Thursday, 16 July 2026

अमोघ शिवकवच

अमोघशिवकवच (१८)

नेत्रे ममाव्याद् भगनेत्रहारी - यह बात कि भगनेत्रहारी नेत्रों की रक्षा करें, बिना दक्षयज्ञ को समझे समझ न आएगी।अपनी पुस्तक ‘देवाधिदेव’ में मैं दक्षयज्ञ और सती प्रसंग की व्याख्या कर चुका हूँ, अत: उसे यहाँ दोहराऊँगा नहीं।

प्रश्न तो यही है—जो आँखें निकाल सकता है, वही आँखों का रक्षक कैसे हो सकता है?ऋषि को यदि केवल शिव की स्तुति करनी होती, तो "त्रिलोचन", "विश्वनाथ", "शम्भु", "महेश" जैसे असंख्य नाम थे। पर उसने जान-बूझकर एक ऐसा नाम चुना जो साधक को झकझोर दे। तो आइए, पहले कथा को समझें।

भग" वैदिक देवताओं में से एक हैं।ऋग्वेद में भग आदित्यों में गिने जाते हैं। उनका सम्बन्ध भाग, सौभाग्य, समृद्धि, ऐश्वर्य, भाग्य-वितरण और भोग के न्यायपूर्ण वितरण से है। संस्कृत का "भग" शब्द केवल धन नहीं है; वह उन सभी ऐश्वर्यों का द्योतक है जिनके कारण जीवन सम्पन्न बनता है।इसी मूल से "भगवान्" शब्द भी बना है। विष्णु पुराण के अनुसार जिसके पास ऐश्वर्य, वीर्य, यश, श्री, ज्ञान और वैराग्य—ये छह "भग" हों, वही भगवान् है।अर्थात् वैदिक भग कोई तुच्छ देवता नहीं हैं। वे समृद्धि और सौभाग्य के अधिष्ठाता हैं।फिर उनकी आँखें क्यों निकाली गईं?यह प्रसंग दक्षयज्ञ से जुड़ा है।जब दक्ष ने शिव का अपमान करते हुए यज्ञ किया, तब अनेक देवता उस यज्ञ में उपस्थित रहे। उन्होंने शिव के अपमान का विरोध नहीं किया।जब वीरभद्र प्रकट हुए और यज्ञ का विध्वंस हुआ, तब प्रत्येक देवता को उसके अपराध के अनुरूप दण्ड मिला।इसी क्रम में—
भग की आँखें निकाल दी गईं।कुछ पुराणों में कारण यह बताया गया है कि भग प्रसन्नतापूर्वक यज्ञ-भाग ग्रहण कर रहे थे, मानो अन्याय हुआ ही न हो। कहीं कहा गया है कि वे दक्ष के पक्ष में बैठे रहे। कहीं यह भी संकेत है कि उन्होंने अधर्म को देखते हुए भी आँखें मूँद लीं।यहाँ कथा से अधिक उसका प्रतीक महत्त्वपूर्ण है।

ध्यान दीजिए।उनकी सम्पत्ति नहीं छीनी गई।उनका पद नहीं छीना गया।आँखें छीनी गईं।
क्योंकि उनका अपराध दृष्टि का था।उन्होंने देखा,पर सत्य नहीं देखा।उन्होंने अन्याय देखा,
पर उसके प्रति जागे नहीं।उन्होंने यज्ञ देखा,
पर धर्म नहीं देखा।अर्थात् दोष नेत्रों का नहीं था,दृष्टि का था।और शिव ने उसी दोष पर प्रहार किया। यदि शिव ने भग की आँखें इसलिए निकालीं कि वे अधर्म के प्रति अन्धी हो गई थीं,तो वही शिव मेरी आँखों की रक्षा क्यों करें? उत्तर है—क्योंकि वे आँखों की रक्षा नहीं,दृष्टि की रक्षा करते हैं।वे ऐसी आँखें नहीं बचाते जो केवल भोग देखें। वे ऐसी आँखें बचाते हैं जो धर्म देखें।

यहाँ एक अत्यन्त रोचक व्युत्पत्तिगत संकेत भी है।”भग" का सम्बन्ध भोग से भी है।भोग स्वयं बुरा नहीं है।पर जब सम्पूर्ण दृष्टि केवल भोग तक सीमित हो जाए,तब वही अन्धता है।आज के समाज को देखिए।हम किसी वस्तु को सबसे पहले किस रूप में देखते हैं?उसकी उपयोगिता।उसकी कीमत।उसकी बाज़ार-क्षमता।उसका उपभोग।क्या यह "भग-दृष्टि" का विकृत रूप नहीं है? शिव उसी दृष्टि को तोड़ते हैं।

मुझे लगता है कि यहाँ एक अत्यन्त समकालीन शिक्षा छिपी है।आज हमारी आँखें स्वस्थ हैं पर क्या हमारी दृष्टि स्वस्थ है?हम जंगल देखते हैं।लकड़ी दिखाई देती है।हम नदी देखते हैं।जल-संसाधन दिखाई देता है।हम विद्यार्थी देखते हैं।मानव-संसाधन दिखाई देता है।हम वृद्ध देखते हैं।आर्थिक बोझ दिखाई देता है।हम संस्कृति देखते हैं।पर्यटन दिखाई देता है।यानी आँखें हैं,दृष्टि नहीं।ऐसी स्थिति में शिव क्या करेंगे?वे आँखें नहीं बचाएँगे।वे पहले उस अन्धी दृष्टि को नष्ट करेंगे। भगनेत्रहारी" का अर्थ "आँखें निकालने वाला" नहीं है।वह है—“झूठी दृष्टि का हरण करने वाला।"
भारतीय साहित्य में "नेत्र" केवल जैविक अंग नहीं है।नेत्र का अर्थ है—दृष्टिकोण।परिप्रेक्ष्य।
चेतना।इसलिए "भगनेत्रहारी" का अर्थ होगा—
वह जो भोग-केंद्रित, स्वार्थ-केंद्रित, अधर्म-अनुकूल दृष्टि का अपहरण कर ले।

हम सामान्यतः यह मान लेते हैं कि आँखें सत्य का सबसे विश्वसनीय साधन हैं। आधुनिक विज्ञान भी लंबे समय तक "Observation" को ज्ञान का पहला आधार मानता रहा। किन्तु भारतीय दर्शन इतना सरल नहीं है। न्याय दर्शन प्रत्यक्ष को प्रमाण मानता है, पर साथ ही यह भी स्वीकार करता है कि प्रत्यक्ष भ्रमित हो सकता है। अद्वैत वेदान्त तो और भी आगे जाकर कहता है कि समस्त दृश्य-जगत् ही अविद्या का विषय बन सकता है। योगसूत्र "विपर्यय" की बात करता है—वह ज्ञान जो वस्तु के अनुरूप नहीं है। अर्थात् भारतीय परम्परा का आग्रह केवल देखने पर नहीं, यथार्थ देखने पर है।

यही कारण है कि "भगनेत्रहारी" का चयन अत्यन्त सूक्ष्म है। भग ने देखा, पर यथार्थ नहीं देखा। उन्होंने यज्ञ देखा, पर यज्ञ का धर्म नहीं देखा। उन्होंने वेद-मन्त्र सुने, पर उनके भीतर से करुणा के लुप्त हो जाने को नहीं सुना। उन्होंने देवताओं की सभा देखी, पर यह नहीं देखा कि जहाँ शिव का अपमान हो रहा हो, वहाँ देवसभा भी अधूरी है। दूसरे शब्दों में कहें तो उनकी आँखें दृश्य की दासी बन गई थीं; वे सत्य की सेविका नहीं रहीं। शिव उसी दासता को तोड़ते हैं।

मुझे यहाँ एक अत्यन्त मौलिक बात दिखाई देती है। हम प्रायः कहते हैं कि "Seeing is believing." भारतीय परम्परा शायद इसके विपरीत कहती है—"Being determines seeing." अर्थात् तुम जैसे हो, वैसे ही संसार को देखोगे। यदि भीतर लोभ है तो संसार अवसरों का बाज़ार दिखाई देगा। यदि भीतर भय है तो हर अपरिचित व्यक्ति शत्रु लगेगा। यदि भीतर करुणा है तो वही संसार पीड़ित प्राणियों का परिवार बन जाएगा। आँखें बाहर नहीं बदलतीं; देखने वाला बदलता है। इस दृष्टि से भग की आँखें इसलिए नहीं गईं कि वे देखने में असमर्थ थीं; वे इसलिए गईं कि उनका अन्तःकरण देखने योग्य नहीं रहा था।

यहीं से इस मन्त्र का साधना-पक्ष खुलता है। हम प्रायः प्रार्थना करते हैं—"हे प्रभु! मुझे सही वस्तुएँ दिखाइए।" पर यह मन्त्र उससे भी बड़ी प्रार्थना करता है—"हे प्रभु! मुझे ऐसा मन दीजिए कि मैं जो भी देखूँ, उसे सही प्रकार से देख सकूँ।" यह अन्तर अत्यन्त गहरा है। पहली प्रार्थना संसार बदलने की है। दूसरी स्वयं को बदलने की।

अब इसे आधुनिक जीवन पर रखकर देखिए। दो लोग एक ही समाचार पढ़ते हैं। एक उसमें केवल राजनीतिक लाभ-हानि देखता है। दूसरा उसमें समाज की पीड़ा देखता है। दो लोग एक ही जंगल में प्रवेश करते हैं। एक को लकड़ी दिखाई देती है, दूसरे को एक जीवित पारिस्थितिकी तन्त्र। दो अर्थशास्त्री एक ही आँकड़ा पढ़ते हैं। एक GDP की वृद्धि देखता है, दूसरा उस वृद्धि के साथ बढ़ती असमानता, पर्यावरणीय क्षति और सामाजिक तनाव को भी देखता है। तथ्य एक ही हैं; दृष्टि भिन्न है। इसलिए भारतीय परम्परा की समस्या कभी केवल सूचना (information) की नहीं रही; उसकी समस्या सदैव दृष्टि (vision) की रही है।

मुझे तो यहाँ एक और भी सूक्ष्म संकेत दिखाई देता है। दक्षयज्ञ में भग की आँखें निकलती हैं, पर कथा वहीं समाप्त नहीं होती। बाद के पुराणों में देवताओं का पुनर्संस्कार होता है; व्यवस्था पुनः स्थापित होती है। इसका प्रतीकात्मक अर्थ यह हो सकता है कि शिव का दण्ड अन्तिम विनाश नहीं है; वह दृष्टि के पुनर्जन्म की तैयारी है। शिव पहले पुरानी आँखें छीनते हैं, फिर नयी दृष्टि की सम्भावना खोलते हैं। यह वही प्रक्रिया है जिसे उपनिषद् "अविद्या से विद्या" की यात्रा कहते हैं। पहले मिथ्या-दर्शन टूटता है, तभी सत्य-दर्शन सम्भव होता है।

इसलिए मुझे लगता है कि "भगनेत्रहारी" का अर्थ यह नहीं है कि शिव ने एक देवता की आँखें निकाल दीं। उसका अर्थ यह है कि शिव किसी भी ऐसी दृष्टि को स्वीकार नहीं करते जो धर्म से रिक्त होकर केवल दृश्य की दासी बन जाए। और जब साधक प्रार्थना करता है—"नेत्रे ममाव्याद् भगनेत्रहारी"—तो वह वस्तुतः यह कह रहा होता है:

"हे शिव! मेरी आँखों को सुरक्षित रखने से पहले मेरी दृष्टि को सत्य के योग्य बनाइए। यदि मेरी दृष्टि भी कभी भग की तरह वैभव, सुविधा और मौन की कैदी बन जाए, तो पहले उसे तोड़ दीजिए। क्योंकि मिथ्या दृष्टि के साथ जीवित रहना, अन्धा होने से भी अधिक खतरनाक है।"

यहाँ नेत्रों की रक्षा का अर्थ नेत्रों का संरक्षण नहीं, दृष्टि का रूपान्तरण है। तभी शिव "भगनेत्रहारी" होकर भी "नेत्ररक्षक" बन सकते हैं।

एक आयाम 'दृष्टि की हिंसा' (Violence of Vision) का है।हम सामान्यतः हिंसा को हाथों से जोड़ते हैं, वाणी से जोड़ते हैं, अस्त्रों से जोड़ते हैं। परन्तु भारतीय साहित्य बार-बार बताता है कि आँखें भी हिंसा कर सकती हैं।

संस्कृत साहित्य में "दृष्टिदोष", "कुदृष्टि", "लोचन-लालसा", "कामदृष्टि", "मत्सर-दृष्टि" जैसे शब्द संयोग से नहीं बने। वे बताते हैं कि देखना भी नैतिक कर्म है। कोई व्यक्ति किसी को वस्तु की तरह देखता है, कोई प्रतियोगी की तरह, कोई शत्रु की तरह, कोई उपभोग की वस्तु की तरह। वस्तु वही रहती है, पर दृष्टि उसे बदल देती है। इसलिए भारतीय संस्कृति में "दृष्टि" कभी निष्पक्ष जैविक क्रिया नहीं रही; वह चरित्र का विस्तार मानी गई।

दक्षयज्ञ में भग की आँखों का नष्ट होना इसी कारण एक गहरा रूपक बन जाता है। उन्होंने केवल अन्याय देखा ही नहीं; उनकी दृष्टि उस अन्याय के साथ सहज हो गई। यह बहुत बड़ा अन्तर है। मनुष्य किसी बुराई को पहली बार देखकर विचलित होता है, दूसरी बार कम विचलित होता है, और तीसरी-चौथी बार वही बुराई सामान्य लगने लगती है। आधुनिक मनोविज्ञान इसे desensitization कहता है—संवेदनशून्यता। मुझे लगता है कि भग उसी संवेदनशून्य दृष्टि के प्रतीक हैं। उनकी आँखें इसलिए नहीं निकाली गईं कि वे देख रही थीं; वे इसलिए निकाली गईं कि वे देख-देखकर भी विचलित होना भूल चुकी थीं।

यदि इस विचार को आज के समाज पर रखें तो उसका अर्थ और भी स्पष्ट हो जाता है।प्रतिदिन समाचारों में हिंसा देखते-देखते हम हिंसा के प्रति अभ्यस्त हो जाते हैं। प्रतिदिन भ्रष्टाचार देखते-देखते वह हमें असामान्य नहीं लगता। प्रतिदिन प्रकृति का विनाश देखते-देखते वह विकास का दूसरा नाम प्रतीत होने लगता है। प्रतिदिन असत्य सुनते-सुनते सत्य असुविधाजनक लगने लगता है। यह केवल सामाजिक समस्या नहीं है; यह दृष्टि की थकान है। आँखें खुली रहती हैं, पर संवेदना सो जाती है।

मुझे लगता है कि "भगनेत्रहारी" इसी निद्रा को तोड़ने वाले शिव हैं। वे आँखें इसलिए नहीं लेते कि मनुष्य देखना बन्द कर दे; वे इसलिए लेते हैं कि वह फिर से देखना सीख सके। जैसे कभी-कभी खेत को कुछ समय के लिए परती छोड़ना पड़ता है ताकि उसकी उर्वरता लौट आए, वैसे ही कभी-कभी पुरानी दृष्टि का विघटन आवश्यक होता है ताकि नई दृष्टि जन्म ले सके। इस अर्थ में शिव विनाशक नहीं, दृष्टि के पुनर्जन्म के देवता हैं।

भग वैदिक देवता हैं—समृद्धि और भाग्य के अधिष्ठाता। यह अत्यन्त अर्थपूर्ण है कि समृद्धि के देवता की आँखें जाती हैं। मानो ऋषि चेतावनी दे रहा हो कि ऐश्वर्य का सबसे बड़ा संकट गरीबी नहीं, बल्कि नैतिक अन्धता है। जब समृद्धि मनुष्य को इतना संतुष्ट कर दे कि वह अन्याय के प्रति मौन हो जाए, तब सबसे पहले उसकी दृष्टि भ्रष्ट होती है। इसलिए शिव धन नहीं छीनते; पहले आँखें छीनते हैं। यह प्रतीक कहता है कि नैतिक दृष्टि के बिना समृद्धि स्वयं विनाश का कारण बन सकती है।

और अन्त में, इस मन्त्र का एक अत्यन्त निजी अर्थ भी है। साधक जब कहता है—"नेत्रे ममाव्याद् भगनेत्रहारी"—तो वह वस्तुतः यह नहीं कह रहा कि "मेरी आँखें सुरक्षित रहें।" वह कह रहा है—"हे शिव! मुझे उस दिन से बचाइए जब मैं अधर्म देखकर भी उसके साथ जीना सीख लूँ। मुझे उस दिन से बचाइए जब मेरी आँखें पीड़ा की अभ्यस्त हो जाएँ। मुझे उस दिन से बचाइए जब वैभव मेरे विवेक को ढँक दे। यदि कभी मेरी दृष्टि भी भग की तरह संवेदनशून्य हो जाए, तो उसे तोड़ दीजिए, क्योंकि ऐसी आँखों का सुरक्षित रहना मेरे लिए वरदान नहीं, अभिशाप होगा।"

मुझे लगता है कि इस बिन्दु पर "भगनेत्रहारी" केवल एक पुराण-कथा का स्मरण नहीं रह जाता। वह आधुनिक मनुष्य के लिए एक गम्भीर आध्यात्मिक प्रार्थना बन जाता है—"मेरी आँखें खुली रहें ही नहीं; मेरी संवेदना भी जागती रहे।" यही इस पद का ऐसा अर्थ है जो आज के समय में अत्यन्त प्रासंगिक और जीवित प्रतीत होता है।

हमें "भगनेत्रहारी" का एक और स्तर देखना चाहिए, जो भारतीय दर्शन के एक अत्यन्त गहरे प्रश्न से जुड़ता है—क्या आँखें केवल बाहर देखने के लिए हैं, या भीतर भी? मुझे बार-बार उपनिषदों की एक धारा याद आती है। कठोपनिषद् कहता है—
"पराञ्चि खानि व्यतृणत् स्वयम्भूः..."

स्वयम्भू ने इन्द्रियों को बाहर की ओर प्रवृत्त बनाया, इसलिए मनुष्य बाहर देखता है; विरले धीर पुरुष ही दृष्टि को भीतर मोड़कर आत्मा का दर्शन करते हैं। अब इस मन्त्र को "भगनेत्रहारी" के साथ रखकर देखिए।भग की आँखें बाहर देख रही थीं।यज्ञ बाहर था।वैभव बाहर था।समारोह बाहर था। किन्तु धर्म भीतर अनुपस्थित था।उनकी दृष्टि बहिर्मुख थी।शिव उसी बहिर्मुखता को तोड़ते हैं।इस अर्थ में भग की आँखें निकालना बाहर की दृष्टि का अन्त नहीं, अन्तर्दृष्टि का प्रारम्भ है।

भारतीय योग परम्परा में जब साधक ध्यान करता है, तो वह आँखें बन्द करता है। यह संसार से घृणा नहीं है। यह बाहर के दृश्य को थोड़ी देर के लिए विराम देकर भीतर के दृश्य को देखने का अभ्यास है।ध्यान दीजिए—शिव ने भग की आँखें नष्ट कीं।योगी अपनी आँखें स्वयं बन्द करता है।दोनों घटनाओं का लक्ष्य एक हो सकता है—बाह्य-दृष्टि के निरंकुश अधिकार को समाप्त करना।जब तक बाहर का आकर्षण इतना प्रबल है कि भीतर की आवाज़ सुनाई ही नहीं देती, तब तक धर्म की दृष्टि उत्पन्न नहीं होती।भग की आँखें निकालना वास्तव में इन्द्रियों की सत्ता पर प्रहार है।भारतीय दर्शन बार-बार कहता है कि इन्द्रियाँ राजा नहीं हैं।वे सेवक हैं।राजा है-बुद्धि।और बुद्धि से भी ऊपर—आत्मा।

जब आँखें स्वयं निर्णय लेने लगती हैं—जो अच्छा लगे वही सत्य है, जो सुन्दर लगे वही मूल्यवान है, जो चमके वही श्रेष्ठ है—तब व्यवस्था उलट जाती है।शिव उसी उलटी व्यवस्था को सीधा करते हैं।

आज हमारी सभ्यता ने देखने की शक्ति को अभूतपूर्व बना दिया है।स्क्रीन।विज्ञापन।रील।वीडियो।चित्र।हर क्षण आँखों पर आक्रमण हो रहा है।इतिहास में शायद पहली बार मनुष्य की आँखें इतनी अधिक व्यस्त हैं।

पर एक प्रश्न है—क्या वे उतनी ही अधिक जागरूक भी हैं?या वे केवल उत्तेजित (stimulated) हैं?यह अन्तर बहुत बड़ा है।

उत्तेजना और जागरूकता एक नहीं हैं।मुझे लगता है कि "भगनेत्रहारी" इसी अन्तर की रक्षा करते हैं।वे आँखों को उत्तेजना का दास नहीं बनने देते।हमने पहले कहा था कि तीसरा नेत्र सम्बन्ध देखता है।पर दो आँखों की भी एक समस्या है।वे सदैव आकर्षण के नियम से चलती हैं।जो चमकदार है, उसकी ओर चली जाती हैं।जो चलता हुआ है, उसकी ओर चली जाती हैं।जो असाधारण है, उसकी ओर चली जाती हैं।मनोविज्ञान इसे attentional capture कहता है।अर्थात् हमारी दृष्टि पर हमारा पूरा नियन्त्रण नहीं होता; बाहरी वस्तुएँ उसे खींच लेती हैं।

शिव का अर्थ है—दृष्टि की स्वाधीनता।यानी मैं क्या देखूँगा, यह वस्तु तय नहीं करेगी।मेरी चेतना तय करेगी।यह विचार आज के डिजिटल युग में कितना बड़ा आध्यात्मिक सिद्धान्त बन जाता है!

