Monday, 20 July 2026

पत्नी वामांगनी

व्रतबंधे विवाहे च जातकर्मादि कर्मसु। व्रते दाने मखे श्राद्धे पत्नी तिष्ठंति दक्षिणे।।

आशिर्वाद अभिषेके च पादप्रक्षालने तथा। भोजने शयनेचैव पत्नी वामे सदा वसेतु।।

एक लाइन में --

सर्वेषु धर्मकृत्येषु पत्नी तिष्ठति दक्षिणे।

सभी पुण्य कार्यों में जो आपको ईश्वर प्राप्ति की ओर ले जाए पत्नी सदा आपके दाहिने बैठेगी।

कन्या दान से बड़ा पुण्य और क्या हो सकता है?

एक रुपए का भी दान आप करते हैं तो आपकी पत्नी आपके दाहिने रहेगी।

Sunday, 19 July 2026

"उपनयन" जनेऊ

"उपनयन" शब्द एक संस्कारविशेष का नाम है। इसी विषय में भरद्वाज का कथन है-
"उपानयाख्यं यत्कर्म विद्यार्थं तदुदीरितम्॥"

विद्यार्थी के लिए जो संस्कार किया जाता है, वही उपनयन नाम से प्रसिद्ध है।

यह नाम व्युत्पत्तिमूलक है। इसका आधार उद्भिद्-न्याय है। भारुचि के अनुसार किसी शब्द की व्युत्पत्ति दो प्रकार की मानी जाती है- भावव्युत्पत्ति और करणव्युत्पत्ति। इसे इस प्रकार समझना चाहिए- उप का अभिप्राय समीप है। आचार्य आदि के निकट बटु को ले जाना अथवा पहुँचाना उपनयन कहलाता है। अथवा जिस साधन के द्वारा बटु को आचार्य आदि के समीप पहुँचाया जाता है, उसे भी उपनयन कहा जा सकता है।
इसी विषय को विद्वानों ने इस प्रकार कहा है-
 "गुरोर्व्रतानां वेदस्य यमस्य नियमस्य च। देवतानां समीपं वा येनासौ नीयते द्विजः॥"
जिस संस्कार के द्वारा द्विज बालक गुरु, व्रत, वेद, यम, नियम अथवा देवताओं के समीप पहुँचाया जाता है, उसी का नाम उपनयन है। इन दोनों प्रकार की व्युत्पत्तियों में भावव्युत्पत्ति ही अधिक उपयुक्त मानी जाती है, क्योंकि वही श्रौतविधि के अभिप्राय के अनुरूप है। करणव्युत्पत्ति को स्वीकार करना उचित नहीं है, क्योंकि उससे अन्य वस्तुओं पर भी 'उपनयन' शब्द का प्रयोग होने लगेगा। फिर यह भी है कि करण का निर्धारण वक्ता की इच्छा पर निर्भर रहता है; इसलिए अनेक प्रकार की कल्पनाएँ सम्भव हो जाती हैं और शास्त्र का निश्चित अभिप्राय अस्थिर हो जाता है।
उदाहरण के रूप में, यदि "जिसके द्वारा समीप ले जाया जाता है" ऐसी करणव्युत्पत्ति स्वीकार कर ली जाए, तो कभी चलना, कभी कोई व्यक्ति और कभी स्वयं आचार्य भी 'उपनयन' कहलाने लगेंगे। ऐसी स्थिति में 'उपनयन' शब्द का निश्चित आशय समाप्त हो जाएगा और अनेक शास्त्रीय विषयों में अर्थ-भ्रम उत्पन्न हो जाएगा। संस्कार किसी अन्य वस्तु का नाम नहीं हो सकता, क्योंकि उसका स्वरूप संस्कार (शुद्धि एवं योग्यता प्रदान करने की क्रिया) है। अतः पूर्व में कही गई भावव्युत्पत्ति ही अधिक संगत और ग्राह्य है। यहाँ उपनयन का अभिप्राय यह है कि आचार्य द्वारा बटु का गायत्री-मन्त्र के माध्यम से संस्कार किया जाए। इसी कारण कात्यायन ने कहा है—

"गायत्र्या ब्राह्मणमुपनयीते।"

अर्थात् कि आचार्य ब्राह्मण बालक का गायत्री-मन्त्र द्वारा उपनयन करे। इस वचन में 'ब्राह्मण' (जिसका संस्कार किया जाना है) और 'गायत्री' (जिसके द्वारा संस्कार सम्पन्न होता है) के पृथक्-पृथक् निर्देश से यह स्पष्ट हो जाता है कि 'उपनयन' शब्द का आशय केवल संस्कारविशेष ही है, किसी साधन अथवा अन्य वस्तु का नहीं।

इसी अभिप्राय को आपस्तम्ब ने भी व्यक्त किया है-
"उपनयनं विद्यार्थस्य श्रुतितः संस्कारः।।"

श्रुति के अनुसार विद्यार्थी का उपनयन एक संस्कार है। इसी उपनयन को मनु ने 'ब्रह्मजन्म' के रूप में निरूपित किया है। वे कहते हैं-

"तत्र यद् ब्रह्मजन्मास्य मौञ्जीबन्धनचिह्नितम्। 
तत्रास्य माता सावित्री 
पिता त्वाचार्य उच्यते॥"

जिस समय मौञ्जी (मुंजघास की मेखला) धारण कराकर उसका उपनयन किया जाता है, वही उसका ब्रह्मजन्म कहलाता है। उस आध्यात्मिक जन्म में सावित्री (गायत्री) उसकी माता और आचार्य उसके पिता माने जाते हैं।
इस प्रकार उपनयन केवल एक बाह्य अनुष्ठान नहीं, बल्कि ऐसा संस्कार है जिसके द्वारा बालक वेदाध्ययन, ब्रह्मचर्य और धार्मिक जीवन के लिए योग्य बनता है। इसी कारण धर्मशास्त्रों में इसे मनुष्य के आध्यात्मिक जीवन का दूसरा जन्म माना गया है।

गीता : प्रथम अध्याय श्लोक २१(१२)•

गीता : प्रथम अध्याय श्लोक २१(१२)

सेनयोरुभयोर्मध्ये"—यहाँ "उभयोः" का पहला अर्थ है सम्पूर्णता। अर्जुन आधा सत्य नहीं देखना चाहते। वे केवल कौरव-सेना नहीं देखना चाहते, केवल अपनी सेना भी नहीं देखना चाहते। वे दोनों को एक साथ देखना चाहते हैं। यह भारतीय ज्ञान-परम्परा की एक मौलिक विशेषता है। सत्य कभी एकांगी दृष्टि से नहीं मिलता। उपनिषद् बार-बार कहते हैं कि आंशिक सत्य भी कभी-कभी असत्य जितना ही खतरनाक हो सकता है। इसलिए अर्जुन का पहला आग्रह है—मुझे दोनों दिखाई दें। ध्यान दीजिए, वे अभी निर्णय नहीं माँग रहे; वे पहले पूर्ण दृश्य माँग रहे हैं। यही दर्शन का पहला संस्कार है—निर्णय से पहले समग्र-दर्शन।

