Saturday, 26 September 2026

सोमनाथ मंदिर और इतिहास

सोमनाथ, अरबों की देवी अल मनात और महमूद...
क्या गजनवी ने लूट के लिए सोमनाथ पर हमला किया था❓ 

क्या कहते हैं उसके समकालीन मुस्लिम इतिहासकार❓

👀👉 सर्दियों का मौसम था।

ग़ज़नी का सुल्तान महमूद बिन सुबुक्तगीन, जिसे इतिहास महमूद ग़ज़नवी के नाम से जानता है, भारत की ओर एक और अभियान की तैयारी कर रहा था।

लेकिन इस बार उसकी दिशा पहले के अभियानों से अलग थी।

लक्ष्य था समुद्र के किनारे स्थित एक ऐसा प्रसिद्ध हिंदू तीर्थ, जिसकी ख्याति गजनी में महमूद तक पहुँच चुकी थी।

नाम था सोमनाथ (द्वादश ज्योतिर्लिंगों में प्रथम)।

साल था हिजरी (इस्लामी कैलेंडर) 416, अर्थात 1025–26 ईस्वी।

इस अभियान का सबसे महत्वपूर्ण प्रारंभिक विवरण हमें  उन्हीं मुस्लिम लेखकों से मिलता है जो महमूद के समय में ही लिख रहे थे।

उनमें सबसे महत्वपूर्ण नाम हैं : अबू रेहान अल-बिरूनी, अबू सईद अब्दुल-हय गारदीज़ी और महमूद के दरबार से जुड़े कवि फर्रुख़ी सिस्तानी।

👉  सबसे पहले सोमनाथ मंदिर को देखें।

अल-बिरूनी ने अपनी प्रसिद्ध कृति " तहकीक मा लिल हिन्द मिन माकूलात माकूलात फी अलीअकबाल आम माजुला", या "किताबुल हिंद" में सोमनाथ विध्वंस का उल्लेख किया है।

वे उसके नाम की व्याख्या करते हुए बताते हैं कि सोम का अर्थ चंद्रमा और नाथ का अर्थ स्वामी है अर्थात चंद्रमा का स्वामी।

उनके अनुसार सोमनाथ समुद्र के किनारे स्थित था और सरस्वती नदी के मुहाने से लगभग तीन मील की दूरी पर था।

वे वहाँ के धार्मिक विश्वास का वर्णन करते हुए बताते हैं कि समुद्र का ज्वार बढ़ने पर उसका पानी मंदिर में स्थित शिवलिंग तक पहुँचता था। इस प्रकार समुद्र स्वयं शिवलिंग का जलाभिषेक करता था। 

अल-बिरूनी केवल भौगोलिक स्थिति नहीं बताते।

वे उस पौराणिक कथा को भी दर्ज करते हैं जिसके अनुसार सोम अर्थात चंद्रमा ने प्रजापति की पुत्रियों से विवाह किया था, लेकिन रोहिणी के प्रति विशेष प्रेम के कारण उसे शाप मिला। प्रायश्चित के लिए उसने शिव लिंग की स्थापना की और वही शिवलिंग सोमनाथ नाम से प्रसिद्ध हुआ।

इस प्रकार अल-बिरूनी ने सोमनाथ के नाम और उसकी पौराणिक प्रतिष्ठा दोनों को दर्ज किया। 

📜 अल-बिरूनी ने सोमनाथ के विनाश के बारे में क्या लिखा?

सोमनाथ की भौगोलिक स्थिति, प्रसिद्धि और उसकी धार्मिक कथा बताने के बाद अल-बिरूनी एक ऐसी सूचना देते हैं जिसे इस घटना के इतिहास में विशेष महत्व प्राप्त है।

वे लिखते हैं कि हिजरी 416 (1025–26 ईस्वी) में अमीर महमूद ने सोमनाथ के विग्रह को नष्ट कर दिया। महमूद ने उसके ऊपरी भाग को तोड़ने का आदेश दिया और शेष भाग को उसके सोने, रत्नों तथा कढ़ाईदार वस्त्रों सहित ग़ज़नी ले जाने का आदेश दिया।

अल-बिरूनी के अनुसार, ग़ज़नी पहुँचने के बाद उस विग्रह का एक भाग नगर के हिप्पोड्रोम(मैदान-ए-गज़नी) में थानेसर से लाई गई कांस्य मूर्ति चक्रस्वामिन् के साथ डाल दिया गया। दूसरा भाग ग़ज़नी की मस्जिद के दरवाजे के सामने रखा गया, जहाँ लोग उस पर अपने पैर रगड़कर मिट्टी और गंदगी साफ करते हुए मस्जिद में प्रवेश करते थे।

अर्थात अल-बिरूनी के वृत्तांत में केवल यह नहीं है कि “मंदिर पर हमला हुआ” या “मूर्ति तोड़ी गई”; वे यह भी बताते हैं कि विग्रह (मूर्ति) के साथ विजय के बाद क्या किया गया और उसके टुकड़ों को ग़ज़नी में किस प्रकार प्रदर्शित किया गया।

यही कारण है कि सोमनाथ पर महमूद के हमले के लिए अल-बिरूनी का विवरण विशेष महत्व रखता है। यह घटना के कुछ दशकों के भीतर लिखा गया एक ऐसे मुस्लिम विद्वान का स्पष्ट विवरण है जिसने महमूद को और इन चीजों को बहुत ही नजदीक से देखा था।

👉  अब गारदीज़ी का दिया विवरण देखते हैं।

अबू सईद अब्दुल-हय गारदीज़ी ने अपनी फ़ारसी इतिहास-कृति "ज़ैन-अल-अख़बार (Zayn al-Akhbar)" में महमूद के जीवन और ग़ज़नवी अभियानों का वर्णन किया है।

यह पुस्तक महमूद की मृत्यु के लगभग दो दशक बाद की ही है और गारदीज़ी ग़ज़नवी दरबार तथा प्रशासन से निकट रूप से जुड़े हुए थे। उनकी पुस्तक में महमूद के शासन का विवरण 999 ईस्वी के बाद अधिक विस्तृत हो जाता है। 

गारदीज़ी बताते हैं कि महमूद को एक ऐसी जगह के बारे में समाचार मिला जो महासागर के किनारे स्थित एक महान नगर थी।

नाम था सोमनाथ।

वे लिखते हैं कि भारतीय उस स्थान को उसी प्रकार पूजते थे जिस प्रकार मुसलमान मक्का को पवित्र मानते हैं।

वहाँ सोने और चाँदी की अनेक मूर्तियाँ थीं।

उनमें एक मूर्ति के बारे में गारदीज़ी मनात (Manāt) जो इस्लाम पूर्व के अरब की प्रमुख देवी थी, का नाम लेते हैं और लिखते हैं कि वह सोने से अलंकृत तथा रत्नों से जड़ी हुई थी।

📜 मनात कौन थी और सोमनाथ से उसका क्या संबंध  था ?

मनात (Manāt) इस्लाम-पूर्व अरब की प्रमुख देवियों में से एक थी। उसका नाम अल-लात और अल-उज़्ज़ा के साथ आता है। पश्चिमी अरब में उसका एक प्रमुख तीर्थ था और उसे भाग्य अथवा नियति की देवी माना जाता था। इस्लाम के उदय से पहले अरब के धार्मिक जीवन में इन देवियों की पूजा महत्वपूर्ण थी।

लेकिन ग़ज़नवी इतिहासकार अबू सईद गारदीज़ी ज़ैन-अल-अख़बार में सोमनाथ के संबंध में एक अलग और अत्यंत रोचक कथा दर्ज करते हैं।

स्वयं गारदीज़ी के  शब्दों में 
"और अमीर महमूद—अल्लाह उस पर दया करे—बल्ख से ग़ज़नी आया और गर्मी का मौसम वहीं बिताया। और जब सर्दी आई, तो अपनी प्रथा और आदत के अनुसार युद्ध के लिए हिंदुस्तान की ओर गया।
और उसके सामने यह बात कही गई कि समुद्र-ए-मुहीत के किनारे एक बड़ा नगर है, जिसे सोमनात कहते हैं। और वह नगर हिंदुओं के लिए वैसा ही है जैसा मुसलमानों के लिए मक्का।
और उसमें सोने और चाँदी की बहुत-सी मूर्तियाँ हैं।
और मनात, जिसे सैय्यद (अर्थात इस्लाम के पैग़ंबर) के समय काबा से अदन के रास्ते वहाँ से निकालकर ले जाया गया था, वहीं है। और उन्होंने उसे सोने से मढ़ रखा है तथा उसमें रत्न जड़े हुए हैं। और उस मूर्तिगृह के खज़ानों में बहुत बड़ी संपत्ति रखी हुई है।
लेकिन वहाँ तक पहुँचने का रास्ता बहुत ख़तरनाक, भयावह और अत्यन्त कष्टपूर्ण है।"

गारदीजी आगे लिखता है:
"और जब अमीर महमूद—अल्लाह उस पर दया करे—ने यह समाचार सुना, तो उसके मन में उस नगर तक जाने, उन मूर्तियों को नष्ट करने और एक ग़ज़ा/धार्मिक सैन्य अभियान करने की इच्छा उत्पन्न हुई।
और वह हिंदुस्तान से सोमनाथ की ओर, नहरवाला के रास्ते, चला।
जब वह नहरवाला नगर पहुँचा, तो वह खाली किया जा चुका था और उसके सभी लोग भाग गए थे। उसने सेना को वहाँ से चारे की व्यवस्था करने का आदेश दिया और वहाँ से सोमनाथ की ओर चला।"

"और जब वह नगर के निकट पहुँचा और श्रमणों तथा ब्राह्मणों ने उसे देखा, तो वे सभी मूर्तियों की पूजा में लग गए।
और उस नगर का सरदार नगर से बाहर निकला और अपने परिवार तथा सामान के साथ नाव में बैठा और समुद्र में चला गया।
और एक द्वीप पर उतर गया। वे वहीं तब तक रहे जब तक इस्लामी सेना उस प्रदेश से चली नहीं गई; वे उस द्वीप से बाहर नहीं आए।"

