Saturday, 28 March 2026

medical report

इसे सेव मत करो। इसे पढ़ो। अभी।

आपने पूरे शरीर के चेकअप के लिए ₹1,500 दिए।
12 पेज की रिपोर्ट मिली।
शायद उसमें से सिर्फ़ 2 लाइनें ही समझ आईं।

इस बीच:
- आपका B12 200 है। 500 से कम = लगातार थकान, दिमाग़ का ठीक से काम न करना, बालों का झड़ना।
- आपका Vitamin D 15 है। 30 से कम = कमज़ोर हड्डियाँ, कम इम्यूनिटी, वज़न बढ़ना। 70-80% भारतीयों में इसकी कमी है।
- आपका HbA1c 5.7 है। 5.6 से ज़्यादा = प्री-डायबिटीज़। 136 मिलियन भारतीय पहले से ही इस स्टेज पर हैं।

आप हर समय थके हुए रहते हैं।
आपके बाल झड़ रहे हैं।
आप वज़न कम नहीं कर पा रहे हैं।
आप इसका दोष स्ट्रेस को देते हैं।

यह स्ट्रेस नहीं है। यह आपका खून है।
अपनी रिपोर्ट को असल में ऐसे पढ़ें...
विटामिन B12.

आपकी रिपोर्ट में 200 आया है। लैब कहती है, "नॉर्मल रेंज: 200-900."
लेकिन सबसे सही लेवल 500-800 होता है।

200 होने पर, आप टेक्निकली तो रेंज में हैं, लेकिन असल में आपके शरीर में इसकी कमी है। इसीलिए दोपहर 3 बजे आपको 'ब्रेन फॉग' (सोचने में धुंधलापन) महसूस होता है, पहले के मुकाबले ज़्यादा बाल झड़ते हैं, और ऐसी थकान होती है जिसे कॉफी भी दूर नहीं कर पाती।

47% भारतीयों में B12 की कमी है। अगर आप शाकाहारी हैं, तो यह आंकड़ा बढ़कर 70% हो जाता है।

इलाज:
अपने डॉक्टर से 'मिथाइलकोबालामिन' (methylcobalamin) लेने को कहें ('सायनोकोबालामिन' नहीं - क्योंकि मिथाइलकोबालामिन शरीर में ज़्यादा बेहतर तरीके से एब्ज़ॉर्ब होता है)।
₹300/महीना। 8-12 हफ़्तों में असर दिखने लगेगा।
सिर्फ़ एक सप्लीमेंट। यही वह फ़र्क है जो आपके दिन को बस किसी तरह घसीटकर काटने और सचमुच पूरे दिन ऊर्जावान महसूस करने के बीच का अंतर तय करता है।

विटामिन D.

भारत में साल के 300 से ज़्यादा दिन धूप रहती है।
फिर भी हममें से 70-80% लोगों में इसकी कमी है।
आपकी रिपोर्ट में 15 आया है। जबकि लैब की नॉर्मल रेंज 20 से शुरू होती है।

लेकिन सबसे सही लेवल 50-80 के बीच होता है।
30 से कम होने पर = कमज़ोर इम्यूनिटी, जोड़ों में दर्द, वज़न जो कुछ भी करने पर भी कम नहीं होता, और बिना किसी वजह के उदासी महसूस होना।
आप अपनी बेजान त्वचा के लिए स्किनकेयर पर ₹3,000 खर्च कर रहे हैं, जबकि असली समस्या एक विटामिन की कमी है जिसे ठीक करने में सिर्फ़ ₹10 लगते हैं।

इलाज:
विटामिन D3 - 60,000 IU का सैशे, 8 हफ़्तों तक हफ़्ते में एक बार लें। उसके बाद महीने में एक बार।
किसी भी केमिस्ट की दुकान पर मिल जाएगा।
हफ़्ते में एक सैशे। बस इतना ही।

HbA1c.

यह एक ऐसा नंबर है जिसके बारे में ज़्यादातर भारतीयों ने कभी सुना भी नहीं है।
यह आपको पिछले 3 महीनों का आपका औसत ब्लड शुगर लेवल बताता है। यह फ़ास्टिंग शुगर की तरह सिर्फ़ एक सुबह का स्नैपशॉट नहीं है।
5.7 से कम = स्वस्थ।
5.7-6.4 = प्री-डायबिटिक।
6.5 से ज़्यादा = डायबिटिक।

अभी 136 मिलियन भारतीय प्री-डायबिटिक हैं। ज़्यादातर लोगों को इस बारे में कोई अंदाज़ा नहीं है, क्योंकि उनकी फ़ास्टिंग शुगर "ठीक" लग रही थी।

अगर आप इसे 5.7 पर ही पहचान लेते हैं, तो आपको दवा की ज़रूरत नहीं पड़ेगी। रोज़ाना 30 मिनट की कसरत + रिफ़ाइंड कार्ब्स को आधा करने से, 3-6 महीनों में यह वापस 5.7 से नीचे आ सकता है।

अगर आप इसे 6.5 पर पहचानते हैं, तो आपको ज़िंदगी भर डायबिटीज़ की दवा लेनी पड़ सकती है। हर महीने ₹2,000-5,000 का खर्च।

आयरन और फेरिटिन।

यह उन सभी भारतीय महिलाओं के लिए है जो इसे पढ़ रही हैं।

15-49 साल की 57% भारतीय महिलाएं एनीमिया (खून की कमी) से पीड़ित हैं। यह हममें से आधे से भी ज़्यादा हैं।
हो सकता है कि आपका हीमोग्लोबिन 12 हो। यानी "नॉर्मल।"
लेकिन किसी ने आपका फेरिटिन चेक नहीं किया होगा।

फेरिटिन = आपके शरीर में जमा आयरन। हीमोग्लोबिन तो ठीक दिख सकता है, लेकिन फेरिटिन का लेवल बहुत ज़्यादा कम हो सकता है।
30 से कम होने पर = ऐसी थकान होती है जो सोने से भी दूर नहीं होती, बालों का झड़ना जो किसी भी शैम्पू से ठीक नहीं होता, और दिमाग में धुंधलापन (brain fog) जिससे आप यह भी भूल जाती हैं कि आप किसी कमरे में क्यों गई थीं।

इलाज:
खास तौर पर फेरिटिन का टेस्ट करवाएं।
अगर लेवल 30 से कम है, तो 'आयरन बिस्ग्लाइसिनेट' (iron bisglycinate) ज़्यादा बेहतर तरीके से शरीर में घुलता है और आम आयरन की गोलियों की तरह आपके पेट को नुकसान नहीं पहुँचाता।

5 टेस्ट।
कुल खर्च: ₹2,500।
यह बाहर एक बार डिनर करने से भी कम है।
आपको ₹15,000 वाले "एग्जीक्यूटिव हेल्थ पैकेज" की ज़रूरत नहीं है।
आपको बस 5 चीज़ों की जानकारी चाहिए:
B12. विटामिन D. HbA1c. फेरिटिन. थायरॉइड (TSH).
साल में एक बार इनकी जाँच करवाएँ। और इन्हें ठीक से समझें।

थकान, बालों का झड़ना, वज़न जो कम ही नहीं होता, और वो मूड जिसे आप समझा नहीं पाते।
यह तनाव नहीं है। यह "बढ़ती उम्र" का असर नहीं है। यह "बस ज़िंदगी ऐसी ही होती है" वाली बात भी नहीं है।

यह आपके खून की बात है। और अब आप जानते हैं कि इसे कैसे समझना है।

#InfiniteEnergy

चक्र व्यूह

गीता : प्रथम श्लोक ६(७)

कभी कभी मुझे यह प्रश्न उलझा देता है कि अभिमन्यु ने जिस चक्रव्यूह की विद्या को अधूरा गर्भ में सीख लिया था, वह विद्या उसे जन्म के बाद के सोलह वर्षों में क्यों पूरी सिखाई न गई। महाभारत में कहीं भी यह उल्लेख नहीं है कि किसी ने — अर्जुन ने, कृष्ण ने, द्रोण ने — अभिमन्यु को बाद में चक्रव्यूह-भेदन की पूरी विद्या सिखाने का प्रयास किया। यह चुप्पी स्वयं एक पाठ है। एक सूक्ष्म किन्तु महत्त्वपूर्ण प्रश्न — क्या अर्जुन को स्मरण था कि उसने सुभद्रा को यह विद्या सुनाई थी, और कि वह अधूरी रह गई? संस्कृत टीकाकार इस पर मौन हैं। यदि अर्जुन जानते थे, तो यह उनकी सबसे बड़ी चूक है। यदि नहीं जानते थे, तो महाकाव्य की यह त्रासद विडम्बना और भी गहरी हो जाती है।

द्रोण ने अभिमन्यु को असंख्य अस्त्र-विद्याएँ सिखाईं होंगी किन्तु चक्रव्यूह-भेदन केवल अर्जुन की विशेष विद्या थी। यह द्रोण के पास भी पूर्णतः नहीं थी उसी रूप में। तो यह ज्ञान देना केवल अर्जुन का काम था — और अर्जुन चूक गये ।

कुरुक्षेत्र-युद्ध अचानक नहीं आया, किन्तु जब आया तो हर महारथी अपनी-अपनी तैयारी में व्यस्त था। जो ज्ञान की कमी थी वह दिखाई नहीं दी — क्योंकि किसी को यह अनुमान नहीं था कि अभिमन्यु को अकेले चक्रव्यूह में भेजना पड़ेगा।

क्या जो ज्ञान जन्म के समय अधूरा रह जाता है, उसे जीवन में पूरा किया जा सकता है?महाभारत का उत्तर क्रूर किन्तु ईमानदार है: कभी-कभी नहीं। कि कुछ अधूरापन संरचनात्मक होता है। वह व्यक्ति की असावधानी नहीं, परिस्थिति की नियति है। और वह अधूरापन ही उस व्यक्ति की त्रासदी बनता है। न उसकी कमज़ोरी से, न शत्रु की चालाकी से, बल्कि उस रिक्तता से जो किसी ने भरी नहीं, क्योंकि किसी ने देखा ही नहीं कि वह रिक्तता है।यही अभिमन्यु की असली त्रासदी है और यही उसे शाश्वत बनाती है।

मैं महाभारतकार के हिसाब से सोचूँ तो यदि अभिमन्यु ने वह विद्या पूरी सीख ली होती, वह चक्रव्यूह से जीवित निकल जाता। और तब?

