दधीचि
१. मनुष्य दधीचि-
च्यवन मुनि तथा उनकी पत्नी सुकन्या के पुत्र आत्मवान् तथा दधीचि थे (ब्रह्माण्ड पुराण, २/३/१/९३, वायु पुराण, ६५/९०) अन्यत्र इनको अथर्वा एवं चित्ति का पुत्र दध्यङ् या अन्य नाम अश्वशिरा कहा गया है (भागवत पुराण, ४/१/४२) वैराजक कल्प में वैराज मनु से दधीचि की उत्पत्ति हुई, उसके बाद गायत्री ने उनकी कामना की जिससे स्निग्ध स्वर की उत्पत्ति हुई। (वायु, पुराण, २१/४१) यह आधिदैविक वर्णन लगता है। दधीचि की पत्नी सरस्वती से सारस्वत नामक पुत्र हुआ (ब्रह्माण्ड पुराण, २/३/१/९३)। अन्यत्र इनकी पत्नी का नाम गभस्तिनी कहा है (ब्रह्म पुराण, २/४०/५)। गभस्तिमान् भारत के ९ खण्डों में सबसे पूर्व का खण्ड गभस्तिमान (पपुआ-न्यूगिनी) था, किन्तु यहां की नदी गभस्ति को अग्नि या शक द्वीप (आस्ट्रेलिया) में कहा है (मत्स्य पुराण१२२/३४, विष्णु पुराण, २/४/६६)। संभवतः उनकी पत्नी वहां की होगी। अन्य पत्नीसुवर्चा या सुभद्रा से पिप्पलाद का जन्म हुआ जिनके नाम से अथर्व वेद की पिप्पलाद संहिता है (शिव पुराण, ३/२४, स्कन्द पुराण अध्याय, ७/१/३१+)
दधीचि के विषय में सबसे प्रसिद्ध कथा है कि वृत्र असुर के वध के लिए इन्होंने इन्द्र को अपनी अस्थियां दी थी, जिनसे वज्र बना (पद्म पुराण, १/१९/७५, ब्रह्म पुराण, २/४०/५, भागवत पुराण, ६/१०, विष्णु धर्मोत्तर पुराण, १/२०७/२३, स्कन्द पुराण अध्याय, ६/८)। अन्य मुख्य कथा है कि इन्होंने दक्ष यज्ञ में शिव की पूजा करने के लिए कहा था, तथा नहीं होने पर वहां से निकल गये थे (कूर्म पुराण अध्याय, १/१५, वायु पुराण, ३०/१०२, शिव पुराण, २/२/२७, स्कन्द पुराण, ४/२/८७/६८)। स्वश्रेष्ठता विवाद में इनकी राजा क्षुब से पराजय हुई थी। मृत्युञ्जय मन्त्र से अमरता की प्राप्ति हुई। क्षुब के समर्थन में आये विष्णु को भी पराजित किया (शिव पुराण, २/२/३८-३९)।
२. आध्यात्मिक अर्थ-
डॉ. फतह सिंह-आनन्दमय कोश के आनन्द को पय: या दुग्ध कहते हैं। जब इस पय: या आनन्द का विज्ञानमय कोश में अवतरण होता है तो यह विकृत होकर दधि बन जाता है । वहां जो जीवात्मा इस दधि को धारण करता है उसे दध्यङ्ग कहते हैं। जब यह जीवात्मा विज्ञानमय से निचले - मनोमय, प्राणमय और अन्नमय स्तरों पर दधि रूपी आनन्द बिखेरता है तो वह दधिक्रावा अश्व कहलाता है । दध्यङ्ग ही पुराणों का दधीचि ऋषि है । वह जीवात्मा जो दधिक्रा - दधि से युक्त है, उसकी अस्थियों से वज्र बनता है । अस्थि अर्थात् अस्ति । वज्र: - वर्जनात्, अर्थात् जो अहंकार की वर्जना करता है ।
रसो वै पयः (शतपथ ब्राह्मण, ४/४/४/८, ७/३/१/४६)-सं ते पयांसि (वाज. यजु, १२/११३)
