Saturday, 17 October 2026

पुष्कर

पुष्कर
१. अर्थ-
(१) पुष्कर-पुष्कर का शाब्दिक अर्थ है, पुष्ट करने वाला। इसके कई अर्थ हैं, किन्तु सामान्यतः यह कमल के लिये प्रयुक्त होता है। पृथ्वी भी पुष्कर है, जो जीवों को पुष्ट करती है।
इसका एक पर्याय पद्म है। पृथ्वी पद्म है, जिस पर पद रखते हैं।
अन्य प्रचलित शब्द कमल है, जो क = जल का मल या उससे उत्पन्न है। लक्ष्मी को कमला कहते हैं। सम्पत्ति रूप में यह क = कर का मल है, हाथों के परिश्रम से उत्पन्न। अतः सम्पत्ति को हाथ का मैल कहते हैं। लक्ष्मी को पद्मा, पद्मालया, भी कहते हैं-
लक्ष्मी पद्मालया पद्मा कमला श्रीर्हरिर्प्रिया। (अमर कोश, १/१/२७) 
कमल का पत्ता जल से उत्पन्न होता है, कितु उससे जल चिपकता नहीं है। इसी प्रकार जीवन्मुक्त व्यक्ति संसार में रहते हुए भी उसमें लिप्त नहीं होता।
ब्रह्मण्याधाय कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा करोति यः। लिप्यते न स पापेन पद्मपत्रमिवाम्भसा॥ (गीता, ५/१०)
कमल जल जैसे स्रोत से सृष्टि का प्रतीक है। अतः इसकी उत्पत्ति ब्रह्मा के कर्ता या यज्ञ रूप विष्णु के नाभि से कही जाती है, जिस पर स्रष्टा रूप ब्रह्मा आसीन हैं। ब्रह्मा का ज्ञान रूप सरस्वती भी पद्म पर स्थित हैं।
पद्म दल का अर्थ है, सृष्टि की विविध दिशायें या प्रकार। सृष्टि केन्द्र रूप में इसे उल्ब (गर्भ-नाल), मेरु भी कहते हैं। 
(२) ब्रह्मा रूप- गायत्री मन्त्र के ३ पादों के अनुसार ब्रह्मा, विष्णु, शिव के स्वरूप-
ब्रह्मा-मूल स्रोत पदार्थ, ३ धामों के ७ लोक, ज्ञान रूप त्रयी वेद, प्रतीक-पलास, दण्ड से ३ पत्ते निकलने पर मूल भी बचा रहता है। इसी तरह त्रयी विभाजन के बाद अविभाज्य अथर्व वेद रहता है।
विष्णु-सृष्टि इच्छा, सृष्टि निर्माण-विनाश क्रिया, व्यक्ति रूप से स्वतन्त्र चेतना जिसका प्रतीक अश्वत्थ है (गीता, १०/२६)
शिव-मूल चेतना, तेज स्तरों का अनुभव, मन के भीतर ज्ञान दाता। प्रतीक वट वृक्ष है जिसकी हवाई जड़ से वैसा ही वृक्ष बनता है। गुरु ज्ञान दे कर अपने जैसा शिष्य बनाता है।
पृथ्वी पर मनुष्य रूप में ब्रह्मा द्वारा सभ्यता और ज्ञान का विकास, प्रजापति। सृष्टि की असुरों से रक्षा के लिए विष्णु के १० या ३२ अवतार। शिव के अवतार २८ व्यास।
२. आधिदैविक पद्मनाभ-
आधिदैविक तथा आध्यात्मिक अर्थ भौतिक शब्दों के ही अर्थ का विस्तार है, जिसे वृद्धि कहा गया है। भागवत माहात्म्य में कहा है कि ज्ञान और वैराग्य की उत्पत्ति द्रविड में हुई, वृद्धि कर्णाटक में। ज्ञान का मूल वेद है, वह श्रुति आदि ज्ञानेन्द्रियों द्वारा निसर्ग से प्राप्त ज्ञान है, अतः इसे श्रुति तथा निगम कहते है। श्रुति का ग्रहण कर्ण से होता है, अतः जहां अर्थों का विभिन्न संस्थाओं में विस्तार हुआ, उसे कर्णाटक कहा गया।
उत्पन्ना द्रविडे साऽहं वृद्धिं कर्णाटके गता। क्वचित् क्वचित् महाराष्ट्रे गुर्जरे जीर्णतां गता॥४८॥
(पद्म पुराण उत्तर खण्ड श्रीमद् भागवत माहात्म्य, भक्ति-नारद समागम नाम प्रथमोऽध्यायः)
वृद्धि अर्थ में मनुष्य द्वारा जो पृथ्वी पर दीखता है, उसी का आकाश में विस्तार करते हैं। यथा पिण्डे, तथा ब्रह्माण्डे-मनुष्य शरीर की ब्रह्माण्ड से तुलना विस्तार से चरक संहिता, शरीर स्थान, अध्याय ५ में है। मनुष्य का जन्म माता के गर्भ में होता है तो उसका शरीर माता के गर्भ से नाल द्वारा जुड़ा रहता है। आकाश में भी सृष्टि के हर स्तर पर स्रष्टा पुरुष की नाभि कमल से सृष्टि रूप ब्रह्मा की उत्पत्ति का वर्णन है।
(१) हिरण्यगर्भ मेरु या उल्ब-अव्यक्त ब्रह्म पूरुष (४ पाद का), हिरण्यगर्भ रूप सृष्टि का आरम्भ उल्ब है, उससे उत्पन्न विश्वों का क्रम ब्रह्मा रूप है। विश्व क्रम हैं-संयती (पूर्ण विश्व), क्रन्दसी (ब्रह्माण्ड, आकाशगङ्गा), रोदसी (सौर मण्डल), पृथ्वी। सूर्य से प्रकाश का विकिरण उसका रुदन है, उसका क्षेत्र रोदसी। ब्रह्माण्ड के खर्व संख्यक सूर्यों के मिलित रुदन को क्रन्दन कहते हैं, उसका क्षेत्र क्रन्दसी है।
हिरण्यगर्भः समवर्तताग्रे भूतस्य जातः पतिरेक आसीत्। स दाधार पृथिवीमुत द्यां कस्मै देवाय हविषा विधेम॥ 
यं क्रन्दसी अवतश्चस्कभाने भियसाने रोदसी अह्वयेथाम्। यस्यासौ पन्था रजसो विमानः कस्मै देवाय हविषा विधेम॥३॥ 
यस्य द्यौरुर्वी पृथिवी च मही यस्याद उर्वऽन्तरिक्षम्। यस्यासौ सूरो विततो महित्वा कस्मै देवाय हविषा विधेम॥
यस्य विश्वे हिमवन्तो महित्वा समुद्रे यस्य रसामिदाहुः। इमाश्च प्रदिशो यस्य बाहू कस्मै देवाय हविषा विधेम॥ 
(ऋक्, १०/१२१/१,४-६, अथर्व, ४/२/३-५, ७)
हिरण्यगर्भ से ब्रह्माण्ड जन्म पुराणों में भी है, जहां इसे मेरु तथा उल्ब भी कहा है।
एक काल समुत्पन्नं जल बुद्बुदवच्च तत्। विशेषेभ्योऽण्डमभवत् बृहत् तदुदके शयम्॥३६॥
तस्मिन् कार्यस्य करणं संसिद्धिः परमेष्ठिनः। प्राकृतेऽण्डे विवृत्तः स क्षेत्रज्ञो ब्रह्म-संज्ञितः॥३७॥
स वै शरीरी प्रथमः स वै पुरुष उच्यते। आदि कर्त्ता स भूतानां ब्रह्माग्रे समवर्तत॥३८॥
यमाहुः पुरुषं हंसं प्रधानात् परतः स्थितम्। हिरण्यगर्भं कपिलं छन्दो-मूर्तिं सनातनम्॥३९॥
मेरुरुल्बमभूत् तस्य जरायुश्चापि पर्वताः। गर्भोदकं समुद्राश्च तस्यास परमात्मनः॥४०॥ (कूर्म पुराण, १/४)
ब्रह्माण्ड पुराण (१/१/३/२५-२९) में प्रायः यही वर्णन है।
(२) स्वयम्भू मण्डल-यह खर्व ब्रह्माण्डों का समूह है। ब्रह्माण्डों के बीच परस्पर आकर्षण (संकर्षण) ही उल्ब या पद्म है, जिस पर ब्रह्माण्ड स्थित है।
(३) कूर्म मेरु-यह ब्रह्माण्ड का निर्माण क्षेत्र है, जो उससे १० गुणा बड़ा है। इसका आकार ब्रह्माण्ड से १० गुणा बड़ा, अर्थात् ५६ अहर्गण (शक्वरी छन्द = रात्रि क्षेत्र) है। जगती छन्द ब्रह्माण्ड की माप है, गायत्री लोकों की माप है (मनुष्य से आरम्भ कर पृथ्वी, सौर मण्डल की भूमि, ब्रह्माण्ड, पूर्ण जगत् क्रमशः २ घात २४ = कोटि गुणा बड़े हैं-विष्णु पुराण, २/७/३-४)। त्रिष्टुप् सौर मण्डल के क्षेत्रों तथा महर्लोक की माप है।
यद्गायत्रे अधि गायत्रमाहितं त्रैष्टुभाद्या त्रैष्टुभं निरतक्षत।
यद्वा जगज्जगत्याहितं पदं य इतद्विदुस्ते अमृतत्वमानशुः॥ (ऋक्, १/१६४/२३)
शङ्कु भवत्यह्नो धृत्यै यद्वा अधृतँ शङ्कुना तद्दाधार॥११॥
तद् (शङ्कु साम) उ सीदन्तीयमित्याहुः॥१२॥ (ताण्ड्य महाब्राह्मण, ११/१०/११-१२)
सप्तपदा वै तेषां (छन्दसां) परार्ध्या शक्वरी। (शतपथ ब्राह्मण, ३/९/२/१७)
यदिमाँल्लोकान् प्रजापतिः सृष्ट्वेदं सर्वमशक्नोद्यदिदं किञ्च तच्छक्वर्योऽभवंस्तच्छक्वरीणां शक्वरीत्वम्॥ (ऐतरेय ब्राह्मण ५/७)
मानेन तस्य कूर्मस्य कथयामि प्रयत्नतः। 
शङ्कोः शतसहस्राणि योजनानि वपुः स्थितम्॥ (नरपति जयचर्या, स्वरोदय, कूर्म चक्र)
(शङ्कु = शंख = १० घात १३, शत सहस्र शङ्कु = १० घात १८, ब्रह्माण्ड = १००० योजन की पृथ्वी x १ कोटि x १ कोटि)
(४) परमेष्ठी मेरु-ब्रह्माण्ड सबसे बड़ी रचना होने के कारण परमेष्ठी है। इसका केन्द्र कृष्ण (Black hole) है जिसके आकर्षण से ३०,००० प्रकाश-वर्ष (प्रकाश योजन) की दूरी पर सूर्य उसके केन्द्र की परिक्रमा कर रहा है। 
अस्य मूलदेशे त्रिंशद् योजन सहस्रान्तर आस्ते या वै कला भगवतस्तामसी समाख्यातानन्त इति सात्वतीया द्रष्टृ दृश्ययोःसङ्कर्षणमहमित्यभिमान लक्षणं यं सङ्कर्षणमित्याचक्ष्यते॥१॥ यस्येदं क्षितिमण्डलं भगवतोऽनन्तमूर्तेः सहस्रशिरस एकस्मिन्नेव शीर्षाणि ध्रियमाणं सिद्धार्थ इव लक्ष्यते॥२॥ (भागवत पुराण, ५/२५/१-२) 
आकृष्णेन रजसा वर्तमानो निवेशयन्नमृतं मर्त्यं च। हिरण्ययेन सविता रथेना देवो याति भुवनानि पश्यन्॥
(ऋक्, १/३५/२, वाजसनेयि यजु ३३/४३, तैत्तिरीय संहिता, ३/४/११/२)
आकृष्णेन = आकर्षण द्वारा, ब्लैक होल द्वारा जो सभी रंगों को आकर्षित करता है।
(५) सौर मण्डल-सूर्य विष्णु का प्रत्यक्ष रूप है, जिसने अपने आकर्षण से पृथ्वी को धारण किया है।
पृथिवी त्वया धृता लोकाः, देवि त्वं विष्णुना धृता (भूमि पूजन मन्त्र)-यह निम्न वेद मन्त्र का सारांश है-
अनवर्णे इमे भूमी इयं चासौ च रोदसी, किं स्विदत्रान्तराभूतं येनेमे विधृते उभे। विष्णुना विधृते भूमी इति वत्सस्य वेदना, इरावती धेनुमती हि भूतं सूयवसिनी मनुषे दशस्या, व्यष्टभ्नाद् रोदसी विश्णवेते वाधयं पृथ्वीमभिति मयूखैः। (तैत्तिरीय आरण्यक, १/८/४/६)
सूर्य ‘यह’ या निकट का सविता है, इसका असौ, यत् या एष से संकेत है। गायत्री मन्त्र का तत्-सविता, सूर्य के पिता का भी पिता या परमपिता है।
असौ बा आदित्यो (सूर्यः) बृहज्ज्योतिः (शतपथ ब्राह्मण, ६/३/१/१५)
य एष (सूर्यः) तपति (शतपथ ब्राह्मण, १४/१/४/२)
सूर्य का आकर्षण कमल-नाल है, उस पर पृथ्वी ही पद्म है। 
इयं (पृथिवी) वै पुष्करपर्णम् (शतपथ ब्राह्मण, ७/४/१/१२)
तस्मिन् हिरण्मये पद्मे बहु योजन विस्तृते। सर्व तेजो गुणमये पार्थिवैर्लक्षणैर्वृते॥
तच्च पद्म पुराभूतं पृथिवी रूपमुत्तमम्। 
नारायण समुद्भूतं प्रवदन्ति महर्षयः॥ (पद्मपुराण, सृष्टि खण्ड, ४०/२-३)
३. पार्थिव पुष्कर-
(१) मनुष्य ब्रह्मा- महाभारत, शान्ति पर्व, अध्याय ३४८ में मनुष्य रूप में ७  ब्रह्मा का वर्णन है-
(१) मुख्य (नारायण के मुख से)-वैखानस को उपदेश, 
(२) नेत्र से-सोम को उपदेश, उनसे रुद्र, वालखिल्यों को, 
