Sunday, 27 September 2026

नाभि तंत्र

 तुम्हारे पूरे अस्तित्व का 'मास्टर स्विच' (Master Switch) तुम्हारी नाभि में लगा है।

प्रामाणिक ग्रंथ: शिव संहिता (मणिपूर चक्र एवं नाड़ी-विज्ञान प्रकरण)

मूल शास्त्र श्लोक:
नाभि-कन्दे समुत्पन्नाः सार्ध-लक्ष-त्रयी-सिराः।
तासां मध्ये प्रधानास्तु द्विसप्तति-सहस्रकाः॥

सरल अर्थ: मनुष्य के नाभि-कंद (Navel) से साढ़े तीन लाख नाड़ियां उत्पन्न होती हैं, जिनमें से 72,000 प्रमुख नाड़ियां पूरे शरीर में फैलती हैं। नाभि ही संपूर्ण शरीर, प्राण और ब्रह्मांडीय ऊर्जा का एकमात्र मुख्य नियंत्रण द्वार है।

एक बहुत ही कड़वा सच आज तुम्हें समझना होगा।

आधुनिक विज्ञान आज जिसे 'गट-ब्रेन एक्सिस' (Gut-Brain Axis) कहता है, सनातन तंत्र उसे हजारों साल पहले ही 'मणिपूर चक्र' घोषित कर चुका है। जब तुम रात को दिन भर की चिंताओं, कर्जों और ईर्ष्या के साथ बिस्तर पर जाते हो, तो तुम्हारी नाभि का ऊर्जा-केंद्र पूरी तरह सूख और सिकुड़ जाता है।

इस सूखी हुई नाड़ी का सबसे पहला और मारक प्रहार सीधे तुम्हारे Subconscious Mind (अवचेतन मन) पर होता है। तुम्हारी Sleep Quality और Mental Clarity रातों-रात नष्ट हो जाती है। तुम रात भर भयानक सपनों और विचारों के चक्रव्यूह में उलझे रहते हो। तुम चाहे जितना भी Stress Management का दिखावा कर लो, तुम्हारी नाभि की ब्लॉकेज के कारण तुम्हारे व्यापार या नौकरी में तुम्हारी Peak Performance बिल्कुल शून्य पर आ जाती है। तुम फैसले गलत लेते हो, घबराते हो, और तुम्हारी मानसिक शक्ति घुटने टेक देती है।

लेकिन सनातन तंत्र में नाभि को जाग्रत करने का एक ऐसा उग्र और अचूक अस्त्र है, जिसे यदि तुमने रात को सोने से पहले केवल 2 मिनट दे दिए, तो ब्रह्मांड की कोई भी शक्ति तुम्हें तुम्हारे लक्ष्य से नहीं भटका पाएगी। यह विद्या तुम्हें इंसान से महामानव बना देगी।

गुप्त 'नाभि-चक्र जागरण' मारक विधान

यह प्रयोग तुम्हें हर रात सोने से ठीक पहले, अपने बिस्तर पर लेटकर करना है।

साधना विधि:

1. रात को जब तुम्हारे सारे काम खत्म हो जाएं और तुम सोने के लिए बिस्तर पर जाओ, तो अपने पास शुद्ध सरसों का तेल (Mustard Oil) या असली गौ-घृत (Cow's Ghee) की कुछ बूंदें रख लो।

2. सीधे पीठ के बल लेट जाओ। अपने दाहिने हाथ (Right Hand) की मध्यमा उंगली (Middle finger - जो आकाश तत्व और ऊर्जा का केंद्र है) में वह तेल या घी लगाओ।

3. अपनी नाभि (Navel) के ठीक बीच में उस तेल की केवल 2 बूंदें डालो।

4. अब अपनी आंखें बंद करो। अपनी उसी उंगली से नाभि के चारों ओर धीरे-धीरे गोल (Clockwise) मालिश करो।

5. अपना पूरा ध्यान नाभि के उस बिंदु पर लगाओ और पूर्ण अधिकार व प्रचंड ऊर्जा के साथ इस 'मणिपूर-जागरण बीज मंत्र' का 21 बार मानसिक उच्चारण करो:

"ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं मणिपूर-चक्राय, मम सर्व-सिद्धिं जाग्रय जाग्रय फट्।"

6. मंत्र पूरा होने के बाद, सीधे करवट लेकर सो जाओ। मोबाइल या किसी भी अन्य वस्तु को मत छूना।

परिणाम:
तंत्र शास्त्र के अनुसार, नाभि में तेल और मंत्र का यह आघात तुम्हारी 72,000 नाड़ियों को उसी क्षण 'अनलॉक' (Unlock) कर देता है। रात भर जब तुम सो रहे होते हो, तुम्हारा अवचेतन मन ब्रह्मांड की सबसे शुद्ध ऊर्जा से जुड़कर प्रोग्राम (Program) हो रहा होता है। 11 से 21 दिनों के भीतर तुम देखोगे कि तुम्हारा डर खत्म हो गया है, तुम्हारी एकाग्रता अजेय हो गई है, और जो लक्ष्य कल तक असंभव लग रहे थे, वे हकीकत में बदलने लगे हैं।


बलि के भी विविध रूप

अभी एक पण्डितजी ने पूछा- आचार्यजी! आपने बलि पर कोई विचार नहीं लिखा? "निवृत्तिस्तु महाफला" का भाव क्या है?

🌺श्रीमन्! लिखा तो था परन्तु एकपक्षीय विचार की अपेक्षा रखने के कारण आपने देखा नहीं। उभय पक्षों में प्रमाणवचनों की कमी नहीं है और बलि के भी विविध रूप हैं। निष्कर्षत: सिद्ध होता है "यदन्न: पुरुषो लोके तदन्नास्तस्य देवता:" व्यक्ति में जिस अन्न को खाने की प्रवृत्ति होती है, उसके देवता-पितर भी वही खाते हैं। "वयं यदन्ना: पितरस्तदन्ना:" का भी यही भाव है। अन्न का तात्पर्य केवल "सिद्धमन्नम्" ओदन ही नहीं होता; "पचाम्यन्नं चतुर्विधम्" भाष्य के अनुसार "यदद्यते भक्ष्यते सर्वप्राणिभिरिति अन्नम्" यानी भक्ष्य, भोज्य, लेह्य, चोष्य के रूप में प्राणिमात्र का आहारद्रव्य अन्न ही कहलाता है। उपनिषदों के #सप्तान्नसृष्टि प्रकरण में जल, दुग्ध, वायु, आमिषादि को भी #अन्न ही कहा गया है। जिसे जो अन्न प्रिय हो वह अपने देवता को वही समर्पित कर उसका ग्रहण करे। स्वतन्त्र प्रवृत्ति का परिशमन ही स्वेष्टपूजाङ्ग बलि का प्रयोजन है। "निवृत्तिस्तु महाफला" मनुस्मृति में भी अनुपाकृत यानी यज्ञभागभिन्न वृथा मांस की ही निवृत्ति इष्ट है, न कि क्रत्ववशिष्टपल की। धर्मशास्त्रों में प्रोक्षिताभ्युक्षित आमिष को #हविष्यान्न ही कहा गया है। इसीलिए देवपितृयज्ञावशिष्ट मांसाशन की आज्ञा देने में शास्त्र किञ्चिदपि संकोच नहीं करते हुए कहते हैं कि "देवपितृ्न्समभ्यर्च्य खादन्मांसं न दोषभाक्" देव-पितरों के समभ्यर्चनशेष हविष्यामिष का ग्रहण करने में दोष नहीं; अपितु ग्रहण न करने वालों को ही दोषी कहा है। अत: जिनकी मांसाशन में प्रवृत्ति है वे स्वतन्त्र उच्छृङ्लता का परित्याग कर क्रत्वङ्ग आमिष को ही ग्रहण करे और जो मांसाशन में प्रवृत्त नहीं हैं वे बलि में अन्य प्रतिनिधि द्रव्यों का प्रयोग करे। पुन: जो मांसाशन नहीं करते वे वैष्णव और जो करते वे अवैष्णव- शास्त्रज्ञों के लिए ऐसी कोई बात नहीं। धर्म में विकृति तब फैलती है जब अमुकामुक विषयों से सर्वथानभिज्ञ व्यक्ति सर्वोच्च न्यायालय के सबसे बड़े न्यायाधीश बन जाते हैं। वस्तुत: किसी एक पक्ष पर किसी का उछलना-कूदना सही नहीं। आमिषाशी महानुभावों का विशेष कर्तव्य है कि वे श्रौतक्रतुओं को भी बचाने का विशेष संघर्ष करें। जय शिव..

☹️जिस मिथिलापुरी को एक कार्यक्रम में चौदह सौ मीमांसकों का संयोग प्राप्त था; वहाँ मीमांसा के अस्तित्व का विलोप होते जाना अतिदु:खद है! आधुनिक मिथिला के मण्डन, वाचस्पतियों को गम्भीरता से इसकी चिन्ता करनी चाहिए। मिथिला के सरकारी-असरकारी श्रौतस्मार्त्तों से निवेदन है कि वे दर्श-पौर्णमासादि प्रकृति-विकृति यागों का समारम्भ करें। इसका श्रीगणेश मिथिला के सर्वोच्चसंस्कृतसंस्थान से होना चाहिए। देश के अन्यान्य संस्कृतसंस्थानों के लिए भी अवश्यकरणीय। यज्ञ विश्व का जीवन है। विशेष भगवदिच्छा.....

Saturday, 26 September 2026

पितृपक्ष के दौरान किसी के घर अन्न-जल क्यों नहीं ग्रहण करे

पितृपक्ष के दौरान किसी के घर अन्न-जल क्यों नहीं ग्रहण करना चाहिए....

