Monday, 12 October 2026

सवर्ण ब्राह्मण

अभी मेरे पास कंफर्म स्रौत नही है मगर सुनने में आ रहा है कि बम्बई में देवेन्द्र फडणवीस सरकार मराठों को आरक्षण देने जा रही हैं। यदी ये सही है तो बम्बई में भी 73 फीसदी ओबीसी आरक्षण विस्तार के बाद आरक्षण हो जाएगा।

मध्य प्रदेश में 100 करोड़ भारतीय रूपये केवल 73 प्रतिशत आरक्षण को माननीय उच्च न्यायालय में डिफेंड करने के लिए बहा दिया गया है। ये पैसा मोहन यादव या गरीब माँ के बेटे नरेद्र मोदी अपने घर से लाये थे ?

पटना में आरक्षण 65 प्रतिशत करने के कारण कोर्ट में लताड़े गये थे। अभी मध्य प्रदेश में 73 प्रतिशत आरक्षण देने के कारण कोर्ट में लताड़े गये हैं। अब बम्बई में भी लताड़े ही जायेंगे।

मित्रो पहला ऐतिहासिक दृष्टि से पक्ष ये है कि बम्बई में 13 में से 10 मुख्यमंत्री इधर मराठे ही हुए हैं। मनोहर जोशी , देवेन्द्र फडणवीस ब्राह्मण हैं और उद्धव ठाकरे कायस्थ थे। आईएएस में ब्राह्मणो और कायस्थों के बाद तीसरी सबसे अधिक प्रतिनिधित्व मराठो का ही है । 

दूसरा ऐतिहासिक पक्ष बहुत मजबूर और बेबस होकर बता रहा हूँ क्युकी भाजपा और कांग्रेस दोनो (आगे आप समझ गई होंगे ) हैं।
भारत मे पहली यूनिवर्सिटी कलकत्ता में 1910 में बनी थी। पहली महिला डॉक्टर कोई शायद तिवारी थी। इंजीनियर भी पहला ब्राह्मण था। हाँ मगर पूरी जिम्मेदारी से बता रहा हूँ कि केवळ डॉक्टर इंजीनियर ही नही यूनिवर्सिटी से नही निकले थे, आगे नेता, पत्रकार और क्रांतिकारी भी निकले थे इसलिए भद्रलोक बोला जाता है।

यही कारण है कि गरम दल के फेश पंडित बाल गंगाधर तिलक, नरम दल के गोपाल कृष्ण गोखले, संघ के संथापक डॉ हेडगेवार या जनसंघ/बीजेपी के फाउंडर डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी या 24 कैरट सुद्ध दक्षिणपंथी हिन्दू महासभा के वीर सावरकर आदी सभी ब्राह्मण थे। एक भी आपको गैर ब्राह्मण नही मिलेगा। इवन समाजवाद और साम्यवाद में भी यही हाल था। 

सही बात है कि पंडित नेहरू ही केवल भारत नही है मगर 14 साल से 16 साल के जो अमर शहीद क्रांतिकारी फाँसी पर चढ़े थे चाहे घोष हो या कोई और, ब्राह्मण और कायस्थ छोड़के तीसरी जाति के लिए आपको चैट GPT और गूगल जैमिनी का सहारा जरूर लेना पड़ेगा। 

भारत के पहले अमर शहीद क्रांतिकारी चाफेकर बंधु हैं या मंगल पांडेय हैं, इसमें इतिहासकारो में मतभेद हैं मगर मेरी बात इरफान हबीब और रोमिला थापर जैसे वामपंथी इतिहासकार भी नही काट पाएंगे कि वो ब्राह्मण ही थे। 

शायद इसी बात के लिये हमें सरकार दंड दे रही है क्युकी जब बाकी बिलों में छुपे हुए थे तो यहाँ युवा फाँसी पर चढ़कर देश को जगाने का कार्य कर रहे थे।

अब एकदम खुल्लम खुल्ला हो रहा है। कोई शोषित वंचित का एंगल भी नही दिया जा सकता है। अब सँख्याबल की ब्लैकमेलिंग शुरू हो चुका है और ये बस यही तक नही रुकेगा। 

हम तुर्को से भी लड़े थे, अंग्रेजो से भी लड़े थे और अब इन काले अंग्रेजो से भी लड़कर जीतेंगे। इलेक्ट्रॉनिक और प्रिंट दोनो मीडिया पूरी तरीके से मैनेज हैं। जैसे ही कंफर्म होगा मैं अपडेट करूँगा, जैसे UGC और मध्य प्रदेश पर किया था। ये भी कयास है मगर जहाँ चिंगारी होती हैं, वही आग भी लगता है, एक कहावत तो आपने सुनी भी होगी।

जय भवानी जय शिवाजी महाराज।

Saturday, 10 October 2026

RSS ब्राह्मण ज्योति फुले और आर्य

संघ के एकात्मता स्तोत्र में फुले, ठक्कर बापा तथा अम्बेडकर की स्तुति है जो सनातन धर्म के विरोधी थे। 
सुभाषः प्रणवानन्दः क्रान्तिवीरो विनायकः
ठक्करो भीमरावश्च फुले नारायणो गुरुः ॥३०॥
संघशक्तिप्रणेतारौ केशवो माधवस्तथा
स्मरणीयाः सदैवैते नवचैतन्यदायकाः ॥३१॥
ज्योतिबा फुले की पुस्तक गुलामगिरी के अनुसार ब्राह्मण मूल भारतीय नहीं थे। वे बाहरी (आर्य) थे, जो लगभग ३०००-३५०० वर्ष पहले भारत आए। फुले ने लिखा कि ये लोग ईरान क्षेत्र (आर्यावर्त के बाहर) से आए और यहाँ के मूल निवासियों (शूद्र-अतिशूद्र) पर अधिकार जमाया। उन्होंने मनुस्मृति जैसी व्यवस्थाओं के माध्यम से सामाजिक वर्चस्व स्थापित किया। यह स्पष्ट रूप से इसाई मत के प्रचार के लिए भारत विरोधी कहानी थी, जिसका प्रचार अशिक्षितों के माध्यम से किया गया। आज तक किसी भी ग्रीक, इरानी या भारतीय साहित्य में आर्यों के बाहर से आगमन का कोई उल्लेख नहीं मिला है। खानों में काम करने के लिए अफ्रीका से मजदूर आये थे जिनके वंशज भारत के खनिज क्षेत्रों में बसे हुए हैं। उनका चेहरा देखने से ही अफ्रीकी मूल स्पष्ट है। आज भी उनकी उपाधियां वही हैं, जो ग्रीक भाषा में खनिजों के नाम हैं। किन्तु बाहरी लोगों को मूल निवासी तथा मूल निवासियों को बाहरी बना दिया। हिरण्यगर्भ सूक्त में स्पष्ट लिखा है-यस्य विश्वे हिमवन्तो महित्वा (ऋक्, १०/१२१/६)-भारत के हिमालय का ही वर्णन है। केवल भारत की नदियों का ही उल्लेख है। फुले ने अंग्रेज गुरुओं से भी अधिक झूठ का प्रचार किया कि केवल ब्राह्मण बाहर से आये थे। यह मूर्खता तथा झूठ की सीमा है। केवल ब्राह्मणों का समाज १ दिन भी नहीं चल सकता है। उनके भोजन के लिए खेती कौन करेगा, घर कौन बनायेगा, पानी के लिए कुंआ कौन खोदेगा? ब्राह्मण समाज स्वयं ही नहीं जीवित रह सकता, दूसरों को कैसे पराजित कर सकता है? उनकी नकल में चितपावन अपने को ग्रीक, शाकद्वीपी अपने को मिस्र, आस्ट्रेलिया या दक्षिण यूरोप का बता रहे हैं, जहां इसका कोई उल्लेख नहीं है कि केवल ब्राह्मणों का समाज वहां था।

