Wednesday, 2 September 2026

विद्यापति शैव हैं

विद्यापति शैव हैं और वे सिर्फ अपनी काव्य प्रतिभा के प्रदर्शन के लिए कृष्ण और राधा पर पद लिख रहे हैं। उन्होंने कई स्थानों पर राधा और कृष्ण के प्रेम प्रसंग को अश्लिल बना दिया है। यदि वे कृष्ण भक्त होते तो किंचित ऐसा करने से बचतें। इसके अतिरिक्त, राधा को कृष्ण से अधिक तो नहीं, लेकिन कृष्ण के समकक्ष लाने का सबसे पहला प्रयास विद्यापति ने ही किया है। जयदेव के गीत गोविन्द में कृष्ण का महत्व बहुत अधिक है, लेकिन विद्यापति ने न सिर्फ राधा को कृष्ण के बराबर खड़ा करने का प्रयास किया है, बल्कि कहीं-कहीं कृष्ण से अधिक महत्वपूर्ण बना दिया है।
खीचा है, और बडा साफ । नायिका के तन्ल नेत्रों से प्रेम के आँसू बह रहे हैं। वह कुल-बाला अस्थिर हो रही है। वह क्षण-क्षण में उठनी है, और विरहाग्नि की ज्वाला द्विगुण बढ़ जाती है। मलय-चन्दन और मृग-मद आदि से अंगो मे जो कुछ लेप उसने शीतलता के लिए कर रक्खा था, उसके तप्न आँसुओं से कंचुकी के भीगने के साथ उसके हृदय तथा उगेजों पर लगाया हुआ वह लेप वह गया। कंचुकी भीग जाने से उसने उसे उतार डाला। प्रेम के पागल लोल लोचन ऐसे हो रहे है, जैसे व्याध के बाण से घायल वन्य हरिणी भीरु दृष्टि से चारो ओर हेरती है। कविशेखर विद्यापति और कविकुल-चूड़ामणि चण्डिदाम, दोनो महाकवि हैं। आकर्षण और पाण्डित्य कविशेखर मे मुझे अधिक मिला। कुछ लोग कविशेखर को अश्लील कहते हैं। उन नीतिज्ञ महापुरुषो की कविता समझने की शक्ति पर मुझे सन्देह है। चण्डिदास में अश्लीलता अवश्य नही आने पायी। इनकी उक्तियाँ एक साधक भक्त की-सी उक्तियाँ है। यह साधक थे भी। एक ही समय के, वंग और मिथिला के, ये दोनो महाकवि साहित्य के अमूल्य रत्न हैं, इसमें जरा भी सन्देह नही। कहते हैं, ये कवि महापुरुप थे, और श्रीचैतन्यदेव के आविर्भाव से पूर्व इन्हें इसलिए आना पड़ा कि ये श्रीकृष्ण-राधा के अलौकिक प्रेम पर अपनी-अपनी रस-सिद्ध रचनाएँ रख जायें। श्रीमहाप्रभु आकर रसास्वादन करेंगे। जिन कवियों के सम्बन्ध में भारतवर्ष के विद्वानों की यह घारणा है, उन पर अश्लीलता का दोष मढ़ने से पहले आजकल के समालोचक अगर कुछ विचार कर लिया करें, तो बुरा न होगा ।
['सुघा', मासिक, लखनऊ, अगस्त, 1928। प्रबन्ध-प्रतिमा में संकलित ('विद्या-पति और चण्डिदास' शीर्षक से)]
बंगाल के वैष्णव कवियों की शृ ंगार-वर्णना
"जय जय यदुकुल-जगनिधि चन्द्र। व्रजकुल गोकुल - आनंद-कन्द ।। जय जय जलघर-श्यामर-अंग। हेलन कल्पतरु - ललित त्रिभंग ।। सुधा सुधामय मुरलि-विलास। जग जन मोहन मधुरिम-हास ।। अवनि-विलम्वित-वनि-वनमाल। मधुकर झंकर ततहि रसाल ॥ तरुण-अरुण रुचि मुख अरविंद। नख-मणि निउछनि दास गोविन्द ।।
- गोविन्ददास
भगवान् श्रीकृष्ण की मधुर रस ने उपासना करते हुए भारतवर्ष के भक्तराज वैष्णव कवियों ने श्रृंगार की जो सुख-शान्ति-शीतल मन्द-मधुर मन्दाकिनी बहायी है, साहित्य के निष्कलुप हृदय का वह अमृत भगवान् श्रीकृष्णचन्द्र सदा ही मोहिनी
246 / निराला रचनावली-5

