Wednesday, 21 October 2026

रावण सुपर्णखा

 इन दुर्जन की स्थापना है कि रावण ने शूर्पणखा के अपमान का बदला लेने के लिए सीता का हरण किया, न कि सीता को पाने की इच्छा से।
वाल्मीकि के अरण्यकाण्ड में 3.49.16 में रावण को सीता को पकड़ते हुए इस प्रकार वर्णित किया गया है:
अभिगम्य सुदुष्टात्मा राक्षसः काममोहितः।
जग्राह रावणः सीतां बुधः खे रोहिणीमिव॥
अर्थात् दुष्टात्मा राक्षस रावण काम से मोहित होकर सीता को पकड़ता है। अगले श्लोक में उसके द्वारा सीता को बालों और जाँघों से पकड़ने का वर्णन है।
शूर्पणखा का अपमान कथा की घटनाओं की शृंखला में महत्त्वपूर्ण है। लेकिन वाल्मीकि स्पष्ट रूप से रावण की कामना और सीता को बलपूर्वक पकड़ने का वर्णन करते हैं। इसलिए यह कहना कि हरण का उद्देश्य बिल्कुल भी सीता को पाने की इच्छा नहीं था, मूल पाठ से मेल नहीं खाता। शूर्पणखा तो रावण को अपने अपमान का नहीं सीता के सौंदर्य के बारे में बताती है।

ये महोदय कहते हैं कि रावण ने सीता का हरण किया, लेकिन उसका उद्देश्य दूसरे पुरुष की पत्नी को प्राप्त करना नहीं था।अरण्यकाण्ड 3.49 में रावण सीता के सामने अपनी शक्ति और वैभव का बखान करता है। सीता उसे अस्वीकार करती हैं। इसके बाद वह उन्हें पकड़कर ले जाता है। अरण्यकाण्ड 3.49.22 में सीता के लिए स्पष्ट शब्द है:
तामकामाम् …अर्थात् वह सीता को, जो इच्छुक नहीं हैं, अपने साथ ले जाता है।रावण की मंशा को केवल प्रतिशोध बताना मूल पाठ में उपस्थित कामना और सीता की असहमति को अनदेखा करना है। इसे निश्चित तथ्य की तरह पेश करना अनुचित है।

महोदय सुन्दरकाण्ड, सर्ग 9 का हवाला देकर लिखते हैं कि रावण के महल की सभी स्त्रियाँ स्वेच्छा से उसकी पत्नियाँ बनी थीं और उसने किसी स्त्री को उसकी इच्छा के विरुद्ध नहीं छुआ।
वाल्मीकि के सुन्दरकाण्ड 5.9.68 में कहा गया है:
राजर्षिपितृदैत्यनाम् गन्धर्वाणां च योषितः।
रक्षसां चाभवन् कन्यास्तस्य कामवशं गताः॥
इसका आशय है कि राजर्षियों, पितरों, दैत्यों, गन्धर्वों और राक्षसों की कन्याएँ रावण के काम के वश में थीं।यहाँ कामवशं गताः का अर्थ अपने-आप यह नहीं हो जाता कि हर स्त्री स्वतंत्र इच्छा से, बिना किसी दबाव के, रावण की पत्नी बनी थी।जनाब का “सभी स्त्रियाँ स्वेच्छा से पत्नी बनीं” वाला निष्कर्ष मूल श्लोक के शब्दों से अधिक व्यापक है। श्लोक में न तो सभी स्त्रियों की स्वतंत्र सहमति का स्पष्ट विवरण है, न ही सभी को पत्नी घोषित किया गया है।

महोदय कहते हैं रावण ने कभी किसी स्त्री को उसकी इच्छा के विरुद्ध नहीं छुआ।यह दावा केवल सीता के प्रसंग तक सीमित नहीं है। वे इसे रावण के पूरे चरित्र की विशेषता बनाते हैं। महोदय कहते हैं कि रावण ने सीता को इसलिए नहीं छुआ क्योंकि वह स्त्रियों की सहमति का आदर्श समर्थक था।सीता पर बल प्रयोग न करने को वे रावण के श्रेष्ठ चरित्र का प्रमाण बनाते हैं। वेदवती की कहानी महोदय नहीं बताते। उत्तरकाण्ड में रम्भा का प्रसंग आता है। रावण रम्भा के साथ बलपूर्वक व्यवहार करता है, जबकि वह उसे रोकती है और अपने संबंध का हवाला देती है। इसके बाद नलकूबर रावण को शाप देता है कि वह किसी अनिच्छुक स्त्री पर बल प्रयोग करेगा तो उसका सिर फट जाएगा।इस प्रसंग का उल्लेख वाल्मीकि रामायण की उत्तरकाण्ड-परंपरा में है; सीता के प्रसंग पर IIT कानपुर के वाल्मीकि रामायण पोर्टल की टीका भी रम्भा-प्रसंग के शाप को रावण द्वारा सीता पर बल प्रयोग न करने का कारण बताती है।यह दावा कि रावण ने कभी किसी स्त्री को उसकी इच्छा के विरुद्ध नहीं छुआ, उत्तरकाण्ड के रम्भा-प्रसंग से टकराता है। रावण द्वारा सीता के साथ बलात्कार न करना और रावण का सभी स्त्रियों के प्रति सदैव सहमति का सम्मान करना एक ही दावा नहीं है।सीता पर बल प्रयोग न करने का तथ्य स्वीकार किया जा सकता है। लेकिन उसे सार्वभौमिक नैतिक आदर्श का प्रमाण बना देना अलग निष्कर्ष है। शाप के कारण उत्पन्न भय और स्वेच्छा से स्वीकार किए गए नैतिक सिद्धांत में अंतर है।

उत्तरकाण्ड 24.1–2 में वाल्मीकि बताते हैं कि 
निवर्तमानः संहृष्टो रावणस्सुदुरात्मवान्।
जह्रे पथि नरेन्द्रर्षिदेवगन्धर्वकन्यकाः॥ ७.२४.१॥
अर्थ: लौटते समय दुष्टात्मा रावण मार्ग में राजाओं, ऋषियों, देवताओं और गन्धर्वों की कन्याओं का हरण करता गया।
अगला श्लोक और भी स्पष्ट है:
दर्शनीयां हि रक्षः स कन्यां स्त्रीं वापि पश्यति।
हत्वा बन्धुजनं तस्या विमानं तां रुरोध ह॥ ७.२४.२॥
अर्थ: वह राक्षस जब भी किसी सुंदर कन्या अथवा स्त्री को देखता, उसके बंधु-बांधवों को मारकर उसे अपने विमान में बंदी बना लेता था।
विभीषण की गवाही: उत्तरकाण्ड 25.19
विभीषण रावण को उसके आचरण पर फटकारते हुए कहता है:
ज्ञातींस्तान्धर्षयित्वेमास्त्वयाऽऽनीता वराङ्गनाः।
त्वामतिक्रम्य मधुना राजन्कुम्भीनसी हृता॥ ७.२५.१९॥
अर्थ: अपने संबंधियों का उत्पीड़न करके तुम इन सुंदर स्त्रियों को यहाँ ले आए हो। और हे राजन्, तुम्हारी अवहेलना करके मधु कुम्भीनसी को हर ले गया।यहाँ धर्षयित्वा और आनीताः को उनके प्रसंग में समझना चाहिए। विभीषण रावण द्वारा दूसरी स्त्रियों को लाने की निंदा कर रहा है और उसी के परिवार की स्त्री के हरण को उसके कर्मों के प्रतिफल से जोड़ रहा है।

यदि उत्तर कांड की प्रामाणिकता पर सवाल है तो सुंदरकांड में ही रावण स्वयं सीता से कहता है कि सुंदर स्त्रियों को बलपूर्वक उठा लाना राक्षस धर्म रहा है।

महोदय कहते हैं रावण ने सीता को बलपूर्वक नहीं उठाया।वे इस प्रसंग में रावण की निर्दोषता के समर्थन में तर्क देते हैं कि सीता को उठाकर ले जाने की कथा के पीछे दूसरे संस्करणों में शाप और छाया-सीता जैसी व्याख्याएँ हैं। फिर वे स्वयं वाल्मीकि के पाठ का उल्लेख करते हैं।

वाल्मीकि का पाठ अरण्यकाण्ड 3.49.17 में है:
वामेन सीतां पद्माक्षीं मूर्धजेषु करेण सः।
ऊर्वोस्तु दक्षिणेनैव परिजग्राह पाणिना॥
अर्थात् रावण ने बाएँ हाथ से सीता के बाल पकड़े और दाएँ हाथ से उनकी जाँघों को पकड़ा। इसके बाद सीता को बलपूर्वक ले जाने और उनके चिल्लाने का वर्णन है।
वाल्मीकि के मूल पाठ में सीता का बलपूर्वक हरण स्पष्ट है। इसलिए यह कहना कि सीता का हरण बलपूर्वक नहीं हुआ, वाल्मीकि के वर्णन के विपरीत है।यहाँ शारीरिक स्पर्श और सहमति अलग प्रश्न हैं। किसी को हाथ लगाना मात्र सहमति का प्रमाण नहीं होता।

महोदय का कथन है कि सीता स्वयं चाहती थीं कि रावण उन्हें उठा ले जाए-। वे लिखते हैं कि सीता को पहले से रावण द्वारा उठाए जाने की अपेक्षा थी और वे उसी के अनुसार तैयारी कर रही थीं।जबकि अरण्यकाण्ड 3.49.22 में सीता को अकामाम् कहा गया है—अर्थात् वे इसके लिए इच्छुक नहीं थीं। 3.49.21 में रावण द्वारा पकड़े जाने पर सीता के दुःख में चिल्लाने का वर्णन है।सीता की पूर्व-सहमति का दावा इन श्लोकों से सिद्ध नहीं होता। इसके विपरीत, मूल वर्णन उनकी अनिच्छा और प्रतिरोध को स्पष्ट करता है।सीता रावण को क्या क्या नहीं कह सुनातीं । वाल्मीकि रामायण में सीता केवल रावण द्वारा अपहृत और असहाय स्त्री नहीं हैं। वह रावण के सामने अपने विवेक, धर्मबुद्धि, नैतिक साहस और वाणी की पूरी शक्ति के साथ खड़ी होती हैं। अरण्यकाण्ड में अपहरण के समय उनका प्रतिरोध है; लंका में सुन्दरकाण्ड के अनेक प्रसंगों में वह रावण के आचरण, चरित्र, राजधर्म और उसकी बुद्धि पर कठोर प्रहार करती हैं।इसलिए सीता को केवल एक पीड़िता के रूप में प्रस्तुत करना भी मूल पाठ के साथ न्याय नहीं है। उनके साथ जो हुआ, वह एक तथ्य है; उसके सामने उन्होंने जिस दृढ़ता से रावण का सामना किया, वह उतना ही महत्त्वपूर्ण तथ्य है। सीता अपहरण के समय ही रावण को लताड़ती हैं—
न व्यपत्रपसे नीचकर्मणाऽनेन रावण।
ज्ञात्वा विरहितां यो मां चोरयित्वा पलायसे॥
अर्थात्—रावण! इस नीच कर्म पर तुझे लज्जा नहीं आती? मुझे अकेली पाकर मेरा अपहरण करके भाग रहा है! यहाँ सीता केवल अपने अपहरण का दुःख नहीं व्यक्त कर रही हैं। वह रावण के आचरण की नैतिक प्रकृति पहचानकर उसे कठघरे में खड़ा करती हैं।
अरण्यकाण्ड 3.53 में सीता रावण के सामने उसके छल को उजागर करती हैं। वह मारीच के स्वर्णमृग-वेश और राम को आश्रम से दूर करने की योजना का संदर्भ देती हैं। फिर रावण के इस तथाकथित पराक्रम की तुलना उसके वास्तविक आचरण से करती हैं।उनकी आपत्ति का सार स्पष्ट है: यदि रावण इतना ही वीर है, तो राम से सामने आकर युद्ध क्यों नहीं करता?
वह राम की अनुपस्थिति का लाभ उठाकर सीता का अपहरण करता है। इस प्रकार सीता रावण की शक्ति का नहीं, उसके शक्ति-प्रदर्शन के तरीके का प्रश्न उठाती हैं। शारीरिक बल होना और वीर होना एक ही बात नहीं है।