दधीचि. मनुष्य दधीचि

दधीचि
१. मनुष्य दधीचि-
च्यवन मुनि तथा उनकी पत्नी सुकन्या के पुत्र आत्मवान् तथा दधीचि थे (ब्रह्माण्ड पुराण, २/३/१/९३, वायु पुराण, ६५/९०) अन्यत्र इनको अथर्वा एवं चित्ति का पुत्र दध्यङ् या अन्य नाम अश्वशिरा कहा गया है (भागवत पुराण, ४/१/४२) वैराजक कल्प में वैराज मनु से दधीचि की उत्पत्ति हुई, उसके बाद गायत्री ने उनकी कामना की जिससे स्निग्ध स्वर की उत्पत्ति हुई। (वायु, पुराण, २१/४१) यह आधिदैविक वर्णन लगता है। दधीचि की पत्नी सरस्वती से सारस्वत नामक पुत्र हुआ (ब्रह्माण्ड पुराण, २/३/१/९३)। अन्यत्र इनकी पत्नी का नाम गभस्तिनी कहा है (ब्रह्म पुराण, २/४०/५)। गभस्तिमान् भारत के ९ खण्डों में सबसे पूर्व का खण्ड गभस्तिमान (पपुआ-न्यूगिनी) था, किन्तु यहां की नदी गभस्ति को अग्नि या शक द्वीप (आस्ट्रेलिया) में कहा है (मत्स्य पुराण१२२/३४, विष्णु पुराण, २/४/६६)। संभवतः उनकी पत्नी वहां की होगी। अन्य पत्नीसुवर्चा या सुभद्रा से पिप्पलाद का जन्म हुआ जिनके नाम से अथर्व वेद की पिप्पलाद संहिता है (शिव पुराण, ३/२४, स्कन्द पुराण अध्याय, ७/१/३१+)
दधीचि के विषय में सबसे प्रसिद्ध कथा है कि वृत्र असुर के वध के लिए इन्होंने इन्द्र को अपनी अस्थियां दी थी, जिनसे वज्र बना (पद्म पुराण, १/१९/७५, ब्रह्म पुराण, २/४०/५, भागवत पुराण, ६/१०, विष्णु धर्मोत्तर पुराण, १/२०७/२३, स्कन्द पुराण अध्याय, ६/८)। अन्य मुख्य कथा है कि इन्होंने दक्ष यज्ञ में शिव की पूजा करने के लिए कहा था, तथा नहीं होने पर वहां से निकल गये थे (कूर्म पुराण अध्याय, १/१५, वायु पुराण, ३०/१०२, शिव पुराण, २/२/२७, स्कन्द पुराण, ४/२/८७/६८)। स्वश्रेष्ठता विवाद में इनकी राजा क्षुब से पराजय हुई थी। मृत्युञ्जय मन्त्र से अमरता की प्राप्ति हुई। क्षुब के समर्थन में आये विष्णु को भी पराजित किया (शिव पुराण, २/२/३८-३९)। 
२. आध्यात्मिक अर्थ-
डॉ. फतह सिंह-आनन्दमय कोश के आनन्द को पय: या दुग्ध कहते हैं। जब इस पय: या आनन्द का विज्ञानमय कोश में अवतरण होता है तो यह विकृत होकर दधि बन जाता है । वहां जो जीवात्मा इस दधि को धारण करता है उसे दध्यङ्ग कहते हैं। जब यह जीवात्मा विज्ञानमय से निचले - मनोमय, प्राणमय और अन्नमय स्तरों पर दधि रूपी आनन्द बिखेरता है तो वह दधिक्रावा अश्व कहलाता है । दध्यङ्ग ही पुराणों का दधीचि ऋषि है । वह जीवात्मा जो दधिक्रा - दधि से युक्त है, उसकी अस्थियों से वज्र बनता है । अस्थि अर्थात् अस्ति । वज्र: - वर्जनात्, अर्थात् जो अहंकार की वर्जना करता है ।
रसो वै पयः (शतपथ ब्राह्मण, ४/४/४/८, ७/३/१/४६)-सं ते पयांसि (वाज. यजु, १२/११३)
(अग्निः) तां (गां) सम्बभूव तस्यां (गवि) रेतः प्रासिञ्चत् तत् पयो अभवत् (शतपथ ब्राह्मण, २/२/४/५)
तस्मात् प्रथम दुग्धं (पयः) उष्णं भवति अग्नेः हि रेतः (शतपथ ब्राह्मण, २/२/४/१५)
समानजन्म वै पयस्य हिरण्यं च-उभयं हि अग्नि रेतसम् (शतपथ ब्राह्मण, ३/२/४/८)
(इन्द्रः) यत् अब्रवीत्, हिनोति, मेति तस्मात् दधि (शतपथ ब्राह्मण, १/६/४/८)
ऐन्द्रं वै दधि (शतपथ ब्राह्मण, ५/२/४/१३)
इन्द्रियं वै दधि (तैत्तिरीय ब्राह्मण, २/१/५/६)
सोमो वै दधि (कौषीतकि ब्राह्मण, ८/९)
सरस्वत्यै दधि (शतपथ ब्राह्मण, ४/२/५/२२)
देवपवित्रं वै दधिक्रा (ऐतरेय ब्राह्मण, ६/३६)
अन्नं वै दधिक्रा (गोपथ ब्राह्मण, उत्तर, ६/१६)
दध्यङ् वा आङ्गिरसो देवानां पुरोधानीय आसीत् (ताण्ड्य महाब्राह्मण, १२/८/६)
वाक वै दध्यङ् आथर्वणः (शतपथ ब्राह्मण, ६/४/२/३)-वाज. यजु, ११/३३
दधि-
(इन्द्रः) यद् अब्रवीत्, हिनोति, मेति तस्मात् दधि (शतपथ ब्राह्मण, १/६/४/८)
ऐन्द्रं वै दधि (शतपथ ब्राह्मण, ७/४/१/४२)
अथ यद् अनडुह्यै वहलाया ऽऐन्द्रं दधि भवति, त इन्द्रस्य चतुर्थो भागः (शतपथ ब्राह्मण, ५२/४/१३)
इन्द्रियं वै दधि (तैतिरीय ब्राह्मण, २/१/५/६)
इन्द्रियं वा एतत्, अस्मिन् लोके यत् दधि (ऐतरेय ब्राह्मण, ८/१९)
३. आधिदैविक अर्थ-
सृष्टि का मूल स्रोत रस था जिसकी अनुभूति से आनन्द मिलता है, अतः उसे आनन्द भी कहते हैं।
यद् वै तत् सुकृतं, रसो वै सः। रसं लब्ध्वा आनन्दी भवति (तैत्तिरीय उपनिषद्, २/७/२)
यह रस सदा आकाश में बना रहता है, अतः अमृत है। इसका चतुर्थ भाग विश्व बनता है, जो बनता और नष्ट होता रहता है। रस से द्रप्स (बुद्बुद्, बुलबुला, अंग्रेजी में drops) जैसा मुक्त हुआ अतः उसे मुच्यु या परोक्ष में मृत्यु कहते हैं। द्रप्स के अलग होने को स्कन्न (स्कन्द) भी कहते हैं। 
पादोऽस्य विश्वा भूतानि, त्रिपादस्यामृतं दिवि (पुरुष सूक्त, वाज. यजु, ३१/३)
द्रप्सश्चस्कन्द प्रथमाँ अनु द्यूनिमं च योनिमनु यश्च पूर्वः॥ (ऋक्, १०/१७/११, वाज. यजु, १३/५)
यस्ते द्रप्सः स्कन्दति॥१२॥ (ऋक्, १०/१७/१२)
स समुद्रात् अमुच्यत स मुच्युः अभवत्, तं वा एतं मुच्युं सन्तं मृत्युः इति आचक्षते। (गोपथ ब्राह्मण, पूर्व, १/७)
मूल स्रोत स्वयम्भू, परमेष्ठी (ब्रह्माण्ड, गैलेक्सी) अपेक्षाकृत स्थायी तथा अमृत हैं। उसमें अस्थायी सूर्य मृत है जिसका तपने से क्षरण हो रहा है। उस अमृत परमेष्ठी में सूर्य अपने ग्रहों (सौरमण्डल = रथ या सरीर) के साथ परिक्रमा कर रहा है।
एष एव मृत्युः । य एष (सूर्यः) तपति (शतपथ ब्राह्मण, २/३/३/७)
आकृष्णेन रजसा वर्तमानो, निवेशयन् अमृतं मर्त्यं च।
हिरण्ययेन सविता रथेन देवो याति भुवनानि पश्यन्॥ 
(ऋग्वेद, १/३५/२, वाज यजु, ३३/४३, तैत्तिरीय सं, ३/४/११/२)
ब्रह्माण्ड में नक्षत्रों का समूह दधि जैसा ठोस कणों से युक्त है, अतः वह दधि है। उसका आवरण उसे शक्ति देता है, वह मधु है। ब्रह्माण्ड का समुद्र घृत या सरस्वती है। अमावास्या रात्रि में यही दीखता है, अतः सरस्वती को अमावास्या भी कहा है।
रेतो वै घृतम् (शतपथ ब्राह्मण, ९/२/३/४४)
रेतः सिक्तिः वै घृतम् (कौषीतकि ब्राह्मण, १६/५)
सरस्वत्यै दधि, मित्रावरुणयोः पयस्या (शतपथ ब्राह्मण, ४/२/५/२२)- ब्रह्माण्ड का आदित्य = वरुण, सौर मण्डल का आदित्य = मित्र। 
अमावास्या वै सरस्वती (गोपथ ब्राह्मण, उत्तर, १/१२)
घृत अलग होने पर मधु बचता है-परमो रसो यत् मधु (शतपथ ब्राह्मण, ११/५/४/८)
परमं वा एतद् अन्नाद्यं यत् मधुः (ताण्ड्य महाब्राह्मण, १३/११/१७)
निर्माण क्रम-रस = अमृत। द्रप्स रूप ब्रह्माण्ड = घृत। उसमें निर्माण क्रिया = मधु। नक्षत्र समूह = सरस्वती या दधि।
४. सौर मण्डल-
इसका बाह्य आवरण अमृत है, जो सदा बना रहता है। इसके भीतर गैस पिण्ड घृत हैं। ग्रहों में सौर ऊर्जा से गति, जीवन धारण आदि मधु है। सौर ऊर्जा के प्रयोग को मधु विद्या कहा गया है। (छान्दोग्य उपनिषद्, अध्याय ३, खण्ड १) ठोस ग्रहों का क्षेत्र दधि है, जिसमें पृथ्वी सबसे बड़ी है और हमारा लोक है। पुराणों में मंगल कक्षा को ही दधि-समुद्र कहा गया है, पृथ्वी से देखने पर मंगल कक्षा वलयाकार दीखेगी, जिसका आकार दधि समुद्र कहा है।
दधि ह एव अस्य लोकस्य रूपम्, घृतं अन्तरिक्षस्य, मधु अमुष्य (शतपथ ब्राह्मण, ७/५/१/३)
५. इन्द्र का वज्र- 
वैदिक मन्त्र है कि दधीचि की हड्डियों से इन्द्र का वज्र बना, जिससे इन्द्र ने वृत्रों का सामना किया, ९९ को मारा।
इन्द्रो दधीचो अस्थभिर्वृत्राण्यप्रतिष्कुतः। जघान नवतिर्नव॥
(ऋग्वेद, १/८४/१३, अथर्व सं २०/१४/१, सामवेद, १/१७६, २/२६३, मैत्रायणी सं. २/१३/६, १५४/१०, काण्व सं. ३९/१२, तैत्तिरीय ब्राह्मण, १/५/८/१)
इन्द्र का आयुध वज्र है। इन्द्र आकाश में ऊर्जा है, 
दध्यङ् या आङ्गिरस देवों के पुरोधा (अग्रणी, पुरोहित) थे।
दध्यङ् वा आङ्गिरसो देवानां पुरोधानीय आसीत् (ताण्ड्य महाब्राह्मण, १२/८/६)
(यजु, ११/३३) वाक् वै दध्यङ् आथर्वणः (शतपथ ब्राह्मण, ६/४/२/३) = अग्नि का प्रवाह अङ्गिरा (अंगारा) है। उसका वाक् (आकाश गुण) या क्षेत्र दध्यङ् आथर्वण है। इन धामों के प्राण देव हैं। इस अर्थ में देवों का आरम्भ दध्यङ् से होता है। अथर्व = ब्रह्म (बिना थर्व या कम्पन। 