"और जब इस्लामी सेना नगर के निकट पहुँची, तो नगर के लोगों ने स्वयं को किलेबंदी के भीतर कर लिया और युद्ध में लग गए।
बहुत समय नहीं बीता कि किलेबंदी टूट गई और अमीर महमूद की सेना उसमें प्रवेश कर गई।
और उन्होंने बहुत भयंकर युद्ध किया, और बहुत से “काफ़िर” मारे गए।"

आगे गारदीजी लिखता है :
"और अमीर महमूद—अल्लाह उस पर दया करे—ने आदेश दिया कि मुअज्ज़िन मंदिर की छत/ऊपरी भाग पर जाए और नमाज़ की पुकार (अज़ान) दे।
और उन सभी मूर्तियों को तोड़ दिया गया, जला दिया गया और नष्ट कर दिया गया।
और मनात के पत्थर को जड़ से उखाड़ दिया गया, उसके टुकड़े-टुकड़े किए गए और उसके कुछ टुकड़े खच्चरों/अस्तरों पर रखकर ग़ज़नी लाए गए।"

"और मूर्तियों के नीचे एक खज़ाना था।
उसने वह खज़ाना ले लिया और वहाँ से बहुत बड़ी संपत्ति प्राप्त की।
अर्थात चाँदी की मूर्तियाँ, रत्नों से जड़ी मूर्तियाँ और दूसरे खज़ानों की लूट—इन सबको ऊँटों पर लादा गया और ग़ज़नी लाया गया।"

"और वहाँ से वह वापस लौट गया।
भीमदेव, हिंदुओं का राजा, रास्ते में था।
अमीर महमूद ने कहा कि ऐसा न हो कि इस महान विजय को कोई क्षति पहुँच जाए। इसलिए वह सीधे रास्ते से नहीं गया और मुल्तान की ओर मुड़ गया।
उस रास्ते में सेना को बहुत कठिनाई हुई और इस यात्रा में इस्लामी सेना के बहुत से लोग मारे गए। यहाँ तक कि मुल्तान पहुँचने से पहले मनुष्यों से अधिक पशु मारे गए।
और वहाँ से वे ग़ज़नी की ओर चले गए।"

👉  अब एक तीसरा विवरण देखते हैं। 

महमूद के दरबार के कवि फर्रुख़ी सिस्तानी ने महमूद ग़ज़नवी के सोमनाथ अभियान पर एक विस्तृत क़सीदा लिखा।  ध्यान रहे कि सिस्तानी इतिहासकार नहीं, एक शायर था।

उसी के शब्द  हिंदी में अनुदित:
"तालाब के चारों ओर एक हजार छोटे-छोटे मंदिर थे। उनके आगे एक विशाल मंदिर था और उसके बीच एक मूर्ति थी—सुंदरता में चंद्रमा जैसी, लेकिन कद में सरू के वृक्ष जैसी। एक दूसरी विशाल आकृति थी, जो सफेद दैत्य जैसी, रास्ते के बीच सिर उठाए दिखाई देती थी। वहाँ नारियल और पोपल के वृक्ष थे, जिनमें हर वृक्ष वर्ष में बार-बार फल देता था। शहर की सीमा पर एक मजबूत किला था और उसमें मूर्तिपूजकों का एक बड़ा समुदाय इकट्ठा था।"

"उसने लोगों को मारा और मंदिरों को तोड़ा तथा जला दिया, जैसे उसने दारनी और थानेसर के मंदिरों के साथ किया था। रास्ते में उससे केवल वही बच पाया जो किसी तिनके या झाड़ी के नीचे छिपा रहा, जैसे कोई दुर्भाग्यशाली पशु। उसने उन छिपे हुए लोगों को खोजे बिना छोड़ दिया, क्योंकि उस राजा का उद्देश्य कुछ और था। जो सोमनाथ के मंदिर को नष्ट करने जा रहा हो, वह छिपे हुए लोगों को खोजने में अपना समय व्यर्थ नहीं करता।"

"बादशाह मनात को नष्ट करने के लिए ही तेजी से आगे बढ़ रहा था; शायद उसकी यही जल्दी इसी कारण थी। मनात, लात और उज़्ज़ा मक्का में तीन मूर्तियाँ थीं—उस समय के मूर्तिकार आज़र के हाथों से बनी हुई। पूरी दुनिया उन तीनों मूर्तियों की पूजा करती थी, सिवाय उस व्यक्ति के जिस पर खुदा की दृष्टि थी। उनमें से दो को पैग़ंबर ने तोड़ दिया और उस दिन दोनों को काबा के सामने डाल दिया गया। मनात को काफ़िरों के बीच से चुरा लिया गया और उस देश से निकालकर किसी दूसरे देश में ले जाया गया। उसे ऐसी जगह ले जाया गया जहाँ आदम के समय से उस भूमि पर किसी काफ़िर के अतिरिक्त कोई बैठा या गया नहीं था।"

"उस मूर्ति के लिए एक मंदिर बनाया गया, जिसमें एक लाख प्रतिमाएँ और एक लाख आकृतियाँ थीं। उस मंदिर पर चारों ओर से श्रद्धा के लिए सोने की पट्टियाँ इस तरह लगाईं गई थीं कि वे पत्थर की पट्टियों जैसी दिखाई देती थीं। मंदिर के भीतर उस मूर्ति के लिए एक ख़ज़ाना बनाया गया था और उस ख़ज़ाने में बड़े-बड़े संदूकों में रत्न रखे थे। उसके लिए नगर-नगर से इतने रत्न खरीदे गए कि रत्न खरीदने वाला रत्न-विक्रेताओं से ही तृप्त हो गया।"

"मूर्ति के सिर के ऊपर एक मुकुट या शिरोभूषण लटकाया गया था, जिस पर माणिकों का काम था और मोतियों की बुनावट थी। उसके लिए शुद्ध सोने का एक शिरस्त्राण बनाया गया था, जो अग्नि के पर्वत जैसा था और उस पर जड़ा रत्न चिंगारी जैसा था। उसका मुकुट और शिरोभूषण किसी पूरे राज्य के कर के बराबर मूल्य का था; और उसकी सबसे कम मूल्यवान वस्तुओं में भी वही मुकुट और शिरोभूषण थे।"

"फिर उन्होंने उसे सोमनात नाम दिया। ऐसा कौन-सा नाम देखा गया है जिसके भीतर उसका दूसरा नाम छिपा हुआ हो? " (यहाँ फर्रुख़ी “सोमनात” के भीतर “मनात” नाम छिपा होने की ओर संकेत करता है।)

"उन्होंने संसार में यह बात फैलाई कि समुद्र से ऐसी आकृति वाली एक मूर्ति निकली है। वह सारे लोगों का नियंता और संसार का कर्ता है; वह सूर्य को प्रकाश देने वाला और चंद्रमा को प्रकाश देने वाला है। उसके ज्ञान से संसार की भलाई और बुराई निर्धारित होती है और उसके आदेश से संसार में भाग्य और नियति चलती है। दूसरे समूह ने कहा—नहीं, इस मूर्ति का स्थान उच्च आकाश में था। किसी मनुष्य ने इसे यहाँ नहीं लाया; यह स्वयं आकाश से यहाँ आई है। यह इसे दिन कहती है और उसे रात; इसे समुद्र कहती है और उसे स्थल। जब यह समुद्र से सिर उठाकर भूमि पर आई, तो सभी वनस्पतियों और वृक्षों ने इसके सामने सजदा किया।"

"गाय ने अपने दूध से इसे धोया और इसी कारण वे गाय को माता कहकर इसकी पूजा या निकटता का साधन मानते हैं। सिर्फ एक पत्थर के कारण ईश्वर की इतनी हजारों प्रजा शैतान की बात पर भरोसा करके संकट में पड़ गई। हर दिन उस पत्थर को धोना उनका कर्तव्य था—गंगा के जल, दूध, केसर और चीनी से। उस मूर्ति को गंगा के जल से धोने के लिए हर दिन दस बड़े प्यालों से भी अधिक जल पहुँचता था। गंगा के जल की क्या बात करूँ—वह सोमनाथ से कई फ़रसख़ ( दूरी मापने की फारसी इकाई) दूर है, उस स्थान से जहाँ यह पतन और अधर्म का स्थान है।"

"जब सूर्य ग्रहण लगता, तो एक लाख बच्चे और पुरुष उसके पास सहायता माँगने और क्षमा माँगने जाते। उन काफ़िरों में जो सोमनाथ हज के लिए जाते थे, उनकी भीड़ रास्ते में एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति से अलग नहीं होती थी। शमन उस पत्थर को ईश्वर कहते हैं—क्या ही व्यर्थ बात है; उनके सिर पर धूल पड़े!"

