Saturday, 2 May 2026

विवाह में त्रिबल शुद्धि


विवाह का मुहूर्त निर्धारण


हिंदुओं में विवाह की तिथि वर-वधू की जन्म राशि के आधार पर निकाली जाती है। वर या वधू का जन्म, जिस चंद्र नक्षत्र में हुआ होता है, उस नक्षत्र के चरण में आने वाले अक्षर को भी विवाह की तिथि ज्ञात करने के लिए प्रयोग किया जाता है।

विवाह की तिथि सदैव वर-वधू की कुंडली में गुण-मिलान करने के बाद निकाली जाती है। विवाह की तिथि तय होने के बाद कुंडलियों का मिलान नहीं किया जाता।

हमारे पूर्व जन्मों के कर्मो या इस जन्म में अनजाने में बुरे कर्म का परिणाम भोगना पडता है। ऎसी स्थिति में शुभ मुहुर्त, मंत्र जाप तथा दानादि ही रक्षा करते हैं।

ब्रह्मलीन पं. तृप्तिनारायण झा शास्त्री द्वारा रचित पुस्तक ‘विवाह-विमर्श’ पुस्तक के अनुसार सोलह नक्षत्र अश्विनी, भरणी, कृतिका, आर्द्रा, पुनर्वसु, पुण्य, अश्लेषा, तीनों पूर्वा, चित्रा, विशाखा, ज्येष्ठा, श्रवण, घनिष्ठा तथा शतभिषा नक्षत्रों को विवाह के लिए शुभ नहीं माना जाता।

‘ज्योतिष रत्न’ पुस्तक के अनुसार कृतिका, भरणी, आर्द्रा, पुनर्वसु और अश्लेषा नक्षत्रों में विवाह होने पर कन्या छह वर्षों के अंदर ही विधवा हो जाती है। पुण्य नक्षत्र में विवाहित पुरूष अपनी पत्नी का परित्याग कर दूसरी औरत से शादी रचा लेता है। चित्रा, विशाखा, ज्येष्ठा, तीनों पूर्वाषाढा नक्षत्र तलाक के कारण बनते हैं।

विशाखा नक्षत्र में विवाहित कन्या अपने पति का परित्याग कर दूसरे पुरूष से पुन: विवाह कर लेती है या गुपचुप यौन संबंध स्थापित करती है। श्रवण, घनिष्ठा तथा अश्विनी नक्षत्र पति-पत्नी में मनमुटाव पैदाकर उनके जीवन को कठिन बना देते हैं।

अशुभ नक्षत्रों में हुए विवाह की अधिकतम आयु दस वर्षों की होती है।

नक्षत्रों के अतिरिक्त विवाह मुहूर्तों में लग्न का उचित चुनाव भी अत्यधिक महत्वपूर्ण है क्योंकि तुला और वृश्चिक दिन में, मकर और धनु राशि में बधिर संज्ञक, मेष-वृष राशि दिन में तथा कन्या-मिथुन और कर्क राशि में अंध संज्ञक होती हैं। कुंभ राशि दिन में और मीन राशि रात्रि में पंगु संज्ञक होती हैं।

बधिर संज्ञक राशि में विवाह करने से दरिद्रता, दिन में अगर अंध संज्ञक लग्न हो तो वैधव्य, अगर यह लग्न रात्रि में हो तो संतान की मृत्यु आदि का योग बनता है।

विवाह जीवन भर सुख-शांति को बनाये रखने के लिए किया जाता है, अतएव विवाह का दिन निर्धारण करने से पूर्व शुभ मुहूर्त का चयन करना अनिवार्य है। योग्य पंडित से विवाह की तिथि का निर्धारण कराया जाना चाहिए।

पंडितजी वर-वधू के शुभ-अशुभ ग्रहों का मिलान करके ही विवाह का मुहुर्त निकालते हैं। शुभ मुहुर्त में लिए गए सात फेरे व्यक्ति का दुर्घटनाओं से बचाव करते हैं। विवाह के समय का निर्णय करने के लिए कुंडली में विवाह संबंधित भाव व भावेश की स्थिति, विवाह का योग देने वाले ग्रहों की दशा, अंतर्दशा तथा वर्तमान ग्रहों के गोचर की स्थित देखी जाती है।

विवाह के सही समय के निर्धारण के लिए पंचाग के 5 तत्व- तिथि, नक्षत्र, वार, योग और करण मुख्य हैं। इसके अतिरिक्त सूर्य व चंद्र पर आधारित महीने, लग्न व राशि के भिन्न-भिन्न योग या युति के साथ मिलाकर, विवाह के शुभ मुहुर्त का चयन किया जाता है। मुहुर्त का एक महत्वपूर्ण भाग लग्न है। मुहुर्त में बहुत शुभ या अनुकूल बातें ना भी हों, किन्तु यदि लग्न का समय युक्तिपूर्वक निकाला गया हो, तो वह मुहुर्त के दूसरे अंगों द्वारा आई बाधाओं व दोषों को दूर कर देता है।

जब बृहस्पति और शुक्र अस्त हो, तो वह समय विवाह के लिए वर्जित है। महीने में आषाढ शुक्ल एकादशी से कार्तिक शुक्ल एकादशी तक का समय विवाह के लिए ठीक नहीं है। इस समय से बचना चाहिए।

सात फेरों के समय शुभ मुहूर्त का विचार करना आवश्यक हैं।

बृहस्पति के कर्क, सिंह के नवमांश में, स्वयं के नवमांश में तथा मंगल के नवमांश अर्थात् उच्च मित्र क्षेत्री तथा स्वक्षेत्री होने पर विवाह किया जा सकता है। अधिक मास, गुरु और शुक्र के अस्तकाल तथा समय शुद्धि का ध्यान रखते हुए विवाह किया जा सकता है। ऊपर वर्णित दोषों के बावजूद हमारे देश में अधिकांश विवाह अबूझ मुहूर्तों में सम्पन्न होते आ रहे हैं।

विवाह मुहूर्त के लिए तिथि, वार और नक्षत्रों पर बल दिया जाता है।

इसमें भी नक्षत्र पर विशेष बल दिया जाता है। तिथि, वार पर इसलिए भी अधिक जोर नहीं दिया गया है, क्योंकि अशुभ तिथियां किसी खास स्थितियों में काफी शुभ हो जाती है। उदाहरण के लिए चतुर्थी तिथि अगर शनिवार को हो तो सिद्घ योग बन जाता है। यद्यपि पृथक रूप से दोनों ही अशुभ तिथि तथा दिन होते हैं; लेकिन नक्षत्रों के साथ ऐसी कोई बात नहीं होती।

विवाह के लिए रोहिणी, मृगाशिरा, मघा, अनुराधा, तीनों उत्तरा, स्वाति, हस्त, मूल एवं रेवती नक्षत्र माने जाते हैं। रोहिणी नक्षत्र में विवाह सम्पन्न होने पर दंपति में आपसी प्रेम बढता है और संतान-पक्ष सुदृढ होता है। मृगाशिरा नक्षत्र संतान की प्रगति का कारक होता है और सुखमय लम्बा दांपत्य देता है।

मघा-नक्षत्र सुखी संतान का कारक और हस्त नक्षत्र मान-सम्मान प्राप्त कराने वाला होता है। अनुराधा नक्षत्र पुत्र-पुत्रियां प्रदान कराने वाला होता है। उत्तरा नक्षत्र विवाह के दो-तीन वर्षों के अंदर ही उन्नति देने वाला होता है। स्वाति नक्षत्र विवाह के तुरंत बाद उन्नति कराता है। रेवती नक्षत्र धन-संपत्ति और समृद्घि विवाह के चार साल बाद देता है।

मूल, मघा और रेवती नक्षत्र का चयन करते समय उनके चरणों पर विशेष ध्यान दिया जाता है। मूल और मघा के प्रथम और रेवती के चतुर्थ चरण का परित्याग करना चाहिए।

किन गुण दोषों का ध्यान रखें, विवाह मुहूर्त निर्धारण में.

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार वर और कन्या की जन्म कुंडलियां मिलाकर किए जाने वाले विवाह के मुहूर्त में प्रमुख दोषों का विवेचन-

सामान्य रूप से सभी शुभ कार्यों में वर्जित 21 प्रमुख दोष:-पंचांग शुद्धि का अभाव, सूर्योदयास्त या गुरु, शुक्रास्त विभिन्न देश के रीति रिवाज को छोड़कर, संक्रांति दिन, पाप षडवर्ग में लग्न होना, विवाह लग्न में छठे शुक्र व अष्टम में मंगल, त्रिविध गणांत, लग्न-कारी योग, विकंगत चंद्रमा, वर-वधू की राशि से अष्टम लग्न, विषघटी, दुर्मुहूर्त पाप ग्रह वार दोष, लतादि दोष, ग्रहण नक्षत्र, उल्पात नक्षत्र, पाप विद्ध नक्षत्र, पापयुत नक्षत्र, पाप नवांश व क्रांतिसाम्य (महापाप)।

विवाह मास- सूर्य संक्रमण की मेष, वृष, मिथुन, वृश्चिक, मकर, कुंभ राशियों के चांद्र मासों में विवाह उत्तमोत्तम होता है। श्रावण, भाद्रपद एवं आश्विन मास विवाह के लिए उत्तम हैं।

विवाह तिथियां- द्वितीया, तृतीया, पंचमी, सप्तमी, दशमी, एकादशी एवं त्रयोदशी तिथियां विवाह के लिए उत्तमोत्तम हैं। प्रतिपदा (कृष्ण), षष्ठी, अष्टमी, द्वादशी एवं पूर्णिमा तिथियां विवाह के लिए उत्तम हैं।

विवाह वार- सोमवार, बुधवार, गुरुवार एवं शुक्रवार विवाह के लिए उत्तमोत्तम हैं। रविवार विवाह के लिए उत्तम हैं।

विवाह नक्षत्र- रोहिणी, मृगशिरा, मघा, उत्तराफाल्गुनी, हस्त, स्वाती, अनुराधा, मूल, उत्तराषाढ़ा, उत्तरभाद्र एवं रेवती नक्षत्र विवाह के लिए उत्तमोत्तम हैं। अश्विनी, चित्रा, श्रवण एवं धनिष्ठा नक्षत्र विवाह के लिए उत्तम हैं।

विवाह योग- प्रीति, आयुष्मान, सौभाग्य, शोभन, सुकर्मा, धृति, वृद्धि, धु्रव, सिद्धि, वरीयान, शिव, सिद्ध, साध्य, शुभ, शुक्ल एवं ब्रह्म योग विवाह के लिए प्रशस्त हैं।

विवाह करण- बव, बालव, कौलव, तैतिल, गर और वणिज विवाह के लिए प्रशस्त हैं। शकुनि, चतुष्पद, नाग एवं किंस्तुघ्न करण विवाह के लिए सामान्य हैं। विष्टि करण विवाह के लिए सर्वथा त्याज्य है।

गुरु/शुक्र अस्त विचार- गुरु और शुक्र ग्रह यदि अस्त चल रहे हों, तो उसे तारा डूबा कहते हैं। इसलिए गुरु-शुक्र का अस्त काल विवाह मुहूर्त के लिए त्याज्य है।

देव शयन विचार- जब सूर्य उत्तरायण होता है, उस काल को देवताओं का दिन माना जाता है। सूर्य दक्षिणायन काल देवताओं की रात्रि मानी जाती है। यही काल देवताओं का शयन काल कहलाता है। देव शयन काल में भी विवाह मुहूर्त त्याज्य होता है।

विवाह में विशेष लत्तादि दोष- विवाह लग्न में मुख्य रूप से 10 दोष वर्जित हैं, जो इस प्रकार हैं:-

“लत्ता पात युति वेध जामित्र बाणपंचक एकार्गल उपग्रह क्रांतिसाम्य दग्धा।”

इनमें वेध व क्रांतिसाम्य अति गंभीर दोष हैं, अतः विवाह लग्न में इनका त्याग अवश्य करना चाहिए।

लत्ता दोष:— लत्ता दोष एक गंभीर दोष है जिसका सर्वथा त्याग करना चाहिए। इसकी दो स्थितियां होती हैं।

1.पात दोष:– सूर्य जिस नक्षत्र में हो उसी नक्षत्र में यदि फेरों का समय आ जाए तो पात दोष होता है। मघा, आश्लेषा, चित्रा, अनुराधा, रेवती और श्रवण ये 6 पातकी नक्षत्र हैं। ये सभी सूर्य के संयोग से पतित हो जाते हैं। इसके अतिरिक्त साध्य, हर्षण, शूल, वैधृत, व्यतिपात व गंड इन योगों का अंत यदि उस दिन के नक्षत्र में हो, तो पात दोष होता है। इसे चंडायुध दोष भी कहते हैं। यह प्रायः सभी शुभ कार्यों में वर्जित है।

2.युति दोष:— विवाह नक्षत्र में पाप ग्रह का विचरण या युति हो, तो युति दोष होता है। सूर्य, मंगल, शनि, राहु और केतु पाप ग्रह हैं। यदि चंद्र षडवर्ग में श्रेष्ठ, उच्च, स्वक्षेत्री या मित्र हो, तो युति दोष का परिहार हो जाता है। शुभ ग्रहों में बुध और गुरु यदि चंद्र के नक्षत्र में हों और मित्र राशि में हों, तो भी युति दोष नहीं माना जाता। शुक्र की युति को शुभ माना गया है, इसका दोष नहीं लगता है।

