Sunday, 15 February 2026

अछूत_कब_और_कैसे - भाग 1

#अछूत_कब_और_कैसे - भाग 1 

फ्रांसिस हैमिल्टन बुचनान ने 1800 में दक्षिण भारत का सर्वे किया। वहां के देशी राजाओं के रक्षा सेना में अधिकतर उन्ही जातियों के लोग थे, जिनको आज वे दलित बोल रहे हैं।

 1807 में बुचनन ने 1500 पेज में तीन वॉल्यूम की पुस्तक लिखी -
"Journey from Madras through the countries of Mysore, Canada and Malabar".

 इस पुस्तक को उसने ईस्ट इंडिया कंपनी के डायरेक्टर्स को समर्पित किया। डेढ़ हजार पेज में उसने एक शब्द भी अछूतों के बारे में नही लिखा, जिनको बाबा साहेब और उनके अंग्रेज मालिकान 3000 साल से उतपन्न हुवा बताते हैं। ऐसा कैसे संभव है? 
क्या वह अंधा था ?

या वे भारतीय शिक्षित लोग अंधे हैं जिनको मैकाले कहता था -" एलियंस और मूर्ख पिछलग्गू"? अवश्य ही मूर्ख पिछलग्गू ही अंधे हैं। 

1807 में ब्रिटिश दस्यु देश को लूट रहे थे। ये पुस्तक भी भारत के आर्थिक समृद्धि के तंत्र - कृषि शिल्प वाणिज्य की रेकी करने के लिए लिखी गयी थी। परंतु  भारत अभी भी विश्व की 20% जीडीपी का निर्माता था, और विश्व का सर्वाधिक धनी और वैभवशाली देश। अतः अभी भारतीय समाज के बारे में फेक न्यूज़ लिखने की अभी कोई आवश्यकता महसूस नही हुई थी। अभी अछूतों का जन्म भी नहीं हुवा था समाज मे। क्योंकि भारतीय अभी बेरोजगार भी नही हुए थे पूर्णतः। शुरुवात लेकिन हो चुकी थी। 

मजे की बात है कि बुचनान लिखता है -" होसो बेट्टा के निवासी, और तुलवा में रहने वाले अनेक कंकनी कंकन के निवासियों के वंशज हैं। वे कहते हैं, कि अपने देश गोवा से वे धर्म परिवर्तन से बचने के लिए भागे। पुर्तगाल के राजा ने समस्त देशी गोवनियों के धर्म परिवर्तन का आदेश दिया। वे बताते है, कि गौवा का वाइसराय बहुत विनम्र था, उसने सभी देशी हिन्दुओ को 15 दिन का समय दिया कि आप अपनी चल संपति को लेकर देश छोड़कर जा सकते हैं। अतएव, सभी धनी लोग, ब्राम्हण और शूद्र, अपनी जिन संपत्तियों को बेंच सकते थे, उनको बेंचकर तलवा चले आये, और अब वाणिज्य के सहारे जीवन यापन कर रहे हैं। ब्राम्हण और शूद्र दोनो अपने देशी नाम कंकनी के नाम से जाने जाते हैं। वे सब सम्पन्न दशा में हैं; और मैने गुजरते हुए एक दो शादियों में उनको देखा है,वे बहुत शानदार वेशभूषा में थे, और उनकी लडकिया बहुत सुंदर थी। गरीब कंकनी जो, गौवा से नही भाग सकतें थे, वे सब ईसाइयत में धर्म परिवर्तीति कर दिए गए"।
 इसी पुस्तक के Vol iiii P.20- 21 से।

ध्यान दीजिये : #धनी_ब्राम्हण_और_शूद्र 
#नेक्स्ट_पोस्ट

#भाग_2 :
फ्रांसिस हैमिलटन बुचनान के पिछले पोस्ट में दिए गए उद्धरण से यह स्पष्ट हो जाता है कि 1800 के आस पास यदि ब्राम्हण और अन्य वर्ण के लोग धनी थे तो शूद्र भी धनी था। अभी तक वह अछूत भी नही बना था। 

अछूत का कोई सिद्धांत भारतीय धर्म ग्रंथो में है भी नही। शौच अर्थात सैनिटेशन और हाइजिन का सिद्धांत अवश्य है। मुसलमान अपने खान पान के कारण हिन्दू समाज में अछूत था। लेकिन खान पान के कारण। 

लेकिन जैसे जैसे भारत के कृषि शिल्प वाणिज्य का विनाश किया जाने लगा, भारत का बहुत बड़ा वर्ग जो हजारों वर्षों से कृषि शिल्प वाणिज्य आधारित भारतीय बैभव का आधार था, उसका बेरोजगार होना शुरू हो गया। 

वामपंथियों के आदि गुरु श्री कार्ल मार्क्स 1853 के न्यूयोर्क ट्रिब्यून में छपे ( आज भी गूगल पर है) लेख में लिखता है कि "1818 में ढाका नामक कस्बे में 150,000  शिल्पकार थे, जिनकी संख्या 1836 में घटकर मात्र 20,000 बची। और वह भारत जो सदियों से पूरे विश्व को वस्त्र निर्यात करता था, वह कपड़ो का आयातक बन गया"। 
आखिर किसी ने पूंछा नहीं आज तक कि साहब ढाका के वे 130,000 शिल्पकार कहाँ गए, जो अभी मात्र दो दशक पूर्व तक शिल्पकारी से जीवन यापन करते थे? 

यही हाल कृषि का  किया गया।  उन्होंने कृषि उत्पादों पर बहुत अधिक दर से  टैक्स वसूलकर कृषि और कृषकों का नाश किया। भारत में कृषक ही वाणिज्य का उत्पादक भी था। वाणिज्य नष्ट करने के कारण यह वर्ग कृषि पर एक नए बोझ की तरह उपजा। 

। 1930 में The Case For India में विल दुरान्त लिखता है -" वे किसान यदि सौभाग्यशाली हुए तो अपने खेतों को छोड़कर दिल्ली जैसे शहरों की ओर जाते थे, जहां यदि प्रतियोगिता कम हुई तो उनको गोरों का मैला ढोने का काम मिल जाता था। यदि गुलाम इतने सस्ते हों तो शौचालय कौन बनवावे"। 

कार्ल मार्क्स के द्वारा ब्रिटिश रिकार्ड्स से ढाका के शिल्पियों के बेरोजगार होने को यदि एक पायलट प्रोजेक्ट बनाया जाय तो यह स्पष्ट हो जाएगा कि कितने भारतीय ब्रिटिश दस्युवों के अत्याचार और लूट के कारण बेरोजगार हुए होंगे आने वाले समय मे।

 पॉल बैरोच, अंगुस मैडिसन, एस गुरुमूर्ति, शशि थरूर के अनेको लेख और वीडियो आपको मिल जाएंगे जो इस लूट का वर्णन करते हैं। अभी उषा पटनायक नामक एक लेखिका ने लिखा कि ब्रिटिश भारत से 45 बिलियन पौंड लूटकर ले गए। जो आज ब्रिटिश के 17 साल के जीडीपी के बराबर होगा। 

1850 तक संक्रामक बीमारियों और महामारियों का जाल भारत मे नही फैला था। परंतु मात्र 1850 से 1900 के बीच भारत मे संक्रामक रोग और भुखमरी से मरने वाले भारतीयों की संख्या 3 से 5 करोड़ है।

#भाग_3:

आज संक्रामक रोग से 100 बच्चे मर जाते हैं तो वह अंतराष्ट्रीय खबर बनती है। टी वी की उद्घोषिका सुझाव देने लगती है कि साफ पानी पीजिए। सफाई से रहिये। उस समय सरकार किसकी थी? जिम्मेदारी किसकी थी, इन बेरोजगार और भुखमरी से जूझ रहे भारतीयों के प्राणों की रक्षा करने की ?
किसी ने आज तक पूंछा उनसे? 
नही पूंछा।
 
इन संक्रामक बीमारियों से बचने का उपाय हिन्दू समाज ने खोजा - सोशल क्वारंटाइन ( Social Quarantine) जो कालांतर में एक प्रथा के रूप में प्रचलित हो गयी।

 जिसे दस्यु ईसाइयों ने #फेक_न्यूज़_लिटरेचर के माध्यम से उसको हिन्दू धर्म से जोड़ा। उसका कारण बताया कि शम्बूक और एकलव्य है। 
यदि अछूतपन हिन्दू धर्म का अंग है तो संस्कृत ग्रंथों में इसका वर्णन भी होगा। 
दिखाइए कौन सा ग्रन्थ बोलता है अछूतपन के बारे में?
शौच का वर्णन हर ग्रन्थ में हैं। 

यह एक बुद्धिमान समाज द्वारा संक्रमक रोगों के प्रसार से बचने की विधा थी। यह प्रश्न खड़ा हो सकता है कि यदि यह सोशल क्वारंटाइन था तो लिमिटेड समय के लिए क्यों नही था?
और भी प्रश्न हो सकते हैं।
आप पूँछिये तो।
आपने अंग्रेजो द्वारा भारत के बारे मे रचित अफवाहजनक गर्न्थो पर कभी प्रश्न ही नहीं खड़ा किया।
आखिर लुटेरों पर इतना विश्वास होने का कोई कारण? 

