Sunday, 26 July 2026

मोदी और मुल्ला प्रेम 3

हिंदू बेवकूफ होता है.
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उसे बेवकूफ बनने में मजा भी आता है.
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बहुत जल्दी प्रचार तंत्र के झांसे में आ जाता है और झांसे में आकर व्यक्ति पूजा में जुट जाता है.
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पहले अंग्रेजों द्वारा भारतीय राजनीति में इंप्लांटेड मोहनदास को महात्मा बनाकर अपने सर पर बैठा लेता है और ईश्वर अल्लाह तेरो नाम गाना शुरू कर देता है.
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मोहन दास के गुणगान और पूजा शुरू कर देता है.
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करोड़ों की संख्या में कट जाता है अपनी मां, बहन, बेटियों की इज्जत लुटा कर... पीढियों की अपनी संपत्ति गंवाकर... जब आंखें खुलती हैं तो रोता हुआ गांधी को कोसता है और गोडसे को धन्यवाद देता है.
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फिर उसे बेवकूफ बनाने को दूसरा गुजराती आ जाता है. 56 मुस्लिम देशों की उम्मत द्वारा भारतीय राजनीति में इंप्लांटेड यह गुजराती, गुजरात दंगों में 300 से ज्यादा हिंदुओं की हत्या करने और 50,000 हिंदुओं को जेलों में ठूंस देने के बाद... त्रिपुंड लगाकर फोटो खिंचवाकर, खुद को हिंदू हृदय सम्राट बना कर दिखाने का प्रचार करता है, और देश की सत्ता प्राप्त करते ही मुसलमानों के विश्वास को जीतने का नारा देता है और जी जान से मुसलमानों का विश्वास जीतने में लग भी जाता है.  
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बेवकूफ हिंदू फिर झांसे में आकर आरती उतारने लगता है और अंधी भक्ति में जुट जाता है.
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उससे पूछो कि भैया 10 वर्षों में हमारे लिए काम क्या किया यह भी तो बताओ? 
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तो अनपढ़ अंध भक्त अपने भगवान पर उंगली उठाने के जुर्म में गाली गलौज पर उतर आता है.
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तो मेरे प्यारे... बहुत ही अकलमंद मोदी की तरह ही बिल्कुल असली डिग्री वाले हिंदूओ... जरा नीचे पूछे गए सवालों का जवाब तो देने की कोशिश तो करो.
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और नहीं दे पाओ तो आंखों पर एक पट्टी और बांधकर ईश्वर अल्लाह तेरो नाम का गाना चालू रखो.
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क्योंकि तुम बेवकूफ बनने... कटने... और मरने के लिए ही बने हो.
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हम हिंदुओं के वोटों से सत्ता सुख भोग रहे नरेंद्र मोदीजी... भाजपा... और मोहन भागवत जी कृपया हम हिंदुओं के प्रश्नों का जवाब दीजिए.
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1....... विपक्ष में रहते हुए पहले जिस सच्चर कमेटी का आप लोग स्वयं पुरजोर विरोध करते रहे... सत्ता में आने के बाद उसी सच्चर कमेटी के हिंदू विरोधी प्रावधानों को क्यों लागू कर दिया? 
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2....... CAA बना तो लिया पर उसे आज तक लागू क्यों नहीं किया? CAA के तहत जान बचाकर भारत के बॉर्डर पर इकट्ठा हुए बांग्लादेशी हिंदुओं को देश में शरण क्यों नहीं की गई??? उन्हें लुटने मरने के लिए बॉर्डर से वापस क्यों भेजा गया??? मोदी जी अपने रोहिंग्या और बांग्लादेशी मुसलमान को लाखों की संख्या में देश में बसाया है.. क्या रोते-बिलखते अपनी जान की भीख मांगते कुछ हजार हिंदुओं को हिंदुओं के देश में, हिंदुओं की सरकार, कुछ दिन भी शरण नहीं दे सकती थी???
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3....... मोदी जी द्वारा खुद गुजरात में और भाजपा द्वारा अनेक राज्यों में मुसलमानों को रिजर्वेशन का फायदा दिलाने के लिए OBC में शामिल क्यों किया गया? हमारे ओबीसी भाइयों का हक छीनकर मुसलमानों को फायदा क्यों पहुंचाया गया???
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4....... केवल दिखावे के लिए धारा 370 हटाकर 1 साल बाद ही एग्रीकल्चरल लैंड कानून बनाकर, 15 साल का डोमिसाइल लगाकर बैकडोर से धारा 370 वापस क्यों लागू कर दी गई? क्यों नहीं भारत देश के नागरिकों को कश्मीर में जमीन खरीदने का अधिकार नहीं दिया गया???
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5.... .. एन.आर.सी.... एन.आर.सी... का झुनझुना क्यों बजाते रहे... आज तक देश में एनआरसी क्यों नहीं लागू किया गया? क्यों नहीं देश में घुसे मुस्लिम घुसपैठियों की पहचान नहीं की जा रही???
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6....... मोदी जी 2014 के पहले जिन्हें देश से बाहर निकालने के लिए चीख-चीख कर भाषण देते फिर रहे थे, उन रोहिंग्या और बांग्लादेशी घुसपैठियों को देश से बाहर क्यों नहीं भेजा?
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7....... मोदी सरकार ने दिल्ली में रोहिंग्या / बांग्लादेशी मुसलमानों को पुलिस सुरक्षा के साथ EWS फ्लैट्स क्यों दिए?
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8....... कांग्रेस से मांग करते रहे पर खुद सत्ता में आने के बाद रामसेतु को राष्ट्रीय स्मारक घोषित क्यों नहीं किया? विपक्ष में रहकर मोदी जी अहमदाबाद का नाम बदलकर कर्णावती करने की मांग कांग्रेस से लगातार करते रहे... पर उन्हें खुद सत्ता में आए 11 वर्ष बीत गए, अहमदाबाद का नाम कर्णावती क्यों नहीं किया गया???
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9....... प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठते ही राम मंदिर के लिए ढाई एकड़ जमीन का अधिग्रहण करने के लिए एक लाइन का अध्यादेश क्यों नहीं लाए? लगभग 5 साल कोर्ट के निर्णय की प्रतीक्षा क्यों की गई और शंकराचार्यों, हिंदू संतो और हिंदू संगठनों द्वारा लड़े गए केस का निर्णय हिंदुओं के पक्ष में आने के बाद सारा क्रेडिट स्वयं क्यों ले लिया गया?
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10..... अयोध्या में 5 एकड़ जमीन मुसलमानों को मस्जिद बनाने के लिए देने वाले कोर्ट के आदेश पर आपत्ति क्यों नहीं की?
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11..... हमारी आस्था के केंद्र मथुरा और काशी के मंदिरों को अपने एजेंडे से बाहर क्यों किया?
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12..... ज्ञानवापी विवाद में हिंदुओं की ओर से लड़ रहे एडवोकेट विष्णु शंकर जैन का समर्थन क्यों नहीं किया?
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13..... मुसलमानों के सबसे बड़े संगठन तबलीगी जमात के मुखिया मौलाना साद को गिरफ्तार करने की बजाए आधी रात को देश के सर्वोच्च शक्तिशाली एनएसए अजीत डोभाल को उससे सलाह मशविरा करने के लिए भेज कर, उसे कहां और क्यों छिपा दिया गया? 
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14..... अनेक राज्यों में हिंदू हित के लिए अपनी आवाज उठा रहे आंदोलनरत हिंदुओं पर लाठियां क्यों चलवाई गईं?
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15..... बंगाल में हिंदुओं के ऊपर हिंसा, बलात्कार, आगजनी और पलायन क्यों नहीं रोका गया? क्या इसलिए कि मरता और पिटता हुआ हिंदू आप को वोट देता है और वोटों की खातिर आप उसे पिटने-मरने के लिए छोड़ देते हैं?
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16..... मणिपुर में कृष्ण भक्त मैतेयी हिंदुओं को मार रहे, उनके घरों और दुकानों को जला रहे कुकी आतंकियों के खिलाफ आप कार्रवाई क्यों नहीं कर रहे? क्यों नहीं उन बेकसूर हिंदुओं की हत्याओं और बलात्कार पर आपके मुंह से एक शब्द भी नहीं फूट रहा??? क्यों उन कृष्णभक्त मैंतेई हिंदुओं के ईसाई कुकी हत्यारों के साथ सरकार चला कर उन्हें बढ़ावा दिया जा रहा है??? क्या देश के हिंदुओं ने आपको हिंदुओं को मरवाने के लिए वोट देकर सत्ता सुख प्रदान किया था???
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17..... पूरे देश में हो रही स्वयंसेवकों, अपने कार्यकर्ताओं और अन्य हिन्दुओं की नृशंस हत्याओं पर दुख क्यों नहीं व्यक्त किया गया और शबाना आजमी को चोट लगने पर मोदी जी तुरंत संवेदना व्यक्त करने क्यों निकल आए? क्यों बाइक चोर तबरेज अंसारी, दो तस्कर पहलू खान और गौ हत्यारे अखलाक के लिए मोदी जी आंखों में आंसू लाकर बयान देने निकल आए???
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18..... हिंदू संस्कृति और धर्म की रक्षा के लिए के लिए अपनी जान पर खेलकर मुस्लिम तस्करों से लड़ते आ रहे जांबाज गौरक्षकों को गली का गुंडा क्यों कहा गया? उनके डोजियर तैयार करवाने का निर्देश देकर उन्हें अपराधी क्यों बनाया गया?
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19..... मेवात में दंगाई मुसलमानों से हिंदुओं की रक्षा के लिए आगे आए मोनू मानेसर और उसके साथी बहादुर हिंदू युवकों को गिरफ्तार क्यों किया गया?
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20..... केन्द्रीय स्तर पर आज तक गौहत्या निषेध कानून क्यों नहीं बनाया गया?
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21..... जीवित पशुओं को विदेश भेजकर कटवाने के लिए विक्रय करने का हिंदू धर्म विरोधी फैसला क्यों किया गया?
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22..... आतंकवादियों पर लगाम लगाने के लिए विदेशी चंदा कानून (FCRA) निरस्त क्यों नहीं किया गया?
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23..... कांग्रेसियों द्वारा बनाए गए और हिंदुओं की संपत्ति हड़प रहे वक्फ एक्ट और वक्फ बोर्ड को समाप्त क्यों नहीं किया गया?
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24..... हिंदुओं के मंदिरों पर कब्जे के लिए कांग्रेसियों द्वारा बनाए गए Places of Worship Act को निरस्त क्यों नहीं किया गया?
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25..... हिंदुओं के मंदिरों को सरकारी नियंत्रण से मुक्त क्यों नहीं किया? हमारे मंदिरों को दिए गए दान का पैसा मुस्लिमों और ईसाइयों के समाज के लिए खर्च करने पर रोक क्यों नहीं लगाई जा रही?
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26..... मोदी जी की डबल इंजन सरकार ने कर्नाटक में 2600 से ज्यादा हिंदू मंदिर क्यों तुड़वा दिए?और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ तथा विश्व हिंदू परिषद ने इसके विरोध में आवाज क्यों नहीं उठाई???
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27..... मोदी सरकार द्वारा काशी विश्वनाथ काॅरिडोर बनाने के लिए हजारों वर्ष पुराने सैकड़ों पुराणोक्त मंदिर व मूर्तियां क्यों तुड़वाए गए? और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ तथा विश्व हिंदू परिषद ने इसके विरोध में आवाज क्यों नहीं उठाई???
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28..... UPSC और अन्य सरकारी नौकरियों में मुसलमानों की अधिकाधिक भर्ती करने के लिए छात्रवृत्ति, मुफ्त कोचिंग आदि योजनाएं क्यों बनाईं गई? हिंदुओं पर राज करने के लिए एक एक लाख रुपए की सरकारी मदद दे दे कर और इंटरव्यू में 13-13 नंबर बढ़ाकर कांग्रेस के जमाने से 10 गुना ज्यादा मुस्लिम आईएएस और आईपीएस क्यों बनाए गए?
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29..... अयोध्या में राममंदिर के समूचे शिल्पकार्य का कान्ट्रैक्ट राम मंदिर के दुश्मन और राम मंदिर की लड़ाई के दौरान हजारों हिंदुओं के हत्यारे मुसलमानों की कंपनियों को क्यों दिया गया?
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30..... कांग्रेस से भी कई गुना ज्यादा मुस्लिम तुष्टिकरण क्यों किया जा रहा है?
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31..... पिछले 9 वर्षों के लंबे समय में आप लोगों ने अहिंसक और शांतिप्रिय हिंदुओं की रक्षा हिंसक मुसलमानों से उनकी जान माल की सुरक्षा और हितों के लिए क्या किया?
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32..... मुस्लिमों की तेजी से बढ़ती जनसंख्या पर नियंत्रण के लिए कानून क्यों नहीं लाए गए?
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33..... मुस्लिम समाज के लिए अपनी लड़कियों की शादी 15 साल में करके उनकी जनसंख्या तेजी से बढ़ा कर भारत पर कब्जा करने के षडयंत्र को रोकने के लिए कोई कानून क्यों नहीं बनाया गया. या फिर हिंदू लड़कियों की शादी 18 साल से कम पर नहीं हो सकती यह कानून क्यों नहीं हटाया गया?
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34..... ईसाइयों और मुसलमानों द्वारा हिंदुओं का तेजी से किया जाता धर्मांतरण रोकने के लिए कड़ा कानून क्यों नहीं बनाया गया?
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35..... 14% मुसलमानों को हिंदुओं के खून पसीने की कमाई का 40% हिस्सा उनके लिए 300 विशेष योजनाएं बनाकर क्यों दिया गया?
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36..... हिंदुओं से अनाधिकृत रूप से जजिया कर वसूल करने वाली और हिंदुओं के उस पैसे को हिंदुओं के ही विनाश में लगाने वाली लाखों करोड़ की हलाल सर्टिफिकेशन की व्यवस्था को क्यों समाप्त नहीं किया गया? आज हिंदू अपने परिवार के लिए जो भी खरीदता है उसमें मुसलमानों के हलाल सर्टिफिकेशन का जजिया कर भी चुकाता है. यहां तक कि बाबा रामदेव तक को अपने सारे प्रोडक्ट पर हलाल सर्टिफिकेशन का निशान मुसलमानों से खरीदना पड़ता है.
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37..... क्यों पिछले 9 वर्षों में हमारे ही देश में हमारे धर्म की शिक्षा हमारे बच्चों को देने की आजादी हम हिंदुओं को नहीं दी गई?
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38..... क्यों पिछले 9 वर्षों के लंबे समय में औरंगजेब बाबर हुमायू के नकली इतिहास को हटाकर हमारे गौरवशाली इतिहास को भारत की शिक्षण व्यवस्था में शामिल नहीं किया गया?
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39..... क्यों 9 राज्यों में अल्पसंख्यक हो चुके हिंदुओं को अल्पसंख्यक का दर्जा और सुविधाएँ नहीं दिलवा पाए? 
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40..... क्यों देश के शिक्षा तंत्र से ईसाईयों का नियंत्रण नहीं हटा पाए, जिनका एकमात्र मकसद भारत के हिंदुओं पर ईसाई सभ्यता और संस्कारों को थोप कर परोक्ष धर्मांतरण है. 
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41..... मुसलमानों की दादागिरी, गुंडागर्दी, लवजिहाद, हिंदुओं के हर त्यौहार पर पत्थरबाजी और सर तन से जुदा के विरुद्ध कानून क्यों नहीं बनाए गए?
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42..... क्यों हमारे देश की सबसे बड़ी मेजोरिटी मुसलमानों का अल्पसंख्यक दर्जा समाप्त नहीं किया गया?
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43..... अल्पसंख्यक मंत्रालय और अल्पसंख्यक आयोग को खत्म क्यों नहीं किया गया?
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44...... बिल्कुल असली डिग्री वाले मोदी जी हर साल दरगाहों पर चादर चढ़ाकर हिंदुओं को क्या संदेश देना चाहते हैं???
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45..... मोहन भागवत जी... 50 साल के लिए अपने देवी देवता भूल जाओ... मुसलमानों के बिना हिंदुत्व की परिकल्पना भी नहीं की जा सकती... हिंदू और मुसलमान का डीएनए एक है... हर मंदिर के नीचे शिवलिंग क्यों ढूंढना... राम मंदिर आंदोलन में हिस्सा लेना हमारी मजबूरी थी और संघ इसके बाद किसी भी मंदिर आंदोलन में कोई हिस्सा लेना नहीं चाहता... हिंदू समाज में समलैंगिकता महाभारत के जमाने से ही चली आ रही है... हिंदुओं में शादी एक कॉन्ट्रैक्ट होता है... जैसे ज्यादा अकलमंदी भरे आपके बयानों के पीछे हिंदू समाज को कौन सी दिशा देने का इरादा होता है?
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मोदी मुल्ला प्रेम 1

