Thursday, 1 October 2026

जीवित्पुत्रिका व्रत=जीमूतवाहन व्रत महा अष्टमी व्रत

1. जीवित्पुत्रिका व्रत= लक्ष्मी का व्रत= धन-संपत्ति तथा सौभाग्य की कामना= उदयव्यापिनी अष्टमी में।
2. जीमूतवाहन-पूजा= जीमूतवाहन की पूजा=संतान की रक्षा हेतु व्रत= प्रदोषव्यापिनी अष्टमी में।

दोनों को एक मान लेना भ्रम का कारण है।

मिथिला में विशुद्ध जीमूतवाहन व्रत को जितिया कहते हैं।

19वीं शती में लिखा गया शब्दकल्पद्रुम सनातन धर्म से सम्बन्धित एक महाकोष है। यह राधाकांतदेव बहादुर द्वारा निर्मित है। इसका प्रकाशन 1828-1854 ई० में हुआ। यह पूर्णतः संस्कृत का एकभाषीय कोश है और सात खण्डों में विरचित है। इस कोश में यथासंभव समस्त उपलब्ध संस्कृत साहित्य के वाङ्मय का उपयोग किया गया है। इसके अतिरिक्त अंत में परिशिष्ट भी दिया गया है जो अत्यंत महत्वपूर्ण है। ऐतिहसिक दृष्टि से भारतीय-कोश-रचना के विकासक्रम में इसे विशिष्ट कोश कहा जा सकता है। परवर्ती संस्कृत कोशों पर ही नहीं, भारतीय भाषा के सभी कोशों पर इसका प्रभाव व्यापक रूप से पड़ता रहा है।। इसके द्वितीय खण्ड, पृ. के पृष्ठ 531-32 पर जिताष्टमी शीर्षक से विवरण है जिसमें जीमूतवाहन-पूजा तथा लक्ष्मीव्रत का एक स्थल पर वर्णन आया है।

इसमें भी स्पष्टतः उल्लेख है कि यह अष्टमी प्रदोषव्यापिनी होती है। पहले दिन या दूसरे दिन जब अष्टमी हो तब यह व्रत होगा। यदि दोनों दिन हो तो पर दिन होगा और यदि किसी दिन न हो तो उदयगामिनी तिथि में यह व्रत होगा।

भ्रान्ति तब आरम्भ हुई जब इसी जिताष्टमी या जीमूताष्टमी के साथ राधाकान्त देव ने लक्ष्मीव्रत का उल्लेख कर दिया।

लक्ष्मीव्रत के लिए ‘निर्णयामृतसिन्धु’ से उद्धरण दिया कि अष्टमी के चन्द्रोदय का समय यानी अर्धराति में यदि अष्टमी हो तो लक्ष्मीव्रत होगा और यदि सूर्योदय के समय अष्टमी रहे तो वह लक्ष्मी जीवित्पुत्रिका हो जाती है।

जो पण्डित धर्मशास्त्रीय ग्रन्थों की भाषा और शैली नहीं जानते थे उन्हें अब यहाँ भ्रान्ति उत्पन्न हुई। उन्होंने ‘जीवित्पुत्रिका’ शब्द देखकर इसे जीमूतवाहन-व्रत समझ लिया। नामसाम्य के कारण ऐसा भ्रम उत्पन्न हुआ होगा।

लेकिन उन्होंने यह नहीं देखा कि परस्पर विरोधी वचन एकत्र क्यों लिखे गये? ऊपर जीमूतवाहन व्रत में प्रदोषव्यापिनी लिख चुके हैं और यहाँ फिर निशीथव्यपिनी और उदयव्यापिनी लिख रहे हैं?

कारण स्पष्ट है कि दो व्रतों का विधान यहाँ एक स्थान पर किया गया और भ्रम उत्पन्न हो गया।

तथाकथित धर्मशास्त्रियों को देखना चाहिए कि ऊपर जीमूतवाहन व्रत में पूज्य देवता जीमूतवाहन हैं और यहाँ पूज्य देवता लक्ष्मी हैं।

इन दोनों व्रतों के घाल-मेल में सारा विवाद उत्पन्न हो गया है।

आश्विन में लक्ष्मी दुर्गा का रूप हैं तो विधान शुक्लपक्ष की अष्टमी के समान हुआ, जिसमें सप्तमी विद्धा का निषेध है। उस पर से ‘निर्णयामृतसिन्धुकार’ ने अपने वचन में लक्ष्मी के लिए ‘जीवित्पुत्रिका’ शब्द का भी प्रयोग कर दिया। लोग जीमूतवाहन की पूजा में लक्ष्मीपूजा का विधान जोड़ने लगे। जीमूतवाहन व्रत की ऐसी कोई कथा थी नहीं, तो कथा भी लिख दी गयी! लोगों ने जीमूतवाहन पूजा और लक्ष्मीव्रत को एक कह दिया।

जहाँ से यह भ्रान्ति उत्पन्न हुई वहाँ का उद्धरण पढ़ लेने के बाद अब शायद कोई भ्रान्ति न रहे, इसलिए मैं मूल भी दे रहे हूँ-

जिताष्टमी, स्त्री. (जिता पुत्त्रसौभाग्यदानेन सर्व्वोत्कर्षेण स्थिता या अष्टमी।) गौणाश्विनकृष्णाष्टमी । सैव जीमूताष्टमी। यथा, “आश्विन-कृष्णाष्टम्यां जीमूतवाहनपूजा । तत्राष्टमी प्रदोषव्यापिनी ग्राह्या।

भविष्योत्तरे-

“इषे मास्यसिते पक्षे अष्टमी या तिथिर्भवेत् ।

पुत्त्रसौभाग्यदा स्त्रीणां ख्याता सा जीवपुत्त्रिका ॥

शालिवाहनराजस्य पुत्त्रो जीमूतवाहनः ।

तस्यां पूज्यः स नारीभिः पुत्त्रसौभाग्यलिप्सया॥

प्रदोषसमये स्त्रीभिः पूज्यो जीमूतवाहनः।

पुस्करिणीं विधायाथ प्राङ्गणे चतुरस्रिकाम्॥”

किञ्च विष्णुधर्म्मोत्तरे।

“पूर्व्वेद्युरपरेद्युर्व्वा प्रदोषे यत्र चाष्टमी।

तत्र पूज्यः सदा स्त्रीभी राजा जीमूतवाहनः ॥”

