Friday, 24 July 2026

भारत में चर्च ऑफ इंग्लैंड की संपत्तियों और व्यवस्था को संभालने के लिए

FCRA और MI6 का खेल, जिसपर आपका ध्यान इसलिए नही जाता कि MI6 कभी किसी मोसाद-सीआईए की तरह शो ऑफ नही करती।

ब्रिटिश कब्जे के दौरान भारत में जो भी चर्च, स्कूल और छावनियाँ(Cantts) बनीं, वे सब 'चर्च ऑफ इंग्लैंड' के तहत आती थीं। 1947 में जब अंग्रेज गए, तो वे भारत में एक बहुत बड़ा कानूनी और अचल संपत्ति का ढांचा छोड़ गए।
​भारत में चर्च ऑफ इंग्लैंड की सीधी दखल को समझने के लिए हमें इसके दो रूपों को देखना होगा।

पहली दखल है-​ CNI और CSI(चर्च ऑफ नॉर्थ इंडिया और चर्च ऑफ साउथ इंडिया)
​अंग्रेजों के जाने के बाद, भारत में चर्च ऑफ इंग्लैंड की संपत्तियों और व्यवस्था को संभालने के लिए दो बड़े आधिकारिक संगठन बनाए गए... ​CNI उत्तर भारत के राज्यों में... ​CSI दक्षिण भारत के राज्यों में। 

ये दोनों संगठन तकनीकी रूप से स्वतंत्र हैं, लेकिन ये वैश्विक 'एंग्लिकन कम्यूनियन'(लंदन) का हिस्सा हैं। इनका मुख्यालय आज भी भारत के सबसे महत्वपूर्ण और रणनीतिक शहरों में है(जैसे दिल्ली में CNI का मुख्यालय संसद भवन और बड़े सरकारी दफ्तरों के बेहद करीब है)।
दूसरी और सबसे बड़ी दखल है- जमीनों का मालिकाना हक क्योंकि ​चर्च ऑफ इंग्लैंड की सबसे बड़ी ताकत कोई धार्मिक प्रचार नहीं, बल्कि "अथााह जमीन और संपत्ति" है।
​भारत में रक्षा मंत्रालय के बाद चर्च ऑफ इंडिया(CNI/CSI) देश का दूसरा सबसे बड़ा जमीन का मालिक है।

​देश के हर बड़े शहर के प्राइम लोकेशन(Civil Lines, Cantt इलाके, मॉल रोड) पर मौजूद ब्रिटिश कालीन चर्च, कब्रिस्तान, कॉन्वेंट स्कूल(जैसे सेंट स्टीफंस, सेंट जेवियर्स आदि) और विशाल बंगले इन्हीं के नियंत्रण में हैं।
इन जमीन की कीमत लाखों-करोड़ों में है और CNI और CSI के भीतर इन जमीनों को अवैध रूप से बेचने, लीज पर देने और लैंड-स्कैम के सैकड़ों मुकदमे चल रहे हैं। 
ED और आर्थिक अपराध शाखा ने कई बार इनके बड़े बिशपों को करोड़ों के घोटाले और फॉरेन फंडिंग के हेरफेर में गिरफ्तार किया है।

सीआईए का खेल--
पंजाब में इस समय जो बड़े पैमाने पर धर्मांतरण हो रहा है, वह वेटिकन या पारंपरिक CNI नहीं कर रहा। 
वहां अमेरिकी इवेंजेलिकल "पास्टर" सक्रिय हैं जो 'चंगाई सभा' के नाम पर सिखों का धर्मांतरण करा रहे हैं। इन्हें सीधे अमेरिका और कनाडा के इवेंजेलिकल डायस्पोरा से फंडिंग आ रही है।
लेकिन इन्हें ​चर्च ऑफ इंग्लैंड का मौन समर्थन है क्योंकि इस खेल में CNI सीधे तौर पर फ्रंट में नहीं आती, लेकिन वह इन नए इवेंजेलिकल समूहों को एक लेजिमेट अम्ब्रेला और अपने पुराने कानूनी नेटवर्क का परोक्ष सहयोग प्रदान करती है ताकि भारतीय कानून(जैसे FCRA) की नजरों से बचा जा सके।

भारत में चर्च ऑफ इंग्लैंड(CNI/CSI) के पास जो लाखों एकड़ जमीन है, उसकी मलाई का एक बहुत बड़ा हिस्सा 'ट्रस्ट' और 'शेल कंपनियों' के जरिए वैश्विक वित्तीय बाजारों(जैसे लंदन और केमैन आइलैंड्स) में घुमाया जाता है। 
भारत सरकार का FCRA कानून इसी पैसे को रोकने के लिए बना है।

यह पैसा सीधे तौर पर अमेरिकी इवेंजेलिकल चर्चों को दान नहीं दिया जाता, बल्कि इसका इस्तेमाल वैश्विक लॉबिंग में ज्यादा होता है। 
लंदन और यूरोप के ये पुराने ट्रस्ट उन अमेरिकी थिंक-टैंकों, एनजीओ और मीडिया घरानों को फंड करते हैं जो भारत में 'धर्मांतरण' और 'मानवाधिकार' के पक्ष में नैरेटिव बनाते हैं। शेष हिस्सा धर्मांतरण के लिए आता है।
इस तरह भारत की जमीन से कमाया गया पैसा घूम-फिरकर उसी अमेरिकी टूलकिट को मजबूत करता है जो भारत के खिलाफ इस्तेमाल होती है

साल 1999 में जब पोप जॉन पॉल द्वितीय भारत आया था, तो उसने दिल्ली में खड़े होकर आधिकारिक तौर पर यह बयान दिया था कि:
​"पहली सहस्राब्दी में यूरोप को ईसाई बनाया गया, दूसरी में अमेरिका और अफ्रीका को और तीसरी सहस्राब्दी में एशिया में ईसाइयत की फसल काटी जाएगी।"
​इसे ईसाई धर्मशास्त्र में "The Great Commission"(महान आदेश) कहा जाता है... यानी दुनिया के हर कोने तक ईसाइयत को पहुँचाना। 

इस बड़े लक्ष्य के लिए ये सभी चर्च(वेटिकन, एंग्लिकन और इवेंजेलिकल) अंदर से एक हैं।
भारत में इन्होंने अपना काम आपस में बांट रखा है ताकि "सब मलाई खा सकें।
​चर्च ऑफ इंग्लैंड(CNI/CSI) भारत का 'एलीट' और कानूनी चेहरा है। 
इसके पास लुटियंस दिल्ली में जमीनें हैं, बड़े कॉन्वेंट स्कूल हैं और इसके लोग न्यायपालिका, ब्यूरोक्रेसी और मीडिया में बैठे हैं। 
इनका काम है कानून और व्यवस्था को मैनेज करना।
​वेटिकन(कैथोलिक) का काम है ट्राइबल इलाकों(झारखंड, छत्तीसगढ़, ओडिशा) और दक्षिण भारत में अस्पताल और चैरिटी के नाम पर पैर जमाना।
​अमेरिकी इवेंजेलिकल(पास्टर्स) का काम है 'आक्रामक' फ्रंटलाइन वॉर... ये पंजाब के गांवों और आंध्र प्रदेश में 'चंगाई सभा' जैसी नौटंकी करके रातों-रात लाखों लोगों का धर्मांतरण कराते हैं।

असल मे धर्मांतरण एक बहुत बड़ा बिजनेस है। 
हर कनवर्टेड ईसाई का मतलब होता है चर्च को मिलने वाला 'Tithe'(दशमांश - अपनी कमाई का 10% हिस्सा चर्च को देना)।

लेकिन दुनिया मे चीजें बदल भी रही है।
इस समय वेटिकन और चर्च ऑफ इंग्लैड एक दूसरे के भी शत्रु बन रखे हैं।
क्योंकि ​अमेरिकी इवेंजेलिकल चर्च बहुत तेजी से बढ़ रहे हैं और इन्होंने लैटिन अमेरिका में वेटिकन के 'ग्राहकों'(कैथोलिकों) को तोड़कर अपने पाले में कर लिया। 
​भारत में भी, पंजाब और आंध्र प्रदेश में जो पारंपरिक कैथोलिक या सीएनआई चर्च थे, उनके लोग अब इन नए अमेरिकी पास्टर्स की तरफ भाग रहे हैं क्योंकि ये पास्टर्स "चमत्कार" का नाटक ज्यादा अच्छे से करते हैं। 
इसलिए वेटिकन और एंग्लिकन चर्च को डर है कि उनका बिजनेस(मार्केट शेयर) अमेरिका छीन रहा है।

हालांकि इसका मतलब ये नही कि इनका गठबंधन भारत जैसे जगह नही है।
क्योंकि साउथ अमरीका में तो तेरा ईसाई बनाम मेरा ईसाई चल रहा है, जबकि भारत में इनका हिसाब किताब इस तरह है कि "पहले ईसाई तो बना लें, फिर तय कर लेंगे कौन से वाला रहेगा"।

इसलिए सिर्फ रटे रटाये.. सीआईए तक सीमित न रहें।
सीआईए भले ही अग्रेसिव फ्रंटलाइन वॉर करता है, पर उसके पीछे हमेशा से MI6 रहा है।
भूलें नही कि आपके 45 ट्रिलियन(आज के दाम में तो 60 ट्रिलियन) जो यहां से लूटकर ले गया था वो ब्रिटेन था।
और 1945 से पहले जो ब्रिटेन अपना पैसा सिटी ऑफ लण्डन(लण्डन सिटी नही) में रखता था, दुनिया का रियल बैंकिंग पावरहाउस.. उसी ने अपने निवेश को वाल स्ट्रीट में डालकर अमरीका को बड़ा बनाया।