(अग्निः) तां (गां) सम्बभूव तस्यां (गवि) रेतः प्रासिञ्चत् तत् पयो अभवत् (शतपथ ब्राह्मण, २/२/४/५)
तस्मात् प्रथम दुग्धं (पयः) उष्णं भवति अग्नेः हि रेतः (शतपथ ब्राह्मण, २/२/४/१५)
समानजन्म वै पयस्य हिरण्यं च-उभयं हि अग्नि रेतसम् (शतपथ ब्राह्मण, ३/२/४/८)
(इन्द्रः) यत् अब्रवीत्, हिनोति, मेति तस्मात् दधि (शतपथ ब्राह्मण, १/६/४/८)
ऐन्द्रं वै दधि (शतपथ ब्राह्मण, ५/२/४/१३)
इन्द्रियं वै दधि (तैत्तिरीय ब्राह्मण, २/१/५/६)
सोमो वै दधि (कौषीतकि ब्राह्मण, ८/९)
सरस्वत्यै दधि (शतपथ ब्राह्मण, ४/२/५/२२)
देवपवित्रं वै दधिक्रा (ऐतरेय ब्राह्मण, ६/३६)
अन्नं वै दधिक्रा (गोपथ ब्राह्मण, उत्तर, ६/१६)
दध्यङ् वा आङ्गिरसो देवानां पुरोधानीय आसीत् (ताण्ड्य महाब्राह्मण, १२/८/६)
वाक वै दध्यङ् आथर्वणः (शतपथ ब्राह्मण, ६/४/२/३)-वाज. यजु, ११/३३
दधि-
(इन्द्रः) यद् अब्रवीत्, हिनोति, मेति तस्मात् दधि (शतपथ ब्राह्मण, १/६/४/८)
ऐन्द्रं वै दधि (शतपथ ब्राह्मण, ७/४/१/४२)
अथ यद् अनडुह्यै वहलाया ऽऐन्द्रं दधि भवति, त इन्द्रस्य चतुर्थो भागः (शतपथ ब्राह्मण, ५२/४/१३)
इन्द्रियं वै दधि (तैतिरीय ब्राह्मण, २/१/५/६)
इन्द्रियं वा एतत्, अस्मिन् लोके यत् दधि (ऐतरेय ब्राह्मण, ८/१९)
३. आधिदैविक अर्थ-
सृष्टि का मूल स्रोत रस था जिसकी अनुभूति से आनन्द मिलता है, अतः उसे आनन्द भी कहते हैं।
यद् वै तत् सुकृतं, रसो वै सः। रसं लब्ध्वा आनन्दी भवति (तैत्तिरीय उपनिषद्, २/७/२)
यह रस सदा आकाश में बना रहता है, अतः अमृत है। इसका चतुर्थ भाग विश्व बनता है, जो बनता और नष्ट होता रहता है। रस से द्रप्स (बुद्बुद्, बुलबुला, अंग्रेजी में drops) जैसा मुक्त हुआ अतः उसे मुच्यु या परोक्ष में मृत्यु कहते हैं। द्रप्स के अलग होने को स्कन्न (स्कन्द) भी कहते हैं।
पादोऽस्य विश्वा भूतानि, त्रिपादस्यामृतं दिवि (पुरुष सूक्त, वाज. यजु, ३१/३)
द्रप्सश्चस्कन्द प्रथमाँ अनु द्यूनिमं च योनिमनु यश्च पूर्वः॥ (ऋक्, १०/१७/११, वाज. यजु, १३/५)
यस्ते द्रप्सः स्कन्दति॥१२॥ (ऋक्, १०/१७/१२)
स समुद्रात् अमुच्यत स मुच्युः अभवत्, तं वा एतं मुच्युं सन्तं मृत्युः इति आचक्षते। (गोपथ ब्राह्मण, पूर्व, १/७)
मूल स्रोत स्वयम्भू, परमेष्ठी (ब्रह्माण्ड, गैलेक्सी) अपेक्षाकृत स्थायी तथा अमृत हैं। उसमें अस्थायी सूर्य मृत है जिसका तपने से क्षरण हो रहा है। उस अमृत परमेष्ठी में सूर्य अपने ग्रहों (सौरमण्डल = रथ या सरीर) के साथ परिक्रमा कर रहा है।
एष एव मृत्युः । य एष (सूर्यः) तपति (शतपथ ब्राह्मण, २/३/३/७)
आकृष्णेन रजसा वर्तमानो, निवेशयन् अमृतं मर्त्यं च।
