निदान
१. अर्थ, उद्देश्य-
निदान का एक अर्थ है, रोग की जांच या निर्णय। लघुत्रयी में प्रसिद्ध एक आयुर्वेद पुस्तक है-माधव निदान। इसका अन्य प्रचलित अर्थ है, देव मूर्तियों की मुद्रा, आयुध आदि के प्रतीक।
किसी वस्तु का पूर्ण ज्ञान असम्भव है, जैसा गीता में कहा है-ज्ञानं ज्ञेयं परिज्ञाता त्रिविधा कर्मचोदना। (गीता, १८/१८)
ज्ञान ३ या अधिक प्रकार का अनन्त है, जिनको अनन्त वेद कहा गया है (अनन्ताः वै वेदाः-तैत्तिरीय ब्राह्मण, ३/१०/११)। तीन प्रकार के अनन्त विष्णु सहस्रनाम में निर्दिष्ट हैं-अनन्त, असंख्येय, अप्रमेय।
ऋक् = मूर्ति = संख्येय अनन्त
यजु = गति = असंख्येय अनन्त
साम = महिमा = अप्रमेय अनन्त
अथर्व = ब्रह्म = अज्ञेय अनन्त।
उसमें ज्ञेय उतना ही है, जिसका साम या प्रभाव हम तक पहुंचता है, अतः भगवान् ने अपने को वेदों में सामवेद कहा है (गीता, १०/२२)। उसका भी बाहरी ज्ञान होता है, जिसे जानने वाले को परिज्ञाता कहा है।
अव्यक्त ब्रह्म या शब्द के परिज्ञान का सूत्र वाज. यजुर्वेद में है-
स पर्यगात्, शुक्रं, अकायं, अव्रणं, शुद्धं, अपापविद्धं, कविः मनीषी परिभूः स्वयम्भूः याथातथ्यतो अर्थान् व्यदधात् शाश्वतीभ्यः समाभ्यः। (ईशावास्योपनिषद्, ६, वाज. सं. ४०/८, काण्व सं. ४०/८)।
अव्यक्त विश्व या वाक् व्यक्त विश्व व्यक्त वाक्
(१). शुक्र तम तम
(२). अकाय पिण्ड शब्द आदि
(३). अव्रण छिद्र, दोष अपूर्णता, लुप्त शब्द।
(४). अस्नाविरम् ऋषि (रस्सी) कारक आदि से सम्बन्ध
(५). शुद्ध मिश्रण अपूर्ण रूप
(६). अपापविद्ध माया के आवरण शब्द, पद, वाक्य का पार्थक्य
ज्ञान प्राप्ति का क्रम वेद में निर्दिष्ट है-
कासीत् प्रमा, प्रतिमा, किं निदानमाज्यं, किमासीत्, परिधिः क आसीत्।
छन्दः किमासीत् प्रउगं किमुक्थं यद्देवा देवमयजन्त विश्वम्॥ (ऋक्, १०/१३०/३)
देवों ने विश्व (पुरुष सूक्त का विराट्, सीमाबद्ध पिण्डों का समूह, अधिपूरुष उसका अधिष्ठान है) की पूजा या यज्ञ कैसे किया? (यज देवपूजासंगतिकरण दानेषु, धातुपाठ १/७२८)। (१) प्रमा = सिद्धान्त, अनुमान (शैव दर्शन का प्रमा, प्रमाता), (२) प्रतिमा (उसी जैसा छोटा या बड़ा प्रतिरूप), (३) निदान मूल जैसा प्रतीक, (४) छन्द = शब्द, आकाश या काल की माप, (५) प्रउग = साधन, उपकरण (प्रउग का अर्थ शस्त्र किया गया है)। निर्माण ३ गुणों से हुआ है अतः इसका अर्थ त्रिकोण भी है)। (६) उक्थ (उक्थ = निर्माण से बचा भाग, भोजन के बाद जूठन)।
२. देव-असुर-
आकाश में फैली हुई ऊर्जा या असु को प्राण कहते हैं। जिस असु से निर्माण नहीं होता वह असुर है। जिस असु के दिवा रूप से सृजन होता है, वह देव हैं।
प्राणो वा असुः (शतपथ ब्राह्मण, ६/६/२/६)
