Saturday, 29 August 2026

कृष्ण का एक अरबी version पकड़ा दिया गया कि तुम इसकी पूजा करो।

आज हम जिस योगेश्वर की पूजा करते हैं वो योगेश्वर कौन है? वो योगेश्वर एक वो कसर का एक अरबी अरेबियन version है, अरेबियन version. हमें एक मुसलमानी कसर पकड़ा दिया गया कि तुम इसकी पूजा करो। भाई साहब कहते हैं भागवत के करने वाले, कहते हैं सनातन धर्म के बड़े बड़े जानने वाले

कि जिस गांव में योगेश्वर ने जन्म लिया, जन्म तो उनका जेल में हुआ मथुरा के और फिर रहने लगे वो गोकुल में। गोकुल की प्रत्येक नारी उन्हें अपना पति, अपना वर समझती थी। भाई साहब आपका जन्म किसी गांव में हुआ या किसी शहर में हुआ था? मैं तो नगर में पैदा हुआ हूं।

भाई साहब मेरा जन्म एक गांव में पैदा हुआ। गांव की परंपरा है, जिस गांव में मेरा जन्म हुआ, उस गांव में प्रत्येक महिला हां मेरी बहन, मेरी शादी होकर आई, मेरी पत्नी के अलावा, उससे पहला रिश्ता मेरा परदादी का, दूसरा रिश्ता दादी का, तीसरा रिश्ता मां का,

चौथा रिश्ता बेटी समान भाई बहू, छोटे भाई की पत्नी, पांचवा रिश्ता पुत्र वधू, छठा रिश्ता पौत्र वधू। एक अपनी पत्नी को छोड़कर केवल यही मेरे रिश्ते उस गांव की महिलाओं से संभव है। और जिस भी महिला ने उस गांव में जन्म लिया,

सबसे पहला रिश्ता पिता की बुआ, फिर मेरी बुआ, फिर मेरी बहन, फिर मेरी बेटी, फिर मेरी पौती, फिर मेरी परपौती। भाई साहब क्या इनमें से कोई भी ऐसा रिश्ता है कि कोई भी महिला मुझे अपना पति मान ले? क्या यह भारतीय धर्म परंपरा में संभव है क्या भाई साहब?

ठीक बात है, बिल्कुल ठीक। यह कभी भी संभव नहीं था। और अगर मैं किसी महिला से यह रिश्ता जोड़ने की कोशिश करता हूं तो इसकी सजा हमारे धार्मिक संस्कारों में या तो death

sentence या परिवार का पूर्ण बहिष्कार, इसके अलावा कोई सजा नहीं थी। एक काम जो नरसिंगानंद नहीं कर सकता, पंडित विनय कसर चतुर्वेदी नहीं कर सकते, एक साधारण हिंदू नहीं कर सकता, तो हम सबका पिता,

जो हमारे धर्म का पिता है, वो ये काम कैसे कर सकता है भाई साहब? ये परंपरा कहां से आई? इस परंपरा को समझने के लिए आपको पचास, साठ और सत्तर के दशक की जो फिल्में हैं वो याद करनी पड़ेंगी।

ये संस्कार कहां से बोए गए? फिल्में दिखाती थी एक गांव में, एक घर में लड़का रहता है, बराबर के घर में लड़की रहती है, दोनों में प्यार हुआ, दोनों की शादी हो गई। गोत्र में भी शादी नहीं हो सकती।

गांव की तो बात छोड़ दीजिए। यह हमारी परंपरा नहीं, यह लुटेरों की परंपरा थी। जो अपनी बहनों से, अपनी बेटियों से, अपनी पौतियों से, अपनी माताओं से, अपनी पुत्र वधुओं से शादी और बलात्कार कर लेते थे। धर्म के नाम पर बिके हुए धर्मगुरुओं ने,