वो अलग बात है कि अमरीका जब अपने बाप को ही आंखे दिखाने लगा तो आजकल इनके यहां भीषण अंदरूनी लड़ाई चल रही है।
ग्लोबलिस्ट बनाम इम्पीरियलिस्ट के अलावा, केथलिक और प्रोटेस्टेंट में भी तलवारें खींच चुकी हैं।

Thursday, 23 July 2026

ध्रुव की कथा

ध्रुव की कथा और जेन-जी(१)

नारायणाष्टकम् पढ़ रहा था तो उसके सातवें छंद पर आँख अटक गई। 

पित्रा भ्रातरमुत्तमासनगतं चौत्तानपादिर्ध्रुवो दृष्ट्वा तत्सममारुरुक्षुरधृतो मात्रावमानं गतः। यं गत्वा शरणं यदाप तपसा हेमाद्रिसिंहासनमार्त न्नार्तत्राणपरायणः स भगवान्नारायणो मे गतिः।।७।। 

अपने भाई को पिता के साथ उत्तम राजसिंहासन पर बैठा देख उत्तानपाद के पुत्र ध्रुव ने जब स्वयं ही उस पर चढ़ना चाहा तो पिता ने उसे अंक में नहीं लिया और विमाता ने भी उसका अनादर किया, उस समय जिनकी शरण जाकर उसने तप के द्वारा सुमेरुगिरि के राजसिंहासन की प्राप्ति की, वे ही दीनरक्षक भगवान् नारायण मेरी एकमात्र गति हैं । 

इस एक श्लोक में जितनी वेदना समाई हुई है, उतनी शायद किसी बड़े महाकाव्य के अनेक सर्गों में भी न हो। एक बालक है। उसके सामने उसका भाई पिता की गोद में बैठा है। वह भी उसी गोद की ओर बढ़ता है। वह भी उसी सिंहासन पर बैठना चाहता है। किंतु उसका हाथ पकड़कर रोक दिया जाता है। उसे बताया जाता है कि यह स्थान उसके लिए नहीं है।

ध्यान दीजिए, ध्रुव की पीड़ा सिंहासन न मिलने की नहीं थी; पीड़ा यह थी कि उसे यह अनुभव करा दिया गया कि "तुम्हारा होना पर्याप्त नहीं है।" किसी भी मनुष्य के लिए इससे बड़ा अपमान क्या हो सकता है कि उसके अस्तित्व को ही कमतर मान लिया जाए? इसीलिए ध्रुव की कथा पाँच हजार वर्ष पुरानी होकर भी आज के युवक की कथा प्रतीत होती है। युग बदलते हैं, पर मनुष्य के अनुभव नहीं बदलते। आज भी किसी युवक को कभी आर्थिक विषमता रोकती है, कभी संसाधनों का अभाव, कभी प्रतियोगिता की विषम शर्तें, कभी सामाजिक परिस्थितियाँ, कभी परिवार की सीमाएँ, तो कभी उसे लगता है कि अवसरों का वितरण उसके अनुकूल नहीं है। हर युग का अपना एक "सिंहासन" होता है—किसी युग में वह राजसिंहासन था, आज वह विश्वविद्यालय की सीट हो सकती है, किसी प्रतिष्ठित संस्था का प्रवेशद्वार हो सकता है, कोई शोधवृत्ति, कोई प्रशासनिक सेवा, कोई व्यवसाय, कोई प्रतिष्ठा, कोई उपलब्धि। और हर युग में कुछ युवक ऐसे होते हैं जिन्हें लगता है कि सिंहासन के समीप पहुँचकर भी उनके हाथ खाली रह गए।

यहीं पुराण आधुनिक मनुष्य के कान में एक अत्यंत धीमी, किंतु अत्यंत प्रखर बात कहता है—तुम्हारी सबसे बड़ी लड़ाई सिंहासन के लिए नहीं है; तुम्हारी सबसे बड़ी लड़ाई अपने भीतर ध्रुव बनने की है।

ध्रुव की कथा का सबसे बड़ा चमत्कार यह नहीं कि उसे भगवान् मिले। सबसे बड़ा चमत्कार यह है कि उसने अपने अपमान को अपनी पहचान नहीं बनने दिया। अधिकांश मनुष्य अपने जीवन की सबसे दुखद घटना का स्मारक बन जाते हैं। वे जीवन भर उसी घटना को ढोते रहते हैं। कोई कहता है—मुझे अवसर नहीं मिला; कोई कहता है—मेरे साथ पक्षपात हुआ; कोई कहता है—समय मेरे विरुद्ध था; कोई कहता है—व्यवस्था दोषपूर्ण थी। इनमें से बहुत-सी बातें सत्य भी हो सकती हैं। संसार कभी पूर्ण न्यायपूर्ण नहीं रहा। महाभारत से लेकर आधुनिक इतिहास तक, हर युग में असमानताएँ रही हैं। किंतु ध्रुव का प्रश्न यह नहीं था कि संसार न्यायपूर्ण है या नहीं। उसका प्रश्न था—मैं अपने भीतर क्या करूँ?
यही वह क्षण है जहाँ पुराण मनोविज्ञान का ग्रंथ बन जाता है।

ध्रुव यदि चाहता तो वह राजमहल में रहकर प्रतिदिन अपने अपमान की कथा दोहराता। वह अपने मित्रों को बताता कि उसके साथ कितना अन्याय हुआ। वह अपने पिता को दोष देता, विमाता को दोष देता, भाग्य को दोष देता। धीरे-धीरे उसका संपूर्ण व्यक्तित्व शिकायत का दूसरा नाम बन जाता। इतिहास में ऐसे असंख्य लोग हुए जिनकी पहचान उनकी पीड़ा बन गई। वे अपनी प्रतिभा से नहीं, अपने आक्रोश से पहचाने गए।

पर ध्रुव ने दूसरा मार्ग चुना।वह वन चला गया।
पुराण में वन केवल वृक्षों का समूह नहीं होता। भारतीय साहित्य में वन का अर्थ है—अपने भीतर लौट जाना। जहाँ शोर समाप्त हो जाता है और साधना आरंभ होती है। जहाँ संसार की आवाज़ें मंद पड़ जाती हैं और आत्मा की आवाज़ सुनाई देने लगती है। इसीलिए हमारे ऋषि वन में गए, वाल्मीकि वन में मिले, व्यास वन में रहे, पाण्डव वन में तपे, राम वन में गए और ध्रुव भी वन गया।

आज का युवक यदि इस वन को केवल जंगल समझेगा तो कथा का आधा अर्थ ही समझ पाएगा। आज वन कहाँ है? आज का वन पुस्तकालय है। प्रयोगशाला है। अध्ययन-कक्ष है। अभ्यास का मैदान है। कंप्यूटर के सामने बिताए गए वे अनगिनत घंटे हैं जहाँ कोई ताली नहीं बजाता, कोई कैमरा नहीं होता, कोई प्रशंसा नहीं होती—केवल साधना होती है। आधुनिक वन वह एकांत है जहाँ मनुष्य अपने भविष्य का निर्माण करता है।इसीलिए ध्रुव की कथा पलायन की कथा नहीं है; वह एकांत की शक्ति की कथा है। वह कहती है कि संसार से क्षणभर हट जाना संसार से हार जाना नहीं है। कभी-कभी पीछे हटना ही सबसे बड़ी छलाँग की तैयारी होता है। आज का युवक एक विचित्र युग में जी रहा है। उसे अपने संघर्ष से अधिक दूसरों की सफलताएँ दिखाई देती हैं। सामाजिक माध्यमों ने तुलना को जीवन का स्थायी रोग बना दिया है। किसी का चयन, किसी का पुरस्कार, किसी का वेतन, किसी की उपलब्धि—सब कुछ प्रतिदिन उसकी आँखों के सामने है। परिणाम यह कि उसका ध्यान अपने तप पर कम और दूसरों के सिंहासन पर अधिक रहने लगा है।

ध्रुव की कथा इस रोग का उपचार है।ध्रुव ने अपने भाई को देखना छोड़ दिया। उसने अपना ध्यान अपने भीतर केंद्रित कर लिया। जिस दिन मनुष्य की दृष्टि प्रतिस्पर्धी से हटकर साधना पर आ जाती है, उसी दिन उसका वास्तविक विकास प्रारंभ होता है। क्योंकि तुलना ऊर्जा को बाहर खर्च करती है, जबकि तप उसी ऊर्जा को भीतर संचित करता है।यही कारण है कि भारतीय परंपरा ने "तप" शब्द का प्रयोग किया, केवल "परिश्रम" का नहीं।परिश्रम शरीर करता है; तप संपूर्ण व्यक्तित्व करता है।परिश्रम घंटे गिनता है; तप जीवन बदल देता है।परिश्रम लक्ष्य तक पहुँचाता है; तप मनुष्य को लक्ष्य से भी बड़ा बना देता है।

ध्रुव ने सिंहासन पाने के लिए तप नहीं किया था। उसने स्वयं को इतना ऊँचा बना लिया कि सिंहासन उसकी उपलब्धि का अंतिम बिंदु ही नहीं रह गया। उसे ध्रुवपद मिला—ऐसा स्थान जहाँ से वह स्वयं दिशा का प्रतीक बन गया।