रचना के कारण ये 'मैथिलकोकिल' कहलाए वह इनकी पदावली है। इन्होंने अपने समय की प्रचलित मैथिली भापा का व्यवहार किया है। विद्यापति को बंगभाषावाले अपनी ओर खींचते हैं। सर जार्ज ग्रियर्सन ने भो विहारी और मैथिली को 'मागधी' से निकली होने के कारण हिंदी से अलग माना है। पर केबल भाषाशास्त्र की दृष्टि से कुछ प्रत्ययों के आधार पर ही साहित्यसामग्री का विभाग नहीं किया जा सकता। कोई भाषा कितनी दूर तक समझी जातो है, इसका विचार भी तो आवश्यक होता है। किसी भापा का समझा जाना अधिकतर उसकी शब्दावली (वाकेवुलरी) पर अवलंबित होता है। यदि ऐसा न होता तो उर्दू और हिंदी का एक ही साहित्य माना जाता ।

खड़ो बोलो, बाँगड़, व्रज, राजस्थानी, कन्नौजी, वैसवारो, अवधी इत्यादि में रूपों और प्रत्ययों का परस्पर इतना भेद होते हुए भी सब हिंदी के अंतर्गत मानी जाती हैं। इनके' बोलनेवाले एक दूसरे की बोलो समझते हैं। बनारस, गाजीपुर, गोरखपुर, बलिया आदि जिलों में 'आयल' ग्राइल', 'गयल' - 'गइल', 'हमरा'- 'तोहरा' आदि बोले जाने पर भी वहाँ की भाषा हिंदी के सिवाय दूसरी नहीं कही जाती। कारण है शब्दावली की एकता । अतः जिस प्रकार हिंदी साहित्य 'वीसलदेवरासो' पर अपना अधिकार रखता है उसी प्रकार विद्यापति की पदावली पर भी ।

विद्यापति के पद अधिकतर शृंगार के ही हैं. जिनमें नायिका और नायक राधाकृष्ण हैं। इन पदों की रचना जयदेव के गोतकाव्य के अनुकरण पर हो शायद की गई हो। इनका माधुर्य अद्भुत है। विद्यापति शैव थे। उन्होंने इन पद्मों की रचना श्रृंगार काव्य की दृष्टि से को है, भक्त के रूप में नहीं। विद्यापति को कृष्णभक्तों को परंपरा में न समझना चाहिए ।

कन्याके आदर तथा अनादरके फल-

कन्याके आदर तथा अनादरके फल-
यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः । यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफलाः क्रियाः ॥ ५६ ॥

जिस कुलमें स्त्रियोंकी पूजा (वस्त्र, भूषण तथा मधुर वचनादि द्वारा आदर-सत्कार) होती है, उस कुलपर देवता प्रसन्न होते हैं और जिस कुलमें इन (स्त्रियों) की पूजा नहीं होती उस कुलमें सब कर्म निष्फत्त होते हैं (अत एव स्त्रियोंका अनादर कभी नहीं करना चाहिये) ॥ ५६ ॥