रावण के प्रलोभनों और अपनी शक्ति के प्रदर्शन के उत्तर में सीता कहती हैं—
राजा दशरथो नाम धर्मसेतुरिवाचलः।
सत्यसन्धः परिज्ञातो यस्य पुत्रः स राघवः॥
अर्थात् दशरथ नाम के राजा धर्म की अचल मर्यादा के समान थे। सत्यप्रतिज्ञ राघव उनके पुत्र हैं।यहाँ सीता राम का परिचय मात्र नहीं दे रहीं। वह रावण के सामने दो नैतिक व्यवस्थाओं का अंतर रख रही हैं—एक ओर धर्म और सत्य पर प्रतिष्ठित राम का वंश, दूसरी ओर छलपूर्वक स्त्री का अपहरण करने वाला रावण।

सीता का सबसे तीखा वाक्य यह है—
शूरेण धनदभ्रात्रा बलैः समुदितेन च।
अपोह्य रामं कस्माच्चिद् दारचौर्यं त्वया कृतम्॥
अर्थात्—कुबेर के भाई! वीर और सेनाओं से सम्पन्न होते हुए भी तूने राम को किसी प्रकार दूर करके यह दारचौर्य किया है।सुंदरकांड का यह वाक्य है।’दारचौर्य’ शब्द पर ध्यान दीजिए। सीता रावण के कृत्य को वीरतापूर्ण विजय नहीं, दूसरे पुरुष की पत्नी की चोरी कहती हैं। रावण की शक्ति, उसका राजपद और उसका वंश—इनमें से कोई भी उसे इस अपराध से मुक्त नहीं करता।

महोदय कहते हैं कि रावण ने केवल यज्ञों में पशुहत्या रोकने के लिए ऋषियों और देवताओं का विरोध किया। वे रावण के देवताओं और ऋषियों के विरोध को यज्ञों में पशुबलि के विरोध से जोड़ते हैं। वे इसे रावण के नैतिक गुण के रूप में प्रस्तुत करते हैं। जबकि वाल्मीकि रामायण के अरण्यकाण्ड में ऐसा कोई प्रसंग नहीं है जिसमें किसी यज्ञ में पशुहिंसा का प्रत्यक्ष वर्णन करके उसे रावण के विरोध का कारण बताया गया होअरण्यकाण्ड 3.32.19–21 में शूर्पणखा रावण के बारे में यज्ञों में बाधा डालने और सोम-आहुति के प्रसंग का उल्लेख करती है। वहाँ रावण को यज्ञों में बाधा डालने वाला और लोगों के अहित में प्रवृत्त बताया गया है।
इस वर्णन में ऐसा स्पष्ट कथन नहीं है कि रावण का उद्देश्य करुणा के कारण पशुहत्या रोकना था। उपलब्ध पाठ में यज्ञ-विरोध को रावण के अपने राजनीतिक और धार्मिक वर्चस्व के संदर्भ में भी पढ़ा जा सकता है।

वे कहते हैं कि रावण ने सीता के साथ वही नहीं किया जो राम और लक्ष्मण ने शूर्पणखा के साथ किया था, इसलिए वह नैतिक रूप से श्रेष्ठ था। कि रावण ने शूर्पणखा के साथ हुए व्यवहार का बदला लेने के लिए सीता के नाक-कान या शरीर के अन्य अंग नहीं काटे।
वाल्मीकि के यहां शूर्पणखा और सीता की घटनाएँ अलग परिस्थितियों में घटती हैं। वाल्मीकि रामायण में शूर्पणखा सीता पर आक्रमण करने के लिए झपटी थी; सीता ने शूर्पणखा पर आक्रमण नहीं किया था।
अरण्यकाण्ड, सर्ग 18 में शूर्पणखा राम और लक्ष्मण के सामने सीता को मारकर खाने की बात करती है। लक्ष्मण द्वारा उसका विरूपण किए जाने का तत्काल प्रसंग भी यही है कि वह सीता को हानि पहुँचाने के लिए उद्यत हुई थी।
अरण्यकाण्ड 3.18.17 में शूर्पणखा कहती है—
इमां विरूपामसतीं करालां निर्णतोदरीम्।
सीतेत्युक्त्वा तु वैदेहीं अङ्केनादाय मैथिलीम्॥

महोदय विभीषण को लालची और विश्वासघाती बताते हैं और कहते हैं कि उसका वास्तविक उद्देश्य लंका का राजा बनना था।
जबकि युद्धकाण्ड 6.10 में विभीषण रावण को सीता लौटाने की सलाह देता है। वह अशुभ संकेतों और युद्ध के विनाशकारी परिणामों का उल्लेख करता है। रावण उसकी सलाह अस्वीकार करता है।युद्धकाण्ड 6.17.14–16 में विभीषण कहता है कि उसने बार-बार रावण को सीता लौटाने की सलाह दी, लेकिन रावण ने उसकी बात नहीं मानी और उसे अपमानित किया। इसके बाद विभीषण राम की शरण में जाता है।

महोदय का कहना रहा कि विभीषण ने रावण के प्रति कोई न्यायपूर्ण सलाह नहीं दी; उसने केवल भाई से विश्वासघात किया।यह दावा पिछले बिंदु का दूसरा पक्ष है।
वाल्मीकि का पाठ बताता है कि विभीषण की सलाह स्पष्ट रूप से सीता को लौटाने और युद्ध टालने की है। वह रावण को बताता है कि उसके निर्णय से लंका और उसके लोगों पर संकट आएगा। रावण सलाह सुनकर क्रोधित होता है और विभीषण को अपमानित करता है।

महोदय के अनुसार रावण प्रजा का दयालु और आदर्श रक्षक था। रावण के दस गुणों की उनकी सूची में वे उसे प्रजा और संबंधियों का दयालु रक्षक बताते हैं। जबकि रण्यकाण्ड 3.41.14–15 में मारीच रावण से कहता है कि अत्याचारी और दुर्बुद्धि राजा के संरक्षण में प्रजा का विकास नहीं होता। वह रावण को कठोर, दुर्बुद्धि और इन्द्रियों को वश में न रखने वाला राजा कहता है।वाल्मीकि के पाठ में रावण की शासन-शैली की आलोचना भी मौजूद है। कुंभकर्ण तक रावण की आलोचना करता है ।
रावण की मृत्यु पर विभीषण के विलाप के रूप में वेलिखते हैं: “You never failed to do justice: You respected the greatmen.” युद्धकाण्ड 6.109 में विभीषण रावण के शव पर विलाप करते हुए उसके पराक्रम और सामर्थ्य का वर्णन करता है। उसी प्रसंग में वह कहता है कि रावण ने उसकी और दूसरे शुभचिंतकों की सलाह नहीं मानी तथा काम और मोह से अभिभूत होकर विनाश की ओर बढ़ा।
महोदय का कथन है कि रावण और उसके अनुयायियों को क्रूर राक्षस इसलिए कहा गया क्योंकि वे ब्राह्मणों के शत्रु थे। जबकि वाल्मीकि का पाठ रावण की कथा में उसका वंश, तपस्या, वरदान, सामर्थ्य और विद्वत्ता वर्णित करता है। रावण स्वयं ब्राह्मण था लेकिन साथ ही सीता-हरण, ऋषियों के यज्ञों में बाधा और विभीषण की सलाह अस्वीकार करने जैसी घटनाएँ भी हैं।अरण्यकाण्ड में मारीच रावण के शासन और उसके निर्णयों की आलोचना करता है। युद्धकाण्ड में विभीषण भी सीता लौटाने की सलाह देता है, जिसे रावण अस्वीकार करता है।

ऐसे झूठे लोग सच्ची रामायण लिखने का दावा करते थे।

Tuesday, 20 October 2026

साबर मंत्र

साबर मन्त्रों से असाधारण चमत्कार।। 
   साबर मंत्र सीधे सादे सरल प्राकृत भाषा में लिखे होते हैं, देखने से पता ही नहीं चलता कि इन मन्त्रों में असाधारण शक्ति और चमत्कार भी भरा हुआ है, गोरखनाथ के समय से इन मंत्रों की प्रसिद्धि हुई और कलियुग में तो ये मन्त्र अन्य सभी साधना विधियों और मन्त्रों से ज्यादा प्रभावकारी चमत्कारिक और तुरन्त सिद्धि देने वाले हैं ।
अब लम्बी साधना विधियां और प्राचीन तरीके ज्यादा उपयोगी नहीं रहे हैं, इसकी अपेक्षा शीघ्र चमत्कार दिखाने वाले मन्त्र ज्यादा उपयोगी हैं, साबर मन्त्र ऐसे ही आश्चर्यजनक परिणाम दिखाने वाले हैं ।
नीचे संसार के वे श्रेष्ठ साबर मन्त्र दे रहे हैं, स्वामी अवधूतानन्दजी महाराज, जो इस युग में साबर मन्त्रों के श्रेष्ठतम चमत्कारिक व्यक्तित्व हैं ।

—योगी अवधूतानन्द
साबर मन्त्र सरल होते हुए भी सामर्थ्यवान है, सीधे साधे लगने पर भी महान शक्तिशाली हैं. छोटे महसूस होते हुए भी जल्दी और तुरन्त प्रभाव दिखाने वाले हैं, सबसे बड़ी बात यह है, कि इस प्रकार की साधनाओं में न तो विशेष विधि विधान की जरूरत है और न कर्मकाण्ड की, ये मन्त्र या इनकी साधना विधियां ज्यादा जटिल भी नहीं है, अपितु आप समाज के अन्य दुःखी लोगों की भी सहायता कर यश प्राप्त कर सकते हैं ।

लाखों साबर मन्त्रों में से कुछ चुने हुए वे साबर मन्त्र दे रहा हूं, जो परीक्षित हैं, जिनको मैंने आजमाया है, और जो हर कसौटी पर खरे उतरे हैं, जितनी बार भी इन मन्त्रों का प्रयोग किया गया इन्होंने तुरन्त सफलता एवं सिद्धि प्रदान की है ।
जैन ग्रन्थों में भी कई साबर मन्त्र हैं, जो सर्वथा गोपनीय रहे हैं मैं साबर मन्त्रों से सम्बन्धित ज्ञात अज्ञात ग्रन्थों और सिद्ध योगियों से प्राप्त साबर मन्त्र नीचे दे रहा हूं—

१- कार्य सिद्धि मन्त्र
रविवार से लाल धोती पहन कर लाल आसन पर बैठकर दक्षिण की ओर मुंह कर सामने लोबान धूप लगा कर मूंगे की माला से सवा लाख मन्त्र जप करे तो निश्चय ही उसका सोचा हुआ कार्य सिद्ध होता है, छोटा मोटा कार्य तो मात्र पांच माला मन्त्र जप करने से ही हो जाता है ।
मन्त्र
ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं, ह्रौं ह्र: अ-सि-आ-उ-सा नमः स्वाहा