ध्रुव और उत्तानपाद की यह कहानी आधुनिक युग की भी है। सिंहासन को अपने कुछ बेटे सगे लगते हैं और कुछ सौतेले। कुछ के लिए आरक्षण है, कुछ के लिए नहीं है। कुछ को 90 परसेंटाइल पर भी प्रवेश नहीं है, कुछ को -40 पर भी है। कुछ को अपने ही किसी सहपाठी की तुलना में ज्यादा गिरी आर्थिक स्थिति पर भी दस गुना शुल्क देना है। तब उन प्रतिभाशाली बेटों के पास रास्ता क्या है? शिकायत का नहीं। तप का। तप यानी परिश्रम ही नहीं असाधारण परिश्रम। ताकि यदि आरक्षण 90% भी हो जैसा तमिलनाडु में है तब भी उस पतली सी छूट गई गली से रास्ता बना पाओ। तप यानी दूसरों पर दोषारोपण नहीं। स्वयं अपना आत्म-परिष्कार। तमिल ब्राह्मण बच्चे ध्रुव की ही तरह अलग जाकर अपनी असाधारण मेहनत से बिज़नेस से लेकर शतरंज तक अपनी पहचान बना सके।

ध्रुव और उत्तानपाद की कथा केवल पुराण की कथा नहीं है; वह हर युग में जन्म लेती है। हर युग में कुछ ध्रुव होते हैं जिन्हें लगता है कि सिंहासन की गोद में बैठने का अधिकार जन्म से नहीं, योग्यता से मिलना चाहिए; फिर भी वे स्वयं को उस सिंहासन से दूर पाते हैं। आज भी अनेक युवाओं को यह अनुभव होता है कि अवसर समान नहीं हैं। किसी को प्रवेश की दौड़ में अधिक अंक लाने पड़ते हैं, किसी को अधिक शुल्क देना पड़ता है, किसी को प्रतिस्पर्धा की शर्तें अपने विरुद्ध प्रतीत होती हैं। ऐसे क्षणों में ध्रुव की कथा उन्हें एक अलग ही शिक्षा देती है।

ध्रुव ने अपने अपमान को अपने व्यक्तित्व की अंतिम परिभाषा नहीं बनने दिया। उसने प्रतिशोध का मार्ग नहीं चुना, न ही अपने जीवन को केवल शिकायत का आख्यान बनाया। वह वन की ओर गया—और वन यहाँ पलायन का नहीं, तप का प्रतीक है। तप का अर्थ केवल परिश्रम नहीं, बल्कि ऐसा अनुशासित, दीर्घकालिक और असाधारण पुरुषार्थ, जो परिस्थितियों की कठोरता से भी बड़ा सिद्ध हो जाए। ध्रुव ने सिंहासन माँगने के बजाय स्वयं को इतना ऊँचा बनाया कि उसे ध्रुवपद प्राप्त हुआ—ऐसा पद जिसे कोई छीन नहीं सकता।

आधुनिक भारत में अवसरों और सामाजिक न्याय पर मतभेद स्वाभाविक हैं। आरक्षण के समर्थन में भी गंभीर ऐतिहासिक और संवैधानिक तर्क हैं, और उसके आलोचकों के पास भी अवसरों की समानता तथा प्रतिस्पर्धा को लेकर अपने प्रश्न हैं। इन बहसों का समाधान न्यायालयों, विधायिकाओं और लोकतांत्रिक विमर्श में खोजा जाना चाहिए। किंतु ध्रुव की कथा का संदेश इन बहसों से भी ऊपर उठकर एक सार्वकालिक सत्य कहता है—परिस्थितियाँ चाहे जैसी हों, अपने पुरुषार्थ का विकल्प किसी के पास नहीं है।

भारतीय समाज में ऐसे अनेक समुदाय और परिवार मिलते हैं जिन्होंने सीमित अवसरों, कठिन प्रतिस्पर्धा अथवा अपनी अनुभूत बाधाओं के बीच भी शिक्षा, विज्ञान, उद्योग, उद्यमिता, कला और खेल के क्षेत्र में असाधारण उपलब्धियाँ अर्जित की हैं। यह किसी एक जाति, प्रदेश या वर्ग की कहानी नहीं, बल्कि उस भारतीय परंपरा की कहानी है जिसमें तप को भाग्य से बड़ा माना गया है। जहाँ अवसर संकरे हों, वहाँ तप और अधिक विराट होना पड़ता है।

ध्रुव की कथा इसलिए आज भी प्रासंगिक है कि वह हमें यह नहीं सिखाती कि व्यवस्था पर कभी प्रश्न मत उठाओ; वह यह सिखाती है कि प्रश्न उठाते हुए भी अपने पुरुषार्थ को शिथिल मत पड़ने दो। यदि मार्ग चौड़ा न मिले, तो अपनी साधना से उस संकरी पगडंडी को ही राजमार्ग बना दो। शिकायत क्षणिक संतोष दे सकती है, पर तप स्थायी सामर्थ्य देता है। ध्रुव इसी कारण ध्रुव है—क्योंकि उसने अपमान को अपनी नियति नहीं, अपनी साधना का आरंभ बना दिया।

ध्रुव इसलिए महान नहीं हुआ कि उसके साथ अन्याय हुआ। ध्रुव इसलिए महान हुआ कि उसने अन्याय को अपने व्यक्तित्व का अंतिम अध्याय नहीं बनने दिया। उसने उसे अपने तप का प्रथम अध्याय बना दिया।

अन्य सितारे केवल चमकते हैं; ध्रुव दिशा देता है क्योंकि जो अपनी पीड़ा को तप में रूपांतरित कर लेता है, वह केवल सफल नहीं होता, वह दूसरों का पथप्रदर्शक बन जाता है।

मनोज श्रीवास्तव जी का आलेख

रॉन्डा बर्न (Rhonda Byrne) की विश्व प्रसिद्ध पुस्तक 'द सीक्रेट'

रॉन्डा बर्न (Rhonda Byrne) की विश्व प्रसिद्ध पुस्तक 'द सीक्रेट'मुख्य रूप से आकर्षण के नियम पर आधारित है। यह पुस्तक बताती है कि हमारे विचार हमारे जीवन को कैसे आकार देते हैं।
इस पुस्तक की सबसे मुख्य और रहस्यमयी बातें निम्नलिखित हैं:
 1. आकर्षण का नियम ,मूलमंत्र:--"जैसा आप सोचते हैं, वैसा ही आप आकर्षित करते हैं।"
  यह ब्रह्मांड का सबसे शक्तिशाली नियम है। इसके अनुसार, आपकी भावनाएं और आपके विचार एक चुंबक की तरह काम करते हैं। आप जिस भी चीज़ के बारे में लगातार सोचते हैं (चाहे वह अच्छी हो या बुरी), वैसी ही परिस्थितियां और लोग आपके जीवन में खिंचे चले आते हैं।
2. ब्रह्मांड एक कैटलॉग की तरह है --
 इच्छा मांगना:-- ब्रह्मांड एक बड़े मेल-ऑर्डर कैटलॉग की तरह है। आप जो चाहते हैं, उसका ऑर्डर (इच्छा) ब्रह्मांड को देते हैं।
   1. मांगें :--स्पष्ट रूप से तय करें कि आप क्या चाहते हैं।
   2. विश्वास करें :-- ऐसा महसूस करें कि वह चीज़ आपको पहले ही मिल चुकी है।
   3. प्राप्त करें :- उस चीज़ को पाकर जो खुशी आपको होगी, उसे अभी महसूस करें।