सनातन धर्म में 16 दिन का पितृपक्ष, सबसे संवेदनशील, सबसे सूक्ष्म दिनों का समय माना गया है। गरुड़ पुराण, जो मृत्यु और मृत्यु के बाद के विज्ञान का ग्रंथ है, वह स्पष्ट कहता है - इन 16 दिनों में आपका शरीर केवल आपका नहीं रहता, आप अपने पितरों के लिए एक "पात्र" बन जाते हैं।इसलिए इस दौरान भोजन का नियम सबसे कठोर है।
भाग 1 - गरुड़ पुराण क्या कहता है - अन्न ही शरीर नहीं, अन्न ही मन है
गरुड़ पुराण, प्रेत कल्प, अध्याय 17 और 33 में भगवान विष्णु, गरुड़ जी को समझाते हैं अन्नं ब्रह्म रसं विष्णुः भोक्ता देवो महेश्वरःअन्न ब्रह्मा है, उसका रस विष्णु है,र से खाने वाला जीव, स्वयं महेश है। इसलिए अन्न को कभी सामान्य मत समझो
और दूसरा श्लोक जैसा अन्न वैसा मन, जैसा पानी वैसी वाणी
गरुड़ पुराण कहता है, अन्न के 3 दोष होते हैं, जो खाने वाले के अंदर चले जाते हैं जाति दोष  अन्न किसने उगाया किस भाव से उगाया अगर किसान ने लोभ, क्रोध से उगाया, तो वह भाव अन्न में आएगा।
2. निमित्त दोष - अन्न बनाते समय, बनाने वाले के मन में क्या था? अगर रसोई में झगड़ा हो रहा है, गाली दी जा रही है, तो वह अन्न विष बन जाता है। इसलिए कहा - रसोई में कभी अशुद्ध मन से भोजन मत बनाओ।
3. आश्रय दोष -अन्न किसके घर का है? किसके पैसे से आया? अगर वह पैसा पाप से, चोरी से, ब्याज से, धोखे से आया है, तो उस अन्न में पाप का अंश आ जाता है।
पितृपक्ष में यही तीसरा दोष, सबसे खतरनाक हो जाता है।
भाग 2 - पितृपक्ष में आपके साथ कौन रहता है - सूक्ष्म विज्ञान
गरुड़ पुराण के अनुसार, मृत्यु के बाद जीव के 2 शरीर बचते हैं - सूक्ष्म शरीर और कारण शरीर। पितृपक्ष में यमराज, पितरों को 16 दिन के लिए, पितृलोक से मुक्त करते हैं, वे अपने पुत्र-पौत्रों के घर आते हैं, उनके द्वार पर, उनकी रसोई में, उनकी छाया में रहते हैं।वे कुछ खाते नहीं, वे केवल गंध और भाव ग्रहण करते हैं।
आप जो भी खाते हो, जो भी सोचते हो, उसका सूक्ष्म अंश, आपके पितरों को जाता है अब सोचो, आप किसी और के घर खाते हो -
उस घर में मांस-मदिरा बनता हो, तो उसका दोष आपके पितरों को जाएगा उस घर में पितरों का श्राद्ध न होता हो, पितर अतृप्त हों, तो उनकी अतृप्ति, ईर्ष्या, आपके पितरों से टकराएगी उस घर का पैसा, अगर अधर्म से आया है, तो आपके पितर भी उस पाप के भागी बनेंगे।
इसलिए गरुड़ पुराण कहता है - *पितृपक्ष में पुत्र, पितरों के लिए एक "पवित्र घड़ा" है, अगर घड़ा गंदा हो गया, तो पितर जल कैसे पिएंगे?
आपका शरीर ही वह घड़ा है, और अन्न-जल ही उस घड़े का जल है।
भाग 3 - 5 कारण - क्यों नहीं खाना चाहिए दूसरों के घर - गरुड़ पुराण के अनुसार
कारण 1 - आपका शरीर पितरों के लिए यज्ञशाला बन जाता है
इन 16 दिनों में, जब आप तर्पण करते हो, पिंडदान करते हो, ब्राह्मण को भोजन कराते हो, तो आपके पितर, आपके माध्यम से ही तृप्त होते हैं। गरुड़ पुराण कहता है - पुत्र की नाभि से, एक सूक्ष्म नाड़ी, पितरों तक जाती है। जो पुत्र खाता है, वही पितरों को सूक्ष्म रूप में मिलता है।
अगर आप बाहर का, अपवित्र, रजोगुणी, तामसिक अन्न खाओगे, तो आपके पितरों को भी वही मिलेगा, वे तृप्त होने की जगह, और अशांत हो जाएंगे। इसलिए कहा - स्वगृहे भोजनं कुर्यात्" - अपने घर का ही भोजन करो।
कारण 2 - दूसरे के घर का अन्न, आपके व्रत को तोड़ देता है
पितृपक्ष, एक व्रत है, 16 दिन का महाव्रत। जैसे नवरात्रि में 9 दिन व्रत में, आप बाहर का नहीं खाते, क्योंकि आप देवी के लिए पवित्र हो, वैसे ही पितृपक्ष में आप पितरों के लिए पवित्र हो।गरुड़ पुराण कहता है - जो व्यक्ति पितृपक्ष में दूसरे के घर अन्न खाता है, उसका श्राद्ध, पितर ग्रहण नहीं करते, उसके पिंड, कौवे भी नहीं खाते, क्योंकि उसके पिंड में, दूसरे के घर की अशुद्धि आ जाती है।
श्लोक है - परान्नं च परवस्त्रं परशय्या परस्त्रियः, पितृपक्षे विवर्जयेत्।" पितृपक्ष में दूसरे का अन्न, दूसरे का वस्त्र, दूसरे की शय्या, और परस्त्री का संग, त्याग देना चाहिए।
कारण 3 - कर्ज का सिद्धांत - अन्न का कर्ज सबसे बड़ा कर्ज सनातन धर्म में, अन्न का कर्ज, कभी न उतरने वाला कर्ज माना गया है। आपने किसी के घर खाया, तो आप उसके कर्जदार हो गए, सूक्ष्म रूप से।
पितृपक्ष में, आपको केवल 3 के कर्जदार रहना है - देव कर्ज, ऋषि कर्ज, पितृ कर्ज। अगर आपने चौथा कर्ज - मनुष्य का कर्ज - ले लिया, दूसरे के घर खाकर, तो आपके पितृ, आपको श्राप देकर जाएंगे, क्योंकि आपने उनका हिस्सा, दूसरे को दे दिया।गरुड़ पुराण में कथा है - एक ब्राह्मण ने पितृपक्ष में अपने मित्र के घर खीर खाई, उसके पितर, भूखे ही पितृलोक लौट गए, क्योंकि उस खीर पर, मित्र की कामना थी - "मेरा काम हो जाए", पितरों ने कहा - "तूने हमारा अन्न, दूसरे की कामना को दे दिया, जा, तुझे पितृदोष लगेगा।"
कारण 4 - प्रेत और पिशाच बाधा से बचाव गरुड़ पुराण, प्रेत कल्प में, प्रेतों के 18 प्रकार बताता है - जो पितृपक्ष में सबसे ज्यादा सक्रिय होते हैं, क्योंकि इस दौरान यमलोक के द्वार खुले होते हैं। जब आप किसी अनजान घर, होटल, ढाबे, या ऐसे घर में खाते हो, जहाँ का शुद्ध-अशुद्ध पता नहीं, जहाँ लहसुन-प्याज, मांस-मदिरा बनता हो, तो उस अन्न के साथ, प्रेतों की सूक्ष्म ऊर्जा, आपके शरीर में प्रवेश कर जाती है।और जब आपके शरीर में पितर भी हैं, और बाहर से प्रेत भी आ गया, तो दोनों में युद्ध होता है, इसी को पितृदोष, नजर दोष, घर में क्लेश कहा जाता है।इसलिए पुराने लोग कहते थे - पितृपक्ष में होटल का मत खाओ, बाहर का मत खाओ, अपने हाथ से बना, सादा, सात्विक खाओ।कारण 5 - आपके पुण्य का ट्रांसफर हो जाता है गरुड़ पुराण का सबसे गुप्त सिद्धांत - अन्न दान, पुण्य का ट्रांसफर है जब आप किसी के घर खाते हो, तो अनजाने में, आपका 1 दिन का श्राद्ध-पुण्य, उस घर के पितरों को चला जाता है, और आपके पितर खाली हाथ रह जाते हैं।जैसे मोबाइल से पैसा ट्रांसफर होता है, वैसे ही अन्न से पुण्य ट्रांसफर होता है, इसलिए पितृपक्ष में केवल उसी के घर खाना चाहिए, जिसके पितर, आपके पितरों के मित्र हों, यानी आपका अपना परिवार, आपका अपना घर।भाग 4किन-किन जगहों पर बिल्कुल नहीं खाना चाहिए - गरुड़ पुराण की सूची
गरुड़ पुराण में, 8 जगहों का अन्न, पितृपक्ष में महापाप बताया गया है -
1. शूद्र या अपवित्र व्यक्ति के घर - जहाँ शौच-अशौच का ध्यान न हो।
2.  शराबी, मांसाहारी के घर - जहाँ जीव हत्या होती हो।
3.  पुत्रहीन, श्राद्धहीन घर में -जहाँ कभी पितरों के नाम पर दीया भी न जलता हो, वहाँ के पितर अतृप्त हैं, वे आपका पुण्य छीन लेंगे।
4. वेश्या, परस्त्रीगामी के घर -जहाँ काम वासना का वास हो।
5. ब्याज, चोरी, रिश्वत से कमाने वाले के घर - उसका पैसा अपवित्र है।
6.श्राद्ध के दिन, निमंत्रण के बिना, दूसरे के घर -जो श्राद्ध में बिना बुलाए जाता है, वह पाप खाता है।
7.  होटल, ढाबा, बाजार का भोजन - जहाँ बनाने वाले का पता नहीं, वहाँ 100 लोगों की वासना, उस अन्न में होती है।
8.  दूसरे के श्राद्ध का बचा हुआ अन्न - अगर किसी और ने अपने पितरों के नाम पर ब्राह्मण को खिलाया, और वह बच गया, उसे कभी मत खाओ, वह सीधे पितरों का अन्न है, उसे खाने से पितृदोष लगता है।
भाग 5 - क्या खाना चाहिए, कैसे खाना चाहिए - पितृपक्ष का आहार विधान तो फिर खाना क्या चाहिए? गरुड़ पुराण, अध्याय 21 में आहार विधान देता है -खाने योग्य -
- अपने घर में, अपने हाथ से, या पत्नी, माता, पुत्री के हाथ से बना, गाय के घी में बना, सादा भोजन।
- बिना लहसुन-प्याज का, बिना मसूर, उड़द, चना, हींग का - क्योंकि ये तामसिक हैं, पितरों को उत्तेजित करते हैं।जौ, चावल, गेहूं, मूंग, गाय का दूध, दही, घी, शहद, फल, कंद-मूल। एक बार भोजन, ब्रह्म मुहूर्त में नहीं, दिन में एक बार, सात्विक।
- भोजन से पहले, अपने पितरों के नाम पर, गाय, कौवा, कुत्ता, चींटी के लिए, थोड़ा निकालना, जिसे पंचबलि कहते हैं।न खाने योग्य -
- 16 दिन - मांस, मछली, अंडा, शराब, लहसुन, प्याज, मसूर, चना, उड़द, बैंगन, लौकी (कुछ जगह), पान, तंबाकू।बासी, जूठा, दोबारा गर्म किया हुआ भोजन।जल का नियम -पितृपक्ष में पानी भी, किसी के घर का नहीं पीना चाहिए, खासकर जो तामसिक हो। अपना पानी, अपने घर का, या गंगा जल, या कुएं का साफ पानी। क्योंकि जल भी, अन्न की तरह, भाव ग्रहण करता है।कहा गया है - जलं पीत्वा परगृहे, पितृणां तृप्ति नश्यति।" दूसरे के घर जल पीने से, पितरों की तृप्ति नष्ट हो जाती है।
भाग 6 - अपवाद - कब दूसरे के घर खा सकते हैं?गरुड़ पुराण, कठोर है, पर करुण भी है, 3 अपवाद देता है -
1. गुरु के घर -अपने गुरु, आचार्य, ज्ञानी ब्राह्मण के घर, पितृपक्ष में खा सकते हैं, क्योंकि गुरु का अन्न, अमृत है, वह आपके पितरों को भी तृप्त करता है।
2. पुत्री के घर -पिता, अपनी विवाहित पुत्री के घर, पितृपक्ष में अन्न नहीं खाता, यह नियम है, पर पुत्री, अपने पिता के घर खा सकती है, क्योंकि पुत्री का संबंध, पिता के पितरों से भी है।
3. आपातकाल में - अगर आप यात्रा में हो, बीमार हो, और अपना भोजन संभव नहीं, तो फल, दूध, गंगा जल लेकर, पितृभ्यो नमः"कहकर, भगवान विष्णु को अर्पण करके, खा सकते हैं, दोष नहीं लगेगा, क्योंकि भाव शुद्ध है।पर होटल, मित्र के घर पार्टी, शादी, बर्थडे में, पितृपक्ष में जाना, और वहां खाना, गरुड़ पुराण में महादोष कहा गया है, इससे पितृ नाराज होकर, पितृदोष देते हैं - घर में क्लेश, संतान बाधा, धन हानि, बीमारी।भाग 7 - आज के जीवन में कैसे पालन करें - प्रैक्टिकल उपाय
आज तो नौकरी है, बाहर रहना पड़ता है, तो कैसे करें? 5 उपाय -
1. टिफिन ले जाओ - 16 दिन, अपने घर से टिफिन ले जाओ, ऑफिस में भी अपना ही खाओ।
2. फलाहार करो -अगर बाहर हो, तो केवल फल, दूध, मूंगफली, गंगा जल, तुलसी दल लो, यह पवित्र है।
3. मानसिक क्षमा मांगो - अगर गलती से, बाहर खा लिया, तो रात को, दक्षिण दिशा में मुंह करके, हाथ में जल लेकर, कहो - "हे मेरे पितरो, आज मैंने अज्ञान में, परान्न ग्रहण किया, मुझे क्षमा करो, मैं कल से ध्यान रखूंगा, और इसके प्रायश्चित में, मैं एक ब्राह्मण को भोजन कराऊंगा, या गाय को चारा दूंगा।"
4. गायत्री मंत्र से शुद्धि - भोजन से पहले, 3 बार गायत्री मंत्र पढ़कर, भोजन पर फूंक मारो, तो उसका दोष 50% कम हो जाता है, यह गरुड़ पुराण का ही उपाय है।
5. तुलसी दल डालो - कोई भी भोजन, जल, अगर बाहर का लेना ही पड़े, तो उसमें तुलसी का पत्ता डाल दो, तुलसी, विष्णु प्रिया है, वह हर अन्न को पवित्र कर देती है, प्रेत बाधा नहीं आने देती।अंतिम - पितृपक्ष, भूखे रहने का नहीं, पवित्र रहने का पर्व हैपितृपक्ष, डरने का पर्व नहीं, प्रेम का पर्व है, 16 दिन, आपके पितर, आपके मेहमान हैं, जैसे घर में मेहमान आए तो आप घर साफ रखते हो, बाहर का गंदा नहीं खाते, वैसे ही।गरुड़ पुराण का सार, एक ही लाइन में -"पितृपक्षे परान्नं यस्तु भुंक्ते मोहात् नराधमः, तस्य पितरो निराशा वै प्रयान्ति यममंदिरम्।"जो मनुष्य, मोहवश, पितृपक्ष में दूसरे का अन्न खाता है, उसके पितर निराश होकर, यमलोक लौट जाते हैं, और उसे श्राप देकर जाते हैं।और जो व्यक्ति, 16 दिन, अपने घर का, पवित्र, सात्विक अन्न, पितरों को याद करके खाता है, उसके पितर, उसे आशीर्वाद देते हैं - धनं धान्यं संतानं, सुखं समृद्धि वर्धताम्।इसलिए इस पितृपक्ष, प्रण लो - बाहर का नहीं, अपना खाऊंगा, पवित्र खाऊंगा, पितरों को तृप्त करूंगा।क्योंकि अन्न ही मन है, और मन ही पितरों तक जाता है।
 इति गरुड़ पुराणोक्त पितृपक्ष परान्न निषेध कथा संपूर्णा --

