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मैं जैसे ही किसी नदी का दर्शन करता हूँ मेरी हृत्तन्त्री के तार झङ्कृत होने लगते हैं। जब पड़ोसी तहसील सरदारपुर के श्री राजेन्द्रसूरि महाविद्यालय में अध्यापन करता था तब निकट ही प्रवहमान माही नदी के दर्शन का अनेको बार लाभ हुआ। निकट ही मालव पठार के मिन्डा ग्राम से निकल तुरन्त उत्तरवाहिनी हो जाने वाली मिहिरकन्या माही का स्वरूप जैसे गौमुख से निकल हमें गंगोत्री में प्राप्त होता है वैसे ही दर्शन सरदारपुर सेतु पार करते हुए होते हैं। सेतु समापन पर पूर्व तट पर नवग्रह मंदिर में सूर्यदेव की प्रतिमा के साथ विराजित माही माता के दर्शन लाभ भी हुए हैं।
वेगड़ जी उचित ही कहते हैं - 'संस्कृतियों का जन्म नदियों की कोख से हुआ है।' दीर्घावधि इतिहास हमें स्मरण हो, न हो, लिखा गया हमें मिला हो, न मिला हो, लेकिन लोकमन ने जो अपनी स्मृतियों में संजो लिया वह परम्परा में अक्षुण्ण हो जाता है! इतिहासकार अपनी विचारधारा अनुसार दोगलापंथी कर सकते हैं लेकिन लोकमन पवित्र होता है। हमारे पुराणों में पंजीबद्ध कथाएँ भले ही अन्यान्य ग्रंथों में गड्डमड्ड करती भी हो लेकिन है तो वे हमारी पुरासम्पदा ही। बाह्य सभ्यताएँ हमें उन्हें विस्मृत करने के लिए अपने कुकर्म करती रहेगी पर हम इन निधियों से अपनी संस्कृति सहेजते है और उसी से सभ्यता संरक्षित होती है। माया और एज़्टेक सभ्यता आज कहाँ है?
जब पुराणों की बात करता हूँ तो माही माता की स्कन्द पुराण में वर्णित प्रार्थना सहज मन में स्फुट होने लगती है - महीदोहे महानन्दसन्दोहे विश्वमोहिनि।
जाता हि सरितां राज्ञि पापम् हर महिद्रवे ॥
('हे देवी ! तू इस पृथ्वीकी दुग्ध है, परमानन्दकी राशि है, सम्पूर्ण विश्वको मोहनेवाली है तथा आप समस्त सरिताओं की महारानी के रूप में प्रकट हुई हैं, इसलिए हे महीद्रवे, मेरे समस्त पाप हर लीजिए!) कितनी अभिभूत करने वाली वन्दना है! माही उत्तरवाहिनी होकर अपना दीर्घपथ चुनती है। यदि मिन्डा ग्राम से दक्षिणपथ चुन लेती तो मात्र ८० किमी की दूरी पार कर नर्मदा जी की सहायक नदी बन जाती, वैसे ही जैसे मालवा पठार की क्रोढ़ से बाघनी नदी निकल कर मेरे ग्राम से होते हुए नर्मदा माई में संगम ले लेती है। विश्व प्रसिद्ध बाघ की बौद्ध गुफाएँ बाघनी के तट पर ही है। माही को अपना स्वतंत्र पथ चुनना था। मालवा के महाराजा भोज शासित अञ्चल को सींचते हुए उत्तर से फिर पश्चिमवाहिनी कहलाना था, कर्क रेखा को पार करते हुए पुनः अपने देशांतर आरेख में लौटना था, वागड़ (व्याघ्रवाट) अञ्चल को सिंचित करना था, बेणेश्वर तीर्थ निर्माण करना था, सोम, जाखम, भादर, अनास, चाप और मोरन जैसी अनेक सखियों को अपना आलिङ्गन देना था। म. प्र., राजस्थान और गुर्जरभूमि तो हमारी खींची हुई रेखाएँ हैं लेकिन वसुधा ने जिस माही को अपने अंक से प्रकट किया वह तो किसी बड़े लक्ष्य के लिए ही होगा न?