तथा च । यद्दिने प्रदोषव्यापिनी अष्टमी तत्रैव व्रतं, उभयदिने चेत् परदिने त्रिसन्ध्यव्यापित्वात्। उभयदिने प्रदोषाव्याप्तौ उदयगामिन्याम्।

तदुक्तं निर्णयामृतसिन्धौ।

“लक्ष्मीव्रतं चाभ्युदिते शशाङ्के यत्राष्टमी चाश्विनकृष्णपक्षे।

तत्रोदयं वै कुरुते दिनेशस्तदा भवेज्जीवितपुत्त्रिका सा॥” इति।

अस्यामष्टम्यां स्त्रीभिर्न भोक्तव्यम्।

“आश्विनस्यासिताष्ठम्यां याः स्त्रियोऽन्नं हि भुञ्जते ।

मृतवत्सा भवेयुस्ता वैधव्यञ्च भवेद्ध्रुवम्॥” इति वचनात् ।

Wednesday, 30 September 2026

रोमिला थापर: ऐतिहासिक मोतियाबिंद से ग्रसित डिस्टोरियन

रोमिला थापर: ऐतिहासिक मोतियाबिंद से ग्रसित डिस्टोरियन

रोमिला थापर पिछले कई दशक से अकादमिक और सिविल के पाठ्यक्रम में अनिवार्य विषय के तौर पर मौजूद है। तथ्यों के नाम पर अहंकार और कपोल कल्पनाओं को परोसती यह इस डिस्टोरियन के लेखन की पहली चाल पहचान पर हमला करने की थी। रोमिला के फर्जीफिकेशन को एक एक कर समझते हैं।

1. थापर ने लगातार ये स्थापित किया कि "हिंदू धर्म जैसा हम आज जानते हैं, वह उन्नीसवीं सदी का निर्माण है। पूर्व-औपनिवेशिक भारत में कोई एकल एकीकृत हिंदू पहचान नहीं थी।" उसके अनुसार प्राचीन भारत में केवल शैव, वैष्णव, शाक्त जैसे बिखरे हुए पंथ थे, जिनमें कोई साझा सभ्यतागत चेतना नहीं थी। इस एक तर्क से भारत की हजारों साल की सांस्कृतिक निरंतरता को तोड़ दिया जाता है और देश को एक आधुनिक, कृत्रिम निर्माण के रूप में पेश किया जाता है।

2. उसका दूसरा कार्य हिन्दू स्रोतों को अवैध घोषित करना था। रामायण, महाभारत, पुराण, वेद और अर्थशास्त्र जैसे ग्रंथों को ब्राह्मण एलीट वर्ग का प्रोपेगेंडा बताकर इतिहास के दायरे से बाहर कर दिया गया। इन ग्रंथों में दिए गए नगरों, राज्यों, वंशों और युद्धों के विस्तृत विवरणों को मिथक कह दिया गया। मजे की बात यह है कि यही कठोरता इस्लामिक काल के दरबारी इतिहासों पर कभी नहीं दिखाई गई, वहाँ तारीख-ए-फिरोजशाही या बाबरनामा जैसे एकतरफा ग्रंथ भी प्रामाणिक स्रोत बन जाते हैं।

3.थापर की तीसरी बात हिंदू धर्म को पूरी तरह जाति व्यवस्था में समेत देना थी। उसके इतिहास में भक्ति आंदोलन, अद्वैत, योग, न्याय दर्शन, गणित और खगोल जैसी बौद्धिक उपलब्धियों के लिए कोई जगह नहीं बची। हर कालखंड, हर राजवंश और हर परम्परा को केवल ब्राह्मण बनाम शूद्र के शोषण के फ्रेम में पढ़ाया गया, ताकि छात्र अपने धर्म को ज्ञान की परम्परा के बजाय केवल शोषण की व्यवस्था के रूप में देखें।

4. रोमिला की चौथी रणनीति पुरातात्विक और मंदिर परम्परा के भाषा के सौंदर्य, विन्यास, विधान को सिरे से नकारना था। अयोध्या, मथुरा और काशी जैसे स्थलों पर मंदिर के स्पष्ट अवशेष मिलने पर भी उन्हें धार्मिक संरचना नहीं बल्कि सामान्य आर्किटेक्चरल फीचर्स कहा गया। साथ ही एक बराबरी का झूठा नैरेटिव बनाया गया कि "महामूद गजनवी का मंदिर से जुड़ाव धार्मिक कट्टरता से ज्यादा धन के लिए विजय का मामला था।" और हिंदू राजाओं ने भी बौद्ध और जैन मठ तोड़े थे, इसलिए सोमनाथ से लेकर काशी विश्वनाथ तक का विध्वंस कोई धार्मिक कट्टरता नहीं बल्कि मध्यकालीन राजनीति का सामान्य हिस्सा था।

5. रोमिला का सबसे विषैला, हाइपोथेटिकल पैटर्न नैतिक मॉडल गढ़ने का था। अशोक जो युद्ध छोड़कर बौद्ध बन गया, वह सेक्युलर और महान है, जबकि समुद्रगुप्त, चाणक्य या पुष्यमित्र शुंग जैसे साम्राज्य निर्माता और राज्य की अवधारणा देने वाले लोग ब्राह्मणवादी और कट्टर हैं। इसका संदेश साफ था, हिंदू तभी अच्छा और प्रगतिशील माना जाएगा जब वह अपनी सत्ता, अपने प्रतीक और अपनी सभ्यतागत पहचान को खुद ही छोड़ दे।

6. हिंदू डी कंस्ट्रक्शन का मॉडल रोमिला ने तैयार किया और मार्क्सिस्ट डिस्टोरियन की कई पीढ़ी उसी के आधार पर बनाई। इस डी कंस्ट्रक्शन मॉडल में गजनी, गोरी, तुगलक, खिलजी, बाबर हीरो हैं, हिंदू राजा मार्क्स का बुर्जुआ है। इस पूरी डी-कंस्ट्रक्शन का सबसे बेतुका उदाहरण तब सामने आया जब थापर ने अपने एक लेक्चर में कहा कि "आज कुछ इतिहासकार कह रहे हैं कि शायद जब युधिष्ठिर ने कहा कि मैं राजा नहीं बनना चाहता, तो उसके मन में अशोक की छवि थी।" यानी 5000 साल पहले का महाभारत का नायक 2300 साल बाद हुए अशोक से प्रेरणा ले रहा है। इसी सोच का विस्तार अयोध्या पर दिया गया उसका वह हलफनामा है जिसमें उन्होंने कहा था कि "अयोध्या में बाबरी मस्जिद के नीचे ऐसे किसी मंदिर का कोई पुरातात्विक प्रमाण नहीं है जिसे राम का जन्मस्थान माना जा सके," जबकि बाद में ASI को वहां 50 से ज्यादा मंदिर स्तंभों के बेस मिले थे।

