पुष्कर
१. अर्थ-
(१) पुष्कर-पुष्कर का शाब्दिक अर्थ है, पुष्ट करने वाला। इसके कई अर्थ हैं, किन्तु सामान्यतः यह कमल के लिये प्रयुक्त होता है। पृथ्वी भी पुष्कर है, जो जीवों को पुष्ट करती है।
इसका एक पर्याय पद्म है। पृथ्वी पद्म है, जिस पर पद रखते हैं।
अन्य प्रचलित शब्द कमल है, जो क = जल का मल या उससे उत्पन्न है। लक्ष्मी को कमला कहते हैं। सम्पत्ति रूप में यह क = कर का मल है, हाथों के परिश्रम से उत्पन्न। अतः सम्पत्ति को हाथ का मैल कहते हैं। लक्ष्मी को पद्मा, पद्मालया, भी कहते हैं-
लक्ष्मी पद्मालया पद्मा कमला श्रीर्हरिर्प्रिया। (अमर कोश, १/१/२७)
कमल का पत्ता जल से उत्पन्न होता है, कितु उससे जल चिपकता नहीं है। इसी प्रकार जीवन्मुक्त व्यक्ति संसार में रहते हुए भी उसमें लिप्त नहीं होता।
ब्रह्मण्याधाय कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा करोति यः। लिप्यते न स पापेन पद्मपत्रमिवाम्भसा॥ (गीता, ५/१०)
कमल जल जैसे स्रोत से सृष्टि का प्रतीक है। अतः इसकी उत्पत्ति ब्रह्मा के कर्ता या यज्ञ रूप विष्णु के नाभि से कही जाती है, जिस पर स्रष्टा रूप ब्रह्मा आसीन हैं। ब्रह्मा का ज्ञान रूप सरस्वती भी पद्म पर स्थित हैं।
पद्म दल का अर्थ है, सृष्टि की विविध दिशायें या प्रकार। सृष्टि केन्द्र रूप में इसे उल्ब (गर्भ-नाल), मेरु भी कहते हैं।
(२) ब्रह्मा रूप- गायत्री मन्त्र के ३ पादों के अनुसार ब्रह्मा, विष्णु, शिव के स्वरूप-
ब्रह्मा-मूल स्रोत पदार्थ, ३ धामों के ७ लोक, ज्ञान रूप त्रयी वेद, प्रतीक-पलास, दण्ड से ३ पत्ते निकलने पर मूल भी बचा रहता है। इसी तरह त्रयी विभाजन के बाद अविभाज्य अथर्व वेद रहता है।
विष्णु-सृष्टि इच्छा, सृष्टि निर्माण-विनाश क्रिया, व्यक्ति रूप से स्वतन्त्र चेतना जिसका प्रतीक अश्वत्थ है (गीता, १०/२६)
शिव-मूल चेतना, तेज स्तरों का अनुभव, मन के भीतर ज्ञान दाता। प्रतीक वट वृक्ष है जिसकी हवाई जड़ से वैसा ही वृक्ष बनता है। गुरु ज्ञान दे कर अपने जैसा शिष्य बनाता है।
पृथ्वी पर मनुष्य रूप में ब्रह्मा द्वारा सभ्यता और ज्ञान का विकास, प्रजापति। सृष्टि की असुरों से रक्षा के लिए विष्णु के १० या ३२ अवतार। शिव के अवतार २८ व्यास।
२. आधिदैविक पद्मनाभ-
आधिदैविक तथा आध्यात्मिक अर्थ भौतिक शब्दों के ही अर्थ का विस्तार है, जिसे वृद्धि कहा गया है। भागवत माहात्म्य में कहा है कि ज्ञान और वैराग्य की उत्पत्ति द्रविड में हुई, वृद्धि कर्णाटक में। ज्ञान का मूल वेद है, वह श्रुति आदि ज्ञानेन्द्रियों द्वारा निसर्ग से प्राप्त ज्ञान है, अतः इसे श्रुति तथा निगम कहते है। श्रुति का ग्रहण कर्ण से होता है, अतः जहां अर्थों का विभिन्न संस्थाओं में विस्तार हुआ, उसे कर्णाटक कहा गया।