युति दोष के शुभ-अशुभ फल इस प्रकार हैं-

१.वेध दोष:— विवाह नक्षत्र का जिस नक्षत्र में वेध हो, उसमें कोई क्रूर या पाप ग्रह चल रहा हो, तो वेध दोष और 12 वें नक्षत्र को सूर्य, तीसरे को मंगल, छठे को बृहस्पति और आठवें को शनि लात मारता है।

दूसरी स्थिति में बायीं ओर के सातवें नक्षत्र को बुध, नौवें को राहु, पांचवें को शुक्र और 22 वें को पूर्ण चंद्र लात मारता है।

इसका फल इस प्रकार है।

पंचशलाका चक्र में एक रेखा पर पड़ने वाले निम्न नक्षत्रों में ग्रह होने से नक्षत्रों का परस्पर वेध हो जाता है। रोहिणी-अभिजित, भरणी-अनुराधा, उत्तराषाढ़ा-मृगशिरा, श्रवण-मघा, हस्त – उत्तराभाद्रपद, स्वाति-शतभिषा मूल-पुनर्वसु, रेवती – उत्तराफलगुनि , चित्रा-पूर्वाभाद्रपद, ज्येष्ठा-पुष्य, पूर्वाषाढ़-आद्र्रा, धनिष्ठा-अश्लेषा, अश्विनी-पूर्वाफाल्गुनी, विशाखा-कृत्तिका का आपस में वेध होता है।

यदि विवाह नक्षत्र में शुभ ग्रह का वेध हो तो ‘पादवेध’ होता है। पादवेध में पूरा नक्षत्र दूषित नहीं होता, सिर्फ चरण दूषित होता है। यदि नक्षत्र के चतुर्थ चरण पर ग्रह हो, तो सामने वाले नक्षत्र के प्रथम चरण पर वेध होगा। यदि ग्रह द्वितीय चरण पर हो, तो सामने वाले नक्षत्र के तृतीय चरण पर वेध होगा।

विवाह मुहूर्त में पादवेध के काल का ही त्याग करना चाहिए, संपूर्ण नक्षत्र का नहीं। पापग्रहों द्वारा भोगकर छोड़े हुए नक्षत्र को यदि चंद्र भोग ले, तो नक्षत्र शुद्ध होकर वेध दोष दूर हो जाता है।

‘रवि वेधे च वैधकं, पुत्रशोको भवेत कुजे।’

अर्थात सूर्य के वेध में विवाह करने से कन्या विधवा हो जाती है और मंगल वेध से पुत्रशोक होता है। शनि के वेध से मृतसंतान उत्पन्न होती है तथा राहु के वेध से स्त्री व्यभिचारिणी हो जाती है। अतः लग्न में इसका परित्याग अवश्य ही करना चाहिए।

यामित्र दोष:— विवाह नक्षत्र से 14 वें नक्षत्र पर कोई ग्रह हो, तो यामित्र या जामित्र दोष लगता है। जामित्र अर्थात सप्तम स्थान। विवाह के समय चंद्र या लग्न से सप्तम भाव में कोई ग्रह हो, तो यह दोष होता है। अतः सप्तम स्थान की शुद्धि आवश्यक होती है। पूर्ण चंद्र, बुध, गुरु और शुक्र के होने से जामित्र शुभ तथा पाप ग्रहों के होने से अशुभ फलदायक होता है। सप्तम अशुभ ग्रह व्याधि और वैधव्य का कारक होता है।

बाण पंचक दोष:— संक्रांति के व्यतीत दिनों (लगभग 16 दिन) में 4 जोड़कर 9 का भाग देने पर शेष 5 रहे तो मृत्यु पंचक दोष होता है। यदि गतांश में 6 जोड़कर 9 का भाग देने 5 शेष बचे, तो रोग पंचक, 3 जोड़कर 9 का भाग देने पर 5 शेष बचे, तो अग्नि पंचक, यदि 1 जोड़कर 9 का भाग देने पर 5 शेष बचे, तो राज पंचक और यदि 8 जोड़कर 9 का भाग देने पर 5 शेष बचे, तो चोर पंचक दोष होता है। यदि शेष 5 नहीं रहे, तो बाण दोष नहीं होगा। यदि रविवार को रोग पंचक, सोमवार को राज पंचक, मंगल को अग्नि पंचक, शुक्र को चोर पंचक और शनि को मृत्यु पंचक होता है। ये सभी दोष विवाह में वर्जित हैं। रोग और चोर पंचक रात्रि में, राज और अग्नि पंचक दिन में और दोनों की संधि में मृत्यु पंचक वर्जित है। मृत्यु पंचक को छोड़ कर 4 पंचकों में दोष का निर्वाह हो जाता है। लेकिन मृत्यु पंचक सर्वथा वर्जित है। इसमें विवाह नहीं करना चाहिए।

एकार्गल दोष:– विष्कुम्भ, अतिगंड, शूल, गंड, व्याघात, वज्र, व्यतिपात, परिघ, वैधृति ये अशुभ योग विवाह के दिन हों तथा सूर्य नक्षत्र से विवाह नक्षत्र विषम हो तो एकार्गल दोष होता है। इसमें नक्षत्र गणना 28 मानकर की जाती है। इस दोष में खोड़ी (ऽ) लगती है दोष नहीं हो तो रेखा (।) लगाते हैं।

उपग्रह दोष: — सूर्य नक्षत्र से विवाह नक्षत्र तक गणना में 5, 7, 8, 10, 14, 15, 18, 19, 21, 22, 23, 24 या 25वें नक्षत्र में कोई ग्रह आए, तो उपग्रह दोष होता है।

क्रांतिसाम्य दोष: — जब स्पष्ट चंद्रक्रांति सूर्य क्रांति के बिल्कुल समान हो तब क्रांतिसाम्य दोष होता है। एक ही अयन में स्पष्ट चंद्र व सूर्य का योग 360 अंश पर क्रांतिसाम्य होने पर वैधृति नामक महापात होता है। विभिन्न अयन में स्पष्ट चंद्र व सूर्य का योग 180 अंश पर क्रांतिसाम्य होने पर यह व्यतिपात संज्ञक होता है। क्रांतिसाम्य काल का निर्धारण गणित विधि से सिद्धांतोक्त पाताध्यायों के अनुसार किया जाता है।

साधारण तौर पर मेष-सिंह, वृष-मकर, तुला-कुंभ, कन्या-मीन, कर्क-वृश्चिक और धनु-मिथुन इन राशि युग्मों में, एक में सूर्य व एक में चंद्र हो, तो क्रांतिसाम्य दोष संभावित होता है। क्रांतिसाम्य दोष शुभ कार्यों में सभी शुभ गुणों को नष्ट कर देता है। विवाह पटल के अनुसार शस्त्र से कटा, अग्नि में जला या सर्प के विषदंश से पीड़ित व्यक्ति तो जीवित बच सकता है, किंतु क्रांतिसाम्य में विवाह करने पर वर-वधू दोनों ही जीवित नहीं रहते। अतः लग्न शुभ (शुद्ध) होने पर भी उक्त दोषों (क्रांतिसाम्य, वेधदोष) में विवाह नहीं करना चाहिए। सूक्ष्म क्रांति साम्य (महापात) की गणित गणना होती है। इसमें सभी शुभ कार्य वजिर्त हैं।

दग्धा तिथि:— सूर्य राशि से तिथि को वर्जित माना गया है।

नीचे दिए गए तिथि चक्र में जिस माह के सूर्य के नीचे जो तिथि लिखी गई है, वह दग्धा तिथि मानी जाती है। इसमें विवाहादि शुभ कार्य वर्जित हैं। विशेष रूप से त्याज्य चार-दोष, विवाह लग्न में निम्नोक्त 4 दोष भी त्याज्य हैं–

(1)मर्म वेध: लग्न में पाप ग्रह होने से मर्म वेध होता है।
(2)कंटक दोष: त्रिकोण में पाप ग्रह होने से कंटक दोष होता है।
(3)शल्य दोष: चतुर्थ और दशम में पाप ग्रह होने से शल्य दोष होता है।
(4)छिद्र दोष: सप्तम भाव में पाप ग्रह होने से छिद्र दोष होता है।


ज्येष्ठा विचार- ज्येष्ठ मास में उत्पन्न व्यक्ति का ज्येष्ठा नक्षत्र हो तो ज्येष्ठ मास में विवाह वर्जित होता है। वर और कन्या दोनों का जन्म ज्येष्ठ मास में हुआ हो, तो इस स्थिति में भी ज्येष्ठ मास में विवाह वर्जित है। विवाह के समय तीन ज्येष्ठों का एक साथ होना वर्जित है। दो या चार या छह ज्येष्ठा होने से विवाह हो सकता है। एक ज्येष्ठा अर्थात केवल मास या केवल वर या कन्या हो तो यह अशुभ नहीं होता व इसे दोष नहीं समझा जाता है.

सिंह-गुरु वर्जित:– सिंह राशि में गुरु हो तो विवाह वर्जित होता है। लेकिन मेष का सूर्य रहे तो सिंह के गुरु में विवाह हो सकता है।

होलाष्टक:—फाल्गुन मास के शुक्लपक्ष में होलिका दहन से 8 दिन पहले अर्थात् शुक्लाष्टमी से पूर्णिमा तक होलाष्टक रहते हैं, जो कि शतरुद्रा, विपाशा, इरावती और तीनों पुष्कर को छोड़कर सर्वत्र शुभ हैं, इसलिए इन स्थानों के अतिरिक्त सर्वत्र विवाहादि शुभ कार्य हो सकते हैं।

इनके अतिरिक्त कुछ अन्य प्रमुख दोषों का फल इस प्रकार है। व्यतिपात में विवाह होने पर मृत्यु और वंश नाश की संभावना रहती है।

गंडांत में विवाह होने पर मृत्यु, वज्र में विवाह होने पर अग्निदाह, गंड में रोग होता हैं।

विवाह में लग्न शुद्धि- दिन और रात के 24 घंटों में 12 राशियों के 12 लग्न होते हैं। सभी मुहूर्तों में लग्न की सर्वाधिक प्रधानता होती है। विवाह आदि शुभ कार्यों में लग्न का शोधन गंभीरता से किया जाता है। विवाह हेतु वृष, मिथुन, कन्या, तुला, धनु लग्न शुभ कहे गए हैं, इन लग्नों में विवाह उत्तम फलदायी होता है। अलग-अलग भावों में स्थित ग्रह विवाह लग्न हेतु अशुभ होते हैं।इनमें से कुछ ग्रहों की पूजा कराकर लग्न शुद्धि की जा सकती है। इनकी शांति के उपरांत विवाह में तथा दाम्पत्य जीवन में बाधाएं नहीं आतीं।

विवाह लग्न में शुभ ग्रह केंद्र, त्रिकोण या द्वितीय, द्वादश में हों और पाप ग्रह भाव 3, 6 या 11 में स्थित हों तो शुभफल देते हैं। लग्न (प्रथम भाव) से षष्ठ में शुक्र व अष्टम में मंगल अशुभ होता है। सप्तम भाव ग्रह रहित हो, विवाह लग्न से चंद्र भाव 6, 8 या 12 में न हो, तो लग्न शुभ होता है।

लग्न भंग— मुहूर्त चिंतामणि के अनुसार यदि किसी व्यक्ति के लग्न के व्यय भाव में शनि हो, तो उस लग्न में विवाह नहीं करना चाहिए। दशम में मंगल, तृतीय में शुक्र, लग्न में चंद्र या पाप ग्रह हो, लग्नेश, सूर्य, चंद्र छठे भाव में हो अथवा चंद्र, लग्न का स्वामी या कोई शुभ ग्रह आठवें भाव में हो अथवा सप्तम भाव में कोई भी ग्रह हो, तो लग्न भंग होता है।

विवाह लग्न में कन्या, मिथुन, धनु का पूर्वाधि नवांश शुभ होता है, बशर्ते ये अंतिम नवांश में न हो। उक्त राशियों का नवांश हो, तो दम्पति को पुत्र, धन व सौभाग्य की प्रप्ति होती है। वर और कन्या की जन्म राशियों या लग्नों से अष्टम या द्वादश भाव का नवांश यदि अनेक गुणों से युक्त हो तो त्याज्य है।

श्री रामदैवज्ञ के अनुसार, लग्न का स्वामी लग्न में स्थित हो या उसे देखता हो, अथवा नवांश का स्वामी नवांश में स्थित हो या उसे देखता हो, तो वह वर को शुभफल प्रदान करता है। इसी प्रकार नवांश का सप्तमेश सप्तम भाव को देखता हो, तो वधू के लिए शुभ फलदायक होता है।

कर्तरी दोष एवं परिहार: — विवाह लग्न से दूसरे या 12वें भाव में यदि पाप ग्रह हो, तो कर्तरी दोष होता है, जो कैंची की तरह दोनों ओर से लग्न की शुभता को काटता है। लग्न से द्वितीय स्थान में पापग्रह वक्री और द्वादश में पाप ग्रह मार्गी हो, तो यह दोष महाकर्तरी होता है, इसका सर्वथा त्याग करना चाहिए। लग्न में बलवान शुभग्रह हो, तो कर्तरी दोष भंग हो जाता है। केंद्र या त्रिकोण में गुरु, शुक्र या बुध हो, या कर्तरीकारक ग्रह नीचस्थ अथवा शत्रुक्षेत्री हो, तो कर्तरी दोष होता है।

पंगु, अंध, बधिर लग्न:— तुला और वृश्चिक दिन में तथा धनु एवं मकर रात्रि में बधिर (बहरी) होते हैं। बधिर लग्न में विवाह करने से जीवन दुखमय होता है। मेष, वृष और सिंह दिन में तथा मिथुन, कर्क और कन्या रात्रि में अंधे होते हैं। दिन में कुंभ एवं रात्रि में मीन लग्न पंगु (विकलांग) होता है। पंगु लग्न में विवाह होने पर धन का नाश होता है। दिवा अंध लग्न में कन्या विधवा हो जाती है, जबकि रात्रि अंध लग्न, संतान के लिए मृत्युकारक होता है। इसलिए इन दोषपूर्ण लग्नों से बचना चाहिए।