कोर्ट ने थापर की बात को नहीं माना लेकिन पिछले कई दशकों से थापर के झूठ को लिख पढ़ कर भारत के प्रोफेसर, सिविल सर्वेंट तैयार हुए। आप स्वयं सोचिए रोमिलाई स्कूल में प्रशिक्षित लोगों का भारत बोध क्या होगा।

भविष्य का सटीक वर्णन असम्भव है।

भविष्य का सटीक वर्णन असम्भव है। केवल भगवत् कृपा या ऋषि प्रेरणा कह सकते हैं, उससे भविष्य की कुछ घटनाओं का बोध होता है। 
फलानि ग्रहचारेण सूचयन्ति मनिषिणः।
को वक्ता तारतम्यस्य तमेकं वेधसं विना॥
तन्त्रालोक के अनुसार भविष्य के काल का अनुमान ३ दिन, मास, या वर्ष में होता है। उससे सटीक काल का पता नहीं चलता। एक प्रचलित उक्ति है-
अवश्यमेव भोक्तव्यं कृत कर्मं शुभाशुभम्।
त्रिभिर्मासैः, त्रिभिर्पक्षैः, त्रिभिर्वर्षैः, त्रिभिर्दिनैः॥
ओड़िशा में ६०० वर्ष पूर्व के महात्मा अच्युतानन्द की १५ पोथियां हैं, १ पोथी अनाचार के कारण नष्ट हो गयी। काकटपुर मंगला मन्दिर के पण्डित अमरेश मिश्र के पास ताम्र पोथी थी। उसी मन्दिर में जगन्नाथ मन्दिर के पुजारियों को निर्देश मिलता है कि जगनाथ विग्रह के लिए शंख-चक्र आदि चिह्नों वाला नीम वृक्ष कहां पर है। वहां मैं कुछ आईपीएस अधिकारियों के साथ १९९६ में गया था। उनका उद्देश्य यह जानना था कि मेरे मन में क्या षड्यन्त्र चल रहा है। किन्तु मेरे मन में केवल गणित ज्योतिष सम्बन्धी चिन्ता थी कि कुछ नियमों की कैसे व्याख्या की जाय। वहां पोथी के नाम पर ताम्बा की ५० प्लेट थी-हथेली के आकार की। एक खल्ली से अपने ललाट को छुआ और एक प्लेट निकाल कर उसे छुआ। मेरे मन में जो सन्देह या प्रश्न था उसका उत्तर ५०० वर्ष पुरानी संस्कृत मिश्रित ओड़िया् में उत्कीर्ण हो कर आने लगा। एक बार में ट्वी स्क्रीन की तरह ६ पंक्ति आती थी। पढ़ने के बाद वह समतल हो कर पुनः ६ पंक्ति उत्कीर्ण होती थी। बार बार अक्षर उत्कीर्ण होने से प्लेट गर्म हो जाती थी और उसे पानी में डुबा कर ठण्ढा करना पड़ता था। ३० मिनट का टेप रेकार्डर का कैसेट समाप्त होने पर ५ मिनट और आया। आश्चर्य की बात थी कि प्राचीन गणित सब्दों के साथ आधुनिक गणित के अंग्रेजी /ग्रीक शब्द भी आ रहे थे। मुझ लगा कि मेरे विचार को अच्युतानन्द का समर्थन प्राप्त है और मैं०ने लिखना आरम्भ किया। पूर्णता के लिये प्रतीक्षा करता तो जीवन भर नहीं लिख पाता। बाद में अनुभव हुआ कि मेरे ही विचार उत्कीर्ण हो रहे थे। पर आधुनिक विज्ञान के लिए भी आश्चर्य है कि मन का विचार ताम्र पत्र पर कैसे आया तथा बिना सांचा के कैसे उत्कीर्ण हुआ।

हिंदी साहित्य का बड़ा फ्रॉड राहुल सांकृत्यायन

केदार पांडेय उर्फ राहुल सांकृत्यायन: महापंडित के मुखौटे वामपंथी मिथ्याचारी

हिंदी साहित्य में एक बहुत बड़ा फ्रॉड बड़े प्यार से पाला गया है - राहुल सांकृत्यायन को महापंडित और महान इतिहासकार बताना। सच ये है कि फिरेला आदमी था, साहित्यकार था, पर उनके ख्याली पुलाव को बहुत तरीके से इतिहास बना कर प्रस्तुत किया गया और उन्हें इतिहासकार बना दिया गया।

राहुल सांकृत्यायन के 3 काम थे - डिस्टॉर्ट, डिफेम, और डिवाइड।

1. डिस्टॉर्ट - इतिहास को तोड़ो-मरोड़ो

वोल्गा से गंगा: इसका सबसे बड़ा सबूत है। 6000 BC से 1942 तक का 8000 साल का इतिहास बिना एक भी पुरातात्विक सबूत के लिख दिया।

तथ्य क्या दिया? शून्य।
फुटनोट कितने? शून्य।
शिलालेख, सिक्का, कार्बन डेटिंग? कुछ भी नहीं।

बस क्या था? गप्प। निशा थी, दिवा थी, अमृताश्व ने घोड़ा पाला, पुरुहूत ने लड़ाई की। ये सब वेदों के नामों से उठा कर बनाई गई काल्पनिक कहानियां हैं, जिनके मुंह में लेनिन के भाषण डाल दिए गए।

इसे इतिहास नहीं, वामपंथी फिक्शन कहते हैं।

2. डिफेम - अपनी ही सभ्यता को गाली दो

राहुल का पूरा प्रोजेक्ट एक ही था - वैदिक सभ्यता को विदेशी साबित करो।

अंग्रेजों की बनाई हुई सड़ी हुई आर्यन इनवेजन थ्योरी को उठाया, उस पर लाल रंग पोता और कहा - देखो आर्य वोल्गा से आए, भारत के मूल निवासी तो दस्यु थे।

मतलब हिंदू सभ्यता ही बाहर की है, तो हिंदू का इस जमीन पर हक ही क्या?

