Sunday, 23 August 2026

मनुस्मृति

#पांचवांस्तंभ 
#मनुस्मृति - 
           आज जिस मनु स्मृति के नाम लेकर सनातन को गरियाने का प्रपंच विभिन्न मंचों से जार्ज सोरेस के पिठ्ठू कर रहे है उन्हें पता होना चाहिए कि मनु स्मृति न तो कोई नित्य पूजनीय धार्मिक ग्रंथ है न ही कोई कानूनन प्रतिबंधित साहित्यिक कृति है. न ही स्वतंत्र भारत वर्ष की संवैधानिक व्यवस्था में उसकी कोई कानूनी मान्यता है.!!!
           मनु स्मृति तात्कालिक राज व्यवस्था की तत्समय की सामाजिक व्यवस्था की नीति निर्धारक संहिता पुस्तक है जिसे समकालीन परिस्थितियों के रूप में ही जानना समझना हर समाजशास्त्री के लिए अध्ययन का विषय है क्योंकि उसके बहुसंख्यक प्रसंग आज भी मानव सभ्यता की अमूल्य निधि है..!!!
         आज मनु स्मृति के आधार पर न तो भारत का संविधान है न ही कानून व्यवस्था है न ही कोई सर्व मान्य सामाजिक व्यवहार है इसलिए मनु स्मृति को लेकर वर्तमान भारतीय समाज को लांक्षित करने का प्रयास एक विदेशी सोच की नियोजित सनातन विरोधी कुंठा है ..!!!
         मनु स्मृति का विरोध वस्तुत: प्रकारांतर सनातन गरिमा को धूमिल करने का कुचक्र है क्योंकि ऐसी मंचीय धृष्टता के दायरे में शरीयत शासन में मध्ययुगीन धार्मिक ग्रंथों के ज्यों का त्यों लागू करने का कोई उल्लेख आपने कहीं नहीं पाया होगा तो उनका तो नाम भी लेने में मैकाले पुत्र कांपते हैं..!!!
        जिस स्मृति ग्रन्थ की कोई विधि व्यवस्था नहीं है उसे लेकर सनातन स्मृति परम्परा को स्त्री विरोधी बताना दरसल सनातन विरोधी कुकृत्य है क्योंकि नारी सम्मान सनातन की धुरी है धुरी थी धुरी रहेगी इसे किसी विदेशी मानस संतति से सर्टिफिकेट की जरूरत नहीं है..!!!
      विचित्र केतु जैसे स्व नाम धन्य हालिया मनु स्मृति को कोस कोस कर उसके नाम पर नारी शक्ति के ठेकेदार बनने का जो नाटक कर रहे है उन्हें दूसरे पंथ की किताबों के स्त्री विरोधी उद्धरण देने में लकवा मार जाता है वैसे भी ऐसे तत्वों की महिला सशक्तिकरण की असलियत शाहबानो- तीन तलाक प्रकरण में दुनिया देख चुकी है और हालिया देख भी रही है..!!!
        मनु स्मृति भारतीय लोकतांत्रिक परम्परा का ऐसा हिस्सा है जो आलोचना समीक्षा से परे नहीं है उसकी समालोचना निरंतर होती रही है आगे भी होती रहनी चाहिए इस पर किसी सनातनी को कोई आपत्ति न थी न है न रहेगी उसके हर प्रसंग पर आम सहमति भी नहीं है ..!!!
       ऐसे में मनु स्मृति के नाम पर पूरी सनातन परंपरा को निशाने पर लिया जाना पूर्णतः सोचा समझा साम्प्रदायिक कृत्य है..बाकी जो पूरी मनुस्मृति न पढ़ पाए न समझ पाए उन्हें बौद्धिक समाधान हेतु आदरणीय श्री मनोज श्रीवास्तव सर की मनु स्मृति पर फेस बुक पोस्ट की श्रृंखला अवश्य पढ़नी चाहिए .. सत्यमेव जयते ..!!!
सादर -बृजेश कुमार त्रिपाठी

अंबेडकर

1927 में ब्रिटिश सरकार ने भारत के शासन को सुधारने के लिए एक कमीशन बनाया। इसका नाम साइमन कमीशन पड़ा क्योंकि इसके अध्यक्ष सर जॉन साइमन थे। इसमें 7 ब्रिटिश सांसद थे— और कोई भी भारतीय इसका सदस्य नहीं था। इसलिए कांग्रेस, मुस्लिम लीग और कई अन्य दलों ने इसका बहिष्कार किया। पूरे देश में “सायमन गो बैक” के नारे लग रहे थे।

लेकिन एक फलाना आदमी था जिसने इस अंग्रेज़ी कमिशन का बहिष्कार नहीं किया। वो बॉम्बे लेजिस्लेटिव काउंसिल की तरफ से प्रांतीय समिति का मेंबर बना और इस कमीशन के सामने आया। 23 अक्टूबर 1928, पूना में सर जॉन साइमन और अन्य सदस्यों के सामने उसने साफ कहा:---
"हम लोग "दा-ललित" हैं। और "दा-ललित" "हैंड-डू" समुदाय का हिस्सा नहीं है। बल्कि अलग और स्वतंत्र है। हम शिक्षा, पैसा और समाज में उनसे पिछड़े हैं। "हैंड-डू" नहीं हैं हम। इसलिए हमें उन (हैंड-डू) लोगों से मौसमलाम लोगों से भी ज्यादा राजनीतिक सुरक्षा चाहिए।"

सोर्स : फलाने की किताब Dr /B /R /AM : राइटिंग्स एंड स्पीचेस वॉल्यूम 2 में वो मेमोरेंडम और गवाही छपी हुई है। व्हाट्सप्प यूनिवर्सिटी, या औंध-भोक्त कह कर अपना दिल हल्का ना करें। क्योंकि जितना तुमको ज्ञान है, उतना मैं समाज में बांट कर भूल चुका हूँ।

(कुछ शब्द बिगाड़ दिए हैं क्योंकि बात की रीच कम हो जाती है सच लिखने से।)

चलो जो है, जो था, वो भी ठीक है। पर मुकेश जोशी का कहना है कि जब तुमने खुद को हैंड-डू माना ही नहीं, तो अब हैंड-डू रहकर, खुद को हैंड-डू जातियों की पैदाइश बता कर R-रकक्षण की मलाई लेने का क्या तुक है । तुम कह दो कि तुम हैंड-डू नहीं हो, तुम्हारी जाति, स्वतः ख़त्म हो जाएगी। और तुम्हारा तथाकथित चोचन भी । तुम्हें सदियों तलक क्यों चोचित ही बने रहना है। 💀

और एक बात। इसी साइमन कमिशन की वजह से लाला लाजपत राय की मौत हुई थी। इसी की कड़ी में भगत सिंह राजगुरु सुखदेव को फांसी हुई थी। 

मगर फलाने थे कि इन अंग्रेज़ो की चापलूसी में कोर्ट पहने, टाई लगाए, पलकें बिछाए खड़े रहते थे। 💀💀
------------------------
मुकेश जोशी ✍️
------------------------
कड़वा सच लिखना ही मेरा शौक है। सच सुनने का हौसला हो तो मुकेश जोशी को फॉलो करें। 🔥

स्तन टैक्स

ऐसी गलती ना करो... यही तो चाहते हैं अंबेडकरवादी
URGENT PLS SHARE

- दिलीप पाण्डेय

हमारे देश के कुछ सामान्य वर्ग के क्रिएटर और लेखक बहुत बड़ी गलती कर रहे हैं । 

मटका झाडू और स्तन टैक्स की झूठी अवधारणाएं वामपंथियों और अंबेडकरवादियों द्वारा फ्लोट की गईं । आज जाने अनजाने कुछ सामान्य वर्ग के ही लोग अंबेडकरवादियों के झूठे नैरेटिव का हिस्सा बन रहे हैं ।

कई पोस्ट में लगातार देख रहा हूं कि अंबेडकरवादियों को जवाब में ये लिखा जा रहा है कि

तुम खुद भेजते थे अपनी मां को स्तन टैक्स देने हमारी क्या गलती है ? (ऐसे जवाब भोले भाले दलितों को दिखाकर भड़काया जा रहा है)

इसी तरह दलित माता नाम से फर्जी वीडियो कुछ सामान्य वर्ग के क्रिएडिव लेकिन मूर्ख लोगों के द्वारा गीत बनाकर प्रचारित किए जा रहे हैं जिसमें ये लाइन लिखी जा रही है कि दलित माता ने झाडू और मटका हटा दिया । जो कभी लगा ही नहीं वो हटाया कैसे जा सकता है ?