२- रोग निवारण मन्त्र
मंगलवार को या शनिवार को रोगी को सामने बिठाकर पानी का एक गिलास लेकर लोहे की कील घुमा कर फूंक दे और वह पानी रोगी को पिला दे तो उसका रोग समाप्त हो जाता है । 

मन्त्र:- ॐ गिरे मोर मोर हुलु हुलु चुलु चुलु स्वाहा ।

३- भूत उतारने का मन्त्र
यदि किसी को भूत या प्रेत लग गया हो तो उसको सामने बैठाकर दाहिनी मुट्ठी बांधकर १०८ बार मंत्र पढ़े और उसके सामने मुट्ठी खोलकर फूंक दे तो भूत-प्रेत उतर जाता है ।
मन्त्र
ॐ ह्रीं अ-सि-आ-उ-सा सर्वदुष्टानां स्तम्भय अन्धय अन्धय कुरु कुरु ह्रीं भूतादि ठः ठः ठः

४- विद्या प्राप्ति मन्त्र
यदि बालक कमजोर हो, पढ़ाई में अच्छे अंक प्राप्त न होते हों, तो भोजपत्र पर रक्त चंदन से इस मन्त्र को लिखकर ताम्बे के तावीज में डालकर काले धागे से उसके गले में पहना दे तो विद्या प्राप्ति हो ।
मन्त्र
ॐ ह्लीं अ-सि-आ-उ-सा नमो वद वद वाद वादिनी सत्यवादिनी मनुजा सुरसद सी अ-सि-आ-उ-सा नमः ।

५- परदेश लाभ-मन्त्र
परदेश में रोजगार के लिए या धन प्राप्ति के लिए जावे तो पहले इस मन्त्र का दस हजार जप कर, फिर यात्रा प्रारम्भ करें तो अवश्य ही परदेश में सफलता मिलती है ।
मन्त्र
ॐ भगवइ ए चन्दाय एसी आवाय मयूर वाहिनी ए स्वाहा ।

६- धन प्राप्ति मन्त्र
इस मन्त्र का सवा लाख जप पूर्ण श्रद्धा के साथ करे तो निश्चय ही द्रव्य प्राप्ति हो ।
मन्त्र
अरहंत, सिद्ध, आ इ रि य, उवज्झं, सव्व साहूणं

७- वशीकरण मन्त्र
एक पुष्प सामने रखकर उस पर निम्न मन्त्र का एक हजार बार उच्चारण कर वह पुष्प सम्बन्धित व्यक्ति के शरीर से स्पर्श करा दे, तो वह निश्चय ही वश में हो जाता है ।

मन्त्र
ॐ अरे अ र मोहिनी अमुकं मोहय मोहय स्वाहा ।
यहां 'अमुकं' के स्थान पर सम्बन्धित व्यक्ति का नाम उच्चारण करना चाहिए ।

८- दुष्ट निवारण मन्त्र
इस मन्त्र की नित्य पांच माला जपे और तीस दिन तक निरन्तर जपे तो दुष्ट या शत्रु का निश्चय ही क्षय होता है ।
मन्त्र
ॐ अहं अमुकं दुष्ट साध्य साध्य अ-सि-आ-उ-सा नमः ।
यहां 'अमुकं' के स्थान पर उस दुष्ट का नाम उच्चारण करे ।

९- सर्व सिद्धि प्रदायक मन्त्र
हाथ में रुमाल लेकर एक माला मन्त्र जपकर रूमाल में गांठ लगा दें और वह रूमाल जेब में रखे, तो उस दिन प्रत्येक कार्य में सिद्धि होती है ।
मन्त्र
ॐ श्री सर्व जुमोहं कुरु कुरु स्वाहा ।
पृष्ठ ३६ : मन्त्र-तन्त्र-यन्त्र विज्ञान
मन्त्र
ॐ गिरे मोर मोर हुलु हुलु चुलु चुलु स्वाहा ।
३- भूत उतारने का मन्त्र
यदि किसी को भूत या प्रेत लग गया हो तो उसको सामने बैठाकर दाहिनी मुट्ठी बांधकर १०८ बार मंत्र पढ़े और उसके सामने मुट्ठी खोलकर फूंक दे तो भूत-प्रेत उतर जाता है ।
मन्त्र
ॐ ह्रीं अ-सि-आ-उ-सा सर्वदुष्टानां स्तम्भय अन्धय अन्धय कुरु कुरु ह्रीं भूतादि ठः ठः ठः
४- विद्या प्राप्ति मन्त्र
यदि बालक कमजोर हो, पढ़ाई में अच्छे अंक प्राप्त न होते हों, तो भोजपत्र पर रक्त चंदन से इस मन्त्र को लिखकर ताम्बे के तावीज में डालकर काले धागे से उसके गले में पहना दे तो विद्या प्राप्ति हो ।
मन्त्र
ॐ ह्लीं अ-सि-आ-उ-सा नमो वद वद वाद वादिनी सत्यवादिनी मनुजा सुरसद सी अ-सि-आ-उ-सा नमः ।
५- परदेश लाभ-मन्त्र
परदेश में रोजगार के लिए या धन प्राप्ति के लिए जावे तो पहले इस मन्त्र का दस हजार जप कर, फिर यात्रा प्रारम्भ करें तो अवश्य ही परदेश में सफलता मिलती है ।
मन्त्र
ॐ भगवइ ए चन्दाय एसी आवाय मयूर वाहिनी ए स्वाहा ।
६- धन प्राप्ति मन्त्र
इस मन्त्र का सवा लाख जप पूर्ण श्रद्धा के साथ करे तो निश्चय ही द्रव्य प्राप्ति हो ।
मन्त्र
अरहंत, सिद्ध, आ इ रि य, उवज्झं, सव्व साहूणं
७- वशीकरण मन्त्र
एक पुष्प सामने रखकर उस पर निम्न मन्त्र का एक हजार बार उच्चारण कर वह पुष्प सम्बन्धित व्यक्ति के शरीर से स्पर्श करा दे, तो वह निश्चय ही वश में हो जाता है ।
मन्त्र
ॐ अरे अ र मोहिनी अमुकं मोहय मोहय स्वाहा ।
यहां 'अमुकं' के स्थान पर सम्बन्धित व्यक्ति का नाम उच्चारण करना चाहिए ।
८- दुष्ट निवारण मन्त्र
इस मन्त्र की नित्य पांच माला जपे और तीस दिन तक निरन्तर जपे तो दुष्ट या शत्रु का निश्चय ही क्षय होता है ।
मन्त्र
ॐ अहं अमुकं दुष्ट साध्य साध्य अ-सि-आ-उ-सा नमः ।
यहां 'अमुकं' के स्थान पर उस दुष्ट का नाम उच्चारण करे ।
९- सर्व सिद्धि प्रदायक मन्त्र
हाथ में रुमाल लेकर एक माला मन्त्र जपकर रूमाल में गांठ लगा दें और वह रूमाल जेब में रखे, तो उस दिन प्रत्येक कार्य में सिद्धि होती है ।
मन्त्र
ॐ श्री सर्व जुमोहं कुरु कुरु स्वाहा ।
अस्पष्ट अक्षर: ३ और ४ नम्बर के मन्त्रों में "अ-सि-आ-उ-सा" की मात्राएं छोटे छापे में साफ़ नहीं हैं (खासकर ३ नम्बर में पहला "सि/सी" और बीच के "आ")। ६ नम्बर मन्त्र में "आ इ रि य" और "उवज्झं" तथा ४ नम्बर में "मनुजा सुरसद सी" भी धुंधले हैं। बेहतर स्कैन मिले तो मैं इन्हें दोबारा जांच सकता हूं।

