Monday, 24 August 2026

जबाला, सत्यकाम और हरिद्रुमत के पुत्र महर्षि गौतम की कथा

'छान्दोग्योपनिषद्' के चौथे अध्याय में जबाला, सत्यकाम और हरिद्रुमत के पुत्र महर्षि गौतम की कथा मिलती है। 

जबाला उस भारत का प्रतिनिधित्व करती है जहाँ नारी हर रूप में नारायणी है, सत्यकाम सत्य के उस प्रहरी के रूप में खड़े हैं जो कहता है कि जो धीर मनुष्य सत्य-पथ से कभी नहीं हटता, वही ब्रह्म-विद्या प्राप्त करने का अधिकारी है और महर्षि गौतम हिन्दू धर्म के उस स्वरुप के प्रदर्शक हैं जहाँ केवल और केवल स्वीकार्यता और समावेशन है और जो ये मानता है कि जन्म, गोत्र, कुल या जाति या किसी का ब्राहमण होना ब्रह्म-विधा का अधिकारी होना तय नहीं करती बल्कि मनुष्य की श्रेष्ठता के मानक उसकी सत्यनिष्ठा और सत्य को जानने की अभिलाषा है।

भारत को और हिन्दू धर्म को समझना है तो इन तीन चरित्रों का पारायण कर लीजिये लिये तो बहुत कुछ समझ में आ जायेगा।

जबाला स्त्री जाति और वंचित वर्ग की प्रतिनिधि है, दैवयोग या किसी दुर्भाग्य से उसे कई-कई पुरुषों की सेविका रूप में काम करना पड़ा था और उसी के नतीजे में उन्हें पुत्र प्राप्त हुआ। पुत्र जब पढ़ने योग्य हुआ तो एक दिन माँ के पास आया और कहा- 

माँ ! मैं शिक्षा प्राप्ति के लिये गुरुकुल जाना चाहता हूँ। जबाला प्रसन्न होकर पुत्र को अनुमति देती है पर पुत्र का एक सवाल उसे संकट में डाल देता है। पुत्र उस समय की गुरुकुल की रीति को जानता है इसलिये वो अपनी माँ से पूछता है, महर्षि मुझसे पूछेंगे, तुम्हारा नाम और गोत्र क्या है, तब मैं उन्हें क्या उत्तर दूँगा? 

माँ संकट में पड़ गई क्योंकि पुत्र का गोत्र तो पिता का गोत्र होता है पर इसके पिता का तो मुझे पता ही नहीं है, अब इसे क्या उत्तर दूं? अगर झूठ बोलती हूँ तो झूठ के बुनियाद पर प्राप्त शिक्षा उसके बालक को क्या संस्कारित करेगी, इसलिये निडर और निर्भीक जबाला अपने पुत्र से कहती है- पुत्र ! निराश्रित होने के कारण और अपना तथा तुम्हारा लेट भरने हेतु यौवनावस्था में मुझे अनेक गृह स्वामियों की परिचर्या करनी पड़ी, वृत्ति बनाये रखने के लिए मुझे उनको अपना शरीर भी अर्पित करना पड़ता था। उन अनेक गृह स्वामियों में से तू किसका पुत्र है मैं यह नहीं जानती। इसलिए तेरा गोत्र मैं कैसे निर्धारित करूं? हाँ, मेरा नाम जाबाला है और तू अपने जीवन में सत्यकाम (सत्य से ही प्रयोजन रखने वाला) है, इसलिए जब तेरे गुरु तेरा नाम पूछें तो उन्हें अपना नाम सत्यकाम जाबाल बताना। फिर वो अपने पुत्र से कहती है - "वत्स ! तेरे जीवन का सत्य तेरी आत्म-कलुषता की निवृत्ति ही तुझे ईश्वर प्राप्ति का मार्ग दर्शन करेगी ऐसा मुझे विश्वास है।"

बालक अपनी माँ के चरणों में सर नवाकर गौतम ऋषि के आश्रम में जाता है और जब ऋषि उससे उसका गोत्र पूछ्तें हैं तो वो निर्भीक होकर वही जबाब देता है जो उससे उसकी माँ ने कहा था। 

ऋषि स्तंभित रह जाते हैं, सोचते हैं लोग ब्रह्मज्ञान पाने के लिये न जाने कितने झूठ गढ़तें हैं और ये बालक इतना साहसी कि सारा सत्य यथावत बयान कर दिया, उधर सारा आश्रम हतप्रभ ये सोचता है कि अब तो गौतम एक कुलटा के पुत्र को यहाँ से निकाल देंगें पर ऋषि गौतम सत्यकाम से कहतें हैं- पुत्र, तूने सत्य का परित्याग न कर अपनी विशिष्टता प्रतिपादित की है, मैं तुझे ब्रह्म विद्या का शिक्षण दूँगा। जा पुत्र ! जा कर यज्ञ के लिये समिधा लेकर आ, आज ही तेरा यज्ञोपवीत संस्कार करना है।

हिन्दू धर्म और हिन्दू समाज जब अपनी सभ्यता के ऊंचाइयों पर था तब उसने दुनिया को संदेश दिया था कि अवैध रिश्तें होतें हैं उस रिश्ते से जन्मीं संतान नहीं, गोत्र या जाति किसी का मान या योग्यता निर्धारित नहीं करती, इसे निर्धारित करती है 'आत्मा का पूर्ण निष्कलुष और निष्कपट होना तथा सत्य को यथारूप में स्वीकार करने का साहस'। 

उस काल में जन्मी एक महिला का अपने बारे में ऐसी स्वीकारोक्ति, पुत्र ब्रह्म-ज्ञानी बने इसकी अभिलाषा, ऋषि गौतम का अवैध रिश्ते और अज्ञात पिता से जन्में बालक को बयोग्य मानते हुये ब्रह्म-ज्ञानी बनाने का फैसला, सत्यकाम का खुद के बारे में वैसी पहचान जाहिर होने के बाबजूद विचलित न होना और न ही अपनी माँ के प्रति कोई कलुष भाव रखना - इन सबको जोड़िये और कल्पना करिये हमारा भारत, और हमारे पूर्वज और उनके आदर्श कितने ऊँचे थे। हमारा हिन्दू धर्म कितना ऊँचा था।

जबकि बाकी मजहबों के विधान को अगर आप देखेंगे तो उनके मजहब जब अपने उरूज पर थे तब उनके यहाँ स्त्री ने अगर किसी अवैध रिश्तों के एवज में कोई औलाद जनी होती तो उसे रज़म (पत्थरवाह) कर दिया जाता था यानि उन्मादी भीड़ उसपर तबतक पत्थर बरसाती थी जब तक कि वो बेचारी तड़प-तड़प पर मर नहीं जाती। 

मज़े की बात ये है कि उनके यहां ज़िना करने वाले पुरुष इस ख़ता में किसी भी अपराध से बरी माने जाते हैं।

किसी के गढ़े झूठ पर, किसी के लगाए आक्षेप पर स्वयं को अपराधी मान लेते की आत्मघाती हिन्दू प्रवृत्ति क्यों नहीं जाती, इसकी वजह है कि हमारे पास हिंदुत्व वाला "प्रोडक्ट" सौ प्रतिशत शुद्ध है पर उसे बेचने (फैलाने) की मार्केटिंग स्किल हमारे पास ज़ीरो है।