उत्पन्ना द्रविडे साऽहं वृद्धिं कर्णाटके गता। क्वचित् क्वचित् महाराष्ट्रे गुर्जरे जीर्णतां गता॥४८॥
(पद्म पुराण उत्तर खण्ड श्रीमद् भागवत माहात्म्य, भक्ति-नारद समागम नाम प्रथमोऽध्यायः)
वृद्धि अर्थ में मनुष्य द्वारा जो पृथ्वी पर दीखता है, उसी का आकाश में विस्तार करते हैं। यथा पिण्डे, तथा ब्रह्माण्डे-मनुष्य शरीर की ब्रह्माण्ड से तुलना विस्तार से चरक संहिता, शरीर स्थान, अध्याय ५ में है। मनुष्य का जन्म माता के गर्भ में होता है तो उसका शरीर माता के गर्भ से नाल द्वारा जुड़ा रहता है। आकाश में भी सृष्टि के हर स्तर पर स्रष्टा पुरुष की नाभि कमल से सृष्टि रूप ब्रह्मा की उत्पत्ति का वर्णन है।
(१) हिरण्यगर्भ मेरु या उल्ब-अव्यक्त ब्रह्म पूरुष (४ पाद का), हिरण्यगर्भ रूप सृष्टि का आरम्भ उल्ब है, उससे उत्पन्न विश्वों का क्रम ब्रह्मा रूप है। विश्व क्रम हैं-संयती (पूर्ण विश्व), क्रन्दसी (ब्रह्माण्ड, आकाशगङ्गा), रोदसी (सौर मण्डल), पृथ्वी। सूर्य से प्रकाश का विकिरण उसका रुदन है, उसका क्षेत्र रोदसी। ब्रह्माण्ड के खर्व संख्यक सूर्यों के मिलित रुदन को क्रन्दन कहते हैं, उसका क्षेत्र क्रन्दसी है।
हिरण्यगर्भः समवर्तताग्रे भूतस्य जातः पतिरेक आसीत्। स दाधार पृथिवीमुत द्यां कस्मै देवाय हविषा विधेम॥
यं क्रन्दसी अवतश्चस्कभाने भियसाने रोदसी अह्वयेथाम्। यस्यासौ पन्था रजसो विमानः कस्मै देवाय हविषा विधेम॥३॥
यस्य द्यौरुर्वी पृथिवी च मही यस्याद उर्वऽन्तरिक्षम्। यस्यासौ सूरो विततो महित्वा कस्मै देवाय हविषा विधेम॥
यस्य विश्वे हिमवन्तो महित्वा समुद्रे यस्य रसामिदाहुः। इमाश्च प्रदिशो यस्य बाहू कस्मै देवाय हविषा विधेम॥
(ऋक्, १०/१२१/१,४-६, अथर्व, ४/२/३-५, ७)
हिरण्यगर्भ से ब्रह्माण्ड जन्म पुराणों में भी है, जहां इसे मेरु तथा उल्ब भी कहा है।
एक काल समुत्पन्नं जल बुद्बुदवच्च तत्। विशेषेभ्योऽण्डमभवत् बृहत् तदुदके शयम्॥३६॥
तस्मिन् कार्यस्य करणं संसिद्धिः परमेष्ठिनः। प्राकृतेऽण्डे विवृत्तः स क्षेत्रज्ञो ब्रह्म-संज्ञितः॥३७॥
स वै शरीरी प्रथमः स वै पुरुष उच्यते। आदि कर्त्ता स भूतानां ब्रह्माग्रे समवर्तत॥३८॥
यमाहुः पुरुषं हंसं प्रधानात् परतः स्थितम्। हिरण्यगर्भं कपिलं छन्दो-मूर्तिं सनातनम्॥३९॥
मेरुरुल्बमभूत् तस्य जरायुश्चापि पर्वताः। गर्भोदकं समुद्राश्च तस्यास परमात्मनः॥४०॥ (कूर्म पुराण, १/४)
ब्रह्माण्ड पुराण (१/१/३/२५-२९) में प्रायः यही वर्णन है।
(२) स्वयम्भू मण्डल-यह खर्व ब्रह्माण्डों का समूह है। ब्रह्माण्डों के बीच परस्पर आकर्षण (संकर्षण) ही उल्ब या पद्म है, जिस पर ब्रह्माण्ड स्थित है।
