Friday, 31 July 2026

अम्बेडकर और अछूत

ये हिंदी है अम्बेडकर के लेख की। 
उन्होंने लिखा - Touchable and Untouchable. 
उन्होंने अंग्रेजो के उस शब्द का नग्रेजी नाम दिया - Polluted by touch. 
कब 1911 की जनगणना में। 
उस समय एक ही कास्ट में दो तरह के लोग पाए जाते थे - Touchable and Untouchable. 

जिसको कुतर्क के द्वारा अम्बेडकर ने नकार दिया।
जो अंग्रेजों के मनोअनुकूल था।
वे वही चाहते थे कि कोई भारतीय पिछलग्गू उनकी बात का समर्थन कर दे। वही हुवा। 

अनेक उद्धरण हैं - विल दुरान्त, रोमेश दत्त, गणेश सखाराम देउस्कर, handyman और जे सुन्दरलैंड के प्रामाणिक ग्रन्थ हैं जो यह बताते हैं कि 1850 से 1947 के बीच लगभग 4 करोड़ भारतीय भुखमरी और संक्रामक रोगों की चपेट में आकर काल के गाल में समा गए। 

जैसा आज कोविड के समय हो रहा है। 
कि छूने से व्यक्ति संक्रमित हो सकता है।
इसलिए छूने से परहेज रखो।
उस समय भी ऐसा ही दृश्य था - जिसे अंग्रेजो और उनके सेवक अम्बेडकर ने नाम दिया - Untouchability. 

...ये हिंदीबाजी है अम्बेडकर के लेख की। 
उन्होंने लिखा - Touchable and Untouchable. 
उन्होंने अंग्रेजो के उस शब्द का नग्रेजी नाम दिया - Polluted by touch. 
कब 1911 की जनगणना में। 
उस समय एक ही कास्ट में दो तरह के लोग पाए जाते थे - Touchable and Untouchable. 

जिसको कुतर्क के द्वारा अम्बेडकर ने नकार दिया।
जो अंग्रेजों के मनोअनुकूल था।
वे वही चाहते थे कि कोई भारतीय पिछलग्गू उनकी बात का समर्थन कर दे। वही हुवा। 

अनेक उद्धरण हैं - विल दुरान्त, रोमेश दत्त, गणेश सखाराम देउस्कर, handyman और जे सुन्दरलैंड के प्रामाणिक ग्रन्थ हैं जो यह बताते हैं कि 1850 से 1947 के बीच लगभग 4 करोड़ भारतीय भुखमरी और संक्रामक रोगों की चपेट में आकर काल के गाल में समा गए। 

जैसा आज कोविड के समय हो रहा है। 
कि छूने से व्यक्ति संक्रमित हो सकता है।
इसलिए छूने से परहेज रखो।
Social distancing का फार्मूला पूरे विश्व में अपनाया गया। जिस मोहल्ले में एक कोविड का मरीज मिल जाय उसको पुलिस धकेलकर अस्पताल में भर्ती करवाती थी और पूरे मोहल्ले को बांस के बाड़े लगाकर घेर दिया जाता था। 
तो यह socual distancing की हिन्दीकरण क्यों नहीं किया गया?
क्योंकि उसका अर्थ ही होता है कि जो संक्रमित हो, उससे दूरी बनाओ। छुआछूत बरतो। छुआछूत शब्द प्रयोग करते ही संविधान की नजर टेढ़ी हो जाती। 

उस समय भी ऐसा ही दृश्य था - जिसे अंग्रेजो और उनके सेवक अम्बेडकर ने नाम दिया - Untouchability. 

...

भाषा

वायर में एक दलित लेखक लिखते हैं और मैं उसका अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ: 

“हर पीढ़ी अपनी एक अलग भाषा गढ़ती है। जनरेशन-ज़ी की भाषा संयोग से ऐसी है जिसमें गालियाँ हैं, तीखा व्यंग्य है, और इस तरह बोलने के लिए किसी से अनुमति लेने में उसे तनिक भी रुचि नहीं है। जंतर-मंतर के पोस्टर, इंस्टाग्राम की रीलें और शिक्षा मंत्री के आवास के बाहर लगे प्लेकार्ड भारतीय विरोध-प्रदर्शनों की उस पुरानी परंपरा जैसे नहीं थे, जो गंभीर नैतिक आग्रह और संयमित भाषा के लिए जानी जाती थी।

वे अधिक किसी ग्रुप-चैट की तरह दिखाई देते थे—गाली-गलौज से भरे, अश्लील, बेतुके और उल्लासपूर्वक मर्यादा-भंजक। और ठीक यही उनकी मंशा भी थी। उनका उद्देश्य उन्हीं लोगों को आहत करना था जिन्हें वे आहत करना चाहते थे— ….उस परिवेश से जुड़े स्वयंभू 'संस्कारी' आस्थावानों को, और उन 'भक्तों' को जिनके लिए नेता के प्रति श्रद्धा लगभग एक नागरिक धर्म का रूप ले चुकी है।

यह आहत करना कोई रणनीतिक भूल नहीं थी; बल्कि यही पूरी रणनीति का केंद्र था। वास्तव में, इस आंदोलन की सफलता के कारणों में इसे भी गिना जाना चाहिए। क्योंकि जब किसी ऐसी सत्ता के विरुद्ध, जिसे पवित्र या अछूत मान लिया गया हो, जान-बूझकर अश्लीलता और अभद्रता का प्रयोग किया जाता है, तो उसकी राजनीतिक उपयोगिता का इतिहास कहीं अधिक पुराना और कहीं अधिक सफल रहा है, जितना कि तथाकथित शालीन और सम्मानजनक टिप्पणीकार स्वीकार करने को तैयार होते हैं।”

यह स्टैंड पहली दृष्टि में आकर्षक और आधुनिक प्रतीत होता है, परन्तु इसके भीतर कई दार्शनिक, समाजशास्त्रीय और तार्किक भ्रम छिपे हुए हैं।

सबसे पहला भ्रम यह है कि यह ध्यान आकर्षित करने (attention) और विश्वास अर्जित करने (persuasion) को एक ही चीज़ मान लेता है। अश्लीलता, व्यंग्य और गाली निश्चित रूप से लोगों का ध्यान खींच सकती हैं; वे समाचारों की सुर्खियाँ बन सकती हैं, सोशल मीडिया पर वायरल हो सकती हैं। किन्तु किसी बात का अधिक दिखाई देना इस बात का प्रमाण नहीं है कि उसने लोगों के विचार भी बदल दिए। लोकतंत्र में किसी आंदोलन की वास्तविक सफलता केवल अपने समर्थकों का मनोरंजन करने में नहीं, बल्कि उन लोगों को भी अपने पक्ष में लाने में है जो अभी तक निर्णय की स्थिति में नहीं हैं। गाली इस कार्य में प्रायः बाधा बनती है, साधन नहीं।

दूसरा भ्रम यह है कि लेखक पीढ़ीगत भाषा (Generational Slang) और लोकतांत्रिक राजनीतिक भाषा के बीच का अंतर मिटा देता है। यह सत्य है कि प्रत्येक पीढ़ी अपनी अलग शब्दावली गढ़ती है। किन्तु इससे यह निष्कर्ष नहीं निकलता कि वही भाषा सार्वजनिक विमर्श और राजनीतिक संघर्ष की आदर्श भाषा भी है। घर, मित्र-मंडली और ग्रुप चैट की भाषा तथा संसद, न्यायालय, विश्वविद्यालय और जनांदोलन की भाषा का उद्देश्य अलग-अलग होता है। निजी संवाद में जो स्वीकार्य है, वह सार्वजनिक संस्कृति का मानक नहीं बन जाता। "Gen-Z ऐसे बोलती है"—यह एक समाजशास्त्रीय तथ्य हो सकता है; किन्तु "अतः राजनीति भी ऐसी ही बोले"—यह निष्कर्ष तार्किक रूप से नहीं निकलता। यह 'जो है' (is) से 'जो होना चाहिए' (ought) निकालने की त्रुटि है।