महाभारत, सभा पर्व, (२४/१९), शान्ति पर्व (१५/१५) में भी इन्द्र द्वारा वृत्र या ९९ असुरों का वध का वर्नन है। इन्द्र जैसी महानता दिखाने के लिए बौद्ध ग्रन्थ दिव्यावदान में भी मौर्य अशोक द्वारा अपने ९९ भाइयों की हत्या कर राजा बनने का उल्लेख किया है।
मनुष्य रूप में देवराज इन्द्र द्वारा वृत्र के वध के लिए दधीचि की हड्डी का कोई उपयोग नहीं था। हड्डी से कठोर पत्थर बिना प्रयास मिल जाते हैं। इस कथा का अनुकरण कर इतिहास में प्रस्तर युग से पूर्व अस्थि-युग की कल्पना की गयी है। जयशंकर प्रसाद ने भारत-महिमा काव्य (चन्द्रगुप्त नाटक, द्वितीय अंक) में इसका अस्थि युग के इतिहास के रूप में वर्णन किया है-
सुना है दधीचि का वह त्याग, हमारी जातीयता विकास। 
पुरन्दर ने पवि से है लिखा, अस्थि-युग का मेरा इतिहास॥
वज्र का अर्थ है विद्युत्-स्फुलिंग। 
ह्रादिनी वज्रं अस्त्रीः स्यात् कुलिशं भिदुरं पविः। शतकोटिः स्वरुः शंबो दम्भोलिः अशनि द्वयोः॥ 
(अमर कोष, १/१/४२-इन्द्र वज्र के नाम)
स्फुर्जथुः वज्र निर्घोषे, मेघज्योतिः इरम्मदः। (अमरकोष, १/३/१०)
यह विद्युत् स्फुलिंग से प्रहार का यन्त्र था-या आज ले लेजर गन जैसा। इसका मनुष्य की हड्डी से कोई सम्बन्ध नहीं है।
सौर मण्डल में सूर्य का विकिरण इन्द्र है, जहां तक इसका विकिरण अन्धकार रूपी वृत्र को दूर करता है, वज इन्द्र का वज्र है जो धाम का आच्छादन करता है।  यह ३३ धाम तक है। मनुष्य के मेरुदण्ड में भी ३३ जोड़ हैं, इस अर्थ में यह मेरुदण्ड जैसा है। त्रिष्टुप् छन्द के ३ चरणों में ३३ अक्षर हैं, अतः इसे त्रिष्टुप् भी कहा गया है।
वज्रो वै त्रिष्टुप् (शतपथ ब्राह्मण, ७/४/२/२४)
वज्रो वै शरः (शतपथ ब्राह्मण, ३/१/३/१३, ३/२/१/१३)
वज्रो वै वषट्कारः (शतपथ ब्राह्मण, १/३/३/१४, ऐतरेय ब्राह्मण, ३/८, कौषीतकि ब्राह्मण, ३/५, गोपथ ब्राह्मण, उत्तर, ३/१, ५) = सौर मण्डल के ३३ धाम ६ भाग में विभक्त हैं, जिनको वषट्कार कहते हैं। ३० धाम तक सूर्य की वाक् (प्रभाव) है जहां तक उसका प्रकाश अधिक है (वि-राजते)
त्रिंशद् धाम वि-राजते। वाक् पतङ्गाय धीयते। प्रति वस्तोः अह द्युभिः॥ (ऋक्, १०/१८९/३)
वाक् वै षट्, ऋतवो वै षट् --- (शतपथ ब्राह्मण, १/७/२/२१)
एष एव वषट्कारो य एष (सूर्यः) तपति (शतपथ ब्राह्मन, १/७/२/११, ११/२/२/५ आदि)
३ धाम पृथ्वी के भीतर तथा पृथ्वी से आरम्भ कर अगले धाम क्रमशः २-२ गुणा बड़े हैं।
पृथिव्यामिमे लोकाः (पृथ्वी, अन्तरिक्ष, द्यौ)प्रतिष्ठिताः(जैमिनीय ब्राह्मण उपनिषद्, १/१०/२)
द्वात्रिंशतं वै देवरथाह्न्यन्ययं लोकस्तं समन्तं पृथिवी द्विस्तावत्पर्येति तां समन्तं पृथिवीं द्विस्तावत्समुद्रः पर्येति..... (बृहदारण्यक उपनिषद्, ३/३/२)
अन्तो वै त्रयस्त्रिंशः परमो वै त्रयस्त्रिंश स्तोमानाम्। (ताण्ड्य महाब्राह्मण, ३/३/२)
संवत्सरो वाव प्रतिष्ठा त्रयस्त्रिंशः (वाज. यजु, १४/२३, शतपथ ब्राह्मण, ८/४/१/२२)-१ संवत्सर में प्रकाश जितनी दूर जाता है, वहां तक सौर मण्डल है (१ प्रकाश वर्ष त्रिज्या)
त्रयो वै वषट्कारा वज्रो धामच्छदरिक्तः (ऐतरेय ब्राह्मन, ३/७, गोपथ ब्राह्मण, उत्तर, ३/३)
३३ धाम के प्राण ३३ देव हैं। प्रति धाम में ३-३ असुर हैं, जो इन्द्र रूपी किरण, प्रकाश, ऊर्जा को रोकते हैं
घेरने वाला अन्धकार वृत्र है-
वृत्रो ह वा इदं सर्वं वृत्वा शिश्ये। (शतपथ ब्राह्मण, १/१/३/४)
पाप्मा वै वृत्रः ( शतपथ ब्राह्मण, १/६/३/९)
नमुचि दिन-रात, शुष्क-आर्द्र आदि का भेद मिटा कर छिप जाता है।
अपां फेनेन नमुचेः शिर इन्द्रोदवर्तयः, विश्वा यदजयः स्पृधः (ऋक्. ८/१४/१३), 
पाप्मा वै नमुचिः (शतपथ ब्राह्मण, १२/७/३/४) 
इन्द्रश्च वै नमुचिश्चासुरः समदधातान्न नौ नक्तान्न दिवाहनन् आर्द्रेण न शुष्केणेति तस्य व्युष्टायामनुदित आदित्ये अपां फेनेन शिरो अछिनत् (ताण्ड्य महाब्राह्मण, १२/६/८)
बल वह है जो बलन करे-मोड़ दे। भौतिक विज्ञान में यह बल की परिभाषा है-जो वस्तुओं की गति या दिशा बदल दे। जिस दिशा में कार्य होना है, वह नहीं हो पाता। बल के कारण कई पिण्ड साथ बन्ध जाते हैं (सह) या शव जैसे निष्क्रिय हो जाते हैं।
बलं वै सहः (शतपथ ब्राह्मण, ६/६/२/१४)
बलं वै शवः (यजु, १२/१०६, १८/५१)-शतपथ ब्राह्मण (७/३/१/२९, ९/४/४/३) 
इन्द्र वज्र से ये ३ x ३३ = ९९ असुर मारे जाते हैं। 
६. दधिवामन-
(१) शालग्राम शिला-जिस शालग्राम शिला में २ छोटे चक्र हों-
अतिक्षुद्रं द्विचक्रं च नवीनजलदप्रभम्। दधिवामनाभिधं ज्ञेयं गृहीणां च सुखप्रदम्॥६३॥
(ब्रह्मवैवर्त्त पुराण, प्रकृति खण्ड, २१/६३)
(२) विष्णु का एक रूप-विष्णु के १० नामों में एक जिनके जप से मनुष्य नीरोग रहता है-
विष्णुं नारायणं कृष्णं माधवं मधुमूदनम् ।
हरिं नरहरिं रामं गोविन्दं दधिवामनम्॥४६॥
भक्त्या चेमानि नामानि दश भद्राणियो जपेत् ।
शतकृत्यो भक्तियुक्तो जप्त्वा नीरोगतां व्रजेत्॥४७॥ 
(ब्रह्मवैवर्त्त पुराण, श्रीकृष्ण जन्म खण्ड, अध्याय ८२)
दधिवामन संज्ञोऽहं भक्तानां दधिभक्तदः। यन्नामस्मरणादेव न दरिद्रो नरो भवेत्॥१९९॥
(स्कन्द पुराण, काशी खण्ड, अध्याय ६१)
(३) सुन्दर रूप-वामन-वाम = सेवनीय, धन, वननीय (निरुक्त, ६/३१, ऋक्, ४/३०/३४)
वामदेव-ज्ञान दाता-भुवो ऽविता वामदेवस्य धीनाम् (ऋक्, ४/१६/१८)
महादेव-वामदेवो महादेवः विरूपाक्शः त्रिलोचनः (अमर कोश, १/१/३२)
(४) शरीर का केन्द्र-सौर मण्डल का सूर्य का शरीर है। उसका केन्द्र सूर्य उससे बहुत छोटा अर्थात् वामन है। मंगल तक ठोस ग्रहों का क्षेत्र भी सौर मण्डल की तुलना में बहुत छोटा है, वह दधिवामन है। यह सूर्य केन्द्र से १९ अहर्गण पर है, अतः १९ अंश उत्तर अक्षांश पर ओड़िशा में दधिवामन मन्दिर हैं।
मनुष्य शरीर रूपी रथ में उसकी आत्मा वामन है, जिसके दर्शन से मुक्ति होती है। इसका भौतिक रूप रथ यात्रा में रथ पर स्थित वामन रूप जगन्नाथ का दर्शन है। इसे ३ प्रकार से देखते हैं- (क) क्रिया रूप यज्ञ-यह दिन-मास या वर्ष के चक्र में होता है, जो दोलन है। यज्ञ का प्रतीक गो है, उसका पालन कर्ता जगन्नाथ गोविन्द हैं।
(ख) हमारा विश्व पृथ्वी रूपी मञ्च पर स्थित है, जो मधु-कैटभ के मेद से बनी। इस रूप में जगन्नाथ मधुसूदन अर्थात् मधु को मारने वाले हैं। मधु निकट लाता है, अर्थात् आकर्षण क्रिया, कैटभ अवाञ्छित या कटु को दूर करता है।
(ग) विश्व या शरीर के प्राण रूपी आत्मा सूक्ष्म आत्मा या वामन हैं। 
पुर = नगर या कोई भी रचना, मनुष्य शरीर।
अष्टाचक्रा नवद्वारा देवानां पूरयोध्या (अथर्व, १०/२/३१)
नवद्वारे पुरे देही हंसो लेलायते बहिः।
वशी सर्वस्य लोकस्य स्थावरस्य चरस्य च॥ (श्वेताश्वतर उपनिषद्, ३/१८)
गतिशील पुर को रथ कहा है-
आत्मानं रथिनं विद्धि, शरीरं रथमेव तु। बुद्धिं तु सारथिं विद्धि, मनः प्रग्रहमेव च॥३॥
इन्द्रियाणि हयानाहुर्विषयांस्तेषु गोचरान्। आत्मेन्द्रियमनोयुक्तं भोक्तेत्याहुर्मनीषिणः॥४॥
(कठोपनिषद्, १/३/३-४)
= शरीर रथ है, इसका रर्थी या स्वामी आत्मा है। बुद्धि सारथी या चालक है, जो मन रूपी प्रग्रह (पगहा, रस्सी) से इन्द्रिय रूपी अश्वों को नियन्त्रित कर रहा है। इन्द्रिय तथा मन द्वारा आत्मा इसका उपभोग कर रहा है।
ऊर्ध्वं प्राणमुन्नयत्यपानं प्रत्यगस्यति। मध्ये वामनमासीनं विश्वे देवा उपासते॥।३॥
(कठोपनिषद्, २/२/३)
रथ यात्रा का वर्णन स्कन्द पुराण, वैष्णव खण्ड, उत्कल खण्ड, अध्याय ३३ में है। इस सम्बन्ध में एक प्रसिद्ध श्लोक प्राचीन कोषों शब्द कल्पद्रुम तथा वाचस्पत्यम् में रथ शब्द के अर्थ में उद्धृत है। इस तरह के कुछ महत्त्वपूर्ण श्लोकों को बाद के पुराण संस्करणों से निकाल दिया गया जो १८९० ई तक थे।
दोलायमानं गोविन्दं मञ्चस्थं मधुसूदनम्। रथस्थं वामनं दृष्ट्वा पुनर्जन्म न विद्यते। 
= जो दोलायमान गोविन्द को, मञ्च स्थित मधुसूदन को, तथा रथ में स्थित वामन को देखता है, उसका पुनर्जन्म नहीं होता।
(घ) दधि वामन शरीर का ठोस आधार अस्थि है, जो दधीचि के आध्यात्मिक अर्थ में कहा गया है।