कवच का प्रत्येक देव-नाम किसी अंग की रक्षा नहीं कर रहा।वह उस अंग के प्रलोभन से रक्षा कर रहा है।चन्द्रमौलि सिर को उसकी उग्रता से बचाते हैं।भालनेत्र ललाट को उसकी दिशाहीनता से बचाते हैं।भगनेत्रहारी आँखों को उनके आकर्षण-बंधन से बचाते हैं।विश्वनाथ नासिका को केवल गन्ध से नहीं, प्राण की विश्वव्यापकता से जोड़ेंगे।

अर्थात् यह कवच शरीर की रक्षा का नहीं, इन्द्रियों के आध्यात्मिक संस्कार का ग्रन्थ है।

और यदि यह सूत्र सही है, तो आगे आने वाले प्रत्येक अंग-रक्षण के श्लोक को भी इसी दृष्टि से पढ़ा जा सकता है। तब यह केवल "शिव मेरे शरीर की रक्षा करें" नहीं रह जाता; यह "शिव मेरी प्रत्येक इन्द्रिय को उसके सर्वोच्च धर्म तक पहुँचा दें"—ऐसी क्रमिक साधना का मानचित्र बन जाता है। यही मुझे इस कवच की सबसे विलक्षण विशेषता प्रतीत होती है।

हम प्रायः मान लेते हैं कि आँखों का कार्य केवल दृश्य ग्रहण करना है। किन्तु भारतीय चिन्तन में आँखें चरित्र का भी विस्तार हैं। मनुष्य जैसा होता है, वैसा ही संसार उसे दिखाई देता है। लोभी को अवसर दिखाई देते हैं, भयभीत को शत्रु, करुणामय को पीड़ित, कलाकार को सौन्दर्य, वैज्ञानिक को नियम और ऋषि को ब्रह्म। वस्तु वही रहती है; बदलता देखने वाला है। इसीलिए भारतीय परम्परा में शुद्धि बाहर की वस्तुओं की अपेक्षा पहले अन्तःकरण की की जाती है। भग की कथा इस सत्य को नाटकीय रूप देती है। उनकी आँखों में दोष नहीं था; दोष उस चेतना में था जो उन आँखों से संसार को देख रही थी। इसलिए शिव बाहरी नेत्रों पर नहीं, भीतर की दृष्टि पर प्रहार करते हैं। यह प्रहार दण्ड भी है और अनुग्रह भी। क्योंकि मिथ्या दृष्टि का नाश ही सत्य-दृष्टि का प्रारम्भ है।

हम प्रतिदिन असंख्य दृश्य देखते हैं, पर उनमें से बहुत कम हमारे भीतर उतरते हैं। धीरे-धीरे हमारी आँखें संवेदनशून्य होने लगती हैं। युद्ध के चित्र सामान्य लगने लगते हैं, पर्यावरण का विनाश विकास जैसा प्रतीत होने लगता है, गरीबी आँकड़ों में बदल जाती है, और मनुष्य "मानव संसाधन" बन जाता है। यह केवल भाषा का परिवर्तन नहीं है; यह दृष्टि का पतन है। "भगनेत्रहारी" उसी पतन से बचाने वाले शिव हैं। वे हमारी आँखों को यह वरदान नहीं देते कि वे अधिक देखें; वे उन्हें यह वरदान देते हैं कि वे सही देखें, और सही देखकर भीतर से विचलित होने की क्षमता कभी न खोएँ। क्योंकि जिस दिन अन्याय देखकर भी हमारी दृष्टि निर्विकार रह जाए, उसी दिन हमारी आँखें भग की आँखों की तरह अपना आध्यात्मिक अधिकार खो चुकी होंगी।

यही कारण है कि मुझे इस मन्त्र का वास्तविक अर्थ अब यह प्रतीत होता है कि साधक शिव से अपनी दृष्टि की सुरक्षा नहीं, बल्कि उसकी पुनर्जन्म-प्रक्रिया की याचना कर रहा है। वह मानो कह रहा है—"हे भगनेत्रहारी! यदि मेरी आँखें भी कभी केवल आकर्षण, उपभोग, सुविधा और वैभव की ओर देखने लगें; यदि वे धर्म और करुणा के प्रति उदासीन हो जाएँ; यदि वे बाहरी चमक में सत्य को खो दें, तो उन्हें वैसा ही झकझोर दीजिए जैसा आपने भग की दृष्टि को झकझोरा था। क्योंकि झूठी दृष्टि के साथ जीवित रहना, आँखें बन्द हो जाने से भी बड़ा अन्धकार है।"

मुझे लगता है कि इस प्रकार पढ़ने पर "भगनेत्रहारी" केवल पुराण की स्मृति नहीं रहते; वे मनुष्य की दृष्टि को पुनः धर्म, सत्य और संवेदना की ओर लौटाने वाले दृष्टि-गुरु बन जाते हैं।