तीसरा भ्रम यह है कि यह अपमान को साहस का पर्याय बना देता है। सत्ता से असहमति व्यक्त करना और सत्ता को गाली देना दो अलग-अलग बातें हैं। इतिहास के सबसे प्रभावशाली प्रतिरोध—महात्मा गांधी, डॉ. भीमराव आंबेडकर, मार्टिन लूथर किंग जूनियर, नेल्सन मंडेला—इसलिए सफल नहीं हुए कि वे अपने विरोधियों को सबसे तीखी गालियाँ देते थे। उनकी शक्ति इस बात में थी कि वे प्रतिरोध करते हुए भी अपनी नैतिक ऊँचाई बनाए रखते थे। नैतिक अधिकार (moral authority) अक्सर भाषा के संयम से जन्म लेता है, भाषा के विघटन से नहीं।

चौथा भ्रम इतिहास का चयनात्मक पाठ (Selective Reading) है। लेखक कहता है कि अश्लीलता का राजनीति में एक लंबा और सफल इतिहास रहा है। यदि यह सत्य है, तो उतना ही सत्य यह भी है कि गरिमा, संयम और नैतिक अनुशासन का इतिहास उससे कहीं अधिक लंबा और कहीं अधिक स्थायी है। भारत का स्वतंत्रता आंदोलन, अमेरिकी नागरिक अधिकार आंदोलन, दक्षिण अफ्रीका का रंगभेद-विरोधी संघर्ष—इनकी विजय का आधार सार्वजनिक मर्यादा, नैतिक विश्वसनीयता और तर्कपूर्ण संवाद था, न कि अश्लीलता। इतिहास में मसखरे भी रहे हैं और महात्मा भी; केवल मसखरों को चुन लेना इतिहास नहीं, इतिहास का संपादित संस्करण है।

पाँचवाँ भ्रम यह है कि लेखक पवित्रता (Sacredness) और सत्ता (Power) को एक ही वस्तु मान लेता है। निस्संदेह, अनेक बार सत्ता स्वयं को पवित्र घोषित कर आलोचना से बचना चाहती है। परन्तु इससे यह निष्कर्ष नहीं निकलता कि समाज में जो कुछ भी किसी के लिए पवित्र है, उसका अपमान राजनीतिक सद्गुण बन जाता है। लोकतंत्र का अर्थ पवित्रताओं का विनाश नहीं, बल्कि पवित्रताओं के बीच सह-अस्तित्व है। यदि प्रत्येक समूह दूसरे की आस्थाओं को अपमानित करने लगे, तो अंततः राजनीति विचारों का संघर्ष न रहकर घृणा का प्रतियोगिता-मंच बन जाएगी।

छठा भ्रम मनोविज्ञान से जुड़ा है। लेखक मानकर चलता है कि किसी नेता या विचारधारा का अपमान उसके समर्थकों को कमजोर कर देगा। सामाजिक मनोविज्ञान इसके विपरीत अनेक उदाहरण प्रस्तुत करता है। जब किसी समूह की पहचान पर सार्वजनिक आक्रमण होता है, तो वह समूह प्रायः और अधिक संगठित हो जाता है। अपमान विरोधियों को तोड़ने से अधिक, उन्हें एकजुट भी कर सकता है। इस दृष्टि से गाली हमेशा राजनीतिक अस्त्र नहीं होती; अनेक बार वह विरोधी पक्ष के लिए सबसे प्रभावी प्रचार-सामग्री बन जाती है।

सातवाँ भ्रम यह है कि लेखक आहत कर देने (offence) को ही सफलता का प्रमाण मान लेता है। यदि किसी आंदोलन का उद्देश्य केवल विरोधी को क्रोधित करना रह जाए, तो वह आंदोलन धीरे-धीरे लोकतांत्रिक संवाद से हटकर नाटकीय प्रदर्शन (performance) में बदल जाता है। राजनीति का अंतिम लक्ष्य प्रतिद्वंद्वी को चिढ़ाना नहीं, समाज को बदलना है। समाज परिवर्तन तर्क, संगठन, नेतृत्व, धैर्य और विश्वसनीयता से होता है; केवल उत्तेजना से नहीं।

सबसे गहरी आपत्ति इस तर्क के दार्शनिक आधार पर है। यह मान लिया गया है कि क्योंकि कभी-कभी सत्ता पवित्रता का आवरण ओढ़ लेती है, इसलिए पवित्रता स्वयं संदेहास्पद है और उसका उपहास करना लोकतांत्रिक कर्तव्य है। यह निष्कर्ष अत्यंत खतरनाक है। किसी भी सभ्यता की स्थिरता केवल अधिकारों से नहीं, बल्कि कुछ साझा मर्यादाओं से भी निर्मित होती है। लोकतंत्र का अर्थ यह नहीं कि किसी के प्रति श्रद्धा असंभव हो जाए; लोकतंत्र का अर्थ केवल इतना है कि श्रद्धा आलोचना से ऊपर नहीं है। आलोचना आवश्यक है, परन्तु आलोचना और अवमानना समानार्थी नहीं हैं।

वास्तव में किसी भी लोकतांत्रिक संस्कृति की परिपक्वता इस बात से नहीं मापी जाती कि वह कितनी निर्भीक गालियाँ दे सकती है, बल्कि इस बात से मापी जाती है कि वह कितनी तीखी असहमति को भी भाषा की गरिमा के भीतर व्यक्त कर सकती है। भाषा केवल विचारों का वाहन नहीं होती; वह समाज के संस्कारों का भी दर्पण होती है। जिस दिन राजनीति का सबसे प्रभावी अस्त्र तर्क के स्थान पर गाली बन जाए, उस दिन केवल भाषा ही नहीं, लोकतंत्र भी निर्धन हो जाता है।