इसको धर्म परिवर्तन और हिंदुत्व को नीचा दिखाने हेतु ब्रिटिश दस्युवो ने #Untouchability का नाम दिया। और उसको फेक न्यूज़ से जोड़कर यह बताया कि यह हजारो साल पुरानी परंपरा है। लेकिन भारत के पढ़े लिखे लोग वही निकले जो मैकाले उनको बनाना चाहता था - एलियंस एंड स्टुपिड प्रोटागोनिस्ट्स। 
वरना सीधी साधी लूट और राजनैतिक षड्यंत्र के परिणामो से वह क्या अनभिज्ञ रहते?
नीचे प्रमाण है कि किस तरह पिछले 100 वर्षों में इन्ही फेक न्यूज़ को आधार बनाकर वे हिन्दुओ का धर्म परिवर्तन करने में सफल रहे। 

यह सब ईसाइयत में धर्म परिवर्तन हेतु तैयार किया गया एक फेक न्यूज़ लिटरेचर के अतिरिक्त कुछ नही हैं। एक हजार से गुलाम रहे हिन्दू समाज का कारण 5000 साल पुराने लिटरेचर से खोजना यही सिद्ध करता है कि मैकाले अपने उद्देश्य में सफल रहा। उसने अपने पिता को लिखे पत्र में लिखा था कि -"यह शिक्षा एलियंस और मूर्ख पिछलग्गू तैयार करने के लिए बनाई गई है"। यदि ऐसा न होता तो पूरी की पूरी संविधान सभा, जो कि पढ़े लिखे विद्वानो से भरी हुई थी, उसमे एक भी व्यक्ति ने न निकलता जो दस्यु ईसाइयों द्वारा बनाये गए संविधान में षड्यंत्र की बू न सूँघ लेता। और जाति के आधार पर हिन्दुओ को बांटने का षड्यंत्र विफल हो गया होता?

कल ही योगी सरकार ने 17 नई जातियों को अनुशूचित घोसित किया है। क्या कोई उनसे पूँछेगा कि आप क्यो एलियंस और मूर्ख पिछलग्गू की भांति व्यवहार कर रहे हैं ?
नौकरियां कितनी दे सकते हो तुम? एक से डेढ़ प्रतिशत लोगों को।
लेकिन उसके द्वारा तुम 100% हिन्दुओ को उसी जाल में डाल रहे हो जिसका फंदा दस्यु ईसाइयों ने हिन्दुओ का धर्म परिवर्तन हेतु बनाया था।
प्रमाण संलग्न हैं।

अछूत_कब_और_कैसे :- #चतुर्थ_भाग

अछूत, शौच और सैनिटेशन में फर्क नहीं जानते अधिकतर लोग, जानिए जो नहीं बताया गया
अछूत शब्द भारत के किसी भी ग्रंथ में वर्णित नही है। यह ठीक उसी तरह से रिलीजन और कास्ट की तरह उनका हिंदीबाजी से उपजा शब्द है। 

रिलिजन - धर्म, 

कास्ट - जाति ( वर्ण को गायब कर दिया गया),
Untouchable - अछूत।

भारतीय ग्रंथ शौच की बात करते हैं। जिसे नग्रेजी में सैनिटेशन और हाइजीन कहते हैं।  और जो अशुचिता पूर्ण जीवन जिये - अपनी संस्कृति के कारण या मजबूरी वश उससे संपर्क में एक निश्चित दूरी बनायी जाती थी।

1030 AD में अलुबेरणी लिखता है कि - हिन्दू मुसलमान को अछूत मानता था - उनकी रहन सहन और खान पान के कारण। आपने कुछ दशक पूर्व इसको देखा होगा। लेकिन उन्होंने इस अछूतपन को कभी मुद्दा नही बनाया।

लेकिन अशुचिता पूर्ण जीवन जीने के लिए विवश किये गए और संक्रामक रोगों के शिकार होने वाले भारतीयों के हत्या के लिए जिम्मेदार ब्रिटिश दस्युवों, ने अपने अपराधों पर पर्दा डालने के लिए इसको हिन्दू धर्म का परिणाम बताया तो मूर्ख एलियंस और मूर्ख पिछलग्गुओं को यह बात सहज हजम हो गयी।

उन मूर्ख पिछलग्गुओं में मात्र पेरियार और अम्बेडकर ही नही थे, भारत का संविधान बनाने वाले ब्रिटिश एडुकेटेड इंडियन बररिस्टर्स भी उनके जाल में फंसे हुए मूर्ख पिछलग्गू थे, जिनके सच और अफवाह का अंतर करने की मेधा नहीं थी।

मोदी ने स्वच्छता अभियान चला रखा है। भारत को लूटने के पश्चात ब्रिटिश दस्युवों ने एक ऐसी स्थित पैदा किया कि करोड़ो लोग बेरोजगार हो गए।
उनके लिए अन्न का एक दाना भी अलभ्य हो गया। वे कुपोषण का भीषण रूप से शिकार होने के लिये विवश किये गए।  साधारण फ्लू जैसे वायरल इन्फेक्शन्स से करोड़ो लोग मौत के शिकार होने लगे।  1918 में 12.5 करोड़ लोग फ्लू से प्रभावित हुए, जिनमे 1.25 करोड़ लोग मौत के मुहं में समा गए।

1850 से 1900 के बीच चार से पांच करोड़ भारतीयों की इन संक्रामक बीमारियों से मृत्यु हो गयी।
अपने इन अत्यचारों और अपराधों को नग्रेज़ों ने विश्व को नही बताया। और यह दुष्प्रचारित किया कि हिन्दू अपने अंध विश्वास के कारण गरीब हैं और इन बीमारियों से मर रहे हैं।

ऐसे हुई ये प्रथा शुरू
 
हिंदुओं ने इन बीमारियों से बचने के लिए एक वैज्ञानिक तरीका इस्तेमाल किया - जिसको नग्रेजी में Quarantine कहते हैं। जो बाद में एक प्रथा बन गयी। उनको न छूना है न छुआना है जो इन बीमारियों से पीड़ित हैं।  

कोई भी सामाजिक प्रथा प्रायः ऐसे ही शुरू होती है।
आज हमारे देश मे सब पेंट शर्ट कोट पेंट और टाई पहनते हैं। बाबा साहेब तो कभी किसी देशी वस्त्र में दिखे ही नही। लेकिन भारत जैसे गरम देश से धीरे धीरे कुर्ता धोती गायब हो गयी। क्यों भाई ? मानसिक गुलामी के कारण।

दक्षिण भारत गुलामी का हुआ कम शिकार

दक्षिण भारत इस गुलामी से बहुत कम प्रभावित हुआ है। लुंगी वे आज भी पहनते हैं जो धोती का लघु स्वरूप है।
1850 के पूर्व भारत में कभी भी महामारी नही आई। आयी भी तो इस भयानक स्वरूप में व्यापक नही हुई थी।
1500 के आस पास यह यूरोप की बीमारी थी। जिससे निबटने के लिए उन्होंने विश्व के गैर ईसाई देशों के जर जोरू जमीन को लूटने की योजना बनाई, जिसमे वे सफल रहे।

