Friday, 10 July 2026

नीत्शे

नीत्शे का यह उद्धरण पहली नज़र में अकेलेपन की बात करता हुआ लगता है, लेकिन वास्तव में यह मनुष्य की चेतना, सत्य और अस्तित्व की सबसे गहरी त्रासदी की ओर संकेत करता है। 

"True loneliness does not begin in the absence of people, but in the moment a man sees through every mask and can no longer pretend."

अर्थात सच्चा अकेलापन तब शुरू नहीं होता जब हमारे आसपास लोग नहीं होते, बल्कि तब शुरू होता है जब मनुष्य हर मुखौटे के पार देखना सीख जाता है और स्वयं भी दिखावा करना छोड़ देता है।

सामान्य रूप से हम अकेलेपन को लोगों की अनुपस्थिति से जोड़ते हैं। हमें लगता है कि यदि परिवार, मित्र, प्रेम या समाज हमारे साथ हो तो हम अकेले नहीं होंगे। लेकिन नीत्शे का कहना इससे बिल्कुल अलग है। उनके अनुसार सबसे बड़ा अकेलापन भीड़ के बीच पैदा होता है। यह वह क्षण होता है जब व्यक्ति समझ जाता है कि अधिकांश संबंध सुविधा पर टिके हैं, अधिकांश मुस्कानें औपचारिक हैं, अधिकांश नैतिकताएँ समाज द्वारा थोपी गई हैं, और अधिकांश लोग अपने वास्तविक स्वरूप में नहीं बल्कि मुखौटों के साथ जी रहे हैं। कोई सफलता का मुखौटा पहनता है, कोई धार्मिकता का, कोई प्रेम का, कोई विनम्रता का और कोई शक्ति का। धीरे-धीरे मनुष्य देखता है कि दुनिया का बड़ा हिस्सा अभिनय कर रहा है। यह समझ जितनी गहरी होती जाती है, उतना ही वो भीतर समाज से अलग होने लगता है।

लेकिन नीत्शे केवल दूसरों के मुखौटों की बात नहीं कर रहे। सबसे कठिन क्षण वह होता है जब व्यक्ति अपने ही चेहरे पर लगे मुखौटे को पहचान लेता है। वह देखता है कि उसने भी वर्षों तक समाज को खुश करने के लिए एक कृत्रिम व्यक्तित्व बनाया था। उसने वही बनने की कोशिश की जो लोग उससे चाहते थे। उसने अपने वास्तविक विचारों, इच्छाओं, भय और सपनों को छिपाकर रखा ताकि उसे स्वीकार किया जा सके। जब यह भ्रम टूटता है, तब पहली बार उसका सामना अपने वास्तविक अस्तित्व से होता है। यही वह क्षण है जहाँ अस्तित्ववादी दर्शन आरंभ होता है।

अस्तित्ववाद कहता है कि मनुष्य पहले अस्तित्व में आता है और फिर अपने अर्थ का निर्माण करता है। दुनिया उसे कोई निश्चित उद्देश्य नहीं देती। कोई अंतिम उत्तर पहले से तैयार नहीं होता। इसलिए मनुष्य को अपने जीवन का अर्थ स्वयं बनाना पड़ता है। लेकिन अधिकांश लोग इस स्वतंत्रता से डरते हैं। वे समाज, धर्म, परंपरा या भीड़ द्वारा दिए गए तैयार उत्तरों में शरण लेते हैं। इससे जीवन आसान लगता है क्योंकि तब स्वयं सोचने की ज़िम्मेदारी समाप्त हो जाती है। परंतु जो व्यक्ति स्वयं प्रश्न पूछता है, स्वयं सत्य खोजता है और हर भ्रम की परत हटाने लगता है, वह धीरे-धीरे भीड़ से अलग हो जाता है।

यहीं से सच्चा अकेलापन जन्म लेता है। यह अकेलापन कमरे में अकेले बैठने का नहीं, बल्कि चेतना का अकेलापन है। अब वह पहले जैसी बातचीत नहीं कर सकता क्योंकि उसे शब्दों के पीछे छिपे स्वार्थ दिखाई देने लगते हैं। वह पहले जैसी प्रशंसा स्वीकार नहीं कर सकता क्योंकि उसे उसमें अपेक्षाएँ दिखाई देती हैं। वह पहले जैसी मान्यताओं पर विश्वास नहीं कर सकता क्योंकि उसने उनके भीतर के विरोधाभास देख लिए हैं। उसकी आँखें खुल चुकी हैं, और जो एक बार सच देख लेता है, उसके लिए पुराने भ्रमों में लौटना लगभग असंभव हो जाता है।