Wednesday, 15 July 2026

अनन्तशयन१. शेषशायी-अनन्त को शेष या शेषनाग भी कहा गया है,

अनन्तशयन
१. शेषशायी-
अनन्त को शेष या शेषनाग भी कहा गया है, जिनके १००० सिरों में १ पर विन्दुमात्र पृथ्वी स्थित है। स्पष्टतः यह कोई सर्प नहीं है, वरन् सूर्य से भी बहुत बड़ी रचना है। शेषनाग क्षीर समुद्र में फैके हुए हैं, जिन पर विष्णु भगवान् सोये हुए है। विष्णु की नाभि से कमल निकलता है जिस पर पद्मनाभ ब्रह्मा स्थित हैं। आकाश के विभिन्न स्तरों एवं पृथ्वी पर इसके अनेक अर्थ हैं।
शयानं नाभिकमले ब्रह्माणं स महाप्रभुः। संस्थाप्य त्रीनिमाँल्लोकान् दग्ध्बा सर्वश्रिया सह॥१०॥
शेते स भोगिशय्यायां ब्रह्मा नारायणात्मकः। योगनिद्रावशं जातस्त्रैलोक्यग्रासबृंहितः॥११॥
(कालिका पुराण, २७/१०-११)
=ब्रह्मा को अपने नाभिकमल में शयन कराये हुए, तीनों लोकों को जला कर अपने जठर में स्थापित कर नारायण रूपधारी ब्रह्म, जगत् प्रभु विष्णु, लक्ष्मी के साथ तीनों लोकों को ग्रसित करते हुए शेषनाग की शय्या पर शयन करते हैं।
पृथ्वी को पहले कूर्म ने धारण किया, उसके बाद क्षीर सागर में फणों को फैला कर लक्ष्मी सहित सोये विष्णु को धारण किया। 
ब्रह्माण्ड खण्ड संयोगात् चूर्णिता पृथ्विवी भवेत्। इति तं तां परिजग्राह कूर्मरूपी जनार्दनः॥१५॥
चलज्जलौघ संसर्गाच्चलन्त्या धरया तदा। कूर्मपृष्ठं बहुरवैर्वरदण्डैर्विततीकृतम्॥१६॥
अनन्तस्तत्र गत्वा तु यत्र क्षीरोदसागरः। तत्र स्वतं श्रिया युक्तं सुषुप्सन्तं जनार्दनम्॥१७॥
फणया मध्यया दध्रे त्रैलोक्यग्रासबृंहितम्। पूरणं फणाः वितत्योर्धं पद्मं कृत्वा महाबलः।
विष्णुमाच्छादयामास शेषाक्यः परमेश्वरम्॥१८॥ (कालिका पुराण, २७/१५-१८)
विश्व का चेतन तत्त्व पुरुष था, जिसे क्रिया या विस्तार रूप में नर कहा गया (लम्बाई की एक माप है नर = ९६ अंगुल)। रस रूपी विरल पदार्थ अप् है, जो नर से उत्पन्न होने के कारण नार कहा गया। उस नार में निवास करने के कारण ब्रह्म रूप विष्णु ल्प् नारायण कहा गया।  
आपो नारा इति प्रोक्ता, आपो वै नरसूनवः॥
(मनु स्मृति, १/१०, विष्णु पुराण, १/४/६, मार्कण्डेय पुराण, ४/४३, वराह पुराण, २/२४)
२. शेष या अनन्त-
(१) अनन्त आकाश-यह न स्त्री है, न पुरुष, अतः नपुंसक लिंग है। सृष्टि के वास स्थान रूप में वासुदेव है। इसमें परस्पर आकर्षण या संकर्षण से ब्रह्माड, उनमें तारा, ग्रह आदि पिण्ड बने। संकर्षण द्वारा निर्माण के बाद मूल तत्त्व पूरुष का ३ पाद बचा रह गया, वह शेष है, जिसके भीतर १ पाद पुरुष रूपी विश्व स्थित है।
एतावान् अस्य महिमा, अतो ज्यायाँश्च पूरुषः। 
पादोऽस्य विश्वा भूतानि, त्रिपादस्यामृतं दिवि। (पुरुष सूक्त, ३)
पाञ्चरात्र भाषा में मूल स्थान वासुदेव, परस्पर आकर्षण निर्मित पिण्ड संकर्षण, प्रकाश उत्सर्जन करने वाले तारा प्रद्युम्न तथा उसके बाद विविध सृष्टि अनिरुद्ध है।
एका भगवतो मूर्तिः ज्ञानरूपा शिवामला। वासुदेवाभिधाना सा गुणातीता सुनिष्कला॥३९॥
द्वितीया कालसंज्ञान्या तामसीशेषसंज्ञिता। निहन्ति सकलं चान्ते वैष्णवी परमा तनुः॥४०॥
सत्त्वोद्रिक्ता तथैवान्या प्रद्युम्नेति च संज्ञिता। जगत् स्थापयते सर्वं स विष्णुः प्रकृतिर्ध्रुवा॥४१॥
चतुर्थी वासुदेवस्य मूर्तिर्ब्राह्मीति संज्ञिता। राजसीचानिरुद्धाख्या प्रद्युम्नः सृष्टिकारिका॥४२॥
(कूर्म पुराण, ४९/३९-४२)
ब्राह्मी मूर्तियां अनन्त प्रकार की हैं, अतः उनको अनिरुद्ध या असीमित कहा गया है। प्रद्युम्न रूप ताराओं से भूत सर्गों की सृष्टि होती है, अतः यह रजो-गुण वाली राजसी है।
(२) ब्रह्माण्ड के शेषशायी- सूर्य-अनन्त विष्णु अव्यक्त है, जिसमें सम्पूर्ण विश्व समाहित है-वेवेष्टि व्याप्नोति विश्वं यः-विष्लृ व्याप्तौ। उनकी कल्पना सम्भव नहीं है। विष्णु का दृश्य रूप सूर्य है, जिससे हमारा जीवन चल रहा है। 
ब्रह्माण्ड का केन्द्रीय चक्र आकाशगंगा है, जिसकी वेद में ७ धारा कही गयी हैं। इसे वेद में अहिर्बुध्न्य तथा पुराण में शेषनाग कहा गया है। इसमें जहां सूर्य स्थित है, उस केन्द्र से भुजा की मोटाई (१४०० प्रकाश वर्ष) के बराबर गोल को महर्लोक कहा गया है जिसकी माप ४३ अहर्गण (पृथ्वी व्यास x २ घात ४०, ३ धाम पृथ्वी के भीतर)। सौर मण्डल के ३ क्षेत्र त्रिष्टुप् छन्द के ३ पाद हैं, चतुर्थ पाद तक महर्लोक है। माहेश्वर सूत्र के ४३ अक्षरों के अनुसार ४४ के स्थान पर ४३ अहर्गण हैं। इसमें प्रायः १,००० तारा हैं, जिनको शेषनाग के १,००० सिर कहा गया है।
त्रिष्टुप् इन्द्रस्य वज्रः (ऐतरेय ब्राह्मण, २/२, १६; शतपथ ब्राह्मण, ६/६/२/७, कौषीतकि ब्राह्मण, ३/२, २२/७)।
गायत्रेण प्रतिमिमीते अर्कम्, अर्केण साम त्रैष्टुभेन वाकम्। 
वाकेन वाकं द्विपदा चतुष्पदाऽक्षरेण मिमते सप्तवाणीः॥ (ऋक्, १/१६४/२४, अथर्व, ९/१०/२) 
आकाशगंगा की ७ धारा-सप्त प्रवत आ दिवम् (ऋक्, ९/५४/२)
इस शेष में सौर-मण्डल विष्णु है। उसका केन्द्र सूर्य पिण्ड उसकी नाभि है। उस नाभि के आकर्षण या कमल-नाल से पृथ्वी बन्धी है, जो मर्त्य ब्रह्मा है।
जिस क्षेत्र में जल बन्धाहै, वह बुध्न है। बुध्न का अहि (सर्प) अहिर्बुध्न्य है।
नीचीनाः स्थुरुपरि बुध्न एषाम्। (ऋक्, १/२४/७)
अब्जां उक्थैः अहिं गृणीषे, बुध्ने नदीनां रजःसु षीदन्॥१६॥
मा नो अहिर्बुध्न्यो रिषे धान्मा यज्हो अस्य स्रिधदृतायोः॥१७॥
(ऋक्, ७/३४/१६, १७, निरुक्त, १०/४१, ४४) 
अहिर्बुध्न्य में सूर्य को शिशु कहा है-
उत नो अहिर्बुध्न्यो मयस्कः शिशुं न पिप्युषीव वेति सिन्धुः।
येन नपातं अपां जुनाम मनोजुवो वृषणो यं वहन्ति। (ऋक्, १/१८६/५)
तन्नो अहिर्बुध्न्यो अद्भिः अर्कैः तत् पर्वतः तत् सबिता च नो धात् (ऋक्, ६/४९/१४)
३. सूर्य रूप विष्णु-
सूर्य के आकर्षण में पृथ्वी अपनी कक्षा में स्थिर है, यह सुप्त रूप है। उनसे इन्द्र रूपी विकिरण से जीवन चल रहा है, यह जाग्रत रूप जगन्नाथ है। 
निद्रां भगवतीं विष्णोरतुलां तेजसः प्रभुः॥७१॥
विष्णुः शरीरग्रहणमहमीशान एव च॥८४॥
जाग्रत होने के बाद-उत्तस्थौ च जगन्नाथस्तत्या मुक्तो जनार्दनः॥९१॥
प्रबोधं च जगत्स्वामी नीयतामच्युतो लघु॥८६॥
(दुर्गा सप्तशती, अध्याय, १)
इन्द्र तेज निकलने से सूर्य का क्षरण होता है, विष्णु रूप के आकर्षण से बाह्य ब्रह्माण्ड का पदार्थ मिलता है। मनुष्य जीवन भी वैसा ही है, बाल्यकाल में क्षरण से पुष्टि अधिक होती है, शरीर बढ़ता है, वृद्धावस्था में क्षरण अधिक होता है। इसे इन्द्र-विष्णु की प्रतिस्पर्धा कहा है-
उभा जिग्यथुर्न पराजयेथे, न पराजिज्ञे कतरश्च नैनोः।
इन्द्रश्च विष्णू यदपस्पृधेथां त्रेधा सहस्रं वि तदैरयेथाम्॥ (ऋक्, ६/६९/८)
किं तत् सहस्रमिति? इमे लोकाः, इमे वेदाः, अथो वागिति ब्रूयात्। (ऐतरेय ब्राह्मण, ६/१४)
मनुष्य गर्भ में माता-पिता के रज-वीर्य से सृष्टि होती है, उसी प्रकार चान्द्र मण्डल के केन्द्र में स्थित पृथ्वी (अत्र या अत्रि) पर सृष्टि होती है, सूर्य रूपी नयन से तेज निकलता है, आकाशगंगा का तेज आकर्षित होता है-
अथ नयन समुत्थं ज्योतिरत्रेरिवद्यौः सुरसरिदिव तेजो वह्निनिष्ठ्यूतमैशम्।
नरपतिकुलभूत्यै गर्भमाधत्त राज्ञी गुरुभिरभिनिविष्टं लोकपालानुभावैः॥ (रघुवंश, २/७५) 
सूर्य या उसके प्रभाव क्षेत्र को कई प्रकार से देखते हैं-(क) वामन-सूर्य का पिण्ड सबसे छोटा या वामन है। 
(ख) दधिवामन-मंगल तक ठोस ग्रह हैं, उसके बाद बृहस्पति से आरम्भ कर गैसीय ग्रह हैं। पुराणों में सौर मण्डल के दधि समुद्र का आकार मंगल ग्रह की कक्षा है। पृथ्वी से मंगल कक्षा १,२५,५०,००० योजन का वलय दीखता है जिसकी चौड़ाई ३२,००,००० योजन है (यहां योजन = पृथ्वी के विषुव व्यास का १००० भाग)-भागवत पुराण, स्कन्ध ५, विष्णु पुराण, अध्याय २/४। 
(ग) त्रिविक्रम-सौर मण्डल में ३ मुख्य क्षेत्र कहे गये हैं-ताप क्षेत्र पृथ्वी कक्षा तक, वायु (कणों का प्रवाह) यूरेनस कक्षा तक, तेज या प्रकाश क्षेत्र सौरमण्डल की सीमा तक।
इदं विष्णुर्विचक्रमे त्रेधा निदधे पदम्। समूळ्हमस्य पांसुरे॥ (ऋक् ,१/२२/१७) 
शतयोजने ह वा एष (आदित्यः) इतस्तपति। (कौषीतकि ब्राह्मण उपनिषद्, ८/३)
स एष (आदित्यः) एकशतविधस्तस्य रश्मयः शतं विधा एष एवैकशततमो य एष तपति। (शतपथ ब्राह्मण, १०/२/४/३)
सूर्य का ईषादण्ड ३००० योजन त्रिज्या का है (सौर मण्डल में सूर्य व्यास = १ योजन)-
योजनानां सहस्राणि भास्करस्य रथो नव। ईषादण्डस्तथैवास्य द्विगुणो मुनिसत्तम॥ (विष्णु पुराण, २/८/२) 
वायवस्थ ऊर्जा को इषा कहा गया है-इषे त्वा, ऊर्ज्जे त्वा वायवस्थः (वाज. यजु, १/१)
जहां तक सूर्य प्रकाश अधिक (ब्रह्माण्ड तुलना में) है, वहां तक सूर्य की वाक् (क्षेत्र) कहते हैं, जिसकी माप अहः गणना में ३० है-
 त्रिंशद् धाम वि राजति वाक् पतङ्गाय धीयते। प्रति वस्तो रहद्युभिः॥ (ऋक्, १०/१८९/३) 
आकाश में हर धाम पिछले धाम का २ गुणा है, जिनकी माप अहः में है। पृथ्वी के भीतर ३ तथा बाहर ३० धाम हैं।
द्वात्रिशतं वै देवरथाह्न्यन्ययं लोकस्तँ समन्तं पृथिवी द्विस्तावत्पर्येति तां समन्तं पृथिवीं द्विस्तावत्समुद्रः पर्येति..... (बृहदारण्यक उपनिषद्, ३/३/२)
(घ) परम पद-जहां तक सूर्य विन्दुमात्र दीखता है, वह ब्रह्माण्ड की सीमा या विष्णु का परम पद है। इसे पुराण में महाविष्णु, विराट् बालक कहा गया है।
तद् विष्णोः परमं पदं सदा पश्यन्ति सूरयः। दिवीव चक्षुराततम्॥ (ऋक्, १/२२/२०) 
सूर्य सिद्धान्त (१२/८१/९०) के अनुसार यहां तक सूर्य किरणों का प्रसार है।
३. ब्रह्माण्ड (गैलेक्सी)-
सूर्य रूपी विष्णु के २ रूप हैं-सौर मण्डल के ताप, बायु तथा प्रकाश क्षेत्र विष्णु के ३ पद या विक्रम हैं। ब्रह्माण्ड की सीमा तक वह विन्दु रूप में दीखता है (सूर्य सिद्धान्त, १२/९०)। इस सूर्यों के समूह को विष्णु का परम पद या महाविष्णु कहते हैं।
इदं विष्णुर्विचक्रमे त्रेधा निदधे पदम्॥१७॥
तद् विष्णोः परमं पदं सदा पश्यन्ति सूरयः॥२०॥ (ऋक्, १/२२/१७, २०) 
ब्रह्माण्ड सबसे बड़ी ईंट है, अतः इसे परमेष्ठी कहा गया है। इसका निर्माण स्थल कूर्म है, जो ब्रह्माण्ड का १० गुणा है। अतः पुराण में इसे गोलोक और ब्रह्माण्ड को महाविष्णु रूप विराट् बालक कहा गया है।
अथाण्डं तु जलेऽतिष्टद्यावद्वै ब्रह्मणो वयः॥१॥ 
तन्मध्ये शिशुरेकश्च शतकोटिरविप्रभः॥२॥ स्थूलात्स्थूलतमः सोऽपि नाम्ना देवो महाविराट्॥४॥ 
तत ऊर्ध्वे च वैकुण्ठो ब्रह्माण्डाद् बहिरेव सः॥९॥
तदूर्ध्वे गोलकश्चैव पञ्चाशत् कोटियोजनात्॥१०॥नित्यौ गोलोक वैकुण्ठौसत्यौ शश्वदकृत्रिमौ॥१६॥
(ब्रह्मवैवर्त पुराण, प्रकृति खण्ड, अध्याय ३)
स यत् कूर्मो नाम-एतद्वै रूपं कृत्वा प्रजापतिः प्रजा असृजत । यदसृजत-अकरोत्-तत् । यदकरोत्-तस्मात् कूर्मः। कश्यपो वै कूर्मः । तस्मादाहुः-सर्वाः प्रजाः काश्यप्यः-इति । (शतपथ ब्राह्मण, ७/५/१/५)
मानेन तस्य कूर्मस्य कथयामि प्रयत्नतः । 
शङ्कोः शत सहस्राणि (१ पर १८ शून्य) योजनानि वपुः स्थितम् ॥ (नरपति जयचर्या, स्वरोदय, कूर्मचक्र)
ब्रह्माण्ड का आकार परार्द्ध (१ पर १७ शून्य) योजन कहा है-ऋतं पिबन्तौ सुकृतस्य लोके गुहां प्रविष्टौ परमे परार्धे ।
छायातपौ ब्रह्मविदो वदन्ति पञ्चाग्नयो ये च त्रिणाचिकेताः ॥ (कठोपनिषद्, १/३/१) = कूर्म का आकार १०० हजार शङ्कु (१० घात १३) योजन है। यहां पृथ्वी व्यास का १००० भाग योजन है। उससे कोटि x कोटि = १० घात १४ गुणा बड़ा अर्थात् १० घात १७ योजन का ब्रह्माण्ड है। उसका १० गुणा बड़ा कूर्म है। इसी कूर्म में ब्रह्माण्ड रूपी महा-पृथ्वी घूम रही है।
महाविष्णु (ब्रह्माण्ड) गोलोक रूपी समुद्र में हैं, वह ब्रह्माण्डों के परस्पर आकर्षण या अनन्त शेष पर स्थित है। उनकी नाभि या केन्द्र की सूर्य परिक्रमा कर रहा है। केन्द्र से सूर्य की दूरी ३०,००० प्रकाश वर्ष कही गयी है।
अस्य मूलदेशे त्रिंशयोजन (यहां योजन = प्रकाश वर्ष) सहस्रान्तर आस्ते या वैकला भगवतस्तामसी समाख्यातानन्त इति सात्वतीया द्रष्टृर्दृश्ययोः सङ्कर्षणमित्याचक्षते। यस्येदं क्षितिमण्डलं भगवतो अनन्त मूर्तेः सहस्र शिरस एकस्मिन्नेव शीर्षणि ध्रियमाणं सिद्धार्थ इव लक्ष्यते॥२॥ (भागवत पुराण, ५/२५/१, २)
आकृष्णेन रजसा वर्तमानो, निवेशयन् अमृतं मर्त्यं च।
हिरण्ययेन सविता रथेन देवो याति भुवनानि पश्यन्॥ 
(ऋग्वेद, १/३५/२, वाज यजु, ३३/४३, तैत्तिरीय सं, ३/४/११/२) 
यहां सूर्य के २ रूप हैं- वह अपने प्रकाशित मार्ग (हिरण्यय) पर ब्रह्माण्ड केन्द्र के आकर्षण से उसकी परिक्रमा कर रहा है। यह केन्द्र कृष्ण (कृष्ण विवर) है।
४. भौगोलिक पद्मनाभ-
गोल पृथ्वी सतह का चित्र समतल कागज पर नहीं हो सकता। अतः उत्तरी गोलार्ध के ४ पादों को भूपद्म का ४ दल कहा गया है। नक्शा बनाने के लिये इन दलों को खोल कर उनका प्रतिरूप काल्पनिक चौकोर मेरु सतह पर बनाते हैं, जो वर्ग आधार पर पिरामिड है। इसके वर्ग आधार की रेखायें विषुव वृत्त को बाहर से स्पर्श करती हैं। इस काल्पनिक मेरु की ऊंचाई १ लाख योजन है। 
जम्बूद्वीपो द्वीपमध्ये तन्मध्ये मेरुरुच्छ्रितः। चतुरशीतिसाहस्रो भूयिष्ठः षोडशाद्रिराट्॥३॥
द्वात्रिंशन् मूर्ध्नि विस्तारात् षोडशाधः सहस्रवान्। भूयस्तस्यास्य शैलोऽसौ कर्णिकाकार संस्थितः॥४॥
(अग्नि पुराण, अध्याय १०८)
ध्रुव के निकट गोल भूखण्ड का आकार बढ़ता जाता है, जैसे ग्रीनलैण्ड भारत से छोटा है, पर नक्शे में बड़ा दीखता है। उत्तर ध्रुव जल में है (स्थल से घिरा है), अतः वहां कोई समस्या नहीं है। दक्षिणी ध्रुव स्थल भाग में है, अतः इसका आकार अनन्त हो जायेगा, अतः इसे अनन्त द्वीप कहते थे। इसका नक्शा अलग से बनता था। इसके २ भूखण्ड प्रायः जुड़े हुए थे। अतः इसे यम (यमल = जुड़वां) द्वीप भी कहते थे, तथा यम दक्षिण का स्वामी है।
दक्षिण दिशा को नक्शे में नीचा दिखाते हैं, अतः अनन्त को पातालों के भी नीचे कहा है जिसके ऊपर पृथ्वी है। 
पातालानामधस्श्चास्ते विष्णोर्या तामसी तनुः। 
शेषाख्या यद्गुणान्वक्तुं न शक्ता दैत्य दानवाः॥ (विष्णु पुराण, २/५/१३)
इसके सबसे निकट के द्वीप को पुष्कर (दक्षिण अमेरिका) कहा है, जो ब्रह्मा का निवास था।
त्वामग्ने पुष्करादध्यथर्वा निरमन्थत। मूर्ध्नो विश्वस्य वाधतः॥१३॥
तमुत्वा दध्यङ्गृषिः पुत्र ईधे अथर्वणः। वृत्रहणं पुरन्दरम्॥१४॥ (ऋक्, ६/१६)
न्यग्रोधः पुष्करद्वीपे ब्रह्मणः स्थानमुत्तमम्। 
तस्मिन्निवसति ब्रह्मा पूज्यमानः सुरासुरैः॥(विष्णु पुराण, २/२/८५, ब्रह्माण्ड पुराण, ८/८/७)
न्यग्रोधः पुष्करद्वीपे पद्मवत् तेन स स्मृतः (मत्स्य पुराण, १२३/३९) 
५. भारत का पद्मनाभ-
पृथ्वी का दक्षिणी छोर अनन्त द्वीप है। अतः भारत के दक्षिणी नहर को तिरु (श्री)-अनन्तपुरम् (अंग्रेजी में त्रिवेन्द्रम्) कहा गया है। यहां पद्मनाभ मन्दिर है। पृथ्वी के पुष्कर द्वीप में अपर-मेरु (अमेरु) था। इससे उसका नाम अमेरिका हुआ। इसकी विपरीत दिशा में पुष्कर उज्जैन से १२ अंश पश्चिम था (विष्णु पुराण, २/८/२८, मत्स्य पुराण, १२४/४०)। अभी इसे बुखारा कहते हैं (उजबेकिस्तान में)। तृतीय पुष्कर इन्द्रप्रस्थ का पुष्कर है, जो राजस्थान में है।
स्कन्द पुराण, अध्याय (६/१७९/५४) के अनुसार ३ पुष्कर हैं-
ज्येष्ठ-पुष्कर द्वीप में न्यग्रोध नामक स्थान के निकट।
मध्य-उज्जैन के १२ अंश पश्चिम उजबेकिस्तान का बुखारा।
कनीयक-अजयमेरु (अजमेर) का पुष्कर जहां सरस्वती धारा बहती थी।
३ पुष्कर के अन्य उल्लेख हैं-(पद्म पुराण, १/१५/१५१, १/१९-२०, अग्नि पुराण, २११/८, स्कन्द पुराण, ६/४५, १७९)-उज्जैन से १२ अंश पश्चिम का पुष्कर (विष्णु पुराण, २/८/२८), इन्द्रप्रस्थ पुष्कर (अजमेर, आबू पर्वत, पद्म पुराण, १/२० आदि) 
विश्व सभ्यता के केन्द्र रूप में भारत को अजनाभ वर्ष कहते थे। इसके शासक को जम्बूद्वीप के राजा अग्नीध्र (स्वयम्भू मनु पुत्र प्रियव्रत की सन्तान) का पुत्र नाभि कहा गया है।
विष्णु पुराण, खण्ड २, अध्याय १-जम्बूद्वीपेश्वरो यस्तु आग्नीध्रो मुनिसत्तम॥१५॥
पित्रा दत्तं हिमाह्वं तु वर्षं नाभेस्तु दक्षिणम्॥१८॥
इसका नाभि कमल पूर्वोत्तर भाग का मणिपुर है, जिसके बाद ब्रह्मा का ब्रह्म देश (बर्मा, या अब म्याम्मार) है।
६. आध्यात्मिक गर्भनाल-
(१) मनुष्य के स्थूल शरीर का जन्म के समय कमल नाल से माता गर्भ में पोषण होता है। 
(२) आध्यात्मिक सूक्ष्म नाल-जन्म के बाद भी नाभि के सूक्ष्म चक्र में अष्टदल कमल द्वारा अष्टविध सिद्धियां मिलती हैं।
अग्नि पुराण, अध्याय ३७४-आध्यात्मिक नाभिकमल 
द्वादशाङ्गुलविस्तीर्णं शुद्धं विकसितं सितम्। नालमष्टाङ्गुलं तस्य नाभिकन्दसमुद्भवम्॥२०॥
पद्मपत्राष्टकं ज्ञेयमणिमादिगुणाष्टकम्। कर्णिका केशरं नालं ज्ञानवैराग्यमुत्तमम्॥२१॥
विष्णुधर्मश्च तत्कन्दमिति पद्मं विचिन्तयेत्। तद्धर्मज्ञान वैराग्यं शिवैश्वर्यमयं परम्॥२२॥
ज्ञात्वा पद्मासनं सर्वं सर्वदुःखान्तमाप्नुयात्। तत्पद्मकर्णिकामध्ये शुद्धदीपशिखाकृतिम्॥२३॥ 
अङ्गुष्ठमात्रममलं ध्यायेदोङ्कारमीश्वरम्। कदम्ब गोलकाकारं तारं रूपमिवस्थितम्॥२४॥
ध्यायेद् वा रश्मिजालेन दीप्यमानं समन्ततः। प्रधानं पुरुषातीतं स्थितं पद्मस्थमीश्वरम्॥२५॥
ध्यायेज्जपेच्च सततमोङ्कारं परमक्षरम्। मनःस्थित्यर्थमिच्छन्ति स्थूलध्यानमनुक्रमात्॥२६॥
तद्भूतं निश्चलीभूतं लभेत् सूक्ष्मेऽपि संस्थितम्। नाभिकन्दे स्थितं नालं दशाङ्गुलसमायतम्॥२७॥
(द्रष्टव्य-पुरुष सूक्त-स भूमिं विश्वतो वृत्त्वात्यत्तिष्ठद्दशाङ्गुलम्।)
नालेनाष्टदलं पद्म द्वादशाङ्गुलविस्तृतम्। सकर्णिके केसराले सूर्य्यसोमाग्निमण्डलम्॥२८॥
अग्निमण्डलमध्यस्थः शङ्खचक्रगदाधरः। पद्मी चतुर्भुजो विष्णुरथ वाष्टभुजो हरिः॥२९॥