आज भी मुगलों के अंडकोष पर झूला झूल रही है मोदी सरकार
कटु किंतु यही सत्य है 

-दिलीप पाण्डेय

ये लाइन लिखने के लिए इसलिए विवश हुआ क्योंकि धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद किसी चम्पू ने ये रोना रोया कि बताओ उस शिक्षा मंत्री को हटा दिया गया जिसने मुगलों को इतिहास से हटा दिया । 

ये पूरी तरह गलत है । आज भी भारत के स्कूलों में भोले भाले बच्चों को मुगलों का पाठ पढ़ाया जा रहा है । इतिहास में किसी का नाम लिखा जाना उसका महिमा मंडन ही होता है । या तो फिर नाम इस तरह लिखा जाए कि पाठक के मन में घृणा पैदा हो । लेकिन वर्तमान इतिहास की स्कूली पुस्तकें नीरस हैं जिनसे बच्चों को कोई भी प्रेरणा नहीं मिलती है ना ही विदेशी हमलावरों के खिलाफ कोई घृणा पैदा होती है । ये मर्द वाली बातें हैं जो जफर सरेशवाला के चरणचुंबक नपुंसक लोग कभी नहीं समझ पाएंगे । 

चलो वक्फ बोर्ड नहीं खत्म कर सके... एक कानून लाकर पुरानी अवैध वक्फ इमारतों को वैध कर दिखावे की मर्दानगी पर तालियां बटोर ली लेकिन कम से कम इतिहास तो सही कर सकते थे क्या इससे भी अमेरिका रोक रहा था ?

