Sunday, 1 March 2026

होलिका स्तोत्र

*होलिका स्तोत्र*  
होली दहन समय या होली दहन के बाद और तीन या पांच परिक्रमा करने के पश्चात होलिका को दोनों हाथो से नमस्कार करके यह स्तोत्र बोलने से होलिका मनुष्य के सभी पापो को हर लेती है, सभी सन्तापों को हर लेती है, और सभी प्रकार से कल्याण करती है होलिका जगन्माता बनके सर्वसिद्धियाँ प्रदान करती है सुखशान्ति प्रदान करती है।
यह स्तोत्र को तीन परिक्रमा करने के बाद दोनों हाथो से नमस्कार करके होलिका स्तोत्र पढ़ना चाहिए
   होलिका स्तोत्र   
ॐ महाज्वालाय विद्महे अग्निदेवाय धीमहि। तन्नो अग्निः प्रचोदयात्।
(अर्थ --ॐ, मैं उस महान् ज्योति का, अग्निदेव का ध्यान करता हूँ। वह (शुभ) अग्नि हमें (समृद्धि और कल्याण की ओर) प्रेरित करे।)
पापं तापं च दहनं कुरु कल्याणकारिणि | 
होलिके त्वं जगद्धात्री होलिकायै नमो नमः || 
होलिके त्वं जगन्माता सर्वसिद्धिप्रदायिनी | 
ज्वालामुखी दारूणा त्वं सुखशान्तिप्रदा भव || 
वन्दितासि सुरेन्द्रेण ब्रह्मणा शंकरेण च । 
अतस्त्वं पाहिनो देवि भूते भूतिप्रदा भव || 
अस्माभिर्भय सन्त्रस्तैः कृत्वा त्वं होलि बालिशैः |
अतस्त्वां पूजयिष्यामि भूते भूतिप्रदा भव ||
त्वदग्नि त्रिः परिक्रम्य गायन्तु च हसंतु च ।
होलिके त्वं जगद्धात्री होलिकायै नमो नमः || 
होलिके त्वं जगन्माता सर्वसिद्धिप्रदायिनी | 
ज्वालामुखी दारूणा त्वं सुखशान्तिप्रदा भव ||
वन्दितासि सुरेन्द्रेण ब्रह्मणा शंकरेण च | 
अतस्त्वं पाहिनो देवि भूते भूतिप्रदा भव || 
अस्माभिर्भय सन्त्रस्तैः कृत्वा त्वं होलि बालिशैः | 
अतस्त्वां पूजयिष्यामि भूते भूतिप्रदा भव || 
त्वदग्नि त्रिः परिक्रम्य गायन्तु च हसंतु च | 
जल्पन्तु स्वेछ्या लोकाः निःशङ्का यस्य यन्मतम्
ॐ नमो भगवते महासुदर्शनाय महाचक्राय महाज्वालाय दीप्तिरूपाय सर्वतो रक्ष रक्ष मां महाबलाय नमः।
ॐ क्लीं कृष्णाय गोविन्दाय गोपीजनवल्लभाय पराय परम पुरूषाय परमात्मने परकर्म मंत्र यंत्र औषध अस्त्र शस्त्राणि संहर संहर मृत्योर्मोचय मोचय ओम नमो भगवते सुदर्शनाय दीप्ते ज्वालादित्याय ,सर्वदिक् क्षोभण कराय हूं फट् ब्रहणे परं ज्योतिषे नमः।
.ॐ नमो भगवते सुदर्शनाय वासुदेवाय, धन्वंतराय अमृतकलश हस्ताय, सकला भय विनाशाय, सर्व रोग निवारणाय त्रिलोक पतये, त्रिलोकीनाथाय ॐ श्री महाविष्णु स्वरूपाय ॐ श्रीं ह्मीं ऐं औषधि चक्र नारायणाय फट्!!
ॐ ऐं ऐं अपराजितायै क्लीं क्लीं नमः।
ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं हूं हूं त्रैलोक्यमोहन विष्णवे नमः।
ॐ त्रैलोक्यमोहनाय च विदमहे आदिकामदेवाय धीमहि 
तन्नो विष्णु: प्रचोदयात्।
ॐ तेजोरूपाय च विदमहे विष्णु पत्न्यै धीमहि तन्नो;
श्री: प्रचोदयात्।
                
इस वर्ष होलिका दहन 2 मार्च 2026 की रात्रि भद्रा उपरांत 5.28 से 6.30 के मध्य हैं । होलिका दहन के लिए लकड़ी और उपले आदि एकत्रित किए जाते हैं। होलिका दहन से पूर्व उसमें गुलाल समेत अन्य सामग्रियां डाली जाती हैं। होलिका की अग्नि को अत्यंत पवित्र माना गया है। मान्यता है कि होलिका की अग्नि में कुछ विशेष चीजों को डालने से जीवन में सुख-समृद्धि का आगमन होता है। जबकि होलिका में कोई भी अपवित्र चीज डालने की मनाही होती है। मान्यता है कि इसका जीवन में नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। 
जानें होलिका में क्या-क्या डालना चाहिए और क्या नहीं-
  होलिका में क्या-क्या डालना चाहिए- 
1.होलिका दहन की आग में सूखा नारियल डालना चाहिए। इसके अलावा अक्षत और ताजे फूल होलिका की अग्नि में चढ़ाएं। होलिका को साबुत मूंग की दाल, हल्दी के टुकड़े, और गाय के सूखे गोबर से बनी माला अर्पित करें।
होलिका की अग्नि में सूखा नारियल डालना अत्यंत शुभ माना गया है।
2. होली की अग्नि में गेहूं की बालियां सेंककर घर लेकर आएं 
बाद में इसके गेंहू के दानों को अन्न भंडार में मिला दें अथवा विसर्जित कर दें।
3. होलिका की अग्नि में नीम के पत्ते व कपूर का टुकड़ा अर्पित करना चाहिए।
4. होलिका की अग्नि में घी में भिगोए पान के पत्ते व बताशा अर्पित करना चाहिए।
5. होलिका दहन में चांदी या तांबे के कलश से जल और गुलाल अर्पित करना चाहिए।
6. होलिका की अग्नि में हल्दी व उपले अर्पित करने चाहिए।
7. होलिका दहन की अग्नि में अक्षत व ताजे फूल भी अर्पित करने चाहिए।
8.होली के दिन रंग खेलने के बाद घर में फिटकरी का पोछा लगाने से धन आपकी तरफ चुंबक की तरह चला आता है. एक बाल्टी में पानी लेकर उसके अंदर थोड़ा फिटकरी का पाउडर डाल दें और उससे पोंछा करें. 
होली पर बहुत सी नकारात्मक शक्तियां सक्रिय रहती है. 
वह दूर होती है।
  होलिका की अग्नि में क्या नहीं डालना चाहिए 
1. होलिका की अग्नि में पानी वाला नारियल नहीं चढ़ाना चाहिए। होलिका में हमेशा सूखा नारियल ही चढ़ाया जाता है। मान्यता है कि पानी वाला नारियल अर्पित करने से जन्मकुंडली में चंद्रमा की स्थिति खराब हो सकती है और जातक को जीवन में कई परेशानियों का सामना करना पड़ता है। पानी वाला नारियल फोड़कर प्रसाद रूप में ले सकते हैं।
2. 2.होलिका की अग्नि में टूटा-फूटा सामान जैसेपलंग, सोफा आदि नहीं डालना चाहिए। अथवा घर का कचरा न डालें।
मान्यता है कि ऐसा करने से शनि, राहु व केतु अशुभ फल प्रदान करते हैं।       
3. होलिका की आग में सूखी हुई गेहूं की बालियां न डालें 
बल्कि सेंक कर घर लाए।
और सूखे फूल नहीं अर्पित करने चाहिए।