शोचन्ति जामयो यत्र विनश्यत्याशु तत्कुलम् । न शोचन्ति तु यत्रैता वर्धते तद्धि सर्वदा ।। ५७ ।।८ 
मनु०११४ मनुस्मृतिः
जिस कुलमें जामि (स्त्री, पुत्रवधू, बहन, भानजी, कन्या आदि) शोक करती हैं, वह कुल शीघ्र ही नष्ट हो जाता है और जिस कुत्तमें ये शोक नहीं करतीं (प्रसन्न रहती) हैं, वह कुत्त सर्वदा उन्नति करता है ॥ ५७ ॥
जामयो यानि गेहानि शपन्त्यप्रतिपूजिताः । तानि कृत्याहतानीव विनश्यन्ति समन्ततः ॥ ५८ ॥
जिस गृहको ये जामियां (स्त्री, पुत्रवधू, बहन, भानजी, कन्या आदि) अनादर पाकर शाप देती हैं, वह गृह कृत्या (अभिचारकर्म-मारण, मोहन, उच्चाटनादि) से हतके समान सब ओरसे (धन, धान्य, परिवार आदिके सहित) नष्ट हो जाता है ॥
उत्सवादिमें स्त्रियोंकी विशेष पूजनीयता -
तस्मादेताः सदा पूज्या भूषणाच्छादनाशनैः । भूतिकामैर्नरैर्नित्यं सत्कारेषुत्सवेषु च ।। ५६ ।।
इस कारण उन्नति चाहनेवाले मनुष्योंको (कौमुदी आदि) सत्कार तथा (यज्ञोपवीत आदि) उत्सवों के अवसरोंपर इन स्त्रियोंका वस्त्र, भूषण और भोजनादिसे विशेष आदर-सत्कार करना चाहिये ॥ ५९ ॥
दम्पतिकी सन्तुष्टिका फल-
सन्तुष्टो भार्यया भर्ता भर्ना भार्या तथैव च । यस्मिन्नेव कुले नित्यं कल्याणं तत्र वै ध्रुवम् ॥ ६० ॥
जिस कुत्तमें स्त्रीसे पति तथा पतिसे स्त्री सन्तुष्ट रहती है, उस कुलमें अवश्य ही सर्वदा कल्याण होता है ॥ ६० ॥
स्त्रीको अलङ्कारादिसे सन्तुष्ट नहीं करनेका फल-यदि हि स्त्री न रोचेत पुमांसं न प्रमोद्येत् । अप्रमोदात्पुनः पुंसः प्रजनं न प्रवर्तते ॥ ६१ ॥
यदि स्त्री वस्त्राभूषण आदि से रुचिकर नहीं होती है तो वह पतिको आनन्दित नहीं करती और हर्षित नहीं होनेसे वह पति गर्भाधान करनेमें प्रवृत्त (समर्थ) नही होता है ॥ ६१ ॥
१. "मेधातिथि-गोविन्दराजौ तु 'नत्रोढादुहितृस्नुषाद्या जामयः" इत्याहतुः” इति (म० मु०)। अमर-हेमचन्द्र हलायुध-मेदिनीकार-विश्वादयः कोषकारास्तु याभिः (यामिः) 'स्वसृकुलस्त्रियोः' इत्याहुः । शाश्वतस्तु 'तत्र कुलबालिकाया-बेत्याह ।

भर वंश

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भर वंश

भर जाति भारशिव ही है। जो दयनीय दशा में जीवन व्यतीत कर रहे हैं। यह लोग अपनी जाति के आगे अपने पुराने राजमोह को नहीं छोड़ पाए और अपने को राजभर कहने लगे। 12वीं शताब्दी तक बनारस राज्य इन्हीं के अधिकार में था। कहा जाता है कि सारनाथ के पास चंदो तालाब इन्ही ने बनवाया था। यह लोग नाग और सूर्य की पूजा करते थे। शकों के पराजय के बाद उस क्षेत्र में इनका अखंड राज्य स्थापित हो गया था। गहरवारों के पराजय के बाद आक्रमणकारी तुर्कों से भरों ने डट कर लोहा लिया था। लगभग 200 वर्षों तक युद्ध चलता रहा।

