Monday, 26 October 2026

श्रीसूक्त ऋग्वेद का खिल सूक्त

#श्रीसूक्त ऋग्वेद का खिल सूक्त है। ऋग्वेद के पाँचवें मण्डल के अन्त में यह उपलब्ध होता है। सूक्त में मन्त्रों की संख्या 15 है। सोलहवें मन्त्र में फलश्रुति है। बाद में 11 मन्त्र परिशिष्ट के रूप में उपलब्ध होते हैं जिनको #लक्ष्मीसूक्त के नाम से स्मरण किया जाता है।

पितरों का एक दिन हमारे 15 दिन

पितरों का एक दिन हमारे 15 दिन का, देवताओं का 6 महीने का — कथा नहीं, खगोल है। बस यह पूछना है कि वे खड़े कहाँ हैं। 🌗

मनुस्मृति 1.66–67: 'पित्र्ये रात्र्यहनी मासः' — हमारा एक महीना पितरों का एक दिन-रात, कृष्ण पक्ष उनका दिन (कर्मचेष्टासु अहः), शुक्ल पक्ष उनकी रात; 'दैवे रात्र्यहनी वर्षम्' — हमारा एक वर्ष देवताओं का एक दिन-रात, उत्तरायण दिन, दक्षिणायन रात। वही श्लोक महाभारत 12.238 और पुराणों में।

पितर चाँद पर — भास्कराचार्य (सिद्धांत शिरोमणि, गोलाध्याय 7.13): 'विधूर्ध्वभागे पितरो वसन्तः' — चाँद के ऊपरी भाग में, जो हमसे उलटी ओर है; अमावस्या (दर्श) को सूर्य उनके सिर पर, इसलिए वह उनकी दोपहर। चाँद हमें एक ही मुँह दिखाता है: धरती का एक चक्कर पूरा करते-करते वह अपनी धुरी पर भी ठीक एक चक्कर घूम लेता है। इसलिए चाँद पर सूर्य एक महीने (29.5 दिन) में एक बार उगता-डूबता है — लगभग 15 दिन धूप, 15 दिन रात। सूर्य की ओर खड़े होकर: अमावस्या दोपहर, पूर्णिमा आधी रात, कृष्ण अष्टमी सूर्योदय, शुक्ल अष्टमी सूर्यास्त।

देवता मेरु पर — सूर्य सिद्धांत में धरती का उत्तरी ध्रुव। वहाँ ध्रुव तारा सिर के ऊपर, आकाश क्षितिज के समानांतर घूमता है, कोई तारा उगता-डूबता नहीं। सूर्य सिद्धांत 12.67: 'मेरौ मेषादिचक्रार्धे देवाः पश्यन्ति भास्करम्, सकृदेवोदितम्' — मेष (वसंत विषुव) से कन्या तक, छह राशियाँ, सूर्य एक बार उगकर क्षितिज के ऊपर ही घूमता रहता है; तुला से मीन तक नीचे (वही आधा असुरों का दिन)। सबसे ऊँचा कर्क संक्रांति पर, 23.4° — देवताओं की दोपहर।

दो गणनाएँ, एक ही दिन: सिद्धांत दिन सूर्योदय से गिनता है (मेष से; अमावस्या दोपहर), मनु उस आधे को दिन कहते हैं जिसमें सूर्य चढ़ता है — आधी रात से दोपहर तक: पितरों के लिए पूर्णिमा→अमावस्या (कृष्ण पक्ष), देवताओं के लिए मकर→कर्क (उत्तरायण)। 15 दिन और 6 महीने, दोनों में उतने ही।