शंकर

शंकर
शंकर ३ रूपों का समन्वय है-
(१)  शं ब्रह्म  (शान्त, लोकों की स्थिति) + 
(२) कं ब्रह्म (कर्ता ब्रह्म, प्रजापति) + 
(३) रं ब्रह्म (ऊर्जा या गति)
यह खं = आकाश रूपी ब्रह्म में स्थित है, जो ब्रह्म की प्रथम सृष्टि है। 
१. शं ब्रह्म-शं - शान्ति, कल्याण।
विश्व के ६ भागों द्वारा षड्विध ऐश्वर्य- 
ऐश्वर्यस्य समग्रस्य धर्मस्य यशसश्श्रियः। 
ज्ञानवैराग्ययोश्चैव षण्णां भग इतीरणा॥ (विष्णु पुराण, ६/५/७४)
शं नो मित्रः शं वरुणः, शं नो भवत्यर्यमा।
शं न इन्द्रो बृहस्पतिः, शं नो विष्णुरुरुक्रमः॥ 
(ऋक्, १/९०/९, अथर्व वेद, १९/९/६, ७, वाज. यजु, ३६/९, तैत्तिरीय आरण्यक, ७/१/१,)
नः = हम लोगों का। नः + इन्द्रः = न इन्द्रः।
(१) आकाश के क्षेत्र-आकाश के ३ धाम हैं-परम धाम-स्वयम्भू मण्डल = पूर्ण विश्व, 
मध्यम धाम = परमेष्ठी मण्डल = ब्रह्माण्ड या आकाशगंगा, 
अवम धाम - सौर मण्डल = सूर्य का प्रकाश क्षेत्र। 
या ते धामानि परमाणि यावमा या मध्यमा विश्वकर्मन्नुतेमा । (ऋक्, १०/८१/४)
हर धाम में जो दृश्य पिण्ड है, वह भूमि, उसका प्रभाव क्षेत्र (साम) आकाश या द्यु, तथा बीच का क्षेत्र (अन्तरिक्ष या व्रत) है। पिण्ड निर्माण का आदि रूप आदित्य है, जो अभी अन्तरिक्ष में दीखता है। तीन धामों के आदित्य हैं-अर्यमा, वरुण, मित्र। भूमि = माता (स्त्रीलिंग), द्यु = पिता (पुल्लिंग), अन्तरिक्ष = नपुंसक लिंग।
तिस्रो भूमीर्धारयन् त्रीरुत द्यून्त्रीणि व्रता विदथे अन्तरेषाम् ।
ऋतेनादित्या महि वो महित्वं तदर्यमन् वरुण मित्र चारु ॥ (ऋक्, २/२७/८)
तिस्रो मातॄस्त्रीन्पितॄन्बिभ्रदेक ऊर्ध्वतस्थौ नेमवग्लापयन्ति । 
मन्त्रयन्ते दिवो अमुष्य पृष्ठे विश्वमिदं वाचमविश्वमिन्वाम् ॥ (ऋक्, १/१६४/१०)
(२) सौर मण्डल-३ क्षेत्र सौर मण्डल के भीतर हैं-
इन्द्र सृष्टि निर्माण के लिए ऊर्जा है-
(देवस्य त्वा सवितुः प्रसवे) इन्द्रियस्य इन्द्रियेण। (तैत्तिरीय ब्राह्मण, २/६/५/३)
इन्द्रस्य इन्द्रियेण अभिषिंचामि (शतपथ ब्राह्मण, ५/४/२/२, ऐतरेय ब्राह्मण, ८/७)
इन्धन रूप में भी इन्द्र कहा गया है-इन्धो वै नामैष 
सौर मण्डल ३३ धाम तक है, जिसमें इन्द्र का विस्तार है। इसे धामच्छद (धाम को ढंकने वाला, छद = छत) कहा है। ३३ अक्षर त्रिष्टुप् छन्द (११ x ४ = ४४ अक्षर) के ३ पाद  हैं। मेरुदण्ड में ३३ जोड़ होते हैं, अतः सौर मण्डल मंत इन्द्र के वज्र को दधीचि की हड्डी से बना कहते हैं।
इन्द्रो दधीचो अस्थभिर्वृत्राण्यप्रतिष्कुतः। जघान नवतीर्नव॥। (ऋक्, १/८४/१३)
वज्रो वै त्रिष्टुप् (शतपथ ब्राह्मण, ७/४/२/२४, ऐतरेय ब्राह्मण, २/१६, २/२)
संवत्सरो (१ संवत्सर में जितनी दूर सूर्य का प्रकाश जाता है-सौर क्षेत्र) वज्रः (शतपथ ब्राह्मण, ३/६/४/१९)
त्रैष्टुभो वा एष य एष (सूर्यः) तपति (कौषीतकि ब्राह्मण, २५/४)
अन्तो वै त्रयस्त्रिंशः परमो वै त्रयस्त्रिंश स्तोमानाम् (ताण्ड्य महाब्राह्मण, ३/३/२)
तं (त्रयस्त्रिंशं स्तोमं) उ नाक इत्याहुः। (ताण्ड्य महाब्राह्मण, १०/१/१८)
बृहस्पति सौर मण्डल के अन्तरिक्ष का मुख्य ग्रह है। सोम (आकाश का विरल पदार्थ) के ३ क्षेत्रों में यह मध्य में है।
(१) चान्द्र मण्डल का देवसोम या राजसोम, (२) जहां तक सौर वायु जाती है वह पवमान सोम है। इसका केन्द्र बृहस्पति होने से यह बृहस्पति सोम है। (३) ब्रह्माण्ड सीमा तक ब्रह्मणस्पति सोम है।
एतद्वै देवसोमं यत् चन्द्रमाः (ऐतरेय ब्राह्मण, ७/११)
सोमो राजा चन्द्रमाः (शतपथ ब्राह्मण, १०/४/२/१)
अयं वायुः पवमानः (शतपथ ब्राह्मण, २/५/१/५) 
सोमो वै पवमानः। (शतपथ ब्राह्मण, २/२/३/२२) 
बृहस्पतिर्ब्रह्म ब्रह्मपतिः। (तैत्तिरीय ब्राह्मण, २/५/७/४) 
वाग् वै बृहती तस्या एष पतिस्तस्मादु बृहस्पतिः।(शतपथ ब्राह्मण, १४/४/१/२२) 
(यजु ३८/८) अयं वै बृहस्पतिर्योऽयं (वायुः) पवते। (शतपथ ब्राह्मण, १४/२/२/१०)
ब्रह्म वै ब्रह्मणस्पतिः (कौषीतकि ब्राह्मण, ८/५, ९/५, ताण्ड्य महाब्राह्मण, १६/५/८)
व्यवहार में बृहस्पति ही दीखता है, अतः उसे भी ब्रह्मणस्पति कहा गया है।
(३) उरुक्रम विष्णु-विष्णु के कई विक्रम वेदों में निर्दिष्ट हैं। 
विष्णु का प्रत्यक्ष रूप सूर्य है, जिससे पृथ्वी पर सृष्टि चल रही है। इसके ३ विक्रम सौर मण्डल के ३ क्षेत्र हैं, जिनको अग्नि, वायु, रवि (११, २२, ३३ अहर्गण तक) कहा गया है।
इदं विष्णुर्विचक्रमे त्रेधा निदधे पदम्। समूळ्हमस्य पांसुरे॥ (ऋक्, १/२२/१७)
तद् विष्णोः परमं पदं सदा पश्यन्ति सूरयः। दिवीव चक्षुराततम्॥ (ऋक्, १/२२/२०)
सूर्य सिद्धान्त (१२/८१, ९०) में ब्रह्माण्ड को सूर्य का परम पद कहा है जहां तक सूर्य विन्दुमात्र दीखता है, तथा ब्रह्माण्ड की सटीक माप दी गयी है।
अग्नि-वायु-रविभ्यस्तु त्रयं ब्रह्म सनातनम्।
दुदोह यज्ञ सिद्ध्यर्थं ऋग्-यजुः साम लक्षणम्॥ (मनु स्मृति, १/२३)