"उभयोः" का दूसरा अर्थ है समान गरिमा (equal dignity)। अर्जुन यह नहीं कहते—"हमारी और उनकी सेना।" वे "उभयोः" कहते हैं। इस छोटे-से शब्द में एक विलक्षण निष्पक्षता है। वे दोनों पक्षों को समान भाषिक सम्मान देते हैं। आधुनिक नैतिक दर्शन में इसे principle of equal moral regard कहा जा सकता है। यह अत्यन्त कठिन है। युद्ध के ठीक पहले भी अर्जुन अपने प्रतिपक्ष को भाषिक रूप से अपमानित नहीं करते। वे उन्हें "दुष्ट", "पापी" या "नीच" नहीं कहते। वे केवल कहते हैं—उभयोः। यह उनकी अन्तःसंस्कृति का प्रमाण है।

"उभयोः" मनुष्य की द्विध्रुवीय चेतना (binary awareness) का संकेत है। सामान्यतः संकट के समय मनुष्य का मन एक पक्ष से चिपक जाता है। इसे आधुनिक मनोविज्ञान confirmation bias कहता है—हम केवल वही देखते हैं जो हमारे पक्ष का समर्थन करता है। अर्जुन इसके विपरीत करते हैं। वे अपने मन को बाध्य करते हैं कि वह दोनों पक्षों को देखे। यह अत्यन्त परिपक्व मानसिक प्रक्रिया है। गीता का जन्म इसलिए सम्भव हुआ क्योंकि अर्जुन केवल अपनी कथा नहीं सुनना चाहते थे; वे दूसरी कथा भी देखना चाहते थे।

भारतीय न्यायशास्त्र में किसी निष्कर्ष पर पहुँचने से पहले पूर्वपक्ष और उत्तरपक्ष दोनों का परीक्षण किया जाता है। कोई भी सिद्धान्त सीधे स्थापित नहीं किया जाता। पहले विरोधी पक्ष को उसकी पूरी शक्ति के साथ प्रस्तुत किया जाता है, फिर उत्तर दिया जाता है। "उभयोः" उसी न्याय-परम्परा का पूर्वाभास है। गीता भी पहले दोनों पक्षों को स्वीकार करती है, फिर समाधान देती है। यह भारतीय बौद्धिक ईमानदारी का अनुपम उदाहरण है।

अर्जुन केवल अपनी सेना की रक्षा के लिए चिन्तित नहीं हैं। उनका दुःख दोनों ओर फैला हुआ है। यही कारण है कि दूसरे अध्याय तक पहुँचते-पहुँचते वे कहेंगे—"एतान्न हन्तुमिच्छामि।" "उभयोः" का बीज उसी करुणा में है। उनके लिए दोनों सेनाओं में केवल सैनिक नहीं खड़े; दोनों ओर उनके अपने लोग खड़े हैं। इसलिए "उभयोः" केवल व्याकरण का द्विवचन नहीं; यह हृदय का द्विवचन है।

ईश्वर किसी एक पक्ष के ईश्वर नहीं होते। कृष्ण पाण्डवों के सारथि अवश्य हैं, पर वे केवल पाण्डवों के भगवान् नहीं हैं। वे भीष्म के भी भगवान् हैं, द्रोण के भी, कर्ण के भी, दुर्योधन के भी। इसीलिए गीता की दृष्टि "उभयोः" है। धर्म का अर्थ किसी एक पक्ष का अन्ध-समर्थन नहीं; धर्म वह दृष्टि है जो दोनों पक्षों को देखकर भी सत्य का निर्णय कर सके। इसलिए "उभयोः" गीता का पहला सार्वभौमिक शब्द है। वह हमें सिखाता है कि न्याय वही कर सकता है जो पहले दोनों को देखने का धैर्य रखता हो।

"उभयोः" आगे चलकर गीता के अनेक द्वन्द्वों का पूर्वरूप है—सुख-दुःख, लाभ-हानि, जय-पराजय, मान-अपमान। गीता बार-बार कहेगी—दोनों को एक साथ देखो, किसी एक से चिपको मत। इस प्रकार "उभयोः" केवल दो सेनाओं का सूचक नहीं है; यह गीता के सम्पूर्ण समत्व-दर्शन का प्रथम व्याकरण है। समत्व का अर्थ एक पक्ष को नष्ट करना नहीं, बल्कि दोनों की उपस्थिति में भी अपनी चेतना को संतुलित रखना है। इसलिए यह छोटा-सा शब्द वास्तव में गीता की सबसे बड़ी शिक्षाओं में से एक का मौन बीज है।

उभयोः" का सबसे बड़ा रहस्य यह है कि यह केवल दो सेनाओं की संख्या नहीं बताता, बल्कि अर्जुन की चेतना की निष्पक्षता (epistemic fairness) को भी प्रकट करता है। यदि अर्जुन चाहते, तो वे कह सकते थे—"हमारी सेना और उनकी सेना।" यह स्वाभाविक भी होता। प्रत्येक योद्धा अपनी सेना को केन्द्र मानकर ही सोचता है। परन्तु अर्जुन ऐसा नहीं करते। वे "हम" और "वे" की भाषा छोड़ देते हैं और "उभयोः" की भाषा ग्रहण करते हैं। यह केवल व्याकरण नहीं बदलता; यह पूरी मानसिक संरचना बदल देता है। "हम-वे" (us vs. them) की भाषा संघर्ष की भाषा है; "उभयोः" की भाषा दर्शन की भाषा है। गीता का जन्म इसलिए सम्भव हुआ क्योंकि अर्जुन ने एक क्षण के लिए योद्धा की भाषा छोड़कर द्रष्टा की भाषा बोलनी आरम्भ कर दी।

आधुनिक सामाजिक मनोविज्ञान में एक शब्द है—depolarization। इसका अर्थ है दो विरोधी पक्षों को इस प्रकार देखना कि वे केवल शत्रु न रह जाएँ, बल्कि एक ही मानवीय परिस्थिति के दो आयाम प्रतीत हों। अर्जुन का "उभयोः" यही करता है। वे अभी किसी पक्ष का नैतिक मूल्यांकन नहीं कर रहे। वे केवल दोनों की उपस्थिति को स्वीकार कर रहे हैं। यह अत्यन्त उच्च मानसिक अवस्था है। अधिकांश संघर्ष इसलिए लम्बे चलते हैं क्योंकि दोनों पक्ष पहले ही क्षण दूसरे पक्ष की मनुष्यता खो देते हैं। अर्जुन ऐसा नहीं करते। उनके लिए दोनों पक्ष अभी भी "उभय" हैं—एक ही वास्तविकता के दो पक्ष।