Saturday, 17 October 2026

पुष्कर

पुष्कर
१. अर्थ-
(१) पुष्कर-पुष्कर का शाब्दिक अर्थ है, पुष्ट करने वाला। इसके कई अर्थ हैं, किन्तु सामान्यतः यह कमल के लिये प्रयुक्त होता है। पृथ्वी भी पुष्कर है, जो जीवों को पुष्ट करती है।
इसका एक पर्याय पद्म है। पृथ्वी पद्म है, जिस पर पद रखते हैं।
अन्य प्रचलित शब्द कमल है, जो क = जल का मल या उससे उत्पन्न है। लक्ष्मी को कमला कहते हैं। सम्पत्ति रूप में यह क = कर का मल है, हाथों के परिश्रम से उत्पन्न। अतः सम्पत्ति को हाथ का मैल कहते हैं। लक्ष्मी को पद्मा, पद्मालया, भी कहते हैं-
लक्ष्मी पद्मालया पद्मा कमला श्रीर्हरिर्प्रिया। (अमर कोश, १/१/२७) 
कमल का पत्ता जल से उत्पन्न होता है, कितु उससे जल चिपकता नहीं है। इसी प्रकार जीवन्मुक्त व्यक्ति संसार में रहते हुए भी उसमें लिप्त नहीं होता।
ब्रह्मण्याधाय कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा करोति यः। लिप्यते न स पापेन पद्मपत्रमिवाम्भसा॥ (गीता, ५/१०)
कमल जल जैसे स्रोत से सृष्टि का प्रतीक है। अतः इसकी उत्पत्ति ब्रह्मा के कर्ता या यज्ञ रूप विष्णु के नाभि से कही जाती है, जिस पर स्रष्टा रूप ब्रह्मा आसीन हैं। ब्रह्मा का ज्ञान रूप सरस्वती भी पद्म पर स्थित हैं।
पद्म दल का अर्थ है, सृष्टि की विविध दिशायें या प्रकार। सृष्टि केन्द्र रूप में इसे उल्ब (गर्भ-नाल), मेरु भी कहते हैं। 
(२) ब्रह्मा रूप- गायत्री मन्त्र के ३ पादों के अनुसार ब्रह्मा, विष्णु, शिव के स्वरूप-
ब्रह्मा-मूल स्रोत पदार्थ, ३ धामों के ७ लोक, ज्ञान रूप त्रयी वेद, प्रतीक-पलास, दण्ड से ३ पत्ते निकलने पर मूल भी बचा रहता है। इसी तरह त्रयी विभाजन के बाद अविभाज्य अथर्व वेद रहता है।
विष्णु-सृष्टि इच्छा, सृष्टि निर्माण-विनाश क्रिया, व्यक्ति रूप से स्वतन्त्र चेतना जिसका प्रतीक अश्वत्थ है (गीता, १०/२६)
शिव-मूल चेतना, तेज स्तरों का अनुभव, मन के भीतर ज्ञान दाता। प्रतीक वट वृक्ष है जिसकी हवाई जड़ से वैसा ही वृक्ष बनता है। गुरु ज्ञान दे कर अपने जैसा शिष्य बनाता है।
पृथ्वी पर मनुष्य रूप में ब्रह्मा द्वारा सभ्यता और ज्ञान का विकास, प्रजापति। सृष्टि की असुरों से रक्षा के लिए विष्णु के १० या ३२ अवतार। शिव के अवतार २८ व्यास।
२. आधिदैविक पद्मनाभ-
आधिदैविक तथा आध्यात्मिक अर्थ भौतिक शब्दों के ही अर्थ का विस्तार है, जिसे वृद्धि कहा गया है। भागवत माहात्म्य में कहा है कि ज्ञान और वैराग्य की उत्पत्ति द्रविड में हुई, वृद्धि कर्णाटक में। ज्ञान का मूल वेद है, वह श्रुति आदि ज्ञानेन्द्रियों द्वारा निसर्ग से प्राप्त ज्ञान है, अतः इसे श्रुति तथा निगम कहते है। श्रुति का ग्रहण कर्ण से होता है, अतः जहां अर्थों का विभिन्न संस्थाओं में विस्तार हुआ, उसे कर्णाटक कहा गया।
उत्पन्ना द्रविडे साऽहं वृद्धिं कर्णाटके गता। क्वचित् क्वचित् महाराष्ट्रे गुर्जरे जीर्णतां गता॥४८॥
(पद्म पुराण उत्तर खण्ड श्रीमद् भागवत माहात्म्य, भक्ति-नारद समागम नाम प्रथमोऽध्यायः)
वृद्धि अर्थ में मनुष्य द्वारा जो पृथ्वी पर दीखता है, उसी का आकाश में विस्तार करते हैं। यथा पिण्डे, तथा ब्रह्माण्डे-मनुष्य शरीर की ब्रह्माण्ड से तुलना विस्तार से चरक संहिता, शरीर स्थान, अध्याय ५ में है। मनुष्य का जन्म माता के गर्भ में होता है तो उसका शरीर माता के गर्भ से नाल द्वारा जुड़ा रहता है। आकाश में भी सृष्टि के हर स्तर पर स्रष्टा पुरुष की नाभि कमल से सृष्टि रूप ब्रह्मा की उत्पत्ति का वर्णन है।
(१) हिरण्यगर्भ मेरु या उल्ब-अव्यक्त ब्रह्म पूरुष (४ पाद का), हिरण्यगर्भ रूप सृष्टि का आरम्भ उल्ब है, उससे उत्पन्न विश्वों का क्रम ब्रह्मा रूप है। विश्व क्रम हैं-संयती (पूर्ण विश्व), क्रन्दसी (ब्रह्माण्ड, आकाशगङ्गा), रोदसी (सौर मण्डल), पृथ्वी। सूर्य से प्रकाश का विकिरण उसका रुदन है, उसका क्षेत्र रोदसी। ब्रह्माण्ड के खर्व संख्यक सूर्यों के मिलित रुदन को क्रन्दन कहते हैं, उसका क्षेत्र क्रन्दसी है।
हिरण्यगर्भः समवर्तताग्रे भूतस्य जातः पतिरेक आसीत्। स दाधार पृथिवीमुत द्यां कस्मै देवाय हविषा विधेम॥ 
यं क्रन्दसी अवतश्चस्कभाने भियसाने रोदसी अह्वयेथाम्। यस्यासौ पन्था रजसो विमानः कस्मै देवाय हविषा विधेम॥३॥ 
यस्य द्यौरुर्वी पृथिवी च मही यस्याद उर्वऽन्तरिक्षम्। यस्यासौ सूरो विततो महित्वा कस्मै देवाय हविषा विधेम॥
यस्य विश्वे हिमवन्तो महित्वा समुद्रे यस्य रसामिदाहुः। इमाश्च प्रदिशो यस्य बाहू कस्मै देवाय हविषा विधेम॥ 
(ऋक्, १०/१२१/१,४-६, अथर्व, ४/२/३-५, ७)
हिरण्यगर्भ से ब्रह्माण्ड जन्म पुराणों में भी है, जहां इसे मेरु तथा उल्ब भी कहा है।
एक काल समुत्पन्नं जल बुद्बुदवच्च तत्। विशेषेभ्योऽण्डमभवत् बृहत् तदुदके शयम्॥३६॥
तस्मिन् कार्यस्य करणं संसिद्धिः परमेष्ठिनः। प्राकृतेऽण्डे विवृत्तः स क्षेत्रज्ञो ब्रह्म-संज्ञितः॥३७॥
स वै शरीरी प्रथमः स वै पुरुष उच्यते। आदि कर्त्ता स भूतानां ब्रह्माग्रे समवर्तत॥३८॥
यमाहुः पुरुषं हंसं प्रधानात् परतः स्थितम्। हिरण्यगर्भं कपिलं छन्दो-मूर्तिं सनातनम्॥३९॥
मेरुरुल्बमभूत् तस्य जरायुश्चापि पर्वताः। गर्भोदकं समुद्राश्च तस्यास परमात्मनः॥४०॥ (कूर्म पुराण, १/४)
ब्रह्माण्ड पुराण (१/१/३/२५-२९) में प्रायः यही वर्णन है।
(२) स्वयम्भू मण्डल-यह खर्व ब्रह्माण्डों का समूह है। ब्रह्माण्डों के बीच परस्पर आकर्षण (संकर्षण) ही उल्ब या पद्म है, जिस पर ब्रह्माण्ड स्थित है।
(३) कूर्म मेरु-यह ब्रह्माण्ड का निर्माण क्षेत्र है, जो उससे १० गुणा बड़ा है। इसका आकार ब्रह्माण्ड से १० गुणा बड़ा, अर्थात् ५६ अहर्गण (शक्वरी छन्द = रात्रि क्षेत्र) है। जगती छन्द ब्रह्माण्ड की माप है, गायत्री लोकों की माप है (मनुष्य से आरम्भ कर पृथ्वी, सौर मण्डल की भूमि, ब्रह्माण्ड, पूर्ण जगत् क्रमशः २ घात २४ = कोटि गुणा बड़े हैं-विष्णु पुराण, २/७/३-४)। त्रिष्टुप् सौर मण्डल के क्षेत्रों तथा महर्लोक की माप है।
यद्गायत्रे अधि गायत्रमाहितं त्रैष्टुभाद्या त्रैष्टुभं निरतक्षत।
यद्वा जगज्जगत्याहितं पदं य इतद्विदुस्ते अमृतत्वमानशुः॥ (ऋक्, १/१६४/२३)
शङ्कु भवत्यह्नो धृत्यै यद्वा अधृतँ शङ्कुना तद्दाधार॥११॥
तद् (शङ्कु साम) उ सीदन्तीयमित्याहुः॥१२॥ (ताण्ड्य महाब्राह्मण, ११/१०/११-१२)
सप्तपदा वै तेषां (छन्दसां) परार्ध्या शक्वरी। (शतपथ ब्राह्मण, ३/९/२/१७)
यदिमाँल्लोकान् प्रजापतिः सृष्ट्वेदं सर्वमशक्नोद्यदिदं किञ्च तच्छक्वर्योऽभवंस्तच्छक्वरीणां शक्वरीत्वम्॥ (ऐतरेय ब्राह्मण ५/७)
मानेन तस्य कूर्मस्य कथयामि प्रयत्नतः। 
शङ्कोः शतसहस्राणि योजनानि वपुः स्थितम्॥ (नरपति जयचर्या, स्वरोदय, कूर्म चक्र)
(शङ्कु = शंख = १० घात १३, शत सहस्र शङ्कु = १० घात १८, ब्रह्माण्ड = १००० योजन की पृथ्वी x १ कोटि x १ कोटि)
(४) परमेष्ठी मेरु-ब्रह्माण्ड सबसे बड़ी रचना होने के कारण परमेष्ठी है। इसका केन्द्र कृष्ण (Black hole) है जिसके आकर्षण से ३०,००० प्रकाश-वर्ष (प्रकाश योजन) की दूरी पर सूर्य उसके केन्द्र की परिक्रमा कर रहा है। 
अस्य मूलदेशे त्रिंशद् योजन सहस्रान्तर आस्ते या वै कला भगवतस्तामसी समाख्यातानन्त इति सात्वतीया द्रष्टृ दृश्ययोःसङ्कर्षणमहमित्यभिमान लक्षणं यं सङ्कर्षणमित्याचक्ष्यते॥१॥ यस्येदं क्षितिमण्डलं भगवतोऽनन्तमूर्तेः सहस्रशिरस एकस्मिन्नेव शीर्षाणि ध्रियमाणं सिद्धार्थ इव लक्ष्यते॥२॥ (भागवत पुराण, ५/२५/१-२) 
आकृष्णेन रजसा वर्तमानो निवेशयन्नमृतं मर्त्यं च। हिरण्ययेन सविता रथेना देवो याति भुवनानि पश्यन्॥
(ऋक्, १/३५/२, वाजसनेयि यजु ३३/४३, तैत्तिरीय संहिता, ३/४/११/२)
आकृष्णेन = आकर्षण द्वारा, ब्लैक होल द्वारा जो सभी रंगों को आकर्षित करता है।
(५) सौर मण्डल-सूर्य विष्णु का प्रत्यक्ष रूप है, जिसने अपने आकर्षण से पृथ्वी को धारण किया है।
पृथिवी त्वया धृता लोकाः, देवि त्वं विष्णुना धृता (भूमि पूजन मन्त्र)-यह निम्न वेद मन्त्र का सारांश है-
अनवर्णे इमे भूमी इयं चासौ च रोदसी, किं स्विदत्रान्तराभूतं येनेमे विधृते उभे। विष्णुना विधृते भूमी इति वत्सस्य वेदना, इरावती धेनुमती हि भूतं सूयवसिनी मनुषे दशस्या, व्यष्टभ्नाद् रोदसी विश्णवेते वाधयं पृथ्वीमभिति मयूखैः। (तैत्तिरीय आरण्यक, १/८/४/६)
सूर्य ‘यह’ या निकट का सविता है, इसका असौ, यत् या एष से संकेत है। गायत्री मन्त्र का तत्-सविता, सूर्य के पिता का भी पिता या परमपिता है।
असौ बा आदित्यो (सूर्यः) बृहज्ज्योतिः (शतपथ ब्राह्मण, ६/३/१/१५)
य एष (सूर्यः) तपति (शतपथ ब्राह्मण, १४/१/४/२)
सूर्य का आकर्षण कमल-नाल है, उस पर पृथ्वी ही पद्म है। 
इयं (पृथिवी) वै पुष्करपर्णम् (शतपथ ब्राह्मण, ७/४/१/१२)
तस्मिन् हिरण्मये पद्मे बहु योजन विस्तृते। सर्व तेजो गुणमये पार्थिवैर्लक्षणैर्वृते॥
तच्च पद्म पुराभूतं पृथिवी रूपमुत्तमम्। 
नारायण समुद्भूतं प्रवदन्ति महर्षयः॥ (पद्मपुराण, सृष्टि खण्ड, ४०/२-३)
३. पार्थिव पुष्कर-
(१) मनुष्य ब्रह्मा- महाभारत, शान्ति पर्व, अध्याय ३४८ में मनुष्य रूप में ७  ब्रह्मा का वर्णन है-
(१) मुख्य (नारायण के मुख से)-वैखानस को उपदेश, 
(२) नेत्र से-सोम को उपदेश, उनसे रुद्र, वालखिल्यों को, 