2020 में प्रकाशित अपनी पुस्तक का नाम #इनसाइड_द_हिन्दू_मॉल मैनें इसी वजह से रखा था कि इस मॉल के आकर्षक वस्तुओं को दुनिया के सामने हमको रखना होगा और इस वर्ष प्रकाशित पुस्तक का नाम #अमृत_कुंभ इस अमृत को समस्त विश्व को देने की कोशिश के रूप में रखी गई है।

जब तक हम में से हरेक हिन्दू धर्म की एक - एक अच्छी बातों का प्रचारक और प्रसारक नहीं बनेगा, हम सिमटते ही जाएंगे।

Abhijeet Singh

मनुस्मृति

युग के अनुसार स्मृति होती है, पर वह वेद विरुद्ध नहीं होना चाहिए। बाइबिल, जेनेसिस, अध्याय २ के अनुसार स्त्री को पुरुष की जंघा हड्डी से उत्पन्न मान कर उसे निर्जीव सम्पत्ति मानते थे। ब्रिटेन में १८२० ई. में उनको मनुष्य माना गया। आसुरी तथा भारतीय परम्परा का अन्तर दुर्गा सप्तशती में स्पष्ट है। महिषासुर का दूत देवी को सम्पत्ति मानता है। पर देवी पति को बराबरी का मानते हैं-यो मे प्रतिबलो लोके, स मे भर्ता भविष्यति।

राजनीतिक दल कार्पोरेट कंपनी की तरह सोचने लगें

जब राजनीतिक दल कार्पोरेट कंपनी की तरह सोचने लगें
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लोकतंत्र का पुराना सिद्धान्त था—जनता मालिक है, राजनीतिक दल उसके प्रतिनिधि हैं और सरकार जनता की सेवा के लिए बनी संस्था है।

लेकिन इक्कीसवीं सदी के भारतीय लोकतंत्र में दृश्य थोड़ा बदल गया है। अब राजनीतिक दलों के पास भी ब्रांड मैनेजर हैं, डेटा एनालिस्ट हैं, सोशल मीडिया वार रूम हैं, फंड-रेज़िंग मशीनरी है, इमेज कंसल्टेंट हैं और चुनाव के समय लगभग हर मतदाता को ग्राहक की तरह देखने की अद्भुत क्षमता है।

अंतर केवल इतना है कि कंपनी अपने उत्पाद के लिए ग्राहक खोजती है और राजनीतिक दल अपने उत्पाद—अर्थात् सत्ता—के लिए मतदाता। कंपनी कहती है—“हमारा ब्रांड सबसे विश्वसनीय है।” राजनीतिक दल कहता है—“हम ही राष्ट्र के सबसे विश्वसनीय रक्षक हैं।” कंपनी विज्ञापन करती है। राजनीतिक दल भी। कंपनी बाजार का सर्वेक्षण करती है।
राजनीतिक दल जाति, क्षेत्र, आयु, लिंग, धर्म, पेशा और सोशल मीडिया व्यवहार तक का सर्वेक्षण करता है।

कंपनी ग्राहक की पसंद बदलने के लिए अभियान चलाती है।
राजनीतिक दल मतदाता की पसंद बदलने के लिए।

और दोनों में एक और अद्भुत समानता है—बोर्डरूम में लाभ और हानि का हिसाब होता है, राजनीतिक कार्यालय में सीट और वोट का।

फर्क केवल इतना है कि कंपनी का सालाना टर्नओवर शेयरधारकों को जवाबदेह होता है; लोकतंत्र में राजनीतिक दल का असली “शेयरधारक” पाँच साल में एक बार वोट डालता है।
और यहीं से इस व्यंग्य की गंभीरता शुरू होती है।

राजनीति अब विचारधारा से अधिक ‘ब्रांड मैनेजमेंट’ है
भारतीय राजनीति में विचारधाराएँ आज भी मौजूद हैं। संविधान, समाजवाद, राष्ट्रवाद, धर्मनिरपेक्षता, सामाजिक न्याय, हिन्दुत्व, लोकतांत्रिक समाजवाद, क्षेत्रीय अस्मिता—सबके अपने ऐतिहासिक और वैचारिक आधार हैं।

लेकिन चुनावी राजनीति ने इन विचारों पर मार्केटिंग की एक चमकदार परत चढ़ा दी है।
आज राजनीतिक दल का मूल्यांकन कई बार इस आधार पर नहीं होता कि उसके पास दीर्घकालीन नीति-दृष्टि क्या है, बल्कि इस पर होता है कि—

उसका नेता कितना लोकप्रिय है,
उसका सोशल मीडिया कितना सक्रिय है,
उसका नैरेटिव कितना वायरल है,
उसकी रैली कितनी बड़ी है,
उसका विज्ञापन कितना प्रभावी है,
और उसका चुनावी माइक्रो-मैनेजमेंट कितना कुशल है।
यहाँ राजनीति धीरे-धीरे विचारधारा से ब्रांड और ब्रांड से उत्पाद बनने लगती है।
एक दल कहता है—हम विकास हैं।
दूसरा कहता है—हम सामाजिक न्याय हैं।
तीसरा कहता है—हम भ्रष्टाचार-विरोध हैं।
चौथा कहता है—हम क्षेत्रीय स्वाभिमान हैं।
और मतदाता सोचता है—“भाई, ऑफर में क्या मिलेगा?”
यहीं लोकतंत्र और उपभोक्तावाद एक-दूसरे को देखकर मुस्करा देते हैं।

राजनीतिक दलों की वित्तीय स्थिति का सबसे विश्वसनीय सार्वजनिक आधार उनके द्वारा चुनाव आयोग को प्रस्तुत किए गए योगदान और ऑडिट विवरण हैं। चुनाव आयोग स्वयं राजनीतिक दलों के contribution reports और expenditure reports प्रकाशित करता है।  
ADR द्वारा चुनाव आयोग में उपलब्ध विवरणों के विश्लेषण के अनुसार, वित्तीय वर्ष 2024-25 में छह राष्ट्रीय दलों को ₹20,000 से अधिक की घोषित कुल 11,343 चंदा प्रविष्टियों से लगभग ₹6,648.56 करोड़ प्राप्त हुए।
इनमें—भाजपा- ₹6,074.02 करोड़, कांग्रेस- ₹517.39 करोड़
अन्य राष्ट्रीय दल
लगभग ₹57 करोड़

अर्थात् ₹20,000 से ऊपर के घोषित चंदे में भाजपा का हिस्सा लगभग 91% बैठता है।
इसे केवल “भाजपा बहुत शक्तिशाली है” कहकर छोड़ देना भी गलत होगा और इसे “भाजपा का पैसा गलत है” कह देना भी।
सही प्रश्न यह है—
लोकतंत्र में इतनी विशाल आर्थिक असमानता राजनीतिक प्रतिस्पर्धा को किस सीमा तक प्रभावित करती है?
यही मूल प्रश्न है।

ADR के इसी विश्लेषण में एक और आंकड़ा अत्यंत महत्वपूर्ण है।
2024-25 में राष्ट्रीय दलों को प्राप्त ₹6,648.56 करोड़ के घोषित चंदे में से लगभग ₹6,128.79 करोड़ अर्थात् 92.18% कॉरपोरेट/व्यावसायिक स्रोतों से आया, जबकि व्यक्तियों का योगदान लगभग ₹505.66 करोड़ अर्थात् 7.61% था। 