किंतु, यदि लग्न का स्वामी या गुरु लग्न को देखता हो, तो पंगु, बधिर आदि लग्न दोष नहीं होते हैं।

त्रिबल शुद्धि विचार- वर व कन्या की जन्मराशि से सूर्य, चंद्र व गुरु का गोचर नाम त्रिबल विचार है। विवाह मुहूर्त के दिनों में से जिस दिन त्रिबल शुद्धि बन जाए, उसी दिन विवाह निश्चय करके बता देना चाहिए।

कन्या के लिए गुरुबल व वर के लिए सूर्यबल का विचार और चंद्रबल का विचार दोनों के लिए करना चाहिए। सूर्य, चंद्र और गुरु की शुध्दी होने पर ही विवाह शुभ होता है।

वरस्य भास्कर बलं:— विवाह के समय वर के लिए सूर्य का बलवान और शुभ होना अति आवश्यक है। सूर्य के बलवान होने से दाम्पत्य जीवन में पति का पत्नी पर प्रभाव व नियंत्रण रहता है। दोनों में वैचारिक सामंजस्य रहता है एवं जीवन के कठिन समय में संघर्ष करने की क्षमता भी सूर्य से प्राप्त होती है। सूर्य की शुभता से संपूर्ण वैवाहिक जीवन सुखमय होता है।

विवाह के समय वर की जन्म राशि से तीसरे, छठे, 10वें और 11वें भाव में सूर्य का गोचर श्रेष्ठ; किंतु चैथे, आठवें और 12वें भाव में अनिष्ट होने के कारण त्याज्य है। पहले, दूसरे, पांचवें, सातवें और नौवें भाव का सूर्य पूजनीय है; अर्थात विवाह से पहले सूर्य की पूजा व लाल दान करने से ही विवाह शुभ हो पाता है। इनमें पहले और सातवें स्थान का सूर्य वर द्वारा विशेष पूज्य माना गया है।

दाम्पत्य जीवन में वर के वर्चस्व के लिए यह आवश्यक है कि सूर्य के उत्तरायण काल, शुक्ल पक्ष व दिवा लग्न में ही विवाह करे। दिवा लग्न में भी अभिजित मुहूर्त सर्वश्रेष्ठ है। सूर्य जिस राशि में हो उससे चतुर्थ राशि का लग्न अभिजित लग्न कहलाता है। यह स्थानीय मध्याह्न काल (दोपहर) में पड़ता है। स्थानीय समयानुसार दिन के 12 बजने से 24 मिनट पूर्व 24 मिनट पश्चात तक 48 मिनट का अभिजित मुहूर्त होता है। उत्तम जाति ब्राह्मण व क्षत्रियों के लिए यह विवाह लग्न श्रेष्ठ कही गया है।

दक्षिण भारतीय ब्राह्मण अभिजित लग्न में ही विवाह करते हैं और यही कारण है कि उत्तर भारतीयों की अपेक्षा उनका वैवाहिक जीवन अधिक सफल रहता है। जन्मगत जाति के आधार पर ही नहीं बल्कि जन्म नक्षत्र के अनुसार यदि वर का वर्ण ब्राह्मण या क्षत्रिय हो, तो भी अभिजित लग्न में ही विवाह शुभफलदायी होता है।

विवाह लग्न में सूर्य यदि एकादश भाव में हो, तो यह सोने में सुहागा होता है। विवाह हेतु अन्य लग्न शुद्धि न हो सके, तो अभिजित मुहूर्त या लग्न में विवाह सभी वर्गों के लिए शुभ होता है।

कन्यायां गुरौ बलं:— कन्या के दाम्पत्य सुख व पति भाव का कारक गुरु है, इसलिए गुरु की शुद्धि में कन्या का विवाह शुभ होता है। कन्या की जन्म राशि से दूसरे, पांचवें, सातवें, नौवें या 11वें में स्थित गुरु विवाह हेतु शुभ माना जाता है, क्योंकि इन स्थानों में गुरु बलवान होता है। पहले, तीसरे, छठे या 10वें में स्थित गुरु मध्यम होता है, जो पूजा से शुभ हो जाता है।

कन्या से पीला दान कराकर विवाह करना चाहिए। चैथे, आठवें या 12वें में स्थित गुरु अशुभ होता हैं, यह पूजा से भी शुभ नहीं होता। अतः कन्या की जन्म राशि से चौथे, आठवें या 12वें में स्थित गुरु विवाह हेतु वर्जित है।

इन स्थानों में गुरु का गोचर वैधव्यप्रद होता है। मिथुन या कन्या राशि में हो, तो कन्या की हानि होती है। कर्क या मकर राशि में हो, तो कन्या के लिए दुखदायी होता है। किंतु उक्त स्थानों में स्वराशि या परमोच्च हो, तो शुभ होता है।

सिंह राशि के नवांश में गुरु हो, तो विवाह नहीं करना चाहिए। कन्या के विवाह हेतु गुरु शुद्धि का इतना गहन विचार तो उस समय किया जाता था, जब उसका विवाह दस वर्ष या इससे भी कम की आयु में होता था।

उपरोक्त दोनों ही योगों में विवाह कार्य संपन्न करने का कार्य नहीं किया जाता है. शुक्र व गुरु दोनों शुभ है. इसके कारण वैवाहिक कार्य के लिये इनका विचार किया जाता है.

आजकल तो लड़की का विवाह सोलह वर्ष के बाद ही होता है। इस उम्र तक वह कन्या नहीं रहती, वह तो रजस्वला होकर युवती हो जाती है। इसलिए गुरुबल शुद्धि रहने पर भी पूजा देकर लड़की का विवाह कराना शास्त्रसम्मत है। ऐसे में विवाह लग्न शुद्धि के लिए चंद्रबल देखना ही अनिवार्य है।

शुक्र व गुरु का बाल्यवृ्द्धत्व—शुक्र पूर्व दिशा में उदित होने के बाद तीन दिन तक बाल्यकाल में रहता है, इस अवधि में शुक्र अपने पूर्ण रुप से फल देने में असमर्थ नहीं होता है। इसी प्रकार जब वह पश्चिम दिशा में होता है, 10 दिन तक बाल्यकाल की अवस्था में होता है। शुक्र जब पूर्व दिशा में अस्त होता है, तो अस्त होने से पहले 15 दिन तक फल देने में असमर्थ होता है। पश्चिम में अस्त होने से 5 दिन पूर्व तक वृ्द्धावस्था में होता है। इन सभी समयों में शुक्र की शुभता प्राप्त नहीं हो पाती है। गुर किसी भी दिशा मे उदित या अस्त हों, दोनों ही परिस्थितियों में 15-15 दिनों के लिये बाल्यकाल में वृ्द्धावस्था में होते है।

विवाहे चंद्रबलं:– श्री बादरायण के अनुसार गुरु और शुक्र के बाल्य दोष में कन्या का और वृद्धत्व दोष में पुरुष का विनाश होता है। गुरु अस्त हो तो पति का, शुक्रास्त हो, तो कन्या का तथा चंद्रास्त हो, तो दोनों का अनिष्ट होता है। अतः विवाह के समय वर और कन्या दोनों के लिए चंद्रबल शुद्धि आवश्यक है।

चंद्र का गोचर दोनों की जन्म राशियों से तीसरे, छठे, सातवें, 10वें या 11वें भाव में शुभ (उत्तम) होता है। पहले, दूसरे, पांचवें, नौवें या 12वें में चंद्रमा पूज्य है। चौथे, आठवें या 12वें स्थान का चंद्र दोनों के लिए अशुभ होता है। विवाह पटल के अनुसार चौथा और 12वां चंद्र ही अशुभ होने के कारण त्याज्य है। 


चन्द्र का शुभ/ अशुभ होना—चन्द्र को अमावस्या से तीन दिन पहले व तीन दिन बाद तक बाल्य काल में होने के कारण इस समय को विवाह कार्य के लिये छोड दिया जाता है। ज्योतिष शास्त्र में यह मान्यता है की शुक्र, गुरु व चन्द्र इन में से कोई भी ग्रह बाल्यकाल में हो तो वह अपने पूर्ण फल देने की स्थिति में न होने के कारण शुभ नहीं होता है. और इस अवधि में विवाह कार्य करने पर इस कार्य की शुभता में कमी होती है।

चन्द्र बल—चन्द्र का गोचर 4, 8 वें भाव के अतिरिक्त अन्य भावों में होने पर चन्द्र को शुभ समझा जाता है। चन्द्र जब पक्षबली, स्वराशि, उच्चगत, मित्रक्षेत्री होने पर उसे शुभ समझा जाता है अर्थात इस स्थिति में चन्द्र बल का विचार नहीं किया जाता है।

एकार्गलादि विवाह संबंधी दोष चंद्र एवं सूर्य के बलयुक्त होने के कारण नष्ट हो जाते हैं, अर्थात् दोनों उच्चस्थ या मित्र क्षेत्री होकर विवाह लग्न में बैठे हो, तो समस्त दोष दूर हो जाते हैं। चंद्र बुध के साथ शुभ और गुरु के साथ सुखदायक होता है। विवाह लग्न में चंद्र की निम्नलिखित युतिस्थितियां दोषपूर्ण होती हैं, इनका त्याग करना चाहिए।

सूर्य-चंद्र की युति– यह युति दंपति को दारिद्र्य दुख देती है।
चंद्र-मंगल की युति– इस युति के फलस्वरूप मरणांतक पीड़ा होती है।
चंद्र-शुक्र की युति– इस युति के फलस्वरूप पति, पराई स्त्री से प्रेम करता है, अर्थात् पत्नी को सौतन का दुख झेलना पड़ता है।
चंद्र-शनि की युति– यह युति वैराग्य देती है।
चंद्र-राहु की युति– राहु से युत चंद्र कलहकारी होता है।
चंद्र-केतु की युति– यह युति कष्ट प्रदान करती है।

इसके अतिरिक्त यदि विवाह लग्न में चंद्र दो पाप ग्रहों से युत हो तो मृत्यु का कारक होता है। विवाह में गोधूलि विचार भी किया जाना चाहिए क्योंकि इसमें सभी दोष त्याज्य हैं।

ऎसी मान्यता है कि शनि जो काल का प्रतीक है, समय का निर्णय करता है और बृहस्पति विवाह के लिए आशीर्वाद देता है। इस प्रकार मंगल जो पौरूष, साहस व पराक्रम का प्रतीक है, उसका भी विवाह संबंधित भाव व ग्रहों के ऊपर से विवाह की तिथि की 6 मास की अवधि के गोचर में विचरण होना चाहिए अथवा गोचर से दृष्टि होनी चाहिए। विवाह का समय निश्चित करने के लिए अष्टकवर्ग विधि का प्रयोग किया जाता है।

व्यक्तिगत, सामाजिक तथा राजनैतिक सभी प्रकार के कार्यो को शुभ मुहुर्त में आरंभ करने से सिद्धि व सफलता प्राप्त होती है।

सगे भाई बहनों का विचार—एक लडके से दो सगी बहनों का विवाह नहीं किया जाता है। दो सगे भाईयों का विवाह दो सगी बहनों से नहीं करना चाहिए। इसके अतिरिक्त दो सगे भाईयों का विवाह या बहनों का विवाह एक ही मुहूर्त समय में नहीं करना चाहिए। जुडंवा भाईयों का विवाह जुडवा बहनों से नहीं करना चाहिए। परन्तु सौतेले भाईयों का विवाह एक ही लग्न समय पर किया जा सकता है। विवाह की शुभता में वृ्द्धि करने के लिये मुहूर्त की शुभता का ध्यान रखा जाता है।

पुत्री के बाद पुत्र का विवाह—पुत्री का विवाह करने के 6 सूर्य मासों की अवधि के अन्दर सगे भाई का विवाह किया जा सकता है। लेकिन पुत्र के बाद पुत्री का विवाह 6 मास की अवधि के मध्य नहीं किया जा सकता है। ऎसा करना अशुभ समझा जाता है। यही नियम उपनयन संस्कार पर भी लागू होता है। पुत्री या पुत्र के विवाह के बाद 6 मास तक उपनयन संस्कार नहीं किया जाता है। दो सगे भाईयों या बहनों का विवाह भी 6 मास से पहले नहीं किया जाता है।

गण्ड मूलोत्पन्न का विचार—मूल नक्षत्र में जन्म लेने वाली कन्या अपने ससुर के लिये कष्टकारी समझी जाती है। आश्लेषा नक्षत्र में जन्म लेने वाली कन्या को अपनी सास के लिये अशुभ माना जाता है। ज्येष्ठा मास की कन्या को जेठ के लिये अच्छा नहीं समझा जाता है। इसके अलावा विशाखा नक्षत्र में जन्म लेने पर कन्या को देवर के लिये अशुभ माना जाता है। इन सभी नक्षत्रों में जन्म लेने वाली कन्या का विवाह करने से पहले इन दोषों का निवारण किया जाता है।

जन्म मास, जन्मतिथि व जन्म नक्षत्र में विवाह— इन तीनों समयावधियों में अपनी बडी सन्तान का विवाह करना सही नहीं रहता है. व जन्म नक्षत्र व जन्म नक्षत्र से दसवां नक्षत्र, 16वां नक्षत्र, 23 वां नक्षत्र का त्याग करना चाहिए!