तेनासुनासुरानसृजत। तदसुराणामसुरत्वम्। (तैत्तिरीय ब्राह्मण, २/३/८/२)
दिवा देवानसृजत नक्तमसुरान् यद्दिवा देवानसृजत तद्देवानां देवत्वं यदसूर्य्यं तदसुराणामसुरत्वम्। (षड्विंश ब्राह्मण, ४/१)
मनुष्यों में भी जो यज्ञ (उत्पादन चक्र) के समन्वय से अपनी आवश्यकता का स्वयं उत्पादन करते हैं, वे देव हैं।
यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवास्तानि धर्माणि प्रथमान्यासन्।
तेह नाकं महिमानः सचन्तः यत्र पूर्वे साध्याः सन्ति देवाः॥ (पुरुष-सूक्त, १६)
असुर भी यज्ञ करते हैं, पर उनका मुख्य उद्देश्य असु (बल) द्वारा अन्य द्वारा उत्पादित सम्पत्ति पर अधिकार करना है।
देव-असुर के बीच अन्य अन्तर है अदिति-दिति। दिति का अर्थ है काटना, दो अवखण्डने (धातु पाठ, ४/३९)। दैत्य हर प्रकार से बांटते हैं-ब्रह्म के एकत्व के बदले अब्राहम को मानते हैं। कहते हैं कि केवल मेरा देव सही है, बाकी के गलत हैं-मेरे देव को मानो या मरो। अपने पैगम्बर के पूर्व की सभी बातें गलत थीं, उसके बाद ही सत्य का पता चला। उसके विपरीत अदिति अखण्ड है, सनातन तत्त्व है, ब्रह्म तथा विश्व का एकत्व मानता है।
३. देव-देवी विभाग-
वेद में पुरुष-स्त्री का विभाजन कई प्रकार से है-
(१) पुरुष-प्रकृति-चेतन तत्त्व पुरुष है, उपादान या पदार्थ तत्व स्त्री है।
मयाध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते स चराचरम् (गीता, ९/१०)
वेद में प्रकृति को श्री या अदिति कहा है।
(२) वाक् और अर्थ-वाक् का अर्थ शब्द है, तथा उसका प्रसार आकाश। उसमें जो सीमाबद्ध पिण्ड या पुर है, वह अर्थ है। पुर में निवास करने वाला पुरुष है। पृथ्वी भी एक अर्थ है, जिसे अंग्रेजी में अर्थ (Earth) कहते हैं। एक वस्तु अर्थ या पुरुष है। उसका विस्तार वाक् स्त्री है। केश पुल्लिङ्ग है पर उसका समूह दाढ़ी, मूंछ, चोटी आदि स्त्रीलिङ्ग है। सैनिक पुल्लिङ्ग है पर उसका समूह सेना, वाहिनी, पुलिस आदि स्त्रीलिङ्ग है। मनुष्य रूप में जन्म देने के लिए स्त्री का गर्भ ही क्षेत्र या स्थान है, पुरुष का योग विन्दु मात्र है।
इयं या परमेष्ठिनी वाग्देवी ब्रह्म संशिता। (अथर्व, १९/९/३)
वाचीमा विश्वा भुवनानि अर्पिता (तैत्तिरीय ब्राह्मण, २/८/८/४)
(३) वृषा-योषा -वृषा का अर्थ है वर्षा करने वाला। समुद्र या मेघ जैसे विस्तार से ब्रह्माण्ड या तारा जैसे विन्दुओं की वर्षा हुई। द्रव रूप में निकले इसलिए इनको द्रप्स (drops) कहा गया। स्रोत से निकलने या अलग होने के कारण इनको स्कन्न या स्कन्द कहा गया। सभ्यता या ज्ञान का स्रोत रूप में पुरुष ऋषभ या वृषभ है। जो क्षेत्र निर्माण के लिए युक्त होता है या ग्रहण करता है, वह योषा या स्त्री है।