(३) कूर्म मेरु-यह ब्रह्माण्ड का निर्माण क्षेत्र है, जो उससे १० गुणा बड़ा है। इसका आकार ब्रह्माण्ड से १० गुणा बड़ा, अर्थात् ५६ अहर्गण (शक्वरी छन्द = रात्रि क्षेत्र) है। जगती छन्द ब्रह्माण्ड की माप है, गायत्री लोकों की माप है (मनुष्य से आरम्भ कर पृथ्वी, सौर मण्डल की भूमि, ब्रह्माण्ड, पूर्ण जगत् क्रमशः २ घात २४ = कोटि गुणा बड़े हैं-विष्णु पुराण, २/७/३-४)। त्रिष्टुप् सौर मण्डल के क्षेत्रों तथा महर्लोक की माप है।
यद्गायत्रे अधि गायत्रमाहितं त्रैष्टुभाद्या त्रैष्टुभं निरतक्षत।
यद्वा जगज्जगत्याहितं पदं य इतद्विदुस्ते अमृतत्वमानशुः॥ (ऋक्, १/१६४/२३)
शङ्कु भवत्यह्नो धृत्यै यद्वा अधृतँ शङ्कुना तद्दाधार॥११॥
तद् (शङ्कु साम) उ सीदन्तीयमित्याहुः॥१२॥ (ताण्ड्य महाब्राह्मण, ११/१०/११-१२)
सप्तपदा वै तेषां (छन्दसां) परार्ध्या शक्वरी। (शतपथ ब्राह्मण, ३/९/२/१७)
यदिमाँल्लोकान् प्रजापतिः सृष्ट्वेदं सर्वमशक्नोद्यदिदं किञ्च तच्छक्वर्योऽभवंस्तच्छक्वरीणां शक्वरीत्वम्॥ (ऐतरेय ब्राह्मण ५/७)
मानेन तस्य कूर्मस्य कथयामि प्रयत्नतः।
शङ्कोः शतसहस्राणि योजनानि वपुः स्थितम्॥ (नरपति जयचर्या, स्वरोदय, कूर्म चक्र)
(शङ्कु = शंख = १० घात १३, शत सहस्र शङ्कु = १० घात १८, ब्रह्माण्ड = १००० योजन की पृथ्वी x १ कोटि x १ कोटि)
(४) परमेष्ठी मेरु-ब्रह्माण्ड सबसे बड़ी रचना होने के कारण परमेष्ठी है। इसका केन्द्र कृष्ण (Black hole) है जिसके आकर्षण से ३०,००० प्रकाश-वर्ष (प्रकाश योजन) की दूरी पर सूर्य उसके केन्द्र की परिक्रमा कर रहा है।
अस्य मूलदेशे त्रिंशद् योजन सहस्रान्तर आस्ते या वै कला भगवतस्तामसी समाख्यातानन्त इति सात्वतीया द्रष्टृ दृश्ययोःसङ्कर्षणमहमित्यभिमान लक्षणं यं सङ्कर्षणमित्याचक्ष्यते॥१॥ यस्येदं क्षितिमण्डलं भगवतोऽनन्तमूर्तेः सहस्रशिरस एकस्मिन्नेव शीर्षाणि ध्रियमाणं सिद्धार्थ इव लक्ष्यते॥२॥ (भागवत पुराण, ५/२५/१-२)
आकृष्णेन रजसा वर्तमानो निवेशयन्नमृतं मर्त्यं च। हिरण्ययेन सविता रथेना देवो याति भुवनानि पश्यन्॥
(ऋक्, १/३५/२, वाजसनेयि यजु ३३/४३, तैत्तिरीय संहिता, ३/४/११/२)
आकृष्णेन = आकर्षण द्वारा, ब्लैक होल द्वारा जो सभी रंगों को आकर्षित करता है।
(५) सौर मण्डल-सूर्य विष्णु का प्रत्यक्ष रूप है, जिसने अपने आकर्षण से पृथ्वी को धारण किया है।
पृथिवी त्वया धृता लोकाः, देवि त्वं विष्णुना धृता (भूमि पूजन मन्त्र)-यह निम्न वेद मन्त्र का सारांश है-
अनवर्णे इमे भूमी इयं चासौ च रोदसी, किं स्विदत्रान्तराभूतं येनेमे विधृते उभे। विष्णुना विधृते भूमी इति वत्सस्य वेदना, इरावती धेनुमती हि भूतं सूयवसिनी मनुषे दशस्या, व्यष्टभ्नाद् रोदसी विश्णवेते वाधयं पृथ्वीमभिति मयूखैः। (तैत्तिरीय आरण्यक, १/८/४/६)
