Thursday, 23 July 2026

रॉन्डा बर्न (Rhonda Byrne) की विश्व प्रसिद्ध पुस्तक 'द सीक्रेट'

रॉन्डा बर्न (Rhonda Byrne) की विश्व प्रसिद्ध पुस्तक 'द सीक्रेट'मुख्य रूप से आकर्षण के नियम पर आधारित है। यह पुस्तक बताती है कि हमारे विचार हमारे जीवन को कैसे आकार देते हैं।
इस पुस्तक की सबसे मुख्य और रहस्यमयी बातें निम्नलिखित हैं:
 1. आकर्षण का नियम ,मूलमंत्र:--"जैसा आप सोचते हैं, वैसा ही आप आकर्षित करते हैं।"
  यह ब्रह्मांड का सबसे शक्तिशाली नियम है। इसके अनुसार, आपकी भावनाएं और आपके विचार एक चुंबक की तरह काम करते हैं। आप जिस भी चीज़ के बारे में लगातार सोचते हैं (चाहे वह अच्छी हो या बुरी), वैसी ही परिस्थितियां और लोग आपके जीवन में खिंचे चले आते हैं।
2. ब्रह्मांड एक कैटलॉग की तरह है --
 इच्छा मांगना:-- ब्रह्मांड एक बड़े मेल-ऑर्डर कैटलॉग की तरह है। आप जो चाहते हैं, उसका ऑर्डर (इच्छा) ब्रह्मांड को देते हैं।
   1. मांगें :--स्पष्ट रूप से तय करें कि आप क्या चाहते हैं।
   2. विश्वास करें :-- ऐसा महसूस करें कि वह चीज़ आपको पहले ही मिल चुकी है।
   3. प्राप्त करें :- उस चीज़ को पाकर जो खुशी आपको होगी, उसे अभी महसूस करें।

 विचारों में ऊर्जा होती है-
  आपके हर एक विचार की एक आवृत्ति  होती है। जब आप कोई विचार सोचते हैं, तो वह ब्रह्मांड में जाता है और अपनी जैसी ही समान आवृत्तियों को चुंबक की तरह अपनी ओर खींचता है।
 सकारात्मकता:-- यदि आप किसी नकारात्मक चीज़ से बचने के बारे में भी बार-बार सोचते हैं, तो आप अनजाने में उसी नकारात्मक चीज़ को आकर्षित कर रहे होते हैं। इसलिए, हमेशा इस बात पर ध्यान दें कि आप *क्या चाहते हैं*, न कि इस पर कि आप *क्या नहीं चाहते*।
 4. कृतज्ञता की शक्ति ,धन्यवाद देना:-- यह जीवन को बदलने का सबसे तेज़ तरीका है। जो चीज़ें आपके पास वर्तमान में हैं, उनके प्रति आभार व्यक्त करना ब्रह्मांड को यह संकेत देता है कि आपके पास और अधिक अच्छी चीज़ें भेजी जानी चाहिए।
 चमत्कार:-- जब आप छोटी से छोटी चीज़ के लिए भी शुक्रगुजार होते हैं, तो आपके जीवन में और अधिक सुख, समृद्धि और आनंद के द्वार खुल जाते हैं।
 मानसिक अभ्यास:-- अपनी आँखें बंद करें और कल्पना करें कि आपकी इच्छा पूरी हो चुकी है। उस पल की खुशियों, महक और अनुभवों को महसूस करें।
  जब आप मन में किसी चीज़ का स्पष्ट चित्र बना लेते हैं और उसे पूरी शिद्दत से महसूस करते हैं, तो आपकी अवचेतन मन की शक्ति उसे वास्तविकता में बदलने के लिए रास्ते तलाशने लगती है।
 "आप अपने जीवन के रचयिता खुद हैं।" 'द सीक्रेट' का सबसे बड़ा रहस्य यह सिखाता है कि अपनी सोच को बदलकर, सकारात्मक भावनाओं को अपनाकर और ब्रह्मांड पर अटूट विश्वास रखकर आप अपने भाग्य को पूरी तरह बदल सकते हैं।
 आपकी भावनाएं इस बात का सबसे सटीक पैमाना हैं कि आप इस समय क्या आकर्षित कर रहे हैं।
  यदि आप खुशी, उत्साह, प्यार या कृतज्ञता महसूस कर रहे हैं, तो आप सही दिशा में हैं और अच्छी चीजें आकर्षित कर रहे हैं। यदि आप निराश, गुस्सा या दुखी महसूस कर रहे हैं, तो आप अपनी ऊर्जा को गलत दिशा में लगा रहे हैं।
  अगर आपका मूड खराब है, तो उसे तुरंत बदलें—कोई पसंदीदा गाना सुनें, हँसे, या किसी अच्छी बात के बारे में सोचें। खराब भावना को अच्छे में बदलना ही आकर्षण की दिशा बदलना है।
ज्यादातर लोग इस डर से जीते हैं कि पैसे, प्यार, या सफलता की कमी है। 'द सीक्रेट' सिखाता है कि यह ब्रह्मांड अनंत  है। यहाँ हर किसी के लिए प्रचुर मात्रा में सब कुछ मौजूद है।
  जब आप दूसरों को सफल या अमीर होते देख कर खुश होते हैं, तो आप ब्रह्मांड को यह संदेश देते हैं कि आप भी उसी प्रचुरता का हिस्सा बनना चाहते हैं। इसके विपरीत, ईर्ष्या की भावना आपको उस चीज़ से दूर कर देती है जो आप पाना चाहते हैं।
अगर आप पैसे की कमी से जूझ रहे हैं, तो आप धन को आकर्षित नहीं कर सकते, क्योंकि "कमी का अहसास" और अधिक कमी को ही खींचता है।
 अपने पास मौजूद थोड़े से पैसों के लिए भी धन्यवाद दें। जब आप महसूस करते हैं कि "मेरे पास पर्याप्त है" या "पैसा आसानी से मेरे पास आता है," तो धन की ऊर्जा आपकी ओर प्रवाहित होने लगती है। बिलों का भुगतान भी खुशी और आभार के साथ करें कि आपने उन सेवाओं का लाभ उठाया।
  दूसरों से प्यार पाने या उन्हें बदलने से पहले आपको खुद से प्यार करना होगा। यदि आप अपने अंदर कमियाँ निकालते रहेंगे, तो आप ऐसे लोग आकर्षित करेंगे जो आपकी आलोचना करें।
  रिश्तों को सुधारने का नियम यह है कि आप सामने वाले की कमियों या गलतियों पर ध्यान देने के बजाय, उनकी खूबियों और अच्छी बातों की सूची बनाएं। आप जिस चीज़ पर ध्यान देंगे, वह गुण और अधिक बढ़ता जाएगा।
 प्लेसीबो प्रभाव :--- शरीर खुद को ठीक करने की अद्भुत क्षमता रखता है। अगर कोई व्यक्ति यह मान ले कि वह ठीक हो रहा है (या उसे सिर्फ एक साधारण गोली दी जाए और वह समझे कि यह दवा है), तो उसका शरीर सचमुच ठीक होने लगता है।
  किसी बीमारी से लड़ने या उसके बारे में लगातार बात करने से बीमारी और मजबूत होती है। इसके बजाय, पूरी तरह से "स्वस्थ" होने की स्थिति पर ध्यान केंद्रित करें और महसूस करें कि आपका शरीर पूरी तरह से निरोगी है।
 आप केवल यह शारीरिक शरीर नहीं हैं, बल्कि आप एक ऊर्जावान प्राणी हैं जो ब्रह्मांड की ऊर्जा से जुड़ी हुई है।
 जब आप शांत होते हैं, ध्यान करते हैं और खुद से जुड़ते हैं, तो आपको अपनी असली शक्ति का अहसास होता है। आप ब्रह्मांड का ही एक रूप हैं, और जो शक्ति ब्रह्मांड को चला रही है, वही आपके भीतर भी है।
 समय सिर्फ एक बाधा है:-- हम अक्सर सोचते हैं कि हमारी इच्छा पूरी होने में समय क्यों लग रहा है। 'द सीक्रेट' के अनुसार, ब्रह्मांड के लिए बड़ी या छोटी कोई इच्छा नहीं होती। दस लाख डॉलर को आकर्षित करना उतना ही आसान है जितना कि एक कप कॉफी को।
  इच्छा पूरी होने में इसलिए देरी होती है क्योंकि हम बीच में संदेह , अविश्वास या डर ले आते हैं। जब आप अपनी इच्छा को लेकर सौ प्रतिशत आश्वस्त हो जाते हैं और उसमें कोई संशय नहीं रखते, तो वह तुरंत प्रकट हो सकती है। ब्रह्मांड आपके विश्वास की गति के अनुसार काम करता है।
  पुस्तक का एक बहुत ही आध्यात्मिक पहलू यह है कि आप इस ब्रह्मांड की उस महान शक्ति  से अलग नहीं हैं, बल्कि उसका एक हिस्सा हैं।
 जब आप यह समझ जाते हैं कि आपके भीतर वही ऊर्जा काम कर रही है जो पूरे ब्रह्मांड को चलाती है, तो आपके अंदर हीन भावना या डर खत्म हो जाता है। आप खुद को अपने जीवन का सर्वेसर्वा और भगवान का एक रूप महसूस करने लगते हैं।
 आप केवल 'वर्तमान'  में ही ऊर्जा पैदा कर सकते हैं। यदि आप अपने अतीत की असफलताओं या भविष्य की चिंताओं में उलझे रहते हैं, तो आप वर्तमान की शक्ति को खो देते हैं।
  यदि आप भविष्य में अमीर या खुश होना चाहते हैं, तो उसकी शुरुआत आपको अभी से करनी होगी। आपको वर्तमान क्षण में ही अमीर और खुश महसूस करना होगा, क्योंकि ब्रह्मांड भविष्य की नहीं बल्कि आपके वर्तमान विचारों और भावनाओं की प्रतिक्रिया देता है।
  हमारे दिमाग में रोजाना हजारों विचार आते हैं, जिनमें से ज्यादातर नकारात्मक या बेकार होते हैं। ध्यान वह जरिया है जो आपके विचारों को थामता है।
 जब आप ध्यान के जरिए अपने मन को शांत करते हैं, तो आप ब्रह्मांड की ऊर्जा से सीधे जुड़ जाते हैं। यह आपको मानसिक स्पष्टता देता है और आपके लिए सही फैसले लेना आसान बनाता है। दिन में केवल कुछ मिनट का मौन आपके पूरे जीवन को बदल सकता है।
 खुशी ही सबसे बड़ा मार्गदर्शक है: 'द सीक्रेट' का सबसे सरल और गहरा संदेश यह है कि "जो आपको सबसे ज्यादा खुशी दे, वही करें।"
 जब आप अपनी पसंद का काम करते हैं और हर पल आनंदित रहते हैं, तो आपकी ऊर्जा का स्तर सबसे ऊंचा होता है। इस उच्च ऊर्जा  की स्थिति में आप जो भी चाहते हैं, वह चुंबक की तरह आपकी तरफ खिंचा चला आता है। आनंद में रहना ही जीवन का सबसे बड़ा रहस्य है।

