Thursday, 20 August 2026

65 साल में जीवन किताब जैसा नहीं, ग्रंथ जैसा

संतोष में ही सुख है--
65 साल में जीवन किताब जैसा नहीं, ग्रंथ जैसा लगने लगता है — हर पन्ने पर कुछ नया अर्थ निकलता है।

65 बसंत देख लिए। बहुत कुछ पाया, बहुत कुछ खोया भी।
जवानी में लगता था — और मिल जाए, थोड़ा और बड़ा घर, थोड़ा और नाम।
दौड़ते-दौड़ते एक दिन समझ आया, दौड़ का कोई अंत ही नहीं है।
जवानी में लगता है पैसा, पद, मकान सब कुछ है। इस उम्र में समझ आता है कि बिना घुटनों में जान और नींद पूरी हुए, कुछ भी काम का नहीं। रोज़ 30 मिनट टहलना, हल्का खाना और समय पर सोना - यही सबसे बड़ा इन्वेस्टमेंट है।

रिश्ते निभाने से चलते हैं, जताने से नहीं
खून के रिश्ते हों या दोस्ती, जोर से नहीं, रोज़ की छोटी-छोटी परवाह से टिकते हैं। एक फोन कर लेना, हाल पूछ लेना, माफ कर देना - यही रिश्तों को बचाता है। इस उम्र में भीड़ नहीं, दो-चार सच्चे लोग चाहिए।

 अहंकार सबसे भारी बोझ है
हमने बहुत साल "मैं सही हूँ" साबित करने में लगा दिए। अब लगता है - झुक जाने में, "कोई बात नहीं" कह देने में ज्यादा शांति है। जीतने से ज्यादा जरूरी है मन का शांत रहना।

समय किसी के लिए नहीं रुकता
जो काम कल पर टाला, वो अक्सर छूट ही गया। इसलिए जो अच्छा लगे - बच्चों से बात करना, कहीं घूम आना, कोई पुरानी इच्छा पूरी करना - आज ही कर लेना चाहिए।

फिर एक दिन नदी के घाट पर बैठा था, नदी बह रही थी। कोई शोर नहीं, कोई होड़ नहीं। बस बह रही थी, अपने में मस्त। तभी मन ने कहा — सुख बाहर नहीं, भीतर है।

आज समझ में आता है:

तुलना ही दुख की जड़ है। दूसरे के पास क्या है देखने लगो तो अपना सब कुछ छोटा लगने लगता है। और अपने पास जो है उसे देखो तो लगता है, ईश्वर ने कितना दिया है।

हमारे पास ललितपुर की मिट्टी की सौंधी खुशबू है, काशी के घाट की शांति है, परिवार का साथ है, दो रोटी इज्जत की है — इससे बड़ा धन क्या होगा?

तुलना करना दुख की जड़ है। दूसरे के पास क्या है, इससे नहीं - अपने पास जो है, उसमें मन लगाने से ही आनंद आता है। ललितपुर की मिट्टी हो या काशी का घाट, जहाँ मन संतुष्ट है, वहीं स्वर्ग है।
मेरा अपना निचोड़: कम चाहो, ज्यादा निभाओ, और हर दिन को प्रसाद समझ कर जियो।

इसलिए अब मेरा मंत्र बहुत सीधा है:
कम चाहो, ज्यादा निभाओ, और हर दिन को प्रसाद समझ कर जियो।
जो मिला है, उसी में आनंद ढूंढो। वही स्वर्ग है।

— शत्रुघ्न सिँह बुंदेला
#संतोषमेंहीसुखहै #जीवनकासबक 
 #बुंदेलखंड #ललितपुर
#PositiveThoughts #HindiSuvichar