Tuesday, 14 July 2026

इस्लाम आक्रांता ओर भारत राजपूत

"आइए इतिहास में झांकते हैं"

622 ई से लेकर 634 ई तक मात्र 12 साल में अरब के सभी मुर्तिपूजकों को इस्लाम की तलवार से पानी पिलाकर मुसलमान बना दिया।

634 ईस्वी से लेकर 651 तक, यानी मात्र 16 साल में सभी पारसियों को तलवार की नोक पर इस्लाम की दीक्षा दी गयी।

640 में मिस्र में पहली बार इस्लाम ने पांव रखे, ओर देखते ही देखते मात्र 15 सालों में , 655 तक इजिप्ट के लगभग सभी लोग मुसलमान बना दिये गए।

नार्थ अफ्रीकन देश जैसे - अल्जीरिया, ट्यूनीशिया, मोरक्को आदि देशों को 640 से 711 ई तक पूर्ण रूप से इस्लाम धर्म मे बदल दिया गया, 3 देशों का सम्पूर्ण सुख चैन लेने में मुसलमानो ने मात्र 71 साल लगाए।

711 ईस्वी में स्पेन पर आक्रमण हुआ, 730 ईस्वी तक स्पेन की 70% आबादी मुसलमान थी । मात्र 19 सालों में तुर्क थोड़े से वीर निकले, तुर्को के विरुद्ध जिहाद 651 ईस्वी में शुरू हुआ, ओर 751 ईस्वी तक सारे तुर्क मुसलमान बना दिये गए।