(३) वाणी से-इसे शान्ति पर्व ३४९/४९ में वाणी का पुत्र अपान्तरतमा कहा है, उनके माता पिता के लिये वाणी-हिरण्यगर्भाय नमः यज्ञ में पाठ होता है। उनसे त्रिसुपर्ण ऋषि को उपदेश। गर्ग संहिता (६/१४/८) में अपान्तरतमा द्वारा गौतम-पुत्र मेधावी को पर्वत बनने का शाप , (७/४०/३५) में अपान्तरतमा ऋषि द्वारा हरिण उपद्वीप (मलगासी द्वीप, मृगव्याध या मृगतस्कर = मगाडास्कर) में तप, अपान्तरतमा आश्रम में गरुड के पक्ष का पतन, (७/४२/२३) में अपान्तरतमा शकुनि द्वारा शम्बर आदि दैत्यों को मोक्ष उपाय रूप में भक्ति के प्रकारों का कथन, ब्रह्मवैवर्त्त पुराण (१/८/२७) में अपान्तरतमा ऋषि का ब्रह्मा के गले से प्रादुर्भाव), (१/१२/४) में ब्रह्मा - पुत्र, (१/२२/१७) में अपान्तरतमा नाम की निरुक्ति, तैत्तिरीय आरण्यक (८/९) सायण भाष्य में अपान्तरतमा का जन्मान्तर में कृष्ण द्वैपायन व्यास बनना।)
(४) आदि कृत युग में (श्लोक ३४) कर्ण से ब्रह्मा की उत्पत्ति-आरण्यक, रहस्य. और संग्रह सहित वेद क्रम से स्वारोचिष मनु, शंखपद, दिक्पाल, सुवर्णाभ को उपदेश।
(५) आदि कृत युग में (श्लोक ४१) नासिका से ब्रह्मा की उत्पत्ति- क्रम से वीरण, रैभ्य मुनि, दिक्पाल कुक्षि को उपदेश।
(६) अण्डज ब्रह्मा (शान्ति पर्व ३४९/१७ में भी)-से बर्हिषद् मुनि, ज्येष्ठसामव्रती हरि, राजा अविकम्पन को उपदेश।
(७) पद्मनाभ ब्रह्मा से दक्ष, विवस्वान्, वैवस्वत मनु, इक्ष्वाकु को उपदेश। यह सम्भवतः मणिपुर के निकट हिमालय के पूर्व भाग में थे। उनके नाम पर त्रिविष्टप् का पूर्व भाग ब्रह्म विटप (ब्रह्मपुत्र नदी का स्रोत क्षेत्र), ब्रह्मपुत्र, ब्रह्म देश (बर्मा, अभी म्याम्मार = महा + अमर) हैं।
इनके अतिरिक्त २ अन्य ब्रह्मा थे। स्वायम्भुव मनु के बहुत बाद सभ्यता नष्ट हो गयी तो द्वितीय व्यास कश्यम ने उसका उद्धार किया। अतः उनको भी ब्रह्मा तथा प्रजापति कहा गया है। उनका समय १७,५०० ईपू. था जब अदिति के पुनर्वसु नक्षत्र से वर्ष का अन्त और आरम्भ होता था-अदितिर्जातम्, अदितिर्जनित्वम् (ऋक्, १/८९/१०, वाज. यजु, २५/२३)  
राजस्या ब्रह्मणोंऽशेन मारीचः कश्यपोऽभवत्॥ (ब्रह्माण्ड पुराण, २/३/३/१०५)
कश्यपो ब्रह्मणोंऽशश्च पृथिव्या अदितिस्तथा॥ (ब्रह्माण्ड पुराण, २/३/७१/२३८) 
द्वापरे प्रथमो व्यासो मनुः स्वायम्भुवो मतः॥१॥
द्वितीये द्वापरे चैव वेदव्यासः प्रजापतिः॥२॥ (कूर्म पुराण, पूर्व भाग, अध्याय ५२)
इनके कई स्थान अनुमानित हैं-कैस्पियन समुद्र (नाम समानता), कश्मीर या कश्यप-मीर (नीलमत पुराण), या थाइलैण्ड के बैंगकाक तथा चम्पक पर्वत वियतनाम की प्राचीन राजधानी चम्पा) के बीच मणिपर्वत पर। सम्भवतः यहां के मेरु को मणिपर्वत कहा है।
विकङ्कस्याचलेन्द्रस्य मणिशैलस्य चान्तरे। शतयोजन विस्तीर्णं द्वियोजन शतायतम्॥१६॥ 
विपुलं चम्पकवनं सिद्ध चारण सेवितम्॥१७॥ तत्राश्रमं भगवतः कश्यपस्य प्रजापतेः।
सिद्ध साध्य गणाकीर्णं नानाश्रुति विभूषितम्॥२२॥ (वायु पुराण, ३७/१६-२२)
पुष्कर कई थे अतः वहां क ब्रह्मा भी भिन्न होंगे।
(२) त्रिपुष्कर-पुराण में ३ पुष्करों का उल्लेख है (पद्म पुराण, १/१५/१५१, १/१९-२०, अग्नि पुराण, २११/८, स्कन्द पुराण, ६/४५, १७९)-उज्जैन से १२ अंश पश्चिम का पुष्कर (विष्णु पुराण, २/८/२८), इन्द्रप्रस्थ पुष्कर (अजमेर, आबू पर्वत, पद्म पुराण, १/२० आदि)-
पृथूदके गयाशीर्षे नैमिषे पुष्करत्रये॥ (स्कन्द पुराण, ६/४/३७)
स्कन्द पुराण, अध्याय (६/१७९/५४) के अनुसार ३ पुष्कर हैं-
ज्येष्ठ-पुष्कर द्वीप में न्यग्रोध नामक स्थान के निकट।
मध्य-उज्जैन के १२ अंश पश्चिम उजबेकिस्तान का बुखारा।
कनीयक-अजयमेरु (अजमेर) का पुष्कर जहां सरस्वती धारा बहती थी।
तीन पुष्कर स्थानों की तरह त्रिपुष्कर योग भी होता है- 
त्रिपादेषु च ऋक्षेषु यदा भद्रा तिथिर्भवेत्॥५७॥ 
भौमादित्यशनैश्चारी विज्ञेयं तत् त्रिपुष्करम्॥५८॥(अग्नि पुराण, १२१/५७-५८)
(३) पुष्कर द्वीप के ब्रह्मा-इनका स्थान पुष्कर द्वीप या दक्षिण अमेरिका कहा है (मत्स्य पुराण, १२३/३९, विष्णु पुराण, २/८/८/५, ऋक्, ६/१६/१३) । इनके स्थान से ४ दिशाओं में ४ राजपथ जाते थे। यह पेरु का कुजको या उसके निकट का स्थान हो सकता है। यह इंका (इनः = सूर्य) साम्राज्य की राजधानी थी और यहां से पूरे अमेरिका में ४ दिशाओं में मार्ग थे।
त्वामग्ने पुष्करादध्यथर्वा निरमन्थत। मूर्ध्नो विश्वस्य वाधतः॥१३॥
तमुत्वा दध्यङ्गृषिः पुत्र ईधे अथर्वणः। वृत्रहणं पुरन्दरम्॥१४॥ (ऋक्, ६/१६)
न्यग्रोधः पुष्करद्वीपे ब्रह्मणः स्थानमुत्तमम्। तस्मिन्निवसति ब्रह्मा पूज्यमानः सुरासुरैः॥
(विष्णु पुराण, २/२/८५, ब्रह्माण्ड पुराण, ८/८/७)
न्यग्रोधः पुष्करद्वीपे पद्मवत् तेन स स्मृतः (मत्स्य पुराण, १२३/३९)
यहां भी मेरु था, जिसका नाम अमेरु (अपर मेरु = पश्चिमी मेरु) है, जिससे द्वीप का नाम अमेरिका हुआ। यहां हिमालय के शिव-पार्वती जैसे मेरु-मू देव हैं। हायु मरका पर्वत पर अमारु मेरु की ७ मीटर ऊंची विशाल मूर्ति तथा प्राचीन विशाल भवन हैं। इसका स्थान १६अंश १२’५१.६२" दक्षिण तथा ६९अंश ३०’२१.२८" पश्चिम है। इसके निकट कैलास के मानसरोवर जैसा टीटीकाका झील है।इस परम्परा को नष्ट करने के लिए एक काल्पनिक स्पेनी लुटेरे अमेरिगो वेस्पुसी की कहानी गढ़ी गयी है, जिसे अमेरिका नाम का स्रोत कहा जा सके। मूल अमेरिकी सभ्यता तथा इतिहास नष्ट करने का अभियान अभी तक चल रहा है।
(४) द्वितीय पुष्कर-यह उज्जैन से १ मुहूर्त अर्थात् १२ अंश पश्चिम था। इस स्थान पर आज बुखारा है (प्राचीन ईरान राज्य, वर्तमान उजबेकिस्तान) जो पुष्कर का अपभ्रंश है। 
एवं पुष्करमध्येन यदा याति दिवाकरः। 
त्रिंशद् भागन्तु मेदिन्यास्तदा मौहूर्त्तिकी गतिः॥ (विष्णु पुराण, २/८/२६)
इस स्थान पर अधिकतम दिन मान १६ गण्टा है जो वेदाङ्ग ज्योतिष में माना गया है (ऋक् ज्योतिष, ७)।
यहां प्राङ्-मेरु (पूर्वी मेरु) है जिसका अपभ्रंश पामीर है। यहां से ४ दिशाओं में पर्वत हैं।
(५) इन्द्रप्रस्थ पुष्कर-इसकी ४ दिशाओं में ४ नदियां हैं।
श्रूयते पुष्करंनाम तीर्थं त्रैलोक्यविश्रुतम्। ब्रह्मणा निर्मितं तत्र यच्च योजनमात्रकम्॥४॥ 
उत्तरे चन्द्रभागाया नद्या यावत्सरस्वती। दक्षिणे करतोयायाः सीमेयं पुष्करत्रये॥५॥ 
(स्कन्द पुराण, नागरखण्ड, १७९/४-५) 
यहां सरस्वती नदी की पूर्ववाहिनी धारा भी आरम्भ होती है, जिसका प्रयाग में गङ्गा-यमुना के साथ त्रिवेणी-सङ्गम होता था।
एवमेषा सरिच्छ्रेष्ठा पुष्करेषु सरस्वती।॥१२६॥ पुण्यस्य पुण्यताकारि पञ्चस्रोता सरस्वती॥१२८॥
पुष्करे तु विशेषेण पूतात् पूततमा हि सा। नदी सरस्वती पुण्या सुलभा जगति स्थिता॥२३३॥
दुर्लभा सा कुरुक्षेत्रे प्रभासे पुष्करे तथा॥२३४॥ प्राची सरस्वतीं प्राप्य योयोऽन्यं तीर्थं हि मार्ग ते॥२३५॥
पुष्करारण्यमासाद्य पुनस्तस्मात् सरस्वती॥२४७॥
अन्तर्धानं गता गन्तुं प्रवृत्ता पश्चिमा मुखी। नाति दूरे ततस्तस्य पुष्करस्य सुशोभना॥२४८॥
(पद्म पुराण, सृष्टि खण्ड, १/१८/१२६-२४८)
इस पुष्कर में ब्रह्मा के भवन का नाम वैराज था। उनकी सभा कान्तिमती थी इसके मेरु का नाम श्रीनिधान (अज) था, जिसे अजमेर कहते हैं। 
श्रीनिधानंपुरं मेरोः शिखरे रत्न-चित्रितम्॥३॥ वैराजं नाम भवनं ब्रह्मणः परमेष्ठिनः॥९॥
सभा कान्तिमती नाम देवानां शर्मदायिका। ऋषि संघ समायुक्ता मुनिवृन्द निषेविता॥१३॥
अहं यत्र समुत्पन्नः पद्मं तद् विष्णु-नाभिजम्। पुष्करं प्रोच्यते तीर्थं ऋषिभिर्वेदपाठकैः॥२०॥
(पद्म पुराण, सृष्टि खण्ड, १/१५/९-२०)
यहां अर्बुद (आबू) पर्वत ही अर्णव से उत्पन्न कमल है-
इन्द्रो मह्ना महतो अर्णवस्य वि मूर्धानं अर्बुदस्य। (अथर्व सं, २०/९१/१२, ऋक्, १०/६७/१२)
वाक् को भी अर्बुद कहा है-वाग्वा अर्बुदम् (तैत्तिरीय ब्राह्मण, ३/८/१६/३)
विद्या रूपी सरस्वती ब्रह्मा की पत्नी हैं।
४. आध्यात्मिक पुष्कर-
शरीर के सभी चक्रों को कमल कहा है, जिसके दलों की संख्या ४, ६, १०, १२, १६, २ हैं। उसके ऊपर सहस्रार में १,००० दल हैं। मूलाधार से मतिष्क केन्द्र आज्ञा चक्र तक को संवित् कमल कहा गया है। मस्तिष्क के वाम-दक्षिण भाग २ पक्षी हैं, इनका सूक्ष्म रूप जीव-आत्मा है। वेद में इनको २ सुपर्ण कहा है।
द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया, समानं वृक्षं परिषस्वजाते। 
तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्ति, अनश्नन्नन्यो अभिचाकषीति॥
(मुण्डक उप. ३/१/१, श्वेताश्वतर उप. ४/६, ऋक् १/१६४/२०, अथर्व ९/९/२०)
सुषुम्ना चेतना या ज्ञान का वृक्ष है। उसके मध्य (आज्ञा चक्र) में २ सुपर्ण (हंस, पक्षी) रहते हैं (परिषस्वजाते-पड़ोस में)। उनमें अन्य (एक) पिप्पल (पिब् + फल = जिस फल में आसक्ति हो) को स्वाद सहित खाता है। अन्य (दूसरा) बिना खाये (बिना आसक्ति = अनश्नन्) केवल देखभाल करता है। आकाश में भी सृष्टि निर्माण का क्रम (स्वयम्भू से पृथ्वी तक) स्कम्भ या वृक्ष है। इसके हर स्तर पर ब्रह्म के २ रूप हैं, निर्विशेष निर्लिप्त रहता है, विशिष्ट रूप विविध या विशिष्ट सृष्टि करता है। निर्विशेष में भेद नहीं होने के कारण उसका वर्णन नहीं होता, उपवर्णन हो सकता है। 
मनुष्य शरीर में इन हंसों को जीव और आत्मा कहते हैं। आत्मा निर्लिप्त है, जीव कर्म में लगा है। जीव और आत्मा को ही बाइबिल में ईव और आदम कहा गया है। 
समुन्मीलत् संवित्-कमल मकरन्दैक रसिकं, भजे हंस-द्वन्द्वं किमपि महतां मानसचरम्।
यदालापादष्टादश गुणित विद्या परिणतिः, तदादत्ते दोषाद् गुणमखिल-मद्भ्यः पय इव॥ (शंकराचार्य, सौन्दर्य लहरी, ३८)
संवित्-कमल को बाइबिल में ज्ञान का वृक्ष कहा है। मस्तिष्क में जो सूचनाओं का संग्रह है, वह अप् = जल है। उसके भीतर से क्रमबद्ध ज्ञान (जो वाक्य में लिखा जा सके) दूध जैसा उपयोगी है। यही मन के हंस द्वारा जल से दूध निकालना है। भौतिक रूप में मान सरोवर का हंस जल में दूध के मिश्रण से दूध नहीं निकाल सकता।