आज साइंस इस थ्योरी को कचरे में फेंक चुकी है, पर राहुल के झूठ की दुकान आज भी यूनिवर्सिटियों में चल रही है।

और दूसरा - अकबर महान, महाराणा प्रताप सामंती। चित्तौड़ में 30,000 हिंदुओं का कत्ल करने वाला अकबर इनके लिए सेक्युलर है, क्योंकि उसने जजिया हटाया। ये है इनका इतिहास का पैमाना।

3. डिवाइड - समाज को बांटो

राहुल का इतिहास हमेशा दो हिस्सों में बंटा है - शोषक और शोषित, आर्य और अनार्य, ब्राह्मण और शूद्र।

हर कहानी में एक ही जहर - ब्राह्मण ने तुम्हें लूटा। क्षत्रिय ने तुम्हें मारा। मंदिर ने तुम्हें ठगा।

उद्देश्य इतिहास बताना नहीं, नफरत बोना था। ताकि हिंदू समाज कभी जुड़ ही न पाए। यही वामपंथी डिस्टोरियन का असली काम है - अतीत में आग लगाओ ताकि वर्तमान में वोट सेको।

झूठ की खेती से क्या मिला?

- तिब्बत से ग्रंथ लाए, पर अनुवाद में बुद्ध को जबरदस्ती कम्युनिस्ट बना दिया।
- रूस गए, स्टालिन के अकाल और हत्याओं पर आंख बंद कर ली और _स्तालिन_ नाम की चापलूसी भरी जीवनी लिख दी।
- खुद को घुमक्कड़ कहते रहे, पर घुमक्कड़ी से बड़ा कोई अहंकार नहीं पाला - 150 किताबें लिख कर खुद को ही अंतिम सत्य घोषित कर दिया।

अंतिम बात

राहुल सांकृत्यायन कोई इतिहासकार नहीं थे। वो एक विचारधारा का प्रचारक थे जिसने गप्प को इतिहास की पैकेजिंग में बेचा।

उन्होंने तथ्य नहीं दिए, कल्पना दी।
उन्होंने सबूत नहीं दिए, कहानियां दी।
उन्होंने इतिहास नहीं लिखा, एजेंडा लिखा।

यह बहुत कठिन होता है मेरे लिए किसी के लिए इस तरह से लिखना, लेकिन मैं क्या ही करूं, इतना झूठ, इतना झूठ वामपंथियों ने फैलाया है कि मेरी मजबूरी बन गई उनके मुखौटे उतारना।

राहुल सांकृत्यायन समेत ये वामपंथी स्टॉक होम सिंड्रोम के उदाहरण बनने के अतिरिक्त अपने धर्म संस्कृति के लिए कुछ नहीं बन पाए, जिस मातृ संस्कृति का दूध पीकर पोषित हुए उस ऋण की एक पाई भी नहीं वापस कर पाए, केवल अपने इन्द्रिय आनंद में कीड़े के तरह भोग करते रहे।

भारतीय नदियाँ


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मैं जैसे ही किसी नदी का दर्शन करता हूँ मेरी हृत्तन्त्री के तार झङ्कृत होने लगते हैं। जब पड़ोसी तहसील सरदारपुर के श्री राजेन्द्रसूरि महाविद्यालय में अध्यापन करता था तब निकट ही प्रवहमान माही नदी के दर्शन का अनेको बार लाभ हुआ। निकट ही मालव पठार के मिन्डा ग्राम से निकल तुरन्त उत्तरवाहिनी हो जाने वाली मिहिरकन्या माही का स्वरूप जैसे गौमुख से निकल हमें गंगोत्री में प्राप्त होता है वैसे ही दर्शन सरदारपुर सेतु पार करते हुए होते हैं। सेतु समापन पर पूर्व तट पर नवग्रह मंदिर में सूर्यदेव की प्रतिमा के साथ विराजित माही माता के दर्शन लाभ भी हुए हैं।

वेगड़ जी उचित ही कहते हैं - 'संस्कृतियों का जन्म नदियों की कोख से हुआ है।' दीर्घावधि इतिहास हमें स्मरण हो, न हो, लिखा गया हमें मिला हो, न मिला हो, लेकिन लोकमन ने जो अपनी स्मृतियों में संजो लिया वह परम्परा में अक्षुण्ण हो जाता है! इतिहासकार अपनी विचारधारा अनुसार दोगलापंथी कर सकते हैं लेकिन लोकमन पवित्र होता है। हमारे पुराणों में पंजीबद्ध कथाएँ भले ही अन्यान्य ग्रंथों में गड्डमड्ड करती भी हो लेकिन है तो वे हमारी पुरासम्पदा ही। बाह्य सभ्यताएँ हमें उन्हें विस्मृत करने के लिए अपने कुकर्म करती रहेगी पर हम इन निधियों से अपनी संस्कृति सहेजते है और उसी से सभ्यता संरक्षित होती है। माया और एज़्टेक सभ्यता आज कहाँ है?

जब पुराणों की बात करता हूँ तो माही माता की स्कन्द पुराण में वर्णित प्रार्थना सहज मन में स्फुट होने लगती है - महीदोहे महानन्दसन्दोहे विश्वमोहिनि। 
      जाता हि सरितां राज्ञि पापम् हर महिद्रवे ॥

('हे देवी ! तू इस पृथ्वीकी दुग्ध है, परमानन्दकी राशि है, सम्पूर्ण विश्वको मोहनेवाली है तथा आप समस्त सरिताओं की महारानी के रूप में प्रकट हुई हैं, इसलिए हे महीद्रवे, मेरे समस्त पाप हर लीजिए!) कितनी अभिभूत करने वाली वन्दना है! माही उत्तरवाहिनी होकर अपना दीर्घपथ चुनती है। यदि मिन्डा ग्राम से दक्षिणपथ चुन लेती तो मात्र ८० किमी की दूरी पार कर नर्मदा जी की सहायक नदी बन जाती, वैसे ही जैसे मालवा पठार की क्रोढ़ से बाघनी नदी निकल कर मेरे ग्राम से होते हुए नर्मदा माई में संगम ले लेती है। विश्व प्रसिद्ध बाघ की बौद्ध गुफाएँ बाघनी के तट पर ही है। माही को अपना स्वतंत्र पथ चुनना था। मालवा के महाराजा भोज शासित अञ्चल को सींचते हुए उत्तर से फिर पश्चिमवाहिनी कहलाना था, कर्क रेखा को पार करते हुए पुनः अपने देशांतर आरेख में लौटना था, वागड़ (व्याघ्रवाट) अञ्चल को सिंचित करना था, बेणेश्वर तीर्थ निर्माण करना था, सोम, जाखम, भादर, अनास, चाप और मोरन जैसी अनेक सखियों को अपना आलिङ्गन देना था। म. प्र., राजस्थान और गुर्जरभूमि तो हमारी खींची हुई रेखाएँ हैं लेकिन वसुधा ने जिस माही को अपने अंक से प्रकट किया वह तो किसी बड़े लक्ष्य के लिए ही होगा न? 