अरोड़ा और खत्री

شاید آپ نے غلطی سے اپنی پچھلی بات کا کچھ حصہ
अरोड़ा और खत्री थे, उनके मोहल्ले साथ-साथ होते थे। एक बड़ी गली थी, जिसके एक तरफ सारे अरोड़ा रहते थे और दूसरी तरफ खत्री रहते थे। खत्री (अपभ्रंश होकर खत्री बना) और बाकी जो कम्युनिटीज हैं, खासकर मुस्लिम कम्युनिटी, वे एक-दो फर्लांग दूर रहते थे, क्योंकि उनके यहाँ नॉन-वेज (मांसाहारी) खाने का चलन था। अरोड़ा एक बेहतरीन बिजनेस कम्युनिटी है और मैं यह बात बिल्कुल मानता हूँ कि वे शायद खत्रियों से भी ज्यादा अच्छी बिजनेस कम्युनिटी रहे होंगे।
मूल रूप से वे 'अरोड़' शहर के रहने वाले थे, जो आज पाकिस्तान के सिंध प्रांत में पड़ता है। सिंध की पहली राजधानी 'थट्टा' हुआ करती थी। आज कराची है, जो पहले एक बंदरगाह (पोर्ट) था। उससे भी पहले वहाँ मोहम्मद बिन कासिम का राज था और उस शहर का नाम 'देबल' (या दारकी) था। मेरे पिताजी (मुझे इस बात पर गर्व है) देश के बंटवारे (1947) से पहले पाकिस्तान के लांढी (कराची) स्टेशन पर स्टेशन मास्टर के रूप में नियुक्त हुए थे। 1947 में वे भारत आए। तो उस क्षेत्र के पास ही यह प्राचीन अरोड़ शहर है, जो आज बिल्कुल बर्बाद हो चुका है। मोहम्मद बिन कासिम और गज़नी-गौरी जैसे आक्रमणकारियों ने उस शहर को तबाह कर दिया था।
बिजनेस कम्युनिटी की बात करें, तो जैसे मारवाड़ी हैं, जो आपको कोलकाता में भी मिलेंगे, नेपाल में भी मिलेंगे (मैं नेपाल गया था, तो वहाँ के 10 में से 9 डिपार्टमेंटल स्टोर मारवाड़ियों के थे), बर्मा के अंदर भी सारा बिजनेस मारवाड़ियों का था; वैसे ही अरोड़ा भी एक बड़ी बिजनेस कम्युनिटी होने के नाते पूरे संयुक्त (अविभाजित) पंजाब में फैले हुए थे, वे किसी एक जगह टिक कर नहीं रहे।
कहा जाता है कि खत्री और अरोड़ा मूल रूप से आज से 5-6 हजार साल पहले मेसोपोटामिया या जेरूसलम (यरूशलम) के इलाकों से आए थे। आप राज कपूर साहब की नीली आँखें और गोरा रंग देखिए, यह वही जींस हैं, उनका रंग-रूप और कद-काठी वहीं से आई है। खत्रियों में 52 जातियां (बावन जाती) होती हैं, जो बहुत प्रसिद्ध हैं और आपको इंटरनेट पर भी मिल जाएंगी—जैसे कपूर, खन्ना, मल्होत्रा। इन्हें 'ढाई घर' भी बोलते हैं, क्योंकि पहले ये लोग इन्हीं तीन-चार घरों में ही आपस में शादी-ब्याह करते थे और इन 52 घरों से बाहर नहीं जाते थे। मेरे नानाजी मल्होत्रा थे, मेरे एक मौसाजी कपूर हैं, दूसरे मौसाजी खन्ना हैं और मेरे पिताजी सहगल हैं। पंजाबियों में यह परंपरा थी।
अरोड़ा और हम खत्री आपस में बहुत नजदीक थे, हमारे परिवारों में बहुत आना-जाना और उठना-बैठना था। मुस्लिमों के साथ भी हमारे अच्छे संबंध थे, लेकिन उनसे हम केवल कच्चा राशन (बिना पका हुआ सामान) लेते थे और अपने घरों में लाकर खुद पकाकर खाते थे। बाकी उनके रहने के तौर-तरीकों में थोड़ा अंतर रहता था। खत्री और अरोड़ा में बहुत कम फर्क था, लेकिन व्यापार के मामले में हमारे अरोड़ा भाई आज भी बहुत आगे हैं।
हालाँकि, हमारे खत्रियों ने भी बड़ी-बड़ी इंडस्ट्रीज (उद्योग) लगाईं। उदाहरण के लिए, पाकिस्तान के इकबाल सहगल वहाँ की सबसे बड़ी फॉर्मास्युटिकल (दवा) कंपनी के मालिक हैं और पाकिस्तान के सबसे अमीर इंसानों में गिने जाते हैं। सहगल कम्युनिटी बिजनेस भी करती है, इंडस्ट्रियल एंटरप्रेन्योर (औद्योगिक उद्यमी) भी है और साथ ही वे फाइटर (योद्धा) भी हैं, अच्छे लड़ाके भी हैं। जैसे इज़राइल के यहूदी हैं—जो फाइटर भी हैं और बुद्धिजीवी (इंटेलेक्चुअल) भी हैं। आइंस्टीन से लेकर अमेरिका के बड़े-बड़े कॉर्पोरेट मालिकों तक, 11 में से 10 कंपनियों के मालिक आपको यहूदी मिलेंगे। हमारा इतिहास भी कुछ वैसा ही रहा है, हम 5,000-6,000 साल पहले वहाँ से चलकर धीरे-धीरे यहाँ आए।