इंडोनेशिया के विरुद्ध जिहाद मात्र 40 साल में पूरा हुआ । 1260 में मुसलमानो ने इंडोनेशिया में मार काट मचाई, ओर 1300 ईस्वी तक सारे इंडोनेशियाई मुसलमान बन चुके थे ।
फिलिस्तीन, सीरिया, लेबनान, जॉर्डन आदि देशों को 634 से 650 के बीच मुसलमान बना दिया गया ।।

उसके बाद 700 ईस्वी में भारत के विरुद्ध जिहाद शुरू हुआ वह अब तक चल रहा है । *इस्लामिक आक्रमणकारियों की क्रूरता का अंदाजा इस बात से लगाएं की मुसलमानो का ईरान पर आक्रमण हुआ, मुसलमानी सेना ईरानी राजा के महल तक पहुंच गई । महल में लगभग 3 साल की पारसी राजकुमारी थी।ईरान पर आक्रमण अली ने किया था जिसे शिया मुसलमान मानते है।

पारसी राजकुमारी को बंदी बना लिया गया,अब वह कन्या थी,तो लूट के माल पर पहला हक़ खलीफा मुगीरा इब्न सूबा का था । खलीफा को वह मासूम बच्ची भोग के लिए भेंट की गई ।लेकिन खलीफा ईरान में अली की लूट से इतना खुश हुआ कि अली को कह दिया, इसका भोग तुम करो । मुसलमानी क्रूरता पशु संस्कृति का एक सबसे गलीच नमूना देखिये की तीन साल की बच्ची में भी उन्हें औरत दिख रही थी।वह उनके लिए बेटी नही भोग की वस्तु थी।बेटी के प्रेम में पिता को भी बंदी बनना पड़ा, इस्लाम या मौत में से एक चुनने का विकल्प पारसी राजा को दिया गया । पारसी राजा ने मृत्यु चुनी । अली ने उस तीन साल की मासूम राजकुमारी को अपनी पत्नी बना लिया।अली की पत्नी Al Sahba' bint Rabi'ah मात्र 3 साल की थी, ओर उस समय अली 30 साल का था।

मात्र ईरान का उदाहरण दिया है इजिप्ट हो या अफ्रीकन देश सब जगह यही हाल है । जिस समय सीरिया आदि को जीता गया था, उसकी कहानी तो ओर दर्दनाक है । मुसलमानो ने ईसाई सैनिकों के आगे अपनी औरतों को कर दिया ।

मुसलमान औरते गयी ईसाइयों के पास की मुसलमानो से हमारी रक्षा करो बेचारे मूर्ख ईसाइयों ने इन धूर्तो की बातों में आकर उन्हें शरण दे दी, फिर क्या था सारी सुपर्णखाओ ने मिलकर रातों रात सभी सैनिकों को हलाल करवा दिया ।।

अब आप भारत की स्थिति देखिये । जिस समय आक्रमणकारी ईरान तक पहुंचकर अपना बड़ा साम्राज्य स्थापित कर चुके थे , उस समय उनकी हिम्मत नही थी की भारत के राजपूत साम्राज्य की ओर आंख उठाकर भी देख सकें।

636 ईस्वी में खलीफा ने भारत पर पहला हमला बोला।एक भी आक्रांता जिंदा वापस नही जा पाया ।कुछ वर्ष तक तो मुस्लिम अक्रान्ताओ की हिम्मत तक नही हुई की भारत की ओर मुंह करके सोया भी जाएं।

लेकिन कुछ ही वर्षो में गिद्धों ने अपनी जात दिखा ही दी।दुबारा आक्रमण हुआ, इस समय खलीफा की गद्दी पर उस्मान आ चुका था । उसने हाकिम नाम के सेनापति के साथ विशाल इस्लामी टिड्डिडल भारत भेजा।सेना का पूर्णतः सफाया हो गया, ओर सेनापति हाकिम बंदी बना लिया गया।हाकिम को भारतीय राजपूतो ने बहुत मारा, ओर बड़े बुरे हाल करके वापस अरब भेजा, जिससे उनकी सेना की दुर्गति का हाल, उस्मान तक पहुंच जाएं ।
यह सिलसिला लगभग 700 ईस्वी तक चलता रहा।जितने भी मुसलमानो ने भारत की तरफ मुँह किया, राजपूतो ने उनका सिर कंधे से नीचे उतार दिया।

उसके बाद भी भारत के वीर जवानों ने हार नही मानी।जब 7 वी सदी इस्लाम की शुरू हुई , जिस समय अरब से लेकर अफ्रीका, ईरान यूरोप, सीरिया , मोरक्को, ट्यूनीशिया, तुर्की यह बड़े बड़े देश जब मुसलमान बन गए, भारत में "बप्पा रावल " महाराणा प्रताप के पितामह का जन्म हो चुका था, वे पूर्णतः योद्धा बन चुके थे, इस्लाम के पंजे में जकड़ गए।

अफगानिस्तान तक से मुसलमानो को उस वीर ने मार भगाया, केवल यही नही, वह लड़ते लड़ते खलीफा की गद्दी तक जा पहुंचा, जहां खुद खलीफा को अपनी जान की भीख मांगनी पड़ी।

उसके बाद भी यह सिलसिला रुका नही । नागभट्ट प्रतिहार द्वितीय जैसे योद्धा भारत को मिले । जिन्होंने अपने पूरे जीवन राजपूती धर्म का पालन करते हुए पूरे भारत की न केवल रक्षा की, बल्कि हमारी शक्ति का डंका विश्व मे बजाए रखा।

पहले बप्पा रावल में साबित किया था कि अरब अपराजित नही है लेकिन 836 ई के समय भारत मे वह हुआ, की जिससे विश्वविजेता मुसलमान थर्रा गए । मुसलमानो ने अपने इतिहास में उन्हें अपना सबसे बड़ा दुश्मन कहा है वह सरदार भी राजपूत ही थे।सम्राट मिहिरभोज प्रतिहार ।।मिहिरभोज के बारे में कहा जाता है की उनका प्रताप ऋषि अगस्त्य से भी ज़्यादा चमका । ऋषि अगस्त्य वहीं है, जिन्होंने श्रीराम को वह अस्त्र दिया था, जिससे रावण का वध सम्भव था ।राम के विजय अभियान के हिडन योद्धाओं में एकथे उन्होंने मुसलमानो को केवल 5 गुफाओं तक सीमित कर दिया।यह वही समय था जिस समय मुसलमान किसी युद्ध मे केवल जीत हासिल करते थे ओर वहां की प्रजा को मुसलमान बना देते, भारत वीर राजपूत मिहिरभोज ने इनअक्रान्ताओ को अरब तक थर्रा दिया।

पृथ्वी राज चौहान तक इस्लाम के उत्कर्ष के 400 सालों बाद तक भारत के राजपूतों ने इस्लाम नाम की बीमारी भारत को नही लगने दी, उस युद्ध काल मे भी भारत की अर्थव्यवस्था को गिरने नही दिया।उसके बाद मुसलमान विजयी भी हुए, लेकिन राजपुतो ने सत्ता गंवाकर भी हार नही मानी एक दिन वह चैन से नही बैठे, अंतिम वीर दुर्गादास जी राठौड़ ने दिल्ली को झुकाकर, जोधपुर का किला मुगलो के हलक ने निकाल कर हिन्दू धर्म की गरिमा, वीरता शौर्य को चार चांद लगा दिए।

किसी भी देश को मुसलमान बनाने में मुसलमानो में 20 साल नही लिए, ओर भारत मे 500 साल राज करने के बाद भी मेवाड़ के शेर महाराणा राजसिंहः ने अपने घोड़े पर भी इस्लाम की मुहर नही लगवाई ।

महाराणा प्रताप, दुर्गादास राठौड़, मिहिरभोज, दुर्गावती, चौहान, परमार लगभग सारे राजपूत अपनी मातृभूमि के लिए जान पर खेल गए ।। एक समय ऐसा आ गया था, लड़ते लड़ते राजपूत केवल 2% पर आकर ठहर गए।

एक बार पूरी दुनियां देखे, ओर आज अपना वर्तमान देखे।जिन मुसलमानों ने 20 साल में आधी विश्व आबादी को मुसलमान बना दिया, वह भारत मे केवल पाकिस्तान बांग्लादेश तक सिमट कर ही क्यो रह गए ?

मान लिया कि उस समय लड़ना राजपुत राजाओं का धर्म था, लेकिन जब राजाओं ने अपना धर्म निभा दिया तो आज उनकी बेटियों, पोतियों पर काल्पनिक कहानियां गढ़कर उन योद्धाओं के वंशजो का हिन्दुओं द्वारा ही अपमान कुछ हिन्दुओं द्वारा ही उनका इतिहास चोरी करना क्या यह बलिदानियों को भेंट करता है हिन्दु समाज ?

राजा भोज, विक्रमादित्य, नागभट्ट प्रथम और नागभट्ट द्वितीय, चंद्रगुप्त मौर्य, बिंदुसार, समुद्रगुप्त, स्कंद गुप्त, छत्रसाल बुंदेला, आल्हा उदल, राजा भाटी, भूपत भाटी, चाचादेव भाटी, सिद्ध श्री देवराज भाटी, कानड़ देव चौहान वीरमदेव चौहान, हठी हम्मीर देव चौहान, विग्रहराज चौहान, मालदेव सिंह राठौड़, विजय राव लांझा भाटी, भोजदेव भाटी, चूहड़ विजयराव भाटी, बलराज भाटी, घड़सी, रतनसिं, राणा हमीर सिंह और अमर सिंह, अमर सिंह राठौड़ दुर्गादास राठौड़ जसवंत सिंह राठौड़ मिर्जा राजा जयसिंह राजा जयचंद, भीमदेव सोलंकी, सिद्ध श्री राजा जय सिंह सोलंकी, पुलकेशिन द्वितीय सोलंकी, रानी दुर्गावती, रानी कर्णावती, राजकुमारी रत्नाबाई, रानी रुद्रा देवी, हाड़ी रानी, पद्मावती, तोगा जी वीरवर कल्लाजी जयमल जी जेता कुपा, गोरा बादल राणा रतन सिंह, पजबन राय जी कच्छावा, मोहन सिंह मंढाड़ , राजा पोरस, हर्षवर्धन बेस, सुहेलदेव बेस , राव शेखाजी, राव चंद्रसेन जी दोड़ , राव चंद्र सिंह जी राठौड़, कृष्ण कुमार सोलंकी, ललितादित्य मुक्तापीड़, जनरल जोरावर सिंह कालुवारिया, धीर सिंह पुंडीर ,बल्लु जी चंपावत, भीष्म रावत चुण्डा जी, रामसाह सिंहतोमर और उनका वंश, झाला राजा मान, महाराजा अनंगपाल सिंह तोमर, स्वतंत्रता सेनानी राव बख्तावर सिंह अमझेरा वजीर सिंह पठानिया, राव राजा राम बक्स सिंह, व्हाट ठाकुर कुशाल सिंह, ठाकुर रोशन सिंह,ठाकुर महावीर सिंह, राव बेनी माधव सिंह, डूंगजी, भुरजी , बलजी, जवाहर जी, छत्रपति शिवाजी और हमारे न जाने अनगिनत लोक देवता, और गुजरात में एक से बढ़कर एक योद्धा लोक देवताओं, संत, सती जुझार, भांजी जडेजा, अजय पाल देव जी।