Friday, 16 October 2026

विजयदशमीनिर्णयः


1. प्रथम पृष्ठ (विजयदशमीनिर्णयः)

संस्कृत: आश्विनशुक्लदशमी विजयदशमीति प्रसिद्ध।
हिंदी: आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि 'विजयदशमी' नाम से प्रसिद्ध है।
संस्कृत: शरत्काले महापूजा क्रियते या च वार्षिकी।
हिंदी: शरद ऋतु में जो वार्षिक महापूजा की जाती है।
संस्कृत: आरभ्य तस्यां दशमीं तु यावत् प्रपूजयेत् पर्वतराजपुत्रीम्।
हिंदी: प्रतिपदा से आरंभ करके उस दशमी तिथि तक पर्वतराजपुत्री (माता दुर्गा) की भली-भांति पूजा करनी चाहिए।
संस्कृत: मूलेनावाहयेद् देवीं श्रवणेन विसर्जयेत्।
हिंदी: मूल नक्षत्र में देवी का आवाहन करना चाहिए और श्रवण नक्षत्र में विसर्जन करना चाहिए।
संस्कृत: शरत्काले महापूजा क्रियते या च वार्षिकी। सा कार्योदयगामिन्यां न तत्र तिथियुग्मता॥
हिंदी: शरद ऋतु में जो वार्षिक महापूजा की जाती है, वह सूर्योदयव्यापिनी तिथि में ही करनी चाहिए, वहाँ तिथियों के जोड़े (युग्म) का विचार नहीं होता।
संस्कृत: प्रातरावाहयेद्देवीं प्रातरेव प्रवेशयेत्। प्रातः प्रातश्च सम्पूज्य प्रातरेव विसर्जयेत्॥
हिंदी: प्रातःकाल ही देवी का आवाहन करें और प्रातः ही प्रवेश कराएं। प्रतिदिन प्रातःकाल भली-भांति पूजन करके प्रातःकाल ही विसर्जन करें।
संस्कृत: प्रातःकालो मुहूर्त्तांस्त्रीन् सङ्गवस्तावदेव हि। मध्याह्नस्त्रिमुहूर्त्तः स्यादपराह्नस्ततः परम्। सायाह्नस्त्रिमुहूर्त्तः स्यात् तत्र श्राद्धं न कारयेत्॥
हिंदी: सूर्योदय से तीन मुहूर्त तक का समय प्रातःकाल होता है और उतना ही समय सङ्गव काल होता है। उसके बाद के तीन मुहूर्त मध्याह्न काल होते हैं और उसके बाद अपराह्न काल होता है। इसके बाद तीन मुहूर्त का सायाह्न काल होता है, जिसमें श्राद्ध कर्म नहीं कराना चाहिए।
संस्कृत: ह्रासवृद्धौ च सततं दिवसानां यथाक्रमम्। सन्ध्यामुहूर्त्तमात्रन्तु ह्रासे वृद्धौ समा स्मृता॥
हिंदी: दिनों के घटने और बढ़ने के क्रम में भी, संध्या का समय हमेशा एक मुहूर्त मात्र का ही माना गया है, चाहे दिन छोटा हो या बड़ा।

2. द्वितीय पृष्ठ

संस्कृत: पद्म पद्म उषःकालः समपद्मारुणोदयः। अष्ट पद्म भवेत् प्रातः शेषः सूर्योदयः स्मृतः॥
हिंदी: उषःकाल और अरुणोदय का समय सूर्योदय से पूर्व का बोध कराता है, तथा उसके बाद का आठ पदों का समय प्रातःकाल का शेष भाग और सूर्योदय कहा गया है।
संस्कृत: व्रतोपवासनियमे घटिकैका यदा भवेत्। सा तिथिः सकला ज्ञेया पित्र्ये चापराह्निकी॥
हिंदी: व्रत और उपवास के नियम में यदि (सूर्योदय के समय) एक घटी भी तिथि विद्यमान हो, तो वह तिथि पूर्ण मानी जानी चाहिए, और पितृ कार्यों के लिए अपराह्न व्यापिनी तिथि ली जाती है।

3. तृतीय पृष्ठ

संस्कृत: भगवत्याः प्रवेशादिविसर्गान्ताश्च याः क्रियाः। तिथौ उदयगामिन्यां सर्वास्ताः कारयेद् बुधः॥
हिंदी: भगवती दुर्गा के प्रवेश (आवाहन) से लेकर विसर्जन तक की जो भी क्रियाएँ हैं, बुद्धिमान मनुष्य को वे सभी सूर्योदयव्यापिनी तिथि में ही करनी चाहिए।
संस्कृत: आश्विने शुक्लपक्षे तु दशम्यां पूजयेत्ततः। एकादश्यां न कुर्वीत पूजनं चापराजितम्॥
हिंदी: आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को अपराजिता देवी का पूजन करना चाहिए। एकादशी तिथि में अपराजिता का पूजन कभी नहीं करना चाहिए।