Wednesday, 19 August 2026

आरक्षण पाने के लिए

आरक्षण पाने के लिए ८०% भारतीय अपने को नीच तथा हीन स्तर का मान चुके हैं तथा वेसे ही बने रहना चाहते हैं। विद्या अब ज्ञान के लिए नहीं, केवल डिग्री तथा नौकरी पाने के लिए है। यह प्रवृत्ति भ्रष्टाचार को बढ़ा रही है। जो वर्ग अपना ज्ञान तथा कौशल बढ़ाकर सम्मानित बनना चाहता था, उस वर्ग के नेता भी नपुंसक की तरह अपने वर्ग के विरुद्ध कह रहे हैं। केवल व्यक्तिगत रूप से अपनी सन्तान को पढ़ने के लिए तथा व्यवसाय के लिए विदेश भेजते हैं। १९६५ तक प्रतिभा पलायन की चिन्ता होती थी, जब तक मूल संविधान के अनुसार २५% आरक्षण था। उसके बाद लूट मार तथा वोट खरीदने के लिए आरक्षण तथा सवर्ण दमन बढ़ता गया। अब विपरीत चिन्ता है कि शिक्षित भारतीयों को कैसे भारत से भगाया जाय। अमेरिका ने जब भारतीयों के प्रवेश को सीमित किया तब पूरे विश्व में खोज होने लगी कि शिक्षित भारतीय कहां भाग कर जायें-पारम्परिक शत्रु देश भी भारतीयों के लिए स्वर्ग जैसा दीखने लगा है। उसके अतिरिक्त आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, इजराइल, कनाडा, जापान, जर्मनी, ब्रिटेन, फ्रांस, स्पेन, हंगरी, रूस, नार्वे आदि भी शिक्षित भारतीयों के लिए स्वर्ग समान हैं। ८०% की मुफ्त शिक्षा का भार २०% सवर्ण उठा रहे हैं। अतः आने जाने का खर्च मिलाकर भी चीन, रूस, आस्ट्रेलिया आदि में मेडिकल या इंजीनियरिंग पढ़ना सस्ता पड़ता है। भारत में एकमात्र योग्यता जाति प्रमाणपत्र है, अतः उज्बेकिस्तान, यूक्रेन आदि का भी स्तर भारत से अच्छा है। विश्वगुरु के मिथ्या अहंकार का देश अभी शिष्य बनने योग्य भी नहीं है। नेताओ को देश नष्ट होने की कोई चिन्ता नहीं है। वे भारत से धन लूट कर विदेश में जमा कर रहे हैं तथा वहीं उनकी सन्तान बस रही है।

बजरंग बाण निष्फल जा रहा

क्या आपका बजरंग बाण निष्फल जा रहा है? जानिए वो गुप्त नियम जो कोई नहीं बताता!
इसीलिए शास्त्र कहते हैं ये तीर की तरह है। तीर निशाना लगाएगा ही, लेकिन अगर चलाने वाला अनाड़ी हुआ तो तीर पलट कर उसी को लग जाता है।

बजरंग बाण कब पलट कर लगता है?

जब आप 3 भाव से करते हो:
1. बदले के भाव से - किसी का बुरा हो जाए इसलिए 2. अहंकार के भाव से 3. अशुद्धता के भाव से - मन में वासना, 
जब आप एक ही भाव से करते हो - "हे प्रभु, मैं असहाय हूँ, मेरी रक्षा करो"