द्रप्सश्च स्कन्द पृथिवीमनुद्याम्। (ऋक्, १०/१७/११, अथर्व, १८/४/२८, वाज. यजु. १३/५, तैत्तिरीय सं. ३/१/८/३, ४/२/८/२, मैत्रायणी संहिता, २/५/१०, ४/८/९, काण्व सं. १३/९, १६/१५,३५/८)
यः सप्तरश्मिः वृषभस्तु विष्मानवासृजत् सर्तवे सप्तसिन्धून्। (ऋक्, २/१२/१२)
योषा वै वेदिः, वृषा अग्निः (शतपथ ब्राह्मण, १/२/५/१५)
४. देव विभाग-हर स्थान के प्राण रूप देव अनन्त हैं। पर उनके २ मुख्य विभाग हैं। सौर मण्डल में ३३ धाम हैं, ३ पृथ्वी के भीतर, ३० बाहर। पृथ्वी को आकाश के लिए माप-दण्ड माना गया है, बड़े धाम पृथ्वी से क्रमशः २-२ गुणा बड़े हैं। केन्द्र से ८ धाम तक अग्नि के ८ रूप वसु हैं, उसके बाद १ अश्विन रूप, फिर ११ वायु रूप रुद्र हैं। रुद्र के बाद पुनः १ अश्विन और उसके बाद तेज रूप १२ आदित्य हैं।
पूरे विश्व के लिए ३ प्रकार से विभाग हैं, जिनका लिए गायत्री मन्त्र में ३ पाद हैं।
स्रष्टा रूप ब्रह्मा- तत् सवितुः वरेण्यम्। सविता = सव या प्रसव करने वाला, स्रष्टा। यह सविता सूर्य पिता है। पिता का जन्म पितामह ब्रह्माण्ड से हुआ। उसका जन्म स्वायम्भुव या पूर्ण विश्व से हुआ। स्वायम्भुव का निर्माता तत् या वह सविता है।
कर्ता रूप विष्णु-तत् सविता दीखता नहीं है। उसकी सृष्टि में क्रिया हो रही है वह दीखती है, जिसे समझ सकते हैं। भर्गो (तेज वाले) देवस्य धीमहि। विष्णु का प्रत्यक्ष रूप हमारा सूर्य है।
ज्ञान रूप शिव- यह हमारी बुद्धि (धी) को प्रेरित करता है- धियो यो नः प्रचोदयात्।
अन्य देवों के भी इस प्रकार के रूप हैं-
ब्रह्मा-(१) स्रष्टा रूप अव्यक्त ब्रह्म, (२) दृश्य ७ लोक, (३) शब्द ज्ञान रूप वेद।
विष्णु- (१) सृष्टि की इच्छा, (२) जीवन दाता सूर्य, (३) व्यक्तिगत चेतना रूप।
शिव- (१) श्वो-वसीयस या शून्य में स्थित मन, (२) गति, तेज का अनुभव रुद्र, (३) शान्त ज्ञान रूप शिव।
हनुमान- (१) पहले जैसी सृष्टि करने वाला वृषाकपि, (२) गति रूप मारुति, (३) बुद्धि रूप मनोजव। तीनों प्रकार से यह शिव का अवतार रूप है।
देवी रूप-ये चण्डी पाठ के ३ चरित्र हैं।
स्रष्टा रूप महाकाली = मूल अव्यक्त अन्धकारमय विश्व, जिसमें काल का भी आभास नहीं था। विश्व का पुनः उसी में लय होता है।
क्रिया रूप महालक्ष्मी- दृश्य जगत् लक्ष्मी है। लक्ष = देखना (लक्ष दर्शनाङ्कनयोः-धातु पाठ, १०/५, १०/१६४)।
ज्ञान रूप-महासरस्वती-जिसकी गणना की जा सके वह गणपति है-स्थूल जगत्। जिसकी गणना नहीं हो सके वह रसवती रूप सरस्वती है।
५. दारु ब्रह्म-जगन्नाथ ६ अर्थों में दारु ब्रह्म हैं-(१) चेतन तत्त्व, (२) निरपेक्ष द्रष्टा, (३) निर्माण क्रम, (४) निर्माण सामग्री और आधार, (५) सदा बढ़ने वाला, (६) संकल्प-क्रिया फल का अनन्त क्रम।
निर्माण सामग्री और आधार-ब्रह्म वनं ब्रह्म स वृक्ष आसीत् यतो द्यावा पृथिवी निष्टतक्षुः।