4. चतुर्थ पृष्ठ

संस्कृत: आश्विने शुक्लपक्षस्य दशम्यां पूजयेत्ततः। एकादश्यां न कुर्वीत पूजनं चापराजितम्॥
हिंदी: आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को अपराजिता देवी का पूजन करना चाहिए। एकादशी तिथि में अपराजिता का पूजन कभी नहीं करना चाहिए।
संस्कृत: उदये दशमी किञ्चित् सम्पूर्णैकादशी यदा। श्रवणर्क्षं यदा काले सा तिथिर्विजयाभिधा॥
हिंदी: जब सूर्योदय के समय थोड़ी सी दशमी हो और बाद में पूरी एकादशी हो, तथा उस समय श्रवण नक्षत्र का योग हो, तो वह तिथि 'विजया' नाम वाली होती है।
संस्कृत: श्रवणर्क्षं तु पूर्णायां काकुत्स्थः प्रस्थितो यतः। उल्लङ्घयेयुः सीमानं तद्दिनर्क्षे ततो नराः॥
हिंदी: चूंकि श्री रामचंद्र जी ने श्रवण नक्षत्र से युक्त पूर्ण तिथि में प्रस्थान किया था, इसीलिए मनुष्यों को उसी दिन नक्षत्र योग में अपनी सीमा का उल्लंघन करना चाहिए।

5. पंचम पृष्ठ

संस्कृत: ईषत्सन्ध्यामतिक्रान्तः किञ्चिदुद्दिन्नतारकः। विजयो नामकालोऽयं सर्वकार्यार्थसिद्धिदः॥
हिंदी: संध्या का समय थोड़ा सा बीत जाने पर, जब आकाश में तारे कुछ-कुछ दिखाई देने लगें, उस समय को 'विजय' नाम का काल कहा जाता है, जो सभी कार्यों में सिद्धि देने वाला है।
संस्कृत: इषस्य दशमीं शुक्लां पूर्वविद्धां न कारयेत्। श्रवणेनापि संयुक्तां युक्तां पट्टाभिषेचने॥
हिंदी: आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की दशमी यदि पूर्वविद्धा (नवमी से युक्त) हो, तो उसमें कार्य नहीं करना चाहिए, चाहे वह श्रवण नक्षत्र से युक्त ही क्यों न हो; वह केवल पट्टाभिषेक के लिए ही उपयुक्त होती है।
संस्कृत: सूर्योदये यदा राजन् ! दृश्यते नवमी तिथिः। आश्विने मासि शुक्ले तु विजयां तां विदुर्बुधाः॥
हिंदी: हे राजन! जब आश्विन मास के शुक्ल पक्ष में सूर्योदय के समय नवमी तिथि दिखाई दे, तो विद्वान लोग उसे ही विजया दशमी जानते हैं।
संस्कृत: उदये दशमी किञ्चित् सम्पूर्णैकादशी यदा। श्रवणर्क्षं यदा काले सा तिथिर्विजयाभिधा॥
हिंदी: जब सूर्योदय के समय थोड़ी सी दशमी हो और बाद में पूरी एकादशी हो, तथा उस समय श्रवण नक्षत्र का योग हो, तो वह तिथि 'विजया' नाम वाली होती है।

6. षष्ठ पृष्ठ

संस्कृत: यस्मिन् देशे य आचारः इत्यादि वचनात् 'धर्मस्य निर्णयो ज्ञेयो मिथिलाव्यवहारतः' इति विष्णुपुराणवचनञ्च।
हिंदी: 'जिस देश में जो आचार या परंपरा हो' इस वचन के अनुसार तथा विष्णुपुराण के वचन के अनुसार—धर्म का निर्णय वहाँ के स्थानीय व्यवहार और परंपरा के अनुसार ही जाना जाना चाहिए।
संस्कृत: व्यवहारस्याप्यनेकविधत्वे या निबन्धकृतां व्यवस्था स्वकुलव्यवहारानुरूपा सैव ग्राह्या।
हिंदी: यदि लोक व्यवहार में भी अनेक प्रकार के मतभेद या भिन्नताएँ हों, तो ग्रंथों के रचनाकारों द्वारा बताई गई वही व्यवस्था स्वीकार करनी चाहिए जो अपने कुल की परंपरा और व्यवहार के अनुकूल हो।
यदि आप इन श्लोकों के अंतर्गत आए मुहूर्त के समय की गणना (जैसे त्रिमुहूर्त या घटी) के बारे में विस्तार से समझना चाहते हैं, तो कृपया मुझे उस विषय के बारे में बताएं।

देवमन्दिर गमन-विज्ञान


देवमन्दिरगमन-विज्ञान
हम पूर्व कह चुके हैं कि–देवमूर्तिपूजा भी एक यज्ञ है; यज्ञवाले लाभ देवमूर्तिपूजामें भी प्रायः होते हैं; क्योंकि–यह भी देव-पूजा है। देवपूजा दो प्रकारकी होती है, एक हवन, दूसरी मूर्ति-पूजा। संस्कृत-अग्निमूर्तिद्वारा 'इन्द्राय स्वाहा, वरुणाय स्वाहा' इत्यादि रूपसे उस-उस देवताको हवि देना—यह हवन-द्वारा देव-पूजा होती है, प्रस्तर-आदिकी संस्कृत-मूर्तिद्वारा उस-उस देवताको बलि देना मूर्तिद्वारा देवपूजा होती है। हवन तथा मूर्तिपूजा दोनों ही 'यज्ञ' कहे जाते हैं; क्योंकि–देवपूजार्थक यजधातुका अर्थ दोनों स्थानोंमें देखा गया है। 'शाङ्खायनब्राह्मण'में कहा है— 'स एवास्मै यज्ञं ददाति तद् यद् एता देवता यजति' (४।२) अर्थात् देवताओंका पूजन ही यज्ञ होता है। यही बात श्रीमद्भागवत-पुराणमें भी सूचित की गई है। वहां (११।२७।१५-१६ में) मूर्तिपूजा तथा अग्निहोत्र दोनोंको ही 'याग' कहा गया है।
जिस प्रकार लोकमें पत्थरकी मूर्ति जड़ मानी जाती है, वैसे ही अग्नि भी। परन्तु 'अभिमानिव्यपदेशः' (वेदान्त० २।१।५) 'सर्वस्य वा चेतनावत्त्वात्' (महाभाष्य-वार्त्तिक ३।१।७) इस शास्त्रीय कथनसे दोनों ही मूर्तियां चैतन्य धारण करती हैं। मन्त्र-संस्कृत अग्नि उस हविके स्थूलभागको भस्म करके उसका सूक्ष्म भाग देवताओंको देती है, और मन्त्रसंस्कृत-मूर्ति मधुमक्षिकासे पिये हुए पुष्पकी भांति उसका सूक्ष्म अंश देवताओंको समर्पित करती है। उस मन्त्रसंस्कृत-मूर्तिको देवमन्दिरमें प्रतिष्ठापित किया जाता है। तब देवमूर्तिकी नमस्कार आदि पूजाकेलिए देवमन्दिरमें जाना भी बहुत विज्ञान-पूर्ण तथा लाभ-प्रद है।
देवमन्दिर धार्मिक-जनताके प्राण हैं, भारतीय सभ्यता एवं संस्कृतिके केन्द्र हैं, मनकी एकाग्रता तथा शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्यलाभके प्रबल साधन हैं। देवप्रतिमा-केन्द्रके द्वारा भगवान्की समग्रशक्तिको भक्तोंकी विश्वासरूपिणी विषमशक्ति खींच लेती है। सम-विषम शक्तिका इस प्रकारका आकर्षण विज्ञान-सिद्ध है। वही प्रतिमा प्रभुशक्तिको इस प्रकार खींचती और प्रकट करती है; जैसे सूर्यकान्तमणि सूर्यकी शक्तिको। इसमें वेदमन्त्रोंकी शक्ति उसमें सहायक हो जाती है।
मूर्तियोंमें दिव्य-ज्योति एवं सूक्ष्मशक्ति जिस प्रकार ठीक रह जाए; उसी प्रकारसे देवमन्दिर (गर्भगृह) बनाये जाते हैं। धूप, दीप आदिके रखनेसे मन्दिरमें दिव्यशक्तिका संचार रहता है। सुगन्धित द्रव्योंके प्रयोगसे भूतबाधाकी निवृत्ति वैज्ञानिक भी मानते हैं, कीटाणुनाशिनी शक्ति भी उनमें हुआ करती है।
प्रत्येक पुरुषमें पञ्चभूतात्मकतावश पृथिवी, जल, तेज, वायु और आकाश इन तत्त्वोंमें एक प्रबल होता ही है। गन्ध, रस, रूप, स्पर्श तथा शब्दका प्रभाव एकतत्त्व-प्रधान शरीरमें रहता है। जिस पुरुषमें अग्नितत्त्वकी प्रधानता हो; उसमें रूपका अधिक प्रभाव होता है। इस प्रकार पृथिवी-तत्त्वकी प्रधानतामें गन्धका, जलकी प्रधानतामें रसका, वायुतत्त्वकी प्रधानतामें स्पर्शका, आकाशकी प्रधानतामें शब्दका अधिक प्रभाव पड़ता है। देवमन्दिरमें सब प्रकारके पुरुष जाते हैं; इसलिए उसमें सब प्रकारके द्रव्योंका समुच्चय रहता है। विविध रत्नोंसे जड़ी हुई प्रतिमाएँ; विविध-वर्णसुसज्जित स्थान, विविध ग्रन्थद्रव्योंका सुगन्ध, शंख, घण्टा आदिका शब्द, विविध-प्रकारका भगवान्का भोग (प्रसार) आदि रहा करता है। यह स्थूलरूपसे जानना चाहिये।
सूक्ष्मरूपसे तो विभिन्न-तत्त्वोंकी प्रधानताके अनुरूप भिन्न-भिन्न प्राणियोंकेलिए भिन्न-भिन्न देवोंकी उपासना बताई गई है। मनुष्यका शरीर पाँच तत्त्वोंसे बना हुआ है। इसलिए शास्त्रने भी सगुण-ब्रह्मकी पञ्चदेवोंके रूपमें उपासना बताई है। विष्णु, शिव, शक्ति, सूर्य, गणपति—यह ईश्वरकी पाँच प्रमुख मूर्तियाँ हैं।
आकाशतत्त्वके साथ विष्णुका, पृथिवीतत्त्वसे शिवका, अग्नितत्त्वके साथ शक्तिका, वायुतत्त्वके साथ सूर्यका, जलतत्त्वके साथ गणपति (गणेश) का सम्बन्ध है। जिस प्राणीमें जिस तत्त्वकी प्रधानता होती है; उसकी स्वाभाविक रुचि उस देवकी उपासनामें होती है। सब प्राणियोंमें समान-तत्त्वकी प्रधानता नहीं होती; अतः सबका हृदय एक देवमें निश्चल-रूपसे नहीं रहता। इसलिए मुनियोंने भिन्न-भिन्न पुरुषोंकेलिए भिन्न-भिन्न देवोंकी उपासना बताई है।
पर इसका यह तात्पर्य नहीं कि पुरुष एक ही देवकी पूजा करेगा, और दूसरोंसे घृणा करेगा। नहीं; मनुष्यमें न्यूनाधिकतासे पाँचों तत्त्व रहते हैं। तब प्रधानतासे उसकी रुचि एक देवमें होती है; किन्तु अन्य तत्त्वोंके भी शरीरमें गौणरूपसे होनेसे अन्य देवोंसे उसकी अरुचि नहीं होती। इस प्रकार रत्न, रंग, गन्ध, शब्द आदिका भी प्रभाव प्रत्येक पुरुषपर पड़ता है। शब्दको ही ले लीजिये। शब्द अपनी प्रकृतिवाले पुरुषको जहाँ लाभ पहुँचाता है; वहाँ सर्व-साधारणको भी कुछ लाभ पहुँचावेगा ही। देवालयोंमें शंख और घड़ियालकी ध्वनि होती है। इसकी ध्वनिका स्थूल एवं सूक्ष्म दोनों ही प्रकारका प्रभाव हमपर पड़ता है। श्रीजगदीशचन्द्र-वसु नामक भारतीय-वैज्ञानिकने शंखके शब्दके विषयमें अनेक रोगाणुओंका नाश एवं वायुका शुद्ध होजाना प्रमाणित कर दिया है; जिसे हम पहले 'शंखध्वनिविज्ञान'में लिख चुके हैं। घड़ियालमें काँसेका प्रयोग होता है। काँसा ताँबे और राँगेसे बनता है। ताँबा विद्युत्का परिचालक होता है, और राँगा होता है संग्रहकोष।
घड़ियालपर चोट पड़नेसे उसमें विद्युत्-शक्तिका संग्रह होता है। तभी घड़ियालका जल पिलानेपर प्रसव-कष्टमें स्त्रीका शीघ्र-प्रसव होता है। तब घण्टा-शब्दसे उत्पन्न हुई विद्युत् हमारे शरीरमें प्रविष्ट होती है। और फिर हमारे मन्दिरोंमें खड़ाऊँ पहनकर जानेका नियम है; जिससे वह बिजली हमारे पाँवके नीचेसे निकलकर पृथिवीमें न चली जावे, और हमारे शरीरमें व्याप्त होकर उसे शक्तिशाली बनावे।
इस प्रकार देवमन्दिरमें स्थित पीपलका वृक्ष, तुलसी, मृगचर्म, व्याघ्रचर्म, पञ्चगव्य, चन्दन, केसर आदि भी लाभदायक सिद्ध होते हैं। इसमें पीपल वन्ध्यात्वको दूर करनेवाला सिद्ध हो चुका है, उसके मूलमें जल डालनेसे ज्वर नहीं होता। इसके विशेष गुण हम आगे बतावेंगे। तुलसी-दलमें भी घातक-कीटाणुओंको दूर करनेकी अद्भुत क्षमता है। विज्ञानाचार्य सर जगदीशचन्द्र वसुने लिखा है कि-तुलसी-सुवासित वायु, घातक-कीटाणुओंको दूर करती है। तुलसीका पौधा धनीसे लेकर निर्धन तक समान रूपसे आरोग्य देनेवाला ईश्वरीय औषधालय है—इसके गुण हम आगे लिखेंगे। यदि तुलसीदलको दाँतोंसे चवाया जाय; तो दांत निर्बल हो जाते हैं। इस कारण हमारे मुनियोंने तुलसीदलको भगवान्के चरणामृतमें स्थान दिया है कि बिना ही दाँतोंके चवाये वह पेटमें पहुँच जाय।
इस प्रकार देवमन्दिरमें रखे हुए मृगचर्म और व्याघ्रचर्मको भी देखिये। लोग प्रायः उसपर बैठकर भगवान्का भजन करते हैं। मृगचर्मपर बैठनेसे भगन्दर आदि रोग नहीं होते; जो प्रायः बैठने वालों एवं कामियोंको हो जाते हैं। अथवा यदि होते हैं; तो उसपर बैठनेसे शान्त हो जाते हैं। इसके विशेष गुण 'मृगचर्मका वैज्ञानिक-रहस्य'में हम लिख चुके हैं। व्याघ्रचर्म आदिके गुण भी हम पूर्व लिख चुके हैं। उसपर साँप-बिच्छू आदि चढ़नेका भय भी नहीं रहता। उसपर बैठ कर उपासक निर्विघ्न, निर्भय एवं एकाग्रचित्तसे भगवान्की उपासना करता है।
इस प्रकार पञ्चगव्य तथा चरणामृत एवं चन्दनादिके विषयमें भी ज्ञान लेना चाहिये, जिनमें चन्दन-केसरादिके गुण पूर्व बता चुके हैं; शेषके आगे बताने वाले हैं। इनसे जहाँ सूक्ष्म दैवी-शक्ति प्राप्त होती है; वहाँ स्थूल लौकिक-शक्ति भी। इनके कारण स्वास्थ्य अच्छा होता है। अकालमृत्यु दूर होती है।
देवालयमें जानेसे जहाँ देवपूजा होती है; वहाँ शारीरिक एवं मानसिक लाभ भी होते हैं। देवालयमें जानेकेलिए सूर्योदयसे पहले उठते हैं; और सूर्योदयसे पूर्व ही स्नान करते हैं; क्योंकि स्नान करते ही देवालयमें जाना पड़ता है। इससे रूप, तेज, आरोग्य, बल, आयु, दुःस्वप्न-नाश और मेधा प्राप्त होती है। देवमन्दिर प्रायः नगरसे बाहर होते हैं, उनमें कोई बगीचा भी होता है। देवपूजाकेलिए बगीचेसे हम फूल चुनते हैं, जिससे हमें शुद्ध-वायु भी मिलती है, नगरके बाहरकी शुद्ध-वायुमें भ्रमण भी हो जाता है। प्रातः-भ्रमणके लाभ जगत्प्रसिद्ध ही हैं। इससे हमें शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य तथा शक्तिका लाभ होता है। शुद्ध होता है। वायुमण्डलके कारण हमारे भीतर कुविचार नहीं रह पाते। चन्दन मस्तिष्कपर लगानेसे मस्तिष्क-शक्तिमें और दृष्टिमें वृद्धि हुआ करती है।
मन्दिरमें शंखनादसे फेफड़ोंकी शुद्धि तथा कीटाणुओंका दूरीभाव होता है; यह हम पहले लिख ही चुके हैं। तब भगवान्की उपासनासे हमारा भगवान्से ऐक्य हो जाता है। धूप, घीका चौमुखा-दीया, और उसका प्रकाश यह सब भी अकाल-मृत्युको रोकते हैं। इस समयकी निष्काम-भक्तिसे मुक्ति मिलनेसे हमें पुनर्जन्म नहीं लेना पड़ता।
इस प्रकारके सूक्ष्म-स्थूल लाभोंके कारण देवस्थानों तथा उनकी वेदमन्त्र-संस्कृत मूर्तियोंमें दिव्यशक्तिके प्रभावसे अनेक रोगोंको दूर करनेकी शक्ति है—यह सिद्ध होगया। हमारी भारतीय-संस्कृति भी इन्हींके कारण हमारे अन्दर रहती है। यदि देवमन्दिरोंमें हमारी हिन्दू-संस्कृतिका हिताधायक कुछ भी न होता; तो मुसलमानी सम्राट् औरङ्गजेब हिन्दू-संस्कृतिके विनाशकेलिए देवमन्दिरोंको न तुड़वाता। तब देवमन्दिरमें जाना और उसमें देवपूजन करना यज्ञकी भांति ही ऐहिक और आमुष्मिक दोनों ही लाभ देनेवाला सिद्ध हुआ।