Friday, 9 October 2026

प्रेमानंद महाराज रसिक बिहारी

पीलू बाबा के प्रवचन किसको लुभाते है ????? 
       ये एक बडा सवाल है । और क्यों पीलू मशहूर हुआ ???? पीलू ने लवगुरू बनकर प्रेम की वो महिमा गाई कि पूछो ही मत । 

रसिक बनो , निकुंज मे प्रेमी का सहचरी संग प्रेमालाप ही प्रेम है । रस , भाव , सहचरी , रसिक , सौंदर्य ,राधा का नाप जपे जाओ । इसने लफंडर स्त्री एवं पुरूषो को प्रेम नाम पर एक स्वछंदता पर मुहर लगा दी ।     
     लंपट स्त्री-पुरूष अपने विवाहेत्तर और विवाह पूर्व के सेक्सुअल आकर्षण वाले रिश्ते को प्रेम कहकर उसकी स्वीकार्यता पर मचल उठे । बचा खुचा काम आज के Oyo होटलो ने पूरा कर दिया । 

          चारो तरफ राधे ही राधे गूँज रहा है । जो जितना चरित्रहीन , कुंठित और Sex deprived वो उतना ही कुटिलतापूर्वक राधे राधे जपता है । 

          कहाँ ले जा रहा था रे बाबा इस समाज को ??? चोदन पीटन और प्रेम के नाम पर , Oyo कल्चर की तरफ ?????

   बस जपते रहो राधे राधे , सौंदर्य , रस , भाव , छवि , आकर्षक , मोहक , प्रेम मे विछोह , दुख , तकलीफ । साले नपुंसको का समाज तैयार करने का इरादा था क्या ????

     शोर्य , दृढता , वीरता , दुशमनो का बेदर्दी से संहार , पुरूषार्थ , दिलेरी , वीरोचित अभिमान , जैसा एक भी शब्द आज तक इसके मुँह से नही निकला । 

     ये समाज का कोढ , माला फेरते , पुरूषार्थ विहीन , कमजोर मनोवृति के लगातार नाम रटन्तू जाॅम्बियो की फौज बनाने निकला था वीरभूमि ब्रज और पूरे देश को । 

          कुल मिलाकर इसकी पूरी बकचोदियो का सार निकाला जाये तो क्या दिया है ,पिछले दो ढाई साल मे देश और समाज को ?????