"खुदाई हुक्म ऐसा था कि वह दीन परवर शहरयार (बादशाह) उस मूर्ति को उसके स्थान से उखाड़ दे। इस उद्देश्य से कि वह उसे मक्का वापस ले जाए, उसने उसे उखाड़ दिया—और अब उसे हमारे साथ-साथ ले जा रहा है।"

"जब उसने उस मूर्ति को वहाँ से उखाड़ लिया और धन तथा सोना ले लिया, तो उसने अपने हाथ से मंदिर के भीतर आग डाल दी। जब सोमनाथ को जलाने का काम पूरा कर लिया, तो उसने लौटने वाले दूसरे लोगों के मार्ग पर प्रस्थान किया।"

महमूद की कशीदगी (प्रशंसा) में सिस्तानी उसे संबोधित करते हुए लिखता है, "तू बहमन के महीने में सोमनाथ जला रहा था, जबकि दूसरे बादशाह ऊद, सुगंधित पदार्थ और अंबर का आनंद ले रहे थे।"

⭐ इस विवरण में सबसे महत्वपूर्ण बात
फर्रुख़ी के वर्णन में मनात और सोमनाथ का संबंध आकस्मिक नहीं है। वह बाकायदा नाम के भीतर “मनात” को छिपा हुआ बताता है और फिर कहता है कि महमूद ने उस मूर्ति को मक्का वापस ले जाने के उद्देश्य से उखाड़ा।

इस प्रकार गारदीज़ी और फर्रुख़ी में एक उल्लेखनीय समानता दिखाई देती है:

- गारदीज़ी: मनात को पैग़ंबर मुहम्मद के समय काबा से अदन के रास्ते सोमनाथ लाए जाने की कथा देता है और उसे “मनात का पत्थर” कहता है।
- फर्रुख़ी: सोमनाथ/सोमनात नाम में “मनात” छिपा होने की व्याख्या करता है और महमूद द्वारा मूर्ति को मक्का वापस ले जाने की बात कहता है।

अर्थात दोनों महमूद के समकालीन स्रोतों में सोमनाथ की मूर्ति को मनात से जोड़ने वाली एक ही व्यापक परंपरा दिखाई देती है, यद्यपि दोनों का विवरण और भाषा अलग है।

👉 वामपंथी और हाल के मुस्लिम इतिहासकार यह सिद्ध करने की कोशिश करते हैं कि गजनवी बस एक लुटेरा था।

लेकिन, प्रथमदर्शी रचनाकारों के अनुसार यह केवल सोने की लूट की कहानी नहीं थी।

यदि उद्देश्य केवल धन प्राप्त करना होता, तो मंदिर से सोना, चाँदी, रत्न और अन्य संपत्ति लेकर वापस लौटना पर्याप्त था।

लेकिन प्रारंभिक मुस्लिम स्रोतों में जो चित्र दिखाई देता है, उसमें मूर्तिभंजन स्वयं विजय का हिस्सा था।

गारदीज़ी लिखते हैं कि महमूद सोमनाथ की मूर्तियों को नष्ट करने की इच्छा से वहाँ पहुँचा। 

अल-बिरूनी बताते हैं कि मूर्ति को तोड़कर उसके टुकड़ों को ग़ज़नी में सार्वजनिक रूप से अपमानित किया गया।

इसलिए प्रारंभिक मुस्लिम सामग्री में धार्मिक उद्देश्य को हटाकर केवल आर्थिक लूट की कहानी बनाना  स्रोतों के साथ न्याय नहीं होगा।

इतिहास की ऐसी ही छिपा दी गई तथ्यात्मक लेखों को पढ़ने के लिए फॉलो करें Prabhat Ranjan 

स्रोत:
1. अल-बिरूनी — किताब अल-हिंद (Kitāb al-Hind)
अंग्रेज़ी अनुवाद: Edward C. Sachau, Alberuni’s India: An Account of the Religion, Philosophy, Literature, Geography, Chronology, Astronomy, Customs, Laws and Astrology of India about A.D. 1030, 2 volumes, Trübner’s Oriental Series, 1887–1888. 
Google Books 

2. अबू सईद अब्दुल-हय गारदीज़ी — ज़ैन अल-अख़बार (Zayn al-Akhbār)
अंग्रेज़ी अनुवाद: C. Edmund Bosworth, The Ornament of Histories: A History of the Eastern Islamic Lands AD 650–1041, I.B. Tauris, 2011. यह गारदीज़ी के Zayn al-Akhbār का अंग्रेज़ी अनुवाद और टिप्पणी सहित संस्करण है। �

3. फर्रुख़ी सिस्तानी — दीवान-ए-फर्रुख़ी सिस्तानी (Dīvān of Farrukhī Sīstānī)
मूल पाठ का प्रमुख आलोचनात्मक संस्करण: मुहम्मद जाबिर दबीर-सियाक़ी (Muhammad Jabir Dabir-Siyāqi), Dīvān-i Farrukhī Sīstānī

सोमनाथ संबंधी अंश का अंग्रेज़ी अनुवाद और विश्लेषण: Th. Emil Homerin, “Saʿdi’s Somnatiyah,” Iranian Studies, जिसमें फर्रुख़ी के दीवान के pp. 69–71, lines 1338ff. का अनुवाद दिया गया है।

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Friday, 25 September 2026

हिंदू महासभा और आरएसएस

राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ (R.S.S.) तब और अब - भाग  2
 
#हिन्दू_महासभा_एवं_आर_एस_एस_के_बीच_कड़वाहट

लेख थोड़ा बड़ा है इसलिए टाइम निकाल कर पूरा पढ़े और कल भाग 1 लिखा था,, भाग 3 भी आयेगा, तीनों पढ़ो तभी फाइनल निष्कर्ष निकलेगा (भाग 1लिंक पिन कमेंट में है)

जैसा विदित है कि वीर सावरकर पहले ही कलकत्ता अधिवेशन के लिये अध्यक्ष चुन लिये गये थे, परन्तु हिन्दू महासभा के अन्य पदों के लिये चुनाव अधिवेशन के मैदान में हुए। सचिव पद के लिये तीन प्रत्याशी थे (1) महाशय इन्द्रप्रकाश, (2) श्री गोलवलकर और (3) श्री ज्योति शंकर दीक्षित। चुनाव हुए और परिणाम स्वरुप महाशय इन्द्रप्रकाश को 80 वोट, श्री गोलवलकर को 40 और श्री ज्योति शंकर दीक्षित को मात्र 2 वोट प्राप्त हुए और इस प्रकार महाशय इन्द्रप्रकाश हिन्दू महासभा कार्यालय सचिव के पद पर चयनित घोषित हुए।

श्री गोलवलकर जी को इस हार से इतनी चिढ़ हो गयी कि वे अपने कुछ साथियों सहित हिन्दू महासभा से दूर होना शुरू हो गये| जून 1940 में डा. हेडगेवार कि अकस्मात मृत्यु हो गयी और उनके स्थान पर श्री गोलवलकर को आर.एस.एस. प्रमुख बना दिया गया। आर.एस.एस. प्रमुख का पद संभालने के थोड़े समय पश्चात ही उन्होंने श्री मारतंडे राव जोग को सर संघ सेनापति के पद से हटा दिया, जिन्हें डा. हेडगेवार ने आर. एस. एस. के उच्च श्रेणी के स्वयं सेवको को सैन्य प्रशिक्षण देने के लिये नियुक्त किया था। इस प्रकार गोलवलकर जी ने अपने ही हाथों आर.एस.एस. की पराक्रमी शक्ति के निर्माण को प्राय: समाप्त ही कर दिया। जिस जुझारू संगठन (मिलीशिया) की स्थापना करना आर.एस.एस. के संस्थापक का उद्देश्य था| वह जुझारूपन, गोलवलकर जी के इस कदम से समाप्त ही हो गया| इसका दुष्परिणाम यह हुआ कि देश विभाजन, चीन व पकिस्तान के आक्रमण के समय जिस समर्पण व भागीदारी की आशा समाज इस राष्ट्रवादी संगठन आर.एस.एस. से करता था, उस दायित्व को आर.एस.एस. निभाने में असफल रहा|

देश विभाजन के समय हिंदू पिटता रहा,अपमानित होता रहा, पर संघ शाखाओं पर कब्बडी ही खेली जाती रही| हाँ हिन्दुओं के खंडित भारत में शरणार्थी के रूप में आने पर, उनके लिए लंगर जरूर लगाये गये| गुरूजी के नेतृत्व में संघ हिन्दुओं की रक्षा की बजाय सेवा कार्य को ही अपना मुख्य कार्य समझने लगा- यहीं इसकी स्थापना के उद्देश्य व ध्येय में अंतर दिखाई देने लगता है| वर्तमान में भी देश पर अंदर व बाहर से हो रहे आतंकी हमलों व सत्ताधीशों द्वारा हिंदू समाज कों जिस प्रकार अपमानित किया जा रहा है उसका मुकाबला करने में इस संगठन की कमजोरी स्पष्ट रूप से देखने को मिल रही है, जब हम और हमारे यह संगठन किसी आतंकी घटना-गुंडागर्दी या सरकार के हिंदू विरोधी कदम का प्रतिकार करने में सक्षम नहीं हो पाते |

यहाँ यह महत्वपूर्ण और उलेखनीय है कि वर्तमान सरसंघ प्रमुख मोहन भागवत जी ने भी आज देश में घटित हो रही आतंकी घटनाओं को देखते हुए हिंदू युवकों के सैन्य प्रशिक्षण की आवश्यकता की मांग की है| स्पष्ट होता है कि गोलवलकर जी वास्तव में किसी भी प्रकार दूरदर्शी नहीं थे| हिंदू समाज व इस राष्ट्र कि रक्षा हेतु जो आवश्यकता वीर सावरकर जी ने “हिन्दुओं के सैनिकीकरण के रूप में सन् 1936 से 1945 के बीच दर्शाई थी, गोलवलकर जी ने मारतंडे राव जोग को सरसंघ सेनापति के पद से हटा कर उससे पूर्णताः उलट कार्य किया| उसी सावरकर की सैनिकीकरण नीति की महत्ता गोलवलकर जी के उत्तराधिकारी मोहन भागवत जी को सावरकर के कथन के 70 वर्ष पश्चात समझ में आ पाई है| इसे क्या कहेंगे| इस बीच देश और समाज को हुई हानी का दायित्व कौन लेगा|