यहाँ भारतीय दर्शन की एक अत्यन्त सूक्ष्म परम्परा स्मरणीय है। उपनिषद् कहते हैं कि संसार में अधिकांश समस्याएँ एकान्त-दृष्टि (one-sidedness) से उत्पन्न होती हैं। जैन दर्शन इसे अनेकान्तवाद के माध्यम से और भी स्पष्ट करता है। यद्यपि गीता और जैन दर्शन की अपनी-अपनी स्वतंत्र दार्शनिक दिशाएँ हैं, फिर भी "उभयोः" में यह आग्रह अवश्य दिखाई देता है कि किसी भी जटिल सत्य को केवल एक पक्ष से नहीं समझा जा सकता। अर्जुन पहले दोनों को देखना चाहते हैं। निर्णय बाद में होगा।

"उभयोः" में अद्भुत करुणा छिपी है। यदि व्यास केवल "सेनयोर्मध्ये" लिखते, तो दृश्य का वर्णन हो जाता। पर "उभयोः" जोड़कर वे पाठक को भी बाध्य करते हैं कि वह दोनों ओर दृष्टि डाले। एक ओर भीष्म हैं, दूसरी ओर युधिष्ठिर। एक ओर द्रोण हैं, दूसरी ओर धृष्टद्युम्न। एक ओर कृपाचार्य हैं, दूसरी ओर सात्यकि। कवि हमें किसी एक ओर देखने नहीं देता। वह हमारी दृष्टि को दोनों ओर घुमाता है। यह केवल वर्णन नहीं; यह पाठक की दृष्टि का भी शिक्षण (education of perception) है।

John Rawls ने veil of ignorance का सिद्धान्त दिया था—न्याय वही कर सकता है जो पहले स्वयं को किसी एक पक्ष की निश्चित पहचान से कुछ समय के लिए अलग कर सके। अर्जुन का "उभयोः" उसी प्रकार की नैतिक निष्पक्षता की प्रारम्भिक झलक है। वे अभी यह नहीं कह रहे कि कौन सही है; वे पहले यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि उन्होंने दोनों को देखा है। न्याय का जन्म दर्शन से होता है, और दर्शन का जन्म समग्र दृष्टि से।

"उभयोः" केवल बाहरी सेनाओं के लिए नहीं है। मनुष्य के भीतर भी दो पक्ष हैं—एक जो संसार की ओर आकर्षित होता है, दूसरा जो आत्मा की ओर। एक जो सम्बन्धों में बँधता है, दूसरा जो सत्य की ओर बढ़ता है। गीता इनमें से किसी एक का निषेध नहीं करती। कृष्ण अर्जुन को संसार छोड़ने के लिए नहीं कहेंगे; वे संसार के बीच योग सिखाएँगे। इसीलिए "उभयोः" गीता की पूरी पद्धति का सूक्ष्म बीज है। यहाँ किसी एक पक्ष को नष्ट नहीं किया जाता; दोनों को समझकर एक उच्चतर संश्लेषण (synthesis) तक पहुँचा जाता है।
अन्ततः "उभयोः" हमें एक अत्यन्त दुर्लभ बौद्धिक सद्गुण सिखाता है—पूर्ण दृष्टि का धैर्य। आज मनुष्य पहले निर्णय करता है, बाद में देखता है। अर्जुन पहले देखना चाहते हैं, फिर निर्णय करेंगे। यही गीता की पद्धति है। इसलिए "उभयोः" केवल द्विवचन नहीं है; यह ज्ञानमीमांसा (epistemology) का एक महान सिद्धान्त है—जो केवल एक पक्ष को देखता है, वह सूचना पा सकता है; जो दोनों पक्षों को देखता है, वही प्रज्ञा प्राप्त कर सकता है। यही "उभयोः" का मौन, किन्तु अमूल्य संदेश है।

Saturday, 18 July 2026

पृथ्वी लोक की अनन्त समस्यायें

** पृथ्वी लोक की अनन्त समस्यायें -१ **
** यह पृथ्वी भी अद्भुत और अपूर्व है l यहाँ गर्भ में आते ही समस्यायें आरम्भ हो जाती हैं l जन्म लेने से पूर्व से लेकर मृत्यु तक समस्यायें ही समस्यायें हैं इस धरती पर l मनुष्य या जीव भी इन समस्याओं से लड़ता रहता है l या तो विजय प्राप्त करता है या समस्याओं से पराजित होता है l 
** समस्याओं का निराकरण तीन स्तर पर होता है- देव द्वारा , राजा द्वारा या स्वयं के पुरुषार्थ द्वारा l देव द्वारा प्राप्त सहयोग दुर्लभ होता है l सभी पात्र नहीं होते कि उन्हें दैवीय सहायता मिल सके l राजा द्वारा या राज्यांग द्वारा सहायता तभी मिलती है जब देव अनुकूल हो l प्रायः विपत्ति काल में दी जाने वाली सहायता को राजा के चक्र (प्रशासनिक जन) खा जाते हैं l स्वयं का पुरुषार्थ ही एक ऐसा माध्यम होता है जो समस्याओं से व्यक्ति का उद्धार करता है l यह अलग बात है कि हर पुरुषार्थ के पीछे सफलता खड़ी नहीं मिलती है l 
** समस्याओं से भयभीत हो कर आत्महत्या करना या पलायन करना इस बात को सूचित करता है कि व्यक्ति की जीवंतता कितनी स्वल्प है l 
** समस्याओं के पीछे के कारण — हमारे पूर्व के कर्म ही हमारी समस्याओं के जनक होते हैं l इन्हें विंशोतरी महादशा और अंतर दशा द्वारा जाना जाता है l साथ ही समुद्र में फंसे व्यक्ति की तरह 
प्रार्थना और पुरुषार्थ दोनों का सहयोग लेना पड़ता है l
** भूमि पर जन्म तभी होता है जब आपको पुराना भोग भोगना हो और नया कर्म करके नयी समस्याओं को अगले जीवन के लिए तैयार करना हो l यदि मोक्ष हो जाए तो कभी समस्याएं उत्पन्न ही न हों पर जन्मलेने का अर्थ हीहै समस्याओं 
को साथ ले कर धरती पर आना l 
** जीवन समुद्रमें उठने वाली अनन्त लहरें समस्याएं ही तो हैंl 
इन समस्याओं को या तो तैरना होता है या लहरें लील लेती हैं l l