Monday, 30 March 2026

बुद्ध तथा भारतीय इतिहास

बुद्ध तथा भारतीय इतिहास के कालक्रम-दोनों में अंग्रेजों ने भारी जालसाजी की है। इतिहास के प्राध्यापक और अधिक गलती करेंगे।
पुराणों के अनुसार परीक्षित जन्म के १५०० वर्ष बाद नन्द का अभिषेक हुआ था। उसके बाद मौर्य साम्राज्य का तीसरा राजा अशोक का काल १४७२-१४३६ ईपू था। प्रायः उसी काल में कश्मीर में गोनन्द वंश का राजा अशोक हुआ था (१४४०-१४०० ईपू)-राजतरंगिणी (१/१०१-१६१)। कश्मीर का अशोक बौद्ध हुआ था जिसके कारण वहां के बौद्धों ने मध्य एशिया को बौद्धों को बुलाकर कश्मीर पर आक्रमण करवाया। ऐसा ही वर्तमान काल में भी चल रहा है-बौद्ध के बदले मुस्लिम बाहर से आक्रमण कराते हैं। मौर्य अशोक कभी बौद्ध नहीं हुआ था। अन्तिम मौर्य राजा बृहद्रथ का सेनाध्यक्ष पुष्यमित्र शुंग ब्राह्मण था जिसे बौद्ध अपना विरोधी कहते हैं। बौद्ध ग्रन्थों में २८ बुद्धों की चर्चा है जिनमें ३ बुद्ध ओड़िशा में थे। अशोक के निगलिहवा शिलालेख में अन्य ४ बुद्धों का नाम है। फाहियान ने ५ बुद्धों का काल तथा स्थान लिखा है। इतिहास में ३ बुद्ध प्रसिद्ध हैं। शुद्धोदन के पुत्र सिद्धार्थ का जन्म ३०-३-१८८७ ई. वैशाख पूर्णिमा को लुम्बिनी में हुआ। वह ज्ञान प्राप्ति के बाद बुद्ध हुए, बीच में कभी गौतम नहीं हुए थे। गौतम बुद्ध कौशाम्बी में ५६३ ईपू में हुए थे। उन्होंने बौद्ध धर्म का पूरे भारत में प्रचार किया। सिद्धार्थ का काम सारनाथ तथा राजगीर के बीच था तथा बिम्बिसार-अजातशत्रु के सहयोगी थे। विष्णु अवतार बुद्ध मगध में अजिन ब्राह्मण के पुत्र थे, जिनका मूल नाम बुद्ध था। उन्होंने ७५६ ईपू में पश्चिम एशिया के असुरों के दमन के लिए मालव गण की स्थापना की थी, जिसका उल्लेख असीरिया तथा ग्रीक इतिहास में भी है।

Saturday, 28 March 2026

medical report

इसे सेव मत करो। इसे पढ़ो। अभी।

आपने पूरे शरीर के चेकअप के लिए ₹1,500 दिए।
12 पेज की रिपोर्ट मिली।
शायद उसमें से सिर्फ़ 2 लाइनें ही समझ आईं।

इस बीच:
- आपका B12 200 है। 500 से कम = लगातार थकान, दिमाग़ का ठीक से काम न करना, बालों का झड़ना।
- आपका Vitamin D 15 है। 30 से कम = कमज़ोर हड्डियाँ, कम इम्यूनिटी, वज़न बढ़ना। 70-80% भारतीयों में इसकी कमी है।
- आपका HbA1c 5.7 है। 5.6 से ज़्यादा = प्री-डायबिटीज़। 136 मिलियन भारतीय पहले से ही इस स्टेज पर हैं।

आप हर समय थके हुए रहते हैं।
आपके बाल झड़ रहे हैं।
आप वज़न कम नहीं कर पा रहे हैं।
आप इसका दोष स्ट्रेस को देते हैं।

यह स्ट्रेस नहीं है। यह आपका खून है।
अपनी रिपोर्ट को असल में ऐसे पढ़ें...
विटामिन B12.

आपकी रिपोर्ट में 200 आया है। लैब कहती है, "नॉर्मल रेंज: 200-900."
लेकिन सबसे सही लेवल 500-800 होता है।

200 होने पर, आप टेक्निकली तो रेंज में हैं, लेकिन असल में आपके शरीर में इसकी कमी है। इसीलिए दोपहर 3 बजे आपको 'ब्रेन फॉग' (सोचने में धुंधलापन) महसूस होता है, पहले के मुकाबले ज़्यादा बाल झड़ते हैं, और ऐसी थकान होती है जिसे कॉफी भी दूर नहीं कर पाती।

47% भारतीयों में B12 की कमी है। अगर आप शाकाहारी हैं, तो यह आंकड़ा बढ़कर 70% हो जाता है।

इलाज:
अपने डॉक्टर से 'मिथाइलकोबालामिन' (methylcobalamin) लेने को कहें ('सायनोकोबालामिन' नहीं - क्योंकि मिथाइलकोबालामिन शरीर में ज़्यादा बेहतर तरीके से एब्ज़ॉर्ब होता है)।
₹300/महीना। 8-12 हफ़्तों में असर दिखने लगेगा।
सिर्फ़ एक सप्लीमेंट। यही वह फ़र्क है जो आपके दिन को बस किसी तरह घसीटकर काटने और सचमुच पूरे दिन ऊर्जावान महसूस करने के बीच का अंतर तय करता है।

विटामिन D.

भारत में साल के 300 से ज़्यादा दिन धूप रहती है।
फिर भी हममें से 70-80% लोगों में इसकी कमी है।
आपकी रिपोर्ट में 15 आया है। जबकि लैब की नॉर्मल रेंज 20 से शुरू होती है।

लेकिन सबसे सही लेवल 50-80 के बीच होता है।
30 से कम होने पर = कमज़ोर इम्यूनिटी, जोड़ों में दर्द, वज़न जो कुछ भी करने पर भी कम नहीं होता, और बिना किसी वजह के उदासी महसूस होना।
आप अपनी बेजान त्वचा के लिए स्किनकेयर पर ₹3,000 खर्च कर रहे हैं, जबकि असली समस्या एक विटामिन की कमी है जिसे ठीक करने में सिर्फ़ ₹10 लगते हैं।

इलाज:
विटामिन D3 - 60,000 IU का सैशे, 8 हफ़्तों तक हफ़्ते में एक बार लें। उसके बाद महीने में एक बार।
किसी भी केमिस्ट की दुकान पर मिल जाएगा।
हफ़्ते में एक सैशे। बस इतना ही।

HbA1c.

यह एक ऐसा नंबर है जिसके बारे में ज़्यादातर भारतीयों ने कभी सुना भी नहीं है।
यह आपको पिछले 3 महीनों का आपका औसत ब्लड शुगर लेवल बताता है। यह फ़ास्टिंग शुगर की तरह सिर्फ़ एक सुबह का स्नैपशॉट नहीं है।
5.7 से कम = स्वस्थ।
5.7-6.4 = प्री-डायबिटिक।
6.5 से ज़्यादा = डायबिटिक।

अभी 136 मिलियन भारतीय प्री-डायबिटिक हैं। ज़्यादातर लोगों को इस बारे में कोई अंदाज़ा नहीं है, क्योंकि उनकी फ़ास्टिंग शुगर "ठीक" लग रही थी।

अगर आप इसे 5.7 पर ही पहचान लेते हैं, तो आपको दवा की ज़रूरत नहीं पड़ेगी। रोज़ाना 30 मिनट की कसरत + रिफ़ाइंड कार्ब्स को आधा करने से, 3-6 महीनों में यह वापस 5.7 से नीचे आ सकता है।

अगर आप इसे 6.5 पर पहचानते हैं, तो आपको ज़िंदगी भर डायबिटीज़ की दवा लेनी पड़ सकती है। हर महीने ₹2,000-5,000 का खर्च।

आयरन और फेरिटिन।

यह उन सभी भारतीय महिलाओं के लिए है जो इसे पढ़ रही हैं।

15-49 साल की 57% भारतीय महिलाएं एनीमिया (खून की कमी) से पीड़ित हैं। यह हममें से आधे से भी ज़्यादा हैं।
हो सकता है कि आपका हीमोग्लोबिन 12 हो। यानी "नॉर्मल।"
लेकिन किसी ने आपका फेरिटिन चेक नहीं किया होगा।

फेरिटिन = आपके शरीर में जमा आयरन। हीमोग्लोबिन तो ठीक दिख सकता है, लेकिन फेरिटिन का लेवल बहुत ज़्यादा कम हो सकता है।
30 से कम होने पर = ऐसी थकान होती है जो सोने से भी दूर नहीं होती, बालों का झड़ना जो किसी भी शैम्पू से ठीक नहीं होता, और दिमाग में धुंधलापन (brain fog) जिससे आप यह भी भूल जाती हैं कि आप किसी कमरे में क्यों गई थीं।

इलाज:
खास तौर पर फेरिटिन का टेस्ट करवाएं।
अगर लेवल 30 से कम है, तो 'आयरन बिस्ग्लाइसिनेट' (iron bisglycinate) ज़्यादा बेहतर तरीके से शरीर में घुलता है और आम आयरन की गोलियों की तरह आपके पेट को नुकसान नहीं पहुँचाता।

5 टेस्ट।
कुल खर्च: ₹2,500।
यह बाहर एक बार डिनर करने से भी कम है।
आपको ₹15,000 वाले "एग्जीक्यूटिव हेल्थ पैकेज" की ज़रूरत नहीं है।
आपको बस 5 चीज़ों की जानकारी चाहिए:
B12. विटामिन D. HbA1c. फेरिटिन. थायरॉइड (TSH).
साल में एक बार इनकी जाँच करवाएँ। और इन्हें ठीक से समझें।

थकान, बालों का झड़ना, वज़न जो कम ही नहीं होता, और वो मूड जिसे आप समझा नहीं पाते।
यह तनाव नहीं है। यह "बढ़ती उम्र" का असर नहीं है। यह "बस ज़िंदगी ऐसी ही होती है" वाली बात भी नहीं है।

यह आपके खून की बात है। और अब आप जानते हैं कि इसे कैसे समझना है।

#InfiniteEnergy

चक्र व्यूह

गीता : प्रथम श्लोक ६(७)

कभी कभी मुझे यह प्रश्न उलझा देता है कि अभिमन्यु ने जिस चक्रव्यूह की विद्या को अधूरा गर्भ में सीख लिया था, वह विद्या उसे जन्म के बाद के सोलह वर्षों में क्यों पूरी सिखाई न गई। महाभारत में कहीं भी यह उल्लेख नहीं है कि किसी ने — अर्जुन ने, कृष्ण ने, द्रोण ने — अभिमन्यु को बाद में चक्रव्यूह-भेदन की पूरी विद्या सिखाने का प्रयास किया। यह चुप्पी स्वयं एक पाठ है। एक सूक्ष्म किन्तु महत्त्वपूर्ण प्रश्न — क्या अर्जुन को स्मरण था कि उसने सुभद्रा को यह विद्या सुनाई थी, और कि वह अधूरी रह गई? संस्कृत टीकाकार इस पर मौन हैं। यदि अर्जुन जानते थे, तो यह उनकी सबसे बड़ी चूक है। यदि नहीं जानते थे, तो महाकाव्य की यह त्रासद विडम्बना और भी गहरी हो जाती है।

द्रोण ने अभिमन्यु को असंख्य अस्त्र-विद्याएँ सिखाईं होंगी किन्तु चक्रव्यूह-भेदन केवल अर्जुन की विशेष विद्या थी। यह द्रोण के पास भी पूर्णतः नहीं थी उसी रूप में। तो यह ज्ञान देना केवल अर्जुन का काम था — और अर्जुन चूक गये ।

कुरुक्षेत्र-युद्ध अचानक नहीं आया, किन्तु जब आया तो हर महारथी अपनी-अपनी तैयारी में व्यस्त था। जो ज्ञान की कमी थी वह दिखाई नहीं दी — क्योंकि किसी को यह अनुमान नहीं था कि अभिमन्यु को अकेले चक्रव्यूह में भेजना पड़ेगा।

क्या जो ज्ञान जन्म के समय अधूरा रह जाता है, उसे जीवन में पूरा किया जा सकता है?महाभारत का उत्तर क्रूर किन्तु ईमानदार है: कभी-कभी नहीं। कि कुछ अधूरापन संरचनात्मक होता है। वह व्यक्ति की असावधानी नहीं, परिस्थिति की नियति है। और वह अधूरापन ही उस व्यक्ति की त्रासदी बनता है। न उसकी कमज़ोरी से, न शत्रु की चालाकी से, बल्कि उस रिक्तता से जो किसी ने भरी नहीं, क्योंकि किसी ने देखा ही नहीं कि वह रिक्तता है।यही अभिमन्यु की असली त्रासदी है और यही उसे शाश्वत बनाती है।

मैं महाभारतकार के हिसाब से सोचूँ तो यदि अभिमन्यु ने वह विद्या पूरी सीख ली होती, वह चक्रव्यूह से जीवित निकल जाता। और तब?

