Tuesday, 6 October 2026

ध्यान

(Re-Posted after 10years) (केवल नये साधकों के लिए) 
भ्रूमध्य का स्थान अवधान का भूखा है ---
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यह मेरा व्यक्तिगत विचार भी है और चैतन्य में भगवती का आदेश भी है| हर साधक को नित्य अनंत असीम रूप में अपनी चेतना का विस्तार कर परमशिव का ध्यान और अर्थ सहित गीता के पाँच श्लोकों का पाठ क्रमशः नित्य अवश्य करना चाहिए| जब परमात्मा से प्रेम हो जाए तब भ्रूमध्य में परमात्मा के प्रियतम रूप का ध्यान करना चाहिए| बलात् प्रयास विफल होंगे| जब ह्रदय में प्रेम और समर्पण का भाव होगा तभी सफलता मिलेगी| ब्रह्ममुहूर्त का समय ध्यान के लिए सर्वश्रेष्ठ है|
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शुद्ध स्थान पर उचित वातावरण में ऊनी आसन बिछाकर पूर्व या उत्तर की ओर मुंह कर के सुख से बैठ जाएँ| कमर सीधी रहे| गुरु रूप परमात्मा को प्रणाम कर उनसे मार्गदर्शन और सहायता की प्रार्थना कीजिये| फिर गुरु-प्रदत्त विधि से ध्यान करें| जिन्हें गुरु लाभ नहीं मिला है, वे अपने इष्ट देव/देवी से या भगवान श्रीकृष्ण से प्रार्थना करें| भगवान श्रीकृष्ण सब गुरुओं के गुरु हैं| उनसे की गई प्रार्थना का उत्तर निश्चित रूप से मिलता है|
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कुछ प्राणायाम करें और कमर सीधी रखते हुए देह को तनाव रहित शिथिल छोड़ दें| कमर सीधी रहे इसके लिए नित्य दिन में दो बार पश्चिमोत्तानासन का अभ्यास करें| इस से जीवन भर कमर सीधी रहेगी, कभी नहीं झुकेगी| सूर्य-नमस्कार का नित्य अभ्यास भी शरीर को स्वस्थ रखेगा| भ्रूमध्य में एक प्रकाश के कण की कल्पना कर के उसे समस्त अनंतता में फैला दें और यह भाव करें कि मैं यह देह नहीं बल्कि वह अनंतता हूँ, स्वयं परमात्मा ही इस देह से साँस ले रहे हैं और वे ही ध्यान कर रहे हैं| हम तो उनके एक उपकरण मात्र हैं| जो विचार आयें उन्हें आने दो, जो जाते हैं उन्हें जाने दो| तटस्थ रहो| सब कामनाओं को तिरोहित कर दो|
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सर्वाधिक महत्व इस भाव का है कि हम क्या हैं, इस भाव का अधिक महत्व नहीं है कि हम क्या कर रहे हैं| हम परमात्मा के प्रेम और उनकी अनंतता हैं, न कि यह देह| गुरु-प्रदत्त बीज मंत्र का या प्रणव का जप करो, फिर उसे सुनने का अभ्यास करते रहो| जितना हमारे ह्रदय में प्रभु के प्रति प्रेम होगा उतनी ही तीब्र गति से हम आगे बढ़ते रहेंगे और उसी अनुपात में परमात्मा से सहायता प्राप्त होगी| अजपा-जप का अभ्यास करें| इस युग के लिए यही सर्वश्रेष्ट आरंभिक साधना है|
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रात्रि को सोने पूर्व भी गहन ध्यान करें फिर परमात्मा की गोद में निश्चिन्त होकर सो जाएँ| दिन का आरम्भ भी भगवान के ध्यान से करें, और पूरे दिन उन्हें स्मृति में रखें| भूल जाएँ तो याद आते ही फिर स्मरण करना आरम्भ कर दें| आरंभ में यह भाव रखो कि हम सब कुछ भगवान के लिए कर रहे हैं, फिर भगवान को ही कर्ता बनाकर जीवन की नौका उन्हीं के हाथों में सौंप दो|
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हमारा आचरण सद आचरण हो, यह सबसे महत्वपूर्ण बिंदु है| यदि हमारे आचरण में शुद्धता नहीं रही तो आसुरी शक्तियाँ हमारे ऊपर अधिकार करने का पूरा प्रयास करेंगी| यदि जीवन में पवित्रता नहीं है तो ध्यान साधना का अभ्यास मत करें| इससे लाभ की बजाय हानि ही होगी|
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कुछ लोग पूछते हैं कि ध्यान से क्या मिलेगा? मेरा उत्तर है कि ध्यान से कुछ भी नहीं मिलेगा, जो कुछ है वह भी चला जाएगा| सारी विषय-वासनाएँ और कामनाएँ समाप्त होने लगेंगी और आप इस दुनियाँ के भोगों के लायक नहीं रहेंगे| जिन्हें कुछ चाहिए वे ध्यान न करें| ध्यान उनके लिए है जो सब कुछ परमात्मा को सौंप देना चाहते हैं| ध्यान से कोई सांसारिक लाभ नहीं है, सिर्फ आध्यात्मिक लाभ ही हैं|
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ध्यान कोई क्रिया नहीं है, यह तो एक अक्रिया है| क्रिया-योग साधना तो प्रत्याहार है जिसके बाद धारणा और ध्यान है| परमात्मा से प्रेम सबसे महत्वपूर्ण है| बिना प्रेम के कोई सफलता नहीं मिलेगी| हमें आरम्भ तो करना चाहिए फिर भगवान निश्चित रूप से मार्ग-दर्शन करेंगे| भगवान भाव के भूखे है, हमारे ह्रदय की पुकार को वे अवश्य सुनेंगे|
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अपनी चेतना को भ्रूमध्य में रखने का प्रयास करें| वह स्थान अवधान का भूखा है| आगे का मार्गदर्शन स्वयं परमात्मा करेंगे| जो कुछ भी मेरे द्वारा लिखा गया है वह तो एक रूपरेखा मात्र है, इसमें मेरी कोई महिमा नहीं है| किसी भी आध्यात्मिक साधना का एकमात्र फल है परमात्मा की शरणागति और समर्पण| अन्य किसी भी लाभ की आकांक्षा है तो आध्यात्मिक साधना न करें|
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भोजन नियम

भर्तुर्भोजनसमये पत्नया समीपे न स्थेयम् ।
पति के भोजन करने के समय पत्नी को उसके समीप नहीं रहना चाहिए।

तथा च याज्ञवल्क्यः -
याज्ञवल्क्य कहते हैं—

न भार्यादर्शनेऽश्नीयान्नैकवासा न संस्थितः ।।
पत्नी के सामने भोजन नहीं करना चाहिए और न ही एक ही वस्त्र में उसके सामने बैठना चाहिए।

पत्नयाः सन्निधाने दोषमाह श्रुतिः -जायाया अन्ते नाश्नीया दवीर्यवदपत्यं भवतीति ।।
श्रुति में पत्नी की उपस्थिति में भोजन करने का दोष बताया गया है—पत्नी के समीप भोजन नहीं करना चाहिए, क्योंकि ऐसा करने से दुर्बल वीर्य वाली सन्तान उत्पन्न होती है।

परिवेषणसमये अन्नादिकं हस्तेन न परिवेषणीयम् ।।
भोजन परोसते समय अन्न आदि पदार्थ हाथ से नहीं परोसने चाहिए।

तथा च शातातपः -
शातातप कहते हैं—

हस्तदत्तानि चान्नानि प्रत्यक्षलवणं तथा । मृत्तिकाभक्षणं चैव गोमांसाभ्यशनं स्मृतम् ।।
हाथ से दिया हुआ अन्न, प्रत्यक्ष रूप से हाथ से दिया हुआ नमक, मिट्टी का भक्षण तथा गोमांस का सेवन—इन सबको अनुचित माना गया है।

लवणं व्यञ्जनं चैव घृतं तैलं तथैव च । लेह्यं पेयं च विविधं हस्तदत्तं न भक्षयेत् ।।
नमक, व्यञ्जन, घी, तेल तथा विभिन्न प्रकार के लेह्य और पेय पदार्थ हाथ से दिए हुए हों तो उनका सेवन नहीं करना चाहिए।

यमः - हस्तदत्ता तु या मिक्षा लवणव्यञ्जनानि च । भोक्ता ह्यशुचितां याति दाता स्वर्ग न गच्छति ।।
यम कहते हैं—हाथ से दी हुई भिक्षा तथा नमक और व्यञ्जन का सेवन करने वाला अशुचिता को प्राप्त होता है और उन्हें देने वाला स्वर्ग को प्राप्त नहीं होता।

हस्तदत्तास्तु ये स्नेहा लवणव्यञ्जनानि च । दातारं नोपतिष्ठते भोक्ता भुञ्जीत किल्विषम् ।।
हाथ से दिए हुए स्नेहद्रव्य, नमक और व्यञ्जन देने वाले को प्राप्त नहीं होते तथा उनका सेवन करने वाला पाप का भागी होता है।

अत्रिः-- घृतं वा यदि वा तैलं ब्राह्मण्या नखनिस्सृतम् । अभोज्यं तद्विजानीयात् भुत्क्त्वा चांद्रायणं चरेत् ।।
अत्रि कहते हैं—यदि घी अथवा तेल ब्राह्मणी के नख से निकला हुआ हो तो उसे अभोज्य समझना चाहिए। उसका सेवन कर लेने पर चान्द्रायण व्रत करना चाहिए।

आपस्तंबः -- घृतं तैलं च लवणं पानीयं पायसं तथा । मिक्षा च हस्तदत्ता तु न ग्राह्या यत्र कुत्रचित् ।।
आपस्तम्ब कहते हैं—घी, तेल, नमक, पानी और पायस आदि के सम्बन्ध में हाथ से दी हुई भिक्षा कहीं भी ग्रहण नहीं करनी चाहिए।

तस्मादन्तर्हितं चान्नं पर्णेन च तृणेन वा ।।
इसलिए अन्न को पत्ते अथवा तृण से ढककर रखना चाहिए।

प्रदद्यान्न तु हस्तेनेति ।।
अन्न हाथ से नहीं देना चाहिए।

तच्च परिवेषणं दर्व्यादिना कर्तव्यम् ।।
भोजन का परोसना दर्वी आदि साधन से करना चाहिए।

तथा चापस्तंवः -दर्व्या देयं कृतानं च समस्तव्यञ्जनानि चेति ।।
आपस्तम्ब कहते हैं—पका हुआ अन्न और सभी प्रकार के व्यञ्जन दर्वी से देने चाहिए।

उदकादेः अदर्व्या परिवेषणे दोषमाह स एव -
जल आदि को दर्वी के अतिरिक्त किसी अन्य साधन से परोसने के दोष को वे ही बताते हैं—

उदकं यच्च पक्वान्नं योऽदर्व्या दातुमिच्छति । स भ्रूणहा सुरापश्च स स्तेनो गुरुतल्पगः ।।
जो व्यक्ति जल अथवा पका हुआ अन्न दर्वी के अतिरिक्त किसी अन्य साधन से देना चाहता है, वह भ्रूणहन्ता, सुरापान करने वाला, चोर और गुरुपत्नीगमन करने वाले के समान दोष का भागी होता है।

तैलपक्वमपक्वं च न तु दर्ज्या कदाचन ।। इति ।।
तेल में पका हुआ अथवा कच्चा पदार्थ भी कभी दर्वी से नहीं देना चाहिए।

आयसेन पात्रेण परिवेषणे दोषमाह पराशरः-
पराशर लोहे के पात्र से भोजन परोसने के दोष को बताते हैं—

आयसेन तु पात्रेण यदन्नमुपदीयते । शुनोच्छिष्टमसौ भुंक्ते दाता तु नरकं व्रजेत् ।।
लोहे के पात्र से जो अन्न परोसा जाता है, उसे ग्रहण करने वाला कुत्ते के जूठे अन्न के समान भोजन करता है और उसे देने वाला नरक को प्राप्त होता है।

अयःपात्त्रमयोग्यं स्यात् स्नानाचमनकर्मसु ।। इति ।।
लोहे का पात्र स्नान और आचमन के कार्यों के लिए अनुपयुक्त माना गया है।

परिवेषणसमये एकपंत्क्त्युपविष्टानां स्नेहादिना विषमपरिवेषण न कर्तव्यम् ।
भोजन परोसते समय एक ही पंक्ति में बैठे हुए लोगों को स्नेह, भय अथवा धन आदि के कारण असमान रूप से भोजन नहीं परोसना चाहिए।

तथा च वसिष्ठः -
वसिष्ठ कहते हैं—

यस्त्वेकपङ्क्त्यां विषमं ददाति स्नेहाद्भयाद्वा यदि वार्थहेतोः ।वेदेषु दृष्टमृषिभिश्च गीतं तां ब्रह्महत्यां मुनयो वदन्ति ॥
जो व्यक्ति एक ही पंक्ति में बैठे लोगों को स्नेह, भय अथवा धन के कारण असमान रूप से भोजन देता है, उस कर्म को मुनिजन ब्रह्महत्या के समान बताते हैं। ऐसा वेदों में देखा गया है और ऋषियों द्वारा भी कहा गया है।

स्कान्दे- स्त्रीणां हि परमश्चैको नियमस्समुदाहृतः । अभ्यर्च्य चरणौ भर्तुः भोक्तव्यमिति निश्चयः ॥ इति ॥
स्कन्दपुराण में कहा गया है—स्त्रियों के लिए एक प्रमुख नियम बताया गया है कि वे पति के चरणों की पूजा करके भोजन करें।

भर्तुर्भुक्तोच्छिष्टं पत्नथा भोक्तव्यम् ।
पत्नी को पति के भोजन से बचे हुए अन्न का सेवन करना चाहिए।

तथा च मनुः -
मनु कहते हैं—

पीत्वाऽऽपोशनमश्नीयात् पात्रदत्तमगर्हितम् । भार्याभृतकदासेभ्यः उच्छिष्टं शेषयेत् ततः ।( भुक्तभिन्न पात्रेषु शेषभोजनमुच्छिष्टम्)
आचमन के लिए जल पी लेने के बाद पात्र में दिया हुआ निन्दित न होने वाला भोजन करना चाहिए और उसके बाद पत्नी, भृत्य तथा दास आदि के लिए भोजन का कुछ अंश बचाकर रखना चाहिए। भिन्न पात्र में भोजन करने के बाद बचा हुआ भोजन ‘उच्छिष्ट’ कहलाता है।

व्यासः - सेवेत भर्तुरुच्छिष्टमन्नपानफलादिकम् । महान् प्रसाद इत्युक्त्वा पतिदत्तं प्रतीच्छती ।।
व्यास कहते हैं—पत्नी को पति के बचे हुए अन्न, पेय, फल आदि का सेवन करना चाहिए और पति द्वारा दिए गए उस अवशेष को ‘महान् प्रसाद’ कहकर ग्रहण करना चाहिए।

भर्तुर्भोजनानन्तरमेव स्त्रिया भोजनमाह व्यासः -देवतातिथिभृत्यानां निर्वाप्य पतिना सह । शेषान्नमुपभुञ्जाना यथान्यायं यथाविधि ।। तुष्टपुष्टजना नित्यं नारी धर्मेण युज्यते ।। इति ।।
व्यास कहते हैं—स्त्री को पति के भोजन करने के बाद ही भोजन करना चाहिए। देवता, अतिथि और भृत्यों के लिए भोजन का अंश निकालकर, पति के साथ शेष अन्न को उचित रीति और विधि के अनुसार ग्रहण करने वाली स्त्री के घर में लोग सदा सन्तुष्ट और पुष्ट रहते हैं तथा वह धर्म से युक्त होती है।

स्वभोजनसमये स्त्रीभिज्येष्ठादेव्यै बलिदानं कर्तव्यम् । तथाच मनुः-
अपने भोजन के समय स्त्री को ज्येष्ठा देवी के लिए बलि अर्पित करनी चाहिए। मनु कहते हैं—

न ददाति च या नारी ज्येष्ठायै प्रत्यहं बलिम् । भोज्यादन्नाद्यथाशक्ति सा प्रेत्य नरकं व्रजेत् ।।
जो स्त्री प्रतिदिन अपनी सामर्थ्य के अनुसार भोजन आदि में से ज्येष्ठा देवी को बलि नहीं देती, वह मृत्यु के बाद नरक को प्राप्त होती है।

अवश्यमेव नारीभीर्ज्येष्ठायै बलिकर्मणा । प्रीणनं प्रत्यहं कार्य पुत्रपौत्रधनेप्सुभिः ।॥ इति ।।
पुत्र, पौत्र और धन की इच्छा रखने वाली स्त्रियों को प्रतिदिन बलि-कर्म के द्वारा ज्येष्ठा देवी को प्रसन्न करना चाहिए।

भर्त्रयुक्तमन्नपानादि पत्नया वर्जनीयम् । तथा च व्यासः -यच्च भर्ता न पिबति यच्च भर्ता न खादति । यच्च भर्ता न चाश्नाति तत् सर्वं वर्जयेत् सती ।। इति ।।
पत्नी को उन अन्न-पान आदि पदार्थों का त्याग करना चाहिए जिन्हें पति त्याग देता है। व्यास कहते हैं—

यच्च भर्ता न पिबति यच्च भर्ता न खादति । यच्च भर्ता न चाश्नाति तत् सर्वं वर्जयेत् सती ।।
पति जिस पेय को नहीं पीता, जिस खाद्य पदार्थ को नहीं खाता और जिस भोजन को ग्रहण नहीं करता, उस सबका सती स्त्री को भी त्याग करना चाहिए।

स्त्रिया भर्तारं विहाय मृष्टमन्नं न भोक्तव्यम् ।
स्त्री को पति को छोड़कर उत्तम अथवा स्वादिष्ट भोजन नहीं करना चाहिए।

तथा च स्कान्दे-या भर्तारं परित्यज्य मृष्टमश्नाति केवलम् । ग्रामे सा सूकरी भूया द्वल्गुली वा स्वविट्भुजा ।।
स्कन्दपुराण में कहा गया है—जो स्त्री पति को छोड़कर अकेले उत्तम भोजन करती है, वह अगले जन्म में सूकरी अथवा अपने ही मल का भक्षण करने वाली अन्य निम्न योनि में जन्म लेती है।