नीत्शे के विचारों में यह स्थिति "ऊँचे मनुष्य" की यात्रा का हिस्सा है। जो व्यक्ति सामान्य चेतना से ऊपर उठने की कोशिश करता है, उसे भीड़ की स्वीकृति नहीं मिलती। वह अक्सर गलत समझा जाता है, उसका उपहास किया जाता है, या उससे दूरी बना ली जाती है। क्योंकि सत्य हमेशा आरामदायक नहीं होता। सत्य मनुष्य से उसका भ्रम छीन लेता है, और अधिकांश लोग भ्रम खोना नहीं चाहते। इसलिए सत्य देखने वाला व्यक्ति अक्सर अकेला रह जाता है।

यहाँ एक और गहरी बात छिपी है। नीत्शे कहते हैं कि जब व्यक्ति दिखावा करना छोड़ देता है, तभी उसका वास्तविक जीवन शुरू होता है। अब वह केवल इसलिए मुस्कुराता नहीं क्योंकि समाज उससे मुस्कुराने की अपेक्षा करता है। अब वह केवल इसलिए किसी विचार को स्वीकार नहीं करता क्योंकि बहुमत उसे सही मानता है। अब वह केवल इसलिए प्रेम नहीं करता क्योंकि अकेले रहने से डरता है। वह अपने हर निर्णय की ज़िम्मेदारी स्वयं लेने लगता है। यही स्वतंत्रता है, और यही स्वतंत्रता सबसे भारी बोझ भी है।

अस्तित्ववादी दार्शनिकों ने बार-बार कहा कि स्वतंत्रता और अकेलापन एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। जब तक कोई व्यक्ति भीड़ के अनुसार जीता है, तब तक उसे अकेलापन कम महसूस होता है क्योंकि भीड़ उसे पहचान देती है। लेकिन जैसे ही वह स्वयं के अनुसार जीना शुरू करता है, वह भीड़ से दूर होने लगता है। अब उसकी पहचान बाहर से नहीं, भीतर से आती है। यही कारण है कि गहरे विचारक अक्सर अकेले दिखाई देते हैं। उनका अकेलापन लोगों की कमी नहीं, बल्कि चेतना की गहराई का परिणाम होता है।

यह उद्धरण हमें यह भी सिखाता है कि हर मुखौटा हटाना सुखद अनुभव नहीं होता। सच कभी-कभी बहुत कठोर होता है। जब भ्रम टूटते हैं, तब व्यक्ति शून्यता का अनुभव करता है। उसे लगता है कि जिन चीज़ों पर उसने भरोसा किया था, वे स्थायी नहीं थीं। जिन लोगों को वह पूरी तरह समझता था, वे भी अपने-अपने अभिनय में बंधे हुए थे। और सबसे बड़ा झटका तब लगता है जब वह स्वयं को भी एक अभिनय करते हुए पकड़ लेता है। यह पीड़ा आवश्यक है, क्योंकि इसी से वास्तविक आत्मबोध जन्म लेता है।

नीत्शे के अनुसार जीवन का उद्देश्य आराम नहीं, बल्कि आत्म-विकास है। जो व्यक्ति सत्य के कारण अकेला पड़ जाता है, वह वास्तव में एक गहरी आंतरिक यात्रा पर निकल चुका होता है। उसका अकेलापन उसकी हार नहीं, बल्कि उसके जागरण की कीमत है। वह अब बाहरी स्वीकृति की बजाय अपने अंतःकरण के साथ जीना सीखता है। धीरे-धीरे वह समझता है कि सच्ची शक्ति भीड़ में घुल जाने से नहीं, बल्कि अपने सत्य के साथ खड़े रहने से आती है।

अंततः यह उद्धरण हमें एक कठिन लेकिन मुक्त करने वाला सत्य देता है। सच्चा अकेलापन लोगों की कमी से नहीं, बल्कि चेतना के जागरण से जन्म लेता है। जब मनुष्य हर मुखौटे के आर-पार देख लेता है, जब वह स्वयं भी अभिनय करने से इनकार कर देता है, तब उसका पुराना संसार समाप्त हो जाता है। उस क्षण वह बाहर से अकेला दिखाई दे सकता है, लेकिन भीतर पहली बार वह अपने वास्तविक अस्तित्व के साथ खड़ा होता है। यही अस्तित्ववादी दर्शन का मूल है—मनुष्य को भ्रमों में नहीं, बल्कि सत्य में जीना चाहिए, चाहे उस सत्य की कीमत गहरा अकेलापन ही क्यों न हो। क्योंकि वही अकेलापन अंततः आत्म-ज्ञान, प्रामाणिकता और वास्तविक स्वतंत्रता का द्वार बन जाता है।

🙏🙏 आदरणीय अजय तिवारी जी के पटल से साभार।

वेदार्थसाधन के कई नैरुक्त प्रकार होते हैं।

☹️एक सर्वज्ञ पाणिनि की पोस्ट और कमेण्ट में ''व्विज्ज्यं धनु:'' के विजयार्थ (भङ्गार्थ-भाँग) पर विपत्तियाँ बरस रही हैं। 