अब जरा इस दृश्य की कल्पना कीजिए।
एक साधारण नागरिक राजनीतिक दल को ₹500 देता है।
एक कंपनी करोड़ों देती है।
दोनों का अधिकार संविधान में बराबर है।
लेकिन राजनीतिक अर्थव्यवस्था में उनका प्रभाव बराबर होना आवश्यक नहीं।
यही वह जगह है जहाँ लोकतंत्र का “एक व्यक्ति, एक वोट” सिद्धान्त और चुनावी वित्त का “एक रुपया, एक संसाधन” वाला संसार आमने-सामने खड़ा हो जाता है।
और यहीं से राजनीतिक दलों का कॉरपोरेट-सदृश व्यवहार समझ में आता है।
इस विषय पर चर्चा करते समय सबसे बड़ा खतरा यह है कि कोई इसे केवल भाजपा-विरोधी लेख बना दे।
वास्तविकता अधिक जटिल है।
भाजपा आज भारतीय राजनीति की सबसे बड़ी चुनावी मशीनरी है। उसके पास संगठन, संसाधन, डिजिटल पहुंच और वित्तीय क्षमता विपक्ष के अधिकांश दलों से कहीं अधिक है।
2024 के लोकसभा चुनाव और साथ हुए चार विधानसभा चुनावों के दौरान ADR के विश्लेषण में 32 राष्ट्रीय एवं क्षेत्रीय दलों का कुल घोषित चुनावी व्यय ₹3,352.81 करोड़ था। इसमें भाजपा का व्यय लगभग ₹1,493.91 करोड़ अर्थात् 44.56% था। कांग्रेस लगभग ₹620.14 करोड़, अर्थात् 18.50%, पर थी। 

यह आर्थिक शक्ति भाजपा को एक स्पष्ट प्रतिस्पर्धात्मक लाभ देती है।
लेकिन यहाँ आलोचना का नैतिक तरीका यह नहीं होना चाहिए कि—
“भाजपा पैसा खर्च करती है, इसलिए भाजपा गलत है।”
बल्कि प्रश्न होना चाहिए—
“क्या भारतीय चुनाव व्यवस्था में धन का इतना असमान वितरण स्वतंत्र और समान राजनीतिक प्रतिस्पर्धा के लिए स्वस्थ है?”
यह प्रश्न भाजपा से भी पूछा जाना चाहिए और व्यवस्था से भी।

यहाँ विपक्ष की भी परीक्षा होनी चाहिए।
कांग्रेस आज आर्थिक रूप से भाजपा से बहुत पीछे है, लेकिन भारतीय राजनीतिक वित्त की पुरानी संस्कृति में वह स्वयं लंबे समय तक सत्ता का केंद्रीय दल रही है।
2024-25 में कांग्रेस ने ₹517.39 करोड़ के ऐसे चंदे घोषित किए जो ₹20,000 से ऊपर थे। उसके कुल आय स्रोतों में लगभग ₹350.12 करोड़ कूपन बिक्री से आए, जो उसकी कुल आय का लगभग 38% था। 

अर्थात् विपक्ष का प्रश्न केवल यह नहीं हो सकता—
“सत्तारूढ़ दल को इतना पैसा क्यों मिलता है?”
उसे यह भी पूछना होगा—
“हमारी अपनी राजनीतिक वित्त व्यवस्था कितनी पारदर्शी, लोकतांत्रिक और जन-आधारित है?”
यदि सत्ता में रहते हुए एक दल कॉरपोरेट संसाधनों पर निर्भर होता है और विपक्ष में आने के बाद वही दल कॉरपोरेट फंडिंग की आलोचना करता है, तो जनता को यह अंतर समझ में आता है।
जनता की स्मृति राजनीतिक दलों की प्रेस कॉन्फ्रेंस से थोड़ी लंबी होती है।

अब आते हैं उस प्रयोग पर जिसने भारतीय राजनीतिक वित्त की बहस को बिल्कुल नए स्तर पर पहुँचा दिया—Electoral Bonds।
2017 में लाई गई व्यवस्था का उद्देश्य राजनीतिक चंदे को बैंकिंग प्रणाली के माध्यम से लाना था, लेकिन इसमें दाता की पहचान सार्वजनिक न होने के कारण पारदर्शिता पर गंभीर प्रश्न उठे।
फरवरी 2024 में सर्वोच्च न्यायालय ने Electoral Bond Scheme तथा उससे संबंधित कुछ कानूनी प्रावधानों को असंवैधानिक ठहराया। न्यायालय ने राजनीतिक फंडिंग की जानकारी को मतदाताओं के सूचना के अधिकार से जोड़ा और unlimited corporate contributions से जुड़े प्रावधान को भी Article 14 के संदर्भ में असंवैधानिक माना। 

यह फैसला केवल किसी एक दल के विरुद्ध निर्णय नहीं था।
यह भारतीय लोकतंत्र के लिए एक सिद्धान्त था—
राजनीतिक धन केवल राजनीतिक दल की निजी संपत्ति नहीं है; उसके स्रोत की जानकारी नागरिक के लोकतांत्रिक अधिकार से जुड़ी है।
यही वह बिंदु है जहाँ कॉरपोरेट संस्कृति और लोकतांत्रिक संस्कृति में मूलभूत अंतर दिखाई देता है।
कंपनी पूछ सकती है—
“मेरे शेयरधारक को यह जानने की आवश्यकता क्यों है?”
लोकतंत्र में नागरिक पूछ सकता है—
“जिस सरकार को मैं चुनने जा रहा हूँ, उसे पैसा कौन दे रहा है?”

राजनीति की प्रतिभा यह है कि वह रास्ते बंद होने पर नए रास्ते खोज लेती है।
Electoral Bonds समाप्त हुए तो Electoral Trusts और अन्य माध्यमों का महत्व बढ़ा।
ADR के 2024-25 के विश्लेषण के अनुसार, Prudent Electoral Trust ने भाजपा, कांग्रेस और AAP को मिलाकर लगभग ₹2,413.47 करोड़ दिए। इसमें भाजपा को लगभग ₹2,180.71 करोड़, कांग्रेस को ₹216.34 करोड़ और AAP को लगभग ₹16.42 करोड़ मिले। 

इसका अर्थ यह नहीं कि Electoral Trust अवैध हैं।
नहीं।
कानूनी होना और लोकतांत्रिक दृष्टि से पर्याप्त पारदर्शी होना दो अलग-अलग बातें हैं।
यही अंतर हमें समझना होगा।

कॉरपोरेट जगत का सबसे लोकप्रिय शब्द है—ROI: Return on Investment.
व्यवसायी निवेश करता है और प्रतिफल चाहता है।
लोकतांत्रिक व्यवस्था में राजनीतिक चंदे का प्रत्यक्ष “प्रतिफल” सिद्ध करना कठिन है, और हर कॉरपोरेट दान को quid pro quo कहना तथ्यात्मक रूप से गलत होगा।
लेकिन चिंता का प्रश्न वास्तविक है।
यदि कोई व्यवसायी किसी राजनीतिक दल को करोड़ों देता है तो नागरिक को यह जानने का अधिकार होना चाहिए कि—
क्या उसके बाद उस कंपनी को सरकारी ठेका मिला?
क्या कोई नीति बदली?
क्या कोई नियामकीय निर्णय हुआ?
क्या कोई कर-संबंधी लाभ मिला?
क्या कोई भूमि, लाइसेंस या परियोजना मिली?
क्या दान और सरकारी निर्णयों के बीच कोई असामान्य समय-संबंध है?
यही कारण है कि सर्वोच्च न्यायालय ने राजनीतिक वित्त और नागरिक के सूचना-अधिकार को गंभीरता से देखा। 