पश्यति प्रिये पत्नया न भोक्तव्यम् ।
पति के देखते हुए पत्नी को भोजन नहीं करना चाहिए।

तथा च व्यासः - भोजनं वमनं निद्रां परिधानं च वाससाम् । प्रारंभं मण्डनानां च न कुर्यात् पश्यति प्रिये ।। इति ।।
व्यास कहते हैं—जब पति देख रहा हो, तब पत्नी को भोजन करना, वमन करना, निद्रा लेना, वस्त्र धारण करना तथा आभूषण आदि धारण करने का आरम्भ नहीं करना चाहिए।
श्रीमती हैमवती 
❗जय महादेव❗
 ⭕प्रश्न नहीं स्वाध्याय करें‼️

Monday, 5 October 2026

श्री सूक्त साधना विधि

*नवरात्रि में लक्ष्मी प्राप्ति हेतु यह अनुष्ठान करे*
श्री सूक्त अर्थात श्री सूक्तम्  देवी लक्ष्मी की अराधना करने हेतु उनको समर्पित मंत्र हैं।इसे ‘लक्ष्मी सूक्तम्’  भी कहते हैं।यह सूक्त ऋग्वेद से लिया गया है।श्री सूक्त  का पाठ धन-धान्य की अधिष्ठात्री, देवी लक्ष्मी की कृपा प्राप्ति के लिए किया जाता है। श्री सूक्तम  का पाठ यश, सुख-समृद्धि ऐश्वर्य प्राप्ति का अचूक उपाय है । इस उपाय का प्रचलन अति प्राचीन काल से होता रहा है।
श्री सूक्त ऋग्वेदोक्त सिद्ध मंत्र हैं। श्री सूक्त में सोलह मंत्र है , इसके प्रत्येक सूक्त या मन्त्र में कुछ ऐसा गूढ़ रहस्य,चमत्कार है जिनसे अथाह धन-सम्पत्ति की प्राप्ति संभव है। यदि माँ का भक्त इसे पूर्ण श्राद्ध एवं विधि पूर्वक नित्य प्रात: पढे तो उसका भाग्य चमकने लगता है, शुभ समाचारो की प्राप्ति होती है, समस्त कार्यो में श्रेष्ठ सफलता मिलने लगती है, अकस्मात् धन लाभ के भी योग बनते है। श्री सूक्तम् के शुभ फलो में जरा भी संदेह की गुंजाइस नहीं है।
मान्यता है कि लक्ष्मी माता की कृपा प्राप्त करने का इससे अमोघ और सरल उपाय कोई भी नहीं है। चाहे कुंडली में कैसे भी ग्रह बैठे हो , कितनी भी विपरीत परिस्थितियां क्योँ ना हो,पिछले कई जन्मो के कैसे भी पाप हो सब कट जाते है , ना केवल इस जन्म में वरन आने वाले जन्मो में भी सुख-समृद्धि प्राप्त होती है,जातक की आने वाली पीढ़ियाँ भी सुख समृद्धि को प्राप्त करती है।
श्री सूक्तम् का पाठ पूर्व अथवा उत्तर दिशा में मुख करके सफ़ेद / गुलाबी आसान पर बैठकर करना चाहये । श्री सूक्तम् पढ़ने से पहले माँ लक्ष्मी के सामने घी का दीपक जलाकर, रोली / कुमकुम का तिलक करके कमल / लाल गुलाब / लाल गुड़हल का पुष्प अर्पित करें एवं प्रशाद चढ़ाएं।
श्री सूक्तम् देवी लक्ष्मी की आराधना करने हेतु उनको समर्पित मंत्र हैं। इसे 'लक्ष्मी सूक्तम्' भी कहते हैं। यह सूक्त ऋग्वेद से लिया गया है। इस सूक्त का पाठ धन-धान्य की अधिष्ठात्री, देवी लक्ष्मी की कृपा प्राप्ति के लिए किया जाता है
श्रीसूक्त पाठ विधि 
[ श्रीसूक्त के इस प्रयोग को हृदय अथवा आज्ञा चक्र में करने से सर्वोत्तम लाभ होगा, अन्यथा सामान्य पूजा प्रकरण से ही संपन्न करें 
🔅 प्राणायाम आचमन आदि कर आसन पूजन करें,
विनियोग:- ॐ अस्य श्री आसन पूजन महामन्त्रस्य कूर्मो देवता मेरूपृष्ठ ऋषि पृथ्वी सुतलं छंद: आसन पूजने विनियोग:। 
[ विनियोग हेतु जल भूमि पर गिरा दें I ]
🔅 पृथ्वी पर रोली से त्रिकोण का निर्माण कर इस मन्त्र से पंचोपचार पूजन करें,
ॐ पृथ्वी त्वया धृता लोका देवी त्वं विष्णुनां धृता I
त्वां च धारय मां देवी पवित्रां कुरू च आसनं II
ॐ आधारशक्तये नम: । ॐ कूर्मासनायै नम: ।
ॐ पद्‌मासनायै नम: । ॐ सिद्धासनाय नम: ।
ॐ साध्य सिद्धसिद्धासनाय नम:।
- तदुपरांत गुरू गणपति गौरी पित्र व स्थान देवता आदि का स्मरण व पंचोपचार पूजन कर श्री चक्र के सम्मुख पुरुष सूक्त का एक बार पाठ करें।
🔅निम्न मन्त्रों से करन्यास करें,
ॐ ऐं ह्रीं श्रीं ऐं क ए ई ल ह्रीं अंगुष्ठाभ्याम नमः ।
ॐ ऐं ह्रीं श्रीं क्लीं ह स क ह ल ह्रीं तर्जनीभ्यां स्वाहा ।
ॐ ऐं ह्रीं श्रीं सौं स क ल ह्रीं मध्यमाभ्यां वष्‌ट ।
ॐ ऐं ह्रीं श्रीं ऐं क ए ई ल ह्रीं अनामिकाभ्यां हुम्‌ ।
ॐ ऐं ह्रीं श्रीं क्लीं ह स क ह ल ह्रीं कनिष्ठिकाभ्यां वौषट ।
ॐ ऐं ह्रीं श्रीं सौं स क ल ह्रीं करतल करपृष्ठाभ्यां फट्‌।
🔅निम्न मन्त्रों से षड़ांग न्यास करें,
ॐ ऐं ह्रीं श्रीं ऐं क ए ई ल ह्रीं हृदयाय नमः ।
ॐ ऐं ह्रीं श्रीं क्लीं ह स क ह ल ह्रीं शिरसे स्वाहा ।
ॐ ऐं ह्रीं श्रीं सौं स क ल ह्रीं शिखायै वष्‌ट ।
ॐ ऐं ह्रीं श्रीं ऐं क ए ई ल ह्रीं कवचायै हुम्‌ ।
ॐ ऐं ह्रीं श्रीं क्लीं ह स क ह ल ह्रीं नेत्रत्रयाय वौषट ।
ॐ ऐं ह्रीं श्रीं सौं स क ल ह्रीं अस्त्राय फट्‌ ।
श्री पादुकां पूजयामि नमः बोलकर शंख के जल से अर्घ्य प्रदान करते रहें ।
श्री चक्र के बिन्दु चक्र में निम्न मन्त्रों से गुरू पूजन करें :-
ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री गुरू पादुकां पूजयामि नमः ।
ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री परम गुरू पादुकां पूजयामि नमः ।
ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री परात्पर गुरू पादुकां पूजयामि नमः ।
श्री चक्र महात्रिपुरसुन्दरी का ध्यान करके योनि मुद्रा का प्रदर्शन करते हुए पुन: इस मन्त्र से तीन बार पूजन करें :- ॐ श्री ललिता महात्रिपुर सुन्दरी श्री विद्या राज राजेश्वरी श्री पादुकां पूजयामि नमः।
अथ श्रीसूक्तम् 
श्रीसूक्त का विधिवत पाठ करें।
हिरण्यवर्णां हरिणीं सुवर्णरजतस्रजाम् ,
चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आवह ॥१॥
भाबार्थ :- हे जातवेदा (सर्वज्ञ) अग्निदेव! सुवर्ण के समान पीले रंगवाली, किंचित हरितवर्ण वाली, सोने और चांदी के हार पहनने वाली, चांदी के समान धवल पुष्पों की माला धारण करने वाली, चन्द्र के समान प्रसन्नकान्ति, स्वर्णमयी लक्ष्मीदेवी को मेरे लिए आवाहन करो (बुलाइए)।
तां म आवह जातवेदो लक्ष्मीमनपगामिनीम् ।
यस्यां हिरण्यं विन्देयं गामश्वं पुरुषानहम् ॥२॥
भाबार्थ :- हे अग्निदेव! आप उन जगत प्रसिद्ध लक्ष्मीजी को, जिनका कभी विनाश नहीं होता तथा जिनके आगमन से मैं सोना, गौ, घोड़े तथा पुत्रादि को प्राप्त करुंगा, मेरे लिए आवाहन करो
अश्वपूर्वां रथमध्यां हस्तिनादप्रबोधिनीम् ।
श्रियं देवीमुपह्वये श्रीर्मा देवी जुषताम् ॥३॥
भाबार्थ :- जिन देवी के आगे घोड़े तथा उनके पीछे रथ रहते हैं अथवा जिनके सम्मुख घोड़े रथ में जुते हुए हैं, ऐसे रथ में बैठी हुई, हाथियों के निनाद से प्रमुदित होने वाली, देदीप्यमान एवं समस्तजनों को आश्रय देने वाली लक्ष्मीजी को मैं अपने सम्मुख बुलाता हूँ। दीप्यमान व सबकी आश्रयदाता वह लक्ष्मी मेरे घर में सर्वदा निवास करें।
कां सोस्मितां हिरण्यप्राकारामार्द्रां ज्वलन्तीं तृप्तां तर्पयन्तीम् ।
पद्मे स्थितां पद्मवर्णां तामिहोपह्वये श्रियम् ॥४
भाबार्थ :- जो साक्षात् ब्रह्मरूपा, मन्द-मन्द मुसकराने वाली, जो चारों ओर सुवर्ण से ओत-प्रोत हैं, दया से आर्द्र हृदय वाली या समुद्र से प्रादुर्भूत (प्रकट) होने के कारण आर्द्र शरीर होती हुई भी तेजोमयी हैं, स्वयं पूर्णकामा होने के कारण भक्तों के नाना प्रकार के मनोरथों को पूर्ण करने वाली, भक्तानुग्रहकारिणी, कमल के आसन पर विराजमान तथा पद्मवर्णा हैं, उन लक्ष्मीदेवी का मैं यहां आवाहन करता हूँ।
चन्द्रां प्रभासां यशसा ज्वलन्तीं श्रियं लोके देवजुष्टामुदाराम् ।
तां पद्मिनीमीं शरणमहं प्रपद्येऽलक्ष्मीर्मे नश्यतां त्वां वृणे ॥५
भाबार्थ :- मैं चन्द्र के समान शुभ्र कान्तिवाली, सुन्दर, द्युतिशालिनी, यश से दीप्तिमती, स्वर्गलोक में देवगणों के द्वारा पूजिता, उदारशीला, पद्महस्ता, सभी की रक्षा करने वाली एवं आश्रयदात्री लक्ष्मीदेवी की शरण ग्रहण करता हूँ। मेरा दारिद्रय दूर हो जाय। मैं आपको शरण्य के रूप में वरण करता हूँ अर्थात् आपका आश्रय लेता हूँ।
आदित्यवर्णे तपसोऽधिजातो वनस्पतिस्तव वृक्षोऽथ बिल्वः ।
तस्य फलानि तपसानुदन्तु मायान्तरायाश्च बाह्या अलक्ष्मीः ॥६
भाबार्थ :- हे सूर्य के समान कान्ति वाली! तुम्हारे ही तप से वृक्षों में श्रेष्ठ मंगलमय बिना फूल के फल देने वाला बिल्ववृक्ष उत्पन्न हुआ। उस बिल्व वृक्ष के फल हमारे बाहरी और भीतरी (मन व संसार के) दारिद्रय को दूर करें
उपैतु मां देवसखः कीर्तिश्च मणिना सह ।
प्रादुर्भूतोऽस्मि राष्ट्रेऽस्मिन् कीर्तिमृद्धिं ददातु मे ॥७।।
भाबार्थ :- हे लक्ष्मी! देवसखा (महादेव के सखा) कुबेर और उनके मित्र मणिभद्र अर्थात् चिन्तामणि तथा दक्ष प्रजापति की कन्या कीर्ति मुझे प्राप्त हों। अर्थात् मुझे धन और यश की प्राप्ति हो। मैं इस राष्ट्र में–देश में उत्पन्न हुआ हूँ, मुझे कीर्ति और ऋद्धि प्रदान करें।
क्षुत्पिपासामलां ज्येष्ठामलक्ष्मीं नाशयाम्यहम् ।
अभूतिमसमृद्धिं च सर्वां निर्णुद मे गृहात् ॥८
भाबार्थ :- लक्ष्मी की ज्येष्ठ बहिन अलक्ष्मी (दरिद्रता की अधिष्ठात्री देवी) का, जो क्षुधा और पिपासा से मलिन–क्षीणकाय रहती हैं, मैं नाश चाहता हूँ। देवि! मेरे घर से सब प्रकार के दारिद्रय और अमंगल को दूर करो।
गन्धद्वारां दुराधर्षां नित्यपुष्टां करीषिणीम् ।
ईश्वरींग् सर्वभूतानां तामिहोपह्वये श्रियम् ॥९
भाबार्थ :- सुगन्धित पुष्प के समर्पण करने से प्राप्त करने योग्य, किसी से भी दबने योग्य नहीं, धन-धान्य से सर्वदा पूर्ण, गौ-अश्वादि पशुओं की समृद्धि देने वाली, समस्त प्राणियों की स्वामिनी तथा संसार प्रसिद्ध लक्ष्मीदेवी का मैं यहां–अपने घर में आवाहन करता हूँ।
मनसः काममाकूतिं वाचः सत्यमशीमहि ।
पशूनां रूपमन्नस्य मयि श्रीः श्रयतां यशः ॥१०
भाबार्थ :- हे लक्ष्मी देवी! आपके प्रभाव से मन की कामनाएं और संकल्प की सिद्धि एवं वाणी की सत्यता मुझे प्राप्त हों; मैं गौ आदि पशुओं के दूध, दही, यव आदि एवं विभिन्न अन्नों के रूप (भक्ष्य, भोज्य, चोष्य, लेह्य, चतुर्विध भोज्य पदार्थों) को प्राप्त करुँ। सम्पत्ति और यश मुझमें आश्रय लें अर्थात् मैं लक्ष्मीवान एवं कीर्तिमान बनूँ
कर्दमेन प्रजाभूता मयि सम्भव कर्दम ।
श्रियं वासय मे कुले मातरं पद्ममालिनीम् ॥११
भाबार्थ :- लक्ष्मी के पुत्र कर्दम की हम संतान हैं। कर्दम ऋषि! आप हमारे यहां उत्पन्न हों (अर्थात् कर्दम ऋषि की कृपा होने पर लक्ष्मी को मेरे यहां रहना ही होगा) मेरे घर में लक्ष्मी निवास करें। पद्मों की माला धारण करने वाली सम्पूर्ण संसार की माता लक्ष्मीदेवी को हमारे कुल में स्थापित कराओ।
आपः सृजन्तु स्निग्धानि चिक्लीत वस मे गृहे ।
नि च देवीं मातरं श्रियं वासय मे कुले ॥१२॥
भाबार्थ :- समुद्र-मन्थन द्वारा चौदह रत्नों के साथ लक्ष्मी का भी आविर्भाव हुआ है। इसी अभिप्राय में कहा गया है कि वरुण देवता स्निग्ध पदार्थों की सृष्टि करें। पदार्थों में सुन्दरता ही लक्ष्मी है। लक्ष्मी के आनन्द, कर्दम, चिक्लीत और श्रीत–ये चार पुत्र हैं। इनमें चिक्लीत से प्रार्थना की गयी है। हे लक्ष्मीपुत्र चिक्लीत! आप भी मेरे घर में वास करें और दिव्यगुणयुक्ता तथा सर्वाश्रयभूता अपनी माता लक्ष्मी को भी मेरे कुल में निवास करायें।
आर्द्रां पुष्करिणीं पुष्टिं पिङ्गलां पद्ममालिनीम् ।
चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आवह ॥१३
भाबार्थ :- हे अग्निदेव! हाथियों के शुण्डाग्र से अभिषिक्त अतएव आर्द्र शरीर वाली, पुष्टि को देने वाली अर्थात् पुष्टिरूपा, पीतवर्णा, पद्मों (कमल) की माला धारण करने वाली, चन्द्रमा के समान शुभ्र कान्ति से युक्त, स्वर्णमयी लक्ष्मीदेवी का मेरे घर में आवाहन करें।
आर्द्रां यः करिणीं यष्टिं सुवर्णां हेममालिनीम् ।
सूर्यां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आवह ॥१४।।
भाबार्थ :- हे अग्निदेव! जो दुष्टों का निग्रह करने वाली होने पर भी कोमल स्वभाव की हैं, जो मंगलदायिनी, अवलम्बन प्रदान करने वाली यष्टिरूपा हैं (जिस प्रकार लकड़ी के बिना असमर्थ पुरुष चल नहीं सकता, उसी प्रकार लक्ष्मी के बिना संसार का कोई भी कार्य ठीक प्रकार नहीं हो पाता), सुन्दर वर्णवाली, सुवर्णमालाधारिणी, सूर्यस्वरूपा तथा हिरण्यमयी हैं (जिस प्रकार सूर्य प्रकाश और वृष्टि द्वारा जगत का पालन-पोषण करता है, उसी प्रकार लक्ष्मी ज्ञान और धन के द्वारा संसार का पालन-पोषण करती है), उन प्रकाशस्वरूपा लक्ष्मी का मेरे लिए आवाहन करें
तां म आवह जातवेदो लक्ष्मीमनपगामिनीम् ।
यस्यां हिरण्यं प्रभूतं गावो दास्योऽश्वान् विन्देयं पूरुषानहम् ॥१५॥