🔥ज्ञातव्य- वेदार्थसाधन के कई नैरुक्त प्रकार होते हैं। निरुक्त में "ऋचस्त्रिविधा:" कहकर "परोक्षकृता: प्रत्यक्षकृता आध्यात्मिक्यश्च" से वेदार्थ के त्रैविध्य का प्रतिपादन किया गया है। पुन: इन तीनों वेदार्थवृत्तियों के कई अवान्तर भेद भी हैं। वेदार्थ करने के लिए व्याकरण-कोशादि के साथ विनियोगज्ञान की आवश्यकता होती है। विनियोग में मन्त्र के ऋषि, छन्द, देवता और कर्मप्रयोग का बोध होता है। तदनन्तर ही अर्थवत्ता की तात्पर्यसिद्धि होती है- "ऋषिच्छन्दोsथ दैवत्यं विनियोगस्तथैव च। मन्त्रजिज्ञासमानानां वेदितव्यं पदे पदे।।" विनियोगज्ञान के बिना वेदार्थ की स्वल्पसिद्धि भी सम्भव नहीं। व्यापक विनियोगज्ञान के अभाव में "गणानान्त्वा" मन्त्र अश्वस्तावक बन कर रह जायगा; गणपतिस्तावक नहीं हो सकता। "शन्नो देवी" मन्त्र जलस्तावक तो रहेगा शनिग्रहस्तावक नहीं हो सकता। 

🔥नैरुक्त निर्वचनसिद्धान्त के अनुसार "अक्षरवर्णसामान्यान्निर्ब्रूयात्" वर्णसामान्य के साम्य से मन्त्र का विनियोग और विनियोगानुकूल अर्थ का निश्चय होता है। शाकपूणि ने और आगे बढ़कर "वर्णसाम्यान्निर्ब्रूते" कह दिया है; यानी दग्ध और अग्नि में गकार मात्र के साम्य से यथाप्रकरण वेदार्थ के लिए विनियोग की प्रवृत्ति हो जाती है। "दधिक्क्राव्व्ण:" में दधि शब्द के साम्य से "दधिस्नानादौ विनियोग:", "अक्क्षन्नमीमदन्त" में अक्ष के साम्य से "अक्षतार्पणे विनियोग:" आदि शास्त्रसिद्ध हैं। उसी प्रकार वैदिकसिद्धान्तों के मर्म्मज्ञ आप्त महानुभावों ने शिवार्चन में परम्परया "व्विज्ज्यं धनु:" का विजयास्नानादि में विनियोग किया है तो वह सर्वथा स्तुत्य और ग्राह्य है। आपकी गुरुपरम्परया तप:पूता वैदिकी मेधा हो तो तद्वत् ही वेदार्थ करने का प्रयास करें; सत्परम्परा पर प्रहार न करें। "वेदार्थस्यानन्त्यात्" वेद के अनन्त अर्थों की इयत्ता नहीं होती। पुन: अनावश्यक अत्यधिक वेदमन्त्रों को प्रसारित करते रहने वाले महाशय भी इस तप:साध्य वेदार्थप्रक्रिया पर ध्यान देते हुए फेसबुक के चौराहे पर वेदभगवान् को फेंकने से बचें। "बिभेत्यल्पश्रुताद्वेद:" को न भूलें एवम् आप वस्तुत: वेदभगवान् को किञ्चित् भी बोलना-समझना चाहते हैं तो "जपादौ नाधिकारोsस्ति सम्यक्पाठमजानत:। प्रातिशाख्यादिकं ज्ञेयं सम्यक्पाठस्य सिद्धये।।" पर चिन्तन करें। 