पौराणिक कथाओं में सूर्य की पत्नी संज्ञा से ताप्ती का जन्म और छाया से यमुना का जन्म माना जाता है। लेकिन सूर्य की तीसरी पुत्री माही है अपने उद्गम से वह सूर्य पुत्री के रूप में पूजित और प्रवाह पथ में स्थान स्थान पर बने मंदिरों में इसी परिचय के साथ विराजमान हैं।
माही मैया का जन्म माघ शुक्ल द्वितीया के दिन मनाया जाता है यानी नर्मदा जी के जन्म से ठीक पांच दिन पूर्व। एक सूर्यपुत्री तो दूसरी शिवपुत्री! माही नदी के जन्म माह को गुजराती भाषी लोग महा मास कहते हैं, महा मास की द्वितीया को माही का जन्म। क्या नामकरण में कोई संकेत छुपे हैं? मन करता है कि लोकमन को पूछूँ कि ५८० किमी लम्बाई में बहने वाली नदी को और उसके जन्मोत्सव को माही-बीज के रूप में उजवने वाले लोग किस शास्त्र को पढ़कर ऐसा अलिखित कैलेंडर सदियों से चला लेते हैं कि प्रतिवर्ष जन्मोत्सव धूमधाम से मना डालते हैं। मंदिरों में पूजन होता है, खगोलीय प्रभाव को साधने के लिए एक नदी को नवग्रह मंदिर में सूर्य की गोद में स्थित अंकन किया जाता है। शनिचरी अमावस्या के दिन माही का नहान करने के लिए मेरे ग्राम से कितने ही लोग सरदारपुर जाकर दर्शन, पूजन और ग्रहशांति के कर्म करते हैं। प्रतिवर्ष पंचकोशी परिक्रमा आयोजित होती है। हजारों नर नारी अपनी पोटलियाँ सिर पर रख परिक्रमा के लिए चल पड़ते हैं। स्कन्द पुराण में वर्णित माही के अठारह नामों का जप करते हैं -
ताम्रा रस्या पयोवाहा पितृप्रीतिप्रदा शुभा।
शस्यमाला महासिन्धुर्दातुर्दात्री पृथुस्तुता॥
इन्द्रद्युम्नस्य कन्या च क्षितिजन्मा इरावती।
महीपर्णा महीशृङ्गा गङ्गा पश्चिमवाहिनी॥
नदी राजनदी चेति नामाष्टादशमालिकाम्।
(ताम्रा, रस्या, पयोवाहा, पितृप्रीतिप्रदा, शुभा, शस्यमाला, महासिन्धु, दातृदात्री, पृथुस्तुता, इन्द्रद्युम्नकन्या, क्षितिजन्मा, इरावती, महीपर्णा, महीश्रृंगा, गंगा, पश्चिमवाहिनी, नदी तथा राजनदी-इन अठारह नामोंकी माला करें।)
इतनी पुण्यदायिनी सरिता अपने प्रवणांक पथ की तीव्रता के कारण ऊँचे तटबंध निर्माण करते हुए बड़े बड़े खादर निर्मित करती है गुजराती में कहें तो भेखड़ रचती है। ये भेखड़ चोरों, लुटेरों के शरणस्थल बन जाते हैं। पुण्या नदी चोरों की जननी कही जाने लगती है। वागड़ी भाषा का यह दोहा देखिए -
खड़, खाकड़ँ, खेजड़ गणा, कासड़ियाळो वेस!
नपट नारि पियु लजामणी, इत बँट्यो वागड़ो देस!
इतिहास के मध्यकाल में ऐसे कथन यथार्थ के अधिक निकट होंगे पर पूर्वकाल में इस बात को बड़े यत्न से कहा गया- वागड़े पञ्चरत्नानि, पत्राणि च शिलोदकम्!