धर्म के नाम पर बिके हुए तथाकथित विद्वानों ने योगेश्वर के चरित्र को समाप्त करने के लिए, ताकि हिंदू मानस बिल्कुल कुचल जाए और हम इस गंदगी को स्वीकार करके गंदगी में लिप्त हो जाएं, इसके लिए यह अरेबियन परंपराएं, यह जाहिल लुटेरों की परंपराएं हम पर डाल दी।

यह तो धन्यवाद देता हूं, मैं अभी भी खाप पंचायतें हैं, अभी भी गांव का system है, जिसने इस बदतमीजी को रोके रखा है। वरना अपने आप को तथाकथित विद्वान कहने वाले तो बहुत दिन पहले से, अभी हमारे न्यायपालिका को देख लीजिए भाई साहब, हमारे विद्वान न्यायाधीशों को देख लीजिए,

वो तो तैयार बैठे रहते हैं कि गंदगी को अपने ऊपर थोप लो और समाज पर लगा दो। इन षड्यंत्रों से लड़ने के लिए आज बड़े धर्म के बारे में मनन, चिंतन, अध्ययन और सही धर्म के प्रचार प्रसार की आवश्यकता है भाई साहब।

लोग जयचंद को गद्दार बताते हैं।

हम लोग जयचंद को गद्दार बताते हैं। क्योंकि हमारी नसों में जो गुलामी है ना, सत्ता की गुलामी। आप पूरा जब पढ़ेंगे तो आपको पता चलेगा जयचंद और पृथ्वीराज चौहान सगे मौसेरे भाई थे। हां और वो गद्दार नहीं था।

एक साथ अमर के देखते थे दोनों। जयचंद छोटे थे, पृथ्वीराज चौहान बड़े थे। तो पृथ्वीराज चौहान को दिल्ली मिल गई। वरना पृथ्वीराज चौहान अजमेर के राजा थे और यह राजा थे कन्नौज के। दोनों एक ही आश्रम में रहकर पढ़े।

और जयचंद जो है पृथ्वीराज चौहान के बहुत ही आज्ञाकारी थे। पृथ्वीराज चौहान जब भी कोई लड़ाई लड़ते थे, बड़ी लड़ाई, जयचंद उनके general रहते थे। लेकिन 65 साल के बूढ़े ने जब अपने सगे छोटे मौसेरे भाई की 13

साल की बेटी का अपहरण कर लिया और लाखन जो था उनका मुँहबोला बेटा, उनका भतीजा था जयचंद का, उनका अपना बेटा तो था नहीं। तो लाखन को बुलाकर कत्ल कर दिया। तो जयचंद बेचारा क्या करता?

हम सच को स्वीकार ही नहीं कर पाते। हम केवल भाटों की भाषा बोलते हैं। हम केवल गुलामों की भाषा बोलते हैं। हम कभी भी सत्य का आकलन नहीं करते। तो गांधी नेहरू की गलती नहीं थी।

उस समय सावरकर को छोड़कर बाकी जितने सरदार पटेल को बहुत महान बताया जाता है। अगर सरदार पटेल चाहते तो क्या एक भी मुसलमान भारत में रह जाता? केवल दो नेता हैं एक भीमराव अंबेडकर और एक वीर सावरकर। ये दोनों चिल्लाते रहे। आज हमें महान लोग भी तो क्योंकि हमें गुजराती महान बनाने हैं।

तो मैं फिर कह रहा हूं अच्छे थे। सरदार पटेल ने रियासतों का एकीकरण किया। अच्छी बात है। लेकिन इस्लाम के बारे में तो वो गांधी के तो follower थे। और संघ पर प्रतिबंध किसने लगाया?