भाबार्थ :- हे अग्निदेव! कभी नष्ट न होने वाली उन स्थिर लक्ष्मी का मेरे लिए आवाहन करें जो मुझे छोड़कर अन्यत्र नहीं जाने वाली हों, जिनके आगमन से बहुत-सा धन, उत्तम ऐश्वर्य, गौएं, दासियां, अश्व और पुत्रादि को हम प्राप्त करें।
यः शुचिः प्रयतो भूत्वा जुहुयादाज्यमन्वहम् ।
सूक्तं पञ्चदशर्चं च श्रीकामः सततं जपेत् ॥१६॥
भाबार्थ :- जिसे लक्ष्मी की कामना हो, वह प्रतिदिन पवित्र और संयमशील होकर अग्नि में घी की आहुतियां दे तथा इन पंद्रह ऋचाओं वाले–’श्री-सूक्त’ का निरन्तर पाठ करे।
(श्री-सूक्त में पन्द्रह ऋचाएं हैं। माहात्म्य सहित सोलह ऋचाएं मानी गयी हैं क्योंकि किसी भी स्तोत्र का बिना माहात्म्य के पाठ करने से फल प्राप्ति नहीं होती। अत: सोलह ऋचाओं का पाठ करना चाहिए। ऋग्वेद में वर्णित श्री-सूक्त के द्वारा जो भी श्रद्धापूर्वक लक्ष्मी का पूजन करता है, वह सात जन्मों तक निर्धन नहीं होता।)
श्री लक्ष्मी सूक्त 
श्री लक्ष्मीसूक्तम्‌ पाठ 
पद्मानने पद्मिनि पद्मपत्रे पद्मप्रिये पद्मदलायताक्षि।
विश्वप्रिये विश्वमनोऽनुकूले त्वत्पादपद्मं मयि सन्निधत्स्व॥
- हे लक्ष्मी देवी! आप कमलमुखी, कमल पुष्प पर विराजमान, कमल-दल के समान नेत्रों वाली, कमल पुष्पों को पसंद करने वाली हैं। सृष्टि के सभी जीव आपकी कृपा की कामना करते हैं। आप सबको मनोनुकूल फल देने वाली हैं। हे देवी! आपके चरण-कमल सदैव मेरे हृदय में स्थित हों।
पद्मानने पद्मऊरू पद्माक्षी पद्मसम्भवे।
तन्मे भजसिं पद्माक्षि येन सौख्यं लभाम्यहम्‌॥
- हे लक्ष्मी देवी! आपका श्रीमुख, ऊरु भाग, नेत्र आदि कमल के समान हैं। आपकी उत्पत्ति कमल से हुई है। हे कमलनयनी! मैं आपका स्मरण करता हूँ, आप मुझ पर कृपा करें।
अश्वदायी गोदायी धनदायी महाधने।
धनं मे जुष तां देवि सर्वांकामांश्च देहि मे॥
- हे देवी! अश्व, गौ, धन आदि देने में आप समर्थ हैं। आप मुझे धन प्रदान करें। हे माता! मेरी सभी कामनाओं को आप पूर्ण करें।
पुत्र पौत्र धनं धान्यं हस्त्यश्वादिगवेरथम्‌।
प्रजानां भवसी माता आयुष्मंतं करोतु मे॥
- हे देवी! आप सृष्टि के समस्त जीवों की माता हैं। आप मुझे पुत्र-पौत्र, धन-धान्य, हाथी-घोड़े, गौ, बैल, रथ आदि प्रदान करें। आप मुझे दीर्घ-आयुष्य बनाएँ।
धनमाग्नि धनं वायुर्धनं सूर्यो धनं वसु।
धन मिंद्रो बृहस्पतिर्वरुणां धनमस्तु मे॥
- हे लक्ष्मी! आप मुझे अग्नि, धन, वायु, सूर्य, जल, बृहस्पति, वरुण आदि की कृपा द्वारा धन की प्राप्ति कराएँ।
वैनतेय सोमं पिव सोमं पिवतु वृत्रहा।
सोमं धनस्य सोमिनो मह्यं ददातु सोमिनः॥
- हे वैनतेय पुत्र गरुड़! वृत्रासुर के वधकर्ता, इंद्र, आदि समस्त देव जो अमृत पीने वाले हैं, मुझे अमृतयुक्त धन प्रदान करें।
न क्रोधो न च मात्सर्यं न लोभो नाशुभामतिः।
भवन्ति कृतपुण्यानां भक्तानां सूक्त जापिनाम्‌॥
- इस सूक्त का पाठ करने वाले की क्रोध, मत्सर, लोभ व अन्य अशुभ कर्मों में वृत्ति नहीं रहती, वे सत्कर्म की ओर प्रेरित होते हैं।
सरसिजनिलये सरोजहस्ते धवलतरांशुक गंधमाल्यशोभे।
भगवति हरिवल्लभे मनोज्ञे त्रिभुवनभूतिकरी प्रसीद मह्यम्‌॥
- हे त्रिभुवनेश्वरी! हे कमलनिवासिनी! आप हाथ में कमल धारण किए रहती हैं। श्वेत, स्वच्छ वस्त्र, चंदन व माला से युक्त हे विष्णुप्रिया देवी! आप सबके मन की जानने वाली हैं। आप मुझ दीन पर कृपा करें।
विष्णुपत्नीं क्षमां देवीं माधवीं माधवप्रियाम्‌।
लक्ष्मीं प्रियसखीं देवीं नमाम्यच्युतवल्लभाम॥
- भगवान विष्णु की प्रिय पत्नी, माधवप्रिया, भगवान अच्युत की प्रेयसी, क्षमा की मूर्ति, लक्ष्मी देवी मैं आपको बारंबार नमन करता हूँ।
महादेव्यै च विद्महे विष्णुपत्न्यै च धीमहि। तन्नो लक्ष्मीः प्रचोदयात्‌॥
- हम महादेवी लक्ष्मी का स्मरण करते हैं। विष्णुपत्नी लक्ष्मी हम पर कृपा करें, वे देवी हमें सत्कार्यों की ओर प्रवृत्त करें।
चंद्रप्रभां लक्ष्मीमेशानीं सूर्याभांलक्ष्मीमेश्वरीम्‌।
चंद्र सूर्याग्निसंकाशां श्रिय देवीमुपास्महे॥
जो चंद्रमा की आभा के समान शीतल और सूर्य के समान परम तेजोमय हैं उन परमेश्वरी लक्ष्मीजी की हम आराधना करते हैं।
श्रीर्वर्चस्वमायुष्यमारोग्यमाभिधाच्छ्रोभमानं महीयते।
धान्य धनं पशु बहु पुत्रलाभम्‌ सत्संवत्सरं दीर्घमायुः॥
इस लक्ष्मी सूक्त का पाठ करने से व्यक्ति श्री, तेज, आयु, स्वास्थ्य से युक्त होकर शोभायमान रहता है। वह धन-धान्य व पशु धन सम्पन्न, पुत्रवान होकर दीर्घायु होता है।
॥इति श्रीलक्ष्मी सूक्तम्‌ संपूर्णम्‌ ॥
 श्रीसूक्तः साधना के आयाम 
श्री-सूक्त’ में 15 ऋचाएँ है । यह सूक्त ऋग्वेद संहिता के अष्टक 4, अध्याय 4, वर्ण के अन्तिम मण्डल 5 के अन्त में ‘परिशिष्ट’ के रुप में आया है । इसी को ‘खिल-सूक्त’ भी कहते हैं । निरुक्त एवं शौनक आदि ने भी इसका उल्लेख किया है । ‘खिल’ शब्द का अर्थ है – ‘अन्य शाखा में अपेक्षावश पढ़े जाने वाला पाठ’ । कहीं इस सूक्त को पदशिष्ट भी कहा गया है, जिसका तात्पर्य है – शौनक ने जिन मन्त्रों का पदपाठ नहीं किया है वह नीलकण्ठ ने अपनी व्याख्या में इस सूक्त के बारे में इसके वेद-मूलक होने का विचार किया है । सर्वानुक्रम और ऋक्संहिता – स्वाहाकार में इस सूक्त का ग्रहण नहीं हुआ है, किन्तु वैदिक कर्मकाण्ड में इसके विनियोगादि सर्वत्र मिलते हैं । वेद भाष्यकारों ने इस सूक्त के भाष्य किये हैं, अतः यह वैदिक है, यही सर्व-मान्य है। इस सूक्त पर श्रीविद्यारण्य, पृथ्वीधराचार्य, श्रीकण्ठ आदि के भाष्य हैं तथा शतानन्द वृत्ति, चिद्विलास वृत्ति, श्रीवैद्यनाथ दायगुण्डे आदि ने विधान सहित टीकाएँ लिखी है। 
इस सूक्त की सोलहवीं ऋचा फलश्रुति स्वरुप है । भाष्यकारों ने इसका भी भाष्यों में विवेचन किया है। इसके पश्चात् 17 से 25 वीं ऋचाएँ, जो फल-स्तुति रुप ही हैं, किन्तु उन्हें कुछ आचार्य ‘लक्ष्मी-सूक्त’ भी कहते हैं । सोलहवीं ऋचा के अनुसार श्रीसूक्त की प्रारम्भिक 15 ऋचाएँ कर्म-काण्ड-उपासना के लिए प्रयोज्य है । 
अतः इन 15 ऋचाओं के द्वारा ही लक्ष्मी-प्राप्ति के लिए अनेक प्रकार के आगम-तन्त्रानुसार साधना में प्रयुक्त होती है। ‘सौभाग्य-तन्त्र‘ में / ‘लक्ष्मी-तन्त्र’ में इन्हीं सूक्त की 15 ऋचाओं के अलग-अलग मन्त्र, यन्त्र और तन्त्र बतलाये हैं । यन्त्रों में एक-एक ऋचा को विभिन्न आकृतियों में लिखकर दिखाया है। अन्य आचार्यों ने समस्त श्रीसूक्त की 15 ऋचाओं को ही १५ यन्त्रों में लिखकर कतिपय बीज-मन्त्रों के साथ यन्त्र बनाने का निर्देश दिया है । 
श्री-सूक्त की प्रत्येक ऋचा को पाठात्मक, अभिषेकात्मक, जपात्मक और हवनात्मक प्रयोग भी आगमों में निर्दिष्ट है। – श्रीसूक्तानुष्ठान पद्धति अनेक आचार्यों ने श्रीसूक्त के नित्य 28,108 अथवा 1000 पाठ के विधान बतलाये हैं। एक दिन में एक हजार पाठ करने से संकल्प-सिद्धि होती है। प्रातः-काल स्नान सन्ध्या आदि करके पवित्रता पूर्वक महालक्ष्मी जी की प्रतिमा अथवा चित्र के सामने पूर्व की ओर मुंह करके आचमन, प्राणायाम और संकल्प करे। फिर चित्र में विराजमान महालक्ष्मी का ध्यान करके षोडशोपचार पूजा करे। धूप-दीप करें, खोये की मिठाई का नैवेद्य लगाये। नमस्कार और प्रदक्षिणा समर्पण करे। यह नित्य-पूजा का क्रम है। इसमें आवाहन और विसर्जन की आवश्यकता नहीं है। 
नित्य पूजा में ‘ॐ श्रीं महालक्ष्म्यै नमः’ इस मन्त्र से पूजा करें। तदनन्तर संकल्प से अनुसार श्रीसूक्त की आवृति करें। श्रीसूक्त वेदोक्त है। अतः इसे शुद्ध पाठ के रुप में सीख लेना चाहिए। पुरश्चरण विधानः- श्रीसूक्त के पाठ विधान में मुख्यतः एक-एक ऋचा का जप अथवा पूरे सूक्त के पाठों का जप होता है। किसी भी मन्त्र की सिद्धि के लिए पहले मन्त्र का पुरश्चरण अवश्य करना चाहिए। श्रीसूक्त के बारह हजार पाठ का पुरश्चरण सर्वोत्तम माना गया है। 
श्रीसूक्त के प्रयोग
[१] “श्रीं ह्रीं क्लीं।। हिरण्य-वर्णा हरिणीं, सुवर्ण रजत स्रजाम्। 
चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मीं, जातवेदो म आवह।। श्रीं ह्रीं क्लीं” 
सुवर्ण से लक्ष्मी की मूर्ति बनाकर उस मूर्ति का पूजन हल्दी और सुवर्ण-चाँदी के कमल-पुष्पों से करें। फिर सुवासिनी-सौभाग्यवती स्त्री और गाय का पूजन कर, पूर्णिमा के चन्द्र में अथवा पानी से भरे हुए कुम्भ में श्रीपरा-नारायणी का ध्यान कर, सोने की माला से कमल-पत्र के आसन पर बैठकर, ‘श्रीसूक्त’ की उक्त ‘हिरण्य-वर्णा॰॰’ ऋचा में ‘श्रीं ह्रीं क्लीं’ बीज जोड़कर प्रातः, दोपहर और सांय एक-एक हजार (१० माला) जप करे। इस प्रकार सवा लाख जप होने पर मधु और कमल-पुष्प से दशांश हवन करे और तर्पण, मार्जन तथा ब्राह्मण-भोजन नियम से करे। इस प्रयोग का पुरश्चरण ३२ लाख जप का है। सवा लाख का जप, होम आदि हो जाने पर दूसरे सवा लाख का जप प्रारम्भ करे। ऐसे कुल २६ प्रयोग करने पर ३२ लाख का प्रयोग सम्पूर्ण होता है। इस प्रयोग का फल राज-वैभव, सुवर्ण, रत्न, वैभव, वाहन, स्त्री, सन्तान और सब प्रकार का सांसारिक सुख की प्राप्ति है। 
[२] “ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं महा-लक्ष्म्यै नमः।। दुर्गे! स्मृता हरसि भीतिमशेष-जन्तोः, स्वस्थैः स्मृता मतिमतीव-शुभां ददासि। ॐ ऐं हिरण्य-वर्णां हरिणीं, सुवर्ण-रजत-स्रजाम्। चन्द्रां हिरण्यमयीं लक्ष्मीं, जातवेदो म आवह।। दारिद्रय-दुःख-भय-हारिणि का त्वदन्या, सर्वोपकार-करणाय सदाऽर्द्र-चित्ता।। ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं महा-लक्ष्म्यै नमः।।” यह ‘श्रीसूक्त का एक मन्त्र सम्पुटित हुआ। इस प्रकार ‘तां म आवह’ से लेकर ‘यः शुचिः’ तक के १६ मन्त्रों को सम्पुटित कर पाठ करने से १ पाठ हुआ। ऐसे १२ हजार पाठ करे। चम्पा के फूल, शहद, घृत, गुड़ का दशांश हवन तद्दशांश तर्पण, मार्जन तथा ब्रह्म-भोजन करे। इस प्रयोग से धन-धान्य, ऐश्वर्य, समृद्धि, वचन-सिद्धि प्राप्त होती है। 
[३] “ॐ ऐं ॐ ह्रीं।। तां म आवह जात-वेदो लक्ष्मीमनप-गामिनीम्। यस्यां हिरण्यं विन्देयं, गामश्वं पुरुषानहम्।। ॐ ऐं ॐ ह्रीं” सुवर्ण से लक्ष्मी की मूर्ति बनाकर उस मूर्ति का पूजन हल्दी और सुवर्ण-चाँदी के कमल-पुष्पों से करें। फिर सुवासिनी-सौभाग्यवती स्त्री और गाय का पूजन कर, पूर्णिमा के चन्द्र में अथवा पानी से भरे हुए कुम्भ में श्रीपरा-नारायणी का ध्यान कर, सोने की माला से कमल-पत्र के आसन पर बैठकर, नित्य सांय-काल एक हजार (१० माला) जप करे। कुल ३२ दिन का प्रयोग है। दशांश हवन, तर्पण, मार्जन तथा ब्रह्म-भोजन करे। माँ लक्ष्मी स्वप्न में आकर धन के स्थान या धन-प्राप्ति के जो साधन अपने चित्त में होंगे, उनकी सफलता का मार्ग बताएँगी। धन-समृद्धि स्थिर रहेगी। प्रत्येक तीन वर्ष के अन्तराल में यह प्रयोग करे। 
[४] “ॐ ह्रीं ॐ श्रीं।। अश्व-पूर्वां रथ-मध्यां, हस्ति-नाद-प्रबोधिनीम्। श्रियं देवीमुपह्वये, श्रीर्मा देवी जुषताम्।। ॐ ह्रीं ॐ श्रीं” उक्त मन्त्र का प्रातः, मध्याह्न और सांय प्रत्येक काल १०-१० माला जप करे। संकल्प, न्यास, ध्यान कर जप प्रारम्भ करे। इस प्रकार ४ वर्ष करने से मन्त्र सिद्ध होता है। प्रयोग का पुरश्चरण ३६ लाख मन्त्र-जप का है। स्वयं न कर सके, तो विद्वान ब्राह्मणों द्वारा कराया जा सकता है। खोया हुआ या शत्रुओं द्वारा छिना हुआ धन प्राप्त होता है। 
[५] “करोतु सा नः शुभ हेतुरीश्वरी, शुभानि भद्राण्यभिहन्तु चापदः। अश्व-पूर्वां रथ-मध्यां, हस्ति-नाद-प्रबोधिनीम्। श्रियं देवीमुपह्वये, श्रीर्मा देवी जुषताम्।। करोतु सा नः शुभ हेतुरीश्वरी, शुभानि भद्राण्यभिहन्तु चापदः।।” उक्त आधे मन्त्र का सम्पुट कर १२ हजार जप करे। दशांश हवन, तर्पण, मार्जन तथा ब्रह्म-भोजन करे। इससे धन, ऐश्वर्य, यश बढ़ता है। शत्रु वश में होते हैं। खोई हुई लक्ष्मी, सम्पत्ति पुनः प्राप्त होती है। 
[६] “ॐ श्रीं ॐ क्लीं।। कांसोऽस्मि तां हिरण्य-प्राकारामार्द्रा ज्वलन्तीं तृप्तां तर्पयन्तीम्। पद्मे स्थितां पद्म-वर्णां तामिहोपह्वये श्रियम्।। ॐ श्रीं ॐ क्लीं” उक्त मन्त्र का पुरश्चरण आठ लाख जप का है। जप पूर्ण होने पर पलाश, ढाक की समिधा, दूध और गाय के घी से हवन तद्दशांश तर्पण, मार्जन, ब्रह्म-भोज करे। इस प्रयोग से सभी प्रकार की समृद्धि और श्रेय मिलता है। शत्रुओं का क्षय होता है। 
