मध्यकाल में क्या गैर-मुस्लिम व्यापारियों (हिंदू/जैन बैंकर्स और व्यापारी) पर जजिया कर बार बार नहीं लगाया गया, आर्थिक दबाव नहीं बढ़ाया गया और वैश्य समुदाय से जुड़े मंदिरों को अपवित्र नहींकिया गया? क्याइससे उनकी समृद्धि प्रभावित नहीं हुई और कुछ ने प्रवास किया? 14वीं शताब्दी में फिरोज शाह ने हिंदू व्यापारियों का जो गंभीर आर्थिक शोषण और धार्मिक उत्पीड़न किया, जबरन धर्मांतरण और मंदिर विध्वंस किए, जिससे व्यापारियों पर जजिया जैसे बोझ बढ़े और असुरक्षा फैली थी, वह सब किसी को याद है?
मुग़ल काल में प्रसिद्ध जैन जौहरी और व्यापारी शांतिदास झवेरी की किसी को याद है? 1645 में क्या औरंगजेब (तब प्रिंस/गवर्नर) के आदेश पर अहमदाबाद में उनके चिंतामणि पार्श्वनाथ मंदिर में मिहराब (इस्लामी प्रार्थना स्थल) बनवाकर अपवित्र नहीं किया गया था ? औरंगजेब के शासन (1658–1707) में हिंदू व्यापारियों (बनिया आदि) पर मुस्लिमों की तुलना में दोगुना सीमा शुल्क (5% बनाम 2.5%) और काबुल जैसे स्थानों पर बिक्री/खरीद पर अधिक कर लगाए गए। जजिया कर की पुनर्स्थापना से आर्थिक तनाव बढ़ा और कई व्यापारी प्रभावित हुए।
परवर्ती मुग़ल शासन और ब्रिटिश प्रभुत्व (18वीं शताब्दी) के दौरान व्यापारियों को व्यापारिक विशेषाधिकारों में कमी कर उन पर भारी करारोपण और बंदरगाहों पर उनकी स्वायत्तता खत्म करने के पाठ कभी पढ़ाये गये, जिससे उन हिन्दू व्यापारियों का आर्थिक हाशियाकरण हुआ था? 18वीं शताब्दी की शुरुआत में नवाब मुर्शिद कुली खान ने अधिकार का विरोध करने वाले हिंदू जमींदारों और व्यापारियों को कैसे कुचला था? छोटे व्यापारियों पर भारी कर और दमन से आई तबाही की याद करें। ये भी याद करें कि 18वीं शताब्दी की शुरुआत में सूरत के बनिया व्यापारियों को काज़ियों और अधिकारियों से असीमित रिश्वत देनी पड़ती थी ताकि उनके मंदिरों को अपवित्र होने या जब्त होने से बचाया जा सके। धार्मिक कट्टरता से क्रूर उत्पीड़न हुआ, जिससे कई परिवार प्रांत छोड़कर भाग गए थे। 1831 में तालपुर मीरों (सिंध के मुस्लिम शासकों) के शासन में एक मुस्लिम भीड़ ने सेठ होतचंद को पकड़ लिया और जबरन इस्लाम कबूल करने की कोशिश की। उन्होंने विरोध किया, लेकिन यह घटना हिंदू व्यापारियों की धार्मिक उत्पीड़न की कमजोरी को दर्शाती है। सेठ नाओमल को तालपुरों के तहत निरंतर धमकियाँ और हाशिए पर धकेला गया।
यदि गजनवी गोरी आदि का मुख्य धंधा सोना चाँदी लूटना था तो क्या वे सिर्फ मंदिरों का ही धन लूट रहे थे?
बंगाल के प्रसिद्ध जैन साहूकार जगत सेठ परिवार के महताब चंद की याद है जिसे 1763 में मुस्लिम नवाब मीर कासिम ने मुंगेर किले से फेंककर या डुबोकर मार डाला? नवाब को परिवार के बंगाल के टकसाल व खजाने पर प्रभाव से नफरत थी। स्वरूप चंद की याद है जिसे 1763 में नवाब मीर कासिम ने मार डाला था? जगत सेठ जैसे प्रमुख व्यापारियों को सीधे धमकियाँ और अपमान झेलना पड़ा। सिराज-उद-दौला ने 3 करोड़ रुपये का Tribute मांगा और इनकार पर महताब चंद की पिटाई की गई थी।
क्या गोवा इंक्विजिशन (1560 से आगे) के दौरान हिंदू व्यापारियों को जबरन धर्मांतरण, संपत्ति जब्ती और निर्वासन का सामना हकरना पड़ा था जिससे स्थापित व्यापारिक नेटवर्क बाधित हुए?
क्या किसी को कलकत्ता में रहने वाले धनी पंजाबी खत्री व्यापारी ओमिचंद (अमीर चंद) की याद है जिसे रॉबर्ट क्लाइव ने नकली संधि से धोखा दिया था और लाखों रुपये का वादा किया था लेकिन धोखा पता चलने पर वे मानसिक रूप से टूट गए और 1767 में ब्रिटिश कंपनी शासन के तहत मर गए?
यदि अंग्रेज भारत के पैसे का इतना ड्रेन कर रहे थे कि दादा भाई नौरोज़ी को उस युग में उस पर एक पूरी पुस्तक लिखनी पड़ी तो वह किस वर्ण का सबसे बड़ा pauperisation था? 1765 के बाद (दिवानी अधिकार मिलने पर) ब्रिटिश नीतियों ने व्यापार पर एकाधिकार किया, कपड़ा उद्योग को नष्ट किया और ब्रिटिश माल से बाजार भर दिया, जिससे पारंपरिक हिंदू व्यापारिक नेटवर्क ढह गए।
क्या वैश्य समुदाय का देशप्रेम कुछ कम था? भामाशाह कौन थे? गुरु गोबिंद सिंह जी के छोटे साहिबजादों (ज़ोरावर सिंह और फतेह सिंह) और माता गुजरी जी की शहादत के बाद, मुग़ल अधिकारियों ने उनके अंतिम संस्कार के लिए सरहिंद की ज़मीन पर सोने के सिक्के खड़े करके (लगभग 7,800 अशर्फ़ी) बिछाने की शर्त रखी। तब हिन्दू वैश्य तोदार मल ने अपनी पूरी संपत्ति बेचकर यह किया और शवों को संस्कार के लिए भूमि को प्राप्त किया था। गुरु तेग बहादुर जी को 500 सोने की मोहरें चढ़ा देने वाले मक्खन शाह लुबाना की याद करें। 12वीं शताब्दी में दिल्ली के आसपास के जैन व्यापारियों ने पृथ्वीराज चौहान जैसे राजपूत राजाओं को आर्थिक सहायता दी थी और युद्धों में योगदान किया था।
तब कैसा लगता है जब अत्याचारों को झेलने की इकतरफ़ा कल्प-कथाएँ सुनाई जाती हैं?