सरदार पटेल ने लगाया ना। लेकिन फिर भी आज संगी जो हैं सारे क्योंकि गुजराती अब चलो छोड़ो यार। ये मेरे बाद की बातें हैं। ये मेरे बाद लोग discuss करेंगे। लेकिन कुल मिलाकर बात यह है कि

कुल मिलाकर बात यह है कि सत्ता की गुलामी छोड़नी पड़ेगी। और हमें बातों के, देखिए हिंदू सत्य को नहीं पसंद करता। हिंदू केवल सत्ता की गुलामी को पसंद करता है। इसलिए आज तक हम जयचंद को गाली देते हैं। जयचंद जो सबसे बड़ा पीड़ित था उस समय का।

जो पृथ्वीराज चौहान का सबसे बड़ा वफादार था। आज भी हिंदू अगर गद्दार किसी को कहता है तो जयचंद को बताता है। ये नहीं कहता कि भाई किसी की बेटी को kidnap करने की जरूरत क्या थी पृथ्वीराज चौहान को? अपने भाई की तो बेटी kidnap कर ली और मोहम्मद गौरी को जिंदा छोड़ दिया।


तुलसीदास ने राम मंदिर का जिक्र नहीं किया

आज मुझे बहुत सारे लोग कहते हैं कि गोस्वामी तुलसीदास जी को अकबर ने बुलाया और उन्होंने जाने से इंकार कर दिया। लेकिन जिन जागीरदार, जिन जमींदारों के पास गोस्वामी तुलसीदास जी रहते थे, जिसमें बनारस में एक बहुत बड़ा नाम था राजा टोडरमल का। यह भूमिहार जमींदार थे भाई साहब।

इनके वंश के ही कुछ लोग बाद में काशी, जो यह काशी का जो राजाओं का परिवार है, इसी वंश से बना भाई साहब। काशी राजवंश ठाकुरों का नहीं है, ब्राह्मणों का है। जानता हूं, जानता हूं।

भूमिहारों का है। भाई साहब खुद राजा, ये टोडरमल के यहां रहते थे। और यह राजा टोडरमल वो नहीं जो नवरत्नों में जिसकी गिनती होती थी। यह दूसरे राजा टोडरमल हैं। और भाई साहब राजा टोडरमल अकबर के गुलाम थे, गुलाम।

पक्की बात, तो उस काल में और उनके धन पर पलने के कारण, गोस्वामी तुलसीदास जी ने अपने पूरे जीवन में इस्लाम के बारे में, इस्लाम के अत्याचारों के बारे में, जो अत्याचार उनके माता पिता पर हुए, उसके बारे में, जो नि-निर्संक हत्याकांड राम जन्मभूमि पर हुआ, उसके बारे में कहीं भी एक शब्द नहीं लिखा।

और कहीं इधर उधर दो चार लाइनें लिख दी हो भाई साहब स्पष्ट सी, तो मैं उसकी चर्चा तो नहीं करता। क्योंकि कुछ लोगों ने मुझे दो चार लाइनें बताई कि भैया तुलसीदास जी की लिखी हुई है, उसमें पीड़ा तो है, लेकिन सत्य संदेश कुछ भी नहीं है।

और भाई साहब, अकबर के, संभवतः अकबर के समय में ही दिल्ली में संतों की एक बहुत बड़ी सभा हुई और उस सभा में धर्मादेश दिया गया। वह धर्मादेश था दिल्लीश्वरोवा जगदीश्वरोवा। जो दिल्ली का अधिपति है, वही हमारा भगवान है।

और यह धर्मादेश किसी मुसलमान ने नहीं, हमारे बड़े बड़े संतों ने इकट्ठे होकर दिया। और उस समय दिल्ली इन अरब के लुटेरों के पास थी। अरब के भी नहीं, टर्की के। अरब तो भाई slightly थोड़े दिनों में समाप्त हो गए थे।

बाद में तो यह जिहाद का सारा ठेका ये टर्киयों ने ले लिया, टर्की के लुटेरों ने ले लिया था। जो अरब के लुटेरों से भी ज्यादा जाहिल और ज्यादा निर्दयी थे। आज भी हमारे कथावाचक, हमारे धर्माचार्य उसी परंपरा का पालन कर रहे हैं।

वैदिक काल स्त्रियां महिलाएं

यह धारणा आधी सच है कि आदि काल में स्त्रियाँ गुरुकुल नहीं जाती थीं। पूरा सच इससे ज्यादा गौरवशाली है।