[७] “सर्वा-बाधा-प्रशमनं, त्रैलोक्याखिलेश्वरि! एवमेव त्वया कार्यमस्मद्-वैरि-विनाशनम्।। कांसोऽस्मि तां हिरण्य-प्राकारामार्द्रा ज्वलन्तीं तृप्तां तर्पयन्तीम्। पद्मे स्थितां पद्म-वर्णां तामिहोपह्वये श्रियम्।। सर्वा-बाधा-प्रशमनं, त्रैलोक्याखिलेश्वरि! एवमेव त्वया कार्यमस्मद्-वैरि-विनाशनम्।।” उक्त सम्पुट मन्त्र का १२ लाख जप करे। ब्राह्मण द्वारा भी कराया जा सकता है। इससे गत वैभव पुनः प्राप्त होता है और धन-धान्य-समृद्धि और श्रेय मिलता है। शत्रुओं का क्षय होता है। 
[८] “ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं।।कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद महा-लक्ष्म्यै नमः।। दुर्गे! स्मृता हरसि भीतिमशेष-जन्तोः, स्वस्थैः स्मृता मतिमतीव-शुभां ददासि। कांसोऽस्मि तां हिरण्य-प्राकारामार्द्रा ज्वलन्तीं तृप्तां तर्पयन्तीम्। पद्मे स्थितां पद्म-वर्णां तामिहोपह्वये श्रियम्।। दारिद्रय-दुःख-भय-हारिणि का त्वदन्या, सर्वोपकार-करणाय सदाऽर्द्र-चित्ता।। ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं।।कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद महा-लक्ष्म्यै नमः।।” उक्त प्रकार से सम्पुटित मन्त्र का १२ हजार जप करे। इस प्रयोग से वैभव, लक्ष्मी, सम्पत्ति, वाहन, घर, स्त्री, सन्तान का लाभ मिलता है।
[९] “ॐ क्लीं ॐ वद-वद।। चन्द्रां प्रभासां यशसा ज्वलन्तीं श्रियं लोके देव-जुष्टामुदाराम्। तां पद्म-नेमिं शरणमहं प्रपद्ये अलक्ष्मीर्मे नश्यतां त्वां वृणे।। ॐ क्लीं ॐ वद-वद।।” उक्त मन्त्र का संकल्प, न्यास, ध्यान कर एक लाख पैंतीस हजार जप करना चाहिए। गाय के गोबर से लिपे हुए स्थान पर बैठकर नित्य १००० जप करना चाहिए। यदि शीघ्र सिद्धि प्राप्त करना हो, तो तीनों काल एक-एक हजार जप करे या ब्राह्मणों से करावे। ४५ हजार पूर्ण होने पर दशांश हवन तद्दशांश तर्पण, मार्जन तथा ब्रह्म-भोजन करे। ध्यान इस प्रकार है- “अक्षीण-भासां चन्द्राखयां, ज्वलन्तीं यशसा श्रियम्। देव-जुष्टामुदारां च, पद्मिनीमीं भजाम्यहम्।।” इस प्रयोग से मनुष्य धनवान होता है। 
[१०] “ॐ वद वद वाग्वादिनि।। आदित्य-वर्णे! तपसोऽधिजातो वनस्पतिस्तव वृक्षोऽथ बिल्वः। तस्य फलानि तपसा नुदन्तु मायान्तरायाश्च बाह्या अलक्ष्मीः।। ॐ वद वद वाग्वादिनि” देवी की स्वर्ण की प्रतिमा बनवाए। चन्दन, पुष्प, बिल्व-पत्र, हल्दी, कुमकुम से उसका पूजन कर एक से तीन हजार तक उक्त मन्त्र का जप करे। कुल ग्यारह लाख का प्रयोग है। जप पूर्ण होने पर बिल्व-पत्र, घी, खीर से दशांश होम, तर्पण, मार्जन, ब्रह्म-भोजन करे। यह प्रयोग ब्राह्मणों द्वारा भी कराया जा सकता है। ‘ऐं क्लीं सौः ऐं श्रीं’– इन बीजों से कर-न्यास और हृदयादि-न्यास करे। ध्यान इस प्रकार करे- “उदयादित्य-संकाशां, बिल्व-कानन-मध्यगाम्। तनु-मध्यां श्रियं ध्यायेदलक्ष्मी-परिहारिणीम्।।” प्रयोग-काल में फल और दूध का आहार करे। पकाया हुआ पदार्थ न खाए। पके हुए बिल्व-फल फलाहार में काए जा सकते हैं। यदि सम्भव हो तो बिल्व-वृक्ष के नीचे बैठकर जप करे। इस प्रयोग से वाक्-सिद्धि मिलती है और लक्ष्मी स्थिर रहती है। 
[११] “ज्ञानिनामपि चेतांसि, देवी भगवती हि सा। बलादाकृष्य मोहाय, महा-माया प्रयच्छति।। आदित्य-वर्णे तपसोऽधिजाते, वनस्पतिस्तव वृक्षोऽथ बिल्वः। तस्य फलानि तपसा नुदन्तु, मायान्तरा ताश्च बाह्या अलक्ष्मीः।। ज्ञानिनामपि चेतांसि, देवी भगवती हि सा। बलादाकृष्य मोहाय, महा-माया प्रयच्छति।।” उक्त मन्त्र का १२००० जप कर दशांश होम, तर्पण करे। इस प्रयोग से जिस वस्तु की या जिस मनुष्य की इच्छा हो, उसका आकर्षण होता है और वह अपने वश में रहता है। राजा या राज्य-कर्ताओं को वश करने के लिए ४८००० जप करना चाहिए। 
[१२] “ॐ वाग्वादिनी ॐ ऐं। उपैतु मां देवसखः, कीर्तिश्च मणिना सह। प्रादुर्भूतोऽस्मि राष्ट्रेऽस्मिन्, कीर्ति वृद्धिं ददातु मे। ॐ वाग्वादिनी ॐ ऐं।।” उक्त मन्त्र का बत्तीस लाख बीस हजार जप करे। “ॐ अस्य श्रीसूक्तस्य ‘उपैतु मां॰’ मन्त्रस्य कुबेर ऋषिः, मणि-मालिनी लक्ष्मीः देवता, अनुष्टुप् छन्दः, श्रीं ब्लूं क्लीं बीजानि ममाभीष्ट-कामना-सिद्धयर्थे जपे विनियोगः।’ इस प्रकार ‘विनियोग’, ऋष्यादि-न्यास’ कर ‘आं ह्रीं क्रों ऐं श्रीं आं ह्रं क्रौं ऐं’ इन ९ बीजों से कर-न्यास एवं ‘हृदयादि-न्यास’ करे। ध्यान- “राज-राजेश्वरीं लक्ष्मीं, वरदां मणि-मालिनीं। देवीं देव-प्रियां कीर्ति, वन्दे काम्यार्थ-सिद्धये।।” मणि-मालिनी लक्ष्मी देवी की स्वर्ण की मूर्ति बनाकर, बिल्व-पत्र, दूर्वा, हल्दी, अक्षत, मोती, केवड़ा, चन्दन, पुष्प आदि से पूजन करे। ‘श्री-ललिता-सहस्त्रनाम-स्तोत्र’ के प्रत्येक नाम के साथ ‘श्रीं’ बीज लगाकर पूजन करे। सन्ध्यादि नित्य कर्म कर प्रयोग का प्रारम्भ करे। घी का दीप और गूगल का धूप करे। द्राक्षा, खजूर, केले, ईख, शहद, घी, दाड़िम, केरी, नारियल आदि जो प्राप्त हो, नैवेद्य में दे। प्रातः और मध्याह्न में १००० और रात्रि में २००० नित्य जप करे। ढाई साल में एक व्यक्ति बत्तीस लाख बीस हजार का जप पूर्ण कर सकता है। जप करने के लिए प्रवाल की माला ले। जप पूर्ण होने पर अपामार्ग की समिधा, धृत, खीर से दशांश होम कर मार्जन और ब्रह्म-भोज करे। इस प्रयोग से कुबेर आदि देव साक्षात् या स्वप्न में दर्शन देते हैं और धन, सुवर्ण, रत्न, रसायन, औषधि, दिव्याञ्जन आदि देते हैं।
[१३] “ॐ ऐं ॐ सौः। क्षुत्-पिपासामला ज्येष्ठा, अलक्ष्मीर्नाशयाम्यहम्। अभूतिमसमृद्धिं च, सर्वान् निर्णुद मे गृहात्। ॐ ऐं ॐ सौः” उक्त मन्त्र का ३२,००० जप करे। प्रतिदिन रात्रि में वीरासन में बैठकर ३००० जप करे। ‘अग्नि-होत्र-कुण्ड’ के सम्मुख बैठकर ‘जप’ करने से विशेष फल मिलता है। रुद्राक्ष की माला से जप करे। तिल, गुड़ और घी से दशांश होम तथा तर्पण, मार्जन, ब्रह्म-भोजन करावे। ध्यान- “खड्गं स-वात-चक्रं च, कमलं वरमेव च। करैश्चतुर्भिर्विभ्राणां, ध्याये चंद्राननां श्रियम्।।” एक अनुष्ठान दस दिन में पूर्ण होगा। इस प्रकार चार अनुष्ठान पूरे करें। इस प्रयोग से शत्रु का या बिना कारण हानि पहुँचानेवाले का नाश होगा और दरिद्रता, निर्धनता, रोग, भय आदि नष्ट होकर प्रयोग करने वाला अपने कुटुम्ब के साथ दीर्घायुषी और ऐश्वर्यवान् होता है। ग्रह-दोषों का अनिष्ट फल, कारण और क्षुद्र तत्वों की पीड़ा आदि नष्ट होकर भाग्योदय होता है। 
[१४] “रोगानशेषानपहंसि तुष्टा, रुष्टा तु कामान् सकलानभीष्टान्। त्वामाश्रितानां न विपन्नराणाम्, त्वामाश्रिता ह्याश्रयतां प्रयान्ति।। क्षुत्-पिपासामला ज्येष्ठा, अलक्ष्मीर्नाशयाम्यहं। अभूतिमसमृद्धिं च, सर्वान् निर्णुद मे गृहात्। रोगानशेषानपहंसि तुष्टा, रुष्टा तु कामान् सकलानभीष्टान्। त्वामाश्रितानां न विपन्नराणाम्, त्वामाश्रिता ह्याश्रयतां प्रयान्ति।।” उक्त मन्त्र का १००० जप रात्रि में करे। २०००० जप होने पर दशांश होम-काले तिल, सुपाड़ी, राई से करे। दशांश तर्पण, मार्जन आदि करे। शत्रु के विनाश के लिए, रोगों की शान्ति के लिए और विपत्तियों के निवारण के लिए यह उत्तम प्रयोग है। शत्रु-नाश के लिए रीठे के बीज की माला से काले ऊन के आसन पर वीरासन-मुद्रा से बैठकर क्रोध-मुद्रा में जप करे। 
[१५] “ॐ सौः ॐ हंसः। गन्ध-द्वारां दुराधर्षां, नित्य-पुष्टां करीषिणीम्। ईश्वरीं सर्व-भूतानां, तामिहोपह्वये श्रियम्। ॐ सौः ॐ हंसः।।” उक्त मन्त्र का एक लाख साठ हजार जप करे। कमल-गट्टे की माला से कमल के आसन पर या कौशेय वस्त्र के आसन पर बैठकर जप करे। ‘स्थण्डिल’ पर केसर, कस्तुरी, चन्दन, कपूर आदि सुगन्धित द्रव्य रखकर श्रीलक्ष्मी देवी की मूर्ति की पूजा करे। जप पूर्ण होने पर खीर, कमल-पुष्प और तील से दशांश होम कर तर्पण, मार्जन आदि करे। इस प्रयोग से धन-धान्य, समृद्धि, सोना-चाँदी, रत्न आदि मिलते हैं और सम्पन्न महानुभावों से बड़ा मान मिलता है।
[१६] “ॐ हंसः ॐ आं। मनसः काममाकूतिं, वाचः सत्यमशीमहि। पशूनां रुपममन्नस्य, मयि श्रीः श्रयतां यशः। ॐ हंसः ॐ आं।।” उक्त मन्त्र ८ लाख जपे। ‘ऐं-लं-वं-श्रीं’- को मन्त्र के साथ जोड़कर न्यास करे। यथा- कर-न्यासः- ऐं-लं-वं-श्रीं मनसः अंगुष्ठाभ्यां नमः। ऐं-लं-वं-श्रीं काममाकूतिं तर्जनीभ्यां स्वाहा। ऐं-लं-वं-श्रीं वाचः सत्यमशीमहि मध्यमाभ्यां वषट्। ऐं-लं-वं-श्रीं पशूनां अनामिकाभ्यां हुं। ऐं-लं-वं-श्रीं रुपममन्नस्य मयि कनिष्ठिकाभ्यां वौषट्। ऐं-लं-वं-श्रीं श्रीः श्रयतां यशः करतल-कर-पृष्ठाभ्यां फट्। अंग-न्यासः- ऐं-लं-वं-श्रीं मनसः हृदयाय नमः। ऐं-लं-वं-श्रीं काममाकूतिं शिरसे स्वाहा। ऐं-लं-वं-श्रीं वाचः सत्यमशीमहि शिखायै वषट्। ऐं-लं-वं-श्रीं पशूनां कवचाय हुं। ऐं-लं-वं-श्रीं रुपममन्नस्य मयि नेत्र-त्रयाय वौषट्। ऐं-लं-वं-श्रीं श्रीः श्रयतां यशः अस्त्राय फट्। ध्यानः- तां ध्यायेत् सत्य-संकल्पां, लक्ष्मीं क्षीरोदन-प्रियाम्। ख्यातां सर्वेषु भूतेषु, तत्तद् ज्ञान-बल-प्रदाम्।। उक्त धऽयतान करे। बिल्व फल, बिल्व-काष्ठ, पलाश की समिधा, घृत, तिल, शक्कर आदि से दशांश हवन कर तर्पण, मार्जन आदि करे। इस प्रयोग से इच्छित वस्तु प्राप्त होती है और धन-धान्य, समृद्धि, वैभव-विलास बढ़ते हैं। 
अजय कुमार श्यामानंदी 
[१७] “ॐ आं ॐ ह्रीं। कर्दमेन प्रजा-भूता, मयि सम्भ्रम-कर्दम। श्रियं वासय मे कुले, मातरं पद्म-मालिनीम्।। ॐ आं ॐ ह्रीं।” उक्त मन्त्र का ३२ लाख जप करे। मन्त्र के साथ ‘वं श्रीं’ बीज जोड़कर न्यास करे। “स-वत्सा गौरिव प्रीता, कर्दमेन यथेन्दिरा। कल्याणी मद्-गृहे नित्यं, निवसेत् पद्म-मालिनी।।” उक्त ध्यान करे। जीवित बछड़ेवाली गाय का और पुत्रवती, सौभाग्यवती स्त्रियों का पूजन करे। गो-शाला में बैठकर कमल-गट्टे की माला से जप करे। प्रतिदिन छोटे बच्चों को दूध पिलाए। जप पूर्ण होने पर दशांश होम, मार्जन, ब्रह्म-भोजन आदि करे। इस प्रयोग से वन्ध्या स्त्री को भाग्य-शाली पुत्र होता है। वंश-वृद्धि होती है। होम शिव-लिंगी के बीज, खीर, श्वेत तिल, दूर्वा, घी से करे। तर्पण व मार्जन दूध से करे।
[१८] “ॐ क्रौं ॐ क्लीं। आर्द्रां पुष्करिणीं पुष्टिं पिंगलाङ पद्म-मालिनीम्। चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मीं, जातवेदो म आवहम्।। ॐ क्रौं ॐ क्लीं” उक्त मन्त्र प्रतिदिन ३००० जप करे। शुक्ल-पक्ष की पञ्चमी से प्रारम्भ कर पूर्णिमा तक जप करे। फिर दूसरे मास में शुक्ल पञ्चमी से पूर्णिमा तक जप करे। सम्भव हो, तो चन्द्र-मण्डल के सामने दृष्टि स्थिर रखकर जप करे। अथवा चन्द्रमा का प्रकाश अपने शरीर पर पड़ सके इस प्रकार बैठकर जप करे। रुद्राक्ष, कमल-गट्टे की माला से कौशेय वस्त्र या कमल-पुष्प-गर्भित आसन पर बैठकर जप करे। प्रयोग सोलह मास का है। ध्यान इस प्रकार करे- “तां स्मरेदभिषेकार्द्रां, पुष्टिदां पुष्टि-रुपिणिम्। मैत्यादि-वृत्तिभिश्चार्द्रां, विराजत्-करुणा श्रियम्।। दयार्द्रां वेत्र-हस्तां च, व्रत-दण्ड-स्वरुपिणिम्। पिंगलाभां प्रसन्नास्यां पद्म-माला-धरां तथा।। चन्द्रास्यां चन्द्र-रुपां च, चन्द्रां चन्द्रधरां तथा। हिरन्मयीं महा-लक्ष्मीमृचभेतां जपेन्निशि।। मन्त्र के अक्षर से विनियोग, ऋष्यादि-न्यास कर चन्द्र-मण्डल में भगवती का उक्त ध्यान कर सोलह मास का प्रयोग करना हो, तो शुक्ल पञ्चमी से प्रारम्भ करे। होम खीर, समिधा, कमल पुष्प, सफेद तिल, घृत, शहद आदि से करे। दशांश तर्पण, मार्जन आदि करे। इस प्रयोग से वचन-सिद्धि, प्रतिष्ठा, वैभव की प्राप्ति होती है।
[१९] “ॐ क्लीं ॐ। श्रीं आर्द्रां यः करिणीं यष्टि-सुवर्णां हेम-मालिनीम्। सूर्यां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो न आवह।। ॐ क्लीं ॐ” उक्त मन्त्र के अनुष्ठान में तीन लाख साठ हजार जप करना होता है। तालाब के किनारे अथवा कमल पुष्पों के आसन पर बैठकर, कमल-गट्टे या स्वर्ण की माला में प्रति-दिन तीन हजार जप है। १२० दिन में प्रयोग पूर्ण होगा। खीर, कमल-पुष्प या घी आदि से दशांश होम करे। १०० सुवासिनी स्त्रियों को भोजन कराए और वस्त्र-भूषण, दक्षिणा दे। ध्यान निम्न प्रकार करे- तां स्मरेदभिषेकार्द्रां, पुष्टिदां पुष्टि-रुपिणीं। रुक्माभां स्वप्न-धी-गम्यां, सुवर्णां स्वर्ण-मालिनी।। सूर्यामैश्वर्य-रुपां च, सावित्रीं सूर्य-रुपिणीम्। आत्म-संज्ञां च चिद्रुपां, ज्ञान-दृष्टि-स्वरुपिणीं। चक्षुः-प्राशदां चैव, हिरण्य-प्रचुरां तथा। स्वर्णात्मनाऽऽविर्भूतां च, जातवेदो म आवह।। इस प्रयोग से ग्रहों की पीड़ा, ग्रह-बाधा-निवृत्ति होकर भाग्य का उदय होता है। अपना और अपने कुटुम्बियों के शरीर नीरोगी, दीर्घायुषी और प्रभावशाली होते हैं। जिससे मिलने की इच्छा हो, वह मनुष्य आ मिलता है।