कुरुक्षेत्र का परिणाम भिन्न होता।परीक्षित की आवश्यकता न होती उसी रूप में और सबसे महत्त्वपूर्ण अर्जुन का जयद्रथ-वध नहीं होता, जो महाभारत के सबसे भव्य प्रतिशोध-प्रसंगों में से एक है।

महाकाव्य को अभिमन्यु की मृत्यु चाहिए थी। जागतिक कारणों से, आख्यान-कारणों से, और नैतिक-कारणों से। इसीलिए न किसी को सूझा, न किसी ने किया।

महाभारत युद्ध होने से पूर्व द्रौपदी के चीरहरण के समय जो नैतिक पतन देखने में आया, महाभारत युद्ध के दौरान वही नैतिक पतन अभिमन्यु के साथ युद्ध में देखने आया। एक में कौरव सभा के आदरणीयों की चुप्पी थी, दूसरे में कौरव सभा के आदरणीयों की संलिप्तता थी। बल्कि द्रौपदी के समय फिर भी विकर्ण की आवाज विरोध में उठी थी, अभिमन्यु के क्षण किसी ने भी विरोध नहीं किया था। चीरहरण में भीष्म, द्रोण, कृप जानते थे कि जो हो रहा है वह अधर्म है। किन्तु वे चुप रहे। यह कायरता थी, नैतिक विफलता थी — किन्तु उनके हाथ उस पाप में प्रत्यक्षतः नहीं थे।द्रौपदी ने स्वयं पूछा था —क्या इस सभा में कोई धर्म जानने वाला नहीं?" और सभा मौन रही।अभिमन्यु-वध में वही द्रोण, वही कृप इस बार स्वयं उस पाप के उपकरण बन गए। उन्होंने केवल देखा नहीं, उन्होंने किया। एक बार एक असहाय स्त्री पर अत्याचार होते देखा। एक बार एक नि:शस्त्र किशोर पर स्वयं अत्याचार किया।

विशुद्ध नैतिक दृष्टिकोण से, अभिमन्यु की हत्या महाकाव्य-साहित्य में सर्वाधिक सावधानीपूर्वक निर्मित नैतिक अत्याचारों में से एक है। महाभारत धर्म-युद्ध के प्रत्येक नियम का क्रमिक उल्लंघन स्थापित करने में अत्यन्त सतर्क है: कर्ण ने उसका धनुष तोड़ा; कृतवर्मा ने उसके अश्व मारे; कृपाचार्य ने उसके सारथी को मारा; अश्वत्थामा ने उसकी ध्वजा काटी; और अन्ततः, जब वह निःशस्त्र था, अनेक महारथियों ने घेरकर उसे मारा। महाकाव्य इनमें से प्रत्येक उल्लंघन का स्पष्ट वर्णन करता है, और अभिमन्यु की प्रतिक्रिया का भी — वह लड़ता रहता है, नए अस्त्र खोजता है, रथ-चक्र से युद्ध करता है, कभी नहीं रुकता, कभी नहीं भागता।

महाकाव्य यह दिखाता है कि नैतिक पतन एकाएक नहीं होता। यह क्रम यों चलता है: 
मौन देखना
    ↓
मौन स्वीकृति
    ↓
निष्क्रिय सहभागिता
    ↓
सक्रिय संलिप्तता
    ↓
नेतृत्व में पाप

चीरहरण पहला पड़ाव था — जब इन महापुरुषों ने मौन रहकर यह सिखाया कि संस्था, स्वामिभक्ति और व्यक्तिगत सुरक्षा धर्म से बड़े हैं। अभिमन्यु-वध अन्तिम पड़ाव था — जब वही संस्था-निष्ठा उन्हें एक किशोर की हत्या में सीधे भागीदार बना गई।

कौरवों के ये प्रसंग नैतिकता पर संस्थागत निष्ठा की विजय बताने के प्रसंग हैं। दोनों प्रसंगों में एक समान सूत्र है — इन महापुरुषों ने व्यक्तिगत धर्म को संस्था-धर्म के नीचे दबा दिया। भीष्म की प्रतिज्ञा, द्रोण का नमक, कृप का कुलधर्म — ये सब संस्थागत बन्धन थे जो उन्हें बार-बार वह करने पर विवश करते रहे जो वे जानते थे कि अधर्म है। यही महाभारत का सबसे आधुनिक सन्देश है कि जो व्यक्ति एक बार संस्था के नाम पर मौन रहना सीख लेता है, वह धीरे-धीरे संस्था के नाम पर पाप करना भी सीख लेता है। चुप्पी और संलिप्तता के बीच की दूरी उतनी नहीं होती जितनी हम सोचते हैं।

द्रौपदी और अभिमन्यु दोनों इसके साक्षी हैं। द्रौपदी बची — किन्तु उसका अपमान महाभारत युद्ध का कारण बना। अभिमन्यु नहीं बचा — किन्तु उसकी मृत्यु महाभारत युद्ध का नैतिक केन्द्र बन गई। दोनों ने कौरव-पक्ष के महापुरुषों का असली चेहरा उघाड़ा। एक ने उनकी कायरता दिखाई, दूसरे ने उनका पतन।

इस निर्माण का नैतिक महत्त्व गहन है। महाभारत गहराई से इस प्रश्न में निवेशित है कि धर्म कब अपने स्वयं के नियमों से विचलन की अनुमति देता है। वास्तव में, सम्पूर्ण भगवद्गीता इसी प्रश्न पर विस्तारित ध्यान है। किन्तु अभिमन्यु की हत्या एक ऐसा मामला है जिसमें महाकाव्य कोई शमन-तर्क नहीं देता। यह असामान्य है, क्योंकि महाभारत सामान्यतः अपने सभी पात्रों के प्रति कठोरता से न्यायसंगत है। अभिमन्यु के हत्यारों की अशमनीय नैतिक निन्दा यह संकेत देती है कि उसकी मृत्यु युद्ध का नैतिक रसातल है।

पांडव मुझे इसीलिए पसंद हैं क्योंकि उन्होंने इन दोनों ही अन्यायों को भुलाया नहीं। अन्याय सहकर चुप बैठते तो वे भी कौरव पक्ष के इन महापुरुषों की श्रेणी में शामिल होते। 

और कौरव इसीलिए नापसंद हैं क्योंकि वे अधिक से और अधिक रसातल में गिरते गये। अश्वत्थामा पर चर्चा हम बाद में करेंगे पर आखिरी दिन उसके द्वारा किया गया कृत्य नैतिक अधोकाष्ठा का निकृष्टतम दृष्टान्त थी।

और देखिए कि वही द्रौपदी पतन के इस चरमतम क्षण पर अपने पितृपक्ष के सभी लोगों के मारे जाने बल्कि सबसे कायर तरीके से मारे जाने पर ही नहीं बल्कि अपने सभी पुत्रों के मारे जाने पर भी अश्वत्थामा को क्षमा कर देती है।प्रतिशोध से क्षमा तक की भी एक यात्रा है इस महाकाव्य में।

वनवास में जब भीम हताश होते हैं, जब अर्जुन अस्त्र-प्राप्ति के लिए जाते हैं और लौटने में विलम्ब होता है, जब युधिष्ठिर में निराशा घर करने लगती है — तब द्रौपदी वह स्त्री है जो सबको सँभालती है। वह एक साथ दो असम्भव काम करती है — अपने क्रोध को जीवित रखती है ताकि न्याय के लिए संघर्ष की आग बुझे नहीं, और अपने परिवार की आशा को जीवित रखती है ताकि वे टूट न जाएँ। यह असाधारण मनोवैज्ञानिक सन्तुलन है। और यह सन्तुलन ही उसे महाकाव्य की सबसे परिपक्व आत्मा बनाता है।

द्रौपदी अपनी पीड़ा से क्षमा तक पहुँचती है — किसी आदर्श से नहीं, किसी धर्मशास्त्र के उपदेश से नहीं। वह कहती है — मैं जानती हूँ एक माँ का दर्द क्या होता है। इसलिए मैं उस माँ को यह पीड़ा नहीं दूँगी। यह empathy का सर्वोच्च रूप है — वह empathy जो अपनी पीड़ा के चरमतम क्षण में भी दूसरे की पीड़ा देख सके।

पूरे महाभारत में द्रौपदी और युधिष्ठिर के बीच एक निरन्तर नैतिक संवाद चलता है।युधिष्ठिर कहते हैं — क्षमा करो, धर्म पर छोड़ो, क्रोध त्यागो।द्रौपदी कहती है — क्षमा कायरता बन जाती है जब अन्याय करने वाला पश्चाताप न करे।दोनों गलत नहीं हैं। दोनों एक ही सत्य के दो पक्ष हैं।किन्तु जो बात उल्लेखनीय है वह यह है कि युद्ध के अन्त में द्रौपदी वहाँ पहुँचती है जहाँ युधिष्ठिर सदा थे — क्षमा तक। और युधिष्ठिर वहाँ पहुँचते हैं जहाँ द्रौपदी थी — शोक तक।दोनों एक-दूसरे की यात्रा करते हैं। यह महाकाव्य का अद्भुत वैवाहिक मनोविज्ञान है।

जिसे सबसे अधिक खोना पड़ा, जिसे सबसे अधिक अधिकार था प्रतिशोध का — वह क्षमा तक पहुँची।यही महाभारत का सन्देश है कि प्रतिशोध न्याय का प्रारम्भ हो सकता है। किन्तु क्षमा उसकी परिणति है — जब वह करुणा से जन्मे, दुर्बलता से नहीं। द्रौपदी ने यह यात्रा पूरी की। अग्नि से जन्मी स्त्री अन्त में प्रकाश बन गई।

अभिमन्यु को कृष्ण की तरह दो दो माताओं सुभद्रा और द्रौपदी का स्नेह मिला था हालाँकि महाकाव्य उन दोनों के मातृस्नेह का वैसाविस्तृत विवरण नहीं देता लेकिन वह था। अभिमन्यु इस महाकाव्य के समाजशास्त्रीय जगत् में वह है जिसे आज हम बाल-प्रतिभा कहते हैं। एक ऐसा पात्र जिसकी प्रतिभा उसके अनुभव और आयु से इतनी अधिक है कि उसके चारों ओर का सामाजिक तन्त्र उसे वयस्क मानता है, उस पर वयस्क भार और अपेक्षाएँ थोपता है। वह सर्वाधिक घातक स्थिति में अपनी युवावस्था के बावजूद नहीं बल्कि किसी अर्थ में उसके कारण ही भेजा जाता है।

पूर्व-जन्म के ज्ञान-संचरण प्रसंग का एक समाजशास्त्रीय आयाम है जिस पर अपर्याप्त ध्यान दिया गया है। वह है इसकी लिंग-संरचना चक्रव्यूह का ज्ञान एक सर्वोच्च सैन्य रहस्य है वह, एक ऐसी स्त्री के पास संचारित किया जा रहा था जो केवल एक माध्यम के रूप में उपस्थित थी। सुभद्रा की नींद ने संचरण को बाधित किया, और पारम्परिक व्याख्या उसे इसके लिए दोषी नहीं मानती।वह बस सो गई। किन्तु संरचनात्मक व्यवस्था प्रकट करती है: ज्ञान अर्जुन का था, अभिमन्यु को प्राप्त करना था, और सुभद्रा का शरीर ही वह माध्यम था जिसके द्वारा संचरण को गुज़रना था।