हर दान रिश्वत नहीं है। लेकिन हर बड़े दान की पारदर्शिता आवश्यक है।
यही स्वस्थ लोकतांत्रिक स्थिति है।

यह बीमारी केवल दिल्ली के बड़े दलों की नहीं है।
क्षेत्रीय राजनीति भी धीरे-धीरे बड़े संसाधनों की अर्थव्यवस्था बन चुकी है।
DMK, AIADMK, TMC, BRS, TDP, YSRCP, BJD, SP, AAP, JD(U)—हर दल का वित्तीय मॉडल अलग है, लेकिन चुनावी राजनीति में धन, संगठन और मीडिया की भूमिका लगातार बढ़ी है।
अगस्त 2026 में प्रकाशित ADR के नवीनतम विश्लेषण ने 40 क्षेत्रीय दलों के 2023-24 और 2024-25 के ₹20,000 से ऊपर के घोषित चंदों का अध्ययन किया है। 

यह बताता है कि समस्या को केवल “भाजपा बनाम कांग्रेस” बनाकर देखना वास्तविक समस्या को छोटा करना है।
यह समस्या भारतीय पार्टी-व्यवस्था की संरचनात्मक समस्या है।

अब जरा वामपंथ की ओर आइए।
जिस विचारधारा ने पूँजी और कॉरपोरेट सत्ता की आलोचना को अपना केंद्रीय राजनीतिक सिद्धान्त बनाया, उसकी चुनावी मशीनरी भी संसाधनों से मुक्त नहीं है।
अंतर यह है कि उसके वित्तीय स्रोत और आकार अलग हैं।

इसलिए वामपंथ से भी प्रश्न होना चाहिए—
क्या केवल कॉरपोरेट विरोध करना पर्याप्त है, या राजनीतिक दलों के भीतर लोकतंत्र, पारदर्शिता और वित्तीय जवाबदेही का आदर्श भी उतना ही आवश्यक है?
यदि पार्टी जनता के लिए लोकतांत्रिक समाज चाहती है तो पार्टी के भीतर भी लोकतांत्रिक संस्कृति दिखाई देनी चाहिए।

BSP का मामला विशेष रूप से दिलचस्प है।
ADR के अनुसार उसने 2024-25 में ₹20,000 से अधिक का कोई दान घोषित नहीं किया—और यह उसके पिछले कई वर्षों के पैटर्न के अनुरूप है। 

यह अपने आप में एक अलग राजनीतिक वित्त मॉडल की ओर संकेत करता है।
लेकिन इसका दूसरा पक्ष भी है—
जहाँ बड़े कॉरपोरेट चंदे की समस्या है, वहाँ छोटे दान की पारदर्शिता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।
सिर्फ यह कह देना कि “हम कॉरपोरेट से पैसा नहीं लेते” लोकतांत्रिक वित्तीय शुचिता का पूरा प्रमाण नहीं है।
प्रश्न होना चाहिए—
पैसा कहाँ से आया, कितना आया, किस माध्यम से आया और कहाँ खर्च हुआ?

नई राजनीति जब पुरानी राजनीति की आलोचना करती है तो जनता उससे अधिक उम्मीद करती है।
AAP का उदय छोटे चंदे, पारदर्शिता और वैकल्पिक राजनीतिक संस्कृति के वादे के साथ हुआ था।
लेकिन सत्ता की राजनीति का बाजार बड़ा है।
ADR के अनुसार 2024-25 में AAP को ₹39.22 करोड़ donations/contributions से मिले और उसकी कुल आय का लगभग 99.85% योगदान से आया। 

यहाँ प्रश्न किसी अपराध का नहीं है।
प्रश्न यह है कि—
क्या कोई राजनीतिक दल सत्ता में आने के बाद उसी वित्तीय संरचना से बच सकता है जिसकी आलोचना करके वह सत्ता में आया था?
शायद कठिन है।
और यही भारतीय लोकतंत्र का बड़ा व्यंग्य है।
क्रांति चुनाव जीतते ही बजट बनाना शुरू कर देती है।

चुनाव अब ‘उत्पाद लॉन्च’ जैसा क्यों लगता है?

2024 के लोकसभा चुनावों के साथ हुए चुनावों के दौरान 32 दलों के घोषित कुल खर्च में ₹2,008 करोड़ से अधिक यानी 53% से ज्यादा खर्च प्रचार पर हुआ। यात्रा पर लगभग ₹795 करोड़ खर्च हुए। 

इसका अर्थ समझना चाहिए।
राजनीति में अब केवल कार्यकर्ता नहीं चाहिए।
चाहिए—
Content.
Camera.
Campaign.
Consultant.
Data.
Digital distribution.
Narrative.
नेता पहले जनता से मिलता था।
अब कभी-कभी जनता से पहले कैमरा मिलता है।
सभा पहले जनसंवाद थी।
अब वह “event” भी है।
भाषण पहले राजनीतिक वक्तव्य था।
अब वह “content asset” भी है।
और मतदाता?
वह कभी नागरिक है, कभी target group, कभी booth cluster और कभी “swing voter segment”।
लोकतंत्र ने शायद MBA कर लिया है।

बड़े राजनीतिक दलों में आज नेतृत्व का केंद्रीकरण बढ़ा है।
कई दलों में निर्णय कुछ शीर्ष नेताओं के इर्द-गिर्द केंद्रित होते हैं।
उम्मीदवार चयन से लेकर संदेश, गठबंधन, अभियान और संसाधन वितरण तक सब कुछ अत्यधिक केंद्रीकृत हो सकता है।
यह कॉरपोरेट मॉडल से मिलता-जुलता है—
CEO → Core Team → Regional Management → Field Staff → Customer
और राजनीतिक मॉडल में—
शीर्ष नेतृत्व → केंद्रीय संगठन → प्रदेश नेतृत्व → बूथ संगठन → मतदाता
अंतर इतना है कि कंपनी में CEO को निदेशक मंडल हटाता है।
राजनीतिक दल में नेता को हटाने की प्रक्रिया कई बार इतनी कठिन होती है कि पार्टी का आंतरिक लोकतंत्र स्वयं विपक्ष में चला जाता है।

यह भाजपा की समस्या हो सकती है।
कांग्रेस की भी।
क्षेत्रीय दलों की भी।
वाम दलों की भी।
नयी पार्टियों की भी।
व्यक्तिपूजा का रंग अलग-अलग हो सकता है; उसका मनोविज्ञान प्रायः एक जैसा होता है।

भारतीय राजनीति में परिवारवाद की आलोचना खूब होती है।
होनी भी चाहिए।
लेकिन एक प्रश्न और पूछा जाना चाहिए—
यदि राजनीतिक दल एक परिवार की निजी संपत्ति जैसा व्यवहार करे, तो वह लोकतांत्रिक संस्था कैसे रहेगा?
और यदि कोई दल पूरी तरह कॉरपोरेट शैली के केंद्रीकृत प्रबंधन में बदल जाए तो?
दोनों स्थितियों में कार्यकर्ता की भूमिका घटती है और नेतृत्व की भूमिका बढ़ती है।
एक में सत्ता का उत्तराधिकार परिवार से आता है।

दूसरे में सत्ता का नियंत्रण संगठनात्मक केंद्रीकरण से।
दोनों में लोकतंत्र के भीतर लोकतंत्र कमजोर हो सकता है।
इसलिए समस्या केवल वंशवाद नहीं है।
समस्या आंतरिक लोकतंत्र का अभाव है।