Friday, 27 February 2026

एकलव्य शम्बूक शूद्र


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ये बहुत पुरानी id है।





पुरानी पोस्ट है : #एकलव्य_महाभारत को संदर्भित करके ऊंची नीची जाति तथा शोषण का प्रोपगंडा फैलाने वालों से अपेक्षा है कि वे मात्र कुछ सौ वर्ष पहले हमारे शिल्पकारों के अंगूठे काटे जाने के सत्य इतिहास से परिचित होंगे। 

1772 के #एकलव्यों का अंगूठा किस द्रोणाचार्य ने काटा था ? 

आज एक उद्भट विद्वान की वाल पर गया, जो उच्च शिक्षा आयोग में निरन्तर कई वर्ष तक सदस्य रहे हैं। 
#शम्बूक_कथा पर अपने पद के अनुरूप ही अति गर्वीली पोस्ट लिखी थी। 

मैंने मात्र दो कमेंट लिखा और वे धराशायी हो गए। 
सत्य एक ही होता है। असत्य के अनेकों स्वरूप और कलेवर होते हैं। एक बार आप जोर से दहाड़िये तो। 
पेंट गीली होना निश्चित है। 

#मिथक के एक #एकलव्य के #अंगूठा काटने को लेकर भारत मे 3000 या 5000 वर्षो के अत्याचार का #रंडी_रोना मचाए वामियों और दलित चिंतको , मात्र 250 साल पहले सिल्क के कपड़े बनाने वाले भारतीयों ने #अपने_अंगूठे_खुद काट लिए। वे कहां गए क्या हुवा उनका? 10,000 साल की कथा तुम्हे पता है और 200 साल की कथा तुम्हे नही याद है।
तुम निम्न किस्म के केंचुए हो। स्वार्थ घृणा और कुंठा से भरे हुए जोंक हो तुम। 
क्योंकि तुमको देश का खून चूसने और झूंठ का ढिंढोरा पीटने में आनंद आने लगा है। 

ब्रिटिश दस्युवो ने तुमको नष्ट किया बर्बाद किया और तुमको एकलव्य और शम्बूक का झुनझुना थमा दिया:

 “18वी शताब्दी मे विश्व के अन्य देशों की तरह ही, भारत मे भी सड़क या नदी से होने वाले व्यापार पर ड्यूटी लगा करती थी। लेकिन ईस्ट इंडिया कंपनी ने एक सरकारी फरमान प्राप्त कर लिया था जिसके माध्यम से आयातित या निर्यात होने वाली वस्तुओं को टैक्स फ्री कर दिया था। अतः कंपनी द्वारा निर्यातित या आयातित किसी भी वस्तु पर टैक्स नहीं लगता था”।

(रिफ्रेन्स – रोमेश दुत्त इकनॉमिक हिसटरि ऑफ ब्रिटिश इंडिया, पेज -18)

"1757 मे मीर जफर को बंगाल का नवाब बनाया गया लेकिन मात्र 3 साल बाद 1760 मे उसके ऊपर असमर्थ बताकर मीर कासिम को नवाब बनाया , जिसने कंपनी को बर्धमान मिदनापुर और चित्तगोंग नामक तीन जिलों का रवेनुए तथा मीरजाफ़र पर द्वारा दक्षिण भारत मे हुये युद्ध मे कंपनी द्वारा खर्च किए गए, देय उधार धन 5 लाख रुपये कंपनी के खाते मे जमा करवाया"।
 ( रोमेश दुत्त – पेज -19 )

लेकिन उसके बाद सभ्य अंग्रेजों ने जो आम जनता के द्वारा निर्मित वस्तुओं की लूट मचाई, वो किसी भी सभ्य समाज द्वारा एक अकल्पनीय घटना है। उस दृश्य को आप बंगाल के नवाब द्वारा मई 1762 को ईस्ट इंडिया कंपनी को लिखे पत्र से समझा जा सकता है:
 “ हर जिले, हर परगना , और हर फ़ैक्ट्री मे वे ( कंपनी के गुमाश्ते ) नमक, सुपाड़ी, घी , चावल धान का पुवाल ( सूखा डंठल, जरा सोचिए क्या क्या खरीद कर ये दरिद्र समुद्री डकैत खरीद कर यूरोप ले जाते थे ) बांस ,मछली ,gunnies अदरक चीनी तंबाकू अफीम और अन्य ढेर सारी वस्तुयेँ,जिनको लिख पान संभव नहीं है , को खरीदते बेंचेते रहते हैं । वे रैयत और व्यापारियों की वस्तुए ज़ोर जबर्दस्ती हिंसा और दमन करके ,उनके मूल्य के एक चौथाई मूल्य पर ले लेते हैं , पाँच रुपये की वस्तु एक रुपए मे लेकर भी वे रैयत पर अहसान करते हैं। 

 प्रत्येक जिले के ओफिसर अपने कर्तव्यो का पालन नहीं करते और उनके दमानात्मक रवैये और मेरा टैक्स न चुकाने के कारण मुझे प्रत्येक वर्ष 25 लाख रुपयों का नुकसान हो रहा है। मैं उनके द्वारा किए गए किसी समझौते का न उल्लंघन करता हूँ न भविष्य मे करूंगा , तो फिर क्यूँ अंग्रेज़ो के उच्च अधिकारी मेरा अपमान कर रहे हैं, और मेरा निरंतर नुकसान कर रहे हैं ”।
( रोमेश दुत्त पेज – 23 ) 