रॉन्डा बर्न (Rhonda Byrne) एक विश्व प्रसिद्ध ऑस्ट्रेलियाई लेखिका, टेलीविज़न निर्माता और उद्यमी हैं। उन्हें मुख्य रूप से उनकी क्रांतिकारी पुस्तक 'द सीक्रेट' (The Secret)और इसी नाम से बनी डॉक्यूमेंट्री फिल्म के लिए जाना जाता है, जिसने पूरी दुनिया में लाखों लोगों के जीवन को देखने का नजरिया बदल दिया।
 जन्म:-- रॉन्डा बर्न का जन्म 12 मार्च 1945 को ऑस्ट्रेलिया के मेलबर्न शहर में हुआ था।
 टेलीविज़न निर्माता:--'द सीक्रेट' लिखने से पहले, वह ऑस्ट्रेलिया में एक सफल टेलीविज़न निर्माता थीं। उन्होंने कई लोकप्रिय टीवी शो और वृत्तचित्र बनाए, जिससे मीडिया जगत में उनकी अच्छी पहचान बनी।
 जीवन का संकट:-- साल 2004 का दौर रॉन्डा के जीवन में बेहद कठिन था। उनके पिता का अचानक निधन हो गया था, वह व्यावसायिक रूप से भारी तनाव में थीं और उनका मानसिक व शारीरिक स्वास्थ्य भी बहुत बिगड़ चुका था।
 बदलाव का मोड़:--इस गहरी निराशा के दौर में उनकी बेटी ने उन्हें वॉटसन डी. वाटल्स की 1910 की एक पुरानी पुस्तक 'द साइंस ऑफ गेटिंग रिच' (The Science of Getting Rich) पढ़ने के लिए दी।
 उस किताब को पढ़ने के बाद रॉन्डा के मन में जिज्ञासा जागी कि दुनिया के इतिहास के महानतम लोगों (जैसे आइंस्टीन, बीथोवेन, प्लेटो) ने सफलता के किन नियमों का पालन किया था। उन्होंने दुनिया भर के धर्मों, दर्शन और इतिहास में छिपे आकर्षण के नियम (Law of Attraction) पर गहरी खोजबीन शुरू की।
 'द सीक्रेट' फिल्म और पुस्तक की सफलता (2006)
 डॉक्यूमेंट्री फिल्म:--अपनी खोज और दुनिया भर के आधुनिक विचारकों व गुरुओं के साक्षात्कारों को मिलाकर उन्होंने 2006 में 'द सीक्रेट' नाम से एक डॉक्यूमेंट्री फिल्म रिलीज़ की, जो ग्लोबल हिट साबित हुई।
 इसी वर्ष (2006) उन्होंने इसी नाम से पुस्तक भी प्रकाशित की। यह किताब रिलीज़ होते ही इतिहास की सबसे ज्यादा बिकنے वाली किताबों में शामिल हो गई। इसका अनुवाद दुनिया की दर्जनों भाषाओं में हो चुका है और करोड़ों कॉपियां बिक चुकी हैं।
'द सीक्रेट' की अपार सफलता के बाद रॉन्डा बर्न ने इसी श्रृंखला में कई अन्य बेहतरीन पुस्तकें लिखीं, जो व्यक्तिगत विकास और आध्यात्मिकता पर आधारित हैं:
 द पावर (The Power - 2010):--इसमें बताया गया है कि ब्रह्मांड की सबसे बड़ी शक्ति 'प्रेम' (Love) है और कैसे भावनाएं हमारे जीवन को संचालित करती हैं।
 द मैजिक (The Magic - 2012):-- यह पुस्तक पूरी तरह से 'कृतज्ञता' (Gratitude) और 28 दिनों के जादुई अभ्यासों पर आधारित है।
 हीरो (Hero - 2013):--इसमें बारह सफल हस्तियों के जीवन के संघर्ष और सफलता के रास्ते को दिखाया गया है।
 द ग्रेटेस्ट सीक्रेट (The Greatest Secret - 2020):-- यह पुस्तक भौतिक आकर्षण के नियम से आगे बढ़कर गहरे आध्यात्मिक सत्य और आंतरिक शांति  को प्राप्त करने पर जोर देती है।
 टाइम मैगजीन:--2007 में 'टाइम' (Time) पत्रिका ने रॉन्डा बर्न को दुनिया के 100 सबसे प्रभावशाली लोगों की सूची में शामिल किया था।
  उन्हें आधुनिक समय में 'आकर्षण के नियम' को आम जनमानस तक पहुँचाने और लोगों को सकारात्मक सोच व जीवन जीने की प्रेरणा देने के लिए दुनिया भर में याद किया जाता है

औपनिषदिक ज्ञान बनाम यूरोपीय रेनेसां:

औपनिषदिक ज्ञान बनाम यूरोपीय रेनेसां:

प्राचीन भारतीय ज्ञान को मानव जाति की सर्वोच्च उपलब्धि मानने में वर्तमान बौद्धिकों को भले ग्लानि हो रही हो किंतु पश्चिमी दार्शनिकों को इस सच्चाई को स्वीकार करने में कोई संकोच नहीं था।
जिन दार्शनिकों ने भारतीय संस्कृति की भूरि-भूरि प्रशंसा की उनमें जर्मन दार्शनिक फ्रेडरिक वोन श्लेगल और आर्थर शोपेनहावर प्रमुख हैं। इसी परंपरा में महान रूसी उपन्यासकार टाल्सटाय भी आते हैं ।