अब थोड़ा दोष जनता का भी।
हम हर चीज मुफ्त चाहते हैं।
फिर पूछते हैं चुनाव इतने महँगे क्यों हैं।
हमें शानदार रैली चाहिए।
हेलीकॉप्टर चाहिए।
24 घंटे सोशल मीडिया चाहिए।
बड़े-बड़े विज्ञापन चाहिए।
चमकदार कार्यालय चाहिए।
हर शहर में पोस्टर चाहिए।
फिर पूछते हैं—
“इतना पैसा कहाँ से आया?”
लोकतंत्र में नागरिक केवल वोटर नहीं है।
वह राजनीतिक अर्थव्यवस्था का हिस्सा भी है।

यदि मतदाता जाति, धर्म, तत्काल लाभ, मुफ्त वस्तु, भावनात्मक भाषण और नेता की लोकप्रियता पर वोट करता है, तो राजनीतिक दल भी उसी बाजार के अनुसार अपना उत्पाद बनाएँगे।

बाजार केवल विक्रेता से नहीं बनता; ग्राहक भी उसे बनाता है।

यह कहना भी गलत होगा कि जनता जैसी है, राजनीति वैसी ही है।
राजनीतिक दलों के पास कहीं अधिक संसाधन हैं।
उनके पास नीति बनाने की क्षमता है।
उनके पास कानून बनाने की शक्ति है।
उनके पास संगठन है।
उनके पास सत्ता है।
इसलिए नैतिक जिम्मेदारी भी अधिक है।
एक नागरिक से उच्च राजनीतिक आदर्श की अपेक्षा की जा सकती है।
लेकिन राजनीतिक दल से संस्थागत ईमानदारी की अपेक्षा अनिवार्य है।

असली खतरा पैसा नहीं—पैसे की अपारदर्शिता है
यहाँ एक महत्वपूर्ण भेद करना चाहिए।
लोकतंत्र को धन की आवश्यकता है।
चुनाव मुफ्त नहीं होते।
पोस्टर, यात्रा, कार्यालय, कर्मचारी, संचार, तकनीक, प्रशिक्षण—सबमें पैसा लगता है।
इसलिए यह कहना कि—
“राजनीतिक दल को कॉरपोरेट पैसा बिल्कुल नहीं मिलना चाहिए”
व्यावहारिक समाधान नहीं है।
समस्या है—

अज्ञात पैसा + असमान पैसा + राजनीतिक प्रभाव + कमजोर पारदर्शिता

यदि ₹100 करोड़ का दान खुले रिकॉर्ड में है, तो नागरिक उसका विश्लेषण कर सकता है।
यदि वही धन ऐसे माध्यम से आए जहाँ वास्तविक स्रोत या संभावित हितों को समझना कठिन हो, तो लोकतंत्र कमजोर होता है।
धन का अस्तित्व समस्या नहीं; धन का अंधकार समस्या है।

यदि राजनीतिक दलों को वास्तव में लोकतांत्रिक संस्थाएँ बनाना है तो कुछ बुनियादी सुधार आवश्यक हैं।
पहला—Real-time political funding disclosure

चंदे की जानकारी चुनाव के वर्षों बाद नहीं, लगभग तत्काल सार्वजनिक होनी चाहिए।
दूसरा—Corporate donations की पूर्ण पारदर्शिता
कंपनी ने कितना दिया, किस दल को दिया और उसके स्वामित्व तथा संबंधित कंपनियों की स्थिति क्या है—यह स्पष्ट हो।
तीसरा—Political Trusts की भी पूरी transparency
Trust के पीछे कौन हैं, किन कंपनियों ने पैसा दिया और किस दल को कितना पहुँचा—जनता को पता होना चाहिए।
चौथा—Political parties के accounts का uniform audit
सभी दलों के लिए एक समान accounting standards हों।
पाँचवाँ—चुनावी खर्च की वास्तविक सीमा पर पुनर्विचार
जब आधिकारिक सीमा और वास्तविक चुनावी खर्च में बड़ा अंतर हो तो कानून स्वयं हास्यास्पद बन जाता है।
छठा—State funding of elections पर गंभीर बहस
यदि लोकतंत्र सार्वजनिक संस्था है तो उसके चुनावी खर्च का एक हिस्सा सार्वजनिक धन से क्यों न आए?

लेकिन इसके साथ कठोर transparency और समान अवसर की शर्त होनी चाहिए।
सातवाँ—Internal democracy
राजनीतिक दलों में नियमित आंतरिक चुनाव, सदस्यता का पारदर्शी रिकॉर्ड और उम्मीदवार चयन की संस्थागत प्रक्रिया हो।
आठवाँ—Political advertising की स्पष्ट regulation

विशेषतः डिजिटल micro-targeting, synthetic media और AI-generated political content के युग में।

और सबसे महत्वपूर्ण—दल को कंपनी बनने से रोकना होगा
कंपनी का मूल उद्देश्य है—
लाभ।
राजनीतिक दल का मूल उद्देश्य होना चाहिए—
लोककल्याण।
कंपनी ग्राहक को संतुष्ट करती है।
राजनीतिक दल नागरिक को सशक्त करे।
कंपनी बाजार हिस्सेदारी चाहती है।
राजनीतिक दल जनविश्वास।
कंपनी प्रतिस्पर्धी को बाजार से बाहर करना चाहती है।
लोकतंत्र में विपक्ष को समाप्त नहीं किया जाता—मजबूत किया जाता है।
यही अंतर यदि मिट गया तो लोकतंत्र केवल चुनावों का आयोजन रह जाएगा।
समापन : लोकतंत्र का ‘वार्षिक परिणाम’
कभी भारत में चुनाव आते थे तो दीवारों पर नारे लिखे जाते थे—
“जनता की सरकार।”
आज वही दीवार डिजिटल हो गई है।
नारे LED हो गए हैं।
प्रचार डेटा-driven हो गया है।
नेता ब्रांड हो गए हैं।
मतदाता target audience हो गया है।
और राजनीतिक दल धीरे-धीरे corporate management सीख रहे हैं।
लेकिन लोकतंत्र की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि—
कंपनी का ग्राहक खरीदकर निकल जाता है; नागरिक अपनी चुनी हुई सरकार के निर्णयों के साथ पाँच वर्ष जीता है।
इसलिए राजनीति को कंपनी की तरह कुशल होना बुरा नहीं है।

उसे कंपनी की तरह अपारदर्शी, लाभ-केंद्रित और नेतृत्व-केंद्रित होना खतरनाक है।
भाजपा कांग्रेस सपा से पूछा जाना चाहिए कि उसकी विशाल वित्तीय शक्ति लोकतांत्रिक प्रतिस्पर्धा को कितना प्रभावित करती है।