यह तो सिर्फ कुछ ही नाम है जिन्हें हमने गलती से किसी इतिहास सोशल मीडिया या फिर किसी पुस्तक में पढ़ लिया वरना स्कूल पाठ्यक्रम में नहीं मिलेगा। एक से बढ़कर एक योद्धा पैदा हुए हैं जिन्होंने 18 साल की उम्र से पहले ही अपना योगदान दे दिया घर के घर गांव के गांव ढाणी की ढाणी खाली हो गई जब कोई भी पुरुष नहीं बचा किसी गांव या ढाणी में पूरा का पूरा परिवार पूरे पूरे गांव कुर्बान हो गया रणभेरी पर चल गया धर्म के लिए।

नागपुर मराठा काल

नागपुर 
मराठा काल 

मराठा काल में नागपुर एक साधारण क्षेत्र से बदलकर एक विशाल और शक्तिशाली साम्राज्य की संप्रभु राजधानी बना।

 सत्रह सौ तैंतालीस से अठारह सौ तिरपन तक यहाँ मराठा साम्राज्य के भोंसले राजवंश का शासन रहा।
 जिसने नागपुर का राजनीतिक आर्थिक और सांस्कृतिक कायाकल्प कर दिया।  
नागपुर नाम नाग नदी की वजह से हुआ।

भोंसले वंश का आगमन।
 गोंड राजा चंद सुल्तान की मृत्यु के बाद राजपरिवार के गृहयुद्ध को सुलझाने के लिए राघोजी प्रथम भोंसले को बुलाया गया था ।
संप्रभु राजधानी स्थिति को संभालने के बाद राघोजी प्रथम
 ने सत्रह सौ तैंतालीस में नागपुर पर सीधा अधिकार स्थापित किया ।
और इसे अपने भोंसले मराठा साम्राज्य की आधिकारिक राजधानी घोषित किया । 

 साम्राज्य का अभूतपूर्व विस्तार  

भोंसले शासकों के काल में नागपुर केवल एक शहर नहीं बल्कि एक विशाल मध्य पूर्वी भारतीय साम्राज्य का केंद्र बन गया ।
नागपुर के नियंत्रण में आज का पूरा विदर्भ महाराष्ट्र छत्तीसगढ़ ओडिशा और मध्य प्रदेश व झारखंड के कुछ हिस्से शामिल
 थे।
 ओडिशा का प्रसिद्ध जगन्नाथ मंदिर भी इसी काल में नागपुर साम्राज्य के अधीन आया था।  

 वास्तुकला और नागरिक बुनियादी ढांचा
  
मराठा शासकों ने नागपुर को एक सुनियोजित और समृद्ध शहर बनाने के लिए बड़े पैमाने पर निर्माण कार्य करवाए।  
किलेबंदी और प्रवेश द्वार सुरक्षा के लिए पूरे नागपुर शहर के चारों ओर एक विशाल सुरक्षा दीवार बनाई गई ।
जिसमें शहर में प्रवेश के लिए कई ऐतिहासिक द्वार थे।
  
वाडा संस्कृति और महल नागपुर का प्रसिद्ध महल क्षेत्र इसी काल की देन है।
 राजाओं और सरदारों के रहने के लिए विशाल पारंपरिक वाडा मराठा शैली के महलनुमा घर बनाए गए । 
तालाबों का निर्माण पानी की सुचारू व्यवस्था के लिए गांधी सागर तालाब जुम्मा तालाब और शुक्रवारी तालाब जैसे जल निकायों का सुंदरीकरण और निर्माण कराया गया । 
धार्मिक स्थल इस काल में मराठा स्थापत्य शैली के कई भव्य मंदिरों और घाटों का निर्माण हुआ।  

 पांचगांव का ऐतिहासिक गृहयुद्ध सत्रह सौ चौहत्तर
  
राघोजी प्रथम के बेटों मुधोजी और साबाजी के बीच नागपुर की गद्दी हासिल करने के लिए छब्बीस जनवरी सत्रह सौ चौहत्तर को पांचगांव के मैदान में भीषण युद्ध हुआ।  
इस युद्ध में तोपों और हाथियों का इस्तेमाल हुआ था।
 जिसमें साबाजी मारे गए और मुधोजी ने नागपुर की सत्ता संभाली।  

व्यापार और प्रशासनिक विकास  
भोंसले राजाओं ने नागपुर को मध्य भारत का एक बड़ा व्यापारिक केंद्र बनाया कपड़ा और कृषि व्यापार को बढ़ावा देने के लिए कई नए बाजारों बुधवारी बाजार इतवारी बाजार की नींव रखी गई ।

इस दौरान राजकाज और दरबार की मुख्य भाषा मराठी
 बनी।  

मराठा काल का अंत सत्रह सौ सत्रह से अठारह सौ तिरपन  
सीताबर्डी का युद्ध।
 अठारह सौ सत्रह तीसरे एंग्लो मराठा युद्ध के दौरान अप्पा साहेब भोंसले अंग्रेजों से हार गए ।
जिसके बाद नागपुर पर ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी का परोक्ष नियंत्रण हो गया । 
ब्रिटिश विलय अठारह सौ तिरपन वर्ष अठारह सौ तिरपन में अंतिम भोंसले शासक राघोजी तृतीय की बिना उत्तराधिकारी के मृत्यु हो गई।
 इसके बाद अंग्रेजों ने हड़प नीति के तहत नागपुर के मराठा साम्राज्य को हमेशा के लिए ब्रिटिश भारत में मिला लिया।  

मुधोजी और साबाजी भोंसले के बीच हुआ संघर्ष

 नागपुर के मराठा इतिहास का एक अत्यंत नाटकीय और रक्तपात से भरा अध्याय है।
 इस गृहयुद्ध का अंतिम और सबसे बड़ा मुकाबला छब्बीस जनवरी सत्रह सौ पचहत्तर को पांचगांव के मैदान में हुआ जो नागपुर से लगभग छह मील दक्षिण में स्थित है।  

नागपुर के तत्कालीन मराठा शासक जानोजी भोंसले की सत्रह सौ बहत्तर में बिना किसी संतान के मृत्यु हो गई।
 उन्होंने मरने से पहले अपने भाई मुधोजी के छोटे बेटे राघोजी द्वितीय को गोद लेकर अपना उत्तराधिकारी घोषित
 किया था।
 लेकिन जानोजी के दूसरे भाई साबाजी भोंसले ने इस फैसले को नहीं माना।
 और नागपुर की गद्दी पर अपना दावा ठोक दिया इस वजह से दोनों भाइयों मुधोजी और साबाजी के बीच सत्ता के लिए तीन साल तक लगातार सैन्य टकराव चलता रहा । 

 पांचगांव के युद्ध का घटनाक्रम  
छब्बीस जनवरी सत्रह सौ पचहत्तर को दोनों भाई अपनी अपनी सेनाओं के साथ पांचगांव के मैदान में आमने सामने आए । 
साबाजी की बढ़त युद्ध की शुरुआत में साबाजी भोंसले का पलड़ा बेहद भारी रहा।
 उनकी कुशल सेना ने मुधोजी की सेना को पीछे धकेल
 दिया । 
मुधोजी का घिरना युद्ध के एक मोड़ पर मुधोजी पूरी तरह से साबाजी के सैनिकों द्वारा घेर लिए गए मुधोजी की हार
 लगभग तय दिख रही थी।  

तीन युद्ध का नाटकीय अंत  

जीत के उत्साह में चूर साबाजी भोंसले ने अपने हाथी को सीधे मुधोजी के हाथी की तरफ बढ़ा दिया।
 साबाजी ने मुधोजी के करीब पहुंचकर चिल्लाकर उन्हें आत्मसमर्पण करने को कहा । 
लेकिन मुधोजी ने हार मानने के बजाय अचानक अपनी पिस्तौल निकाली।
 और सीधे साबाजी पर गोली चला दी गोली लगते ही 
साबाजी भोंसले की युद्ध के मैदान में ही तड़पकर मृत्यु
 हो गई।
 अपने सेनापति और राजा को मरा देख साबाजी की सेना में भगदड़ मच गई और जीती जा रही बाजी अचानक मुधोजी के पक्ष में पलट गई । 

 युद्ध का परिणाम  
एकछत्र राज अपने सगे भाई साबाजी की हत्या करने के बाद नागपुर की राजगद्दी के लिए मुधोजी का रास्ता पूरी तरह साफ हो गया।  
संरक्षक का पद
 मुधोजी ने अपने छोटे बेटे राघोजी द्वितीय को नागपुर का आधिकारिक राजा बनाया ।
और खुद उसके मुख्य संरक्षक के रूप में सत्ता की कमान संभाली । 
इस शानदार और अप्रत्याशित जीत के बाद मुधोजी भोंसले को सेना धुरंधर की उपाधि दी गई।

सिखो ने नही बल्कि हिन्दुओ ने सदैव सिखों को बचाया

सिखो ने नही बल्कि हिन्दुओ ने सदैव सिखों को बचाया है
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अमृतसर के स्वर्ण मंदिर में पठानों ने भर दी थी मिट्टी , निकाल ले गए थे हरमंदिर साहिब का स्वर्ण ।। ख़लसा पंथ का अंत था निकट ।। 

22 अक्टूबर 1758 दोपहर 2 बजे । दोआब मोर्चा , कानपुर 

पेशवाओ ने सरदार रघुनाथ पंडितराव के हमलों के फलस्वरूप सन 1751 से उत्तर में अपनी पकड़ मजबूत कर ली थी । वे हरियाणा के जाट, राजा सुरजमाल के साथ रोहिल्लो को जकड़ने में लगे थे । 

इस काम मे पेशवाओ के साथ आगरा से साबाजी शिन्दे और तुकोजी होल्कर भी मजबूती से घेराव कर रहे थे । 
सारा ध्यान रोहिल्ला मुल्ला नजीब जंग और मुग़ल की राजपूत रानी मालिका ज़मानी को पूर्वी दिल्ली और मेरठ में नेस्तनाबूत करने में था
 कि अचानक पठानों ने हरमिंदर साहेब , अमृतसर को नापाक कर दिया और स्वर्ण मंदिर तोड दिया ।।

सिख सरदार अवाक रह गए , उनके सबसे पवित्र स्थान स्वर्ण मंदिर के तालाब में पठानों का कब्जा हो गया था । गिनती के 15 हज़ार सिख अब पठानों की 40 हजारी फौज़ से कैसे लड़ते ?

सरहिन्द में सिखों के तीन बेहतरीन सरदार 

१. जस्सासिंह अहलूवालिया , कपूरथला
२. अला जाट , पटियाला
३. जस्ससिंह रामगढ़िया , अज्ञात 

ने लाहौर के पुराने मुगल गवर्नर अदीना बेग से मुलाकात की और चारो ने अमृतसर को मुक्त कराने पेशवा पंडितराओ रॉघोबा को संदेश भेजे ।। संदेश 6 थे और इस प्रकार है ।

पंडितराव राजा रॉघोबा ।।

सिरहिन्द में तुर्क 
पठान अब्दुस्समन्द खान आ गए है ।
हरमिंदर साहब नापाक कर दिया है ।
पवित्र मंदिर में बेग़ैरत लाशें है ।
दक्क्न की मदद जरूरी । 
हिन्दू-ख़ालसा का सफ़ाया होना । 

रॉघोबा उर्फ रघुनाथराव ने पूर्व की मुहिम रोक दी और सरहिन्द की ओर निकल पड़े और फरवरी में पेशवा , मराठो की भयंकर फौज़ के साथ पंजाब में घुस आए । 

अब यहां से शुरू हुई अमृतसर को मुक्त करने की कवयाद ।। इसमे मराठाओ के भगवा के नीचे निम्मनलिखित सरदार पहुंचे और सिखों के सबसे पवित्र स्थान को मुक्त करने , शुरू हुआ पठान - पेशवा सँघर्ष ।।

24 फरवरी : कुंजपुरा की जंग : पेशवा कृष्णराव काले ( दीक्षित ) और शिवनायरायन गोसाइँ बुन्देला ने 2400 पठानों को मार कर खूनी जंग लड़ी । 8 घण्टे की जंग के बाद यह किला जीत लिया गया । पंजाब में नंगी तलवारों के साथ पेशवाओ का प्रवेश ।।

8 मार्च : सिरहिन्द की जंग और 'मराठा सरदार': पेशवा रघुनाथ राओ रॉघोबा , 

सरदार हिग्निस .