पौराणिक कथाओं में सूर्य की पत्नी संज्ञा से ताप्ती का जन्म और छाया से यमुना का जन्म माना जाता है। लेकिन सूर्य की तीसरी पुत्री माही है अपने उद्गम से वह सूर्य पुत्री के रूप में पूजित और प्रवाह पथ में स्थान स्थान पर बने मंदिरों में इसी परिचय के साथ विराजमान हैं।

माही मैया का जन्म माघ शुक्ल द्वितीया के दिन मनाया जाता है यानी नर्मदा जी के जन्म से ठीक पांच दिन पूर्व। एक सूर्यपुत्री तो दूसरी शिवपुत्री! माही नदी के जन्म माह को गुजराती भाषी लोग महा मास कहते हैं, महा मास की द्वितीया को माही का जन्म। क्या नामकरण में कोई संकेत छुपे हैं? मन करता है कि लोकमन को पूछूँ कि ५८० किमी लम्बाई में बहने वाली नदी को और उसके जन्मोत्सव को माही-बीज के रूप में उजवने वाले लोग किस शास्त्र को पढ़कर ऐसा अलिखित कैलेंडर सदियों से चला लेते हैं कि प्रतिवर्ष जन्मोत्सव धूमधाम से मना डालते हैं। मंदिरों में पूजन होता है, खगोलीय प्रभाव को साधने के लिए एक नदी को नवग्रह मंदिर में सूर्य की गोद में स्थित अंकन किया जाता है। शनिचरी अमावस्या के दिन माही का नहान करने के लिए मेरे ग्राम से कितने ही लोग सरदारपुर जाकर दर्शन, पूजन और ग्रहशांति के कर्म करते हैं। प्रतिवर्ष पंचकोशी परिक्रमा आयोजित होती है। हजारों नर नारी अपनी पोटलियाँ सिर पर रख परिक्रमा के लिए चल पड़ते हैं। स्कन्द पुराण में वर्णित माही के अठारह नामों का जप करते हैं - 
              ताम्रा रस्या पयोवाहा पितृप्रीतिप्रदा शुभा। 
              शस्यमाला महासिन्धुर्दातुर्दात्री पृथुस्तुता॥ 
              इन्द्रद्युम्नस्य कन्या च क्षितिजन्मा इरावती। 
              महीपर्णा महीशृङ्गा गङ्गा पश्चिमवाहिनी॥ 
              नदी राजनदी चेति नामाष्टादशमालिकाम्।
(ताम्रा, रस्या, पयोवाहा, पितृप्रीतिप्रदा, शुभा, शस्यमाला, महासिन्धु, दातृदात्री, पृथुस्तुता, इन्द्रद्युम्नकन्या, क्षितिजन्मा, इरावती, महीपर्णा, महीश्रृंगा, गंगा, पश्चिमवाहिनी, नदी तथा राजनदी-इन अठारह नामोंकी माला करें।) 

इतनी पुण्यदायिनी सरिता अपने प्रवणांक पथ की तीव्रता के कारण ऊँचे तटबंध निर्माण करते हुए बड़े बड़े खादर निर्मित करती है गुजराती में कहें तो भेखड़ रचती है। ये भेखड़ चोरों, लुटेरों के शरणस्थल बन जाते हैं। पुण्या नदी चोरों की जननी कही जाने लगती है। वागड़ी भाषा का यह दोहा देखिए - 

खड़, खाकड़ँ, खेजड़ गणा, कासड़ियाळो वेस! 
नपट नारि पियु लजामणी, इत बँट्यो वागड़ो देस! 
इतिहास के मध्यकाल में ऐसे कथन यथार्थ के अधिक निकट होंगे पर पूर्वकाल में इस बात को बड़े यत्न से कहा गया- वागड़े पञ्चरत्नानि, पत्राणि च शिलोदकम्! 
           चतुर्थ मधुप पुष्पम् च पञ्चमम् वस्त्रलुञ्चनम्!
यहाँ ऐसे लोग हुए हैं जो वस्त्र लुञ्चन कर पूर्ण नग्न कर भेजते होंगे तब ऐसे कथन ख्यात हुए होंगे। जो भी हो अपने भेखड़ों की शरण के कारण यह निम्न वर्ग कहे जाने वाले अकिञ्चन लोगों की भगिनी है, माई है। यह नदी अपने पूरे पथ में भील, बंजारा और पारदी जनजातियों को अपने भ्राता के रूप में गिनती है। साथ ही यह भी दृष्टव्य है कि अन्त्यज कहे जाने वाले ये समुदाय अपनी भगिनी, अपनी माई की शपथ जल-हस्त ले उठाते हैं तो शीश कट जाए लेकिन उस शपथ की आन रखते हैं - 
विवादे च समुत्पन्ने अपराधी च यो मतः।
जलहस्तः सदा वाच्यो महीसागरसंगमे ॥

माही नदी का विवाह समुद्र से हुआ तो समुद्र बारात लेकर ४५ मील भीतर तक चला आया, इतने भीतर आकर संगम लेने वाली यह एकमात्र नदी भी है। जो आणंद तहसील (गुजरात) के वहेराखाड़ी में स्थित है। लोकमान्यता है कि जब समुद्र माही के विवाह की भाँवर में चौथा फेरा चल रहा था तब रबारी जनजाति के लोगों ने कन्यादान किया था। इसलिए माही को बहन जैसा मानते हुए अपनी बहिनी के जन्मदिन पर प्रतिवर्ष वहेराखाड़ी और अन्य स्थानों पर अपनी गायों के दूध को न बेचते हुए उस दिन दुग्धाभिषेक करते हैं! अब एक पंथ विशेष के लोग पहले ही शिवजी पर दूध चढ़ाने को लेकर कुढ़ते रहे हैं, यह सुनेंगे तो दोगुना सिर धुनेंगे! पर धुनें तो धुनें! उनके भाग में ही सिर धुनना लिक्खा हो तो मैं क्या कर सकता हूँ? स्कन्द पुराण के अवन्ती खण्ड की पूज्या, आराधिता नदी लोक में आकर कैसे कैसे विरूद और कैसे कैसे कथानक, किम्वदन्तियों की गाथा बन जाती है इसका सबसे सशक्त उदाहरण माही है। गुजराती में माही माँ नो गरबो गाते हुए कवि कह देता है - 
नाख्यु घोड़ा पर जीन तारी ख्याता रे। 
सूध सान ने वीसरी मही माता रे। 
उछाळ्यु नीर अपार तारी ख्याता रे। 
गाम घणां ने घेरिया मही माता रे! 
तुं निकळी हद थी बहार तारी ख्याता रे! 
माही के रौद्र रूप का वर्णन बहुत अल्प शब्दों में हम समझ सकते हैं! 