ये रक्षा का बाण है, हमले का नहीं। 
आज के समय में जब व्यक्ति चारों तरफ से संकटों, गुप्त शत्रुओं, कोर्ट-कचहरी और मानसिक तनाव से घिर जाता है, तो उसे केवल एक ही सहारा नजर आता है—महावीर हनुमान। हनुमान जी की भक्ति में 'बजरंग बाण' को सबसे अचूक और तीव्र प्रभाव दिखाने वाला माना गया है।
लेकिन क्या कारण है कि कई लोग महीनों तक इसका पाठ करते हैं, फिर भी उन्हें वो परिणाम नहीं मिलता जो मिलना चाहिए? क्या बजरंग बाण का पाठ रोज़ करना चाहिए? या इसकी कोई विशेष विधि है? आइए आज इसके पीछे के उस रहस्य और सही विधि को जानते हैं, जिससे यह पाठ सीधे जागृत हो जाता है।
 सबसे बड़ी भूल: क्यों बजरंग बाण साधारण पाठ नहीं है?
कई साधक इसे हनुमान चालीसा की तरह एक सामान्य प्रार्थना समझ लेते हैं। यहीं पर सबसे बड़ी चूक होती है। बजरंग बाण में हनुमान जी को "श्री राम की सौगंध" दी जाती है। जब आप किसी देव को उनके सबसे प्रिय आराध्य की सौगंध देते हैं, तो उन्हें तुरंत उस कार्य के लिए अग्रसर होना पड़ता है।
नियम: साधारण और छोटी-मोटी इच्छाओं के लिए कभी भी बजरंग बाण का प्रयोग न करें। इसका प्रयोग केवल तब करना चाहिए जब संकट अत्यंत गंभीर हो, शत्रु हावी हो रहे हों, या जीवन पर कोई बड़ा संकट मंडरा रहा हो।
 बजरंग बाण सिद्ध करने की प्रामाणिक विधि
यदि आप किसी विशेष कार्य या भारी संकट से मुक्ति पाना चाहते हैं, तो इसे एक अनुष्ठान के रूप में करें। 
शुभ समय: यह अनुष्ठान किसी भी मंगलवार, शनिवार या हनुमान जयंती से शुरू किया जा सकता है। समय हमेशा ब्रह्ममुहूर्त (सुबह 4 से 6) या रात्रि काल (9 बजे के बाद) का चुनें। रात्रि काल में साधना अधिक तीव्र परिणाम देती है।
आसन और दिशा: लाल रंग का ऊनी आसन लें। आपका मुख पूर्व या उत्तर दिशा की ओर होना चाहिए।
संकल्प: हनुमान जी के सम्मुख गाय के घी का या चमेली के तेल का दीपक जलाएं। दीपक आप 7 अनाज के आटे मै बड के पत्तों मै से जो दूध निकलता है वह मिला कर बना सकत है,या मिट्टी का के सक्त है,
 हाथ में जल और अक्षत (चावल) लेकर अपनी समस्या कहें और संकल्प लें कि आप 11 या 21 दिनों तक रोज़ निश्चित संख्या (जैसे 7, 11 या 21,54,108पाठ) में बजरंग बाण करेंगे।
राम नाम का आश्रय: बजरंग बाण शुरू करने से पहले और बाद मै 1 माला (108 बार) "राम रामाय नमः" या "जय श्री राम" का जाप अनिवार्य है। प्रभु श्री राम का नाम सुनकर हनुमान जी अत्यंत प्रसन्न होते हैं।
भोग मै लड्डू गुड चना मीठा पान तुलसी पत्ता रखे
 साधना के दौरान होने वाले अनुभव और सावधानियां
जब आप पूरी निष्ठा से बजरंग बाण का अनुष्ठान करते हैं, तो शरीर और वातावरण में एक विशेष ऊर्जा (Vibrations) का संचार होने लगता है।
ऊर्जा का अहसास: साधना के दौरान रीढ़ की हड्डी में गर्माहट महसूस होना, शरीर का भारी होना या अचानक कमरे के तापमान में बदलाव महसूस होना बेहद सामान्य है। यह इस बात का संकेत है कि आपकी प्रार्थना स्वीकार हो रही है।
पूर्ण ब्रह्मचर्य: जितने दिन भी आपका अनुष्ठान चले (11 या 21,41दिन), मन, वचन और कर्म से पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन अनिवार्य है।
साधना के समय मन हनुमान जी मै ही लगाए रखे, आपका शरीर जाप कर रहा है मन भौतिक संसार मै घूम रहा है तो ऐसी साधना का कोई लाभ नहीं है,
सात्विक आहार: तामसिक भोजन (प्याज, लहसुन, मांस, मदिरा) से पूरी तरह दूर रहें।
 फलश्रुति: क्या लाभ मिलते हैं?
जो साधक नियमों में बंधकर बजरंग बाण को सिद्ध कर लेता है, उसके जीवन से:
तनाव और नकारात्मक ऊर्जा (Negative Energy) का जड़ से नाश हो जाता है।
गंभीर से गंभीर बीमारियाँ और अकाल मृत्यु का भय टल जाता है।
व्यापार और नौकरी में आ रही गुप्त शत्रुओं की बाधाएं तुरंत शांत होती हैं।
अंत में यही सत्य है: हनुमान जी आज भी इस पृथ्वी पर जागृत देव हैं। आपकी भक्ति जितनी निश्छल होगी, 
मार्केट मै जो पुस्तक मिलती है उसमें 12 से 15 लाइन मिस की हुई है बजरंग बाण की जिससे कोई किसी को हानि न पहुंचाएं या स्वय को हानि न पहुंचे, इसलिए अधूरा दिया गया है,
ऐसी ही जानकारी के लिए पेज को फॉलो कर ले, और पोस्ट को शेयर किया करे,जिससे ऐसी ही जानकारी आपको प्राप्त होती रहे
जय श्री राम। जय हनुमान।
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श्रावण मास उत्सव है तो रहस्य भी।


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श्रावण मास उत्सव है तो रहस्य भी। गूढ़ रहस्य होगा न कि वैदिक ऋषि श्रावण मास को 'नभ' क्यों कहते हैं। नभस् इसलिए क्योंकि जल का अवरोध समाप्त रहता है। इस महीने का सूर्य 'इन्द्र' क्यों है? वह इन्द्र जो द्यौ का पुत्र है और शवसी नाम की गौ से उत्पन्न है। उपेन्द्र विष्णु का बड़ा भाई है, तड़ित और मेघ का स्वामी देवता हैं। 

और अप्सरा! अप्सरा प्रम्लोचा क्यों? वह प्रम्लोचा जिसे इन्द्र ने गोमती तट पर तपस्या कर रहे कंडु ऋषि का तप भंग करने भेजा था। कमाल देखिए कि ऋषि को लगा कि वह प्रम्लोचा पर बस कुछ क्षण के लिए आसक्त हुए थे पर उन्हें साथ रहते ९०७ वर्ष बीत गये थे। जैसे एक महीने का सावन एक क्षण में बीत जाता है। 