दोनों नैरेटिव झूठ हैं अगर कोई ये सब बोले तो उसको ये उत्तर दीजिए जो मैं लिख रहा हूं-

1- झाडू मटका बांधा गया- अंबेडकर ने खुद बहुत कोशिश की थी कि उनको इसका कोई प्रमाण मिल जाए लेकिन वो कोई प्रमाण नहीं दे सके । उन्होंने अपने साहित्य में इसका जिक्र भी किया है कि उनके पास इस घटना का कोई सबूूत ही नहीं है ।

2- स्तन टैक्स- ये केरल के त्रावणकोर साम्राज्य की घटनाएं कहकर झूठी प्रचारित की जाती हैं । पहली बात ये कि त्रावणकोर साम्राज्य के राजा नायर जाति के होते थे और नायर जाति केरल में ओबीसी के तहत आती है । इस साम्राज्य का सामान्य वर्ग से कोई रिश्ता ही नहीं है । दूसरी बात ऐसे फोटो मौजूद हैं कि तब त्रावणकोर के राजपरिवार की स्त्रियों के स्तन भी खुले हुए थे तो क्या वो भी स्तन टैक्स दे रही थीं ? इन्हीं तस्वीरों से ही ये प्रोपागेंडा पहले ही ध्वस्त हो चुका है ।

आप सभी सामान्य वर्ग के लोगों से निवेदन है कि व्यंग्य कसते वक्त भी इस तरह के झूठे नैरिटिव का हिस्सा कभी ना बनें नहीं तो एक झूठ बात सच हो जाएगी और इसका नुकसान आपको तो नहीं लेकिन आपकी आने वाली पीढ़ियों को पक्का उठाना पड़ेगा ।

क्योंकि आम तौर पर देश के लोग व्यंग्य को व्यंग्य की तरह ही देखें, या आपका व्यंग्य समझ पाएं, ये कोई जरूरी नहीं है ।

URGENT PLS SHARE

बाकी मोदी तो खुद ही हिसाब चुक्ता करने की बात करता है वो खुद गलत नैरेटिव को आगे बढ़ा रहा है इसलिए आपकी चुनौतियां और ज्यादा बड़ी हैं । ये ध्यान रखना ।

-दिलीप पाण्डेय

Saturday, 22 August 2026

नहुष मेरा देवता भी और ऊंचा उठे मेरे साथ_

मेरा देवता भी और ऊंचा उठे मेरे साथ
___________________________

भारतीय पुराणों ने मनुष्य को सत्ता के बारे में बहुत पहले ही सावधान कर दिया था। इतना पहले कि तब न चुनाव होते थे, न प्रेस-कॉन्फ्रेंस, न सर्वेक्षण एजेंसियाँ, न सोशल मीडिया की ट्रोल-सेना। फिर भी सत्ता के चरित्र को लेकर मनुष्य की बीमारी वही थी—सिंहासन मिलते ही आदमी अपने कद को भूल जाता है और सिंहासन की ऊँचाई को अपना कद समझने लगता है।

महाराज नहुष इसका प्राचीनतम और शायद सबसे सुंदर उदाहरण हैं।
इंद्र के लुप्त हो जाने पर देवताओं ने नहुष को इंद्रपद दिया। नहुष में तेज था, तप था, पुण्य था, योग्यता थी। किंतु सत्ता की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि वह अयोग्य को योग्य नहीं बनाती—वह कई बार योग्य को भी अपने भ्रम में अयोग्य बना देती है।

नहुष को इंद्रासन मिला तो भीतर का मनुष्य धीरे-धीरे बाहर के पद में घुलने लगा। जो कभी विनम्र था, वह ऐश्वर्य का अभ्यासी हुआ। फिर अधिकार का अभ्यासी। फिर अधिकार के प्रदर्शन का। और अंततः उसे लगा कि देवताओं के ऊपर बैठने वाला व्यक्ति देवताओं से ऊपर हो गया है।
यहीं से पतन शुरू हुआ।

कहानी का सबसे मार्मिक दृश्य तब आता है जब नहुष ने सप्तर्षियों को अपनी पालकी उठाने के लिए लगा दिया। ऋषि पालकी ढो रहे थे और इंद्रासन पर बैठा हुआ नहुष अपने को विश्व का स्वामी समझ रहा था। अगस्त्य मुनि की चाल स्वाभाविक रूप से धीमी थी। नहुष अधीर हुआ।

“सर्प! सर्प!”—कहा जाता है कि उसने शीघ्र चलने के लिए प्रेरित किया।
और फिर सत्ता का व्याकरण बदल गया।
उसने अगस्त्य को पैर से स्पर्श किया। ऋषि का शाप मिला—“सर्प योनि में जाओ।”
नहुष गिरा।
जिस ऊँचाई पर वह पहुँचा था, उससे कहीं अधिक ऊँचाई से।

यह केवल एक राजा के सर्प बनने की कथा नहीं है। यह भारतीय राजनीतिक दर्शन का एक अद्भुत रूपक है।

सत्ता जब सेवा से कट जाती है, तो पहले वह अहंकार बनती है; अहंकार जब आलोचना से कट जाता है, तो उन्माद बनता है; और उन्माद जब मर्यादा से कट जाता है, तो पतन बन जाता है।

आज नहुष हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन नहुषत्व बिल्कुल जीवित है।

आज सप्तर्षियों को पालकी उठाने के लिए बुलाने की आवश्यकता नहीं। सत्ता ने तकनीक विकसित कर ली है। अब पालकी दिखाई नहीं देती; कुर्सी दिखाई देती है। ऋषि दिखाई नहीं देते; अधिकारी, कर्मचारी, समर्थक, पत्रकार, विशेषज्ञ, पार्टी कार्यकर्ता और नागरिक दिखाई देते हैं। और सबसे सुविधाजनक बात यह है कि पालकी भी अब अदृश्य है।

सत्ता में बैठे व्यक्ति को अब यह कहने की आवश्यकता नहीं पड़ती कि “मुझे उठाओ।”
व्यवस्था स्वयं उठाती है।

दरवाज़े स्वयं खुलते हैं। रास्ते स्वयं साफ होते हैं। स्वागत स्वयं होता है। कैमरे स्वयं घूमते हैं। जयकारे स्वयं उत्पन्न होते हैं। समर्थक स्वयं प्रमाणपत्र देते हैं कि जो हो रहा है, वह ऐतिहासिक है।

इतिहास भी बेचारा कई बार सोचता होगा—“मुझे कब बुलाया गया?”

सत्ता का नैतिक पतन किसी एक बड़े अपराध से नहीं होता। वह छोटी-छोटी सुविधाओं से शुरू होता है।
पहले नेता को सुरक्षा घेरे की आदत होती है।
फिर प्रशंसा की।
फिर विरोध से असुविधा होने लगती है।
फिर प्रश्न पूछने वाला शत्रु दिखाई देता है।
फिर आलोचक राष्ट्र-विरोधी, व्यवस्था-विरोधी, विकास-विरोधी या किसी अन्य सुविधाजनक श्रेणी में रख दिया जाता है।

और अंत में राजा को राजा नहीं, अवतार समझने वाले लोग चारों ओर खड़े हो जाते हैं।
यही नहुष का संकट था।

और यही किसी भी लोकतंत्र का संकट है।
लोकतंत्र में सिंहासन नहीं होना चाहिए—लेकिन कुर्सियाँ कभी-कभी सिंहासन से भी अधिक खतरनाक हो जाती हैं। क्योंकि सिंहासन पर बैठने वाला राजा जानता था कि उसके ऊपर देवता हैं, ऋषि हैं, धर्म है, लोकमत है और अंततः मृत्यु है।

आधुनिक सत्ता में समस्या यह है कि आदमी के पास पाँच साल का कार्यकाल होता है और उसके चारों ओर पाँच हजार लोग होते हैं जो उसे बताते रहते हैं कि वह अमर है।
यहाँ नहुष फिर मुस्कुराते हैं।