हम काफी समय तक अफगानिस्तान में भी रहे। हमारे जो दीपक वोहरा साहब हैं (जो भारत के राजदूत रहे हैं और भारत के प्रधानमंत्री के सलाहकार होने के साथ-साथ अफ्रीका के 5 देशों के भी एडवाइजर हैं), वे कहते हैं कि उनके पूर्वज गज़नी (अफगानिस्तान) में रहते थे। अभी कल ही मैं एक वीडियो देख रहा था, जिसमें अफगानिस्तान के गज़नी शहर को दिखाया गया था कि वहाँ हमारे गुरुद्वारे और मंदिर आज भी हैं, लेकिन वहाँ के हिंदुओं को छिपकर रहना पड़ता था क्योंकि जब वहाँ इस्लामी शासकों का कब्जा हुआ, तो उन्हें प्रताड़ित होना पड़ा।
यह जो खत्री, मुल्तानी और झांगी (झंग के रहने वाले) लोग थे, वे बंटवारे के बाद भारत के अलग-अलग राज्यों और शहरों में आकर बसे। जैसे:
  • डेरा गाजी खान वाले लोग फरीदाबाद में आए।
  • डेरा इस्माइल खान वाले लोग गाजियाबाद और आस-पास के इलाकों में आए।
  • झंग (झांगी) वाले लोग रोहतक में आकर बसे।
  • मुल्तान (मुल्तानी) वाले लोग पानीपत में आए।
  • बहावलपुर वाले लोग राजपुरा में आकर बसे।
  • इसके अलावा कुछ मिक्स आबादी हांसी और हिसार में भी आई।
पंजाबियों के मामले में मैं एक बात मानता हूँ—हमारा पुराना पंजाब अटक और पेशावर (जो अब पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा में है और जिस पर अफगानिस्तान भी दावा करता है) तक फैला हुआ था। वहां जो डूरंड लाइन (रेड लाइन) है, उसे लोग नहीं मानते। उनका कहना है कि सिंधु नदी के पार का सारा इलाका अफगानिस्तान है और इस तरफ का सारा इलाका पंजाब था। हमारा पंजाब सिंधु नदी से लेकर कोसी (फरीदाबाद, पलवल, होडल और फिर कोसी कलां) तक फैला हुआ था।
पहले विभाजन के समय राजनीति खराब हुई और एक अलग देश (पाकिस्तान) बन गया। फिर हमारे सिख भाइयों ने 'पंजाबी सूबा' आंदोलन शुरू कर दिया कि हमारा ही मुख्यमंत्री होना चाहिए। मास्टर तारा सिंह और संत फतेह सिंह के दौर में इस राजनीति के कारण पंजाब का एक बार फिर बंटवारा हो गया और हरियाणा तथा हिमाचल प्रदेश अलग राज्य बन गए।
मुल्तानी और झांगी लोग वहां क्या काम करते थे? वहां भी सब मिक्स काम था। मुल्तान बहुत लंबे समय तक सिंध का हिस्सा रहा। करनाल के जो नवाब थे (लियाकत अली खान, जो बाद में पाकिस्तान के पहले प्रधानमंत्री बने और जिनकी गोली मारकर हत्या कर दी गई), वे 1945 से 1947 तक अविभाजित भारत के वित्त मंत्री (Finance Minister) रहे थे। उन्होंने कांग्रेस के साथ असहयोग (Non-cooperation) की नीति अपनाई और एक भी फाइल क्लियर नहीं होने दी, क्योंकि वे हिंदुओं को शासक नहीं बनने देना चाहते थे। उनका तर्क था कि हमने (मुगलों और नवाबों ने) सदियों तक इस ज़मीन पर राज किया है, अंग्रेजों ने सरकार बहादुर शाह जफर से ली थी, इसलिए वे सत्ता वापस मुसलमानों को ही सौंप कर जाएं।
हरियाणा टॉक्स (Haryana Talks) में आपका स्वागत है। आज मैं गुरुग्राम (गुड़गांव) में हूँ और हमारे साथ बेहद खास मेहमान हैं—अतुल कुमार सहगल जी, जो हरियाणा सरकार में अपनी सेवाएं दे चुके हैं। आज हम पंजाबी कम्युनिटी और 1947 के बंटवारे के इतिहास पर बात करेंगे कि कैसे लोग पाकिस्तान से भारत आए और यहाँ से वहाँ गए। सहगल साहब, नमस्कार और आपका बहुत-बहुत धन्यवाद।