Monday, 12 October 2026

सवर्ण ब्राह्मण

अभी मेरे पास कंफर्म स्रौत नही है मगर सुनने में आ रहा है कि बम्बई में देवेन्द्र फडणवीस सरकार मराठों को आरक्षण देने जा रही हैं। यदी ये सही है तो बम्बई में भी 73 फीसदी ओबीसी आरक्षण विस्तार के बाद आरक्षण हो जाएगा।

मध्य प्रदेश में 100 करोड़ भारतीय रूपये केवल 73 प्रतिशत आरक्षण को माननीय उच्च न्यायालय में डिफेंड करने के लिए बहा दिया गया है। ये पैसा मोहन यादव या गरीब माँ के बेटे नरेद्र मोदी अपने घर से लाये थे ?

पटना में आरक्षण 65 प्रतिशत करने के कारण कोर्ट में लताड़े गये थे। अभी मध्य प्रदेश में 73 प्रतिशत आरक्षण देने के कारण कोर्ट में लताड़े गये हैं। अब बम्बई में भी लताड़े ही जायेंगे।

मित्रो पहला ऐतिहासिक दृष्टि से पक्ष ये है कि बम्बई में 13 में से 10 मुख्यमंत्री इधर मराठे ही हुए हैं। मनोहर जोशी , देवेन्द्र फडणवीस ब्राह्मण हैं और उद्धव ठाकरे कायस्थ थे। आईएएस में ब्राह्मणो और कायस्थों के बाद तीसरी सबसे अधिक प्रतिनिधित्व मराठो का ही है । 

दूसरा ऐतिहासिक पक्ष बहुत मजबूर और बेबस होकर बता रहा हूँ क्युकी भाजपा और कांग्रेस दोनो (आगे आप समझ गई होंगे ) हैं।
भारत मे पहली यूनिवर्सिटी कलकत्ता में 1910 में बनी थी। पहली महिला डॉक्टर कोई शायद तिवारी थी। इंजीनियर भी पहला ब्राह्मण था। हाँ मगर पूरी जिम्मेदारी से बता रहा हूँ कि केवळ डॉक्टर इंजीनियर ही नही यूनिवर्सिटी से नही निकले थे, आगे नेता, पत्रकार और क्रांतिकारी भी निकले थे इसलिए भद्रलोक बोला जाता है।

यही कारण है कि गरम दल के फेश पंडित बाल गंगाधर तिलक, नरम दल के गोपाल कृष्ण गोखले, संघ के संथापक डॉ हेडगेवार या जनसंघ/बीजेपी के फाउंडर डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी या 24 कैरट सुद्ध दक्षिणपंथी हिन्दू महासभा के वीर सावरकर आदी सभी ब्राह्मण थे। एक भी आपको गैर ब्राह्मण नही मिलेगा। इवन समाजवाद और साम्यवाद में भी यही हाल था। 

सही बात है कि पंडित नेहरू ही केवल भारत नही है मगर 14 साल से 16 साल के जो अमर शहीद क्रांतिकारी फाँसी पर चढ़े थे चाहे घोष हो या कोई और, ब्राह्मण और कायस्थ छोड़के तीसरी जाति के लिए आपको चैट GPT और गूगल जैमिनी का सहारा जरूर लेना पड़ेगा। 

भारत के पहले अमर शहीद क्रांतिकारी चाफेकर बंधु हैं या मंगल पांडेय हैं, इसमें इतिहासकारो में मतभेद हैं मगर मेरी बात इरफान हबीब और रोमिला थापर जैसे वामपंथी इतिहासकार भी नही काट पाएंगे कि वो ब्राह्मण ही थे। 

शायद इसी बात के लिये हमें सरकार दंड दे रही है क्युकी जब बाकी बिलों में छुपे हुए थे तो यहाँ युवा फाँसी पर चढ़कर देश को जगाने का कार्य कर रहे थे।

अब एकदम खुल्लम खुल्ला हो रहा है। कोई शोषित वंचित का एंगल भी नही दिया जा सकता है। अब सँख्याबल की ब्लैकमेलिंग शुरू हो चुका है और ये बस यही तक नही रुकेगा। 

हम तुर्को से भी लड़े थे, अंग्रेजो से भी लड़े थे और अब इन काले अंग्रेजो से भी लड़कर जीतेंगे। इलेक्ट्रॉनिक और प्रिंट दोनो मीडिया पूरी तरीके से मैनेज हैं। जैसे ही कंफर्म होगा मैं अपडेट करूँगा, जैसे UGC और मध्य प्रदेश पर किया था। ये भी कयास है मगर जहाँ चिंगारी होती हैं, वही आग भी लगता है, एक कहावत तो आपने सुनी भी होगी।