(३) वाणी से-इसे शान्ति पर्व ३४९/४९ में वाणी का पुत्र अपान्तरतमा कहा है, उनके माता पिता के लिये वाणी-हिरण्यगर्भाय नमः यज्ञ में पाठ होता है। उनसे त्रिसुपर्ण ऋषि को उपदेश। गर्ग संहिता (६/१४/८) में अपान्तरतमा द्वारा गौतम-पुत्र मेधावी को पर्वत बनने का शाप , (७/४०/३५) में अपान्तरतमा ऋषि द्वारा हरिण उपद्वीप (मलगासी द्वीप, मृगव्याध या मृगतस्कर = मगाडास्कर) में तप, अपान्तरतमा आश्रम में गरुड के पक्ष का पतन, (७/४२/२३) में अपान्तरतमा शकुनि द्वारा शम्बर आदि दैत्यों को मोक्ष उपाय रूप में भक्ति के प्रकारों का कथन, ब्रह्मवैवर्त्त पुराण (१/८/२७) में अपान्तरतमा ऋषि का ब्रह्मा के गले से प्रादुर्भाव), (१/१२/४) में ब्रह्मा - पुत्र, (१/२२/१७) में अपान्तरतमा नाम की निरुक्ति, तैत्तिरीय आरण्यक (८/९) सायण भाष्य में अपान्तरतमा का जन्मान्तर में कृष्ण द्वैपायन व्यास बनना।)
(४) आदि कृत युग में (श्लोक ३४) कर्ण से ब्रह्मा की उत्पत्ति-आरण्यक, रहस्य. और संग्रह सहित वेद क्रम से स्वारोचिष मनु, शंखपद, दिक्पाल, सुवर्णाभ को उपदेश।
(५) आदि कृत युग में (श्लोक ४१) नासिका से ब्रह्मा की उत्पत्ति- क्रम से वीरण, रैभ्य मुनि, दिक्पाल कुक्षि को उपदेश।
(६) अण्डज ब्रह्मा (शान्ति पर्व ३४९/१७ में भी)-से बर्हिषद् मुनि, ज्येष्ठसामव्रती हरि, राजा अविकम्पन को उपदेश।
(७) पद्मनाभ ब्रह्मा से दक्ष, विवस्वान्, वैवस्वत मनु, इक्ष्वाकु को उपदेश। यह सम्भवतः मणिपुर के निकट हिमालय के पूर्व भाग में थे। उनके नाम पर त्रिविष्टप् का पूर्व भाग ब्रह्म विटप (ब्रह्मपुत्र नदी का स्रोत क्षेत्र), ब्रह्मपुत्र, ब्रह्म देश (बर्मा, अभी म्याम्मार = महा + अमर) हैं।
इनके अतिरिक्त २ अन्य ब्रह्मा थे। स्वायम्भुव मनु के बहुत बाद सभ्यता नष्ट हो गयी तो द्वितीय व्यास कश्यम ने उसका उद्धार किया। अतः उनको भी ब्रह्मा तथा प्रजापति कहा गया है। उनका समय १७,५०० ईपू. था जब अदिति के पुनर्वसु नक्षत्र से वर्ष का अन्त और आरम्भ होता था-अदितिर्जातम्, अदितिर्जनित्वम् (ऋक्, १/८९/१०, वाज. यजु, २५/२३)  
राजस्या ब्रह्मणोंऽशेन मारीचः कश्यपोऽभवत्॥ (ब्रह्माण्ड पुराण, २/३/३/१०५)
कश्यपो ब्रह्मणोंऽशश्च पृथिव्या अदितिस्तथा॥ (ब्रह्माण्ड पुराण, २/३/७१/२३८) 
द्वापरे प्रथमो व्यासो मनुः स्वायम्भुवो मतः॥१॥
द्वितीये द्वापरे चैव वेदव्यासः प्रजापतिः॥२॥ (कूर्म पुराण, पूर्व भाग, अध्याय ५२)
इनके कई स्थान अनुमानित हैं-कैस्पियन समुद्र (नाम समानता), कश्मीर या कश्यप-मीर (नीलमत पुराण), या थाइलैण्ड के बैंगकाक तथा चम्पक पर्वत वियतनाम की प्राचीन राजधानी चम्पा) के बीच मणिपर्वत पर। सम्भवतः यहां के मेरु को मणिपर्वत कहा है।
विकङ्कस्याचलेन्द्रस्य मणिशैलस्य चान्तरे। शतयोजन विस्तीर्णं द्वियोजन शतायतम्॥१६॥ 
विपुलं चम्पकवनं सिद्ध चारण सेवितम्॥१७॥ तत्राश्रमं भगवतः कश्यपस्य प्रजापतेः।
सिद्ध साध्य गणाकीर्णं नानाश्रुति विभूषितम्॥२२॥ (वायु पुराण, ३७/१६-२२)
पुष्कर कई थे अतः वहां क ब्रह्मा भी भिन्न होंगे।
(२) त्रिपुष्कर-पुराण में ३ पुष्करों का उल्लेख है (पद्म पुराण, १/१५/१५१, १/१९-२०, अग्नि पुराण, २११/८, स्कन्द पुराण, ६/४५, १७९)-उज्जैन से १२ अंश पश्चिम का पुष्कर (विष्णु पुराण, २/८/२८), इन्द्रप्रस्थ पुष्कर (अजमेर, आबू पर्वत, पद्म पुराण, १/२० आदि)-
पृथूदके गयाशीर्षे नैमिषे पुष्करत्रये॥ (स्कन्द पुराण, ६/४/३७)
स्कन्द पुराण, अध्याय (६/१७९/५४) के अनुसार ३ पुष्कर हैं-
ज्येष्ठ-पुष्कर द्वीप में न्यग्रोध नामक स्थान के निकट।
मध्य-उज्जैन के १२ अंश पश्चिम उजबेकिस्तान का बुखारा।
कनीयक-अजयमेरु (अजमेर) का पुष्कर जहां सरस्वती धारा बहती थी।
तीन पुष्कर स्थानों की तरह त्रिपुष्कर योग भी होता है- 
त्रिपादेषु च ऋक्षेषु यदा भद्रा तिथिर्भवेत्॥५७॥ 
भौमादित्यशनैश्चारी विज्ञेयं तत् त्रिपुष्करम्॥५८॥(अग्नि पुराण, १२१/५७-५८)
(३) पुष्कर द्वीप के ब्रह्मा-इनका स्थान पुष्कर द्वीप या दक्षिण अमेरिका कहा है (मत्स्य पुराण, १२३/३९, विष्णु पुराण, २/८/८/५, ऋक्, ६/१६/१३) । इनके स्थान से ४ दिशाओं में ४ राजपथ जाते थे। यह पेरु का कुजको या उसके निकट का स्थान हो सकता है। यह इंका (इनः = सूर्य) साम्राज्य की राजधानी थी और यहां से पूरे अमेरिका में ४ दिशाओं में मार्ग थे।
त्वामग्ने पुष्करादध्यथर्वा निरमन्थत। मूर्ध्नो विश्वस्य वाधतः॥१३॥
तमुत्वा दध्यङ्गृषिः पुत्र ईधे अथर्वणः। वृत्रहणं पुरन्दरम्॥१४॥ (ऋक्, ६/१६)
न्यग्रोधः पुष्करद्वीपे ब्रह्मणः स्थानमुत्तमम्। तस्मिन्निवसति ब्रह्मा पूज्यमानः सुरासुरैः॥
(विष्णु पुराण, २/२/८५, ब्रह्माण्ड पुराण, ८/८/७)
न्यग्रोधः पुष्करद्वीपे पद्मवत् तेन स स्मृतः (मत्स्य पुराण, १२३/३९)
यहां भी मेरु था, जिसका नाम अमेरु (अपर मेरु = पश्चिमी मेरु) है, जिससे द्वीप का नाम अमेरिका हुआ। यहां हिमालय के शिव-पार्वती जैसे मेरु-मू देव हैं। हायु मरका पर्वत पर अमारु मेरु की ७ मीटर ऊंची विशाल मूर्ति तथा प्राचीन विशाल भवन हैं। इसका स्थान १६अंश १२’५१.६२" दक्षिण तथा ६९अंश ३०’२१.२८" पश्चिम है। इसके निकट कैलास के मानसरोवर जैसा टीटीकाका झील है।इस परम्परा को नष्ट करने के लिए एक काल्पनिक स्पेनी लुटेरे अमेरिगो वेस्पुसी की कहानी गढ़ी गयी है, जिसे अमेरिका नाम का स्रोत कहा जा सके। मूल अमेरिकी सभ्यता तथा इतिहास नष्ट करने का अभियान अभी तक चल रहा है।
(४) द्वितीय पुष्कर-यह उज्जैन से १ मुहूर्त अर्थात् १२ अंश पश्चिम था। इस स्थान पर आज बुखारा है (प्राचीन ईरान राज्य, वर्तमान उजबेकिस्तान) जो पुष्कर का अपभ्रंश है। 
एवं पुष्करमध्येन यदा याति दिवाकरः। 
त्रिंशद् भागन्तु मेदिन्यास्तदा मौहूर्त्तिकी गतिः॥ (विष्णु पुराण, २/८/२६)
इस स्थान पर अधिकतम दिन मान १६ गण्टा है जो वेदाङ्ग ज्योतिष में माना गया है (ऋक् ज्योतिष, ७)।
यहां प्राङ्-मेरु (पूर्वी मेरु) है जिसका अपभ्रंश पामीर है। यहां से ४ दिशाओं में पर्वत हैं।
(५) इन्द्रप्रस्थ पुष्कर-इसकी ४ दिशाओं में ४ नदियां हैं।
श्रूयते पुष्करंनाम तीर्थं त्रैलोक्यविश्रुतम्। ब्रह्मणा निर्मितं तत्र यच्च योजनमात्रकम्॥४॥ 
उत्तरे चन्द्रभागाया नद्या यावत्सरस्वती। दक्षिणे करतोयायाः सीमेयं पुष्करत्रये॥५॥ 
(स्कन्द पुराण, नागरखण्ड, १७९/४-५) 
यहां सरस्वती नदी की पूर्ववाहिनी धारा भी आरम्भ होती है, जिसका प्रयाग में गङ्गा-यमुना के साथ त्रिवेणी-सङ्गम होता था।
एवमेषा सरिच्छ्रेष्ठा पुष्करेषु सरस्वती।॥१२६॥ पुण्यस्य पुण्यताकारि पञ्चस्रोता सरस्वती॥१२८॥
पुष्करे तु विशेषेण पूतात् पूततमा हि सा। नदी सरस्वती पुण्या सुलभा जगति स्थिता॥२३३॥
दुर्लभा सा कुरुक्षेत्रे प्रभासे पुष्करे तथा॥२३४॥ प्राची सरस्वतीं प्राप्य योयोऽन्यं तीर्थं हि मार्ग ते॥२३५॥
पुष्करारण्यमासाद्य पुनस्तस्मात् सरस्वती॥२४७॥
अन्तर्धानं गता गन्तुं प्रवृत्ता पश्चिमा मुखी। नाति दूरे ततस्तस्य पुष्करस्य सुशोभना॥२४८॥
(पद्म पुराण, सृष्टि खण्ड, १/१८/१२६-२४८)
इस पुष्कर में ब्रह्मा के भवन का नाम वैराज था। उनकी सभा कान्तिमती थी इसके मेरु का नाम श्रीनिधान (अज) था, जिसे अजमेर कहते हैं। 
श्रीनिधानंपुरं मेरोः शिखरे रत्न-चित्रितम्॥३॥ वैराजं नाम भवनं ब्रह्मणः परमेष्ठिनः॥९॥
सभा कान्तिमती नाम देवानां शर्मदायिका। ऋषि संघ समायुक्ता मुनिवृन्द निषेविता॥१३॥
अहं यत्र समुत्पन्नः पद्मं तद् विष्णु-नाभिजम्। पुष्करं प्रोच्यते तीर्थं ऋषिभिर्वेदपाठकैः॥२०॥
(पद्म पुराण, सृष्टि खण्ड, १/१५/९-२०)
यहां अर्बुद (आबू) पर्वत ही अर्णव से उत्पन्न कमल है-
इन्द्रो मह्ना महतो अर्णवस्य वि मूर्धानं अर्बुदस्य। (अथर्व सं, २०/९१/१२, ऋक्, १०/६७/१२)
वाक् को भी अर्बुद कहा है-वाग्वा अर्बुदम् (तैत्तिरीय ब्राह्मण, ३/८/१६/३)
विद्या रूपी सरस्वती ब्रह्मा की पत्नी हैं।
४. आध्यात्मिक पुष्कर-
शरीर के सभी चक्रों को कमल कहा है, जिसके दलों की संख्या ४, ६, १०, १२, १६, २ हैं। उसके ऊपर सहस्रार में १,००० दल हैं। मूलाधार से मतिष्क केन्द्र आज्ञा चक्र तक को संवित् कमल कहा गया है। मस्तिष्क के वाम-दक्षिण भाग २ पक्षी हैं, इनका सूक्ष्म रूप जीव-आत्मा है। वेद में इनको २ सुपर्ण कहा है।
द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया, समानं वृक्षं परिषस्वजाते। 
तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्ति, अनश्नन्नन्यो अभिचाकषीति॥
(मुण्डक उप. ३/१/१, श्वेताश्वतर उप. ४/६, ऋक् १/१६४/२०, अथर्व ९/९/२०)
सुषुम्ना चेतना या ज्ञान का वृक्ष है। उसके मध्य (आज्ञा चक्र) में २ सुपर्ण (हंस, पक्षी) रहते हैं (परिषस्वजाते-पड़ोस में)। उनमें अन्य (एक) पिप्पल (पिब् + फल = जिस फल में आसक्ति हो) को स्वाद सहित खाता है। अन्य (दूसरा) बिना खाये (बिना आसक्ति = अनश्नन्) केवल देखभाल करता है। आकाश में भी सृष्टि निर्माण का क्रम (स्वयम्भू से पृथ्वी तक) स्कम्भ या वृक्ष है। इसके हर स्तर पर ब्रह्म के २ रूप हैं, निर्विशेष निर्लिप्त रहता है, विशिष्ट रूप विविध या विशिष्ट सृष्टि करता है। निर्विशेष में भेद नहीं होने के कारण उसका वर्णन नहीं होता, उपवर्णन हो सकता है। 
मनुष्य शरीर में इन हंसों को जीव और आत्मा कहते हैं। आत्मा निर्लिप्त है, जीव कर्म में लगा है। जीव और आत्मा को ही बाइबिल में ईव और आदम कहा गया है। 
समुन्मीलत् संवित्-कमल मकरन्दैक रसिकं, भजे हंस-द्वन्द्वं किमपि महतां मानसचरम्।
यदालापादष्टादश गुणित विद्या परिणतिः, तदादत्ते दोषाद् गुणमखिल-मद्भ्यः पय इव॥ (शंकराचार्य, सौन्दर्य लहरी, ३८)
संवित्-कमल को बाइबिल में ज्ञान का वृक्ष कहा है। मस्तिष्क में जो सूचनाओं का संग्रह है, वह अप् = जल है। उसके भीतर से क्रमबद्ध ज्ञान (जो वाक्य में लिखा जा सके) दूध जैसा उपयोगी है। यही मन के हंस द्वारा जल से दूध निकालना है। भौतिक रूप में मान सरोवर का हंस जल में दूध के मिश्रण से दूध नहीं निकाल सकता।