मनीषिणो मनसा विब्रवीमि वो ब्रह्माध्यतिष्ठद् भुवनानि धारयन्॥ (तैत्तिरीय ब्राह्मण, २/८/९/१६)
निर्माण का अधिष्ठान, आरम्भ और विधि-
किं स्विदासीदधिष्ठानमारम्भणं कतमत्स्वित् कथासीत्।
यतो भूमि जनयन् विश्वकर्मा वि द्यामौर्णोन् मह्ना विश्वचक्षाः॥ (ऋक्, १०/८१/२, तैत्तिरीय संहिता, ४/६/२/११)
सर्वोच्च द्रष्टा-यस्मात् परं नापरमस्ति किञ्चित्, यस्मान्नाणीयो न ज्यायोऽस्ति कश्चित्।
वृक्ष इव स्तब्धो दिवि तिष्ठत्येनेदं पूर्णं पुरुषेण सर्वम्॥ (श्वेताश्वतर उपनिषद्, ३/९)
गुण, वासना, कर्म, फल का अनन्त क्रम-
अधश्चोर्ध्वं प्रसृतास्तस्य शाखा गुणप्रवृद्धा विषयप्रवालाः।
अधश्च मूलान्यनुसन्ततानि कर्मानुबन्धीनि मनुष्यलोके॥ (गीता, १५/२)
प्राण, चित्त, वासना-द्वे बीजे चित्तवृक्षस्य प्राणस्पन्दनवासने।
एकस्मिँश्च तयोः क्षीणे क्षिप्रं द्वे अपि नश्यतः (मुक्तिकोपनिषद्, २/२७)
ब्रह्म के ३ रूपों का निर्देश गायत्री मन्त्र के ३ पादों में है-सृष्टि रूप ब्रह्मा, क्रिया रूप विष्णु, ज्ञान रूप शिव। इनके प्रतीक हैं-पलास, अश्वत्थ, वट।
अश्वत्थरूपो भगवान् विष्णुरेव न संशयः। रुद्ररूपो वटस्तद्वत् पलाशो ब्रह्मरूपधृक्॥ (पद्मपुराण, उत्तर खण्ड, ११५/२२)
६. विष्णु रूप अश्वत्थ- अश्वत्थः सर्व वृक्षाणां (गीता, १०/२६)-कई रूप में अश्वत्थ विष्णु रूप है-(१) इस पर अनेक पक्षी आश्रय लेते हैं, जैसे पूर्थ्वी पर जीव गण, (२) इसके गोल बीजों में कण समान छोटे बीज हैं, जैसे ब्रह्माण्ड में कण रूप तारा आदि। (३) सूक्ष्म बीज से बड़ा अश्वत्थ बन जाता है, जैसे सूक्ष्म सङ्कल्प से अनन्त विश्व, (४) पिप्पल का छोटा बीज पत्थर, दीवाल आदि में भी जम जाता है, जैसे हर स्थिति में जीव हो जाते हैं। (५) वृक्ष नष्ट होने पर उसी के काष्ठ से अन्य पीपल उगने लगता है, एक कल्प के अन्त होने पर अन्य कल्प। (६) रोग नाशक।
अश्वत्थे वो निषदनं पर्णे वो वसतिष्कृता। (ऋक्, १०/९७/५)।
यस्मिन् वृक्षे मध्वदः सुपर्णा निविशन्ते चाधिविश्वे। तस्येदाहुः पिप्पलं स्वाद्वग्रे तन्नोन्नशद्यः पितरं न वेद॥ (ऋक्, १/१६४/२२)
अश्वत्थे वो निषदनं पर्णे वो वसतिष्कृता। गो भाज इत् किलासथ यत् सनवथ पूरुषम्॥ (ऋक्, १०/९७/५)
अलाबूनि पृषत्कान्यश्वत्थ पलाशम्। पिपीलिका वटश्वसो विद्युत् स्वापर्णशफो। गोशफो जरिततरोऽथामो दैव॥(अथर्व, २०/१३५/३)
अथ यदनाशकायनमित्याचक्षते ब्रह्मचर्यमेव तदेष ह्यात्मा न नश्यति यं ब्रह्मचर्येणानुविन्दते। अथ यदरण्यायनमित्याचक्षते ब्रह्मचर्यमेव तदरश्च ह वैण्यश्चर्णवौ ब्रह्मलोके तृतीयस्यामितो दिवि। तदैरं मदीयं सरस्तदश्वत्थः सोमसवनः। तदपराजिता पूः ब्रह्मण। प्रभु विमितं हिरण्मयम्। (छान्दोग्य उपनिषद्, ८/५/३)