चूंकि आपका दिया गया पाठ पहले से ही हिंदी भाषा (देवनागरी लिपि) में है, इसलिए यहाँ इसका वाक्य-दर-वाक्य और अधिक स्पष्ट, शुद्ध तथा पढ़ने में आसान (Formatted) रूप दिया जा रहा है ताकि आप इसे आसानी से समझ या कहीं भी कॉपी-पेस्ट कर सकें:
"पंजाबी होने का मतलब समझो। यह पंजाबी कोई जाति नहीं है, पंजाबी एक कल्चर (संस्कृति) है, पंजाबी एक सभ्यता है। चाहे कोई पंजाबी हिंदू हो, सिख हो, दलित हो, बैकवर्ड (पिछड़ा) हो या जो भी हो—जिसकी मातृभाषा पंजाबी है, वह पंजाबी है। इसमें कोई जाति, धर्म या वर्ग की बात नहीं है।"
यह जवाब मैंने आलोचना करने वालों को दिया। आज भी लोगों को ऐसा लगता है, लोग सोचते हैं कि पंजाबी कोई अलग ही जाति है। जैसे कोई मुझसे कहता है कि "मैं पंजाबी हूँ", तो दूसरा कहता है कि "अरे, तू तो ब्राह्मण है, तो तू पंजाबी कैसे हो सकता है?" तो यह बात आज भी लोगों के दिमाग में बैठी हुई है।
इसके पीछे एक बहुत बड़ी साजिश है और उस साजिश के लिए कहीं न कहीं हम खुद भी जिम्मेदार हैं। अब हम कैसे जिम्मेदार हैं? वह ऐसे कि हरियाणा में 'खत्री सभा', 'अरोड़ा खत्री सभा', 'अरोड़ा खत्री पंजाबी सभा' और इस तरह के मंच बने हुए हैं—जैसे 'अरोड़ा खत्री मंच'। अब आप खुद सोचिए, जब कोई लिखता है कि "अरोड़ा खत्री पंजाबी मंच", तो इसका (गलत) मतलब यह निकलता है कि अरोड़ा अलग हैं, खत्री अलग हैं और पंजाबी अलग हैं।
तो जब हम पंजाबियों में से खत्रियों को भी अलग कर देंगे, अरोड़ों को भी अलग कर देंगे, दलित पंजाबियों को भी अलग कर देंगे और केशधारी (सिख) पंजाबियों को भी अलग कर देंगे, तो फिर हम (संख्या में) तैंतीस (33) परसेंट कैसे रह जाएंगे? बिल्कुल नहीं रह पाएंगे।
फिर तो चौधरी देवीलाल जी की वह बात ठीक हो जाएगी, जिसका जिक्र जुगल किशोर शर्मा ने अपनी पुस्तक 'चौधरी देवीलाल' में किया है। उन्होंने लिखा है कि चौधरी देवीलाल साहब ने लोकसभा में कहा था कि "ये खत्री तो हरियाणा में सिर्फ सात-आठ परसेंट हैं।" तो अगर हम खुद को ऐसे ही बांटते रहे, तो फिर हम सच में सात-आठ परसेंट ही रह जाएंगे। यह हमारे खिलाफ एक बहुत बड़ी साजिश है, मगर आजकल जो ये सभाएं बन रही हैं, वे लोग इस बात की गंभीरता को समझ ही नहीं रहे हैं।
आजकल चलन में यह बात बहुत ज्यादा आ गई है कि कोई कहता है कि वह पंजाबी नहीं है, वह पंजाबी नहीं है। देखिए, पंजाबी सिर्फ वही है जिसकी मातृभाषा पंजाबी है, जिसका कल्चर पंजाबी है, जिसकी सभ्यता और संस्कृति पंजाबी है। चाहे वह पाकिस्तान से आया हो या हिंदुस्तान का रहने वाला हो; जो पंजाबी बोलता है, जिसकी मदर लैंग्वेज (मातृभाषा) पंजाबी है, वह पंजाबी है—चाहे वह हिंदू हो, सिख हो, दलित हो, बैकवर्ड हो या किसी भी धर्म और वर्ग का हो।
जैसे एक गुजराती है, तो क्या आप गुजराती को कोई जाति कह सकते हैं? बिल्कुल नहीं। बंगाली को कोई जाति कह सकते हैं? बिल्कुल नहीं। इसी तरह आप पंजाबी को भी कोई जाति नहीं कह सकते। मगर जब आप खुद ही इसे खत्री, अरोड़ा वगैरह में बांट दोगे, तो फिर तो वह (जाति) बन ही जाएगी।