परम पद को बड़े आकार के कारण उरुक्रम भी कहा गया है।
उरुक्रमस्य स हि बन्धुरित्था विष्णोः पदे परमे मध्व उत्सः॥ (ऋक्, १/१५४/५)
पृथ्वी पर मनुष्य की सबसे बड़ी रचना नगर है, जिसे उरु या उर कहते हैं, जैसे बंगलूरु, मैसूरु, चित्तूर, तञ्जाउर, आदि। शिल्पशास्त्र के अनुसार विष्णु (मनुष्य रूप, सम्भवतः वामन) ने नगरों का प्रारूप तैयार किया था, इस अर्थ में उनको उरुक्रम कहा गया है। बाद में वरुण ने भी उरु प्रारूप का नगर बनाया जो इराक का सबसे प्राचीन नगर है।
उरुं हि राजा वरुण श्चकार (ऋग् वेद १/२४/८) 
यज्ञ या सृष्टि अर्थ में विष्णु को विक्रान्त = विभाजन, उत्क्रान्त (वाहर निकलना), न्यक्रामत् (परिणत होना) आदि कहा है। लोकों का निर्माण और उनकी स्थिति भी विष्णु का विक्रम है।  
यज्ञो विष्णुः स देवेभ्य इमां विक्रान्तिं विचक्रमे यैषामियं विक्रान्तिरिदमेव प्रथमेन पदेन पस्पाराथेदमन्तरिक्षं द्वितीयमेन दिवमुत्तमेन। (शतपथ ब्राह्मण, १/९/३/९)
इमे वै लोका विष्णोर्विक्रमणं विक्रान्तं विष्णोः क्रान्तम्। (शतपथ ब्राह्मण, ५/४/२/६)
स उदक्रामत् सा गार्हपत्ये न्यक्रामत्॥२॥
यज्ञ चक्र रूप में दिन-रात भी विष्णु-क्रम है।
तद्वाऽहोरात्रेऽएव विष्णुक्रमा भवन्ति। (शतपथ ब्राह्मण, ६/७/४/१०)
विष्णु का विचक्रम गो रूप यज्ञ है। प्रति व्यक्ति सबसे अधिक गो वाला देश भी दक्षिण अमेरिका का उरुगुए है।
विचक्रमाणस्त्रेधोरुगायः (ऋक् १/१५४/१, अथर्व ७/२६/१, वाज.सं. ५/१८, तैत्तिरीय सं. १/२/१३/३, काण्व सं. २/१०, मैत्रायणी सं. १/२९/१९/९)
२. कं ब्रह्म- कः = प्रजापति, स्रष्टा रूप ब्रह्म।
कस्मै देवाय हविषा विधेम (हिरण्यगर्भ सूक्त, १/१२१/१, ९, अथर्व, ४/२/१, ७, ८, वाज. यजु, १२/१०२, १३/४, २३/१, ३, २५/१०, ११, १२, १३, २७/२५, २६, आदि)
सृष्टि या निर्माण में कुछ सामग्री लगती है, अतः कर्ता रूप ’क’ ब्रह्म ले लिए हवि देनी पड़ती है।
वेद संहिताओं में कई स्थान पर कः, कं आया है, पर वह प्रजापति का वाचक है, या प्रश्नवाचक सर्वनाम, इसमें सन्देह है। ब्राह्मण ग्रन्थों में स्पष्ट परिभाषा है।
प्रजापतिर्वै कः (ऐतरेय ब्राह्मण, २/३८, ६/२१, कौषीतकि ब्राह्मण, ५/४, २४/४, ५, ९, ताण्ड्य महाब्राह्मण, ७/८/३, शतपथ ब्राह्मण, ६/४/३/४, ७/३/१/२०, तैत्तिरीय ब्राह्मण, २/२/५/५, जैमिनीय उपनिषद्, ३/२/१०, गोपथ ब्राह्मण, उत्तर, १/२२, ६/३)
कं वै प्रजापतिः। (शतपथ ब्राह्मण, २/५/२/१३) 
सृष्टि निर्माण के लिए ऊर्जा या प्राण भी ’क’ है।
प्राणो वाव कः (जैमिनीय उपनिषद्, ४/२३/४)
कं ब्रह्म द्वारा निर्माण कं है। उपभोग्य वस्तु अन्न या उससे प्राप्त सुख कं है।
अन्नं वै कम् (ऐतरेय ब्राह्मण, ६/२१, गोपथ ब्राह्मण, उत्तर, ६/३)
सुखं वै कम् (गोपथ ब्राह्मण, उत्तर, ६/३)
अथो सुखस्य वा एतत् नामधेयं कं इति (गोपथ ब्राह्मण, उत्तर, १/२२, कौषीतकि ब्राह्मण, ५/४)
कं ह वा अस्मैभवति य एवमेतत् अर्कस्य अर्कत्वं वेद (बृहदारण्यक उपनिषद्, १/२/१)
देवी के लिए स्त्रीलिंग में ’कां’ प्रयुक्त है-
कां सोस्मितां हिरण्य प्राकारां (श्री सूक्त, ४, ऋक् खिल भाग, अष्टक ४/४/३२ के बाद का परिशिष्ट)
एक व्यक्ति ने इसका अर्थ किया है कि इस मन्त्र द्वारा कांसा से स्वर्ण (हिरण्य) बनाया जा सकता है। पर कांस्य या स्वर्ण अर्थ में यहां प्रयोग नहीं है।
काम्-(१) वाणी तथा मन से जिसका ज्ञान नहीं होता। (२) अव्यक्त, अमूर्त्त ब्रह्म। (३) सुख स्वरूपा। (४) चिन्मयी लक्ष्मी, जो अन्तःकरण में आवाज करती है (कै शब्दे, धातु पाठ, १/६५३)। (५) वाणी, वाक्य रूपा (वाग्देवी)। (६) सभी वेद जिस के बारे में जिज्ञासा करते हैं-का = कौन है? (७) क = ब्रह्म के रूप वाली। कस्मै देवाय हविषा विधेम (ऋक्, १०/१२१/१)-कर्त्ता रूप देव के लिए हवि दें। जड़ चेतन गुण दोषमय विश्व कीन्ह करतार (क)-रामचरितमानस (१/६/०)। (८) कर्त्ता रूपिणी।
(३) खं ब्रह्म-
ख का अर्थ आकाश है। गणित ज्योतिष में शून्य अर्थ में ख, व्योम (जहां ॐ भी नही है), आकाश आदि कूट शब्दों का प्रयोग है। खग = ख में गमन करने वाला पक्षी।
खं वेपसा तुविजात स्तवानः (ऋक्, ४/११/२)
अंङ्घि खं वर्तया पणिम् (ऋक्, १०/१५६/३)
ॐ खं ब्रह्म (ईशावास्योपनिषद्, १७, वाज. यजु, ४०/१७)
खं (आकाश) मनो बुद्धिरेव च (गीता, ७/४)
ॐ खं ब्रह्म, खं पुराणं, वायु रं, खं-इति (बृहदारण्यक उपनिषद्, ५/१/१)
अव्यक्त ब्रह्म की प्रथम सृषी आकाश भी उसी का स्वरूप है। वास स्थान रूप में इसे वासुदेव भी कहा है।
(४) रं ब्रह्म-प्राण या गति रूप ब्रह्म ’रं’ है।
रं इति, प्राणो वै रं, प्राणे हि इमानि भूतानि रमन्ते (बृहदारण्यक उपनिषद्, ५/१२/१, शतपथ ब्राह्मण, १४/८/१३/३)
र इति-रञ्जयति इमानि भूतानि (मैत्रायणी उपनिषद्, ६/७)
रकारो अण्डं विराड् भवति (तारसार उपनिषद्, १/४)
रकारं अग्नि बीजं (ध्यानबिन्दु उपनिषद्, ९५)
स चित्रेण चिकिते रंसु भासा (ऋक्, २/४/५)