उन्हें याद आता है कि उन्होंने भी कभी सोचा था कि इंद्रासन स्थायी है।

सत्ता का सबसे बड़ा छल यही है कि वह अपने धारक को अस्थायित्व भूलने देती है।
कुर्सी स्थायी नहीं होती, लेकिन कुर्सी पर बैठे व्यक्ति की स्मृति बहुत जल्दी स्थायी हो जाती है।
उसे लगता है—यह सब मेरे कारण है।
वह भूल जाता है कि लोकतंत्र में जनता ने उसे नियुक्त नहीं, उधार दिया है।
जनादेश स्वामित्व-पत्र नहीं होता।
वह एक अस्थायी विश्वास है।

लेकिन जब विश्वास को अधिकार समझ लिया जाता है, तब नैतिकता धीरे-धीरे सरकारी फाइल की तरह नीचे दब जाती है।
और सत्ता पक्ष का नैतिक पतन यहीं से आरंभ होता है।

विरोधी दलों की गलतियाँ गिनाने में सत्ता जितनी दक्ष होती है, अपनी गलतियों को देखने में उतनी ही अंधी।

यह भी नहुष की ही परंपरा है।
क्योंकि अहंकार का सबसे मनोरंजक गुण यह है कि उसे आईना पसंद नहीं आता।
उसे चित्र पसंद आता है।
आईना बताता है—चेहरे पर दाग है।
चित्र बताता है—चेहरा शानदार है।
इसलिए सत्ता को आईने से अधिक चित्रकार चाहिए।

आज के चित्रकार आधुनिक हैं। वे शब्दों से चित्र बनाते हैं। आँकड़ों से बनाते हैं। प्रचार से बनाते हैं। उपलब्धियों की ऐसी माला बनाते हैं जिसमें कभी-कभी फूल कम और प्लास्टिक अधिक होता है।
पर जनता की आँखें अंततः चित्र से नहीं, जीवन से निर्णय करती हैं।
रसोई में महँगाई का दर्शन अलग होता है।
बेरोजगार युवक के कमरे में विकास की परिभाषा अलग होती है।
किसान के खेत में अर्थव्यवस्था का रंग अलग होता है।
और अस्पताल की कतार में नागरिकता का अनुभव किसी भाषण से बिल्कुल अलग।

राजनीति की विडंबना यह है कि सत्ता अक्सर राष्ट्र को नक्शे पर देखती है और जनता उसे रसोई, खेत, नौकरी, सड़क, विद्यालय और अस्पताल में देखती है।
यहीं नैतिकता और प्रचार के बीच दूरी पैदा होती है।
नहुष की कथा हमें यह नहीं बताती कि सत्ता बुरी है।
वह बताती है कि सत्ता के सामने मनुष्य की परीक्षा शुरू होती है।
योग्यता ने नहुष को ऊपर पहुँचाया था।
लेकिन चरित्र उसे वहाँ टिकाकर नहीं रख सका।
यही किसी भी सत्ता पक्ष के लिए सबसे बड़ा पाठ होना चाहिए।

किसी सरकार की सफलता केवल इस बात में नहीं है कि उसने कितनी सड़कें बनाईं, कितने भवन बनाए, कितनी योजनाएँ घोषित कीं या कितने चुनाव जीते।
उसकी वास्तविक सफलता इस बात में है कि सत्ता मिलने के बाद उसके भीतर विनम्रता कितनी बची।
क्या वह अपने आलोचक को सुन सकती है?
क्या वह अपनी भूल स्वीकार सकती है?
क्या वह अपने समर्थक को भी गलत कह सकती है?
क्या वह कानून को अपने विरोधी और अपने समर्थक के लिए समान रख सकती है?
क्या वह यह स्मरण रख सकती है कि जनता प्रजा नहीं है?
और सबसे महत्वपूर्ण—
क्या वह अगस्त्य को पैर लग जाने पर शाप से पहले क्षमा माँग सकती है?

नहुष की कथा का आधुनिक संस्करण शायद यही होगा।
एक दिन सत्ता की पालकी रुकती है।
नीचे खड़े लोग थक चुके होते हैं।
ऊपर बैठा हुआ व्यक्ति चिल्लाता है—“जल्दी चलो!”
कोई धीरे से कहता है—
“महाराज, हम थक गए हैं।”
सत्ता कहती है—
“तुम्हें समझ नहीं कि मैं कौन हूँ?”
और इतिहास बहुत धीरे से उत्तर देता है—
“हमें अच्छी तरह मालूम है। इसी लिए तो पालकी नीचे रख दी है।”
इतिहास का हास्य बड़ा निर्मम होता है।
वह किसी को तत्काल दंड नहीं देता।
वह पहले उसे ऊँचा उठाता है।
फिर उसकी स्मृति में उसका अहंकार सुरक्षित रखता है।
फिर समय बीतने देता है।
और जब लोग उस व्यक्ति का नाम लेते हैं, तो उसके महलों, भाषणों और विजय से अधिक उसकी भूल याद आती है।
नहुष इसलिए अमर नहीं हुए कि वे इंद्र बने थे।
वे इसलिए अमर हुए कि इंद्र बनकर भी मनुष्य रहना भूल गए थे।

आज के सत्ता पक्ष के लिए इससे बड़ा व्यंग्य और क्या होगा कि लोकतंत्र ने राजाओं को समाप्त कर दिया, लेकिन राजसी मानसिकता को नहीं।

राजा चला गया।
राजत्व बचा रहा।
सिंहासन चला गया।
सिंहासन-बोध बचा रहा।
और पालकी उठाने वाले सप्तर्षि अब भी कहीं न कहीं मौजूद हैं।
बस फर्क इतना है कि आज उनके हाथ में संविधान है।

और यदि कभी कोई नहुष फिर यह समझ बैठे कि संविधान उसके नीचे है, तो उसे नहुष की कथा एक बार फिर पढ़ लेनी चाहिए।
क्योंकि भारतीय परंपरा का सबसे गहरा राजनीतिक संदेश शायद यही है—
सत्ता सिर पर रखी जाने वाली वस्तु नहीं है; वह सिर झुकाने की परीक्षा है।

जो सिर झुका सकता है, वही लंबे समय तक ऊँचा रह सकता है।
और जो अपने लिए सप्तर्षियों को पालकी ढोने पर मजबूर करता है, उसके लिए इतिहास के पास एक ही पुराना शब्द है—
नहुष।

कर्ण karn

महाभारत में कर्ण नाम के एक पात्र हुए, एक नंबर के चूतिया और कुंठित. आज भी घोर चूतिया और बेईमान दोगले आदमी उनकी फर्जी कहानियों को अपना दोगलापन ढांपने के लिए हीरो बनाकर इस्तेमाल करते हैं. कर्ण कुमार को हमारे रूस पोषित वामपंथियों ने सिर्फ इसलिए ऊपर उठाया कि हमारा जो सबसे बड़ा हीरो था अर्जुन उसके जीवन से कोई प्रेरणा लेने को न सोचे. अर्जुन भगवान नहीं है, वो राम कृष्ण और परशुराम नहीं है, वो इंसान है, साधारण इंसान जिसने अपने जीवन में पराक्रम, सदाचरण और त्याग के उच्च आदर्श प्रस्तुत किए, और महाभारत जैसा युद्ध जीतकर धर्म की स्थापना की.

अब सोचिए कर्ण क्या था, दुर्योधन का गुर्गा, जैसे फिल्मों में खलनायक अमरीश पुरी का गुर्गा होता था वैसे. बॉस के लिए लड़की उठाने तक को तैयार रहता था अगला. लेकिन आधुनिक काल में कर्ण का क्या महिमामंडन हुआ है. एकदम टॉप क्लास. समझ से बाहर एकदम. एक फिल्म आई थी कल्कि, उसमें भी वही कहानी. कर्ण बड़े योद्धा थे अर्जुन से.

एक हुए राष्ट्र कवि रामधारी सिंह दिनकर जी, सर जी ने अपने जीवन में दो ही आदमी को महान माना, एक जवाहर लाल नेहरू और दूसरा कर्ण. दिनकर जी की एक कृति है लोकदेव नेहरू, और एक कृति है रश्मिरथी. उनकी और भी बहुत सारी उत्कृष्ट कृतियां हैं, जैसे उर्वशी जिसमें एक पंक्ति आती है कि मर्त्य मानव की विजय का तूर्य हूं मैं, उर्वशी अपने समय का सूर्य हूं मैं. ऐसी पंक्ति जिसकी तुलना आपको विश्व साहित्य में बहुत मुश्किल से मिलेगी. जैसे शेन वॉर्न की मैजिक बॉल, जिसपर उन्होंने माइक गेटिंग को आउट किया था. ऐसे में उनके साहित्य वांग्मय में ये दो नाम अलग से चमकते हैं. क्योंकि गले से नीचे नहीं उतरते. नेहरू और कर्ण.