☹️ऐसे ही दो-चार सन्धि-विच्छेद रट लेने मात्र से वेदतुल्य श्रीमद्भागवतार्थ की सर्वार्थसिद्धि नहीं हो सकती। श्रीमद्भागवत के प्रथम पद्य में ही वेदान्त के "जन्माद्यस्य यत:" आदि मुख्यतम सूत्रचतुष्टय का व्याख्यान किया गया है और "मुह्यन्ति यत्सूरय:" कहकर वक्ता-श्रोताओं को सावधान भी कर दिया गया है। ध्यातव्य- पारमहंस्यसंहिता श्रीमद्भागवत में विद्यार्थियों की नहीं; "विद्यावतां भागवते परीक्षा" विद्यावानों की परीक्षा होती है। आप सच में सामर्थ्यवान् हैं तो श्रीमद्भागवत के प्रत्येक पद ही नहीं; प्रत्येक वर्ण में "शब्दात्मिका" भगवती श्रीराधा रानी का साक्षात्कार करें। सीतोपनिषत् में "प्रथमा शब्दमयी देवी" के अनुसार भगवती का प्रथम स्वरूप शब्दमय ही है। महाभागवत श्रीवंशीधरजी ने श्रीमद्भागवत के प्रथम श्लोक के सौ अर्थ किये हैं; जिनमें तीसवाँ अर्थ श्रीराधापरक ही है। बङ्गप्रदेश के महामहोपाध्याय श्रीपञ्चानन तर्करत्न भट्टाचार्यजी ने सम्पूर्ण ब्रह्मसूत्रों का शक्तिपरक भाष्य किया है। नैषधमहाकाव्यादि की भाष्यचमत्कृति से अचम्भित हुए बिना कोई विद्वान् रह नहीं सकते। "यथा प्रियङ्गुपत्रेषु गूढमारुण्यमिष्यते। श्रीमद्भागवते शास्त्रे राधिकातत्त्वमीदृशम्।।" जिस प्रकार प्रियङ्गुपत्रों के अण्वणु में आरुण्य है; परन्तु बाह्यचक्षुर्दृश्य नहीं होता। अपितु अङ्गुल्यादि के मर्द्दन से पत्राभ्यन्तर में प्रवेश करने की चेष्टा करते ही उनकी लालिमा प्रकट हो जाती है। उसी प्रकार श्रीमद्भागवत के बाह्य सन्धि-विच्छेदों से कृष्णप्राणेश्वरी श्रीराधा महारानी का साक्षात्कार सम्भव नहीं; परन्तु राधारमण श्रीकृष्ण का वाङ्मयविग्रह श्रीभागवतरूप भगवान् की आत्मा "आत्मा तु राधिका तस्य" भगवती राधिका श्रीमद्भागवत से पृथक् कैसे हो सकती हैं?। अत: प्रलापत्यागपूर्वक निश्छलबुद्ध्या भगवद्भागवतकृपया "यमेवैष वृणुते तेन लभ्य:" के लिए सदैव स्वेष्ट की आराधना-उपासना करते रहनी चाहिए...

एकादशी

🔴अजयमेरु और मयराष्ट्र के दो विद्वान् गृहस्थों ने एक ही समस्या पूछी कि 'वे स्वयं शांकरपरम्परा में दीक्षित हैं, उनके पुत्र रामानन्दपरम्परा में और एक की पुत्रवधू निम्बार्क्कपरम्परा में एवं दूसरी गौड़ीय परम्परा में दीक्षा ले चुकी है।' अस्तु-----
🔴बन्धो! उनके यहाँ एकादशी, जन्माष्ट्टमी आदि व्रतों में क्या किया जाय? स्मार्त्त लोग सूर्य्योदयवेध एकादशी सामान्येन नहीं करते, श्रीरामानन्दी आदि अरुणोदयवेध नहीं करते और निम्बार्की कपालवेध नहीं करते। क्या ऐसे गृहस्थ के एक ही परिवार में पृथक् दो-तीन एकादशी या दो जन्माष्ट्टमी आदि किये जायँ या एक ही? एक करें तो कौन वाला?

Thursday, 9 July 2026

शूद्रों को पढ़ने का अधिकार नहीं दिया गया।

शूद्रों को पढ़ने का अधिकार नहीं दिया गया। उन्हें संस्कृत ग्रंथों को पढ़ने का अधिकार नहीं दिया गया। उन्हें धर्मग्रंथों को पढ़ने का अधिकार नहीं दिया गया। चंडूखाने की ऐसी गप्पें आपने जरूर सुनी होंगी। 

शायद हमारे त्रिकालज्ञ ऋषि जानते रहे होंगे कि ऐसे प्रवाद भी रचे जायेंगे तो उन्होंने फलश्रुति की परम्परा विकसित की। 

अब उसके अनुसार स्थिति यों है: 

१.ब्रह्म पुराण (Brahma Purana)फलश्रुति: इसे 'आदिपुराण' भी कहते हैं। इसके श्रवण से ब्राह्मण वेदों और ब्रह्मज्ञान का ज्ञाता बनता है, क्षत्रिय संग्राम में विजयी होकर पृथ्वी का पालन करता है, वैश्य व्यापार में समृद्धि और शूद्र उत्तम आरोग्य तथा सुख-सम्मान प्राप्त करता है।

२. पद्म पुराण (Padma Purana)फलश्रुति: भगवान विष्णु के नाभि-कमल की महिमा वाले इस पुराण को सुनने से ब्राह्मण परम गति को पाता है, क्षत्रिय बल-पराक्रम से युक्त होता है, वैश्य को अटूट धन की प्राप्ति होती है और शूद्र सब पापों से छूटकर पवित्र हो जाता है।

३. विष्णु पुराण (Vishnu Purana)फलश्रुति: भगवान पराशर द्वारा रचित इस पुराण के पाठ से ब्राह्मण का आत्मबल और वाक-सिद्धि बढ़ती है, क्षत्रिय को शत्रुओं पर विजय मिलती है, वैश्य पशुधन और धान्य से समृद्ध होता है तथा शूद्र भगवान विष्णु की भक्ति पाकर श्रेष्ठ गति प्राप्त करता है।