Thursday, 30 July 2026

पूर्व का भारत

5000 साल पहले ब्राह्मणों ने हमारा बहुत शोषण किया ब्राह्मणों ने हमें पढ़ने से रोका। यह बात बताने वाले महान इतिहासकार यह नहीं बताते कि,100 साल पहले अंग्रेजो ने हमारे साथ क्या किया। 500 साल पहले मुगल बादशाहों ने क्या किया।।

हमारे देश में शिक्षा नहीं थी लेकिन 1897 में शिवकर बापूजी तलपडे ने हवाई जहाज बनाकर उड़ाया था मुंबई में जिसको देखने के लिए उस टाइम के हाई कोर्ट के जज महा गोविंद रानाडे और मुंबई के एक राजा महाराज गायकवाड के साथ-साथ हजारों लोग मौजूद थे जहाज देखने के लिए।

उसके बाद एक डेली ब्रदर नाम की इंग्लैंड की कंपनी ने शिवकर बापूजी तलपडे के साथ समझौता किया और बाद में बापू जी की मृत्यु हो गई यह मृत्यु भी एक षड्यंत्र है हत्या कर दी गई और फिर बाद में 1903 में राइट बंधु ने जहाज बनाया।

आप लोगों को बताते चलें कि आज से हजारों साल पहले की किताब है महर्षि भारद्वाज की विमान शास्त्र जिसमें 500 जहाज 500 प्रकार से बनाने की विधि है उसी को पढ़कर शिवकर बापूजी तलपडे ने जहाज बनाई थी।

लेकिन यह तथाकथित नास्तिक लंपट बताते कि भारत में तो कोई शिक्षा ही नहीं था कोई रोजगार नहीं था।

अमेरिका के प्रथम राष्ट्रपति जॉर्ज वाशिंगटन 14 दिसंबर 1799 को आये थे। सर्दी और बुखार की वजह से उनके पास बुखार की दवा नहीं थी। उस टाइम भारत में प्लास्टिक सर्जरी होती थी और अंग्रेज प्लास्टिक सर्जरी सीख रहे थे हमारे गुरुकुल में अब कुछ वामपंथी बोलेंगे यह सरासर झूठ है।

तो ऑस्ट्रेलियन कॉलेज ऑफ सर्जन मेलबर्न में ऋषि सुश्रुत ऋषि की प्रतिमा "फादर ऑफ सर्जरी" टाइटल के साथ स्थापित है।

महर्षि सुश्रुत: ये शल्य चिकित्सा विज्ञान यानी सर्जरी के जनक व दुनिया के पहले शल्यचिकित्सक (सर्जन) माने जाते हैं। वे शल्यकर्म या आपरेशन में दक्ष थे। महर्षि सुश्रुत द्वारा लिखी गई ‘सुश्रुतसंहिता’ ग्रंथ में शल्य चिकित्सा के बारे में कई अहम ज्ञान विस्तार से बताया है। इनमें सुई, चाकू व चिमटे जैसे तकरीबन 125 से भी ज्यादा शल्यचिकित्सा में जरूरी औजारों के नाम और 300 तरह की शल्यक्रियाओं व उसके पहले की जाने वाली तैयारियों, जैसे उपकरण उबालना आदि के बारे में पूरी जानकारी बताई गई है।

जबकि आधुनिक विज्ञान ने शल्य क्रिया की खोज तकरीबन चार सदी पहले ही की है। माना जाता है कि महर्षि सुश्रुत मोतियाबिंद पथरी हड्डी टूटना जैसे पीड़ाओं के उपचार के लिए शल्यकर्म यानी आपरेशन करने में माहिर थे। यही नहीं वे त्वचा बदलने की शल्यचिकित्सा भी करते थे।

भास्कराचार्य: आधुनिक युग में धरती की गुरुत्वाकर्षण शक्ति (पदार्थों को अपनी ओर खींचने की शक्ति) की खोज का श्रेय न्यूटन को दिया जाता है। किंतु बहुत कम लोग जानते हैं कि गुरुत्वाकर्षण का रहस्य न्यूटन से भी कई सदियों पहले भास्कराचार्यजी ने उजागर किया। भास्कराचार्यजी ने अपने ‘सिद्धांतशिरोमणि’ ग्रंथ में पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण के बारे में लिखा है कि ‘पृथ्वी आकाशीय पदार्थों को विशिष्ट शक्ति से अपनी ओर खींचती है। इस वजह से आसमानी पदार्थ पृथ्वी पर गिरता है’।

आचार्य कणाद: कणाद परमाणु की अवधारणा के जनक माने जाते हैं। आधुनिक दौर में अणु विज्ञानी जॉन डाल्टन के भी हजारों साल पहले महर्षि कणाद ने यह रहस्य उजागर किया कि द्रव्य के परमाणु होते हैं।

उनके अनासक्त जीवन के बारे में यह रोचक मान्यता भी है कि किसी काम से बाहर जाते तो घर लौटते वक्त रास्तों में पड़ी चीजों या अन्न के कणों को बटोरकर अपना जीवनयापन करते थे। इसीलिए उनका नाम कणाद भी प्रसिद्ध हुआ।

गर्गमुनि: गर्ग मुनि नक्षत्रों के खोजकर्ता माने जाते हैं। यानी सितारों की दुनिया के जानकार। ये गर्गमुनि ही थे, जिन्होंने श्रीकृष्ण एवं अर्जुन के बारे में नक्षत्र विज्ञान के आधार पर जो कुछ भी बताया, वह पूरी तरह सही साबित हुआ। कौरव-पांडवों के बीच महाभारत युद्ध विनाशक रहा। इसके पीछे वजह यह थी कि युद्ध के पहले पक्ष में तिथि क्षय होने के तेरहवें दिन अमावस थी। इसके दूसरे पक्ष में भी तिथि क्षय थी। पूर्णिमा चौदहवें दिन आ गई और उसी दिन चंद्रग्रहण था। तिथि-नक्षत्रों की यही स्थिति व नतीजे गर्ग मुनिजी ने पहले बता दिए थे।

आचार्य चरक: ‘चरकसंहिता’ जैसा महत्वपूर्ण आयुर्वेद ग्रंथ रचने वाले आचार्य चरक आयुर्वेद विशेषज्ञ व ‘त्वचा चिकित्सक’ भी बताए गए हैं। आचार्य चरक ने शरीर विज्ञान, गर्भविज्ञान, औषधि विज्ञान के बारे में गहन खोज की। आज के दौर में सबसे ज्यादा होने वाली बीमारियों जैसे डायबिटीज, हृदय रोग व क्षय रोग के निदान व उपचार की जानकारी बरसों पहले ही उजागर कर दी।

पतंजलि: आधुनिक दौर में जानलेवा बीमारियों में एक कैंसर या कर्करोग का आज उपचार संभव है। किंतु कई सदियों पहले ही ऋषि पतंजलि ने कैंसर को भी रोकने वाला योगशास्त्र रचकर बताया कि योग से कैंसर का भी उपचार संभव है।

बौद्धयन: भारतीय त्रिकोणमितिज्ञ के रूप में जाने जाते हैं। कई सदियों पहले ही तरह-तरह के आकार-प्रकार की यज्ञवेदियां बनाने की त्रिकोणमितिय रचना-पद्धति बौद्धयन ने खोजी। दो समकोण समभुज चौकोन के क्षेत्रफलों का योग करने पर जो संख्या आएगी, उतने क्षेत्रफल का ‘समकोण’ समभुज चौकोन बनाना और उस आकृति का उसके क्षेत्रफल के समान के वृत्त में बदलना, इस तरह के कई मुश्किल सवालों का जवाब बौद्धयन ने आसान बनाया।