महाभारत में एक उद्धरण है जब भगवान कृष्ण कर्ण के रोने पीटने से ऊबकर उसे बहुत सही से ज्ञान देते हैं, कि तुम क्या हर समय रोते पीटते रहते हो, क्या कष्ट और अपमान तुमने ही सहे हैं, कभी मेरे जीवन के बारे में सोचना.

अर्जुन को कभी राजा नहीं बनना था, युधिष्ठिर के बाद युवराज भी भीमसेन थे. अर्जुन केवल योद्धा था. उसकी कोई महत्वकांक्षा नहीं थी, लेकिन प्रकृति सर्वश्रेष्ठ जीन का चुनाव करती है, इसलिए अर्जुन के वंश का परीक्षित ही राजा बना. महाभारत की पूरी कहानी में वर्णित कोई भी महायोद्धा अर्जुन से नहीं जीत पाता है. एक प्रसंग में अर्जुन किरात वेश धारी महादेव के आगे नतमस्तक होते हैं, और उनको प्रसन्न करके पाशुपतास्त्र प्राप्त करते हैं. एक प्रसंग है जब अर्जुन द्रोणाचार्य जब चक्रव्यूह की रचना करते हैं, तब उनका सारा खेल इसपर आधारित होता है, कि अर्जुन को युद्ध भूमि से दूर कर दो, तभी मैं युधिष्ठिर को बंदी बना पाऊंगा. 

वहीं कर्ण विराट युद्ध में अर्जुन से हारते हैं, महाभारत के चौदहवें दिन भीमसेन से पराजित होते हैं, अभिमन्यु से अकेले पार नहीं पा पाते, और वो उनके सारे बाण और धनुष काट देता है, सात्यकि कई मौकों पर कर्ण पर भारी पड़ते हैं, गंधर्वराज चित्रसेन कर्ण को पराजित करके भगा देते हैं और दुर्योधन को बंदी बना लेते हैं, यहां तक कि भगवान कृष्ण के पुत्र प्रद्युम्न ने भी कर्ण को हरा कर बंदी बना लिया था. आखिर में कर्ण अर्जुन के हाथों मारे जाते हैं, जहां वो हथियार छोड़कर रथ का पहिया निकालने का बहाना कर रहे होते हैं. 
 
भगवान कृष्ण ने गीता का उपदेश देने को अर्जुन को ही चुना, जैसे महादेव ने माता पार्वती को अमरता का उपदेश दिया. इसलिए नहीं कि वो उनकी भार्या थीं, माता को कड़ी तपस्या और सौ जन्मों की साधना से गुजरना पड़ा.

राम पर, कृष्ण पर, अर्जुन पर इसलिए प्रहार होते रहे हैं, ताकि हमारे नौजवानों के दिमाग में नपुंसकता की खेती की जा सके. अर्जुन और कर्ण के युद्ध की केवल एक तस्वीर दिखाई जाती है, जिसमें अर्जुन पहिया निकालते कर्ण पर बाण तान रहे हैं. कर्ण जैसों का महिमामंडन इसलिए किया गया कि युवा पीढ़ी में दास्य भाव उत्पन्न हो, आदमी अवलंबन में ही स्वयं की उन्नति समझे. तर्क दिया जाता है कि मित्र हो तो कर्ण जैसा, अरे वो मित्र नहीं चमचा था, नौकर था, दलाल था दुर्योधन का. कर्ण को गाली देने के लिए द्यूत भवन में द्रौपदी को बोले गए अपशब्द ही पर्याप्त कारण हैं, बाकी जीवन में भी वो सारा समय दुर्योधन का मैला उठाता रहा. महर्षि व्यास ने पूरे महाभारत में कहीं भी नहीं लिखा है कि कर्ण अर्जुन के टक्कर का योद्धा भी था, कर्ण का महिमामंडन केवल वामपंथी प्रोपोगंडा है.

यह नाम कहीं से भी प्रेरणा नहीं देता, उल्टा मन में जुगुप्सा और जगाता है. अर्जुन ही भारत के इतिहास में सबसे बड़े नायक हैं जिनसे नौजवान प्रेरणा ले सकते हैं.

मनुस्मृति में महिलाये ओर डायन

उन्होंने अपने रिलिजीयस बुक को खोला। वहां एक आदेश था - :- "तुम जादूगरनी को जीवित नहीं रहने दोगे"

अपने बुक के इस एक आदेश का पालन करते हुए तकरीबन पांच शताब्दियों के अंदर केवल यूरोप में उन लोगों ने 90 लाख महिलाओं को चुड़ैल और डायन बताकर उनकी निर्मम हत्या कर दी।

उनके रिलीजियस लीडर्स ने 1486 में अपने अनुयाइयों के लिए एक किताब छपवाई, जिसका नाम था :-

The Malleus Maleficarum (The Witch Hammer)

ये वो किताब थी, जिसको मानव इतिहास के सबसे निर्मम और सबसे अधिक कत्लेआम की किताब माना जाता है। इस किताब में उन्होंने दुनिया भर में फैले अपने प्रतिनिधियों को निर्देश दिए कि डायनें और जादूगरनियाँ धरती पर शैतान की प्रतिनिधि हैं, इसलिए जादू-टोना करने वाली हर स्त्री को चुन-चुन कर जिन्दा जला दिया जाए।

जहाँ-जहाँ उनका रिलीजन पहुँचा, वहां के लोगों की मूल पूजा-विधि को उन्होंने डायन विधा और शैतानी अनुष्ठान घोषित कर दिया और उनकी नृशंस हत्या करवा दी।

रोचक ये कि किताब The Malleus Maleficarum के जो मुख्य भूमिकाकार थे, उनके नाम में "इनोसेंट" लगा था🙂

उनकी तरफ से दुनिया भर में ऐसे प्रचारक भेजे गए जिनका दावा था कि वो डायनों को देखतें ही पहचान सकतें हैं। डायनों को खोजने वाले इन एक्सपर्ट्स को "विच फाइंडर" कहा जाता था जिसमें सबसे बड़ा नाम है - इंग्लैंड के मैथ्यू हॉपकिन्स का जिसने अकेले सन 1645 से 1647 के बीच हज़ारों महिलाओं को डायन घोषित किया और जो महिला डायन होने के आरोप से इनकार करती थी, हॉपकिन्स उस पर तब तक जुल्म करता था जब तक वो डायन होना स्वीकार न ले और जब एक बार उसने स्वीकार कर लिया फिर उसे जिन्दा जला दिया जाता था।

अत्याचार की ये करुण कथा केवल मध्य युग की ही नहीं है. फ्रांस की महान देशभक्त महिला जॉन आफ आर्क (जिनके वीरता की कहानी हमने बचपन में पढ़ी थी और जो फ़्रांस-इंग्लैंड युद्ध की नायिका थी) को भी इन लोगों ने नहीं छोड़ा। उसे विधर्मी और 'चुडै़ल' घोषित कर देकर पूर्वी फ्रांस के बुरगुंडी शहर के राउन बाजार में जिंदा जला दिया गया।

अत्याचार की भीषण कहानी यही ख़त्म नहीं हुई, 1944 में इंग्लैंड में हेलेन डंकल नाम की एक महिला को 'डायन' होने के आरोप में गिरफ्तार कर उन पर मुकदमा चलाया गया।

आज किसी ने मनुस्मृति में महिलाओं के बारे पर कुछ झूठी बात की तो ये सब याद आ गया 


#मनु_और_उनकी_स्मृति 

मनुस्मृति कोई आज उनके निशाने पर नहीं आई। ये बहुत पहले से चल रहा है।

देश में अंग्रजों के आने के बाद भारत तोड़ने के जो सूत्रधार बने उनके निशाने पर सबसे अधिक महर्षि मनु और “मनुस्मृति” आई। मनु को गालियाँ दी गई, मनुस्मृति जलाए गए, ब्राह्मणों को "मनुवादी" कहकर कोसा गया।

आपने कभी सोचा है कि मनु उनके हमलों का शिकार क्यों बने, मनुस्मृति ही क्यों जलाई गई जबकि हिन्दू समाज के अंदर मनुस्मृति के अलावा आज सौ से अधिक स्मृतियाँ यथा याज्ञवल्क्य, अत्रि, बिष्णु, हारीत, औशनस, अंगिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, वृहस्पति, बिष्णु, पराशर, व्यास, शंख, देवल, लिखित, गौतम, शातातप, वशिष्ठ, प्रजापति मौजूद हैं?