12 साल बहुत होते हैं । एक पीढ़ी तैयार हो जाती है । 12 साल हो गए मोदी सरकार को अगर इतिहास भी हिंदुत्ववादी लिख दिया होता तो भी हम मानते कि इस सरकार ने कम से कम कुछ तो सुधार किया स्कूली शिक्षा में ।

सीखो इजराइल से... क्या इजराइल ये पढ़ाता है कि हिटलर के नाजी साम्राज्य की वास्तुकला कैसी थी और उन्होंने कौन कौन से युद्धों में जीत दर्ज की थी ? 

सारी दुनिया मानती है कि इस्लामिक राज में हिंदुओं के साथ जो हुआ वो दुनिया के इतिहास में बर्बरता की पराकाष्ठा है लेकिन ये मोदी सरकार मुगलों की वास्तुकला का पाठ पढ़ाते हुए मुगलों के अंडकोष से खेलते हुए ये दावा भी करती है कि वो हिंदूवादी है । 

इसको वो मुगलिया वास्तुकला नजर नहीं आती जिसमें सिरों के मीनार बनाए गए थे । अरे ! तुम्हारे अंदर इतनी भी बौद्धिकता नहीं कि स्कूली इतिहास इस लायक लिख सको कि हिंदू बच्चों को हिंदुत्व की प्रेरणा मिले । 

कालापानी में जाकर सावरकर की फोटो के आगे मत्था रगड़ते रगड़ते बोर हो गए तो ब्रह्माजी को रंडीबाज बताने वाले ज्योतिराव फुले के कदमों में लेट गए । यही तुम्हारी बौद्धिकता है । तुम सावरकर के अनुयायी हो कि फुले के ये तो तय कर लो ? 

अगर सच में कोई सावरकर के विचारों पर चलने वाली सरकार 12 साल तक चली होती तो आज देश में आमूलचूल परिवर्तन देखने को मिलता जो हमें बिलकुल भी नजर नहीं आ रहा है । नजर आ रहे हैं तो प्रधानमंत्री आवास के तहत हिंदुओं के टैक्स से बने हुए जिहादियों के करोड़ों मकान और उनमें चल रहे लव जिहाद ! 

और देखो कैसी अहसान फरामोशी है । हमने यूजीसी के खिलाफ इतना लिखा, यहां फेसबुक पर जो लिखा जाता था वो 24 घंटे में सड़कों पर प्रदर्शनकारियों की जुबान से निकलता था । मां सरस्वती की कृपा से हमने अपनी लेखनी की ताकत से और लाखों बहादुर लोगों ने ऐसे काले कानून पर स्टे लगवाया । और मोदी समर्थकों की बहन बेटियों को ओबीसी जिहादियों से बचाया वरना यूजीसी के बाद तो ओबीसी जिहादी मोदी समर्थकों की बहन बेटियों को खुल्ले आम उड़ा ले जाते और किसी प्रधानमंत्री आवास योजना से बने मकान में ले जाकर अक्कड़ बक्कड़ खेलते । लेकिन इसके बाद भी निर्लज्ज मोदी के निर्लज्ज समर्थक हमारा अहसान ही नहीं मानते, इससे ज्यादा अहसानफरामोशी और क्या हो सकती है ? 