 विचारों में ऊर्जा होती है-
  आपके हर एक विचार की एक आवृत्ति  होती है। जब आप कोई विचार सोचते हैं, तो वह ब्रह्मांड में जाता है और अपनी जैसी ही समान आवृत्तियों को चुंबक की तरह अपनी ओर खींचता है।
 सकारात्मकता:-- यदि आप किसी नकारात्मक चीज़ से बचने के बारे में भी बार-बार सोचते हैं, तो आप अनजाने में उसी नकारात्मक चीज़ को आकर्षित कर रहे होते हैं। इसलिए, हमेशा इस बात पर ध्यान दें कि आप *क्या चाहते हैं*, न कि इस पर कि आप *क्या नहीं चाहते*।
 4. कृतज्ञता की शक्ति ,धन्यवाद देना:-- यह जीवन को बदलने का सबसे तेज़ तरीका है। जो चीज़ें आपके पास वर्तमान में हैं, उनके प्रति आभार व्यक्त करना ब्रह्मांड को यह संकेत देता है कि आपके पास और अधिक अच्छी चीज़ें भेजी जानी चाहिए।
 चमत्कार:-- जब आप छोटी से छोटी चीज़ के लिए भी शुक्रगुजार होते हैं, तो आपके जीवन में और अधिक सुख, समृद्धि और आनंद के द्वार खुल जाते हैं।
 मानसिक अभ्यास:-- अपनी आँखें बंद करें और कल्पना करें कि आपकी इच्छा पूरी हो चुकी है। उस पल की खुशियों, महक और अनुभवों को महसूस करें।
  जब आप मन में किसी चीज़ का स्पष्ट चित्र बना लेते हैं और उसे पूरी शिद्दत से महसूस करते हैं, तो आपकी अवचेतन मन की शक्ति उसे वास्तविकता में बदलने के लिए रास्ते तलाशने लगती है।
 "आप अपने जीवन के रचयिता खुद हैं।" 'द सीक्रेट' का सबसे बड़ा रहस्य यह सिखाता है कि अपनी सोच को बदलकर, सकारात्मक भावनाओं को अपनाकर और ब्रह्मांड पर अटूट विश्वास रखकर आप अपने भाग्य को पूरी तरह बदल सकते हैं।
 आपकी भावनाएं इस बात का सबसे सटीक पैमाना हैं कि आप इस समय क्या आकर्षित कर रहे हैं।
  यदि आप खुशी, उत्साह, प्यार या कृतज्ञता महसूस कर रहे हैं, तो आप सही दिशा में हैं और अच्छी चीजें आकर्षित कर रहे हैं। यदि आप निराश, गुस्सा या दुखी महसूस कर रहे हैं, तो आप अपनी ऊर्जा को गलत दिशा में लगा रहे हैं।
  अगर आपका मूड खराब है, तो उसे तुरंत बदलें—कोई पसंदीदा गाना सुनें, हँसे, या किसी अच्छी बात के बारे में सोचें। खराब भावना को अच्छे में बदलना ही आकर्षण की दिशा बदलना है।
ज्यादातर लोग इस डर से जीते हैं कि पैसे, प्यार, या सफलता की कमी है। 'द सीक्रेट' सिखाता है कि यह ब्रह्मांड अनंत  है। यहाँ हर किसी के लिए प्रचुर मात्रा में सब कुछ मौजूद है।
  जब आप दूसरों को सफल या अमीर होते देख कर खुश होते हैं, तो आप ब्रह्मांड को यह संदेश देते हैं कि आप भी उसी प्रचुरता का हिस्सा बनना चाहते हैं। इसके विपरीत, ईर्ष्या की भावना आपको उस चीज़ से दूर कर देती है जो आप पाना चाहते हैं।
अगर आप पैसे की कमी से जूझ रहे हैं, तो आप धन को आकर्षित नहीं कर सकते, क्योंकि "कमी का अहसास" और अधिक कमी को ही खींचता है।
 अपने पास मौजूद थोड़े से पैसों के लिए भी धन्यवाद दें। जब आप महसूस करते हैं कि "मेरे पास पर्याप्त है" या "पैसा आसानी से मेरे पास आता है," तो धन की ऊर्जा आपकी ओर प्रवाहित होने लगती है। बिलों का भुगतान भी खुशी और आभार के साथ करें कि आपने उन सेवाओं का लाभ उठाया।
  दूसरों से प्यार पाने या उन्हें बदलने से पहले आपको खुद से प्यार करना होगा। यदि आप अपने अंदर कमियाँ निकालते रहेंगे, तो आप ऐसे लोग आकर्षित करेंगे जो आपकी आलोचना करें।
  रिश्तों को सुधारने का नियम यह है कि आप सामने वाले की कमियों या गलतियों पर ध्यान देने के बजाय, उनकी खूबियों और अच्छी बातों की सूची बनाएं। आप जिस चीज़ पर ध्यान देंगे, वह गुण और अधिक बढ़ता जाएगा।
 प्लेसीबो प्रभाव :--- शरीर खुद को ठीक करने की अद्भुत क्षमता रखता है। अगर कोई व्यक्ति यह मान ले कि वह ठीक हो रहा है (या उसे सिर्फ एक साधारण गोली दी जाए और वह समझे कि यह दवा है), तो उसका शरीर सचमुच ठीक होने लगता है।
  किसी बीमारी से लड़ने या उसके बारे में लगातार बात करने से बीमारी और मजबूत होती है। इसके बजाय, पूरी तरह से "स्वस्थ" होने की स्थिति पर ध्यान केंद्रित करें और महसूस करें कि आपका शरीर पूरी तरह से निरोगी है।
 आप केवल यह शारीरिक शरीर नहीं हैं, बल्कि आप एक ऊर्जावान प्राणी हैं जो ब्रह्मांड की ऊर्जा से जुड़ी हुई है।
 जब आप शांत होते हैं, ध्यान करते हैं और खुद से जुड़ते हैं, तो आपको अपनी असली शक्ति का अहसास होता है। आप ब्रह्मांड का ही एक रूप हैं, और जो शक्ति ब्रह्मांड को चला रही है, वही आपके भीतर भी है।
 समय सिर्फ एक बाधा है:-- हम अक्सर सोचते हैं कि हमारी इच्छा पूरी होने में समय क्यों लग रहा है। 'द सीक्रेट' के अनुसार, ब्रह्मांड के लिए बड़ी या छोटी कोई इच्छा नहीं होती। दस लाख डॉलर को आकर्षित करना उतना ही आसान है जितना कि एक कप कॉफी को।
  इच्छा पूरी होने में इसलिए देरी होती है क्योंकि हम बीच में संदेह , अविश्वास या डर ले आते हैं। जब आप अपनी इच्छा को लेकर सौ प्रतिशत आश्वस्त हो जाते हैं और उसमें कोई संशय नहीं रखते, तो वह तुरंत प्रकट हो सकती है। ब्रह्मांड आपके विश्वास की गति के अनुसार काम करता है।
  पुस्तक का एक बहुत ही आध्यात्मिक पहलू यह है कि आप इस ब्रह्मांड की उस महान शक्ति  से अलग नहीं हैं, बल्कि उसका एक हिस्सा हैं।
 जब आप यह समझ जाते हैं कि आपके भीतर वही ऊर्जा काम कर रही है जो पूरे ब्रह्मांड को चलाती है, तो आपके अंदर हीन भावना या डर खत्म हो जाता है। आप खुद को अपने जीवन का सर्वेसर्वा और भगवान का एक रूप महसूस करने लगते हैं।
 आप केवल 'वर्तमान'  में ही ऊर्जा पैदा कर सकते हैं। यदि आप अपने अतीत की असफलताओं या भविष्य की चिंताओं में उलझे रहते हैं, तो आप वर्तमान की शक्ति को खो देते हैं।
  यदि आप भविष्य में अमीर या खुश होना चाहते हैं, तो उसकी शुरुआत आपको अभी से करनी होगी। आपको वर्तमान क्षण में ही अमीर और खुश महसूस करना होगा, क्योंकि ब्रह्मांड भविष्य की नहीं बल्कि आपके वर्तमान विचारों और भावनाओं की प्रतिक्रिया देता है।
  हमारे दिमाग में रोजाना हजारों विचार आते हैं, जिनमें से ज्यादातर नकारात्मक या बेकार होते हैं। ध्यान वह जरिया है जो आपके विचारों को थामता है।
 जब आप ध्यान के जरिए अपने मन को शांत करते हैं, तो आप ब्रह्मांड की ऊर्जा से सीधे जुड़ जाते हैं। यह आपको मानसिक स्पष्टता देता है और आपके लिए सही फैसले लेना आसान बनाता है। दिन में केवल कुछ मिनट का मौन आपके पूरे जीवन को बदल सकता है।
 खुशी ही सबसे बड़ा मार्गदर्शक है: 'द सीक्रेट' का सबसे सरल और गहरा संदेश यह है कि "जो आपको सबसे ज्यादा खुशी दे, वही करें।"
 जब आप अपनी पसंद का काम करते हैं और हर पल आनंदित रहते हैं, तो आपकी ऊर्जा का स्तर सबसे ऊंचा होता है। इस उच्च ऊर्जा  की स्थिति में आप जो भी चाहते हैं, वह चुंबक की तरह आपकी तरफ खिंचा चला आता है। आनंद में रहना ही जीवन का सबसे बड़ा रहस्य है।