४. वायु पुराण / शिव पुराण (Vayu / Shiva Purana)फलश्रुति: शिव-महिमा से ओतप्रोत इस पुराण को सुनने से ब्राह्मण को शिवसायुज्य (ज्ञान) मिलता है, क्षत्रिय का तेज बढ़ता है और वह अजेय बनता है, वैश्य का व्यापार देश-विदेश में फैलता है और शूद्र को समाज में उच्च सम्मान और सुख की प्राप्ति होती है।

५. श्रीमद्भागवत पुराण (Srimad Bhagavata Purana)फलश्रुति: भक्ति का सर्वोपरि ग्रंथ होने के कारण इसकी फलश्रुति आध्यात्मिक है। इसके श्रवण से ब्राह्मण को भक्तिरस और ज्ञाननिष्ठा, क्षत्रिय को धर्मपरायणता और न्यायपूर्ण विजय, वैश्य को निष्काम कर्म से शुद्धि और शूद्र को दुःखों से आत्यंतिक मुक्ति तथा भगवद-धाम मिलता है।यह भी कि: 

विद्याप्रकाशो विप्राणां राज्ञां शत्रुजयो विशाम् । धनं स्वास्थ्यं च शूद्राणां श्रीमद्भागवताद् भवेत्॥

६. नारद पुराण (Narada Purana)फलश्रुति: इस पुराण के अनुसार, इसे सुनने वाला ब्राह्मण जितेंद्रिय होकर तपस्वी बनता है, क्षत्रिय संकटों से मुक्त होकर राज्य सुख भोगता है, वैश्य ऋणों से मुक्त होकर धनवान बनता है और शूद्र का अंतःकरण शुद्ध हो जाता है।यह भी कि इसके पाठ से ब्राह्मण वेदोंका भण्डार होता है, क्षत्रिय इस भूतलपर विजय पाता है, वैश्य धन-धान्यसे सम्पन्न होता है तथा शूद्र सब प्रकारके दुःखोंसे छूट जाता है।

७. मार्कण्डेय पुराण (Markandeya Purana)फलश्रुति: इसमें 'दुर्गा सप्तशती' भी शामिल है। इसका पाठ करने से ब्राह्मण को मंत्रसिद्धि, क्षत्रिय को शौर्य और शत्रुओं का नाश, वैश्य को लक्ष्मी की स्थायी कृपा तथा शूद्र को भय, व्याधि और क्लेशों से सर्वथा मुक्ति मिलती है।

८. अग्नि पुराण (Agni Purana)फलश्रुति: इस ज्ञानकोषीय पुराण को सुनने से ब्राह्मण समस्त विद्याओं (चौदह विद्याओं) में पारंगत होता है, क्षत्रिय अस्त्र-शस्त्र और कलाओं में निपुण होकर विजयी होता है, वैश्य धन-धान्य का स्वामी बनता है और शूद्र सब प्रकार के भयों से मुक्त होकर सुख पाता है।

९. भविष्य पुराण (Bhavishya Purana)फलश्रुति: भविष्य की घटनाओं और सूर्योपासना से युक्त इस पुराण के श्रवण से ब्राह्मण तेजस्वी और ज्योतिर्विद बनता है, क्षत्रिय दीर्घजीवी राजा बनता है, वैश्य कृषि और वाणिज्य में अपार लाभ पाता है तथा शूद्र आरोग्यता और लंबी आयु प्राप्त करता है।

१०. ब्रह्मवैवर्त पुराण (Brahmavaivarta Purana)फलश्रुति: कृष्ण और राधा की लीलाओं वाले इस पुराण को सुनने से ब्राह्मण हरिभक्त और विद्वान बनता है, क्षत्रिय की कीर्ति दिगंत में फैलती है, वैश्य को महालक्ष्मी का वरदान मिलता है और शूद्र को संसार के सभी सुख और अंत में मुक्ति मिलती है।

११. लिंग पुराण (Linga Purana)फलश्रुति: भगवान शिव के लिंग स्वरूप की महिमा वाले इस ग्रंथ से ब्राह्मण निष्पाप होकर रुद्रलोक जाता है, क्षत्रिय का यश बढ़ता है, वैश्य धनवान बनता है और शूद्र जन्म-मरण के चक्र से छूटकर परम पद पाता है।

१२. वराह पुराण (Varaha Purana)फलश्रुति: पृथ्वी के उद्धार की कथा वाले इस पुराण से ब्राह्मण सदाचारी और वेदमार्गी होता है, क्षत्रिय भूमिपति बनता है, वैश्य व्यापारिक लाभ से संतुष्ट रहता है और शूद्र मानसिक शांति और दीर्घायु प्राप्त करता है।