चतुर्थ मधुप पुष्पम् च पञ्चमम् वस्त्रलुञ्चनम्!
यहाँ ऐसे लोग हुए हैं जो वस्त्र लुञ्चन कर पूर्ण नग्न कर भेजते होंगे तब ऐसे कथन ख्यात हुए होंगे। जो भी हो अपने भेखड़ों की शरण के कारण यह निम्न वर्ग कहे जाने वाले अकिञ्चन लोगों की भगिनी है, माई है। यह नदी अपने पूरे पथ में भील, बंजारा और पारदी जनजातियों को अपने भ्राता के रूप में गिनती है। साथ ही यह भी दृष्टव्य है कि अन्त्यज कहे जाने वाले ये समुदाय अपनी भगिनी, अपनी माई की शपथ जल-हस्त ले उठाते हैं तो शीश कट जाए लेकिन उस शपथ की आन रखते हैं -
विवादे च समुत्पन्ने अपराधी च यो मतः।
जलहस्तः सदा वाच्यो महीसागरसंगमे ॥
माही नदी का विवाह समुद्र से हुआ तो समुद्र बारात लेकर ४५ मील भीतर तक चला आया, इतने भीतर आकर संगम लेने वाली यह एकमात्र नदी भी है। जो आणंद तहसील (गुजरात) के वहेराखाड़ी में स्थित है। लोकमान्यता है कि जब समुद्र माही के विवाह की भाँवर में चौथा फेरा चल रहा था तब रबारी जनजाति के लोगों ने कन्यादान किया था। इसलिए माही को बहन जैसा मानते हुए अपनी बहिनी के जन्मदिन पर प्रतिवर्ष वहेराखाड़ी और अन्य स्थानों पर अपनी गायों के दूध को न बेचते हुए उस दिन दुग्धाभिषेक करते हैं! अब एक पंथ विशेष के लोग पहले ही शिवजी पर दूध चढ़ाने को लेकर कुढ़ते रहे हैं, यह सुनेंगे तो दोगुना सिर धुनेंगे! पर धुनें तो धुनें! उनके भाग में ही सिर धुनना लिक्खा हो तो मैं क्या कर सकता हूँ? स्कन्द पुराण के अवन्ती खण्ड की पूज्या, आराधिता नदी लोक में आकर कैसे कैसे विरूद और कैसे कैसे कथानक, किम्वदन्तियों की गाथा बन जाती है इसका सबसे सशक्त उदाहरण माही है। गुजराती में माही माँ नो गरबो गाते हुए कवि कह देता है -
नाख्यु घोड़ा पर जीन तारी ख्याता रे।
सूध सान ने वीसरी मही माता रे।
उछाळ्यु नीर अपार तारी ख्याता रे।
गाम घणां ने घेरिया मही माता रे!
तुं निकळी हद थी बहार तारी ख्याता रे!
माही के रौद्र रूप का वर्णन बहुत अल्प शब्दों में हम समझ सकते हैं!
माही को टॉलेमी नामक यात्रा वृत्तांतकार ने मेफिस के नाम से उद्धृत किया है और अल्बरुनी माही को महिन्द्री लिखता है! व्हेन सांग ने इसे मो-हे-ई नाम से अपने ग्रंथ में स्थान दिया है! इटैलियन यात्री लुडोविको डी वर्थेमा ने भी इसका उल्लेख किया है। इसका तात्पर्य है कि हजार वर्ष के इतिहास में इस नदी की कोख में सभ्यता के, संस्कृति के उत्थान गीत रचे जाते रहे हैं, तभी तो बाहरी यात्री इस नदी का सामिप्य पाने के लिए दौड़े चले आए होंगे!
ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित रचनाकार श्री पन्नालाल पटेल मूल गुजराती नहीं लेकिन वागड़ के निवासी थे। उनके ऐतिहासिक कथानक पर लिखे उपन्यास 'रक्त गुलाल' में श्री पटेल ने पूरे महीकाँठा को जो लिखा है उससे मुझे रेणु जी का मैला आँचल उपन्यास स्मरण हो आता है! गलालसिंह और पियोली के चरित्र चित्रण के साथ वागड़ की गलालेंग परम्परा जो आज भी निरन्तर है उसका विवरण भूल जाऊँ तो माही के साथ लेखन में मेरे द्वारा अन्याय होगा! ऐसा कैसे कर सकता हूँ? गलालेंग में गायी जाने वाली पंक्तियाँ पटेल जी रक्त गुलाल में लिखते हैं -
खळभळ खळभळ मही नो काँठो,
काँठे फरके माँ नी धजाओ!
आवन जावन मनखा मेळो,
ऊँट, घोड़ा कोई पालखी वाळो!
(काँठो = किनारा या तट)
पटेल जी ने गलालसिंह का वर्णन किया है लेकिन माही काँठे स्थित भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के दो क्रांतितीर्थ कहीं विस्मरण न हो जाए इसलिए लिखता हूँ। इस नदी की कोख में भारतीय स्वतंत्रता के दो क्रांतितीर्थ हैं। जो भोले भाले जनजातीय लोगों ने लड़े हैं। पहला तीर्थ है खानपुर (जहाँ १८५७ के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के समय का एक वटवृक्ष है जिस पर ३५० क्रांतिकारियों को फाँसी देने का भीषण कृत्य अंग्रेजों ने किया था, दूसरा है कडाणा बाँध की तराई में आया मानगढ़ (पहाड़ी) नामक तीर्थ, जहाँ १५०७ जनजातीय वीरों को गोलियों का भोग बनना पड़ा। इन दोनों क्रांतितीर्थों पर माही की कोख में ९ अगस्त को मेला लगता है। माही ने स्वतंत्रता के लिए मानों अपने जनजाति पुत्रों को प्रेरित कर अपनी ओर से स्वतंत्रता यज्ञ में आहुति अर्पित की हो।
म. प्र., राजस्थान और फिर गुजरात का जलाभिषेक लेकर महिसागर नामक एक नया भौगोलिक लगून (पश्चजल) रचती है जो विश्व में दुर्लभ है। ठीक पास में जहाँ माही धुवारण की खाड़ी में समुद्र संगम करती है यह खम्भात की खाड़ी का उत्तर भाग है इसी खम्भात की खाड़ी में नर्मदा माई विश्व की १२ या १३ कुल नदियों की श्रेणी में Estuaries (ज्वारनदमुख) निर्माण करती है वहीं माही नदी धुवारण से लेकर वहेराखाड़ी तक महिसागर रुपी लगुन निर्माण करती है। कितना अद्भुत है न पास पास प्रकृति का यह अनुपम रचाव? हमारी संस्कृति नदियों को सामान्य कारणों से माँ उपमा नहीं देती! वे माँ हैं इसीलिए माँ कही जाती है। एक माँ अपने बेटे को आँचल की ओट में दूध पिलाती है, लेकिन नदियाँ खुले वक्ष अपनी संतति को सदैव अमृतपान कराती है। इसीलिए भारतीय चित्रकला नदियों का अंकन खुले स्तन के साथ करती है। आलेख समापन करते हुए बताता चलूँ कि धुवारण में समुद्र संगम करते हुए माही अपने जन्मस्थान की तरह पुनः उत्तरवाहिनी हो जाती है! समुद्र पर कावी स्थित स्तम्भेश्वर महादेव अग्निरूपी योनी को धारण करने वाली माही के सागर संगम के साक्षी बनते हैं!