1808 में श्लेगल ने भारतीय ज्ञान की प्रशंसा में एक किताब लिखी थी, जिसका नाम ' आन द लैंग्वेज एंड विज्डम आफ इंडियन्स ( On the Language and Wisdom of the Indians) है।
 विदित हो कि उन्होंने उपनिषदों में निहित ज्ञान की तुलना यूरोप के रेनेसां से की थी। फलत: विदेशों में यूरोपीय विचारकों के बीच हिंदू धर्म और संस्कृत साहित्य के प्रति भारी जिज्ञासा पैदा हो गई। इनके अध्ययन के लिए यूरोप के विश्वविद्यालयों में इंडोलोजी विभाग तक खुल गए। अपने भाई की सहायता से स्वयं श्लेगल ने संस्कृत भाषा का प्रेस खोला।
उनका मानना था कि विश्व की सभी भाषाओं की जननी संस्कृत है तथा दुनिया की सभी सभ्यताओं ने राजनीतिक गठन के तौर तरीके भारत से सीखे।

 शोपेनहावर ने तो यहां तक कह दिया कि उपनिषदों के अध्ययन से अधिक कल्याणकारी और उत्थान प्रवण दुनिया में कोई दूसरा ग्रंथ नहीं है। वेद , उपनिषद और श्रीमद्भागवत के बारे उनकी उक्ति बहुत प्रेरणास्पद है।
 उनका मानना था कि ये ग्रंथ मानव बुद्धि की उच्चतम अभिव्यक्ति हैं । अपने इस विचार को उन्होंने 'वर्ल्ड ऐज विल एंड रिप्रेजेंटेशन ' में कलम बद्ध किया है। 
बताते चलें कि भारतीय ज्ञान परंपरा को यूरोप तक पहुंचाने में मुसलमानों का हाथ रहा है। इस्लामिक विद्वानों ने ही पहले उपनिषदों का अनुवाद फारसी में किया था। दारशिकोह के शासन काल में यह कार्य संपन्न हुआ था।
  फिर उपनिषद फारसी से लैटिन भाषा में अनुदित हुए। शोपेनहावर ने जिस भाषा में उपनिषदों को पढ़ा , वह लैटिन भाषा ही थी। दरअसल उपनिषदों का लैटिन में अनुवाद फ्रांस के एक विद्वान ने किया था।
 शोपेनहावर उक्त ग्रंथों से इतने अविभूत थे कि उन्होंने यह विश्वास व्यक्त किया था कि भारतीय ज्ञान एक न एक दिन पश्चिम में प्रवाहित होगा और यूरोपीय विचारों और संस्कृति में मौलिक बदलाव लाएगा । विडंबना है कि उसी ज्ञान और दार्शनिक परंपरा को हम कीड़ा -मकोड़ा समझते हैं। 

एक ओर विदेशी धरती की ओर से भारतीय ज्ञान की इतनी अभिपुष्टि और इतना सम्मान और दूसरी ओर भारतीय माटी से इस ज्ञान का इस रूप में खंडन व अपमान, यह समझ से परे है! 
पर ज्ञान है क्या? 
ज्ञान कोई दिखाई पड़ने वाली चीज नहीं है। यह फुदकने वाली कोई चिड़िया नहीं है। बल्कि यह चीजों के बारे में आंतरिक समझ को व्यक्त करने वाला एक प्रत्यय ( आइडिया ) और प्रत्ययों का समूह है जो शाब्दिक अभिव्यक्ति पाकर एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति तक तथा एक समाज के दूसरे समाज तक संचरित होता है।

दृष्टांत के तौर पर वेदांत और उपनिषदों की यह स्थापना कि' सभी चीजों में ईश्वर या परमात्मा का अंश है ' , एक ज्ञान है जिसका सहज संदेश यह है कि संसार के चर- चराचर सभी प्राणियों व पदार्थो के प्रति हमें आदर का भाव रखना चाहिए व उनसे प्रेम करना चाहिए।
दूसरी ओर बाइबल के पूराने विधान ( ओल्ड टेस्टामेंट) का यह प्रावधान भी एक ज्ञान है कि दुनिया के सभी चर चराचर पदार्थ मनुष्य और खासकर पुरुषों के उपभोग के लिए ईश्वर द्वारा बनाए गए हैं। बाइबल के जेनेसिस नामक किताब ( अध्याय) में यह विचार देखा जा सकता है।   
बाइबल के इसी अध्याय में यह भी लिखा है कि औरतें पुरषों के मनोरंजन के लिए बनाई गई हैं। 
एक तरफ ' तेन त्यक्तेन भुंजीथा:" ईशावास्य उपनिषद का श्लोक है जहां त्याग के साथ भोग करने की शिक्षा है वही बाइबल हमें मह सिखाता है कि दुनिया खाकर- पीकर हजम करने के लिए है। स्त्रियों पर पुरूष वर्चस्व ही नहीं, सामी धर्म के राजनीतिक वर्चस्व की जड़ भी बाइबिल के पुराने विधान में है।

सवाल है कि कौन सा ज्ञान मनुष्योचित है? भारत का वह ज्ञान जहां स्त्री अर्धनारीश्वर के रूप में समता की अधिकारी है या वह जहां स्त्री पुरूषों के लिए केवल मौज- मस्ती की वस्तु है। 
आप कहेंगे कि भारत में भी तो स्त्रियों की दुर्दशा है। यहां तो स्त्रियां यूरोप से भी तुच्छ अवस्था में हैं। हां, हो सकती हैं पर मैं बात वर्तमान यथार्थ की नहीं कर रहा हूं, बल्कि बात उस कसौटी की कर रहा हूं, जिसे हमने जाने- अनजाने पीछे धकेल दिया है। 
कसौटी निखारने से निखरती है। यह निरंतर व्याख्या से संवरती और दैनिक जीवन में उतरती है। 
क्या वर्ग संघर्ष के विचारों का संश्रव भारतीय मार्क्सवादियों के मानस में एक दिन में हुआ है या दशकों के प्रचार-प्रसार से यह संभव हुआ ? 
वस्तुत: जब शोपेनहावर यूरोपीय संस्कृति में मौलिक बदलाव की बात करते हैं तो उनका संदर्भ यही है।
 यह सन्दर्भ महान विचारक और उपन्यासकार लियो टाल्सटाय तक आते-आते कितना खुल कर सामने आ जाता है, यह उनके लेखन और उनके अपने जीवन में स्पष्ट झलकता है।

 टॉलस्टॉय कुलीन घराने से आते थे। हजारों दास थे और अपार संपत्ति थी। परंतु उनपर उपनिषद, श्रीमद्भागवत और वेदांत का प्रभाव इस कदर हुआ कि उन्होंने स्वेच्छा से न केवल दरिद्रता का जीवन अपनाया बल्कि इसके प्रवक्ता बन गए।

स्वेच्छा से दरिद्रता अपनाने की बात हमें अटपटी लग सकती है, पर यह ज्ञान भारतीय जीवन दर्शन का अभिन्न अंग है और कई- कई आदर्शों में यह एक प्रमुख आदर्श है। और आदर्श अटपटे ही होते हैं।
वस्तुत: मनुष्यता और इंसानियत की रट लगाने से हम मनुष्य नहीं बन जाएंगे। उसके लिए आदर्श प्रस्तुत करने पड़ते हैं।
 जब महर्षि याग्यबल्क्य अपनी पत्नी मैत्रेयी को सांसारिक संपत्ति सौंपने लगे तो मैत्रेयी ने कहा कि जो धन और ऐश्वर्य आदमी को मनुष्य न रहने दे, वह लेकर हमें क्या करना है।
"तवैव वाहास्तव नृत्यगीते , 
येनाहं नामृता स्यां किमहं तेन कुर्याम।"

 दरअसल दरिद्रता अभिशाप तब है जब किसी पर आरोपित की जाए, किंतु जब इसे अपनी इच्छा से अंगीकार किया जाय तो यह एक मानवीय आदर्श बन जाता है। स्वार्थ और कर्तव्य के बीच द्वंद्व में कर्तव्य की जीत ही आदर्श है।

 दरिद्रता एक बरदान भी है क्योंकि यह धन- दौलत, यश और पैसे के प्रलोभन से हमें रोकती है। हमारे सामने इसके अनन्य उदाहरण हैं किंतु हम टाल्सटाय का ही अभी उल्लेख करते हैं।

टॉलस्टॉय पहले माशांहारी थे, वे शाकाहारी बन गए। दासों को मुक्त कर दिया और एक परीब्राजक का जीवन अपना लिया। वे एक ईसाई थे तथा ईसा मसीह द्वारा दिए गये " सरमन आफ दि माउंट" को ईसाई धर्म की रीढ़ मानते थे किंतु नए तरीके का जो जीवन टाल्सटाय ने अपनाया , उसकी प्रेरणा उन्होंने बाइबल से नहीं ली बल्कि भारतीय जीवन दर्शन और उपनिषदों से ली।

 गौरतलब है कि अहिंसा में श्रद्धा रखने और चर्च के बर्चस्ववादी रूप की भर्त्सना के कारण उन्हें 1901 में चर्च से निष्कासित कर दिया गया। दरअसल स्वामी विवेकानंद की शिक्षाओं और भाषणों को सुनने और उनकी पुस्तकों के अध्ययन से रूढ़िवादी ईसाई धर्म से टाल्सटाय का मोहभंग हो गया था । 
गरज यह कि हमने बाइबल और पश्चिम के उपभोगवादी दर्शन को हृदयंगम कर लिया है, हम अचानक वेदांत और उपनिषदों द्वारा विहित त्याग और मूल्यों पर आधारित जीवन अख्तियार करने से रहे किन्तु उन ग्रंथों को अपमानित करने तथा भारतीय ज्ञान परंपरा को कोसने की अपनी धृष्टता पर थोड़ा अंकुश तो लगा ही सकते हैं!