तुर्की शासकों ने इस वीर जाति और रणबांकुरों के विनाश में कोई कसर नहीं उठा रखी, सुल्तान अल्तमश के पुत्र ने बहराइच में भरों के विनाश करने में डेढ़ लाख सिपाही कटवा दिए थे। बलबन ने कालिंजर में ऐसा ही किया था। जौनपुर के इब्राहिम शाह शर्की ने भरो का विनाश करने में कोई कसर न उठा रखी थी। सेमरौता के राजा केशरी सिंह ने रायबरेली के हरदोई नामक स्थान में भरों को परास्त कर शेरपुर कटरा बसाया। इलाहाबाद जिले के पास कड़े नामक स्थान को भरों के राजा कड़े चंद ने बसाया था। इनके भाई मानिक चंद्र ने मानिकपुर बसाया था। जिनके दुर्ग आज भी खंडहर के रूप में मौजूद है। जायस का पुराना नाम उजालक नगर था। 505 जिसे भरो के राजा उजालक ने बसाया था। जौनपुर के इब्राहिम शाह शर्की को रायबरेली डलमऊ तथा सुदामन पुर नामक स्थान पर भरों से कठिन लोहा लेना पड़ा था।

भर वंश

जिन पल्लवों ने दक्षिण को पवित्र हिंदू राष्ट्र बनाया था। वे ब्राह्मण थे। उन लोगों ने विकट और उग्र राजनैतिक कार्य करके अपनी मर्यादा बढ़ाई थी। पल्लव वंश के संस्थापक का नाम वीर्यकूर्च था। जिसका विवाह नागवंशी राजा की कन्या से हुआ था। इसलिए वह पूर्ण राज चिन्हों से अलंकृत हुआ था। उस समय अर्थात तीसरी शताब्दी के उत्तरार्ध में जो नागवंशी सम्राट था। वह भारशिव नाग था। जिसका राज्य नागपुर और बस्तर होता हुआ आंध्र तक पहुंच गया था। वीर्य कुर्च (वीर कोर्च) के पौत्र के एक शिलालेख जो आंध्र प्रदेश से प्राप्त हुआ था। जिसमें अंकित है कि "परम ब्रह्मणस्य स्वबाहु बलार्जित क्षत्र तपो निधे विंधि विहित सर्वा मर्यादस्य"

जिसका तात्पर्य यह है कि वीर्य कूर्च ब्राह्मणों के सर्वोच्च लक्षणों से युक्त था। उसने क्षत्रिय का पद प्राप्त किया था और इन्हीं नागवंशी से महात्मा बुद्ध के उस दांत का कुछ अंश सिंघल ले जाने की आज्ञा प्राप्त की गई थी। जो आंध्र प्रदेश के दंत पुर नामक स्थान पर था। आंध्र प्रदेश के इस स्थान को मजेरिक कहते हैं। जो संभवत गोदावरी के उस शाखा का नाम है जिसे आजकल मंझिर कहते हैं।

बौद्धों ने जिस नागराज का वर्णन किया है वह पल्लव वंश का होना चाहिए। जो नाग साम्राज्य के अधीन था। यह नागवंशी सम्राट वह होना चाहिए जिसने अपनी कन्या का विवाह वीर्य कूर्च से किया था। यह समय 300 ई० के आसपास होना चाहिए।

सन 300 ई के जिन पल्लव वंशियों के ताम्र लेख मिले हैं 78 इसमें उन्होंने अपने को भारद्वाज कहा है। पल्लव वंश में वीर्य कूर्य (कुमार विष्णु), शिव स्कंद बर्मन, वीर बर्मन, विजय (स्कंद) बर्मन, सिंह बर्मन, स्कंद बर्मन तृतीय, गोप विष्णु, सिंह बर्मन द्वितीय ने 265 ई० से 360 ई० तक राज्य किया। पल्लव वंश का उल्लेख करते हुए वी० ए० स्मिथ ने लिखा है कि "All these people doubless to "Naga"