जय भवानी जय शिवाजी महाराज।

Saturday, 10 October 2026

RSS ब्राह्मण ज्योति फुले और आर्य

संघ के एकात्मता स्तोत्र में फुले, ठक्कर बापा तथा अम्बेडकर की स्तुति है जो सनातन धर्म के विरोधी थे। 
सुभाषः प्रणवानन्दः क्रान्तिवीरो विनायकः
ठक्करो भीमरावश्च फुले नारायणो गुरुः ॥३०॥
संघशक्तिप्रणेतारौ केशवो माधवस्तथा
स्मरणीयाः सदैवैते नवचैतन्यदायकाः ॥३१॥
ज्योतिबा फुले की पुस्तक गुलामगिरी के अनुसार ब्राह्मण मूल भारतीय नहीं थे। वे बाहरी (आर्य) थे, जो लगभग ३०००-३५०० वर्ष पहले भारत आए। फुले ने लिखा कि ये लोग ईरान क्षेत्र (आर्यावर्त के बाहर) से आए और यहाँ के मूल निवासियों (शूद्र-अतिशूद्र) पर अधिकार जमाया। उन्होंने मनुस्मृति जैसी व्यवस्थाओं के माध्यम से सामाजिक वर्चस्व स्थापित किया। यह स्पष्ट रूप से इसाई मत के प्रचार के लिए भारत विरोधी कहानी थी, जिसका प्रचार अशिक्षितों के माध्यम से किया गया। आज तक किसी भी ग्रीक, इरानी या भारतीय साहित्य में आर्यों के बाहर से आगमन का कोई उल्लेख नहीं मिला है। खानों में काम करने के लिए अफ्रीका से मजदूर आये थे जिनके वंशज भारत के खनिज क्षेत्रों में बसे हुए हैं। उनका चेहरा देखने से ही अफ्रीकी मूल स्पष्ट है। आज भी उनकी उपाधियां वही हैं, जो ग्रीक भाषा में खनिजों के नाम हैं। किन्तु बाहरी लोगों को मूल निवासी तथा मूल निवासियों को बाहरी बना दिया। हिरण्यगर्भ सूक्त में स्पष्ट लिखा है-यस्य विश्वे हिमवन्तो महित्वा (ऋक्, १०/१२१/६)-भारत के हिमालय का ही वर्णन है। केवल भारत की नदियों का ही उल्लेख है। फुले ने अंग्रेज गुरुओं से भी अधिक झूठ का प्रचार किया कि केवल ब्राह्मण बाहर से आये थे। यह मूर्खता तथा झूठ की सीमा है। केवल ब्राह्मणों का समाज १ दिन भी नहीं चल सकता है। उनके भोजन के लिए खेती कौन करेगा, घर कौन बनायेगा, पानी के लिए कुंआ कौन खोदेगा? ब्राह्मण समाज स्वयं ही नहीं जीवित रह सकता, दूसरों को कैसे पराजित कर सकता है? उनकी नकल में चितपावन अपने को ग्रीक, शाकद्वीपी अपने को मिस्र, आस्ट्रेलिया या दक्षिण यूरोप का बता रहे हैं, जहां इसका कोई उल्लेख नहीं है कि केवल ब्राह्मणों का समाज वहां था।