Sunday, 23 August 2026

मनुस्मृति

#पांचवांस्तंभ 
#मनुस्मृति - 
           आज जिस मनु स्मृति के नाम लेकर सनातन को गरियाने का प्रपंच विभिन्न मंचों से जार्ज सोरेस के पिठ्ठू कर रहे है उन्हें पता होना चाहिए कि मनु स्मृति न तो कोई नित्य पूजनीय धार्मिक ग्रंथ है न ही कोई कानूनन प्रतिबंधित साहित्यिक कृति है. न ही स्वतंत्र भारत वर्ष की संवैधानिक व्यवस्था में उसकी कोई कानूनी मान्यता है.!!!
           मनु स्मृति तात्कालिक राज व्यवस्था की तत्समय की सामाजिक व्यवस्था की नीति निर्धारक संहिता पुस्तक है जिसे समकालीन परिस्थितियों के रूप में ही जानना समझना हर समाजशास्त्री के लिए अध्ययन का विषय है क्योंकि उसके बहुसंख्यक प्रसंग आज भी मानव सभ्यता की अमूल्य निधि है..!!!
         आज मनु स्मृति के आधार पर न तो भारत का संविधान है न ही कानून व्यवस्था है न ही कोई सर्व मान्य सामाजिक व्यवहार है इसलिए मनु स्मृति को लेकर वर्तमान भारतीय समाज को लांक्षित करने का प्रयास एक विदेशी सोच की नियोजित सनातन विरोधी कुंठा है ..!!!
         मनु स्मृति का विरोध वस्तुत: प्रकारांतर सनातन गरिमा को धूमिल करने का कुचक्र है क्योंकि ऐसी मंचीय धृष्टता के दायरे में शरीयत शासन में मध्ययुगीन धार्मिक ग्रंथों के ज्यों का त्यों लागू करने का कोई उल्लेख आपने कहीं नहीं पाया होगा तो उनका तो नाम भी लेने में मैकाले पुत्र कांपते हैं..!!!
        जिस स्मृति ग्रन्थ की कोई विधि व्यवस्था नहीं है उसे लेकर सनातन स्मृति परम्परा को स्त्री विरोधी बताना दरसल सनातन विरोधी कुकृत्य है क्योंकि नारी सम्मान सनातन की धुरी है धुरी थी धुरी रहेगी इसे किसी विदेशी मानस संतति से सर्टिफिकेट की जरूरत नहीं है..!!!
      विचित्र केतु जैसे स्व नाम धन्य हालिया मनु स्मृति को कोस कोस कर उसके नाम पर नारी शक्ति के ठेकेदार बनने का जो नाटक कर रहे है उन्हें दूसरे पंथ की किताबों के स्त्री विरोधी उद्धरण देने में लकवा मार जाता है वैसे भी ऐसे तत्वों की महिला सशक्तिकरण की असलियत शाहबानो- तीन तलाक प्रकरण में दुनिया देख चुकी है और हालिया देख भी रही है..!!!
        मनु स्मृति भारतीय लोकतांत्रिक परम्परा का ऐसा हिस्सा है जो आलोचना समीक्षा से परे नहीं है उसकी समालोचना निरंतर होती रही है आगे भी होती रहनी चाहिए इस पर किसी सनातनी को कोई आपत्ति न थी न है न रहेगी उसके हर प्रसंग पर आम सहमति भी नहीं है ..!!!
       ऐसे में मनु स्मृति के नाम पर पूरी सनातन परंपरा को निशाने पर लिया जाना पूर्णतः सोचा समझा साम्प्रदायिक कृत्य है..बाकी जो पूरी मनुस्मृति न पढ़ पाए न समझ पाए उन्हें बौद्धिक समाधान हेतु आदरणीय श्री मनोज श्रीवास्तव सर की मनु स्मृति पर फेस बुक पोस्ट की श्रृंखला अवश्य पढ़नी चाहिए .. सत्यमेव जयते ..!!!
सादर -बृजेश कुमार त्रिपाठी

अंबेडकर

1927 में ब्रिटिश सरकार ने भारत के शासन को सुधारने के लिए एक कमीशन बनाया। इसका नाम साइमन कमीशन पड़ा क्योंकि इसके अध्यक्ष सर जॉन साइमन थे। इसमें 7 ब्रिटिश सांसद थे— और कोई भी भारतीय इसका सदस्य नहीं था। इसलिए कांग्रेस, मुस्लिम लीग और कई अन्य दलों ने इसका बहिष्कार किया। पूरे देश में “सायमन गो बैक” के नारे लग रहे थे।

लेकिन एक फलाना आदमी था जिसने इस अंग्रेज़ी कमिशन का बहिष्कार नहीं किया। वो बॉम्बे लेजिस्लेटिव काउंसिल की तरफ से प्रांतीय समिति का मेंबर बना और इस कमीशन के सामने आया। 23 अक्टूबर 1928, पूना में सर जॉन साइमन और अन्य सदस्यों के सामने उसने साफ कहा:---
"हम लोग "दा-ललित" हैं। और "दा-ललित" "हैंड-डू" समुदाय का हिस्सा नहीं है। बल्कि अलग और स्वतंत्र है। हम शिक्षा, पैसा और समाज में उनसे पिछड़े हैं। "हैंड-डू" नहीं हैं हम। इसलिए हमें उन (हैंड-डू) लोगों से मौसमलाम लोगों से भी ज्यादा राजनीतिक सुरक्षा चाहिए।"

सोर्स : फलाने की किताब Dr /B /R /AM : राइटिंग्स एंड स्पीचेस वॉल्यूम 2 में वो मेमोरेंडम और गवाही छपी हुई है। व्हाट्सप्प यूनिवर्सिटी, या औंध-भोक्त कह कर अपना दिल हल्का ना करें। क्योंकि जितना तुमको ज्ञान है, उतना मैं समाज में बांट कर भूल चुका हूँ।

(कुछ शब्द बिगाड़ दिए हैं क्योंकि बात की रीच कम हो जाती है सच लिखने से।)

चलो जो है, जो था, वो भी ठीक है। पर मुकेश जोशी का कहना है कि जब तुमने खुद को हैंड-डू माना ही नहीं, तो अब हैंड-डू रहकर, खुद को हैंड-डू जातियों की पैदाइश बता कर R-रकक्षण की मलाई लेने का क्या तुक है । तुम कह दो कि तुम हैंड-डू नहीं हो, तुम्हारी जाति, स्वतः ख़त्म हो जाएगी। और तुम्हारा तथाकथित चोचन भी । तुम्हें सदियों तलक क्यों चोचित ही बने रहना है। 💀

और एक बात। इसी साइमन कमिशन की वजह से लाला लाजपत राय की मौत हुई थी। इसी की कड़ी में भगत सिंह राजगुरु सुखदेव को फांसी हुई थी। 

मगर फलाने थे कि इन अंग्रेज़ो की चापलूसी में कोर्ट पहने, टाई लगाए, पलकें बिछाए खड़े रहते थे। 💀💀
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मुकेश जोशी ✍️
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कड़वा सच लिखना ही मेरा शौक है। सच सुनने का हौसला हो तो मुकेश जोशी को फॉलो करें। 🔥

स्तन टैक्स

ऐसी गलती ना करो... यही तो चाहते हैं अंबेडकरवादी
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- दिलीप पाण्डेय

हमारे देश के कुछ सामान्य वर्ग के क्रिएटर और लेखक बहुत बड़ी गलती कर रहे हैं । 

मटका झाडू और स्तन टैक्स की झूठी अवधारणाएं वामपंथियों और अंबेडकरवादियों द्वारा फ्लोट की गईं । आज जाने अनजाने कुछ सामान्य वर्ग के ही लोग अंबेडकरवादियों के झूठे नैरेटिव का हिस्सा बन रहे हैं ।

कई पोस्ट में लगातार देख रहा हूं कि अंबेडकरवादियों को जवाब में ये लिखा जा रहा है कि

तुम खुद भेजते थे अपनी मां को स्तन टैक्स देने हमारी क्या गलती है ? (ऐसे जवाब भोले भाले दलितों को दिखाकर भड़काया जा रहा है)

इसी तरह दलित माता नाम से फर्जी वीडियो कुछ सामान्य वर्ग के क्रिएडिव लेकिन मूर्ख लोगों के द्वारा गीत बनाकर प्रचारित किए जा रहे हैं जिसमें ये लाइन लिखी जा रही है कि दलित माता ने झाडू और मटका हटा दिया । जो कभी लगा ही नहीं वो हटाया कैसे जा सकता है ?