कुरुक्षेत्र का परिणाम भिन्न होता।परीक्षित की आवश्यकता न होती उसी रूप में और सबसे महत्त्वपूर्ण अर्जुन का जयद्रथ-वध नहीं होता, जो महाभारत के सबसे भव्य प्रतिशोध-प्रसंगों में से एक है।

महाकाव्य को अभिमन्यु की मृत्यु चाहिए थी। जागतिक कारणों से, आख्यान-कारणों से, और नैतिक-कारणों से। इसीलिए न किसी को सूझा, न किसी ने किया।

महाभारत युद्ध होने से पूर्व द्रौपदी के चीरहरण के समय जो नैतिक पतन देखने में आया, महाभारत युद्ध के दौरान वही नैतिक पतन अभिमन्यु के साथ युद्ध में देखने आया। एक में कौरव सभा के आदरणीयों की चुप्पी थी, दूसरे में कौरव सभा के आदरणीयों की संलिप्तता थी। बल्कि द्रौपदी के समय फिर भी विकर्ण की आवाज विरोध में उठी थी, अभिमन्यु के क्षण किसी ने भी विरोध नहीं किया था। चीरहरण में भीष्म, द्रोण, कृप जानते थे कि जो हो रहा है वह अधर्म है। किन्तु वे चुप रहे। यह कायरता थी, नैतिक विफलता थी — किन्तु उनके हाथ उस पाप में प्रत्यक्षतः नहीं थे।द्रौपदी ने स्वयं पूछा था —क्या इस सभा में कोई धर्म जानने वाला नहीं?" और सभा मौन रही।अभिमन्यु-वध में वही द्रोण, वही कृप इस बार स्वयं उस पाप के उपकरण बन गए। उन्होंने केवल देखा नहीं, उन्होंने किया। एक बार एक असहाय स्त्री पर अत्याचार होते देखा। एक बार एक नि:शस्त्र किशोर पर स्वयं अत्याचार किया।

विशुद्ध नैतिक दृष्टिकोण से, अभिमन्यु की हत्या महाकाव्य-साहित्य में सर्वाधिक सावधानीपूर्वक निर्मित नैतिक अत्याचारों में से एक है। महाभारत धर्म-युद्ध के प्रत्येक नियम का क्रमिक उल्लंघन स्थापित करने में अत्यन्त सतर्क है: कर्ण ने उसका धनुष तोड़ा; कृतवर्मा ने उसके अश्व मारे; कृपाचार्य ने उसके सारथी को मारा; अश्वत्थामा ने उसकी ध्वजा काटी; और अन्ततः, जब वह निःशस्त्र था, अनेक महारथियों ने घेरकर उसे मारा। महाकाव्य इनमें से प्रत्येक उल्लंघन का स्पष्ट वर्णन करता है, और अभिमन्यु की प्रतिक्रिया का भी — वह लड़ता रहता है, नए अस्त्र खोजता है, रथ-चक्र से युद्ध करता है, कभी नहीं रुकता, कभी नहीं भागता।

महाकाव्य यह दिखाता है कि नैतिक पतन एकाएक नहीं होता। यह क्रम यों चलता है: 
मौन देखना
    ↓
मौन स्वीकृति
    ↓
निष्क्रिय सहभागिता
    ↓
सक्रिय संलिप्तता
    ↓
नेतृत्व में पाप

चीरहरण पहला पड़ाव था — जब इन महापुरुषों ने मौन रहकर यह सिखाया कि संस्था, स्वामिभक्ति और व्यक्तिगत सुरक्षा धर्म से बड़े हैं। अभिमन्यु-वध अन्तिम पड़ाव था — जब वही संस्था-निष्ठा उन्हें एक किशोर की हत्या में सीधे भागीदार बना गई।

कौरवों के ये प्रसंग नैतिकता पर संस्थागत निष्ठा की विजय बताने के प्रसंग हैं। दोनों प्रसंगों में एक समान सूत्र है — इन महापुरुषों ने व्यक्तिगत धर्म को संस्था-धर्म के नीचे दबा दिया। भीष्म की प्रतिज्ञा, द्रोण का नमक, कृप का कुलधर्म — ये सब संस्थागत बन्धन थे जो उन्हें बार-बार वह करने पर विवश करते रहे जो वे जानते थे कि अधर्म है। यही महाभारत का सबसे आधुनिक सन्देश है कि जो व्यक्ति एक बार संस्था के नाम पर मौन रहना सीख लेता है, वह धीरे-धीरे संस्था के नाम पर पाप करना भी सीख लेता है। चुप्पी और संलिप्तता के बीच की दूरी उतनी नहीं होती जितनी हम सोचते हैं।

द्रौपदी और अभिमन्यु दोनों इसके साक्षी हैं। द्रौपदी बची — किन्तु उसका अपमान महाभारत युद्ध का कारण बना। अभिमन्यु नहीं बचा — किन्तु उसकी मृत्यु महाभारत युद्ध का नैतिक केन्द्र बन गई। दोनों ने कौरव-पक्ष के महापुरुषों का असली चेहरा उघाड़ा। एक ने उनकी कायरता दिखाई, दूसरे ने उनका पतन।

इस निर्माण का नैतिक महत्त्व गहन है। महाभारत गहराई से इस प्रश्न में निवेशित है कि धर्म कब अपने स्वयं के नियमों से विचलन की अनुमति देता है। वास्तव में, सम्पूर्ण भगवद्गीता इसी प्रश्न पर विस्तारित ध्यान है। किन्तु अभिमन्यु की हत्या एक ऐसा मामला है जिसमें महाकाव्य कोई शमन-तर्क नहीं देता। यह असामान्य है, क्योंकि महाभारत सामान्यतः अपने सभी पात्रों के प्रति कठोरता से न्यायसंगत है। अभिमन्यु के हत्यारों की अशमनीय नैतिक निन्दा यह संकेत देती है कि उसकी मृत्यु युद्ध का नैतिक रसातल है।

पांडव मुझे इसीलिए पसंद हैं क्योंकि उन्होंने इन दोनों ही अन्यायों को भुलाया नहीं। अन्याय सहकर चुप बैठते तो वे भी कौरव पक्ष के इन महापुरुषों की श्रेणी में शामिल होते। 

और कौरव इसीलिए नापसंद हैं क्योंकि वे अधिक से और अधिक रसातल में गिरते गये। अश्वत्थामा पर चर्चा हम बाद में करेंगे पर आखिरी दिन उसके द्वारा किया गया कृत्य नैतिक अधोकाष्ठा का निकृष्टतम दृष्टान्त थी।

और देखिए कि वही द्रौपदी पतन के इस चरमतम क्षण पर अपने पितृपक्ष के सभी लोगों के मारे जाने बल्कि सबसे कायर तरीके से मारे जाने पर ही नहीं बल्कि अपने सभी पुत्रों के मारे जाने पर भी अश्वत्थामा को क्षमा कर देती है।प्रतिशोध से क्षमा तक की भी एक यात्रा है इस महाकाव्य में।

वनवास में जब भीम हताश होते हैं, जब अर्जुन अस्त्र-प्राप्ति के लिए जाते हैं और लौटने में विलम्ब होता है, जब युधिष्ठिर में निराशा घर करने लगती है — तब द्रौपदी वह स्त्री है जो सबको सँभालती है। वह एक साथ दो असम्भव काम करती है — अपने क्रोध को जीवित रखती है ताकि न्याय के लिए संघर्ष की आग बुझे नहीं, और अपने परिवार की आशा को जीवित रखती है ताकि वे टूट न जाएँ। यह असाधारण मनोवैज्ञानिक सन्तुलन है। और यह सन्तुलन ही उसे महाकाव्य की सबसे परिपक्व आत्मा बनाता है।

द्रौपदी अपनी पीड़ा से क्षमा तक पहुँचती है — किसी आदर्श से नहीं, किसी धर्मशास्त्र के उपदेश से नहीं। वह कहती है — मैं जानती हूँ एक माँ का दर्द क्या होता है। इसलिए मैं उस माँ को यह पीड़ा नहीं दूँगी। यह empathy का सर्वोच्च रूप है — वह empathy जो अपनी पीड़ा के चरमतम क्षण में भी दूसरे की पीड़ा देख सके।

पूरे महाभारत में द्रौपदी और युधिष्ठिर के बीच एक निरन्तर नैतिक संवाद चलता है।युधिष्ठिर कहते हैं — क्षमा करो, धर्म पर छोड़ो, क्रोध त्यागो।द्रौपदी कहती है — क्षमा कायरता बन जाती है जब अन्याय करने वाला पश्चाताप न करे।दोनों गलत नहीं हैं। दोनों एक ही सत्य के दो पक्ष हैं।किन्तु जो बात उल्लेखनीय है वह यह है कि युद्ध के अन्त में द्रौपदी वहाँ पहुँचती है जहाँ युधिष्ठिर सदा थे — क्षमा तक। और युधिष्ठिर वहाँ पहुँचते हैं जहाँ द्रौपदी थी — शोक तक।दोनों एक-दूसरे की यात्रा करते हैं। यह महाकाव्य का अद्भुत वैवाहिक मनोविज्ञान है।

जिसे सबसे अधिक खोना पड़ा, जिसे सबसे अधिक अधिकार था प्रतिशोध का — वह क्षमा तक पहुँची।यही महाभारत का सन्देश है कि प्रतिशोध न्याय का प्रारम्भ हो सकता है। किन्तु क्षमा उसकी परिणति है — जब वह करुणा से जन्मे, दुर्बलता से नहीं। द्रौपदी ने यह यात्रा पूरी की। अग्नि से जन्मी स्त्री अन्त में प्रकाश बन गई।

अभिमन्यु को कृष्ण की तरह दो दो माताओं सुभद्रा और द्रौपदी का स्नेह मिला था हालाँकि महाकाव्य उन दोनों के मातृस्नेह का वैसाविस्तृत विवरण नहीं देता लेकिन वह था। अभिमन्यु इस महाकाव्य के समाजशास्त्रीय जगत् में वह है जिसे आज हम बाल-प्रतिभा कहते हैं। एक ऐसा पात्र जिसकी प्रतिभा उसके अनुभव और आयु से इतनी अधिक है कि उसके चारों ओर का सामाजिक तन्त्र उसे वयस्क मानता है, उस पर वयस्क भार और अपेक्षाएँ थोपता है। वह सर्वाधिक घातक स्थिति में अपनी युवावस्था के बावजूद नहीं बल्कि किसी अर्थ में उसके कारण ही भेजा जाता है।

पूर्व-जन्म के ज्ञान-संचरण प्रसंग का एक समाजशास्त्रीय आयाम है जिस पर अपर्याप्त ध्यान दिया गया है। वह है इसकी लिंग-संरचना चक्रव्यूह का ज्ञान एक सर्वोच्च सैन्य रहस्य है वह, एक ऐसी स्त्री के पास संचारित किया जा रहा था जो केवल एक माध्यम के रूप में उपस्थित थी। सुभद्रा की नींद ने संचरण को बाधित किया, और पारम्परिक व्याख्या उसे इसके लिए दोषी नहीं मानती।वह बस सो गई। किन्तु संरचनात्मक व्यवस्था प्रकट करती है: ज्ञान अर्जुन का था, अभिमन्यु को प्राप्त करना था, और सुभद्रा का शरीर ही वह माध्यम था जिसके द्वारा संचरण को गुज़रना था।