सोमनाथ मंदिर और इतिहास

सोमनाथ, अरबों की देवी अल मनात और महमूद...
क्या गजनवी ने लूट के लिए सोमनाथ पर हमला किया था❓ 

क्या कहते हैं उसके समकालीन मुस्लिम इतिहासकार❓

👀👉 सर्दियों का मौसम था।

ग़ज़नी का सुल्तान महमूद बिन सुबुक्तगीन, जिसे इतिहास महमूद ग़ज़नवी के नाम से जानता है, भारत की ओर एक और अभियान की तैयारी कर रहा था।

लेकिन इस बार उसकी दिशा पहले के अभियानों से अलग थी।

लक्ष्य था समुद्र के किनारे स्थित एक ऐसा प्रसिद्ध हिंदू तीर्थ, जिसकी ख्याति गजनी में महमूद तक पहुँच चुकी थी।

नाम था सोमनाथ (द्वादश ज्योतिर्लिंगों में प्रथम)।

साल था हिजरी (इस्लामी कैलेंडर) 416, अर्थात 1025–26 ईस्वी।

इस अभियान का सबसे महत्वपूर्ण प्रारंभिक विवरण हमें  उन्हीं मुस्लिम लेखकों से मिलता है जो महमूद के समय में ही लिख रहे थे।

उनमें सबसे महत्वपूर्ण नाम हैं : अबू रेहान अल-बिरूनी, अबू सईद अब्दुल-हय गारदीज़ी और महमूद के दरबार से जुड़े कवि फर्रुख़ी सिस्तानी।

👉  सबसे पहले सोमनाथ मंदिर को देखें।

अल-बिरूनी ने अपनी प्रसिद्ध कृति " तहकीक मा लिल हिन्द मिन माकूलात माकूलात फी अलीअकबाल आम माजुला", या "किताबुल हिंद" में सोमनाथ विध्वंस का उल्लेख किया है।

वे उसके नाम की व्याख्या करते हुए बताते हैं कि सोम का अर्थ चंद्रमा और नाथ का अर्थ स्वामी है अर्थात चंद्रमा का स्वामी।

उनके अनुसार सोमनाथ समुद्र के किनारे स्थित था और सरस्वती नदी के मुहाने से लगभग तीन मील की दूरी पर था।

वे वहाँ के धार्मिक विश्वास का वर्णन करते हुए बताते हैं कि समुद्र का ज्वार बढ़ने पर उसका पानी मंदिर में स्थित शिवलिंग तक पहुँचता था। इस प्रकार समुद्र स्वयं शिवलिंग का जलाभिषेक करता था। 

अल-बिरूनी केवल भौगोलिक स्थिति नहीं बताते।

वे उस पौराणिक कथा को भी दर्ज करते हैं जिसके अनुसार सोम अर्थात चंद्रमा ने प्रजापति की पुत्रियों से विवाह किया था, लेकिन रोहिणी के प्रति विशेष प्रेम के कारण उसे शाप मिला। प्रायश्चित के लिए उसने शिव लिंग की स्थापना की और वही शिवलिंग सोमनाथ नाम से प्रसिद्ध हुआ।

इस प्रकार अल-बिरूनी ने सोमनाथ के नाम और उसकी पौराणिक प्रतिष्ठा दोनों को दर्ज किया। 

📜 अल-बिरूनी ने सोमनाथ के विनाश के बारे में क्या लिखा?