हिरण्ययेन सविता रथेन देवो याति भुवनानि पश्यन्॥
(ऋग्वेद, १/३५/२, वाज यजु, ३३/४३, तैत्तिरीय सं, ३/४/११/२)
ब्रह्माण्ड में नक्षत्रों का समूह दधि जैसा ठोस कणों से युक्त है, अतः वह दधि है। उसका आवरण उसे शक्ति देता है, वह मधु है। ब्रह्माण्ड का समुद्र घृत या सरस्वती है। अमावास्या रात्रि में यही दीखता है, अतः सरस्वती को अमावास्या भी कहा है।
रेतो वै घृतम् (शतपथ ब्राह्मण, ९/२/३/४४)
रेतः सिक्तिः वै घृतम् (कौषीतकि ब्राह्मण, १६/५)
सरस्वत्यै दधि, मित्रावरुणयोः पयस्या (शतपथ ब्राह्मण, ४/२/५/२२)- ब्रह्माण्ड का आदित्य = वरुण, सौर मण्डल का आदित्य = मित्र।
अमावास्या वै सरस्वती (गोपथ ब्राह्मण, उत्तर, १/१२)
घृत अलग होने पर मधु बचता है-परमो रसो यत् मधु (शतपथ ब्राह्मण, ११/५/४/८)
परमं वा एतद् अन्नाद्यं यत् मधुः (ताण्ड्य महाब्राह्मण, १३/११/१७)
निर्माण क्रम-रस = अमृत। द्रप्स रूप ब्रह्माण्ड = घृत। उसमें निर्माण क्रिया = मधु। नक्षत्र समूह = सरस्वती या दधि।
४. सौर मण्डल-
इसका बाह्य आवरण अमृत है, जो सदा बना रहता है। इसके भीतर गैस पिण्ड घृत हैं। ग्रहों में सौर ऊर्जा से गति, जीवन धारण आदि मधु है। सौर ऊर्जा के प्रयोग को मधु विद्या कहा गया है। (छान्दोग्य उपनिषद्, अध्याय ३, खण्ड १) ठोस ग्रहों का क्षेत्र दधि है, जिसमें पृथ्वी सबसे बड़ी है और हमारा लोक है। पुराणों में मंगल कक्षा को ही दधि-समुद्र कहा गया है, पृथ्वी से देखने पर मंगल कक्षा वलयाकार दीखेगी, जिसका आकार दधि समुद्र कहा है।
दधि ह एव अस्य लोकस्य रूपम्, घृतं अन्तरिक्षस्य, मधु अमुष्य (शतपथ ब्राह्मण, ७/५/१/३)
५. इन्द्र का वज्र-
वैदिक मन्त्र है कि दधीचि की हड्डियों से इन्द्र का वज्र बना, जिससे इन्द्र ने वृत्रों का सामना किया, ९९ को मारा।
इन्द्रो दधीचो अस्थभिर्वृत्राण्यप्रतिष्कुतः। जघान नवतिर्नव॥
(ऋग्वेद, १/८४/१३, अथर्व सं २०/१४/१, सामवेद, १/१७६, २/२६३, मैत्रायणी सं. २/१३/६, १५४/१०, काण्व सं. ३९/१२, तैत्तिरीय ब्राह्मण, १/५/८/१)
इन्द्र का आयुध वज्र है। इन्द्र आकाश में ऊर्जा है,
दध्यङ् या आङ्गिरस देवों के पुरोधा (अग्रणी, पुरोहित) थे।
दध्यङ् वा आङ्गिरसो देवानां पुरोधानीय आसीत् (ताण्ड्य महाब्राह्मण, १२/८/६)
(यजु, ११/३३) वाक् वै दध्यङ् आथर्वणः (शतपथ ब्राह्मण, ६/४/२/३) = अग्नि का प्रवाह अङ्गिरा (अंगारा) है। उसका वाक् (आकाश गुण) या क्षेत्र दध्यङ् आथर्वण है। इन धामों के प्राण देव हैं। इस अर्थ में देवों का आरम्भ दध्यङ् से होता है। अथर्व = ब्रह्म (बिना थर्व या कम्पन।