[२०] “ॐ श्रीं ॐ हूं। तां म आवह जातवेदो, लक्ष्मीमनपगामिनीम्। यस्यां हिरण्यं प्रभूतं गावो, दास्योऽश्वान् विन्देयं पुरुषानहं।। ॐ श्रीं ॐ हूं” ‘ॐ अस्य श्री-पञ्च-दश-मन्त्र ऋचः कुबेरो ऋषिः, भूत-धात्री लक्ष्मी देवता, प्रस्तार-पंक्तिश्छन्दः, ह्रीं श्रीं ह्रीं इति बीजानि, ममाभीष्ट-फल-प्राप्त्यर्थे जपे विनियोगः।’ इस प्रकार विनियोग कर ऋष्यादि-न्यास करे। ‘ह्रीं श्रीं ह्रीं’ यर बीज लगाकर अंग-न्यास तथा हृदयादि-न्यास करे। ध्यान इस प्रकार करें- ध्याये लक्ष्मीं प्रहसित-मुखीं राज-सिंहासनस्थां। मुद्रा-शक्ति-सकल-विनुतां सर्व-संसेव्यनाम्। अग्नौ पूज्यामखिल-जननीं हेम-वर्णां हिरण्यां। भाग्योपेतां भुवन-सुखदां भार्गवीं भुत-धात्रीम्।। ज्वारी अथवा गेहूँ की राशि के ऊपर रतेशमी आसन बिछाकर, कमल-बीज की माला से नित्य तीन हजार जप करे। कुल सवा लाख जप करे। जप पूर्ण होने पर दूर्वा, खीर, मधु, घृत आदि से दशांश होम, तर्पण, मार्जन आदि करे। इस प्रयोग से लक्ष्मी स्थिर रहती है। 
सामान्य अनुष्ठान विधि
१॰ संकल्पः- ‘॰॰॰मम दुःख-दारिद्रय-भय-शोकादि-अलक्ष्मी-विनिवृत्ति-पूर्वक सुख-सौभाग्य-सम्पत्ति-विधिधैश्वर्य-प्राप्त्यर्थं ऋग्वेदान्तर्गत पञ्च-दशर्चस्य श्रीसूक्तस्य अमुक श्लोकस्य अमुक संख्यावृत्ति जपाख्यं कर्म करिष्ये।’
२॰ विनियोगः- ॐ हिरण्य-वर्णामिति पञ्च-दशर्चस्य श्रीसूक्तस्य अमुक-मन्त्रस्य श्रीरानन्दकर्दम-चिक्लीतेन्दिरा-सुता ऋषयः, श्रीः देवता, अमुक छन्दः, श्रीं बीज, श्रीं शक्तिः, ह्रीं कीलकं, अलक्ष्मी-परिहारार्थं लक्ष्मी-प्राप्त्यै च विनियोगः। 
३॰ ऋष्यादि-न्यास,श्रीरानन्दकर्दम-चिक्लीतेन्दिरा-सुता ऋषिभ्यो नमः शिरसि। श्री-देवतायै नमः हृदि। अमुक छन्दसे नमः मुखे। श्रीः शक्त्यै नमः नाभौ। ह्रीं-कीलकाय नमः पादयोः। अलक्ष्मी-परिहारार्थं लक्ष्मी-प्राप्त्यै च विनियोगाय नमः सर्वांगे। 
‘श्रीसूक्त’ के छन्द के विषय में उल्लेखनीय है कि प्रथम तीन ऋचाओं तथा सातवीं से १४वीं ऋचाओं का छन्द अनुष्टुप् है। चौथी ऋचा का छन्द ‘त्रिष्टुप’ है। ५वीं ऋचा का छन्द ‘प्रस्तार-पंक्ति’ है। 
४॰ कर-न्यासः- 
ॐ हिरण्य-वर्णा अंगुष्ठाभ्यां नमः। 
ॐ हरिणी तर्जनीभ्यां स्वाहा। 
ॐ सुवर्ण-रजत-स्रजां मध्यमाभ्यां वषट्। 
ॐ चन्द्रां हिरण्मयीं अनामिकाभ्यां हुं। 
ॐ लक्ष्मीं कनिष्ठिकाभ्यां वौषट्। 
ॐ जातवेदो म आवह करतल-करपृष्ठाभ्यां फट्। 
५॰ अंग-न्यासः- 
ॐ हिरण्य-वर्णा हृदयाय नमः। 
ॐ हरिणी शिरसे स्वाहा। 
ॐ सुवर्ण-रजत-स्रजां शिखायै वषट्। 
ॐ चन्द्रां हिरण्मयीं कवचाय हुं। 
ॐ लक्ष्मीं नेत्र-त्रयाय वौषट्। 
ॐ जातवेदो म आवह अस्त्राय फट्। 
६॰ ध्यानः- 
“अरुण-कमल-संस्था, तद्रजः-पुञ्ज-वर्णा, 
कर-कमल-धृतेष्टा, भीति-युग्माम्बुजा च। 
मणि-मुकुट-विचित्रालंकृता कल्प-जालैर्भवतु 
भुवन-माता सततं श्रीः श्रियै नः।। 
७॰ मानस-पूजन,  ८॰ जप, ९॰ हवन,  १०॰ क्षमा-प्रार्थना और विसर्जन
“श्रीसूक्त”-विधान" 
विनियोगः- ॐ हिरण्य –वर्णामित्यादि-पञ्चदशर्चस्य श्रीसूक्तस्याद्यायाः ऋचः श्री ऋषिः तां म आवहेति चतुर्दशानामृचां आनन्द-कर्दम-चिक्लीत-इन्दिरा-सुताश्चत्वारः ऋचयः, आद्य-मन्त्र-त्रयाणां अनुष्टुप् छन्दः, कांसोऽस्मीत्यस्याः चतुर्थ्या वृहती छन्दः, पञ्चम-षष्ठयोः त्रिष्टुप् छन्दः, ततोऽष्टावनुष्टुभः, अन्त्या प्रस्तार-पंक्तिः छन्दः । श्रीरग्निश्च देवते । हिरण्य-वर्णां बीजं । “तां म आवह जातवेद” शक्तिः । कीर्तिसमृद्धिं ददातु मे” कीलकम् । मम श्रीमहालक्ष्मी-प्रसाद-सिद्धयर्थे जपे विनियोगः।                                                ऋष्यादि-न्यास :---
श्री-आनन्द-कर्दम-चिक्लीत-इन्दिरा-सुतेभ्यः ऋषिभ्यो नमः-शिरसि । 
अनुष्टुप्-बृहती-त्रिष्टुप्-प्रस्तार-पंक्ति-छन्दोभ्यो नमः-मुखे । 
श्रीरग्निश्च देवताभ्यां नमः – हृदि । हिरण्य-वर्णां बीजाय नमः गुह्ये । 
“तां म आवह जातवेद” शक्तये नमः – पादयो । 
कीर्तिसमृद्धिं ददातु मे” कीलकाय नमः नाभौ । 
मम श्रीमहालक्ष्मी-प्रसाद-सिद्धयर्थे जपे विनियोगाय नमः सर्वांगे ।
अंग-न्यासः- ‘श्री-सूक्त’ के मन्त्रों में से एक-एक मन्त्र का उच्चारण करते हुए दाहिने हाथ की अँगुलियों से क्रमशः सिर, नेत्र, कान, नासिका, मुख, कण्ठ, दोनों बाहु, हृदय, नाभि, लिंग, पायु (गुदा), उरु (जाँघ), जानु (घुटना), जँघा और पैरों में न्यास करें । यथा,
१॰ ॐ हिरण्य-वर्णां हरिणीं, सुवर्ण-रजत-स्त्रजाम् । 
चन्द्रां हिरण्यमयीं लक्ष्मीं, जातवेदो म आवह ।। – शिरसि 
२॰ ॐ तां म आवह जात-वेदो, लक्ष्मीमनप-गामिनीम् । 
यस्यां हिरण्यं विन्देयं, गामश्वं पुरूषानहम् ।। – नेत्रयोः 
३॰ ॐ अश्वपूर्वां रथ-मध्यां, हस्ति-नाद-प्रबोधिनीम् । 
श्रियं देवीमुपह्वये, श्रीर्मा देवी जुषताम् ।। – कर्णयोः
 ४॰ ॐ कांसोऽस्मि तां हिरण्य-प्राकारामार्द्रां ज्वलन्तीं तृप्तां तर्पयन्तीं । 
पद्मे स्थितां पद्म-वर्णां तामिहोपह्वये श्रियम् ।। – नासिकायाम् 
५॰ ॐ चन्द्रां प्रभासां यशसा ज्वलन्तीं श्रियं लोके देव-जुष्टामुदाराम् । 
तां पद्म-नेमिं शरणमहं प्रपद्ये अलक्ष्मीर्मे नश्यतां त्वां वृणोमि ।। – मुखे 
६॰ ॐ आदित्य-वर्णे तपसोऽधिजातो वनस्पतिस्तव वृक्षोऽक्ष बिल्वः । 
तस्य फलानि तपसा नुदन्तु मायान्तरायाश्च बाह्या अलक्ष्मीः ।। – कण्ठे 
७॰ ॐ उपैतु मां दैव-सखः, कीर्तिश्च मणिना सह । 
प्रादुर्भूतोऽस्मि राष्ट्रेऽस्मिन्, कीर्तिं वृद्धिं ददातु मे ।। – बाह्वोः 
८॰ ॐ क्षुत्-पिपासाऽमला ज्येष्ठा, अलक्ष्मीर्नाशयाम्यहम् । 
अभूतिमसमृद्धिं च, सर्वान् निर्णुद मे गृहात् ।। – हृदये 
९॰ ॐ गन्ध-द्वारां दुराधर्षां, नित्य-पुष्टां करीषिणीम् । 
ईश्वरीं सर्व-भूतानां, तामिहोपह्वये श्रियम् ।। – नाभौ 
१०॰ ॐ मनसः काममाकूतिं, वाचः सत्यमशीमहि ।
 पशूनां रूपमन्नस्य, मयि श्रीः श्रयतां यशः ।। – लिंगे 
११॰ ॐ कर्दमेन प्रजा-भूता, मयि सम्भव-कर्दम । 
श्रियं वासय मे कुले, मातरं पद्म-मालिनीम् ।। – पायौ 
१२॰ ॐ आपः सृजन्तु स्निग्धानि, चिक्लीत वस मे गृहे । 
नि च देवीं मातरं श्रियं वासय मे कुले ।। – उर्वोः 
१३॰ ॐ आर्द्रां पुष्करिणीं पुष्टिं, पिंगलां पद्म-मालिनीम् । 
चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मीं, जातवेदो म आवह ।। – जान्वोः
१४॰ ॐ आर्द्रां यः करिणीं यष्टिं, सुवर्णां हेम-मालिनीम् । 
सूर्यां हिरण्मयीं लक्ष्मीं, जातवेदो ममावह ।। – जंघयोः 
१५॰ ॐ तां म आवह जात-वेदो लक्ष्मीमनप-गामिनीम् । 
यस्यां हिरण्यं प्रभूतं गावो दास्योऽश्वान् विन्देयं पुरूषानहम् ।। – पादयोः 
षडङ्ग-न्यास – कर-न्यास –  अंग-न्यास – 
ॐ हिरण्य-मय्यै नमः अंगुष्ठाभ्यां नमः हृदयाय नमः 
ॐ चन्द्रायै नमः तर्जनीभ्यां नमः शिरसे स्वाहा 
ॐ रजत-स्रजायै नमः मध्यमाभ्यां नमः शिखायै वषट् 
ॐ हिरण्य-स्रजायै नमः अनामिकाभ्यां नमः कवचाय हुम् 
ॐ हिरण्यायै नमः कनिष्ठिकाभ्यां नमः नेत्र-त्रयाय वौषट् 
ॐ हिरण्य-वर्णायै नमः  करतल-कर-पृष्ठाभ्यां नमः अस्त्राय फट् 
  दिग्-बन्धनः- “ॐ भूर्भुवः स्वरोम्” से दिग्-बन्धन करें।                                ध्यान 
या सा पद्मासनस्था विपुल-कटि-तटी पद्म-पत्रायताक्षी, 
गम्भीरावर्त्त-नाभि-स्तन-भार-नमिता शुभ्र-वस्त्रोत्तरीया । 
लक्ष्मीर्दिव्यैर्गन्ध-मणि-गण-खचितैः स्नापिता हेम-कुम्भैः, 
नित्यं सा पद्म-हस्ता मम वसतु गृहे सर्व-मांगल्य-युक्ता ।। 
अरुण-कमल-संस्था, तद्रजः-पुञ्ज-वर्णा, 
कर-कमल-धृतेष्टा, भीति-युग्माम्बुजा च। 
मणि-मुकुट-विचित्रालंकृता कल्प-जालैः 
सकल-भुवन-माता ,सन्ततं श्रीः श्रियै नः।। मानस-पूजनः- इस प्रकार ध्यान करके भगवती लक्ष्मी का मानस पूजन करें,
ॐ लं पृथ्वी-तत्त्वात्मकं गन्धं श्रीमहा-लक्ष्मी-श्रीपादुकाभ्यां नमः अनुकल्पयामि (अधोमुख-कनिष्ठांगुष्ठ-मुद्रा) । 
ॐ हं आकाश-तत्त्वात्मकं पुष्पं श्रीमहा-लक्ष्मी-श्रीपादुकाभ्यां नमः अनुकल्पयामि (अधोमुख-तर्जनी-अंगुष्ठ-मुद्रा) । 
ॐ यं वायु-तत्त्वात्मकं धूपं श्रीमहा-लक्ष्मी-श्रीपादुकाभ्यां नमः अनुकल्पयामि (ऊर्ध्व-मुख-तर्जनी-अंगुष्ठ-मुद्रा) । ॐ रं वह्नयात्मकं दीपं श्रीमहा-लक्ष्मी-श्रीपादुकाभ्यां नमः अनुकल्पयामि । (ऊर्ध्व-मुख-मध्यमा-अंगुष्ठ-मुद्रा) । 
ॐ वं जल-तत्त्वात्मकं नैवेद्यं श्रीमहा-लक्ष्मी-श्रीपादुकाभ्यां नमः अनुकल्पयामि (ऊर्ध्व-मुख-अनामिका-अंगुष्ठ-मुद्रा) । 
ॐ शं सर्व-तत्त्वात्मकं ताम्बूलं श्रीमहा-लक्ष्मी-श्रीपादुकाभ्यां नमः अनुकल्पयामि (ऊर्ध्व-मुख-सर्वांगुलि-मुद्रा) । 
अब सर्व-देवोपयोगी पद्धति से अर्घ्य एवं पाद्य-आचमनीय आदि पात्रों की स्थापना करके पीठ-पूजन करें । ‘सर्वतोभद्र-मण्डल’ आदि पर निम्न ‘पूजन-यन्त्र’ की स्थापना करके मण्डूकादि-पर-तत्त्वान्त देवताओं की पूजा करें । तत्पश्चात् पूर्वादि-क्रम से भगवती लक्ष्मी की पीठ-शक्तियों की अर्चना करें । 
यथा – श्री विभूत्यै नमः, श्री उन्नत्यै नमः, श्री कान्त्यै नमः, श्री सृष्ट्यै नमः, श्री कीर्त्यै नमः, श्री सन्नत्यै नमः, श्री व्युष्ट्यै नमः, श्री उत्कृष्ट्यै नमः । मध्य में – ‘श्री ऋद्धयै नमः ।’ पुष्पाञ्जलि समर्पित कर मध्य में प्रसून-तूलिका की कल्पना करके – “श्री सर्व-शक्ति-कमलासनाय नमः” इस मन्त्र से समग्र ‘पीठ’ का पूजन करे । ‘सहस्रार’ में गुरुदेव का पूजन कर एवं उनसे आज्ञा लेकर पूर्व-वत् पुनः ‘षडंग-न्यास’ करे । भगवती लक्ष्मी का ध्यान कर पर-संवित्-स्वरुपिणी तेजो-मयी देवी लक्ष्मी को नासा-पुट से पुष्पाञ्जलि में लाकर आह्वान करे । यथा – 
ॐ देवेशि ! भक्ति-सुलभे, परिवार-समन्विते ! 
तावत् त्वां पूजयिष्यामि, तावत् त्वं स्थिरा भव ! 
हिरण्य-वर्णां हरिणीं, सुवर्ण-रजत-स्रजाम् । 
चन्द्रां हिरण्य-मयीं लक्ष्मीं, जातवेदो ममावह ।। 
श्री महा-लक्ष्मि ! इहागच्छ, इहागच्छ, इह सन्तिष्ठ, इह सन्तिष्ठ, इह सन्निधेहि,
 इह सन्निधेहि, इह सन्निरुध्वस्व, इह सन्निरुध्वस्व, इह सम्मुखी भव, इह अवगुण्ठिता भव ! आवाहनादि नव मुद्राएँ दिखाकर ‘अमृतीकरण’ एवं ‘परमीकरण’ करके – 
“ॐ आं ह्रीं क्रों यं रं लं वं शं षं सं हौं हंसः श्रीमहा-लक्ष्मी-देवतायाः प्राणाः।
ॐ आं ह्रीं क्रों यं रं लं वं शं षं सं हौं हंसः श्रीमहा-लक्ष्मी-देवतायाः जीव इह स्थितः । ॐ आं ह्रीं क्रों यं रं लं वं शं षं सं हौं हंसः श्रीमहा-लक्ष्मी-देवतायाः सर्वेन्द्रियाणि । ॐ आं ह्रीं क्रों यं रं लं वं शं षं सं हौं हंसः श्रीमहा-लक्ष्मी-देवतायाः वाङ्-मनो-चक्षु-श्रोत्र-घ्राण-प्राण-पदानि इहैवागत्य सुखं चिर तिष्ठन्तु स्वाहा ।।” 
इस प्राण-प्रतिष्ठा-मन्त्र से लेलिहान-मुद्रा-पूर्वक प्राण-प्रतिष्ठा करे । उक्त प्रकार आवाहनादि करके यथोपलब्ध द्रव्यों से भगवती की राजसी पूजा करे । यथा,
१॰ आसन – ॐ तां म आवह जात-वेदो, लक्ष्मीमनप-गामिनीम् । यस्यां हिरण्यं विन्देयं, गामश्वं पुरूषानहम् ।। ।। हे महा-लक्ष्मि ! तुभ्यं पद्मासनं कल्पयामि नमः ।। देवी के वाम भाग में कमल-पुष्प स्थापित करके ‘सिंहासन-मुद्रा’ और ‘पद्म-मुद्रा’ दिखा।
२॰ अर्घ्य-दान – ॐ अश्वपूर्वां रथ-मध्यां, हस्ति-नाद-प्रबोधिनीम् । श्रियं देवीमुपह्वये, श्रीर्मा देवी जुषताम् ।। ।। हे महा-लक्ष्मि ! एतत् ते अर्घ्यं कल्पयामि स्वाहा ।। ‘कमल-मुद्रा’ से भगवती के शिर पर अर्घ्य प्रदान करे।
३॰ पाद्य – ॐ कांसोऽस्मि तां हिरण्य-प्राकारामार्द्रां ज्वलन्तीं तृप्तां तर्पयन्तीं । पद्मे स्थितां पद्म-वर्णां तामिहोपह्वये श्रियम् ।। ।। हे महा-लक्ष्मि ! पाद्यं कल्पयामि नमः ।। चरण-कमलों में ‘पाद्य’ समर्पित करके प्रणाम करे ।
४॰ आचमनीय – ॐ चन्द्रां प्रभासां यशसा ज्वलन्तीं श्रियं लोके देव-जुष्टामुदाराम् । तां पद्म-नेमिं शरणमहं प्रपद्ये अलक्ष्मीर्मे नश्यतां त्वां वृणोमि ।। ।। श्री महा-लक्ष्म्यै आचमनीयं कल्पयामि नमः ।। मुख में आचमन प्रदान करके प्रणाम करे।
५॰ मधु-पर्क – ॐ आदित्य-वर्णे तपसोऽधिजातो वनस्पतिस्तव वृक्षोऽक्ष बिल्वः । तस्य फलानि तपसा नुदन्तु मायान्तरायाश्च बाह्या अलक्ष्मीः ।। ।। श्री महालक्ष्म्यै मधु-पर्क कल्पयामि स्वधा । पुनराचमनीयम् कल्पयामि ।। पुनः आचमन समर्पित करें 