सदा न संग सहेलियाँ,

सदा न संग सहेलियाँ, सदा न राजा देश।
सदा न जुग में जीवणा, सदा न काला केश॥
सदा न फूलै केतकी, सदा न सावन होय।
सदा न विपदा रह सके, सदा न सुख भी होय॥
सदा न काहू की रही, गल प्रीतम की बांह।
ढलते ढलते ढल गई, तरवर की सी छाँह॥

 लोहे का जंग चोर का संग और बदचलन का रंग, इज्जत की धज्जियां उड़ा देते हैं।
 खारा पानी, कड़वे बोल-बोलने वाली रानी और ढलती जवानी, सुकून छीन लेते हैं। 
कायर का साथ, चुगलखोर की बात और बड़चलन से ताल्लुकात मुसीबत ही खड़ी करते हैं।
 कपटी भाई खोटी लुगाई और फटी रजाई नींद उड़ा देते हैं। उम्मीदों का बोझ, पैर की मोच और घटिया सोच कभी आगे नहीं बढ़ने देते।
 पुराना मर्ज औकात से बड़ा कर्ज और घुटने का दर्द चाल धीमी कर देते हैं।
 आँख में जाला, घर में साला और दिवार में आला खोखला कर देते हैं।
 सड़े हुए विचार, बिना break की कार और दगाबाज यार सिर्फ तबाही की तरफ ले जाते हैं।

Sunday, 25 October 2026

वामपंथ communist

यदि आप वामपंथ को नहीं समझते तो आप कमल के सुगन्धित फूलों से भरे ऐसे तालाब में तैर रहे हैं, जिसकी तली में सैंकड़ों मगरमच्छ लेटे हैं।

अभी दो दिन पहले फिर इस तालाब की सतह पर हलचल हुई। जामिया की दीवारों पर लिख दिया गया 'फ़्री कश्मीर', 'फ़्री शरजील इमाम'। सीसीटीवी कैमरों के तार टूटे मिले। लिखने वाले हाथ अँधेरे में हैं पर जो भाषा उन दीवारों पर उतरी, वो उजाले में है। कुछ दिन पहले, जेएनयू में 'भारत तेरे टुकड़े होंगे' गूँजा था। फिर शाहीन बाग़ आंदोलन के चेहरे, शरजील इमाम, ने 'चिकन नेक' जाम करके असम को भारत से काटने का भाषण दिया।

ये नारे अचानक नहीं उगे। इनकी जड़ों तक पहुँचने के लिए एक ऐसे आदमी को सुनना होगा, जिसने चार दशक से भी पहले ये दृश्य देख लिया था। भारत उससे ज़्यादा परिचित नहीं लेकिन उसकी कहानी का सबसे अहम हिस्सा दिल्ली में ही घटा.....

अमेरिका में उसने 'थॉमस शूमैन' के नाम से व्याख्यान दिया लेकिन उसका असली नाम था 'यूरी अलेक्ज़ेन्ड्रोविच बेज़मेनोव'। वो पहले सोवियत रिफ़ाइनरी परियोजना में अनुवादक बनकर भारत आया, फिर समाचार एजेंसी 'नोवोस्ती' से जुड़कर दिल्ली के सोवियत दूतावास में प्रेस अधिकारी बना। उसके ही शब्दों में, उसका काम था ''भारत में अराजकता से साम्यवाद का रास्ता बनाना।'' इसके लिए मंत्रियों, पत्रकारों, प्रोफ़ेसरों और साहित्यकारों को खरीदना, ब्लैकमेल करना और  कठपुतली बनाना।

हिन्दी-उर्दू का माहिर बनाकर भेजे गए बेज़मेनोव के साथ एक भावुक-दुर्घटना घटी। उसे भारत की संस्कृति, आध्यात्म और भोले लोगों से 'प्यार' हो गया। उसकी आत्मा धिक्कारती कि इन्हें पता ही नहीं, इन निर्दोष लोगों के साथ 'क्या किया जा रहा है।' सायबेरिया के 'गुलाग' उसकी आँखों में तैरते। जहाँ लाखों बेगुनाहों को कम्युनिस्टों ने मौत के घाट उतार दिया....

भागना आसान नहीं था, क्योंकि भारत शरण नहीं देता था। उदाहरण सामने था, स्टालिन की बेटी स्वेतलाना। उसे भारतीय कम्युनिस्ट कुँवर ब्रजेश सिंह से प्रेम हुआ पर रूसी प्रधानमंत्री ने शादी की इजाज़त ठुकरा दी क्योंकि रूसी कम्युनिस्टों की नज़र में दूसरे देशों के कम्युनिस्ट ''बराबरी के साथी'' नहीं, बस 'यूज़फ़ुल ईडियट्स' थे। ब्रजेश सिंह की अस्थियाँ लेकर भारत आई स्वेतलाना यहीं रहना चाहती थी पर नहीं रह सकी। आख़िर एक शाम वो अमेरिकी दूतावास पहुँची और उसी रात चुपचाप रोम की उड़ान में निकल गई।

तीन साल बाद बेज़मेनोव एक दिन फ़िल्म देखने निकला और उसके बाद किसी को नहीं दिखा। विग और दाढ़ी लगाकर वो 'हिप्पी' बना, सैलानियों में घुलकर एथेंस पहुँचा और वहाँ से कनाडा निकल गया।

'यूज़फ़ुल ईडियट्स', यही शब्द इस कहानी का प्राण है। ये 'उपयोगी मूर्ख' कैसे दीमक बनकर अपने ही देश को कुतरते हैं, ये जानकर विस्मय, क्षोभ और करुणा के भाव, किसी भी हृदय को मुट्ठी में भींच डालेंगे। आगे बेज़मेनोव के शब्दों में...