दधीचि. मनुष्य दधीचि

दधीचि
१. मनुष्य दधीचि-
च्यवन मुनि तथा उनकी पत्नी सुकन्या के पुत्र आत्मवान् तथा दधीचि थे (ब्रह्माण्ड पुराण, २/३/१/९३, वायु पुराण, ६५/९०) अन्यत्र इनको अथर्वा एवं चित्ति का पुत्र दध्यङ् या अन्य नाम अश्वशिरा कहा गया है (भागवत पुराण, ४/१/४२) वैराजक कल्प में वैराज मनु से दधीचि की उत्पत्ति हुई, उसके बाद गायत्री ने उनकी कामना की जिससे स्निग्ध स्वर की उत्पत्ति हुई। (वायु, पुराण, २१/४१) यह आधिदैविक वर्णन लगता है। दधीचि की पत्नी सरस्वती से सारस्वत नामक पुत्र हुआ (ब्रह्माण्ड पुराण, २/३/१/९३)। अन्यत्र इनकी पत्नी का नाम गभस्तिनी कहा है (ब्रह्म पुराण, २/४०/५)। गभस्तिमान् भारत के ९ खण्डों में सबसे पूर्व का खण्ड गभस्तिमान (पपुआ-न्यूगिनी) था, किन्तु यहां की नदी गभस्ति को अग्नि या शक द्वीप (आस्ट्रेलिया) में कहा है (मत्स्य पुराण१२२/३४, विष्णु पुराण, २/४/६६)। संभवतः उनकी पत्नी वहां की होगी। अन्य पत्नीसुवर्चा या सुभद्रा से पिप्पलाद का जन्म हुआ जिनके नाम से अथर्व वेद की पिप्पलाद संहिता है (शिव पुराण, ३/२४, स्कन्द पुराण अध्याय, ७/१/३१+)
दधीचि के विषय में सबसे प्रसिद्ध कथा है कि वृत्र असुर के वध के लिए इन्होंने इन्द्र को अपनी अस्थियां दी थी, जिनसे वज्र बना (पद्म पुराण, १/१९/७५, ब्रह्म पुराण, २/४०/५, भागवत पुराण, ६/१०, विष्णु धर्मोत्तर पुराण, १/२०७/२३, स्कन्द पुराण अध्याय, ६/८)। अन्य मुख्य कथा है कि इन्होंने दक्ष यज्ञ में शिव की पूजा करने के लिए कहा था, तथा नहीं होने पर वहां से निकल गये थे (कूर्म पुराण अध्याय, १/१५, वायु पुराण, ३०/१०२, शिव पुराण, २/२/२७, स्कन्द पुराण, ४/२/८७/६८)। स्वश्रेष्ठता विवाद में इनकी राजा क्षुब से पराजय हुई थी। मृत्युञ्जय मन्त्र से अमरता की प्राप्ति हुई। क्षुब के समर्थन में आये विष्णु को भी पराजित किया (शिव पुराण, २/२/३८-३९)। 
२. आध्यात्मिक अर्थ-
डॉ. फतह सिंह-आनन्दमय कोश के आनन्द को पय: या दुग्ध कहते हैं। जब इस पय: या आनन्द का विज्ञानमय कोश में अवतरण होता है तो यह विकृत होकर दधि बन जाता है । वहां जो जीवात्मा इस दधि को धारण करता है उसे दध्यङ्ग कहते हैं। जब यह जीवात्मा विज्ञानमय से निचले - मनोमय, प्राणमय और अन्नमय स्तरों पर दधि रूपी आनन्द बिखेरता है तो वह दधिक्रावा अश्व कहलाता है । दध्यङ्ग ही पुराणों का दधीचि ऋषि है । वह जीवात्मा जो दधिक्रा - दधि से युक्त है, उसकी अस्थियों से वज्र बनता है । अस्थि अर्थात् अस्ति । वज्र: - वर्जनात्, अर्थात् जो अहंकार की वर्जना करता है ।
रसो वै पयः (शतपथ ब्राह्मण, ४/४/४/८, ७/३/१/४६)-सं ते पयांसि (वाज. यजु, १२/११३)
(अग्निः) तां (गां) सम्बभूव तस्यां (गवि) रेतः प्रासिञ्चत् तत् पयो अभवत् (शतपथ ब्राह्मण, २/२/४/५)
तस्मात् प्रथम दुग्धं (पयः) उष्णं भवति अग्नेः हि रेतः (शतपथ ब्राह्मण, २/२/४/१५)
समानजन्म वै पयस्य हिरण्यं च-उभयं हि अग्नि रेतसम् (शतपथ ब्राह्मण, ३/२/४/८)
(इन्द्रः) यत् अब्रवीत्, हिनोति, मेति तस्मात् दधि (शतपथ ब्राह्मण, १/६/४/८)
ऐन्द्रं वै दधि (शतपथ ब्राह्मण, ५/२/४/१३)
इन्द्रियं वै दधि (तैत्तिरीय ब्राह्मण, २/१/५/६)
सोमो वै दधि (कौषीतकि ब्राह्मण, ८/९)
सरस्वत्यै दधि (शतपथ ब्राह्मण, ४/२/५/२२)
देवपवित्रं वै दधिक्रा (ऐतरेय ब्राह्मण, ६/३६)
अन्नं वै दधिक्रा (गोपथ ब्राह्मण, उत्तर, ६/१६)
दध्यङ् वा आङ्गिरसो देवानां पुरोधानीय आसीत् (ताण्ड्य महाब्राह्मण, १२/८/६)
वाक वै दध्यङ् आथर्वणः (शतपथ ब्राह्मण, ६/४/२/३)-वाज. यजु, ११/३३
दधि-
(इन्द्रः) यद् अब्रवीत्, हिनोति, मेति तस्मात् दधि (शतपथ ब्राह्मण, १/६/४/८)
ऐन्द्रं वै दधि (शतपथ ब्राह्मण, ७/४/१/४२)
अथ यद् अनडुह्यै वहलाया ऽऐन्द्रं दधि भवति, त इन्द्रस्य चतुर्थो भागः (शतपथ ब्राह्मण, ५२/४/१३)
इन्द्रियं वै दधि (तैतिरीय ब्राह्मण, २/१/५/६)
इन्द्रियं वा एतत्, अस्मिन् लोके यत् दधि (ऐतरेय ब्राह्मण, ८/१९)
३. आधिदैविक अर्थ-
सृष्टि का मूल स्रोत रस था जिसकी अनुभूति से आनन्द मिलता है, अतः उसे आनन्द भी कहते हैं।
यद् वै तत् सुकृतं, रसो वै सः। रसं लब्ध्वा आनन्दी भवति (तैत्तिरीय उपनिषद्, २/७/२)
यह रस सदा आकाश में बना रहता है, अतः अमृत है। इसका चतुर्थ भाग विश्व बनता है, जो बनता और नष्ट होता रहता है। रस से द्रप्स (बुद्बुद्, बुलबुला, अंग्रेजी में drops) जैसा मुक्त हुआ अतः उसे मुच्यु या परोक्ष में मृत्यु कहते हैं। द्रप्स के अलग होने को स्कन्न (स्कन्द) भी कहते हैं। 
पादोऽस्य विश्वा भूतानि, त्रिपादस्यामृतं दिवि (पुरुष सूक्त, वाज. यजु, ३१/३)
द्रप्सश्चस्कन्द प्रथमाँ अनु द्यूनिमं च योनिमनु यश्च पूर्वः॥ (ऋक्, १०/१७/११, वाज. यजु, १३/५)
यस्ते द्रप्सः स्कन्दति॥१२॥ (ऋक्, १०/१७/१२)
स समुद्रात् अमुच्यत स मुच्युः अभवत्, तं वा एतं मुच्युं सन्तं मृत्युः इति आचक्षते। (गोपथ ब्राह्मण, पूर्व, १/७)
मूल स्रोत स्वयम्भू, परमेष्ठी (ब्रह्माण्ड, गैलेक्सी) अपेक्षाकृत स्थायी तथा अमृत हैं। उसमें अस्थायी सूर्य मृत है जिसका तपने से क्षरण हो रहा है। उस अमृत परमेष्ठी में सूर्य अपने ग्रहों (सौरमण्डल = रथ या सरीर) के साथ परिक्रमा कर रहा है।
एष एव मृत्युः । य एष (सूर्यः) तपति (शतपथ ब्राह्मण, २/३/३/७)
आकृष्णेन रजसा वर्तमानो, निवेशयन् अमृतं मर्त्यं च।
हिरण्ययेन सविता रथेन देवो याति भुवनानि पश्यन्॥ 
(ऋग्वेद, १/३५/२, वाज यजु, ३३/४३, तैत्तिरीय सं, ३/४/११/२)
ब्रह्माण्ड में नक्षत्रों का समूह दधि जैसा ठोस कणों से युक्त है, अतः वह दधि है। उसका आवरण उसे शक्ति देता है, वह मधु है। ब्रह्माण्ड का समुद्र घृत या सरस्वती है। अमावास्या रात्रि में यही दीखता है, अतः सरस्वती को अमावास्या भी कहा है।
रेतो वै घृतम् (शतपथ ब्राह्मण, ९/२/३/४४)
रेतः सिक्तिः वै घृतम् (कौषीतकि ब्राह्मण, १६/५)
सरस्वत्यै दधि, मित्रावरुणयोः पयस्या (शतपथ ब्राह्मण, ४/२/५/२२)- ब्रह्माण्ड का आदित्य = वरुण, सौर मण्डल का आदित्य = मित्र। 
अमावास्या वै सरस्वती (गोपथ ब्राह्मण, उत्तर, १/१२)
घृत अलग होने पर मधु बचता है-परमो रसो यत् मधु (शतपथ ब्राह्मण, ११/५/४/८)
परमं वा एतद् अन्नाद्यं यत् मधुः (ताण्ड्य महाब्राह्मण, १३/११/१७)
निर्माण क्रम-रस = अमृत। द्रप्स रूप ब्रह्माण्ड = घृत। उसमें निर्माण क्रिया = मधु। नक्षत्र समूह = सरस्वती या दधि।
४. सौर मण्डल-
इसका बाह्य आवरण अमृत है, जो सदा बना रहता है। इसके भीतर गैस पिण्ड घृत हैं। ग्रहों में सौर ऊर्जा से गति, जीवन धारण आदि मधु है। सौर ऊर्जा के प्रयोग को मधु विद्या कहा गया है। (छान्दोग्य उपनिषद्, अध्याय ३, खण्ड १) ठोस ग्रहों का क्षेत्र दधि है, जिसमें पृथ्वी सबसे बड़ी है और हमारा लोक है। पुराणों में मंगल कक्षा को ही दधि-समुद्र कहा गया है, पृथ्वी से देखने पर मंगल कक्षा वलयाकार दीखेगी, जिसका आकार दधि समुद्र कहा है।
दधि ह एव अस्य लोकस्य रूपम्, घृतं अन्तरिक्षस्य, मधु अमुष्य (शतपथ ब्राह्मण, ७/५/१/३)
५. इन्द्र का वज्र- 
वैदिक मन्त्र है कि दधीचि की हड्डियों से इन्द्र का वज्र बना, जिससे इन्द्र ने वृत्रों का सामना किया, ९९ को मारा।
इन्द्रो दधीचो अस्थभिर्वृत्राण्यप्रतिष्कुतः। जघान नवतिर्नव॥
(ऋग्वेद, १/८४/१३, अथर्व सं २०/१४/१, सामवेद, १/१७६, २/२६३, मैत्रायणी सं. २/१३/६, १५४/१०, काण्व सं. ३९/१२, तैत्तिरीय ब्राह्मण, १/५/८/१)
इन्द्र का आयुध वज्र है। इन्द्र आकाश में ऊर्जा है, 
दध्यङ् या आङ्गिरस देवों के पुरोधा (अग्रणी, पुरोहित) थे।
दध्यङ् वा आङ्गिरसो देवानां पुरोधानीय आसीत् (ताण्ड्य महाब्राह्मण, १२/८/६)
(यजु, ११/३३) वाक् वै दध्यङ् आथर्वणः (शतपथ ब्राह्मण, ६/४/२/३) = अग्नि का प्रवाह अङ्गिरा (अंगारा) है। उसका वाक् (आकाश गुण) या क्षेत्र दध्यङ् आथर्वण है। इन धामों के प्राण देव हैं। इस अर्थ में देवों का आरम्भ दध्यङ् से होता है। अथर्व = ब्रह्म (बिना थर्व या कम्पन। 
महाभारत, सभा पर्व, (२४/१९), शान्ति पर्व (१५/१५) में भी इन्द्र द्वारा वृत्र या ९९ असुरों का वध का वर्नन है। इन्द्र जैसी महानता दिखाने के लिए बौद्ध ग्रन्थ दिव्यावदान में भी मौर्य अशोक द्वारा अपने ९९ भाइयों की हत्या कर राजा बनने का उल्लेख किया है।
मनुष्य रूप में देवराज इन्द्र द्वारा वृत्र के वध के लिए दधीचि की हड्डी का कोई उपयोग नहीं था। हड्डी से कठोर पत्थर बिना प्रयास मिल जाते हैं। इस कथा का अनुकरण कर इतिहास में प्रस्तर युग से पूर्व अस्थि-युग की कल्पना की गयी है। जयशंकर प्रसाद ने भारत-महिमा काव्य (चन्द्रगुप्त नाटक, द्वितीय अंक) में इसका अस्थि युग के इतिहास के रूप में वर्णन किया है-
सुना है दधीचि का वह त्याग, हमारी जातीयता विकास। 
पुरन्दर ने पवि से है लिखा, अस्थि-युग का मेरा इतिहास॥
वज्र का अर्थ है विद्युत्-स्फुलिंग। 
ह्रादिनी वज्रं अस्त्रीः स्यात् कुलिशं भिदुरं पविः। शतकोटिः स्वरुः शंबो दम्भोलिः अशनि द्वयोः॥ 
(अमर कोष, १/१/४२-इन्द्र वज्र के नाम)
स्फुर्जथुः वज्र निर्घोषे, मेघज्योतिः इरम्मदः। (अमरकोष, १/३/१०)
यह विद्युत् स्फुलिंग से प्रहार का यन्त्र था-या आज ले लेजर गन जैसा। इसका मनुष्य की हड्डी से कोई सम्बन्ध नहीं है।
सौर मण्डल में सूर्य का विकिरण इन्द्र है, जहां तक इसका विकिरण अन्धकार रूपी वृत्र को दूर करता है, वज इन्द्र का वज्र है जो धाम का आच्छादन करता है।  यह ३३ धाम तक है। मनुष्य के मेरुदण्ड में भी ३३ जोड़ हैं, इस अर्थ में यह मेरुदण्ड जैसा है। त्रिष्टुप् छन्द के ३ चरणों में ३३ अक्षर हैं, अतः इसे त्रिष्टुप् भी कहा गया है।
वज्रो वै त्रिष्टुप् (शतपथ ब्राह्मण, ७/४/२/२४)
वज्रो वै शरः (शतपथ ब्राह्मण, ३/१/३/१३, ३/२/१/१३)
वज्रो वै वषट्कारः (शतपथ ब्राह्मण, १/३/३/१४, ऐतरेय ब्राह्मण, ३/८, कौषीतकि ब्राह्मण, ३/५, गोपथ ब्राह्मण, उत्तर, ३/१, ५) = सौर मण्डल के ३३ धाम ६ भाग में विभक्त हैं, जिनको वषट्कार कहते हैं। ३० धाम तक सूर्य की वाक् (प्रभाव) है जहां तक उसका प्रकाश अधिक है (वि-राजते)
त्रिंशद् धाम वि-राजते। वाक् पतङ्गाय धीयते। प्रति वस्तोः अह द्युभिः॥ (ऋक्, १०/१८९/३)
वाक् वै षट्, ऋतवो वै षट् --- (शतपथ ब्राह्मण, १/७/२/२१)
एष एव वषट्कारो य एष (सूर्यः) तपति (शतपथ ब्राह्मन, १/७/२/११, ११/२/२/५ आदि)
३ धाम पृथ्वी के भीतर तथा पृथ्वी से आरम्भ कर अगले धाम क्रमशः २-२ गुणा बड़े हैं।
पृथिव्यामिमे लोकाः (पृथ्वी, अन्तरिक्ष, द्यौ)प्रतिष्ठिताः(जैमिनीय ब्राह्मण उपनिषद्, १/१०/२)
द्वात्रिंशतं वै देवरथाह्न्यन्ययं लोकस्तं समन्तं पृथिवी द्विस्तावत्पर्येति तां समन्तं पृथिवीं द्विस्तावत्समुद्रः पर्येति..... (बृहदारण्यक उपनिषद्, ३/३/२)
अन्तो वै त्रयस्त्रिंशः परमो वै त्रयस्त्रिंश स्तोमानाम्। (ताण्ड्य महाब्राह्मण, ३/३/२)
संवत्सरो वाव प्रतिष्ठा त्रयस्त्रिंशः (वाज. यजु, १४/२३, शतपथ ब्राह्मण, ८/४/१/२२)-१ संवत्सर में प्रकाश जितनी दूर जाता है, वहां तक सौर मण्डल है (१ प्रकाश वर्ष त्रिज्या)
त्रयो वै वषट्कारा वज्रो धामच्छदरिक्तः (ऐतरेय ब्राह्मन, ३/७, गोपथ ब्राह्मण, उत्तर, ३/३)
३३ धाम के प्राण ३३ देव हैं। प्रति धाम में ३-३ असुर हैं, जो इन्द्र रूपी किरण, प्रकाश, ऊर्जा को रोकते हैं
घेरने वाला अन्धकार वृत्र है-
वृत्रो ह वा इदं सर्वं वृत्वा शिश्ये। (शतपथ ब्राह्मण, १/१/३/४)
पाप्मा वै वृत्रः ( शतपथ ब्राह्मण, १/६/३/९)
नमुचि दिन-रात, शुष्क-आर्द्र आदि का भेद मिटा कर छिप जाता है।
अपां फेनेन नमुचेः शिर इन्द्रोदवर्तयः, विश्वा यदजयः स्पृधः (ऋक्. ८/१४/१३), 
पाप्मा वै नमुचिः (शतपथ ब्राह्मण, १२/७/३/४) 
इन्द्रश्च वै नमुचिश्चासुरः समदधातान्न नौ नक्तान्न दिवाहनन् आर्द्रेण न शुष्केणेति तस्य व्युष्टायामनुदित आदित्ये अपां फेनेन शिरो अछिनत् (ताण्ड्य महाब्राह्मण, १२/६/८)
बल वह है जो बलन करे-मोड़ दे। भौतिक विज्ञान में यह बल की परिभाषा है-जो वस्तुओं की गति या दिशा बदल दे। जिस दिशा में कार्य होना है, वह नहीं हो पाता। बल के कारण कई पिण्ड साथ बन्ध जाते हैं (सह) या शव जैसे निष्क्रिय हो जाते हैं।
बलं वै सहः (शतपथ ब्राह्मण, ६/६/२/१४)
बलं वै शवः (यजु, १२/१०६, १८/५१)-शतपथ ब्राह्मण (७/३/१/२९, ९/४/४/३) 
इन्द्र वज्र से ये ३ x ३३ = ९९ असुर मारे जाते हैं। 
६. दधिवामन-
(१) शालग्राम शिला-जिस शालग्राम शिला में २ छोटे चक्र हों-
अतिक्षुद्रं द्विचक्रं च नवीनजलदप्रभम्। दधिवामनाभिधं ज्ञेयं गृहीणां च सुखप्रदम्॥६३॥
(ब्रह्मवैवर्त्त पुराण, प्रकृति खण्ड, २१/६३)
(२) विष्णु का एक रूप-विष्णु के १० नामों में एक जिनके जप से मनुष्य नीरोग रहता है-
विष्णुं नारायणं कृष्णं माधवं मधुमूदनम् ।
हरिं नरहरिं रामं गोविन्दं दधिवामनम्॥४६॥
भक्त्या चेमानि नामानि दश भद्राणियो जपेत् ।
शतकृत्यो भक्तियुक्तो जप्त्वा नीरोगतां व्रजेत्॥४७॥ 
(ब्रह्मवैवर्त्त पुराण, श्रीकृष्ण जन्म खण्ड, अध्याय ८२)
दधिवामन संज्ञोऽहं भक्तानां दधिभक्तदः। यन्नामस्मरणादेव न दरिद्रो नरो भवेत्॥१९९॥
(स्कन्द पुराण, काशी खण्ड, अध्याय ६१)
(३) सुन्दर रूप-वामन-वाम = सेवनीय, धन, वननीय (निरुक्त, ६/३१, ऋक्, ४/३०/३४)
वामदेव-ज्ञान दाता-भुवो ऽविता वामदेवस्य धीनाम् (ऋक्, ४/१६/१८)
महादेव-वामदेवो महादेवः विरूपाक्शः त्रिलोचनः (अमर कोश, १/१/३२)
(४) शरीर का केन्द्र-सौर मण्डल का सूर्य का शरीर है। उसका केन्द्र सूर्य उससे बहुत छोटा अर्थात् वामन है। मंगल तक ठोस ग्रहों का क्षेत्र भी सौर मण्डल की तुलना में बहुत छोटा है, वह दधिवामन है। यह सूर्य केन्द्र से १९ अहर्गण पर है, अतः १९ अंश उत्तर अक्षांश पर ओड़िशा में दधिवामन मन्दिर हैं।
मनुष्य शरीर रूपी रथ में उसकी आत्मा वामन है, जिसके दर्शन से मुक्ति होती है। इसका भौतिक रूप रथ यात्रा में रथ पर स्थित वामन रूप जगन्नाथ का दर्शन है। इसे ३ प्रकार से देखते हैं- (क) क्रिया रूप यज्ञ-यह दिन-मास या वर्ष के चक्र में होता है, जो दोलन है। यज्ञ का प्रतीक गो है, उसका पालन कर्ता जगन्नाथ गोविन्द हैं।
(ख) हमारा विश्व पृथ्वी रूपी मञ्च पर स्थित है, जो मधु-कैटभ के मेद से बनी। इस रूप में जगन्नाथ मधुसूदन अर्थात् मधु को मारने वाले हैं। मधु निकट लाता है, अर्थात् आकर्षण क्रिया, कैटभ अवाञ्छित या कटु को दूर करता है।
(ग) विश्व या शरीर के प्राण रूपी आत्मा सूक्ष्म आत्मा या वामन हैं। 
पुर = नगर या कोई भी रचना, मनुष्य शरीर।
अष्टाचक्रा नवद्वारा देवानां पूरयोध्या (अथर्व, १०/२/३१)
नवद्वारे पुरे देही हंसो लेलायते बहिः।
वशी सर्वस्य लोकस्य स्थावरस्य चरस्य च॥ (श्वेताश्वतर उपनिषद्, ३/१८)
गतिशील पुर को रथ कहा है-
आत्मानं रथिनं विद्धि, शरीरं रथमेव तु। बुद्धिं तु सारथिं विद्धि, मनः प्रग्रहमेव च॥३॥
इन्द्रियाणि हयानाहुर्विषयांस्तेषु गोचरान्। आत्मेन्द्रियमनोयुक्तं भोक्तेत्याहुर्मनीषिणः॥४॥
(कठोपनिषद्, १/३/३-४)
= शरीर रथ है, इसका रर्थी या स्वामी आत्मा है। बुद्धि सारथी या चालक है, जो मन रूपी प्रग्रह (पगहा, रस्सी) से इन्द्रिय रूपी अश्वों को नियन्त्रित कर रहा है। इन्द्रिय तथा मन द्वारा आत्मा इसका उपभोग कर रहा है।
ऊर्ध्वं प्राणमुन्नयत्यपानं प्रत्यगस्यति। मध्ये वामनमासीनं विश्वे देवा उपासते॥।३॥
(कठोपनिषद्, २/२/३)
रथ यात्रा का वर्णन स्कन्द पुराण, वैष्णव खण्ड, उत्कल खण्ड, अध्याय ३३ में है। इस सम्बन्ध में एक प्रसिद्ध श्लोक प्राचीन कोषों शब्द कल्पद्रुम तथा वाचस्पत्यम् में रथ शब्द के अर्थ में उद्धृत है। इस तरह के कुछ महत्त्वपूर्ण श्लोकों को बाद के पुराण संस्करणों से निकाल दिया गया जो १८९० ई तक थे।
दोलायमानं गोविन्दं मञ्चस्थं मधुसूदनम्। रथस्थं वामनं दृष्ट्वा पुनर्जन्म न विद्यते। 
= जो दोलायमान गोविन्द को, मञ्च स्थित मधुसूदन को, तथा रथ में स्थित वामन को देखता है, उसका पुनर्जन्म नहीं होता।
(घ) दधि वामन शरीर का ठोस आधार अस्थि है, जो दधीचि के आध्यात्मिक अर्थ में कहा गया है।