15 साल साल पहले का 2000 साल पहले का मंदिर मिलते हैं जिसको आज के वैज्ञानिक और इंजीनियर देखकर हैरान में हो जाते हैं कि मंदिर बना कैसे होगा अब हमें इन वामपंथी लोगो से हमें पूछना चाहिए कि मंदिर बनाया किसने

ब्राह्मणों ने हमें पढ़ने नहीं दिया यह बात बताने वाले महान इतिहासकार हमें यह नहीं बताते कि सन 1835 तक भारत में 700000 गुरुकुल थे इसका पूरा डॉक्यूमेंट Indian house में मिलेगा।

भारत गरीब देश था तो फिर दुनिया के तमाम आक्रमणकारी भारत ही क्यों आए हमें अमीर बनाने के लिए।


बौद्ध बुद्ध

अय्याश बौद्धों की कहानियां सुनिये 

पहली बात , घुंघराले बाल मोटे होंठ और लंबे कान, ये भारतीयों की पहचान हे ही नहीं, ये पहचान अफ्रीकन या ग्रीक लोगों की हे

बौद्ध ग्रन्थ सुत्तपिटक (खुद्दक_निकाय) के "बुद्धवंस के अनुसार गौतम बुद्ध से पहले 24 और बुद्ध अवतार लेकर दुनिया मे आये थे! " 

इन बुद्धावतारों की कहानियाँ भी पाखण्डों से कम नहीं हैं,सबसे पहली बात तो ये सारे के सारे बुद्ध अय्याश थे, क्योंकि इनके अन्तःपुर (हरम) मे हजारों महिलायें थीं! और दूसरी बात त्रिपिटक मे गौतम बुद्ध ने अपने से पूर्व के बुद्धावतारों की जितनी आयु और शारीरिक लम्बाई बतायी है, उससे तो लगता है गौतम बुद्ध भी काफी हद तक "बुद्धू" ही था।  

"बुद्धवंस" में गौतम बुद्ध ने बताया है कि "दीपङ्कर_बुद्ध" की तीन हजार रानियाँ थी, और इनकी सम्पूर्ण आयु एक लाख वर्ष थी! साथ ही इनकी शारीरिक ऊँचाई अस्सी हाथ थी!!

"कौण्डिन्य_बुद्ध" की तीन लाख रानियाँ थी, और इनकी भी आयु एक लाख वर्ष थी! जबकि इनकी शारीरिक ऊँचाई अट्ठासी हाथ थी!!

"मङ्गल_बुद्ध" की तीस हजार रानियाँ थी, और इनकी आयु नब्बे हजार वर्ष थी!!

"सुमन_बुद्ध" के हरम मे तिरसठ लाख स्त्रियाँ थी, और इनकी आयु नब्बे हजार वर्ष थी, तथा सुमन बुद्ध की लम्बाई भी नब्बे हाथ की थी!!

ऐसे ही "रेवत_बुद्ध" की तैंतीस हजार स्त्रियाँ थी और आयु साठ हजार वर्ष की थी, इनकी भी शारीरिक ऊँचाई अस्सी हाथ की थी!

अब विवशता यह है कि एक पोस्ट मे सारे चौबीस बुद्धों का वृतांत लिखने से पोस्ट बहुत बडी़ हो जायेगी! 
पर पाठकगण यह जान लें कि गौतम बुद्ध के अनुसार सभी बुद्धों की आयु कई हजार वर्षों की थी, और सभी के सभी अपने हरम मे कई हजार स्त्रियाँ रखते थे, साथ ही सभी की शारीरिक ऊँचाई भी 80-100 हाथ थी। 
वैसे यहाँ एक बात और विचारणीय है कि जब इन बुद्धों की शारीरिक लम्बाई अस्सी/नब्बे हाथ थी तो इनके शरीर के दूसरे अंग इसी अनुपात मे कितने लम्बे होते रहे होंगे?

क्या ये सब बातें विश्वास योग्य हैं और पहली ही नज़र में नहीं लगतीं कि गप्पें हैं? हम

टीकमगढ_जिले_का_संपूर्ण_इतिहास

 #टीकमगढ_जिले_का_संपूर्ण_इतिहास 
#हमारा_अतीत_हमारी_विरासत
#ओरछा_रियासत_की_टीकमगढ़_राजधानी 
बुन्देलखण्ड का टीकमगढ़ जिला ऐतिहासिक एवं पुरातात्वीय दृष्टि से भारतीय इतिहास में विशिष्ट स्थान रखता है। बुन्देलखण्ड की ओरछा रियासत मध्यकाल में सर्वाधिक चर्चित रियासत रही है। बुन्देला राजवंश के शासकों द्वारा ई. 1531 से 1783 तक ओरछा को राजधानी रूप में उपयोग करने के बाद ईस्वी 1783 में टेहरी को अपनी राजधानी बनाया गया। बुन्देला राजा विक्रमजीत सिंह द्वारा भगवान कृष्ण के एक नाम टीकम के आधार पर टीकमगढ़ नाम रखा।
ऐतिहासिक दृष्टि से देखा जावे तो यह भू-भाग पौराणिक काल में चेदी साम्राज्य का भाग था, जो चौथी शताब्दी ईस्वी पूर्व तक अस्तित्व में बना रहा। मगध साम्राज्य के उत्कर्ष के साथ ही यह भू-भाग मगध का अंग बना, किन्तु स्थानीय प्रशासन का मुख्यालय सागर जिले के एरण नामक स्थल पर बना रहा। एरण के स्थानीय शासकों ने समुद्रगुप्त के आक्रमण तक इस भू-भाग पर अपना अस्तित्व बनाये रखा।गुप्त काल के पश्चात् गुर्जर-प्रतीहार एवं चंदेल शासकों का शासन रहा।चंदेल शासन के बाद बुन्देला राजवंश ने लम्बे समय तक शासन किया। इस काल में बड़े पैमाने पर मंदिरों, महलों, छत्रियों, तालाबों एवं बावड़ियों का निर्माण हुआ, जो हमारी महत्वपूर्ण धरोहर हैं।

इसे क्रमवार ऐसे समझ सकते हैं 
1. पौराणिक काल:,पौराणिक कथानको के आधार पर ऐसा माना जाता है कि बाणासुर की पुत्री ऊषा कुंडेश्वर स्थित ऊषा कुंड पर शिव आराधना करने आती थीं। महाभारत काल में यह धसान के किनारे बसा क्षेत्र दशार्ण देश कहलाता था। यह भू-भाग पौराणिक काल में चेदि साम्राज्य का हिस्सा था।  