''हम भारत को साम्यवादी बनाने आए थे, बिना युद्ध और टैंकों के। मैं एक भारतीय लड़की से विवाह करना चाहता था पर पार्टी का मेरे क्रोमोसोम्स और जींस पर कब्ज़ा था। 'इन्फ़ीरियर रेस' से विवाह की अनुमति नहीं थी।''

''नोवोस्ती का अर्थ है 'न्यूज़' लेकिन ये ख़ुफ़िया एजेंसी के प्रोपेगंडा का मुखौटा था। मुझे उन विदेशी स्टूडेंट्स से दोस्ती करनी थी, जिन्हें साम्यवाद 'सिखाकर' लौटाया जाता, ताकि वो अपने देश में 'राष्ट्रीय आन्दोलनों' के लीडर बनें, अपने ही देश को अस्थिर करें, अपने ही लोगों की हत्याएँ करें। फिर मीडिया इन हत्यारों को 'वामपंथी विद्रोही' और 'फ़्रीडम फ़ाइटर' लिखे और सुरक्षाबलों को 'डेथ स्क्वाड'।''

इस पंक्ति को पढ़िये और जामिया की दीवार देखिये। कश्मीर में जिनके हाथ हमारे जवानों के ख़ून से रँगे हैं, वो वामपंथियों के लिए 'आज़ादी के सिपाही' हैं और जो उन्हें रोकें, वो 'क़ाबिज़ सेना' है। जिस शब्दकोश का नुस्खा बेज़मेनोव ने बताया था, वो कैंपस की दीवारों पर बिना झिझक लिखा जा रहा है। उसने वो तस्वीरें भी दिखाईं, जिनमें वो भारतीय लेखकों और प्रतिनिधिमंडलों के साथ है, एक में 'Springtime Blossom for Mankind, Comrade Lenin' लिखने वाला भारतीय कवि भी हैं। बेज़मेनोव बताता है-

''मेरा काम रूस आने वाले मेहमानों को हलके नशे में रखना था क्योंकि उस नशे में साम्यवाद की हर चीज़ 'प्यारी' लगती है। वो बेचारा मूर्ख दस दिन शैम्पेन पीता, फिर अचानक शराब बंद। वो एक-एक बूँद को तड़पता और यही वो समय है जब दिमाग 'प्रोपेगंडा' के लिए सबसे लचीला होता है।'' उसने अपने व्याख्यान में कई असली फोटो दिखाए और उनके बारे में एक-एक कर बताया....

''इस फ़ोटो में 'दिल्ली विश्वविद्यालय' के राजनीति-विज्ञान के एक प्रोफ़ेसर हैं। वो कहता है-''हमें इनसे कोई सीक्रेट नहीं, इनके स्टूडेंट्स का 'दिमाग' चाहिए था। अब ये दशकों तक पढ़ाएँगे कि साम्यवाद से बेहतर कुछ नहीं और ये पीढ़ी लोगों को साम्यवाद के कारण मरते देखकर भी कहेगी, 'ये सब तो सी.आई.ए. का किया-धरा है।''

उस समय जो फ़सल बोई जा रही थी? उसके पौधे दशकों बाद जेएनयू के उस मंच पर लहलहाए, जहाँ 'भारत तेरे टुकड़े होंगे' और 'अफ़ज़ल हम शर्मिंदा हैं' जैसे नारे गूँजे। बेज़मेनोव आगे बताता है-

''हमारा काम उन प्रभावशाली लोगों की लिस्ट बनाना था जो 'पब्लिक ओपिनियन' बदल सकते थे। हमसे सहमत को रिश्वत और सत्ता मिलती और विरोधी को क्रांति के दिन हत्या। वियतनाम के 'ह्यू' शहर को याद करो। कुछ हफ़्तों के कब्ज़े में ही हज़ारों लोग चुन-चुनकर मारे गए। सब हैरान थे कि इतने विरोधी लोगों की 'पहचान' इतनी जल्दी कैसे हुई? आपको नहीं पता पर मुझे पता है।''

'टेट' हमले में चार हफ़्ते के कब्ज़े के दौरान ह्यू शहर में हज़ारों लोग मारे गए क्योंकि उनकी सूचियाँ पहले से ही तैयार थीं। 

''दिल्ली में मुझे ऐसी ही 'डेथ-लिस्ट' बनानी थी। तब लगा, क्या इन्हें बस इसलिए मारा जाएगा कि ये 'थोड़ा अधिक' बोलते हैं? मेरे पास कार, धन, पद, सत्ता सब था। सब छोड़कर फिर भी मैं निकला। पराजितों के पक्ष में खड़े होने के लिए।''