सभ्य बनाने आए इयसाइयों के नैतिक ऊंचाई को आप इस एक उद्धरण से ही माप सकते हैं।

यही बात ढाका का कलेक्टर महोम्मद अली ने कलकत्ता के अंग्रेज़ गवर्नर 26 मई 1762 मे लिखा “पहली बात तो ये है कि व्यापारी फ़ैक्टरी मे रुचि दिखा रहे हैं और अपने नावों पर अंग्रेजों का झण्डा लगाकर अपने को अंग्रेजो का समान होने का दिखावा करते हैं , जिससे कि उनको duty न देना पड़े। दूसरी बात ढाका और लकीपुर की फ़क्टरियाँ व्यापारियों को तंबाकू सूती कपड़े , लोहा और अनेक विविध वस्तुओं को बाज़ार से ज्यादा दामों मे खरीदने का प्रलोभन देते हैं, लेकिन बाद मे जबर्दस्ती वो पैसा उनसे छीन लेते हैं; वे व्यापारियों को पैसा एडवांस मे देते हैं।

लेकिन फिर उनके ऊपर एग्रीमंट तोड़ने का बहाना बनाकर उनके ऊपर फ़ाइन लगाते हैं । तीसरी बात लुकीपुर फैक्ट्री के गुमाश्ते तहसीलदार से ताल्लूकदारों से उनके ताल्लूक ( कृषि योग्य जमीन ) को निजी प्रयोग के लिए जबरन कब्जा कर लेते हैं , और उसका भाड़ा भी नहीं देते। कुछ लोगों के कहने पर ,कोई शिकायत होने पर वे यूरोपेयन लोगों को एक सरकारी आदेश का परवाना लेकर गावों मे जाकर उपद्रव करते हैं। वे टोल स्टेशन बनाते हैं और जो भी किसी गरीब के घर समान मिलता है उसको बैंचकर पैसा बनाते हैं। इन उपद्रवों के कारण पूरा देश नष्ट हो गया है और रैयत न अपने घरों मे रह सकते हैं और न ही मालगुजारी चुका सकते हैं। मिस्टर चवालीर ने कई स्तर पर झूँटे बाजार और झूंठे फक्ट्रिया बनाया हैं, और अपनी तरफ से झूंठे सिपाही बनाए हैं जो जिसको चाहे उसको पकड़कर उनसे जबरन अर्थदण्ड वसूलते हैं । उनके इस जबर्दस्ती के अत्याचारों के कारण कई हाट बाजार और परगना नष्ट हो गए हैं। ” 
( रोमेश दुत्त पेज 24- 25 )

“इस तरह बंगाल के प्रत्येक महत्वपूर्ण जिले के व्यापार को कंपनी के नौकरों और अजेंटों ने नष्ट किया और इन वस्तुओं के निरमातों को निर्दयता के साथ अपना गुलाम बनाया । उसका वर्णन एक अंग्रेज़ व्यापारी विलियम बोल्ट्स ने आंखो देखी हाल खुद लिखा है :
“ अब इस बात को सत्यता के साथ बताया जा सकता है कि वर्तमान मे यह व्यापार जिस तरह इस देश मे हो रहा है , और जिस तरह कंपनी अपना इनवेस्टमेंट यूरोप मे कर रही है,वो एक दमनकारी प्रक्रिया है; जिसका अभिशाप इस देश का हर बुनकर और निर्माता भुगतने को मजबूर है, प्रत्येक उत्पाद को एकाधिकार मे बदला जा रहा है ; जिसमे अंग्रेज़ अपने बनियों और काले गुमाश्तों के मदद से, मनमाने तारीके से यह तय करते हैं कि कौन निर्माता किस वस्तु का कितनी मात्रा मे, और किस दर पर निर्मित करेगा ...गुमाश्ते औरंग या निर्माताओं के कस्बे मे पहुँचने के बाद वो एक दरबार लगाता है जिसको वह अपनी कचहरी कहता है। 

जिसमे वो अपने चपरासी और हरकारों की मदद से वो दलाल और पयकार और बुनकरों को बुलाता है, और अपने मालिक द्वारा दिये गए धन मे से कुछ पैसा उनको एडवांस मे देता है और उनसे एक एग्रीमंट पर दस्तखत करवाता है जिसके तहत एक विशेष प्रॉडक्ट , एक विशेष मात्रा मे, एक विशेष समय के अंदर डेलीवर करना है। उस मजबूर बुनकर की सहमति आवश्यक नहीं समझी जाती है। और ये गुमाश्ते, जो कंपनी के वेतनभोगी थे , प्रायः इस तरह के एग्रीमंट उनसे अपने मन मुताबिक करवाते रहते थे; और यदि बुनकरों ने ये एडवांस रकम स्वीकार करने से इंकार किया तो उनको बांधकर शारीरिक यातना दी जाती है.... कंपनी के गुमाश्तों के रजिस्टर मे बहुत से बुनकरों के नाम दर्ज रहते थे, जो किसी दूसरे के लिए काम नहीं कर सकते थे, और वे प्रायः एक गुलाम की तरह एक गुमाश्ते से दूसरे गुमाश्ते के हाथों तब्दील किए जाते रहते हैं, जिनके ऊपर दुष्टता और अत्याचार हर नए गुमाश्ते के हाँथो बढ़ता ही जाता है ... इस विभाग मे जो अत्याचार होता है वो अकल्पनीय है ; लेकिन इसका अंत इन बेचारे बुनकरों को धोखा देने मे ही होता है; क्योंकि गुमाश्तों और जांचकारो ( कपड़े की क्वालिटी जाँचने वाला ) द्वारा जो दाम उनके प्रोडक्टस का ताया किया जाता था वो कम से कम बाजार के दाम से 15 से 40 % कम होता है ...।

बंगाल के बुनकरों के साथ, कंपनी के अजेंटों द्वारा जबर्दस्ती किए गए इन अग्रीमेंट्स को पूरा न करने की स्थिति मे, उनके खिलाफ मुचलका जारी किया जाता था , उसके तहत उनके सारे सामान (कच्चा और पक्का माल ) उस एग्रीमंट की भरपाई के लिए कब्जा कर लिया जाता है और उसी स्थान पर उनको बेंच दिया जाता है ; कच्चे सिल्क को कपड़ों मे बुनने वाले लोगों के, जिनको Nagoads कहते हैं, उनके साथ भी इसी तरह का अन्याय होता है, और ऐसी घटनाए आम बात हैं जिसमे उन्होने जबर्दस्ती #सिल्क के #कपड़े #बनाने की #मजबूरी से बचने के लिए स्वयं ही अपने #अंगूठे #काट लिए / 

( and the winders of raw silk , called Nagoads, have been known of their cutting off their thumbs to prevent their being forced to wind silk ) 
(Ref: Consideration on India affairs (London 1772), p 191 to 194 : from Romesh Dutt ; Economic History of British India , page 25-27 )