लेकिन अपने अपराधों पर पर्दा डालने और ईसाइयत के प्रचार के लिए भूमि तैयार करने के लिए फेक न्यूज़ तैयार किये, जिसको लोकल स्तर पर प्रामाणिक बनाने हेतु फुले , पेरियार और अम्बेडकर जैसे लोगों को राजाश्रय प्रदान किया, जिन्होंने उन ईसाई दस्युवो के कुकृत्यों के कारण भारत मे हुए समाजिक परिणामों को हिन्दू धर्म को दोषी ठहराते हुए उन दस्यओं को भगवान घोषित कर दिया।

Friday, 13 February 2026

कबीर और नारी स्त्री

#तुलसीदास जी को गलत ठहराने वाले नारी समर्थको कबीर दास जी के बारे में क्या ख्याल है आप का जिन्होंने 
स्त्री उपहास में बहुत तीखा तीखा मसाला पेश किया है।
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#तुलसीदास जी के एक दोहे पर चर्चाओं का बाजार इतना गर्म हो गया कि ठंडा होता नज़र ही नहीं आता #तो फिर क्यों न कबीर दास जी के उन स्त्री उपहास में लिख गए दोहों पर चर्चा हो जिनमें स्त्रियों का घोर अपमान झलकता है                                                       #आप तुलसीदास जी द्वारा रचित दोहे पर अर्थहीन और बेतुके कुतर्क और चर्चा करते हैं तो फिर कबीर के नारी विरोधी दोहे पर क्यों नहीं करते??                         #यदि तुलसीदास स्त्री विरोधी थे तो फिर कबीर दास क्या थे ? पांच सौ साल पुराने किसी दोहे को लेकर आज आधुनिक युग में अल्पज्ञानी लोग बहस का मुद्दा बनाते हैं तो फिर कबीर को कैसे छोड़ रखा है ?

#मतलब  आप लोगों को सिर्फ सनातन धर्म का विरोध करना है और यही आप का एक सूत्रीय कार्यक्रम है। 
अब आप लोग जरा कबीर दास जी के दोहों को भी दोहरा लीजिए 👇👇👇👇

#नारी की झांई पड़त, अंधा होत भुजंग
कबिरा तिन की कौन गति, जो नित नारी को संग

     अर्थ #नारी की छाया पड़ते ही सांप तक अंधा हो जाता है, फिर सामान्य मनुष्य की बात ही क्या है?

#कबीर नारी की प्रीति से, कितने गये गरंत
  कितने और जायेंगे नरक हसंत हसंत।

   #अर्थ  नारी से प्रेम के कारण अनेक लोग बरबाद हो गये और अभी बहुत सारे लोग हंसते-हंसते नरक जायेंगे।

 #कबीर मन मृतक भया, इंद्री अपने हाथ
तो भी कबहु ना किजिये, कनक कामिनि साथ।

 #अर्थ यदि आपकी इच्छाएं मर चुकी हैं और आपकी विषय भोग की इन्द्रियां भी आपके हाथ में हैं, तो भी आप धन और नारी की चाहत न करें।

 #कलि मंह कनक कामिनि, ये दौ बार फांद
   इनते जो ना बंधा बहि, तिनका हूं मैं बंद।

 #अर्थ कलियुग में जो धन और स्त्री के मोह में नहीं फंसा      है,भगवान उसके हृदय से बंधे हुये हैं
क्योंकि ये दोनों माया मोह के बड़े फंदे हैं।

 #कामिनि काली नागिनि, तीनो लोक मंझार
  हरि सनेही उबरै, विषयी खाये झार।

 #अर्थ स्त्री काली नागिन है, जो तीनों लोकों में व्याप्त है। परंतु हरि का प्रेमी व्यक्ति उसके काटने से बच जाता है। वह विषयी लोभी लोगों को खोज-खोज कर काटती है।

 #कामिनि सुन्दर सर्पिनी, जो छेरै तिहि खाये
जो हरि चरनन राखिया, तिनके निकट ना जाये।

#अर्थ नारी एक सुन्दर सर्पिणी की भांति है। उसे जो छेड़ता है उसे वह खा जाती है। पर जो हरि के चरणों मे रमा है उसके नजदीक भी वह नहीं जाती है।

 #नारी कहुँ की नाहरी, नख सिख से येह खाये
 जाल बुरा तो उबरै, भाग बुरा बहि जाये।

#अर्थ इन्हें नारी कहा जाय या शेरनी। यह सिर से पूंछ तक खा जाती है। पानी में डूबने वाला बच सकता है पर विषय भोग में डूबने वाला संसार सागर में बह जाता है।

  #छोटी मोटी कामिनि, सब ही बिष की बेल
  बैरी मारे दाव से, येह मारै हंसि खेल।

#अर्थ  स्त्री छोटी बड़ी सब जहर की लता है।
दुश्मन दांव चाल से मारता है पर स्त्री हंसी खेल से मार देती है।

  #नागिन के तो दोये फन, नारी के फन बीस
  जाका डसा ना फिर जीये, मरि है बिसबा बीस।
#अर्थ नागिन के तो दो फन होते जिसका काटा बच सकता है लेकिन स्त्रियां बीसों फन बाली होती हैं ये एक बार में बीस को एक साथ मार सकतीं हैं 
आज तक मैंने इतने प्रगतिशील, स्त्री चिन्तन करने वाले लेखकों को कबीरदास के विरोध में लिखते नहीं देखा। क्योंकि वह उनके एजेंडे को सूट नहीं करता।                                🙏🙏 🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏
माफी और क्षमा के साथ कहना चाहूंगी कि ये उन समाज विरोधियों के लिए सिर्फ एक आईना मात्र है,जो बिन सोचे समझे अधूरा ज्ञान बघार रहे हैं मेरी पोस्ट का किसी तरह का कोई वाद विवाद से मतलब नहीं है #और हां ये सारी जानकारी गूगल पर उपलब्ध है जिनको सन्देह हो वो सर्च करके संतुष्टि कर सकते हैं 🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏

अछूतपन और अछूत शूद्र

मैक्समुलर, अम्बेडकर, फुले, पेरियार, रोमिला थापरो को धराशायी करने के लिए एक पोस्ट ही पर्याप्त है।

#शूद्र_मृत्युदंड_दे_सकता_था_1807_तक ? :: ब्राम्हण शूद्रों के भी पुरोहित थे । दक्षिण भारत की एक झलक द्रविडियन नश्ल के पोस्ट्मॉर्टेम के पूर्व।

इस सामाजिक वैभव का निर्माण तब हुवा था, जब समाज केंद्रीय कानूनों से नही वरन स्वयं से प्रशासित था। 
कानून तो बनाये ही गए भारत को लूटने और उसका दोषारोपण ब्रम्हानिस्म और मनुवाद पर करने हेतु। 
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1750  से 1900  के बीच भारत की जीडीपी विश्व जीडीपी का 25 प्रतिशत से घटकर मात्र 2 प्रतिशत बचती है। और जिसके कारण 800 प्रतिशत लोग बेरोजगार और बेघर हो जाते हैं । 
एक वर्ष पूर्व जस्टिस मार्कण्डेय काटजू का भी एक लेख आया जिसमे उन्होंने अंग्रेजों कि इसी डस्ट कृत्य को जिम्मेदार ठहराते हुए 100 मिलियन लोगों यानि करोड़ लोगों की  #भूख से मौत का जिम्मेदार ठहराया है।

गणेश सखाराम देउसकर और विल दुरान्त ने लिखा है कि मात्र 1875 से 1900 के बीच 2.5 करोड़ लोगों की मौत #अन्नाभाव और संक्रामक रोगों की चपेट में आने  से हो जाती है , इसलिए नहीं कि अन्न की कोई कमी थी , बल्कि बेरोजगार हुये भारत का निर्माता वर्ग के पास जीवन रक्षा हेतु, अन्न खरीदने का पैसा नहीं था।
अंग्रेज नहीं मरता कोई?
सिर्फ भारतीय ही मरते हैं?