दोनों नैरेटिव झूठ हैं अगर कोई ये सब बोले तो उसको ये उत्तर दीजिए जो मैं लिख रहा हूं-

1- झाडू मटका बांधा गया- अंबेडकर ने खुद बहुत कोशिश की थी कि उनको इसका कोई प्रमाण मिल जाए लेकिन वो कोई प्रमाण नहीं दे सके । उन्होंने अपने साहित्य में इसका जिक्र भी किया है कि उनके पास इस घटना का कोई सबूूत ही नहीं है ।

2- स्तन टैक्स- ये केरल के त्रावणकोर साम्राज्य की घटनाएं कहकर झूठी प्रचारित की जाती हैं । पहली बात ये कि त्रावणकोर साम्राज्य के राजा नायर जाति के होते थे और नायर जाति केरल में ओबीसी के तहत आती है । इस साम्राज्य का सामान्य वर्ग से कोई रिश्ता ही नहीं है । दूसरी बात ऐसे फोटो मौजूद हैं कि तब त्रावणकोर के राजपरिवार की स्त्रियों के स्तन भी खुले हुए थे तो क्या वो भी स्तन टैक्स दे रही थीं ? इन्हीं तस्वीरों से ही ये प्रोपागेंडा पहले ही ध्वस्त हो चुका है ।

आप सभी सामान्य वर्ग के लोगों से निवेदन है कि व्यंग्य कसते वक्त भी इस तरह के झूठे नैरिटिव का हिस्सा कभी ना बनें नहीं तो एक झूठ बात सच हो जाएगी और इसका नुकसान आपको तो नहीं लेकिन आपकी आने वाली पीढ़ियों को पक्का उठाना पड़ेगा ।

क्योंकि आम तौर पर देश के लोग व्यंग्य को व्यंग्य की तरह ही देखें, या आपका व्यंग्य समझ पाएं, ये कोई जरूरी नहीं है ।

URGENT PLS SHARE

बाकी मोदी तो खुद ही हिसाब चुक्ता करने की बात करता है वो खुद गलत नैरेटिव को आगे बढ़ा रहा है इसलिए आपकी चुनौतियां और ज्यादा बड़ी हैं । ये ध्यान रखना ।

-दिलीप पाण्डेय

Saturday, 22 August 2026

नहुष मेरा देवता भी और ऊंचा उठे मेरे साथ_

मेरा देवता भी और ऊंचा उठे मेरे साथ
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भारतीय पुराणों ने मनुष्य को सत्ता के बारे में बहुत पहले ही सावधान कर दिया था। इतना पहले कि तब न चुनाव होते थे, न प्रेस-कॉन्फ्रेंस, न सर्वेक्षण एजेंसियाँ, न सोशल मीडिया की ट्रोल-सेना। फिर भी सत्ता के चरित्र को लेकर मनुष्य की बीमारी वही थी—सिंहासन मिलते ही आदमी अपने कद को भूल जाता है और सिंहासन की ऊँचाई को अपना कद समझने लगता है।

महाराज नहुष इसका प्राचीनतम और शायद सबसे सुंदर उदाहरण हैं।
इंद्र के लुप्त हो जाने पर देवताओं ने नहुष को इंद्रपद दिया। नहुष में तेज था, तप था, पुण्य था, योग्यता थी। किंतु सत्ता की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि वह अयोग्य को योग्य नहीं बनाती—वह कई बार योग्य को भी अपने भ्रम में अयोग्य बना देती है।

नहुष को इंद्रासन मिला तो भीतर का मनुष्य धीरे-धीरे बाहर के पद में घुलने लगा। जो कभी विनम्र था, वह ऐश्वर्य का अभ्यासी हुआ। फिर अधिकार का अभ्यासी। फिर अधिकार के प्रदर्शन का। और अंततः उसे लगा कि देवताओं के ऊपर बैठने वाला व्यक्ति देवताओं से ऊपर हो गया है।
यहीं से पतन शुरू हुआ।

कहानी का सबसे मार्मिक दृश्य तब आता है जब नहुष ने सप्तर्षियों को अपनी पालकी उठाने के लिए लगा दिया। ऋषि पालकी ढो रहे थे और इंद्रासन पर बैठा हुआ नहुष अपने को विश्व का स्वामी समझ रहा था। अगस्त्य मुनि की चाल स्वाभाविक रूप से धीमी थी। नहुष अधीर हुआ।

“सर्प! सर्प!”—कहा जाता है कि उसने शीघ्र चलने के लिए प्रेरित किया।
और फिर सत्ता का व्याकरण बदल गया।
उसने अगस्त्य को पैर से स्पर्श किया। ऋषि का शाप मिला—“सर्प योनि में जाओ।”
नहुष गिरा।
जिस ऊँचाई पर वह पहुँचा था, उससे कहीं अधिक ऊँचाई से।

यह केवल एक राजा के सर्प बनने की कथा नहीं है। यह भारतीय राजनीतिक दर्शन का एक अद्भुत रूपक है।

सत्ता जब सेवा से कट जाती है, तो पहले वह अहंकार बनती है; अहंकार जब आलोचना से कट जाता है, तो उन्माद बनता है; और उन्माद जब मर्यादा से कट जाता है, तो पतन बन जाता है।

आज नहुष हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन नहुषत्व बिल्कुल जीवित है।

आज सप्तर्षियों को पालकी उठाने के लिए बुलाने की आवश्यकता नहीं। सत्ता ने तकनीक विकसित कर ली है। अब पालकी दिखाई नहीं देती; कुर्सी दिखाई देती है। ऋषि दिखाई नहीं देते; अधिकारी, कर्मचारी, समर्थक, पत्रकार, विशेषज्ञ, पार्टी कार्यकर्ता और नागरिक दिखाई देते हैं। और सबसे सुविधाजनक बात यह है कि पालकी भी अब अदृश्य है।

सत्ता में बैठे व्यक्ति को अब यह कहने की आवश्यकता नहीं पड़ती कि “मुझे उठाओ।”
व्यवस्था स्वयं उठाती है।

दरवाज़े स्वयं खुलते हैं। रास्ते स्वयं साफ होते हैं। स्वागत स्वयं होता है। कैमरे स्वयं घूमते हैं। जयकारे स्वयं उत्पन्न होते हैं। समर्थक स्वयं प्रमाणपत्र देते हैं कि जो हो रहा है, वह ऐतिहासिक है।

इतिहास भी बेचारा कई बार सोचता होगा—“मुझे कब बुलाया गया?”