इस सच्चाई तक तुम्हारी पहुंच नही है धूर्त और मक्कारों?
इसीलिये पुस्तक का नाम लिखा है। गूगल आर्काइव से डाउनलोड करो और पढो।

Thursday, 26 February 2026

सिद्ध कुंजिका स्तोत्र का होम न करने की आज्ञा

हवन नहीं करना चाहिए, अधोलिखित स्तोत्रों का...
चंडीपाठ में कवच, अर्गला ,कीलक और कुंजिका स्तोत्र से हवन नहीं करना चाहिए सप्रमाण प्रस्तुति~

यो मूर्ख: कवचं हुत्वा प्रतिवाचं नरेश्वरः ।
स्वदेह - पतनं तस्य नरकं च प्रपद्यते ।।
अन्धकश्चैव महादैत्यो दुर्गाहोम-परायणः ।
कवचाहुति - प्रभावेण महेशेन निपातितः ।।

कवच में पाहि, अवतु, रक्ष रक्ष, रक्षतु, पातु आदि शब्दों का प्रयोग हुआ रहता है।
सप्तशती के चतुर्थ अध्याय के 4 मंत्र से इसी कारण होम नहीं होता है।
शास्त्री प्रवीण त्रिवेदी 
#सिद्ध #कुंजिका स्तोत्र का होम न करने की आज्ञा स्वयं महादेव नें दी है
इसका प्रथम कारण है की ,
कुंजिका देवी सिद्धियों की एकमात्र कुंजी है ।
ओर कुंजी का रक्षण किया जाता है आहूत नहीं किया जा सकता ।

यदि यदि कुंजी का ही लोप हो जाएगा तो सिद्धी के द्वार का खुलना असम्भव हो जाएगा ।
दूसरा कारण यह की 
सप्तशती में आता है की याचना स्तोत्र , कवच एवं कवच मन्त्रों की आहुति नहीं की जाती अन्यथा विनाश ही होता है ।
|| अथ प्रमाण ||

#कवचं #वार्गलाचैव ,#कीलकोकुंजिकास्तथा ।
#स्वप्नेकुर्वन्नहोमं #च ,#जुहुयात्सर्वत्रनष्ट्यते: ।।

भगवान शिव भैरव स्वरूप में स्थित होकर कहते हैं ! 
कवच , अर्गला , कीलक , तथा कुंजिका का होम स्वप्न में भी न करें
 स्वप्न मात्र में भी होम करने से सर्वत्र नाश की संभावनाएँ प्रकट हो जाती है ।

#बुद्धिनाषोहुजेत् #देवि,#अर्गलाऽनर्गलोभवेत् ।
#सिद्धीर्नाषगत:#होता, #विद्यां #च #विस्मृतोर्भभवेत् ।।

अर्गला के होमकर्म से सिद्धीयों का नाश हो जाता है । तथा होता की समस्त विद्याएँ विस्मृत हो जाती है , अर्गला अनर्गल सिद्ध हो जाती है ।

#कीलितोजायतेमन्त्र: ,#होमे #वा #कीलकस्तथा ।
#ममकण्ठसमंयस्य: ,#कीलकोत्कीलकं #हि #च ।।

कीलक के होमकर्म से होता के समस्त मन्त्र सदा सर्वदा के लिए कीलित हो जाते हैं ।
इसे मेरा उत्किलित कण्ठ ही जानें जो जो कीलक का कारक है ।
#धनधान्ययुतंभद्रे ,#पुत्र:#प्राण:#विनष्यते: ।
#रोगशोकोर्व्रिते:#कृत्वा,कवचंहोमकर्मण: ।।
कवच के होम से धन,धान्य, पुत्र तथा प्राण का विनाश निश्चित है एवं वह होता रोग तथा शोकों से घिर जाता है ।

स्वप्ने वा हुज्यते देवि ,* *कुंजिकायं च कुंजिकां ।

षड्मासे च भवेन्मृत्यु , सत्यं सत्यं न संशय: ।
होमे च कुंजिकायास्तु ,* *सकुटुम्बंविनाश्यती: ।

कुंजिका के होमकर्म के प्रभाव से होता की छः मास में मृत्यु निश्चित जानें तथा होता का सकूटुंब विनाश हो जाता है यह सत्य है परम सत्य है इसमें कोई संशय नहीं करना चाहिए ।

■यस्यं च दोषमात्रेण ,प्रसन्नार्मृत्युदेवता: ।
कुंजिकाहोममात्रेण ,रावण:प्रलयंगत: ।।

इसी के दोष से मृत्युदेवता अत्यंत प्रसन्न होकर होता का सकूटुंब भक्षण करते हैं ।

कुंजिका के होममात्र के प्रभाव से ही रावण का सम्पूर्ण विनाश सम्भव हुआ ।

■भैरवयामले भैरवभैरवी संवादे ।।
चतुर्विंश प्रभागे होमप्रकरणे ।।

■मातृका:बीजसंयुक्ता: ,प्राणाप्राणविबोधिनी ।
प्राणदा:कुंजिका:मायां ,सर्वप्राण:प्रभाविनी ।।

कुंजिका में बीज मातृकाएँ उपस्थित हैं ।
प्राण को देविप्राण का बोधप्रदान करती हैं ।
यह प्राणज्ञान प्रदान करने वाली महामाया कुंजिका प्राण को प्रभावित करने वाली हैं ।
।। शक्तियामले शक्तिहोमप्रकरणे ।।

Monday, 23 February 2026

शूद्र दलित

*चलिए हजारो साल पुराना इतिहास पढ़ते हैं। जातिवाद छुआछूत कैसे आया* 

*सम्राट शांतनु ने विवाह किया एक मछवारे की पुत्री सत्यवती से।उनका बेटा ही राजा बने इसलिए भीष्म ने विवाह न करके,आजीवन संतानहीन रहने की भीष्म ने प्रतिज्ञा की।*

*सत्यवती के बेटे बाद में क्षत्रिय बन गए, जिनके लिए भीष्म आजीवन अविवाहित रहे, क्या उनका शोषण होता होगा?*

*महाभारत लिखने वाले वेद व्यास भी मछवारे थे, पर महर्षि बन गए, गुरुकुल चलाते थे वो।*

*विदुर, जिन्हें महा पंडित कहा जाता है वो एक दासी के पुत्र थे, हस्तिनापुर के महामंत्री बने, उनकी लिखी हुई विदुर नीति, राजनीति का एक महाग्रन्थ है।*