फिर गंधर्व कौन? विश्वावसु! वह विश्वावसु जिसे कुंवारियों का अधिपति कहा गया। जिसे कुमारी हृदय पर अधिकार है। सावन में यह 'मन' कैसा 'नम' हो जाता है कि कहीं 'अ-मन' होने लगता। 

और इस माह का नाग कौन? एलापत्र! वह एलापत्र जो ब्रह्मसभा का मान्य सदस्य है। वह एलापत्र जो वंश रक्षा का देवता है। सावन में वंश- परम्परा अक्षुण्ण रखने के जतन आज भी तमाम समुदायों में जीवित हैं। 

और इस श्रावण मास के यक्ष को देखिए। क्या नाम है? श्रोता! भारतीय वेदान्त दर्शन में ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति का एक मार्ग कहा गया श्रवण। तो श्रोता बनना आवश्यक। धर्म-बक उपाख्यान का मूल चरित्र यही। सावन का राक्षस कौन? वर्य ! क्यों? मैं ही प्रधान यही बड़ा अवगुण इसका। 

और ऋषि अंगिरा! स्वयं बृहस्पति के पिता। श्रावण नक्षत्र स्वयं चंद्रमा का नक्षत्र है। चंद्रमा और बृहस्पति का संबंध जगजाहिर है ही। सावन को सावन कहते ही इसीलिए हैं क्योंकि चंद्रमा पूर्णिमा के समय इस नक्षत्र के आस-पास होंगे। “श्रावणः श्रवणनक्षत्रे पौर्णमास्यां भवत्यतः।”

सावन ऋतु, रस, स्मृति, लोकाचार, कृषि, देह, देवता और प्रेम को एक साथ बाँधने वाला सांस्कृतिक रज्जु है। 

सावन आते ही आकाश का रंग बदलता है, धरती की गंध बदलती है, खेतों की भाषा बदलती है और मनुष्य के भीतर भी कोई पुराना संगीत जाग उठता है। सूखी हुई डालियों पर हरियाली लौटती है, कुओं में जल का स्वर आता है, मोर बोलते हैं, झूले पड़ते हैं और लोकगीतों में विरहिणी स्त्री अपने दूर गए प्रिय को पुकारती है—अजहुँ ना आए बालमा, सावन बीता जाए

किन्तु भारतीय परंपरा में सावन केवल प्रकृति का उत्सव नहीं है। यह श्रवण का महीना है—वेद सुनने का, गुरु से ज्ञान ग्रहण करने का, शिव को जल अर्पित करने का, नागों और पृथ्वी के प्रति कृतज्ञ होने का, बहन के हाथ से रक्षा-सूत्र बाँधने का और वर्षा से पुनर्जीवित हुई पृथ्वी के साथ अपने संबंध को फिर से पहचानने का महीना है।

इसलिए सावन को समझना हो तो केवल पंचांग देखना पर्याप्त नहीं। उसे आकाश, आयुर्वेद, कृषि, ज्योतिष, पुराण, वेद, लोकगीत और भारतीय स्त्री-मन—इन सबके बीच रखकर देखना होगा।
 
सूर्य का उत्तरायण से दक्षिणायन की ओर संक्रमण भारतीय कालगणना में अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है। वर्षा ऋतु इसी व्यापक सौर-ऋतुचक्र के भीतर आती है।आधुनिक खगोल-विज्ञान की दृष्टि से देखें तो भारतीय मानसून का वास्तविक कारण पृथ्वी-सूर्य की मौसमी ज्यामिति, स्थल और समुद्र के तापांतर, वायुदाब-प्रणाली तथा वायुमंडलीय परिसंचरण है। अतः यह कहना वैज्ञानिक रूप से उचित नहीं होगा कि “सावन की वर्षा चंद्रमा के कारण होती है।” परंपरा ने इन आकाशीय घटनाओं को एक दूसरे से जोड़कर काल की एक समग्र भाषा बनाई थी। सूर्य ऋतु का नियंता है। चंद्रमा मास का सूचक है।

नक्षत्र काल का चिह्न हैं। और वर्षा पृथ्वी के पुनर्जन्म की सूचना।

सावन का सबसे लोकप्रिय धार्मिक रूप है—शिव का महीना।
“चन्द्रशेखरमाश्रये।” यह चंद्रमा और शिव के संबंध का माह भी अद्भुत रहस्य। एक श्रुति के हिसाब से दोनों साढ़ू भाई हैं आपस में। तो शिव ने साढ़ू को सर चढ़ा रखा है।‌