आदि काल के 2 दौर समझिए -

### 1. वैदिक काल (1500 BC - 500 BC) - तब स्त्रियाँ गुरुकुल जाती थीं

उस समय दो प्रकार की विद्यार्थिनी होती थीं -

*क) ब्रह्मवादिनी -* जो आजीवन ब्रह्म-विद्या पढ़ती थीं, विवाह नहीं करती थीं। ये ऋषि ही बन जाती थीं।
- *लोपामुद्रा, घोषा, अपाला, विश्ववारा* - इन्होंने ऋग्वेद के सूक्त लिखे हैं। ऋषिका हैं।
- *गार्गी, मैत्रेयी* - जनक के दरबार में याज्ञवल्क्य जैसे ऋषियों से शास्त्रार्थ करती थीं।

*ख) सद्योवधू -* जो 15-16 साल तक गुरुकुल / आचार्य के आश्रम में पढ़ती थीं, फिर विवाह कर गृहस्थ बनती थीं।

तब उपनयन संस्कार लड़के-लड़की दोनों का होता था। अथर्ववेद कहता है - _"ब्रह्मचर्येण कन्या युवानं विन्दते पतिम्"_ - ब्रह्मचर्य से ही कन्या योग्य पति पाती है।

### 2. उत्तर वैदिक और स्मृति काल (500 BC के बाद) - तब व्यवस्था बदली

जब गुरुकुल घर से बहुत दूर जंगलों में चले गए, और समाज में बाल-विवाह, बाहरी आक्रमण शुरू हुए, तब लड़कियों को दूर भेजना असुरक्षित माना गया। तब से -

*स्त्रियों की शिक्षा के 3 केंद्र बने -*

*1. घर ही पहला गुरुकुल -* 
माता, पिता, भाई ही गुरु होते थे। मनु ने लिखा है - माता 1000 पिताओं से बड़ी आचार्य है। लड़की को पाकशास्त्र, आयुर्वेद, संगीत, गणित, धर्मशास्त्र माँ सिखाती थी। पिता वेदांग।

*2. अंतःपुर की शिक्षा -*
राजघरानों और श्रेष्ठी परिवारों में आचार्य घर आकर पढ़ाते थे। इसे अंतःपुर-शिक्षा कहते थे। कालिदास के नाटकों में शकुंतला, मालविका सब पढ़ी-लिखी हैं।

*3. पति ही गुरु -*
विवाह के बाद पति को गुरु माना गया। याज्ञवल्क्य ने मैत्रेयी को घर में ही ब्रह्मज्ञान दिया। यही परम्परा बाद में "पति ही पत्नी का गुरुकुल है" बन गई।

*4. कन्या गुरुकुल भी थे -*
पूरी तरह बंद नहीं थे। जैन और बौद्ध काल में भिक्षुणी संघ थे, जहाँ स्त्रियाँ रहकर पढ़ती थीं। विजयनगर साम्राज्य में कन्या पाठशालाओं के शिलालेख मिलते हैं।

तो सार यह है - वैदिक आदि काल में स्त्रियाँ गुरुकुल जाती थीं, बराबरी से वेद रचती थीं। बाद में सुरक्षा और सामाजिक कारणों से शिक्षा का स्थान गुरुकुल से घर में शिफ्ट हो गया, शिक्षा बंद नहीं हुई, उसका रूप बदल गया।

स्वर सिद्धि


गुप्त 'स्वर-सिद्धि' और कार्य-सफलता विधान

यह प्रयोग आपको तब करना है जब आप किसी बहुत ही महत्वपूर्ण कार्य के लिए घर से बाहर निकल रहे हों।

साधना विधि:
जब आप पूरी तरह तैयार होकर घर के मुख्य दरवाजे पर खड़े हों, तो चौखट पार करने से पहले एक क्षण के लिए रुक जाएं।

अपनी दोनों आंखें बंद करें और अपने दाहिने हाथ की उंगलियों को अपनी नाक के दोनों छिद्रों के पास लाएं।