सूर्य ‘यह’ या निकट का सविता है, इसका असौ, यत् या एष से संकेत है। गायत्री मन्त्र का तत्-सविता, सूर्य के पिता का भी पिता या परमपिता है।
असौ बा आदित्यो (सूर्यः) बृहज्ज्योतिः (शतपथ ब्राह्मण, ६/३/१/१५)
य एष (सूर्यः) तपति (शतपथ ब्राह्मण, १४/१/४/२)
सूर्य का आकर्षण कमल-नाल है, उस पर पृथ्वी ही पद्म है।
इयं (पृथिवी) वै पुष्करपर्णम् (शतपथ ब्राह्मण, ७/४/१/१२)
तस्मिन् हिरण्मये पद्मे बहु योजन विस्तृते। सर्व तेजो गुणमये पार्थिवैर्लक्षणैर्वृते॥
तच्च पद्म पुराभूतं पृथिवी रूपमुत्तमम्।
नारायण समुद्भूतं प्रवदन्ति महर्षयः॥ (पद्मपुराण, सृष्टि खण्ड, ४०/२-३)
३. पार्थिव पुष्कर-
(१) मनुष्य ब्रह्मा- महाभारत, शान्ति पर्व, अध्याय ३४८ में मनुष्य रूप में ७ ब्रह्मा का वर्णन है-
(१) मुख्य (नारायण के मुख से)-वैखानस को उपदेश,
(२) नेत्र से-सोम को उपदेश, उनसे रुद्र, वालखिल्यों को,
(३) वाणी से-इसे शान्ति पर्व ३४९/४९ में वाणी का पुत्र अपान्तरतमा कहा है, उनके माता पिता के लिये वाणी-हिरण्यगर्भाय नमः यज्ञ में पाठ होता है। उनसे त्रिसुपर्ण ऋषि को उपदेश। गर्ग संहिता (६/१४/८) में अपान्तरतमा द्वारा गौतम-पुत्र मेधावी को पर्वत बनने का शाप , (७/४०/३५) में अपान्तरतमा ऋषि द्वारा हरिण उपद्वीप (मलगासी द्वीप, मृगव्याध या मृगतस्कर = मगाडास्कर) में तप, अपान्तरतमा आश्रम में गरुड के पक्ष का पतन, (७/४२/२३) में अपान्तरतमा शकुनि द्वारा शम्बर आदि दैत्यों को मोक्ष उपाय रूप में भक्ति के प्रकारों का कथन, ब्रह्मवैवर्त्त पुराण (१/८/२७) में अपान्तरतमा ऋषि का ब्रह्मा के गले से प्रादुर्भाव), (१/१२/४) में ब्रह्मा - पुत्र, (१/२२/१७) में अपान्तरतमा नाम की निरुक्ति, तैत्तिरीय आरण्यक (८/९) सायण भाष्य में अपान्तरतमा का जन्मान्तर में कृष्ण द्वैपायन व्यास बनना।)
(४) आदि कृत युग में (श्लोक ३४) कर्ण से ब्रह्मा की उत्पत्ति-आरण्यक, रहस्य. और संग्रह सहित वेद क्रम से स्वारोचिष मनु, शंखपद, दिक्पाल, सुवर्णाभ को उपदेश।
(५) आदि कृत युग में (श्लोक ४१) नासिका से ब्रह्मा की उत्पत्ति- क्रम से वीरण, रैभ्य मुनि, दिक्पाल कुक्षि को उपदेश।
(६) अण्डज ब्रह्मा (शान्ति पर्व ३४९/१७ में भी)-से बर्हिषद् मुनि, ज्येष्ठसामव्रती हरि, राजा अविकम्पन को उपदेश।
(७) पद्मनाभ ब्रह्मा से दक्ष, विवस्वान्, वैवस्वत मनु, इक्ष्वाकु को उपदेश। यह सम्भवतः मणिपुर के निकट हिमालय के पूर्व भाग में थे। उनके नाम पर त्रिविष्टप् का पूर्व भाग ब्रह्म विटप (ब्रह्मपुत्र नदी का स्रोत क्षेत्र), ब्रह्मपुत्र, ब्रह्म देश (बर्मा, अभी म्याम्मार = महा + अमर) हैं।