आञ्जनेय हनुमान

आञ्जनेय
१. अञ्जना माता-आञ्जनेय का सामान्य अर्थ है अञ्जना माता के पुत्र हनुमान्। भारत के ९ स्थानों को अञ्जना का निवास कहा जाता है-(१) हरियाणा का कैथल (कपिस्थल), (२) अयोध्या का हनुमानगढ़ी, (३) राजस्थान का सुजानगढ़, (४) झारखण्ड के गुमला में अञ्जन गुफा, (५) गुजरात के डांग जिले में अञ्जनी गुफा, (६) महाराष्ट्र के नासिक के निकट अञ्जनेरी गांव, (७) कर्णाटक में हम्पी के निकट आञ्जनेयाद्रि, (८) तिरुपति में अञ्जनाद्रि, (९) ओड़िशा में खोर्धा के निकट जरीपुट (पुट का अर्थ पठार, या ऊंची समतल भूमि)।
तिरुपति से प्रकाशित पराशर संहिता के अनुसार मनुष्य रूप में हनुमान् के ९ अवतार थे।
२. हनुमान् के अर्थ-
(१) मनुष्य- पराशर संहिता के अनुसार उनके मनुष्य रूप में ९ अवतार हुये थे।
(२) योगी, विद्वान्-आध्यात्मिक अर्थ तैत्तिरीय उपनिषद् में दिया है-दोनों हनु के बीच का भाग ज्ञान और कर्म की ५-५ इन्द्रियों का मिलन विन्दु है। जो इन १० इन्द्रियों का उभयात्मक मन द्वारा समन्वय करता है, वह हनुमान् है।
तैत्तिरीय उपनिषद् शीक्षा वल्ली, अनुवाक् ३-अथाध्यात्मम्। अधरा हनुः पूर्वरूपं, उत्तरा हनुरुत्तर रूपम्। वाक् सन्धिः, जिह्वा सन्धानम्। इत्यध्यात्मम्।
(३) ब्रह्म रूप में गायत्री मन्त्र के ३ पादों के अनुसार ३ रूप हैं-स्रष्टा रूप में यथापूर्वं अकल्पयत् = पहले जैसी सृष्टि करने वाला वृषाकपि है। मूल तत्त्व के समुद्र से से विन्दु रूपों (द्रप्सः -ब्रह्माण्ड, तारा, ग्रह, -सभी विन्दु हैं) में वर्षा करता है वह वृषा है। पहले जैसा करता है अतः कपि है। अतः मनुष्य का अनुकरण करने वाले पशु को भी कपि कहते हैं। तेज का स्रोत विष्णु है, उसका अनुभव शिव है और तेज के स्तर में अन्तर के कारण गति मारुति = हनुमान् है। वर्गीकृत ज्ञान ब्रह्मा है या वेद आधारित है। चेतना विष्णु है, गुरु शिव है। उसकी शिक्षा के कारण जो उन्नति होती है वह मनोजव हनुमान् है। 
तत्र गत्वा जगन्नाथं वासुदेवं (देवदेवं) वृषाकपिं। 
पुरुषं पुरुष सूक्तेन उपतस्थे समाहिताः॥ (भागवत पुराण, १०/१/२०)
तद् यत् कम्पायमानो रेतो वर्षति तस्माद् वृषाकपिः, तद् वृषाकपेः वृषाकपित्वम्। (गोपथ ब्राह्मण उत्तर, ६/१२)
आदित्यो वै वृषाकपिः। ( गोपथ ब्राह्मण उत्तर, ६/१०), स्तोको वै द्रप्सः। (गोपथ ब्राह्मण उत्तर, २/१२)
पहले जैसी सृष्टि-सूर्याचन्द्रमसौ धाता यथापूर्वं अकल्पयत् (ऋक्, १०/१९०/३) 
(४) महावीर-वीर = जो शत्रु को दूर करे, विक्रमी। सीमा स्थान को भी वीर कहते हैं-जैसे मत्स्य राज्य की सीमा वीरमत्स्य जहां केकय से आते समय भरत रुके थे। रक्षा करने वाला पति, पुत्र, या यज्ञ रक्षक-अवीरा निष्पतिसुता (अमरकोष, २/६/११)। विष्णु का एक नाम-(विष्णु सहस्रनाम, ४०१, ६४३, ६५८)। ’वीरभोग्या वसुन्धरा’ अर्थ में राजा द्वारा दी गयी जागीर (ओड़िशा में) या सम्पत्ति का उत्तराधिकारी अर्थ में बड़ा भाई। महावीर का अर्थ है- विष्णु की सीमा, जैन मत में तीर्थंकर परम्परा की सीमा महावीर। अतः महावीर हनुमान् के हृदय में विष्णु अवतार श्रीराम हैं। ब्रह्माण्ड की सीमा पर ४९वां मरुत् है। ब्रह्माण्ड केन्द्र से सीमा तक गति क्षेत्रों का वर्गीकरण मरुतों के रूप में है। अन्तिम मरुत् की सीमा हनुमान् है। इसी प्रकार सूर्य (विष्णु) के रथ या चक्र की सीमा हनुमान् है। ब्रह्माण्ड विष्णु के परम-पद के रूप में महाविष्णु है। 
(५) हारियोजन -२ प्रकार की सीमाओं को हरि कहते हैं-पिण्ड या मूर्त्ति की सीमा ऋक् है,उसकी महिमा साम है-ऋक्-सामे वै हरी (शतपथ ब्राह्मण, ४/४/३/६)। पृथ्वी सतह पर हमारी सीमा क्षितिज है। उसमें २ प्रकार के हरि हैं-वास्तविक भूखण्ड जहां तक दृष्टि जाती है, ऋक् है। वह रेखा जहां राशिचक्र से मिलती है वह साम हरि है। इन दोनों का योजन शतपथ ब्राह्मण (४/४/३) में बताया है, अतः इसको हारियोजन ग्रह कहते हैं। हारियोजन से होराइजन हुआ है। हारियोजन या पूर्व क्षितिज रेखा पर जब सूर्य आता है, उसे बाल सूर्य कहते हैं। मध्याह्न का युवक और सायं का वृद्ध है। इसी प्रकार गायत्री के रूप हैं। जब सूर्य का उदय दीखता है, उस समय वास्तव में उसका कुछ भाग क्षितिज रेखा के नीचे रहता है और वायुमण्डल में प्रकाश के वलन के कारण दीखने लगता है। सूर्य सिद्धान्त में सूर्य का व्यास ६५०० योजन कहा है, यह भ-योजन = २७ भू-योजन = प्रायः २१४ किमी. है। इसे सूर्य व्यास १३,९२,००० किमी. से तुलना कर देख सकते हैं। वलन के कारण जब पूरा सूर्य बिम्ब उदित दीखता है तो इसका २००० योजन भाग (प्रायः ४,२८,००० किमी.) हारियोजन द्वारा ग्रस्त रहता है। इसी को कहा है-बाल समय रवि भक्षि लियो ...)। इसके कारण ३ लोकों पृथ्वी का क्षितिज, सौरमण्डल की सीमा तथा ब्रह्माण्ड की सीमा पर अन्धकार रहता है। यहां युग सहस्र का अर्थ युग्म-सहस्र = २००० योजन है जिसकी इकाई २१४ कि.मी. है।
अथ हारियोजनं गृह्णाति । छन्दांसि वै हारियोजनश्चन्दांस्येवैतत्संतर्पयति तस्माद्धारियोजनं गृह्णाति (शतपथ ब्राह्मण, ४/४/३/२) 
एवा ते हारियोजना सुवृक्ति (ऋक्, १/६१/१६, अथर्व, २०/३५/१६) 
(६) सुनर -मूल वैदिक शब्द सु-नर था जिससे लौकिक शब्द सुन्दर हुआ है। सु = अच्छा, समन्वय, मिला हुआ। दुः = अलग-अलग, असम्बद्ध। जैसे सुख-दुःख।
सु-नर = अच्छा नर, जो लोगों को मिलाये। जैसे इसाई विवाह में पति-पत्नी को मिलाने वाला सु-नर (Best man) कहलाता है।
वेद में सुनर वह है जो पति-पत्नी, भक्त भगवान् को मिला दे। वैदिक रूप-सूनर, सूनरी।
यो वाधते ददाति सूनरं वसु (ऋक्, १/४०/४), वि दाशुषे भजति सूनरं वसु (ऋक्, ५/३४/७)
आ घा योषेव सूनरी, उषा याति प्रमुञ्चती (ऋक्, १/४८/५), ज्योतिष्कृणोति सूनरी (ऋक्, ७/८१/१)
रामायण में हनुमानजी सीता-राम को मिलाने के लिए दूत बने, भक्त विभीषण या शत्रु पक्ष के व्यक्ति को भगवान् राम से मिलाया तथा परस्पर विरोधी सुग्रीव तथा अंगद को भी राम से मिलाया। 
सु-नर हनुमान का चरित्र वर्णन होने के कारण इस अध्याय को सुन्दर काण्ड कहते हैं।
३. सृष्टि क्रम- 
(१) सन्दर्भ-यह पं मधुसूदन ओझा और उनके शिष्य पं मोतीलाल शास्त्री की पुस्तकों के आधार पर है जिसका सारांश मेरी पुस्तक ’पुरुष सूक्त’ में है।
ब्रह्म सिद्धान्त-पं. मधुसूदन ओझा-सृष्टि के मूलतत्त्व रस का ६ स्तरों में विभाजन-अधिकरण २-३५
भारतीय हिन्दू मानव और उसकी भावुकता-पं मोतीलाल शास्त्री-पृ २५७-२७७
गीता विज्ञान भाष्य-बुद्धियोग परीक्षा, खण्ड १-पं मोतीलाल शास्त्री-प्रकरण १-स्तम्भ २-योगेश्वर का तात्त्विक स्वरूप-पृ. ३१-८७
https://archive.org/details/@madhusudanojha
https://shankarshikshayatan.org/
पुरुष सूक्त-अरुण कुमार उपाध्याय-अध्याय २-पारा ११-१५
https://archive.org/details/PurushaSukta_201311
(२) परात्पर से विविधता-परात्पर ब्रह्म को रस (द्रव के समान समरूप पदार्थ) कहा गया है, जो अविभाज्य है। इसके साषात से आनन्द होता है, अतः इसे आनन्द भी कहते हैं (तैत्तिरीय उपनिषद्, २/७/२)। रस के भीतर स्पन्दन या कम्पन होते रहते हैं, जिनको बल कहते हैं। बल के विभिन्न स्तरों के कारण इनके ३-३ वर्ग हैं-
१. अमृत-(क) शान्ति-बल की सुप्त या निष्क्रिय अवस्था।
   (ख) तृप्ति-स्वप्न के समान। यहआं रस और बल दोनों समान हैं। 
   (ग) प्रसाद (कृपा)-जाग्रत अवस्था-रस के साथ बल भी दीखता है।
२. अमृत-मृत्यु= (विश्व के १६ खण्ड)
   (क) माया (सीमा भाव)- आलम्बन या आधार पुरुष।
   (ख) कला- (मात्रा के स्तर)- स्थान मूल प्रकृत्।
   (ग) गुण (क्रिया या प्रभाव)-विभक्त प्रकृति- अलग-अलग स्थानों पर।
३. मृत्यु (विश्व की १६ प्रतिमा)-
    (क) विकार- २ पिण्डों के बीच का स्मबन्ध का कारण, कमी की पूर्ति।
   (ख) अञ्जन (रंग, दृश्य भेद)-बन्धन, पुरञ्जन- विराट् प्रजापति।
   (ग) आवरण (सीमा)-सुप्त स्थिति-पुर - विश्व प्रजापति।
प्रथम ३ रूपों का अनुभव नहीं हो सकता। अन्तिम २ वर्गों के ६ रूप परिवर्तन के ६ स्तर हैं। सभी ६ बल ६ प्रकार के परिग्रह (आवरण में बन्द करने वाले) हैं।
(३) परिग्रह-१. माया-माया २ प्रकार की है। मात्रा-बल (परिमाण का भेद) अनन्त प्रकार का है। कोष बल १६ प्रकार का है, जो वस्तुओं को अलग अलग करता है-विद्या, माया, जाया, धारा, आप्, हृदय, भूति, यज्ञ, सूत्र, सत्य, यक्ष, अभ्व, मोह, वय, वयोनाध, वयुन। (पं. मधुसूदन ओझा के ब्रह्म विज्ञान के निर्विशेष अनुवाक् से)
२. कला-बड़े छोटे का क्रम, वर्गीकरण।
३. गुण- तीन प्रकार की स्थिति। सत्त्व-एक सीमा के भीतर् रज - गति। तम-निष्क्रिय।
४. बिकार-अणुओं में परिवर्तन, यज्ञ द्वारा निर्माण।
५. अञ्जन-यह ३ प्रकार का है-विभूति-सत्त्व हुण का परिणाम। रजोगुण का परिणाम पाप्मा। तमोगुण का परिणाम-आवरण। इससेविराट् या दृश्य जगत् बनता है।, जो २ स्तरों का है-विश्व तथा व्यक्ति रूपों में।
६. आवरण- प्रति विश्व या व्यक्ति का ऊप एक आवरण में छिपा है। उसकी रचना पुर है। यह विश्व प्रजापति है।  
(४) महेश्वर से क्रम-
(क) महेश्वर- १. माया परिग्रह-मायी महेश्वर
   २. कला परिग्रह- सकल षोडशी
(ख) विश्वेश्वर- ३. गुण परिग्रह।
(ग) उपेश्वर- ४. विकार परिग्रह- सविकार यज्ञ।
(घ) ईश्वर- ५. अञ्जन परिग्रह-साञ्जन विराट्।
    ६. आवरण परिग्रह-सावरण विश्व या व्यक्ति रूप में वैश्वानर।
(५) अञ्जन, त्रिककुद्-अञ्जन रंग या गुण है। इसी अञ्जना से विराट् रूप उत्पन्न हुआ जो त्रिककुद् आवरण के भीतर व्यक्ति रूप में वैश्वानर है। यह विश्व रूप आञ्जनेय है।
भौतिक रूप में कैलास के निकट त्रिककुद् पर्वत कहा गया है। पर इस आकार का पर्वत कहीं नहीं है, न किसी पर्वत पर काले रंग का अञ्जन होता है। उपेश्वर रुद्र के बाद उसके अवतार रूप आञ्जनेय वैश्वानर हैं। अतः त्रिककुद् को कैलास के निकट अञ्जन गिरि कहा है। 
प्रकृति में काला रंग का कार्बन होता है, जिसके अणु त्रि-ककुद् (४ त्रिभुजों से घिरा) रूप के हैं। इन कार्बन परमाणुओं के संयोग से ही जैव सृष्टि होती है। आवरण से माप होने के कारण यजुर्वेद में ककुप् तथा त्रिककुप् छन्द कहा गया है (वाज. यजु, १५/४)। वृत्र का बन्धन इन्द्र वज्र से टूटने के बाद त्रिककुद् अणु अलग होते हैं।
 