माही को टॉलेमी नामक यात्रा वृत्तांतकार ने मेफिस के नाम से उद्धृत किया है और अल्बरुनी माही को महिन्द्री लिखता है! व्हेन सांग ने इसे मो-हे-ई नाम से अपने ग्रंथ में स्थान दिया है! इटैलियन यात्री लुडोविको डी वर्थेमा ने भी इसका उल्लेख किया है। इसका तात्पर्य है कि हजार वर्ष के इतिहास में इस नदी की कोख में सभ्यता के, संस्कृति के उत्थान गीत रचे जाते रहे हैं, तभी तो बाहरी यात्री इस नदी का सामिप्य पाने के लिए दौड़े चले आए होंगे!

ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित रचनाकार श्री पन्नालाल पटेल मूल गुजराती नहीं लेकिन वागड़ के निवासी थे। उनके ऐतिहासिक कथानक पर लिखे उपन्यास 'रक्त गुलाल' में श्री पटेल ने पूरे महीकाँठा को जो लिखा है उससे मुझे रेणु जी का मैला आँचल उपन्यास स्मरण हो आता है! गलालसिंह और पियोली के चरित्र चित्रण के साथ वागड़ की गलालेंग परम्परा जो आज भी निरन्तर है उसका विवरण भूल जाऊँ तो माही के साथ लेखन में मेरे द्वारा अन्याय होगा! ऐसा कैसे कर सकता हूँ? गलालेंग में गायी जाने वाली पंक्तियाँ पटेल जी रक्त गुलाल में लिखते हैं - 
खळभळ खळभळ मही नो काँठो, 
काँठे फरके माँ नी धजाओ! 
आवन जावन मनखा मेळो, 
ऊँट, घोड़ा कोई पालखी वाळो! 
(काँठो = किनारा या तट) 

पटेल जी ने गलालसिंह का वर्णन किया है लेकिन माही काँठे स्थित भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के दो क्रांतितीर्थ कहीं विस्मरण न हो जाए इसलिए लिखता हूँ। इस नदी की कोख में भारतीय स्वतंत्रता के दो क्रांतितीर्थ हैं। जो भोले भाले जनजातीय लोगों ने लड़े हैं। पहला तीर्थ है खानपुर (जहाँ १८५७ के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के समय का एक वटवृक्ष है जिस पर ३५० क्रांतिकारियों को फाँसी देने का भीषण कृत्य अंग्रेजों ने किया था, दूसरा है कडाणा बाँध की तराई में आया मानगढ़ (पहाड़ी) नामक तीर्थ, जहाँ १५०७ जनजातीय वीरों को गोलियों का भोग बनना पड़ा। इन दोनों क्रांतितीर्थों पर माही की कोख में ९ अगस्त को मेला लगता है। माही ने स्वतंत्रता के लिए मानों अपने जनजाति पुत्रों को प्रेरित कर अपनी ओर से स्वतंत्रता यज्ञ में आहुति अर्पित की हो। 

म. प्र., राजस्थान और फिर गुजरात का जलाभिषेक लेकर महिसागर नामक एक नया भौगोलिक लगून (पश्चजल) रचती है जो विश्व में दुर्लभ है। ठीक पास में जहाँ माही धुवारण की खाड़ी में समुद्र संगम करती है यह खम्भात की खाड़ी का उत्तर भाग है इसी खम्भात की खाड़ी में नर्मदा माई विश्व की १२ या १३ कुल नदियों की श्रेणी में Estuaries (ज्वारनदमुख) निर्माण करती है वहीं माही नदी धुवारण से लेकर वहेराखाड़ी तक महिसागर रुपी लगुन निर्माण करती है। कितना अद्भुत है न पास पास प्रकृति का यह अनुपम रचाव? हमारी संस्कृति नदियों को सामान्य कारणों से माँ उपमा नहीं देती! वे माँ हैं इसीलिए माँ कही जाती है। एक माँ अपने बेटे को आँचल की ओट में दूध पिलाती है, लेकिन नदियाँ खुले वक्ष अपनी संतति को सदैव अमृतपान कराती है। इसीलिए भारतीय चित्रकला नदियों का अंकन खुले स्तन के साथ करती है। आलेख समापन करते हुए बताता चलूँ कि धुवारण में समुद्र संगम करते हुए माही अपने जन्मस्थान की तरह पुनः उत्तरवाहिनी हो जाती है! समुद्र पर कावी स्थित स्तम्भेश्वर महादेव अग्निरूपी योनी को धारण करने वाली माही के सागर संगम के साक्षी बनते हैं! 

'अग्निश्च ते योनिरिडा च देहो रेतोऽथ विष्णोरमृतस्य नाभिः।' 
('हे महीनदी ! अग्नि तुम्हारी योनि (उत्पत्तिस्थान) और पृथ्वी तुम्हारी देह है। तुम यज्ञस्वरूप विष्णुके वीर्यसे उत्पन्न हुई हो और अमृतका केन्द्रस्थान हो।') 