चंद्रमा मन के अधिपति माने जाते हैं और शिव ‘मनःशमन’ के देवता की तरह भारतीय मानस में प्रतिष्ठित हैं। इसीलिए सावन के सोमवारों में शिवोपासना का जो विस्तार हुआ, उसमें केवल पौराणिक आस्था ही नहीं, चंद्र-मन-शिव-जल के प्रतीकात्मक संबंध को भी पढ़ा जा सकता है।

जल और चंद्रमा का संबंध भी भारतीय चिंतन में बहुत प्राचीन है। चंद्रमा का कलात्मक बढ़ना-घटना, समुद्र के ज्वार-भाटे और जल के साथ उसकी सांस्कृतिक संबद्धता ने चंद्रमा को रस, सोम और जीवन-जल के प्रतीक के रूप में स्थापित किया।

सावन में शिवलिंग पर जलाभिषेक इसलिए केवल एक पूजा-पद्धति नहीं रह जाता। वह वर्षा से भीगी पृथ्वी के बीच मनुष्य द्वारा जल के प्रति व्यक्त किया गया आभार और समर्पण भी बन जाता है।

रामायण के किष्किंधा कांड में मिलता है।राम सुग्रीव से कहते हैं कि श्रावण वर्षा के आरंभ का समय है और वर्षा ऋतु में युद्ध करना उचित नहीं। वर्षा बीतने पर कार्तिक में आकाश निर्मल होगा और तब अभियान आरंभ किया जा सकेगा। यह प्रसंग अत्यंत महत्वपूर्ण है। प्रकृति यहाँ मनुष्य की राजनीति को भी अनुशासित कर रही है।सावन में युद्ध स्थगित है।

कालिदास के मेघदूत में बादल केवल जल लेकर चलने वाला वाष्प-पुंज नहीं है। वह विरही यक्ष का दूत है। मेघ के भीतर संदेश है, स्मृति है, प्रेम है और मिलन की आशा है। कालिदास से कजरी तक बारहमासा से भोजपुरी तक सावन विरह को दृश्य और मिलन को संभाव्य बनाता है।वर्षा बाहर भी होती है और भीतर भी।

सावन सच में भारतीय स्त्री का मन है। लोकगीतों को देखिए? कहीं मायके आई बेटी अपने भाई से कहती है कि उसे फिर ससुराल न भेजा जाए। विवाह के बाद पति से जिद कर मायके लौटना और कहीं इसका उलट भी, सखियों से मिलना, झूला झूलना, मेहंदी रचाना, माता-पिता से मिलना—इन सबको सावन के धार्मिक पर्वों ने एक सांस्कृतिक वैधता दी है। इसलिए हरियाली तीज केवल व्रत नहीं है। वह बेटी के मायके लौटने की सामाजिक कविता भी है।

हरियाली तीज, हरित प्रकृति,श्रावण शुक्ल तृतीया को अनेक क्षेत्रों में हरियाली तीज मनाई जाती है। श्रावण की तृतीया तिथि को तीज-परंपरा से जोड़ने की पुष्टि पंचांग-परंपरा में भी मिलती है। इस दिन प्रकृति का रंग हरा है। हरी चूड़ियाँ। हरी साड़ी मेंहदी।झूला। नीम और आम की डालियाँ। सखियों का समूह। गीत।

यहाँ ‘हरियाली’ केवल वनस्पति का रंग नहीं है। वह उर्वरता का प्रतीक है। वर्षा ने पृथ्वी को गर्भवती किया है। खेतों में अंकुर फूट रहे हैं। वृक्षों में नई पत्तियाँ हैं। स्त्री-सौंदर्य और पृथ्वी-सौंदर्य एक दूसरे का रूपक बन जाते हैं। इसलिए तीज के गीतों में पति की प्रतीक्षा और वर्षा की प्रतीक्षा एक-दूसरे में घुल जाती हैं।

मेघ प्रिय के आने का संकेत है।

श्रावण शुक्ल पंचमी आती है—नागपंचमी। इसे केवल ‘साँपों की पूजा’ कह देना भारतीय परंपरा की जटिलता को बहुत छोटा कर देना होगा। भारतीय कृषि-समाज में नाग का संबंध खेत, मिट्टी, जल और भूमिगत संसार से रहा है। साँप चूहों जैसे कृंतकों को नियंत्रित करते हैं; कृषि-पर्यावरण में उनकी भूमिका महत्वपूर्ण है।

धार्मिक प्रतीक में नाग, भूमि के भीतर की शक्ति हैं, जल से जुड़े हैं, कुण्डलित ऊर्जा के प्रतीक हैं, अनन्त के प्रतीक हैं, और शिव के कंठ का अलंकार भी हैं। सावन में नागपंचमी का आना इस बात की सांस्कृतिक स्मृति है कि मनुष्य अकेला जीव नहीं है; उसका जीवन असंख्य अन्य प्राणियों के साथ साझा है।