(६) उद्धरण-कैलासात् पश्चिमोदीच्यां ककुद्मानौषधीगिरिः॥१४॥
ककुद्मति च रुद्रस्य उत्पत्तिश्च ककुद्मिनः। तदञ्जनं त्रैककुदं शैलं त्रिककुदं प्रति॥१५॥ (मत्स्य पुराण, १२१/१४-१५)
श्रेष्ठमाहुः त्रिककुदं अञ्जनं नित्यमेव च। (ब्रह्माण्ड पुराण, २/३/११/६७)
कैलासाद् दक्षिणे पार्श्वे क्रूर सत्त्वौषधं गिरिम्। वृत्रकायात् किलोत्पन्नं अञ्जनं त्रिककुं प्रति॥ (वायु पुराण, ४७/१३)
अथर्व वेद, सूक्त (५/९) का देवता त्रैककुदाञ्जन है। 
त्रयो दासा आञ्जनस्य तक्मा बलास आदहिः। वर्षिष्ठः पर्वतानां त्रिककुन्नाम ते पिता॥८॥
यदाञ्जनं त्रैककुदं जातं हिमवतस्परि। यातूंश्च सर्वाञ्जम्भयत् सर्वाश्च यातुधान्यः॥९॥
यदि वासि त्रैककुदं यदि यामुनमुच्यसे। उभे ते भद्रे नाम्नी ताभ्यां नः पाह्याञ्जन॥१०॥
(अथर्व, ४/९/८-१०)
आञ्जनं पृथिव्यां जातं भद्रं पुरुषजीवनम्। कृणोत्वप्रमायुकं रथजूतिमनागसम्॥३॥
देवाञ्जन त्रैककुदं परि मा पाहि विश्वतः। न त्वा तरन्त्योषधयो बाह्याः पर्वतीया उत॥६॥
(अथर्व सूक्त १९/४४-भैषज्यम्, देवता आञ्जनम्, वरुणः)
अथर्व सूक्त (१९/४५) आञ्जन सूक्त है।
अहन् अहिं पर्वते शिश्रियाणं त्वष्टास्मै वज्रं स्वयं ततक्ष।
वाश्रा इव धेनवः स्यन्दमाना अञ्जः समुद्रमव जग्मुरापः॥२॥
वृषायमाणोऽवृणीत सोमं त्रिकद्रुकेष्वपिबत् सुतस्य।
आ सायकं मगवादत्त वज्रमहन्नेनं प्रथमजा महीनाम्॥३॥
(ऋक्, १/३२/२-३)
यद्ध प्रसर्गे त्रिककुप् निवर्तत् अप द्रुहो मानुषस्य दुरो वः। (ऋक्, १/१२१/४)
इन्द्रं वै वृत्रं जघ्निवाँसं रक्षाँस्यसचन्त तानि अञ्जनगिरिणान्तरधत्त रक्षाँस्येतँ सचन्ते यो दीक्षते भवति हि यदाङ्क्ते रक्षसामन्तर्हित्या इन्द्रो वै वृत्रमहँस्तस्य चक्षुः परापतत् तत् त्रिककुभं प्राविशद् यदाङ्क्ते तस्यैव चक्षुषोऽवरुद्ध्यै द्विर्दक्षिणमाङ्क्ते सकृत् सव्यं चि (त्रि)वॄद् यज्ञो मुखत एव यज्ञं आलभते त्रिः दक्षिणमाङ्क्ते --- (काठक संहिता, २३/१)