'अग्निश्च ते योनिरिडा च देहो रेतोऽथ विष्णोरमृतस्य नाभिः।'
('हे महीनदी ! अग्नि तुम्हारी योनि (उत्पत्तिस्थान) और पृथ्वी तुम्हारी देह है। तुम यज्ञस्वरूप विष्णुके वीर्यसे उत्पन्न हुई हो और अमृतका केन्द्रस्थान हो।')
हमारे मालव माटी के गहन गंभीर अध्येता डॉ वाकणकर जी ने अपनी शोधों के माध्यम से अपूर्व कार्य किए, उन्होंने ही अम्बीतमे सरस्वती के पथ का पंजाब, हरियाणा, राजस्थान और गुजरात होते हुए समुद्र के संगम की जानकारी भारतीय वाङ्मय के आधार पर सिद्ध करते हुए लोकमानस में यह रोपा। अन्धकार युग में लोकचेतना से विलुप्त तथ्यों को हमारा एक वर्ग सरस्वती को कपोल कल्पना मान रहा था। इस कथन के साथ मैं माही नदी के भू-गर्भ विषयक तथ्य को रखने जा रहा हूँ। श्री वाकणकर जी ख्यात किया कि सरस्वती नदी गुजरात में बहती रही है। हाल के अनुसंधानों से गुजराती में कुछ अनुसंधान हुए हैं कि सरस्वती नदी पूर्व में कच्छ के बड़े रण में होते हुए समुद्र में मिलती रही इससे पूर्वपथ वह सोमनाथ ज्योतिर्लिंग के निकट हीरण और कपिला के साथ समुद्र संगम कर त्रिवेणी संगम रचती रही। लेकिन जो भू-गर्भ तथ्य आ रहे हैं उसके अनुसार इससे भी पूर्वकाल में वह ताप्ती के सूरत स्थित संगम के ठीक सामने समुद्र में मिलती थी। ताप्ती और सरस्वती का यह एश्चुअरी क्षेत्र ऊँचा था, जबकि नर्मदा और माही का पाट नीचे था। फलस्वरूप जैसे जैसे गुजरात का आनर्त अंचल बाहर आता रहा, सरस्वती ने अपना पथ परिवर्तन किया। ताप्ती का प्रवणांक पथ तीव्र था इसलिए समुद्र की काप को काट कर सूरत का सुवाळी-बीच (बर्थ प्लेस ऑफ इंडियन नेवी) निर्मित किया। माही ने भी अपनी गहरी नदी घाटी की काप को काटकर गहरी घाटी निर्मित की। अपने लोथल की हड़प्पा संस्कृति से संबंधित लेख में भोगावो नदी के तथ्य के साथ समुद्र के पीछे हटना मैं लिख चुका हूँ। बाद में ज्ञात हुआ कि भोगावो की उस गहरी गाद में दिल्ली विश्वविद्यालय की एक शोध छात्रा लोथल के भू-गर्भ के प्रमाण एकत्रण हेतु उतरी थी और काप का भूखण्ड गिरा जिसमें वह दिवंगत हुई।
हमारे प्राचीन ऋषियों ने जो हजारों नहीं बल्कि लाखों वर्षों के पृथ्वी के परिवर्तनों को नोटिस किया और कथाओं के माध्यम से उन्हें ज्योतित किया हम ऋणी हैं उनके। वरन सौ वर्ष पूर्व तक वायुयान भी भारतीय कथाओं का काल्पनिक विषय ही कहा जाता रहा। हमारे ऋषियों ने आज भी अल्पज्ञात इस माही नदी की महिमा में यह स्तुतिगान किया है वह हृदयाम्बुज में उतार अवगाहन करने के लिए ही तो है -
मुखम् च यः सर्वनदीषु पुण्यः पाथोधिरम्बुप्रचुरा मही च।
समस्ततीर्थाकृतिरेतयोश्च ददामि चार्ध्यम् प्रणमामि नौमि॥
सहस्रविंशतिश्चैव षट्शतानि तथैव च॥
तासां सारसमुद्भुतं महीतोयं प्रकीर्तितम्॥
पृथिव्यां सर्वतीर्थेषु स्नात्वा यत्फलमाप्यते॥
तन्महीसागरे प्रोक्तं कुमारस्य वचो यथा॥
एकत्र सर्वतीर्थानां यदि संयोगमिच्छथ॥
तद्गच्छथ महापुण्यं महीसागरसंगमम्॥
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