  इसी को डॉ आंबेडकर ने एनी बेसेंट के हवाले से उनका 1909 के भाषण का उल्लेख किया  है जिसमे बेसेंट जी ने कहा कि इंग्लैंड की 10 प्रतिशत जनसँख्या "The  submeged tenth ( तलछट की आबादी )  और भारत की एक छठी आबादी Generic Depressed one sixth Class  जैसी है जो  रहने खाने और अशिक्षा सौच और जीवन यापन के लिए एक ही जैसा कार्य करती है यानि मेहतर भंगी और स्वीपर  का काम।

 लेकिन इसे विद्वानों ने इसके लिए भारत के ग्रंथों से बिना सन्दर्भ और प्रसंग से उद्दृत किये श्लोकों का हवाला देते हुए ब्रम्हानिस्म को जिम्मेदार ठहराया है। इस इतिहास लेखन में भारत के आर्थिक इतिहास को काटकर अलग कर दिया गया।

 लेकिन ईसाई संस्कृतज्ञ विद्वानों द्वारा हमारे पूर्वजों को  "धूर्त दुस्ट घमंडी ब्राम्हणों की" उपाधि से नवाजे जाने के पूर्व ,डॉ फ्रांसिस बुचनन की  1807 में  लिखी एक पुस्तक (जिसका जिम्मा अंग्रेजी शासकों ने सौपा था ,दक्षिण भारर्त की जनता के बारे में , उनकी संस्कृति , और उस समय के व्यापार के बारे में ):

" JOURNEY FROM MADRAS through the countries of MYSORE CANARA AND MALABAR" PUBLISHED BY EAST INDIA COMPANY , के कुछ वाक्यांश , जो उस समय के भारत की झलक देते हैं।

(इस बात को ध्यान में रखा जाय कि 1750 तक भारत का सकल घरेलू उत्पाद विश्व का 25 %% था , जबकि ब्रिटेन और अमेरिका कुल मिलाकर मात्र 2% के हिस्सेदार थे। और पर कैपिटा industralisation और प्रति व्यक्ति आमदनी लगभग बराबर थी। आने वाले 50 वर्षों में यानि 1800  में भारत का शेयर गिरकर 20% तक पहुँच गया था , लेकिन 1900  वाला हाल नहीं हुवा था जब भारत के जीडीपी का शेयर मात्र 2 % बचा।

 इस समय तक ईसाईयों को अभी ब्राम्हणों को धूर्त घमंडी और खड़यन्त्र कारी सिद्ध करने का अवसर नहीं आ पाया था।)

विजय नगर के तुलवा क्षेत्र ,जो पहले जैन राजाओं के कब्जे में था जिसको बाद में हैदर और टीपू सुलतान ने अपने अधिकार क्षेत्र में ले लिया था , के बारे में डॉ बुचनन के उद्धरण :
(1) इस इलाके में 6 मंदिर और 700 ब्राम्हणों के घर थे , लेकिन जब टीपू सुलतान ने इस क्षेत्र पर कब्ज़ा किया इन ब्राम्हणों के घरों को तबाह। नष्ट कर दिया , और अब मात्र 150 ब्राम्हणों के घर बचे हैं।
(Vol iii,पेज - 75 )

(2) तुलवा में घाट के ऊपर बसने वाले ब्राम्हण ,वैश्य और अन्य जातियां अपने पुत्रों को वारिस मानते हैं , परन्तु   राजा (क्षत्रिय ) और शूद्र,जो कि भूमि के मालिक हैं वे अपने बहनों के बच्चों को अपना वारिस मानते हैं।

शूद्रों को भी जानवर खाने और देशी शराब पीने की इजाजत नहीं है , सिर्फ क्षत्रियों को मात्र युद्ध के समय जानवरों कि हत्या करने और खाने की इजाजत है।ये सभी लोग अपने मृतकों को आग में जलाते हैं ( लाश को फूकते हैं )।
 (Vol iii, पेज - 75 )

(३) मध्वाचार्य के अनुयायियों ने बताया कि तलुए के ब्राम्हण पंच द्रविड़ कहलाते हैं जो कि पूर्व में भारत के पांच अलग अलग राज्यों और भाषाओँ को बोलने वाले है , जिनमे तेलिंगा (आंद्रेय से ) , कन्नड़ (कर्णाटक से ) ,गुर्जर (गुजरात से) ,मराठी (महाराष्ट्र से ) ,तमिल बोलने वाले पांच भाषाओ को मिला कर पंच द्रविड़ का इलाका बनता है। लेकिन तमिल बोलने वाला इलाका द्रविड़ या देशम कहलाता है। इनकी शादी विवाह सिर्फ अपने ही मूल भाषा बोलने वालों के बीच होता है।
  (Vol iii, पेज -90)

(4)इस क्षेत्र का एक्सपोर्ट और इम्पोर्ट गजट के अनुसार क्रमशः9 ,63,833 रूपये (यानि एक्सपोर्ट ) और 1,08,045 रुपये (इम्पोर्ट ) है , और एक रुपये की कीमत 2 पौंड के बराबर है।
( अर्थात एक्सपोर्ट लगभग इम्पोर्ट का 9 गुना , यानि कितने लोग रोजगार युक्त ,कितने टेचनोक्रट्स ,कितने interpreunerer , जो अगले 100 सालों में बेघर और बेरोजगार होने वाले हैं)

(Vol iii पेज- 246)

(5) एक चिका- बैली -करय नामक एक स्थान पर लोहे कि भट्ठी का वर्णन वे करते हैं कि वहाँ पर जो लोहा बनाया जाता था कच्चे आयरन ore से , स्टील बनाने की तकनीक का वर्णन करते हुए बुचनान बताता है कि गाँव के लोग किस तरह लोहा पैदा करते थे, उसका बंटवारा किस रूप से करते थे ?
इसी को वैदिक मॉडल ऑफ इकॉनमी कहते हैं। जिसमें कोई मालिक नही है, सब शेयर होल्डर हैं।

" Every 42 plough shares are thus distributed -----------------------------------------------------------------------
To the proporieters -----11
tot he 9 charcoal makers ------------9
To the iron smith ------------------3.5
to the 4 hammer -men --------7
to the 6 bellows -men --------8
to the miner -------------------1
to the buffalo driver ---------------2.५
total ----------------------42"

( Vol iii, page--362)

ये प्रमाण है इस बात का कि भारतीय समाज में आज से मात्र २०० साल पहले तक मालिक और श्रमिक के हिस्से बराबर तो नहीं लेकिन एकदम वाजिब होते थे, शोसण पर आधारित श्रम नहीं था , जैसा कि हमें पढ़ाया गया है , उससे एकदम इतर।

 डॉ फ्रांसिस बुचनन आगे उद्धृत करते हैं कि Comarapeca कोंकणी कि एक ऐसी ट्राइब है , जो कि विशुद्ध शूद्र है, ये उस इलाके में ऐसे ही बसते हैं , जैसे मलयालम के विशुद्ध शूद्र nairs हैं।  ये पैदाइशी खेतिहर और योद्धा हैं ,,और इनका झुकाव डकैती की तरफ रहता है ( ज्ञात हो कि बुचनन ने जब caste / ट्रेड की लिस्ट बनाई तो क्षत्रियों को संदेशवाहक ,योद्धा या डकैत क़ी श्रेणीं में डाला )।  इनके मुखिया वंशानुगत रूप से नायक कहलाते हैं जो किसी को भी आपस में सलाह करके   जात बाहर कर सकते थे। ये पुराने शाश्त्रों का अध्ययन कर सकते हैं और मांस तथा शराब का भी सेवन कर सकते हैं। श्रृंगेरी के स्वामलु उनके गुरु हैं जो उनको पवित्र जल . भभूत और उपदेश देते हैं शादी विवाह नामकरण और शगुन तिथियों को बताने के लिए इनके निश्चित ब्राम्हण पुरोहित हैं। ये मंदिरों में विष्णु और शिव जी क़ी पूजा करते हैं जिनकी देखभाल कोंकणी ब्राम्हण करते हैं। ये देवियों के मंदिरों में शक्ति क़ी पूजा भी करते हैं और पशुबलि भी चढ़ाते हैं। 
कोंकण में रहने वाले ब्राम्हण जो मूलरूप में गोवा में रहते थे , पुर्तगालियों ने जब उनको गोवा से भगा दिया (नहीं तो धर्म परिवर्तन कर देते ) अब मुख्यतः व्यापारी हो गए हैं ,लेकिन कुछ लोग अभी भी पुरोहिताई करते हैं।