७. ब्रह्मा रूप पलास- पलास के हर शाखा से ३ पत्र निकलते हैं-शाखा भी बची रहती है। अतः ब्रह्मा रूप सृष्टि को समझने के लिए वेद में कई प्रकार से (प्रायः ६० वैदिक उल्लेख) त्रिविध विभाजन हैं। हर विभाजन में कुछ छूट जाता है जिससे त्रयी का अर्थ ४ वेद होता है। अविभक्त को अज्ञेय ब्रह्म कहा है (अविभक्तं विभक्तेषु - गीता, १३/१६, १८/२०) । अतः ब्रह्मा को पलास जैसा कहा है और व्रतारम्भ संस्कार में मूल ब्रह्म रूप पलास दण्ड धारण करते हैं।
यस्मिन् वृक्षे सुपलाशे देवैः संपिबते यमः। अत्रा नो विश्पतिः पिता पुराणां अनु वेनति॥ (ऋक्, १०/१३५/१)
सर्वेषां वा एष वनस्पतीनां योनिर्यत् पलासः। (स्वायम्भुव ब्रह्मरूपत्त्वात्) तेजो वै ब्रह्मवर्चसं वनस्पतीनां पलाशः-ऐतरेय ब्राह्मण, २/१)
ब्रह्म वै पलाशस्य पलाशम् (= पर्णम्)। (शतपथ ब्राह्मण, २/६/२/८)
ब्रह्म वै पलाशः। (शतपथ ब्राह्मण, १/३/३/१९)
८. शिव रूप वट- शिव का प्रतीक वट है। शिव ज्ञान रूप हैं, गुरु-शिष्य परम्परा का आरम्भ शिव से ही हुआ है। वट शिव का प्रतीक है। इसकी हवाई जड़ भूमि से मिल कर अन्य वृक्ष को जन्म देती है। इसी प्रकार गुरु शिष्य को ज्ञान दे कर अपने जैसा मनुष्य बना देता है। ऋग्वेद में मूल वृक्ष की शाखा से उत्पन्न वृक्ष को द्रुघण या प्रघण (द्वितीय, मिले हुए घने वृक्ष) कहा गया है। यज्ञ रूप शिव का प्रतीक या वाहन वृषभ है, जिसके शृङ्ग, सिर, पाद, हाथ आदि यज्ञ के अङ्ग रूप में वर्णित हैं। लोकभाषा में द्रुघन का दुमदुमा (द्रुम से द्रुम) हो गया है जो हर शिव पीठ में है।
न्यक्रन्दयन्नुपयन्त एन ममेहयन् वृषभं मध्य आजेः।
तेन सूभर्वं शतवत् सहस्रं गवां मुद्गलः प्रघने जिगाय॥५॥
शुनमष्ट्राव्यचरत् कपर्दी वरत्रायां दार्वानह्यमानः॥८॥
इमं तं पश्य वृषभस्य युञ्जं काष्ठाया मध्ये द्रुघणं शयानम्॥९॥ (ऋक्, १०/१०२/५-८)
वट की शाखा नीचे आकर पुनः उठती है, इस अर्थ में इसे वेद में न्यग्रोध कहा है-
ते यत् न्यञ्चो अरोहन्, तस्मात् न्यङ् रोहति न्यग्रोहः, न्यग्रोहः वै नाम तत् न्यग्रोहं सन्तं न्यग्रोध इति आचक्षते। (ऐतरेय ब्राह्मण, ७/३०)
न्यञ्चो न्यग्रोधा रोहन्ति। (शतपथ ब्राह्मण, १३/२/७/३)
अथर्व वेद में अश्वत्थ, न्यग्रोध आदि का रोगनाशक रूप में वर्णन है-
यत्रा अश्वत्था न्यग्रोधा महावृक्षाः शिखण्डिनः। तत्परेत अप्सरसः प्रतिबुद्धा अभूतन॥ (अथर्व, ४/३७/४)
’प्रतिबुद्धा अभूतन’ जानने, स्मरण रखने अर्थ में है। इस पर सिद्धार्थ की कथा बनी कि उनको पिप्पल के नीचे बैठने से ज्ञान मिला। मस्तिष्क में जो ज्ञान रूपी वृक्ष है, उसके नीचे बैठने से ज्ञान मिलता है। ज्ञान के लिए गुरु रूपी वट के नीचे बैठते हैं, वह वटु (छात्र) या वटुक (छोटा छात्र) है।