रॉन्डा बर्न (Rhonda Byrne) एक विश्व प्रसिद्ध ऑस्ट्रेलियाई लेखिका, टेलीविज़न निर्माता और उद्यमी हैं। उन्हें मुख्य रूप से उनकी क्रांतिकारी पुस्तक 'द सीक्रेट' (The Secret)और इसी नाम से बनी डॉक्यूमेंट्री फिल्म के लिए जाना जाता है, जिसने पूरी दुनिया में लाखों लोगों के जीवन को देखने का नजरिया बदल दिया।
 जन्म:-- रॉन्डा बर्न का जन्म 12 मार्च 1945 को ऑस्ट्रेलिया के मेलबर्न शहर में हुआ था।
 टेलीविज़न निर्माता:--'द सीक्रेट' लिखने से पहले, वह ऑस्ट्रेलिया में एक सफल टेलीविज़न निर्माता थीं। उन्होंने कई लोकप्रिय टीवी शो और वृत्तचित्र बनाए, जिससे मीडिया जगत में उनकी अच्छी पहचान बनी।
 जीवन का संकट:-- साल 2004 का दौर रॉन्डा के जीवन में बेहद कठिन था। उनके पिता का अचानक निधन हो गया था, वह व्यावसायिक रूप से भारी तनाव में थीं और उनका मानसिक व शारीरिक स्वास्थ्य भी बहुत बिगड़ चुका था।
 बदलाव का मोड़:--इस गहरी निराशा के दौर में उनकी बेटी ने उन्हें वॉटसन डी. वाटल्स की 1910 की एक पुरानी पुस्तक 'द साइंस ऑफ गेटिंग रिच' (The Science of Getting Rich) पढ़ने के लिए दी।
 उस किताब को पढ़ने के बाद रॉन्डा के मन में जिज्ञासा जागी कि दुनिया के इतिहास के महानतम लोगों (जैसे आइंस्टीन, बीथोवेन, प्लेटो) ने सफलता के किन नियमों का पालन किया था। उन्होंने दुनिया भर के धर्मों, दर्शन और इतिहास में छिपे आकर्षण के नियम (Law of Attraction) पर गहरी खोजबीन शुरू की।
 'द सीक्रेट' फिल्म और पुस्तक की सफलता (2006)
 डॉक्यूमेंट्री फिल्म:--अपनी खोज और दुनिया भर के आधुनिक विचारकों व गुरुओं के साक्षात्कारों को मिलाकर उन्होंने 2006 में 'द सीक्रेट' नाम से एक डॉक्यूमेंट्री फिल्म रिलीज़ की, जो ग्लोबल हिट साबित हुई।
 इसी वर्ष (2006) उन्होंने इसी नाम से पुस्तक भी प्रकाशित की। यह किताब रिलीज़ होते ही इतिहास की सबसे ज्यादा बिकنے वाली किताबों में शामिल हो गई। इसका अनुवाद दुनिया की दर्जनों भाषाओं में हो चुका है और करोड़ों कॉपियां बिक चुकी हैं।
'द सीक्रेट' की अपार सफलता के बाद रॉन्डा बर्न ने इसी श्रृंखला में कई अन्य बेहतरीन पुस्तकें लिखीं, जो व्यक्तिगत विकास और आध्यात्मिकता पर आधारित हैं:
 द पावर (The Power - 2010):--इसमें बताया गया है कि ब्रह्मांड की सबसे बड़ी शक्ति 'प्रेम' (Love) है और कैसे भावनाएं हमारे जीवन को संचालित करती हैं।
 द मैजिक (The Magic - 2012):-- यह पुस्तक पूरी तरह से 'कृतज्ञता' (Gratitude) और 28 दिनों के जादुई अभ्यासों पर आधारित है।
 हीरो (Hero - 2013):--इसमें बारह सफल हस्तियों के जीवन के संघर्ष और सफलता के रास्ते को दिखाया गया है।
 द ग्रेटेस्ट सीक्रेट (The Greatest Secret - 2020):-- यह पुस्तक भौतिक आकर्षण के नियम से आगे बढ़कर गहरे आध्यात्मिक सत्य और आंतरिक शांति  को प्राप्त करने पर जोर देती है।
 टाइम मैगजीन:--2007 में 'टाइम' (Time) पत्रिका ने रॉन्डा बर्न को दुनिया के 100 सबसे प्रभावशाली लोगों की सूची में शामिल किया था।
  उन्हें आधुनिक समय में 'आकर्षण के नियम' को आम जनमानस तक पहुँचाने और लोगों को सकारात्मक सोच व जीवन जीने की प्रेरणा देने के लिए दुनिया भर में याद किया जाता है

औपनिषदिक ज्ञान बनाम यूरोपीय रेनेसां:

औपनिषदिक ज्ञान बनाम यूरोपीय रेनेसां:

प्राचीन भारतीय ज्ञान को मानव जाति की सर्वोच्च उपलब्धि मानने में वर्तमान बौद्धिकों को भले ग्लानि हो रही हो किंतु पश्चिमी दार्शनिकों को इस सच्चाई को स्वीकार करने में कोई संकोच नहीं था।
जिन दार्शनिकों ने भारतीय संस्कृति की भूरि-भूरि प्रशंसा की उनमें जर्मन दार्शनिक फ्रेडरिक वोन श्लेगल और आर्थर शोपेनहावर प्रमुख हैं। इसी परंपरा में महान रूसी उपन्यासकार टाल्सटाय भी आते हैं ।

1808 में श्लेगल ने भारतीय ज्ञान की प्रशंसा में एक किताब लिखी थी, जिसका नाम ' आन द लैंग्वेज एंड विज्डम आफ इंडियन्स ( On the Language and Wisdom of the Indians) है।
 विदित हो कि उन्होंने उपनिषदों में निहित ज्ञान की तुलना यूरोप के रेनेसां से की थी। फलत: विदेशों में यूरोपीय विचारकों के बीच हिंदू धर्म और संस्कृत साहित्य के प्रति भारी जिज्ञासा पैदा हो गई। इनके अध्ययन के लिए यूरोप के विश्वविद्यालयों में इंडोलोजी विभाग तक खुल गए। अपने भाई की सहायता से स्वयं श्लेगल ने संस्कृत भाषा का प्रेस खोला।
उनका मानना था कि विश्व की सभी भाषाओं की जननी संस्कृत है तथा दुनिया की सभी सभ्यताओं ने राजनीतिक गठन के तौर तरीके भारत से सीखे।

 शोपेनहावर ने तो यहां तक कह दिया कि उपनिषदों के अध्ययन से अधिक कल्याणकारी और उत्थान प्रवण दुनिया में कोई दूसरा ग्रंथ नहीं है। वेद , उपनिषद और श्रीमद्भागवत के बारे उनकी उक्ति बहुत प्रेरणास्पद है।
 उनका मानना था कि ये ग्रंथ मानव बुद्धि की उच्चतम अभिव्यक्ति हैं । अपने इस विचार को उन्होंने 'वर्ल्ड ऐज विल एंड रिप्रेजेंटेशन ' में कलम बद्ध किया है। 
बताते चलें कि भारतीय ज्ञान परंपरा को यूरोप तक पहुंचाने में मुसलमानों का हाथ रहा है। इस्लामिक विद्वानों ने ही पहले उपनिषदों का अनुवाद फारसी में किया था। दारशिकोह के शासन काल में यह कार्य संपन्न हुआ था।
  फिर उपनिषद फारसी से लैटिन भाषा में अनुदित हुए। शोपेनहावर ने जिस भाषा में उपनिषदों को पढ़ा , वह लैटिन भाषा ही थी। दरअसल उपनिषदों का लैटिन में अनुवाद फ्रांस के एक विद्वान ने किया था।
 शोपेनहावर उक्त ग्रंथों से इतने अविभूत थे कि उन्होंने यह विश्वास व्यक्त किया था कि भारतीय ज्ञान एक न एक दिन पश्चिम में प्रवाहित होगा और यूरोपीय विचारों और संस्कृति में मौलिक बदलाव लाएगा । विडंबना है कि उसी ज्ञान और दार्शनिक परंपरा को हम कीड़ा -मकोड़ा समझते हैं। 

एक ओर विदेशी धरती की ओर से भारतीय ज्ञान की इतनी अभिपुष्टि और इतना सम्मान और दूसरी ओर भारतीय माटी से इस ज्ञान का इस रूप में खंडन व अपमान, यह समझ से परे है! 
पर ज्ञान है क्या? 
ज्ञान कोई दिखाई पड़ने वाली चीज नहीं है। यह फुदकने वाली कोई चिड़िया नहीं है। बल्कि यह चीजों के बारे में आंतरिक समझ को व्यक्त करने वाला एक प्रत्यय ( आइडिया ) और प्रत्ययों का समूह है जो शाब्दिक अभिव्यक्ति पाकर एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति तक तथा एक समाज के दूसरे समाज तक संचरित होता है।

दृष्टांत के तौर पर वेदांत और उपनिषदों की यह स्थापना कि' सभी चीजों में ईश्वर या परमात्मा का अंश है ' , एक ज्ञान है जिसका सहज संदेश यह है कि संसार के चर- चराचर सभी प्राणियों व पदार्थो के प्रति हमें आदर का भाव रखना चाहिए व उनसे प्रेम करना चाहिए।
दूसरी ओर बाइबल के पूराने विधान ( ओल्ड टेस्टामेंट) का यह प्रावधान भी एक ज्ञान है कि दुनिया के सभी चर चराचर पदार्थ मनुष्य और खासकर पुरुषों के उपभोग के लिए ईश्वर द्वारा बनाए गए हैं। बाइबल के जेनेसिस नामक किताब ( अध्याय) में यह विचार देखा जा सकता है।   
बाइबल के इसी अध्याय में यह भी लिखा है कि औरतें पुरषों के मनोरंजन के लिए बनाई गई हैं। 
एक तरफ ' तेन त्यक्तेन भुंजीथा:" ईशावास्य उपनिषद का श्लोक है जहां त्याग के साथ भोग करने की शिक्षा है वही बाइबल हमें मह सिखाता है कि दुनिया खाकर- पीकर हजम करने के लिए है। स्त्रियों पर पुरूष वर्चस्व ही नहीं, सामी धर्म के राजनीतिक वर्चस्व की जड़ भी बाइबिल के पुराने विधान में है।

सवाल है कि कौन सा ज्ञान मनुष्योचित है? भारत का वह ज्ञान जहां स्त्री अर्धनारीश्वर के रूप में समता की अधिकारी है या वह जहां स्त्री पुरूषों के लिए केवल मौज- मस्ती की वस्तु है। 
आप कहेंगे कि भारत में भी तो स्त्रियों की दुर्दशा है। यहां तो स्त्रियां यूरोप से भी तुच्छ अवस्था में हैं। हां, हो सकती हैं पर मैं बात वर्तमान यथार्थ की नहीं कर रहा हूं, बल्कि बात उस कसौटी की कर रहा हूं, जिसे हमने जाने- अनजाने पीछे धकेल दिया है। 
कसौटी निखारने से निखरती है। यह निरंतर व्याख्या से संवरती और दैनिक जीवन में उतरती है। 
क्या वर्ग संघर्ष के विचारों का संश्रव भारतीय मार्क्सवादियों के मानस में एक दिन में हुआ है या दशकों के प्रचार-प्रसार से यह संभव हुआ ? 
वस्तुत: जब शोपेनहावर यूरोपीय संस्कृति में मौलिक बदलाव की बात करते हैं तो उनका संदर्भ यही है।
 यह सन्दर्भ महान विचारक और उपन्यासकार लियो टाल्सटाय तक आते-आते कितना खुल कर सामने आ जाता है, यह उनके लेखन और उनके अपने जीवन में स्पष्ट झलकता है।