सन् 1935 तक संघ का कार्य धीमी गति परन्तु दृढ विचारधारा से चलता रहा और महाराष्ट्र तक ही सीमित रहा| सन् 1936 के बाद देश में हिंदू मुस्लिम तनाव पुरे उफान पर आया | मुस्लिम लीग ने पकिस्तान की मांग बड़े जोर शोर से उठानी शुरू कर दी थी| इस हेतु उनके द्वारा मुस्लिम नेशनल गार्ड की स्थापना भी की गई, अल्लामा-मशर्की ने बेल्चा पार्टी (मुसलमानों के एक अर्द्धसैनिक दल) की स्थापना की जिसके कार्यकर्त्ता/वोलंटियर/रजाकार- हिंदुओं के साथ छोटी-छोटी बातों को तूल देकर लड़ाई-झगड़े के लिए अमादा हो जाते थे| निजाम हैदराबाद व उसके रजाकारों द्वारा किये जा रहे अत्याचारों से वहां की हिंदू जनता आर्तनाद कर रही थी| निजाम ने राज्य के हिंदुओं के सभी धार्मिक कार्यों व अधिकारों पर रोक लगा दी थी| हिंदू न तो यज्ञोपवीत पहन सकते थे, न हवन कर सकते थे| मंदिरों में घंटे-घड़ियाल बजाना अथवा कीर्तन आदि करने को भी निजाम ने गैर क़ानूनी घोषित कर दिया था| जिस कारण आर्यसमाज और हिंदू महासभा को भारी आन्दोलन/सत्याग्रह करना पड़ा| सिंध प्रान्त में मुस्लिम लीगी सरकार ने स्वामी दयानंद द्वारा रचित धार्मिक ग्रन्थ “सत्यार्थ प्रकाश” पर प्रतिबंध लगा दिया था|

सन् 1945-46 में मुस्लिम लीग ने अंग्रेज सरकार और कांग्रेसी नेताओं कों पाकिस्तान की मांग मानने के लिए विवश करने के उद्देश्य से “डायरेक्ट एक्शन” नाम से कार्यवाही शुरू की, जिसके परिणाम स्वरूप बिहार, कलकत्ता आदि शहरों में हजारों हिंदुओं का नरसंहार हुआ | ऐसी स्थिति में हिंदू भयग्रस्त भी था और आक्रोशित भी, और वे चाहते थे कि हिंदुओं का भी एक युवा जुझारू संगठन हो जो उनकी सुरक्षा कर सके| इन्हीं कारणों से हिंदुओं का रुझान संघ की ओर बढ़ा और इसी समय संघ के स्वंयसेवकों और शाखाओं की संख्या बढ़ी और सन् 1946 के पहुंचते- पहुंचते युवा स्वंयसेवकों की संख्या लगभग 7 लाख हो गई|” संघ के स्वंयसेवकों की संख्या में यह विस्तार गोलवलकर जी के नेतृत्व से अधिक देश में उस समय उत्पन्न हो रही सामाजिक व राजनैतिक परस्थितियों के कारण ही मुख्य रूप से था, जिससे हिंदू समाज- उद्वेलित होकर संघ की ओर आशा लगाकर देखने लगा जो स्वाभाविक था|

श्री गोलवलकर एक रूढ़िवादी व्यक्ति थे जो पुरानी धार्मिक रीतियों पर अधिक विश्वास रखते थे, यहाँ तक कि उन्होंने अपने पूर्वजो के लिये ही नहीं अपितु अपने जीवन काल में ही अपना भी श्राद्ध कर्म संपन्न कर दिया था। वे गंडा-ताबीज के हार पहने रहते थे, जो सम्भवत: किसी संत ने उन्हें किसी बुरे प्रभाव से बचने के लिये दिए थे। गोलवलकर जी का हिंदुत्व श्री वीर सावरकर और डॉ. हेडगेवार के हिंदुत्व से किंचित भिन्न था। गोलवलकर जी के मन में वीर सावरकर के लिये उतना आदर सत्कार का भाव नहीं था जितना की डा. हेडगेवार के मन में था। डा. हेडगेवार, वीर सावरकर को आदर्श पुरुष मानते थे| यथार्थ में श्री गोलवलकर इतने दृढ़ विचार के न हो कर एक अपरिपक्व व्यक्ति थे, जो आर.एस.एस. विशाल संस्था का उत्तरदायित्व ठीक से उठाने के योग्य नही थे। राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ ने गोलवलकर जी के नेतृत्व में संघ कि शाखाओं और स्वयंसेवकों की संख्या तो बढाई परन्तु अपने मूल सिद्धांतों से दुरी बना लेने के कारण संगठन की ऊर्जा को प्रायः खो दिया| वही क्रमिक ह्रास, आज आर.एस.एस. जिस स्थिती में पहुँच गई है, में स्पष्ट रूप से दिखाई देता है|

गोलवलकर जी के आर.एस.एस. प्रमुख बनने के बाद हिन्दू महासभा एवं आर.एस.एस के बीच सम्बन्ध तनावपूर्ण होते चले गये। यहाँ तक की श्री गोलवलकर ने वीर सावरकर एवं हिन्दू महासभा द्वारा चलाये जा रहे उस अभियान की आलोचना करनी शुरू कर दी जिसके अंतर्गत हिन्दू युवको को सेना में भर्ती होने के लिये प्रेरित किया जाता था। यह अभियान 1938 से सफलता पूर्वक चलाया जा रहा था और डॉ. हेडगेवार ने 1940 में अपनी मृत्यु तक इसका समर्थन किया था। सुभाष चंद्र बोस ने भी सिंगापुर से रेडियो पर अपने भाषण में इन युवको को सेना में भर्ती कराने के लिये श्री वीर सावरकर के प्रयत्नों की बहुत प्रशंसा की थी। हिन्दू महासभा के इस अभियान के कारण सेना में हिंदुओ की संख्या बढ़ने लगी, जिस पर मुस्लिम लीग ने बहुत बवाल मचाया और अंग्रेज सरकार से आग्रह किया कि सेना में हिंदुओ कि भर्ती बंद की जाये। क्योँकि उस समय द्वितीय विश्व युद्ध चल रहा था इस कारण सरकार को सेना में बढ़ोतरी करनी थी अतः मुस्लिम लीग के विरोध को नकार दिया गया। यह इसी अभियान का ही नतीजा था कि सेना में हिंदुओ की संख्या 36% से बढ़ कर 65% हो गयी, और इसी कारण विभाजन के तुरंत बाद पाकिस्तान द्वारा कश्मीर पर आक्रमण का भारतीय सेना मुंह तोड़ जवाब दे पायी। परन्तु गोलवलकर जी के उदासीन व्यवहार एवं नकारात्मक सोच के कारण दोनों संगठनो के सम्बन्ध बिगड़ते चले गये।

यह भी उलेखनीय है कि एक ओर काँग्रेस व गाँधीजी ने अंग्रेजो को सहमति दे दी थी कि उनके द्वारा भारत छोड़े जाने से पहले, भारत कि सत्ता मुस्लिम लीग को सौपने पर उन्हें कोई आपत्ति नहीं है। दूसरी ओर वे लगातार यह प्रचार भी करते रहे कि वीर सावरकर और हिन्दू महासभा साम्प्रदायिक हैं। डा. हेडगेवार की मृत्यु के उपरान्त आर.एस.एस. ने भी श्री गोलवलकर के नेतृत्व में वीर सावरकर एवं हिन्दू महासभा के विरुद्ध एक द्वेषपूर्ण अभियान आरंभ कर दिया। श्री गंगाधर इंदुलकर (पूर्व आर.एस.एस. नेता) का कथन है कि श्री गोलवलकर यह सब वीर सावरकर की बढ़ती हुई लोकप्रियता (विशेषकर महाराष्ट्र के युवको में) के कारण कर रहे थे। उन्हें आशंका थी कि यदि सावरकर कि लोकप्रियता बढ़ती गयी तो युवक वर्ग उनकी ओर आकर्षित होगा और आर.एस.एस. से विमुख हो जायेगा।

इस टिप्पणी के बाद श्री इंदुलकर पूछते है कि “क्या ऐसा कर के आर.एस.एस. हिंदुओ को संगठित कर रही थी या कि विघटित कर रही थी|”

सन् 1936-37 में श्री माधव राव सदाशिव राव गोलवलकर संघ में आये| 1938 में उन्होंने एक पुस्तक लिखी जिसका नाम “वी. आर. अवर नेशनहुड डिफाइंड”(हमारी राष्ट्रीयता)| इस पुस्तक में उन्होंने हिंदू, हिंदुत्व, हिंदू राष्ट्र की वही व्याख्यायें स्वीकार की जो वीर सावरकर द्वारा लिखित पुस्तक “हिंदुत्व” में तथा वीर सावरकर जी के बड़े भाई श्री बाबा राव सावरकर द्वारा लिखित पुस्तक “राष्ट्र मिमांसा” में दर्शायी गई थी | १५ मई १९६३ के दिन बम्बई में सावरकर सप्ताह का आयोजन किया गया था, उसमें श्री गोलवलकर ने अपने भाषण में कहा कि उन्होंने सावरकर जी की महान रचना ‘हिंदुत्व’ में राष्ट्रवाद के सिद्धांत का विवेचन पाया है| उनके लिए यह एक पाठ्य पुस्तक व एक वैज्ञानिक पुस्तक है|(हिंदू अस्मिता दि. १-११-९३)

परन्तु कुछ समय पश्चात, श्री गोलवलकर ने स्वंय अपने द्वारा सन् 1938 में लिखी गई पुस्तक ‘वी. आर. अवर नेशनहुड डिफाइंड’ पुस्तक को अस्वीकार करने की बात कही| उन्होंने यहाँ तक कहा कि भूल जाओ ‘ वी आर. अवर नेशनहुड डिफाइंड’ को| 1949 में संघ पर लगे प्रतिबंध के दौरान, राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ ने जो अपना संविधान बना कर सरकार को दिया उसमें हिंदू राष्ट्र शब्द का कहीं उल्लेख नहीं था परन्तु उसके बाद भी संघ की शाखाओं पर स्वंयसेवकों द्वारा “प्रभु शक्ति मम हिंदू राष्ट्रांग भूता” कि प्रार्थना अवश्य गाई जाती रही है| यह संविधान गोलवलकर जी द्वारा डॉ. हेडगेवार कि मृत्यु के बाद संघ पर प्रतिबन्ध लगने के पश्चात बनाया गया था|