          राधा सबसे बडी शक्ति है ,जबकि वो एक काल्पनिक चरित्र है । 

दूसरा , बस नाम चपते रहो , नाम जपते जाओ । बीच मे कभी अढैया नाम के बालक की झूठी कहानी , तो कभी श्रंगार , प्राण प्यारी , सुंदर रूप , रसिक और रसिया , प्रियतमा और सहचरी । बस प्रेम के नाम पर सात खून माफ । 

       साला सगे भाईयो , मौसी की बेटी बेटो , चचेरी बहन , ताऊ की बेटी , पडोसन , विवाहेत्तर संबंधो को आतुर रसिक प्रवृति के लोगो को सामाजिक मान्यता दिलाने को ही प्रयासरत दिखा ये पीलूराम । सारी नौटंकी राधा के नाम पे । 

एक सच्ची घटना सुनो , मेरी कंपनी का एक हवलदार था । नोएडा -टप्पल क्षेत्र का । साले ने जयहिंद बोलना छोडकर , जब देखो राधे राधे । 

         राधे राधे भी बडी कुटिल टाईप मुस्कान के साथ , सिर झुकाकर बोले । हर कोई साले को नाम रखे ,मगर कुत्ते की पूँछ सीधी हो जाये तो फिर पूँछ ही कैसी ????

   उसकी इसी नौटंकी से किलसकर , मैने उसे कशमीर से दिल्ली मे अपनी एक कंपनी मे भेज दिया ।  

   भाई की 60 लाख रूपये की ताजा ताजा जमीन बिकी थी । दिल्ली मे अपनी सगी साली की युवा मगर विधवा बेटी को , किराये के कमरे मे रखकर लुगाई बना लिया और उसे फोर्स करो कि तू मेरे नाम का सिंदूर लगा । 

            साढू और साली समझते रहे कि , मौसा बेचारी लडकी की मदद कर रहा है । बीवी भी कुछ ना कहे । 

    वो लडकी भी पक्की खिलाडी निकली , मौसा तो हफ्ते मे एक दिन आकर चढता था , बाकी टाईम मे वो अपने यार बुला लेती , इसको भनक लगती , आगबबूला होता , मारपीट करता , फोन चैक करता । 

        इतना नीच इंसान की उसी भाँजी के साथ अंतरंग वीडियो काॅल करता , और आस पास ड्यूटी करते नये जवानो को दिखाता । उन जवानो पर ताना मारता कि सालो थू है तुम्हारी जवानी पे , जवानी कच्छे मे ही सूख रही है । 

         नंगे भद्दे वीडियो सबको दिखाता उसे अपनी गर्लफ्रैंड बताता ,जबकि थी उसकी सगी भाँजी । 

         एक दिन उस लडकी ने बलात्कार की कंपलेन कर दी अपने किसी दूसरे यार के कहने पर । ये फौरन दिल्ली से भागकर , कशमीर मे प्रकट हुआ । वही लुच्चो की तरह हर बात मे राधे राधे । 

   माँ के मरने का बहाना बनाकर तुरंत छुट्टी भागने को आतुर । मै भी साले की बातो मे आ गया । 

        सुबह से छुट्टी मिकला , शाम को कोर्ट के अरेस्ट वारंट सहित दो दिल्ली पुलिस के सब इंस्पेक्टर हाजिर । मेरे आफिस मे बैठकर पूरा वृतांत सुनायै तो मेरे भी हाथो के तोते उड गये । हावांकि उसकी भाव-भंगिमा पर शक तो पहले से था । 

          ये भाई साहब , 15 दिन की छुट्टी गये तो फिर लौटकर नही आये , कई महीनो बाद कोर्ट मे सेरेंडर किया । एक गढवाली लेडीज I.O. थी 12 लाख उसको चढाये , 40 लाख का फ्लैट उस प्रेयसी को दिलवाया । 2024 तक तो साल जेल मे ही था । इधर विभाग ने Removed from service कर दिया । बिल्कुल मेरी आँखो देखी और भुगती हुई स्टोरी है । उसके बाद मै भी चंडीगढ चला आया । पता नही फिर उस हराम के पिल्ले का क्या बना । 

आप भी अपने आस पास जरा नजर दौडा कर देखिये , बात बात मे हद से ज्यादा , कुटिलता के साथ मुस्कुरा कर राधे -राधे बोलने वाले , ज्यादातर सैक्स मैनियाक , कुंठित , ठरकी , वासना मे डूबे हुए , और लंपट लोग ही मिलेंगें । 

        मेरा अनुभव तो ऐसा ही है , आप लोगो का पता नही ।

बली बली परंपरा

आज धर्मपत्नी जी ने पूछा की क्या ब्राह्मण को बलि देना चाहिए.......... बलि हेतु शास्त्र प्रमाण उपलब्ध है क्या???

जो यह कहते हैं कि ब्राह्मण के लिए बलि नहीं वह भी उचित नहींं #आगमिक #ब्राह्मण जो कि #शाक्त हैं उन्हें तो #बलि देनी चाहिए, #वैदिको को भी #चण्डी को #कूष्माण्ड तो देना ही चाहिए.........
#ब्राह्मणेनमाषादिमिश्रान्नेनकूष्माण्डेनवाकार्यं, 
धर्मसिन्धु निर्णयसिन्धु में ब्राह्मणों को माषादि मिश्रित अन्न वा कुष्माण्ड देने को कहा है। अत: यहां जो #कुलपरम्परा से प्राप्त हो वह उचित है। #ब्राह्मण को पशु का #स्वयं #बलि 
हेतु घात न कर #क्षत्रियादि से घात करवाना चाहिए......

#शास्त्रवचनानि...............

तद् यथैवादाे मनुष्यराज अागते अन्यस्मिन् वा अर्हति उक्षाणं वा वेहतं वा क्षदन्ते-- #ऋग्वेद-एेतरेयब्राह्मण ३।४ ।

स्वाहा च्छागम् अश्विभ्यां स्वाहा मेषं सरस्वत्यै स्वाह ऋषभम् इन्द्राय स्वाहा--#माध्यन्दिनीय-शुक्ल-यजुर्वेदसंहिता २१।४०

यदश्वस्य क्रविषाे मक्षिकाश यद् वा स्वराै स्वधिताै रिप्तमस्ति ।
यद्धस्तयाेः शमितुर्यन्नखेषु सर्वा ता ते अपि देवेष्वस्तु ।। #ऋग्वेदसंहिता १।१६२।९, मा. शुक्लयजुर्वेदसंहिता २५।३२

ये वाजिनं परिपश्यन्ति पक्वं य ईमाहुः सुरभिर् निर्हरेति । 
ये चार्वतो मांसभिक्षामुपासत उतो तेषामभिगूर्तिर् न इन्वतु॥-- #ऋग्वेदसंहिता १।१६२।१२, मा. शुक्लयजुर्वेदसंहिता २५।३५

यन्नीक्षणं माँस्पचन्या उखाया या ते पात्राणि यूष्ण अासेचनानि 
उष्मण्या पिधानाश् चरूणामङ्काः सूनाः परिभूषन्त्यश्वम् ।।-- #ऋग्वेदसंहिता १।१६२।१३, मा. शुक्लयजुर्वेदसंहिता २५।३६

चतुस्त्रिंशद् वाजिनाे देवबन्धाेर् वङ्क्रीरश्वस्य स्वधितिः समेति।
अच्छिद्रा गात्रा वयुना कृणाेत परुष्परुरनुघुष्या विशस्त ।।-- #ऋग्वेदसंहिता १।१६२।१८, मा. शुक्लयजुर्वेदसंहिता २५।४१

न वा उ एतन् म्रियसे न रिष्यसि देवाँ इदेषि पथिभिः सुगेभिः ।
हरी ते युञ्जा पृषती अभूताम् उपास्थाद् वाजी धुरि रासभस्य ।।-- ऋग्वेदसंहिता १।१६२।२१, मा. शुक्लयजुर्वेदसंहिता २५।४४
मांसाैदनं पाचयित्वा सर्पिष्मन्तमश्नीयातामीश्वराै जनयितवा अाैक्ष्णेन वार्षभेण वा ।
-- शुक्लयजुर्वेद-शतपथब्राह्मण-बृहदारण्यकाेपनिषद् ६।४।१८ 

मांसमिश्रमाेदनं मांसाैदनम् तन्मांसनियमार्थमाह अाैक्षेण वा मांसेन, उक्षा सेचनसमर्थः पुङ्गवस्तदीयं मांसम्, ऋषभस्तताेऽप्यधिकवयास्तदीयमार्षभं मांसम्-- शङ्करभगवत्पादकृत बृहदारण्यकाेपनिषद्वृत्ति ६।४।१८