 टॉलस्टॉय कुलीन घराने से आते थे। हजारों दास थे और अपार संपत्ति थी। परंतु उनपर उपनिषद, श्रीमद्भागवत और वेदांत का प्रभाव इस कदर हुआ कि उन्होंने स्वेच्छा से न केवल दरिद्रता का जीवन अपनाया बल्कि इसके प्रवक्ता बन गए।

स्वेच्छा से दरिद्रता अपनाने की बात हमें अटपटी लग सकती है, पर यह ज्ञान भारतीय जीवन दर्शन का अभिन्न अंग है और कई- कई आदर्शों में यह एक प्रमुख आदर्श है। और आदर्श अटपटे ही होते हैं।
वस्तुत: मनुष्यता और इंसानियत की रट लगाने से हम मनुष्य नहीं बन जाएंगे। उसके लिए आदर्श प्रस्तुत करने पड़ते हैं।
 जब महर्षि याग्यबल्क्य अपनी पत्नी मैत्रेयी को सांसारिक संपत्ति सौंपने लगे तो मैत्रेयी ने कहा कि जो धन और ऐश्वर्य आदमी को मनुष्य न रहने दे, वह लेकर हमें क्या करना है।
"तवैव वाहास्तव नृत्यगीते , 
येनाहं नामृता स्यां किमहं तेन कुर्याम।"

 दरअसल दरिद्रता अभिशाप तब है जब किसी पर आरोपित की जाए, किंतु जब इसे अपनी इच्छा से अंगीकार किया जाय तो यह एक मानवीय आदर्श बन जाता है। स्वार्थ और कर्तव्य के बीच द्वंद्व में कर्तव्य की जीत ही आदर्श है।

 दरिद्रता एक बरदान भी है क्योंकि यह धन- दौलत, यश और पैसे के प्रलोभन से हमें रोकती है। हमारे सामने इसके अनन्य उदाहरण हैं किंतु हम टाल्सटाय का ही अभी उल्लेख करते हैं।

टॉलस्टॉय पहले माशांहारी थे, वे शाकाहारी बन गए। दासों को मुक्त कर दिया और एक परीब्राजक का जीवन अपना लिया। वे एक ईसाई थे तथा ईसा मसीह द्वारा दिए गये " सरमन आफ दि माउंट" को ईसाई धर्म की रीढ़ मानते थे किंतु नए तरीके का जो जीवन टाल्सटाय ने अपनाया , उसकी प्रेरणा उन्होंने बाइबल से नहीं ली बल्कि भारतीय जीवन दर्शन और उपनिषदों से ली।

 गौरतलब है कि अहिंसा में श्रद्धा रखने और चर्च के बर्चस्ववादी रूप की भर्त्सना के कारण उन्हें 1901 में चर्च से निष्कासित कर दिया गया। दरअसल स्वामी विवेकानंद की शिक्षाओं और भाषणों को सुनने और उनकी पुस्तकों के अध्ययन से रूढ़िवादी ईसाई धर्म से टाल्सटाय का मोहभंग हो गया था । 
गरज यह कि हमने बाइबल और पश्चिम के उपभोगवादी दर्शन को हृदयंगम कर लिया है, हम अचानक वेदांत और उपनिषदों द्वारा विहित त्याग और मूल्यों पर आधारित जीवन अख्तियार करने से रहे किन्तु उन ग्रंथों को अपमानित करने तथा भारतीय ज्ञान परंपरा को कोसने की अपनी धृष्टता पर थोड़ा अंकुश तो लगा ही सकते हैं!