मोदी मुल्ला प्रेम 2

अगर आपमें मोदी जी के कपड़े, दाढ़ी, टोपी, झांकी और शानदार वीडियोज से ऊपर उठ कर देखने की दृष्टि हो... अगर तर्क करने की... प्रश्न पूछने की और सोचने की शक्ति हो आपमें... और साथ-साथ थोड़ा तथ्यों, थोड़ा घटनाओं का ज्ञान भी हो... तो जरा सोच कर बताएं...
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जिस तरह महाभारत और रामायण के युद्धों के अनुयाई... और अपने हर देवता को शस्त्रों के साथ पूजने वाले... लड़ाका हिंदुओं को अहिंसा का पाठ पढ़ाने के लिए, उनके हथियार छीन लेने के लिए और हमारे देश को लूटने के लिए अंग्रेजों ने मोहनदास गांधी को भारतीय राजनीति में इंप्लांट किया था...
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उसी तरह क्या मोदी भारतीय राजनीति में 57 मुस्लिम देशों की उम्मत (संगठन) द्वारा गजवा-ए-हिंद के लिए बढ़ाया गया एक मोहरा है?
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अगर इस दृष्टिकोण से... आप मोदी के मुख्यमंत्री शासन या प्रधानमंत्री शासन के पूरे कार्यकाल को देखेंगे तो मुसलमानों के विश्वास और मुसलमानों के तृप्तिकरण की सारी पिक्चर, सारा परिदृश्य बिल्कुल साफ साफ नजर आएगा... 
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1..... गुजरात का मुख्यमंत्री रहते 2002 के दंगों में 300 से ज्यादा हिंदुओं की हत्या मोदी ने क्यों कराई? ये पुलिस की गोलियों से मारे गए हिंदुओं की संख्या का गुजरात सरकार का ऑफिशियल फिगर है, याद रहे असली संख्या सरकारी फिगर से हमेशा कई गुना ज्यादा होती है. यहाँ ये भी याद रहे कि जलियांवालाबाग के हत्यारे जनरल डायर ने 379 मारे थे और मुल्ला मुलायम ने 28... मोदी के प्रचार तंत्र के चलते हम 28 हिन्दुओं को मारने वाले को मुल्ला मुलायम और 300 से ज्यादा हिंदुओं को मारने वाले मोदी को हिंदू हृदय सम्राट पुकारते हैं.
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2..... 50,000 से ज्यादा हिंदुओं को जेलों में क्यों डाल दिया गया? 
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3..... क्यों गुजरात का मुख्यमंत्री रहते हुए बजरंग दल, विश्व हिंदू परिषद और आर एस एस का संगठन तबाह कर दिया गया? क्यों गुजरात में सैकड़ो हिंदू मंदिरों को नष्ट किया गया? जिसके विरोध में विश्व हिंदू परिषद के अध्यक्ष अशोक सिंघल भी खड़े हुए थे. मोदी को गजनी ठहराते हुए उनका वीडियो इंटरनेट पर वायरल है.
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4..... क्यों हिंदुओं के गरजते शेर प्रवीण तोगड़िया को बर्बाद किया गया? 
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5..... क्यूँ हिंदू धर्म और हिंदुओं के लिए आवाज बुलंद करने वाले नूपुर शर्मा, नवीन जिंदल, अरुण यादव, काजल हिंदुस्तानी, पायल रोहतगी और राजा सिंह, बिट्टू बजरंगी, मोनू मानेसर का जीवन तबाह किया गया? क्यों हिंदुओं के लिए कानून बनाने की लगातार मांग करने वाले सुप्रीम कोर्ट के वकील अश्वनी उपाध्याय को झूठे आरोपों में जेल भेजा गया?
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6..... क्यों आधी रात को देश के सबसे ज्यादा शक्तिशाली व्यक्ति नेशनल सिक्योरिटी एडवाइजर अजित डोभाल को भेज कर मौलाना साद को फरार होने में मदद की गई?
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7..... क्यों मुसलमानों का विश्वास जीतने और उनका तृप्तिकरण करने की बात की गई, और मुसलमानों का तुष्टिकरण करने में कांग्रेस के भी रिकॉर्ड तोड़ दिए गए और गौ रक्षकों को गली का गुंडा ठहराया गया? 
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8..... क्यों हिंदुओं पर राज करने के लिए और गजवा ए हिंद के लक्ष्य पाने में मुसलमानों को मदद करने के लिए थोक के भाव कांग्रेस के जमाने से 10 गुना ज्यादा मुस्लिम आईएएस और आईपीएस... एक एक लाख की सरकारी मदद दे दे कर और फ्री कोचिंग फ्री रहना खाना दे देकर तैयार किए गए?
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9..... क्यों मुसलमानों को 300 विशेष योजनाएं प्रदान की गईं और हिंदुओं को एक भी नहीं?
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10..... कांग्रेस तक ने जिस सच्चर कमेटी को डस्टबिन में डाल के रखा था और जिसके हिंदू विरोधी प्रावधानों का भाजपा ने विपक्ष में रहते पुरजोर विरोध किया था, उसे क्यों लागू किया गया? 
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11... क्यों फ्री वैक्सीन अधिकतर मुस्लिम देशों को दिए गए? 
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12... क्यों मुस्लिम देशों पर संकट आने पर मोदी जी... हिन्दुओं के टेक्स का आटा, दाल, चावल, ट्रक्स, संसाधन और लाव-लश्कर लेकर तुरंत मदद को दौड़ पड़ते हैं? अफगानिस्तान हो या तुर्की, पाकिस्तान हो या हमास वाला फिलिस्तीन या हिंदुओं का कत्लेआम करने वाला बांग्लादेश.
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13... क्यों बड़े-बड़े मुस्लिम देश मोदी को अपने सर्वोच्च सम्मान से नवाज रहे हैं? ऐसा क्या किया है मोदी ने उनके लिए... जी बड़े-बड़े मुस्लिम देश मोदी को सर्वोच्च सम्मान से इसलिए नवाज रहे हैं इसलिए पुरस्कार दे रहे हैं क्योंकि मोदी मुस्लिम एजेंडे को फॉलो कर रहे हैं...हिंदुस्तान को तेजी से गजवा ए हिंद की तरफ ले जा रहे हैं.
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14... क्यों हर मुस्लिम की मौत पर मुखर होकर बयान देने वाले मोदी हिंदुओं के मरने पर जुबान सिल कर बैठ जाते हैं? गौ हत्यारे अखलाक की हत्या पर बोलने वाले, बाइक चोर तबरेज अंसारी और गौ तस्कर पहलू खान की हत्या पर दुख व्यक्त करने वाले, और तो और शबाना आजमी के पैर में चोट लग जाने पर दुख व्यक्त करने वाले मोदी बंगाल में हजारों हिंदुओं के मर जाने पर भी एक शब्द अपने मुंह से नहीं निकालते... पूरे हिंदुस्तान में हिंदुओं की हो रही हत्याओं पर मोदी ने एक बार भी मुंह खोला हो तो हमें जरूर बताइएगा.
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15... क्यों पिछले 9 सालों के लम्बे समय में हिंदुओं के लिए अति-आवश्यक मुद्दों जैसे मुस्लिम जनसँख्या पर लगाम... हमारे मंदिरों को शासन से मुक्ति... हमारे धर्म की शिक्षा हमारे बच्चों को देने की आजादी... हमारे गौरवशाली इतिहास को शिक्षण में शामिल करना और गुलामी का इतिहास समाप्त करना... 9 राज्यों में अल्पसंख्यक हो चुके हिंदुओं को अल्पसंख्यक दर्जा और सुविधाएँ दिलवाना... देश के शिक्षा तंत्र से ईसाईयों का नियंत्रण हटाना... धर्मांतरण के विरुद्ध सख्त से सख्त कानून बनाना... मुसलमानों की दादागिरी, गुंडागर्दी, लवजिहाद, सर तन से जुदा के विरुद्ध कानून बनाना... हिंदुओं के पैसे से आतंकवादियों को मदद में जुटी हलाल इकोनॉमी पर बैन लगाना... हिंदुओं की सम्पत्ति हथिया रहे वक्फ बोर्ड कानून को समाप्त करना... हमारे देश की सबसे बड़ी मेजोरिटी मुसलमानों का अल्पसंख्यक दर्जा समाप्त करना... अल्पसंख्यक मंत्रालय और अल्पसंख्यक आयोग समाप्त करना... हमारे हजारों मंदिरों पर मुसलमानों के कब्जे को बरकरार रखने के लिए बनाए गए प्लेसेज ऑफ वरशिप एक्ट को हटाना... के साथ हिंदू समाज की अनेकों समस्याओं पर कोई काम नहीं किया गया... सच तो ये है कि पिछले 9 सालों में हिंदू समाज और देश के 100 करोड़ हिंदुओं की भलाई के लिए के लिए कोई भी काम किया ही नहीं गया. अगर आपके हिसाब से हमारे देश के 100 करोड़ हिंदू समाज के लिए कुछ किया गया है तो उस योजना... उस एक काम को... मुझे जरूर बताएं.
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मुझे तो पूरा यकीन है कि एक दिन हमको जरूर पता चलेगा... कि मोदी को भारतीय राजनीति में आगे बढ़ाने के लिए ही 57 मुस्लिम देशों की उम्मत ने गोधरा ट्रेन का अग्निकांड और पुलवामा विस्फोट कराया था..