छागाेस्रमेषाः पश्वभिधानाद् यथालिङ्गम् ।-- 
    कात्यायनश्राैतसूत्र २०।७।१९
मृतम् ब्राह्मणान् भाेजयेत् ।--कात्यायनश्राैतसूत्र २३।४।२३
न अमांसाे मधुपर्काे भवति--ऋग्.अाश्वलायनगृह्यसूत्र १।२४।२६

न अमांसः अर्घः भवति अधियज्ञमधिविवाहम् -- 
#ऋग्. काैषीतकिगृह्यसूत्र २।१५
एतावद् गाेरालम्भनस्थानम् अतिथिः पितराे विवाहश् च--कृष्णयजु. अापस्तम्बगृह्यसूत्र ३।१०

न अमांसाे मधुपर्क इति श्रुतिः--कृष्णयजु.मानवमैत्रायणीय गृह्यसूत्र १।९।२२
न त्वेव अमांसः अर्घः स्याद् अधियज्ञमधिविवाहम् कुरूतेत्येव ब्रूयात् --शुक्लयजु. #पारस्करगृह्यसूत्र १।३।२९-३० ।

न अलाेहिताे मधुपर्काे भवति--अथर्व.-काैशिकगृह्यसूत्र ९२।१६
भक्ष्याै तु धेन्वनडुहाै मेध्याै वाजसनेयके विज्ञायते ।--वसिष्ठधर्मसूत्र १४।४६

धेन्वनडुहयाेर् भक्ष्यं मेध्यमानडुहमिति वाजसनेयकम् ।-- अापस्तम्बधर्मसूत्र १।५।३।३०-३१

यज्ञशिष्टं मांसं भक्षणीयम् ।--वैखानसगृह्यसूत्र ९।१५, वैखानसधर्मसूत्र २।१५

नियुक्तस् तु यतिः श्राद्धे दैवे वा मांसमुत्सृजेत् ।
यावन्ति पशुराेमाणि तावन् नरकमृच्छति।।--वसिष्ठधर्मसूत्र ११।३४
अभक्ष्याे ग्राम्यकुक्कुटः अभक्ष्याे ग्राम्यशूकरः, गम्यत एतदारण्याे भक्ष्य इति ।
--पाणिनीयव्याकरण अष्टाध्यायी-पातञ्जलभाष्य पस्पशाह्निक ।
शमिता च शब्दभेदात् ।--जैमिनीयधर्ममीमांसासूत्र ३।७।२८
वङ्क्रीणां तु प्रधानत्वात् समासेनाऽभिधानं स्यात् प्राधान्यमध्रिगाेस्तदर्थत्वात् ।-- जैमिनीयधर्ममीमांसासूत्र ९।४।८
अश्वस्य चतुस्त्रिंशत् तस्य वचनाद् वैशेषिकम् ।--जैमिनीयधर्ममीमांसासूत्र ९।४।१७

वनिष्ठुसन्निधानेन उरूकेण वपाभिधानम् ।--जैमिनीयधर्ममीमांसासूत्र ९।४।२२

अशुद्धमिति चेन्न शब्दात् ।--बादरायणीय ब्रह्ममीमांसासूत्र ३।१।२५

मधुपर्के च यज्ञे च पितृ-दैवतकर्मणि ।
अत्रैव पशवाे हिंस्या नाऽन्यत्रेत्यब्रवीन् मनुः ॥
एष्वर्थेषु पशून् हिंसन् वेदतत्त्वार्थविद् द्विजः ।
अात्मानं च पशुं चैव गमयत्युत्तमां गतिम् ॥
#मनुस्मृति, अध्याय ५ श्लाेक ४१-४२

मांसाशनं ये कुर्वन्ति तैः कार्यँ पशुहिंसनम्।
महिषाऽजवराहाणां बलिदानं विशिष्यते॥
देव्यग्रे निहता यान्ति पशवः स्वर्गमव्ययम्।
न हिंँसा पशुजा तत्र निघ्नतां तत्कृतेऽनघ॥
#देवीभागवतमहापुराण, स्कन्ध ३ अध्याय २६ श्लोक ३२ तथा ३३ ।

अामन्त्रितश् च यः श्राद्धे दैवे वा मांसमुत्सृजेत् ।
यावन्ति पशुराेमाणि तावन् नरकमृच्छति ।।
पद्मपुराण, स्वर्गखण्ड ५६।४२

न किञ्चिद् वर्जयेच् छ्राद्धे नियुक्तस्तु द्विजाेत्तमः । 
न मांसं प्रतिषेधेत न चान्यस्यान्नमीक्षयेत् ।।
कूर्ममहापुराण २।२२।६७

हविष्यान्नेन वै मासं पायसेन तु वत्सरम् ।
मात्स्य-हारिणकाैरभ्र-शाकुन-च्छाग-पार्षतैः।।
एेण-राैरव-वाराह-शाशमांसैर्यथाक्रमम्।
मासवृद्ध्यापि तुष्यन्ति दत्तैरिह पितामहाः ।।
#गरुडमहापुराण १।९९।३७-३८

पञ्च पञ्च नखा भक्ष्या ब्रह्म-क्षत्रेण राघव ।
शल्यकः श्वाविधाे गाेधा शशः कूर्मश्च पञ्चमः ।। #वाल्मीकिरामायण ४।१७।३७ (३९)

पञ्च पञ्च नखा भक्ष्या ब्रह्म-क्षत्रस्य वै विशः ।
यथा शास्त्रं प्रमाणं ते माऽभक्ष्ये मानसं कृथाः ।।
#महाभारत शान्तिपर्व १४१।७०

विधिना वेददृष्टेन तद् भुक्त्वेह न दुष्यति ।
यज्ञार्थे पशवः सृष्टा इत्यपि श्रूयते श्रुतिः ।।
#महाभारत अनुशासन पर्व ११६।१४

पशुहिंसादिसम्बन्धे यज्ञे तुष्यन्ति हि द्विजाः ।
तेभ्य एव हि यज्ञेभ्यः शाक्याः क्रुध्यन्ति पीडिताः ।।
-- मीमांसकशिराेमणि कुमारिलभट्टपाद, #जैमिनीय-धर्ममीमांसाशास्त्र-वार्त्तिक

यदि ह्यनादरेणैषां न कल्प्येताऽप्रमाणता ।
अशक्यैवेति मत्त्वाऽन्ये भवेयुः समदृष्टयः ।।
शाेभा-साैकर्य-हेतूक्ति-कलिकालवशेन वा ।
यज्ञाेक्तपशुहिंसादित्यागभ्रान्तिमवाप्नुयुः ।।
#कुमारिलभट्टपादकृत जैमिनीयधर्मीमांसातन्त्रवार्तिक
शाक्याेक्ताऽहिंसनं धर्माे न वा? धर्मः श्रुतत्वतः ।
न धर्माे नहि पूतं स्याद् गाेक्षीरं श्वदृताै धृतम् ।।
माधवाचार्यकृत जैमिनीयन्यायमाला
अथैकदा पितुः श्राद्धे इक्ष्वाकुः सुतमादिशत् ।
मांसमानीयतां मेध्यं विकुक्षे गच्छ मा चिरम् ।।--भागवत ९।९।६
चरन्तं मृगयां क्वापि हयमारुह्य सैन्धवम् ।
घ्नन्तं ततः पशून् मेध्यान् परीतं यदुपुङ्गवैः ।।--भागवत १०।६९।३५

                       