Monday, 20 July 2026

पत्नी वामांगनी

व्रतबंधे विवाहे च जातकर्मादि कर्मसु। व्रते दाने मखे श्राद्धे पत्नी तिष्ठंति दक्षिणे।।

आशिर्वाद अभिषेके च पादप्रक्षालने तथा। भोजने शयनेचैव पत्नी वामे सदा वसेतु।।

एक लाइन में --

सर्वेषु धर्मकृत्येषु पत्नी तिष्ठति दक्षिणे।

सभी पुण्य कार्यों में जो आपको ईश्वर प्राप्ति की ओर ले जाए पत्नी सदा आपके दाहिने बैठेगी।

कन्या दान से बड़ा पुण्य और क्या हो सकता है?

एक रुपए का भी दान आप करते हैं तो आपकी पत्नी आपके दाहिने रहेगी।

Sunday, 19 July 2026

"उपनयन" जनेऊ

"उपनयन" शब्द एक संस्कारविशेष का नाम है। इसी विषय में भरद्वाज का कथन है-
"उपानयाख्यं यत्कर्म विद्यार्थं तदुदीरितम्॥"

विद्यार्थी के लिए जो संस्कार किया जाता है, वही उपनयन नाम से प्रसिद्ध है।

यह नाम व्युत्पत्तिमूलक है। इसका आधार उद्भिद्-न्याय है। भारुचि के अनुसार किसी शब्द की व्युत्पत्ति दो प्रकार की मानी जाती है- भावव्युत्पत्ति और करणव्युत्पत्ति। इसे इस प्रकार समझना चाहिए- उप का अभिप्राय समीप है। आचार्य आदि के निकट बटु को ले जाना अथवा पहुँचाना उपनयन कहलाता है। अथवा जिस साधन के द्वारा बटु को आचार्य आदि के समीप पहुँचाया जाता है, उसे भी उपनयन कहा जा सकता है।
इसी विषय को विद्वानों ने इस प्रकार कहा है-
 "गुरोर्व्रतानां वेदस्य यमस्य नियमस्य च। देवतानां समीपं वा येनासौ नीयते द्विजः॥"
जिस संस्कार के द्वारा द्विज बालक गुरु, व्रत, वेद, यम, नियम अथवा देवताओं के समीप पहुँचाया जाता है, उसी का नाम उपनयन है। इन दोनों प्रकार की व्युत्पत्तियों में भावव्युत्पत्ति ही अधिक उपयुक्त मानी जाती है, क्योंकि वही श्रौतविधि के अभिप्राय के अनुरूप है। करणव्युत्पत्ति को स्वीकार करना उचित नहीं है, क्योंकि उससे अन्य वस्तुओं पर भी 'उपनयन' शब्द का प्रयोग होने लगेगा। फिर यह भी है कि करण का निर्धारण वक्ता की इच्छा पर निर्भर रहता है; इसलिए अनेक प्रकार की कल्पनाएँ सम्भव हो जाती हैं और शास्त्र का निश्चित अभिप्राय अस्थिर हो जाता है।
उदाहरण के रूप में, यदि "जिसके द्वारा समीप ले जाया जाता है" ऐसी करणव्युत्पत्ति स्वीकार कर ली जाए, तो कभी चलना, कभी कोई व्यक्ति और कभी स्वयं आचार्य भी 'उपनयन' कहलाने लगेंगे। ऐसी स्थिति में 'उपनयन' शब्द का निश्चित आशय समाप्त हो जाएगा और अनेक शास्त्रीय विषयों में अर्थ-भ्रम उत्पन्न हो जाएगा। संस्कार किसी अन्य वस्तु का नाम नहीं हो सकता, क्योंकि उसका स्वरूप संस्कार (शुद्धि एवं योग्यता प्रदान करने की क्रिया) है। अतः पूर्व में कही गई भावव्युत्पत्ति ही अधिक संगत और ग्राह्य है। यहाँ उपनयन का अभिप्राय यह है कि आचार्य द्वारा बटु का गायत्री-मन्त्र के माध्यम से संस्कार किया जाए। इसी कारण कात्यायन ने कहा है—

"गायत्र्या ब्राह्मणमुपनयीते।"

अर्थात् कि आचार्य ब्राह्मण बालक का गायत्री-मन्त्र द्वारा उपनयन करे। इस वचन में 'ब्राह्मण' (जिसका संस्कार किया जाना है) और 'गायत्री' (जिसके द्वारा संस्कार सम्पन्न होता है) के पृथक्-पृथक् निर्देश से यह स्पष्ट हो जाता है कि 'उपनयन' शब्द का आशय केवल संस्कारविशेष ही है, किसी साधन अथवा अन्य वस्तु का नहीं।

इसी अभिप्राय को आपस्तम्ब ने भी व्यक्त किया है-
"उपनयनं विद्यार्थस्य श्रुतितः संस्कारः।।"

श्रुति के अनुसार विद्यार्थी का उपनयन एक संस्कार है। इसी उपनयन को मनु ने 'ब्रह्मजन्म' के रूप में निरूपित किया है। वे कहते हैं-

"तत्र यद् ब्रह्मजन्मास्य मौञ्जीबन्धनचिह्नितम्। 
तत्रास्य माता सावित्री 
पिता त्वाचार्य उच्यते॥"

जिस समय मौञ्जी (मुंजघास की मेखला) धारण कराकर उसका उपनयन किया जाता है, वही उसका ब्रह्मजन्म कहलाता है। उस आध्यात्मिक जन्म में सावित्री (गायत्री) उसकी माता और आचार्य उसके पिता माने जाते हैं।
इस प्रकार उपनयन केवल एक बाह्य अनुष्ठान नहीं, बल्कि ऐसा संस्कार है जिसके द्वारा बालक वेदाध्ययन, ब्रह्मचर्य और धार्मिक जीवन के लिए योग्य बनता है। इसी कारण धर्मशास्त्रों में इसे मनुष्य के आध्यात्मिक जीवन का दूसरा जन्म माना गया है।

गीता : प्रथम अध्याय श्लोक २१(१२)•

गीता : प्रथम अध्याय श्लोक २१(१२)