१३. स्कन्द पुराण (Skanda Purana)फलश्रुति: सबसे बड़े इस पुराण के श्रवण से ब्राह्मण को गया-काशी आदि तीर्थों का संपूर्ण पुण्य मिलता है, क्षत्रिय दिग्विजयी होता है, वैश्य कुबेर के समान समृद्ध होता है और शूद्र सब पापों से मुक्त होकर शिवभक्ति प्राप्त करता है।

१४. वामन पुराण (Vamana Purana)फलश्रुति: भगवान विष्णु के वामन अवतार की इस कथा से ब्राह्मण का कुल पवित्र होता है, क्षत्रिय को शौर्य और पराक्रम मिलता है, वैश्य को उत्तम संतान और धन मिलता है तथा शूद्र को समाज में आदरणीय स्थान और सुख मिलता है।

१५. कूर्म पुराण (Kurma Purana)फलश्रुति: भगवान के कच्छप अवतार द्वारा कहे गए इस ज्ञान से ब्राह्मण को आत्मज्ञान, क्षत्रिय को न्यायप्रियता और तेज, वैश्य को दान-पुण्य की बुद्धि और संपत्ति तथा शूद्र को धर्म की प्राप्ति और पापों का क्षय मिलता है।

१६. मत्स्य पुराण (Matsya Purana)फलश्रुति: प्रलयकालीन नौका और वेदोद्धार की इस कथा के श्रवण से ब्राह्मण परम ज्ञानी बनता है, क्षत्रिय संकटों को पार कर विजयी होता है, वैश्य का कोष कभी खाली नहीं होता और शूद्र को समस्त ऐहिक (सांसारिक) सुख मिलते हैं।

१७. गरुड़ पुराण (Garuda Purana)फलश्रुति: प्रेत कल्प और सदाचार का विवेचन करने वाले इस पुराण के श्रवण से ब्राह्मण को सद्गति और ज्ञान, क्षत्रिय को अकाल मृत्यु से सुरक्षा, वैश्य को संकटों से मुक्ति और समृद्धि तथा शूद्र को दुर्गति से मुक्ति और उत्तम पुनर्जन्म या मोक्ष मिलता है।

१८. ब्रह्मांड पुराण (Brahmanda Purana)फलश्रुति: (इसमें 'ललिता सहस्रनाम' और 'अध्यात्म रामायण' समाहित हैं)। इसके पाठ से ब्राह्मण ब्रह्मलीन होने की योग्यता पाता है, क्षत्रिय चक्रवर्ती राजा बनने का पुण्य पाता है, वैश्य अक्षय धन का स्वामी बनता है और शूद्र समस्त मानसिक और शारीरिक कष्टों से मुक्त होकर कीर्तिमान बनता है।

पंचम वेद कहे जाने वाले महाभारत में यह थी:

ब्राह्मणो वामयीं सिद्धिं क्षत्रियो भूमिपालिताम्।वैश्यो लाभमवाप्नोति शूद्रः कीर्तिमवाप्नुयात्॥

और रामायण के लिए यह थी: 

पठन् द्विजो वागृषभत्वमीयात् स्यात् क्षत्रियो भूमिपतित्वमीयात्। वणिग्जनः पण्यफलत्वमीयाज्जनश्च शूद्रोऽपि महत्त्वमीयात्।।

(१.१.७९)

इस फलश्रुति में चारों वर्णों के लिए रामायण-पाठ का फल वर्णित है-

१. ब्राह्मण - वाणी में श्रेष्ठता

२. क्षत्रिय - भूमि का राज्य

३. वैश्य - वाणिज्य में लाभ

४. शूद्र - महत्त्व (महानता)

शूद्रों को यह सब पाठ-फल देना ही सिद्ध करता है कि उनसे इन ग्रंथों का पाठ अपेक्षित था। 

फिर भी दुराग्रह की ज़ुबान कौन पकड़ सकता है?