''सुनत्ज़ु ने कहा था, सर्वश्रेष्ठ युद्ध वो है जो बिना लड़े जीता जाए। ये युद्ध मैदानों में नहीं, दिमागों में लड़ा जाता है। जनता का दिमाग काबू कर लो तो हर सरकार वही करेगी जो तुम चाहो। वो तुम्हें परमाणु बम से नष्ट नहीं करना चाहते, ऐसा कर दिया तो कैडिलैक, कंप्यूटर और नीले जीन्स कहाँ से लाएँगे?''आगे बेज़मेनोव विचारधारा का रहस्य खोलता है-

''शुरुआत होगी 'समानता' से। पर क्या हम सब समान हैं? याद रखना, लोहे की गोलियाँ समान हो सकती हैं, लोग नहीं....लेकिन 'मीठे उदारवादी' संविधान दिखाएँगे और कहेंगे, 'ये शब्द तो हमारे संविधान में लिखा है।' लेकिन दोस्त! आपका संविधान तो मुझे पंद्रह साल की उम्र में ही पढ़ा दिया गया था। अगर मुझसे पूछो तो समानता का एक ही अर्थ है, 'अवसरों की समानता'। बाकी सबको तो ईश्वर भी समान नहीं बना सकता। क्या आपने कभी किसी को समानता की खोज में चीन या रूस का बॉर्डर पार करते देखा है?

बेज़मेनोव बताता है इसका समाधान क्या है? ''समाधान है....अपनी नैतिकता मत त्यागिये, धार्मिक रहिये, स्कूलों में प्रार्थना वापस लाइए, अपने ईश्वर को मत खोइए। ये सच है....आपका सिस्टम पूर्ण नहीं है पर ये कमियाँ उसके सामने कुछ नहीं जो साम्यवादी कम्बोडिया, रूस या वियतनाम में होता है। ये मानवता की स्वतंत्रता और न्याय की अंतिम आशा है। ये देश गया तो कोई उन्हें नहीं रोक पायेगा।''

यहीं बेज़मेनोव का वक्तव्य समाप्त होता है  लेकिन उसकी चेतावनी नहीं। 'थॉमस शूमैन' के नाम से उसने तीन किताबें  लिखीं, 'लव लेटर टू अमेरिका', 'ब्लैक इज़ ब्यूटीफुल, कम्यूनिज़्म इज़ नॉट' और 'वर्ल्ड थॉट पुलिस'। इनमें सबसे पतली मुश्किल से पचास-पचपन पन्नों की है पर उसका हर पन्ना उसी तालाब की तली का नक्शा है जिसका ज़िक्र शुरू में किया गया है....

ये बीते ज़माने की कहानी नहीं। अपने देश में नक्सली हिंसा में अब तक 3,600 से ज़्यादा सुरक्षाकर्मी और लगभग 13,700 नागरिक मारे गए। इस वक़्त फ़्रांस जल रहा है। स्कूलों से शुरू हुआ आंदोलन आगज़नी बना, लिमोज़ का लगभग डेढ़ सौ साल पुराना टाउन हॉल राख हो गया। जिसके मुख्य आरोपी को पुलिस सूत्रों ने 'धुर-वामपंथी' बताया है। पेरिस में कर्फ़्यू लगा, सरकार ने वामपंथी गुटों पर अराजकता भड़काने का आरोप लगाया है। इटली के तूरिन में वामपंथी अड्डा खाली कराने पर अराजकतावादियों ने सौ से अधिक पुलिसकर्मी घायल कर दिए। शुरुआत, हर जगह एक जायज़ शिकायत से ही होती है, जिसकी पीठ पर सवार होकर लूटपाट और आगजनी भीतर पहुँचती हैं। 

बरसों पहले जो बीज बोए गए थे, उन्हें पुराने माली की ज़रूरत नहीं। अब नए माली उन्हें सींचते हैं। कभी बस्तर के जंगल में, कभी लिमोज़ के टाउन हॉल में, कभी जेएनयू के मंच पर, कभी जामिया की दीवार पर। यही बेज़मेनोव की चेतावनी का सबसे डरावना निचोड़ है-''एक बार दिमाग बदल दिया जाए तो फिर एजेंट की ज़रूरत नहीं रहती। मूर्ख खुद को 'क्रांतिकारी' समझकर वो काम मुफ़्त में करते हैं, जिसके लिए कभी शैम्पेन पिलानी पड़ती थी।''

इसलिए, प्रथम वाक्य याद रखना.....यदि आप वामपंथ को नहीं समझते तो आप कमल के सुगन्धित फूलों से भरे ऐसे तालाब में तैर रहे हैं, जिसकी तली में सैंकड़ों मगरमच्छ लेटे हैं। जामिया की दीवारें सावधान कर रही हैं..... तालाब में हलचल है लेकिन मगरमच्छ अब तली में नहीं, किनारे पर बैठे हैं जो धूर्त मुस्कराहट के साथ आपके नौनिहालों को आग के तालाब में.....तैराकी सिखा रहे हैं।