महाभारत, सभा पर्व, (२४/१९), शान्ति पर्व (१५/१५) में भी इन्द्र द्वारा वृत्र या ९९ असुरों का वध का वर्नन है। इन्द्र जैसी महानता दिखाने के लिए बौद्ध ग्रन्थ दिव्यावदान में भी मौर्य अशोक द्वारा अपने ९९ भाइयों की हत्या कर राजा बनने का उल्लेख किया है।
मनुष्य रूप में देवराज इन्द्र द्वारा वृत्र के वध के लिए दधीचि की हड्डी का कोई उपयोग नहीं था। हड्डी से कठोर पत्थर बिना प्रयास मिल जाते हैं। इस कथा का अनुकरण कर इतिहास में प्रस्तर युग से पूर्व अस्थि-युग की कल्पना की गयी है। जयशंकर प्रसाद ने भारत-महिमा काव्य (चन्द्रगुप्त नाटक, द्वितीय अंक) में इसका अस्थि युग के इतिहास के रूप में वर्णन किया है-
सुना है दधीचि का वह त्याग, हमारी जातीयता विकास।
पुरन्दर ने पवि से है लिखा, अस्थि-युग का मेरा इतिहास॥
वज्र का अर्थ है विद्युत्-स्फुलिंग।
ह्रादिनी वज्रं अस्त्रीः स्यात् कुलिशं भिदुरं पविः। शतकोटिः स्वरुः शंबो दम्भोलिः अशनि द्वयोः॥
(अमर कोष, १/१/४२-इन्द्र वज्र के नाम)
स्फुर्जथुः वज्र निर्घोषे, मेघज्योतिः इरम्मदः। (अमरकोष, १/३/१०)
यह विद्युत् स्फुलिंग से प्रहार का यन्त्र था-या आज ले लेजर गन जैसा। इसका मनुष्य की हड्डी से कोई सम्बन्ध नहीं है।
सौर मण्डल में सूर्य का विकिरण इन्द्र है, जहां तक इसका विकिरण अन्धकार रूपी वृत्र को दूर करता है, वज इन्द्र का वज्र है जो धाम का आच्छादन करता है। यह ३३ धाम तक है। मनुष्य के मेरुदण्ड में भी ३३ जोड़ हैं, इस अर्थ में यह मेरुदण्ड जैसा है। त्रिष्टुप् छन्द के ३ चरणों में ३३ अक्षर हैं, अतः इसे त्रिष्टुप् भी कहा गया है।
वज्रो वै त्रिष्टुप् (शतपथ ब्राह्मण, ७/४/२/२४)
वज्रो वै शरः (शतपथ ब्राह्मण, ३/१/३/१३, ३/२/१/१३)
वज्रो वै वषट्कारः (शतपथ ब्राह्मण, १/३/३/१४, ऐतरेय ब्राह्मण, ३/८, कौषीतकि ब्राह्मण, ३/५, गोपथ ब्राह्मण, उत्तर, ३/१, ५) = सौर मण्डल के ३३ धाम ६ भाग में विभक्त हैं, जिनको वषट्कार कहते हैं। ३० धाम तक सूर्य की वाक् (प्रभाव) है जहां तक उसका प्रकाश अधिक है (वि-राजते)
त्रिंशद् धाम वि-राजते। वाक् पतङ्गाय धीयते। प्रति वस्तोः अह द्युभिः॥ (ऋक्, १०/१८९/३)
वाक् वै षट्, ऋतवो वै षट् --- (शतपथ ब्राह्मण, १/७/२/२१)
एष एव वषट्कारो य एष (सूर्यः) तपति (शतपथ ब्राह्मन, १/७/२/११, ११/२/२/५ आदि)
३ धाम पृथ्वी के भीतर तथा पृथ्वी से आरम्भ कर अगले धाम क्रमशः २-२ गुणा बड़े हैं।
पृथिव्यामिमे लोकाः (पृथ्वी, अन्तरिक्ष, द्यौ)प्रतिष्ठिताः(जैमिनीय ब्राह्मण उपनिषद्, १/१०/२)
द्वात्रिंशतं वै देवरथाह्न्यन्ययं लोकस्तं समन्तं पृथिवी द्विस्तावत्पर्येति तां समन्तं पृथिवीं द्विस्तावत्समुद्रः पर्येति..... (बृहदारण्यक उपनिषद्, ३/३/२)