Saturday, 29 August 2026

कृष्ण का एक अरबी version पकड़ा दिया गया कि तुम इसकी पूजा करो।

आज हम जिस योगेश्वर की पूजा करते हैं वो योगेश्वर कौन है? वो योगेश्वर एक वो कसर का एक अरबी अरेबियन version है, अरेबियन version. हमें एक मुसलमानी कसर पकड़ा दिया गया कि तुम इसकी पूजा करो। भाई साहब कहते हैं भागवत के करने वाले, कहते हैं सनातन धर्म के बड़े बड़े जानने वाले

कि जिस गांव में योगेश्वर ने जन्म लिया, जन्म तो उनका जेल में हुआ मथुरा के और फिर रहने लगे वो गोकुल में। गोकुल की प्रत्येक नारी उन्हें अपना पति, अपना वर समझती थी। भाई साहब आपका जन्म किसी गांव में हुआ या किसी शहर में हुआ था? मैं तो नगर में पैदा हुआ हूं।

भाई साहब मेरा जन्म एक गांव में पैदा हुआ। गांव की परंपरा है, जिस गांव में मेरा जन्म हुआ, उस गांव में प्रत्येक महिला हां मेरी बहन, मेरी शादी होकर आई, मेरी पत्नी के अलावा, उससे पहला रिश्ता मेरा परदादी का, दूसरा रिश्ता दादी का, तीसरा रिश्ता मां का,

चौथा रिश्ता बेटी समान भाई बहू, छोटे भाई की पत्नी, पांचवा रिश्ता पुत्र वधू, छठा रिश्ता पौत्र वधू। एक अपनी पत्नी को छोड़कर केवल यही मेरे रिश्ते उस गांव की महिलाओं से संभव है। और जिस भी महिला ने उस गांव में जन्म लिया,

सबसे पहला रिश्ता पिता की बुआ, फिर मेरी बुआ, फिर मेरी बहन, फिर मेरी बेटी, फिर मेरी पौती, फिर मेरी परपौती। भाई साहब क्या इनमें से कोई भी ऐसा रिश्ता है कि कोई भी महिला मुझे अपना पति मान ले? क्या यह भारतीय धर्म परंपरा में संभव है क्या भाई साहब?

ठीक बात है, बिल्कुल ठीक। यह कभी भी संभव नहीं था। और अगर मैं किसी महिला से यह रिश्ता जोड़ने की कोशिश करता हूं तो इसकी सजा हमारे धार्मिक संस्कारों में या तो death

sentence या परिवार का पूर्ण बहिष्कार, इसके अलावा कोई सजा नहीं थी। एक काम जो नरसिंगानंद नहीं कर सकता, पंडित विनय कसर चतुर्वेदी नहीं कर सकते, एक साधारण हिंदू नहीं कर सकता, तो हम सबका पिता,

जो हमारे धर्म का पिता है, वो ये काम कैसे कर सकता है भाई साहब? ये परंपरा कहां से आई? इस परंपरा को समझने के लिए आपको पचास, साठ और सत्तर के दशक की जो फिल्में हैं वो याद करनी पड़ेंगी।

ये संस्कार कहां से बोए गए? फिल्में दिखाती थी एक गांव में, एक घर में लड़का रहता है, बराबर के घर में लड़की रहती है, दोनों में प्यार हुआ, दोनों की शादी हो गई। गोत्र में भी शादी नहीं हो सकती।

गांव की तो बात छोड़ दीजिए। यह हमारी परंपरा नहीं, यह लुटेरों की परंपरा थी। जो अपनी बहनों से, अपनी बेटियों से, अपनी पौतियों से, अपनी माताओं से, अपनी पुत्र वधुओं से शादी और बलात्कार कर लेते थे। धर्म के नाम पर बिके हुए धर्मगुरुओं ने,