दिनाँक 30-1-1948 को गाँधी जी की हत्या हुई| जिस समय गाँधी जी की मृत्यु का समाचार गोलवलकर जी को मिला, वह उस समय दि. 30-1-1948 को मद्रास (चैन्नई) में प्रवास पर थे| आल इंडिया रेडियो पर जब यह समाचार प्रसारित हुआ की गांधीजी की हत्या महाराष्ट्र के एक हिंदू-राष्ट्रवादी पंडित नाथूराम गोडसे ने की है| इसकी प्रतिक्रिया में गांधीवादियों द्वारा महाराष्ट्र में बहुत उत्पात मचाया गया है, साथ ही वीर सावरकर के छोटे भाई नारायण राव सावरकर जी को भी लाठियों से पीटा गया| गोडसे जी का परिवार भी घोर प्रताड़ना का शिकार हुआ| इसके अतिरिक्त वीर सावरकर जी के साथ-साथ हिंदू महासभा और राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के हजारों कार्यकर्ताओं को भी जेलों में ठूस दिया गया| उन लोगों को भी जिनका गाँधी वध से दूर दूर तक का कोई संबंध नहीं था|(संदर्भ- “गोडसे की आवाज सुनो” पृष्ठ सं.51-52)

इस कांड का सबसे दुखद पहलु यह रहा कि जिस पंडित नाथूराम गोडसे ने राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के कार्यकलापों में सदा बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया, जिसने महाराष्ट्र के सांगली जिले के बौद्धिक प्रमुख का महत्वपूर्ण दायित्व निभाया और दि. 15-11-1949 को- आर.एस.एस. की शाखा स्थल पर गाई जाने वाली प्रार्थना “नमस्ते सदा वत्सले मातृ भूमि” का स्वर गान करते हुए, भारत विभाजन के विरोध में, फांसी का फंदा चूमा और शाह्दत का जाम पिया| उसी संघ समर्पित गोडसे को, गाँधी वध के बाद आर.एस.एस. के तात्कालिक प्रमुख – सरसंघचालक श्री माधव राव सदाशिव राव गोलवलकर उपाख्य “गुरूजी” ने भयभीत होकर सिरे से नकार दिया, और तुरत-फुरत में दिनांक 31-1-1948 को जवाहरलाल नेहरु तात्कालिक प्रधानमंत्री को पत्र लिख कर गोडसे को “अविवेकी और दुराग्रही आत्मा के साथ देशद्रोही” तक लिख डाला| इसके विपरीत अखिल भारत हिंदू महासभा नें उस विषम परस्थितियों में भी निर्भीकता के साथ छाती ठोककर हुतात्मा नाथूराम गोडसे को न सिर्फ अपना कार्यकर्ता बताना स्वीकार किया वरन हिंदू महासभा के तात्कालिक अध्यक्ष बैरिस्टर एल.वी.भोपटकर ने नाथूराम गोडसे के साथ अन्य अभियुक्तों का मुकदमा निशुल्क और पूर्ण निष्ठा और समर्पण के साथ अंत तक लड़ा|

क्रमशः

Thursday, 24 September 2026

पूरे पितृपक्ष में अपने पितरों को जल दान करें विशेष विधि

'                        🌿🌕🌿
         *पितृ पक्ष 2026 विशेष सूचना--*

 *दिनांक 26 सितंबर 2026 दिन शनिवार से पितृपक्ष, महालयारंभ हो रहा है ।।*

  *पूरे पितृपक्ष में अपने पितरों को जल दान करें ।।  पितरों को जल देने, उनका सम्मान करने से पितृ दोष समाप्त होता है ।।*

*जो लोग मंत्र सहित तर्पण नहीं कर सकते -- साधारण रूप से तर्पण करने की जानकारी दी जा रही है---*
 
 पितरों के प्रसन्न करने से  अनेकों दुखों का शमन होता है ।। इस समय पुरुषों को, पितृपक्ष आरंभ होने से पहले अपने सर के बाल उतरवा देना चाहिए ।।
 
 *अपने पितरों का नाम ले लेकर के जल प्रदान कर आशीष प्राप्त करें, जिससे आप अपने जीवन में अच्छी प्रगति कर सकें ।।*
 '       *क्योंकि पितृपक्ष में पितरलोक और पृथ्वी लोक एक दूसरे लोक के बहुत निकट आ जाते हैं ।।*
, *ऐसे समय में पितर लोग जब देखते हैं पृथ्वी की ओर तो, अपने कुल खानदान से, जल की अपेक्षा करते हैं  तर्पण के लिए विशेष सामग्री जो तर्पण करते समय चाहिए वह है---*
१~  जल 
२~गंगाजल
३~ तुलसी का पत्ता
 ४~ देशी गौ का दूध
 ५~ सफेद चावल {धुलकर सुखाया हुआ}
६~ काला तिल {धुलकर सुखाया हुआ}
७~ जौ    {धुलकर सुखाया हुआ}
८~ श्रीखंड चंदन {घिसकर लेप बनाया हुआ}
९~  सफेद फूल 
१०~ शहद
यह सारा सामान एक-एक डिब्बे में सुरक्षित रख लें ।।

*बैठने के लिए आसन ।* 

दो भगौना, जिसमें कम से कम तीन- तीन लीटर से अधिक पानी आ जाये ।।

दो प्लेट सामने रखें 
एक प्लेट में थोड़ा सा तिल, जौ, चावल, सफेद फूल, मीठा एक प्लेट में रखें ।। एक छोटे कटोरी में जल रखें ।

दोनों हाथ के अनामिका अंगुली में पैंती पहन लें । उसको हाथों में लेकर दोनों हाथों से जल प्रदान करें ।।
पैंती नहीं है तो अंगुलियों में अंगूठी पहनें ।
 
जो सामने खाली प्लेट है उसमें थोड़ा सा चावल हाथ में लेकर के पितरों का आवाहन करें ।
और उसमें जल अक्षत पुष्प धूप दीप और मीठा अर्पित करें ।
खाली प्लेट में रख दें । और पितरों से कहें हे पितृगण !! आप यह भोग स्वीकार करें ।।
अब जो --
*१० प्रकार का समान लिखा हुआ है उसको एक भगौने में थोड़ा-थोड़ा रखें ।।*
जिस भगवान में सामग्री रखे है उस भगौने को जल गंगाजल से भर दें ।।

अब आप अपने पिता माता 
दादा-दादी 
आजा आजी 
तीन पीढ़ी को अपने {अंजुरी} अर्थात् *अंजलि से एक-एक अंजलि जल* खाली वाले भगौने में डालें -- 
पिता सहित तीन पीढ़ी को जल दें और कहें हे पिता यह जल स्वीकार करो हे माता यह जल स्वीकार करो, दादा दादी आजा आजी ।।
अपने मामा के तीन पीढ़ी मामा मामी नाना नानी बूढ़े नाना नानी
*इसी तरह आपकी मौसी मौसी, ससुर सास, मित्र, गुरु जितने भी लोग आपके जीवन में रहे हों और अब ना हों, उन्हें जल प्रदान करना चाहिए ।।*
अंतिम में तीन अंजलि जल चराचर जगत के लिए अर्पित करना चाहिए 
 और एक अंजलि जल भीष्म पितामह के लिए अर्पित करना चाहिए ।।
अंतिम में वह जल किसी पौधे में डाल देना चाहिए 
, जो पैर के नीचे ना पड़े ।।

पुराण और अर्थ

## प्रश्न बिलकुल वैज्ञानिक है - आज का बच्चा पूछता है, "पापा, ब्रह्मा जी हंस पर कैसे उड़ते हैं?"
हम उसे कथा सुना कर टाल देते हैं, पर ऋषि ने कथा नहीं, कोड लिखा था। आज के विज्ञान से ही उस कोड को खोलते हैं, जो वाहन अभी तक नहीं बताए, उन्हीं को लेते हैं।
### 1. सूर्य के सात घोड़े - S= सप्तरंगी प्रकाश
पुराण कहते है - सूर्य के रथ में सात घोड़े हैं।
आज का विज्ञान क्या कहता है? न्यूटन ने 1666 में प्रिज्म से सिद्ध किया - सूर्य का श्वेत प्रकाश सात रंगों से बना है - VIBGYOR।
हमारे ऋषि ने हजारों साल पहले कह दिया था - अश्व = आशु गमन करने वाला, अर्थात किरण। सात अश्व = सात किरणें।
प्रमाण - ऋग्वेद 1.164.2 - *"सप्त युज्यन्ति रथं एकचक्रम"* - एक चक्र वाले रथ में सात घोड़े जुते हैं। यह रथ सूर्य है, सात घोड़े प्रकाश के सात बैंड हैं।
### 2. चंद्रमा का हिरण और खरगोश - मृग लांछन
चंद्रमा के वाहन को मृग कहा है, इसीलिए चंद्रमा को मृगांक कहते हैं।
आज आप पूर्णिमा के चाँद को देखिए, नासा की तस्वीर में भी आपको चाँद पर काले धब्बे हिरण की तरह दिखेंगे। वे धब्बे क्या हैं? - वे चंद्रमा के विशाल गड्ढे - Maria हैं।
ऋषि ने कहा - चंद्रमा पर मृग बैठा है। अर्थात चंद्रमा के कलंक - क्रेटर ही उसका वाहन - चिन्ह है। वाहन का अर्थ है पहचान।
### 3. इंद्र का ऐरावत हाथी - बादल का वैज्ञानिक नाम
इंद्र वर्षा के देवता हैं, ऐरावत पर बैठते हैं। ऐरावत = जल को फेंकने वाला।
ऋग्वेद में ऐरावत को *"अभ्र-मातंग"* कहा है - अभ्र माने बादल, मातंग माने हाथी। बादल हाथी जैसा ही तो दिखता है। और हाथी जैसे ही सूंड से जल फेंकता है, बादल भी जल वैसे बरसाता है। 
आज मौसम विज्ञान में भी बादलों को हाथी की उपमा दी जाती है - Cumulonimbus को हाथी की पीठ जैसा कहा जाता है।
इंद्र का वज्र = बिजली, ऐरावत = मेघ। बिजली मेघ पर ही सवार हो कर आती है, यह तो सीधा विज्ञान है।
### 4. शनि का कौआ और यम का भैंसा - Decomposition का विज्ञान
ये दो वाहन सबसे ज्यादा डरावने लगते हैं।
शनि = न्याय, धीमी गति, दंड। कौआ क्या करता है? सड़ा-गला साफ करता है। प्रकृति का स्कैवेंजर है। वह किसी को ऐसे ही नहीं छोड़ता, घंटों देखता है। शनि भी वैसे ही - धीरे-धीरे कर्मों का फल देता है। कौआ काला है, शनि भी अंधकार, अर्थात अनुशासन का प्रतीक है।
यम का भैंसा - यम मृत्यु के देवता हैं। भैंसा सबसे ज्यादा बलशाली, पर आलसी प्राणी है, कीचड़ में बैठा रहता है। मृत्यु भी वैसी ही है - अचानक आएगी तो भैंसे जैसी ताकत से कोई नहीं रोक सकता। और भैंसा अंधेरे में सबसे ज्यादा देख सकता है, यम भी अंधकार - मृत्यु-लोक में देखता है।
आयुर्वेद प्रमाण - भैंसे के सींग में यम-गंध होती है, जो मृत्यु के समय निकलने वाली गैसों को सोख लेती है, इसलिए शव के पास भैंसे की बात कही गई।
### 5. वरुण का मगर - मकर
वरुण जल के देवता हैं, उनका वाहन मकर - मगरमच्छ।
मगर क्या है? जल में सबसे प्राचीन, सबसे शक्तिशाली प्राणी। वह जल के इको-सिस्टम का राजा है। वह जल को शुद्ध रखता है।
आज पर्यावरण विज्ञान कहता है - अगर मगरमच्छ न हो तो नदी सड़ जाएगी। वरुण का मकर पर बैठना = जल के पारिस्थितिकी तंत्र का संतुलन।
### 6. अग्नि का मेढ़ा और वायु का हरिण
अग्नि का वाहन मेढ़ा - मेढ़ा कभी सीधा नहीं चलता, कूद-कूद कर चलता है। अग्नि की लपटें भी वैसी ही हैं - कभी इधर, कभी उधर। और मेढ़े के बाल ज्वलनशील होते हैं।
वायु का वाहन हरिण - हवा से तेज क्या दौड़ता है? हरिण। वायु की गति को नापने का सबसे पुराना पैमाना हरिण की गति थी।
### वैज्ञानिक युग में अजीब क्यों लगता है?
क्योंकि हमने दो भाषाओं को मिला दिया।
ऋषि की भाषा थी - *प्रतीक भाषा - Symbolic Language।*
आज की भाषा है - *भौतिक भाषा - Literal Language।*
पुराणों में वाहन कोई चिड़ियाघर नहीं, *"गुण-परिवहन तंत्र"* है। हर देवता एक ऊर्जा है, हर पशु उस ऊर्जा की प्रकृति है।