 तुलवा भाषी मूलनिवासी , जो लोग खजूर/ ताड के पेड़ों से गुड और शराब बनाने के लिए उनका रस/जूस निकलते हैं उनको बिलुआरा (Biluaras ) नामक जात से जाना जाता है ,वे अपने को शूद्र कहते हैं लेकिन कहते हैं कि वे बुन्त्स (bunts ) से सामजिक स्तर पर नीचे मानते हैं / लेकिन इनमे से कुछ लोग खेती भी करते हैं , लेकिन ज्यादातर लोग मजदूर हैं इन खेतों में , लेकिन काफी लोग मालिक भी हैं खेतों के।
इनके आपसी मामलों को निपटने के लिए सरकार द्वारा एक व्यक्ति नियुक्त होता है जिसको गुरिकारा के नाम से जाना जाता है , उसे किसी व्यक्ति को अपने समाज के वरिष्ठ लोगों से सलाह करके ,जात बाहर करने या मृत्युदंड (कार्पोरल पनिशमेंट ) देने का अधिकार है। इनमे से कोई भी पढ़ा लिखा नहीं है। इनको मांस भाषण का अधिकार तो है परन्तु मदिरा पीने का हक़ नहीं है। इनका मानना है कि मृत्यपर्यंत अच्छे लोग स्वर्ग में जाते हैं , और बुरे लोग नरक में।जो लोग सक्षम है . वे लाशों को जलाते हैं परन्तु , गरीब लोग उनको जमीन में गाड़ देते हैं। 

इनमे से कुछ लोग ही विष्णु जैसे बड़े देवताओं कि पूजा करते हैं , लेकिन ज्यादातर लोग "मरिमा" नामक शक्ति को बलि चढ़ाते हैं , बुरी आत्माओं को भगाने के लिए। 
ज्यादातर बुलिआरों या उन लोगों के यहाँ जो शक्ति कि पूजा करते हैं, के शादी व्याह में या मृत्यु पर कोई पुरोहित मन्त्र या शास्त्र पढने नहीं जाता। 
लेकिन जो बुलिअर विष्णु की पूजा करते हैं उनके पुरोहिताई का जिम्मा श्री वैष्णवी ब्राम्हणों का है।वे उनको उपदेश भी देते हैं ,Chaki'dntikam, भी देते हैं और पवित्र जल का छिड़काव भी करते हैं"।
( रेफ: डॉ फ्रांसिस बुचनन .a journey from Mdras through  ,mysore Canara  and Malabar " Vol iii --पेज - 52-53)

buchanan classified all castes of south India 122 categories only , and as sole criteria being caste / trade Buliars were categorized as extractors of juice from palm tree and Buntus as Cultivators but both categorized under Shudras under Varna scale of Hindu DharmVarnashram .

बुचनन का नाम इतिहास के हर व्यक्ति को मालूम हैं।
शूद्र / दलित मृत्युदंड दे सकता था 1807 तक ???
शूद्र / दलित खेतों का मालिक भी हो सकता है , और खेतिहर किसान भी हो सकता है।
और ब्राम्हण उसका पुरोहित भी था?
बुचनान एक डॉक्टर था। साइंस की पृष्ठभूमि का। उसकी बुद्धि तथ्य खोजने वाली प्रतीत होती है।
उसने यह सर्वे 1800 AD में शुरू किया था।
उसके अनुसार द्रविड़ एक क्षेत्रीय अस्मिता वाला शब्द है।
अब आएंगे दस्युवो के साथ वाले धर्मान्ध ईसाई - मिशनरीज और प्रशासकों के भेष में।
वे पहले कल्पना के पर लगाकर यह सिद्ध करेंगे कि द्रविड़ कोई क्षेत्रीय अस्मिता न होकर एक अलग भाषा है जिसका संस्कृत से सम्बन्ध न होकर हिब्रू भाषा से सम्बन्ध है।
 फिर एक विलियम मोनिर मोनिर नामक मैक्समुलर का प्रतिद्वंदी आएगा जो यह सिद्ध करेगा कि  द्रविड़ भाषा नही, वरन  एक नश्ल है। 

भारत के कृषि शिल्प वाणिज्य को नष्ट किया जाएगा जिससे करोड़ो लोग भुखमरी और संकामक रोगों की चपेट में आकर मृत्यु  का वरण करेंगे। 
उधर यूरोप में बैठकर मैट्रिक पास प्रोफेसर और डॉक्टर मैक्समुलर आर्यन अफवाह की रचना करेगा। 
1872 फ्रस्टेट मिशनरी एम ए शेरिंग अकारण ही ब्राम्हणो को दुष्ट, अहंकारी और स्वार्थी जैसे गाली देने का टेमपलेट तैयार करेगा। 
कुल मिलाकर 1900 आते आते अपने अपराधों के कारण बेघर बेरोजगार और मृत्यु से संघर्षरत भारतीयों की इस दशा के लिए ब्रम्हानिस्म और मनुवाद को दोषी ठहराया जाएगा। 
हिंदुओं के तीन वर्ण जिनको वह आर्यन कहते थे, उन्हें 1901 में तीन ऊंची कास्ट में चिन्हित किया जाएगा, बाकी समस्त समुदायों को नीची जाति में।
आगे की कथा हम कई बार लिख  चुके है।

पुस्तक तीन वॉल्यूम में संकलित है। लगभग 1450 पेज में। गूगल आर्काइव से फ्री डाउनलोड कर सकते हैं।
3000 वर्षो की अछूत कथा धड़ाम से गिर पड़ेगी क्योंकि इसके 1450 पेजो में एक पैराग्राफ भी 
...