इसलिए गीता को अभिमन्यु को सौभद्र कहना उचित ही लगता है।

Friday, 27 March 2026

ज्ञान ज्ञान की सीमा

निदान 
१. अर्थ, उद्देश्य-
निदान का एक अर्थ है, रोग की जांच या निर्णय। लघुत्रयी में प्रसिद्ध एक आयुर्वेद पुस्तक है-माधव निदान। इसका अन्य प्रचलित अर्थ है, देव मूर्तियों की मुद्रा, आयुध आदि के प्रतीक।
किसी वस्तु का पूर्ण ज्ञान असम्भव है, जैसा गीता में कहा है-ज्ञानं ज्ञेयं परिज्ञाता त्रिविधा कर्मचोदना। (गीता, १८/१८) 
ज्ञान ३ या अधिक प्रकार का अनन्त है, जिनको अनन्त वेद कहा गया है (अनन्ताः वै वेदाः-तैत्तिरीय ब्राह्मण, ३/१०/११)। तीन प्रकार के अनन्त विष्णु सहस्रनाम में निर्दिष्ट हैं-अनन्त, असंख्येय, अप्रमेय।
ऋक् = मूर्ति = संख्येय अनन्त
यजु = गति = असंख्येय अनन्त
साम = महिमा = अप्रमेय अनन्त
अथर्व = ब्रह्म = अज्ञेय अनन्त। 
उसमें ज्ञेय उतना ही है, जिसका साम या प्रभाव हम तक पहुंचता है, अतः भगवान् ने अपने को वेदों में सामवेद कहा है (गीता, १०/२२)। उसका भी बाहरी ज्ञान होता है, जिसे जानने वाले को परिज्ञाता कहा है। 
अव्यक्त ब्रह्म या शब्द के परिज्ञान का सूत्र वाज. यजुर्वेद में है-
स पर्यगात्, शुक्रं, अकायं, अव्रणं, शुद्धं, अपापविद्धं, कविः मनीषी परिभूः स्वयम्भूः याथातथ्यतो अर्थान् व्यदधात् शाश्वतीभ्यः समाभ्यः। (ईशावास्योपनिषद्, ६, वाज. सं. ४०/८, काण्व सं. ४०/८)।
अव्यक्त विश्व या वाक् व्यक्त विश्व व्यक्त वाक्
(१). शुक्र तम तम
(२). अकाय पिण्ड शब्द आदि
(३). अव्रण छिद्र, दोष अपूर्णता, लुप्त शब्द।
(४). अस्नाविरम् ऋषि (रस्सी) कारक आदि से सम्बन्ध
(५). शुद्ध मिश्रण अपूर्ण रूप
(६). अपापविद्ध माया के आवरण शब्द, पद, वाक्य का पार्थक्य
ज्ञान प्राप्ति का क्रम वेद में निर्दिष्ट है-
कासीत् प्रमा, प्रतिमा, किं निदानमाज्यं, किमासीत्, परिधिः क आसीत्।
छन्दः किमासीत् प्रउगं किमुक्थं यद्देवा देवमयजन्त विश्वम्॥ (ऋक्, १०/१३०/३)
देवों ने विश्व (पुरुष सूक्त का विराट्, सीमाबद्ध पिण्डों का समूह, अधिपूरुष उसका अधिष्ठान है) की पूजा या यज्ञ कैसे किया? (यज देवपूजासंगतिकरण दानेषु, धातुपाठ १/७२८)। (१) प्रमा = सिद्धान्त, अनुमान (शैव दर्शन का प्रमा, प्रमाता), (२) प्रतिमा (उसी जैसा छोटा या बड़ा प्रतिरूप), (३) निदान मूल जैसा प्रतीक, (४) छन्द = शब्द, आकाश या काल की माप, (५) प्रउग = साधन, उपकरण (प्रउग का अर्थ शस्त्र किया गया है)। निर्माण ३ गुणों से हुआ है अतः इसका अर्थ त्रिकोण भी है)। (६) उक्थ (उक्थ = निर्माण से बचा भाग, भोजन के बाद जूठन)। 
२. देव-असुर-
आकाश में फैली हुई ऊर्जा या असु को प्राण कहते हैं। जिस असु से निर्माण नहीं होता वह असुर है। जिस असु के दिवा रूप से सृजन होता है, वह देव हैं।  
प्राणो वा असुः (शतपथ ब्राह्मण, ६/६/२/६)
तेनासुनासुरानसृजत। तदसुराणामसुरत्वम्। (तैत्तिरीय ब्राह्मण, २/३/८/२)
दिवा देवानसृजत नक्तमसुरान् यद्दिवा देवानसृजत तद्देवानां देवत्वं यदसूर्य्यं तदसुराणामसुरत्वम्। (षड्विंश ब्राह्मण, ४/१)
मनुष्यों में भी जो यज्ञ (उत्पादन चक्र) के समन्वय से अपनी आवश्यकता का स्वयं उत्पादन करते हैं, वे देव हैं।
यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवास्तानि धर्माणि प्रथमान्यासन्।
तेह नाकं महिमानः सचन्तः यत्र पूर्वे साध्याः सन्ति देवाः॥ (पुरुष-सूक्त, १६)
असुर भी यज्ञ करते हैं, पर उनका मुख्य उद्देश्य असु (बल) द्वारा अन्य द्वारा उत्पादित सम्पत्ति पर अधिकार करना है।
देव-असुर के बीच अन्य अन्तर है अदिति-दिति। दिति का अर्थ है काटना, दो अवखण्डने (धातु पाठ, ४/३९)। दैत्य हर प्रकार से बांटते हैं-ब्रह्म के एकत्व के बदले अब्राहम को मानते हैं। कहते हैं कि केवल मेरा देव सही है, बाकी के गलत हैं-मेरे देव को मानो या मरो। अपने पैगम्बर के पूर्व की सभी बातें गलत थीं, उसके बाद ही सत्य का पता चला। उसके विपरीत अदिति अखण्ड है, सनातन तत्त्व है, ब्रह्म तथा विश्व का एकत्व मानता है।
३. देव-देवी विभाग-
वेद में पुरुष-स्त्री का विभाजन कई प्रकार से है-
(१) पुरुष-प्रकृति-चेतन तत्त्व पुरुष है, उपादान या पदार्थ तत्व स्त्री है।
मयाध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते स चराचरम् (गीता, ९/१०)
वेद में प्रकृति को श्री या अदिति कहा है।
(२) वाक् और अर्थ-वाक् का अर्थ शब्द है, तथा उसका प्रसार आकाश। उसमें जो सीमाबद्ध पिण्ड या पुर है, वह अर्थ है। पुर में निवास करने वाला पुरुष है। पृथ्वी भी एक अर्थ है, जिसे अंग्रेजी में अर्थ (Earth) कहते हैं। एक वस्तु अर्थ या पुरुष है। उसका विस्तार वाक् स्त्री है। केश पुल्लिङ्ग है पर उसका समूह दाढ़ी, मूंछ, चोटी आदि स्त्रीलिङ्ग है। सैनिक पुल्लिङ्ग है पर उसका समूह सेना, वाहिनी, पुलिस आदि स्त्रीलिङ्ग है। मनुष्य रूप में जन्म देने के लिए स्त्री का गर्भ ही क्षेत्र या स्थान है, पुरुष का योग विन्दु मात्र है। 
इयं या परमेष्ठिनी वाग्देवी ब्रह्म संशिता। (अथर्व, १९/९/३)
वाचीमा विश्वा भुवनानि अर्पिता (तैत्तिरीय ब्राह्मण, २/८/८/४)
(३) वृषा-योषा -वृषा का अर्थ है वर्षा करने वाला। समुद्र या मेघ जैसे विस्तार से ब्रह्माण्ड या तारा जैसे विन्दुओं की वर्षा हुई। द्रव रूप में निकले इसलिए इनको द्रप्स (drops) कहा गया। स्रोत से निकलने या अलग होने के कारण इनको स्कन्न या स्कन्द कहा गया। सभ्यता या ज्ञान का स्रोत रूप में पुरुष ऋषभ या वृषभ है। जो क्षेत्र निर्माण के लिए युक्त होता है या ग्रहण करता है, वह योषा या स्त्री है।
द्रप्सश्च स्कन्द पृथिवीमनुद्याम्। (ऋक्, १०/१७/११, अथर्व, १८/४/२८, वाज. यजु. १३/५, तैत्तिरीय सं. ३/१/८/३, ४/२/८/२, मैत्रायणी संहिता, २/५/१०, ४/८/९, काण्व सं. १३/९, १६/१५,३५/८) 
यः सप्तरश्मिः वृषभस्तु विष्मानवासृजत् सर्तवे सप्तसिन्धून्। (ऋक्, २/१२/१२)
योषा वै वेदिः, वृषा अग्निः (शतपथ ब्राह्मण, १/२/५/१५)
४. देव विभाग-हर स्थान के प्राण रूप देव अनन्त हैं। पर उनके २ मुख्य विभाग हैं। सौर मण्डल में ३३ धाम हैं, ३ पृथ्वी के भीतर, ३० बाहर। पृथ्वी को आकाश के लिए माप-दण्ड माना गया है, बड़े धाम पृथ्वी से क्रमशः २-२ गुणा बड़े हैं। केन्द्र से ८ धाम तक अग्नि के ८ रूप वसु हैं, उसके बाद १ अश्विन रूप, फिर ११ वायु रूप रुद्र हैं। रुद्र के बाद पुनः १ अश्विन और उसके बाद तेज रूप १२ आदित्य हैं।
पूरे विश्व के लिए ३ प्रकार से विभाग हैं, जिनका लिए गायत्री मन्त्र में ३ पाद हैं।
स्रष्टा रूप ब्रह्मा- तत् सवितुः वरेण्यम्। सविता = सव या प्रसव करने वाला, स्रष्टा। यह सविता सूर्य पिता है। पिता का जन्म पितामह ब्रह्माण्ड से हुआ। उसका जन्म स्वायम्भुव या पूर्ण विश्व से हुआ। स्वायम्भुव का निर्माता तत् या वह सविता है।
कर्ता रूप विष्णु-तत् सविता दीखता नहीं है। उसकी सृष्टि में क्रिया हो रही है वह दीखती है, जिसे समझ सकते हैं। भर्गो (तेज वाले) देवस्य धीमहि। विष्णु का प्रत्यक्ष रूप हमारा सूर्य है।
ज्ञान रूप शिव- यह हमारी बुद्धि (धी) को प्रेरित करता है- धियो यो नः प्रचोदयात्।
अन्य देवों के भी इस प्रकार के रूप हैं-
ब्रह्मा-(१) स्रष्टा रूप अव्यक्त ब्रह्म, (२) दृश्य ७ लोक, (३) शब्द ज्ञान रूप वेद।
विष्णु- (१) सृष्टि की इच्छा, (२) जीवन दाता सूर्य, (३) व्यक्तिगत चेतना रूप।
शिव- (१) श्वो-वसीयस या शून्य में स्थित मन, (२) गति, तेज का अनुभव रुद्र, (३) शान्त ज्ञान रूप शिव।
हनुमान- (१) पहले जैसी सृष्टि करने वाला वृषाकपि, (२) गति रूप मारुति, (३) बुद्धि रूप मनोजव। तीनों प्रकार से यह शिव का अवतार रूप है।
देवी रूप-ये चण्डी पाठ के ३ चरित्र हैं।
स्रष्टा रूप महाकाली = मूल अव्यक्त अन्धकारमय विश्व, जिसमें काल का भी आभास नहीं था। विश्व का पुनः उसी में लय होता है।
क्रिया रूप महालक्ष्मी- दृश्य जगत् लक्ष्मी है। लक्ष = देखना (लक्ष दर्शनाङ्कनयोः-धातु पाठ, १०/५, १०/१६४)।
ज्ञान रूप-महासरस्वती-जिसकी गणना की जा सके वह गणपति है-स्थूल जगत्। जिसकी गणना नहीं हो सके वह रसवती रूप सरस्वती है।
५. दारु ब्रह्म-जगन्नाथ ६ अर्थों में दारु ब्रह्म हैं-(१) चेतन तत्त्व, (२) निरपेक्ष द्रष्टा, (३) निर्माण क्रम, (४) निर्माण सामग्री और आधार, (५) सदा बढ़ने वाला, (६) संकल्प-क्रिया फल का अनन्त क्रम।
निर्माण सामग्री और आधार-ब्रह्म वनं ब्रह्म स वृक्ष आसीत् यतो द्यावा पृथिवी निष्टतक्षुः।
मनीषिणो मनसा विब्रवीमि वो ब्रह्माध्यतिष्ठद् भुवनानि धारयन्॥ (तैत्तिरीय ब्राह्मण, २/८/९/१६) 
निर्माण का अधिष्ठान, आरम्भ और विधि-
किं स्विदासीदधिष्ठानमारम्भणं कतमत्स्वित् कथासीत्।
यतो भूमि जनयन् विश्वकर्मा वि द्यामौर्णोन् मह्ना विश्वचक्षाः॥ (ऋक्, १०/८१/२, तैत्तिरीय संहिता, ४/६/२/११) 
सर्वोच्च द्रष्टा-यस्मात् परं नापरमस्ति किञ्चित्, यस्मान्नाणीयो न ज्यायोऽस्ति कश्चित्।
वृक्ष इव स्तब्धो दिवि तिष्ठत्येनेदं पूर्णं पुरुषेण सर्वम्॥ (श्वेताश्वतर उपनिषद्, ३/९) 
गुण, वासना, कर्म, फल का अनन्त क्रम-
अधश्चोर्ध्वं प्रसृतास्तस्य शाखा गुणप्रवृद्धा विषयप्रवालाः। 
अधश्च मूलान्यनुसन्ततानि कर्मानुबन्धीनि मनुष्यलोके॥ (गीता, १५/२)
प्राण, चित्त, वासना-द्वे बीजे चित्तवृक्षस्य प्राणस्पन्दनवासने। 
एकस्मिँश्च तयोः क्षीणे क्षिप्रं द्वे अपि नश्यतः (मुक्तिकोपनिषद्, २/२७)
ब्रह्म के ३ रूपों का निर्देश गायत्री मन्त्र के ३ पादों में है-सृष्टि रूप ब्रह्मा, क्रिया रूप विष्णु, ज्ञान रूप शिव। इनके प्रतीक हैं-पलास, अश्वत्थ, वट।
अश्वत्थरूपो भगवान् विष्णुरेव न संशयः। रुद्ररूपो वटस्तद्वत् पलाशो ब्रह्मरूपधृक्॥ (पद्मपुराण, उत्तर खण्ड, ११५/२२)
६. विष्णु रूप अश्वत्थ- अश्वत्थः सर्व वृक्षाणां (गीता, १०/२६)-कई रूप में अश्वत्थ विष्णु रूप है-(१) इस पर अनेक पक्षी आश्रय लेते हैं, जैसे पूर्थ्वी पर जीव गण, (२) इसके गोल बीजों में कण समान छोटे बीज हैं, जैसे ब्रह्माण्ड में कण रूप तारा आदि। (३) सूक्ष्म बीज से बड़ा अश्वत्थ बन जाता है, जैसे सूक्ष्म सङ्कल्प से अनन्त विश्व, (४) पिप्पल का छोटा बीज पत्थर, दीवाल आदि में भी जम जाता है, जैसे हर स्थिति में जीव हो जाते हैं। (५) वृक्ष नष्ट होने पर उसी के काष्ठ से अन्य पीपल उगने लगता है, एक कल्प के अन्त होने पर अन्य कल्प। (६) रोग नाशक।
अश्वत्थे वो निषदनं पर्णे वो वसतिष्कृता। (ऋक्, १०/९७/५)। 
यस्मिन् वृक्षे मध्वदः सुपर्णा निविशन्ते चाधिविश्वे। तस्येदाहुः पिप्पलं स्वाद्वग्रे तन्नोन्नशद्यः पितरं न वेद॥ (ऋक्, १/१६४/२२)
अश्वत्थे वो निषदनं पर्णे वो वसतिष्कृता। गो भाज इत् किलासथ यत् सनवथ पूरुषम्॥ (ऋक्, १०/९७/५)
अलाबूनि पृषत्कान्यश्वत्थ पलाशम्। पिपीलिका वटश्वसो विद्युत् स्वापर्णशफो। गोशफो जरिततरोऽथामो दैव॥(अथर्व, २०/१३५/३)
अथ यदनाशकायनमित्याचक्षते ब्रह्मचर्यमेव तदेष ह्यात्मा न नश्यति यं ब्रह्मचर्येणानुविन्दते। अथ यदरण्यायनमित्याचक्षते ब्रह्मचर्यमेव तदरश्च ह वैण्यश्चर्णवौ ब्रह्मलोके तृतीयस्यामितो दिवि। तदैरं मदीयं सरस्तदश्वत्थः सोमसवनः। तदपराजिता पूः ब्रह्मण। प्रभु विमितं हिरण्मयम्। (छान्दोग्य उपनिषद्, ८/५/३) 