६॰ स्नान (सुगन्धित द्रव्यों से उद्वर्तन करके स्नान कराए) – ॐ उपैतु मां दैव-सखः, कीर्तिश्च मणिना सह । प्रादुर्भूतोऽस्मि राष्ट्रेऽस्मिन्, कीर्तिं वृद्धिं ददातु मे ।। ।। श्री महा-लक्ष्म्यै स्नानं कल्पयामि नमः ।। ‘स्नान’ कराकर केशादि मार्जन करने के बाद वस्त्र प्रदान करे । इसके पूर्व पुनः आचमन कराए ।
७॰ वस्त्र – ॐ क्षुत्-पिपासाऽमला ज्येष्ठा, अलक्ष्मीर्नाशयाम्यहम् । अभूतिमसमृद्धिं च, सर्वान् निर्णुद मे गृहात् ।। ।। श्री महा-लक्ष्म्यै वाससी परिकल्पयामि नमः ।। पुनः आचमन कराए ।
८॰ आभूषण – ॐ गन्ध-द्वारां दुराधर्षां, नित्य-पुष्टां करीषिणीम् । ईश्वरीं सर्व-भूतानां, तामिहोपह्वये श्रियम् ।। ।। श्री महा-लक्ष्म्यै सुवर्णानि भूषणानि कल्पयामि ।।
९॰ गन्ध – ॐ मनसः काममाकूतिं, वाचः सत्यमशीमहि । पशूनां रूपमन्नस्य, मयि श्रीः श्रयतां यशः ।। ।। श्री महा-लक्ष्म्यै गन्धं समर्पयामि नमः ।।
१०॰ पुष्प – ॐ कर्दमेन प्रजा-भूता, मयि सम्भव-कर्दम । श्रियं वासय मे कुले, मातरं पद्म-मालिनीम् ।। ।। श्री महा-लक्ष्म्यै एतानि पुष्पाणि वौषट् ।। ११॰ धूप – ॐ आपः सृजन्तु स्निग्धानि, चिक्लीत वस मे गृहे । नि च देवीं मातरं श्रियं वासय मे कुले ।। ॐ वनस्पति-रसोद्-भूतः, गन्धाढ्यो गन्धः उत्तमः । आघ्रेयः सर्व-देवानां, धूपोऽयं प्रतिगृह्यताम् ।। ।। श्री महा-लक्ष्म्यै धूपं आघ्रापयामि नमः ।।
१२॰ दीप – ॐ आर्द्रां पुष्करिणीं पुष्टिं, पिंगलां पद्म-मालिनीम् । चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मीं, जातवेदो म आवह ।। ॐ सुप्रकाशो महा-दीपः, सर्वतः तिमिरापहः । स बाह्यान्तर-ज्योतिः, दीपोऽयं प्रति-गृह्यताम् ।। ।। श्री महा-लक्ष्म्यै प्रदीपं दर्शयामि नमः ।। दीपक दिखाकर प्रणाम करे । पुनः आचमन कराए।
१३॰ नैवेद्य – देवी के समक्ष ‘चतुरस्र-मण्डल’ बनाकर उस पर ‘त्रिपादिका-आधार’ स्थापित करे । षट्-रस व्यञ्जन-युक्त ‘नैवेद्य-पात्र’ उस आधार पर रखें । ‘वायु-बीज’ (यं) नैवेद्य के दोषों को सुखाकर, ‘अग्नि-बीज’ (रं) से उसका दहन करे । ‘सुधा-बीज’ (वं) से नैवेद्य का ‘अमृतीकरण’ करें । बाँएँ हाथ के अँगूठे से नैवेद्य-पात्र को स्पर्श करते हुए दाहिने हाथ में सुसंस्कृत अमृत-मय जल-पात्र लेकर ‘नैवेद्य’ समर्पित करें – ॐ आर्द्रां यः करिणीं यष्टिं, सुवर्णां हेम-मालिनीम् । सूर्यां हिरण्मयीं लक्ष्मीं, जातवेदो ममावह ।। ॐ सत्पात्र-सिद्धं सुहविः, विविधानेक-भक्षणम् । नैवेद्यं निवेदयामि, सानुगाय गृहाण तत् ।। ।। श्री महा-लक्ष्म्यै नैवेद्यं निवेदयामि नमः ।। चुलूकोदक (दाईं हथेली में जल) से ‘नैवेद्य’ समर्पित करें । दूसरे पात्र में अमृतीकरण जल लेकर “ॐ हिरण्य-वर्णाम्” – इस प्रथम ऋचा का पाठ करके – “श्री महा-लक्ष्म्यै अमृतोपस्तरणमसि स्वाहा” । श्री महा-लक्ष्मि ! अपोशनं कल्पयामि स्वाहा । तत्पश्चात् “प्राणाय स्वाहा” आदि का उच्चारण करते हुए ‘पञ्च प्राण-मुद्राएँ’ दिखाएँ । “हिरण्य-वर्णाम्” – इस प्रथम ऋचा का दस बार पाठ करके समर्पित करें । फिर ‘उत्तरापोशन’ कराएँ । ‘नैवेद्य-मुद्रा’ दिखाकर प्रणाम करें । ‘नैवेद्य-पात्र’ को ईशान या उत्तर दिशा में रखें । नैवेद्य-स्थान को जल से साफ कर ताम्बूल प्रदान करें।
१४॰ ताम्बूल – ॐ तां म आवह जात-वेदो लक्ष्मीमनप-गामिनीम् । यस्यां हिरण्यं प्रभूतं गावो दास्योऽश्वान् विन्देयं पुरूषानहम् ।। ।। श्री महा-लक्ष्मि ! ऐं हं हं हं इदम् ताम्बूलं गृहाण, स्वाहा ।। ‘ताम्बूल’ देकर प्रणाम करें । आवरण-पूजा भगवती से उनके परिवार की अर्चना हेतु अनुमति माँग कर ‘आवरण-पूजा’ करे । यथा – ॐ संविन्मयि ! परे देवि ! परामृत-रस-प्रिये ! अनुज्ञां देहि मे मातः ! परिवारार्चनाय ते ।।   प्रथम आवरण – केसरों में ‘षडंग-शक्तियों’ का पूजन करे –
१॰ हिरण्य-मय्यै नमः हृदयाय नमः । हृदय-श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । 
२॰ चन्द्रायै नमः शिरसे स्वाहा । शिरः-श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । 
३॰ रजत-स्रजायै नमः शिखायै वषट् । शिखा-श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । ४॰ हिरण्य-स्रजायै नमः कवचाय हुम् । कवच-श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । ५॰ हिरण्यायै नमः नेत्र-त्रयाय वौषट् । नेत्र-श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । 
६॰ हिरण्य-वर्णायै नमः अस्त्राय फट् । अस्त्र-श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । 
प्रथम आवरण की पूजा कर फल भगवती को समर्पित करें । यथा – 
ॐ अभीष्ट-सिद्धिं मे देहि, शरणागत-वत्सले ! 
भक्तया समर्पये तुभ्यं, प्रथमावरणार्चनम् ।। 
पूजिताः तर्पिताः सन्तु महा-लक्ष्म्यै नमः ।। पुष्पाञ्जलि प्रदान करे।
द्वितीय आवरण – पत्रों में पूर्व से प्रारम्भ करके वामावर्त-क्रम से ‘पद्मा, पद्म-वर्णा, पद्मस्था, आर्द्रा, तर्पयन्ती, तृप्ता, ज्वलन्ती’ एवं ‘स्वर्ण-प्राकारा’ का पूजन-तर्पण करे । यथा 
१॰ पद्मायै नमः । पद्मा-श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । 
२॰ पद्म-वर्णायै नमः । पद्म-वर्णा–श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । 
३॰ पद्मस्थायै नमः । पद्मस्था-श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । 
४॰ आर्द्रायै नमः । आर्द्रा–श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । 
५॰ तर्पयन्त्यै नमः । तर्पयन्ती-श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । 
६॰ तृप्तायै नमः । तृप्ता-श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । 
७॰ ज्वलन्त्यै नमः । ज्वलन्ती-श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । 
८॰ स्वर्ण-प्राकारायै नमः । स्वर्ण-प्राकारा-श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । द्वितीय आवरण की पूजा कर फल भगवती को समर्पित करें।
यथा – ॐ अभीष्ट-सिद्धिं मे देहि, शरणागत-वत्सले ! भक्तया समर्पये तुभ्यं, द्वितीयावरणार्चनम् ।। पूजिताः तर्पिताः सन्तु महा-लक्ष्म्यै नमः ।। तृतीय आवरण – भू-पुर में इन्द्र आदि दिक्-पालों का पूजन-तर्पण करे।
यथा – लं इन्द्राय नमः – पूर्वे । रं अग्न्ये नमः – अग्नि कोणे । यं यमाय नमः – दक्षिणे । क्षं निऋतये नमः – नैऋत-कोणे । वं वरुणाय नमः – पश्चिमे । यं वायवे नमः – वायु-कोणे । सं सोमाय नमः – उत्तरे । हां ईशानाय नमः – ईशान-कोणे । आं ब्रह्मणे नमः – इन्द्र और ईशान के बीच ।रीं अनन्ताय नमः – वरुण और निऋति के बीच । तृतीय आवरण की पूजा कर फल भगवती को समर्पित करें । यथा – ॐ अभीष्ट-सिद्धिं मे देहि, शरणागत-वत्सले ! भक्तया समर्पये तुभ्यं, तृतीयावरणार्चनम् ।। पूजिताः तर्पिताः सन्तु महा-लक्ष्म्यै नमः ।। चतुर्थ आवरण इन्द्रादि दिक्पालों के समीप ही उनके ‘वज्र’ आदि आयुधों का अर्चन करें।
यथा – ॐ वं वज्राय नमः, ॐ वज्र-श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः। ॐ शं शक्तये नमः, ॐ शक्ति-श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः। ॐ दं दण्डाय नमः, ॐ दण्ड-श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः। ॐ खं खड्गाय नमः, ॐ खड्ग-श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः। ॐ पां पाशाय नमः, ॐ पाश-श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः। ॐ अं अंकुशाय नमः, ॐ अंकुश-श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः। ॐ गं गदायै नमः, ॐ गदा-श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः। ॐ त्रिं त्रिशूलाय नमः, ॐ त्रिशूल-श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः। ॐ पं पद्माय नमः, ॐ पद्म-श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः। ॐ चं चक्राय नमः, ॐ चक्र-श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः। चतुर्थ आवरण की पूजा कर फल भगवती को समर्पित करें । यथा – ॐ अभीष्ट-सिद्धिं मे देहि, शरणागत-वत्सले ! भक्तया समर्पये तुभ्यं, चतुर्थावरणार्चनम् ।। पूजिताः तर्पिताः सन्तु महा-लक्ष्म्यै नमः।।
प्रथम ऋचा से कर्णिका में महा-देवी महा-लक्ष्मी का पुष्प-धूप-गन्ध, दीप और नैवेद्य आदि उपचारों से पुनः पूजन करें । तत्पश्वात् पूजा-यन्त्र में देवी के समक्ष गन्ध-पुष्प-अक्षत से भगवती के ३२ नामों से पूजन-तर्पण करें।
१॰ ॐ श्रियै नमः । श्री-श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः। 
२॰ ॐ लक्ष्म्यै नमः । लक्ष्मी-श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः। 
३॰ ॐ वरदायै नमः । वरदा-श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः। 
४॰ ॐ विष्णु-पत्न्यै नमः । विष्णु-पत्नी-श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः। 
५॰ ॐ वसु-प्रदायै नमः । वसु-प्रदा-श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः। 
६॰ ॐ हिरण्य-रुपिण्यै नमः । हिरण्य-रुपिणी-श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः। 
७॰ ॐ स्वर्ण-मालिन्यै नमः । स्वर्ण-मालिनी-श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः। 
८॰ ॐ रजत-स्रजायै नमः । रजत-स्रजा-श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः। 
९॰ ॐ स्वर्ण-गृहायै नमः । स्वर्ण-गृहा-श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः। 
१०॰ ॐ स्वर्ण-प्राकारायै नमः । स्वर्ण-प्राकारा-श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः। 
११॰ ॐ पद्म-वासिन्यै नमः । पद्म-वासिनी-श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः। 
१२॰ ॐ पद्म-हस्तायै नमः । पद्म-हस्ता-श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः। 
१३॰ ॐ पद्म-प्रियायै नमः । पद्म-प्रिया-श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः। 
१४॰ ॐ मुक्तालंकारायै नमः । मुक्तालंकारा-श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः। 
१५॰ ॐ सूर्यायै नमः । सूर्या-श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः। 
१६॰ ॐ चन्द्रायै नमः । चन्द्रा-श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः। 
१७॰ ॐ बिल्व-प्रियायै नमः । बिल्व-प्रिया-श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः। 
१८॰ ॐ ईश्वर्यै नमः । ईश्वरी-श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः। 
१९॰ ॐ भुक्तयै नमः । भुक्ति-श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः। 
२०॰ ॐ प्रभुक्तयै नमः । प्रभुक्ति-श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः। 
२१॰ ॐ विभूत्यै नमः । विभूति-श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः। 
२२॰ ॐ ऋद्धयै नमः । ऋद्धि-श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः। 
२३॰ ॐ समृद्धयै नमः । समृद्धि-श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः। 
२४॰ ॐ तुष्टयै नमः । तुष्टि-श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः। 
२५॰ ॐ पुष्टयै नमः । पुष्टि-श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः। 
२६॰ ॐ धनदायै नमः । धनदा-श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः। 
२७॰ ॐ धनेश्वर्यै नमः । धनेश्वरी-श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः। 
२८॰ ॐ श्रद्धायै नमः । श्रद्धा-श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः। 
२९॰ ॐ भोगिन्यै नमः । भोगिनी-श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः। 
३०॰ ॐ भोगदायै नमः । भोगिनी-श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः। 
३१॰ ॐ धात्र्यै नमः।धात्री-श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः। 
३२॰ ॐ विधात्र्यै नमः।विधात्री-श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः।
उपर्युक्त ३२ नामों से भगवती के निमित्त हविष्य ‘बलि’ प्रदान करने का भी विधान है।श्री-सूक्त की पन्द्रह ऋचाओं से नीराजन और प्रदक्षिणा करके पुष्पाञ्जलि प्रदान करे।तदुपरान्त पुनः न्यास करके श्री-सूक्त का पाठ करे । ‘क्षमापन-स्तोत्र’ का पाठ करके पूजन और पाठ का फल भगवती को समर्पित करके विसर्जन करे।