धर्म के नाम पर बिके हुए तथाकथित विद्वानों ने योगेश्वर के चरित्र को समाप्त करने के लिए, ताकि हिंदू मानस बिल्कुल कुचल जाए और हम इस गंदगी को स्वीकार करके गंदगी में लिप्त हो जाएं, इसके लिए यह अरेबियन परंपराएं, यह जाहिल लुटेरों की परंपराएं हम पर डाल दी।

यह तो धन्यवाद देता हूं, मैं अभी भी खाप पंचायतें हैं, अभी भी गांव का system है, जिसने इस बदतमीजी को रोके रखा है। वरना अपने आप को तथाकथित विद्वान कहने वाले तो बहुत दिन पहले से, अभी हमारे न्यायपालिका को देख लीजिए भाई साहब, हमारे विद्वान न्यायाधीशों को देख लीजिए,

वो तो तैयार बैठे रहते हैं कि गंदगी को अपने ऊपर थोप लो और समाज पर लगा दो। इन षड्यंत्रों से लड़ने के लिए आज बड़े धर्म के बारे में मनन, चिंतन, अध्ययन और सही धर्म के प्रचार प्रसार की आवश्यकता है भाई साहब।

लोग जयचंद को गद्दार बताते हैं।

हम लोग जयचंद को गद्दार बताते हैं। क्योंकि हमारी नसों में जो गुलामी है ना, सत्ता की गुलामी। आप पूरा जब पढ़ेंगे तो आपको पता चलेगा जयचंद और पृथ्वीराज चौहान सगे मौसेरे भाई थे। हां और वो गद्दार नहीं था।

एक साथ अमर के देखते थे दोनों। जयचंद छोटे थे, पृथ्वीराज चौहान बड़े थे। तो पृथ्वीराज चौहान को दिल्ली मिल गई। वरना पृथ्वीराज चौहान अजमेर के राजा थे और यह राजा थे कन्नौज के। दोनों एक ही आश्रम में रहकर पढ़े।

और जयचंद जो है पृथ्वीराज चौहान के बहुत ही आज्ञाकारी थे। पृथ्वीराज चौहान जब भी कोई लड़ाई लड़ते थे, बड़ी लड़ाई, जयचंद उनके general रहते थे। लेकिन 65 साल के बूढ़े ने जब अपने सगे छोटे मौसेरे भाई की 13

साल की बेटी का अपहरण कर लिया और लाखन जो था उनका मुँहबोला बेटा, उनका भतीजा था जयचंद का, उनका अपना बेटा तो था नहीं। तो लाखन को बुलाकर कत्ल कर दिया। तो जयचंद बेचारा क्या करता?

हम सच को स्वीकार ही नहीं कर पाते। हम केवल भाटों की भाषा बोलते हैं। हम केवल गुलामों की भाषा बोलते हैं। हम कभी भी सत्य का आकलन नहीं करते। तो गांधी नेहरू की गलती नहीं थी।

उस समय सावरकर को छोड़कर बाकी जितने सरदार पटेल को बहुत महान बताया जाता है। अगर सरदार पटेल चाहते तो क्या एक भी मुसलमान भारत में रह जाता? केवल दो नेता हैं एक भीमराव अंबेडकर और एक वीर सावरकर। ये दोनों चिल्लाते रहे। आज हमें महान लोग भी तो क्योंकि हमें गुजराती महान बनाने हैं।

तो मैं फिर कह रहा हूं अच्छे थे। सरदार पटेल ने रियासतों का एकीकरण किया। अच्छी बात है। लेकिन इस्लाम के बारे में तो वो गांधी के तो follower थे। और संघ पर प्रतिबंध किसने लगाया?