अब सावन के सबसे गंभीर बौद्धिक पक्ष की बात कर लें।
सावन का एक ऐसा पक्ष भी है जो लोक-उत्सवों की चमक में अक्सर छिप जाता है—श्रावणी उपाकर्म। मनुस्मृति कहती है—
“श्रावण्यां प्रौष्ठपद्यां वाप्युपाकृत्य यथाविधि।
युक्तश्छन्दांस्यधीयीत मासानर्धपञ्चमान्॥”
— मनुस्मृति 4.95
अर्थात् श्रावण की पूर्णिमा पर विधिपूर्वक उपाकर्म करके वेदाध्ययन किया जाए। गौतम धर्मसूत्र भी श्रावण पूर्णिमा को वार्षिक वेदाध्ययन के आरंभ से जोड़ता है। यजुर्वेदीय परंपरा में श्रावण पूर्णिमा का उपाकर्म आज भी एक महत्वपूर्ण वैदिक संस्कार है। विभिन्न शाखाओं के लिए नक्षत्र और तिथि की सूक्ष्म भिन्नताएँ भी धर्मशास्त्रीय ग्रंथों में मिलती हैं। 
यहाँ सावन का एक अद्भुत अर्थ खुलता है—
श्रावण = श्रवण।
वर्षा बाहर हो रही है और भीतर वेद की वाणी का श्रवण प्रारंभ हो रहा है।
बाहर बादल गरज रहे हैं;
अंदर ऋषियों की वाणी गूँज रही है।
यह संयोग भारतीय सांस्कृतिक चेतना में आकस्मिक नहीं लगता।

उपाकर्म जहाँ वैदिक ज्ञान की रक्षा का संस्कार है, वहीं रक्षा-सूत्र सामाजिक संबंधों की रक्षा का प्रतीक बन जाता है।
धागा यहाँ केवल धागा नहीं है।
वह कहता है—
मैं तुम्हारी रक्षा का संकल्प लेता हूँ और तुम मेरे जीवन की स्मृति में बँधे रहो।
एक ही पूर्णिमा पर—
वेद की रक्षा, संबंध की रक्षा और संस्कार की रक्षा।
यही भारतीय पर्व-व्यवस्था की खूबसूरती है।

अब सावन को शरीर की दृष्टि से देखिए।
वर्षा के साथ तापमान, आर्द्रता, जल की गुणवत्ता, भोजन की उपलब्धता और पाचन-शक्ति—सब बदलते हैं।
आयुर्वेद ने इसीलिए ऋतुचर्या की व्यवस्था की।

चरकसंहिता में वर्षा ऋतु के विषय में कहा गया है कि इस समय वर्षा, आर्द्रता और पृथ्वी से उठने वाले प्रभावों के कारण अग्नि कमजोर पड़ती है और वातादि दोषों का प्रभाव बढ़ता है। इसलिए आहार में संयम और अग्नि की रक्षा पर विशेष बल दिया गया है। 

चरक के अनुसार वर्षा ऋतु में—
पुराना शालि/चावल, जौ,गेहूँ, हल्का एवं सुपाच्य भोजन, उचित मात्रा में मधु आदि का प्रयोग उपयोगी माना गया है; अत्यधिक जलपान, दिन में सोना और अनावश्यक शारीरिक परिश्रम से बचने की सलाह दी गई है। 

सुश्रुत भी वर्षा ऋतु में पाचन और वात की स्थिति को ध्यान में रखते हुए आहार-विहार के विशेष नियम बताते हैं।

आज के संदर्भ में इसका एक व्यावहारिक अर्थ और भी है—मानसून में दूषित जल, संक्रमण, फफूँद, खाद्य-संदूषण और मच्छरजनित रोगों का जोखिम बढ़ सकता है। इसलिए ताजा, स्वच्छ, अच्छी तरह पका हुआ और सुपाच्य भोजन तथा सुरक्षित जल का सेवन आधुनिक सार्वजनिक स्वास्थ्य की दृष्टि से भी विवेकपूर्ण है।
अर्थात् आयुर्वेद का संदेश था—
सावन में प्रकृति बदली है, इसलिए आहार भी बदलो।

बचपन की याद भी है सावन। मां झूला झूल रही है। हम बच्चे पेंग मार रहे हैं। मां गा रही है। 

"हमके मेंहदी मंगा द पिया मोतीझील से
जा के साइकिल से ना "

कि

"छैला छाय रहे मधुबन में सावन सुरत बिसारे मोर।
मोर शोर बरजोर मचावै, देखि घटा घनघोर।।

कोकिल शुक सारिका पपीहा, दादुर धुनि चहुंओर।
झूलत ललिता लता तरु पर, पवन चलत झकझोर।।"

अब भी है सावन हमारी प्रतीक्षा में । पर राजनीति के अलावा अब कुछ और दिखाई नहीं देता 

मधुसूदन उपाध्याय 
लक्ष्मणपुरी

शिव का एक नाम-नक्सलेश्वर भी है.