इसकी वजह ये है कि घरवापसी, स्वदेशी और आत्मबोध के मन्त्र-प्रणेता महर्षि दयानंद सरस्वती ने अपने ग्रन्थ “सत्यार्थ प्रकाश” में “मनुस्मृति” को ही मूल आधार बनाया। अस्पृश्यता का निवारण हो, समाज में न्याय का प्रतिपादन हो, नारी सम्मान की बात हो, राष्ट्र के गौरव की स्थापना हो, दूसरे मतों का खंडन हो सबके सूत्र महर्षि ने मनुस्मृति से ही निकाले और यही मनुस्मृति से इनके चिढ़ने का मूल कारण है। 

अब तक बचाव के मुद्रा में रहने वाले हिन्दू समाज को महर्षि दयानंद ने मनुस्मृति को आधार बनाकर बौद्धिक हमलावर बना दिया और उन्होंने विभिन्न मतों और मजहबों के मूल पर ही चोट कर दी तो इनकी कुंठा स्वाभाविक थी। इसके अलावा मनु से इनकी पीड़ा इसलिए भी है, मनु इनको इसलिए भी बर्दाश्त नहीं हैं कि क्योंकि :-

💐 धर्म के दस लक्षणों का प्रतिपादन मनु महाराज ने ही किया था, जिसे धारण करने से एक सभ्य व सुसंकृत समाज बनता है, पर इन उदंडों को तो उच्छृंखल समाज चाहिए तो मनुस्मृति के रहते संभव नहीं है।

💐 मनु ने अपने ग्रन्थ में भारत की महिमा गाते हुए कहा है कि इस देश में उत्पन्न हुए ब्राहमण के समीप पृथ्वी के समस्त मानव अपने-अपने चरित्र की शिक्षा ग्रहण करें. भारत की महिमा का गायन भारत तोड़ने वाले कैसे सह सकते हैं, तो जाहिर है मनु को खलनायक बनाये बिना ये संभव नहीं है।

💐 मनु की शिक्षाओं में परिवार प्रबोधन के सूत्र, गुरुओं के सम्मान के निर्देश मिलते हैं, जो इन्हें बर्दाश्त नहीं हैं क्योंकि इनके लिए तो लंपट समाज ही आधुनिकता का पर्याय है; जबकि मनु कहते हैं कि माता की भक्ति से मनुष्य इस लोक को, पिता की भक्ति से मध्यलोक को और गुरु की भक्ति से ब्रह्मलोक को जीत लेता है। मनुष्य की उत्पत्ति के समय जो क्लेश माता-पिता सहते हैं, उसका बदला सौ वर्षों में भी उनकी सेवादि करके भी नहीं चुकाया जा सकता।

💐 मनु स्त्रियों की पूजा वाले घर को देवताओं का वास स्थान कहते हैं, तो ये तो इनको पचेगा क्योंकि फिर इनके "नारीवाद" की विकृत परिभाषाओं का क्या होगा।

💐 मनु ने सदाचार की महिमा गाई, चरित्र उज्जवल रखने का आदेश दिया तो जाहिर है जैसा यौन-कुंठित समाज ये हिन्दू अतीत को दिखाना चाहते हैं वो ये सिद्ध नहीं कर पायेंगे।

अगर किसी को इस बात से ही जिद हो कि स्मृति ग्रंथों को ही मानना हिन्दू समाज की मूल प्रवृति है तो इसके लिए उसे पराशर स्मृति के प्रणेता महर्षि पराशर के आदेश को देखना चाहिये, वो कहते हैं:- 

कृते तु मानवो धर्मस्त्रेतायां गौतम: स्मृत:
द्वापरे शंखलिखित: कलौ पाराशरः स्मृत:
क्योंकि मनु सदा सत्य बोलने के लिए निर्देशित करते हैं, 
क्योंकि मनु सदाचार के पालन हेतु निर्दिष्ट करते हैं।

Friday, 21 August 2026

रश्मिरथी :दिनकर की झूठी तथ्यहीन रचना कर्ण

#रश्मिरथी : #दिनकर  की झूठी तथ्यहीन रचना 

#कर्ण का नाम सुनते ही, मुझे बचपन के डीडी नेशनल पर कर्ण पर दिखाए गए धरावाहिक की स्मृतियां मस्तिष्क में घूमने लगती हैं।। और लगता है कि अहो! देखो उसके साथ कितना अत्याचार हुआ है। वह कितना महान था, कितना बड़ा दानी था, लेकिन पाण्डवों ने उसके साथ कितना अनुचित व्यवहार किया। ऐसा ही कुछ #B_R_Chopra के माहाभारत से प्रकट होता है। कैसे उस निहत्थे कर्ण को अर्जुन ने मार दिया। गुरु #द्रोणाचार्य ने उसको शिक्षा नहीं दी। कर्ण शोषित, वंचित है। ऐसा लगता है मानो उसका जन्म ही इसलिए हुआ था ताकि सब लोग मिलकर उसका शोषण कर सकें।

जबकि तथ्य यह है कि उस जैसा अधमी दुराचारी षड्यन्त्रकारी खोजने पर भी नहीं मिलता है। कर्ण के प्रति मन में जो सहानुभूति उत्तपन्न होती है।  कर्ण को पीड़ित के रूप स्थापित करना एवम उसको इसाईयों के दलित शब्द से जोड़कर प्रस्तुत करना, एक सुनियोजित षडयंत्र है। इसमें भारत के हिंदी के राष्ट्रवादी कवि कहे जाने वाले दिनकर सुविख्यात हैं। इनके साथ साथ #शिवाजी_सावंत द्वारा लिखित मृत्युञ्ज भी कर्ण के गुणगाण के लिए जाना जाता है। 

इसके पहले की कर्ण पर दिनकर की रश्मिरथी की तथ्यात्मक विवेचना की जाए, आप यह प्रश्न आवश्य विचार कीजिएगा की जब कोई कवि, जिसकी प्रस्तावना देश के प्रधानमंत्री #नेहरू करते हो, यदि वह तथ्यहीन मनगढ़ंत बातें प्रचारित करता हो, तो उसका कुछ न कुछ  तो उद्देश्य होगा ही। अब क्या होगा आप सब विचार कीजिएगा।

प्रस्तुत है हिन्दी लेखक प्रताप नारायण सिंह द्वारा संयोजित, समाजिक झूठी समरसता पर लिखी रश्मिरथी की तथ्यात्मक विवेचना: 

--------------

◆रश्मिरथी -प्रथम सर्ग

ज्ञान-ध्यान, शस्त्रास्त्र, शास्त्र का कर सम्यक् अभ्यास, अपने गुण का किया कर्ण ने आप स्वयं सुविकास। निज समाधि में निरत, सदा निज कर्मठता में चूर, वन्यकुसुम-सा खिला कर्ण, जग की आँखों से दूर।

खंडकाव्य का आरम्भ ही महाझूठ से होता है, इन पंक्तियों को पढ़कर यही लगता है कि बेचारा कर्ण स्वयं ही शस्त्राभ्यास करके धनुर्विद्या में पारंगत हुआ। कविवर आगे लिखते हैं कि द्रौणाचार्य कर्ण को अपना शिष्य न बनाने का ठानते हैं -

सोच रहा हूँ क्या उपाय, मैं इसके साथ करूँगा, इस प्रचंडतम धूमकेतु का कैसे तेज हरूँगा? शिष्य बनाऊँगा न कर्ण को, यह निश्चित है बात; रखना ध्यान विकट प्रतिभट का, पर तू भी हे तात!'