Tuesday, 6 October 2026

ध्यान

(Re-Posted after 10years) (केवल नये साधकों के लिए) 
भ्रूमध्य का स्थान अवधान का भूखा है ---
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यह मेरा व्यक्तिगत विचार भी है और चैतन्य में भगवती का आदेश भी है| हर साधक को नित्य अनंत असीम रूप में अपनी चेतना का विस्तार कर परमशिव का ध्यान और अर्थ सहित गीता के पाँच श्लोकों का पाठ क्रमशः नित्य अवश्य करना चाहिए| जब परमात्मा से प्रेम हो जाए तब भ्रूमध्य में परमात्मा के प्रियतम रूप का ध्यान करना चाहिए| बलात् प्रयास विफल होंगे| जब ह्रदय में प्रेम और समर्पण का भाव होगा तभी सफलता मिलेगी| ब्रह्ममुहूर्त का समय ध्यान के लिए सर्वश्रेष्ठ है|
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शुद्ध स्थान पर उचित वातावरण में ऊनी आसन बिछाकर पूर्व या उत्तर की ओर मुंह कर के सुख से बैठ जाएँ| कमर सीधी रहे| गुरु रूप परमात्मा को प्रणाम कर उनसे मार्गदर्शन और सहायता की प्रार्थना कीजिये| फिर गुरु-प्रदत्त विधि से ध्यान करें| जिन्हें गुरु लाभ नहीं मिला है, वे अपने इष्ट देव/देवी से या भगवान श्रीकृष्ण से प्रार्थना करें| भगवान श्रीकृष्ण सब गुरुओं के गुरु हैं| उनसे की गई प्रार्थना का उत्तर निश्चित रूप से मिलता है|
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कुछ प्राणायाम करें और कमर सीधी रखते हुए देह को तनाव रहित शिथिल छोड़ दें| कमर सीधी रहे इसके लिए नित्य दिन में दो बार पश्चिमोत्तानासन का अभ्यास करें| इस से जीवन भर कमर सीधी रहेगी, कभी नहीं झुकेगी| सूर्य-नमस्कार का नित्य अभ्यास भी शरीर को स्वस्थ रखेगा| भ्रूमध्य में एक प्रकाश के कण की कल्पना कर के उसे समस्त अनंतता में फैला दें और यह भाव करें कि मैं यह देह नहीं बल्कि वह अनंतता हूँ, स्वयं परमात्मा ही इस देह से साँस ले रहे हैं और वे ही ध्यान कर रहे हैं| हम तो उनके एक उपकरण मात्र हैं| जो विचार आयें उन्हें आने दो, जो जाते हैं उन्हें जाने दो| तटस्थ रहो| सब कामनाओं को तिरोहित कर दो|
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सर्वाधिक महत्व इस भाव का है कि हम क्या हैं, इस भाव का अधिक महत्व नहीं है कि हम क्या कर रहे हैं| हम परमात्मा के प्रेम और उनकी अनंतता हैं, न कि यह देह| गुरु-प्रदत्त बीज मंत्र का या प्रणव का जप करो, फिर उसे सुनने का अभ्यास करते रहो| जितना हमारे ह्रदय में प्रभु के प्रति प्रेम होगा उतनी ही तीब्र गति से हम आगे बढ़ते रहेंगे और उसी अनुपात में परमात्मा से सहायता प्राप्त होगी| अजपा-जप का अभ्यास करें| इस युग के लिए यही सर्वश्रेष्ट आरंभिक साधना है|
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रात्रि को सोने पूर्व भी गहन ध्यान करें फिर परमात्मा की गोद में निश्चिन्त होकर सो जाएँ| दिन का आरम्भ भी भगवान के ध्यान से करें, और पूरे दिन उन्हें स्मृति में रखें| भूल जाएँ तो याद आते ही फिर स्मरण करना आरम्भ कर दें| आरंभ में यह भाव रखो कि हम सब कुछ भगवान के लिए कर रहे हैं, फिर भगवान को ही कर्ता बनाकर जीवन की नौका उन्हीं के हाथों में सौंप दो|
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हमारा आचरण सद आचरण हो, यह सबसे महत्वपूर्ण बिंदु है| यदि हमारे आचरण में शुद्धता नहीं रही तो आसुरी शक्तियाँ हमारे ऊपर अधिकार करने का पूरा प्रयास करेंगी| यदि जीवन में पवित्रता नहीं है तो ध्यान साधना का अभ्यास मत करें| इससे लाभ की बजाय हानि ही होगी|
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कुछ लोग पूछते हैं कि ध्यान से क्या मिलेगा? मेरा उत्तर है कि ध्यान से कुछ भी नहीं मिलेगा, जो कुछ है वह भी चला जाएगा| सारी विषय-वासनाएँ और कामनाएँ समाप्त होने लगेंगी और आप इस दुनियाँ के भोगों के लायक नहीं रहेंगे| जिन्हें कुछ चाहिए वे ध्यान न करें| ध्यान उनके लिए है जो सब कुछ परमात्मा को सौंप देना चाहते हैं| ध्यान से कोई सांसारिक लाभ नहीं है, सिर्फ आध्यात्मिक लाभ ही हैं|
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ध्यान कोई क्रिया नहीं है, यह तो एक अक्रिया है| क्रिया-योग साधना तो प्रत्याहार है जिसके बाद धारणा और ध्यान है| परमात्मा से प्रेम सबसे महत्वपूर्ण है| बिना प्रेम के कोई सफलता नहीं मिलेगी| हमें आरम्भ तो करना चाहिए फिर भगवान निश्चित रूप से मार्ग-दर्शन करेंगे| भगवान भाव के भूखे है, हमारे ह्रदय की पुकार को वे अवश्य सुनेंगे|
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अपनी चेतना को भ्रूमध्य में रखने का प्रयास करें| वह स्थान अवधान का भूखा है| आगे का मार्गदर्शन स्वयं परमात्मा करेंगे| जो कुछ भी मेरे द्वारा लिखा गया है वह तो एक रूपरेखा मात्र है, इसमें मेरी कोई महिमा नहीं है| किसी भी आध्यात्मिक साधना का एकमात्र फल है परमात्मा की शरणागति और समर्पण| अन्य किसी भी लाभ की आकांक्षा है तो आध्यात्मिक साधना न करें|
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भोजन नियम

भर्तुर्भोजनसमये पत्नया समीपे न स्थेयम् ।
पति के भोजन करने के समय पत्नी को उसके समीप नहीं रहना चाहिए।

तथा च याज्ञवल्क्यः -
याज्ञवल्क्य कहते हैं—

न भार्यादर्शनेऽश्नीयान्नैकवासा न संस्थितः ।।
पत्नी के सामने भोजन नहीं करना चाहिए और न ही एक ही वस्त्र में उसके सामने बैठना चाहिए।

पत्नयाः सन्निधाने दोषमाह श्रुतिः -जायाया अन्ते नाश्नीया दवीर्यवदपत्यं भवतीति ।।
श्रुति में पत्नी की उपस्थिति में भोजन करने का दोष बताया गया है—पत्नी के समीप भोजन नहीं करना चाहिए, क्योंकि ऐसा करने से दुर्बल वीर्य वाली सन्तान उत्पन्न होती है।

परिवेषणसमये अन्नादिकं हस्तेन न परिवेषणीयम् ।।
भोजन परोसते समय अन्न आदि पदार्थ हाथ से नहीं परोसने चाहिए।

तथा च शातातपः -
शातातप कहते हैं—

हस्तदत्तानि चान्नानि प्रत्यक्षलवणं तथा । मृत्तिकाभक्षणं चैव गोमांसाभ्यशनं स्मृतम् ।।
हाथ से दिया हुआ अन्न, प्रत्यक्ष रूप से हाथ से दिया हुआ नमक, मिट्टी का भक्षण तथा गोमांस का सेवन—इन सबको अनुचित माना गया है।

लवणं व्यञ्जनं चैव घृतं तैलं तथैव च । लेह्यं पेयं च विविधं हस्तदत्तं न भक्षयेत् ।।
नमक, व्यञ्जन, घी, तेल तथा विभिन्न प्रकार के लेह्य और पेय पदार्थ हाथ से दिए हुए हों तो उनका सेवन नहीं करना चाहिए।

यमः - हस्तदत्ता तु या मिक्षा लवणव्यञ्जनानि च । भोक्ता ह्यशुचितां याति दाता स्वर्ग न गच्छति ।।
यम कहते हैं—हाथ से दी हुई भिक्षा तथा नमक और व्यञ्जन का सेवन करने वाला अशुचिता को प्राप्त होता है और उन्हें देने वाला स्वर्ग को प्राप्त नहीं होता।

हस्तदत्तास्तु ये स्नेहा लवणव्यञ्जनानि च । दातारं नोपतिष्ठते भोक्ता भुञ्जीत किल्विषम् ।।
हाथ से दिए हुए स्नेहद्रव्य, नमक और व्यञ्जन देने वाले को प्राप्त नहीं होते तथा उनका सेवन करने वाला पाप का भागी होता है।

अत्रिः-- घृतं वा यदि वा तैलं ब्राह्मण्या नखनिस्सृतम् । अभोज्यं तद्विजानीयात् भुत्क्त्वा चांद्रायणं चरेत् ।।
अत्रि कहते हैं—यदि घी अथवा तेल ब्राह्मणी के नख से निकला हुआ हो तो उसे अभोज्य समझना चाहिए। उसका सेवन कर लेने पर चान्द्रायण व्रत करना चाहिए।

आपस्तंबः -- घृतं तैलं च लवणं पानीयं पायसं तथा । मिक्षा च हस्तदत्ता तु न ग्राह्या यत्र कुत्रचित् ।।
आपस्तम्ब कहते हैं—घी, तेल, नमक, पानी और पायस आदि के सम्बन्ध में हाथ से दी हुई भिक्षा कहीं भी ग्रहण नहीं करनी चाहिए।

तस्मादन्तर्हितं चान्नं पर्णेन च तृणेन वा ।।
इसलिए अन्न को पत्ते अथवा तृण से ढककर रखना चाहिए।

प्रदद्यान्न तु हस्तेनेति ।।
अन्न हाथ से नहीं देना चाहिए।

तच्च परिवेषणं दर्व्यादिना कर्तव्यम् ।।
भोजन का परोसना दर्वी आदि साधन से करना चाहिए।