७. ब्रह्मा रूप पलास- पलास के हर शाखा से ३ पत्र निकलते हैं-शाखा भी बची रहती है। अतः ब्रह्मा रूप सृष्टि को समझने के लिए वेद में कई प्रकार से (प्रायः ६० वैदिक उल्लेख) त्रिविध विभाजन हैं। हर विभाजन में कुछ छूट जाता है जिससे त्रयी का अर्थ ४ वेद होता है। अविभक्त को अज्ञेय ब्रह्म कहा है (अविभक्तं विभक्तेषु - गीता, १३/१६, १८/२०) । अतः ब्रह्मा को पलास जैसा कहा है और व्रतारम्भ संस्कार में मूल ब्रह्म रूप पलास दण्ड धारण करते हैं। 
यस्मिन् वृक्षे सुपलाशे देवैः संपिबते यमः। अत्रा नो विश्पतिः पिता पुराणां अनु वेनति॥ (ऋक्, १०/१३५/१)
सर्वेषां वा एष वनस्पतीनां योनिर्यत् पलासः। (स्वायम्भुव ब्रह्मरूपत्त्वात्) तेजो वै ब्रह्मवर्चसं वनस्पतीनां पलाशः-ऐतरेय ब्राह्मण, २/१)
ब्रह्म वै पलाशस्य पलाशम् (= पर्णम्)। (शतपथ ब्राह्मण, २/६/२/८)
ब्रह्म वै पलाशः। (शतपथ ब्राह्मण, १/३/३/१९) 
८. शिव रूप वट- शिव का प्रतीक वट है। शिव ज्ञान रूप हैं, गुरु-शिष्य परम्परा का आरम्भ शिव से ही हुआ है। वट शिव का प्रतीक है। इसकी हवाई जड़ भूमि से मिल कर अन्य वृक्ष को जन्म देती है। इसी प्रकार गुरु शिष्य को ज्ञान दे कर अपने जैसा मनुष्य बना देता है। ऋग्वेद में मूल वृक्ष की शाखा से उत्पन्न वृक्ष को द्रुघण या प्रघण (द्वितीय, मिले हुए घने वृक्ष) कहा गया है। यज्ञ रूप शिव का प्रतीक या वाहन वृषभ है, जिसके शृङ्ग, सिर, पाद, हाथ आदि यज्ञ के अङ्ग रूप में वर्णित हैं। लोकभाषा में द्रुघन का दुमदुमा (द्रुम से द्रुम) हो गया है जो हर शिव पीठ में है।
न्यक्रन्दयन्नुपयन्त एन ममेहयन् वृषभं मध्य आजेः। 
तेन सूभर्वं शतवत् सहस्रं गवां मुद्गलः प्रघने जिगाय॥५॥
शुनमष्ट्राव्यचरत् कपर्दी वरत्रायां दार्वानह्यमानः॥८॥
इमं तं पश्य वृषभस्य युञ्जं काष्ठाया मध्ये द्रुघणं शयानम्॥९॥ (ऋक्, १०/१०२/५-८)
वट की शाखा नीचे आकर पुनः उठती है, इस अर्थ में इसे वेद में न्यग्रोध कहा है-
ते यत् न्यञ्चो अरोहन्, तस्मात् न्यङ् रोहति न्यग्रोहः, न्यग्रोहः वै नाम तत् न्यग्रोहं सन्तं न्यग्रोध इति आचक्षते। (ऐतरेय ब्राह्मण, ७/३०)
न्यञ्चो न्यग्रोधा रोहन्ति। (शतपथ ब्राह्मण, १३/२/७/३)
अथर्व वेद में अश्वत्थ, न्यग्रोध आदि का रोगनाशक रूप में वर्णन है-
यत्रा अश्वत्था न्यग्रोधा महावृक्षाः शिखण्डिनः। तत्परेत अप्सरसः प्रतिबुद्धा अभूतन॥ (अथर्व, ४/३७/४)
’प्रतिबुद्धा अभूतन’ जानने, स्मरण रखने अर्थ में है। इस पर सिद्धार्थ की कथा बनी कि उनको पिप्पल के नीचे बैठने से ज्ञान मिला। मस्तिष्क में जो ज्ञान रूपी वृक्ष है, उसके नीचे बैठने से ज्ञान मिलता है। ज्ञान के लिए गुरु रूपी वट के नीचे बैठते हैं, वह वटु (छात्र) या वटुक (छोटा छात्र) है। 
वट-विटप समीपे भूमिभागे निषण्णं, सकल मुनि जनानां ज्ञान-दातारमारात्।
त्रिभुवनगुरुमीशं दक्षिणामूर्तिदेवं, जनन-मरण दुःख-च्छेद दक्षं नमामि॥
चित्रं वट-तरोर्मूले, वृद्धाः शिष्या गुरुर्युवा। गुरोस्तु मौनं व्याख्यानं, शिष्यास्तु छिन्न-संशयाः॥
(दक्षिणामूर्ति उपनिषद्)
बट-वृक्ष की शाखाओं से नये वृक्षों का निर्माण सृष्टि के एक कल्प के बाद नये कल्प के निर्माण जैसा है। निर्माण क्रम शिव हैं, उसके पत्र पर कर्त्ता रूपी बीज श्रीकृष्ण हैं-
करारविन्देन पदारविन्दं, मुखारविन्दे विनिवेशयन्तम्।
वटस्य पत्रस्य पुटे शयानं, बालं मुकुन्दं मनसा स्मरामि॥ 
(ब्रह्म पुराण, ५३/२७-३३, भागवत पुराण, १२/९/२०-२५, विष्णु धर्मोत्तर पुराण, १/७८/१०-२०, स्कन्द पुराण, २/२/३/५-१४ के आधार पर बिल्वमङ्गल रचित बालमुकुन्दाष्टकम्, १) 
९. देवी रूप-(१) काली का प्रतीक नीम वृक्ष है। काली ने रक्तबीज रूप में फैलते वायरस रूप जीवों को खा लिया था। प्रकृति में नीम के पत्ते भी यही करते हैं। महाकाली चरित्र में जगन्नाथ के सुप्त रूप को विष्णु तथा जाग्रत रूप को जगन्नाथ कहा है। अतः जगन्नाथ मूर्ति भी नीम काष्ठ से ही बनतीहै।
(२) लक्ष्मी- विष्णु रूप पीपल के पत्तों में लक्ष्मी का निवास कहते हैं। लक्ष्मी को श्री कहते हैं। २ फलों को श्रीफल कहते हैं-बेल, नारियल। 
(३) सरस्वती-बेल तथा नारियल का शिव से भी सम्बन्ध है। बेल के ३ पत्ते शिव के त्रिशूल या त्रिताप नाशन के प्रतीक हैं। इनसे शरीर का ताप दूर होता है। नारियल का फल मनुष्य के सिर जैसा है, कठोर आवरण में कोमल फल और जल। उसमें सिर जैसी जटा तथा शिव के ३ नेत्र जैसे ३ छेद हैं। बेल का भी बाहरी भाग कठोर है।
१०. भुजा, सिर, आयुध-
(१) विष्णु-सहस्रबाहु-पूर्ण विश्व रूप में १००० सिर, अक्ष (धुरी, आंख), पाद वाला पुरुष (पुरुष सूक्त, १)
चतुर्बाहु-स्वस्तिक चिह्न की ४ दिशायें। ये परस्पर लम्ब क्रान्तिवृत्त के ४ पाद हैं-ज्येष्ठा नक्षत्र का स्वामी इन्द्र, रेवती का पूषा, श्रवण का गोविन्द जो अरिष्ट की नेमि या सीमा (दूर करने वाले) हैं, तथा पुष्य का बृहस्पति। यह जीवन के ४ उद्देश्य (पुरुषार्थ = धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) पूरा करता है-समाज के क्रम (श्रवा) में श्रेष्ठ अर्थात् वृद्धश्रवा इन्द्र की रक्षा में ही धर्म पालन होता है। विश्व को पाने या जानने से हमारी पुष्टि पूषा द्वारा होती है। हमारी इच्छा (काम) गोविन्द से पूरी होती है तथा मोक्ष ज्ञान से होता है जिसका स्रोत बृहस्पति है।
स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवा स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः। 
स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु॥ (यजु, २५/१९)
भास्कराचार्य ने लीलावती में इसकी गणना दिखाई है कि विष्णु की ४ भुजाओं में ४ अस्त्रों-शंख, चक्र, गदा पद्म का विन्यास ४ x ३ x २ x १ = २४ प्रकार से हो सकता है। मुख्य अवतार १० हैं जो असुरों के प्रतिकार के लिए हुए थे, तथा एक अभी बाकी है।
द्विभुज मनुष्य रूप में अवतार-तेनैव रूपेण चतुर्भुजेन सहस्रबाहो भव विश्वमूर्ते (गीता, ११/४६)
आयुध-(१) शंख-शब्द, आकाश का गुण। ध्रुव को ज्ञान की प्रेरणा विष्णु के शंख से हुई थी (विष्णु पुराण, १/१२/४८-५०, भागवत पुराण, ४/९/४-५)। (२) चक्र-सृष्टि के ९ चक्र, अव्यक्त को मिला कर १० सर्ग हैं। ९ सर्गों के ९ कालमान हैं (सूर्य सिद्धान्त, १४/१)। क्रान्ति वृत्त-इस सुदर्शन चक्र से चन्द्र कक्षा २ विन्दुओं पर कटती है, जिनको राहु, केतु कहते हैं। मनुष्य रूप राहु असुर समुद्र मन्थन के बाद विष्णु के सुदर्शन चक्र द्वारा मारा गया था। (३) गदा-युद्ध का सामान्य अस्त्र जिससे व्यूह, शस्त्र आदि काटते हैं। वायु का अस्त्र (गरुड़ पुराण, ३/१२/७९)। सृष्टि के लिए गति, क्रिया-तस्मिन् अपो मातरिश्वा दधाति (ईशावास्योपनिषद्, ४)। (४) पद्म-पृथ्वी, जिस पर पद रखते हैं। पृथ्वी के ३ स्तर-ग्रह पृथ्वी, सौर आकर्षण क्षेत्र, ब्रह्माण्ड या काश्यपी पृथ्वी।
(२) शिव-पञ्चमुख-इसके कई अर्थ हैं-आकाश के ५ पर्व
मण्डल देवता महाभूत
स्वयम्भू ब्रह्मा आकाश
परमेष्ठी विष्णु वायु (गति)
सौर इन्द्र अग्नि
चान्द्र सोम आप
भू अग्नि पृथ्वी
इन महाभूतों का प्रतीक कलश है। इनके प्रतीक माहेश्वर सूत्र के प्रथम ५ वर्ण ( ५ मूल स्वर) हैं, जो नन्दिकेश्वर काशिका के अनुसार सृष्टि आरम्भ के प्रतीक हैं- अ, इ, उ, ऋ, लृ।
आकाश के ५ पर्व या मण्डलों की प्रतिमा मनुष्य शरीर के ५ कोष हैं, जिनके केन्द्र सुषुम्ना के ५ चक्र हैं-विशुद्धि, अनाहत, मणिपूर, स्वाधिष्ठान, मूलाधार। इनके बीज मन्त्र आकाश सृष्टि के ५ मूल स्वरों के सवर्ण अन्तःस्थ वर्ण हैं- हयवरट्। लण् । बीजमन्त्रों का क्रम सृष्टि क्रम से लेने पर स्वाधिष्ठान तथा मणिपूर का क्रम आपस में बदल जाता है। ५ कोष-आनन्दमय, विज्ञानमय, मनोमय, प्राणमय, अन्नमय कोष।
मस्तिष्क के वाम-दक्षिण २-२ भाग, केन्द्र में अघोर। अन्य ४ भाग-ईशान, तत्पुरुष, वामदेव, सद्योजात।
३ अम्बक-३ पृथ्वी और उनके ३ आकाश-तिस्रो मातॄस्त्रीन्पितॄन्बिभ्रदेक ऊर्ध्वतस्थौ नेमवग्लापयन्ति । 
मन्त्रयन्ते दिवो अमुष्य पृष्ठे विश्वमिदं वाचमविश्वमिन्वाम् ॥ (ऋक्, १/१६४/१०)
तिस्रो भूमीर्धारयन् त्रीरुत द्यून्त्रीणि व्रता विदथे अन्तरेषाम् ।
ऋतेनादित्या महि वो महित्वं तदर्यमन् वरुण मित्र चारु ॥ (ऋक्, २/२७/८)
(३) ब्रह्मा के ४ मुख-४ वेद। इसका प्रतीक पलास दण्ड है जिससे ३ पत्ते निकलते हैं। मूल दण्ड = अथर्व, ३ पत्र = ऋक्, यजु, साम।
(४) महाकाली-खड्ग-नाश शक्ति। मुण्ड माला-नष्ट होने वाली सृष्टि। इसे अक्ष माला कहा है, अर्थात् अ से क्ष तक के ५० वर्ण-ये मूलाधार से आज्ञा चक्र तक के पद्मों के दल हैं। अभयमुद्रा-संहार भी समय पर होता है, सृष्टि काल में अभय है। प्रलय काल में अन्धकार है, जिसका रूप कृष्ण वर्ण है। उससे बाहर कुछ नहीं है, इस रूप में दिगम्बर हैं (शिव भी)। प्रलय में लीन विश्व श्मशान है।
(५) दशभुजा दुर्गा और शिव के आयुध-शूलं टङ्क कृपाण वज्र दहनान् नागेन्द्र पाशाङ्कुशान्,
पाशं भीतिहरं दधानममिताकल्पोज्ज्वलाङ्गं भजे। (तन्त्रसार)
१. अभय, २. टङ्क, ३. शूल, ४. वज्र, ५. पाश, ६. खड्ग, ७. अङ्कुश, ८. घण्टा, ९. नाग, १०. अग्नि।
इनका एक अर्थ है कि आकाश या सृष्टि के १० आयाम हैं-रेखा, पृष्ठ, आयतन (स्तोम), पदार्थ (अग्नि), काल, पुरुष (चेतन), ऋषि (रस्सी, पिण्डों के बीच सम्बन्ध), नाग (पिण्डों का आवरण), रन्ध्र (कमी, विषमता), रस या आनन्द (मूल स्रोत, अभय)।
आध्यात्मिक रूप में ये शरीर की स्थिति हैं-जैसे वायु से शूल, अग्नि से टङ्क, जल रोग वरुण का पाश, नाग आदि उपप्राण, अङ्कुश = कांटा, खड्ग (चान्द्र आकार-मानसिक कष्ट), घण्टा (कोलाहल), अग्नि (ज्वलन)।
(६) महासरस्वती की १८ भुजा १८ विद्या की प्रतीक हैं। ललिता सहस्रनाम (२-३) में भूजा तथा बाणों का अर्थ दिया है-
उद्यद् भानु सहस्राभा चतुर्बाहु समन्विता।
राग-स्वरूप पाशाढ्या क्रोधाकाराङ्कुशोज्ज्वला॥२॥
मनोरूपेक्षु कोदण्डा पञ्च तन्मात्र सायका।
निजारुण प्रभापूरमज्जद् ब्रह्माण्ड मण्डला॥३॥
राग = पाश, क्रोध= अङ्कुश, मन = इक्षु धनुष, ५ बाण = ५ तन्मात्रा शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध।
तन्त्र साहित्य में सभी देवियों कॆ आयुध प्रतीकों का विस्तृत वर्णन है।
(७) गणेश-गणनात्मक विश्व गणेष है। जिसकी गणना नहीं हो सके वह ज्ञान सरस्वती है। कण रूप में पिण्डों की संख्या विश्व के प्रत्येक स्तर में १ खर्व है, अतः गणेश को खर्व कहा गया है। 
आकाश में ब्रह्माण्ड संख्या = हमारे ब्रह्माण्ड में तारा संख्या = मनुष्य मस्तिष्क में कलिल संख्या = १ खर्व (शतपथ ब्राह्मण, १२/३/२/५) में इनको लोमगर्त्त कहा है जो १ सेकण्ड का प्रायः ७५,००० भाग है। शतपथ ब्राह्मण (१०/४/४/२) के अनुसार वर्ष में जितने लोमगर्त हैं, आकाश में उतने ही नक्षत्र हैं।
गणेश के गोल पेट का अर्थ है, ब्रह्माण्ड, तारा, ग्रह-सभी प्ण्ड गोल है। उनकी सूंड बायीं तरफ मुड़ने का अर्थ है कि पेंच या टेपी को बायीं तरफ घुमाने पर वह ऊपर उठता है। भौतिक विज्ञान के विद्युत् चुन्मकीय प्रभाव या जाइरोस्कोप के नियम इसी प्रकार हैं।