*भीम ने वनवासी हिडिम्बा से विवाह किया।*

*श्रीकृष्ण दूध का व्यवसाय करने वालों के परिवार से थे,*

*उनके भाई बलराम खेती करते थे, हमेशा हल साथ रखते थे।*

*यादव क्षत्रिय रहे हैं, कई प्रान्तों पर शासन किया और श्रीकृषण सबके पूजनीय हैं, गीता जैसा ग्रन्थ विश्व को दिया।*

*राम के साथ वनवासी निषादराज गुरुकुल में पढ़ते थे।*

*उनके पुत्र लव कुश महर्षि वाल्मीकि के गुरुकुल में पढ़े जो वनवासी थे*

*तो ये हो गयी वैदिक काल की बात, स्पष्ट है कोई किसी का शोषण नहीं करता था,सबको शिक्षा का अधिकार था, कोई भी पद तक पहुंच सकता था अपनी योग्यता के अनुसार।*

*वर्ण सिर्फ काम के आधार पर थे वो बदले जा सकते थे, जिसको आज इकोनॉमिक्स में डिवीज़न ऑफ़ लेबर कहते हैं वो ही।*

*प्राचीन भारत की बात करें, तो भारत के सबसे बड़े जनपद मगध पर जिस नन्द वंश का राज रहा वो जाति से नाई थे ।* 

*नन्द वंश की शुरुवात महापद्मनंद ने की थी जो की राजा नाई थे। बाद में वो राजा बन गए फिर उनके बेटे भी, बाद में सभी क्षत्रिय ही कहलाये।*

*उसके बाद मौर्य वंश का पूरे देश पर राज हुआ, जिसकी शुरुआत चन्द्रगुप्त से हुई,जो कि एक मोर पालने वाले परिवार से थे और एक ब्राह्मण चाणक्य ने उन्हें पूरे देश का सम्राट बनाया । 506 साल देश पर मौर्यों का राज रहा।*

*फिर गुप्त वंश का राज हुआ, जो कि घोड़े का अस्तबल चलाते थे और घोड़ों का व्यापार करते थे।140 साल देश पर गुप्ताओं का राज रहा।*

*केवल पुष्यमित्र शुंग के 36 साल के राज को छोड़ कर 92% समय प्राचीन काल में देश में शासन उन्ही का रहा, जिन्हें आज दलित पिछड़ा कहते हैं तो शोषण कहां से हो गया? यहां भी कोई शोषण वाली बात नहीं है।*

*फिर शुरू होता है मध्यकालीन भारत का समय जो सन 1100- 1750 तक है, इस दौरान अधिकतर समय, अधिकतर जगह मुस्लिम शासन रहा।*

*अंत में मराठों का उदय हुआ, बाजी राव पेशवा जो कि ब्राह्मण थे, ने गाय चराने वाले गायकवाड़ को गुजरात का राजा बनाया, चरवाहा जाति के होलकर को मालवा का राजा बनाया।*

*अहिल्या बाई होलकर खुद बहुत बड़ी शिवभक्त थी। ढेरों मंदिर गुरुकुल उन्होंने बनवाये।* 

*मीरा बाई जो कि राजपूत थी, उनके गुरु एक चर्मकार रविदास थे और रविदास के गुरु ब्राह्मण रामानंद थे|।*

*यहां भी शोषण वाली बात कहीं नहीं है।*

*मुग़ल काल से देश में गंदगी शुरू हो गई और यहां से पर्दा प्रथा, गुलाम प्रथा, बाल विवाह जैसी चीजें शुरू होती हैं।*

*1800 -1947 तक अंग्रेजो के शासन रहा और यहीं से जातिवाद शुरू हुआ । जो उन्होंने फूट डालो और राज करो की नीति के तहत किया।* 

*अंग्रेज अधिकारी निकोलस डार्क की किताब "कास्ट ऑफ़ माइंड" में मिल जाएगा कि कैसे अंग्रेजों ने जातिवाद, छुआछूत को बढ़ाया और कैसे स्वार्थी भारतीय नेताओं ने अपने स्वार्थ में इसका राजनीतिकरण किया।*

*इन हजारों सालों के इतिहास में देश में कई विदेशी आये जिन्होंने भारत की सामाजिक स्थिति पर किताबें लिखी हैं, जैसे कि मेगास्थनीज ने इंडिका लिखी, फाहियान, ह्यू सांग और अलबरूनी जैसे कई। किसी ने भी नहीं लिखा की यहां किसी का शोषण होता था।*

*योगी आदित्यनाथ जो ब्राह्मण नहीं हैं, गोरखपुर मंदिर के महंत हैं, पिछड़ी जाति की उमा भारती महा मंडलेश्वर रही हैं। जन्म आधारित जातीय व्यवस्था हिन्दुओ को कमजोर करने के लिए लाई गई थी।*

*इसलिए भारतीय होने पर गर्व करें और घृणा, द्वेष और भेदभाव के षड्यंत्रों से खुद भी बचें और औरों को भी बचाएं

वैदिक गणित

1947, नवंबर 3 तारीख। तारीख याद रखिये। भारत को कागजों मे स्वाधीन हुए 3 महीना भी नही हुआ था । वेद-कर्मकांड स्कूल में प्राइज़ गिविंग सेरिमनी चल रहा था। उस समय में गवर्नर थे कैलाशनाथ काट्जू। वे आयेथे मुख्य अतिथि बनकर। प्रधान आचार्य पंण्डित राम चन्द्र रथ भी वहाँ उपस्थित थे और सभापतित्व कर रहे थे। भारतिकृष्ण तीर्थजी, जो कि कितने ही विषयों मे फर्स्ट क्लास फास्ट थे आप अनुमान भी नही कर सकते। भारतिकृष्ण जी गोवर्धन मठ के मुख्य(शंकराचार्य) थे और उस कार्यक्रम के सभापति थे। 
सभापति गवर्नर को इंट्रोड्यूस करते हुए बोले की वेद में ऐसे 16 मंत्र है जिससे कोईभी गणित संबंधी समस्या का समाधान हो सकता है। इसको सुनते ही काटजू उठ खड़े हुए और बोले की वेद की प्रशंसा करना अच्छी बात है। क्यों कि वेद, हिन्दू धर्म का सर्वश्रेष्ठ शास्त्र है। वेद हमारा मूल है और जगन्नाथजी को भी वेदपुरुष कहा गया है। इसलिए वेद की प्रशस्ति गाने में कोई असुविधा नहीँ है। पर शंकराचार्य के पीठ में बैठे हुए भारतिकृष्ण जी के द्वारा यह कहना की वेद में सारी समस्या का समाधान हो सकता है- अतिश्योक्ति है। इसको सुनकर शंकराचार्य भारतिकृष्ण जी फिर से उठे और बोले "ठीक है। आप मुझे कोई गणित संबंधित प्रश्न दीजिये और मेरे वैदिक समाधान आप देखिये। 
देखते देखते प्राइज़ गिविंग सेरिमनी, एक शास्त्रार्थ सभा में बदल गयी। ब्लैकबोर्ड लाया गया। उसके बाद शंकराचार्य भारतिकृष्ण जी काट्जू जी से बोले कृपया आप अपना प्रश्न लिखिये। काटजू गणित में एम.ए. थे। उन्होंने ब्लैकबोर्ड में एक प्रश्न हिंदी में लिखा। इसे देखकर भारतिकृष्ण जी ने उस प्रश्न को अंग्रेजी में लिखने केलिये बोला। काटजू ने तुरंत उस प्रश्न को अंग्रेजी में भाषांतर कर दिया। शंकराचार्य जी ने पूछा की यह ट्रांसलेसन ठीक हुआ है ? उन्होंने बोला "यह ठीक है" । इसका समाधान करना था शंकराचार्य जी को।