सरदार पटेल ने लगाया ना। लेकिन फिर भी आज संगी जो हैं सारे क्योंकि गुजराती अब चलो छोड़ो यार। ये मेरे बाद की बातें हैं। ये मेरे बाद लोग discuss करेंगे। लेकिन कुल मिलाकर बात यह है कि

कुल मिलाकर बात यह है कि सत्ता की गुलामी छोड़नी पड़ेगी। और हमें बातों के, देखिए हिंदू सत्य को नहीं पसंद करता। हिंदू केवल सत्ता की गुलामी को पसंद करता है। इसलिए आज तक हम जयचंद को गाली देते हैं। जयचंद जो सबसे बड़ा पीड़ित था उस समय का।

जो पृथ्वीराज चौहान का सबसे बड़ा वफादार था। आज भी हिंदू अगर गद्दार किसी को कहता है तो जयचंद को बताता है। ये नहीं कहता कि भाई किसी की बेटी को kidnap करने की जरूरत क्या थी पृथ्वीराज चौहान को? अपने भाई की तो बेटी kidnap कर ली और मोहम्मद गौरी को जिंदा छोड़ दिया।


तुलसीदास ने राम मंदिर का जिक्र नहीं किया

आज मुझे बहुत सारे लोग कहते हैं कि गोस्वामी तुलसीदास जी को अकबर ने बुलाया और उन्होंने जाने से इंकार कर दिया। लेकिन जिन जागीरदार, जिन जमींदारों के पास गोस्वामी तुलसीदास जी रहते थे, जिसमें बनारस में एक बहुत बड़ा नाम था राजा टोडरमल का। यह भूमिहार जमींदार थे भाई साहब।

इनके वंश के ही कुछ लोग बाद में काशी, जो यह काशी का जो राजाओं का परिवार है, इसी वंश से बना भाई साहब। काशी राजवंश ठाकुरों का नहीं है, ब्राह्मणों का है। जानता हूं, जानता हूं।

भूमिहारों का है। भाई साहब खुद राजा, ये टोडरमल के यहां रहते थे। और यह राजा टोडरमल वो नहीं जो नवरत्नों में जिसकी गिनती होती थी। यह दूसरे राजा टोडरमल हैं। और भाई साहब राजा टोडरमल अकबर के गुलाम थे, गुलाम।

पक्की बात, तो उस काल में और उनके धन पर पलने के कारण, गोस्वामी तुलसीदास जी ने अपने पूरे जीवन में इस्लाम के बारे में, इस्लाम के अत्याचारों के बारे में, जो अत्याचार उनके माता पिता पर हुए, उसके बारे में, जो नि-निर्संक हत्याकांड राम जन्मभूमि पर हुआ, उसके बारे में कहीं भी एक शब्द नहीं लिखा।

और कहीं इधर उधर दो चार लाइनें लिख दी हो भाई साहब स्पष्ट सी, तो मैं उसकी चर्चा तो नहीं करता। क्योंकि कुछ लोगों ने मुझे दो चार लाइनें बताई कि भैया तुलसीदास जी की लिखी हुई है, उसमें पीड़ा तो है, लेकिन सत्य संदेश कुछ भी नहीं है।

और भाई साहब, अकबर के, संभवतः अकबर के समय में ही दिल्ली में संतों की एक बहुत बड़ी सभा हुई और उस सभा में धर्मादेश दिया गया। वह धर्मादेश था दिल्लीश्वरोवा जगदीश्वरोवा। जो दिल्ली का अधिपति है, वही हमारा भगवान है।

और यह धर्मादेश किसी मुसलमान ने नहीं, हमारे बड़े बड़े संतों ने इकट्ठे होकर दिया। और उस समय दिल्ली इन अरब के लुटेरों के पास थी। अरब के भी नहीं, टर्की के। अरब तो भाई slightly थोड़े दिनों में समाप्त हो गए थे।