तथा चापस्तंवः -दर्व्या देयं कृतानं च समस्तव्यञ्जनानि चेति ।।
आपस्तम्ब कहते हैं—पका हुआ अन्न और सभी प्रकार के व्यञ्जन दर्वी से देने चाहिए।

उदकादेः अदर्व्या परिवेषणे दोषमाह स एव -
जल आदि को दर्वी के अतिरिक्त किसी अन्य साधन से परोसने के दोष को वे ही बताते हैं—

उदकं यच्च पक्वान्नं योऽदर्व्या दातुमिच्छति । स भ्रूणहा सुरापश्च स स्तेनो गुरुतल्पगः ।।
जो व्यक्ति जल अथवा पका हुआ अन्न दर्वी के अतिरिक्त किसी अन्य साधन से देना चाहता है, वह भ्रूणहन्ता, सुरापान करने वाला, चोर और गुरुपत्नीगमन करने वाले के समान दोष का भागी होता है।

तैलपक्वमपक्वं च न तु दर्ज्या कदाचन ।। इति ।।
तेल में पका हुआ अथवा कच्चा पदार्थ भी कभी दर्वी से नहीं देना चाहिए।

आयसेन पात्रेण परिवेषणे दोषमाह पराशरः-
पराशर लोहे के पात्र से भोजन परोसने के दोष को बताते हैं—

आयसेन तु पात्रेण यदन्नमुपदीयते । शुनोच्छिष्टमसौ भुंक्ते दाता तु नरकं व्रजेत् ।।
लोहे के पात्र से जो अन्न परोसा जाता है, उसे ग्रहण करने वाला कुत्ते के जूठे अन्न के समान भोजन करता है और उसे देने वाला नरक को प्राप्त होता है।

अयःपात्त्रमयोग्यं स्यात् स्नानाचमनकर्मसु ।। इति ।।
लोहे का पात्र स्नान और आचमन के कार्यों के लिए अनुपयुक्त माना गया है।

परिवेषणसमये एकपंत्क्त्युपविष्टानां स्नेहादिना विषमपरिवेषण न कर्तव्यम् ।
भोजन परोसते समय एक ही पंक्ति में बैठे हुए लोगों को स्नेह, भय अथवा धन आदि के कारण असमान रूप से भोजन नहीं परोसना चाहिए।

तथा च वसिष्ठः -
वसिष्ठ कहते हैं—

यस्त्वेकपङ्क्त्यां विषमं ददाति स्नेहाद्भयाद्वा यदि वार्थहेतोः ।वेदेषु दृष्टमृषिभिश्च गीतं तां ब्रह्महत्यां मुनयो वदन्ति ॥
जो व्यक्ति एक ही पंक्ति में बैठे लोगों को स्नेह, भय अथवा धन के कारण असमान रूप से भोजन देता है, उस कर्म को मुनिजन ब्रह्महत्या के समान बताते हैं। ऐसा वेदों में देखा गया है और ऋषियों द्वारा भी कहा गया है।

स्कान्दे- स्त्रीणां हि परमश्चैको नियमस्समुदाहृतः । अभ्यर्च्य चरणौ भर्तुः भोक्तव्यमिति निश्चयः ॥ इति ॥
स्कन्दपुराण में कहा गया है—स्त्रियों के लिए एक प्रमुख नियम बताया गया है कि वे पति के चरणों की पूजा करके भोजन करें।

भर्तुर्भुक्तोच्छिष्टं पत्नथा भोक्तव्यम् ।
पत्नी को पति के भोजन से बचे हुए अन्न का सेवन करना चाहिए।

तथा च मनुः -
मनु कहते हैं—

पीत्वाऽऽपोशनमश्नीयात् पात्रदत्तमगर्हितम् । भार्याभृतकदासेभ्यः उच्छिष्टं शेषयेत् ततः ।( भुक्तभिन्न पात्रेषु शेषभोजनमुच्छिष्टम्)
आचमन के लिए जल पी लेने के बाद पात्र में दिया हुआ निन्दित न होने वाला भोजन करना चाहिए और उसके बाद पत्नी, भृत्य तथा दास आदि के लिए भोजन का कुछ अंश बचाकर रखना चाहिए। भिन्न पात्र में भोजन करने के बाद बचा हुआ भोजन ‘उच्छिष्ट’ कहलाता है।

व्यासः - सेवेत भर्तुरुच्छिष्टमन्नपानफलादिकम् । महान् प्रसाद इत्युक्त्वा पतिदत्तं प्रतीच्छती ।।
व्यास कहते हैं—पत्नी को पति के बचे हुए अन्न, पेय, फल आदि का सेवन करना चाहिए और पति द्वारा दिए गए उस अवशेष को ‘महान् प्रसाद’ कहकर ग्रहण करना चाहिए।

भर्तुर्भोजनानन्तरमेव स्त्रिया भोजनमाह व्यासः -देवतातिथिभृत्यानां निर्वाप्य पतिना सह । शेषान्नमुपभुञ्जाना यथान्यायं यथाविधि ।। तुष्टपुष्टजना नित्यं नारी धर्मेण युज्यते ।। इति ।।
व्यास कहते हैं—स्त्री को पति के भोजन करने के बाद ही भोजन करना चाहिए। देवता, अतिथि और भृत्यों के लिए भोजन का अंश निकालकर, पति के साथ शेष अन्न को उचित रीति और विधि के अनुसार ग्रहण करने वाली स्त्री के घर में लोग सदा सन्तुष्ट और पुष्ट रहते हैं तथा वह धर्म से युक्त होती है।

स्वभोजनसमये स्त्रीभिज्येष्ठादेव्यै बलिदानं कर्तव्यम् । तथाच मनुः-
अपने भोजन के समय स्त्री को ज्येष्ठा देवी के लिए बलि अर्पित करनी चाहिए। मनु कहते हैं—

न ददाति च या नारी ज्येष्ठायै प्रत्यहं बलिम् । भोज्यादन्नाद्यथाशक्ति सा प्रेत्य नरकं व्रजेत् ।।
जो स्त्री प्रतिदिन अपनी सामर्थ्य के अनुसार भोजन आदि में से ज्येष्ठा देवी को बलि नहीं देती, वह मृत्यु के बाद नरक को प्राप्त होती है।

अवश्यमेव नारीभीर्ज्येष्ठायै बलिकर्मणा । प्रीणनं प्रत्यहं कार्य पुत्रपौत्रधनेप्सुभिः ।॥ इति ।।
पुत्र, पौत्र और धन की इच्छा रखने वाली स्त्रियों को प्रतिदिन बलि-कर्म के द्वारा ज्येष्ठा देवी को प्रसन्न करना चाहिए।

भर्त्रयुक्तमन्नपानादि पत्नया वर्जनीयम् । तथा च व्यासः -यच्च भर्ता न पिबति यच्च भर्ता न खादति । यच्च भर्ता न चाश्नाति तत् सर्वं वर्जयेत् सती ।। इति ।।
पत्नी को उन अन्न-पान आदि पदार्थों का त्याग करना चाहिए जिन्हें पति त्याग देता है। व्यास कहते हैं—

यच्च भर्ता न पिबति यच्च भर्ता न खादति । यच्च भर्ता न चाश्नाति तत् सर्वं वर्जयेत् सती ।।
पति जिस पेय को नहीं पीता, जिस खाद्य पदार्थ को नहीं खाता और जिस भोजन को ग्रहण नहीं करता, उस सबका सती स्त्री को भी त्याग करना चाहिए।

स्त्रिया भर्तारं विहाय मृष्टमन्नं न भोक्तव्यम् ।
स्त्री को पति को छोड़कर उत्तम अथवा स्वादिष्ट भोजन नहीं करना चाहिए।

तथा च स्कान्दे-या भर्तारं परित्यज्य मृष्टमश्नाति केवलम् । ग्रामे सा सूकरी भूया द्वल्गुली वा स्वविट्भुजा ।।
स्कन्दपुराण में कहा गया है—जो स्त्री पति को छोड़कर अकेले उत्तम भोजन करती है, वह अगले जन्म में सूकरी अथवा अपने ही मल का भक्षण करने वाली अन्य निम्न योनि में जन्म लेती है।

पश्यति प्रिये पत्नया न भोक्तव्यम् ।
पति के देखते हुए पत्नी को भोजन नहीं करना चाहिए।

तथा च व्यासः - भोजनं वमनं निद्रां परिधानं च वाससाम् । प्रारंभं मण्डनानां च न कुर्यात् पश्यति प्रिये ।। इति ।।
व्यास कहते हैं—जब पति देख रहा हो, तब पत्नी को भोजन करना, वमन करना, निद्रा लेना, वस्त्र धारण करना तथा आभूषण आदि धारण करने का आरम्भ नहीं करना चाहिए।
श्रीमती हैमवती 
❗जय महादेव❗
 ⭕प्रश्न नहीं स्वाध्याय करें‼️