दलाई लामा

दलाई लामा के जन्म दिवस पर 
लामा परम्परा ओड़िशा से आरम्भ हुई थी। आचार्य नरेन्द्र देव की पुस्तक 'बौद्ध धर्म और दर्शन' बिहार राष्ट्रभाषा परिषद से प्रकाशित हुई थी। बाद में मोतीलाल बनारसीदास प्रकाशन ने पुनः प्रकाशित किया। इसमें दीपंकर बुद्ध का चरित्र वर्णित है। इन्होंने राजा सुचन्द्र को वज्र-योग का उपदेश दिया था। यह मार्ग वज्रयान कहा जाता है जिसमें उच्च कोटि की योग साधना की जाती है। इनके बुद्ध-तन्त्र का प्रचार हेवज्र ने किया तथा उस परम्परा में पद्म (सरोरुह) , वज्र, आनन्द-वज्र, अनङ्ग-वज्र हुये। अनङ्ग-वज्र का शिष्य ओडिशा का राजा इन्द्रभूति था जिसकी बहन लक्ष्मीङ्करा ने उनकी शिक्षा को गीतों के रूप में प्रचलित किया जिनको बंगाल में बाउल गीत कहा जाता है। इन्द्रभूति के पुत्र पद्मसम्भव ने तिब्बत में लामा परम्परा का आरम्भ किया। बौद्ध साधना शाक्त मत है जो ३६ तत्त्वों के शैव-दर्शन पर आधारित है। अतः इसके लिये ३६ अक्षरों की लिपि का प्रयोग होता था जो आज अरबी या लैटिन, रूसी है। बौद्ध विद्यालयों में सहपाठी को अबुस कहते थे जो प्रथम ३ वर्णों अ,ब, ज़ (a, b, c) का मिलन है। कम स्तर के व्यक्ति को केवल २ वर्णों से सम्बोधित किया जाता है-अबे (अलिफ + बे) जो तिरस्कार सूचक है। संख्या रूप में अबज़द् आदि १,२,-९ तक को सूचित करते थे। दहाई के अंक कलमन आदि से होते थे (k, l, m, n)। अतः कलाम का अर्थ गुरु, कलम = लेखनी, कलीम = विद्वान् आदि है। इसी प्रकार साधना करने वाले को अल्लामा कहा जाता है जो अ से ल तक (संस्कृत में अलम्) का ज्ञान रखता है। इसे ही लामा कहते हैं। लामा लोगों का प्रधान दलई-लामा है। दलई या दलवाइ ओडिशा, महाराष्ट्र, कर्णाटक में प्रचलित है।


बौद्ध जगन्नाथ और भुवनेश्वर महादेव मंदिर पर दावा कर रहे हैं। कहाँ उचित है?
 
उनके अनुसार वेद पुराण आदि भी बौद्ध शास्त्रों की निन्दा के लिए लिखे गये थे। केवल बुद्ध के बारे में पता नहीं है कि वे २८ बुद्धों में किस बुद्ध की बात कर रहे हैं। स्तूप वंश में २८ बुद्धों का वर्णन है, बौद्ध लेखक अश्वघोष के बुद्ध चरित में सिद्धार्थ बुद्ध ने अपने पूर्व के ७ बुद्धों का उल्लेख किया है। सिद्धार्थ के १३०० वर्ष बाद गौतम बुद्ध कौशाम्बी में हुए थे। फाहियान ने दोनों बुद्धों के अतिरिक्त ४ अन्य का समय तथा जन्म स्थान लिखा है। उसने सिद्धार्थ के आलोचक देवदत्त के मठों का उल्लेख किया है, जो सिद्धार्थ बुद्ध से अधिक लोकप्रिय थे। मौर्य अशोक के निगलिहवा शिलालेख में ४ बुद्धों का उल्लेख है।
कट्टर बौद्ध पुरी के जगन्नाथ मन्दिर का प्रसाद छूते भी नहीं हैं। वहां सम्मेलन में प्रायः वही खिलाया जाता है। बौद्ध विद्वान भूखे रह जाते हैं पर प्रसाद को देखते नहीं हैं।

Tuesday, 7 July 2026

गया श्राद्ध के बाद भी श्राद्ध अनिवार्य



*गया श्राद्ध के बाद भी श्राद्ध अनिवार्य*

धर्मशास्त्रानुसार गया में जिन पितरों का श्राद्ध कर दिया गया है, उनके लिये भी तर्पण-पिण्डदान आदि अनिवार्यत: करने ही चाहिये। 

मान लिया- किसी के पिता ने अपने पिता आदि का गयाश्राद्ध कर दिया था, पुन: जब उनके पुत्र उनका सपिण्डीकरण श्राद्ध करेंगे तो प्रेतरूप पिता से अतिरिक्त त्रिक या पितामह, प्रपितामह और वृद्धप्रपितामह का पिण्डसहित श्राद्ध किये बिना पिण्डसम्मेलन कैसे सम्भव होगा? 

अपने यहाँ किसी भी यज्ञ या संस्कार में पिण्डरहित या पिण्डसहित त्रिकश्राद्ध के बिना आभ्युदयिकश्राद्ध कैसे सम्पन्न होगा? 

गयाश्राद्ध करके लौटे हुए पिता का ही यथासमय उनके पुत्र जब पिण्डसहित पार्वणश्राद्ध करेंगे तो त्रिक के पिण्डदान बिना कैसे करेंगे?