पर उन्होंने अपने एक 15 बर्ष के शिष्य को बुलाया। संस्कृत में शिष्य को बोले कि आकर समाधान कर दो। शंकराचार्य जी ने खुद नहीँ किया। वह शिष्य आया, और सीधे उसका उत्त्तर लिख डाला। जैसेही उसने लिखा, काटजू ने उसका प्रतिवाद किया "नहीँ, यह सही नही है। आप एक एक स्टेप करके बताइये। यह कोई जादू भी हो सकता है ! आप कोई मंत्र या तंत्र जानते होंगे। इसको सोपानित करिये" । शंकराचार्य जी ने अपने शिष्य को कहा, बेटा, इसको तुम एक एक स्टेप में कराके दिखाओ" । 

शिष्य ने फिरसे चाक पकड़ा और एक एक स्टेप करके वह उत्तर तक पहुंचा। उस समय काटजू का शिर झुका हुआ था और आँख से आँसू आ रहे थे। उन्होंने खड़े होकर सबके सामने बोला की में निःसर्त क्षमा माँगता हूं। में नहीँ जानता था की वेद में ऐसा भी ज्ञान है और आप नहीँ आपके पंदरह साल के शिष्य ने मेरे प्रश्न का समाधान करदिया ! इसके बाद काट्जू ने हाथ जोड़ कर पूछा कि वैदिक गणित सीखने केलिये कितने दिन लगेंगे ? शंकराचार्य जी ने कहा की छह महीने तक आप अगर मेरे पास आएंगे यो मैं आपको वैदिक गणित सीखा दूँगा। उसके बाद छह महीेने तक गोवर्धन मठ के सामने गवर्नर की गाड़ी खड़ी होने लगी।

भारत” शब्द की पाणिनीय सूत्रानुसार विस्तृत रूप-सिद्धि

“भारत” शब्द की पाणिनीय सूत्रानुसार विस्तृत रूप-सिद्धि

✓•१. उपोद्घात: “भारत” शब्द की रूप-सिद्धि को यदि पाणिनीय व्याकरण की दृष्टि से देखा जाए, तो यह केवल ऐतिहासिक संज्ञा नहीं, अपितु धातु-व्युत्पन्न तद्धित/कृतान्त रूप है। पाणिनि की अष्टाध्यायी के सिद्धान्तानुसार शब्द-निर्माण की प्रक्रिया तीन मुख्य चरणों से गुजरती है—
•१. धातु-निर्णय
•२. प्रत्यय-विधान
•३. ध्वनि-परिवर्तन (संधि, गुण, वृद्धि, लोप)

“भारत” शब्द का मूलाधार “भृ” (भॄ) धातु है।

✓•२. मूल धातु : “भृ”

∆धातुपाठ में—
भृ धारणपोषणयोः

•अर्थात् “भृ” धातु का अर्थ है—
धारण करना
पोषण करना
वहन करना

∆धातु : भृ (भॄ)
•गण : भ्वादिगण
•पद : परस्मैपदी

✓•३. प्रथम स्तर : “भरत” की सिद्धि (कृत् प्रत्यय द्वारा)

∆(क) कर्तरि शतृ प्रत्यय:
•पाणिनि सूत्र —
लटः शतृशानचावप्रथमासमानाधिकरणे
सूत्रार्थः ... स्तः, अतः प्रयोगे केवलम् 'आन' इत्यस्यैव प्रयोगः भवति । यथा - वन्द् शानच् वन्दमान ।प्रक्रिया -१) पठ् लट् वर्तमाने लट् ३.२.१२३ इति लट् पठ् शतृँ लटः शतृशानचावप्रथमासमानाधिकरणे ३.२.१२४ इति शतृँ पठ् शप् अत् कर्तरि शप् ३.१.६८ इति विकरणम् शप् पठत्२) वन्द् लट् वर्तमाने लट् ३.२.१२३ इति लट् वन्द् ...
पदमञ्जरी लटः शतृशानचावप्रथमासमानाधिकरणे॥ शकारः सार्वधातुकसंज्ञार्थः, ऋकार उगित्कार्यार्थः, चकारः स्वरार्थः। प्रथमाशब्दस्सुपामाद्ये त्रिके प्रसिद्धः, प्रथमाया अन्याऽप्रथमाउद्वितीयादिः,...
महाभाष्यम् लटः शतृशानचावप्रथमासमानाधिकरणे (८१९) (५२० लटः शतृशानज्विधिसूत्रम्॥ ३ । २ । ३ आ.१) (आदेशोपपादनाधिकरणम्) (३०२४ आदेशानुपपत्तिवार्तिकम्॥ १ ॥) - लस्याप्रथमासमानाधिकरणेनायोगादादेशानुपपत्तिर्यथान्यत्र-...