जिस दिन आप यह समझ गए कि हंस का अर्थ सरस्वती की Ola नहीं, सरस्वती का विवेक है, उसी दिन पुराण वैज्ञानिक ग्रंथ लगने लगेंगे, कहानी नहीं।

पुराण और जातियां

##कल वानर वाले लेख पर आप सबके क आस्था और इतिहास दोनों का सम्मान होना चाहिए। इसलिए आज उसी कड़ी को आगे बढ़ाते हैं - *नाग, गंधर्व, किन्नर, यक्ष, मत्स्य कन्या क्या थीं?*
पुराणों में जब लिखा है - "वह नागकन्या थी" तो क्या सच में आधी स्त्री आधी सर्प थी? यही भ्रम हमें समझना है।
### पुराणों में सृष्टि का वर्गीकरण - मनुष्य ही मनुष्य के कई रूप हैं
हम आज सोचते हैं दुनिया में केवल एक ही मानव जाति है। पुराण कहते हैं नहीं, सृष्टि में 8 प्रकार के मानव-सदृश सभ्यताएं थीं। इसे *अष्ट-मानव योनि* कहा गया -
*1. नाग -*
नाग का अर्थ सांप नहीं, *नग में रहने वाला* - पहाड़ की गुफाओं, पाताल अर्थात भूमिगत नगरों में रहने वाली अत्यंत विकसित सभ्यता।
वे महान इंजीनियर थे। भोगवतीपुरी, जो आज के पाताल लोक में बताई जाती है, वह जल-निकासी और वास्तुकला का अद्भुत नमूना थी।
नागकन्या का अर्थ - नागवंश की कन्या। जैसे अर्जुन ने नागकन्या उलूपी से विवाह किया, भीम ने नागवंश की राजकुमारी से। वे इच्छाधारी नागिन नहीं, नाग-वंश की राजकुमारियां थीं, जो विष-विद्या, मणि-विद्या जानती थीं।
कालिया नाग - वह यमुना के एक टापू पर रहने वाला नागवंशी राजा था, जो यमुना के जल पर कर लगाता था। कृष्ण ने उस राज्य को जीता, उसे मारा नहीं, निर्वासित किया।
*2. गंधर्व -*
गंधर्व का अर्थ है - गंध को धारण करने वाला, अर्थात संगीत, सुगंध और कला का उपासक।
ये आज के गंधार - अफगानिस्तान, कश्मीर क्षेत्र के निवासी थे। ये परम सुंदर, संगीतज्ञ और वीर थे।
गंधर्व विवाह क्या है? - प्रेम विवाह। शकुंतला और दुष्यंत का गंधर्व विवाह ही था। यानी गंधर्व सभ्यता में प्रेम-विवाह मान्य था, जबकि आर्य सभ्यता में नहीं।
विश्वावसु, चित्ररथ - ये गंधर्वों के राजा थे, जिनके पास विमान विद्या थी।
*3. किन्नर - किं + नर = क्या यह मानव है?*
ये हिमालय की घाटियों में रहने वाली एक विशेष सभ्यता थी - अश्वमुखी नहीं, अश्व-पालक। घोड़े पालने वाले, तेज दौड़ने वाले, इसलिए चित्रकारों ने उनका मुंह घोड़े जैसा बना दिया।
वे महान वाद्यकार थे। आज भी हिमाचल के किन्नौर में किन्नर जाति रहती है।
*4. मत्स्य कन्या -*
सत्यवती मत्स्यगंधा थी। क्या वह आधी मछली थी? नहीं।
वह *धीवर-वंश* की थी, नाव चलाने वाली। दिन भर मछलियों में रहने से उसके शरीर से मत्स्य की गंध आती थी, इसलिए मत्स्यगंधा। वह मत्स्य-वंश की राजकुमारी थी, इसीलिए मत्स्यकन्या।
वैसे ही कश्यप ऋषि की पत्नी कद्रू नाग-माता कही गई, विनता गरुड़-माता। इसका अर्थ है - एक पत्नी नाग-वंश की मूल माता बनी, दूसरी गरुड़ अर्थात गरुत वंशी आर्य वंश की।
*5. यक्ष, राक्षस, वानर, विद्याधर -*
यक्ष - कुबेर के अनुचर, धन-रक्षक, आज के कुबेर क्षेत्र - तिब्बत के व्यापारी।
राक्षस - रक्षा करने वाले, रक्ष-संस्कृति के लोग। रावण राक्षस-वंशी राजा था, कोई दस सिर वाला प्राणी नहीं। दस सिर = दस दिशाओं का ज्ञाता।
विद्याधर - विज्ञान और विद्या के धारक। हनुमान, रावण सब विद्याधर थे।
### फिर चित्रों में उन्हें आधा पशु क्यों दिखाते हैं?
यह हमारे प्राचीन चित्र-संकेतों की भाषा है, जिसे हम भूल गए।
पुराणकार ने सांकेतिक भाषा लिखी -
- बलवान है तो पूंछ दिखा दी
- तेज दौड़ता है तो घोड़े का मुख
- जल में निपुण है तो मछली की पूंछ
- संगीतज्ञ है तो गंधर्व के पंख
यह *टोटम - ध्वज चिन्ह* है। जैसे आज भी हर रेजिमेंट का चिन्ह होता है - गोरखा की खुखरी, राजपूताना राइफल्स का कटार। वैसे ही नाग-वंश का चिन्ह सर्प, गरुड़-वंश का गरुड़, वानर-वंश का वानर।
### निष्कर्ष क्या निकला?
पुराण झूठ नहीं बोलते, हम पढ़ना भूल गए।
नागकन्या का अर्थ सांपिन नहीं, नागवंश की विदुषी राजकुमारी है।
मत्स्यकन्या का अर्थ मछली नहीं, मत्स्य देश की, धीवर कुल की कन्या है।
वानर का अर्थ बंदर नहीं, वानर-ध्वज धारी पराक्रमी मानव है।
देवता भी इसी मनुष्य समाज से उठ कर देवत्व पाए हुए लोग थे। तभी तो मनुष्य का देवता बनना, देवता का मनुष्य बनना संभव है।
पुराणों को चमत्कार कथा नहीं, मानव सभ्यताओं का भूगोल समझ कर पढ़िए, सब कुछ स्पष्ट हो जाएगा।##सबको जय जय श्री सीताराम🙏🙏 ##

Wednesday, 23 September 2026

संकल्प वाचन

आजकल बड़े-बड़े यज्ञों और अनुष्ठानों में एक बहुत बड़ी विडंबना देखने को मिलती है। लाखों रुपये खर्च करके महायज्ञ का आयोजन होता है, लेकिन जब 'संकल्प' की बारी आती है, तो मात्र देश-काल और गोत्र बोलकर इतिश्री कर दी जाती है।

अरे गुरु! संकल्प केवल आपका नाम और पता नहीं है। यह ब्रह्मांड की उत्पत्ति से लेकर, 14 लोकों के निर्माण, ग्रहों की सूक्ष्म दशाओं और विश्व-कल्याण तक की एक 'कॉस्मिक उद्घोषणा' है।
मेरे उच्च कोटि के विद्वान आचार्य जन और प्रबुद्ध पाठक अक्सर मुझसे एक ऐसे 'विशुद्ध संकल्प' की मांग करते थे, जिसमें कुछ भी अछूता न रहे। जिसमें सृष्टि का दर्शन भी हो और यजमान की सूक्ष्मतम कामनाएं भी।