श्राद्ध शब्द श्रद्धा से नहीं बना

अब मैं आपके तर्क को एक-एक करके पाणिनीय कसौटी पर देखना चाहता हूँ।

प्रश्न 1 — “श्रत्” कहाँ से आया?

आप कहते हैं:

«श्रत् + धा = श्रद्धा»

तो पहले यह प्रमाणित कीजिए कि “श्रत्” स्वयं कोई पाणिनीय प्रकृति/प्रातिपदिक है जिसका अर्थ “सत्य” है।

कौन-सा धातुपाठ, गणपाठ, उणादिसूत्र अथवा पाणिनीय सूत्र “श्रत् = सत्य” सिद्ध करता है?

यदि “श्रत्” ही सिद्ध नहीं हुआ, तो पूरी व्युत्पत्ति का पहला चरण ही कहाँ खड़ा है?

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प्रश्न 2 — “धा” को जोड़ देने से शब्द नहीं बनता

यह कहना कि:

«धा = धारण करना»

अपने-आप में पर्याप्त नहीं है।

पाणिनीय प्रक्रिया में यह बताना होगा कि किस प्रत्यय और किस सूत्र से √धा से अपेक्षित रूप बनता है, और फिर वह “श्रत्” के साथ किस नियम से जुड़ता है।

सिर्फ दो अर्थपूर्ण अंशों को जोड़कर कोई संस्कृत शब्द बना देना पाणिनीय व्युत्पत्ति नहीं है।

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प्रश्न 3 — “श्रद्धा + अ = श्राद्ध” का सूत्र कहाँ है?

यही आपके पूरे तर्क का सबसे महत्वपूर्ण चरण है।

यदि आप कहते हैं:

«श्रद्धा + अ → श्राद्ध»

तो कृपया बताइए:

1. यहाँ अ किस प्रत्यय का प्रतिनिधित्व करता है?
2. वह प्रत्यय किस सूत्र से विहित है?
3. “श्रद्धा” में कौन-सा वर्णादेश/गुण/वृद्धि/लोप हुआ?
4. किस पाणिनीय नियम से श्राद्ध रूप प्राप्त होता है?

जब तक इनका उत्तर नहीं है, “श्रद्धा + अ = श्राद्ध” केवल एक अनुमानित decomposition है, व्याकरणिक सिद्धि नहीं।

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प्रश्न 4 — अर्थ से व्युत्पत्ति सिद्ध नहीं होती

आपका तर्क है:

«श्रद्धा से किया गया कर्म = श्राद्ध।»

लेकिन यहाँ आपने पहले अर्थ निर्धारित किया और फिर उसी अर्थ को शब्द की व्युत्पत्ति का प्रमाण बना दिया।

व्याकरण में प्रक्रिया उलटी नहीं चलती।

पहले शब्द-सिद्धि, फिर उसके आधार पर अर्थ-निर्णय होगा।

“यह अर्थ सुंदर बैठता है” = “यही व्युत्पत्ति है” नहीं होता।

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प्रश्न 5 — “श्राद्ध” का अर्थ क्या केवल आपकी व्युत्पत्ति से निर्धारित होगा?

मान लीजिए किसी शब्द का संबंध “श्रद्धा” से सिद्ध हो भी जाए।

उससे यह कैसे सिद्ध हुआ कि:

«श्राद्ध = श्रद्धापूर्वक किया गया हर अच्छा कर्म?»

किस पाणिनीय सूत्र में ऐसा अर्थ-विस्तार निर्धारित है?

किस शास्त्रीय प्रयोग में “किसी भी श्रद्धापूर्वक किए गए सत्कर्म” के लिए “श्राद्ध” को सामान्य technical term बनाया गया है?

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प्रश्न 6 — सबसे निर्णायक अंतर

मैं आपसे दो चीजें अलग रखने का आग्रह करूँगा:

व्युत्पत्ति: शब्द कैसे बना?
प्रयोग: शब्द का शास्त्र में किस अर्थ में प्रयोग हुआ?

यदि “श्रद्धा” और “श्राद्ध” संबंधित सिद्ध होते हैं, तो इससे यह स्वतः सिद्ध नहीं होता कि श्राद्ध शब्द के प्रत्येक प्रयोग को श्रद्धा + कर्म के सामान्य अर्थ में पढ़ा जाए।

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इसलिए मेरे लिए निर्णायक प्रश्न बहुत छोटा है:

«कृपया “श्रत् + धा → श्रद्धा → श्रद्धा + अ → श्राद्ध” की पूरी पाणिनीय सूत्र-सिद्धि दीजिए।»

सिर्फ अर्थ, निरुक्ति-सदृश व्याख्या या आधुनिक हिन्दी में भावार्थ नहीं—प्रकृति, प्रत्यय और लागू पाणिनीय सूत्र।

यदि वह सिद्धि नहीं दी जा सकती, तो “श्राद्ध = श्रद्धा का क्रिया-रूप” को पाणिनीय निष्कर्ष कहना छोड़ना पड़ेगा।

और मैं यह बात पूरी तरह व्याकरण के स्तर पर कह रहा हूँ; इससे किसी व्यक्ति की धार्मिक मान्यता पर कोई टिप्पणी नहीं होती।

Sunday, 4 October 2026

इबादत" का अर्थ होता है गुलाम.

इस्लाम और हिन्दू धर्म की फिलोसॉफी पर तुलना में एक पोस्ट लिखी जिसमें "इबादत" की उत्पत्ति अरबी के शब्द "अब्द" से बताई जिसका शाब्दिक और व्यावहारिक अर्थ होता है गुलाम.. यानि इस्लाम में अल्लाह से एक मुस्लिम का संबंध गुलामी का है.. और यह एक ऐसी विवेचना है जो न तो मौलिक है, न विवादित है और ना ही कोई मुस्लिम इसको लेकर डिफेंसिव है या इससे कन्नी काटता है. 

    पर इसको लेकर आपत्ति हुई एक हिंदी के कविराज को, जिन्होंने कहा कि चूँकि मैं अरबी का विद्वान नहीं हूँ इसलिए मेरी यह व्याख्या गलत है और किसी उलटबांसी से इबादत एक संस्कृत शब्द से निकला है जिसका अर्थ होता है तपस्या..

    यह एक एबरेशन नहीं है, एक कंसिस्टेंट पैटर्न है.. यदि किसी की बात काटनी है तो उसके तथ्यों को चुनौती देने के बदले उसकी ऑथोरिटी को चुनौती दो, एक बड़ी ऑथोरिटी से. क्योंकि उनका सत्य ऑब्जेक्टिव नहीं होता, सब्जेक्टिव होता है, इसलिए उनकी दुनिया में सत्य की अपनी कोई ऑथोरिटी नहीं होती, कहने वाले की ऑथोरिटी होती है. चूँकि आप किसी विषय के स्पेशलिस्ट नहीं हैं और आप सबकुछ नहीं जानते इसलिए आप जो जानते हैं वह वैलिड नहीं है. 

   अरबी के एक शब्द का अर्थ जानने के लिए अरबी का विद्वान होना आवश्यक नहीं है. एक दर्जी पजामा सिलते हुए कपड़ा सेंटीमीटर में नापता है. वहीं एक स्पेस साइंटिस्ट के लिए माइक्रोन और एंगस्ट्रम के मेजरमेंट भी महत्वपूर्ण होते हैं जबकि दर्जी ने उनका नाम भी नहीं सुना. बेशक लंबाई और दूरी की माप के मामले में स्पेस साइंटिस्ट दर्जी से अधिक जानता है लेकिन दर्जी पजामे का कपड़ा कटवाने के लिए स्पेस साइंटिस्ट के पास नहीं जाता. आप कितना जानते हैं, इससे अधिक महत्व की बात है कि आपके काम का क्या है और आप वह जानते हैं या नहीं.

    अर्थशास्त्री और सोशल फिलॉसफर फ्रेडरिक हायेक ने अगर एक महत्व की बात कही है तो वह है कि नॉलेज समाज में बिखरा पड़ा है. नॉलेज असीमित है और हर किसी के पास अपने काम के लिए रेलेवेंट नॉलेज ही होता है. वहीं वामपंथ की सोच है कि नॉलेज सीमित है, और उसका सेंट्रलाइज्ड कंट्रोल होना चाहिए और डिसीजन मेकिंग प्रॉसेस सेंट्रलाइज्ड होना चाहिए. 

  इसकी अति देखिए.. कविराज ने कहा कि हिन्दू धर्म में भक्ति का स्वरूप भी सेंट्रलाइज्ड निर्णय से निर्धारित होगा. उनके अनुसार तुलसीदास सबके लिए भक्ति का स्वरूप निर्धारित करके गए हैं कि श्रीराम की भक्ति सिर्फ दास्य भाव से की जा सकती है..

     हनुमान जी ने या तुलसीदास ने प्रभु श्रीराम से कहा कि मैं आपका दास हूँ.. प्रभु श्रीराम ने किसी को नहीं कहा कि तुम मेरे दास हो. हिन्दू होने का अर्थ है स्वतंत्रता. यहाँ भक्त निर्धारित करता है कि उसका अपने इष्ट से क्या सम्बन्ध होगा.. वह भक्ति दास्य भाव से करेगा, या प्रेम भाव से या वात्सल्य भाव से. ईश्वर यह आदेश नहीं करते. यह स्वतंत्रता इस्लाम में या अन्य मोनोथेइस्ट रिलिजन में नहीं है. 

   कविवर "वैदिक समाजवाद" के आग्रही हैं.. यह भक्ति और अध्यात्म का वामपंथ है. इसीलिये इसका स्वरूप इस्लाम से इतना मिलता जुलता है. समाजवाद को चाहे आप कोई भी नाम दें, अपने हर रूप में एक समान ही परिणाम देता है. चाहे वह हिटलर का नेशनल सोशलिज्म हो, या मामदानी का डेमोक्रेटिक सोशलिज्म हो या फेबियन्स का वेलफेयर सोशलिज्म हो, या माओ, मार्क्स, लेनिन का कम्युनिज्म हो.. सबकी मूल आत्मा एक ही है और सबका परिणाम भी एक है. सबकी आत्मा है निर्णय प्रक्रिया का केन्द्रीकरण किसी न किसी बहाने से...और सबका अंतिम परिणाम है व्यक्तिगत स्वतंत्रता की हत्या.. कहीं झटके से तो कहीं धीरे धीरे हलाल से और कहीं वेलफेयर का एनेस्थीसिया देकर.

बुद्धिजीवियों की असलियत

बुद्धिजीवियों का अंडरवर्ल्ड

इस आलेख में मैं कोशिश करूंगा कि जिन्हें पढ़कर हम आप बड़े हुए, हमने जिन्हें अपने तर्क, बहसों का आधार बनाया उनके मुखौटे के पीछे का वास्तविक चेहरा दिखा सकूं। ये वो लोग हैं जिनकी किताबें कॉलेज में पढ़ाई जाती हैं, पर जिनकी जिंदगी पुलिस फाइल में होनी चाहिए थी।

आज नौ लोगों पर संक्षिप्त चर्चा करते हैं, मार्क्स से शुरू करते हैं, 

1. कार्ल मार्क्स : घर का पूंजीपति

लिखता है कि मालिक मजदूर को लूटता है। 
किया - घर की नौकरानी हेलेन से बेटा पैदा किया, नाम तक नहीं दिया। बेटे को नौकर बना कर रखा। एंगेल्स को बोला - तू बाप बन जा। बाहर क्रांति, घर में सबसे गंदा शोषण।

2. मार्टिन हाइडेगर - दर्शन का नाजी
लिखता है कि प्रामाणिक बनो।
किया - 1933 में नाजी पार्टी जॉइन की। रेक्टर बनते ही यहूदी प्रोफेसरों को निकलवाया। छात्रों को हिटलर का नारा लगवाया। और खुद की प्रेमिका यहूदी थी जिसके आगे पीछे वह कुकुर बनकर घूमता था । मतलब कुर्सी के लिए कुछ भी बेच देगा।

3. सार्त्र और सिमोन द बोउवार - स्वतंत्रता के शिकारी
नारा - शादी गुलामी है, खुला रिश्ता आजादी है।
धंधा - बोउवार अपनी 15-17 साल की छात्राओं को फुसला कर सार्त्र के पास भेजती थी। जिस लड़की ने मना किया, उसकी इज्जत उछाली। सरकार ने इसी कारण बोउवार का लाइसेंस छीन लिया था। 1977 में दोनों ने एक चिट्ठी पर साइन किया जिसमें कहा गया - बच्चों के साथ संबंध भी जायज है। ये आजादी नहीं, गुरु का सबसे घटिया क्राइम है।

4. मिशेल फूको - सत्ता का नशेड़ी
लिखता है कि सत्ता तुम्हें हर जगह दबाती है।
किया - ट्यूनीशिया में पैसे देकर नाबालिग लड़कों के साथ संबंध। खुद लिखा - यहाँ मुझे असली आजादी मिलती है। दूसरों की सत्ता पर किताब, अपनी सत्ता का नशा।

5. मालिनोव्स्की - आदिवासी का दुश्मन
किताब - आदिवासियों को उनके बीच रहकर समझो।
डायरी - जब मरा तब डायरी छपी। उसी आदिवासियों के लिए लिखा है - "काले, बदबूदार, नफरत है इनसे"। दिन में उनके साथ खाना, रात में डायरी में गाली।

6. लुई अल्थूसर - आखिरी मर्डर
लिखता है कि आदमी कुछ नहीं, सिस्टम सब कुछ है।
किया - 1980 में अपनी ही बीवी हेलेन का गला दबा कर मार दिया। वही बीवी जिसने 30 साल उसके पागलपन को झेला था। कोर्ट ने कहा पागल है, छोड़ दो। सिस्टम के नाम पर इंसान को खत्म करने वाला आखिर में सच में इंसान को खत्म कर गया।

7. कामू, रसेल, वेबर - तीन तरह के पाखंडी
कामू - लिखता था नैतिक बनो, पत्नी अस्पताल में सड़ रही थी और वो पेरिस में आशिकी कर रहा था।
रसेल - लिखता था शादी जेल है, 4 शादियां की, दर्जनों अफेयर, बेटा पागल हो गया, बेटी बर्बाद।
वेबर - इतना नैतिक बना कि खुद नपुंसक हो गया, प्रेमिका थी पर छूने से डरता था कि पाप लग जाएगा।

इन्हें पढ़ने के बाद आप सोचिए किन लोगों को पढ़ रहे थे। यूनिवर्सिटी में मार्क्स की तस्वीर लगी है, घर दफ्तर में मार्क्स की तस्वीर लगी है। इसका अर्थ है कि हर जगह सुविधानुसार औरतों का भोग करो और बच्चा पैदा हो जाए तो खलनायक रंजीत जैसे बोल दो, इतनी लड़कियां आती हैं किस किस बच्चे का बाप बनूँगा।

नारा होना था कि मार्क्स जात धोखा है।

Saturday, 3 October 2026

श्राद्ध पितृ कर्म

🌷 पितरों का परिचय, महत्व, कर्म एवं विधान।
       (ऋग्वेद, महाभारत, मनुस्मृति, गरुड़पुराण, विष्णुपुराण,      
         स्कंदपुराण, वायुपुराण आदि के आधार पर विवरण)
🍁1. पितरों का परिचय
‘पितृ’ शब्द संस्कृत के ‘पिता’ से निष्पन्न है, जिसका अर्थ पूर्वज या पिता-पितामह आदि है।
शास्त्रों में पितर दो प्रकार के माने गए हैं—
व्यक्तिगत पितर (व्यक्ति विशेष के दिवंगत पिता, पितामह, प्रपितामह आदि)
सार्वभौम पितर (मनुष्य जाति के आदि पूर्वज)

ऋग्वेद (मंडल 10, सूक्त 15 – पितृ सूक्त) में पितरों को ‘सोमवन्त:’, ‘बर्हिषद:’ और ‘अग्निष्वात्ता:’ नाम से तीन श्रेणियों में वर्णित किया गया है। वे परलोक में स्थित हैं और वंशजों के कर्म, दान एवं श्राद्ध से संतुष्ट होकर आशीर्वाद देते हैं।
उनकी उपेक्षा से जीवन में बाधाएँ आ सकती हैं, जबकि श्रद्धापूर्वक तर्पण-श्राद्ध से परिवार में सुख, समृद्धि, संतान और शांति की प्राप्ति होती है।

🍁2. पितृस्थान (पितृलोक)
पितरों का निवास स्थान पितृलोक है।
यह मर्त्यलोक (पृथ्वी) और सूर्यलोक के मध्य या चंद्रमा के पथ के निकट माना गया है। कुछ पुराणों में इसे भुवर्लोक के निकट बताया गया है।
यमराज को पितृसम्राट कहा गया है। पितर सूक्ष्म शरीर में रहते हैं और श्राद्ध-तर्पण के समय पृथ्वी पर आकर अर्पण ग्रहण करते हैं।गरुड़ पुराण एवं विष्णु पुराण में स्पष्ट है कि पितृलोक में वे तृप्ति की प्रतीक्षा करते हैं।

🍁3. पितृकर्म (मुख्य अनुष्ठान)
शास्त्रों में पितृयज्ञ को पंच महायज्ञों में से एक माना गया है (मनुस्मृति 3.70)। मुख्य कर्म निम्नलिखित हैं—
श्राद्ध – श्रद्धापूर्वक पितरों के निमित्त भोजन, दान एवं ब्राह्मण भोजन।
तर्पण (जलदान) – काले तिल, कुश एवं जल से अर्घ्य अर्पण। तीन-तीन अंजलियाँ दी जाती हैं।
पिंडदान – जौ/चावल के आटे में दूध, घी, शहद, शक्कर मिलाकर गोल पिंड बनाकर दक्षिणाभिमुख होकर समर्पण।
दान एवं ब्राह्मण भोजन – गौ, कौआ, कुत्ता, चींटी, गरीब एवं ब्राह्मण को भोजन-वस्त्र दान।
गरुड़ पुराण एवं मत्स्य पुराण में कहा गया है कि पिंडदान से पशु-पक्षी योनि में पड़े पितर भी तृप्त होते हैं।

🍁4. पितरों का प्रभाव
अनुग्रह होने पर – आयु, स्वास्थ्य, सुसंतति, धन-धान्य, यश, बल, वैभव एवं मोक्ष की प्राप्ति।
असंतोष होने पर – कलह, रोग, आर्थिक कठिनाई, मानसिक अशांति, संतान संबंधी बाधाएँ।
महाभारत एवं पुराणों में स्पष्ट है कि पितर प्रसन्न होकर वंशजों को वरदान देते हैं।

🍁5. वैदिक एवं पुराणिक दृष्टि
ऋग्वेद (10.15 एवं 10.14) में पितरों का आह्वान एवं यम-वरुण का उल्लेख।
महाभारत (अनुशासन पर्व) में भीष्म पितामह युधिष्ठिर को श्राद्ध की महिमा बताते हैं। महर्षि निमि को प्रथम श्राद्धकर्ता माना गया।
भागवत पुराण, गरुड़ पुराण, विष्णु पुराण, मत्स्य पुराण में श्राद्ध की विस्तृत महिमा।
पितरों को देवताओं के समान अन्न-जल से तृप्त करना आवश्यक बताया गया है। विश्वेदेव पितरों के रक्षक हैं, अतः पहले उनकी पूजा की जाती है।