भारत की काल गणना आधुनिक नासा सॉफ्टवेयर से अधिक शुद्ध है।

भारत की ऐतिहासिक काल गणना अभी भी आधुनिक नासा सॉफ्टवेयर से अधिक शुद्ध है। १९२३ के मिलांकोविच सिद्धान्त की तुलना में भारतीय गणना के अनुसार जल प्रलय अधिक शुद्ध हैं। सृष्टि काल की गणना तथा दोलन की भी सूक्ष्म माप है। २०,००० वर्ष पुराना इतिहास आज भी परम्परा रूप में जीवित है।
(१) १७५०० ई.पू. में कश्यप के समय पुनर्वसु नक्षत्र में सूर्य प्रवेश से वर्ष गणना होती थी, जिसका देवता अदिति है। शान्ति पाठ में यही कहते हैं-अदितिर्जायम्, अदितिर्जनित्वम् = अदिति नक्षत्र से संवत्सर का अन्त होता है तथा नया संवत्सर आरम्भ होता है। आज भी जब सूर्य पुनर्वसु नक्षत्र में आता है को जगन्नाथ की रथ यात्रा होती है। आगे-पीछे दोनों संवत्सरों का रूप अदिति है, अतः ग्रीस में इसके प्रतीक जूनो देवी का मुंह आगे-पीछे दोनों तरफ होता है।
(२) पुष्कर द्वीप (दक्षिण अमेरिका) में आमेजन तट पर हिरण्याक्ष का राज्य था। वे लोग वराह रूप में विष्णु भगवान् की पूजा करते थे। अतः उनसे मैत्री दिखाने के लिए विष्णु अपने १८ साथियों सहित वराह का मुखौटा लगा कर उनके पास गये। मित्र रूप में उनका स्वागत हुआ। एक दिन धोखे से हिरण्याक्ष को मार कर वे लोग भाग निकले। यह वर्णन जेन्द अवेस्ता का है। पुराणों में भी लिखा है कि इन्द्र की सहायता के लिए वराह ने धोखे से हिरण्याक्ष को मारा था अतः उसके प्रतिशोध के लिए हिरण्यकशिपु ने तप किया। वराह अवतार द्वारा वध होने के बाद से सूअर का मांस वर्जित गो गया, जो आज तक इस्लाम में चल रहा है।
(२) राजा पृथु द्वारा खेती के लिए पर्वतों को धनुष की नोक से समतल बनाया गया। धनुषाकार समतल बनाई भूमिको टेरेस फार्मिंग कहते हैं, जिसके प्राचीन अवशेष आज भी पेरु में हैं।
(३) शतपथ ब्राह्मण के अनुसार प्रथम बृहस्पति चीन में थे, जिन्होंने हर शब्द के लिए चिह्न दिया था। बहां आज भी शब्द-लिपि प्रचलित है। बाद में इन्द्र ने मरुत की सहायता से शब्दों को ध्वनि खण्डों में विभाजन किया। ३३ देवों के चिहन् ३३ व्यञ्जन तथा ४९ मरुत् रूप ४९ अक्षर बने।, अतः निर्माता को मरुत् कहा। चिह्न रूप में देवों का नगर होने के कारण यह देव-नागरी लिपि है। आज भी यह लिपि पूर्व के लोकपाल इन्द्र के स्थान से उत्तर पश्चिम के लोकपाल मरुत् क्षेत्र तक प्रचलित है। यह इन्द्र की त्रिलोकी (भारत-रूस-चीन) में प्रचलित हुआ, किन्तु चीन के लोग अपनी मूल लिपि पर बने रहे। बॄहस्पति के लाल में ब्रह्मा पुष्कर में रहते थे जिसे इज्जैन से १२ अंस पश्चिम तथा ३५ अंश उत्तर अक्षांश पर कहा गया है (पुष्कर = बुखारा)। ब्रह्मा के स्थान से उत्तर-पूर्व चीन-जापान में लिपि ऊपर से नीचे लिखते थे, दक्षिण पूर्व में बायें से दाहिने, तथा दक्षिण पश्चिम में दाहिने से बांये लिखते थे, जो आज तक प्रचलित है।
(४) नरसिंह अवतार में नरसिंह छोटी सेना लेकर मिस्र गये थे और हिरण्याकशिपु को मार कर प्रह्लाद को गद्दी पर वैठाया। हिरण्यकशिपु की अधिकांश सेना सीमा पर थी। अतः नरसिंह को मनुष्यों में सिंह कहते है< जो आज तक राजाओं की उपाधि है। शत्रु रूप में निन्दा के लिए उसे मिस्र में पशु रूप बनाते हैं-स्फिंक्स।
(५) बलि के यज्ञ में इन्द्र ने वामन की सहायता से ३ लोक वापस लिए (रामायण के अनुसार भारत-चीन-रूस)। बलि के पुरोहित कवि उशना का स्थान काबा है। वहां बलि की बाल देवता के रूप में पूजा होती थी।
(६) राजा वरुण के उर नगर बनाया था (उरुं हि राजा वरुणश्चकार-ऋग्वेद, १/२४/८)। यह इराक का प्राचीनतम नगर है। इस वरुण तथा रोहित की जो कथा शतपथ ब्राह्मण, ब्रह्माण्ड पुराण आदि में है, वही कथा उर निवासी अब्राहम और उनके पुत्र इस्माइल के विषय में बाइबिल में है।
(७) बलि के समय ही समुद्र मन्थन हुआ था जिसमें देव-असुर ने परस्पर सहायता की थी। इसके संयोजक इन्द्र के मित्र वासुकि थे, जिनका निवास रसातल (दक्षिण अमेरिका) में था (ब्रह्माण्ड पुराण, १/२/२० अध्याय)। खनिज कूर्म-पृष्ठ भूमि (ग्रेनाइट या अन्य कठिन भूमि) में ही मिलते हैं, अतः आयोजक को कूर्म कहा गया। खनन में असुर दक्ष थे अतः वे खनन के लिए अफ्रीका से भारत के खनिज क्षेत्र झारखण्ड आये। खान के नीचे गर्म होता है, अतः असुर कार्य वासुकि के मुंह की तरफ गर्म था। आज भी उनके वंशजों का चेहरा अफ्रीकियों से मिलता है। उसी भाषा क्षेत्र के यवनों को राजा सगर ने निष्कासित किया था, जो भाग कर ग्रीस चले गये, जिसे हेरोडोटस के अनुसार इयोनिआ कहने लगे। किन्तु आज भी अरबी चिकित्सा पद्धति को ही यूनानी कहते हैं। आज भी असुर वंशजों की वही उपाधि है जो ग्रीक भाषा में खनिजों के नाम हैं। देवता लोग विरल धातुओं के शोधन में दक्ष थे। अतः वे स्वर्ण के लिए जिम्बाबवे तथा चान्दी के लिए मेक्सिको गये। अतः जाम्बूनद स्वर्ण श्रेष्ठ कहते थे (दुर्गा स्तुति-जाम्बूनद स्वर्णाभां)। मेक्सिको के नाम पर चान्दी को माक्षिक कहते थे (आयुर्वेद का स्वर्ण-माक्षिक भस्म)। सिंहभूमि से भागलपुर में गंगा तट तक मन्दराचल (मन्दार) पर्वत है, जिसके छोर पर वासुकिनाथ मन्दिर है। 
(८) कार्त्तिकेय ने क्रौञ्च द्वीप (उत्तर अमेरिका) पर आक्रमण के लिए नौसेना गठित की थी। उसके पूर्व शक्ति द्वारा क्रौञ्च पर्वत पर प्रहार किया था (कुमारः क्रौञ्चदारणः)। जल और वायु में भी गति होने के कारण उनकी नौसेना को मयूर कहा गया। उसमें भारत के अतिरिक्त प्रशान्त क्षेत्र के भी सैनिक थे (वियतनाम-इण्डोनेसिया तक ९ खण्ड का भारत था)। आज भी मयूर सेना के मयूरी के वंशज (माओरी) हवाइ द्वीप, न्यूजीलैण्ड तथा आस्ट्रेलिया में एक ही भाषा कहते है। १८३३ में हवाई द्वीप से एक माओरी जेम्स कुक के साथ न्यूजीलैण्ड आया था तथा वहां की माओरी रानी के साथ सन्धि में दुभाषिया रूप में हस्ताक्षर किया था। जेम्स कुक को आश्चर्य हुआ कि इतने दूर क्षेत्र की एक ही भाषा कैसे है। उस दुभाषिये की प्रपौत्री श्रीमती युमा बोक्कासा ने मेरा लेख पढ़ कर मुझे लिखा कि उसके दादा ने वही कहानी बतायी थी।
(९) रामायण (४/४०/५४) के अनुसार पूर्व दिशा के अन्त का चिह्न देने के लिए ब्रह्मा ने एक द्वार बनवाया था। उज्जैन से १८० अंश पूर्व आज भी प्राचीन पिरामिड मेक्सिको में है जिसे प्रथम देवता का पिरामिड कहते हैं। प्राचीन समय क्षेत्रों की सीमा पर आज भी प्रायः ३० से अधिक क्षेत्र पुराने नामों से विश्व भर में फैले हुए हैं।
(१०) कार्त्तिकेय काल में अभिजित का पतन होने पर धनिष्ठा से वर्ष का आरम्भ हुआ (महाभारत, वन पर्व, २३०/८-१०)। यह प्रायः १५८०० ईपू. में था। मेगास्थनीज की मुल इण्डिका में था कि भारत अन्न और खनिज में स्वावलम्बी था अतः पिछले १५,००० वर्षों में किसी पर आक्रमण नहीं किया। सिकन्दर से प्रायः १५,५०० वर्ष पूर्व कार्तिकेय ने क्रौञ्च द्वीप पर आक्रमण किया था। इससे भारतीय सभ्यता अधिक प्राचीन लग रही थी, अतः बाद के संस्करण में इसे हटाया गया। मेगास्थनीज को इसलिए चुना क्योंकि उसकी पुस्तक उपलब्ध नहीं है तथा इच्छानुसार बार-बार परिवर्तन किया जा सकता है। कार्त्तिकेय के समय धनिष्ठा नक्षत्र से वर्षा होती थी, अतः संवत्सर को वर्ष कहा गया।
(११) कार्त्तिकेय का धनिष्ठा नक्षत्र से आरम्भ वर्ष वेदाङ्ग ज्योतिष में है, जिसमें १९ वर्ष का युग होता है। आज भी जगन्नाथ का नव कलेवर १९ वर्ष बाद होता है। उस समय ज्येष्ठ मास में शीत आरम्भ होता था, अतः पश्चिम ओड़िशा में ज्येष्ठ शुक्ल षष्ठी को शीतल षष्ठी कहते है, जिस दिन शिव पार्वती का विवाह होता है।
(१२) स्वातम्भुव मनु के समय २९१०१२ ईपू. से भारत में कई पञ्चाङ्ग आरम्भ हुए। भारत में युग तथा दिन का निर्णय ५-५ प्रकार से होता है (पञ्च संवत्सरमयं युगम्, पञ्चाङ्ग) जिसके द्वारा अशुद्धि दूर की जाती है। नासा के कैलेण्डर सॉफ्टवेयर में यह पद्धति नहीं है, अतः उससे गणना में महाभारत काल में ३ दिन तथा रामायन काल (४५०० ईपू) में ७ दिन की भूल होती है। पर आजकल नासा सॉफ्टवेयर द्वारा भारतीय तिथियों को बदलने का फैशन चला है।

Friday, 24 July 2026

गाली और नाम

कभी आपको लगता है कि ऋग्वेद के वाक्-सूक्त, भर्तृहरि के शब्द-ब्रह्म, तांत्रिक परंपरा की परा, पश्यन्ती, मध्यमा और वैखरी वाक् का देश किस स्तर तक के कीचड़ में लोटने में किसी पशु की तरह आनंदित युवाओं को देखेगा? वाक् के साधकों की चेतना विकास की दिशा में बढ़ती है—आवेग से विवेक की ओर, प्रतिक्रिया से उत्तरदायित्व की ओर, हिंसा से संवाद की ओर। गाली इस विकास-यात्रा का उलटा मार्ग है। वह चेतना को पुनः आदिम प्रतिक्रियाओं की ओर ले जाती है। ये गालियाँ भारतीय चेतना के अवरोह (Regression of Consciousness) का संकेत हैं।