आञ्जनेय हनुमान

आञ्जनेय
१. अञ्जना माता-आञ्जनेय का सामान्य अर्थ है अञ्जना माता के पुत्र हनुमान्। भारत के ९ स्थानों को अञ्जना का निवास कहा जाता है-(१) हरियाणा का कैथल (कपिस्थल), (२) अयोध्या का हनुमानगढ़ी, (३) राजस्थान का सुजानगढ़, (४) झारखण्ड के गुमला में अञ्जन गुफा, (५) गुजरात के डांग जिले में अञ्जनी गुफा, (६) महाराष्ट्र के नासिक के निकट अञ्जनेरी गांव, (७) कर्णाटक में हम्पी के निकट आञ्जनेयाद्रि, (८) तिरुपति में अञ्जनाद्रि, (९) ओड़िशा में खोर्धा के निकट जरीपुट (पुट का अर्थ पठार, या ऊंची समतल भूमि)।
तिरुपति से प्रकाशित पराशर संहिता के अनुसार मनुष्य रूप में हनुमान् के ९ अवतार थे।
२. हनुमान् के अर्थ-
(१) मनुष्य- पराशर संहिता के अनुसार उनके मनुष्य रूप में ९ अवतार हुये थे।
(२) योगी, विद्वान्-आध्यात्मिक अर्थ तैत्तिरीय उपनिषद् में दिया है-दोनों हनु के बीच का भाग ज्ञान और कर्म की ५-५ इन्द्रियों का मिलन विन्दु है। जो इन १० इन्द्रियों का उभयात्मक मन द्वारा समन्वय करता है, वह हनुमान् है।
तैत्तिरीय उपनिषद् शीक्षा वल्ली, अनुवाक् ३-अथाध्यात्मम्। अधरा हनुः पूर्वरूपं, उत्तरा हनुरुत्तर रूपम्। वाक् सन्धिः, जिह्वा सन्धानम्। इत्यध्यात्मम्।
(३) ब्रह्म रूप में गायत्री मन्त्र के ३ पादों के अनुसार ३ रूप हैं-स्रष्टा रूप में यथापूर्वं अकल्पयत् = पहले जैसी सृष्टि करने वाला वृषाकपि है। मूल तत्त्व के समुद्र से से विन्दु रूपों (द्रप्सः -ब्रह्माण्ड, तारा, ग्रह, -सभी विन्दु हैं) में वर्षा करता है वह वृषा है। पहले जैसा करता है अतः कपि है। अतः मनुष्य का अनुकरण करने वाले पशु को भी कपि कहते हैं। तेज का स्रोत विष्णु है, उसका अनुभव शिव है और तेज के स्तर में अन्तर के कारण गति मारुति = हनुमान् है। वर्गीकृत ज्ञान ब्रह्मा है या वेद आधारित है। चेतना विष्णु है, गुरु शिव है। उसकी शिक्षा के कारण जो उन्नति होती है वह मनोजव हनुमान् है। 
तत्र गत्वा जगन्नाथं वासुदेवं (देवदेवं) वृषाकपिं। 
पुरुषं पुरुष सूक्तेन उपतस्थे समाहिताः॥ (भागवत पुराण, १०/१/२०)
तद् यत् कम्पायमानो रेतो वर्षति तस्माद् वृषाकपिः, तद् वृषाकपेः वृषाकपित्वम्। (गोपथ ब्राह्मण उत्तर, ६/१२)
आदित्यो वै वृषाकपिः। ( गोपथ ब्राह्मण उत्तर, ६/१०), स्तोको वै द्रप्सः। (गोपथ ब्राह्मण उत्तर, २/१२)
पहले जैसी सृष्टि-सूर्याचन्द्रमसौ धाता यथापूर्वं अकल्पयत् (ऋक्, १०/१९०/३) 
(४) महावीर-वीर = जो शत्रु को दूर करे, विक्रमी। सीमा स्थान को भी वीर कहते हैं-जैसे मत्स्य राज्य की सीमा वीरमत्स्य जहां केकय से आते समय भरत रुके थे। रक्षा करने वाला पति, पुत्र, या यज्ञ रक्षक-अवीरा निष्पतिसुता (अमरकोष, २/६/११)। विष्णु का एक नाम-(विष्णु सहस्रनाम, ४०१, ६४३, ६५८)। ’वीरभोग्या वसुन्धरा’ अर्थ में राजा द्वारा दी गयी जागीर (ओड़िशा में) या सम्पत्ति का उत्तराधिकारी अर्थ में बड़ा भाई। महावीर का अर्थ है- विष्णु की सीमा, जैन मत में तीर्थंकर परम्परा की सीमा महावीर। अतः महावीर हनुमान् के हृदय में विष्णु अवतार श्रीराम हैं। ब्रह्माण्ड की सीमा पर ४९वां मरुत् है। ब्रह्माण्ड केन्द्र से सीमा तक गति क्षेत्रों का वर्गीकरण मरुतों के रूप में है। अन्तिम मरुत् की सीमा हनुमान् है। इसी प्रकार सूर्य (विष्णु) के रथ या चक्र की सीमा हनुमान् है। ब्रह्माण्ड विष्णु के परम-पद के रूप में महाविष्णु है। 
(५) हारियोजन -२ प्रकार की सीमाओं को हरि कहते हैं-पिण्ड या मूर्त्ति की सीमा ऋक् है,उसकी महिमा साम है-ऋक्-सामे वै हरी (शतपथ ब्राह्मण, ४/४/३/६)। पृथ्वी सतह पर हमारी सीमा क्षितिज है। उसमें २ प्रकार के हरि हैं-वास्तविक भूखण्ड जहां तक दृष्टि जाती है, ऋक् है। वह रेखा जहां राशिचक्र से मिलती है वह साम हरि है। इन दोनों का योजन शतपथ ब्राह्मण (४/४/३) में बताया है, अतः इसको हारियोजन ग्रह कहते हैं। हारियोजन से होराइजन हुआ है। हारियोजन या पूर्व क्षितिज रेखा पर जब सूर्य आता है, उसे बाल सूर्य कहते हैं। मध्याह्न का युवक और सायं का वृद्ध है। इसी प्रकार गायत्री के रूप हैं। जब सूर्य का उदय दीखता है, उस समय वास्तव में उसका कुछ भाग क्षितिज रेखा के नीचे रहता है और वायुमण्डल में प्रकाश के वलन के कारण दीखने लगता है। सूर्य सिद्धान्त में सूर्य का व्यास ६५०० योजन कहा है, यह भ-योजन = २७ भू-योजन = प्रायः २१४ किमी. है। इसे सूर्य व्यास १३,९२,००० किमी. से तुलना कर देख सकते हैं। वलन के कारण जब पूरा सूर्य बिम्ब उदित दीखता है तो इसका २००० योजन भाग (प्रायः ४,२८,००० किमी.) हारियोजन द्वारा ग्रस्त रहता है। इसी को कहा है-बाल समय रवि भक्षि लियो ...)। इसके कारण ३ लोकों पृथ्वी का क्षितिज, सौरमण्डल की सीमा तथा ब्रह्माण्ड की सीमा पर अन्धकार रहता है। यहां युग सहस्र का अर्थ युग्म-सहस्र = २००० योजन है जिसकी इकाई २१४ कि.मी. है।
अथ हारियोजनं गृह्णाति । छन्दांसि वै हारियोजनश्चन्दांस्येवैतत्संतर्पयति तस्माद्धारियोजनं गृह्णाति (शतपथ ब्राह्मण, ४/४/३/२) 
एवा ते हारियोजना सुवृक्ति (ऋक्, १/६१/१६, अथर्व, २०/३५/१६) 
(६) सुनर -मूल वैदिक शब्द सु-नर था जिससे लौकिक शब्द सुन्दर हुआ है। सु = अच्छा, समन्वय, मिला हुआ। दुः = अलग-अलग, असम्बद्ध। जैसे सुख-दुःख।
सु-नर = अच्छा नर, जो लोगों को मिलाये। जैसे इसाई विवाह में पति-पत्नी को मिलाने वाला सु-नर (Best man) कहलाता है।
वेद में सुनर वह है जो पति-पत्नी, भक्त भगवान् को मिला दे। वैदिक रूप-सूनर, सूनरी।
यो वाधते ददाति सूनरं वसु (ऋक्, १/४०/४), वि दाशुषे भजति सूनरं वसु (ऋक्, ५/३४/७)
आ घा योषेव सूनरी, उषा याति प्रमुञ्चती (ऋक्, १/४८/५), ज्योतिष्कृणोति सूनरी (ऋक्, ७/८१/१)
रामायण में हनुमानजी सीता-राम को मिलाने के लिए दूत बने, भक्त विभीषण या शत्रु पक्ष के व्यक्ति को भगवान् राम से मिलाया तथा परस्पर विरोधी सुग्रीव तथा अंगद को भी राम से मिलाया। 
सु-नर हनुमान का चरित्र वर्णन होने के कारण इस अध्याय को सुन्दर काण्ड कहते हैं।
३. सृष्टि क्रम- 
(१) सन्दर्भ-यह पं मधुसूदन ओझा और उनके शिष्य पं मोतीलाल शास्त्री की पुस्तकों के आधार पर है जिसका सारांश मेरी पुस्तक ’पुरुष सूक्त’ में है।
ब्रह्म सिद्धान्त-पं. मधुसूदन ओझा-सृष्टि के मूलतत्त्व रस का ६ स्तरों में विभाजन-अधिकरण २-३५
भारतीय हिन्दू मानव और उसकी भावुकता-पं मोतीलाल शास्त्री-पृ २५७-२७७
गीता विज्ञान भाष्य-बुद्धियोग परीक्षा, खण्ड १-पं मोतीलाल शास्त्री-प्रकरण १-स्तम्भ २-योगेश्वर का तात्त्विक स्वरूप-पृ. ३१-८७
https://archive.org/details/@madhusudanojha
https://shankarshikshayatan.org/
पुरुष सूक्त-अरुण कुमार उपाध्याय-अध्याय २-पारा ११-१५
https://archive.org/details/PurushaSukta_201311
(२) परात्पर से विविधता-परात्पर ब्रह्म को रस (द्रव के समान समरूप पदार्थ) कहा गया है, जो अविभाज्य है। इसके साषात से आनन्द होता है, अतः इसे आनन्द भी कहते हैं (तैत्तिरीय उपनिषद्, २/७/२)। रस के भीतर स्पन्दन या कम्पन होते रहते हैं, जिनको बल कहते हैं। बल के विभिन्न स्तरों के कारण इनके ३-३ वर्ग हैं-
१. अमृत-(क) शान्ति-बल की सुप्त या निष्क्रिय अवस्था।
   (ख) तृप्ति-स्वप्न के समान। यहआं रस और बल दोनों समान हैं। 
   (ग) प्रसाद (कृपा)-जाग्रत अवस्था-रस के साथ बल भी दीखता है।
२. अमृत-मृत्यु= (विश्व के १६ खण्ड)
   (क) माया (सीमा भाव)- आलम्बन या आधार पुरुष।
   (ख) कला- (मात्रा के स्तर)- स्थान मूल प्रकृत्।
   (ग) गुण (क्रिया या प्रभाव)-विभक्त प्रकृति- अलग-अलग स्थानों पर।
३. मृत्यु (विश्व की १६ प्रतिमा)-
    (क) विकार- २ पिण्डों के बीच का स्मबन्ध का कारण, कमी की पूर्ति।
   (ख) अञ्जन (रंग, दृश्य भेद)-बन्धन, पुरञ्जन- विराट् प्रजापति।
   (ग) आवरण (सीमा)-सुप्त स्थिति-पुर - विश्व प्रजापति।
प्रथम ३ रूपों का अनुभव नहीं हो सकता। अन्तिम २ वर्गों के ६ रूप परिवर्तन के ६ स्तर हैं। सभी ६ बल ६ प्रकार के परिग्रह (आवरण में बन्द करने वाले) हैं।
(३) परिग्रह-१. माया-माया २ प्रकार की है। मात्रा-बल (परिमाण का भेद) अनन्त प्रकार का है। कोष बल १६ प्रकार का है, जो वस्तुओं को अलग अलग करता है-विद्या, माया, जाया, धारा, आप्, हृदय, भूति, यज्ञ, सूत्र, सत्य, यक्ष, अभ्व, मोह, वय, वयोनाध, वयुन। (पं. मधुसूदन ओझा के ब्रह्म विज्ञान के निर्विशेष अनुवाक् से)
२. कला-बड़े छोटे का क्रम, वर्गीकरण।
३. गुण- तीन प्रकार की स्थिति। सत्त्व-एक सीमा के भीतर् रज - गति। तम-निष्क्रिय।
४. बिकार-अणुओं में परिवर्तन, यज्ञ द्वारा निर्माण।
५. अञ्जन-यह ३ प्रकार का है-विभूति-सत्त्व हुण का परिणाम। रजोगुण का परिणाम पाप्मा। तमोगुण का परिणाम-आवरण। इससेविराट् या दृश्य जगत् बनता है।, जो २ स्तरों का है-विश्व तथा व्यक्ति रूपों में।
६. आवरण- प्रति विश्व या व्यक्ति का ऊप एक आवरण में छिपा है। उसकी रचना पुर है। यह विश्व प्रजापति है।  
(४) महेश्वर से क्रम-
(क) महेश्वर- १. माया परिग्रह-मायी महेश्वर
   २. कला परिग्रह- सकल षोडशी
(ख) विश्वेश्वर- ३. गुण परिग्रह।
(ग) उपेश्वर- ४. विकार परिग्रह- सविकार यज्ञ।
(घ) ईश्वर- ५. अञ्जन परिग्रह-साञ्जन विराट्।
    ६. आवरण परिग्रह-सावरण विश्व या व्यक्ति रूप में वैश्वानर।
(५) अञ्जन, त्रिककुद्-अञ्जन रंग या गुण है। इसी अञ्जना से विराट् रूप उत्पन्न हुआ जो त्रिककुद् आवरण के भीतर व्यक्ति रूप में वैश्वानर है। यह विश्व रूप आञ्जनेय है।
भौतिक रूप में कैलास के निकट त्रिककुद् पर्वत कहा गया है। पर इस आकार का पर्वत कहीं नहीं है, न किसी पर्वत पर काले रंग का अञ्जन होता है। उपेश्वर रुद्र के बाद उसके अवतार रूप आञ्जनेय वैश्वानर हैं। अतः त्रिककुद् को कैलास के निकट अञ्जन गिरि कहा है। 
प्रकृति में काला रंग का कार्बन होता है, जिसके अणु त्रि-ककुद् (४ त्रिभुजों से घिरा) रूप के हैं। इन कार्बन परमाणुओं के संयोग से ही जैव सृष्टि होती है। आवरण से माप होने के कारण यजुर्वेद में ककुप् तथा त्रिककुप् छन्द कहा गया है (वाज. यजु, १५/४)। वृत्र का बन्धन इन्द्र वज्र से टूटने के बाद त्रिककुद् अणु अलग होते हैं।
 