सिख और हिंदुत्ववादी अक्सर सिखों को सदैव मुगलों से लड़ने वाले योद्धा के रूप में पेश करते हैं। पर इतिहास की कुछ बातें अक्सर नहीं बताई जातीं, जैसे—

1) छठे गुरु, गुरु हरगोबिंद जी की जहाँगीर के साथ दोस्ती रही, जबकि उसी जहाँगीर ने उनके पिता, पाँचवें गुरु अर्जन देव जी को मृत्युदंड दिया था।
जिस हत्यारे ने उसके पिता की क्रूरतापूर्वक हत्या की हो , उसका पुत्र हत्यारे को मित्र बना ले 
और उसके साथ पोलो खेले ?🙂

2) कथित हिन्द की चादर औरंगजेब की फौज के साथ अहोम के राजा चक्रधर से युद्ध करने गए थे , इसका मतलब उनके संबंध औरंगजेब से प्रगाढ थे ,, राजा चक्रधर का राज्य पंजाब से कई किलोमीटर दूर था और न ही कोई शत्रुता थी अहोम शासक चक्रधर की 

3): दसवें गुरु, गुरु गोबिंद सिंह जी का औरंगज़ेब के बेटे बहादुर शाह से संबंध रहा और वे उसके दक्कन अभियान के साथ रहे 

4) गुरु गोबिंद सिंह जी की पत्नियाँ दिल्ली (मुगल राजधानी) में लगभग 40 साल तक सुरक्षित रहीं। वहीं से उन्होंने खालसा के कई मामलों का संचालन किया और बाबा बंदा बैरागी का विरोध किया, 
जो मुगलों से लड़ रहे थे। बाद में बाबा बंदा बैरागी को मुगलों ने दिल्ली में मृत्युदंड दे दिया और उनका बंदई खालसा गुट बिखर गया।
मुगलो के संरक्षण मे इन्होने तत खालसा की नीव रखी , जो बंदा वैरागी के विरोध मे थी यही कारण था कि सिख जनरल विनोद सिंह जैसे की सिख योद्धाओं ने बंदा वैरागी से गद्दारी कर मुगलो का साथ दिया 

5 माता सुंदरी जी के दत्तक पुत्र ने भी मुगल दरबार में काम किया। बाद में एक हत्या के मामले में मुगलों ने उसे भी मृत्युदंड दे दिया।

यह भी इतिहास है इसे क्यो नही बताते सिख इतिहासकार

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मैक्समूलर एक_लुच्चा

#मैक्समूलर_एक_लुच्चा था। 
"Maxmuller was a Swindler".
: Prodosh Aich 
(गूगल कीजिए) 

पहले एक ट्रेसिंग पेपर आता था, यदि आपको स्मरण हो तो। उसको चित्र के ऊपर रखकर, पहले पेंसिल से चित्र की कॉपी की जाती थी। यह है कॉपी करना। 

फिर उसकी सहायता से एक प्लेन पेपर पर ट्रेसिंग बनाई थी, चित्र की। यह है collate करना। 

तदोपरांत उस चित्र में रंग भरे जाते थे। 

याद है आपको?
पता नहीं आजकल ऐसा होता है या नहीं। 

जो लोग मैक्समूलर को संस्कृत का विद्वान मानते हों, उन्होंने कभी यह नहीं पढ़ा होगा कि ईस्ट इंडिया कंपनी के प्रतिवर्ष 200 पाउंड की नौकरी पर रखा हुवा मैक्समूलर ऋग्वेद को किस तरह लिखा था। उसे एक पेज को लिखने का 8 पाउंड मिलता था, और प्रत्येक वर्ष में 25 पेज लिख पाता था। इतना बड़ा संस्कृतज्ञ और एक वर्ष में मात्र 25 पेज लिख सकता था? इसका आखिर रहस्य क्या है? 
रहस्य छुपा है उसकी लिखाई की विधि में। उसको संस्कृत का स भी नहीं आता था। 

तो फिर कैसे लिखता था वह? 
उसने स्वयं लिखा है, और उस पर रिसर्च करने वालों ने लिखा है कि वह copy और collate करता था। 

इसका अर्थ क्या होता है?

 
उसे फ्रांस की लाइब्रेरी में एक संस्कृत ग्रंथ की प्रति हांथ लग गई। उसको उसने वहां से झटक लिया। और उन पांडुलिपियों को लेकर घूमने लगा और उनकी ऊल जलूल व्याख्या करने लगा। क्योंकि अन्य यूरोपीय विद्वान भी नहीं जानते थे कि उन ग्रंथो में क्या था, इसलिए वे भी मूर्ख बनते गए। उसने फारसी भाषा पढ़ रखा था। और हम जानते हैं कि दारा शिकोह और अन्य लोगों द्वारा संस्कृत ग्रंथों के किए गए अनुवाद फारसी में उपलब्ध थे, यूरोप में भी। उससे उसने जो भी पढ़ा हो भारत के बारे में। 

इस copy और collate का अर्थ क्या होता है?
वही जो तकनीक ऊपर वर्णित है, ट्रेसिंग पेपर वाली। 
पहले ट्रेसिंग पेपर से उन शब्दों की ट्रेसिंग बनाता था जिसे कहते हैं कॉपी करना। फिर उस ट्रेसिंग को वह सादे पेपर पर उतारता था। जिसे कहते हैं collate करना। और उस collate किए गए पन्नों को वह बोलता था manuscript अर्थात पांडुलिपि। 

बहुत दिनों से इन दो शब्दों की व्याख्या करना चाहता था। आज कर पाया। 

और हम इतने बड़े टूचिए हैं कि हमने जर्मनी के दूतावास का नाम आज भी मैक्समूलर भवन रख रखा है, जिसने पहली बात तो, प्रथम अवसर पाते ही जर्मनी की नागरिकता छोड़कर उसने इंग्लैंड की नागरिकता ग्रहण कर ली थी। 

दूसरी बात उसकी कुल प्रमाणिक शिक्षा मैट्रिक पास करने भर की थी। तीसरी बात उसने संस्कृत का कोई भी शब्द अपने कानों से नहीं सुना था। चौथी बात उसने इस कॉपी कोलेट विधि के द्वारा जो भी लिखा हो संस्कृत, लिखा हो, स्वतंत्र लेखन के नाम पर उसने संस्कृत का एक वाक्य भी नहीं लिखा था। लिखा हो तो कोई मुझे दिखावे यहां।

®Tribhuwan Singh
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शिवलिंग पर अर्पित प्रसाद खाना चाहिए या नहीं?

*शास्त्र के अनुसार शिवलिंग पर अर्पित प्रसाद खाना चाहिए या नहीं?*

इसका उत्तर 2 भाग में है - *"जो चढ़ाया"* और *"जो चढ़ाने के बाद बचा"*।

### *1. शास्त्र क्या कहता है?*

शिव पुराण और आगम शास्त्रों के अनुसार शिवलिंग पर 2 तरह का प्रसाद होता है:

#### *A. "निर्माल्य" - जो शिवलिंग को स्पर्श कर चुका है*
*नियम: इसे नहीं खाते*

कारण: शिवलिंग पर चढ़ा जल, बेलपत्र, फूल, दूध आदि "निर्माल्य" कहलाता है। ये भगवान का उच्छिष्ट है।  
शिव पुराण में कहा गया है कि शिवलिंग पर चढ़ा हुआ नैवेद्य केवल शिव और शिव के गण ही ग्रहण कर सकते हैं।

*"शिवस्योच्छिष्टं नैवेद्यं भक्षयेत् न कदाचन"*  
मतलब: शिव को चढ़ाया हुआ उच्छिष्ट प्रसाद कभी नहीं खाना चाहिए।

इसलिए मंदिर में पुजारी जी शिवलिंग पर चढ़ा दूध, जल नाली से बहा देते हैं।

#### *B. "नैवेद्य" - जो पास में थाली में रखा है*
*नियम: इसे खा सकते हैं*

जो फल, मिठाई, पेठा आदि शिवलिंग को स्पर्श नहीं कराते, सिर्फ सामने थाली में रखकर "भोग" लगाते हैं।  
पूजा के बाद वही "प्रसाद" बनकर सबमें बांटा जाता है। इसे खाना शुभ और पुण्यदायक है।

### *2. आसान नियम याद रखिए*
क्या चढ़ाया कहाँ रखा खा सकते हैं?
**दूध, जल, बेलपत्र** सीधे शिवलिंग पर **नहीं** - ये निर्माल्य है। इसे पैरों में या जड़ में डाल दें
**फल, मिठाई, लड्डू** थाली में, शिवलिंग से दूर **हाँ** - ये भोग है। पूजा बाद प्रसाद रूप में खाएं
### *3. अपवाद - केवल 2 जगह खा सकते हैं*

शास्त्र में 2 जगह का नियम अलग है:

1. *काशी विश्वनाथ मंदिर* - यहाँ शिवलिंग पर चढ़ा प्रसाद भी "महाप्रसाद" माना जाता है और भक्तों में बांटा जाता है।
2. *बाणलिंग* - नर्मदा नदी के प्राकृतिक शिवलिंग पर चढ़ा नैवेद्य खा सकते हैं।

इनके अलावा बाकी सभी शिव मंदिरों में लिंग पर स्पर्श हुआ प्रसाद नहीं खाते।

### *4. क्यों है ऐसा नियम?*

शिव "संहारक" और "योगी" रूप हैं। शिवलिंग पर चढ़ी हर चीज उनके साथ उनकी ऊर्जा को भी लेती है।  
इसलिए वो ऊर्जा सिर्फ शिव के लिए आरक्षित मानी जाती है। हम उसे ग्रहण नहीं करते।

दूसरी तरफ विष्णु, देवी, हनुमान जी को चढ़ा प्रसाद हम खाते हैं क्योंकि वो "पालनहार" रूप हैं।

### *एक लाइन में सार*
*"शिवलिंग को छुआ हुआ प्रसाद = नहीं"*  
*"शिव के सामने रखा हुआ प्रसाद = हाँ"*

इसलिए अगली बार मंदिर जाएं तो पुजारी से 2 थाली लगवाएं।  
एक लिंग पर जल चढ़ाने के लिए, दूसरी भोग लगाने के लिए। पूजा बाद दूसरी वाली थाली का प्रसाद पूरे परिवार के साथ खायें। हर हर महादेव, ऊँ नमः शिवाय।