Friday, 9 October 2026

प्रेमानंद महाराज रसिक बिहारी

पीलू बाबा के प्रवचन किसको लुभाते है ????? 
       ये एक बडा सवाल है । और क्यों पीलू मशहूर हुआ ???? पीलू ने लवगुरू बनकर प्रेम की वो महिमा गाई कि पूछो ही मत । 

रसिक बनो , निकुंज मे प्रेमी का सहचरी संग प्रेमालाप ही प्रेम है । रस , भाव , सहचरी , रसिक , सौंदर्य ,राधा का नाप जपे जाओ । इसने लफंडर स्त्री एवं पुरूषो को प्रेम नाम पर एक स्वछंदता पर मुहर लगा दी ।     
     लंपट स्त्री-पुरूष अपने विवाहेत्तर और विवाह पूर्व के सेक्सुअल आकर्षण वाले रिश्ते को प्रेम कहकर उसकी स्वीकार्यता पर मचल उठे । बचा खुचा काम आज के Oyo होटलो ने पूरा कर दिया । 

          चारो तरफ राधे ही राधे गूँज रहा है । जो जितना चरित्रहीन , कुंठित और Sex deprived वो उतना ही कुटिलतापूर्वक राधे राधे जपता है । 

          कहाँ ले जा रहा था रे बाबा इस समाज को ??? चोदन पीटन और प्रेम के नाम पर , Oyo कल्चर की तरफ ?????

   बस जपते रहो राधे राधे , सौंदर्य , रस , भाव , छवि , आकर्षक , मोहक , प्रेम मे विछोह , दुख , तकलीफ । साले नपुंसको का समाज तैयार करने का इरादा था क्या ????

     शोर्य , दृढता , वीरता , दुशमनो का बेदर्दी से संहार , पुरूषार्थ , दिलेरी , वीरोचित अभिमान , जैसा एक भी शब्द आज तक इसके मुँह से नही निकला । 

     ये समाज का कोढ , माला फेरते , पुरूषार्थ विहीन , कमजोर मनोवृति के लगातार नाम रटन्तू जाॅम्बियो की फौज बनाने निकला था वीरभूमि ब्रज और पूरे देश को । 

          कुल मिलाकर इसकी पूरी बकचोदियो का सार निकाला जाये तो क्या दिया है ,पिछले दो ढाई साल मे देश और समाज को ?????

          राधा सबसे बडी शक्ति है ,जबकि वो एक काल्पनिक चरित्र है । 

दूसरा , बस नाम चपते रहो , नाम जपते जाओ । बीच मे कभी अढैया नाम के बालक की झूठी कहानी , तो कभी श्रंगार , प्राण प्यारी , सुंदर रूप , रसिक और रसिया , प्रियतमा और सहचरी । बस प्रेम के नाम पर सात खून माफ । 

       साला सगे भाईयो , मौसी की बेटी बेटो , चचेरी बहन , ताऊ की बेटी , पडोसन , विवाहेत्तर संबंधो को आतुर रसिक प्रवृति के लोगो को सामाजिक मान्यता दिलाने को ही प्रयासरत दिखा ये पीलूराम । सारी नौटंकी राधा के नाम पे । 

एक सच्ची घटना सुनो , मेरी कंपनी का एक हवलदार था । नोएडा -टप्पल क्षेत्र का । साले ने जयहिंद बोलना छोडकर , जब देखो राधे राधे । 

         राधे राधे भी बडी कुटिल टाईप मुस्कान के साथ , सिर झुकाकर बोले । हर कोई साले को नाम रखे ,मगर कुत्ते की पूँछ सीधी हो जाये तो फिर पूँछ ही कैसी ????

   उसकी इसी नौटंकी से किलसकर , मैने उसे कशमीर से दिल्ली मे अपनी एक कंपनी मे भेज दिया ।  

   भाई की 60 लाख रूपये की ताजा ताजा जमीन बिकी थी । दिल्ली मे अपनी सगी साली की युवा मगर विधवा बेटी को , किराये के कमरे मे रखकर लुगाई बना लिया और उसे फोर्स करो कि तू मेरे नाम का सिंदूर लगा । 

            साढू और साली समझते रहे कि , मौसा बेचारी लडकी की मदद कर रहा है । बीवी भी कुछ ना कहे । 

    वो लडकी भी पक्की खिलाडी निकली , मौसा तो हफ्ते मे एक दिन आकर चढता था , बाकी टाईम मे वो अपने यार बुला लेती , इसको भनक लगती , आगबबूला होता , मारपीट करता , फोन चैक करता । 

        इतना नीच इंसान की उसी भाँजी के साथ अंतरंग वीडियो काॅल करता , और आस पास ड्यूटी करते नये जवानो को दिखाता । उन जवानो पर ताना मारता कि सालो थू है तुम्हारी जवानी पे , जवानी कच्छे मे ही सूख रही है । 

         नंगे भद्दे वीडियो सबको दिखाता उसे अपनी गर्लफ्रैंड बताता ,जबकि थी उसकी सगी भाँजी । 

         एक दिन उस लडकी ने बलात्कार की कंपलेन कर दी अपने किसी दूसरे यार के कहने पर । ये फौरन दिल्ली से भागकर , कशमीर मे प्रकट हुआ । वही लुच्चो की तरह हर बात मे राधे राधे । 

   माँ के मरने का बहाना बनाकर तुरंत छुट्टी भागने को आतुर । मै भी साले की बातो मे आ गया । 

        सुबह से छुट्टी मिकला , शाम को कोर्ट के अरेस्ट वारंट सहित दो दिल्ली पुलिस के सब इंस्पेक्टर हाजिर । मेरे आफिस मे बैठकर पूरा वृतांत सुनायै तो मेरे भी हाथो के तोते उड गये । हावांकि उसकी भाव-भंगिमा पर शक तो पहले से था । 

          ये भाई साहब , 15 दिन की छुट्टी गये तो फिर लौटकर नही आये , कई महीनो बाद कोर्ट मे सेरेंडर किया । एक गढवाली लेडीज I.O. थी 12 लाख उसको चढाये , 40 लाख का फ्लैट उस प्रेयसी को दिलवाया । 2024 तक तो साल जेल मे ही था । इधर विभाग ने Removed from service कर दिया । बिल्कुल मेरी आँखो देखी और भुगती हुई स्टोरी है । उसके बाद मै भी चंडीगढ चला आया । पता नही फिर उस हराम के पिल्ले का क्या बना । 

आप भी अपने आस पास जरा नजर दौडा कर देखिये , बात बात मे हद से ज्यादा , कुटिलता के साथ मुस्कुरा कर राधे -राधे बोलने वाले , ज्यादातर सैक्स मैनियाक , कुंठित , ठरकी , वासना मे डूबे हुए , और लंपट लोग ही मिलेंगें । 

        मेरा अनुभव तो ऐसा ही है , आप लोगो का पता नही ।