किन्तु तथ्य क्या है वह #वेदव्यास के महाभारत में देखिए:  

#आदिपर्व - एकत्रिंशदधिकशततमोध्याय- श्लोक संख्या- ११&१२ - वृष्णिवंशी तथा अंधकवंशी क्षत्रिय, नाना देशों के राजकुमार तथा राधानंदन कर्ण -ये सभी आचार्य द्रोण के पास शिक्षा प्राप्त करने आये। कर्ण सदा अर्जुन से लाग-डाँट रखता और अत्यंत अमर्ष में भरकर दुर्योधन का सहारा ले पाण्डवों का अपमान करता था। ( यह आश्रम में शिक्षा ग्रहण करते समय का उल्लेख है। )  

#वन_पर्व - अध्याय ३०९-श्लोक १६-१८- - अधिरथ सूत ने अपने पुत्र को बड़ा होते देखकर उसे हस्तिनापुर भेज दिया। वहाँ उसने धनुर्वेद की शिक्षा लेने के लिए आचार्य द्रोण की शिष्यता स्वीकार की।  वह द्रोणाचार्य, #कृपाचार्य और #परशुराम से चारों प्रकार की अस्त्र विद्या सीखकर एक बड़ा धनुर्धर बना। 

इतने बड़े झूठ के आधार पर इस खंडकाव्य को लिखा गया है। इसे मूल रचना का चीरहरण नहीं तो और क्या कहेंगे? दिनकर ने वेदव्यास की बात ही पलट दी। पात्रों के चरित्र ही बदल दिए। कर्ण के अतिरिक्त  सभी को कुटिल दिखा दिया। और यही बात आज पूरे जन मानस में फैली है कि द्रोण ने कर्ण को शिक्षा नहीं दी। 
-------------------

◆ रश्मिरथी -प्रथम सर्ग - 

द्वन्द्व-युद्ध के लिए पार्थ को फिर उसने ललकारा, #अर्जुन को चुप ही रहने का गुरु ने किया इशारा। इसे कहते हैं सफेद झूठ।  'अर्जुन बङ़ा वीर क्षत्रिय है, तो आगे वह आवे, क्षत्रियत्व का तेज जरा मुझको भी तो दिखलावे। 

वेदव्यास क्या लिखते हैं - आदि पर्व -संभवपर्व-श्लोक २१ - 

"ततो द्रोणाभ्यनुज्ञातः पार्थः परपुरंजयः। भ्रातृभिस्त्वरया $$श्लिष्टो रणायोपाजगाम तम ।" तदनन्तर, शत्रुओं के नगर को जीतने वाले कुंतीनंदन अर्जुन आचार्य  द्रोणाचार्य की आज्ञा ले तुरंत अपने भाइयों से गले मिलकर युद्ध के लिए कर्ण की ओर  बढ़े।

यही योद्धा जो रश्मिरथी के प्रथम सर्ग में हुंकार भरता है और जिसके शौर्य का महिमामंडन दिनकर जी रश्मिरथी के सात सर्गों  में भूरि -भूरि  करते हैं। वह अगली बार जब अर्जुन के सम्मुख आता है तो क्या होता है?  

स्वयंवर पर्व- श्लोक ३० - अर्जुन से कर्ण के डर जाने पर सभी राजा युद्ध का विचार छोड़कर भीम के चारों और खड़े हो जाते हैं।  

इतना ही नहीं दिनकर जी का यह गरजने वाला महारथी वेदव्यास के #महाभारत में १४ बार पराजित होता है : 

द्रुपद से एक बार - (आदि पर्व /१३७ )- द्रुपद को बंदी बनाने गया था। अर्जुन से पाँच बार - क ) द्रौपदी स्वयंवर (आदि पर्व /१८९ ), ख ) विराट युद्ध (विराट पर्व / ६० ) , ग) कुरुक्षेत्र (द्रोण पर्व / १५९ ) , घ) कुरुक्षेत्र (द्रोण पर्व/145) ङ ) कुरुक्षेत्र (कर्ण पर्व / ९१ )। गंधर्व चित्रसेन से एक बार- (वन पर्व /२४१)। भीमसेन से चार बार (द्रोण पर्व /१२९, १३१, १३४,१३६, कर्ण पर्व / ५०)। युधिष्ठिर से एक बार ( (कर्ण पर्व /४९ )। अभिमन्यु से एक बार (द्रोण पर्व /४० )। अर्जुन के शिष्य सात्यकि से एक बार (द्रोण पर्व /१४७ )किन्तु दिनकर ने इस तरह से अपने खंडकाव्य में दिखाया है जैसे कि वह एक अजेय योद्धा था। 
--------------------------
◆ रश्मिरथी -सर्ग ३

कर्ण के द्वारा #दुर्योधन का साथ देने की बात पर दिनकर ने भगवान से भी प्रशंसा करवा दिया ( यहाँ भी महाभारत का चीरहरण कर डाला ) -- 

"वीर शत बार धन्य,तुझसा न मित्र कोई अनन्य, तू कुरूपति का ही नही प्राण,नरता का है भूषण महान." हरि के सम्मुख भी न हार जिसकी निष्ठा ने मानी, धन्य धन्य राधेय! बंधुता के अद्भुत अभिमानी।

जबकि कर्ण के हठ पर वेदव्यास लिखते हैं - द्विचत्वारिंशदधिकशततमोघ्याय- श्लोक १- ७ --

"कर्ण की बात सुनकर भगवान ठठाकर हँस पड़े और बोले- कर्ण !  मैं जो राज्य प्राप्ति का उपाय बता रहा हूँ, लगता है वह तुम्हे ग्राह्य नहीं है।  पाण्डवों की विजय अवश्यम्भावी है। इस विषय में कोई संशय नहीं है| कर्ण ! युद्ध में जब मुझको सारथी बनाकर आए हुए अर्जुन को तुम ऐन्द्र, आग्नेय तथा वायव्य अस्त्र प्रकट करते देखोगे और जब गांडीव की वज्र-गर्जना के समान भयंकर टंकार तुम्हारे कानों में पड़ेगी, उस समय तुम्हें सतयुग, त्रेता और द्वापर की प्रतीति नहीं होगी बल्कि मात्र भयंकर कलि ही दृष्टिगोचर होगा।   

दिनकर ने कर्ण के महिमामंडन में लिखा - "नरता का है भूषण महान" - किसी की पत्नी को बलपूर्वक छीनने का प्रयत्न करना, किसी स्त्री को सभा में निर्वस्त्र करना, किसी को छल से विष देकर मारना, किसी को छल से जलाकर मारने का प्रयत्न करना - क्या यह सब मनुजता और उच्च चरित्र की परिभाषा है?

वेदव्यास ने क्या लिखा है - विदुरागमनराज्यलंभपर्व-श्लोक-२९- दुर्योधन, कर्ण,  शकुनि -ये अधर्मपरायण,  खोटी बुद्धि वाले और मूर्ख हैं। 

जहाँ तक मित्रता निभाने की बात है तो, देखिये जब जब #दुर्योधन को आवश्यकता पड़ी है तब तब कर्ण ने क्या किया है - आदि पर्व में -दुर्योधन जब द्रुपद के ऊपर आक्रमण करता है तब कर्ण बाणों से बिद्ध होकर भाग आता है| 
वन पर्व में -  जब दुर्योधन को गंधर्व बाँधकर ले जाते हैं तब कर्ण जान बचाकर भाग जाता है|  
विराट पर्व - जब दुर्योधन विराटनगर पर आक्रमण करता है , तब कर्ण व्यूह का मुहाना छोड़कर भाग जाता है|  
भीष्म  पर्व - जब कुरुक्षेत्र का युद्ध शुरू होता है तब अपने अहंकार के कारण पहले दस दिनों तक युद्ध भूमि में नहीं उतरता है। 

यह कौन सी मित्रता थी? किस मित्रता की दुहाई दी जाती है। हाँ, अंत में सेनापति बनता है और मारा जाता है। उससे तो बच भी नहीं सकता था। 
---------------------------

◆ रश्मिरथी - सर्ग ४ -

कवि दिनकर ने कर्ण से कवच कुण्डल दान में दिलवा दिया और खूब महिमा मंडन किया: 

'भुज को छोड़ न मुझे सहारा किसी और सम्बल का, बड़ा भरोसा था, लेकिन, इस कवच और कुण्डल का, पर, उनसे भी आज दूर सम्बन्ध किये लेता हूँ, देवराज! लीजिए खुशी से महादान देता हूँ."