** पृथ्वी लोक की अनन्त समस्यायें -२ **
** पृथ्वी पर व्यक्ति का जन्म आदान प्रदान के लिए होता है l व्यक्ति का जन्म ऐसे परिवारमें होताहै जहाँ उसके पूर्वके आत्मीय लोग होते हैं l माता पिता, भाई बहन, दादा दादी, चाचा चाची से आपका पहले से राग बंधन होता है l ये सम्बन्ध या तो आपको समस्या मुक्त करते हैं या ऐसी समस्याओं से युक्त करते हैं जिनसे आप कभी मुक्त नहीं हो पाते l 
** आप जिनका जितना पूर्व काल में उधार लिए रहते हैं वह उतना आपसे ले लेता है l कोई भी व्यक्ति इतना स्वतंत्र नहीं होता की वह जन्म कालिक सम्बन्धों का चयन कर सके l यदि श्रेष्ठ सम्बन्धों की इच्छा हो तो भगवती प्रकृति की आराधना करनी पड़ती है l हमारा पूर्व का कर्म ही हमें तामसिक,राजसिक या सात्विक वातावरण को प्रदान करता है l इस अपार सृष्टि में आपसे वे लोग ही मिल पायेंगे जिनसे आपका पूर्वगत सम्बन्ध है l किसी से किसी व्यक्ति का सम्बन्ध कितने दिनों तक रह पाएगा यह भी पूर्व निर्धारित रहता है l
** मेरे जीवन में अनेक ऐसी घटनाएं घटित हुई हैं जिन्होंने पूर्व कर्मों से उत्पन्न मोह जनित त्रास को सामने लाकर खड़ा किया है l मॉरिशस में जाकर मैने एक विशाल कच्छप को वासुदेव मंत्र दिया l जहाँ एक ओर राष्ट्रपति और अनेक मंत्रियों से भेंट हुई वहीं एक शापित आत्मा जो कछुए के शरीर में रही उसे मुक्ति का मंत्र देना पड़ा l २००९ में मुझे स्वप्न हुआ कि पूर्व जीवन का २ लाख कर्ज लेकर बैठे हो उसे लौटा देना l २०१० के अप्रैल में वैसी ही घटना घटित हुई l मैं ने पूछा क्या ब्याज भी देना होगा? उत्तर मिला - नहीं l परलोक के गणित में यथा का तथा होता है l अधिक न्यून नहीं l 
** इस जीवन में मैने भगवती की अत्यधिक आराधना की - हे देवि! मैं निर्विघ्न रहूँ l न तो किसी को विघ्न दूं न किसी के द्वारा विघ्न ग्रस्त हो सकूँ l 
मनुष्य जीवन की सारी समस्याएं चक्रीय हैं l वे घूमती रहती हैं l इस जीवन में नहीं तो किसी अन्य जीवन में हमें अपने कर्मों को भोगना ही पड़ता है l राजयोग और राज भ्रंश भी उसी कर्म भोग के सुनिश्चित अंश हैं l यह बहुत जटिल और अक्रम भोग होता है जिसे त्रिकाल द्रष्टा ही जान पाता है हम लोगों जैसे सामान्य जन नहीं l

कुञ्जिका स्तोत्रम्

॥🔺अथ सिद्ध कुञ्जिका स्तोत्रम्🔺॥
कुञ्जिका स्तोत्र पाठ विषय में भ्रांति हैं कि इसके पाठ के फल से दुर्गापाठ का फल मिल जाता हैं तो फिर सप्तशती के पाठ की क्या आवश्यकता हैं अतः सप्तशती पठन के पश्चात् कुञ्जिका स्तोत्र का पाठ करें। परन्तु इसी स्तोत्र में लिखा हैं कि "इदं तु कुञ्जिका स्तोत्रं- मंत्र जाग्रति हेतवे" अतः मंत्र के जाग्रति की प्रार्थना तो मंत्र जपने से पहिले ही करनी चाहिये। जैसे के माला मंत्रों में (ॐ मां माले महामाये.......) प्रयोग में आया हैं।
पुनः तंत्र ग्रंथों में लिखा हैं कि "भूत लिपि" के प्रयोग के बिना मंत्र सिद्ध नहीं होता हैं। इस स्तोत्र में "अं, कं, चं, टं, तं, पं, यं, शं" शब्द आये हैं इनका अर्थ हैं, अ वर्ग, क वर्ग, च वर्ग, ट वर्ग, त वर्ग, प वर्ग, य वर्ग, श वर्ग, अर्थात् समस्त मातृका का उच्चारण व स्मरण हैं। अतः इसमें "भूत लिपि" जाग्रति की सूक्ष्म क्रिया का समावेश है। मंत्र जागृति के २७ जप रहस्य हैं उनमें दोहन, आकर्षण, अमृतीकरण, दीप्तिकरण आदि हैं उनका प्रयोग इस स्तोत्र में नवार्ण मंत्र में हैं, उनमें आये बीजाक्षरों को देखने से मिलता हैं।
संकेत मात्र-अग्नि/पृथ्वी बीज : अशुद्धिनिवारण व दोहन हेतु।
 काम बीज: आकर्षण हेतु।
 अमृत बीज: अमृतीकरण हेतु।
ज्वालय ज्वालय, ज्वल ज्वल प्रज्वल प्रज्वल: दीप्तिकरण हेतु।
अतः इस स्तोत्र का पाठ नवार्ण जप से पहिले व दुर्गापाठ से पहिले करें।
यह सर्वमान्य नहीं है,परंपरा रूप में ग्राह्य है!
भज दुर्गे 🔺🌹

पार्थिवलिङ्ग निर्माण

पार्थिवलिङ्ग निर्माण में एक तोला या दो तोला मिट्टी से त्रिसूत्रप्रमाण अपना अंगुष्ठपर्व परिमाण का शास्त्रीय प्रमाण है और इसी से बडे लिङ्ग में पूजन से पूजन का फल भी नहीं मिलता । परन्तु आजकल तो..........