सोमनाथ की भौगोलिक स्थिति, प्रसिद्धि और उसकी धार्मिक कथा बताने के बाद अल-बिरूनी एक ऐसी सूचना देते हैं जिसे इस घटना के इतिहास में विशेष महत्व प्राप्त है।

वे लिखते हैं कि हिजरी 416 (1025–26 ईस्वी) में अमीर महमूद ने सोमनाथ के विग्रह को नष्ट कर दिया। महमूद ने उसके ऊपरी भाग को तोड़ने का आदेश दिया और शेष भाग को उसके सोने, रत्नों तथा कढ़ाईदार वस्त्रों सहित ग़ज़नी ले जाने का आदेश दिया।

अल-बिरूनी के अनुसार, ग़ज़नी पहुँचने के बाद उस विग्रह का एक भाग नगर के हिप्पोड्रोम(मैदान-ए-गज़नी) में थानेसर से लाई गई कांस्य मूर्ति चक्रस्वामिन् के साथ डाल दिया गया। दूसरा भाग ग़ज़नी की मस्जिद के दरवाजे के सामने रखा गया, जहाँ लोग उस पर अपने पैर रगड़कर मिट्टी और गंदगी साफ करते हुए मस्जिद में प्रवेश करते थे।

अर्थात अल-बिरूनी के वृत्तांत में केवल यह नहीं है कि “मंदिर पर हमला हुआ” या “मूर्ति तोड़ी गई”; वे यह भी बताते हैं कि विग्रह (मूर्ति) के साथ विजय के बाद क्या किया गया और उसके टुकड़ों को ग़ज़नी में किस प्रकार प्रदर्शित किया गया।

यही कारण है कि सोमनाथ पर महमूद के हमले के लिए अल-बिरूनी का विवरण विशेष महत्व रखता है। यह घटना के कुछ दशकों के भीतर लिखा गया एक ऐसे मुस्लिम विद्वान का स्पष्ट विवरण है जिसने महमूद को और इन चीजों को बहुत ही नजदीक से देखा था।

👉  अब गारदीज़ी का दिया विवरण देखते हैं।

अबू सईद अब्दुल-हय गारदीज़ी ने अपनी फ़ारसी इतिहास-कृति "ज़ैन-अल-अख़बार (Zayn al-Akhbar)" में महमूद के जीवन और ग़ज़नवी अभियानों का वर्णन किया है।

यह पुस्तक महमूद की मृत्यु के लगभग दो दशक बाद की ही है और गारदीज़ी ग़ज़नवी दरबार तथा प्रशासन से निकट रूप से जुड़े हुए थे। उनकी पुस्तक में महमूद के शासन का विवरण 999 ईस्वी के बाद अधिक विस्तृत हो जाता है। 

गारदीज़ी बताते हैं कि महमूद को एक ऐसी जगह के बारे में समाचार मिला जो महासागर के किनारे स्थित एक महान नगर थी।

नाम था सोमनाथ।

वे लिखते हैं कि भारतीय उस स्थान को उसी प्रकार पूजते थे जिस प्रकार मुसलमान मक्का को पवित्र मानते हैं।

वहाँ सोने और चाँदी की अनेक मूर्तियाँ थीं।

उनमें एक मूर्ति के बारे में गारदीज़ी मनात (Manāt) जो इस्लाम पूर्व के अरब की प्रमुख देवी थी, का नाम लेते हैं और लिखते हैं कि वह सोने से अलंकृत तथा रत्नों से जड़ी हुई थी।

📜 मनात कौन थी और सोमनाथ से उसका क्या संबंध  था ?

मनात (Manāt) इस्लाम-पूर्व अरब की प्रमुख देवियों में से एक थी। उसका नाम अल-लात और अल-उज़्ज़ा के साथ आता है। पश्चिमी अरब में उसका एक प्रमुख तीर्थ था और उसे भाग्य अथवा नियति की देवी माना जाता था। इस्लाम के उदय से पहले अरब के धार्मिक जीवन में इन देवियों की पूजा महत्वपूर्ण थी।

लेकिन ग़ज़नवी इतिहासकार अबू सईद गारदीज़ी ज़ैन-अल-अख़बार में सोमनाथ के संबंध में एक अलग और अत्यंत रोचक कथा दर्ज करते हैं।

स्वयं गारदीज़ी के  शब्दों में 
"और अमीर महमूद—अल्लाह उस पर दया करे—बल्ख से ग़ज़नी आया और गर्मी का मौसम वहीं बिताया। और जब सर्दी आई, तो अपनी प्रथा और आदत के अनुसार युद्ध के लिए हिंदुस्तान की ओर गया।
और उसके सामने यह बात कही गई कि समुद्र-ए-मुहीत के किनारे एक बड़ा नगर है, जिसे सोमनात कहते हैं। और वह नगर हिंदुओं के लिए वैसा ही है जैसा मुसलमानों के लिए मक्का।
और उसमें सोने और चाँदी की बहुत-सी मूर्तियाँ हैं।
और मनात, जिसे सैय्यद (अर्थात इस्लाम के पैग़ंबर) के समय काबा से अदन के रास्ते वहाँ से निकालकर ले जाया गया था, वहीं है। और उन्होंने उसे सोने से मढ़ रखा है तथा उसमें रत्न जड़े हुए हैं। और उस मूर्तिगृह के खज़ानों में बहुत बड़ी संपत्ति रखी हुई है।
लेकिन वहाँ तक पहुँचने का रास्ता बहुत ख़तरनाक, भयावह और अत्यन्त कष्टपूर्ण है।"

गारदीजी आगे लिखता है:
"और जब अमीर महमूद—अल्लाह उस पर दया करे—ने यह समाचार सुना, तो उसके मन में उस नगर तक जाने, उन मूर्तियों को नष्ट करने और एक ग़ज़ा/धार्मिक सैन्य अभियान करने की इच्छा उत्पन्न हुई।
और वह हिंदुस्तान से सोमनाथ की ओर, नहरवाला के रास्ते, चला।
जब वह नहरवाला नगर पहुँचा, तो वह खाली किया जा चुका था और उसके सभी लोग भाग गए थे। उसने सेना को वहाँ से चारे की व्यवस्था करने का आदेश दिया और वहाँ से सोमनाथ की ओर चला।"

"और जब वह नगर के निकट पहुँचा और श्रमणों तथा ब्राह्मणों ने उसे देखा, तो वे सभी मूर्तियों की पूजा में लग गए।
और उस नगर का सरदार नगर से बाहर निकला और अपने परिवार तथा सामान के साथ नाव में बैठा और समुद्र में चला गया।
और एक द्वीप पर उतर गया। वे वहीं तब तक रहे जब तक इस्लामी सेना उस प्रदेश से चली नहीं गई; वे उस द्वीप से बाहर नहीं आए।"

"और जब इस्लामी सेना नगर के निकट पहुँची, तो नगर के लोगों ने स्वयं को किलेबंदी के भीतर कर लिया और युद्ध में लग गए।
बहुत समय नहीं बीता कि किलेबंदी टूट गई और अमीर महमूद की सेना उसमें प्रवेश कर गई।
और उन्होंने बहुत भयंकर युद्ध किया, और बहुत से “काफ़िर” मारे गए।"

आगे गारदीजी लिखता है :
"और अमीर महमूद—अल्लाह उस पर दया करे—ने आदेश दिया कि मुअज्ज़िन मंदिर की छत/ऊपरी भाग पर जाए और नमाज़ की पुकार (अज़ान) दे।
और उन सभी मूर्तियों को तोड़ दिया गया, जला दिया गया और नष्ट कर दिया गया।
और मनात के पत्थर को जड़ से उखाड़ दिया गया, उसके टुकड़े-टुकड़े किए गए और उसके कुछ टुकड़े खच्चरों/अस्तरों पर रखकर ग़ज़नी लाए गए।"

"और मूर्तियों के नीचे एक खज़ाना था।
उसने वह खज़ाना ले लिया और वहाँ से बहुत बड़ी संपत्ति प्राप्त की।
अर्थात चाँदी की मूर्तियाँ, रत्नों से जड़ी मूर्तियाँ और दूसरे खज़ानों की लूट—इन सबको ऊँटों पर लादा गया और ग़ज़नी लाया गया।"

"और वहाँ से वह वापस लौट गया।
भीमदेव, हिंदुओं का राजा, रास्ते में था।
अमीर महमूद ने कहा कि ऐसा न हो कि इस महान विजय को कोई क्षति पहुँच जाए। इसलिए वह सीधे रास्ते से नहीं गया और मुल्तान की ओर मुड़ गया।
उस रास्ते में सेना को बहुत कठिनाई हुई और इस यात्रा में इस्लामी सेना के बहुत से लोग मारे गए। यहाँ तक कि मुल्तान पहुँचने से पहले मनुष्यों से अधिक पशु मारे गए।
और वहाँ से वे ग़ज़नी की ओर चले गए।"

👉  अब एक तीसरा विवरण देखते हैं। 

महमूद के दरबार के कवि फर्रुख़ी सिस्तानी ने महमूद ग़ज़नवी के सोमनाथ अभियान पर एक विस्तृत क़सीदा लिखा।  ध्यान रहे कि सिस्तानी इतिहासकार नहीं, एक शायर था।

उसी के शब्द  हिंदी में अनुदित:
"तालाब के चारों ओर एक हजार छोटे-छोटे मंदिर थे। उनके आगे एक विशाल मंदिर था और उसके बीच एक मूर्ति थी—सुंदरता में चंद्रमा जैसी, लेकिन कद में सरू के वृक्ष जैसी। एक दूसरी विशाल आकृति थी, जो सफेद दैत्य जैसी, रास्ते के बीच सिर उठाए दिखाई देती थी। वहाँ नारियल और पोपल के वृक्ष थे, जिनमें हर वृक्ष वर्ष में बार-बार फल देता था। शहर की सीमा पर एक मजबूत किला था और उसमें मूर्तिपूजकों का एक बड़ा समुदाय इकट्ठा था।"