सत्ता का नैतिक पतन किसी एक बड़े अपराध से नहीं होता। वह छोटी-छोटी सुविधाओं से शुरू होता है।
पहले नेता को सुरक्षा घेरे की आदत होती है।
फिर प्रशंसा की।
फिर विरोध से असुविधा होने लगती है।
फिर प्रश्न पूछने वाला शत्रु दिखाई देता है।
फिर आलोचक राष्ट्र-विरोधी, व्यवस्था-विरोधी, विकास-विरोधी या किसी अन्य सुविधाजनक श्रेणी में रख दिया जाता है।

और अंत में राजा को राजा नहीं, अवतार समझने वाले लोग चारों ओर खड़े हो जाते हैं।
यही नहुष का संकट था।

और यही किसी भी लोकतंत्र का संकट है।
लोकतंत्र में सिंहासन नहीं होना चाहिए—लेकिन कुर्सियाँ कभी-कभी सिंहासन से भी अधिक खतरनाक हो जाती हैं। क्योंकि सिंहासन पर बैठने वाला राजा जानता था कि उसके ऊपर देवता हैं, ऋषि हैं, धर्म है, लोकमत है और अंततः मृत्यु है।

आधुनिक सत्ता में समस्या यह है कि आदमी के पास पाँच साल का कार्यकाल होता है और उसके चारों ओर पाँच हजार लोग होते हैं जो उसे बताते रहते हैं कि वह अमर है।
यहाँ नहुष फिर मुस्कुराते हैं।

उन्हें याद आता है कि उन्होंने भी कभी सोचा था कि इंद्रासन स्थायी है।

सत्ता का सबसे बड़ा छल यही है कि वह अपने धारक को अस्थायित्व भूलने देती है।
कुर्सी स्थायी नहीं होती, लेकिन कुर्सी पर बैठे व्यक्ति की स्मृति बहुत जल्दी स्थायी हो जाती है।
उसे लगता है—यह सब मेरे कारण है।
वह भूल जाता है कि लोकतंत्र में जनता ने उसे नियुक्त नहीं, उधार दिया है।
जनादेश स्वामित्व-पत्र नहीं होता।
वह एक अस्थायी विश्वास है।

लेकिन जब विश्वास को अधिकार समझ लिया जाता है, तब नैतिकता धीरे-धीरे सरकारी फाइल की तरह नीचे दब जाती है।
और सत्ता पक्ष का नैतिक पतन यहीं से आरंभ होता है।

विरोधी दलों की गलतियाँ गिनाने में सत्ता जितनी दक्ष होती है, अपनी गलतियों को देखने में उतनी ही अंधी।

यह भी नहुष की ही परंपरा है।
क्योंकि अहंकार का सबसे मनोरंजक गुण यह है कि उसे आईना पसंद नहीं आता।
उसे चित्र पसंद आता है।
आईना बताता है—चेहरे पर दाग है।
चित्र बताता है—चेहरा शानदार है।
इसलिए सत्ता को आईने से अधिक चित्रकार चाहिए।

आज के चित्रकार आधुनिक हैं। वे शब्दों से चित्र बनाते हैं। आँकड़ों से बनाते हैं। प्रचार से बनाते हैं। उपलब्धियों की ऐसी माला बनाते हैं जिसमें कभी-कभी फूल कम और प्लास्टिक अधिक होता है।
पर जनता की आँखें अंततः चित्र से नहीं, जीवन से निर्णय करती हैं।
रसोई में महँगाई का दर्शन अलग होता है।
बेरोजगार युवक के कमरे में विकास की परिभाषा अलग होती है।
किसान के खेत में अर्थव्यवस्था का रंग अलग होता है।
और अस्पताल की कतार में नागरिकता का अनुभव किसी भाषण से बिल्कुल अलग।

राजनीति की विडंबना यह है कि सत्ता अक्सर राष्ट्र को नक्शे पर देखती है और जनता उसे रसोई, खेत, नौकरी, सड़क, विद्यालय और अस्पताल में देखती है।
यहीं नैतिकता और प्रचार के बीच दूरी पैदा होती है।
नहुष की कथा हमें यह नहीं बताती कि सत्ता बुरी है।
वह बताती है कि सत्ता के सामने मनुष्य की परीक्षा शुरू होती है।
योग्यता ने नहुष को ऊपर पहुँचाया था।
लेकिन चरित्र उसे वहाँ टिकाकर नहीं रख सका।
यही किसी भी सत्ता पक्ष के लिए सबसे बड़ा पाठ होना चाहिए।

किसी सरकार की सफलता केवल इस बात में नहीं है कि उसने कितनी सड़कें बनाईं, कितने भवन बनाए, कितनी योजनाएँ घोषित कीं या कितने चुनाव जीते।
उसकी वास्तविक सफलता इस बात में है कि सत्ता मिलने के बाद उसके भीतर विनम्रता कितनी बची।
क्या वह अपने आलोचक को सुन सकती है?
क्या वह अपनी भूल स्वीकार सकती है?
क्या वह अपने समर्थक को भी गलत कह सकती है?
क्या वह कानून को अपने विरोधी और अपने समर्थक के लिए समान रख सकती है?
क्या वह यह स्मरण रख सकती है कि जनता प्रजा नहीं है?
और सबसे महत्वपूर्ण—
क्या वह अगस्त्य को पैर लग जाने पर शाप से पहले क्षमा माँग सकती है?

नहुष की कथा का आधुनिक संस्करण शायद यही होगा।
एक दिन सत्ता की पालकी रुकती है।
नीचे खड़े लोग थक चुके होते हैं।
ऊपर बैठा हुआ व्यक्ति चिल्लाता है—“जल्दी चलो!”
कोई धीरे से कहता है—
“महाराज, हम थक गए हैं।”
सत्ता कहती है—
“तुम्हें समझ नहीं कि मैं कौन हूँ?”
और इतिहास बहुत धीरे से उत्तर देता है—
“हमें अच्छी तरह मालूम है। इसी लिए तो पालकी नीचे रख दी है।”
इतिहास का हास्य बड़ा निर्मम होता है।
वह किसी को तत्काल दंड नहीं देता।
वह पहले उसे ऊँचा उठाता है।
फिर उसकी स्मृति में उसका अहंकार सुरक्षित रखता है।
फिर समय बीतने देता है।
और जब लोग उस व्यक्ति का नाम लेते हैं, तो उसके महलों, भाषणों और विजय से अधिक उसकी भूल याद आती है।
नहुष इसलिए अमर नहीं हुए कि वे इंद्र बने थे।
वे इसलिए अमर हुए कि इंद्र बनकर भी मनुष्य रहना भूल गए थे।

आज के सत्ता पक्ष के लिए इससे बड़ा व्यंग्य और क्या होगा कि लोकतंत्र ने राजाओं को समाप्त कर दिया, लेकिन राजसी मानसिकता को नहीं।

राजा चला गया।
राजत्व बचा रहा।
सिंहासन चला गया।
सिंहासन-बोध बचा रहा।
और पालकी उठाने वाले सप्तर्षि अब भी कहीं न कहीं मौजूद हैं।
बस फर्क इतना है कि आज उनके हाथ में संविधान है।

और यदि कभी कोई नहुष फिर यह समझ बैठे कि संविधान उसके नीचे है, तो उसे नहुष की कथा एक बार फिर पढ़ लेनी चाहिए।
क्योंकि भारतीय परंपरा का सबसे गहरा राजनीतिक संदेश शायद यही है—
सत्ता सिर पर रखी जाने वाली वस्तु नहीं है; वह सिर झुकाने की परीक्षा है।

जो सिर झुका सकता है, वही लंबे समय तक ऊँचा रह सकता है।
और जो अपने लिए सप्तर्षियों को पालकी ढोने पर मजबूर करता है, उसके लिए इतिहास के पास एक ही पुराना शब्द है—
नहुष।