•इस सूत्र के अनुसार वर्तमानकाल (लट्) में कर्ता के अर्थ में “शतृ” प्रत्यय लगाया जाता है।

∆“भृ” धातु पर “शतृ” प्रत्यय लगे—
•भृ + शतृ

∆(ख) धातु में गुणादेश:

∆सूत्र :
•ऋतो गुणः (६.१.८७)
•ऋकार का गुण = अर्
∆अतः—
•भृ → भर
∆अब रूप :
•भर + त् (शतृ प्रत्यय का तकारान्त रूप)
= भरत्

∆प्रातिपदिक रूप में — भरत
•अर्थ : “जो भरण करता है”, “धारक”, “पोषक”

✓•४. “भरत” से “भारत” : तद्धित प्रक्रिया
∆अब प्रश्न है—“भरत” से “भारत” कैसे?
•यहाँ पाणिनीय तद्धित प्रकरण लागू होता है।

∆(क) अपत्यार्थे अण् प्रत्यय:
•सूत्र —

 •तस्य अपत्यम् (४.१.९२)

•इस अधिकार में “अण्” प्रत्यय लगाया जाता है।

•यदि “भरत” से अपत्य (वंशज) अथवा सम्बन्धसूचक रूप बने—
भरत + अण्

∆(ख) वृद्धि विधान:
•सूत्र :

वृद्धिरादैच् (१.१.१)
अदेङ् गुणः (१.१.२)

•तद्धित प्रत्यय लगने पर आद्यस्वर में वृद्धि होती है।

•अकार की वृद्धि = आ

∆अतः—
•भरत → भारत
(भ → भ; अ → आ; रत यथावत्)

∆(ग) रूप सिद्धि:
•भरत + अण्
→ भार + त
= भारत

∆अर्थ :
•भरत का वंशज
•भरत से सम्बद्ध
•भरत का देश

✓•५. राष्ट्रनाम की सिद्धि:
जब “भारत” शब्द किसी व्यक्ति के अपत्य या वंश के अर्थ में प्रयुक्त हुआ, तब वह “भारतः” (पुंलिङ्ग) या “भारती” (स्त्रीलिङ्ग) रूप लेता है।

किन्तु जब वही शब्द भूगोल-विशेष के लिए प्रयुक्त हुआ, तब—

∆भारत + वर्ष = भारतवर्ष

✓•६. धात्वर्थ-आधारित राष्ट्रार्थ:
यदि हम “भरत” को केवल व्यक्ति न मानकर धात्वर्थपरक संज्ञा मानें—

∆भृ (धारण, पोषण)
→ भरत (पोषक)
→ भारत (पोषणप्रधान भूमि)

∆अर्थात्—

 भारत = भरण-पोषण करने वाला राष्ट्र

•यह अर्थ पाणिनीय दृष्टि से संगत है, क्योंकि कृत्-प्रत्यय से बना “भरत” स्वयं कर्तृवाचक शब्द है।

✓•७. वैदिक प्रयोग:
ऋग्वेद में “भरत” शब्द वैदिक ऋषि-कुल के रूप में आता है—

“भरतस्य अग्ने…”

•यहाँ “भरत” एक संज्ञा है, परन्तु व्याकरणतः वह कर्तृवाचक भी है।

✓•८. महाकाव्यीय प्रमाण:
महाभारत में “भारत” शब्द बारम्बार राष्ट्र और वंश दोनों अर्थों में प्रयुक्त है।

“भारत” =
•१. भरतवंशी
•२. भारतभूमि का निवासी
•३. राष्ट्रविशेष

✓•९. ध्वन्यात्मक विश्लेषण:

भृ → भर (गुण)
भर → भारत (वृद्धि)

∆ध्वनि-परिवर्तन क्रम :

ऋ → अर (गुण)
अ → आ (वृद्धि)

•यह पूर्णतः पाणिनीय ध्वनिविज्ञान के अनुरूप है।

✓•१०. रूप-सिद्धि का क्रम (सारणी)

चरण प्रक्रिया रूप
१ मूल धातु भृ
२ गुणादेश भर
३ शतृ प्रत्यय भरत
४ अण् तद्धित भारत
५ समास भारतवर्ष

✓•११. वैकल्पिक व्याख्या:
कुछ आचार्य “भारत” को “भा” (प्रकाश) + “रत” (रमणशील) मानते हैं—

∆भा + रत = प्रकाश में रत

•किन्तु यह व्युत्पत्ति पाणिनीय दृष्टि से गौण और काव्यात्मक है; मूल रूप “भृ” धातु से ही अधिक शास्त्रीय है।

✓•१२. निष्कर्ष:
•१. “भारत” शब्द की मूल धातु “भृ” है।
•२. “भरत” कृत्-प्रत्ययजन्य कर्तृवाचक शब्द है।
•३. “भारत” तद्धित-प्रत्यय से सिद्ध सम्बन्धसूचक रूप है।
•४. ध्वनि-परिवर्तन पूर्णतः पाणिनीय नियमों के अनुरूप है।
•५. राष्ट्रार्थ में “भारत” धात्वर्थ-संगत, दार्शनिक रूप से भी युक्तिसंगत है।

•अतः पाणिनीय व्याकरण की कसौटी पर “भारत” शब्द की रूप-सिद्धि न केवल सम्भव है, अपितु व्यवस्थित, तार्किक और शास्त्रसम्मत है।
#त्रिस्कन्धज्योतिर्विद्

Tuesday, 17 February 2026

हिंदू खटीक जाति

हिंदू खटीक जाति - एक धर्माभिमानी समाज की उत्पति, उत्थान एवं पतन का इतिहास।

एक हिन्दू। श्रेष्ठ हिन्दू।।

खटीक जाति मूल रूप से वो ब्राह्मण जाति है, जिनका काम आदि काल में याज्ञिक पशु बलि देना होता था। आदि काल में यज्ञ में बकरे की बलि दी जाती थी। संस्कृत में इनके लिए शब्द है, 'खटिटक'।

मध्यकाल में जब क्रूर इस्लामी अक्रांताओं ने हिंदू मंदिरों पर हमला किया, तो सबसे पहले खटिक जाति के ब्राह्मणों ने ही उनका प्रतिकार किया। राजा व उनकी सेना तो बाद में आती थी, उससे पहले मंदिर परिसर में रहने वाले खटीक ही उनका मुकाबला किया करते थे। 

तैमूरलंग को दीपालपुर व अजोधन में खटीक योद्धाओं ने ही रोका था और सिकंदर को भारत में प्रवेश से रोकने वाली सेना में भी सबसे अधिक खटीक जाति के ही योद्धा थे। तैमूर खटीकों के प्रतिरोध से इतना भयाक्रांत हुआ कि उसने सोते हुए हजारों खटीक सैनिकों की हत्या करवा दी और 1,00,000 सैनिकों के सिर का ढेर लगवाकर उस पर रमजान की तेरहवीं तारीख पर नमाज अदा की।

मध्यकालीन बर्बर दिल्ली सल्तनत में गुलाम, तुर्क, लोदी वंश और मुगल शासनकाल में जब अत्याचारों की मारी हिंदू जाति मौत या इस्लाम का चुनाव कर रही थी, तो खटीक जाति ने अपने धर्म की रक्षा और बहू बेटियों को मुगलों की गंदी नजर से बचाने के लिए अपने घर के आसपास सूअर बांधना शुरू किया।