Friday, 20 March 2026

चंडीपाठ में कवच, अर्गला ,कीलक और कुंजिका स्तोत्र से हवन नहीं करना चाहिए

चंडीपाठ में कवच, अर्गला ,कीलक और कुंजिका स्तोत्र से हवन नहीं करना चाहिए सप्रमाण प्रस्तुति~

यो मूर्ख: कवचं हुत्वा प्रतिवाचं नरेश्वरः ।
स्वदेह - पतनं तस्य नरकं च प्रपद्यते ।।
अन्धकश्चैव महादैत्यो दुर्गाहोम-परायणः ।
कवचाहुति - प्रभावेण महेशेन निपातितः ।।

कवच में पाहि, अवतु, रक्ष रक्ष, रक्षतु, पातु आदि शब्दों का प्रयोग हुआ रहता है।
सप्तशती के चतुर्थ अध्याय के 4 मंत्र से इसी कारण होम नहीं होता है।
#सिद्ध #कुंजिका स्तोत्र का होम न करने की आज्ञा स्वयं महादेव नें दी है
इसका प्रथम कारण है की ,
कुंजिका देवी सिद्धियों की एकमात्र कुंजी है ।
ओर कुंजी का रक्षण किया जाता है आहूत नहीं किया जा सकता ।

यदि यदि कुंजी का ही लोप हो जाएगा तो सिद्धी के द्वार का खुलना असम्भव हो जाएगा ।
दूसरा कारण यह की 
सप्तशती में आता है की याचना स्तोत्र , कवच एवं कवच मन्त्रों की आहुति नहीं की जाती अन्यथा विनाश ही होता है ।
|| अथ प्रमाण ||