वट-विटप समीपे भूमिभागे निषण्णं, सकल मुनि जनानां ज्ञान-दातारमारात्।
त्रिभुवनगुरुमीशं दक्षिणामूर्तिदेवं, जनन-मरण दुःख-च्छेद दक्षं नमामि॥
चित्रं वट-तरोर्मूले, वृद्धाः शिष्या गुरुर्युवा। गुरोस्तु मौनं व्याख्यानं, शिष्यास्तु छिन्न-संशयाः॥
(दक्षिणामूर्ति उपनिषद्)
बट-वृक्ष की शाखाओं से नये वृक्षों का निर्माण सृष्टि के एक कल्प के बाद नये कल्प के निर्माण जैसा है। निर्माण क्रम शिव हैं, उसके पत्र पर कर्त्ता रूपी बीज श्रीकृष्ण हैं-
करारविन्देन पदारविन्दं, मुखारविन्दे विनिवेशयन्तम्।
वटस्य पत्रस्य पुटे शयानं, बालं मुकुन्दं मनसा स्मरामि॥
(ब्रह्म पुराण, ५३/२७-३३, भागवत पुराण, १२/९/२०-२५, विष्णु धर्मोत्तर पुराण, १/७८/१०-२०, स्कन्द पुराण, २/२/३/५-१४ के आधार पर बिल्वमङ्गल रचित बालमुकुन्दाष्टकम्, १)
९. देवी रूप-(१) काली का प्रतीक नीम वृक्ष है। काली ने रक्तबीज रूप में फैलते वायरस रूप जीवों को खा लिया था। प्रकृति में नीम के पत्ते भी यही करते हैं। महाकाली चरित्र में जगन्नाथ के सुप्त रूप को विष्णु तथा जाग्रत रूप को जगन्नाथ कहा है। अतः जगन्नाथ मूर्ति भी नीम काष्ठ से ही बनतीहै।
(२) लक्ष्मी- विष्णु रूप पीपल के पत्तों में लक्ष्मी का निवास कहते हैं। लक्ष्मी को श्री कहते हैं। २ फलों को श्रीफल कहते हैं-बेल, नारियल।
(३) सरस्वती-बेल तथा नारियल का शिव से भी सम्बन्ध है। बेल के ३ पत्ते शिव के त्रिशूल या त्रिताप नाशन के प्रतीक हैं। इनसे शरीर का ताप दूर होता है। नारियल का फल मनुष्य के सिर जैसा है, कठोर आवरण में कोमल फल और जल। उसमें सिर जैसी जटा तथा शिव के ३ नेत्र जैसे ३ छेद हैं। बेल का भी बाहरी भाग कठोर है।
१०. भुजा, सिर, आयुध-
(१) विष्णु-सहस्रबाहु-पूर्ण विश्व रूप में १००० सिर, अक्ष (धुरी, आंख), पाद वाला पुरुष (पुरुष सूक्त, १)
चतुर्बाहु-स्वस्तिक चिह्न की ४ दिशायें। ये परस्पर लम्ब क्रान्तिवृत्त के ४ पाद हैं-ज्येष्ठा नक्षत्र का स्वामी इन्द्र, रेवती का पूषा, श्रवण का गोविन्द जो अरिष्ट की नेमि या सीमा (दूर करने वाले) हैं, तथा पुष्य का बृहस्पति। यह जीवन के ४ उद्देश्य (पुरुषार्थ = धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) पूरा करता है-समाज के क्रम (श्रवा) में श्रेष्ठ अर्थात् वृद्धश्रवा इन्द्र की रक्षा में ही धर्म पालन होता है। विश्व को पाने या जानने से हमारी पुष्टि पूषा द्वारा होती है। हमारी इच्छा (काम) गोविन्द से पूरी होती है तथा मोक्ष ज्ञान से होता है जिसका स्रोत बृहस्पति है।
स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवा स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः।
स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु॥ (यजु, २५/१९)