अन्तो वै त्रयस्त्रिंशः परमो वै त्रयस्त्रिंश स्तोमानाम्। (ताण्ड्य महाब्राह्मण, ३/३/२)
संवत्सरो वाव प्रतिष्ठा त्रयस्त्रिंशः (वाज. यजु, १४/२३, शतपथ ब्राह्मण, ८/४/१/२२)-१ संवत्सर में प्रकाश जितनी दूर जाता है, वहां तक सौर मण्डल है (१ प्रकाश वर्ष त्रिज्या)
त्रयो वै वषट्कारा वज्रो धामच्छदरिक्तः (ऐतरेय ब्राह्मन, ३/७, गोपथ ब्राह्मण, उत्तर, ३/३)
३३ धाम के प्राण ३३ देव हैं। प्रति धाम में ३-३ असुर हैं, जो इन्द्र रूपी किरण, प्रकाश, ऊर्जा को रोकते हैं
घेरने वाला अन्धकार वृत्र है-
वृत्रो ह वा इदं सर्वं वृत्वा शिश्ये। (शतपथ ब्राह्मण, १/१/३/४)
पाप्मा वै वृत्रः ( शतपथ ब्राह्मण, १/६/३/९)
नमुचि दिन-रात, शुष्क-आर्द्र आदि का भेद मिटा कर छिप जाता है।
अपां फेनेन नमुचेः शिर इन्द्रोदवर्तयः, विश्वा यदजयः स्पृधः (ऋक्. ८/१४/१३),
पाप्मा वै नमुचिः (शतपथ ब्राह्मण, १२/७/३/४)
इन्द्रश्च वै नमुचिश्चासुरः समदधातान्न नौ नक्तान्न दिवाहनन् आर्द्रेण न शुष्केणेति तस्य व्युष्टायामनुदित आदित्ये अपां फेनेन शिरो अछिनत् (ताण्ड्य महाब्राह्मण, १२/६/८)
बल वह है जो बलन करे-मोड़ दे। भौतिक विज्ञान में यह बल की परिभाषा है-जो वस्तुओं की गति या दिशा बदल दे। जिस दिशा में कार्य होना है, वह नहीं हो पाता। बल के कारण कई पिण्ड साथ बन्ध जाते हैं (सह) या शव जैसे निष्क्रिय हो जाते हैं।
बलं वै सहः (शतपथ ब्राह्मण, ६/६/२/१४)
बलं वै शवः (यजु, १२/१०६, १८/५१)-शतपथ ब्राह्मण (७/३/१/२९, ९/४/४/३)
इन्द्र वज्र से ये ३ x ३३ = ९९ असुर मारे जाते हैं।
६. दधिवामन-
(१) शालग्राम शिला-जिस शालग्राम शिला में २ छोटे चक्र हों-
अतिक्षुद्रं द्विचक्रं च नवीनजलदप्रभम्। दधिवामनाभिधं ज्ञेयं गृहीणां च सुखप्रदम्॥६३॥
(ब्रह्मवैवर्त्त पुराण, प्रकृति खण्ड, २१/६३)
(२) विष्णु का एक रूप-विष्णु के १० नामों में एक जिनके जप से मनुष्य नीरोग रहता है-
विष्णुं नारायणं कृष्णं माधवं मधुमूदनम् ।
हरिं नरहरिं रामं गोविन्दं दधिवामनम्॥४६॥
भक्त्या चेमानि नामानि दश भद्राणियो जपेत् ।
शतकृत्यो भक्तियुक्तो जप्त्वा नीरोगतां व्रजेत्॥४७॥
(ब्रह्मवैवर्त्त पुराण, श्रीकृष्ण जन्म खण्ड, अध्याय ८२)
दधिवामन संज्ञोऽहं भक्तानां दधिभक्तदः। यन्नामस्मरणादेव न दरिद्रो नरो भवेत्॥१९९॥
(स्कन्द पुराण, काशी खण्ड, अध्याय ६१)
(३) सुन्दर रूप-वामन-वाम = सेवनीय, धन, वननीय (निरुक्त, ६/३१, ऋक्, ४/३०/३४)
वामदेव-ज्ञान दाता-भुवो ऽविता वामदेवस्य धीनाम् (ऋक्, ४/१६/१८)
महादेव-वामदेवो महादेवः विरूपाक्शः त्रिलोचनः (अमर कोश, १/१/३२)