#कवचं #वार्गलाचैव ,#कीलकोकुंजिकास्तथा ।
#स्वप्नेकुर्वन्नहोमं #च ,#जुहुयात्सर्वत्रनष्ट्यते: ।।

भगवान शिव भैरव स्वरूप में स्थित होकर कहते हैं ! 
कवच , अर्गला , कीलक , तथा कुंजिका का होम स्वप्न में भी न करें
 स्वप्न मात्र में भी होम करने से सर्वत्र नाश की संभावनाएँ प्रकट हो जाती है ।

#बुद्धिनाषोहुजेत् #देवि,#अर्गलाऽनर्गलोभवेत् ।
#सिद्धीर्नाषगत:#होता, #विद्यां #च #विस्मृतोर्भभवेत् ।।

अर्गला के होमकर्म से सिद्धीयों का नाश हो जाता है । तथा होता की समस्त विद्याएँ विस्मृत हो जाती है , अर्गला अनर्गल सिद्ध हो जाती है ।

#कीलितोजायतेमन्त्र: ,#होमे #वा #कीलकस्तथा ।
#ममकण्ठसमंयस्य: ,#कीलकोत्कीलकं #हि #च ।।

कीलक के होमकर्म से होता के समस्त मन्त्र सदा सर्वदा के लिए कीलित हो जाते हैं ।
इसे मेरा उत्किलित कण्ठ ही जानें जो जो कीलक का कारक है ।
#धनधान्ययुतंभद्रे ,#पुत्र:#प्राण:#विनष्यते: ।
#रोगशोकोर्व्रिते:#कृत्वा,कवचंहोमकर्मण: ।।
कवच के होम से धन,धान्य, पुत्र तथा प्राण का विनाश निश्चित है एवं वह होता रोग तथा शोकों से घिर जाता है ।

स्वप्ने वा हुज्यते देवि ,* *कुंजिकायं च कुंजिकां ।

षड्मासे च भवेन्मृत्यु , सत्यं सत्यं न संशय: ।
होमे च कुंजिकायास्तु ,* *सकुटुम्बंविनाश्यती: ।

कुंजिका के होमकर्म के प्रभाव से होता की छः मास में मृत्यु निश्चित जानें तथा होता का सकूटुंब विनाश हो जाता है यह सत्य है परम सत्य है इसमें कोई संशय नहीं करना चाहिए ।
शास्त्री प्रवीण त्रिवेदी 

■यस्यं च दोषमात्रेण ,प्रसन्नार्मृत्युदेवता: ।
कुंजिकाहोममात्रेण ,रावण:प्रलयंगत: ।।

इसी के दोष से मृत्युदेवता अत्यंत प्रसन्न होकर होता का सकूटुंब भक्षण करते हैं ।

कुंजिका के होममात्र के प्रभाव से ही रावण का सम्पूर्ण विनाश सम्भव हुआ ।

■भैरवयामले भैरवभैरवी संवादे ।।
चतुर्विंश प्रभागे होमप्रकरणे ।।

■मातृका:बीजसंयुक्ता: ,प्राणाप्राणविबोधिनी ।
प्राणदा:कुंजिका:मायां ,सर्वप्राण:प्रभाविनी ।।

कुंजिका में बीज मातृकाएँ उपस्थित हैं ।
प्राण को देविप्राण का बोधप्रदान करती हैं ।
यह प्राणज्ञान प्रदान करने वाली महामाया कुंजिका प्राण को प्रभावित करने वाली हैं ।
।। शक्तियामले शक्तिहोमप्रकरणे ।।

Thursday, 19 March 2026

हिंदू कभी ईद मुबारक नहीं कहें


*हिंदू कभी ईद मुबारक नहीं कहेंगे अगर ये किताब पढ़ लेंगे !* 

_(लेख का आधार और स्रोत- किताब- तुगलककालीन भारत, अनुवादक- सैयद अतहर अब्बास रिजवी, प्रोजेक्ट-अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी, प्रकाशन-राजकमल)_ 

-आपने अक्सर देखा होगा... मुस्लिम काफी उत्सुक रहते हैं कि हिंदू भी उनको ईद मुबारक कहें लेकिन अगर इतिहास के किताबों के पन्नों कों पलटेंगे तो ये पता चलेगा कि हिंदुओं के लिए ईद मुबारक कभी नहीं रही... हिंदुओं के लिए ईद हमेशा विनाशक ही रही है ! 

- मुस्लिम शासन के वक्त भारत में मौजूद मुस्लिम इतिहासकारों ने अपनी किताबों में लिखा है कि ईद के पहले मुस्लिम सुल्तान और बादशाह पूरे अपने इलाकों में काफिर स्त्रियों को पकड़ने का एक अभियान चलाया करते थे । ताकी ईद के दिन उनकी इच्छा के विरुद्ध उनका आनंद ले सकें ! भारत में मराठा शासन आने तक हिंदुओं पर ईद के रोज़ पर ये अत्याचार लगातार चलता रहा ।

- इब्नेबतूता... बद्रेचाच... जियाउद्दीन बरनी जैसे तमाम मध्य कालीन इतिहासकारों ने लिखा है कि हिंदू लड़कियों की लूट और उनकी खऱीद फरोख्त इस तरह हो रही थी कि हिंदू लड़कियां बहुत सस्ते में बिक रही थीं ।

-अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के निर्देशन में लिखी गई किताब... तुगलककालीन भारत में इस अत्यंत क्षोभदायक घटना का जिक्र मिलता है । इस किताब में मुहम्मद बिन तुगलक के समय में हुए मुस्लिम इतिहासकारों के ग्रंथों का हिंदी अनुवाद पेश किया गया है । इसके अनुवादक भी सैयद अतहर अब्बास रिजवी हैं । 

- तुगलककालीन भारत किताब में इब्नेबतूता के यात्रा वृतांत का जिक्र किया है । इब्नबतूता ने अपने यात्रा वृतांत में लिखा है कि जब वो भारत आया तो उसने देखा कि ईद के दिन मुस्लिम सुल्तान अपने दरबार में हिंदू राजाओं और हिंदुओं की अपहरण की गई बेटियों से नृत्य करवाता था । इसके बाद इन हिंदू औरतों को सुल्तान अपने सिपाहियों में जबरन भोग विलास करने के लिए बांट दिया करता था । ये इब्नेबतूता ने लिखा है और अनुवाद सैयद अतहर अब्बास रिजवी का है । यानी ये सब मुसलमान हैं और मुसलमानों ने खुद ही अपनी पोल खोली है । 

-ईद के एक महीने पहले से ही भारी संख्या में हिंदू औरतों की लूट की जाती थी । इब्नेबतूता ने लिखा है कि हिंदू अपनी बहन बेटियों को बचाने के लिए बांस के जंगलों में छुप जाया करते थे । इब्नेबतूता ने लिखा है कि काफिरों के खिलाफ जीत में उसके हाथ काफिर स्त्रियां लगी थीं । इन स्त्रियों के साथ बलात्कार के बाद इब्नेबतूता के बच्चे भी हुए थे ।

-अभी कुछ साल पहले पूरी दुनिया ने देखा था कि कैसे सीरिया और इराक में इस्लामिक स्टेट के मोमिनों ने कुरान की आयत का हवाला देकर यजीदी महिलाओं की मंडियां लगाई थी और उनकी खरीद फरोख्त भी की थी । आतंकियों ने काफिर स्त्रियो के बलात्कार को इस्लाम सम्मत बताने के लिए कुरान की आयतों का हवाला भी दिया था   

- आपने देखा होगा कि जब बंगाल में मुस्लिमों की कठपुतली शासक ममता बनर्जी का राज पश्चिम बंगाल में आया तो हिंदू औरतों के साथ रेप किए गए । तब बहुत सारे हिंदुओं ने अपनी इज्जत बचाने के लिए अपने घरों को छोड़ दिया । बहुत सारे हिंदू परिवारों ने जंगलों में शरण ली ताकी किसी तरह वो बच जाएं और बहुत सारे हिंदुओं ने भागकर असम राज्य में प्रवेश किया था । इतिहास से सबक ना लिया जाए तो इतिहास बार बार खुद को दोहराता है बंगाल में भी यही हो रहा था । 

- मैंने आपको किताब का नाम और अनुवादक का जिक्र कर दिया है... प्रकाशक भी बता दिया है... किताब लाकर पढ़ लें... हिंदुओं पर जुल्म ऐसे ऐसे हुए हैं कि आपको उल्टी आ जाएगी ।