भास्कराचार्य ने लीलावती में इसकी गणना दिखाई है कि विष्णु की ४ भुजाओं में ४ अस्त्रों-शंख, चक्र, गदा पद्म का विन्यास ४ x ३ x २ x १ = २४ प्रकार से हो सकता है। मुख्य अवतार १० हैं जो असुरों के प्रतिकार के लिए हुए थे, तथा एक अभी बाकी है।
द्विभुज मनुष्य रूप में अवतार-तेनैव रूपेण चतुर्भुजेन सहस्रबाहो भव विश्वमूर्ते (गीता, ११/४६)
आयुध-(१) शंख-शब्द, आकाश का गुण। ध्रुव को ज्ञान की प्रेरणा विष्णु के शंख से हुई थी (विष्णु पुराण, १/१२/४८-५०, भागवत पुराण, ४/९/४-५)। (२) चक्र-सृष्टि के ९ चक्र, अव्यक्त को मिला कर १० सर्ग हैं। ९ सर्गों के ९ कालमान हैं (सूर्य सिद्धान्त, १४/१)। क्रान्ति वृत्त-इस सुदर्शन चक्र से चन्द्र कक्षा २ विन्दुओं पर कटती है, जिनको राहु, केतु कहते हैं। मनुष्य रूप राहु असुर समुद्र मन्थन के बाद विष्णु के सुदर्शन चक्र द्वारा मारा गया था। (३) गदा-युद्ध का सामान्य अस्त्र जिससे व्यूह, शस्त्र आदि काटते हैं। वायु का अस्त्र (गरुड़ पुराण, ३/१२/७९)। सृष्टि के लिए गति, क्रिया-तस्मिन् अपो मातरिश्वा दधाति (ईशावास्योपनिषद्, ४)। (४) पद्म-पृथ्वी, जिस पर पद रखते हैं। पृथ्वी के ३ स्तर-ग्रह पृथ्वी, सौर आकर्षण क्षेत्र, ब्रह्माण्ड या काश्यपी पृथ्वी।
(२) शिव-पञ्चमुख-इसके कई अर्थ हैं-आकाश के ५ पर्व
मण्डल देवता महाभूत
स्वयम्भू ब्रह्मा आकाश
परमेष्ठी विष्णु वायु (गति)
सौर इन्द्र अग्नि
चान्द्र सोम आप
भू अग्नि पृथ्वी
इन महाभूतों का प्रतीक कलश है। इनके प्रतीक माहेश्वर सूत्र के प्रथम ५ वर्ण ( ५ मूल स्वर) हैं, जो नन्दिकेश्वर काशिका के अनुसार सृष्टि आरम्भ के प्रतीक हैं- अ, इ, उ, ऋ, लृ।
आकाश के ५ पर्व या मण्डलों की प्रतिमा मनुष्य शरीर के ५ कोष हैं, जिनके केन्द्र सुषुम्ना के ५ चक्र हैं-विशुद्धि, अनाहत, मणिपूर, स्वाधिष्ठान, मूलाधार। इनके बीज मन्त्र आकाश सृष्टि के ५ मूल स्वरों के सवर्ण अन्तःस्थ वर्ण हैं- हयवरट्। लण् । बीजमन्त्रों का क्रम सृष्टि क्रम से लेने पर स्वाधिष्ठान तथा मणिपूर का क्रम आपस में बदल जाता है। ५ कोष-आनन्दमय, विज्ञानमय, मनोमय, प्राणमय, अन्नमय कोष।
मस्तिष्क के वाम-दक्षिण २-२ भाग, केन्द्र में अघोर। अन्य ४ भाग-ईशान, तत्पुरुष, वामदेव, सद्योजात।
३ अम्बक-३ पृथ्वी और उनके ३ आकाश-तिस्रो मातॄस्त्रीन्पितॄन्बिभ्रदेक ऊर्ध्वतस्थौ नेमवग्लापयन्ति ।
मन्त्रयन्ते दिवो अमुष्य पृष्ठे विश्वमिदं वाचमविश्वमिन्वाम् ॥ (ऋक्, १/१६४/१०)
तिस्रो भूमीर्धारयन् त्रीरुत द्यून्त्रीणि व्रता विदथे अन्तरेषाम् ।
ऋतेनादित्या महि वो महित्वं तदर्यमन् वरुण मित्र चारु ॥ (ऋक्, २/२७/८)