भगवान शिव के सहस्रनामो (1001 )में एक-नक्सलेश्वर भी है.
कुछ नदी के किनारे विशिष्ट जंगली ('नक्सल' घास पाई जाती है) में स्थापित शिव लिंग को स्थानीय लोग नक्सलेश्वर महादेव के नाम से पूजते है. (भगवान शिव - कार्तिकेय के पिता है) कार्तिकेय - का जन्म,नक्सल जंगली घास की राख से , कृतिका नक्षत्र में हुआ था ) 
तंत्र साधना-1.विद्या माया,2.अविद्यामाया.
(1) में सकारात्मक बौद्धिक रचनात्मकता , जबकि (2)में हठधर्मिता और अंधविश्वास व्याप्त होता है।

Tuesday, 18 August 2026

हनुमान मन्त्र चमत्कार अनुष्ठान पद्धति

।। श्री हनुमान जी मन्त्र चमत्कार अनुष्ठान पद्धति।।
    सन् १९४९ में याज्ञिक सम्राट् पण्डित श्वेणी राम शर्मा गौड़ जी उत्तराखण्ड की यात्रा में आए थे। वे ज्योतिर्मठ में ठहरे थे।। उस समय में तत्कालीन शंकराचार्य अनन्त श्री विभूषित श्रीमद्ज्योतिषपीठाधीश्वर स्वामीश्री ब्रह्मानन्द सरस्वती जी महाराज भी उपस्थित थे। वे रात्रि में उनके दर्शनार्थ गये थे।। कुशल मंगल के अनन्तर उन्होंने श्री गौड जी से कहा :~ "आप प्रतिष्ठित बनारस (काशी विश्वनाथ जी) के वेदज्ञ ब्राह्मण परिवार के वेदज्ञ विद्वान् हो।अतः हम तुमको आशीर्वाद रूप में अत्यन्त प्राचीन हस्तलिखित :~ 🌹"हनुमन् मंत्र चमत्कारानुष्ठान पद्धति "🌹

नाम की लघु पुस्तिका दे रहे हैं।। इसे स्वीकार करो। उन्होंने सहर्ष पुस्तिका प्राप्त की।। जगद् गुरु शंकराचार्य ब्रह्मानंद सरस्वती जी ने कहा हमने जो पुस्तिका तुमको दी है। यह अत्यन्त महत्त्वपूर्ण सिद्धप्रद है।। इसमें बीस मंत्र हैं। प्रत्येक मंत्र का ग्यारह~ ग्यारह हज़ार बार रुद्राक्ष की माला पर श्री हनुमान जी के किसी भी प्राचीन मन्दिर में ब्रह्मचर्य पूर्वक जप करने से सभी मंत्र सिद्ध हो जाते हैं।। मंत्रों को सिद्ध कर लेने के पश्चात् मन्त्रों का प्रयोग करने पर कठिन से कठिन कार्य सुसाध्य हो जाते हैं।"

🌹" हनुमन् मन्त्र चमत्कारानुष्ठान पद्धति "🌹
 
इसका अनुष्ठान करने वाला साधक को चाहिये।कि वह ब्रह्म मुहूर्त में उठकर नित्य क्रिया से निवृत्त होकर प्रत्येक मंत्र की ग्यारह ~ग्यारह हज़ार बार आवृत्ति करके मंत्र को सिद्ध कर ले । पश्चात् आवश्यकता पड़ने पर स्वयं अथवा दूसरे द्वारा अनुष्ठान कर या करवा सकता है।। जप के अनन्तर ११०० मंत्रों से आहुति दें।

सर्व कल्याणार्थ यह पद्धति प्रकाशित की जा रही है।।
 
ब्रह्मचारी रह कर अनुष्ठान कर्त्ता जिस कार्य के लिये जप तथा हवन करें । संकल्प में उसका नामोल्लेख अवश्य करें।।