भारतीय दर्शन में नाम और रूप केवल पहचान नहीं हैं; वे अस्तित्व के आयाम हैं। किसी का नाम लेना उसकी सत्ता को स्वीकार करना है। इसीलिए भारतीय परंपरा में नामकरण संस्कार है। नाम व्यक्ति को समाज में प्रतिष्ठित करता है। इसके विपरीत गाली नाम का अपहरण करती है। वह व्यक्ति को उसके वास्तविक नाम से नहीं पुकारती; उसे एक अपमानजनक संकेत में बदल देती है।

गाली का सबसे बड़ा भ्रम यह है कि उसे केवल अशिष्ट भाषा समझ लिया जाता है। वस्तुतः गाली भाषा का नहीं, चेतना का विषय है। शब्द केवल उसका माध्यम हैं; उसका वास्तविक निवास मनुष्य की मानसिक संरचना में है। किसी व्यक्ति की गालियाँ केवल उसके शब्दकोश का परिचय नहीं देतीं; वे उसके भावनात्मक संगठन, उसकी असुरक्षाओं, उसकी आक्रामकता, उसके आत्म-नियंत्रण और उसके सांस्कृतिक संस्कारों का भी परिचय देती हैं। गालियाँ प्रायः उस व्यक्ति के अचेतन का दर्पण होती हैं जो उन्हें उच्चार रहा है। वे विरोधी की वास्तविकता से अधिक वक्ता की भीतरी संरचना को उद्घाटित करती हैं।

गाली और तर्क का मूलभूत अंतर स्पष्ट है। जब मस्तिष्क का प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स सक्रिय रहता है, तब मनुष्य कारण देता है, प्रमाण प्रस्तुत करता है, तर्क करता है और स्वयं को नियंत्रित रखता है। परंतु जब वह निष्क्रिय हो तो उसकी अमिग्डाला खतरे या अपमान का अनुभव करती है और नियंत्रण अपने हाथ में ले लेती है, तब भाषा का स्वरूप बदल जाता है। तर्क की जगह विस्फोट आ जाता है। आधुनिक मनोविज्ञान इसे Emotional Hijacking कहता है—एक ऐसी स्थिति जिसमें भावनाएँ संज्ञानात्मक नियंत्रण पर अस्थायी विजय प्राप्त कर लेती हैं। इस दृष्टि से गाली विवेकपूर्ण संप्रेषण नहीं, भावनात्मक अपहरण की भाषाई अभिव्यक्ति है।

गालियों का अध्ययन करें तो स्पष्ट होगा कि लगभग प्रत्येक गाली किसी-न-किसी सांस्कृतिक पवित्रता पर आघात करती है। कहीं मातृत्व को अपवित्र किया जाता है, कहीं स्त्री-देह को, कहीं धर्म को, कहीं जातीय पहचान को। यह कोई संयोग नहीं है। गाली वहीं प्रहार करती है जहाँ समाज ने सबसे अधिक पवित्रता स्थापित की होती है। इसलिए गाली का वास्तविक कार्य सूचना देना नहीं, पवित्र का अपवित्रीकरण करना है। इन गालियों का आश्चर्यजनक विरोधाभास यह है कि वे लगभग कभी भी यौन सुख (sexual pleasure) के बारे में नहीं होतीं; वे यौन सत्ता (sexual power) के बारे में होती हैं। वे कामुकता की भाषा नहीं, प्रभुत्व (domination), अपमान (humiliation) और अधिकार-हरण (violation) की भाषा हैं। इसलिए यदि कोई व्यक्ति यह मानता है कि यौन गालियाँ केवल काम-वासना का भाषिक रूप हैं, तो वह उनके वास्तविक मनोविज्ञान को नहीं समझ रहा। वे इच्छा की नहीं, हिंसा की भाषा हैं। उस स्थान पर अभिव्यक्त हो रही वे गालियाँ केवल अश्लील नहीं हैं; वे सांस्कृतिक अपवित्रीकरण (cultural profanation) का अनुभव कराने की नई वामपंथी स्ट्रेटेजी हैं।

विकासवादी मनोविज्ञान गालियों को प्रभुत्व-प्रदर्शन (Dominance Display) के रूप में भी देखता है। गाली का उद्देश्य सामने वाले को कोई नई सूचना देना नहीं होता; उसका उद्देश्य उसे मनोवैज्ञानिक रूप से दबाना होता है। इस प्रकार गाली संवाद की नहीं, शक्ति-प्रदर्शन की भाषा बन जाती है।

सोशल मीडिया पर गाली केवल भावनात्मक प्रतिक्रिया नहीं रहती; वह सामाजिक पुरस्कार (social reward) प्राप्त करने का साधन भी बन जाती है। यदि किसी अपमानजनक टिप्पणी पर हजारों लाइक, शेयर और प्रशंसा मिलती है, तो मस्तिष्क का डोपामिन तंत्र उसे सफलता के रूप में दर्ज करता है। धीरे-धीरे व्यक्ति सीख जाता है कि संयमित तर्क की अपेक्षा उत्तेजक अपमान अधिक लोकप्रिय है। यही वह प्रक्रिया है जिसे आज कई विचारक "Outrage Economy" कहते हैं—एक ऐसी अर्थव्यवस्था जिसमें ध्यान (attention) सबसे मूल्यवान वस्तु है और गाली उसे प्राप्त करने का सबसे सस्ता साधन।

गाली का प्रयोजन तर्क को परास्त करना नहीं, प्रतिद्वंद्वी की आत्म-प्रतिष्ठा को आहत करना है। यही कारण है कि गाली मूलतः degradation ritual है—एक ऐसा भाषिक अनुष्ठान जिसके माध्यम से बोलने वाला दूसरे व्यक्ति को उसके मानवीय स्तर से नीचे धकेलना चाहता है।

और वह भी इसलिए कि वह स्वयं नीचा महसूस करता है। एरिख फ्रॉम ने अपनी प्रसिद्ध कृति The Anatomy of Human Destructiveness में विनाशकारी प्रवृत्ति और जीवनोन्मुख प्रवृत्ति का अंतर किया है। फ्रॉम के अनुसार स्वस्थ व्यक्ति अपनी शक्ति का अनुभव सृजन द्वारा करता है, जबकि असुरक्षित व्यक्ति अपनी शक्ति का अनुभव दूसरे को छोटा करके करता है। इस दृष्टि से गाली कई बार शक्ति का प्रदर्शन नहीं, शक्ति के अभाव की क्षतिपूर्ति (Compensation) होती है। जिस व्यक्ति को अपने तर्क, अपने व्यक्तित्व या अपनी नैतिक ऊँचाई पर विश्वास नहीं होता, वह शब्दों की तीव्रता से उस रिक्ति को भरने का प्रयास करता है। इसलिए गाली अनेक बार साहस की नहीं, सृजनशक्ति के अभाव की भाषा होती है।

फ्रायड का कहना था कि गाली हिंसा का स्थानापन्न ( substitute) है। मैं उससे असहमत हूँ। मेरे विचार से गाली हिंसा की भूमिका है। प्रत्येक समाज अपनी हिंसा को वैध ठहराने से पहले अपने शिकार का नैतिक अवमूल्यन करता है। किसी व्यक्ति को सीधे नष्ट करना कठिन है; पहले उसे सम्मान के योग्य न रहने वाला सिद्ध करना पड़ता है। इतिहास के प्रत्येक बड़े नरसंहार से पहले भाषा बदलती है। लोग व्यक्तियों को नाम से नहीं, अपमानसूचक विशेषणों से पुकारना प्रारम्भ करते हैं। यह हिंसा की पूर्वपीठिका होती है । यानी गाली हिंसा का विकल्प नहीं, अनेक बार उसकी प्रस्तावना होती है। गाली संवाद को समाप्त नहीं करती; वह संवाद की संभावना को ही समाप्त कर देती है।