एक गहरी सांस बाहर छोड़ें और महसूस करें कि किस नाक से सांस का प्रवाह तेज चल रहा है— दाहिने (Right) से या बाएं (Left) से।

जो भी स्वर (सांस) उस समय तेजी से चल रहा हो, उसी तरफ के हाथ से अपने उसी तरफ के चेहरे (गाल) को स्पर्श करें और मन ही मन भगवान शिव के परम नाद 'हंस:' (Hamsah) का मात्र 3 बार मानसिक उच्चारण करें। (हंस: वह नाद है जो हमारी हर सांस के साथ अपने आप उत्पन्न होता है)।

अब घर की चौखट से बाहर अपना वही पैर सबसे पहले निकालें, जिस तरफ की सांस (स्वर) तेजी से चल रही थी।

परिणाम: शिव स्वरोदय के अनुसार, जो स्वर उस समय चल रहा होता है, ब्रह्मांड की पूरी अनुकूल ऊर्जा उसी हिस्से में केंद्रित होती है। जब आप उसी पैर को आगे बढ़ाकर 'हंस:' नाद करते हैं, तो आपकी ऊर्जा ब्रह्मांड की गति के साथ पूरी तरह जुड़ (Sync) जाती है। आप जिस भी काम के लिए जाएंगे, सामने वाले का अवचेतन मन आपके प्रभाव में आ जाएगा और वह काम शत-प्रतिशत आपके पक्ष में ही पूरा होगा। बाधाएं आपके रास्ते से खुद हट जाएंगी।


चितपावन ब्राह्मण

ब्राह्मणों में एक ब्राह्मण होते हैं चितपावन ब्राह्मण जो बहुत ही शुद्ध और अपने धर्म के प्रति कट्टर माने जाते हैं। 30 January 1948 को गांधी की हत्या से ठीक 10 दिन पहले यानी 20 January 1948 को गांधी के ऊपर हमला होता है,

जिसमें मदनलाल पहवा नाम के एक व्यक्ति पकड़े जाते हैं। पुलिस की पूछताछ में मदनलाल पहवा, नाथूराम गोडसे जी और नारायण आपटे जी का नाम लेते हैं। पुलिस को सारी जानकारी होती है लेकिन पुलिस चुपचाप बैठ जाती है। उसके बाद आता है वह दिन 30 January,

1948 की शाम 5:17 पर नाथूराम गोडसे जी द्वारा गांधी के सीने में तीन गोलियां उतार दी जाती हैं और उसके बाद पूरे महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश में यह बात फैल जाती है कि नाथूराम गोडसे एक चितपावन ब्राह्मण हैं

और उन्होंने ही गांधी की हत्या की है। सोचिए उस जमाने में ना Twitter था, ना Instagram, ना Facebook, ना WhatsApp, ना ही कोई संचार का कोई ऐसा माध्यम। फिर यह बात पूरे भारत में फैलती है और उसके बाद कांग्रेसियों और गांधीवादी विचारधारा के

लोगों द्वारा पूरे देश में से चितपावन ब्राह्मणों को खोज-खोज कर निकाला जाता है। घरों से खींच-खींच कर निकाला जाता है और सड़कों पर घसीट कर जलाकर मार दिया जाता है। उसके बाद उनके मां बहनों के साथ अत्याचार किया जाता था।

महाराष्ट्र के कपस नाम के गांव में दो ऐसे भाई थे जिनका सरनेम गोडसे था। उनको चारपाई में बांधकर जलाकर गांधीवादी विचारधारा के लोगों ने मार दिया। सोचिए जो गांधी अपने जीते जी लाखों लोगों को मरवाया, जो गांधी मरने के बाद हजारों लोगों को मरवाया तो इस भारत में पता नहीं क्यों लोग उसे महात्मा का दर्जा देते हैं।

यह दुर्भाग्य है इस भारत का। हर हर महादेव।

Friday, 28 August 2026

अंबेडकर का झूठ और शूद्र

लाल किताब है ज्योतिष निराली, जो किस्मत सोई को जगा देती है। और लाल किताब एक ऐसी किताब है आज के युग की, जिससे कि आप किसी भी समस्या का हल ले सकते हैं। हां, यह मैं नहीं सौ percent नहीं कह सकता। जो भी आपको सौ percent कहेगा कभी भी, वह झूठ बोलता होगा।