इनके अतिरिक्त २ अन्य ब्रह्मा थे। स्वायम्भुव मनु के बहुत बाद सभ्यता नष्ट हो गयी तो द्वितीय व्यास कश्यम ने उसका उद्धार किया। अतः उनको भी ब्रह्मा तथा प्रजापति कहा गया है। उनका समय १७,५०० ईपू. था जब अदिति के पुनर्वसु नक्षत्र से वर्ष का अन्त और आरम्भ होता था-अदितिर्जातम्, अदितिर्जनित्वम् (ऋक्, १/८९/१०, वाज. यजु, २५/२३)
राजस्या ब्रह्मणोंऽशेन मारीचः कश्यपोऽभवत्॥ (ब्रह्माण्ड पुराण, २/३/३/१०५)
कश्यपो ब्रह्मणोंऽशश्च पृथिव्या अदितिस्तथा॥ (ब्रह्माण्ड पुराण, २/३/७१/२३८)
द्वापरे प्रथमो व्यासो मनुः स्वायम्भुवो मतः॥१॥
द्वितीये द्वापरे चैव वेदव्यासः प्रजापतिः॥२॥ (कूर्म पुराण, पूर्व भाग, अध्याय ५२)
इनके कई स्थान अनुमानित हैं-कैस्पियन समुद्र (नाम समानता), कश्मीर या कश्यप-मीर (नीलमत पुराण), या थाइलैण्ड के बैंगकाक तथा चम्पक पर्वत वियतनाम की प्राचीन राजधानी चम्पा) के बीच मणिपर्वत पर। सम्भवतः यहां के मेरु को मणिपर्वत कहा है।
विकङ्कस्याचलेन्द्रस्य मणिशैलस्य चान्तरे। शतयोजन विस्तीर्णं द्वियोजन शतायतम्॥१६॥
विपुलं चम्पकवनं सिद्ध चारण सेवितम्॥१७॥ तत्राश्रमं भगवतः कश्यपस्य प्रजापतेः।
सिद्ध साध्य गणाकीर्णं नानाश्रुति विभूषितम्॥२२॥ (वायु पुराण, ३७/१६-२२)
पुष्कर कई थे अतः वहां क ब्रह्मा भी भिन्न होंगे।
(२) त्रिपुष्कर-पुराण में ३ पुष्करों का उल्लेख है (पद्म पुराण, १/१५/१५१, १/१९-२०, अग्नि पुराण, २११/८, स्कन्द पुराण, ६/४५, १७९)-उज्जैन से १२ अंश पश्चिम का पुष्कर (विष्णु पुराण, २/८/२८), इन्द्रप्रस्थ पुष्कर (अजमेर, आबू पर्वत, पद्म पुराण, १/२० आदि)-
पृथूदके गयाशीर्षे नैमिषे पुष्करत्रये॥ (स्कन्द पुराण, ६/४/३७)
स्कन्द पुराण, अध्याय (६/१७९/५४) के अनुसार ३ पुष्कर हैं-
ज्येष्ठ-पुष्कर द्वीप में न्यग्रोध नामक स्थान के निकट।
मध्य-उज्जैन के १२ अंश पश्चिम उजबेकिस्तान का बुखारा।
कनीयक-अजयमेरु (अजमेर) का पुष्कर जहां सरस्वती धारा बहती थी।
तीन पुष्कर स्थानों की तरह त्रिपुष्कर योग भी होता है-
त्रिपादेषु च ऋक्षेषु यदा भद्रा तिथिर्भवेत्॥५७॥
भौमादित्यशनैश्चारी विज्ञेयं तत् त्रिपुष्करम्॥५८॥(अग्नि पुराण, १२१/५७-५८)
(३) पुष्कर द्वीप के ब्रह्मा-इनका स्थान पुष्कर द्वीप या दक्षिण अमेरिका कहा है (मत्स्य पुराण, १२३/३९, विष्णु पुराण, २/८/८/५, ऋक्, ६/१६/१३) । इनके स्थान से ४ दिशाओं में ४ राजपथ जाते थे। यह पेरु का कुजको या उसके निकट का स्थान हो सकता है। यह इंका (इनः = सूर्य) साम्राज्य की राजधानी थी और यहां से पूरे अमेरिका में ४ दिशाओं में मार्ग थे।
त्वामग्ने पुष्करादध्यथर्वा निरमन्थत। मूर्ध्नो विश्वस्य वाधतः॥१३॥