#पार्थिवलिंग निर्माण में मृत्तिका का परिमाण का शास्त्रीय निर्देश 👇

मृत्तिकातोलकं ग्राह्यमथवा तोलकद्वयम् ।
एतदन्यन्न कुर्वीत कदाचिदपि पार्वति ! ॥

#पुनः

मृत्तिकातोलकं ग्राह्यमथवा तोलकद्वयम् ।
त्रिसूत्रस्य प्रमाणेन घटनं कारयेद्‌बुधः ॥
स्वांगुष्ठपर्वमाणन्तु कृत्वा लिङ्गं प्रपूजयेत् ।
मृदादिलिङ्गघटने प्रमाणं परिकीर्त्तितम् ।
फलमुक्तमवाप्नोति अन्यथा चेत्तदन्यथा ॥(६२७•त.तो.प्रा)

Thursday, 16 July 2026

अमोघ शिवकवच

अमोघशिवकवच (१८)

नेत्रे ममाव्याद् भगनेत्रहारी - यह बात कि भगनेत्रहारी नेत्रों की रक्षा करें, बिना दक्षयज्ञ को समझे समझ न आएगी।अपनी पुस्तक ‘देवाधिदेव’ में मैं दक्षयज्ञ और सती प्रसंग की व्याख्या कर चुका हूँ, अत: उसे यहाँ दोहराऊँगा नहीं।

प्रश्न तो यही है—जो आँखें निकाल सकता है, वही आँखों का रक्षक कैसे हो सकता है?ऋषि को यदि केवल शिव की स्तुति करनी होती, तो "त्रिलोचन", "विश्वनाथ", "शम्भु", "महेश" जैसे असंख्य नाम थे। पर उसने जान-बूझकर एक ऐसा नाम चुना जो साधक को झकझोर दे। तो आइए, पहले कथा को समझें।

भग" वैदिक देवताओं में से एक हैं।ऋग्वेद में भग आदित्यों में गिने जाते हैं। उनका सम्बन्ध भाग, सौभाग्य, समृद्धि, ऐश्वर्य, भाग्य-वितरण और भोग के न्यायपूर्ण वितरण से है। संस्कृत का "भग" शब्द केवल धन नहीं है; वह उन सभी ऐश्वर्यों का द्योतक है जिनके कारण जीवन सम्पन्न बनता है।इसी मूल से "भगवान्" शब्द भी बना है। विष्णु पुराण के अनुसार जिसके पास ऐश्वर्य, वीर्य, यश, श्री, ज्ञान और वैराग्य—ये छह "भग" हों, वही भगवान् है।अर्थात् वैदिक भग कोई तुच्छ देवता नहीं हैं। वे समृद्धि और सौभाग्य के अधिष्ठाता हैं।फिर उनकी आँखें क्यों निकाली गईं?यह प्रसंग दक्षयज्ञ से जुड़ा है।जब दक्ष ने शिव का अपमान करते हुए यज्ञ किया, तब अनेक देवता उस यज्ञ में उपस्थित रहे। उन्होंने शिव के अपमान का विरोध नहीं किया।जब वीरभद्र प्रकट हुए और यज्ञ का विध्वंस हुआ, तब प्रत्येक देवता को उसके अपराध के अनुरूप दण्ड मिला।इसी क्रम में—
भग की आँखें निकाल दी गईं।कुछ पुराणों में कारण यह बताया गया है कि भग प्रसन्नतापूर्वक यज्ञ-भाग ग्रहण कर रहे थे, मानो अन्याय हुआ ही न हो। कहीं कहा गया है कि वे दक्ष के पक्ष में बैठे रहे। कहीं यह भी संकेत है कि उन्होंने अधर्म को देखते हुए भी आँखें मूँद लीं।यहाँ कथा से अधिक उसका प्रतीक महत्त्वपूर्ण है।

ध्यान दीजिए।उनकी सम्पत्ति नहीं छीनी गई।उनका पद नहीं छीना गया।आँखें छीनी गईं।
क्योंकि उनका अपराध दृष्टि का था।उन्होंने देखा,पर सत्य नहीं देखा।उन्होंने अन्याय देखा,
पर उसके प्रति जागे नहीं।उन्होंने यज्ञ देखा,
पर धर्म नहीं देखा।अर्थात् दोष नेत्रों का नहीं था,दृष्टि का था।और शिव ने उसी दोष पर प्रहार किया। यदि शिव ने भग की आँखें इसलिए निकालीं कि वे अधर्म के प्रति अन्धी हो गई थीं,तो वही शिव मेरी आँखों की रक्षा क्यों करें? उत्तर है—क्योंकि वे आँखों की रक्षा नहीं,दृष्टि की रक्षा करते हैं।वे ऐसी आँखें नहीं बचाते जो केवल भोग देखें। वे ऐसी आँखें बचाते हैं जो धर्म देखें।

यहाँ एक अत्यन्त रोचक व्युत्पत्तिगत संकेत भी है।”भग" का सम्बन्ध भोग से भी है।भोग स्वयं बुरा नहीं है।पर जब सम्पूर्ण दृष्टि केवल भोग तक सीमित हो जाए,तब वही अन्धता है।आज के समाज को देखिए।हम किसी वस्तु को सबसे पहले किस रूप में देखते हैं?उसकी उपयोगिता।उसकी कीमत।उसकी बाज़ार-क्षमता।उसका उपभोग।क्या यह "भग-दृष्टि" का विकृत रूप नहीं है? शिव उसी दृष्टि को तोड़ते हैं।

मुझे लगता है कि यहाँ एक अत्यन्त समकालीन शिक्षा छिपी है।आज हमारी आँखें स्वस्थ हैं पर क्या हमारी दृष्टि स्वस्थ है?हम जंगल देखते हैं।लकड़ी दिखाई देती है।हम नदी देखते हैं।जल-संसाधन दिखाई देता है।हम विद्यार्थी देखते हैं।मानव-संसाधन दिखाई देता है।हम वृद्ध देखते हैं।आर्थिक बोझ दिखाई देता है।हम संस्कृति देखते हैं।पर्यटन दिखाई देता है।यानी आँखें हैं,दृष्टि नहीं।ऐसी स्थिति में शिव क्या करेंगे?वे आँखें नहीं बचाएँगे।वे पहले उस अन्धी दृष्टि को नष्ट करेंगे। भगनेत्रहारी" का अर्थ "आँखें निकालने वाला" नहीं है।वह है—“झूठी दृष्टि का हरण करने वाला।"
भारतीय साहित्य में "नेत्र" केवल जैविक अंग नहीं है।नेत्र का अर्थ है—दृष्टिकोण।परिप्रेक्ष्य।
चेतना।इसलिए "भगनेत्रहारी" का अर्थ होगा—
वह जो भोग-केंद्रित, स्वार्थ-केंद्रित, अधर्म-अनुकूल दृष्टि का अपहरण कर ले।

हम सामान्यतः यह मान लेते हैं कि आँखें सत्य का सबसे विश्वसनीय साधन हैं। आधुनिक विज्ञान भी लंबे समय तक "Observation" को ज्ञान का पहला आधार मानता रहा। किन्तु भारतीय दर्शन इतना सरल नहीं है। न्याय दर्शन प्रत्यक्ष को प्रमाण मानता है, पर साथ ही यह भी स्वीकार करता है कि प्रत्यक्ष भ्रमित हो सकता है। अद्वैत वेदान्त तो और भी आगे जाकर कहता है कि समस्त दृश्य-जगत् ही अविद्या का विषय बन सकता है। योगसूत्र "विपर्यय" की बात करता है—वह ज्ञान जो वस्तु के अनुरूप नहीं है। अर्थात् भारतीय परम्परा का आग्रह केवल देखने पर नहीं, यथार्थ देखने पर है।