लेकिन वेदव्यास ने  महाभारत में क्या यह लिखा है --(वनपर्व - अध्याय ३१० - श्लोक संख्या १७ से २६ )- कर्ण ने सूर्य की आज्ञा को याद करके कहा- शक्र! आप कुछ बदला देकर इच्छानुसार मेरे कुण्डल और उत्तम कवच ले जाइये; अन्यथा मैं इन्हे नहीं दे सकता’। #इन्द्र बोले- कर्ण जब मैं तुम्हारे पास आ रहा था, उसके पहले ही सूर्यदेव को यह बात मालूम हो गयी थी। इसमें संदेह नहीं कि उन्होंने ही तुमसे सारी बातें बता दी हैं। तात कर्ण! तुम्हारी रुचि के अनुसार इन वस्तुओं का परिवर्तन ही हो जाये। मेरे वज्र को छोड़कर तुम जो चाहो, वही आयुध मुझसे माँग लो। वैशम्पायन जी कहते हैं- जनमेजय! तब कर्ण अत्यन्त प्रसन्न होकर देवराज इन्द्र के पास गया और सफल मनोरथ होकर उसने उनकी अमोघ शक्ति माँगी। कर्ण बोला- 'वासव! मेरे कवच और कुण्डल लेकर आप मुझे अपनी वह अमोघ शक्ति प्रदान कीजिये, जो सेना के अग्रभाग में शत्रुसमुदाय का संहार करने वाली है।'राजन तब इन्द्र ने शक्ति के विषय में दो घड़ी तक मन-ही-मन विचार करके कर्ण से इस प्रकार कहा- ‘कर्ण! तुम मुझे अपने दोनों कुण्डल और सहज कवच दे दो और मेरी यह शक्ति ग्रहण कर लो। इसी शर्त के अनुसार हम लोगों में इन वस्तुओं का विनिमय (बदला) हो जाये। कर्ण बोला- देवेन्द्र! मैं महासमर में अपने एक ही शत्रु को मारना चाहता हूँ, जो बहुत गर्जना करने वाला और प्रतापी है तथा जिससे मुझे हमेशा भय बना रहता है।  

इस तरह यह एक शुद्ध विनिमय था, दान नहीं।  

दूसरी सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि कवच-कुण्डल पूरे महाभारत में अप्रासंगिक रहता है। मात्र कुरुक्षेत्र के युद्ध के पहले प्रासंगिक हो जाता है। जब कर्ण #द्रुपद से हारता है तब वह कवच कुण्डल धारण किये रहता है, जब अर्जुन से द्रौपदी स्वयंवर के समय हारता है तब भी कवच कुण्डल धारण किये हुआ था। जब गंधर्वों से जान बचाकर भागता है तब भी कवच कुण्डल धारन किए हुए था। प्रश्न यह है कि उस समय कवच कुण्डल ने काम क्यों नहीं किया?  

कर्ण के दान के विषय में वन पर्व में वेदव्यास ने लिखा है - जब गन्धर्व कर्ण को हराकर दुर्योधन को बाँध ले जाते हैं और फिर अर्जुन उसे छुड़ाते हैं तो दुर्योधन का विश्वास कर्ण पर से उठ जाता है।  दुर्योधन को दुबारा विश्वास दिलाने के लिए कर्ण प्रतिज्ञा करता है- जब तक मैं अर्जुन को मार नहीं लेता तब तक न तो मैं  किसी से पैर धुलवाऊँगा और न ही किसी के कुछ माँगने पर मना करूँगा। --तो यह था कर्ण के दान के पीछे का सत्य। रश्मिरथी में जिस तरह से दानवीर दिखाया गया है वैसा महाभारत में कहीं नहीं है।  
-------------------------

◆  रश्मिरथी-सर्ग-६ -

इन पंक्तियों में तो दिनकर की पांडवों के प्रति घृणा चरमोत्कर्ष पर है -

अर्जुन-कुमार की कथा, किन्तु, अब तक भी हृदय हिलाती है, सभ्यता नाम लेकर उसका अब भी रोती, पछताती है। 
पर, हाय, युद्ध अन्तक-स्वरूप, अन्तक-सा ही दारूण कठोर देखता नहीं ज्यायान्-युवा, देखता नहीं बालक-किशोर।

यहाँ भी तथ्य को किस तरह से कर्ण के पक्ष में मोड़ा है ! दिनकर बाबा ! #अभिमन्यु के नाम  पर सभ्यता इसलिए नहीं रोती है कि वह बालक था। वह बालक था ही नहीं। सत्रह-अठारह वर्ष का क्षत्रिय बालक नहीं होत है वह एक महायोद्धा था। सभ्यता रोती इसलिए है कि सात महारथियों ने मिलकर युद्ध के सारे नियमों को ताक पर रखकर मारा था। उसमें आपके काव्य का महानायक भी था। जिसमें  अकेले उस योद्धा का सामना करने की शक्ति नहीं थी। एक बार सामने आया तो परास्त होकर भाग गया था।    

‘‘है कहाँ पार्थ ? है कहाँ पार्थ ?’’ राधेय गरजता था क्षण-क्षण।
‘‘करता क्यों नही प्रकट होकर, अपने कराल प्रतिभट से रण ?
क्या इन्हीं मूलियों से मेरी रणकला निबट रह जायेगी ?
या किसी वीर पर भी अपना, वह चमत्कार दिखलायेगी ?

इन पंक्तियों को पढ़कर हँसी आती है | चमत्कार दिखाने के चक्कर में सब से तो हार चुका था। हालाँकि एक अध्याय में महाभारत में लिखा है कि कर्ण लोगों से पार्थ का पता  पूछता है। लेकिन यह नहीं समझ में आता कि पार्थ कहीं छुपे तो थे नहीं, उसी युद्ध भूमि में शत्रुओं का संहार कर रहे थे। फिर ऐसा क्योंं लिखा है, यह समझ से परे है। 

बहरहाल,  पार्थ के अतिरिक्त अन्य लोगोंंसे भी कर्ण कुरुक्षेत्र में कई बार परिजित हुआ और अपनी जान बचाकर भागा। जैसे अर्जुन से तीन बार  हार -  कुरुक्षेत्र (द्रोण पर्व / १५९ ), घ) कुरुक्षेत्र (द्रोण पर्व/145) ङ ) कुरुक्षेत्र (कर्ण पर्व / ९१ )। भीमसेन से चार बार हार  (द्रोण पर्व /१२९, १३१, १३४,१३६, कर्ण पर्व / ५० )। युधिष्ठिर से एक बार हार ( (कर्ण पर्व /४९ )। अभिमन्यु से एक बार हार  (द्रोण पर्व /४० )।  अर्जुन के शिष्य सात्यकि से एक बार हार  (द्रोण पर्व /१४७ )  

दिनकर ने यह नहीं लिखा कि कितनी बार कर्ण  भयाक्रांत  हुआ था जैसे: 

★#द्रौपदी स्वयंवर के बाद अर्जुन-कर्ण का पहला युद्ध आदि पर्व /१८९ -कर्ण थककर अर्जुन से कहता है - "आप मूर्तिमान् धनुर्वेद हैं? या परशुराम! अथवा आप स्‍वयं इन्‍द्र या अपनी महिमा से कभी च्‍युत न होने वाले साक्षात् भगवान् विष्णु हैं? मैं समझता हूं, आप इन्‍हीं में से कोई हैं और अपने स्‍वरुप को छिपाने के लिये यह ब्राह्मणवेष धारण करके बाहुबल का आश्रय ले मेरे साथ युद्ध कर रहे हैं।" यह कहकर वह युद्ध से हट जाता है।

★  विराट युद्ध (विराट पर्व / ६०)तत्पश्चात् पराक्रमी कुन्ती कुमार ने महान् तेजस्वी तथा अग्नि के समान प्रज्वलित दूसरे बाण द्वारा कर्ण की छाती में आघात किया। वह बाण कर्ण का कवच काटकर उसके वक्षःस्थल के भीतर घुस गया। इससे कर्ण को मूर्च्छा आ गयी और उसे किसी भी बात की सुध न रही। कर्ण को उस चोट से बड़ी भारी वेदना हुई और वह युद्ध भूमि को छोड़कर उत्तर दिशा की ओर भागा।

★ कुरुक्षेत्र - (कर्ण पर्व /५० -भीमसेन ने धनुष को जोर-जोर से कान तक खींचकर कर्ण को मार डालने की इच्छा से उस बाण को क्रोध पूर्वक छोड़ दिया। बलवान भीमसेन के हाथ से छूटकर वज्र और विद्युत के समान शब्द करने वाले उस बाण ने रणभूमि में कर्ण को चीर डाला, मानो वज्र के वेग ने पर्वत को विदीर्ण कर दिया हो। कुरुश्रेष्ठ! भीमसेन की गहरी चोट खाकर सेनापति सूतपुत्र कर्ण अचेत हो रथ की बैठक में धम्म से बैठ गया। उसका सारा शरीर रक्त से सिंच गया। शत्रुओं का दमन करने वाला वह वीर प्राणहीन सा हो गया था। इसी समय भीमसेन को कर्ण की जीभ काटने के लिये आते देख मद्रराज शल्य ने उन्हें सान्वना देते हुए इस प्रकार कहा- शल्य बोले- महाबाहु भीमसेन! मैं तुमसे जो युक्ति युक्त वचन कह रहा हूं, उसे सुनो और सुनकर उसका पालन करो। अर्जुन ने पराक्रमी कर्ण के वध की प्रतिज्ञा की है। तुम्हारा कल्याण हो। तुम सव्यसाची अर्जुन के उस प्रतिज्ञा को सफल करो।