बाद में तो यह जिहाद का सारा ठेका ये टर्киयों ने ले लिया, टर्की के लुटेरों ने ले लिया था। जो अरब के लुटेरों से भी ज्यादा जाहिल और ज्यादा निर्दयी थे। आज भी हमारे कथावाचक, हमारे धर्माचार्य उसी परंपरा का पालन कर रहे हैं।

वैदिक काल स्त्रियां महिलाएं

यह धारणा आधी सच है कि आदि काल में स्त्रियाँ गुरुकुल नहीं जाती थीं। पूरा सच इससे ज्यादा गौरवशाली है।

आदि काल के 2 दौर समझिए -

### 1. वैदिक काल (1500 BC - 500 BC) - तब स्त्रियाँ गुरुकुल जाती थीं

उस समय दो प्रकार की विद्यार्थिनी होती थीं -

*क) ब्रह्मवादिनी -* जो आजीवन ब्रह्म-विद्या पढ़ती थीं, विवाह नहीं करती थीं। ये ऋषि ही बन जाती थीं।
- *लोपामुद्रा, घोषा, अपाला, विश्ववारा* - इन्होंने ऋग्वेद के सूक्त लिखे हैं। ऋषिका हैं।
- *गार्गी, मैत्रेयी* - जनक के दरबार में याज्ञवल्क्य जैसे ऋषियों से शास्त्रार्थ करती थीं।

*ख) सद्योवधू -* जो 15-16 साल तक गुरुकुल / आचार्य के आश्रम में पढ़ती थीं, फिर विवाह कर गृहस्थ बनती थीं।

तब उपनयन संस्कार लड़के-लड़की दोनों का होता था। अथर्ववेद कहता है - _"ब्रह्मचर्येण कन्या युवानं विन्दते पतिम्"_ - ब्रह्मचर्य से ही कन्या योग्य पति पाती है।

### 2. उत्तर वैदिक और स्मृति काल (500 BC के बाद) - तब व्यवस्था बदली

जब गुरुकुल घर से बहुत दूर जंगलों में चले गए, और समाज में बाल-विवाह, बाहरी आक्रमण शुरू हुए, तब लड़कियों को दूर भेजना असुरक्षित माना गया। तब से -

*स्त्रियों की शिक्षा के 3 केंद्र बने -*

*1. घर ही पहला गुरुकुल -* 
माता, पिता, भाई ही गुरु होते थे। मनु ने लिखा है - माता 1000 पिताओं से बड़ी आचार्य है। लड़की को पाकशास्त्र, आयुर्वेद, संगीत, गणित, धर्मशास्त्र माँ सिखाती थी। पिता वेदांग।

*2. अंतःपुर की शिक्षा -*
राजघरानों और श्रेष्ठी परिवारों में आचार्य घर आकर पढ़ाते थे। इसे अंतःपुर-शिक्षा कहते थे। कालिदास के नाटकों में शकुंतला, मालविका सब पढ़ी-लिखी हैं।

*3. पति ही गुरु -*
विवाह के बाद पति को गुरु माना गया। याज्ञवल्क्य ने मैत्रेयी को घर में ही ब्रह्मज्ञान दिया। यही परम्परा बाद में "पति ही पत्नी का गुरुकुल है" बन गई।

*4. कन्या गुरुकुल भी थे -*
पूरी तरह बंद नहीं थे। जैन और बौद्ध काल में भिक्षुणी संघ थे, जहाँ स्त्रियाँ रहकर पढ़ती थीं। विजयनगर साम्राज्य में कन्या पाठशालाओं के शिलालेख मिलते हैं।

तो सार यह है - वैदिक आदि काल में स्त्रियाँ गुरुकुल जाती थीं, बराबरी से वेद रचती थीं। बाद में सुरक्षा और सामाजिक कारणों से शिक्षा का स्थान गुरुकुल से घर में शिफ्ट हो गया, शिक्षा बंद नहीं हुई, उसका रूप बदल गया।