यही कारण है कि "भगनेत्रहारी" का चयन अत्यन्त सूक्ष्म है। भग ने देखा, पर यथार्थ नहीं देखा। उन्होंने यज्ञ देखा, पर यज्ञ का धर्म नहीं देखा। उन्होंने वेद-मन्त्र सुने, पर उनके भीतर से करुणा के लुप्त हो जाने को नहीं सुना। उन्होंने देवताओं की सभा देखी, पर यह नहीं देखा कि जहाँ शिव का अपमान हो रहा हो, वहाँ देवसभा भी अधूरी है। दूसरे शब्दों में कहें तो उनकी आँखें दृश्य की दासी बन गई थीं; वे सत्य की सेविका नहीं रहीं। शिव उसी दासता को तोड़ते हैं।

मुझे यहाँ एक अत्यन्त मौलिक बात दिखाई देती है। हम प्रायः कहते हैं कि "Seeing is believing." भारतीय परम्परा शायद इसके विपरीत कहती है—"Being determines seeing." अर्थात् तुम जैसे हो, वैसे ही संसार को देखोगे। यदि भीतर लोभ है तो संसार अवसरों का बाज़ार दिखाई देगा। यदि भीतर भय है तो हर अपरिचित व्यक्ति शत्रु लगेगा। यदि भीतर करुणा है तो वही संसार पीड़ित प्राणियों का परिवार बन जाएगा। आँखें बाहर नहीं बदलतीं; देखने वाला बदलता है। इस दृष्टि से भग की आँखें इसलिए नहीं गईं कि वे देखने में असमर्थ थीं; वे इसलिए गईं कि उनका अन्तःकरण देखने योग्य नहीं रहा था।

यहीं से इस मन्त्र का साधना-पक्ष खुलता है। हम प्रायः प्रार्थना करते हैं—"हे प्रभु! मुझे सही वस्तुएँ दिखाइए।" पर यह मन्त्र उससे भी बड़ी प्रार्थना करता है—"हे प्रभु! मुझे ऐसा मन दीजिए कि मैं जो भी देखूँ, उसे सही प्रकार से देख सकूँ।" यह अन्तर अत्यन्त गहरा है। पहली प्रार्थना संसार बदलने की है। दूसरी स्वयं को बदलने की।

अब इसे आधुनिक जीवन पर रखकर देखिए। दो लोग एक ही समाचार पढ़ते हैं। एक उसमें केवल राजनीतिक लाभ-हानि देखता है। दूसरा उसमें समाज की पीड़ा देखता है। दो लोग एक ही जंगल में प्रवेश करते हैं। एक को लकड़ी दिखाई देती है, दूसरे को एक जीवित पारिस्थितिकी तन्त्र। दो अर्थशास्त्री एक ही आँकड़ा पढ़ते हैं। एक GDP की वृद्धि देखता है, दूसरा उस वृद्धि के साथ बढ़ती असमानता, पर्यावरणीय क्षति और सामाजिक तनाव को भी देखता है। तथ्य एक ही हैं; दृष्टि भिन्न है। इसलिए भारतीय परम्परा की समस्या कभी केवल सूचना (information) की नहीं रही; उसकी समस्या सदैव दृष्टि (vision) की रही है।

मुझे तो यहाँ एक और भी सूक्ष्म संकेत दिखाई देता है। दक्षयज्ञ में भग की आँखें निकलती हैं, पर कथा वहीं समाप्त नहीं होती। बाद के पुराणों में देवताओं का पुनर्संस्कार होता है; व्यवस्था पुनः स्थापित होती है। इसका प्रतीकात्मक अर्थ यह हो सकता है कि शिव का दण्ड अन्तिम विनाश नहीं है; वह दृष्टि के पुनर्जन्म की तैयारी है। शिव पहले पुरानी आँखें छीनते हैं, फिर नयी दृष्टि की सम्भावना खोलते हैं। यह वही प्रक्रिया है जिसे उपनिषद् "अविद्या से विद्या" की यात्रा कहते हैं। पहले मिथ्या-दर्शन टूटता है, तभी सत्य-दर्शन सम्भव होता है।

इसलिए मुझे लगता है कि "भगनेत्रहारी" का अर्थ यह नहीं है कि शिव ने एक देवता की आँखें निकाल दीं। उसका अर्थ यह है कि शिव किसी भी ऐसी दृष्टि को स्वीकार नहीं करते जो धर्म से रिक्त होकर केवल दृश्य की दासी बन जाए। और जब साधक प्रार्थना करता है—"नेत्रे ममाव्याद् भगनेत्रहारी"—तो वह वस्तुतः यह कह रहा होता है:

"हे शिव! मेरी आँखों को सुरक्षित रखने से पहले मेरी दृष्टि को सत्य के योग्य बनाइए। यदि मेरी दृष्टि भी कभी भग की तरह वैभव, सुविधा और मौन की कैदी बन जाए, तो पहले उसे तोड़ दीजिए। क्योंकि मिथ्या दृष्टि के साथ जीवित रहना, अन्धा होने से भी अधिक खतरनाक है।"

यहाँ नेत्रों की रक्षा का अर्थ नेत्रों का संरक्षण नहीं, दृष्टि का रूपान्तरण है। तभी शिव "भगनेत्रहारी" होकर भी "नेत्ररक्षक" बन सकते हैं।

एक आयाम 'दृष्टि की हिंसा' (Violence of Vision) का है।हम सामान्यतः हिंसा को हाथों से जोड़ते हैं, वाणी से जोड़ते हैं, अस्त्रों से जोड़ते हैं। परन्तु भारतीय साहित्य बार-बार बताता है कि आँखें भी हिंसा कर सकती हैं।

संस्कृत साहित्य में "दृष्टिदोष", "कुदृष्टि", "लोचन-लालसा", "कामदृष्टि", "मत्सर-दृष्टि" जैसे शब्द संयोग से नहीं बने। वे बताते हैं कि देखना भी नैतिक कर्म है। कोई व्यक्ति किसी को वस्तु की तरह देखता है, कोई प्रतियोगी की तरह, कोई शत्रु की तरह, कोई उपभोग की वस्तु की तरह। वस्तु वही रहती है, पर दृष्टि उसे बदल देती है। इसलिए भारतीय संस्कृति में "दृष्टि" कभी निष्पक्ष जैविक क्रिया नहीं रही; वह चरित्र का विस्तार मानी गई।