 आज मैं आपके समक्ष वही अद्भुत, गूढ़ और परिपूर्ण संकल्प प्रस्तुत कर रहा हूँ।  
यह कोई साधारण संकल्प नहीं है।

 जब कोई विद्वान आचार्य यज्ञ मंडप में इसे नाद स्वर में पढ़ेगा, तो सुनने वालों के रोंगटे खड़े हो जाएंगे और उन्हें लगेगा— "हाँ, इसे कहते हैं संकल्प!"
 जहाँ-जहाँ संस्कृत अत्यंत क्लिष्ट है, वहाँ मैंने कोष्ठक में उसका सरल अर्थ लिख दिया है, ताकि भाव पूरी तरह स्पष्ट हो।
इसे ध्यान से पढ़ें, कंठस्थ करें और अपने पास सहेज कर रख लें:

॥ बृहद अनुष्ठान एवं यज्ञ हेतु सम्पूर्ण विशुद्ध सङ्कल्पः ॥

🛑परब्रह्म और ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति का दार्शनिक स्मरण👇

ॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णुः स्वस्ति श्री मन्मुकुन्द सच्चिदानन्द-रूपस्य परब्रह्मणो निर्वाच्य मायया यथाशक्ति विजृम्भिता विद्यायोगात् कालकर्मस्वभावाविर्भूत महत्तोदिताहंकार त्रयोदभूतस्य वियदादि पञ्च केन्द्रिय देवता निर्मिताण्डकटाहे चतुर्दश लोकात्मके लीलयातन्तमध्यवर्ति भगवतः श्रीनारायणस्य  
(अर्थात: सच्चिदानंद परब्रह्म की अनिर्वचनीय माया, महत तत्त्व, अहंकार, पंचतन्मात्राओं और पंचमहाभूतों से निर्मित इस ब्रह्माण्ड रूपी अण्डकटाह (कड़ाहे) और चौदह लोकों के मध्य लीला करने वाले भगवान श्रीनारायण...)  

 🛑सृष्टि, देश और काल का विशुद्ध वर्णन

नाभिकमलोद्भूतस्य सकललोकस्य पितामहस्य ब्रह्मणः सृष्टि कुर्वतस्तदुद्धारणाय प्रजापति प्रार्थितस्य महापुरुषस्य श्री श्वेतवाराहावतारेण ध्रियमाणायामस्यां धरित्र्यां भूर्लोकसंज्ञितायां सप्तद्वीप मण्डितायां क्षीरोदादि समुद्रतद्वीज वलयीकृत लक्षयोजनविस्तीर्णेजम्बुद्वीपे स्वर्गादि सरिद्भिः पाविते निखिल जनपावन कर्तृभिः शौनकादि महामुनि निवास भूते नैमिष्यारण्यादि मोक्षसाधनभूते श्रीमद्भगवतो महापुरुषस्य विष्णोराज्ञया प्रवर्तमानस्य अद्य श्रीब्रह्मणोह्नि द्वितीयपरार्द्धे श्रीश्वेतवाराहकल्पे वैवश्वतमन्वन्तरे अष्टाविंशतितमे कलियुगे कलिप्रथम चरणे भूर्लोके भरतखण्डे भारतवर्षे आर्यावर्तान्तर्गते ब्रह्मावर्त्तैकदेशे पुण्यप्रदेशे

👉(यहाँ यदि काशी में हों तो यह पढ़ें: काश्यां-अविमुक्त वाराणसी क्षेत्रे महाश्मशाने गौरीमुखे त्रिकण्टक विराजिते भागीरथ्याः उत्तरवाहिन्याः गङ्गायाः वामे दिग्भागे)  
(अब अपना वर्तमान स्थान और काल बोलें)

(अमुक) प्रान्ते (अमुक) मण्डलान्तर्गत (अमुक) पुण्यपवित्र ग्रामे (अमुक अयने) (अमुक) ऋतौ (अमुक) संवत्सरे (अमुक) मासे (अमुक) पक्षे (अमुक) तिथौ (अमुक) वासरे (अमुक) राशिस्थिते श्रीसूर्ये (अमुक) राशिस्थिते श्रीचन्द्रे (अमुक) राशिस्थिते श्रीदेवगुरौ शेषेषु ग्रहेषु यथा यथा राशिस्थान स्थितेषु सत्सु एवं ग्रहगुणगण विशेषण-विशिष्टायां शुभपुण्यकाले...  

🛑 यजमान का परिचय एवं कामनाओं का महासागर

... (अमुक) गोत्रः (अमुक) शर्मा, वर्मा, गुप्तोऽहं वा सपत्नीकोऽहं (अत्रागत्यानां सर्वेषां जनानां प्रतिनिधि भूतोऽहं अस्मिन् (अमुक) यज्ञे श्रुतिस्मृतिपुराणोक्त शास्त्रोक्त वेदोक्त तन्त्रोक्त पुण्यफल प्राप्त्यर्थं मम सकुटुम्बस्य सपरिवारस्य तथा च अन्येषां जनानां विशेषतः एतत् प्रान्तीयानां सर्वेषां स्त्री पुंसां च नित्य कल्याण प्राप्त्यर्थं...  
...कायिक वाचिक मानसिक सांसर्गिक चतुर्विध पापक्षय पूर्वकं आध्यात्मिक, आधिदैविक, आधिभौतिक, त्रिविध तापोपशान्तिसकल दुःख शेष निवृत्ति पूर्वकं व्याधादि जरा मृत्यु रोगभय शोकाद्युपसर्ग निवृत्ति-पुरस्सरं...
(अर्थात: काया, वाणी, मन और संसर्ग से हुए चारों प्रकार के पापों का क्षय हो, तथा दैहिक, दैविक और भौतिक तीनों तापों एवं बुढ़ापा, रोग, मृत्युभय आदि शांत हों।)  

मम जन्म कुण्डल्यां प्रश्नकुण्डल्यां लग्न कुण्डल्यां गोचरे च तन्महादशायां अन्तर्दशायां प्रत्यन्तर्दशायां प्रतिप्रत्यन्तर्दशायां सूक्ष्मान्तर्दशायां केचिद्विरुद्ध चतुर्थाष्टम द्वादश स्थान स्थित क्रूर ग्रहास्तैः संसूचितं संसूचयिष्यमाणं पुत्रपौत्रादिसन्तते-रविच्छिन्नाभिवृद्ध्यर्थं...
(अर्थात: जन्मकुंडली, गोचर, या किसी भी सूक्ष्म दशा में यदि ४, ८ या १२वें भाव में क्रूर ग्रह बैठे हों, तो उनका दोष शांत हो।)  

...आदित्यादिनवग्रहानुकुलता सिद्ध्यर्थं इन्द्रादिदशदिक्पालप्रसन्नता सिद्ध्यर्थं धर्मार्थकाममोक्ष चतुर्विध पुरुषार्थ सिद्ध्यर्थं अप्राप्तलक्ष्मीप्राप्त्यर्थं प्राप्तलक्ष्म्याश्चिरकालसंरक्षणार्थं सकलमनेप्सितकामना सिद्ध्यर्थं लोके वा राजद्वारे, सभायां, न्यायालये, उद्योगे, कृषिकार्ये, व्यापारे, समाजेऽपि तद्वारे वा सर्वत्र यशोविजय कीर्तिलाभादि प्राप्त्यर्थं शत्रुप्रराजय सद्धिष्ट सकल्पोक्त कामना सिद्ध्यर्थं च...
(अर्थात: राजदरबार (सरकार), न्यायालय , व्यापार और कृषि हर जगह विजय हो और शत्रुओं का पराभव हो।)  

...इह जन्मनि जन्मान्तरे वा सकलदुरितोपशमनार्थं गृहे विपुल धन-धान्य ऐश्वर्यादि-अभिवृद्धिपूर्बकं गृहे सर्वेषां जनानां शरीरे उत्पन्न एवं उत्पत्स्यमाण समस्त रोग व्याधि कष्ट पीडा निवारणपूर्बकं शरीरे दीर्घायुष्यनैरोग्य कीर्तिलाभक्षेमस्थैर्य सद्धर्म सद्बुद्धि सद्विद्या सद्विवेक सदाचारादि प्राप्त्यर्थं सनातन धर्मेस्मिन् अतिशयश्रद्धाभक्तिसंवृद्ध्यर्थं, धार्मिकग्रन्थानां पुराणानां सर्वासामं विद्यानां संवृद्ध्यर्थं विशेषतः स्वधर्मे सनातनधर्मे प्रीतिविवर्द्धनार्थम-
सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु, मा कश्चिद् दुःखभाग्भवेत्।।  

🛑 प्राकृतिक आपदा निवारण एवं अनुष्ठान का अंतिम संकल्प

इति सदुद्देश्यसिद्धिद्वारा विश्वस्मिन् जगति सर्वविधशान्त्यर्थं धर्मग्लान्यधर्मधर्माभ्युत्थान निवृत्तिपूर्वकं धर्मसंस्थापनार्थं च पुण्यकालेऽस्मिन् सकलदुरितोपशमनार्थं दुर्भिक्ष, अतिवृष्टि, अनावृष्टि, विप्लव भूकम्प पशुरोग कृषिकार्ये च उत्पन्न समस्त बाधा निवारणार्थं निर्विघ्नतापूर्वक प्रचुर अन्न उत्पादनार्थं राजभय चौरभय सर्पभय शत्रुभय अग्निभय रोगभय यानपातानादिभय दुस्संगजन्याकस्मिकभय तथा नानागतभयनिवारणार्थं...
(अर्थात: अकाल, अतिवृष्टि, भूकंप, पशुओं के रोग, दुर्घटना, सर्प भय, अग्नि भय आदि सभी ज्ञात-अज्ञात भयों का निवारण हो।)  