"उसने लोगों को मारा और मंदिरों को तोड़ा तथा जला दिया, जैसे उसने दारनी और थानेसर के मंदिरों के साथ किया था। रास्ते में उससे केवल वही बच पाया जो किसी तिनके या झाड़ी के नीचे छिपा रहा, जैसे कोई दुर्भाग्यशाली पशु। उसने उन छिपे हुए लोगों को खोजे बिना छोड़ दिया, क्योंकि उस राजा का उद्देश्य कुछ और था। जो सोमनाथ के मंदिर को नष्ट करने जा रहा हो, वह छिपे हुए लोगों को खोजने में अपना समय व्यर्थ नहीं करता।"

"बादशाह मनात को नष्ट करने के लिए ही तेजी से आगे बढ़ रहा था; शायद उसकी यही जल्दी इसी कारण थी। मनात, लात और उज़्ज़ा मक्का में तीन मूर्तियाँ थीं—उस समय के मूर्तिकार आज़र के हाथों से बनी हुई। पूरी दुनिया उन तीनों मूर्तियों की पूजा करती थी, सिवाय उस व्यक्ति के जिस पर खुदा की दृष्टि थी। उनमें से दो को पैग़ंबर ने तोड़ दिया और उस दिन दोनों को काबा के सामने डाल दिया गया। मनात को काफ़िरों के बीच से चुरा लिया गया और उस देश से निकालकर किसी दूसरे देश में ले जाया गया। उसे ऐसी जगह ले जाया गया जहाँ आदम के समय से उस भूमि पर किसी काफ़िर के अतिरिक्त कोई बैठा या गया नहीं था।"

"उस मूर्ति के लिए एक मंदिर बनाया गया, जिसमें एक लाख प्रतिमाएँ और एक लाख आकृतियाँ थीं। उस मंदिर पर चारों ओर से श्रद्धा के लिए सोने की पट्टियाँ इस तरह लगाईं गई थीं कि वे पत्थर की पट्टियों जैसी दिखाई देती थीं। मंदिर के भीतर उस मूर्ति के लिए एक ख़ज़ाना बनाया गया था और उस ख़ज़ाने में बड़े-बड़े संदूकों में रत्न रखे थे। उसके लिए नगर-नगर से इतने रत्न खरीदे गए कि रत्न खरीदने वाला रत्न-विक्रेताओं से ही तृप्त हो गया।"

"मूर्ति के सिर के ऊपर एक मुकुट या शिरोभूषण लटकाया गया था, जिस पर माणिकों का काम था और मोतियों की बुनावट थी। उसके लिए शुद्ध सोने का एक शिरस्त्राण बनाया गया था, जो अग्नि के पर्वत जैसा था और उस पर जड़ा रत्न चिंगारी जैसा था। उसका मुकुट और शिरोभूषण किसी पूरे राज्य के कर के बराबर मूल्य का था; और उसकी सबसे कम मूल्यवान वस्तुओं में भी वही मुकुट और शिरोभूषण थे।"

"फिर उन्होंने उसे सोमनात नाम दिया। ऐसा कौन-सा नाम देखा गया है जिसके भीतर उसका दूसरा नाम छिपा हुआ हो? " (यहाँ फर्रुख़ी “सोमनात” के भीतर “मनात” नाम छिपा होने की ओर संकेत करता है।)

"उन्होंने संसार में यह बात फैलाई कि समुद्र से ऐसी आकृति वाली एक मूर्ति निकली है। वह सारे लोगों का नियंता और संसार का कर्ता है; वह सूर्य को प्रकाश देने वाला और चंद्रमा को प्रकाश देने वाला है। उसके ज्ञान से संसार की भलाई और बुराई निर्धारित होती है और उसके आदेश से संसार में भाग्य और नियति चलती है। दूसरे समूह ने कहा—नहीं, इस मूर्ति का स्थान उच्च आकाश में था। किसी मनुष्य ने इसे यहाँ नहीं लाया; यह स्वयं आकाश से यहाँ आई है। यह इसे दिन कहती है और उसे रात; इसे समुद्र कहती है और उसे स्थल। जब यह समुद्र से सिर उठाकर भूमि पर आई, तो सभी वनस्पतियों और वृक्षों ने इसके सामने सजदा किया।"

"गाय ने अपने दूध से इसे धोया और इसी कारण वे गाय को माता कहकर इसकी पूजा या निकटता का साधन मानते हैं। सिर्फ एक पत्थर के कारण ईश्वर की इतनी हजारों प्रजा शैतान की बात पर भरोसा करके संकट में पड़ गई। हर दिन उस पत्थर को धोना उनका कर्तव्य था—गंगा के जल, दूध, केसर और चीनी से। उस मूर्ति को गंगा के जल से धोने के लिए हर दिन दस बड़े प्यालों से भी अधिक जल पहुँचता था। गंगा के जल की क्या बात करूँ—वह सोमनाथ से कई फ़रसख़ ( दूरी मापने की फारसी इकाई) दूर है, उस स्थान से जहाँ यह पतन और अधर्म का स्थान है।"

"जब सूर्य ग्रहण लगता, तो एक लाख बच्चे और पुरुष उसके पास सहायता माँगने और क्षमा माँगने जाते। उन काफ़िरों में जो सोमनाथ हज के लिए जाते थे, उनकी भीड़ रास्ते में एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति से अलग नहीं होती थी। शमन उस पत्थर को ईश्वर कहते हैं—क्या ही व्यर्थ बात है; उनके सिर पर धूल पड़े!"

"खुदाई हुक्म ऐसा था कि वह दीन परवर शहरयार (बादशाह) उस मूर्ति को उसके स्थान से उखाड़ दे। इस उद्देश्य से कि वह उसे मक्का वापस ले जाए, उसने उसे उखाड़ दिया—और अब उसे हमारे साथ-साथ ले जा रहा है।"

"जब उसने उस मूर्ति को वहाँ से उखाड़ लिया और धन तथा सोना ले लिया, तो उसने अपने हाथ से मंदिर के भीतर आग डाल दी। जब सोमनाथ को जलाने का काम पूरा कर लिया, तो उसने लौटने वाले दूसरे लोगों के मार्ग पर प्रस्थान किया।"

महमूद की कशीदगी (प्रशंसा) में सिस्तानी उसे संबोधित करते हुए लिखता है, "तू बहमन के महीने में सोमनाथ जला रहा था, जबकि दूसरे बादशाह ऊद, सुगंधित पदार्थ और अंबर का आनंद ले रहे थे।"

⭐ इस विवरण में सबसे महत्वपूर्ण बात
फर्रुख़ी के वर्णन में मनात और सोमनाथ का संबंध आकस्मिक नहीं है। वह बाकायदा नाम के भीतर “मनात” को छिपा हुआ बताता है और फिर कहता है कि महमूद ने उस मूर्ति को मक्का वापस ले जाने के उद्देश्य से उखाड़ा।

इस प्रकार गारदीज़ी और फर्रुख़ी में एक उल्लेखनीय समानता दिखाई देती है:

- गारदीज़ी: मनात को पैग़ंबर मुहम्मद के समय काबा से अदन के रास्ते सोमनाथ लाए जाने की कथा देता है और उसे “मनात का पत्थर” कहता है।
- फर्रुख़ी: सोमनाथ/सोमनात नाम में “मनात” छिपा होने की व्याख्या करता है और महमूद द्वारा मूर्ति को मक्का वापस ले जाने की बात कहता है।

अर्थात दोनों महमूद के समकालीन स्रोतों में सोमनाथ की मूर्ति को मनात से जोड़ने वाली एक ही व्यापक परंपरा दिखाई देती है, यद्यपि दोनों का विवरण और भाषा अलग है।

👉 वामपंथी और हाल के मुस्लिम इतिहासकार यह सिद्ध करने की कोशिश करते हैं कि गजनवी बस एक लुटेरा था।

लेकिन, प्रथमदर्शी रचनाकारों के अनुसार यह केवल सोने की लूट की कहानी नहीं थी।

यदि उद्देश्य केवल धन प्राप्त करना होता, तो मंदिर से सोना, चाँदी, रत्न और अन्य संपत्ति लेकर वापस लौटना पर्याप्त था।

लेकिन प्रारंभिक मुस्लिम स्रोतों में जो चित्र दिखाई देता है, उसमें मूर्तिभंजन स्वयं विजय का हिस्सा था।

गारदीज़ी लिखते हैं कि महमूद सोमनाथ की मूर्तियों को नष्ट करने की इच्छा से वहाँ पहुँचा। 

अल-बिरूनी बताते हैं कि मूर्ति को तोड़कर उसके टुकड़ों को ग़ज़नी में सार्वजनिक रूप से अपमानित किया गया।

इसलिए प्रारंभिक मुस्लिम सामग्री में धार्मिक उद्देश्य को हटाकर केवल आर्थिक लूट की कहानी बनाना  स्रोतों के साथ न्याय नहीं होगा।

इतिहास की ऐसी ही छिपा दी गई तथ्यात्मक लेखों को पढ़ने के लिए फॉलो करें Prabhat Ranjan 

स्रोत:
1. अल-बिरूनी — किताब अल-हिंद (Kitāb al-Hind)
अंग्रेज़ी अनुवाद: Edward C. Sachau, Alberuni’s India: An Account of the Religion, Philosophy, Literature, Geography, Chronology, Astronomy, Customs, Laws and Astrology of India about A.D. 1030, 2 volumes, Trübner’s Oriental Series, 1887–1888. 
Google Books 

2. अबू सईद अब्दुल-हय गारदीज़ी — ज़ैन अल-अख़बार (Zayn al-Akhbār)
अंग्रेज़ी अनुवाद: C. Edmund Bosworth, The Ornament of Histories: A History of the Eastern Islamic Lands AD 650–1041, I.B. Tauris, 2011. यह गारदीज़ी के Zayn al-Akhbār का अंग्रेज़ी अनुवाद और टिप्पणी सहित संस्करण है। �

3. फर्रुख़ी सिस्तानी — दीवान-ए-फर्रुख़ी सिस्तानी (Dīvān of Farrukhī Sīstānī)
मूल पाठ का प्रमुख आलोचनात्मक संस्करण: मुहम्मद जाबिर दबीर-सियाक़ी (Muhammad Jabir Dabir-Siyāqi), Dīvān-i Farrukhī Sīstānī

सोमनाथ संबंधी अंश का अंग्रेज़ी अनुवाद और विश्लेषण: Th. Emil Homerin, “Saʿdi’s Somnatiyah,” Iranian Studies, जिसमें फर्रुख़ी के दीवान के pp. 69–71, lines 1338ff. का अनुवाद दिया गया है।

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Friday, 25 September 2026

हिंदू महासभा और आरएसएस

राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ (R.S.S.) तब और अब - भाग  2
 
#हिन्दू_महासभा_एवं_आर_एस_एस_के_बीच_कड़वाहट

लेख थोड़ा बड़ा है इसलिए टाइम निकाल कर पूरा पढ़े और कल भाग 1 लिखा था,, भाग 3 भी आयेगा, तीनों पढ़ो तभी फाइनल निष्कर्ष निकलेगा (भाग 1लिंक पिन कमेंट में है)

जैसा विदित है कि वीर सावरकर पहले ही कलकत्ता अधिवेशन के लिये अध्यक्ष चुन लिये गये थे, परन्तु हिन्दू महासभा के अन्य पदों के लिये चुनाव अधिवेशन के मैदान में हुए। सचिव पद के लिये तीन प्रत्याशी थे (1) महाशय इन्द्रप्रकाश, (2) श्री गोलवलकर और (3) श्री ज्योति शंकर दीक्षित। चुनाव हुए और परिणाम स्वरुप महाशय इन्द्रप्रकाश को 80 वोट, श्री गोलवलकर को 40 और श्री ज्योति शंकर दीक्षित को मात्र 2 वोट प्राप्त हुए और इस प्रकार महाशय इन्द्रप्रकाश हिन्दू महासभा कार्यालय सचिव के पद पर चयनित घोषित हुए।

श्री गोलवलकर जी को इस हार से इतनी चिढ़ हो गयी कि वे अपने कुछ साथियों सहित हिन्दू महासभा से दूर होना शुरू हो गये| जून 1940 में डा. हेडगेवार कि अकस्मात मृत्यु हो गयी और उनके स्थान पर श्री गोलवलकर को आर.एस.एस. प्रमुख बना दिया गया। आर.एस.एस. प्रमुख का पद संभालने के थोड़े समय पश्चात ही उन्होंने श्री मारतंडे राव जोग को सर संघ सेनापति के पद से हटा दिया, जिन्हें डा. हेडगेवार ने आर. एस. एस. के उच्च श्रेणी के स्वयं सेवको को सैन्य प्रशिक्षण देने के लिये नियुक्त किया था। इस प्रकार गोलवलकर जी ने अपने ही हाथों आर.एस.एस. की पराक्रमी शक्ति के निर्माण को प्राय: समाप्त ही कर दिया। जिस जुझारू संगठन (मिलीशिया) की स्थापना करना आर.एस.एस. के संस्थापक का उद्देश्य था| वह जुझारूपन, गोलवलकर जी के इस कदम से समाप्त ही हो गया| इसका दुष्परिणाम यह हुआ कि देश विभाजन, चीन व पकिस्तान के आक्रमण के समय जिस समर्पण व भागीदारी की आशा समाज इस राष्ट्रवादी संगठन आर.एस.एस. से करता था, उस दायित्व को आर.एस.एस. निभाने में असफल रहा|

देश विभाजन के समय हिंदू पिटता रहा,अपमानित होता रहा, पर संघ शाखाओं पर कब्बडी ही खेली जाती रही| हाँ हिन्दुओं के खंडित भारत में शरणार्थी के रूप में आने पर, उनके लिए लंगर जरूर लगाये गये| गुरूजी के नेतृत्व में संघ हिन्दुओं की रक्षा की बजाय सेवा कार्य को ही अपना मुख्य कार्य समझने लगा- यहीं इसकी स्थापना के उद्देश्य व ध्येय में अंतर दिखाई देने लगता है| वर्तमान में भी देश पर अंदर व बाहर से हो रहे आतंकी हमलों व सत्ताधीशों द्वारा हिंदू समाज कों जिस प्रकार अपमानित किया जा रहा है उसका मुकाबला करने में इस संगठन की कमजोरी स्पष्ट रूप से देखने को मिल रही है, जब हम और हमारे यह संगठन किसी आतंकी घटना-गुंडागर्दी या सरकार के हिंदू विरोधी कदम का प्रतिकार करने में सक्षम नहीं हो पाते |

यहाँ यह महत्वपूर्ण और उलेखनीय है कि वर्तमान सरसंघ प्रमुख मोहन भागवत जी ने भी आज देश में घटित हो रही आतंकी घटनाओं को देखते हुए हिंदू युवकों के सैन्य प्रशिक्षण की आवश्यकता की मांग की है| स्पष्ट होता है कि गोलवलकर जी वास्तव में किसी भी प्रकार दूरदर्शी नहीं थे| हिंदू समाज व इस राष्ट्र कि रक्षा हेतु जो आवश्यकता वीर सावरकर जी ने “हिन्दुओं के सैनिकीकरण के रूप में सन् 1936 से 1945 के बीच दर्शाई थी, गोलवलकर जी ने मारतंडे राव जोग को सरसंघ सेनापति के पद से हटा कर उससे पूर्णताः उलट कार्य किया| उसी सावरकर की सैनिकीकरण नीति की महत्ता गोलवलकर जी के उत्तराधिकारी मोहन भागवत जी को सावरकर के कथन के 70 वर्ष पश्चात समझ में आ पाई है| इसे क्या कहेंगे| इस बीच देश और समाज को हुई हानी का दायित्व कौन लेगा|

सन् 1935 तक संघ का कार्य धीमी गति परन्तु दृढ विचारधारा से चलता रहा और महाराष्ट्र तक ही सीमित रहा| सन् 1936 के बाद देश में हिंदू मुस्लिम तनाव पुरे उफान पर आया | मुस्लिम लीग ने पकिस्तान की मांग बड़े जोर शोर से उठानी शुरू कर दी थी| इस हेतु उनके द्वारा मुस्लिम नेशनल गार्ड की स्थापना भी की गई, अल्लामा-मशर्की ने बेल्चा पार्टी (मुसलमानों के एक अर्द्धसैनिक दल) की स्थापना की जिसके कार्यकर्त्ता/वोलंटियर/रजाकार- हिंदुओं के साथ छोटी-छोटी बातों को तूल देकर लड़ाई-झगड़े के लिए अमादा हो जाते थे| निजाम हैदराबाद व उसके रजाकारों द्वारा किये जा रहे अत्याचारों से वहां की हिंदू जनता आर्तनाद कर रही थी| निजाम ने राज्य के हिंदुओं के सभी धार्मिक कार्यों व अधिकारों पर रोक लगा दी थी| हिंदू न तो यज्ञोपवीत पहन सकते थे, न हवन कर सकते थे| मंदिरों में घंटे-घड़ियाल बजाना अथवा कीर्तन आदि करने को भी निजाम ने गैर क़ानूनी घोषित कर दिया था| जिस कारण आर्यसमाज और हिंदू महासभा को भारी आन्दोलन/सत्याग्रह करना पड़ा| सिंध प्रान्त में मुस्लिम लीगी सरकार ने स्वामी दयानंद द्वारा रचित धार्मिक ग्रन्थ “सत्यार्थ प्रकाश” पर प्रतिबंध लगा दिया था|

सन् 1945-46 में मुस्लिम लीग ने अंग्रेज सरकार और कांग्रेसी नेताओं कों पाकिस्तान की मांग मानने के लिए विवश करने के उद्देश्य से “डायरेक्ट एक्शन” नाम से कार्यवाही शुरू की, जिसके परिणाम स्वरूप बिहार, कलकत्ता आदि शहरों में हजारों हिंदुओं का नरसंहार हुआ | ऐसी स्थिति में हिंदू भयग्रस्त भी था और आक्रोशित भी, और वे चाहते थे कि हिंदुओं का भी एक युवा जुझारू संगठन हो जो उनकी सुरक्षा कर सके| इन्हीं कारणों से हिंदुओं का रुझान संघ की ओर बढ़ा और इसी समय संघ के स्वंयसेवकों और शाखाओं की संख्या बढ़ी और सन् 1946 के पहुंचते- पहुंचते युवा स्वंयसेवकों की संख्या लगभग 7 लाख हो गई|” संघ के स्वंयसेवकों की संख्या में यह विस्तार गोलवलकर जी के नेतृत्व से अधिक देश में उस समय उत्पन्न हो रही सामाजिक व राजनैतिक परस्थितियों के कारण ही मुख्य रूप से था, जिससे हिंदू समाज- उद्वेलित होकर संघ की ओर आशा लगाकर देखने लगा जो स्वाभाविक था|

श्री गोलवलकर एक रूढ़िवादी व्यक्ति थे जो पुरानी धार्मिक रीतियों पर अधिक विश्वास रखते थे, यहाँ तक कि उन्होंने अपने पूर्वजो के लिये ही नहीं अपितु अपने जीवन काल में ही अपना भी श्राद्ध कर्म संपन्न कर दिया था। वे गंडा-ताबीज के हार पहने रहते थे, जो सम्भवत: किसी संत ने उन्हें किसी बुरे प्रभाव से बचने के लिये दिए थे। गोलवलकर जी का हिंदुत्व श्री वीर सावरकर और डॉ. हेडगेवार के हिंदुत्व से किंचित भिन्न था। गोलवलकर जी के मन में वीर सावरकर के लिये उतना आदर सत्कार का भाव नहीं था जितना की डा. हेडगेवार के मन में था। डा. हेडगेवार, वीर सावरकर को आदर्श पुरुष मानते थे| यथार्थ में श्री गोलवलकर इतने दृढ़ विचार के न हो कर एक अपरिपक्व व्यक्ति थे, जो आर.एस.एस. विशाल संस्था का उत्तरदायित्व ठीक से उठाने के योग्य नही थे। राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ ने गोलवलकर जी के नेतृत्व में संघ कि शाखाओं और स्वयंसेवकों की संख्या तो बढाई परन्तु अपने मूल सिद्धांतों से दुरी बना लेने के कारण संगठन की ऊर्जा को प्रायः खो दिया| वही क्रमिक ह्रास, आज आर.एस.एस. जिस स्थिती में पहुँच गई है, में स्पष्ट रूप से दिखाई देता है|