Friday, 16 October 2026

विजयदशमीनिर्णयः


1. प्रथम पृष्ठ (विजयदशमीनिर्णयः)

संस्कृत: आश्विनशुक्लदशमी विजयदशमीति प्रसिद्ध।
हिंदी: आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि 'विजयदशमी' नाम से प्रसिद्ध है।
संस्कृत: शरत्काले महापूजा क्रियते या च वार्षिकी।
हिंदी: शरद ऋतु में जो वार्षिक महापूजा की जाती है।
संस्कृत: आरभ्य तस्यां दशमीं तु यावत् प्रपूजयेत् पर्वतराजपुत्रीम्।
हिंदी: प्रतिपदा से आरंभ करके उस दशमी तिथि तक पर्वतराजपुत्री (माता दुर्गा) की भली-भांति पूजा करनी चाहिए।
संस्कृत: मूलेनावाहयेद् देवीं श्रवणेन विसर्जयेत्।
हिंदी: मूल नक्षत्र में देवी का आवाहन करना चाहिए और श्रवण नक्षत्र में विसर्जन करना चाहिए।
संस्कृत: शरत्काले महापूजा क्रियते या च वार्षिकी। सा कार्योदयगामिन्यां न तत्र तिथियुग्मता॥
हिंदी: शरद ऋतु में जो वार्षिक महापूजा की जाती है, वह सूर्योदयव्यापिनी तिथि में ही करनी चाहिए, वहाँ तिथियों के जोड़े (युग्म) का विचार नहीं होता।
संस्कृत: प्रातरावाहयेद्देवीं प्रातरेव प्रवेशयेत्। प्रातः प्रातश्च सम्पूज्य प्रातरेव विसर्जयेत्॥
हिंदी: प्रातःकाल ही देवी का आवाहन करें और प्रातः ही प्रवेश कराएं। प्रतिदिन प्रातःकाल भली-भांति पूजन करके प्रातःकाल ही विसर्जन करें।
संस्कृत: प्रातःकालो मुहूर्त्तांस्त्रीन् सङ्गवस्तावदेव हि। मध्याह्नस्त्रिमुहूर्त्तः स्यादपराह्नस्ततः परम्। सायाह्नस्त्रिमुहूर्त्तः स्यात् तत्र श्राद्धं न कारयेत्॥
हिंदी: सूर्योदय से तीन मुहूर्त तक का समय प्रातःकाल होता है और उतना ही समय सङ्गव काल होता है। उसके बाद के तीन मुहूर्त मध्याह्न काल होते हैं और उसके बाद अपराह्न काल होता है। इसके बाद तीन मुहूर्त का सायाह्न काल होता है, जिसमें श्राद्ध कर्म नहीं कराना चाहिए।
संस्कृत: ह्रासवृद्धौ च सततं दिवसानां यथाक्रमम्। सन्ध्यामुहूर्त्तमात्रन्तु ह्रासे वृद्धौ समा स्मृता॥
हिंदी: दिनों के घटने और बढ़ने के क्रम में भी, संध्या का समय हमेशा एक मुहूर्त मात्र का ही माना गया है, चाहे दिन छोटा हो या बड़ा।

2. द्वितीय पृष्ठ

संस्कृत: पद्म पद्म उषःकालः समपद्मारुणोदयः। अष्ट पद्म भवेत् प्रातः शेषः सूर्योदयः स्मृतः॥
हिंदी: उषःकाल और अरुणोदय का समय सूर्योदय से पूर्व का बोध कराता है, तथा उसके बाद का आठ पदों का समय प्रातःकाल का शेष भाग और सूर्योदय कहा गया है।
संस्कृत: व्रतोपवासनियमे घटिकैका यदा भवेत्। सा तिथिः सकला ज्ञेया पित्र्ये चापराह्निकी॥
हिंदी: व्रत और उपवास के नियम में यदि (सूर्योदय के समय) एक घटी भी तिथि विद्यमान हो, तो वह तिथि पूर्ण मानी जानी चाहिए, और पितृ कार्यों के लिए अपराह्न व्यापिनी तिथि ली जाती है।

3. तृतीय पृष्ठ

संस्कृत: भगवत्याः प्रवेशादिविसर्गान्ताश्च याः क्रियाः। तिथौ उदयगामिन्यां सर्वास्ताः कारयेद् बुधः॥
हिंदी: भगवती दुर्गा के प्रवेश (आवाहन) से लेकर विसर्जन तक की जो भी क्रियाएँ हैं, बुद्धिमान मनुष्य को वे सभी सूर्योदयव्यापिनी तिथि में ही करनी चाहिए।
संस्कृत: आश्विने शुक्लपक्षे तु दशम्यां पूजयेत्ततः। एकादश्यां न कुर्वीत पूजनं चापराजितम्॥
हिंदी: आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को अपराजिता देवी का पूजन करना चाहिए। एकादशी तिथि में अपराजिता का पूजन कभी नहीं करना चाहिए।

4. चतुर्थ पृष्ठ

संस्कृत: आश्विने शुक्लपक्षस्य दशम्यां पूजयेत्ततः। एकादश्यां न कुर्वीत पूजनं चापराजितम्॥
हिंदी: आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को अपराजिता देवी का पूजन करना चाहिए। एकादशी तिथि में अपराजिता का पूजन कभी नहीं करना चाहिए।
संस्कृत: उदये दशमी किञ्चित् सम्पूर्णैकादशी यदा। श्रवणर्क्षं यदा काले सा तिथिर्विजयाभिधा॥
हिंदी: जब सूर्योदय के समय थोड़ी सी दशमी हो और बाद में पूरी एकादशी हो, तथा उस समय श्रवण नक्षत्र का योग हो, तो वह तिथि 'विजया' नाम वाली होती है।
संस्कृत: श्रवणर्क्षं तु पूर्णायां काकुत्स्थः प्रस्थितो यतः। उल्लङ्घयेयुः सीमानं तद्दिनर्क्षे ततो नराः॥
हिंदी: चूंकि श्री रामचंद्र जी ने श्रवण नक्षत्र से युक्त पूर्ण तिथि में प्रस्थान किया था, इसीलिए मनुष्यों को उसी दिन नक्षत्र योग में अपनी सीमा का उल्लंघन करना चाहिए।

5. पंचम पृष्ठ

संस्कृत: ईषत्सन्ध्यामतिक्रान्तः किञ्चिदुद्दिन्नतारकः। विजयो नामकालोऽयं सर्वकार्यार्थसिद्धिदः॥
हिंदी: संध्या का समय थोड़ा सा बीत जाने पर, जब आकाश में तारे कुछ-कुछ दिखाई देने लगें, उस समय को 'विजय' नाम का काल कहा जाता है, जो सभी कार्यों में सिद्धि देने वाला है।
संस्कृत: इषस्य दशमीं शुक्लां पूर्वविद्धां न कारयेत्। श्रवणेनापि संयुक्तां युक्तां पट्टाभिषेचने॥
हिंदी: आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की दशमी यदि पूर्वविद्धा (नवमी से युक्त) हो, तो उसमें कार्य नहीं करना चाहिए, चाहे वह श्रवण नक्षत्र से युक्त ही क्यों न हो; वह केवल पट्टाभिषेक के लिए ही उपयुक्त होती है।
संस्कृत: सूर्योदये यदा राजन् ! दृश्यते नवमी तिथिः। आश्विने मासि शुक्ले तु विजयां तां विदुर्बुधाः॥
हिंदी: हे राजन! जब आश्विन मास के शुक्ल पक्ष में सूर्योदय के समय नवमी तिथि दिखाई दे, तो विद्वान लोग उसे ही विजया दशमी जानते हैं।
संस्कृत: उदये दशमी किञ्चित् सम्पूर्णैकादशी यदा। श्रवणर्क्षं यदा काले सा तिथिर्विजयाभिधा॥
हिंदी: जब सूर्योदय के समय थोड़ी सी दशमी हो और बाद में पूरी एकादशी हो, तथा उस समय श्रवण नक्षत्र का योग हो, तो वह तिथि 'विजया' नाम वाली होती है।