इसलिए गीता को अभिमन्यु को सौभद्र कहना उचित ही लगता है।

Friday, 27 March 2026

ज्ञान ज्ञान की सीमा

निदान 
१. अर्थ, उद्देश्य-
निदान का एक अर्थ है, रोग की जांच या निर्णय। लघुत्रयी में प्रसिद्ध एक आयुर्वेद पुस्तक है-माधव निदान। इसका अन्य प्रचलित अर्थ है, देव मूर्तियों की मुद्रा, आयुध आदि के प्रतीक।
किसी वस्तु का पूर्ण ज्ञान असम्भव है, जैसा गीता में कहा है-ज्ञानं ज्ञेयं परिज्ञाता त्रिविधा कर्मचोदना। (गीता, १८/१८) 
ज्ञान ३ या अधिक प्रकार का अनन्त है, जिनको अनन्त वेद कहा गया है (अनन्ताः वै वेदाः-तैत्तिरीय ब्राह्मण, ३/१०/११)। तीन प्रकार के अनन्त विष्णु सहस्रनाम में निर्दिष्ट हैं-अनन्त, असंख्येय, अप्रमेय।
ऋक् = मूर्ति = संख्येय अनन्त
यजु = गति = असंख्येय अनन्त
साम = महिमा = अप्रमेय अनन्त
अथर्व = ब्रह्म = अज्ञेय अनन्त। 
उसमें ज्ञेय उतना ही है, जिसका साम या प्रभाव हम तक पहुंचता है, अतः भगवान् ने अपने को वेदों में सामवेद कहा है (गीता, १०/२२)। उसका भी बाहरी ज्ञान होता है, जिसे जानने वाले को परिज्ञाता कहा है। 
अव्यक्त ब्रह्म या शब्द के परिज्ञान का सूत्र वाज. यजुर्वेद में है-
स पर्यगात्, शुक्रं, अकायं, अव्रणं, शुद्धं, अपापविद्धं, कविः मनीषी परिभूः स्वयम्भूः याथातथ्यतो अर्थान् व्यदधात् शाश्वतीभ्यः समाभ्यः। (ईशावास्योपनिषद्, ६, वाज. सं. ४०/८, काण्व सं. ४०/८)।
अव्यक्त विश्व या वाक् व्यक्त विश्व व्यक्त वाक्
(१). शुक्र तम तम
(२). अकाय पिण्ड शब्द आदि
(३). अव्रण छिद्र, दोष अपूर्णता, लुप्त शब्द।
(४). अस्नाविरम् ऋषि (रस्सी) कारक आदि से सम्बन्ध
(५). शुद्ध मिश्रण अपूर्ण रूप
(६). अपापविद्ध माया के आवरण शब्द, पद, वाक्य का पार्थक्य
ज्ञान प्राप्ति का क्रम वेद में निर्दिष्ट है-
कासीत् प्रमा, प्रतिमा, किं निदानमाज्यं, किमासीत्, परिधिः क आसीत्।
छन्दः किमासीत् प्रउगं किमुक्थं यद्देवा देवमयजन्त विश्वम्॥ (ऋक्, १०/१३०/३)
देवों ने विश्व (पुरुष सूक्त का विराट्, सीमाबद्ध पिण्डों का समूह, अधिपूरुष उसका अधिष्ठान है) की पूजा या यज्ञ कैसे किया? (यज देवपूजासंगतिकरण दानेषु, धातुपाठ १/७२८)। (१) प्रमा = सिद्धान्त, अनुमान (शैव दर्शन का प्रमा, प्रमाता), (२) प्रतिमा (उसी जैसा छोटा या बड़ा प्रतिरूप), (३) निदान मूल जैसा प्रतीक, (४) छन्द = शब्द, आकाश या काल की माप, (५) प्रउग = साधन, उपकरण (प्रउग का अर्थ शस्त्र किया गया है)। निर्माण ३ गुणों से हुआ है अतः इसका अर्थ त्रिकोण भी है)। (६) उक्थ (उक्थ = निर्माण से बचा भाग, भोजन के बाद जूठन)। 
२. देव-असुर-
आकाश में फैली हुई ऊर्जा या असु को प्राण कहते हैं। जिस असु से निर्माण नहीं होता वह असुर है। जिस असु के दिवा रूप से सृजन होता है, वह देव हैं।  
प्राणो वा असुः (शतपथ ब्राह्मण, ६/६/२/६)
तेनासुनासुरानसृजत। तदसुराणामसुरत्वम्। (तैत्तिरीय ब्राह्मण, २/३/८/२)
दिवा देवानसृजत नक्तमसुरान् यद्दिवा देवानसृजत तद्देवानां देवत्वं यदसूर्य्यं तदसुराणामसुरत्वम्। (षड्विंश ब्राह्मण, ४/१)
मनुष्यों में भी जो यज्ञ (उत्पादन चक्र) के समन्वय से अपनी आवश्यकता का स्वयं उत्पादन करते हैं, वे देव हैं।
यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवास्तानि धर्माणि प्रथमान्यासन्।
तेह नाकं महिमानः सचन्तः यत्र पूर्वे साध्याः सन्ति देवाः॥ (पुरुष-सूक्त, १६)
असुर भी यज्ञ करते हैं, पर उनका मुख्य उद्देश्य असु (बल) द्वारा अन्य द्वारा उत्पादित सम्पत्ति पर अधिकार करना है।
देव-असुर के बीच अन्य अन्तर है अदिति-दिति। दिति का अर्थ है काटना, दो अवखण्डने (धातु पाठ, ४/३९)। दैत्य हर प्रकार से बांटते हैं-ब्रह्म के एकत्व के बदले अब्राहम को मानते हैं। कहते हैं कि केवल मेरा देव सही है, बाकी के गलत हैं-मेरे देव को मानो या मरो। अपने पैगम्बर के पूर्व की सभी बातें गलत थीं, उसके बाद ही सत्य का पता चला। उसके विपरीत अदिति अखण्ड है, सनातन तत्त्व है, ब्रह्म तथा विश्व का एकत्व मानता है।
३. देव-देवी विभाग-
वेद में पुरुष-स्त्री का विभाजन कई प्रकार से है-
(१) पुरुष-प्रकृति-चेतन तत्त्व पुरुष है, उपादान या पदार्थ तत्व स्त्री है।
मयाध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते स चराचरम् (गीता, ९/१०)
वेद में प्रकृति को श्री या अदिति कहा है।
(२) वाक् और अर्थ-वाक् का अर्थ शब्द है, तथा उसका प्रसार आकाश। उसमें जो सीमाबद्ध पिण्ड या पुर है, वह अर्थ है। पुर में निवास करने वाला पुरुष है। पृथ्वी भी एक अर्थ है, जिसे अंग्रेजी में अर्थ (Earth) कहते हैं। एक वस्तु अर्थ या पुरुष है। उसका विस्तार वाक् स्त्री है। केश पुल्लिङ्ग है पर उसका समूह दाढ़ी, मूंछ, चोटी आदि स्त्रीलिङ्ग है। सैनिक पुल्लिङ्ग है पर उसका समूह सेना, वाहिनी, पुलिस आदि स्त्रीलिङ्ग है। मनुष्य रूप में जन्म देने के लिए स्त्री का गर्भ ही क्षेत्र या स्थान है, पुरुष का योग विन्दु मात्र है। 
इयं या परमेष्ठिनी वाग्देवी ब्रह्म संशिता। (अथर्व, १९/९/३)
वाचीमा विश्वा भुवनानि अर्पिता (तैत्तिरीय ब्राह्मण, २/८/८/४)
(३) वृषा-योषा -वृषा का अर्थ है वर्षा करने वाला। समुद्र या मेघ जैसे विस्तार से ब्रह्माण्ड या तारा जैसे विन्दुओं की वर्षा हुई। द्रव रूप में निकले इसलिए इनको द्रप्स (drops) कहा गया। स्रोत से निकलने या अलग होने के कारण इनको स्कन्न या स्कन्द कहा गया। सभ्यता या ज्ञान का स्रोत रूप में पुरुष ऋषभ या वृषभ है। जो क्षेत्र निर्माण के लिए युक्त होता है या ग्रहण करता है, वह योषा या स्त्री है।
द्रप्सश्च स्कन्द पृथिवीमनुद्याम्। (ऋक्, १०/१७/११, अथर्व, १८/४/२८, वाज. यजु. १३/५, तैत्तिरीय सं. ३/१/८/३, ४/२/८/२, मैत्रायणी संहिता, २/५/१०, ४/८/९, काण्व सं. १३/९, १६/१५,३५/८) 
यः सप्तरश्मिः वृषभस्तु विष्मानवासृजत् सर्तवे सप्तसिन्धून्। (ऋक्, २/१२/१२)
योषा वै वेदिः, वृषा अग्निः (शतपथ ब्राह्मण, १/२/५/१५)
४. देव विभाग-हर स्थान के प्राण रूप देव अनन्त हैं। पर उनके २ मुख्य विभाग हैं। सौर मण्डल में ३३ धाम हैं, ३ पृथ्वी के भीतर, ३० बाहर। पृथ्वी को आकाश के लिए माप-दण्ड माना गया है, बड़े धाम पृथ्वी से क्रमशः २-२ गुणा बड़े हैं। केन्द्र से ८ धाम तक अग्नि के ८ रूप वसु हैं, उसके बाद १ अश्विन रूप, फिर ११ वायु रूप रुद्र हैं। रुद्र के बाद पुनः १ अश्विन और उसके बाद तेज रूप १२ आदित्य हैं।
पूरे विश्व के लिए ३ प्रकार से विभाग हैं, जिनका लिए गायत्री मन्त्र में ३ पाद हैं।
स्रष्टा रूप ब्रह्मा- तत् सवितुः वरेण्यम्। सविता = सव या प्रसव करने वाला, स्रष्टा। यह सविता सूर्य पिता है। पिता का जन्म पितामह ब्रह्माण्ड से हुआ। उसका जन्म स्वायम्भुव या पूर्ण विश्व से हुआ। स्वायम्भुव का निर्माता तत् या वह सविता है।
कर्ता रूप विष्णु-तत् सविता दीखता नहीं है। उसकी सृष्टि में क्रिया हो रही है वह दीखती है, जिसे समझ सकते हैं। भर्गो (तेज वाले) देवस्य धीमहि। विष्णु का प्रत्यक्ष रूप हमारा सूर्य है।
ज्ञान रूप शिव- यह हमारी बुद्धि (धी) को प्रेरित करता है- धियो यो नः प्रचोदयात्।
अन्य देवों के भी इस प्रकार के रूप हैं-
ब्रह्मा-(१) स्रष्टा रूप अव्यक्त ब्रह्म, (२) दृश्य ७ लोक, (३) शब्द ज्ञान रूप वेद।
विष्णु- (१) सृष्टि की इच्छा, (२) जीवन दाता सूर्य, (३) व्यक्तिगत चेतना रूप।
शिव- (१) श्वो-वसीयस या शून्य में स्थित मन, (२) गति, तेज का अनुभव रुद्र, (३) शान्त ज्ञान रूप शिव।
हनुमान- (१) पहले जैसी सृष्टि करने वाला वृषाकपि, (२) गति रूप मारुति, (३) बुद्धि रूप मनोजव। तीनों प्रकार से यह शिव का अवतार रूप है।
देवी रूप-ये चण्डी पाठ के ३ चरित्र हैं।
स्रष्टा रूप महाकाली = मूल अव्यक्त अन्धकारमय विश्व, जिसमें काल का भी आभास नहीं था। विश्व का पुनः उसी में लय होता है।
क्रिया रूप महालक्ष्मी- दृश्य जगत् लक्ष्मी है। लक्ष = देखना (लक्ष दर्शनाङ्कनयोः-धातु पाठ, १०/५, १०/१६४)।
ज्ञान रूप-महासरस्वती-जिसकी गणना की जा सके वह गणपति है-स्थूल जगत्। जिसकी गणना नहीं हो सके वह रसवती रूप सरस्वती है।
५. दारु ब्रह्म-जगन्नाथ ६ अर्थों में दारु ब्रह्म हैं-(१) चेतन तत्त्व, (२) निरपेक्ष द्रष्टा, (३) निर्माण क्रम, (४) निर्माण सामग्री और आधार, (५) सदा बढ़ने वाला, (६) संकल्प-क्रिया फल का अनन्त क्रम।
निर्माण सामग्री और आधार-ब्रह्म वनं ब्रह्म स वृक्ष आसीत् यतो द्यावा पृथिवी निष्टतक्षुः।
मनीषिणो मनसा विब्रवीमि वो ब्रह्माध्यतिष्ठद् भुवनानि धारयन्॥ (तैत्तिरीय ब्राह्मण, २/८/९/१६) 
निर्माण का अधिष्ठान, आरम्भ और विधि-
किं स्विदासीदधिष्ठानमारम्भणं कतमत्स्वित् कथासीत्।
यतो भूमि जनयन् विश्वकर्मा वि द्यामौर्णोन् मह्ना विश्वचक्षाः॥ (ऋक्, १०/८१/२, तैत्तिरीय संहिता, ४/६/२/११) 
सर्वोच्च द्रष्टा-यस्मात् परं नापरमस्ति किञ्चित्, यस्मान्नाणीयो न ज्यायोऽस्ति कश्चित्।
वृक्ष इव स्तब्धो दिवि तिष्ठत्येनेदं पूर्णं पुरुषेण सर्वम्॥ (श्वेताश्वतर उपनिषद्, ३/९) 
गुण, वासना, कर्म, फल का अनन्त क्रम-
अधश्चोर्ध्वं प्रसृतास्तस्य शाखा गुणप्रवृद्धा विषयप्रवालाः। 
अधश्च मूलान्यनुसन्ततानि कर्मानुबन्धीनि मनुष्यलोके॥ (गीता, १५/२)
प्राण, चित्त, वासना-द्वे बीजे चित्तवृक्षस्य प्राणस्पन्दनवासने। 
एकस्मिँश्च तयोः क्षीणे क्षिप्रं द्वे अपि नश्यतः (मुक्तिकोपनिषद्, २/२७)
ब्रह्म के ३ रूपों का निर्देश गायत्री मन्त्र के ३ पादों में है-सृष्टि रूप ब्रह्मा, क्रिया रूप विष्णु, ज्ञान रूप शिव। इनके प्रतीक हैं-पलास, अश्वत्थ, वट।
अश्वत्थरूपो भगवान् विष्णुरेव न संशयः। रुद्ररूपो वटस्तद्वत् पलाशो ब्रह्मरूपधृक्॥ (पद्मपुराण, उत्तर खण्ड, ११५/२२)
६. विष्णु रूप अश्वत्थ- अश्वत्थः सर्व वृक्षाणां (गीता, १०/२६)-कई रूप में अश्वत्थ विष्णु रूप है-(१) इस पर अनेक पक्षी आश्रय लेते हैं, जैसे पूर्थ्वी पर जीव गण, (२) इसके गोल बीजों में कण समान छोटे बीज हैं, जैसे ब्रह्माण्ड में कण रूप तारा आदि। (३) सूक्ष्म बीज से बड़ा अश्वत्थ बन जाता है, जैसे सूक्ष्म सङ्कल्प से अनन्त विश्व, (४) पिप्पल का छोटा बीज पत्थर, दीवाल आदि में भी जम जाता है, जैसे हर स्थिति में जीव हो जाते हैं। (५) वृक्ष नष्ट होने पर उसी के काष्ठ से अन्य पीपल उगने लगता है, एक कल्प के अन्त होने पर अन्य कल्प। (६) रोग नाशक।
अश्वत्थे वो निषदनं पर्णे वो वसतिष्कृता। (ऋक्, १०/९७/५)। 
यस्मिन् वृक्षे मध्वदः सुपर्णा निविशन्ते चाधिविश्वे। तस्येदाहुः पिप्पलं स्वाद्वग्रे तन्नोन्नशद्यः पितरं न वेद॥ (ऋक्, १/१६४/२२)
अश्वत्थे वो निषदनं पर्णे वो वसतिष्कृता। गो भाज इत् किलासथ यत् सनवथ पूरुषम्॥ (ऋक्, १०/९७/५)
अलाबूनि पृषत्कान्यश्वत्थ पलाशम्। पिपीलिका वटश्वसो विद्युत् स्वापर्णशफो। गोशफो जरिततरोऽथामो दैव॥(अथर्व, २०/१३५/३)
अथ यदनाशकायनमित्याचक्षते ब्रह्मचर्यमेव तदेष ह्यात्मा न नश्यति यं ब्रह्मचर्येणानुविन्दते। अथ यदरण्यायनमित्याचक्षते ब्रह्मचर्यमेव तदरश्च ह वैण्यश्चर्णवौ ब्रह्मलोके तृतीयस्यामितो दिवि। तदैरं मदीयं सरस्तदश्वत्थः सोमसवनः। तदपराजिता पूः ब्रह्मण। प्रभु विमितं हिरण्मयम्। (छान्दोग्य उपनिषद्, ८/५/३) 