- दिलीप पाण्डेय

भारतीय इतिहास के युग-

भारतीय इतिहास के युग-(१) अन्धकार युग-मनुष्य उत्पत्ति प्रायः ३० लाख वर्ष पुरानी है, पर प्राचीन काल का विवरण उपलब्ध नहीं है। मनुष्य वन में प्रायः पशु जैसा रहते थे ऐसा अनुमान है। वृक्ष की शाखा जैसा घर बनाना आरम्भ हुआ अतः घर को शाला (शाखा जैसा) कहा गया (वायु पुराण, अध्याय ८, ब्रह्माण्ड पुराण, अध्याय १/७)। 
(२) आदि कृत युग-भारत में ऐतिहासिक युग चक्र १२,००० वर्ष का माना गया है जिसमें आगम के अनुसार बीज संस्कार का वर्णन भास्कराचार्य तथा ब्रह्मगुप्त ने किया है (सिद्धान्त शिरोमणि, भू परिधि, ७-८, ब्राह्म-स्फुट सिद्धान्त, सुधाकर द्विवेदी संस्करण, १९०२, मध्यमाधिकार, ६०-६१)। ब्रह्माब्द में पहले १२,००० वर्ष का अवसर्पिणी क्रम तथा उसके बाद उतने ही काल का उत्सर्पिणी क्रम होता है। अवसर्पिणी में सत्य युग ४८००, त्रेता ३६००, द्वापर २४००, कलि १२०० वर्ष के होते हैं। उत्सर्पिणी में विपरीत क्रम में कलि से सत्य युग तक होते हैं। अभी ब्रह्माब्द का तृतीय युग चल रहा है जिसका आरम्भ वैवस्वत मनु के समय से हुआ। वैवस्वत मनु के बाद सत्य, त्रेता, द्वापर की समाप्ति ३१०२ ईपू में हुई, अतः उनका समय १३९०२ ईपू है। अतः आदि कृत युग काल ६१९०२ से ५७१०२ ईपू तक है। इस युग में मणिजा सभ्यता द्वारा खनिज निष्कासन आरम्भ हुआ था तथा उस काल के खानों के अवशेष विश्व भर में मिलते हैं। (वायु पुराण, अध्याय ३१ आदि)
(३) ब्रह्मा काल-ब्रह्माण्ड पुराण (१/२/२९/, १९, ३६, ३७), मत्स्य पुराण (२७३/७७-७८) आदि के अनुसार स्वायम्भुव मनु या मनुष्य ब्रह्मा कलि आरम्भ से २६,००० वर्ष पूर्व हुए थे। अतः २९१०२ ईपू इनके युग की समाप्ति का काल मान सकते हैं। महाभारत, शान्ति पर्व, अध्याय ३४९-३५० के अनुसार ७ मनुष्य व्रह्मा हुए थे। वायु पुराण (९/४६; ३१/३, ५, २९) इनका काल आद्य त्रेता में कहता है (३३१०२-२९५०२ ईपू)।
(४) मन्वन्तर काल-स्वायम्भुव से वैवस्वत मनु तक ७ मनु हुए। ७ सावर्णि मनु भी इनके ही सम्बन्धी थे, अतः इसी काल में वे भी हुए। समान अवधि मानने पर इनका काल है- 
क्रम मनु सावर्णि मनु काल (ईपू)
१ स्वायम्भुव इन्द्र ३३१०२-२९१०२
२ स्वारोचिष देव २९१०२-२६०६२
३ उत्तम रुद्र २६०६२-२३०२२
४ तामस धर्म २३०२२-१९९८२
५ रैवत ब्रह्म १९९८२-१६९४२
६ चाक्षुष दक्ष १६९४२-१३९०२
७ वैवस्वत मेरु १३९०२-८५७६
इस काल में देव-असुर सभ्यता कश्यप से आरम्भ हुई। उस काल में पुनर्वसु नक्षत्र में विषुव संक्रान्ति होती थी, जिसका देवता अदिति है। दिति-अदिति को कश्यप की पत्नियां कहते हैं। अतः शान्ति पाठ में कहते हैं-अदितिर्जातम्, अदितिर्जनित्वम् = अदिति (पुनर्वसु) से संवत्सर आरम्भ हुआ, उसी से अन्त हुआ। यह समय १७,५०० ईपू में था। इसके बाद १० युग = ३६,०० वर्ष तक असुर प्रभुत्व कहा है, जिसके बाद वैवस्वत मनु काल हुआ। (ब्रह्माण्ड पुराण, २/३/७२, वायु पुराण, ९८/५१)
(५) वैवस्वत मनु काल- इनका काल १३९०२ ईपू. में आरम्भ होता है। इनके पिता विवस्वान् ने स्वायम्भुव मनु के पितामह सिद्धान्त के स्थान पर सूर्य सिद्धान्त की ज्योतिष पद्धति निकाली जिसमें १२,००० वर्षों की युग पद्धति बनायी। इस चतुर्युग गणना का आरम्भ यदि ब्रह्मा से होता तो उनसे सत्ययुग का आरम्भ होता, पर विवस्वान् गणना से वे आद्य त्रेता में थे। वेद में भी ब्रह्म सम्प्रदाय के बाद आदित्य सम्प्रदाय का प्रचलन हुआ, जिसका विस्तार योगी याज्ञवल्क्य ने किया। पितामह सिद्धान्त का उद्धार ३६० कलि वर्ष (२७४२ ईपू) में आर्यभट ने किया। आर्यभट को ग्रीक ज्योतिष की नकल दिखाने के लिए उनका समय ३६० के बदले ३६०० कलि किया गया। आज तक वह ग्रीक ज्योतिष गणना नहीं मिली है। वैवस्वत मनु के बाद इस परम्परा में वैवस्वत यम हुए जिनके काल में प्रायः २ युग = ७२० वर्ष तक जल प्रलय रहा। इसका विवरण जेन्द अवेस्ता में है, तथा जगन्नाथ मूर्ति समुद्र में डूबने का उल्लेख ब्रह्म पुराण (४३/७१-७७) में है। विष्णु धर्मोत्तर पुराण (८२/७-८) के अनुसार मत्स्य और राम अवतार के समय पितामह और सूर्य सिद्धान्त दोनों मत से प्रभव वर्ष था। इससे मत्स्य अवतार ९५३३ ईपू और राम अवतार ४४३३ ईपू में हुआ। मत्स्य अवतार के समय जल-प्रलय था, जिसका आधुनिक भूगर्भ शास्त्र का अनुमान भी यही है।
(६) ऋषभ काल-२८ व्यास गणना में यह ११वें हैं (वायु पुराण, २३/११९-२१८, ९८/७१-९१, कूर्म पुराण, ५२/१-१० आदि)। इनका प्रभाव काल ९५८०-८८६० ईपू है। स्वायम्भुव मनु की तरह जल प्रलय के बाद पुनः सभ्यता का आरम्भ करने के कारण इनको स्वायम्भुव मनु का वंशज कहा गया है। इस काल में सूर्य वंश (वैवस्वत मनु का) के राजा इन्द्रद्युम्न ने पुनः जगन्नाथ पूजा आरम्भ की (स्कन्द पुराण, वैष्णव, उत्कल खण्ड, ७/६)। 
(७) इक्ष्वाकु काल-इनका काल १-११-८५७६ ईपू में आरम्भ हुआ (एनी बेसण्ट द्वार तञ्जावुर मन्दिर अभिलेख से उद्धृत)। इस काल में सूर्व वंश का प्रभुत्व आरम्भ हुआ अतः इनको वैवस्वत मनु का पुत्र कहते हैं। इस काल में १२वें व्यास अत्रि द्वारा ज्योतिष गणना और १३वें व्यास नर-नारायण द्वारा वेद विकास हुआ। इस वंश के ककुत्स्थ और मान्धाता का पूरे विश्व में प्रभुत्व था।
(८) परशुराम काल-६७७७ ईपू में बाक्कस के नेतृत्व में यवन आक्रमण हुआ जिसमें सूर्य वंश का राजा बाहु मारा गया। उसके प्रायः १५ वर्ष बाद राजा सगर ने यवनों आदि को दण्डित कर बाहर निकाला तथा समुद्रों पर अधिपत्य किया। ६०० वर्ष बाद परशुराम ने यवनों के सहायक हैहय राज्य का अन्त किया जिसमें बर्मा से इराक तक की जातियों ने उनका सहयोग किया (कामधेनु जातियां)। उनके देहान्त के बाद ६१७७ ईपू में कलम्ब संवत् आरम्भ हुआ जो केरल में अभी तक चल रहा है। इस काल में राम सबसे प्रतापी राजा हुए जिन्होंने राक्षसों का प्रभुत्व समाप्त किया।
(९) चन्द्र वंश उदय-कुरु द्वारा ४०७१ ईपू में हस्तिनापुर में चन्द्र वंश का पुनः उदय हुआ। इस वंश की शाखा में उपरिचर वसु ने मगध में शासन आरम्भ किया। शान्तनु (३३१०-३२५१ ईपू) मुख्य राजा थे जिनके वंशजों में महाभारत युद्ध ३१३९ ईपू में हुआ। उसके बाद युधिष्ठिर का ३६ वर्ष तक विश्व में प्रभुत्व था।
(१०) मगध काल-कलियुग के बाद मगध के राजा सबसे शक्तिशाली थे जिनमें सबसे प्रतापी महापद्म नन्द था। उसने द्वितीय परशुराम की तरह सभी क्षत्रियों के राज्यों पर अधिकार किया। इसके मुख्य राजवंश हैं-
बार्हद्रथ वंश के २२ राजा-३१३८-२१३२ ईसा पूर्व (१००६ वर्ष)-इसमें सरस्वती लोप के बाद पार्श्वनाथ का संन्यास २६३४ ईसा पूर्व, उसके बाद के राजा-(१२) अणुव्रत (२६४८-२५८४ ईसा पूर्व), (१३) धर्मनेत्र (२५८४-२५४९ ईसा पूर्व), (१४) निर्वृत्ति (२५४९-२४९१ ईसा पूर्व), (१५) सुव्रत (२४९१-२४५३ ईसा पूर्व)।
प्रद्योत वंश के ५ राजा १३८ वर्ष-(२१३२-१९९४ ईसा पूर्व)। प्रथम राजा प्रद्योत (२१३२-२१०९ ईसा पूर्व) चण्ड महासेन नाम से प्रसिद्ध था जिसने वत्सराज उदयन को धोखे से पराजित कर दिया था। इस की चर्चा भास के नाटक स्वप्नवासवदत्ता तथा कालिदास के मेघदूत में है।
शिशुनाग वंश के १० राजा ३६० वर्ष तक (१९९४-१६३४ ईसा पूर्व)। सिद्धार्थ बुद्ध इसी काल में हुये (३१-३-१८८७ से २७-३-१८०७ ईसा पूर्व) यह बिम्बिसार (शासन १८५२-१८१४ ईसा पूर्व) से ५ वर्ष छोटे थे तथा उसके पुत्र अजातशत्रु शासन (१८१४-१७८७ ईसा पूर्व) के ८वें वर्ष में मृत्यु हुई। अजातशत्रु के पौत्र उदायि (१७५२-१७१९ ईसा पूर्व) के चतुर्थ वर्ष में गङा के दक्षिण तट पर पाटलिपुत्र बना। उसके पूर्व वह केवल शिक्षा संस्थान के रूप में कुसुमपुर था। भगवान् महावीर सिद्धार्थ बुद्ध से १८ वर्ष बड़े थे (जन्म ११-३-१९०५ ईसा पूर्व, चैत्र शुक्ल १३) तथा निर्वाण बुद्ध के १२ वर्ष बाद १७९५ ईसा पूर्व में)। 
नन्द वंश १०० वर्ष (१६३४-१५३४ ईसा पूर्व)-महापद्मनन्द ८८ वर्ष, उसके ८ पुत्र १२ वर्ष।
मौर्य वंश के १२ राजा ३१६ वर्ष (१५३४-१२१८ ईसा पूर्व)-चन्द्रगुप्त (१५३४-१५००), बिन्दुसार (१५००-१४७२) अशोक (१५७२-१४३६ ईसा पूर्व) इसका समकालीन कश्मीर का राजा अशोक (गोनन्द वंश का ४३वां राजा, १४४८-१४०० ईसा पूर्व) बौद्ध हो गया था जिसके कारण मध्य एसिआ के बौद्धों ने उसका राज्य नष्ट कर दिया।
शुंग वंश के १० राजा ३०० वर्ष (१२१८-९१८ ईसा पूर्व), पुष्यमित्र (१२१८-११५८) अग्निमित्र (११५८-११०८ ईसा पूर्व)
कण्व वंश के ४ राजा ८५ वर्ष (९१८-८३३ ईसा पूर्व)
आन्ध्र वंश के ३३ राजा ५०६ वर्ष (८३३-३०७ ईसा पूर्व) ३२वें राजा चन्द्रश्री का सेनापति घटोत्कच गुप्त ने उसे मारकर उसके पुत्र पुलोमावि को नाममात्र का राजा बनाया तथा अपने पुत्र चन्द्रगुप्त को गुप्तवंश का प्रथम राजा (३२७-३२० ईसा पूर्व) बनाया। इसके काल में सिकन्दर का आक्रमण हुआ। उसके बाद समुद्रगुप्त (३२०-२६९), चन्द्रगुप्त-२ (२६९-२३३ ईसा पूर्व) थे। गुप्त काल के अन्त ८२ ईसा पूर्व के बाद उज्जैन में परमार वंशी विक्रमादित्य का शासन १०० वर्ष (१९ ईसवी तक) रहा। नेपाल राजा अवन्तिवर्मन (१०३-३३ ईसा पूर्व) के काल में पशुपतिनाथ में ५७ ईसा पूर्व में विक्रम संवत् आरम्भ किया। उसी वर्ष कार्त्तिक मास में सोमनाथ में कार्त्तिकादि संवत् आरम्भ हुआ। गुप्तों के वंशज गुजरात के वलभी में शासन करते रहे जिनके अन्त के बाद ३१९ ईसवी में वलभी-भंग शक हुआ।  
शालिवाहन (७८-१३८ ईसवी) ने शकों को परजित कर ७८ ईसवी में शक चलाया। उसके १०वीं पीढ़ी के भोजराज के काल में तृतीय कालिदास पैगम्बर मुहम्मद के समकालीन थे।
(११) मालव गण-विक्रमादित्य काल से १२०० ई तक मुख्यतः ४ अग्निवंशी शासकों का प्रभुत्व रहा-परमार, प्रतिहार, चौहान, चालुक्य। उत्तर भारत में चन्देल, असम के राजा, ओड़िशा तथा दक्षिण में काञ्ची आदि के भी मुख्य राजा थे।
(१२) विदेशी आतंक काल-१२०० से १५२६ ई तक तुर्क अफगान और उसके बाद मुगलों द्वारा भारत में प्रायः ८ करोड़ हिन्दुओं का नरसंहार अकबर के इतिहासकार फरिश्ता के अनुसार हुआ। मन्दिरों, पुस्तकालयों का पूर्ण विनाश हुआ। असम, ओड़िशा, मराठा राज्य इनसे मुक्त रहे। 
(१३) अंग्रेजी लूट-१८०३-१९४७ ई तक। मुस्लिम शासक भारत में विनाश करते थे, अंग्रेज विनाश भी करते थे और बाहर भी सम्पत्ति ले जाते थे।
(१४) आधुनिक काल-१९४७ ई से आरम्भ हुआ। अंग्रेज अपने प्रिय लोगों को शासन दे कर चले गये जो उसी प्रकार विदेशी बैंकों में भ्रष्टाचार की आय जमा करते रहे जो अभी तक जमा है। अब पुनः भारत उद्योग और रक्षा उत्पादन में स्वावलम्बी होने के मार्ग पर है।