2. प्राचीन काल:
लिखित इतिहास से पहले के प्रमाण इस जिले में अनेक स्थान पर बिखरे खंडहरों में मिलते हैं। 
• नाग काल (10 ईसा पूर्व - 220 ईस्वी) का शिवलिंग देवरदा में मिला है जिसे बैजनाथ शिवजी कहा जाता है।  
 • वाकाटक (सन 300-520 ई.) शासकों का मूल स्थान अविभाजित टीकमगढ़ का बाघाट गांव माना जाता है।
 • गुप्त काल के प्रतीक मोहनगढ़ किले में विष्णु मय लक्ष्मी, शेषशायी विष्णु और भेलसी गाँव (बल्देवगढ़ के पास) में वराह की विशाल मूर्ति है। 
3. पूर्व-मध्यकाल:
• 5वीं शताब्दी में यहाँ गहरवार सत्ता और फिर उन्हें हटाकर प्रतिहारों का शासन रहा। प्रतिहार गुप्तों के मांडलिक रहे थे , मडखेरा और उमरी के सूर्य मंदिर प्रतिहार काल के प्रमाण हैं। 
6-पूरे टीकमगढ़ जिले में हर गांव में बने गौड़ बब्बा , गुरइया दाई के चबूतरे यह प्रमाणित करते हैं कि इस क्षेत्र में गौड़ सत्ता भी रही है । वैसे यहां बहुत प्राचीन समय से गौड़ भील इत्यादि रहने के प्रमाण मिलते हैं लेकिन गौड शासकों के बारे में क्रमबद्ध इतिहास प्राप्त नहीं होता है परंतु यह माना जाता है कि टीकमगढ़ जिला खटौला के गौड़ राजा से शासित रहा है । कहा जाता है कि सर्वप्रथम माँदेले ( लोधी ) और दाँगी शासकों ने गौडो को हराकर सत्ता हासिल की थी । टीकमगढ़ ज़िले में कई जगह गौडो के बनाए कौडुआ ( पत्थरों की बांगड) मिलती है जो यहां गौड़ सत्ता की निशानियां है । उत्तर प्रदेश मध्य प्रदेश सीमा पर स्थित रानीगंज महेबा चक्र की पहाड़ी पर जंगल जिसे पठारी जंगल कहते है , बनी विशाल बांगड और अन्य पुरा चिन्ह गौड़ शासकों की निशानियां हैं । 
• 6वीं शताब्दी में बेतवा और धसान के बीच मांदेले (लोधियों) की सत्ता भी प्रभावशाली रही। यह गौडों को प्रतिस्थापित कर सत्तासीन हुए माने जाते हैं । 
4. चंदेल काल - स्वर्ण युग (830 - 13वीं सदी):
प्रतिहारों के बाद टीकमगढ़ चंदेलों द्वारा शासित रहा और इसी काल में सबसे ज्यादा विकास हुआ। इस क्षेत्र को तब जैजाकभुक्ति कहा जाता था। लगभग हर गांव में बने चंदेलकालीन तालाब और मठ इसकी महत्ता प्रमाणित करते हैं।
• कीर्तिवर्मन चंदेल (1053-1100) के मंत्री महिपाल ने नारायणपुर में विष्णु मंदिर बनवाया। 
• सलक्षण वर्मन (1100-1110) ने उर नदी के तट पर सलक्षणपुर (आज का सरकनपुर) बसाया, वहां तालाब, मठ और मंदिर बनवाए।
 • मदनवर्मन (1129-1167) ने जतारा और अहार में मदनसागर तालाब, बल्देवगढ ( बांध) का ग्वालसागर तालाब , अहार में मदनेश्वर का विशाल शिवमठ बनवाया और इस जगह का नाम मदनेशपुरी रखा। उनके काल में बल्देवगढ़, अहार, पपावनी, जिनागढ ,झिनगुआं मे मदन बेर वनवाई गई और अहार के जैन मंदिर भी बने।
 • परमार्दिदेव चंदेल (1167-1237) के समय अहार में सन 1180 में प्रसिद्ध मूर्तिकार पापट ने 21 फीट ऊँची शांतिनाथ भगवान की जैन प्रतिमा बनाई।
परमार्दिदेव की सन 1182 में पृथ्वीराज चौहान से हुई पराजय के बाद भी टीकमगढ़ पर चंदेल शासन बने रहने के प्रमाण मिलते हैं । 
त्रिलौकवर्मन ( 1203-45) के समय ककददाहा ( संभवतः ककरवाहा ) में त्रिलोक वर्मन और मुसलमानों के बीच युद्ध होने और उनके सामंत राउत को मारे जाने के शिलालेख मिले हैं । 
वीर वर्मन ( 1246-1285 ) के समय पपावनी जिला टीकमगढ़ के मैदान में चंदेल सेनापति राउत आभी ने नरवर के राजा गोविंद और ग्वालियर के राजा हरिदेव से सन 1254 में युद्ध किया था जिसमें चंदेल सेनापति राउत आभी की विजय हुई थी । पपावनी के पास स्थित विजय स्तंभ ( जैत खंब ) एक बावड़ी और चंदेली पुरा चिन्ह इस बात की निशानी है ।

5- बुंदेला काल - गहरवार के रूप में इस क्षेत्र के शासक रहे थे लगभग 800 वर्ष बाद यही गहरवार क्षत्रिय बुंदेला के रूप में पुनः इस क्षेत्र में अपनी मजबूत पकड़ बनाने में कामयाब हुए थे । यह काशी से आए माने गए हैं और यह महौनी में अपनी राजधानी बनाए हुए थे । गढ़ कुडार में सोहनपाल बुंदेला द्वारा खंगार सत्ता पर कब्जा करने के बाद जतारा पर भी कब्जा करने के लेख मिलते हैं । सोहनपाल बुंदेला कुड़ार के राजा बनने के बाद सन 1501 तक बुंदेला सत्ता की राजधानी गढकुडार ही रही थी । 
1501 से बुंदेला सत्ता की राजधानी ओरछा बनी एवं इसका नाम ओरछा रियासत रखा गया । 
टीकमगढ़ ज़िला ओरछा रियासत का भाग रहा है । प्रसिद्ध बुंदेला शासक महराजा छत्रसाल की पैत्रिक जागीर महेवा एवं उनकी जन्म स्थली मोर पहाड़ी टीकमगढ़ जिले में ही स्थित है । महराजा छत्रसाल मूल रूप से ओरछा के बुंदेला राजा के वंशज ही रहे हैं । 
सन 1783 में ओरछा के महाराजा बिक्रमजीत में टीकमगढ़ को ओरछा रियासत की राजधानी बनाकर टीकमगढ़ को महत्त्वपूर्ण दर्जा प्रदान किया गया पहले यह टेहरी के नाम से जानी जाती थी और ओरछा रियासत की जागीर होती थी ।

टीकमगढ़ में विक्रमजीत सिंह के बाद हुए शासकों में धर्मपाल सिंह (1817-1834 ई.), तेजसिंह (1834-1841 ई.), सुजान सिंह (1841-1854 ई.), हमीर सिंह (1854-1874), प्रतापसिंह (1874-1930 ई.), वीरसिंह द्वितीय (1930-1947 ई.) शासक रहे।

ओरछा रियासत की टीकमगढ़ राजधानी के अंतिम राजा वीर सिंह जू देव द्वतीय रहे थे जिन्होंने 17 दिसम्बर 1947 को बुंदेलखंड के राजाओं में सर्वप्रथम राज्य शासन की बागडोर जनता के हाथ सौंपकर लोकप्रिय उत्तरदायी शासन की स्थापना कर दी थी । जिसके प्रथम प्रधानमंत्री लाला राम वाजपेयी वनाए गए । केबिनेट के अन्य सदस्यों में चतुर्भुज पाठक अर्थमंत्री , मिथिला प्रसाद गोस्वामी न्याय मंत्री , पं मनकामेश्वर नाथ जुत्सी गृहमंत्री ( शासकीय) बने । 
12 मार्च 1948 को बुंदेलखंड एवं बघेलखंड के राज्यों को मिलाकर विन्ध्य प्रदेश निर्माण हेतु भारत सरकार के गृह विभाग के सचिव वी पी मेनन नौगाँव आए थे । जिन्होंने बुंदेलखंड के सभी राजाओं से रियासतों के विलीनीकरण समझौते पर हस्ताक्षर करवाए थे । 
इस तरह टीकमगढ़ ज़िला विंध्य प्रदेश का हिस्सा बना । फिर 1 नवंबर 1956 को राज्यों के पुनर्गठन के बाद टीकमगढ़ ज़िला मध्य प्रदेश का एक ज़िला बना । 1 अक्टूबर 2018 को टीकमगढ़ ज़िले का विभाजन कर निवाडी जिला अस्तित्व में आया था ।
संकलन -पुष्पेन्द्र सिंह चौहान (कृप्या कापी पेस्ट न करें यह हमारी बौद्धिक संपदा है ) 
#टेहरी_से_टीकमगढ़_को_राजधानी_का_वैभव_प्रदान_करने_वाले_महाराजा_बिक्रमाजीत_की_पुरानी_फोटो_को_AI_से रंगीन किया है । #प्रथमबार_बिक्रमाजीत_महराज_के_दर्शन_करें_क्योंकि_समूचा_टीकमगढ़_इनका_सदैव_ऋणी_रहेगा