6. षष्ठ पृष्ठ

संस्कृत: यस्मिन् देशे य आचारः इत्यादि वचनात् 'धर्मस्य निर्णयो ज्ञेयो मिथिलाव्यवहारतः' इति विष्णुपुराणवचनञ्च।
हिंदी: 'जिस देश में जो आचार या परंपरा हो' इस वचन के अनुसार तथा विष्णुपुराण के वचन के अनुसार—धर्म का निर्णय वहाँ के स्थानीय व्यवहार और परंपरा के अनुसार ही जाना जाना चाहिए।
संस्कृत: व्यवहारस्याप्यनेकविधत्वे या निबन्धकृतां व्यवस्था स्वकुलव्यवहारानुरूपा सैव ग्राह्या।
हिंदी: यदि लोक व्यवहार में भी अनेक प्रकार के मतभेद या भिन्नताएँ हों, तो ग्रंथों के रचनाकारों द्वारा बताई गई वही व्यवस्था स्वीकार करनी चाहिए जो अपने कुल की परंपरा और व्यवहार के अनुकूल हो।
यदि आप इन श्लोकों के अंतर्गत आए मुहूर्त के समय की गणना (जैसे त्रिमुहूर्त या घटी) के बारे में विस्तार से समझना चाहते हैं, तो कृपया मुझे उस विषय के बारे में बताएं।

देवमन्दिर गमन-विज्ञान


देवमन्दिरगमन-विज्ञान
हम पूर्व कह चुके हैं कि–देवमूर्तिपूजा भी एक यज्ञ है; यज्ञवाले लाभ देवमूर्तिपूजामें भी प्रायः होते हैं; क्योंकि–यह भी देव-पूजा है। देवपूजा दो प्रकारकी होती है, एक हवन, दूसरी मूर्ति-पूजा। संस्कृत-अग्निमूर्तिद्वारा 'इन्द्राय स्वाहा, वरुणाय स्वाहा' इत्यादि रूपसे उस-उस देवताको हवि देना—यह हवन-द्वारा देव-पूजा होती है, प्रस्तर-आदिकी संस्कृत-मूर्तिद्वारा उस-उस देवताको बलि देना मूर्तिद्वारा देवपूजा होती है। हवन तथा मूर्तिपूजा दोनों ही 'यज्ञ' कहे जाते हैं; क्योंकि–देवपूजार्थक यजधातुका अर्थ दोनों स्थानोंमें देखा गया है। 'शाङ्खायनब्राह्मण'में कहा है— 'स एवास्मै यज्ञं ददाति तद् यद् एता देवता यजति' (४।२) अर्थात् देवताओंका पूजन ही यज्ञ होता है। यही बात श्रीमद्भागवत-पुराणमें भी सूचित की गई है। वहां (११।२७।१५-१६ में) मूर्तिपूजा तथा अग्निहोत्र दोनोंको ही 'याग' कहा गया है।
जिस प्रकार लोकमें पत्थरकी मूर्ति जड़ मानी जाती है, वैसे ही अग्नि भी। परन्तु 'अभिमानिव्यपदेशः' (वेदान्त० २।१।५) 'सर्वस्य वा चेतनावत्त्वात्' (महाभाष्य-वार्त्तिक ३।१।७) इस शास्त्रीय कथनसे दोनों ही मूर्तियां चैतन्य धारण करती हैं। मन्त्र-संस्कृत अग्नि उस हविके स्थूलभागको भस्म करके उसका सूक्ष्म भाग देवताओंको देती है, और मन्त्रसंस्कृत-मूर्ति मधुमक्षिकासे पिये हुए पुष्पकी भांति उसका सूक्ष्म अंश देवताओंको समर्पित करती है। उस मन्त्रसंस्कृत-मूर्तिको देवमन्दिरमें प्रतिष्ठापित किया जाता है। तब देवमूर्तिकी नमस्कार आदि पूजाकेलिए देवमन्दिरमें जाना भी बहुत विज्ञान-पूर्ण तथा लाभ-प्रद है।
देवमन्दिर धार्मिक-जनताके प्राण हैं, भारतीय सभ्यता एवं संस्कृतिके केन्द्र हैं, मनकी एकाग्रता तथा शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्यलाभके प्रबल साधन हैं। देवप्रतिमा-केन्द्रके द्वारा भगवान्की समग्रशक्तिको भक्तोंकी विश्वासरूपिणी विषमशक्ति खींच लेती है। सम-विषम शक्तिका इस प्रकारका आकर्षण विज्ञान-सिद्ध है। वही प्रतिमा प्रभुशक्तिको इस प्रकार खींचती और प्रकट करती है; जैसे सूर्यकान्तमणि सूर्यकी शक्तिको। इसमें वेदमन्त्रोंकी शक्ति उसमें सहायक हो जाती है।
मूर्तियोंमें दिव्य-ज्योति एवं सूक्ष्मशक्ति जिस प्रकार ठीक रह जाए; उसी प्रकारसे देवमन्दिर (गर्भगृह) बनाये जाते हैं। धूप, दीप आदिके रखनेसे मन्दिरमें दिव्यशक्तिका संचार रहता है। सुगन्धित द्रव्योंके प्रयोगसे भूतबाधाकी निवृत्ति वैज्ञानिक भी मानते हैं, कीटाणुनाशिनी शक्ति भी उनमें हुआ करती है।
प्रत्येक पुरुषमें पञ्चभूतात्मकतावश पृथिवी, जल, तेज, वायु और आकाश इन तत्त्वोंमें एक प्रबल होता ही है। गन्ध, रस, रूप, स्पर्श तथा शब्दका प्रभाव एकतत्त्व-प्रधान शरीरमें रहता है। जिस पुरुषमें अग्नितत्त्वकी प्रधानता हो; उसमें रूपका अधिक प्रभाव होता है। इस प्रकार पृथिवी-तत्त्वकी प्रधानतामें गन्धका, जलकी प्रधानतामें रसका, वायुतत्त्वकी प्रधानतामें स्पर्शका, आकाशकी प्रधानतामें शब्दका अधिक प्रभाव पड़ता है। देवमन्दिरमें सब प्रकारके पुरुष जाते हैं; इसलिए उसमें सब प्रकारके द्रव्योंका समुच्चय रहता है। विविध रत्नोंसे जड़ी हुई प्रतिमाएँ; विविध-वर्णसुसज्जित स्थान, विविध ग्रन्थद्रव्योंका सुगन्ध, शंख, घण्टा आदिका शब्द, विविध-प्रकारका भगवान्का भोग (प्रसार) आदि रहा करता है। यह स्थूलरूपसे जानना चाहिये।
सूक्ष्मरूपसे तो विभिन्न-तत्त्वोंकी प्रधानताके अनुरूप भिन्न-भिन्न प्राणियोंकेलिए भिन्न-भिन्न देवोंकी उपासना बताई गई है। मनुष्यका शरीर पाँच तत्त्वोंसे बना हुआ है। इसलिए शास्त्रने भी सगुण-ब्रह्मकी पञ्चदेवोंके रूपमें उपासना बताई है। विष्णु, शिव, शक्ति, सूर्य, गणपति—यह ईश्वरकी पाँच प्रमुख मूर्तियाँ हैं।
आकाशतत्त्वके साथ विष्णुका, पृथिवीतत्त्वसे शिवका, अग्नितत्त्वके साथ शक्तिका, वायुतत्त्वके साथ सूर्यका, जलतत्त्वके साथ गणपति (गणेश) का सम्बन्ध है। जिस प्राणीमें जिस तत्त्वकी प्रधानता होती है; उसकी स्वाभाविक रुचि उस देवकी उपासनामें होती है। सब प्राणियोंमें समान-तत्त्वकी प्रधानता नहीं होती; अतः सबका हृदय एक देवमें निश्चल-रूपसे नहीं रहता। इसलिए मुनियोंने भिन्न-भिन्न पुरुषोंकेलिए भिन्न-भिन्न देवोंकी उपासना बताई है।
पर इसका यह तात्पर्य नहीं कि पुरुष एक ही देवकी पूजा करेगा, और दूसरोंसे घृणा करेगा। नहीं; मनुष्यमें न्यूनाधिकतासे पाँचों तत्त्व रहते हैं। तब प्रधानतासे उसकी रुचि एक देवमें होती है; किन्तु अन्य तत्त्वोंके भी शरीरमें गौणरूपसे होनेसे अन्य देवोंसे उसकी अरुचि नहीं होती। इस प्रकार रत्न, रंग, गन्ध, शब्द आदिका भी प्रभाव प्रत्येक पुरुषपर पड़ता है। शब्दको ही ले लीजिये। शब्द अपनी प्रकृतिवाले पुरुषको जहाँ लाभ पहुँचाता है; वहाँ सर्व-साधारणको भी कुछ लाभ पहुँचावेगा ही। देवालयोंमें शंख और घड़ियालकी ध्वनि होती है। इसकी ध्वनिका स्थूल एवं सूक्ष्म दोनों ही प्रकारका प्रभाव हमपर पड़ता है। श्रीजगदीशचन्द्र-वसु नामक भारतीय-वैज्ञानिकने शंखके शब्दके विषयमें अनेक रोगाणुओंका नाश एवं वायुका शुद्ध होजाना प्रमाणित कर दिया है; जिसे हम पहले 'शंखध्वनिविज्ञान'में लिख चुके हैं। घड़ियालमें काँसेका प्रयोग होता है। काँसा ताँबे और राँगेसे बनता है। ताँबा विद्युत्का परिचालक होता है, और राँगा होता है संग्रहकोष।
घड़ियालपर चोट पड़नेसे उसमें विद्युत्-शक्तिका संग्रह होता है। तभी घड़ियालका जल पिलानेपर प्रसव-कष्टमें स्त्रीका शीघ्र-प्रसव होता है। तब घण्टा-शब्दसे उत्पन्न हुई विद्युत् हमारे शरीरमें प्रविष्ट होती है। और फिर हमारे मन्दिरोंमें खड़ाऊँ पहनकर जानेका नियम है; जिससे वह बिजली हमारे पाँवके नीचेसे निकलकर पृथिवीमें न चली जावे, और हमारे शरीरमें व्याप्त होकर उसे शक्तिशाली बनावे।
इस प्रकार देवमन्दिरमें स्थित पीपलका वृक्ष, तुलसी, मृगचर्म, व्याघ्रचर्म, पञ्चगव्य, चन्दन, केसर आदि भी लाभदायक सिद्ध होते हैं। इसमें पीपल वन्ध्यात्वको दूर करनेवाला सिद्ध हो चुका है, उसके मूलमें जल डालनेसे ज्वर नहीं होता। इसके विशेष गुण हम आगे बतावेंगे। तुलसी-दलमें भी घातक-कीटाणुओंको दूर करनेकी अद्भुत क्षमता है। विज्ञानाचार्य सर जगदीशचन्द्र वसुने लिखा है कि-तुलसी-सुवासित वायु, घातक-कीटाणुओंको दूर करती है। तुलसीका पौधा धनीसे लेकर निर्धन तक समान रूपसे आरोग्य देनेवाला ईश्वरीय औषधालय है—इसके गुण हम आगे लिखेंगे। यदि तुलसीदलको दाँतोंसे चवाया जाय; तो दांत निर्बल हो जाते हैं। इस कारण हमारे मुनियोंने तुलसीदलको भगवान्के चरणामृतमें स्थान दिया है कि बिना ही दाँतोंके चवाये वह पेटमें पहुँच जाय।
इस प्रकार देवमन्दिरमें रखे हुए मृगचर्म और व्याघ्रचर्मको भी देखिये। लोग प्रायः उसपर बैठकर भगवान्का भजन करते हैं। मृगचर्मपर बैठनेसे भगन्दर आदि रोग नहीं होते; जो प्रायः बैठने वालों एवं कामियोंको हो जाते हैं। अथवा यदि होते हैं; तो उसपर बैठनेसे शान्त हो जाते हैं। इसके विशेष गुण 'मृगचर्मका वैज्ञानिक-रहस्य'में हम लिख चुके हैं। व्याघ्रचर्म आदिके गुण भी हम पूर्व लिख चुके हैं। उसपर साँप-बिच्छू आदि चढ़नेका भय भी नहीं रहता। उसपर बैठ कर उपासक निर्विघ्न, निर्भय एवं एकाग्रचित्तसे भगवान्की उपासना करता है।
इस प्रकार पञ्चगव्य तथा चरणामृत एवं चन्दनादिके विषयमें भी ज्ञान लेना चाहिये, जिनमें चन्दन-केसरादिके गुण पूर्व बता चुके हैं; शेषके आगे बताने वाले हैं। इनसे जहाँ सूक्ष्म दैवी-शक्ति प्राप्त होती है; वहाँ स्थूल लौकिक-शक्ति भी। इनके कारण स्वास्थ्य अच्छा होता है। अकालमृत्यु दूर होती है।
देवालयमें जानेसे जहाँ देवपूजा होती है; वहाँ शारीरिक एवं मानसिक लाभ भी होते हैं। देवालयमें जानेकेलिए सूर्योदयसे पहले उठते हैं; और सूर्योदयसे पूर्व ही स्नान करते हैं; क्योंकि स्नान करते ही देवालयमें जाना पड़ता है। इससे रूप, तेज, आरोग्य, बल, आयु, दुःस्वप्न-नाश और मेधा प्राप्त होती है। देवमन्दिर प्रायः नगरसे बाहर होते हैं, उनमें कोई बगीचा भी होता है। देवपूजाकेलिए बगीचेसे हम फूल चुनते हैं, जिससे हमें शुद्ध-वायु भी मिलती है, नगरके बाहरकी शुद्ध-वायुमें भ्रमण भी हो जाता है। प्रातः-भ्रमणके लाभ जगत्प्रसिद्ध ही हैं। इससे हमें शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य तथा शक्तिका लाभ होता है। शुद्ध होता है। वायुमण्डलके कारण हमारे भीतर कुविचार नहीं रह पाते। चन्दन मस्तिष्कपर लगानेसे मस्तिष्क-शक्तिमें और दृष्टिमें वृद्धि हुआ करती है।
मन्दिरमें शंखनादसे फेफड़ोंकी शुद्धि तथा कीटाणुओंका दूरीभाव होता है; यह हम पहले लिख ही चुके हैं। तब भगवान्की उपासनासे हमारा भगवान्से ऐक्य हो जाता है। धूप, घीका चौमुखा-दीया, और उसका प्रकाश यह सब भी अकाल-मृत्युको रोकते हैं। इस समयकी निष्काम-भक्तिसे मुक्ति मिलनेसे हमें पुनर्जन्म नहीं लेना पड़ता।
इस प्रकारके सूक्ष्म-स्थूल लाभोंके कारण देवस्थानों तथा उनकी वेदमन्त्र-संस्कृत मूर्तियोंमें दिव्यशक्तिके प्रभावसे अनेक रोगोंको दूर करनेकी शक्ति है—यह सिद्ध होगया। हमारी भारतीय-संस्कृति भी इन्हींके कारण हमारे अन्दर रहती है। यदि देवमन्दिरोंमें हमारी हिन्दू-संस्कृतिका हिताधायक कुछ भी न होता; तो मुसलमानी सम्राट् औरङ्गजेब हिन्दू-संस्कृतिके विनाशकेलिए देवमन्दिरोंको न तुड़वाता। तब देवमन्दिरमें जाना और उसमें देवपूजन करना यज्ञकी भांति ही ऐहिक और आमुष्मिक दोनों ही लाभ देनेवाला सिद्ध हुआ।