इस्लाम में सूअर को हराम माना गया है। मुगल तो इसे देखना भी हराम समझते थे और खटीकों ने मुस्लिम शासकों से बचाव के लिए सूअर पालन शुरू कर दिया। उसे उन्होंने हिंदू के देवता विष्णु के वराह (सूअर) अवतार के रूप में लिया। मुस्लिमों की गौहत्या के जवाब में खटीकों ने सूअर का मांस बेचना शुरू कर दिया और धीरे-धीरे यह स्थिति आई कि वह अपने ही हिंदू समाज में पद्दलित होते चले गए। कल के शूरवीर ब्राहण आज अछूत और दलित श्रेणी में हैं।

1857 की लडाई में, मेरठ व उसके आसपास अंग्रेजों के पूरे के पूरे परिवारों को मौत के घाट उतारने वालों में खटीक समाज सबसे आगे था। इससे गुस्साए अंग्रेजों ने 1891 में पूरी खटीक जाति को ही वांटेड और अपराधी जाति घोषित कर दिया।

जब आप मेरठ से लेकर कानपुर तक 1857 के विद्रोह की कहानी पढेंगे, तो रोंगटे खडे हो जाए्ंगे। जैसे को तैसा पर चलते हुए खटीक जाति ने न केवल अंग्रेज अधिकारियों, बल्कि उनकी पत्नी बच्चों को इस निर्दयता से मारा कि अंग्रेज थर्रा उठे। क्रांति को कुचलने के बाद अंग्रेजों ने खटीकों के गाँव के गाँव को सामूहिक रूप से फांसी दे दिया गया और बाद में उन्हें अपराधी जाति घोषित कर समाज के एक कोने में ढकेल दिया।

स्वतंत्रता से पूर्व जब मोहम्मद अली जिन्ना ने डायरेक्ट एक्शन की घोषणा की थी तो मुस्लिमों ने कोलकाता शहर में हिंदुओं का नरसंहार शुरू किया, लेकिन एक-दो दिन में ही पासा पलट गया और खटीक जाति ने मुस्लिमों का इतना भयंकर नरसंहार किया कि बंगाल के मुस्लिम लीग के मंत्री ने सार्वजनिक रूप से कहा कि हमसे भूल हो गई।

बाद में, इसी का बदला मुसलमानों ने बंग्लादेश में स्थित नोआखाली में लिया। आज हम आप खटीकों को अछूत मानते हैं, क्योंकि हमें उनका सही इतिहास नहीं बताया गया है, उसे दबा व साजिशन छुपा दिया गया है।

दलित शब्द का सबसे पहले प्रयोग अंग्रेजों ने 1931 की जनगणना में 'डिप्रेस्ड क्लास' के रूप में किया था। उसे ही बाबा साहब अंबेडकर ने अछूत के स्थान पर दलित शब्द में तब्दील कर दिया। इससे पूर्व पूरे भारतीय इतिहास व साहित्य में 'दलित' शब्द का उल्लेख कहीं नहीं मिलता है। मुस्लिमों के डर से अपना धर्म नहीं छोड़ने वाले, हिंसा और सूअर पालन के जरिए इस्लामी आक्रांताओं का कठोर प्रतिकार करने वाले एक शूरवीर ब्राहमण खटीक जाति को आज दलित वर्ग में रखकर अछूत की तरह व्यवहार किया और आज भी किया जा रहा है।

भारत में 1000 ईस्वी में केवल 1% अछूत जाति थी, लेकिन मुगल वंश की समाप्ति होते-होते इनकी संख्या 14% हो गई। आखिर कैसे ?

सबसे अधिक इन अनुसूचित जातियों के लोग आज के उत्तर प्रदेश, बिहार, बंगाल, मध्य भारत में है, जहाँ मुगलों के शासन का सीधा हस्तक्षेप था और जहाँ सबसे अधिक धर्मांतरण हुआ। आज सबसे अधिक मुस्लिम आबादी भी इन्हीं प्रदेशों में है, जो धर्मांतरित हो गये थे।

डॉ सुब्रहमनियन स्वामी लिखते हैं - ''अनुसूचित जाति उन्हीं बहादुर ब्राह्मण व क्षत्रियों के वंशज है, जिन्होंने जाति से बाहर होना स्वीकार किया, लेकिन मुगलों के जबरन धर्म परिवर्तन को स्वीकार नहीं किया। आज के हिंदू समाज को उनका शुक्रगुजार होना चाहिए, उन्हें कोटिश: प्रणाम करना चाहिए, क्योंकि उन लोगों ने हिंदू के भगवा ध्वज को कभी झुकने नहीं दिया, भले ही स्वयं अपमान व दमन झेला।''

प्रोफेसर शेरिंग ने भी अपनी पुस्तक 'हिंदू कास्ट एंड टाईव्स' में स्पष्ट रूप से लिखा है कि - "भारत के निम्न जाति के लोग कोई और नहीं, बल्कि ब्राह्मण और क्षत्रिय ही हैं।" स्टेनले राइस ने अपनी पुस्तक "हिन्दू कस्टम्स एण्ड देयर ओरिजिन्स" में यह भी लिखा है कि - "अछूत मानी जाने वाली जातियों में प्रायः वे बहादुर जातियां भी हैं, जो मुगलों से हारीं तथा उन्हें अपमानित करने के लिए मुसलमानों ने अपने मनमाने काम करवाए थे।"

यदि आज हम बचे हुए हैं तो अपने इन्हीं अनुसूचित जाति के भाईयों के कारण जिन्होंने नीच कर्म करना तो स्वीकार किया, लेकिन इस्लाम को नहीं अपनाया।

धन्य हैं हमारे ये भाई जिन्होंने पीढ़ी-दर-पीढ़ी अत्याचार और अपमान सहकर भी हिन्दुत्व का गौरव बचाये रखा और स्वयं अपमानित और गरीब रहकर भी हर प्रकार से भारतवासियों की सेवा की। हमारे अनुसूचित जाति के भाइयों को पूरे देश का प्रणाम।

नेहरू-गांधी कांग्रेस ने हमें जाति के ऐसे जन्जाल मे फंस दिया गया है कि निकलने की कोशिश पर भी नही निकल पा रहे। परन्तु सत्य यही है कि हमें निकलना ही होगा। जहां चाह, वहां राह!!!
साभार : 
1. हिंदू खटिक जाति : एक धर्माभिमानी समाज की उत्पत्ति, उत्थान एवं पतन का इतिहास, लेखक डॉ.विजय सोनकर शास्त्री, प्रभात प्रकाशन।
2. आजादी से पूर्व कोलकाता में हुए हिंदू-मुस्लिम दंगे में खटीक जाति का जिक्र, पुस्तक 'अप्रतिम नायक - श्यामाप्रसाद मुखर्जी' में है। यह पुस्तक भी प्रभात प्रकाशन द्वारा प्रकाशित है।