सेनयोरुभयोर्मध्ये"—यहाँ "उभयोः" का पहला अर्थ है सम्पूर्णता। अर्जुन आधा सत्य नहीं देखना चाहते। वे केवल कौरव-सेना नहीं देखना चाहते, केवल अपनी सेना भी नहीं देखना चाहते। वे दोनों को एक साथ देखना चाहते हैं। यह भारतीय ज्ञान-परम्परा की एक मौलिक विशेषता है। सत्य कभी एकांगी दृष्टि से नहीं मिलता। उपनिषद् बार-बार कहते हैं कि आंशिक सत्य भी कभी-कभी असत्य जितना ही खतरनाक हो सकता है। इसलिए अर्जुन का पहला आग्रह है—मुझे दोनों दिखाई दें। ध्यान दीजिए, वे अभी निर्णय नहीं माँग रहे; वे पहले पूर्ण दृश्य माँग रहे हैं। यही दर्शन का पहला संस्कार है—निर्णय से पहले समग्र-दर्शन।

"उभयोः" का दूसरा अर्थ है समान गरिमा (equal dignity)। अर्जुन यह नहीं कहते—"हमारी और उनकी सेना।" वे "उभयोः" कहते हैं। इस छोटे-से शब्द में एक विलक्षण निष्पक्षता है। वे दोनों पक्षों को समान भाषिक सम्मान देते हैं। आधुनिक नैतिक दर्शन में इसे principle of equal moral regard कहा जा सकता है। यह अत्यन्त कठिन है। युद्ध के ठीक पहले भी अर्जुन अपने प्रतिपक्ष को भाषिक रूप से अपमानित नहीं करते। वे उन्हें "दुष्ट", "पापी" या "नीच" नहीं कहते। वे केवल कहते हैं—उभयोः। यह उनकी अन्तःसंस्कृति का प्रमाण है।

"उभयोः" मनुष्य की द्विध्रुवीय चेतना (binary awareness) का संकेत है। सामान्यतः संकट के समय मनुष्य का मन एक पक्ष से चिपक जाता है। इसे आधुनिक मनोविज्ञान confirmation bias कहता है—हम केवल वही देखते हैं जो हमारे पक्ष का समर्थन करता है। अर्जुन इसके विपरीत करते हैं। वे अपने मन को बाध्य करते हैं कि वह दोनों पक्षों को देखे। यह अत्यन्त परिपक्व मानसिक प्रक्रिया है। गीता का जन्म इसलिए सम्भव हुआ क्योंकि अर्जुन केवल अपनी कथा नहीं सुनना चाहते थे; वे दूसरी कथा भी देखना चाहते थे।

भारतीय न्यायशास्त्र में किसी निष्कर्ष पर पहुँचने से पहले पूर्वपक्ष और उत्तरपक्ष दोनों का परीक्षण किया जाता है। कोई भी सिद्धान्त सीधे स्थापित नहीं किया जाता। पहले विरोधी पक्ष को उसकी पूरी शक्ति के साथ प्रस्तुत किया जाता है, फिर उत्तर दिया जाता है। "उभयोः" उसी न्याय-परम्परा का पूर्वाभास है। गीता भी पहले दोनों पक्षों को स्वीकार करती है, फिर समाधान देती है। यह भारतीय बौद्धिक ईमानदारी का अनुपम उदाहरण है।

अर्जुन केवल अपनी सेना की रक्षा के लिए चिन्तित नहीं हैं। उनका दुःख दोनों ओर फैला हुआ है। यही कारण है कि दूसरे अध्याय तक पहुँचते-पहुँचते वे कहेंगे—"एतान्न हन्तुमिच्छामि।" "उभयोः" का बीज उसी करुणा में है। उनके लिए दोनों सेनाओं में केवल सैनिक नहीं खड़े; दोनों ओर उनके अपने लोग खड़े हैं। इसलिए "उभयोः" केवल व्याकरण का द्विवचन नहीं; यह हृदय का द्विवचन है।

ईश्वर किसी एक पक्ष के ईश्वर नहीं होते। कृष्ण पाण्डवों के सारथि अवश्य हैं, पर वे केवल पाण्डवों के भगवान् नहीं हैं। वे भीष्म के भी भगवान् हैं, द्रोण के भी, कर्ण के भी, दुर्योधन के भी। इसीलिए गीता की दृष्टि "उभयोः" है। धर्म का अर्थ किसी एक पक्ष का अन्ध-समर्थन नहीं; धर्म वह दृष्टि है जो दोनों पक्षों को देखकर भी सत्य का निर्णय कर सके। इसलिए "उभयोः" गीता का पहला सार्वभौमिक शब्द है। वह हमें सिखाता है कि न्याय वही कर सकता है जो पहले दोनों को देखने का धैर्य रखता हो।

"उभयोः" आगे चलकर गीता के अनेक द्वन्द्वों का पूर्वरूप है—सुख-दुःख, लाभ-हानि, जय-पराजय, मान-अपमान। गीता बार-बार कहेगी—दोनों को एक साथ देखो, किसी एक से चिपको मत। इस प्रकार "उभयोः" केवल दो सेनाओं का सूचक नहीं है; यह गीता के सम्पूर्ण समत्व-दर्शन का प्रथम व्याकरण है। समत्व का अर्थ एक पक्ष को नष्ट करना नहीं, बल्कि दोनों की उपस्थिति में भी अपनी चेतना को संतुलित रखना है। इसलिए यह छोटा-सा शब्द वास्तव में गीता की सबसे बड़ी शिक्षाओं में से एक का मौन बीज है।

उभयोः" का सबसे बड़ा रहस्य यह है कि यह केवल दो सेनाओं की संख्या नहीं बताता, बल्कि अर्जुन की चेतना की निष्पक्षता (epistemic fairness) को भी प्रकट करता है। यदि अर्जुन चाहते, तो वे कह सकते थे—"हमारी सेना और उनकी सेना।" यह स्वाभाविक भी होता। प्रत्येक योद्धा अपनी सेना को केन्द्र मानकर ही सोचता है। परन्तु अर्जुन ऐसा नहीं करते। वे "हम" और "वे" की भाषा छोड़ देते हैं और "उभयोः" की भाषा ग्रहण करते हैं। यह केवल व्याकरण नहीं बदलता; यह पूरी मानसिक संरचना बदल देता है। "हम-वे" (us vs. them) की भाषा संघर्ष की भाषा है; "उभयोः" की भाषा दर्शन की भाषा है। गीता का जन्म इसलिए सम्भव हुआ क्योंकि अर्जुन ने एक क्षण के लिए योद्धा की भाषा छोड़कर द्रष्टा की भाषा बोलनी आरम्भ कर दी।

आधुनिक सामाजिक मनोविज्ञान में एक शब्द है—depolarization। इसका अर्थ है दो विरोधी पक्षों को इस प्रकार देखना कि वे केवल शत्रु न रह जाएँ, बल्कि एक ही मानवीय परिस्थिति के दो आयाम प्रतीत हों। अर्जुन का "उभयोः" यही करता है। वे अभी किसी पक्ष का नैतिक मूल्यांकन नहीं कर रहे। वे केवल दोनों की उपस्थिति को स्वीकार कर रहे हैं। यह अत्यन्त उच्च मानसिक अवस्था है। अधिकांश संघर्ष इसलिए लम्बे चलते हैं क्योंकि दोनों पक्ष पहले ही क्षण दूसरे पक्ष की मनुष्यता खो देते हैं। अर्जुन ऐसा नहीं करते। उनके लिए दोनों पक्ष अभी भी "उभय" हैं—एक ही वास्तविकता के दो पक्ष।

यहाँ भारतीय दर्शन की एक अत्यन्त सूक्ष्म परम्परा स्मरणीय है। उपनिषद् कहते हैं कि संसार में अधिकांश समस्याएँ एकान्त-दृष्टि (one-sidedness) से उत्पन्न होती हैं। जैन दर्शन इसे अनेकान्तवाद के माध्यम से और भी स्पष्ट करता है। यद्यपि गीता और जैन दर्शन की अपनी-अपनी स्वतंत्र दार्शनिक दिशाएँ हैं, फिर भी "उभयोः" में यह आग्रह अवश्य दिखाई देता है कि किसी भी जटिल सत्य को केवल एक पक्ष से नहीं समझा जा सकता। अर्जुन पहले दोनों को देखना चाहते हैं। निर्णय बाद में होगा।