(३) ब्रह्मा के ४ मुख-४ वेद। इसका प्रतीक पलास दण्ड है जिससे ३ पत्ते निकलते हैं। मूल दण्ड = अथर्व, ३ पत्र = ऋक्, यजु, साम।
(४) महाकाली-खड्ग-नाश शक्ति। मुण्ड माला-नष्ट होने वाली सृष्टि। इसे अक्ष माला कहा है, अर्थात् अ से क्ष तक के ५० वर्ण-ये मूलाधार से आज्ञा चक्र तक के पद्मों के दल हैं। अभयमुद्रा-संहार भी समय पर होता है, सृष्टि काल में अभय है। प्रलय काल में अन्धकार है, जिसका रूप कृष्ण वर्ण है। उससे बाहर कुछ नहीं है, इस रूप में दिगम्बर हैं (शिव भी)। प्रलय में लीन विश्व श्मशान है।
(५) दशभुजा दुर्गा और शिव के आयुध-शूलं टङ्क कृपाण वज्र दहनान् नागेन्द्र पाशाङ्कुशान्,
पाशं भीतिहरं दधानममिताकल्पोज्ज्वलाङ्गं भजे। (तन्त्रसार)
१. अभय, २. टङ्क, ३. शूल, ४. वज्र, ५. पाश, ६. खड्ग, ७. अङ्कुश, ८. घण्टा, ९. नाग, १०. अग्नि।
इनका एक अर्थ है कि आकाश या सृष्टि के १० आयाम हैं-रेखा, पृष्ठ, आयतन (स्तोम), पदार्थ (अग्नि), काल, पुरुष (चेतन), ऋषि (रस्सी, पिण्डों के बीच सम्बन्ध), नाग (पिण्डों का आवरण), रन्ध्र (कमी, विषमता), रस या आनन्द (मूल स्रोत, अभय)।
आध्यात्मिक रूप में ये शरीर की स्थिति हैं-जैसे वायु से शूल, अग्नि से टङ्क, जल रोग वरुण का पाश, नाग आदि उपप्राण, अङ्कुश = कांटा, खड्ग (चान्द्र आकार-मानसिक कष्ट), घण्टा (कोलाहल), अग्नि (ज्वलन)।
(६) महासरस्वती की १८ भुजा १८ विद्या की प्रतीक हैं। ललिता सहस्रनाम (२-३) में भूजा तथा बाणों का अर्थ दिया है-
उद्यद् भानु सहस्राभा चतुर्बाहु समन्विता।
राग-स्वरूप पाशाढ्या क्रोधाकाराङ्कुशोज्ज्वला॥२॥
मनोरूपेक्षु कोदण्डा पञ्च तन्मात्र सायका।
निजारुण प्रभापूरमज्जद् ब्रह्माण्ड मण्डला॥३॥
राग = पाश, क्रोध= अङ्कुश, मन = इक्षु धनुष, ५ बाण = ५ तन्मात्रा शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध।
तन्त्र साहित्य में सभी देवियों कॆ आयुध प्रतीकों का विस्तृत वर्णन है।
(७) गणेश-गणनात्मक विश्व गणेष है। जिसकी गणना नहीं हो सके वह ज्ञान सरस्वती है। कण रूप में पिण्डों की संख्या विश्व के प्रत्येक स्तर में १ खर्व है, अतः गणेश को खर्व कहा गया है।
आकाश में ब्रह्माण्ड संख्या = हमारे ब्रह्माण्ड में तारा संख्या = मनुष्य मस्तिष्क में कलिल संख्या = १ खर्व (शतपथ ब्राह्मण, १२/३/२/५) में इनको लोमगर्त्त कहा है जो १ सेकण्ड का प्रायः ७५,००० भाग है। शतपथ ब्राह्मण (१०/४/४/२) के अनुसार वर्ष में जितने लोमगर्त हैं, आकाश में उतने ही नक्षत्र हैं।
गणेश के गोल पेट का अर्थ है, ब्रह्माण्ड, तारा, ग्रह-सभी प्ण्ड गोल है। उनकी सूंड बायीं तरफ मुड़ने का अर्थ है कि पेंच या टेपी को बायीं तरफ घुमाने पर वह ऊपर उठता है। भौतिक विज्ञान के विद्युत् चुन्मकीय प्रभाव या जाइरोस्कोप के नियम इसी प्रकार हैं।