७. ब्रह्मा रूप पलास- पलास के हर शाखा से ३ पत्र निकलते हैं-शाखा भी बची रहती है। अतः ब्रह्मा रूप सृष्टि को समझने के लिए वेद में कई प्रकार से (प्रायः ६० वैदिक उल्लेख) त्रिविध विभाजन हैं। हर विभाजन में कुछ छूट जाता है जिससे त्रयी का अर्थ ४ वेद होता है। अविभक्त को अज्ञेय ब्रह्म कहा है (अविभक्तं विभक्तेषु - गीता, १३/१६, १८/२०) । अतः ब्रह्मा को पलास जैसा कहा है और व्रतारम्भ संस्कार में मूल ब्रह्म रूप पलास दण्ड धारण करते हैं। 
यस्मिन् वृक्षे सुपलाशे देवैः संपिबते यमः। अत्रा नो विश्पतिः पिता पुराणां अनु वेनति॥ (ऋक्, १०/१३५/१)
सर्वेषां वा एष वनस्पतीनां योनिर्यत् पलासः। (स्वायम्भुव ब्रह्मरूपत्त्वात्) तेजो वै ब्रह्मवर्चसं वनस्पतीनां पलाशः-ऐतरेय ब्राह्मण, २/१)
ब्रह्म वै पलाशस्य पलाशम् (= पर्णम्)। (शतपथ ब्राह्मण, २/६/२/८)
ब्रह्म वै पलाशः। (शतपथ ब्राह्मण, १/३/३/१९) 
८. शिव रूप वट- शिव का प्रतीक वट है। शिव ज्ञान रूप हैं, गुरु-शिष्य परम्परा का आरम्भ शिव से ही हुआ है। वट शिव का प्रतीक है। इसकी हवाई जड़ भूमि से मिल कर अन्य वृक्ष को जन्म देती है। इसी प्रकार गुरु शिष्य को ज्ञान दे कर अपने जैसा मनुष्य बना देता है। ऋग्वेद में मूल वृक्ष की शाखा से उत्पन्न वृक्ष को द्रुघण या प्रघण (द्वितीय, मिले हुए घने वृक्ष) कहा गया है। यज्ञ रूप शिव का प्रतीक या वाहन वृषभ है, जिसके शृङ्ग, सिर, पाद, हाथ आदि यज्ञ के अङ्ग रूप में वर्णित हैं। लोकभाषा में द्रुघन का दुमदुमा (द्रुम से द्रुम) हो गया है जो हर शिव पीठ में है।
न्यक्रन्दयन्नुपयन्त एन ममेहयन् वृषभं मध्य आजेः। 
तेन सूभर्वं शतवत् सहस्रं गवां मुद्गलः प्रघने जिगाय॥५॥
शुनमष्ट्राव्यचरत् कपर्दी वरत्रायां दार्वानह्यमानः॥८॥
इमं तं पश्य वृषभस्य युञ्जं काष्ठाया मध्ये द्रुघणं शयानम्॥९॥ (ऋक्, १०/१०२/५-८)
वट की शाखा नीचे आकर पुनः उठती है, इस अर्थ में इसे वेद में न्यग्रोध कहा है-
ते यत् न्यञ्चो अरोहन्, तस्मात् न्यङ् रोहति न्यग्रोहः, न्यग्रोहः वै नाम तत् न्यग्रोहं सन्तं न्यग्रोध इति आचक्षते। (ऐतरेय ब्राह्मण, ७/३०)
न्यञ्चो न्यग्रोधा रोहन्ति। (शतपथ ब्राह्मण, १३/२/७/३)
अथर्व वेद में अश्वत्थ, न्यग्रोध आदि का रोगनाशक रूप में वर्णन है-
यत्रा अश्वत्था न्यग्रोधा महावृक्षाः शिखण्डिनः। तत्परेत अप्सरसः प्रतिबुद्धा अभूतन॥ (अथर्व, ४/३७/४)
’प्रतिबुद्धा अभूतन’ जानने, स्मरण रखने अर्थ में है। इस पर सिद्धार्थ की कथा बनी कि उनको पिप्पल के नीचे बैठने से ज्ञान मिला। मस्तिष्क में जो ज्ञान रूपी वृक्ष है, उसके नीचे बैठने से ज्ञान मिलता है। ज्ञान के लिए गुरु रूपी वट के नीचे बैठते हैं, वह वटु (छात्र) या वटुक (छोटा छात्र) है। 
वट-विटप समीपे भूमिभागे निषण्णं, सकल मुनि जनानां ज्ञान-दातारमारात्।
त्रिभुवनगुरुमीशं दक्षिणामूर्तिदेवं, जनन-मरण दुःख-च्छेद दक्षं नमामि॥
चित्रं वट-तरोर्मूले, वृद्धाः शिष्या गुरुर्युवा। गुरोस्तु मौनं व्याख्यानं, शिष्यास्तु छिन्न-संशयाः॥
(दक्षिणामूर्ति उपनिषद्)
बट-वृक्ष की शाखाओं से नये वृक्षों का निर्माण सृष्टि के एक कल्प के बाद नये कल्प के निर्माण जैसा है। निर्माण क्रम शिव हैं, उसके पत्र पर कर्त्ता रूपी बीज श्रीकृष्ण हैं-
करारविन्देन पदारविन्दं, मुखारविन्दे विनिवेशयन्तम्।
वटस्य पत्रस्य पुटे शयानं, बालं मुकुन्दं मनसा स्मरामि॥ 
(ब्रह्म पुराण, ५३/२७-३३, भागवत पुराण, १२/९/२०-२५, विष्णु धर्मोत्तर पुराण, १/७८/१०-२०, स्कन्द पुराण, २/२/३/५-१४ के आधार पर बिल्वमङ्गल रचित बालमुकुन्दाष्टकम्, १) 
९. देवी रूप-(१) काली का प्रतीक नीम वृक्ष है। काली ने रक्तबीज रूप में फैलते वायरस रूप जीवों को खा लिया था। प्रकृति में नीम के पत्ते भी यही करते हैं। महाकाली चरित्र में जगन्नाथ के सुप्त रूप को विष्णु तथा जाग्रत रूप को जगन्नाथ कहा है। अतः जगन्नाथ मूर्ति भी नीम काष्ठ से ही बनतीहै।
(२) लक्ष्मी- विष्णु रूप पीपल के पत्तों में लक्ष्मी का निवास कहते हैं। लक्ष्मी को श्री कहते हैं। २ फलों को श्रीफल कहते हैं-बेल, नारियल। 
(३) सरस्वती-बेल तथा नारियल का शिव से भी सम्बन्ध है। बेल के ३ पत्ते शिव के त्रिशूल या त्रिताप नाशन के प्रतीक हैं। इनसे शरीर का ताप दूर होता है। नारियल का फल मनुष्य के सिर जैसा है, कठोर आवरण में कोमल फल और जल। उसमें सिर जैसी जटा तथा शिव के ३ नेत्र जैसे ३ छेद हैं। बेल का भी बाहरी भाग कठोर है।
१०. भुजा, सिर, आयुध-
(१) विष्णु-सहस्रबाहु-पूर्ण विश्व रूप में १००० सिर, अक्ष (धुरी, आंख), पाद वाला पुरुष (पुरुष सूक्त, १)
चतुर्बाहु-स्वस्तिक चिह्न की ४ दिशायें। ये परस्पर लम्ब क्रान्तिवृत्त के ४ पाद हैं-ज्येष्ठा नक्षत्र का स्वामी इन्द्र, रेवती का पूषा, श्रवण का गोविन्द जो अरिष्ट की नेमि या सीमा (दूर करने वाले) हैं, तथा पुष्य का बृहस्पति। यह जीवन के ४ उद्देश्य (पुरुषार्थ = धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) पूरा करता है-समाज के क्रम (श्रवा) में श्रेष्ठ अर्थात् वृद्धश्रवा इन्द्र की रक्षा में ही धर्म पालन होता है। विश्व को पाने या जानने से हमारी पुष्टि पूषा द्वारा होती है। हमारी इच्छा (काम) गोविन्द से पूरी होती है तथा मोक्ष ज्ञान से होता है जिसका स्रोत बृहस्पति है।
स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवा स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः। 
स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु॥ (यजु, २५/१९)
भास्कराचार्य ने लीलावती में इसकी गणना दिखाई है कि विष्णु की ४ भुजाओं में ४ अस्त्रों-शंख, चक्र, गदा पद्म का विन्यास ४ x ३ x २ x १ = २४ प्रकार से हो सकता है। मुख्य अवतार १० हैं जो असुरों के प्रतिकार के लिए हुए थे, तथा एक अभी बाकी है।
द्विभुज मनुष्य रूप में अवतार-तेनैव रूपेण चतुर्भुजेन सहस्रबाहो भव विश्वमूर्ते (गीता, ११/४६)
आयुध-(१) शंख-शब्द, आकाश का गुण। ध्रुव को ज्ञान की प्रेरणा विष्णु के शंख से हुई थी (विष्णु पुराण, १/१२/४८-५०, भागवत पुराण, ४/९/४-५)। (२) चक्र-सृष्टि के ९ चक्र, अव्यक्त को मिला कर १० सर्ग हैं। ९ सर्गों के ९ कालमान हैं (सूर्य सिद्धान्त, १४/१)। क्रान्ति वृत्त-इस सुदर्शन चक्र से चन्द्र कक्षा २ विन्दुओं पर कटती है, जिनको राहु, केतु कहते हैं। मनुष्य रूप राहु असुर समुद्र मन्थन के बाद विष्णु के सुदर्शन चक्र द्वारा मारा गया था। (३) गदा-युद्ध का सामान्य अस्त्र जिससे व्यूह, शस्त्र आदि काटते हैं। वायु का अस्त्र (गरुड़ पुराण, ३/१२/७९)। सृष्टि के लिए गति, क्रिया-तस्मिन् अपो मातरिश्वा दधाति (ईशावास्योपनिषद्, ४)। (४) पद्म-पृथ्वी, जिस पर पद रखते हैं। पृथ्वी के ३ स्तर-ग्रह पृथ्वी, सौर आकर्षण क्षेत्र, ब्रह्माण्ड या काश्यपी पृथ्वी।
(२) शिव-पञ्चमुख-इसके कई अर्थ हैं-आकाश के ५ पर्व
मण्डल देवता महाभूत
स्वयम्भू ब्रह्मा आकाश
परमेष्ठी विष्णु वायु (गति)
सौर इन्द्र अग्नि
चान्द्र सोम आप
भू अग्नि पृथ्वी
इन महाभूतों का प्रतीक कलश है। इनके प्रतीक माहेश्वर सूत्र के प्रथम ५ वर्ण ( ५ मूल स्वर) हैं, जो नन्दिकेश्वर काशिका के अनुसार सृष्टि आरम्भ के प्रतीक हैं- अ, इ, उ, ऋ, लृ।
आकाश के ५ पर्व या मण्डलों की प्रतिमा मनुष्य शरीर के ५ कोष हैं, जिनके केन्द्र सुषुम्ना के ५ चक्र हैं-विशुद्धि, अनाहत, मणिपूर, स्वाधिष्ठान, मूलाधार। इनके बीज मन्त्र आकाश सृष्टि के ५ मूल स्वरों के सवर्ण अन्तःस्थ वर्ण हैं- हयवरट्। लण् । बीजमन्त्रों का क्रम सृष्टि क्रम से लेने पर स्वाधिष्ठान तथा मणिपूर का क्रम आपस में बदल जाता है। ५ कोष-आनन्दमय, विज्ञानमय, मनोमय, प्राणमय, अन्नमय कोष।
मस्तिष्क के वाम-दक्षिण २-२ भाग, केन्द्र में अघोर। अन्य ४ भाग-ईशान, तत्पुरुष, वामदेव, सद्योजात।
३ अम्बक-३ पृथ्वी और उनके ३ आकाश-तिस्रो मातॄस्त्रीन्पितॄन्बिभ्रदेक ऊर्ध्वतस्थौ नेमवग्लापयन्ति । 
मन्त्रयन्ते दिवो अमुष्य पृष्ठे विश्वमिदं वाचमविश्वमिन्वाम् ॥ (ऋक्, १/१६४/१०)
तिस्रो भूमीर्धारयन् त्रीरुत द्यून्त्रीणि व्रता विदथे अन्तरेषाम् ।
ऋतेनादित्या महि वो महित्वं तदर्यमन् वरुण मित्र चारु ॥ (ऋक्, २/२७/८)
(३) ब्रह्मा के ४ मुख-४ वेद। इसका प्रतीक पलास दण्ड है जिससे ३ पत्ते निकलते हैं। मूल दण्ड = अथर्व, ३ पत्र = ऋक्, यजु, साम।
(४) महाकाली-खड्ग-नाश शक्ति। मुण्ड माला-नष्ट होने वाली सृष्टि। इसे अक्ष माला कहा है, अर्थात् अ से क्ष तक के ५० वर्ण-ये मूलाधार से आज्ञा चक्र तक के पद्मों के दल हैं। अभयमुद्रा-संहार भी समय पर होता है, सृष्टि काल में अभय है। प्रलय काल में अन्धकार है, जिसका रूप कृष्ण वर्ण है। उससे बाहर कुछ नहीं है, इस रूप में दिगम्बर हैं (शिव भी)। प्रलय में लीन विश्व श्मशान है।
(५) दशभुजा दुर्गा और शिव के आयुध-शूलं टङ्क कृपाण वज्र दहनान् नागेन्द्र पाशाङ्कुशान्,
पाशं भीतिहरं दधानममिताकल्पोज्ज्वलाङ्गं भजे। (तन्त्रसार)
१. अभय, २. टङ्क, ३. शूल, ४. वज्र, ५. पाश, ६. खड्ग, ७. अङ्कुश, ८. घण्टा, ९. नाग, १०. अग्नि।
इनका एक अर्थ है कि आकाश या सृष्टि के १० आयाम हैं-रेखा, पृष्ठ, आयतन (स्तोम), पदार्थ (अग्नि), काल, पुरुष (चेतन), ऋषि (रस्सी, पिण्डों के बीच सम्बन्ध), नाग (पिण्डों का आवरण), रन्ध्र (कमी, विषमता), रस या आनन्द (मूल स्रोत, अभय)।
आध्यात्मिक रूप में ये शरीर की स्थिति हैं-जैसे वायु से शूल, अग्नि से टङ्क, जल रोग वरुण का पाश, नाग आदि उपप्राण, अङ्कुश = कांटा, खड्ग (चान्द्र आकार-मानसिक कष्ट), घण्टा (कोलाहल), अग्नि (ज्वलन)।
(६) महासरस्वती की १८ भुजा १८ विद्या की प्रतीक हैं। ललिता सहस्रनाम (२-३) में भूजा तथा बाणों का अर्थ दिया है-
उद्यद् भानु सहस्राभा चतुर्बाहु समन्विता।
राग-स्वरूप पाशाढ्या क्रोधाकाराङ्कुशोज्ज्वला॥२॥
मनोरूपेक्षु कोदण्डा पञ्च तन्मात्र सायका।
निजारुण प्रभापूरमज्जद् ब्रह्माण्ड मण्डला॥३॥
राग = पाश, क्रोध= अङ्कुश, मन = इक्षु धनुष, ५ बाण = ५ तन्मात्रा शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध।
तन्त्र साहित्य में सभी देवियों कॆ आयुध प्रतीकों का विस्तृत वर्णन है।
(७) गणेश-गणनात्मक विश्व गणेष है। जिसकी गणना नहीं हो सके वह ज्ञान सरस्वती है। कण रूप में पिण्डों की संख्या विश्व के प्रत्येक स्तर में १ खर्व है, अतः गणेश को खर्व कहा गया है। 
आकाश में ब्रह्माण्ड संख्या = हमारे ब्रह्माण्ड में तारा संख्या = मनुष्य मस्तिष्क में कलिल संख्या = १ खर्व (शतपथ ब्राह्मण, १२/३/२/५) में इनको लोमगर्त्त कहा है जो १ सेकण्ड का प्रायः ७५,००० भाग है। शतपथ ब्राह्मण (१०/४/४/२) के अनुसार वर्ष में जितने लोमगर्त हैं, आकाश में उतने ही नक्षत्र हैं।
गणेश के गोल पेट का अर्थ है, ब्रह्माण्ड, तारा, ग्रह-सभी प्ण्ड गोल है। उनकी सूंड बायीं तरफ मुड़ने का अर्थ है कि पेंच या टेपी को बायीं तरफ घुमाने पर वह ऊपर उठता है। भौतिक विज्ञान के विद्युत् चुन्मकीय प्रभाव या जाइरोस्कोप के नियम इसी प्रकार हैं।