Friday, 6 February 2026

ब्रह्मा सरस्वती विवाह



अक्सर मुस्लिम और वामपंथी दुष्प्रचार करते हैं कि ब्रह्मा ने सरस्वती से विवाह किया था लेकिन जब आप उनसे पूछोगे यह किस किताब में लिखा है तब वह कहेंगे #सरस्वती पुराण में लिखा है। उसके बाद जब आप उनके सामने 18 पुराणों के नाम बता देंगे और फिर आप पूछेंगे इन 18 पुराणों में कोई सरस्वती पुराण तो है ही नही, तो वह गूगल पर सर्च करेगा और कहेगा #डीएनझा की किताब में लिखा है.....
       यह डीएन झा, रोमिला थापर, इरफान हबीब ,सतीश चंद्र यह भारत के सभी इतिहासकार एक ऐसी संस्था की उपज है, जो संस्था मार्कसिस्ट हिस्टोग्राफी कहलाती है। चीन में कम्युनिस्ट पार्टी के अधिवेशन में वामपंथी नेताओं ने एक प्लानिंग की कि भारत जैसे देश पर वामपंथ का शासन कैसे हो सकता है क्योंकि भारत के युवा वामपंथियों के जाल में इतनी आसानी से नहीं फंसने वाले है....
         क्यूबा के कम्युनिस्ट शासक फिदेल कास्त्रो, ने एक समय कहा था कि हमें 10 साल या 20 साल की प्लानिंग नहीं करनी होगी, हमें सबसे पहले जिस भी देश पर कब्जा करना है उस देश के इतिहास को विकृत करना पड़ेगा, उस देश के शिक्षा संस्थानों में घुसना पड़ेगा । फिर उन शिक्षा संस्थानों में पढ़ने वाले बच्चों में हम उनकी मूल संस्कृति मूल धर्म के प्रति ऐसा जहर बोयेंगे कि वह धीरे-धीरे वामपंथी विचारधारा का हो जाएगा । इसके लिए हमें कम से कम 50 से 80 साल की प्लानिंग लेकर चलनी होगी....
        जब भारत को 'आजादी' मिली तब वामपंथी दलों ने नेहरू (जो खुद एक कट्टर कम्युनिस्ट थे) से एक समझौता किया । कि आप देश चलाइए हम आपको देश चलाने में कोई डिस्टर्ब नहीं करेंगे, हमें आप देश के कुछ शिक्षा संस्थान दे दीजिए, इतिहास लिखने का काम दे दीजिए और हमारी पसंद का शिक्षा मंत्री नियुक्त करते रहिए... परिणामस्वरूप भारत का जो पहला शिक्षा मंत्री (मौलाना अबुल कलाम) बना, उसके पास कोई डिग्री नहीं थी बल्कि उसके पास मुफ्ती की डिग्री थी, वह मक्का में पैदा हुआ था और 30 साल से मक्का की मस्जिद में तकरीरें देता था। सऊदी अरब का नागरिक था..
       उसके बाद वामपंथियों ने भारतीय इतिहास प्रतिष्ठान से लेकर जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी, दिल्ली यूनिवर्सिटी तमाम जगहों पर कब्जा किया। अपने विचारधारा के इतिहासकारों से झूठ का पुलिंदा इतिहास की किताबें लिखवाइँ । नेहरू के बाद इंदिरा गांधी ने भी इस परंपरा को जारी रक्खा , इंदिरा गांधी ने भी वामपंथियों को खुली छूट, इस शर्त पर दे दी कि कम्युनिस्ट , इंदिरागांधी की सरकार को डिस्टर्ब न करें...
                 मार्क्सवादी इतिहास इतिहासकार में से सबसे झूठे और षड्यंत्रकारी इतिहासकार प्रोफेसर डीएन झा की गवाही,मुस्लिम पक्ष की ओर से राम मंदिर केस में हुई थी,उन्होंने बयान दिया था , कि राम कभी हुए ही नहीं थे,काल्पनिक थे। उन्होंने यह भी दावा किया कि उनके ही शोध के आधार पर केंद्र की तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने रामसेतु तोड़ने का आदेश दिया था ।
           हिंदू पक्ष के वकील ने डीएन झा का एक सेमिनार में दिया गया वीडियो चलाया जिसमें वह भगवान राम को शराबी और मांसाहारी बता रहे थे। उसके बाद जज ने उनसे सवाल किया कि आप एक व्यक्ति को काल्पनिक बताते हैं फिर दूसरे सेमिनार में उसी व्यक्ति को शराबी और मांसाहारी बताते हैं, ऐसा कैसे हो सकता है कि जो व्यक्ति काल्पनिक है तो आपने यह कैसे शोध कर लिया कि वह शराबी और मांसाहारी भी है? उसके बाद डीएन झा की बोलती बंद हो गई और उनकी गवाही को और उनके रिसर्च को सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया।
        अभी रक्षाबंधन के दिन तमाम अखबारों में AMU के प्रोफेसर इरफान हबीब ने एक लेख लिखा कि रक्षाबंधन के दिन अकबर से लेकर जहांगीर के दरबार में लाखों महिलाएं आती थी और मुगल बादशाह सबसे राखी बधवाते थे। जबकि सच्चाई यह है कि जब अकबर छोटा था तब से बैरम खां और उसकी बेगम सलीमा सुल्ताना अकबर की संरक्षक थी। अकबर ने अपने ही बहनोई बैरम खां का कत्ल करवा कर अपनी सगी फुफेरी बहन से निकाह कर लिया था ।
                    अब ऐसे मुगलों के दरिंदे आचरण को किस तरह से यह इतिहासकार छुपाकर एक इनकी शानदार छवि बनाने की कोशिश करते हैं सोचिए, भारत के कम्युनिस्ट और 'सेकुलर' इतिहासकारों ने जो गंदगी फैलाई है उसे मिटाने में कई सदी लगेगी..... हालांकि अधिकांश बंटाधार तो हो ही चुका है...

जयश्रीराम 🙏

Thursday, 5 February 2026

एप्सटीन फाइल्स: सत्ता, सेक्स और नैतिकता

एप्सटीन फाइल्स: सत्ता, सेक्स और नैतिकता

एप्सटीन फाइल में बिज़नेसमैन Bill Gates से लेकर धर्मगुरु Deepak Chopra तक, लेखक Noam Chomsky से लेकर Stephen Hawking, Bill Clinton और Donald Trump—सबके नाम हैं। 

ये सभी वो लोग हैं जो अपनी-अपनी फील्ड में टॉप पर रहे हैं। लगभग इन सभी पर यौन अपराध या एप्सटीन से संबंध रखने करने के इल्ज़ाम हैं, जिनमें 12 साल तक की बच्चियों के साथ संबंध बनाना, इंसानी मांस खाना शामिल है। 

 """ कुछ रिपोर्ट्स में यहां तक ज़िक्र है कि कुछ छोटे बच्चों को टॉर्चर करते थे, क्योंकि बेहद तनाव की स्थिति में बच्चों के शरीर में Adrenochrome जैसा कैमिकल बनता है, जिसे पीकर जवान बने रह सकते हैं। """"

अभी ये कहना संभव नहीं है कि इनमें से कितने लोग इन सभी अपराधों के बारे में जानते थे या उसमें शामिल थे। लेकिन इतना तय है कि इनमें से लगभग सभी अपनी यौन इच्छाओं की पूर्ति के लिए एप्सटीन के टापू पर जाते थे।

जब हम ये सारी बातें सुनते या पढ़ते हैं, तो पहला सवाल ज़ेहन में यही आता है कि कोई इतना कैसे गिर सकता है। इस सवाल से डील करने के दो तरीके हो सकते हैं। 

पहला तो ये कि आप इन लोगों की सिर्फ़ बुराई करके, इन्हें घटिया बताकर बात ख़त्म कर लें। दूसरा तरीका ये हो सकता है कि हम समझने की कोशिश करें कि दुनिया के सबसे बेहतरीन दिमाग अपराध और नैतिकता को देखते कैसे हैं।

इच्छाओं से अपराध तक की मनोवैज्ञानिक यात्रा
पहले मैं यौन इच्छाओं के सवाल पर आता हूं, फिर हम इसके नैतिक पक्ष की बात करेंगे। आपको याद होगा, कुछ साल पहले Tiger Woods के एक सेक्स स्कैंडल का भंडाफोड़ हुआ था। 

पता लगा था कि कैसे हाई-प्रोफाइल कॉल गर्ल्स के साथ संबंध बनाने के लिए उन्होंने पूरा एक नेटवर्क बना रखा था। एक पूरी टीम इसी काम में लगी थी।

Tiger Woods का ये भंडाफोड़ उस वक्त दुनिया की सबसे बड़ी ख़बर बना। उस समय वो अपने खेल में टॉप पर थे। ख़बर सामने आने के बाद जब उनसे इस बारे में पूछा गया, तो उन्होंने जो जवाब दिया, वो हमें बताता है कि मानव मस्तिष्क सोचता कैसे है। 

वुड्स ने कहा—“मैंने यहां तक पहुंचने में बहुत मेहनत की। बहुत पैसा कमाया, नाम कमाया। और जब मैंने ये सब पा लिया, तो मुझे लगा कि मुझे पूरा हक़ है अपनी temptations को पूरा करने का। अगर मेरा मन है कि मैं हर दिन एक लड़की से संबंध बनाऊं और मैं इसके लिए पैसे खर्च कर सकता हूं, तो क्यों नहीं?”

Tiger Woods की ये सोच ही, सफलता के शिखर पर पहुंचे बहुत से लोगों की सोच बन जाती है।

अब होता ये है कि ज़्यादातर लोग अपनी पूरी ज़िंदगी बुनियादी सवालों से जूझते रहते हैं। उनकी जो यौन इच्छाएं होती हैं, वो उस बारे में कुछ नहीं कर पाते और एक वक्त बाद वही इच्छाएं कुंठा बन जाती हैं। 

उनके लिए किसी पसंदीदा रेस्टोरेंट में जाकर मनपसंद खाना ही बड़ा इंद्रिय सुख होता है। वो जीवन में किसी बड़ी या छोटी सफलता को खा-पीकर सेलिब्रेट कर लेते हैं। यही खाना-पीना उनके लिए अपनी temptations को भोगने का चरम होता है।

और जिनकी यौन उत्तेजना ज़्यादा होती है और जिनके पास थोड़ा ज़्यादा पैसा भी होता है, वो उसे पैसे के ज़रिए बाहर जाकर पूरा कर लेते हैं।

मगर जो लोग जीवन में इतना पैसा कमा लेते हैं कि पैसे के दम पर कुछ भी हासिल करना उनके लिए मुश्किल नहीं होता, जहां कोई भी सामान्य चीज़ उन्हें उत्तेजना नहीं देती। जहां दुनिया की सबसे महंगी शराब या कॉल गर्ल भी उनके लिए बड़ी बात नहीं रह जाती।