तमुत्वा दध्यङ्गृषिः पुत्र ईधे अथर्वणः। वृत्रहणं पुरन्दरम्॥१४॥ (ऋक्, ६/१६)
न्यग्रोधः पुष्करद्वीपे ब्रह्मणः स्थानमुत्तमम्। तस्मिन्निवसति ब्रह्मा पूज्यमानः सुरासुरैः॥
(विष्णु पुराण, २/२/८५, ब्रह्माण्ड पुराण, ८/८/७)
न्यग्रोधः पुष्करद्वीपे पद्मवत् तेन स स्मृतः (मत्स्य पुराण, १२३/३९)
यहां भी मेरु था, जिसका नाम अमेरु (अपर मेरु = पश्चिमी मेरु) है, जिससे द्वीप का नाम अमेरिका हुआ। यहां हिमालय के शिव-पार्वती जैसे मेरु-मू देव हैं। हायु मरका पर्वत पर अमारु मेरु की ७ मीटर ऊंची विशाल मूर्ति तथा प्राचीन विशाल भवन हैं। इसका स्थान १६अंश १२’५१.६२" दक्षिण तथा ६९अंश ३०’२१.२८" पश्चिम है। इसके निकट कैलास के मानसरोवर जैसा टीटीकाका झील है।इस परम्परा को नष्ट करने के लिए एक काल्पनिक स्पेनी लुटेरे अमेरिगो वेस्पुसी की कहानी गढ़ी गयी है, जिसे अमेरिका नाम का स्रोत कहा जा सके। मूल अमेरिकी सभ्यता तथा इतिहास नष्ट करने का अभियान अभी तक चल रहा है।
(४) द्वितीय पुष्कर-यह उज्जैन से १ मुहूर्त अर्थात् १२ अंश पश्चिम था। इस स्थान पर आज बुखारा है (प्राचीन ईरान राज्य, वर्तमान उजबेकिस्तान) जो पुष्कर का अपभ्रंश है।
एवं पुष्करमध्येन यदा याति दिवाकरः।
त्रिंशद् भागन्तु मेदिन्यास्तदा मौहूर्त्तिकी गतिः॥ (विष्णु पुराण, २/८/२६)
इस स्थान पर अधिकतम दिन मान १६ गण्टा है जो वेदाङ्ग ज्योतिष में माना गया है (ऋक् ज्योतिष, ७)।
यहां प्राङ्-मेरु (पूर्वी मेरु) है जिसका अपभ्रंश पामीर है। यहां से ४ दिशाओं में पर्वत हैं।
(५) इन्द्रप्रस्थ पुष्कर-इसकी ४ दिशाओं में ४ नदियां हैं।
श्रूयते पुष्करंनाम तीर्थं त्रैलोक्यविश्रुतम्। ब्रह्मणा निर्मितं तत्र यच्च योजनमात्रकम्॥४॥
उत्तरे चन्द्रभागाया नद्या यावत्सरस्वती। दक्षिणे करतोयायाः सीमेयं पुष्करत्रये॥५॥
(स्कन्द पुराण, नागरखण्ड, १७९/४-५)
यहां सरस्वती नदी की पूर्ववाहिनी धारा भी आरम्भ होती है, जिसका प्रयाग में गङ्गा-यमुना के साथ त्रिवेणी-सङ्गम होता था।
एवमेषा सरिच्छ्रेष्ठा पुष्करेषु सरस्वती।॥१२६॥ पुण्यस्य पुण्यताकारि पञ्चस्रोता सरस्वती॥१२८॥
पुष्करे तु विशेषेण पूतात् पूततमा हि सा। नदी सरस्वती पुण्या सुलभा जगति स्थिता॥२३३॥
दुर्लभा सा कुरुक्षेत्रे प्रभासे पुष्करे तथा॥२३४॥ प्राची सरस्वतीं प्राप्य योयोऽन्यं तीर्थं हि मार्ग ते॥२३५॥
पुष्करारण्यमासाद्य पुनस्तस्मात् सरस्वती॥२४७॥
अन्तर्धानं गता गन्तुं प्रवृत्ता पश्चिमा मुखी। नाति दूरे ततस्तस्य पुष्करस्य सुशोभना॥२४८॥
(पद्म पुराण, सृष्टि खण्ड, १/१८/१२६-२४८)
इस पुष्कर में ब्रह्मा के भवन का नाम वैराज था। उनकी सभा कान्तिमती थी इसके मेरु का नाम श्रीनिधान (अज) था, जिसे अजमेर कहते हैं।
