Friday, 13 February 2026

कबीर और नारी स्त्री

#तुलसीदास जी को गलत ठहराने वाले नारी समर्थको कबीर दास जी के बारे में क्या ख्याल है आप का जिन्होंने 
स्त्री उपहास में बहुत तीखा तीखा मसाला पेश किया है।
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#तुलसीदास जी के एक दोहे पर चर्चाओं का बाजार इतना गर्म हो गया कि ठंडा होता नज़र ही नहीं आता #तो फिर क्यों न कबीर दास जी के उन स्त्री उपहास में लिख गए दोहों पर चर्चा हो जिनमें स्त्रियों का घोर अपमान झलकता है                                                       #आप तुलसीदास जी द्वारा रचित दोहे पर अर्थहीन और बेतुके कुतर्क और चर्चा करते हैं तो फिर कबीर के नारी विरोधी दोहे पर क्यों नहीं करते??                         #यदि तुलसीदास स्त्री विरोधी थे तो फिर कबीर दास क्या थे ? पांच सौ साल पुराने किसी दोहे को लेकर आज आधुनिक युग में अल्पज्ञानी लोग बहस का मुद्दा बनाते हैं तो फिर कबीर को कैसे छोड़ रखा है ?

#मतलब  आप लोगों को सिर्फ सनातन धर्म का विरोध करना है और यही आप का एक सूत्रीय कार्यक्रम है। 
अब आप लोग जरा कबीर दास जी के दोहों को भी दोहरा लीजिए 👇👇👇👇

#नारी की झांई पड़त, अंधा होत भुजंग
कबिरा तिन की कौन गति, जो नित नारी को संग

     अर्थ #नारी की छाया पड़ते ही सांप तक अंधा हो जाता है, फिर सामान्य मनुष्य की बात ही क्या है?

#कबीर नारी की प्रीति से, कितने गये गरंत
  कितने और जायेंगे नरक हसंत हसंत।

   #अर्थ  नारी से प्रेम के कारण अनेक लोग बरबाद हो गये और अभी बहुत सारे लोग हंसते-हंसते नरक जायेंगे।

 #कबीर मन मृतक भया, इंद्री अपने हाथ
तो भी कबहु ना किजिये, कनक कामिनि साथ।

 #अर्थ यदि आपकी इच्छाएं मर चुकी हैं और आपकी विषय भोग की इन्द्रियां भी आपके हाथ में हैं, तो भी आप धन और नारी की चाहत न करें।

 #कलि मंह कनक कामिनि, ये दौ बार फांद
   इनते जो ना बंधा बहि, तिनका हूं मैं बंद।

 #अर्थ कलियुग में जो धन और स्त्री के मोह में नहीं फंसा      है,भगवान उसके हृदय से बंधे हुये हैं
क्योंकि ये दोनों माया मोह के बड़े फंदे हैं।

 #कामिनि काली नागिनि, तीनो लोक मंझार
  हरि सनेही उबरै, विषयी खाये झार।

 #अर्थ स्त्री काली नागिन है, जो तीनों लोकों में व्याप्त है। परंतु हरि का प्रेमी व्यक्ति उसके काटने से बच जाता है। वह विषयी लोभी लोगों को खोज-खोज कर काटती है।

 #कामिनि सुन्दर सर्पिनी, जो छेरै तिहि खाये
जो हरि चरनन राखिया, तिनके निकट ना जाये।

#अर्थ नारी एक सुन्दर सर्पिणी की भांति है। उसे जो छेड़ता है उसे वह खा जाती है। पर जो हरि के चरणों मे रमा है उसके नजदीक भी वह नहीं जाती है।

 #नारी कहुँ की नाहरी, नख सिख से येह खाये
 जाल बुरा तो उबरै, भाग बुरा बहि जाये।

#अर्थ इन्हें नारी कहा जाय या शेरनी। यह सिर से पूंछ तक खा जाती है। पानी में डूबने वाला बच सकता है पर विषय भोग में डूबने वाला संसार सागर में बह जाता है।

  #छोटी मोटी कामिनि, सब ही बिष की बेल
  बैरी मारे दाव से, येह मारै हंसि खेल।

#अर्थ  स्त्री छोटी बड़ी सब जहर की लता है।
दुश्मन दांव चाल से मारता है पर स्त्री हंसी खेल से मार देती है।

  #नागिन के तो दोये फन, नारी के फन बीस
  जाका डसा ना फिर जीये, मरि है बिसबा बीस।
#अर्थ नागिन के तो दो फन होते जिसका काटा बच सकता है लेकिन स्त्रियां बीसों फन बाली होती हैं ये एक बार में बीस को एक साथ मार सकतीं हैं 
आज तक मैंने इतने प्रगतिशील, स्त्री चिन्तन करने वाले लेखकों को कबीरदास के विरोध में लिखते नहीं देखा। क्योंकि वह उनके एजेंडे को सूट नहीं करता।                                🙏🙏 🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏
माफी और क्षमा के साथ कहना चाहूंगी कि ये उन समाज विरोधियों के लिए सिर्फ एक आईना मात्र है,जो बिन सोचे समझे अधूरा ज्ञान बघार रहे हैं मेरी पोस्ट का किसी तरह का कोई वाद विवाद से मतलब नहीं है #और हां ये सारी जानकारी गूगल पर उपलब्ध है जिनको सन्देह हो वो सर्च करके संतुष्टि कर सकते हैं 🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏

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