जो मैं सोचता हूं। तो तालीम, विद्या या education, यह बड़ी जरूरी है life में। तो बच्चे का या व्यक्ति जो भी हो तालीम क्योंकि कभी मुकम्मल नहीं होती। चाहे वह बचपन में है, चाहे वह जवानी में, चाहे बुढ़ापे में। तालीम का जो process है वह चलता ही रहता है।

विद्या का, पढ़ाई का, education का। तो तालीम पर लगाया हुआ क्या पैसा को investment करते हैं हम। यह विद्या पर भी पैसा लगाया आजकल investment ही है। तो क्या इसको वापस कैसे लाना है? क्या आपने जितना पैसा लगाया है उससे कई multiplication होकर वह multiply होगा,

सौ गुना हो जाए, हजार हो जाए, लाख हो जाए, उससे ज्यादा हो जाए तो वह क्या आपको वापस मिलेगा कि नहीं मिलेगा? तो लाल किताब में लिखा है कि चंद्रमा से भी हम तालीम, विद्या का, education का पता कर सकते हैं। बृहस्पति इसका देवता है।

मगर चंद्रमा अगर ठीक हो तो बृहस्पति से भी लाभ लिया जा सकता है। तो तालीम पर लगाया पैसा अगर किसी व्यक्ति का चंद्रमा number एक में है, कुंडली के खाना number एक। राशि छोड़ नक्षत्र भूला ना ही कोई पंचांग लिया। राशि नहीं देखनी।

पहले खाने में हो, पहले भाव में हो, कुंडली के लग्न में हो तो कभी खाली नहीं जाता पैसा लगाया हुआ। वापस आएगा ही आएगा। क्योंकि इसको लगाने के बाद आपने जो विद्या प्राप्त की है उससे आपको लाभ हो ही होगा।

कारामत, मदद। तालीम लिखा हुआ है कि इससे अच्छी तालीम मिलेगी जो कारामत होगी, आपको अच्छा लाभ देगी। तो घर में रखे हुए घड़े का, बर्तन का पानी कहा गया है। क्योंकि चंद्रमा पानी भी है तो पानी कहा गया है।

पानी इसलिए कहा गया है कि चंद्रमा जो है धरती माता भी है, पानी भी है। और यह दोनों ही चीजें जो हैं, यह बड़ी जरूरी है इंसान की life के लिए। तो इसमें घड़े का पानी क्यों कहा गया चंद्रमा पहले को?

क्योंकि घड़े का पानी होता है जब मर्जी उठाकर आप अपने घर में glass भरें और पी लें। मतलब you can use it, इस्तेमाल कर सकते हैं। इसका मतलब है जो विद्या आपने प्राप्त की है उससे आपको लाभ हो ही होगा। ऐसी बात नहीं है कि भाई लाभ नहीं होगा।

यह note कर लें। number दो में अगर भाव में किसी के चंद्रमा है तो पहाड़ से निकलता शह-जोर उम्दा पानी। माता के रहते-रहते कहता है तालीम उत्तम फल ही देगी। जितनी देर माता की इज्जत करता रहे, माता के पांव छूता रहे,

माता की सेवा करता रहे तो तालीम, विद्या जो है, पढ़ाई जो है उससे लाभ होगा ही होगा। number तीन में किसी का चंद्रमा है। अच्छा होता है। भाई बहनों के घर में है,

उनसे प्यार भी रहता है तो रेगिस्तान का पानी इसको कहा गया है। जिस कदर तालीम बढ़ती जावे, पिता की आय कम होती जाए। अब देखिए इसमें पिता का संबंध कहां से आ गया तीसरे खाने का। क्योंकि दसवां खाना जो है पिता का है। और छठी दृष्टि और आठवीं दृष्टि से चंद्रमा देखता है।