दक्षयज्ञ में भग की आँखों का नष्ट होना इसी कारण एक गहरा रूपक बन जाता है। उन्होंने केवल अन्याय देखा ही नहीं; उनकी दृष्टि उस अन्याय के साथ सहज हो गई। यह बहुत बड़ा अन्तर है। मनुष्य किसी बुराई को पहली बार देखकर विचलित होता है, दूसरी बार कम विचलित होता है, और तीसरी-चौथी बार वही बुराई सामान्य लगने लगती है। आधुनिक मनोविज्ञान इसे desensitization कहता है—संवेदनशून्यता। मुझे लगता है कि भग उसी संवेदनशून्य दृष्टि के प्रतीक हैं। उनकी आँखें इसलिए नहीं निकाली गईं कि वे देख रही थीं; वे इसलिए निकाली गईं कि वे देख-देखकर भी विचलित होना भूल चुकी थीं।

यदि इस विचार को आज के समाज पर रखें तो उसका अर्थ और भी स्पष्ट हो जाता है।प्रतिदिन समाचारों में हिंसा देखते-देखते हम हिंसा के प्रति अभ्यस्त हो जाते हैं। प्रतिदिन भ्रष्टाचार देखते-देखते वह हमें असामान्य नहीं लगता। प्रतिदिन प्रकृति का विनाश देखते-देखते वह विकास का दूसरा नाम प्रतीत होने लगता है। प्रतिदिन असत्य सुनते-सुनते सत्य असुविधाजनक लगने लगता है। यह केवल सामाजिक समस्या नहीं है; यह दृष्टि की थकान है। आँखें खुली रहती हैं, पर संवेदना सो जाती है।

मुझे लगता है कि "भगनेत्रहारी" इसी निद्रा को तोड़ने वाले शिव हैं। वे आँखें इसलिए नहीं लेते कि मनुष्य देखना बन्द कर दे; वे इसलिए लेते हैं कि वह फिर से देखना सीख सके। जैसे कभी-कभी खेत को कुछ समय के लिए परती छोड़ना पड़ता है ताकि उसकी उर्वरता लौट आए, वैसे ही कभी-कभी पुरानी दृष्टि का विघटन आवश्यक होता है ताकि नई दृष्टि जन्म ले सके। इस अर्थ में शिव विनाशक नहीं, दृष्टि के पुनर्जन्म के देवता हैं।

भग वैदिक देवता हैं—समृद्धि और भाग्य के अधिष्ठाता। यह अत्यन्त अर्थपूर्ण है कि समृद्धि के देवता की आँखें जाती हैं। मानो ऋषि चेतावनी दे रहा हो कि ऐश्वर्य का सबसे बड़ा संकट गरीबी नहीं, बल्कि नैतिक अन्धता है। जब समृद्धि मनुष्य को इतना संतुष्ट कर दे कि वह अन्याय के प्रति मौन हो जाए, तब सबसे पहले उसकी दृष्टि भ्रष्ट होती है। इसलिए शिव धन नहीं छीनते; पहले आँखें छीनते हैं। यह प्रतीक कहता है कि नैतिक दृष्टि के बिना समृद्धि स्वयं विनाश का कारण बन सकती है।

और अन्त में, इस मन्त्र का एक अत्यन्त निजी अर्थ भी है। साधक जब कहता है—"नेत्रे ममाव्याद् भगनेत्रहारी"—तो वह वस्तुतः यह नहीं कह रहा कि "मेरी आँखें सुरक्षित रहें।" वह कह रहा है—"हे शिव! मुझे उस दिन से बचाइए जब मैं अधर्म देखकर भी उसके साथ जीना सीख लूँ। मुझे उस दिन से बचाइए जब मेरी आँखें पीड़ा की अभ्यस्त हो जाएँ। मुझे उस दिन से बचाइए जब वैभव मेरे विवेक को ढँक दे। यदि कभी मेरी दृष्टि भी भग की तरह संवेदनशून्य हो जाए, तो उसे तोड़ दीजिए, क्योंकि ऐसी आँखों का सुरक्षित रहना मेरे लिए वरदान नहीं, अभिशाप होगा।"

मुझे लगता है कि इस बिन्दु पर "भगनेत्रहारी" केवल एक पुराण-कथा का स्मरण नहीं रह जाता। वह आधुनिक मनुष्य के लिए एक गम्भीर आध्यात्मिक प्रार्थना बन जाता है—"मेरी आँखें खुली रहें ही नहीं; मेरी संवेदना भी जागती रहे।" यही इस पद का ऐसा अर्थ है जो आज के समय में अत्यन्त प्रासंगिक और जीवित प्रतीत होता है।

हमें "भगनेत्रहारी" का एक और स्तर देखना चाहिए, जो भारतीय दर्शन के एक अत्यन्त गहरे प्रश्न से जुड़ता है—क्या आँखें केवल बाहर देखने के लिए हैं, या भीतर भी? मुझे बार-बार उपनिषदों की एक धारा याद आती है। कठोपनिषद् कहता है—
"पराञ्चि खानि व्यतृणत् स्वयम्भूः..."

स्वयम्भू ने इन्द्रियों को बाहर की ओर प्रवृत्त बनाया, इसलिए मनुष्य बाहर देखता है; विरले धीर पुरुष ही दृष्टि को भीतर मोड़कर आत्मा का दर्शन करते हैं। अब इस मन्त्र को "भगनेत्रहारी" के साथ रखकर देखिए।भग की आँखें बाहर देख रही थीं।यज्ञ बाहर था।वैभव बाहर था।समारोह बाहर था। किन्तु धर्म भीतर अनुपस्थित था।उनकी दृष्टि बहिर्मुख थी।शिव उसी बहिर्मुखता को तोड़ते हैं।इस अर्थ में भग की आँखें निकालना बाहर की दृष्टि का अन्त नहीं, अन्तर्दृष्टि का प्रारम्भ है।

भारतीय योग परम्परा में जब साधक ध्यान करता है, तो वह आँखें बन्द करता है। यह संसार से घृणा नहीं है। यह बाहर के दृश्य को थोड़ी देर के लिए विराम देकर भीतर के दृश्य को देखने का अभ्यास है।ध्यान दीजिए—शिव ने भग की आँखें नष्ट कीं।योगी अपनी आँखें स्वयं बन्द करता है।दोनों घटनाओं का लक्ष्य एक हो सकता है—बाह्य-दृष्टि के निरंकुश अधिकार को समाप्त करना।जब तक बाहर का आकर्षण इतना प्रबल है कि भीतर की आवाज़ सुनाई ही नहीं देती, तब तक धर्म की दृष्टि उत्पन्न नहीं होती।भग की आँखें निकालना वास्तव में इन्द्रियों की सत्ता पर प्रहार है।भारतीय दर्शन बार-बार कहता है कि इन्द्रियाँ राजा नहीं हैं।वे सेवक हैं।राजा है-बुद्धि।और बुद्धि से भी ऊपर—आत्मा।