अत: जिनका गयाश्राद्ध हो चुका है उनका भी यथासमय श्राद्ध-तर्पण करना अनिवार्य है। गया पितरों का तीर्थ है, वहाँ प्रतिवर्ष एक पक्ष के पितृमहोत्सव में सबके पितर श्राद्ध की अपेक्षा रखते हैं। पुन: पुन: अवसर मिले तो वहाँ श्राद्ध करना चाहिये। यह उत्तम है। पञ्चमहायज्ञों में भी पितृयज्ञ यानी श्राद्ध-तर्पण तो नित्य ही है।

कृत्यसारसमुच्चय पृ.२१८ आदि के अनुसार सपिण्डीकरणश्राद्ध हो जाने पर वर्षाभ्यन्तर में भी गयाश्राद्ध किया जा सकता है। सपिण्डीकरणश्राद्ध द्वादशाह में (प्राय: बारहवें दिन) होना चाहिये। पहले एक वर्ष में होता था।

यदि किसी के पिता संन्यासी हो जाने से, पतित हो जाने से या तर्पण की योग्यता अथवा श्रद्धा नहीं रखने से अपने पूर्वजों का श्राद्ध-तर्पण नहीं करते हैं तो पिता के जीवित रहते भी पुत्र को ही पितामहादि का श्राद्ध-तर्पण करना चाहिये।

कोई मिथ्या प्रचार करते हैं कि गयाश्राद्ध के बाद श्राद्ध-तर्पण नहीं करने से प्रत्यवाय नहीं होता है और करने से अच्छा होता है। यह निर्णय श्राद्ध-तर्पणादि के अनधिकारी किसी अशास्त्रीय व्यक्ति का हो सकता है, धर्मशास्त्र का नहीं। बड़े नाम और ऊँचे सिंहासन देखकर सनातनी श्रद्धालु भ्रमित न हों।

धर्मशास्त्रीय विचार बहुत सूक्ष्म होता है, आपके प्रश्नों के उत्तर सामान्य रूप से देने पड़ते हैं। सर्वत्र विशेष चर्चा की आवश्यकता होती है।

अस्तु.....

Monday, 6 July 2026

सरदार सिक्ख सिख



किसी भी निहंग या सरदार को पास बुलाकर कुछ सवाल पूछो ।

आपने हिंदुओं को बचाने के लिए कौन सी लड़ाई लड़ी ??

कोई एक लड़ाई बता दो। जबकि पंजाबीयो को बचाने के लिए राजपूत मराठा हमेशा पंजाब पहुंचे।

जब गुरु शहीद हो रहे थे तो आप लोग कहां पर थे??

कौन लोग थे जो खुद लड़ने की बजाय अपने धर्म गुरुओं को शहीद होने के लिए दिल्ली भेज दिए थे ??

बाद में उनके पवित्र शरीर को लेने तक नहीं पहुंचे।

पाकिस्तान किन लोगों ने लिया??

वही पंजाबी जो मुसलमान बन चुके थे। आज पाकिस्तान में सबसे बड़ी ताकत पंजाबी ही है। जबकि बलोच सिंधी और पठान पाकिस्तान की लड़ाई नहीं लड़े।

तो आप इतने मुसलमान बन ही क्यों ??

कि भारत के विभाजन हो गया।

पंजाबी लोग 80% मुसलमान बने (आज पाकिस्तान में 14 करोड़ है भारतीय पंजाब में सिर्फ 3 करोड़)

जबकि पहाड़ी 2% ही मुस्लिम बने।

फिर बताओ कौन किसका बाप है। बहादुर कौन है ??

आप लोग सिर्फ 6 हजार ही पाकिस्तान में क्यों रह गए??

उसमें से भी काफी लोग अपना धर्म बचाने राजपूतों के गढ़ सिंध के अमरकोट में क्यों शिफ्ट हो गए हो??

जहां आज भी 50 लाख हिंदू मुश्किल हालात में भी अपने धर्म साथ जुड़े हुए है।

आज पाकिस्तान में एक भी निहंग क्यों नहीं??

क्या आखिरी निहंग 1949 में ही मुसलमान बन गया था?

श्री करतारपुर साहब पंजाब बॉर्डर से सिर्फ 2 किलोमीटर दूर पाकिस्तान में है। आप उसको पंजाब में मिलने की मांग क्यों नहीं करते ? आप लोग मुसलमानो से इतना क्यों डरते हो ??

जबकि हिंदुओं से लड़ने के लिए कहीं भी पहुंच जाते हो।

"श्री हरमंदिर साहब की नींव मुस्लिम फकीर साईं मिया मीर ने रखी। ये झूठी कहानी आपने क्यों जोड़ी"। क्या सिर्फ मुसलमानो को खुश करना था।

क्या नींव रखने वाले गुरु रामदास की छवि धूमिल नहीं की गई ??

गुरु परिवार शहीद करने वाले और गुरु परिवार की महिलाओं की इज्जत से खिलवाड़ करने वाले नवाब शेर मोहम्मद अली खान के नाम का मलेरकोटला में आपने गुरुद्वारा क्यों बना दिया ??

क्या कोई हिंदू औरंगजेब का मंदिर बनाने की सोच भी सकता है??।

मुसलमानो की चमचागिरी करने में इतने गिर जाओगे।

साफ दिख रहा अगर आप सारे पाकिस्तान में रह जाते तो कब की सलवारे पहन के मुसलमान हो चुके होते।