लेकिन यह तो गाली देने वालों का मनोविज्ञान है, उन साहित्यकारों का मनोविज्ञान भी पढ़िए जो इन गालियों की Moral Licensing कर रहे हैं। यानी ये वे हैं जो यह विश्वास कर लेते हैं कि इनके उद्देश्य इतने पवित्र हैं कि उसके लिए सामान्य नैतिक नियम लागू नहीं होते। जब वे गालियों के इन क्षणों को अपवाद मानने के बजाय आदर्श या सामान्य घोषित करने लगते हैं, तब समस्या केवल भाषा की नहीं रहती; तब हमारी सामूहिक मनोसंरचना बदलने लगती है। उसी दिन गालियाँ शब्दकोश से निकलकर संस्कृति का हिस्सा बन जाती हैं। साहित्यकार जब गाली को नैतिक वैधता देता है, तब वह समाज के सामूहिक विवेक का पुनर्लेखन कर रहा होता है। वह केवल यह नहीं कह रहा कि "गाली दी गई"; वह यह कह रहा है कि "गाली उचित थी।"जबकि ऐसे माहौल में साहित्यकार का दायित्व सबसे अधिक बढ़ जाता है। क्योंकि साहित्य का संपूर्ण प्रयोजन मनुष्य को पुनः नाम देना है। उपन्यास, कविता, नाटक और कथा—ये सभी हमें याद दिलाते हैं कि प्रत्येक मनुष्य किसी विशेषण से बड़ा है। साहित्य व्यक्ति को उसकी जटिलता लौटाता है; गाली उसे उसकी जटिलता से वंचित कर देती है। साहित्य कहता है—"उसे समझो।" गाली कहती है—"उसे समाप्त करो।" साहित्य व्यक्ति के भीतर की कहानी खोजता है; गाली व्यक्ति को कहानी बनने से पहले ही एक निर्णय में बदल देती है।तो होना तो यह चाहिए था कि सभी साहित्यकार एक साथ एक संयुक्त ज्ञापन निकालते कि भाषा का सम्मान रखें पर होता यह देखा कि कुछ स्वनामधन्य उसी को जस्टिफ़ाई करने में लग गए। वे साहित्य को हमेशा चार खेमे और चौंसठ खूँटों में बांटे रहे तो यहाँ भी वे एक ingroup moral immunity की स्थिति से—अपने समूह को नैतिक छूट देने से- मुतमईन हैं। 

यौन-आधारित गालियों के समर्थन में एक और सूक्ष्म मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया कार्य करती है—प्रतीकात्मक दूरी (Symbolic Distance)। साहित्यकार स्वयं गाली नहीं देता; वह कहता है कि "यह जनता का क्रोध है", "यह प्रतिरोध की भाषा है", या "यह दमन के विरुद्ध स्वाभाविक प्रतिक्रिया है।" इस प्रकार वह अपने और गाली के बीच एक बौद्धिक दूरी निर्मित कर लेता है। परिणाम यह होता है कि वह स्वयं को अशिष्ट नहीं, बल्कि अशिष्टता का व्याख्याकार समझने लगता है। किंतु सामाजिक प्रभाव की दृष्टि से यह दूरी बहुत कम मायने रखती है। सार्वजनिक संस्कृति यह संदेश ग्रहण करती है कि यदि प्रतिष्ठित लेखक इसे उचित कह रहा है, तो यह नैतिक रूप से स्वीकार्य है। आधुनिक बौद्धिक संसार प्रायः लैंगिक समानता, स्त्री-अस्मिता और गरिमा की वकालत करता है। किंतु यदि वही बौद्धिक वर्ग ऐसी गालियों का समर्थन करे जिनकी संरचना स्त्री-देह, मातृत्व या पारिवारिक स्त्री-संबंधों को अपमान के औज़ार के रूप में प्रयोग करती है, तो वह अनजाने में उसी पितृसत्तात्मक भाषा को वैधता दे रहा होता है जिसकी वैचारिक आलोचना वह अन्यत्र करता है। यहाँ सबसे बड़ा विरोधाभास यह है कि सिद्धांत में स्त्री की गरिमा का समर्थन और व्यवहार में स्त्री-आधारित अपमान की स्वीकृति एक साथ उपस्थित हो जाती है।

क्या उन्हें अहसास है कि वे शब्दों की सीमा नहीं बदल रहे हैं ; वे समाज की नैतिक संवेदनशीलता की सीमा भी बदल दे रहे हैं?

सभ्यता का पालना मेसोपोटामिया नहीं बल्कि भारत है

निक कोलिंस समुद्री इतिहासकार, उन्होंने वेस्टर्न इतिहासकारों को धता बताते हुए दावा किया कि cradle of Civilization अर्थात सभ्यता का पालना मेसोपोटामिया नहीं बल्कि भारत है

इसके लिए उन्होंने लोथल में मिले बंदरगाह का उदाहरण दिया जो मानव निर्मित थी और ज्वारीय तरंगों को कंट्रोल करती थी, ये एक समय में 60 टन के तीस जहाज को सम्भाल सकती थी 

इसकी इंजीनियरिंग इतनी उन्नत थी कि यूरोप या पश्चिमी दुनिया को 4,000 साल का समय लगा इसे मैच करने में, औद्योगिक क्रांति के बाद जाकर वे इसे कंपीट कर पाए

उनके अनुसार मेसोपोटामिया को सभ्यता का पालना कैसे कहा जा सकता है जब वे भारत पर व्यापार के मामले डिपेंडेंट थे, मेसोपोटामिया के खत्म हो चुके शहरों में आज भी भारतीय मुहरे, मोती और कपास मिले है इसके अतिरिक्त सागौन की लकड़ी और खाद्यान्न भी भारत आपूर्ति करता था

वे आर्यन थ्योरी को नकारते है, वे कहते है कि आर्यन आक्रमण की थ्योरी इसलिए गढ़ी जाती है क्योंकि अंग्रेज ये स्वीकार नहीं कर पा रहे थे कि वे जो सबसे शक्तिशाली है उनके जैसे श्वेत लोगों के बिना ये गहरे रंग वाले भारतीय इतने महान कैसे हो सकते है

उन्होंने अपनी श्वेत प्रतिष्ठा को बचाने के लिए मेसोपोटामिया को तो प्राचीन माना बल्कि भारत की महान विरासत को भी यूरोपीय शाखा की देन घोषित कर दी

ब्रिटिशों ने अपने शासन को भी स्थाई बनाने के लिए ऐसा किया था ताकि उनका विरोध कम हो क्योंकि हम यहां शासन करने वाले नए थोड़े है 

निक के अनुसार भारत 4,000 साल तक दुनिया की समुद्री महाशक्ति थी, इसी को लेकर रोम सम्राट ने शिकायत की थी कि भारत से सामान लेने के कारण हमारा सारा सोना हर साल भारत चला जा रहा है, उन्होंने चीन से लेकर अफ्रीका और यूरोप तक फैले भारतीय व्यापार के बारे में जिक्र किया है 

उन्होंने सरस्वती नदी के बारे में भी बात की है, उनके अनुसार सरस्वती नदी को लेकर भ्रम फैला है कि वे काल्पनिक थी और केवल वेदों की लिखित थी, बल्कि वर्तमान वैज्ञानिक स्रोतों से पता चला है कि सरस्वती नदी वास्तव में एक्जिस्ट करती थी और वे इसे केवल सिंधु सभ्यता नहीं मानते बल्कि इसे सिंधु सरस्वती सभ्यता कहते है जिनके किनारों में पूरी जनसंख्या बसी थी

बाद में ये नदी भूकंपों की श्रृंखला के कारण सुख गई,

सामान्य व्यक्ति यदि क्रोध में गाली देता है

सामान्य व्यक्ति यदि क्रोध में गाली देता है तो वह अपनी निजी दुर्बलता प्रकट करता है। परन्तु जब कोई प्रतिष्ठित लेखक, कवि या बुद्धिजीवी उसी गाली को वैचारिक औचित्य प्रदान करता है, तब वह केवल स्वयं नहीं बोल रहा होता; उसके पीछे उसकी अर्जित सांस्कृतिक पूँजी की अल्पता बोल रही होती है। साहित्यकार की सबसे बड़ी शक्ति उसकी भाषा पर समाज का विश्वास है। वह विश्वास वर्षों की साधना से अर्जित होता है। जब वही व्यक्ति कहता है कि अमुक परिस्थिति में गाली उचित है, तब वह केवल एक अपशब्द का समर्थन नहीं करता; वह भाषा के नैतिक संविधान में संशोधन कर देता है।

समाज अपने शब्दकोश केवल विद्यालयों से नहीं सीखता; वह उन्हें कवियों, उपन्यासकारों, नाटककारों और सार्वजनिक बुद्धिजीवियों से भी सीखता है। यदि साहित्यकार भाषा की मर्यादा का प्रहरी न रहकर उसकी सीमा-भंग का वैचारिक अधिवक्ता बन जाए, तब समाज में यह धारणा बनने लगती है कि नैतिकता भी दलगत है—जिसे हम अपना विरोधी मान लें, उसके लिए कोई भी शब्द वैध हो जाता है।

कोई समाज एक दिन अचानक असभ्य नहीं हो जाता। पहले एक अपशब्द को अपवाद कहा जाता है, फिर उसे प्रतिक्रिया कहा जाता है, फिर प्रतिरोध कहा जाता है, और अन्ततः उसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का पर्याय बना दिया जाता है। इस क्रम में सबसे खतरनाक वह चरण है जहाँ बुद्धिजीवी उसका औचित्य सिद्ध करने लगते हैं। क्योंकि बुद्धिजीवी किसी प्रवृत्ति को जन्म भले न दें, उसे वैधता अवश्य दे सकते हैं।