🍁6. पितृदोष एवं निवारण
जन्मकुंडली में यदि पूर्वजों की अधूरी इच्छाएँ या अतृप्त आत्मा के कारण पितृदोष बनता है, तो संतान, विवाह, स्वास्थ्य एवं अर्थ संबंधी बाधाएँ आती हैं।
निवारण के शास्त्रोक्त उपाय –
नियमित श्राद्ध, तर्पण एवं पिंडदान
गायत्री मंत्र जप, रुद्राभिषेक
नारायण नागबलि, त्रिपिंडी श्राद्ध
गया, ब्रह्मकपाल, काशी आदि तीर्थों में श्राद्ध
दान, सेवा एवं गौ-सेवा
गरुड़ पुराण में कहा गया है – “गयाश्राद्धात् प्रमुच्यन्ते पितरो भवसागरात्।”

🍁7.  पितृ मंत्र
 (शास्त्रोक्त पितृ-तर्पण, श्राद्ध एवं पिण्डदान के प्रमुख मंत्र )
(ऋग्वेद, यजुर्वेद, पुराण एवं धर्मशास्त्रीय परम्परा के आधार पर)

🌷 १. पितृ-नमस्कार एवं स्वधा-मंत्र
🍁ॐ पितृभ्यः स्वधा नमः।
🍁ॐ सर्वपितृभ्यः स्वधा नमः।
🍁ॐ पितृदेवतायै नमः।
🍁ॐ सर्वपितृदेवताभ्यो नमः।
🍁ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं स्वधायै नमः।
🍁ॐ सर्वपितृभ्यः स्वधा नमः।

🌷 २. स्वधा देवी का मंत्र
🍁ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं स्वधायै नमः।
अर्थ—स्वधा देवी को प्रणाम। यह मंत्र पितृकर्म में स्वधा-तत्त्व की उपासना के लिए प्रयुक्त किया जा सकता है।

🌷 ३. सर्वपितृ प्रसन्नता प्रार्थना
🍁ॐ सर्वपितृ प्रसन्न भवः॥ या प्रार्थनात्मक रूप में—
🍁ॐ सर्वपितरः प्रसन्नाः भवन्तु॥
अर्थ—सभी पितृदेव प्रसन्न हों।
नोट: “ॐ सर्व पितृ प्रसन्न भवः” को वैदिक मूलमंत्र के रूप में प्रस्तुत न करके प्रार्थना-वाक्य के रूप में रखना अधिक उचित है।

🌷 ४. यजुर्वेदीय परम्परा के स्वधा-मंत्र
🍁ॐ पितृभ्यः स्वधायिभ्यः स्वधा नमः।
🍁ॐ पितामहेभ्यः स्वधायिभ्यः स्वधा नमः।
🍁ॐ प्रपितामहेभ्यः स्वधायिभ्यः स्वधा नमः।

🌷 ५. पितृ-आवाहन मंत्र
🍁ॐ आगच्छन्तु मे पितरः सर्वे, गृह्णन्तु जलाञ्जलिम्।
अर्थ—मेरे सभी पितर यहाँ पधारें और इस जलाञ्जलि को स्वीकार करें।

🌷 ६. पिता, पितामह एवं प्रपितामह के लिए तर्पण
🍁 पिता — वसु-स्वरूप
ॐ अद्य अस्मत्पिता [गोत्र]गोत्रः [नाम] शर्मा वसुस्वरूपः।
इदं सतिलं गोपुच्छोदकं तस्मै स्वधा नमः।
तस्मै स्वधा नमः। तस्मै स्वधा नमः॥
🍁 पितामह — रुद्र-स्वरूप
ॐ अद्य अस्मत्पितामहः [गोत्र]गोत्रः [नाम] शर्मा रुद्रस्वरूपः।
इदं सतिलं गोपुच्छोदकं तस्मै स्वधा नमः।
तस्मै स्वधा नमः।बतस्मै स्वधा नमः॥
🍁 प्रपितामह — आदित्य-स्वरूप
ॐ अद्य अस्मत्प्रपितामहः [गोत्र]गोत्रः [नाम] शर्मा आदित्यस्वरूपः।
इदं सतिलं गोपुच्छोदकं तस्मै स्वधा नमः।
तस्मै स्वधा नमः। तस्मै स्वधा नमः॥

🌷 ७. मातृ-पक्ष के तर्पण-मंत्र
🍁 माता — वसु-स्वरूपा
ॐ अद्य अस्मन्माता [गोत्र]गोत्रोत्पन्ना [नाम] देवी वसुस्वरूपा।
इदं सतिलं गोपुच्छोदकं तस्यै स्वधा नमः।
तस्यै स्वधा नमः। तस्यै स्वधा नमः॥
इसी प्रकार—
पितामही — रुद्रस्वरूपा
प्रपितामही — आदित्यस्वरूपा
मातामह — वसु/रुद्र/आदित्य परम्परा अनुसार
मातामही एवं अन्य ज्ञात-अज्ञात पितृगण
के लिए नाम एवं गोत्र के अनुसार तर्पण किया जाता है।

🌷 ८. सर्वपितृ तर्पण
🍁ॐ सर्वपितृणां तृप्तये इदं तिलोदकं स्वधा नमः।
🍁ॐ दिव्याय पितृगणाय नमः।
तृप्यन्ताम्। इदं जलं सतिलं सयवं गृह्णन्ताम्॥

🌷 ९. ऋग्वैदिक पितृ-सूक्त के प्रमुख मंत्र
🍁 ऋग्वेद १०.१५
उदीरतामवर उत्परास उन्मध्यमाḥ पितरः सोम्यासः।
असुं य ईयुरवृका ऋतज्ञास्ते नोऽवन्तु पितरो हवेषु॥
🍁
इदं पितृभ्यो नमो अस्त्वद्य ये पूर्वासो य उपरास ईयुः।
ये पार्थिवे रजस्या निषत्ताः ये वा नूनं सुवृजनासु विक्षु॥

🌷 १०. पितृ-गायत्री
🍁ॐ पितृगणाय विद्महे जगद्धारिणे धीमहि।
तन्नः पितृः प्रचोदयात्।।
🍁ॐ पितृदेवाय विद्महे प्रपितामहाय धीमहि।
तन्नः पितृः प्रचोदयात्॥
महत्त्वपूर्ण: इन दोनों को वैदिक ऋचा न कहकर पितृ-गायत्री/प्रार्थना-मंत्र के रूप में रखना अधिक सुरक्षित है।

🌷 ११. सर्वपितृ गायत्री-प्रार्थना
🍁ॐ सर्वपितृभ्यो विद्महे।पितृदेवेभ्यो धीमहि।तन्नः पितरः प्रचोदयन्तु॥
यह भी प्रार्थनात्मक गायत्री-रचना के रूप में रखें, न कि किसी वेद की मूल ऋचा के रूप में।

🌷 १२. पितृ-संबोधन मंत्र
🍁ॐ नमो वः पितरो रसाय। नमो वः पितरः शोषाय।
नमो वः पितरो जीवाय। नमो वः पितरः स्वधायै।
नमो वः पितरो घोराय। नमो वः पितरो नमो नमः॥

🌷 १३. श्राद्ध में विष्णु-मंत्र
🍁ॐ नमो भगवते वासुदेवाय॥
अर्थ—भगवान वासुदेव को नमस्कार।

🌷 १४. विश्वेदेव आवाहन
🍁ॐ विश्वेदेवाः आगत शृणुत मे हवम्।
इदं बर्हिः निषीदत॥
श्राद्ध-विधि में पितृकर्म से पूर्व विश्वेदेवों का आवाहन परम्परानुसार किया जाता है।

🌷 १५. महामृत्युञ्जय मंत्र
🍁ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।
उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥
यह मूलतः मृत्यु-निवारण एवं अमृतत्व की वैदिक प्रार्थना है; इसे पितृकर्म में सहायक जप के रूप में रखा जा सकता है।

🌷 १६. तर्पण-संकल्प मंत्र
🍁ॐ अद्य [तिथि-नक्षत्र] अस्मत्पितृ-पितामह-प्रपितामहानां सपत्नीकानाम् अक्षयतृप्तिसम्पादनार्थं पितृतर्पणं करिष्ये॥

वैकल्पिक व्यापक संकल्प
🍁ॐ अद्य श्रुतिस्मृतिपुराणोक्त-सर्वसांसारिक ,सुखसमृद्धिप्राप्तये वंशवृद्धिहेतवे देवर्षिमनुष्यपितृतर्पणमहं करिष्ये॥

🌷 १७. पिण्डदान में पितृ-स्मरण
पिण्डदान के समय संबंधित पितृ का—
नाम + गोत्र + सम्बन्ध + स्वधा का उच्चारण किया जाता है।
उदाहरण—
🍁ॐ अस्मत्पितुः [नाम] [गोत्र]गोत्रस्य इदं पिण्डं स्वधा नमः॥
🍁ॐ अस्मत्पितामहस्य [नाम] [गोत्र]गोत्रस्य इदं पिण्डं स्वधा नमः॥
🍁ॐ अस्मत्प्रपितामहस्य [नाम] [गोत्र]गोत्रस्य इदं पिण्डं स्वधा नमः॥

🌷 १८. तर्पण की सामान्य समापन प्रार्थना
🍁ॐ सर्वे पितरः तृप्यन्तु।ॐ सर्वे पितरः प्रसन्नाः भवन्तु।
ॐ सर्वे पितरः स्वधां गृह्णन्तु।ॐ पितृभ्यः स्वधा नमः॥

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🍁8. विशेष प्रसंग – दानवीर कर्ण की कथा
महाभारत एवं लोक-परंपरा के अनुसार, कर्ण मृत्यु के बाद स्वर्ग पहुँचे तो उन्हें अन्न के स्थान पर स्वर्ण मिला, क्योंकि उन्होंने जीवन में अन्नदान एवं पितृ-तर्पण नहीं किया था।
इंद्र/यमराज की अनुमति से वे 15-16 दिनों के लिए पृथ्वी पर लौटे, पितरों का श्राद्ध-तर्पण-पिंडदान किया और अन्नदान किया। तभी उन्हें तृप्ति मिली।
यही 16 दिन आज पितृपक्ष के रूप में मनाए जाते हैं। यह कथा पितृऋण की महत्ता को सिद्ध करती है।

🍁9. भरणी श्राद्ध
भरणी नक्षत्र में होने वाला श्राद्ध महाभरणी श्राद्ध कहलाता है।
यह गया श्राद्ध के समान फलदायी माना गया है। इस दिन कौवा, कुत्ता एवं गौ को भोजन अवश्य कराना चाहिए।

🍁10. श्राद्ध के नियम एवं विशेष बातें (शास्त्रोक्त)
गाय का घी, दूध, दही ही प्रयोग करें (दस दिन से अधिक बछड़े वाली गाय का)।
चांदी या चांदी-तांबे के बर्तन श्रेष्ठ हैं।
मौन ब्राह्मण भोजन आवश्यक।
समय – कुतप मुहूर्त (दिन का आठवाँ मुहूर्त, लगभग प्रातः 11:30 से दोपहर 12:30/1:00 तक) सर्वश्रेष्ठ। अपराह्न काल भी शुभ। रात्रि, संध्या एवं शुक्ल पक्ष निषिद्ध।
पितरों को प्रिय – खीर, दूध, दही, शहद, घी, जौ।
कौआ, गाय, कुत्ता, चींटी आदि को भोजन अर्पण (पंचबली)।
तुलसी, कुशा, काला तिल, गंगाजल अनिवार्य।
दक्षिण दिशा मुख करके, अपसव्य (जनेऊ दाएँ कंधे पर) होकर कर्म करें।
लहसुन-प्याज, मांस, मदिरा, बासी अन्न वर्जित।
तीन पीढ़ियों तक श्राद्ध का विधान।

🍁11. श्राद्ध स्थलों का शास्त्रोक्त महत्व 
     (गया के अतिरिक्त प्रमुख पितृतीर्थ)

गरुड़ पुराण, विष्णु पुराण, वायु पुराण, स्कंद पुराण एवं अन्य धर्मशास्त्रों में गया को पितृतीर्थराज कहा गया है, किन्तु कई अन्य स्थलों पर भी श्राद्ध-पिंडदान अत्यंत फलदायी एवं मोक्षदायी माना गया है। प्रमुख स्थान निम्नलिखित हैं—
1. गया (बिहार) – सर्वोच्च पितृतीर्थ। विष्णुपद मंदिर एवं फल्गु नदी तट पर पिंडदान से सात पीढ़ियों तक के पितरों को अक्षय तृप्ति एवं मोक्ष मिलता है। गरुड़ पुराण एवं वायु पुराण में इसकी महिमा सर्वोपरि कही गई है।
2. ब्रह्मकपाल (बद्रीनाथ, उत्तराखंड) – अलकनंदा नदी के तट पर स्थित। स्कंद पुराण (बदरीमहात्म्य) में इसे गया से आठ गुना अधिक फलदायी बताया गया है। यहाँ पिंडदान करने से पितरों को पूर्ण एवं अंतिम मुक्ति (मोक्ष) मिलती है, जिससे आगे वार्षिक श्राद्ध की आवश्यकता नहीं रहती। ब्रह्मा जी ने स्वयं यहाँ श्राद्ध किया था तथा शिव जी को ब्रह्महत्या से मुक्ति मिली थी। पांडवों ने भी यहाँ पिंडदान किया था। इसे अंतिम (अंतिम श्राद्ध) स्थल माना जाता है।
3. प्रयागराज (त्रिवेणी संगम, उत्तर प्रदेश) – तीर्थराज। गंगा-यमुना-सरस्वती संगम पर तर्पण-पिंडदान से 14 पीढ़ियों तक के पितर तृप्त होते हैं। मत्स्य पुराण एवं अन्य ग्रंथों में इसकी विशेष महिमा है।
4. काशी / वाराणसी (उत्तर प्रदेश) – मणिकर्णिका घाट एवं पिशाचमोचन कुंड। गरुड़ पुराण में कहा गया है कि यहाँ त्रिपिंडी श्राद्ध से प्रेतबाधा, अकाल मृत्यु एवं अन्य दोषों से मुक्ति मिलती है। शिव की नगरी होने से मोक्षदायी है।
5. रामेश्वरम (तमिलनाडु) – अग्नि तीर्थम्। भगवान राम ने लंका युद्ध में मृत योद्धाओं एवं पितरों का यहाँ श्राद्ध किया था। यहाँ पिंडदान से पितर पूर्ण संतुष्ट होते हैं।
6. हरिद्वार (उत्तराखंड) – हर की पैड़ी, नारायणी शिला एवं कुशावर्त घाट। गंगा तट पर तर्पण-पिंडदान अत्यंत पुण्यदायी है। स्कंद पुराण में उल्लेख।
7. अन्य प्रमुख शास्त्रोक्त स्थल –
देवप्रयाग (उत्तराखंड) – भागीरथी-अलकनंदा संगम।
कुरुक्षेत्र / पेहोवा (हरियाणा) – सरस्वती तट।
पुष्कर (राजस्थान) – ब्रह्मा की तपोभूमि।
उज्जैन / सिद्धवट (मध्य प्रदेश)।
त्र्यम्बकेश्वर (महाराष्ट्र)।
जगन्नाथ पुरी (ओडिशा)।
बिंदू सरोवर / सिद्धपुर (गुजरात)।
लोहार्गल (राजस्थान)।
नैमिषारण्य, अयोध्या, मथुरा, गंगासागर आदि।
विष्णुधर्मसूत्र, शंख स्मृति एवं पुराणों में कहा गया है कि नदी तट, पर्वत, तीर्थ, कुंज एवं गोबर से लिप्त पवित्र स्थलों पर किया गया श्राद्ध अक्षय फलदायी होता है। गया, प्रयाग, काशी, पुष्कर, कुरुक्षेत्र आदि पर दिया गया दान कोटि गुना फल देता है।

🍁12. पितृपक्ष का महत्व
भाद्रपद पूर्णिमा से आश्विन अमावस्या तक के 16 दिन पितृपक्ष कहलाते हैं।इस अवधि में पितर पृथ्वी पर आते हैं।
पितृऋण से मुक्ति, वंश की उन्नति, संतान, स्वास्थ्य एवं धन की वृद्धि, पूर्वजों की आत्मा को शांति एवं वंशजों को सुख-समृद्धि
मनुस्मृति एवं पुराणों में तीन ऋण बताए गए हैं – 
देवऋण, ऋषिऋण एवं पितृऋण। 
श्राद्ध से पितृऋण चुकता है।
निष्कर्ष – शास्त्रों का स्पष्ट निर्देश है कि श्रद्धापूर्वक श्राद्ध, तर्पण एवं पिंडदान करने से पितर तृप्त होते हैं और वंश पर उनकी कृपा बनी रहती है। गया सर्वश्रेष्ठ है, किन्तु ब्रह्मकपाल (बद्रीनाथ) को स्कंद पुराण में गया से भी अधिक शक्तिशाली अंतिम मुक्ति स्थल बताया गया है। यह केवल कर्मकांड नहीं, बल्कि कृतज्ञता एवं धर्म का पालन है।

(सभी विवरण ऋग्वेद, महाभारत, मनुस्मृति, गरुड़ पुराण, विष्णु पुराण, स्कंद पुराण, वायु पुराण एवं अन्य धर्मशास्त्रों पर आधारित हैं। व्यक्तिगत विधि के लिए योग्य पंडित से परामर्श लें।)

धार्मिक संदेश
━━━━━━━━पितृपक्ष में श्रद्धापूर्वक तर्पण, श्राद्ध, पिण्डदान, ब्राह्मण-सत्कार तथा यथाशक्ति दान अपनी कुल-परम्परा और योग्य आचार्य के निर्देशानुसार करना चाहिए।
“श्रद्धया दीयते यत् तत् श्राद्धम्।”
अर्थात् पितरों के निमित्त श्रद्धा और विधिपूर्वक किया गया कर्म ही श्राद्ध कहलाता है।

🙏 पितृदेवों की शान्ति, तृप्ति एवं सद्गति तथा समस्त वंश के कल्याण की मंगलकामना।
॥ ॐ पितृभ्यो नमः॥ ॐ स्वधायै नमः ॥ ॐ नारायणाय नमः ॥