चंद्रमा तीसरे, तीसरे में भाई बहनों के लिए तो ठीक है। मगर पिता को अगर तालीम लेगा तो लिखा हुआ है थोड़ी खराबी करेगा। और पढ़ाई रुकेगी उसकी। अगर रुक भी जाए तो दोबारा चालू हो जाएगी। ऐसा नहीं है कि पढ़ाई बिल्कुल ही खत्म हो जाएगी।

और जब तक केतु कुंडली में उम्दा हो तो ना पिता को नुकसान तो ना जो है उसकी पढ़ाई में रुकावट आए। और उसकी पढ़ाई से लाभ भी रहेगा, रहेगा। अब चौथे भाव में किसी के चंद्रमा है तो चश्मे का पानी मीठा हरदम मुबारक लिखा हुआ है।

माता के असली खून का सबूत होगा। माता की तालीम अच्छी हो तो उत्तम फल मिलेगा। माता अगर ज्यादा पढ़ी लिखी नहीं है तो उत्तम फल कम होगा। मगर फिर भी चश्मे का पानी कहा गया है तो उत्तम फल तो हो ही होगा।

चंद्रमा जो है आपके बच्चे को पढ़ाई अच्छी देगा। अगर पांचवे भाव में किसी के चंद्रमा है तो लिखा हुआ है आबादी के अंदर का दरिया का पानी। मतलब जैसे कोई नदी है जो कि शहर के अंदर से होकर गुजरती, गुजरती है या आपके गांव के पास से

होकर गुजरती है तो यह वह पानी है। आबादी के अंदर का दरिया। और तालीम पर लगाया हुआ जो पैसा है, अगर आप तालीम पर पैसा लगाते हैं तो पूरी लिखा हुआ है वह ज्यादा उसका लाभ नहीं प्राप्त हो सक,

हो सकता है। खुद, खुद को बजाते खुद उसको लाभ नहीं होगा। मगर ऐसे बच्चे या ऐसे आगे जब वह बड़ा हो जाता है उस व्यक्ति की। जिसका चंद्रमा पांचवें में है उसके बच्चों की तालीम बड़ी अच्छी रहेगी और technical degree वो प्राप्त कर सकते हैं।

अगर उनकी हो तो technical degree जो है वो प्राप्त करते हैं। अअ मतलब कोई भी mechanical है, engineering line है, like that। और अगर छहवें में हो तो पताल, पताल का पानी कह दिया गया है कि मगर hand pump का पानी कारामद लिखा हुआ है,

अच्छा फल देने वाला है और तकलीफें तो आएंगी। अगर आपका चंद्रमा छठे भाव में है, तकलीफें तो आएंगी मगर आप overpower कर सकते हैं। तकलीफों के बावजूद भी आपकी विद्या जो है वो अच्छा लाभ ही देगी आपको। अगर सातवें में है, सातवें भाव में कुंडली के,

आपका राशि नहीं देखनी, कुंडली के सातवें भाव में है तो खेती का, जमीन का पानी, मैदान का पानी कहा गया है। जमीन का मतलब खेती की जमीन को जो पानी लगते हैं। कि शादी होने से पहले तालीम पूरी कर लेगा। ऐसा शख्स, ऐसा जो शख्स है खुद लक्ष्मी अवतार होगा।

मगर तालीम जो है वो ज्यादा कारामद नहीं होगी। ज्यादा कारामद नहीं होगी मगर फिर भी कुछ ना कुछ उसको लाभ देगी। तो अगर आठवें में कहा गया है आबे हयात वरना जहर खाली। यहां तो बहुत ही उत्तम, यहां बहुत ही मंदा। तालीम zero या तालीम जो है पूरी तरह से

highest degree जो है वो ले सकता है और उस तालीम से फायदा भी होगा। मगर तालीम बढ़ती जाए तो माता का कष्ट भी बढ़ता जाए। इसलिए माता के कष्ट के लिए चंद्रमा आठ का उपाय जो है वह करते रहना चाहिए। पितरों के नाम पर दूध देना चाहिए।