हमारे मालव माटी के गहन गंभीर अध्येता डॉ वाकणकर जी ने अपनी शोधों के माध्यम से अपूर्व कार्य किए, उन्होंने ही अम्बीतमे सरस्वती के पथ का पंजाब, हरियाणा, राजस्थान और गुजरात होते हुए समुद्र के संगम की जानकारी भारतीय वाङ्मय के आधार पर सिद्ध करते हुए लोकमानस में यह रोपा। अन्धकार युग में लोकचेतना से विलुप्त तथ्यों को हमारा एक वर्ग सरस्वती को कपोल कल्पना मान रहा था। इस कथन के साथ मैं माही नदी के भू-गर्भ विषयक तथ्य को रखने जा रहा हूँ। श्री वाकणकर जी ख्यात किया कि सरस्वती नदी गुजरात में बहती रही है। हाल के अनुसंधानों से गुजराती में कुछ अनुसंधान हुए हैं कि सरस्वती नदी पूर्व में कच्छ के बड़े रण में होते हुए समुद्र में मिलती रही इससे पूर्वपथ वह सोमनाथ ज्योतिर्लिंग के निकट हीरण और कपिला के साथ समुद्र संगम कर त्रिवेणी संगम रचती रही। लेकिन जो भू-गर्भ तथ्य आ रहे हैं उसके अनुसार इससे भी पूर्वकाल में वह ताप्ती के सूरत स्थित संगम के ठीक सामने समुद्र में मिलती थी। ताप्ती और सरस्वती का यह एश्चुअरी क्षेत्र ऊँचा था, जबकि नर्मदा और माही का पाट नीचे था। फलस्वरूप जैसे जैसे गुजरात का आनर्त अंचल बाहर आता रहा, सरस्वती ने अपना पथ परिवर्तन किया। ताप्ती का प्रवणांक पथ तीव्र था इसलिए समुद्र की काप को काट कर सूरत का सुवाळी-बीच (बर्थ प्लेस ऑफ इंडियन नेवी) निर्मित किया। माही ने भी अपनी गहरी नदी घाटी की काप को काटकर गहरी घाटी निर्मित की। अपने लोथल की हड़प्पा संस्कृति से संबंधित लेख में भोगावो नदी के तथ्य के साथ समुद्र के पीछे हटना मैं लिख चुका हूँ। बाद में ज्ञात हुआ कि भोगावो की उस गहरी गाद में दिल्ली विश्वविद्यालय की एक शोध छात्रा लोथल के भू-गर्भ के प्रमाण एकत्रण हेतु उतरी थी और काप का भूखण्ड गिरा जिसमें वह दिवंगत हुई। 

हमारे प्राचीन ऋषियों ने जो हजारों नहीं बल्कि लाखों वर्षों के पृथ्वी के परिवर्तनों को नोटिस किया और कथाओं के माध्यम से उन्हें ज्योतित किया हम ऋणी हैं उनके। वरन सौ वर्ष पूर्व तक वायुयान भी भारतीय कथाओं का काल्पनिक विषय ही कहा जाता रहा। हमारे ऋषियों ने आज भी अल्पज्ञात इस माही नदी की महिमा में यह स्तुतिगान किया है वह हृदयाम्बुज में उतार अवगाहन करने के लिए ही तो है - 
मुखम् च यः सर्वनदीषु पुण्यः पाथोधिरम्बुप्रचुरा मही च। 
समस्ततीर्थाकृतिरेतयोश्च ददामि चार्ध्यम् प्रणमामि नौमि॥
सहस्रविंशतिश्चैव षट्‌शतानि तथैव च॥
तासां सारसमुद्भुतं महीतोयं प्रकीर्तितम्॥ 
पृथिव्यां सर्वतीर्थेषु स्नात्वा यत्फलमाप्यते॥
तन्महीसागरे प्रोक्तं कुमारस्य वचो यथा॥ 
एकत्र सर्वतीर्थानां यदि संयोगमिच्छथ॥
तद्गच्छथ महापुण्यं महीसागरसंगमम्॥
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भारतीय एतिहासिकता और विश्व

भारत में दुर्बल तथा पराधीन मानसिकता है। उसी लेख या पुस्तक को शोध मानते हैं जिसका समर्थन विदेश के विशेषकर ब्रिटेन तथा अमेरिका के लेखक करें। भारतीय पुस्तकों को बिना पढ़े झूठा मान लेते हैं, या उसका उल्टा निष्कर्ष निकालते हैं। (१) इन्द्र पूर्व दिशा के लोकपाल थे, उनके शब्द तथा स्थान नाम आज तक असम से वियतनाम तक प्रचलित हैं। पर उनको पश्चिम से आये आर्यों का नेता कहते हैं। (२) भागवत प्रवचन में कहते हैं कि द्रविड से ज्ञान का आरम्भ हुआ, कर्नाटक में वृद्धि हुई तथा महाराष्ट्र तक प्रसार हुआ। इसी कारण भारत को राष्ट्र तथा उसके खण्ड को महाराष्ट्र कहते हैं। पर अशिक्षित लेखक कहते हैं कि उत्तर के आर्यों ने दक्षिण भारत पर वेद थोप दिया। (३) भारत के खनिज क्षेत्रों में भी बाहर से आये मजदूरों के वंशज देखने से ही अफ्रीकी मूल के लगते हैं। इसमें किसी शोध की आवश्यकता नहीं है। आज तक उनकी उपाधि वही है जो ग्रीक भाषा में खनिजों के नाम हैं।(४) चण्डी पाठ में आक्रमण करने वाले महिषासुर को स्पष्ट कहा है कि जीवित रहना चाहते हो तो पाताल (अमेरिका) लौट जाओ। अमेरिकन इतिहास में भी पढ़ाया जाता है कि यूरोपीय लोगों के पूर्व यहा महिष (Bison) मुख्य पशु था। हिरण्यकशिपु का वंशज बलि भी देव क्षेत्र पर कब्जा छोड़ने के बाद अमेरिका लौट गया था। उसकी राजधानी भोगवती तट पर भोगवती नगरी थी जो आज भी है (बोगोटा तट पर कोलम्बिया की राजधानी बोगोटा)। पर नवरात्र का पाखण्ड करने वाले भी महिषासुर को मूल भारतीय कहते हैं। (५) आज तक विश्व में केवल एक जाति का समाज नहीं हुआ है। केवल ब्राह्मण, केवल मोची, या केवल क्षत्रिय का समाज एक दिन भी नहीं टिक सकता है। पर मतान्धों का प्रचार है कि ब्राह्मण बाहर से आकर भारतीयों को दास बना दिया। बिना किसान के तो भोजन भी नहीं मिलेगा, जीवित रहना ही असम्भव है।
(६) जिस किसी अन्न की चर्चा हो, उसके विषय में प्रचार है कि यह भारत में नहीं होता था। सरकार तथा संघ के प्रचार के अनुसार ५००० वर्ष तक भारतीय बिना अन्न के जीवित रहे। दलित तो पानी भी नहीं पी सके। ये प्रचार करने वाले केवल ३ दिन बिना पानी पिये रह कर दिखायें। (७) संस्कृत विश्वविद्यालय के प्राध्यापक तथा कुलपति भी अशिक्षा तथा भारत के अज्ञान में किसी से कम नहीं हैं। ज्योतिष के प्रायः सभी प्राध्यापक तथा पञ्चाङ्ग निर्माता युधिष्ठिर शक, विक्रमादित्य संवत् तथा शालिवाहन शक का प्रयोग करते हैं। पर अगले ही वाक्य में कहते हैं कि शक-संवत् विदेशी शकों का था। शक तथा संवत् भिन्न-भिन्न हैं, तथा किसी शक राजा ने आजतक कोई शक या संवत् आरम्भ नहीं किया। विक्रमादित्य संवत् की गणना करने के बाद उसके आधार वराहमिहिर, कालिदास तथा ब्रह्मगुप्त को विक्रमादित्य के ६०० वर्ष बाद का कहते हैं। इन लोगों के अनुसार बिना किसी गणित या शासक के विक्रमादित्य संवत् आरम्भ हो गया। (८) प्रयाग के राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान के कुलपति गयाचरण त्रिपाठी हर भाषण में कहते थे कि वेद में जगन्नाथ का ही वर्णन है तथा वे ज्ञान के स्रोत हैं। पर 'अन्तरराष्ट्रीय ख्याति' के लिए हरमन कुल्के के साथ मिलकर 'जगन्नाथ कल्ट' नाम की पुस्तक लिखी जिसके अनुसार जगन्नाथ हिन्दू देवता नहीं है, अशिक्षित आदिवासियों के टोटेम हैं, इस कारण उनकी मूर्ति बिना हाथ पैर के अनुसार। इन लेखकों के अनुसार प्रयाग तथा हार्वर्ड में पढ़ने के बाद ही पता चलता है कि मनुष्य के हाथ पैर भी होते हैं। २००४ में डाॅक्टर कर्ण सिंह की अध्यक्षता में त्रिपाठी जी जगन्नाथ को वेद स्वरूप कह रहे थे तो मैंने कहा कि आप बिल्कुल उल्टा अपनी पुस्तक में लिखते है। उन्होंने कही कि पुस्तक में भूल है, उसका सुधार करेंगे। अगले तीन सम्मेलनों में उनको याद दिलाया, पर वे जीवन भर सत्य लिखने का साहस नहीं कर सके।