जब आँखें स्वयं निर्णय लेने लगती हैं—जो अच्छा लगे वही सत्य है, जो सुन्दर लगे वही मूल्यवान है, जो चमके वही श्रेष्ठ है—तब व्यवस्था उलट जाती है।शिव उसी उलटी व्यवस्था को सीधा करते हैं।

आज हमारी सभ्यता ने देखने की शक्ति को अभूतपूर्व बना दिया है।स्क्रीन।विज्ञापन।रील।वीडियो।चित्र।हर क्षण आँखों पर आक्रमण हो रहा है।इतिहास में शायद पहली बार मनुष्य की आँखें इतनी अधिक व्यस्त हैं।

पर एक प्रश्न है—क्या वे उतनी ही अधिक जागरूक भी हैं?या वे केवल उत्तेजित (stimulated) हैं?यह अन्तर बहुत बड़ा है।

उत्तेजना और जागरूकता एक नहीं हैं।मुझे लगता है कि "भगनेत्रहारी" इसी अन्तर की रक्षा करते हैं।वे आँखों को उत्तेजना का दास नहीं बनने देते।हमने पहले कहा था कि तीसरा नेत्र सम्बन्ध देखता है।पर दो आँखों की भी एक समस्या है।वे सदैव आकर्षण के नियम से चलती हैं।जो चमकदार है, उसकी ओर चली जाती हैं।जो चलता हुआ है, उसकी ओर चली जाती हैं।जो असाधारण है, उसकी ओर चली जाती हैं।मनोविज्ञान इसे attentional capture कहता है।अर्थात् हमारी दृष्टि पर हमारा पूरा नियन्त्रण नहीं होता; बाहरी वस्तुएँ उसे खींच लेती हैं।

शिव का अर्थ है—दृष्टि की स्वाधीनता।यानी मैं क्या देखूँगा, यह वस्तु तय नहीं करेगी।मेरी चेतना तय करेगी।यह विचार आज के डिजिटल युग में कितना बड़ा आध्यात्मिक सिद्धान्त बन जाता है!

कवच का प्रत्येक देव-नाम किसी अंग की रक्षा नहीं कर रहा।वह उस अंग के प्रलोभन से रक्षा कर रहा है।चन्द्रमौलि सिर को उसकी उग्रता से बचाते हैं।भालनेत्र ललाट को उसकी दिशाहीनता से बचाते हैं।भगनेत्रहारी आँखों को उनके आकर्षण-बंधन से बचाते हैं।विश्वनाथ नासिका को केवल गन्ध से नहीं, प्राण की विश्वव्यापकता से जोड़ेंगे।

अर्थात् यह कवच शरीर की रक्षा का नहीं, इन्द्रियों के आध्यात्मिक संस्कार का ग्रन्थ है।

और यदि यह सूत्र सही है, तो आगे आने वाले प्रत्येक अंग-रक्षण के श्लोक को भी इसी दृष्टि से पढ़ा जा सकता है। तब यह केवल "शिव मेरे शरीर की रक्षा करें" नहीं रह जाता; यह "शिव मेरी प्रत्येक इन्द्रिय को उसके सर्वोच्च धर्म तक पहुँचा दें"—ऐसी क्रमिक साधना का मानचित्र बन जाता है। यही मुझे इस कवच की सबसे विलक्षण विशेषता प्रतीत होती है।

हम प्रायः मान लेते हैं कि आँखों का कार्य केवल दृश्य ग्रहण करना है। किन्तु भारतीय चिन्तन में आँखें चरित्र का भी विस्तार हैं। मनुष्य जैसा होता है, वैसा ही संसार उसे दिखाई देता है। लोभी को अवसर दिखाई देते हैं, भयभीत को शत्रु, करुणामय को पीड़ित, कलाकार को सौन्दर्य, वैज्ञानिक को नियम और ऋषि को ब्रह्म। वस्तु वही रहती है; बदलता देखने वाला है। इसीलिए भारतीय परम्परा में शुद्धि बाहर की वस्तुओं की अपेक्षा पहले अन्तःकरण की की जाती है। भग की कथा इस सत्य को नाटकीय रूप देती है। उनकी आँखों में दोष नहीं था; दोष उस चेतना में था जो उन आँखों से संसार को देख रही थी। इसलिए शिव बाहरी नेत्रों पर नहीं, भीतर की दृष्टि पर प्रहार करते हैं। यह प्रहार दण्ड भी है और अनुग्रह भी। क्योंकि मिथ्या दृष्टि का नाश ही सत्य-दृष्टि का प्रारम्भ है।

हम प्रतिदिन असंख्य दृश्य देखते हैं, पर उनमें से बहुत कम हमारे भीतर उतरते हैं। धीरे-धीरे हमारी आँखें संवेदनशून्य होने लगती हैं। युद्ध के चित्र सामान्य लगने लगते हैं, पर्यावरण का विनाश विकास जैसा प्रतीत होने लगता है, गरीबी आँकड़ों में बदल जाती है, और मनुष्य "मानव संसाधन" बन जाता है। यह केवल भाषा का परिवर्तन नहीं है; यह दृष्टि का पतन है। "भगनेत्रहारी" उसी पतन से बचाने वाले शिव हैं। वे हमारी आँखों को यह वरदान नहीं देते कि वे अधिक देखें; वे उन्हें यह वरदान देते हैं कि वे सही देखें, और सही देखकर भीतर से विचलित होने की क्षमता कभी न खोएँ। क्योंकि जिस दिन अन्याय देखकर भी हमारी दृष्टि निर्विकार रह जाए, उसी दिन हमारी आँखें भग की आँखों की तरह अपना आध्यात्मिक अधिकार खो चुकी होंगी।

यही कारण है कि मुझे इस मन्त्र का वास्तविक अर्थ अब यह प्रतीत होता है कि साधक शिव से अपनी दृष्टि की सुरक्षा नहीं, बल्कि उसकी पुनर्जन्म-प्रक्रिया की याचना कर रहा है। वह मानो कह रहा है—"हे भगनेत्रहारी! यदि मेरी आँखें भी कभी केवल आकर्षण, उपभोग, सुविधा और वैभव की ओर देखने लगें; यदि वे धर्म और करुणा के प्रति उदासीन हो जाएँ; यदि वे बाहरी चमक में सत्य को खो दें, तो उन्हें वैसा ही झकझोर दीजिए जैसा आपने भग की दृष्टि को झकझोरा था। क्योंकि झूठी दृष्टि के साथ जीवित रहना, आँखें बन्द हो जाने से भी बड़ा अन्धकार है।"

मुझे लगता है कि इस प्रकार पढ़ने पर "भगनेत्रहारी" केवल पुराण की स्मृति नहीं रहते; वे मनुष्य की दृष्टि को पुनः धर्म, सत्य और संवेदना की ओर लौटाने वाले दृष्टि-गुरु बन जाते हैं।