अब इन्हें अपने इस इंद्रिय सुख के लिए एक नया high चाहिए होता है। तभी आप देखेंगे—फैशन इंडस्ट्री हो, फिल्म इंडस्ट्री हो—जहां शराब और सेक्स बहुत सहज हैं, वहां उस अगले high के तौर पर लोग नशे की तरफ़ जाते हैं। क्योंकि बाकी चीज़ों में उन्हें अब कोई sensation महसूस नहीं होता।

ये एक तरह का पागलपन है।

ऐसी चीज़ से प्यास बुझाने की कोशिश, जिसे आप जितना पीएंगे, उसकी प्यास उतनी ही बढ़ती जाएगी। आपकी senses हर दिन आपसे कुछ नया demand करने लगती हैं।

Jeffrey Epstein के टापू पर छोटे बच्चों के साथ जो यौन अपराध हुए उसका एक मनोवैज्ञानिक पहलू तो है ही, लेकिन मोटे तौर वो इसी पागलपन की अगली कड़ी थे।

अब सवाल उठता है—अगर पैसे और इच्छापूर्ति का यही नैसर्गिक चढ़ाव है, तो हर पैसे वाले आदमी को इसी गति तक पहुंच जाना चाहिए। लेकिन ऐसा नहीं है। और यही वजह है कि एप्सटीन फाइल में अमेरिका का हर प्रभावशाली और अमीर आदमी नहीं है। कितने लोग ऐसे भी रहे होंगे जिन्होंने एप्सटीन के निमंत्रण को नकार दिया होगा।

लेकिन जो हैं—वो किन कारणों से यहां तक पहुंचे—यह उसकी एक मनोवैज्ञानिक व्याख्या हो सकती है।

ताक़त बनाम नैतिकता

अब दूसरा और ज़्यादा महत्वपूर्ण सवाल ये है कि इतने बड़े-बड़े लोग अपनी इच्छापूर्ति के लिए इतना कैसे गिर सकते हैं। क्या उन्हें ये सब करना अनैतिक नहीं लगा?

Bill Gates से लेकर Donald Trump तक, Stephen Hawking तक—इन सबने न सिर्फ़ यौन अपराध किए, बल्कि अपनी पत्नियों को भी धोखा दिया।
इस सवाल का जो जवाब है, वो बहुत खतरनाक है।

इतना खतरनाक कि वो सच्चाई, जीवन और नैतिकता को लेकर आपकी सारी मान्यताओं को ध्वस्त कर सकता है।

Steve Jobs के बिज़नेस पार्टनर ने एक इंटरव्यू में बताया था कि जॉब्स उनसे 
निजी बातचीत में कहा करते थे—“मुझे इस बात से फर्क नहीं पड़ता कि बच्चे क्या सोचते हैं या उनके मां-बाप क्या चाहते हैं। मुझे बस ये पता है कि वो वही चाहेंगे जो मैं चाहूंगा।”

Bill Gates 2015 से अगले पैनडेमिक की बात कर रहे थे। ये भी सामने आया है कि WHO भी इसमें शामिल था। कौन-सी दवा कंपनियां वैक्सीन बनाएंगी—ये भी पहले से तय था।

आप Jeffrey Epstein के इंटरव्यू सुन लीजिए। समाज, जीवन और मानव स्वभाव पर उसकी बातें किसी भी बड़े दार्शनिक को शर्मिंदा कर सकती हैं।

कुल मिलाकर, दुनिया में टॉप पर बैठे ये वही लोग हैं जो शेयर बाज़ारों में उतार-चढ़ाव लाते हैं, बड़ी-बड़ी बीमारियां लाते हैं, अदालतों को कंट्रोल करते हैं। Deep State के ज़रिए दूसरे देशों की सरकारें गिराते हैं।

दूसरे शब्दों में कहूं तो इनका cause and effect पर इतना ज़बरदस्त कंट्रोल है कि ये Sacred Games के Nawazuddin की तरह खुद को भगवान समझने लगते हैं।

वो भगवान, जो जानता है कि नैतिकता, अच्छा-बुरा, नियम-कानून जैसी चीज़ें सिर्फ़ कमज़ोर लोगों को कंट्रोल करने के लिए बनाई गई हैं।

कमज़ोर लोग अपनी नौकरी के लिए, तरक्की के लिए, और सज़ा से बचने के लिए व्यवस्था पर निर्भर होते हैं।

जबकि ताक़तवर लोग जानते हैं—व्यवस्था वही हैं।

तभी आप देखिए—छोटे देशों पर दबाव बनाने के लिए UN है, लेकिन अमेरिका के लिए कोई UN नहीं। वो चाहे तो Venezuela के राष्ट्रपति को उसके घर से उठा सकता है।

आपकी गाड़ी से दो पेटी शराब मिल जाए, तो पुलिस जेल में डाल देगी।
इधर Supreme Court के जज के घर से 15 करोड़ रुपये बोरे में मिलते हैं और कुछ नहीं होता।

हिंदू धर्म में किसी की मौत के बाद 13 दिन तक शोक होता है।
इधर Ajit Pawar की पत्नी ने उनकी मौत के पांचवें दिन उपमुख्यमंत्री की शपथ ले ली।

क्योंकि दुनिया के हर हिस्से का ताक़तवर आदमी जानता है—
व्यवस्था, नियम, क़ायदा, नैतिकता, ईश्वर—जैसी कोई चीज़ नहीं होती।
जिसके पास पैसा है, ताक़त है—वही व्यवस्था है और वही ईश्वर है।

भारत में नेताओं से लेकर जजों, अफसरों और पुलिस में जो हद दर्जे की निर्लज्जता आप देखते हैं, उसके पीछे भी यही सोच है—“हम ही व्यवस्था हैं। हमारा कोई क्या ही बिगाड़ लेगा।”

और इसमें मैं हर धर्म और मज़हब के पाखंडी गुरुओं को भी शामिल करता हूं।
“हमारा कोई क्या ही बिगाड़ लेगा”—

यही अहसास हर बड़े अपराध की जड़ है।

अमेरिका में तो एक Epstein Files सामने आई है। 

लेकिन यक़ीन मानिए दोस्तों—भारत के कोने-कोने में ऐसी न जाने कितनी Epstein Files दबी पड़ी हैं। जिनमें निर्दोष लोगों की चीखें हैं, क़त्ल हैं, और उन पर हुए ज़ुल्म शामिल हैं। 

और जिस दिन वो फाइलें खुलीं—धर्म से लेकर राजनीति तक, न जाने कितनी सत्ताएं एक साथ ध्वस्त हो जाएंगी।

Names Referenced in the Epstein Files:
🇺🇸 Donald Trump
🇺🇸 Elon Musk
🇺🇸 Michael Jackson
🇺🇸 Bill Gates
🇺🇸 Leonardo DiCaprio
🇺🇸 George W. Bush
🇺🇸 Bill Clinton
🇺🇸 Hillary Clinton
🇬🇧 Prince Andrew
🇺🇸 Cameron Diaz
🇺🇸 Bruce Willis
🇺🇸 Kevin Spacey
🇺🇸 Harvey Weinstein
🇺🇸 Jeffrey Epstein
🇬🇧 Mick Jagger
🇺🇸 George Lucas
🇬🇧 Tony Blair
🇸🇦 Mohammed bin Salman
🇺🇸 John Kerry
🇺🇸 Ted Kennedy
🇺🇸 Robert F. Kennedy Jr.
🇺🇸 Michael Bloomberg
🇺🇸 Woody Allen
🇺🇸 Alan Dershowitz
🇬🇧 Ghislaine Maxwell
🇺🇸 Andrew Cuomo
🇬🇧 Phil Collins
🇺🇸 Larry Summers
🇮🇱 Ehud Barak
🇺🇸 Chris Tucker
🇺🇸 Les Wexner
🇺🇸 Leon Black
🇺🇸 Glenn Dubin
🇫🇷 Jean-Luc Brunel
🇬🇧 Peter Mandelson
🇬🇧 Lynn Rothschild
🇶🇦 Hamad bin Jassim
🇦🇪 Abdullah bin Zayed
🇱🇧 Saad Hariri
🇪🇬 Ahmed Aboul Gheit
🇪🇸 Miguel Ángel Moratinos
🇬🇧 Minnie Driver
🇨🇦 Peter Dalglish
🇲🇦 Taieb Fassi-Fihri
🇧🇭 Khalid bin Ahmed Al Khalifa
🇵🇰 Makhdoom Shah Mahmood
🇳🇬 Henry Odein Ajumogobia

Wednesday, 4 February 2026

सवर्ण और मुगल शासन

क्या हिंदू व्यापारी और साहूकार समुदायों (जैसे जैन/बनिया बैंकर्स, खत्री व्यापारी आदि) लोगों को मुस्लिम शासकों (नवाब, मुग़ल आदि) या औपनिवेशिक शक्तियों (मुख्यतः ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी) के हाथों उत्पीड़न, हत्या, विश्वासघात, आर्थिक तबाही या संबंधित संपत्तियों को गँवा देने का सामना नहीं करना पड़ा? 