गोलवलकर जी के आर.एस.एस. प्रमुख बनने के बाद हिन्दू महासभा एवं आर.एस.एस के बीच सम्बन्ध तनावपूर्ण होते चले गये। यहाँ तक की श्री गोलवलकर ने वीर सावरकर एवं हिन्दू महासभा द्वारा चलाये जा रहे उस अभियान की आलोचना करनी शुरू कर दी जिसके अंतर्गत हिन्दू युवको को सेना में भर्ती होने के लिये प्रेरित किया जाता था। यह अभियान 1938 से सफलता पूर्वक चलाया जा रहा था और डॉ. हेडगेवार ने 1940 में अपनी मृत्यु तक इसका समर्थन किया था। सुभाष चंद्र बोस ने भी सिंगापुर से रेडियो पर अपने भाषण में इन युवको को सेना में भर्ती कराने के लिये श्री वीर सावरकर के प्रयत्नों की बहुत प्रशंसा की थी। हिन्दू महासभा के इस अभियान के कारण सेना में हिंदुओ की संख्या बढ़ने लगी, जिस पर मुस्लिम लीग ने बहुत बवाल मचाया और अंग्रेज सरकार से आग्रह किया कि सेना में हिंदुओ कि भर्ती बंद की जाये। क्योँकि उस समय द्वितीय विश्व युद्ध चल रहा था इस कारण सरकार को सेना में बढ़ोतरी करनी थी अतः मुस्लिम लीग के विरोध को नकार दिया गया। यह इसी अभियान का ही नतीजा था कि सेना में हिंदुओ की संख्या 36% से बढ़ कर 65% हो गयी, और इसी कारण विभाजन के तुरंत बाद पाकिस्तान द्वारा कश्मीर पर आक्रमण का भारतीय सेना मुंह तोड़ जवाब दे पायी। परन्तु गोलवलकर जी के उदासीन व्यवहार एवं नकारात्मक सोच के कारण दोनों संगठनो के सम्बन्ध बिगड़ते चले गये।

यह भी उलेखनीय है कि एक ओर काँग्रेस व गाँधीजी ने अंग्रेजो को सहमति दे दी थी कि उनके द्वारा भारत छोड़े जाने से पहले, भारत कि सत्ता मुस्लिम लीग को सौपने पर उन्हें कोई आपत्ति नहीं है। दूसरी ओर वे लगातार यह प्रचार भी करते रहे कि वीर सावरकर और हिन्दू महासभा साम्प्रदायिक हैं। डा. हेडगेवार की मृत्यु के उपरान्त आर.एस.एस. ने भी श्री गोलवलकर के नेतृत्व में वीर सावरकर एवं हिन्दू महासभा के विरुद्ध एक द्वेषपूर्ण अभियान आरंभ कर दिया। श्री गंगाधर इंदुलकर (पूर्व आर.एस.एस. नेता) का कथन है कि श्री गोलवलकर यह सब वीर सावरकर की बढ़ती हुई लोकप्रियता (विशेषकर महाराष्ट्र के युवको में) के कारण कर रहे थे। उन्हें आशंका थी कि यदि सावरकर कि लोकप्रियता बढ़ती गयी तो युवक वर्ग उनकी ओर आकर्षित होगा और आर.एस.एस. से विमुख हो जायेगा।

इस टिप्पणी के बाद श्री इंदुलकर पूछते है कि “क्या ऐसा कर के आर.एस.एस. हिंदुओ को संगठित कर रही थी या कि विघटित कर रही थी|”

सन् 1936-37 में श्री माधव राव सदाशिव राव गोलवलकर संघ में आये| 1938 में उन्होंने एक पुस्तक लिखी जिसका नाम “वी. आर. अवर नेशनहुड डिफाइंड”(हमारी राष्ट्रीयता)| इस पुस्तक में उन्होंने हिंदू, हिंदुत्व, हिंदू राष्ट्र की वही व्याख्यायें स्वीकार की जो वीर सावरकर द्वारा लिखित पुस्तक “हिंदुत्व” में तथा वीर सावरकर जी के बड़े भाई श्री बाबा राव सावरकर द्वारा लिखित पुस्तक “राष्ट्र मिमांसा” में दर्शायी गई थी | १५ मई १९६३ के दिन बम्बई में सावरकर सप्ताह का आयोजन किया गया था, उसमें श्री गोलवलकर ने अपने भाषण में कहा कि उन्होंने सावरकर जी की महान रचना ‘हिंदुत्व’ में राष्ट्रवाद के सिद्धांत का विवेचन पाया है| उनके लिए यह एक पाठ्य पुस्तक व एक वैज्ञानिक पुस्तक है|(हिंदू अस्मिता दि. १-११-९३)

परन्तु कुछ समय पश्चात, श्री गोलवलकर ने स्वंय अपने द्वारा सन् 1938 में लिखी गई पुस्तक ‘वी. आर. अवर नेशनहुड डिफाइंड’ पुस्तक को अस्वीकार करने की बात कही| उन्होंने यहाँ तक कहा कि भूल जाओ ‘ वी आर. अवर नेशनहुड डिफाइंड’ को| 1949 में संघ पर लगे प्रतिबंध के दौरान, राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ ने जो अपना संविधान बना कर सरकार को दिया उसमें हिंदू राष्ट्र शब्द का कहीं उल्लेख नहीं था परन्तु उसके बाद भी संघ की शाखाओं पर स्वंयसेवकों द्वारा “प्रभु शक्ति मम हिंदू राष्ट्रांग भूता” कि प्रार्थना अवश्य गाई जाती रही है| यह संविधान गोलवलकर जी द्वारा डॉ. हेडगेवार कि मृत्यु के बाद संघ पर प्रतिबन्ध लगने के पश्चात बनाया गया था|

दिनाँक 30-1-1948 को गाँधी जी की हत्या हुई| जिस समय गाँधी जी की मृत्यु का समाचार गोलवलकर जी को मिला, वह उस समय दि. 30-1-1948 को मद्रास (चैन्नई) में प्रवास पर थे| आल इंडिया रेडियो पर जब यह समाचार प्रसारित हुआ की गांधीजी की हत्या महाराष्ट्र के एक हिंदू-राष्ट्रवादी पंडित नाथूराम गोडसे ने की है| इसकी प्रतिक्रिया में गांधीवादियों द्वारा महाराष्ट्र में बहुत उत्पात मचाया गया है, साथ ही वीर सावरकर के छोटे भाई नारायण राव सावरकर जी को भी लाठियों से पीटा गया| गोडसे जी का परिवार भी घोर प्रताड़ना का शिकार हुआ| इसके अतिरिक्त वीर सावरकर जी के साथ-साथ हिंदू महासभा और राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के हजारों कार्यकर्ताओं को भी जेलों में ठूस दिया गया| उन लोगों को भी जिनका गाँधी वध से दूर दूर तक का कोई संबंध नहीं था|(संदर्भ- “गोडसे की आवाज सुनो” पृष्ठ सं.51-52)

इस कांड का सबसे दुखद पहलु यह रहा कि जिस पंडित नाथूराम गोडसे ने राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के कार्यकलापों में सदा बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया, जिसने महाराष्ट्र के सांगली जिले के बौद्धिक प्रमुख का महत्वपूर्ण दायित्व निभाया और दि. 15-11-1949 को- आर.एस.एस. की शाखा स्थल पर गाई जाने वाली प्रार्थना “नमस्ते सदा वत्सले मातृ भूमि” का स्वर गान करते हुए, भारत विभाजन के विरोध में, फांसी का फंदा चूमा और शाह्दत का जाम पिया| उसी संघ समर्पित गोडसे को, गाँधी वध के बाद आर.एस.एस. के तात्कालिक प्रमुख – सरसंघचालक श्री माधव राव सदाशिव राव गोलवलकर उपाख्य “गुरूजी” ने भयभीत होकर सिरे से नकार दिया, और तुरत-फुरत में दिनांक 31-1-1948 को जवाहरलाल नेहरु तात्कालिक प्रधानमंत्री को पत्र लिख कर गोडसे को “अविवेकी और दुराग्रही आत्मा के साथ देशद्रोही” तक लिख डाला| इसके विपरीत अखिल भारत हिंदू महासभा नें उस विषम परस्थितियों में भी निर्भीकता के साथ छाती ठोककर हुतात्मा नाथूराम गोडसे को न सिर्फ अपना कार्यकर्ता बताना स्वीकार किया वरन हिंदू महासभा के तात्कालिक अध्यक्ष बैरिस्टर एल.वी.भोपटकर ने नाथूराम गोडसे के साथ अन्य अभियुक्तों का मुकदमा निशुल्क और पूर्ण निष्ठा और समर्पण के साथ अंत तक लड़ा|

क्रमशः

Thursday, 24 September 2026

पूरे पितृपक्ष में अपने पितरों को जल दान करें विशेष विधि

'                        🌿🌕🌿
         *पितृ पक्ष 2026 विशेष सूचना--*

 *दिनांक 26 सितंबर 2026 दिन शनिवार से पितृपक्ष, महालयारंभ हो रहा है ।।*

  *पूरे पितृपक्ष में अपने पितरों को जल दान करें ।।  पितरों को जल देने, उनका सम्मान करने से पितृ दोष समाप्त होता है ।।*