Friday, 20 March 2026

चंडीपाठ में कवच, अर्गला ,कीलक और कुंजिका स्तोत्र से हवन नहीं करना चाहिए

चंडीपाठ में कवच, अर्गला ,कीलक और कुंजिका स्तोत्र से हवन नहीं करना चाहिए सप्रमाण प्रस्तुति~

यो मूर्ख: कवचं हुत्वा प्रतिवाचं नरेश्वरः ।
स्वदेह - पतनं तस्य नरकं च प्रपद्यते ।।
अन्धकश्चैव महादैत्यो दुर्गाहोम-परायणः ।
कवचाहुति - प्रभावेण महेशेन निपातितः ।।

कवच में पाहि, अवतु, रक्ष रक्ष, रक्षतु, पातु आदि शब्दों का प्रयोग हुआ रहता है।
सप्तशती के चतुर्थ अध्याय के 4 मंत्र से इसी कारण होम नहीं होता है।
#सिद्ध #कुंजिका स्तोत्र का होम न करने की आज्ञा स्वयं महादेव नें दी है
इसका प्रथम कारण है की ,
कुंजिका देवी सिद्धियों की एकमात्र कुंजी है ।
ओर कुंजी का रक्षण किया जाता है आहूत नहीं किया जा सकता ।

यदि यदि कुंजी का ही लोप हो जाएगा तो सिद्धी के द्वार का खुलना असम्भव हो जाएगा ।
दूसरा कारण यह की 
सप्तशती में आता है की याचना स्तोत्र , कवच एवं कवच मन्त्रों की आहुति नहीं की जाती अन्यथा विनाश ही होता है ।
|| अथ प्रमाण ||

#कवचं #वार्गलाचैव ,#कीलकोकुंजिकास्तथा ।
#स्वप्नेकुर्वन्नहोमं #च ,#जुहुयात्सर्वत्रनष्ट्यते: ।।

भगवान शिव भैरव स्वरूप में स्थित होकर कहते हैं ! 
कवच , अर्गला , कीलक , तथा कुंजिका का होम स्वप्न में भी न करें
 स्वप्न मात्र में भी होम करने से सर्वत्र नाश की संभावनाएँ प्रकट हो जाती है ।

#बुद्धिनाषोहुजेत् #देवि,#अर्गलाऽनर्गलोभवेत् ।
#सिद्धीर्नाषगत:#होता, #विद्यां #च #विस्मृतोर्भभवेत् ।।

अर्गला के होमकर्म से सिद्धीयों का नाश हो जाता है । तथा होता की समस्त विद्याएँ विस्मृत हो जाती है , अर्गला अनर्गल सिद्ध हो जाती है ।

#कीलितोजायतेमन्त्र: ,#होमे #वा #कीलकस्तथा ।
#ममकण्ठसमंयस्य: ,#कीलकोत्कीलकं #हि #च ।।

कीलक के होमकर्म से होता के समस्त मन्त्र सदा सर्वदा के लिए कीलित हो जाते हैं ।
इसे मेरा उत्किलित कण्ठ ही जानें जो जो कीलक का कारक है ।
#धनधान्ययुतंभद्रे ,#पुत्र:#प्राण:#विनष्यते: ।
#रोगशोकोर्व्रिते:#कृत्वा,कवचंहोमकर्मण: ।।
कवच के होम से धन,धान्य, पुत्र तथा प्राण का विनाश निश्चित है एवं वह होता रोग तथा शोकों से घिर जाता है ।

स्वप्ने वा हुज्यते देवि ,* *कुंजिकायं च कुंजिकां ।

षड्मासे च भवेन्मृत्यु , सत्यं सत्यं न संशय: ।
होमे च कुंजिकायास्तु ,* *सकुटुम्बंविनाश्यती: ।

कुंजिका के होमकर्म के प्रभाव से होता की छः मास में मृत्यु निश्चित जानें तथा होता का सकूटुंब विनाश हो जाता है यह सत्य है परम सत्य है इसमें कोई संशय नहीं करना चाहिए ।
शास्त्री प्रवीण त्रिवेदी 

■यस्यं च दोषमात्रेण ,प्रसन्नार्मृत्युदेवता: ।
कुंजिकाहोममात्रेण ,रावण:प्रलयंगत: ।।

इसी के दोष से मृत्युदेवता अत्यंत प्रसन्न होकर होता का सकूटुंब भक्षण करते हैं ।

कुंजिका के होममात्र के प्रभाव से ही रावण का सम्पूर्ण विनाश सम्भव हुआ ।

■भैरवयामले भैरवभैरवी संवादे ।।
चतुर्विंश प्रभागे होमप्रकरणे ।।

■मातृका:बीजसंयुक्ता: ,प्राणाप्राणविबोधिनी ।
प्राणदा:कुंजिका:मायां ,सर्वप्राण:प्रभाविनी ।।

कुंजिका में बीज मातृकाएँ उपस्थित हैं ।
प्राण को देविप्राण का बोधप्रदान करती हैं ।
यह प्राणज्ञान प्रदान करने वाली महामाया कुंजिका प्राण को प्रभावित करने वाली हैं ।
।। शक्तियामले शक्तिहोमप्रकरणे ।।

Thursday, 19 March 2026

हिंदू कभी ईद मुबारक नहीं कहें


*हिंदू कभी ईद मुबारक नहीं कहेंगे अगर ये किताब पढ़ लेंगे !* 

_(लेख का आधार और स्रोत- किताब- तुगलककालीन भारत, अनुवादक- सैयद अतहर अब्बास रिजवी, प्रोजेक्ट-अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी, प्रकाशन-राजकमल)_ 

-आपने अक्सर देखा होगा... मुस्लिम काफी उत्सुक रहते हैं कि हिंदू भी उनको ईद मुबारक कहें लेकिन अगर इतिहास के किताबों के पन्नों कों पलटेंगे तो ये पता चलेगा कि हिंदुओं के लिए ईद मुबारक कभी नहीं रही... हिंदुओं के लिए ईद हमेशा विनाशक ही रही है ! 

- मुस्लिम शासन के वक्त भारत में मौजूद मुस्लिम इतिहासकारों ने अपनी किताबों में लिखा है कि ईद के पहले मुस्लिम सुल्तान और बादशाह पूरे अपने इलाकों में काफिर स्त्रियों को पकड़ने का एक अभियान चलाया करते थे । ताकी ईद के दिन उनकी इच्छा के विरुद्ध उनका आनंद ले सकें ! भारत में मराठा शासन आने तक हिंदुओं पर ईद के रोज़ पर ये अत्याचार लगातार चलता रहा ।

- इब्नेबतूता... बद्रेचाच... जियाउद्दीन बरनी जैसे तमाम मध्य कालीन इतिहासकारों ने लिखा है कि हिंदू लड़कियों की लूट और उनकी खऱीद फरोख्त इस तरह हो रही थी कि हिंदू लड़कियां बहुत सस्ते में बिक रही थीं ।

-अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के निर्देशन में लिखी गई किताब... तुगलककालीन भारत में इस अत्यंत क्षोभदायक घटना का जिक्र मिलता है । इस किताब में मुहम्मद बिन तुगलक के समय में हुए मुस्लिम इतिहासकारों के ग्रंथों का हिंदी अनुवाद पेश किया गया है । इसके अनुवादक भी सैयद अतहर अब्बास रिजवी हैं । 

- तुगलककालीन भारत किताब में इब्नेबतूता के यात्रा वृतांत का जिक्र किया है । इब्नबतूता ने अपने यात्रा वृतांत में लिखा है कि जब वो भारत आया तो उसने देखा कि ईद के दिन मुस्लिम सुल्तान अपने दरबार में हिंदू राजाओं और हिंदुओं की अपहरण की गई बेटियों से नृत्य करवाता था । इसके बाद इन हिंदू औरतों को सुल्तान अपने सिपाहियों में जबरन भोग विलास करने के लिए बांट दिया करता था । ये इब्नेबतूता ने लिखा है और अनुवाद सैयद अतहर अब्बास रिजवी का है । यानी ये सब मुसलमान हैं और मुसलमानों ने खुद ही अपनी पोल खोली है । 

-ईद के एक महीने पहले से ही भारी संख्या में हिंदू औरतों की लूट की जाती थी । इब्नेबतूता ने लिखा है कि हिंदू अपनी बहन बेटियों को बचाने के लिए बांस के जंगलों में छुप जाया करते थे । इब्नेबतूता ने लिखा है कि काफिरों के खिलाफ जीत में उसके हाथ काफिर स्त्रियां लगी थीं । इन स्त्रियों के साथ बलात्कार के बाद इब्नेबतूता के बच्चे भी हुए थे ।

-अभी कुछ साल पहले पूरी दुनिया ने देखा था कि कैसे सीरिया और इराक में इस्लामिक स्टेट के मोमिनों ने कुरान की आयत का हवाला देकर यजीदी महिलाओं की मंडियां लगाई थी और उनकी खरीद फरोख्त भी की थी । आतंकियों ने काफिर स्त्रियो के बलात्कार को इस्लाम सम्मत बताने के लिए कुरान की आयतों का हवाला भी दिया था   

- आपने देखा होगा कि जब बंगाल में मुस्लिमों की कठपुतली शासक ममता बनर्जी का राज पश्चिम बंगाल में आया तो हिंदू औरतों के साथ रेप किए गए । तब बहुत सारे हिंदुओं ने अपनी इज्जत बचाने के लिए अपने घरों को छोड़ दिया । बहुत सारे हिंदू परिवारों ने जंगलों में शरण ली ताकी किसी तरह वो बच जाएं और बहुत सारे हिंदुओं ने भागकर असम राज्य में प्रवेश किया था । इतिहास से सबक ना लिया जाए तो इतिहास बार बार खुद को दोहराता है बंगाल में भी यही हो रहा था । 

- मैंने आपको किताब का नाम और अनुवादक का जिक्र कर दिया है... प्रकाशक भी बता दिया है... किताब लाकर पढ़ लें... हिंदुओं पर जुल्म ऐसे ऐसे हुए हैं कि आपको उल्टी आ जाएगी ।

- दिलीप पाण्डेय