इस्लाम जातिवाद और छुआछूत

प्रायः वामपंथी इतिहासकार इस्लाम को भारतीय जाति व्यवस्था को डाइल्यूट करने का एक कारण बताते हैं, इस्लामी विद्वान देवदत्त पटनायक कहते हैं कि इस्लाम आने के बाद हिंदू जातियों में सुधार हुआ।

अव्वल इस्लाम में एक नुक्ता इधर से उधर करने की इजाजत और आजादी दोनों नहीं है। सुधार तो दूर की कौड़ी है लेकिन कुछ जाले मै साफ कर देना चाहता हूँ जो यह नैरेटिव बनाते हैं कि इस्लाम के जाति व्यवस्था हिंदुओं से आयी।

हिंदू संपर्क से पहले ही अरब और शुरुआती इस्लामी दुनिया में जातिवाद और छुआछूत का पूरा ढांचा तय हो चुका था। इस्लाम से पहले का अरब कोई बराबर समाज नहीं था, वो नसब यानी खून से बंटा हुआ था। सबसे ऊपर कुरैश कबीला था जो मक्का का मालिक था और कुरैश के अंदर भी बानू हाशिम को सबसे ऊंचा माना जाता था। उसके नीचे बानू तमीम, बानू असद जैसे दूसरे अरबी कबीले थे और सबसे नीचे मवाली और अबीद यानी गैर-अरबी और गुलाम, जिन्हें अरबी कभी अपने बराबर नहीं मानते थे। ये बंटवारा हिंदू समाज से सीखा हुआ नहीं था, ये रेगिस्तान का अपना कबीलाई सिस्टम था।

इस्लाम के आने के तुरंत बाद जब ईरान, सीरिया, मिस्र जीते गए और वहां के लोग मुसलमान बने तो अरबी मुसलमानों ने उन्हें मवाली कहा, यानी आजाद किया हुआ गुलाम जैसा। मवाली को मस्जिद में आगे की सफ में खड़े नहीं होने दिया जाता था, वो किसी अरबी औरत से निकाह नहीं कर सकता था और इसी के लिए क़ुफ़ यानी बराबरी का सिद्धांत बनाया गया कि अरबी औरत का क़ुफ़ सिर्फ अरबी मर्द ही हो सकता है। उमय्यद दौर में मवाली से मुसलमान होने के बाद भी जजिया जैसा टैक्स लिया जाता था और कहा जाता था कि तुम असली मुसलमान नहीं हो। गवर्नर हज्जाज बिन यूसुफ ने तो बसरा में हुक्म दिया था कि मवाली अरबी की तरह पगड़ी भी न पहनें। ये सब 8वीं सदी की बात है, भारत में इस्लाम के आने से लगभग 300 साल पहले की।

इसी तरह अफ्रीका से लाए गए काले मुसलमानों को जंज कहा जाता था और उनके साथ अछूत जैसा बर्ताव होता था। हजरत बिलाल को आजाद तो कर दिया गया पर उन्हें पूरी जिंदगी गुलाम पृष्ठभूमि से ही जोड़ा गया। 9वीं सदी में इराक में जंज गुलामों ने 14 साल तक विद्रोह किया क्योंकि उन्हें अलग बस्तियों में जानवरों की तरह रखा जाता था। उस दौर की कई अरबी किताबों में उनके लिए बहुत अपमानजनक बातें लिखी मिलती हैं।

इसके साथ ही सैय्यदवाद यानी जन्म से ऊंचा होने का सिद्धांत भी 8वीं सदी में ही बन गया था। पैगंबर के परिवार अहल-ए-बैत को पाक खून वाला माना गया, सैय्यद के लिए जकात लेना हराम बताया गया क्योंकि उसका दर्जा ऊंचा है, सैय्यद लड़की का निकाह गैर-सैय्यद से अमान्य माना गया और सैय्यद को गुलाम नहीं बनाया जा सकता था। ये सब जन्म से ऊंच-नीच का सिद्धांत था और ये अरब में ही बना था, भारत का इसमें कोई लेना-देना नहीं था।

तो निचोड़ ये है कि भारत में आने से पहले ही अरब समाज में तीन चीजें पूरी तरह मौजूद थीं - खून से जाति तय होना कि कुरैश ऊंचा और बाकी नीचे, पेशे और नस्ल से छुआछूत कि मवाली और जंज को अलग रखना और शादी में जाति देखना यानी क़ुफ़ का कानून। भारत में आकर इस्लाम ने जाति नहीं सीखी, उसने अपनी पुरानी अरबी जाति व्यवस्था को यहां सिर्फ नए नाम दे दिए - अशराफ, अजलाफ और अरजाल।