(४) शरीर का केन्द्र-सौर मण्डल का सूर्य का शरीर है। उसका केन्द्र सूर्य उससे बहुत छोटा अर्थात् वामन है। मंगल तक ठोस ग्रहों का क्षेत्र भी सौर मण्डल की तुलना में बहुत छोटा है, वह दधिवामन है। यह सूर्य केन्द्र से १९ अहर्गण पर है, अतः १९ अंश उत्तर अक्षांश पर ओड़िशा में दधिवामन मन्दिर हैं।
मनुष्य शरीर रूपी रथ में उसकी आत्मा वामन है, जिसके दर्शन से मुक्ति होती है। इसका भौतिक रूप रथ यात्रा में रथ पर स्थित वामन रूप जगन्नाथ का दर्शन है। इसे ३ प्रकार से देखते हैं- (क) क्रिया रूप यज्ञ-यह दिन-मास या वर्ष के चक्र में होता है, जो दोलन है। यज्ञ का प्रतीक गो है, उसका पालन कर्ता जगन्नाथ गोविन्द हैं।
(ख) हमारा विश्व पृथ्वी रूपी मञ्च पर स्थित है, जो मधु-कैटभ के मेद से बनी। इस रूप में जगन्नाथ मधुसूदन अर्थात् मधु को मारने वाले हैं। मधु निकट लाता है, अर्थात् आकर्षण क्रिया, कैटभ अवाञ्छित या कटु को दूर करता है।
(ग) विश्व या शरीर के प्राण रूपी आत्मा सूक्ष्म आत्मा या वामन हैं।
पुर = नगर या कोई भी रचना, मनुष्य शरीर।
अष्टाचक्रा नवद्वारा देवानां पूरयोध्या (अथर्व, १०/२/३१)
नवद्वारे पुरे देही हंसो लेलायते बहिः।
वशी सर्वस्य लोकस्य स्थावरस्य चरस्य च॥ (श्वेताश्वतर उपनिषद्, ३/१८)
गतिशील पुर को रथ कहा है-
आत्मानं रथिनं विद्धि, शरीरं रथमेव तु। बुद्धिं तु सारथिं विद्धि, मनः प्रग्रहमेव च॥३॥
इन्द्रियाणि हयानाहुर्विषयांस्तेषु गोचरान्। आत्मेन्द्रियमनोयुक्तं भोक्तेत्याहुर्मनीषिणः॥४॥
(कठोपनिषद्, १/३/३-४)
= शरीर रथ है, इसका रर्थी या स्वामी आत्मा है। बुद्धि सारथी या चालक है, जो मन रूपी प्रग्रह (पगहा, रस्सी) से इन्द्रिय रूपी अश्वों को नियन्त्रित कर रहा है। इन्द्रिय तथा मन द्वारा आत्मा इसका उपभोग कर रहा है।
ऊर्ध्वं प्राणमुन्नयत्यपानं प्रत्यगस्यति। मध्ये वामनमासीनं विश्वे देवा उपासते॥।३॥
(कठोपनिषद्, २/२/३)
रथ यात्रा का वर्णन स्कन्द पुराण, वैष्णव खण्ड, उत्कल खण्ड, अध्याय ३३ में है। इस सम्बन्ध में एक प्रसिद्ध श्लोक प्राचीन कोषों शब्द कल्पद्रुम तथा वाचस्पत्यम् में रथ शब्द के अर्थ में उद्धृत है। इस तरह के कुछ महत्त्वपूर्ण श्लोकों को बाद के पुराण संस्करणों से निकाल दिया गया जो १८९० ई तक थे।
दोलायमानं गोविन्दं मञ्चस्थं मधुसूदनम्। रथस्थं वामनं दृष्ट्वा पुनर्जन्म न विद्यते।
= जो दोलायमान गोविन्द को, मञ्च स्थित मधुसूदन को, तथा रथ में स्थित वामन को देखता है, उसका पुनर्जन्म नहीं होता।
(घ) दधि वामन शरीर का ठोस आधार अस्थि है, जो दधीचि के आध्यात्मिक अर्थ में कहा गया है।