-कुमार पंकज

देव बृक्ष

भविष्यपुराण में आता हैं कि अशोक-वृक्ष लगाने से कभी शोक नहीं होता, प्लक्ष (पाकड़) वृक्ष उत्तम स्त्री प्रदान करवाता है ज्ञानरुपी फल भी देता हैं | बिल्ववृक्ष दीर्घ आयुष्य प्रदान करता है | जामुन का वृक्ष धन देता है, तेंदू का वृक्ष कुलबुद्धि कराता है | दाडिम (अनार) का वृक्ष स्त्री-सुख प्राप्त कराता है | बकुल पाप-नाशक, यंजुल (तिनिश) बल-बुद्धिप्रद है | धातकी (धव) स्वर्ग प्रदान करता हैं | वटवृक्ष मोक्षप्रद, आम्रवृक्ष अभीष्ट कामनाप्रद और गुवाक (सुपारी) का वृक्ष सिद्धिप्रद है | वल्वल, मधूक (महुआ) तथा अर्जुन-वृक्ष सब प्रकार का अन्न प्रदान करता है | कदम्ब-वृक्ष से विपुल लक्ष्मी की प्रप्ति होती है | तिन्तिडी) इमली) का वृक्ष धर्मदूषक माना गया है | शमी वृक्ष रोग-नाशक है | केशर से शत्रुओं का विनाश होता है | श्वेत वट धनप्रदाता पनस (कटहल) वृक्ष मंद बुद्धिकारक है | मर्कटी (केंवाच) एवं कदम-वृक्ष के लगाने से संतति का क्षय होता है | शीशम, अर्जुन, जयंती, करवीर, बेल तथा पलाश- वृक्षों के आरोपण से स्वर्ग की प्राप्ति होती है | विधिपूर्वक वृक्ष का रोपण करने से स्वर्ग-सुख प्राप्त होता है और रोपणकर्ता के तीन जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं |

वृक्षों में देवता निवास

*** वृक्षों में देवता निवास ***
बिल्व वृक्ष में भगवान् शिव का निवास तथा अश्वत्थ में विष्णु का निवास होता है l शिरीष वृक्ष में इन्द्र देव का तथा निम्ब और अर्क (मदार) में सूर्य देव का निवास होता है l ये वृक्ष इन देवों के विग्रह माने गए हैं l अतः इनका विनाश वर्जित है—-
तत्र बिल्वे स्थितः शम्भु: अश्वत्थे हरिरव्ययः l 
शिरीषेऽभूत् सहस्रक्षो निम्बे देवः प्रभाकर: ll 
स तु तन्मयताँ यातः तस्मात् तं न विनाशयेत् ll पद्म पुराण ll 
ऋग्वेद के अनुसार बिल्व वृक्ष श्रीदेवी का वृक्ष है—
वनस्पतिस्तव वृक्षोथ बिल्व: ll देवासुर युद्ध के समय संकट काल में इन वृक्षों में इन देवों ने गुप्त रूप से निवास किया था l 
अतः इन वृक्षों का छेदन वर्जित है l 
ग्रहों की समिधा के वैदिक वृक्ष निम्नवत् हैं— 
सूर्य का मदार, चंद्र का पलाश, मंगल का खदिर, बुध का अपामार्ग (चिड़चिड़ा),गुरु का अश्वत्थ,शुक्र का औदुम्बर (गूलर),
शनि का शमी, राहु का दूर्वा तथा केतु का कुशा l 
तिल अन्न को विष्णु का प्रत्यक्ष प्रकटी करण माना गया है l पृथ्वी को तिल तिल में व्याप्त कर विष्णु ने अपने को तिल रूप में प्रकट किया था l अतः इसे हवनीय माना गया है l 
इसी तरह से २७ नक्षत्रों के २७ वनस्पति प्रसिद्धि को प्राप्त हैं l 
   वेदों में अथवा ब्राह्मण ग्रंथों में किस वृक्ष से हवन करने से क्या मिलता है यह वर्णित है जैसे खदिर से हवन से बल तेज की वृद्धि, 
पलाश से हवन से विद्या वृद्धि तथा गूलर से हवन से वंश वृद्धि होती है l देवी के निवास के लिए निम्ब वृक्ष लोक प्रसिद्ध है ही l 
प्रेत निवास वृक्ष के रूप में विभीतक (बहेड़ा) माना गया है l 
ये वृक्ष पृथ्वी के रोम माने गये हैं l ये पृथ्वी की सम्पदा हैं l देवता के निवास स्थान हैं l पर्जन्यों के आकर्षण केन्द्र हैं l