Monday, 12 October 2026

सवर्ण ब्राह्मण

अभी मेरे पास कंफर्म स्रौत नही है मगर सुनने में आ रहा है कि बम्बई में देवेन्द्र फडणवीस सरकार मराठों को आरक्षण देने जा रही हैं। यदी ये सही है तो बम्बई में भी 73 फीसदी ओबीसी आरक्षण विस्तार के बाद आरक्षण हो जाएगा।

मध्य प्रदेश में 100 करोड़ भारतीय रूपये केवल 73 प्रतिशत आरक्षण को माननीय उच्च न्यायालय में डिफेंड करने के लिए बहा दिया गया है। ये पैसा मोहन यादव या गरीब माँ के बेटे नरेद्र मोदी अपने घर से लाये थे ?

पटना में आरक्षण 65 प्रतिशत करने के कारण कोर्ट में लताड़े गये थे। अभी मध्य प्रदेश में 73 प्रतिशत आरक्षण देने के कारण कोर्ट में लताड़े गये हैं। अब बम्बई में भी लताड़े ही जायेंगे।

मित्रो पहला ऐतिहासिक दृष्टि से पक्ष ये है कि बम्बई में 13 में से 10 मुख्यमंत्री इधर मराठे ही हुए हैं। मनोहर जोशी , देवेन्द्र फडणवीस ब्राह्मण हैं और उद्धव ठाकरे कायस्थ थे। आईएएस में ब्राह्मणो और कायस्थों के बाद तीसरी सबसे अधिक प्रतिनिधित्व मराठो का ही है । 

दूसरा ऐतिहासिक पक्ष बहुत मजबूर और बेबस होकर बता रहा हूँ क्युकी भाजपा और कांग्रेस दोनो (आगे आप समझ गई होंगे ) हैं।
भारत मे पहली यूनिवर्सिटी कलकत्ता में 1910 में बनी थी। पहली महिला डॉक्टर कोई शायद तिवारी थी। इंजीनियर भी पहला ब्राह्मण था। हाँ मगर पूरी जिम्मेदारी से बता रहा हूँ कि केवळ डॉक्टर इंजीनियर ही नही यूनिवर्सिटी से नही निकले थे, आगे नेता, पत्रकार और क्रांतिकारी भी निकले थे इसलिए भद्रलोक बोला जाता है।

यही कारण है कि गरम दल के फेश पंडित बाल गंगाधर तिलक, नरम दल के गोपाल कृष्ण गोखले, संघ के संथापक डॉ हेडगेवार या जनसंघ/बीजेपी के फाउंडर डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी या 24 कैरट सुद्ध दक्षिणपंथी हिन्दू महासभा के वीर सावरकर आदी सभी ब्राह्मण थे। एक भी आपको गैर ब्राह्मण नही मिलेगा। इवन समाजवाद और साम्यवाद में भी यही हाल था। 

सही बात है कि पंडित नेहरू ही केवल भारत नही है मगर 14 साल से 16 साल के जो अमर शहीद क्रांतिकारी फाँसी पर चढ़े थे चाहे घोष हो या कोई और, ब्राह्मण और कायस्थ छोड़के तीसरी जाति के लिए आपको चैट GPT और गूगल जैमिनी का सहारा जरूर लेना पड़ेगा। 

भारत के पहले अमर शहीद क्रांतिकारी चाफेकर बंधु हैं या मंगल पांडेय हैं, इसमें इतिहासकारो में मतभेद हैं मगर मेरी बात इरफान हबीब और रोमिला थापर जैसे वामपंथी इतिहासकार भी नही काट पाएंगे कि वो ब्राह्मण ही थे। 

शायद इसी बात के लिये हमें सरकार दंड दे रही है क्युकी जब बाकी बिलों में छुपे हुए थे तो यहाँ युवा फाँसी पर चढ़कर देश को जगाने का कार्य कर रहे थे।

अब एकदम खुल्लम खुल्ला हो रहा है। कोई शोषित वंचित का एंगल भी नही दिया जा सकता है। अब सँख्याबल की ब्लैकमेलिंग शुरू हो चुका है और ये बस यही तक नही रुकेगा। 

हम तुर्को से भी लड़े थे, अंग्रेजो से भी लड़े थे और अब इन काले अंग्रेजो से भी लड़कर जीतेंगे। इलेक्ट्रॉनिक और प्रिंट दोनो मीडिया पूरी तरीके से मैनेज हैं। जैसे ही कंफर्म होगा मैं अपडेट करूँगा, जैसे UGC और मध्य प्रदेश पर किया था। ये भी कयास है मगर जहाँ चिंगारी होती हैं, वही आग भी लगता है, एक कहावत तो आपने सुनी भी होगी।

जय भवानी जय शिवाजी महाराज।

Saturday, 10 October 2026

RSS ब्राह्मण ज्योति फुले और आर्य

संघ के एकात्मता स्तोत्र में फुले, ठक्कर बापा तथा अम्बेडकर की स्तुति है जो सनातन धर्म के विरोधी थे। 
सुभाषः प्रणवानन्दः क्रान्तिवीरो विनायकः
ठक्करो भीमरावश्च फुले नारायणो गुरुः ॥३०॥
संघशक्तिप्रणेतारौ केशवो माधवस्तथा
स्मरणीयाः सदैवैते नवचैतन्यदायकाः ॥३१॥
ज्योतिबा फुले की पुस्तक गुलामगिरी के अनुसार ब्राह्मण मूल भारतीय नहीं थे। वे बाहरी (आर्य) थे, जो लगभग ३०००-३५०० वर्ष पहले भारत आए। फुले ने लिखा कि ये लोग ईरान क्षेत्र (आर्यावर्त के बाहर) से आए और यहाँ के मूल निवासियों (शूद्र-अतिशूद्र) पर अधिकार जमाया। उन्होंने मनुस्मृति जैसी व्यवस्थाओं के माध्यम से सामाजिक वर्चस्व स्थापित किया। यह स्पष्ट रूप से इसाई मत के प्रचार के लिए भारत विरोधी कहानी थी, जिसका प्रचार अशिक्षितों के माध्यम से किया गया। आज तक किसी भी ग्रीक, इरानी या भारतीय साहित्य में आर्यों के बाहर से आगमन का कोई उल्लेख नहीं मिला है। खानों में काम करने के लिए अफ्रीका से मजदूर आये थे जिनके वंशज भारत के खनिज क्षेत्रों में बसे हुए हैं। उनका चेहरा देखने से ही अफ्रीकी मूल स्पष्ट है। आज भी उनकी उपाधियां वही हैं, जो ग्रीक भाषा में खनिजों के नाम हैं। किन्तु बाहरी लोगों को मूल निवासी तथा मूल निवासियों को बाहरी बना दिया। हिरण्यगर्भ सूक्त में स्पष्ट लिखा है-यस्य विश्वे हिमवन्तो महित्वा (ऋक्, १०/१२१/६)-भारत के हिमालय का ही वर्णन है। केवल भारत की नदियों का ही उल्लेख है। फुले ने अंग्रेज गुरुओं से भी अधिक झूठ का प्रचार किया कि केवल ब्राह्मण बाहर से आये थे। यह मूर्खता तथा झूठ की सीमा है। केवल ब्राह्मणों का समाज १ दिन भी नहीं चल सकता है। उनके भोजन के लिए खेती कौन करेगा, घर कौन बनायेगा, पानी के लिए कुंआ कौन खोदेगा? ब्राह्मण समाज स्वयं ही नहीं जीवित रह सकता, दूसरों को कैसे पराजित कर सकता है? उनकी नकल में चितपावन अपने को ग्रीक, शाकद्वीपी अपने को मिस्र, आस्ट्रेलिया या दक्षिण यूरोप का बता रहे हैं, जहां इसका कोई उल्लेख नहीं है कि केवल ब्राह्मणों का समाज वहां था।