सोशल मीडिया ने भाषा को तत्क्षण प्रतिक्रिया का माध्यम बना दिया है। अब शब्द तपस्या से नहीं, आवेग से जन्म लेते हैं। एल्गोरिद्म संयम को नहीं, उत्तेजना को पुरस्कृत करते हैं। सबसे अधिक साझा वही वाक्य होता है जो सबसे अधिक अपमानजनक हो। परिणाम यह हुआ कि भाषा का बाज़ार बन गया, जहाँ शालीनता की नहीं, सनसनी की माँग है। इस बाज़ार में यदि साहित्यकार भी वही बेचने लगे जो भीड़ खरीदना चाहती है, तो साहित्य और ट्रोलिंग के बीच का अंतर मिटने लगता है।

साहित्यकार को सत्ता से असहमति का पूरा अधिकार है; बल्कि अनेक बार वही उसका नैतिक दायित्व भी है। परन्तु यदि वह प्रतिरोध की भाषा को गाली की भाषा बना देता है, तो वह सत्ता का प्रतिरोध नहीं करता—वह भाषा की पराजय का उत्सव मनाता है। तब समझ लीजिए कि लोकतंत्र का संकट चुनावों में नहीं, भाषा में प्रारम्भ हो चुका है।

गाली का सबसे बड़ा अपराध यह नहीं कि वह अशिष्ट है। अशिष्टता तो कभी-कभी केवल सामाजिक प्रशिक्षण का अभाव भी हो सकती है। उसका वास्तविक अपराध यह है कि वह सामने वाले को संवाद के योग्य व्यक्ति नहीं रहने देती। वह उसे एक विचारशील अस्तित्व से घटाकर एक अपमानित वस्तु में बदल देती है। दर्शनशास्त्री इमैनुएल लेविनास ने कहा था कि दूसरे मनुष्य का चेहरा हमें नैतिक उत्तरदायित्व का आह्वान देता है। गाली उस चेहरे को मिटा देती है। वह दूसरे को एक चेहरा नहीं, एक लक्ष्य (target) बना देती है। जिस क्षण किसी व्यक्ति का नाम उसके लिए प्रयुक्त अपशब्द से प्रतिस्थापित हो जाता है, उसी क्षण संवाद समाप्त हो जाता है और केवल आक्रमण शेष रह जाता है।

समाज में प्रत्येक व्यक्ति की विश्वसनीयता समान स्रोत से नहीं आती। सैनिक की विश्वसनीयता उसके साहस से जन्म लेती है, न्यायाधीश की उसके निष्पक्ष विवेक से, चिकित्सक की उसकी करुणा और कौशल से। उसी प्रकार साहित्यकार की वास्तविक पूँजी न उसकी प्रसिद्धि है, न पुरस्कार, न पाठकों की संख्या; उसकी सबसे बड़ी पूँजी है—उसकी भाषा की नैतिक विश्वसनीयता। जो साहित्यकार सत्ता-विरोध और सभ्यता-विरोध में फर्क ही नहीं पहचान सके, वह साहित्यकार नहीं प्रोपेगंडिस्ट है जिसकी मानसिकता यह है कि यदि विरोधी को पराजित करना है, तो उसके लिए कोई भी साधन उचित है। यही मनोविज्ञान भाषा में भी प्रवेश करता है कि यदि विरोधी को पराजित करना है, तो उसके लिए कोई भी शब्द उचित है।

लोकतंत्र केवल सत्ता बदलने की व्यवस्था नहीं है; वह भाषा को हिंसा से बचाने की भी व्यवस्था है। जिस शब्दावली में कोई आंदोलन बोलना सीखता है, वही उसके राजनीतिक संस्कार का स्थायी हिस्सा बन जाती है। यदि कोई आंदोलन केवल घृणा की भाषा सुनता और बोलता रहे, तो अंततः वह घृणा उसके नैतिक व्यक्तित्व का हिस्सा बन जाती है। तब वह सत्ता बदलने के बाद भी उसी भाषा में शासन करता है। 

अन्यथा वाक्लाव हैवेल ने चेकोस्लोवाकिया के दमनकारी शासन का कठोर विरोध किया, किंतु उनकी भाषा में प्रतिशोध नहीं, नैतिक स्पष्टता थी। अलेक्ज़ेंडर सोल्झेनित्सिन ने सोवियत अत्याचारों का भंडाफोड़ किया, पर उनकी शक्ति अपशब्दों से नहीं, साक्ष्य और नैतिक साहस से आई। मार्टिन लूथर किंग जूनियर ने नस्लवाद के विरुद्ध ऐसी भाषा विकसित की जिसमें क्रोध था, किंतु घृणा नहीं; पीड़ा थी, किंतु अपमान नहीं। इसी कारण उनका शब्द इतिहास में टिक गया और उनके विरोधियों के नारे समय के साथ विलुप्त हो गए। यदि विश्व के सबसे सफल जनांदोलन—जहाँ दमन कहीं अधिक था, हिंसा कहीं अधिक थी, अन्याय कहीं अधिक था—अपनी भाषा को मर्यादित रख सकते थे, तो आज हम क्यों यह मान लें कि गाली प्रतिरोध की अपरिहार्य भाषा है? फिर इनकी भाषा अधिक हिंसक क्यों है? जिन आंदोलनों को अपने नैतिक बल पर विश्वास होता है, वे भाषा को गिराने की आवश्यकता नहीं समझते। जिन्हें अपने तर्क पर विश्वास होता है, वे गाली से परहेज़ करते हैं। गाली प्रायः वहाँ जन्म लेती है जहाँ व्यक्ति को लगता है कि उसके शब्द पर्याप्त प्रभावशाली नहीं रहे। वह अर्थ की कमी को तीव्रता से भरना चाहता है। इसलिए गाली अनेक बार शक्ति का नहीं, असुरक्षा का व्याकरण होती है।

यदि साहित्यकार, जिसे भाषा का ऋषि होना था, स्वयं भाषा की मर्यादा के विघटन का तर्कशास्त्री बन जाए, तो समाज किससे अपेक्षा करे? यदि प्रहरी ही द्वार खोल दे, तो आक्रमणकारी को परिश्रम नहीं करना पड़ता। इसलिए किसी साहित्यकार द्वारा गाली का औचित्यीकरण केवल एक व्यक्तिगत मत नहीं; वह भाषा की उस नैतिक परंपरा के विरुद्ध विद्रोह है जिसने साहित्य को सभ्यता का अंतःकरण बनाया था। सभ्यताएँ गालियों से नहीं टूटतीं।वे तब टूटती हैं जब उनके साहित्यकार गालियों को सांस्कृतिक वैधता (Cultural Legitimacy) देने लगते हैं।साधारण व्यक्ति गाली देता है, समाज उसे सुधार सकता है।राजनेता गाली देता है, चुनाव उसे दंडित कर सकता है।पर यदि साहित्यकार गाली को सिद्धांत बना दे, तब समाज के पास उसे सुधारने का कोई सहज साधन नहीं बचता।क्योंकि वह भाषा का न्यायाधीश माना जाता है।और जब न्यायाधीश ही अपराध को वैध घोषित कर दे, तब अपराधी को अपराध-बोध क्यों होगा? यहीं मुझे लगता है कि हमारे समय की वास्तविक त्रासदी केवल यह नहीं है कि सार्वजनिक जीवन में भाषा गिर रही है।
उससे कहीं बड़ी त्रासदी यह है कि भाषा के संरक्षक स्वयं उसके पतन के दार्शनिक बनने लगे हैं।यही वह क्षण है जहाँ सभ्यता भीतर से दरकने लगती है।क्योंकि किसी भी राष्ट्र की अंतिम रक्षा सेना नहीं करती।संविधान भी नहीं।उसकी अंतिम रक्षा उसकी भाषा करती है।

किसी सभ्यता का वास्तविक चरित्र इस बात से नहीं पहचाना जाता कि वह अपने मित्रों से कैसी भाषा बोलती है; बल्कि इस बात से पहचाना जाता है कि वह अपने विरोधियों से कैसी भाषा बोलती है।

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा के दावे करने वाले अभिव्यक्ति की साधना को लगभग भूल गए हैं। ऐसे समय जुर्गेन हैबरमास की संवाद-नैतिकता (Discourse Ethics) अत्यंत प्रासंगिक हो उठती है। उनके अनुसार लोकतंत्र का वास्तविक आधार केवल मतदान नहीं, संवाद है। किंतु संवाद तभी संभव है जब प्रतिभागी एक-दूसरे को तर्क के योग्य मनुष्य मानते हों। जिस क्षण हम विरोधी को अपमान के योग्य प्राणी मानने लगते हैं, उसी क्षण संवाद की नैतिक पूर्वशर्त समाप्त हो जाती है।

लोकतंत्र केवल मतपत्रों से नहीं बचता।वह शब्दों से बचता है।संविधान केवल अधिकारों की रक्षा करता है। भाषा उन अधिकारों के योग्य मनुष्य की।