Wednesday, 29 July 2026

आरक्षण - जातिवाद

#आरक्षण ---#जातिवाद---#योग्यता
      बीजेपी के लगता है बुरे दिन नहीं बुरा साल 
चल रहा है एक मुसीबत जाती नहीं कि दूसरी पहुंच जाती है
 या खुद मुसीबत बुलाते हैं
अभी तिलचट्टों के हाथों पटखनी खाने के बाद आराम कर ही रहे थे कि 
#ReservationHataoAndolan शुरू हो गया 
      हालांकि मैं भी जानता हूं कि इसका परिणाम कुछ नहीं निकलेगा, सिर्फ सवर्ण समाज अपनी भड़ास निकालेगा तो बाकी दूसरे वर्ग एक दूसरे की मां बहन करेंगे 
    क्योंकि 75 वर्ष से जो आरक्षण की चाशनी चटाई गई है 
वो अब पूरा शक्कर की फैक्ट्री चाहते हैं 
मुझे लगता है अंग्रेज कभी गया ही नहीं आज भी उनके द्वारा फैलाया जाल में फंसा भारत फड़फड़ा रहा है 
एक अंग्रेज लार्ड था #मैकाले 
उसके आने के बाद एक सर्वे कराया गया था मद्रास प्रेसीडेंसी, बंगाल प्रेसीडेंसी, और भी कई इलाकों का ,
जिसमें शिक्षा की स्थिति की रिपोर्ट पेश की गई जिसमें पता चलता है कि भारत के सभी रजवाड़ों में जो भी गुरुकुल थे उस समय स्कूल तो थे नहीं तो जो अपने बच्चों को भेज सकते थे भेजते थे उसमें ऐसा नहीं था कि कोई जाति नहीं थी 
और जाति की अवधारणा भी अंग्रेज ही लेकर आए 
                हमारे भारत में वर्ण था ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य शूद्र 
अंग्रेजी शासन ने सबके काम के आधार पर उनकी जाति बना दी और सरनेम भी रिकार्ड में लिख लिया जो आज भी आर्काइव में मिल जाएगा 
   और चूंकि क्षत्रिय अनेकों जगह शासन किए और अपने राज्य की प्रजा की रक्षा करने और उनका पालन-पोषण की जिम्मेदारी थी तो उनको और ब्राह्मण जो प्रायः गरीब ही थे लेकिन ज्ञान रखते थे वेद शास्त्र पुराण उपनिषद और व्यापार करने वाले बनिया समाज और भी जोड़कर उसे उच्च वर्ग बना दिया, जो जिस काम में निपुण था उसकी जाति बन गई।
          और अंग्रेज़ ने जिस क्रम में लिखा उसे उससे ऊंचा और नीचा बना दिया।
    मैकाले ने शिक्षा नीति बनाई और जो 1947 के बाद भी हमारे देश के कर्णधारो ने वैसा ही अपना लिया, वहीं जाति विभाजन,
     ऊंच नीच , तो छोड़िए संविधान ने नया चार वर्ग बना दिया 
जनरल , ओबीसी, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति 
     कहते हैं कि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति गरीब थे पिछड़ा थे सामाजिक आर्थिक रूप से।
मानता हूं लेकिन बाकी वर्ग भी कोई अमीर नहीं था हमने तो 80 के दशक तक भी अपने गांव के सवर्ण परिवारो को देखा है 
जो अत्यंत गरीबी की जिंदगी जिए है जिनके पास ना पर्याप्त जमीन थी ना धन
लेकिन उनके माथे पर चिपका दिया गया कि तुम शोषण करते हो , हां मानता हूं भेदभाव था लेकिन वैसा नहीं था जेसा वामपंथियों ने प्रचार किया 
        ये तो अपने अपने इलाके में जनसंख्या के ऊपर था अब छत्तीसगढ़ और उड़ीसा, महाराष्ट्र के अनेक इलाकों को मैं जानता हूं जहां दूर दूर तक कोई सवर्ण है ही नहीं , फिर वह गरीब और पिछड़े क्यों रह गए 
असली बात है शिक्षा।
जो शिक्षा पाएगा या पाया था उसने उपयोग किया, भाई संपत्ति में था ही क्या, हमने देखा है सिर्फ जमीन थी और जैसा सबका मकान मिट्टी का और खपरैल वाला होता था सवर्णों का भी वैसा ही था 
      आसपास के आदिवासियों का एक तबका जो मेहनती थे वे काम करने आते थे और बदले में उस समय रूपया नहीं अनाज देते थे 
अब फिर आते हैं संविधान पर , अंबेडकर के अंदर चुल्ल मची थी अलग दलित कांस्टिटेंसी बनाने की जिसका जबर्दस्त विरोध हुआ 
तब संविधान में ही उनको 145 सीट दिए गए जिससे केवल वही चुनाव लड़ सकते थे
और आरक्षण दिया गया हर चीज में नौकरी में शिक्षा में
     चलो ठीक है दिया भाई ठीक है 
परंतु कोई आंकड़ा है कि इससे किसका फायदा हुआ किसका नहीं हुआ, कोई दस्तावेज नहीं बस यही कहानी है कि पांच हजार साल से अत्याचार हुआ, पानी नहीं पीने दिया।
      उसके बाद हमारे होनहार नेता भी समझ गया कि वोटबैंक बनाओ चुनाव जीतो बल्कि और बढ़ाओ ।
‌। ये चीज आगे जाकर विकराल रूप धारण करेगी , जिस हिसाब से दलितों के एक वर्ग में देवी देवताओं को लेकर अपशब्द पढ़ा दिया गया है और हर दिन अपमान करते हैं
   कभी ऐसी नौबत ना आ जाए कि खून की नदियां बह जाए
सच कह रहा हूं नफ़रत बढ रही है 
उधर जिहादी भी टकटकी निगाह लगाए हैं कि खुद तो लड़कर सब करके देख लिया, सवर्णों के कारण ना तो खुलकर धर्म परिवर्तन करवा पा रहे ना ईसाई मिशनरियों का मंसूबा पूरा हो रहा है 
इसलिए सवर्णों को दलितों से मारकाट करवा दो 
   सब गड़बड़झाला है भाई 
आरक्षण नहीं जाएगा मैं भी जानता हूं बल्कि बढ़ता जाएगा 
    जातिवाद को मंसूबा धारी साजिशकर्ता जाने नहीं देंगे 
देश ऐसे ही चलेगा 
जयश्री राम 🙏 🚩 
#castism #UGC #viralpost