★ कुरुक्षेत्र - (कर्ण पर्व /८४ ) -महाराज! जैसे प्रजावर्ग पर यमराज का बल काम करता है, उसी प्रकार भीमसेन का वह पराक्रम देखकर कर्ण के मन में महान भय समा गया। युद्ध में शोभा पाने वाले शल्य कर्ण की आकृति देखकर ही उसके मन का भाव समझ गये; अतः शत्रुदमन कर्ण से यह समयोचित वचन बोले- राधानन्दन! तुम खेद न करो तुम्हें यह शोभा नहीं देता है।   

--------------
◆ रश्मिरथी -सर्ग ७ - 

राधेय जरा हंसकर बोला, ''रे कुटिल! बात क्या कहता है ? जय का समस्त साधन नर की अपनी बांहों में रहता है| जा भाग, मनुज का सहज शत्रु, मित्रता न मेरी पा सकता , मैं किसी हेतु भी यह कलंक अपने पर नहीं लगा सकता।

अश्वसेन को कर्ण भगा देता है। इस बात के लिए खूब महिमा मंडन किया है। किन्तु दिनकर इस बात को छिपा जाते हैं कि वह अश्वसेन को दूसरी बार भगाता है। एक बार तो अश्वसेन, कर्ण की बाण पर बैठकर चला ही जाता है।

वेदव्यास ने क्या लिखा है - कर्ण पर्व -नवतितमोघ्याय-श्लोक-४३-४८ -

कर्ण के हाथों से छूटा वह अग्नि और सूर्य के समान तेजस्वी, बहुमूल्य बाण, जो वास्तव में अर्जुन के साथ वैर रखने वाला महानाग था, उनके किरीट पर आघात करके पुनः कर्ण के तरकस में घुसना ही चाहता था कि कर्ण की दृष्टि उस पर पड़ गयी। तब उसने कर्ण से कहा- कर्ण! तुमने अच्छी तरह सोच-विचारकर मुझे नहीं छोड़ा था; इसीलिये मैं अर्जुन के मस्तक का अपहरण न कर सका। अब पुनः सोच-समझकर, ठीक से निशाना साधकर रणभूमि में शीघ्र ही मुझे छोड़ो, तब मैं अपने और तुम्हारे उस शत्रु का वध कर डालूँगा। युद्धस्थल में उस नाग के ऐसा कहने पर सूतपुत्र कर्ण ने उससे पूछा- पहले यह तो बताओ कि ऐसा भयानक रूप धारण करने वाले तुम हो कौन? तब नाग ने कहा- अर्जुन ने मेरा अपराध किया है। मेरी माता का उनके द्वारा वध होने के कारण मेरा उनसे वैर हो गया है। तुम मुझे नाग समझो। यदि साक्षात वज्रधारी इन्द्र भी अर्जुन की रक्षा के लिये आ जाय तो भी आज अर्जुन को यमलोक में जाना ही पड़ेगा। इतना कहकर सूर्य के श्रेष्ठ पुत्र कर्ण ने युद्धस्थल में उस नाग से फिर इस प्रकार कहा-मेरे पास सर्पमुख बाण है। मैं उत्तम यत्न कर रहा हूँ और मेरे मन में अर्जुन के प्रति पर्याप्‍त रोष भी है; अतः मैं स्वयं ही पार्थ को मार डालूँगा। तुम सुख पूर्वक यहाँ से पधारो।

एक बार नाग विफल हो चुका था तो आवश्यक तो था नहीं कि दूसरी बार सफल ही हो जाता। जब कर्ण उसे मना कर देता है तो वह स्वतः अर्जुन पर आक्रमण कर देता है और अर्जुन उसे मार डालते हैं। खैर, फिर भी कर्ण अश्वसेन को भगाता तो है। इस्का श्रेय दे सकते हैं, हालाँकि युद्ध पर उसका कोई प्रभाव नहीं पड़ने वाला था। 

इसके अतिरक्त भी पूरा खंडकाव्य महाभारत के विरोधी बातों से भरा पड़ा है। दिनकर ने अर्जुन को "मदांध" तक लिखा है। जबकि अर्जुन पर चाहे जो भी आरोप लगें, किन्तु मदांध नहीं कहा जा सकता। वे महाभारत मे सदैव विनीत दिखाए गए हैं। वेद व्यास ने उन्हें धर्मात्मा लिखा है और अवतार बताया है । 

रश्मिरथी पढ़कर ऐसा लगता है कि दिनकर पांडवों को घृणा की हद तक नापसंद करते थे। 
-------------
◆ सप्तम सर्ग में कर्ण को दलित तारक कह सम्बोधित किया। 

माने एक राजा को दलित बतला दिया। 🤦 

दलित जैसी कोई पहचान आज भी न है। यदि शोषित वंचित कहना चाहते तो, यदि कोई था तो वह पाण्डव ही थे। 
----------

हद की बात तो यह है कि जिस कर्ण को पूरे खंडकाव्य में धर्म की धुरी बनाकर दिनकर ने प्रस्तुत किया है, उसके अधर्म  और पापों को सातवें सर्ग में स्वयं ही  गिनवाते हैं, लेकिन मात्र चार पदों में इस तरह समेट  देते हैं जैसे कि वह कोई बात ही न हो।  फलस्वरूप ७ सर्गों से झूठी महिमामंडन पढता आया पाठक उन पदों का संज्ञान ही नहीं लेता है। जबकि कर्ण का मूल चरित्र इन्हींं चार-पाँच पदों में है-   
'
'रुको तब तक, चलाना बाण फिर तुम ;
हरण करना, सको तो, प्राण फिर तुम .
नहीं अर्जुन ! शरण मैं मागंता हूं ,
समर्थित धर्म से रण मागंता हूं .''

उपस्थित देख यों न्यायार्थ अरि को ,
निहारा पार्थ ने हो खिन्न हरि को .
मगर, भगवान् किञ्चित भी न डोले ,
कुपित हो वज्र-सी यह वात बोले _

''प्रलापी ! ओ उजागर धर्म वाले !
बड़ी निष्ठा, बड़े सत्कर्म वाले !
मरा, अन्याय से अभिमन्यु जिस दिन ,
कहां पर सो रहा था धर्म उस दिन ?''

''हलाहल भीम को जिस दिन पड़ा था ,
कहां पर धर्म यह उस दिन धरा था ?
लगी थी आग जब लाक्षा-भवन में,
हंसा था धर्म ही तब क्या भुवन में ?''

''सभा में द्रौपदी को खींच लाके ,
सुयोधन की उसे दासी बता के ,
सुवामा-जाति को आदर दिया जो ,
बहुत सत्कार तुम सबने किया जो ,''

''नहीं वह और कुछ, सत्कर्म ही था ,
उजागर, शीलभूषित धर्म ही था .
जुए में हारकर धन-धाम जिस दिन ,
हुए पाण्डव यती निष्काम जिस दिन ,''

इतने दुर्गुणों के बाद भी उस पात्र का महिमामंडन करना और उसे धर्म की धुरी दिखाना महाभारत की अवहेलना करना नहीं है तो और क्या है?  

इस पूरे खंडकाव्य में कोई चीज अच्छी है तो वह है भगवान् श्रीकृष्ण का संवाद। 

जब उन्हें पता चलता है कि दुर्योधन उन्हें बांधना चाहता है, उस समय जो उन्होंने कहा है वह दिनकर ने महाभारत से लिया है। उसमें कोई नकारात्मक परिवर्तन नहीं किया गया है।

----

यह तो वैचारिक हाल है राष्ट्रवादी राष्ट्रकवि का, तो सोचिए कि राष्ट्रद्रोहियों की क्या बात करना। अभी समझता है कि हिन्दू इतना मूलविहीन क्यों है?