Tuesday, 17 March 2026

मनुष्यों में मोह पुरष और माया स्त्री होती है।

मनुष्यों में मोह पुरष और माया स्त्री होती है। 

हमारे शास्त्रों में लिखा है कि पुरष स्थिर और स्त्री अस्थिर होती है। 

माया या स्त्री या शक्ति क्योंकि ऊर्जा का रूप होती है इसलिए ऊर्जा स्थिर नहीं रहती। बल्कि लगातार परिवर्तित होती है एक रूप से दूसरे में ना ही ऊर्जा को स्टोर किया जा सकता है। इसलिए माया या स्त्री या शक्ति जब किसी मोह या पुरष के संपर्क में आती है तो वह पूरे के पूरे मोह या पुरष में व्याप्त हो जाती है और वहां किसी दूसरी माया या स्त्री या शक्ति की उपस्थिति की बर्दास्त नहीं कर सकती यही कारण है सास बहू ननद भाभी आदि के आपसी रंजिश का। 

लेकिन माया तो अंतहीन है इसलिए माया या स्त्री या शक्ति किसी पुरष या मोह में व्याप्त होने के बावजूद भी बाकी संसार में फैलाव बना कर रखती है। 

इसीलिए हमारे शास्त्रों में लिखा है कि माया या स्त्री को कभी गुप्त भेद की बातें नहीं बतानी चाहिए। इसलिए कोई पुरष या मोह किसी भी स्त्री या माया या शक्ति को पूरी तरह से जान नहीं पाता। जबकि माया या स्त्री या शक्ति किसी भी पुरष या मोह में क्योंकि पूरी तरह से व्याप्त होती है इसलिए कोई भी स्त्री या माया या शक्ति उसकी पूरी नस नस से वाकिफ होती है।

इसलिए आप ने देखा होगा जब भी कोई पुरष अपने सामान्य काम काज में व्यस्त होता है तो उसकी पत्नी या गर्लफ्रेंड उसकी कोई ज्यादा परवाह नहीं करती लेकिन जैसे ही वह किसी दूसरी स्त्री या माया या शक्ति से मिलने का कार्यक्रम बनाता है तो उसकी पत्नी या गर्लफ्रेंड चाहे सात समुंदर पार हो उसे उस बात की भनक लग जाती है और वह चाहे फोन पर या खुद एकदम से आपके पास पहुंच जाएगी और आपकी ऐसी तैसी कर के छोड़ेगी। क्योंकि स्त्री या माया या शक्ति का फैलाव अंतहीन होता है।

लेकिन जब यही काम स्त्री या माया या शक्ति खुद करे और किसी दूसरे पुरष या मोह के साथ अंतरंग संबध बना रही हो और उसके पति या मोह या ब्वॉयफ्रेंड का उसी समय फोन भी आ जाए तो वह दूसरे पुरष को दो मिनट चुप रहने को कह कर अपने पति या बॉयफ्रेंड को ऐसी डांट लगाएगी की उसका पति या बॉयफ्रेंड भूल कर भी दूसरी बार यह गलती नहीं करेगा। 
और वापिस घर आ कर ऐसा तगड़ा विक्टिम कार्ड प्ले करेगी कि आप हाथ जोड़ कर माफी मांगने पर मजबूर हो जाएंगे। और कोई पति समझ ही नहीं पाएगा की ऐसा भी हो सकता है। 

पुरष कभी भी स्त्री या माया के असली कारनामों को ना कभी सोच सकता है ना समझ सकता है ना कभी उसे इन बातों का आभास हो सकता है। क्योंकि मोह या पुरष स्थिर होता है। 

अब यही बात लेवल सिस्टम से समझते हैं। पुरष या मोह को शास्त्रों में स्थिर कहा गया है। इसलिए कोई भी पुरष अपने जन्म नक्षत्र और ग्रह स्थिति के अनुसार किसी एक लेवल पर फोकस होता है जबकि स्त्री अपने हार्मोनल साइकिल की वजह से पूरे माह में सभी लेवल्स पर बारी बारी से फोकस बदलती रहती है। और अपने फोकस के हिसाब से किसी एक लेवल पर फोकस्ड पुरष को अपने साथ दूसरे लेवल पर ले के जाना चाहती है और लगातार यह खीचतान जीवन भर चलती रहती है। 

अगर आप में से कोई भी ऐसा पुरष है जो अपने घर में अपनी स्त्री से छुपा कर कोई अपनी वस्तु रख सकता है तो बताएं यह एक एक्सेप्शनल केस होगा। लेकिन स्त्री अपनी पता नहीं कितनी चीजे पूरा जीवन भर पति से छुपा कर पूरे घर में रखती हैं और पति को भनक भी नहीं लगती। कभी आप अपनी पत्नी कि अलमारी को अपनी मर्जी से खोल कर देखो क्या हालत होगी। जबकि आप अपनी जेब भी पत्नी से छुपा कर नहीं रख सकते।

इसी खींचतान से पुरष को कर्म करने की शक्ति प्रदान करती है। और स्त्री या माया या शक्ति अपने अंतहीन फैलाव के कारण समाज में उस पुरष को अन्य लोगों से जोड़े रखती है। चाहे रिश्तों से चाहे दोस्ती से चाहे दुश्मनी से। मतलब माया या स्त्री समाज में एक्शन इंटरेक्शन बनाए रखती है। नहीं तो शक्ति या स्त्री या माया के बिना शिव या पुरष या मोह एक शव ही होता है।

इसलिए स्त्री को सृष्टि का जन्मदाता कहा जाता है। अगर स्त्री या माया ना हो तो संसार रुक जाएगा।

जब मोह या पुरष या शिव या पदार्थ या मैटर या पॉजिटिव आयन और माया या स्त्री या शक्ति या ऊर्जा या नेगेटिव आयन। 

जब एक दूसरे से अलग होते है तो क्या क्या हो सकता है। साधारण भाषा में समझ ले पति पत्नी या गर्लफ्रेंड बॉयफ्रेंड का जब रिश्ता टूटता है।  

जैसा मैने ऊपर ही लिखा है कि माया या स्त्री किसी पुरष या मोह में पूरी तरह समा जाने के बावजूद भी बाकी संसार में अनन्त तक फैली रहती है। इस प्रकार से एक स्त्री या माया किसी पुरष या मोह को बाकी दुनिया के साथ जोड़ कर रखती है चाहे दोस्ती में चाहे दुश्मनी में या किसी दूसरे रिश्तों में। स्त्री या माया किसी पुरष या मोह को एक्शन और इंटरेक्शन में उलझाए रखती है। 

लेकिन जीवन की परिभाषा में किसी भी जीव में स्त्री के जीवन का मूल बायलॉजिकल उद्देश्य संतान उत्पन्न करना होता है ताकि सृष्टि आगे बढ़ती रहे। अब कोई भी स्त्री या माया जब किसी मोह या पुरष से अलग होती है तो यह घटना एक रासायनिक क्रिया की तरह होती है। जब तक एक बॉन्ड पूरा नहीं टूटता और नया नहीं बन जाता तब तक ऊर्जा का इस्तेमाल या निकलना जारी रहता है। 

मतलब स्त्री या माया जब एक मोह या पुरष से पूरी तरह निकल कर किसी दूसरे मोह या पुरष में नहीं चली जाती तब तक कोई ना कोई एक्शन रिएक्शन होता रहता है। यह काम एक झटके में नहीं होता इसको वर्षों भी लग सकते हैं। 

जब तक कोई स्त्री एक पुरष से अलग हो कर दूसरे पुरष से पूरी तरह गहन रूप से शारीरिक और मानसिक संबध नहीं बना लेती या संतान प्राप्त नहीं कर लेती तब तक पहले वाला पुरष या मोह चैन से नहीं जी पाता मतलब उस स्त्री की याद में डूबा रहता है और उदासी भरे गाने सुनता रहता है या मदिरा का करते रहता है। 

जब कोई स्त्री या माया या शक्ति किसी पुरष या मोह के प्रेम में होती हैं तो यह बात सौ प्रतिशत तय है कि वह स्त्री उस पुरष के साथ गहन शारीरिक और मानसिक संबंध बनाने का या फिर संतान उत्पन्न करने का विचार बनाए रखती है। और ऐसे हर प्रेमी जोड़े में यह वचन एक दूसरे के साथ किया जाता है। दोनों मिल कर अपने होने वाले बच्चों कि कल्पना अवश्य करते है। क्योंकि जीवन का मूल बोलॉजिकल उद्देश्य हर जीव का यही होता है अपना वंश आगे बढ़ाने का इसी कारण यह स्त्री पुरष का आकर्षण होता है।

अब जब तक स्त्री पहले पुरष से अलग होकर जब तक दूसरे पुरष से गहन क्षणों का मिलन या संतान उत्पन्न नहीं कर लेती तब तक पहले वाला पुरष उस स्त्री से मानसिक रूप से जुड़ा रहता है । चाहे उनकी आपस में बातचीत हो या ना हो। वे एक दूसरे की स्थिति और विचार सिर्फ अपनी कल्पनाओं में ही पता लगा लेते है।

अगर सालों से बिछड़े ऐसे जोड़े अगर कभी मिल जाएं तो आपस में नज़रें भी नहीं मिला पाते। लेकिन मन ही मन एक दूसरे से बातें कर लेते हैं।

इससे उन दोनों में ऊर्जा का आदान प्रदान होता है। 

इसलिए ऐसे बिछड़े प्रेमी जोड़े को एक दूसरे के लिए प्रार्थना करनी चाहिए कि वे जल्दी से समागम के गहन क्षणों में उतरे या फिर जितना जल्दी हो संतान उत्पन्न कर लें। ताकि ये मोह और माया का एक्शन रिएक्शन समाप्त हो सके। या किसी व्यक्ति को चाहिए कि ऐसे एक्शन रिएक्शन से बचने के लिए वह अपना फोकस माया स्त्री या शक्ति के साथ गहन क्षणों पर केंद्रित करे। 

इस प्रक्रिया में महीनों या कभी कभी वर्षों भी लग सकता है।

आज बस इतना ही......