श्रीनिधानंपुरं मेरोः शिखरे रत्न-चित्रितम्॥३॥ वैराजं नाम भवनं ब्रह्मणः परमेष्ठिनः॥९॥
सभा कान्तिमती नाम देवानां शर्मदायिका। ऋषि संघ समायुक्ता मुनिवृन्द निषेविता॥१३॥
अहं यत्र समुत्पन्नः पद्मं तद् विष्णु-नाभिजम्। पुष्करं प्रोच्यते तीर्थं ऋषिभिर्वेदपाठकैः॥२०॥
(पद्म पुराण, सृष्टि खण्ड, १/१५/९-२०)
यहां अर्बुद (आबू) पर्वत ही अर्णव से उत्पन्न कमल है-
इन्द्रो मह्ना महतो अर्णवस्य वि मूर्धानं अर्बुदस्य। (अथर्व सं, २०/९१/१२, ऋक्, १०/६७/१२)
वाक् को भी अर्बुद कहा है-वाग्वा अर्बुदम् (तैत्तिरीय ब्राह्मण, ३/८/१६/३)
विद्या रूपी सरस्वती ब्रह्मा की पत्नी हैं।
४. आध्यात्मिक पुष्कर-
शरीर के सभी चक्रों को कमल कहा है, जिसके दलों की संख्या ४, ६, १०, १२, १६, २ हैं। उसके ऊपर सहस्रार में १,००० दल हैं। मूलाधार से मतिष्क केन्द्र आज्ञा चक्र तक को संवित् कमल कहा गया है। मस्तिष्क के वाम-दक्षिण भाग २ पक्षी हैं, इनका सूक्ष्म रूप जीव-आत्मा है। वेद में इनको २ सुपर्ण कहा है।
द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया, समानं वृक्षं परिषस्वजाते।
तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्ति, अनश्नन्नन्यो अभिचाकषीति॥
(मुण्डक उप. ३/१/१, श्वेताश्वतर उप. ४/६, ऋक् १/१६४/२०, अथर्व ९/९/२०)
सुषुम्ना चेतना या ज्ञान का वृक्ष है। उसके मध्य (आज्ञा चक्र) में २ सुपर्ण (हंस, पक्षी) रहते हैं (परिषस्वजाते-पड़ोस में)। उनमें अन्य (एक) पिप्पल (पिब् + फल = जिस फल में आसक्ति हो) को स्वाद सहित खाता है। अन्य (दूसरा) बिना खाये (बिना आसक्ति = अनश्नन्) केवल देखभाल करता है। आकाश में भी सृष्टि निर्माण का क्रम (स्वयम्भू से पृथ्वी तक) स्कम्भ या वृक्ष है। इसके हर स्तर पर ब्रह्म के २ रूप हैं, निर्विशेष निर्लिप्त रहता है, विशिष्ट रूप विविध या विशिष्ट सृष्टि करता है। निर्विशेष में भेद नहीं होने के कारण उसका वर्णन नहीं होता, उपवर्णन हो सकता है।
मनुष्य शरीर में इन हंसों को जीव और आत्मा कहते हैं। आत्मा निर्लिप्त है, जीव कर्म में लगा है। जीव और आत्मा को ही बाइबिल में ईव और आदम कहा गया है।
समुन्मीलत् संवित्-कमल मकरन्दैक रसिकं, भजे हंस-द्वन्द्वं किमपि महतां मानसचरम्।
यदालापादष्टादश गुणित विद्या परिणतिः, तदादत्ते दोषाद् गुणमखिल-मद्भ्यः पय इव॥ (शंकराचार्य, सौन्दर्य लहरी, ३८)
संवित्-कमल को बाइबिल में ज्ञान का वृक्ष कहा है। मस्तिष्क में जो सूचनाओं का संग्रह है, वह अप् = जल है। उसके भीतर से क्रमबद्ध ज्ञान (जो वाक्य में लिखा जा सके) दूध जैसा उपयोगी है। यही मन के हंस द्वारा जल से दूध निकालना है। भौतिक रूप में मान सरोवर का हंस जल में दूध के मिश्रण से दूध नहीं निकाल सकता।