"उभयोः" में अद्भुत करुणा छिपी है। यदि व्यास केवल "सेनयोर्मध्ये" लिखते, तो दृश्य का वर्णन हो जाता। पर "उभयोः" जोड़कर वे पाठक को भी बाध्य करते हैं कि वह दोनों ओर दृष्टि डाले। एक ओर भीष्म हैं, दूसरी ओर युधिष्ठिर। एक ओर द्रोण हैं, दूसरी ओर धृष्टद्युम्न। एक ओर कृपाचार्य हैं, दूसरी ओर सात्यकि। कवि हमें किसी एक ओर देखने नहीं देता। वह हमारी दृष्टि को दोनों ओर घुमाता है। यह केवल वर्णन नहीं; यह पाठक की दृष्टि का भी शिक्षण (education of perception) है।

John Rawls ने veil of ignorance का सिद्धान्त दिया था—न्याय वही कर सकता है जो पहले स्वयं को किसी एक पक्ष की निश्चित पहचान से कुछ समय के लिए अलग कर सके। अर्जुन का "उभयोः" उसी प्रकार की नैतिक निष्पक्षता की प्रारम्भिक झलक है। वे अभी यह नहीं कह रहे कि कौन सही है; वे पहले यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि उन्होंने दोनों को देखा है। न्याय का जन्म दर्शन से होता है, और दर्शन का जन्म समग्र दृष्टि से।

"उभयोः" केवल बाहरी सेनाओं के लिए नहीं है। मनुष्य के भीतर भी दो पक्ष हैं—एक जो संसार की ओर आकर्षित होता है, दूसरा जो आत्मा की ओर। एक जो सम्बन्धों में बँधता है, दूसरा जो सत्य की ओर बढ़ता है। गीता इनमें से किसी एक का निषेध नहीं करती। कृष्ण अर्जुन को संसार छोड़ने के लिए नहीं कहेंगे; वे संसार के बीच योग सिखाएँगे। इसीलिए "उभयोः" गीता की पूरी पद्धति का सूक्ष्म बीज है। यहाँ किसी एक पक्ष को नष्ट नहीं किया जाता; दोनों को समझकर एक उच्चतर संश्लेषण (synthesis) तक पहुँचा जाता है।
अन्ततः "उभयोः" हमें एक अत्यन्त दुर्लभ बौद्धिक सद्गुण सिखाता है—पूर्ण दृष्टि का धैर्य। आज मनुष्य पहले निर्णय करता है, बाद में देखता है। अर्जुन पहले देखना चाहते हैं, फिर निर्णय करेंगे। यही गीता की पद्धति है। इसलिए "उभयोः" केवल द्विवचन नहीं है; यह ज्ञानमीमांसा (epistemology) का एक महान सिद्धान्त है—जो केवल एक पक्ष को देखता है, वह सूचना पा सकता है; जो दोनों पक्षों को देखता है, वही प्रज्ञा प्राप्त कर सकता है। यही "उभयोः" का मौन, किन्तु अमूल्य संदेश है।

Saturday, 18 July 2026

पृथ्वी लोक की अनन्त समस्यायें

** पृथ्वी लोक की अनन्त समस्यायें -१ **
** यह पृथ्वी भी अद्भुत और अपूर्व है l यहाँ गर्भ में आते ही समस्यायें आरम्भ हो जाती हैं l जन्म लेने से पूर्व से लेकर मृत्यु तक समस्यायें ही समस्यायें हैं इस धरती पर l मनुष्य या जीव भी इन समस्याओं से लड़ता रहता है l या तो विजय प्राप्त करता है या समस्याओं से पराजित होता है l 
** समस्याओं का निराकरण तीन स्तर पर होता है- देव द्वारा , राजा द्वारा या स्वयं के पुरुषार्थ द्वारा l देव द्वारा प्राप्त सहयोग दुर्लभ होता है l सभी पात्र नहीं होते कि उन्हें दैवीय सहायता मिल सके l राजा द्वारा या राज्यांग द्वारा सहायता तभी मिलती है जब देव अनुकूल हो l प्रायः विपत्ति काल में दी जाने वाली सहायता को राजा के चक्र (प्रशासनिक जन) खा जाते हैं l स्वयं का पुरुषार्थ ही एक ऐसा माध्यम होता है जो समस्याओं से व्यक्ति का उद्धार करता है l यह अलग बात है कि हर पुरुषार्थ के पीछे सफलता खड़ी नहीं मिलती है l 
** समस्याओं से भयभीत हो कर आत्महत्या करना या पलायन करना इस बात को सूचित करता है कि व्यक्ति की जीवंतता कितनी स्वल्प है l 
** समस्याओं के पीछे के कारण — हमारे पूर्व के कर्म ही हमारी समस्याओं के जनक होते हैं l इन्हें विंशोतरी महादशा और अंतर दशा द्वारा जाना जाता है l साथ ही समुद्र में फंसे व्यक्ति की तरह 
प्रार्थना और पुरुषार्थ दोनों का सहयोग लेना पड़ता है l
** भूमि पर जन्म तभी होता है जब आपको पुराना भोग भोगना हो और नया कर्म करके नयी समस्याओं को अगले जीवन के लिए तैयार करना हो l यदि मोक्ष हो जाए तो कभी समस्याएं उत्पन्न ही न हों पर जन्मलेने का अर्थ हीहै समस्याओं 
को साथ ले कर धरती पर आना l 
** जीवन समुद्रमें उठने वाली अनन्त लहरें समस्याएं ही तो हैंl 
इन समस्याओं को या तो तैरना होता है या लहरें लील लेती हैं l l

** पृथ्वी लोक की अनन्त समस्यायें -२ **
** पृथ्वी पर व्यक्ति का जन्म आदान प्रदान के लिए होता है l व्यक्ति का जन्म ऐसे परिवारमें होताहै जहाँ उसके पूर्वके आत्मीय लोग होते हैं l माता पिता, भाई बहन, दादा दादी, चाचा चाची से आपका पहले से राग बंधन होता है l ये सम्बन्ध या तो आपको समस्या मुक्त करते हैं या ऐसी समस्याओं से युक्त करते हैं जिनसे आप कभी मुक्त नहीं हो पाते l 
** आप जिनका जितना पूर्व काल में उधार लिए रहते हैं वह उतना आपसे ले लेता है l कोई भी व्यक्ति इतना स्वतंत्र नहीं होता की वह जन्म कालिक सम्बन्धों का चयन कर सके l यदि श्रेष्ठ सम्बन्धों की इच्छा हो तो भगवती प्रकृति की आराधना करनी पड़ती है l हमारा पूर्व का कर्म ही हमें तामसिक,राजसिक या सात्विक वातावरण को प्रदान करता है l इस अपार सृष्टि में आपसे वे लोग ही मिल पायेंगे जिनसे आपका पूर्वगत सम्बन्ध है l किसी से किसी व्यक्ति का सम्बन्ध कितने दिनों तक रह पाएगा यह भी पूर्व निर्धारित रहता है l
** मेरे जीवन में अनेक ऐसी घटनाएं घटित हुई हैं जिन्होंने पूर्व कर्मों से उत्पन्न मोह जनित त्रास को सामने लाकर खड़ा किया है l मॉरिशस में जाकर मैने एक विशाल कच्छप को वासुदेव मंत्र दिया l जहाँ एक ओर राष्ट्रपति और अनेक मंत्रियों से भेंट हुई वहीं एक शापित आत्मा जो कछुए के शरीर में रही उसे मुक्ति का मंत्र देना पड़ा l २००९ में मुझे स्वप्न हुआ कि पूर्व जीवन का २ लाख कर्ज लेकर बैठे हो उसे लौटा देना l २०१० के अप्रैल में वैसी ही घटना घटित हुई l मैं ने पूछा क्या ब्याज भी देना होगा? उत्तर मिला - नहीं l परलोक के गणित में यथा का तथा होता है l अधिक न्यून नहीं l 
** इस जीवन में मैने भगवती की अत्यधिक आराधना की - हे देवि! मैं निर्विघ्न रहूँ l न तो किसी को विघ्न दूं न किसी के द्वारा विघ्न ग्रस्त हो सकूँ l 
मनुष्य जीवन की सारी समस्याएं चक्रीय हैं l वे घूमती रहती हैं l इस जीवन में नहीं तो किसी अन्य जीवन में हमें अपने कर्मों को भोगना ही पड़ता है l राजयोग और राज भ्रंश भी उसी कर्म भोग के सुनिश्चित अंश हैं l यह बहुत जटिल और अक्रम भोग होता है जिसे त्रिकाल द्रष्टा ही जान पाता है हम लोगों जैसे सामान्य जन नहीं l