...नवग्रह-जन्यपीडा शान्त्यर्थं उपस्थितानां समेषां जनानां कल्याणार्थं तथा डाकिनी-शाकिनी-भूत-प्रेत-पिशाच-वेतालादिभय निवारणार्थं विशेषतः जगन्नियन्ता अनन्तकोटि ब्रह्माण्डनायकस्य भगवतः सूर्यमण्डलावर्ति जगद्वीज पुरुषोत्तम वैकुण्ठाधिपतेः श्रीसीतारामयोः वा साम्बसदाशिवस्य वा लक्ष्मीनारायणयोः वा जगदम्बिकयोः अनुग्रह प्राप्त्यर्थं सग्रहमखं (शिवशक्ति या अपने हिसाब से यज्ञादि का नाम)
 यागकर्म एभिर्द्विजकुलावंतसैः शम-दमादि-निखिल-गुणगण-भरितैः विद्वद्भिः सह अद्यरभ्य पूर्णाहुति पर्यन्तं करिष्ये।  
तदङ्गत्वेन स्वस्तिपुण्याहवाचनं मातृकापूजनं, वसोर्धारा-पूजनमायुष्य मन्त्रजपं साङ्कल्पिकेन विधिना नान्दीश्राद्धमाचार्यादि वरणञ्च करिष्ये।
तथा च मण्डपप्रवेशपूर्वकं वास्तुपूजनं, मण्डपपूजनं, चतुःषष्टियोगिनीपूजनं क्षेत्रपालनवग्रहपूजनं असंख्यात् सर्वतोभद्रपूजनं च करिष्ये।
तत्रादौ निर्विघ्नतासंसिद्ध्यर्थं गणैशाम्बिकयोः पूजन महं करिष्ये।  

(इतना बोलकर हाथ का जल, अक्षत और द्रव्य सामने पात्र में छोड़ दे

मंत्र यानी बांधने का उपाय-

मंत्र यानी बांधने का उपाय-
      

             मेरा जब जनेऊ हुआ तो उस समय मेरी उम्र 7साल की थी,पिता ने बड़े जतन के साथ वैदिक रीति से हम सब भाईयों का जनेऊ कराया। साथ में दो और भाईयों का जनेऊ हुआ। स्व.कामेश्वर नाथ चतुर्वेदी,श्रीजी मंदिर –यमुनाजी धर्मराज मंदिर वाले मेरे दीक्षागुरू बने, उन्होंने ही मंत्र दीक्षा दी,पहले गायत्री मंत्र की दीक्षा दी,साथ में बाला और भुवनेश्वरी के मंत्रों की दीक्षा दी,पिता के पास पहले से ही महात्रिपुरसुंदरी यंत्र थे।यानी बचपन से तीन देवियों गायत्री,बाला और भुवनेश्वरी की उपासना पद्धतियां जीवन में शामिल हो गयीं।बचपन के तकरीबन 12साल सघन आराधना-उपासना में बीते।मैं सुबह 4बजे उठता था,उठकर पढ़ता था, आधा गिलास चाय माँ बनाकर 4बजे ही दे देती थी।सात साल की उम्र से लेकर 12 साल की उम्र तक तो सुबह उठकर संध्या आदि करने के अलावा समूची तांत्रिक पद्धति से पूजा उपासना में पाँच-छह घंटे खर्च करता था। घर में ही पूजा की बढ़िया व्यवस्था थी।बाद में 11 साल की उम्र से माथुर चतुर्वेद संस्कृत महाविद्यालय पढ़ने जाने लगा तो दैनंदिन जीवन में बदलाव आया।पूजा के घंटे कम हो गए,पढाई के घंटे बढ़ गए। इनमें सुबह का पढ़ना शामिल हो गया,पहले सुबह उठकर कम पढ़ता था, पूजा-उपासना में मन ज्यादा लगाता था।

         मेरा घर यमुना के किनारे है और यमुना के उस पार एक बगीची खरीदी गयी उसका एकमात्र मकसद ही यही था कि पूजा के लिए फूलों को लाना।मेरी पूजा में तकरीबन डेढ़ दो किलो फूल लगते थे।इतने फूल रोज खरीदना संभव नहीं था। यह बगीची आज भी है,दुर्वासा ऋषि के आश्रम के पास ही ईसापुर ग्राम में, वहां भी पिता ने एक मंदिर बनवाया था, मैं सुबह ही सुबह पांच बजे के करीब रोज पिता के साथ वहां नाव में बैठकर निकल जाता और वहां घंटों रहता,नहाना-धोना-पूजा-भजन आदि करना,नाश्ता के तौर पर वहीं पर फल आदि तोड़कर खाना,यह दैनिक क्रिया तकरीबन 7-8 साल चली। दिलचस्प बात यह है कि मैंने जितना भजन-पूजन किया मेरे जीवन के दुख कम नहीं हुए।इससे एक बात बचपन में ही समझ में आ गयी कि भजन-पूजन-ईश्वरोपासना का दुख दूर करने से कोई संबंध नहीं है। हकीकत यह थी कि जितना भजन मैंने किया शायद मेरे साथ के किसी मित्र ने नहीं किया।जितनी पूजा मैंने की,उतनी किसी ने नहीं की।सब कुछ मंत्रबद्ध,सही पद्धति के साथ बेहतरीन गुरूओं के निर्देश में किया।इस मामले मैं मेरे असल गुरू तो पिताजी ही थे,वे तंत्र के पारंगत विद्वान हैं,वेदों का उन्होंने गंभीरता से अध्ययन किया है। दीक्षागुरू कामेश्वरनाथ जी निजी तौर पर बेहतरीन इंसान थे, हमें बेहद प्यार करते थे। इस वाकया को बताने के दो प्रधान कारण हैं ,पहला, निजी जीवन की तलाश,दूसरा,मंत्र के साथ अपने संबंध की नए सिरे से खोज।मंत्र जप मुझे आज भी प्रिय है,मैं मंत्र जप करता हूँ।आमतौर पर अजपा-जप करता हूँ।यानी मन ही मन मंत्र जप चलता रहता है।

मंत्र का एक रूप वह है जिसे पूजा-उपासना के संदर्भ में हमलोग जानते और मानते हैं लेकिन मंत्र का एक दूसरा बड़ा अर्थ भी जिसे आमतौर पर लोग नहीं जानते।मंत्र जप के संदर्भ में पहली बात यह कि मंत्र जप से मनोकामना कभी पूरी नहीं होती,मंत्र जप से सिद्धियां प्राप्त नहीं होतीं,ये सब बातें पाखंडियों की रची गयी हैं।मंत्र का प्रयोजनमूलक उद्देश्य पाखंडियों की सृष्टि है।मंत्र तो असल में जीवन को बाँधने का उपाय है।आप अपने जीवन को किस तरह के तारों से बाँधना चाहते हैं यह मंत्र से तय होता रहा है।मंत्र यानी जीवन बाँधने की कला।मंत्र को यदि जीवन जीने की कला के रूप में लें और देखें तो हमारे धर्म के अनेक संकट और व्याधियां खत्म हो जाएं।अनेक पाखंड खत्म हो जाएं।मंत्र का मतलब पाखंड से किसने जोड़ा हमें नहीं मालूम, लेकिन यही सच्चाई है कि मंत्र आज पाखंड का अंग है।जीवन जीने के अनेक रूप हैं उनमें से आपको चुनना होगा कि कैसे जिओगे,मंत्र असल में जीने के मार्ग को बांधने, नियोजित करने,संगठित,अनुशासित होकर जीने की कला है।

जीवन आज सबसे ज्यादा बिखरा हुआ है, भयानक अराजकता है, जीवनशैली के रूपों में अराजकता है , हमारे पास जीवनशैली को बांधने,संगठित करने का कोई उपाय नहीं है, पुराने जमाने में मंत्र का आविष्कार असल में जीवन बाँधने की कला के रूप में हुआ ,उसके हजारों-लाखों रूप हमें परंपरा में मिलते हैं, लाखों मंत्र मिलते हैं।जीवन जीने के लिए मंत्र जरूरी है,मंत्र के बिना जीवनशैली के अव्यवस्थित और अराजक हो जाने के चांस ज्यादा हैं।मंत्र का दूसरा पहलू है उदात्तता।मंत्र हमें क्षुत्रताओं से परे ले जाता है, निहित-स्वार्थों से परे ले जाता है।

रवीन्द्र नाथ टैगोर ने सही लिखा है ´मंत्र नामक वस्तु जीवन बाँधने का एक उपाय है।मंत्र का सहारा लेकर हम चिंतन के विषय को मन के साथ बाँधे रहते हैं।यह मानो वीणा की खूँटी,उसके कान की तरह है।तार को ऐंठ कर बाँधे रखने का साधन,वह तार को खुलकर अलग नहीं होने देता,उसे कस कर बाँधे रखता है।विवाह के समय स्त्री-पुरूष के वस्त्रों को गाँठ लगाकर बाँध दिया जाता है।इसके साथ मंत्र पढ़ दिए जाते हैं,वे मंत्र मन में ग्रंथि-बंधन करते रहते हैं।ईश्वर के साथ हमारे ग्रंथि-बंधन की जो जरूरत है,मंत्र उसमें सहायता करता है। इस मंत्र के सहारे हम उनके साथ अपना कोई एक संबंध पक्का कर लेंगे। वैसा एक मंत्र है पिता नोsसि।आप मेरे पिता है।मंत्र के इस सुर में अपने जीवन को बाँध लेने पर सारी चिन्ताओं,सारे कर्मों में एक विशेष रागिनी झंकृत हो उठेगी।मैं उनका पुत्र हूँ यही उक्ति साकार होकर हमारे सारे कार्य कलापों में प्रकाशित होने लगेगी कि मैं उनका पुत्र हूं।´

कहने का आशय यह कि मंत्र के मर्म को हम भूल गए और उसे हमने व्यवहारवाद,अवसरवाद, फल प्राप्ति के उपायों का सहारा बना दिया।मैं भी कभी-कभी किसी के मन संतोष के लिए उपाय के तौर पर मंत्र सुझा देता हूँ लेकिन सच यही है कि मंत्र उपाय नहीं है बल्कि मंत्र जीवन को बाँधने की कला है।संगठित नियमित जीवन जीना है तो मंत्र से सीखो।किसी अन्य से नहीं।