मध्यकाल में क्या गैर-मुस्लिम व्यापारियों (हिंदू/जैन बैंकर्स और व्यापारी) पर जजिया कर बार बार नहीं लगाया गया, आर्थिक दबाव नहीं बढ़ाया गया और वैश्य समुदाय से जुड़े मंदिरों को अपवित्र नहींकिया गया? क्याइससे उनकी समृद्धि प्रभावित नहीं हुई और कुछ ने प्रवास किया? 14वीं शताब्दी में फिरोज शाह ने हिंदू व्यापारियों का जो गंभीर आर्थिक शोषण और धार्मिक उत्पीड़न किया, जबरन धर्मांतरण और मंदिर विध्वंस किए, जिससे व्यापारियों पर जजिया जैसे बोझ बढ़े और असुरक्षा फैली थी, वह सब किसी को याद है?

मुग़ल काल में प्रसिद्ध जैन जौहरी और व्यापारी शांतिदास झवेरी की किसी को याद है? 1645 में क्या औरंगजेब (तब प्रिंस/गवर्नर) के आदेश पर अहमदाबाद में उनके चिंतामणि पार्श्वनाथ मंदिर में मिहराब (इस्लामी प्रार्थना स्थल) बनवाकर अपवित्र नहीं किया गया था ? औरंगजेब के शासन (1658–1707) में हिंदू व्यापारियों (बनिया आदि) पर मुस्लिमों की तुलना में दोगुना सीमा शुल्क (5% बनाम 2.5%) और काबुल जैसे स्थानों पर बिक्री/खरीद पर अधिक कर लगाए गए। जजिया कर की पुनर्स्थापना से आर्थिक तनाव बढ़ा और कई व्यापारी प्रभावित हुए।

परवर्ती मुग़ल शासन और ब्रिटिश प्रभुत्व (18वीं शताब्दी) के दौरान व्यापारियों को व्यापारिक विशेषाधिकारों में कमी कर उन पर भारी करारोपण और बंदरगाहों पर उनकी स्वायत्तता खत्म करने के पाठ कभी पढ़ाये गये, जिससे उन हिन्दू व्यापारियों का आर्थिक हाशियाकरण हुआ था? 18वीं शताब्दी की शुरुआत में नवाब मुर्शिद कुली खान ने अधिकार का विरोध करने वाले हिंदू जमींदारों और व्यापारियों को कैसे कुचला था? छोटे व्यापारियों पर भारी कर और दमन से आई तबाही की याद करें। ये भी याद करें कि 18वीं शताब्दी की शुरुआत में सूरत के बनिया व्यापारियों को काज़ियों और अधिकारियों से असीमित रिश्वत देनी पड़ती थी ताकि उनके मंदिरों को अपवित्र होने या जब्त होने से बचाया जा सके। धार्मिक कट्टरता से क्रूर उत्पीड़न हुआ, जिससे कई परिवार प्रांत छोड़कर भाग गए थे। 1831 में तालपुर मीरों (सिंध के मुस्लिम शासकों) के शासन में एक मुस्लिम भीड़ ने सेठ होतचंद को पकड़ लिया और जबरन इस्लाम कबूल करने की कोशिश की। उन्होंने विरोध किया, लेकिन यह घटना हिंदू व्यापारियों की धार्मिक उत्पीड़न की कमजोरी को दर्शाती है। सेठ नाओमल को तालपुरों के तहत निरंतर धमकियाँ और हाशिए पर धकेला गया।

यदि गजनवी गोरी आदि का मुख्य धंधा सोना चाँदी लूटना था तो क्या वे सिर्फ मंदिरों का ही धन लूट रहे थे? 

बंगाल के प्रसिद्ध जैन साहूकार जगत सेठ परिवार के महताब चंद की याद है जिसे 1763 में मुस्लिम नवाब मीर कासिम ने मुंगेर किले से फेंककर या डुबोकर मार डाला? नवाब को परिवार के बंगाल के टकसाल व खजाने पर प्रभाव से नफरत थी। स्वरूप चंद की याद है जिसे 1763 में नवाब मीर कासिम ने मार डाला था? जगत सेठ जैसे प्रमुख व्यापारियों को सीधे धमकियाँ और अपमान झेलना पड़ा। सिराज-उद-दौला ने 3 करोड़ रुपये का Tribute मांगा और इनकार पर महताब चंद की पिटाई की गई थी। 

क्या गोवा इंक्विजिशन (1560 से आगे) के दौरान हिंदू व्यापारियों को जबरन धर्मांतरण, संपत्ति जब्ती और निर्वासन का सामना हकरना पड़ा था जिससे स्थापित व्यापारिक नेटवर्क बाधित हुए?

क्या किसी को कलकत्ता में रहने वाले धनी पंजाबी खत्री व्यापारी ओमिचंद (अमीर चंद) की याद है जिसे रॉबर्ट क्लाइव ने नकली संधि से धोखा दिया था और लाखों रुपये का वादा किया था लेकिन धोखा पता चलने पर वे मानसिक रूप से टूट गए और 1767 में ब्रिटिश कंपनी शासन के तहत मर गए? 

यदि अंग्रेज भारत के पैसे का इतना ड्रेन कर रहे थे कि दादा भाई नौरोज़ी को उस युग में उस पर एक पूरी पुस्तक लिखनी पड़ी तो वह किस वर्ण का सबसे बड़ा pauperisation था? 1765 के बाद (दिवानी अधिकार मिलने पर) ब्रिटिश नीतियों ने व्यापार पर एकाधिकार किया, कपड़ा उद्योग को नष्ट किया और ब्रिटिश माल से बाजार भर दिया, जिससे पारंपरिक हिंदू व्यापारिक नेटवर्क ढह गए।

क्या वैश्य समुदाय का देशप्रेम कुछ कम था? भामाशाह कौन थे? गुरु गोबिंद सिंह जी के छोटे साहिबजादों (ज़ोरावर सिंह और फतेह सिंह) और माता गुजरी जी की शहादत के बाद, मुग़ल अधिकारियों ने उनके अंतिम संस्कार के लिए सरहिंद की ज़मीन पर सोने के सिक्के खड़े करके (लगभग 7,800 अशर्फ़ी) बिछाने की शर्त रखी। तब हिन्दू वैश्य तोदार मल ने अपनी पूरी संपत्ति बेचकर यह किया और शवों को संस्कार के लिए भूमि को प्राप्त किया था। गुरु तेग बहादुर जी को 500 सोने की मोहरें चढ़ा देने वाले मक्खन शाह लुबाना की याद करें। 12वीं शताब्दी में दिल्ली के आसपास के जैन व्यापारियों ने पृथ्वीराज चौहान जैसे राजपूत राजाओं को आर्थिक सहायता दी थी और युद्धों में योगदान किया था।

तब कैसा लगता है जब अत्याचारों को झेलने की इकतरफ़ा कल्प-कथाएँ सुनाई जाती हैं?

Monday, 2 February 2026

शबर शब्द शबरी

शबर शब्द जाति सूचक नहीं है। शिव के द्वारा उपदिष्ट तान्त्रिक मन्त्रों को शाबर मन्त्र कहते हैं। दक्षिण ओड़िशा तथा उसके निकट के छत्तीसगढ़ और आन्ध्र प्रदेश के क्षेत्रों को शबर क्षेत्र कहते हैं। मीमांसा दर्शन का शाबर भाष्य प्रसिद्ध है जो उस क्षेत्र के एक विद्वान् द्वारा प्रणीत था। यह वराह अवतार तथा वैखानस दर्शन से सम्बन्धित क्षेत्र है।