*जो लोग मंत्र सहित तर्पण नहीं कर सकते -- साधारण रूप से तर्पण करने की जानकारी दी जा रही है---*
 
 पितरों के प्रसन्न करने से  अनेकों दुखों का शमन होता है ।। इस समय पुरुषों को, पितृपक्ष आरंभ होने से पहले अपने सर के बाल उतरवा देना चाहिए ।।
 
 *अपने पितरों का नाम ले लेकर के जल प्रदान कर आशीष प्राप्त करें, जिससे आप अपने जीवन में अच्छी प्रगति कर सकें ।।*
 '       *क्योंकि पितृपक्ष में पितरलोक और पृथ्वी लोक एक दूसरे लोक के बहुत निकट आ जाते हैं ।।*
, *ऐसे समय में पितर लोग जब देखते हैं पृथ्वी की ओर तो, अपने कुल खानदान से, जल की अपेक्षा करते हैं  तर्पण के लिए विशेष सामग्री जो तर्पण करते समय चाहिए वह है---*
१~  जल 
२~गंगाजल
३~ तुलसी का पत्ता
 ४~ देशी गौ का दूध
 ५~ सफेद चावल {धुलकर सुखाया हुआ}
६~ काला तिल {धुलकर सुखाया हुआ}
७~ जौ    {धुलकर सुखाया हुआ}
८~ श्रीखंड चंदन {घिसकर लेप बनाया हुआ}
९~  सफेद फूल 
१०~ शहद
यह सारा सामान एक-एक डिब्बे में सुरक्षित रख लें ।।

*बैठने के लिए आसन ।* 

दो भगौना, जिसमें कम से कम तीन- तीन लीटर से अधिक पानी आ जाये ।।

दो प्लेट सामने रखें 
एक प्लेट में थोड़ा सा तिल, जौ, चावल, सफेद फूल, मीठा एक प्लेट में रखें ।। एक छोटे कटोरी में जल रखें ।

दोनों हाथ के अनामिका अंगुली में पैंती पहन लें । उसको हाथों में लेकर दोनों हाथों से जल प्रदान करें ।।
पैंती नहीं है तो अंगुलियों में अंगूठी पहनें ।
 
जो सामने खाली प्लेट है उसमें थोड़ा सा चावल हाथ में लेकर के पितरों का आवाहन करें ।
और उसमें जल अक्षत पुष्प धूप दीप और मीठा अर्पित करें ।
खाली प्लेट में रख दें । और पितरों से कहें हे पितृगण !! आप यह भोग स्वीकार करें ।।
अब जो --
*१० प्रकार का समान लिखा हुआ है उसको एक भगौने में थोड़ा-थोड़ा रखें ।।*
जिस भगवान में सामग्री रखे है उस भगौने को जल गंगाजल से भर दें ।।

अब आप अपने पिता माता 
दादा-दादी 
आजा आजी 
तीन पीढ़ी को अपने {अंजुरी} अर्थात् *अंजलि से एक-एक अंजलि जल* खाली वाले भगौने में डालें -- 
पिता सहित तीन पीढ़ी को जल दें और कहें हे पिता यह जल स्वीकार करो हे माता यह जल स्वीकार करो, दादा दादी आजा आजी ।।
अपने मामा के तीन पीढ़ी मामा मामी नाना नानी बूढ़े नाना नानी
*इसी तरह आपकी मौसी मौसी, ससुर सास, मित्र, गुरु जितने भी लोग आपके जीवन में रहे हों और अब ना हों, उन्हें जल प्रदान करना चाहिए ।।*
अंतिम में तीन अंजलि जल चराचर जगत के लिए अर्पित करना चाहिए 
 और एक अंजलि जल भीष्म पितामह के लिए अर्पित करना चाहिए ।।
अंतिम में वह जल किसी पौधे में डाल देना चाहिए 
, जो पैर के नीचे ना पड़े ।।

पुराण और अर्थ

## प्रश्न बिलकुल वैज्ञानिक है - आज का बच्चा पूछता है, "पापा, ब्रह्मा जी हंस पर कैसे उड़ते हैं?"
हम उसे कथा सुना कर टाल देते हैं, पर ऋषि ने कथा नहीं, कोड लिखा था। आज के विज्ञान से ही उस कोड को खोलते हैं, जो वाहन अभी तक नहीं बताए, उन्हीं को लेते हैं।
### 1. सूर्य के सात घोड़े - S= सप्तरंगी प्रकाश
पुराण कहते है - सूर्य के रथ में सात घोड़े हैं।
आज का विज्ञान क्या कहता है? न्यूटन ने 1666 में प्रिज्म से सिद्ध किया - सूर्य का श्वेत प्रकाश सात रंगों से बना है - VIBGYOR।
हमारे ऋषि ने हजारों साल पहले कह दिया था - अश्व = आशु गमन करने वाला, अर्थात किरण। सात अश्व = सात किरणें।
प्रमाण - ऋग्वेद 1.164.2 - *"सप्त युज्यन्ति रथं एकचक्रम"* - एक चक्र वाले रथ में सात घोड़े जुते हैं। यह रथ सूर्य है, सात घोड़े प्रकाश के सात बैंड हैं।
### 2. चंद्रमा का हिरण और खरगोश - मृग लांछन
चंद्रमा के वाहन को मृग कहा है, इसीलिए चंद्रमा को मृगांक कहते हैं।
आज आप पूर्णिमा के चाँद को देखिए, नासा की तस्वीर में भी आपको चाँद पर काले धब्बे हिरण की तरह दिखेंगे। वे धब्बे क्या हैं? - वे चंद्रमा के विशाल गड्ढे - Maria हैं।
ऋषि ने कहा - चंद्रमा पर मृग बैठा है। अर्थात चंद्रमा के कलंक - क्रेटर ही उसका वाहन - चिन्ह है। वाहन का अर्थ है पहचान।
### 3. इंद्र का ऐरावत हाथी - बादल का वैज्ञानिक नाम
इंद्र वर्षा के देवता हैं, ऐरावत पर बैठते हैं। ऐरावत = जल को फेंकने वाला।
ऋग्वेद में ऐरावत को *"अभ्र-मातंग"* कहा है - अभ्र माने बादल, मातंग माने हाथी। बादल हाथी जैसा ही तो दिखता है। और हाथी जैसे ही सूंड से जल फेंकता है, बादल भी जल वैसे बरसाता है। 
आज मौसम विज्ञान में भी बादलों को हाथी की उपमा दी जाती है - Cumulonimbus को हाथी की पीठ जैसा कहा जाता है।
इंद्र का वज्र = बिजली, ऐरावत = मेघ। बिजली मेघ पर ही सवार हो कर आती है, यह तो सीधा विज्ञान है।
### 4. शनि का कौआ और यम का भैंसा - Decomposition का विज्ञान
ये दो वाहन सबसे ज्यादा डरावने लगते हैं।
शनि = न्याय, धीमी गति, दंड। कौआ क्या करता है? सड़ा-गला साफ करता है। प्रकृति का स्कैवेंजर है। वह किसी को ऐसे ही नहीं छोड़ता, घंटों देखता है। शनि भी वैसे ही - धीरे-धीरे कर्मों का फल देता है। कौआ काला है, शनि भी अंधकार, अर्थात अनुशासन का प्रतीक है।
यम का भैंसा - यम मृत्यु के देवता हैं। भैंसा सबसे ज्यादा बलशाली, पर आलसी प्राणी है, कीचड़ में बैठा रहता है। मृत्यु भी वैसी ही है - अचानक आएगी तो भैंसे जैसी ताकत से कोई नहीं रोक सकता। और भैंसा अंधेरे में सबसे ज्यादा देख सकता है, यम भी अंधकार - मृत्यु-लोक में देखता है।
आयुर्वेद प्रमाण - भैंसे के सींग में यम-गंध होती है, जो मृत्यु के समय निकलने वाली गैसों को सोख लेती है, इसलिए शव के पास भैंसे की बात कही गई।
### 5. वरुण का मगर - मकर
वरुण जल के देवता हैं, उनका वाहन मकर - मगरमच्छ।
मगर क्या है? जल में सबसे प्राचीन, सबसे शक्तिशाली प्राणी। वह जल के इको-सिस्टम का राजा है। वह जल को शुद्ध रखता है।
आज पर्यावरण विज्ञान कहता है - अगर मगरमच्छ न हो तो नदी सड़ जाएगी। वरुण का मकर पर बैठना = जल के पारिस्थितिकी तंत्र का संतुलन।
### 6. अग्नि का मेढ़ा और वायु का हरिण
अग्नि का वाहन मेढ़ा - मेढ़ा कभी सीधा नहीं चलता, कूद-कूद कर चलता है। अग्नि की लपटें भी वैसी ही हैं - कभी इधर, कभी उधर। और मेढ़े के बाल ज्वलनशील होते हैं।
वायु का वाहन हरिण - हवा से तेज क्या दौड़ता है? हरिण। वायु की गति को नापने का सबसे पुराना पैमाना हरिण की गति थी।
### वैज्ञानिक युग में अजीब क्यों लगता है?
क्योंकि हमने दो भाषाओं को मिला दिया।
ऋषि की भाषा थी - *प्रतीक भाषा - Symbolic Language।*
आज की भाषा है - *भौतिक भाषा - Literal Language।*
पुराणों में वाहन कोई चिड़ियाघर नहीं, *"गुण-परिवहन तंत्र"* है। हर देवता एक ऊर्जा है, हर पशु उस ऊर्जा की प्रकृति है।

जिस दिन आप यह समझ गए कि हंस का अर्थ सरस्वती की Ola नहीं, सरस्वती का विवेक है, उसी दिन पुराण वैज्ञानिक ग्रंथ लगने लगेंगे, कहानी नहीं।