(६) उद्धरण-कैलासात् पश्चिमोदीच्यां ककुद्मानौषधीगिरिः॥१४॥
ककुद्मति च रुद्रस्य उत्पत्तिश्च ककुद्मिनः। तदञ्जनं त्रैककुदं शैलं त्रिककुदं प्रति॥१५॥ (मत्स्य पुराण, १२१/१४-१५)
श्रेष्ठमाहुः त्रिककुदं अञ्जनं नित्यमेव च। (ब्रह्माण्ड पुराण, २/३/११/६७)
कैलासाद् दक्षिणे पार्श्वे क्रूर सत्त्वौषधं गिरिम्। वृत्रकायात् किलोत्पन्नं अञ्जनं त्रिककुं प्रति॥ (वायु पुराण, ४७/१३)
अथर्व वेद, सूक्त (५/९) का देवता त्रैककुदाञ्जन है। 
त्रयो दासा आञ्जनस्य तक्मा बलास आदहिः। वर्षिष्ठः पर्वतानां त्रिककुन्नाम ते पिता॥८॥
यदाञ्जनं त्रैककुदं जातं हिमवतस्परि। यातूंश्च सर्वाञ्जम्भयत् सर्वाश्च यातुधान्यः॥९॥
यदि वासि त्रैककुदं यदि यामुनमुच्यसे। उभे ते भद्रे नाम्नी ताभ्यां नः पाह्याञ्जन॥१०॥
(अथर्व, ४/९/८-१०)
आञ्जनं पृथिव्यां जातं भद्रं पुरुषजीवनम्। कृणोत्वप्रमायुकं रथजूतिमनागसम्॥३॥
देवाञ्जन त्रैककुदं परि मा पाहि विश्वतः। न त्वा तरन्त्योषधयो बाह्याः पर्वतीया उत॥६॥
(अथर्व सूक्त १९/४४-भैषज्यम्, देवता आञ्जनम्, वरुणः)
अथर्व सूक्त (१९/४५) आञ्जन सूक्त है।
अहन् अहिं पर्वते शिश्रियाणं त्वष्टास्मै वज्रं स्वयं ततक्ष।
वाश्रा इव धेनवः स्यन्दमाना अञ्जः समुद्रमव जग्मुरापः॥२॥
वृषायमाणोऽवृणीत सोमं त्रिकद्रुकेष्वपिबत् सुतस्य।
आ सायकं मगवादत्त वज्रमहन्नेनं प्रथमजा महीनाम्॥३॥
(ऋक्, १/३२/२-३)
यद्ध प्रसर्गे त्रिककुप् निवर्तत् अप द्रुहो मानुषस्य दुरो वः। (ऋक्, १/१२१/४)
इन्द्रं वै वृत्रं जघ्निवाँसं रक्षाँस्यसचन्त तानि अञ्जनगिरिणान्तरधत्त रक्षाँस्येतँ सचन्ते यो दीक्षते भवति हि यदाङ्क्ते रक्षसामन्तर्हित्या इन्द्रो वै वृत्रमहँस्तस्य चक्षुः परापतत् तत् त्रिककुभं प्राविशद् यदाङ्क्ते तस्यैव चक्षुषोऽवरुद्ध्यै द्विर्दक्षिणमाङ्क्ते सकृत् सव्यं चि (त्रि)वॄद् यज्ञो मुखत एव यज्ञं आलभते त्रिः दक्षिणमाङ्क्ते --- (काठक संहिता, २३/१)

Monday, 20 July 2026

पत्नी वामांगनी

व्रतबंधे विवाहे च जातकर्मादि कर्मसु। व्रते दाने मखे श्राद्धे पत्नी तिष्ठंति दक्षिणे।।

आशिर्वाद अभिषेके च पादप्रक्षालने तथा। भोजने शयनेचैव पत्नी वामे सदा वसेतु।।

एक लाइन में --

सर्वेषु धर्मकृत्येषु पत्नी तिष्ठति दक्षिणे।

सभी पुण्य कार्यों में जो आपको ईश्वर प्राप्ति की ओर ले जाए पत्नी सदा आपके दाहिने बैठेगी।

कन्या दान से बड़ा पुण्य और क्या हो सकता है?

एक रुपए का भी दान आप करते हैं तो आपकी पत्नी आपके दाहिने रहेगी।

Sunday, 19 July 2026

"उपनयन" जनेऊ

"उपनयन" शब्द एक संस्कारविशेष का नाम है। इसी विषय में भरद्वाज का कथन है-
"उपानयाख्यं यत्कर्म विद्यार्थं तदुदीरितम्॥"

विद्यार्थी के लिए जो संस्कार किया जाता है, वही उपनयन नाम से प्रसिद्ध है।

यह नाम व्युत्पत्तिमूलक है। इसका आधार उद्भिद्-न्याय है। भारुचि के अनुसार किसी शब्द की व्युत्पत्ति दो प्रकार की मानी जाती है- भावव्युत्पत्ति और करणव्युत्पत्ति। इसे इस प्रकार समझना चाहिए- उप का अभिप्राय समीप है। आचार्य आदि के निकट बटु को ले जाना अथवा पहुँचाना उपनयन कहलाता है। अथवा जिस साधन के द्वारा बटु को आचार्य आदि के समीप पहुँचाया जाता है, उसे भी उपनयन कहा जा सकता है।
इसी विषय को विद्वानों ने इस प्रकार कहा है-
 "गुरोर्व्रतानां वेदस्य यमस्य नियमस्य च। देवतानां समीपं वा येनासौ नीयते द्विजः॥"
जिस संस्कार के द्वारा द्विज बालक गुरु, व्रत, वेद, यम, नियम अथवा देवताओं के समीप पहुँचाया जाता है, उसी का नाम उपनयन है। इन दोनों प्रकार की व्युत्पत्तियों में भावव्युत्पत्ति ही अधिक उपयुक्त मानी जाती है, क्योंकि वही श्रौतविधि के अभिप्राय के अनुरूप है। करणव्युत्पत्ति को स्वीकार करना उचित नहीं है, क्योंकि उससे अन्य वस्तुओं पर भी 'उपनयन' शब्द का प्रयोग होने लगेगा। फिर यह भी है कि करण का निर्धारण वक्ता की इच्छा पर निर्भर रहता है; इसलिए अनेक प्रकार की कल्पनाएँ सम्भव हो जाती हैं और शास्त्र का निश्चित अभिप्राय अस्थिर हो जाता है।
उदाहरण के रूप में, यदि "जिसके द्वारा समीप ले जाया जाता है" ऐसी करणव्युत्पत्ति स्वीकार कर ली जाए, तो कभी चलना, कभी कोई व्यक्ति और कभी स्वयं आचार्य भी 'उपनयन' कहलाने लगेंगे। ऐसी स्थिति में 'उपनयन' शब्द का निश्चित आशय समाप्त हो जाएगा और अनेक शास्त्रीय विषयों में अर्थ-भ्रम उत्पन्न हो जाएगा। संस्कार किसी अन्य वस्तु का नाम नहीं हो सकता, क्योंकि उसका स्वरूप संस्कार (शुद्धि एवं योग्यता प्रदान करने की क्रिया) है। अतः पूर्व में कही गई भावव्युत्पत्ति ही अधिक संगत और ग्राह्य है। यहाँ उपनयन का अभिप्राय यह है कि आचार्य द्वारा बटु का गायत्री-मन्त्र के माध्यम से संस्कार किया जाए। इसी कारण कात्यायन ने कहा है—

"गायत्र्या ब्राह्मणमुपनयीते।"

अर्थात् कि आचार्य ब्राह्मण बालक का गायत्री-मन्त्र द्वारा उपनयन करे। इस वचन में 'ब्राह्मण' (जिसका संस्कार किया जाना है) और 'गायत्री' (जिसके द्वारा संस्कार सम्पन्न होता है) के पृथक्-पृथक् निर्देश से यह स्पष्ट हो जाता है कि 'उपनयन' शब्द का आशय केवल संस्कारविशेष ही है, किसी साधन अथवा अन्य वस्तु का नहीं।

इसी अभिप्राय को आपस्तम्ब ने भी व्यक्त किया है-
"उपनयनं विद्यार्थस्य श्रुतितः संस्कारः।।"

श्रुति के अनुसार विद्यार्थी का उपनयन एक संस्कार है। इसी उपनयन को मनु ने 'ब्रह्मजन्म' के रूप में निरूपित किया है। वे कहते हैं-

"तत्र यद् ब्रह्मजन्मास्य मौञ्जीबन्धनचिह्नितम्। 
तत्रास्य माता सावित्री 
पिता त्वाचार्य उच्यते॥"

जिस समय मौञ्जी (मुंजघास की मेखला) धारण कराकर उसका उपनयन किया जाता है, वही उसका ब्रह्मजन्म कहलाता है। उस आध्यात्मिक जन्म में सावित्री (गायत्री) उसकी माता और आचार्य उसके पिता माने जाते हैं।
इस प्रकार उपनयन केवल एक बाह्य अनुष्ठान नहीं, बल्कि ऐसा संस्कार है जिसके द्वारा बालक वेदाध्ययन, ब्रह्मचर्य और धार्मिक जीवन के लिए योग्य बनता है। इसी कारण धर्मशास्त्रों में इसे मनुष्य के आध्यात्मिक जीवन का दूसरा जन्म माना गया है।