श्मशान के कुएं का पानी घर में रखना चाहिए। ये तो आगे उपाय है ना जी, कि आगे देखना पड़ता है उसका टकराव दूसरे घर में है, दूसरे घर से छठे घर को है आठवें का, तो वो देखना पड़ेगा कि वो क्या फल देता है।

मगर तालीम पर जो है वो उसका ध्यान ना देगा। अपनी तालीम पर देगा तो औलाद की पर नहीं देगा। बेफिक्रा सा हो जाएगा। कोई बात नहीं मेरा बच्चा पढ़ रहा है तो कोई, कोई ऐसी बात नहीं, नहीं पढ़ रहा तब भी कोई बात नहीं।

अब नौवें में हो तो सागर सबसे उत्तम, आराम देने वाली तालीम। इंद्र राजा की तरह सबका पालनहारा कहा गया है। इसके बाद दसवें में अगर चंद्रमा हो किसी का तो पहाड़ों की रुकावट में बना, बनाया हुआ पानी जैसे आप कह सकते हो dam।

आजकल dam जो हैं वो पहाड़ों को बीच में जहां पर ज्यादा पहाड़ आसपास हो उसके बीच में वो पानी इकट्ठा करके बाद में जब जरूरत होती है तो वो वहां पर उधर भेज देते हैं। चाहे खेती के लिए, चाहे और किसी काम के लिए।

तो कम फायदा। मगर वो हकीम जो हो तो बड़ा अच्छा है। डॉक्टरी line adopt कर ले अच्छा है। डॉक्टरी सहायता के लिए जो साथ में worker होते हैं, सहायक होते हैं, assistant हैं, वो काम कर ले तो बड़ा अच्छा है।

जैसे कोई surgery कर रहा है doctor से, उसका assistant बन जाए। उसका काम जो है वो हकीमी और डॉक्टरी के संबंधित हो तो अच्छा फल ही मिलेगा उसको। अब अगर ग्यारह में किसी का है। ग्यारहवें भाव में किसी का है चंद्रमा तो बरसाती लाला कहा गया है।

तो पढ़ेगा तो पूरा, अगर नहीं पढ़ेगा तो अनपढ़ हाफिज तो जरूर होगा। अनपढ़ भी हो मगर उसको knowledge पूरी होगी कि क्या काम करना है, किस बात में कैसे। जैसे कई लोग जो हैं उनके पास degree नहीं होती। वैसे education का मतलब ही यही है कि degree ना

भी हो आपको कोई उसका हुनर तो होना चाहिए। आपका दिमाग ठीक चलना चाहिए तो ग्यारह वाले व्यक्ति का ऐसा दिमाग चलेगा। अगर बारहवें में हो किसी का चंद्रमा तो आसमानी पानी कहा गया है ओले। ओले जो पड़ते हैं गड़े, बर्फ। अगर शनि, राहु, केतु कुंडली में मंदे तो तालीम का फायदा ना होगा।

और श-शनि जहां है मंदा कहां पर होगा? पहले भाव में ज्यादातर मंदा माना जाता है। नीच राहु जो है वो बारहवें में, केतु छठे में। तो ये हो तो तालीम से पूरा फायदा न होगा पर पढ़े-लिखे का बाप भी होगा।

इसलिए अ-लाल किताब में इसके उपाय भी दिए गए हैं। हर एक अ-अगर तालीम प्राप्त नहीं हो रही बच्चे की तो उसमें बृहस्पति और चंद्रमा को देखकर ही उपाय बताए जा सकते हैं। मगर चंद्रमा को उत्तम करने का सिर्फ एक ही उपाय है

आपके पास कि बड़े बुजुर्गों से आशीर्वाद लेते रहे। उनसे झुककर उनको सलाम करें, उनको, उनको नमस्ते करें, उनको सत श्री अकाल करें, उनको अपनी भाषा में जो भी है उनका regard करें

और तो आप जाकर आपको लाभ इसका मिल सकता है। सत श्री अकाल।