     ।। मन्त्र।।

१)ॐ नमो हनुमते रुद्रावताराय वायु सुताय अञ्जनी गर्भ संभूताय अखण्ड ब्रह्मचर्य व्रत पालन तत्पराय धवली कृत जगत् त्रितयाय ज्वलदग्नि सूर्य कोटि संप्रभाय प्रकट पराक्रमाय आक्रान्तदिङ् मण्डलाय यशो वितानाय यशोऽलंकृताय शोभिताननाय महासामर्थ्याय महातेजः पुञ्ज विराजमानाय श्री राम भक्ति तत्पराय श्री राम लक्ष्मणानन्द कारणाय कपि सैन्य प्राकाराय सुग्रीव सख्यकारणाय सुग्रीव साहाय्य कारणाय ब्रह्मास्त्र ब्रह्म शक्ति असनाय लक्ष्मण शक्ति भेद निवारणाय शल्य विशल्यौषधि समानयनाय वनरक्षाकर समूह विभञ्जनाय द्रोण पर्वतोत्पाटनाय स्वामि वचन सम्पादितार्जुन संयुग संग्रामाय गम्भीर शब्दोदयाय दक्षिणाशा मार्तण्डाय मेरु पर्वतपीठिकार्चनाय दावानल कालाग्नि रुद्राय, समुद्रलंघनाय सीताश्वासनाय सीतारक्षकाय राक्षसी संघ विदारणाय अशोक वन विदारणाय लङ्कापुरी दहनाय दशग्रीव शिरकृन्तकाय कुम्भकरणादिवध कारणाय वालि निवर्हण कारणाय मेघनाद होम विध्वंसनाय इन्द्रजिद् वध कारणाय सर्वशास्त्र पारंगताय सर्व ग्रह विनाशकाय सर्व ज्वर हराय सर्वभय निवारणाय सर्व कष्ट निवारणाय सर्वापत्ति निवारणाय सर्व दुष्टादि निवर्हणाय सर्व शत्रुच्छेदनाय भूत प्रेत पिशाच डाकिनी शाकिनी ध्वंसकाय सर्व कार्य साधकाय प्राणिमात्र रक्षकाय रामदूताय स्वाहा। 
२)ॐ नमो हनुमते रुद्रावताराय विश्व रूपाय अमित विक्रमाय प्रकट पराक्रमाय महाबलाय सूर्य कोटि सम प्रभाय रामदूताय स्वाहा । 
३)ॐ नमो हनुमते रुद्रावताराय राम सेवकाय राम भक्ति तत्पराय रामहृदयाय लक्ष्मण शक्ति भेदन निवारणाय लक्ष्मण रक्षकाय, दुष्ट निबर्हणाय रामदूताय स्वाहा। नगर निक
४)ॐ नमो हनुमते रुद्रावताराय सर्व शत्रु संहरणाय सर्व रोग हराय सर्व वशी करणाय राम दूताय स्वाहा।
५)ॐ नमो हनुमते रुद्रावताराय आध्यात्मिकाधिदैविकाधिभौतिक ताप त्रय निवारणाय राम दूताय स्वाहा।
६)ॐ नमो हनुमते रुद्रावताराय देवदानवर्षि मुनि वरदाय रामदूताय स्वाहा ।
७)ॐ नमो हनुमते रुद्रावताराय भक्त जन मनः कल्पना कल्पद्रुमाय, दुष्ट मनोरथ स्तम्भनाय प्रभञ्जन प्राण प्रियाय महाबल परिक्रमाय महाविपत्ति निवारणाय पुत्र पौत्र धनधान्यादि विविध सम्पत् प्रदाय रामदूताय स्वाहा ।
८)ॐ नमो हनुमते रुद्रावताराय बज्रदेहाय वज्रनखाय बज्र मुखाय बज्ररोम्णे कान वज्र नेत्राय वज्र दन्ताय वज्र कराय वज्र भक्ताय राम दूताय स्वाहा।
९)ॐ नमो हनुमते रुद्रावताराय परयन्त्र मन्त्र तन्त्र त्राटक नाशकाय सर्व ज्वरच्छेदकाय सर्वव्याधि निकृन्तकाय सर्वभय प्रशमनाय सर्वदुष्ट मुख स्तम्भनाय सर्व कार्य सिद्धि प्रदाय राम दूताय स्वाहा ।
१०)ॐ नमो हनुमते रुद्रावताराय देव दानव यक्ष राक्षस भूत प्रेत पिशाच डाकिनी शाकिनी दुष्ट ग्रह बन्धनाय राम दूताय स्वाहा।
११) ॐ नमो हनुमते रुद्रावताराय पंच वदनाय पूर्व मुखे सकल शत्रु संहारकाय राम दूताय स्वाहा ।
१२)ॐ नमो हनुमते रुद्रावताराय पंच वदनाय दक्षिण मुखे कराल वदनाय नारसिंहाय सकल भूत प्रेत दमनाय रामदूताय स्वाहा।
१३)ॐ नमो हनुमते रुद्रावताराय पंच वदनाय पश्चिम मुखे गरुडाय सकल विघ्न निवारणाय राम दूताय स्वाहा। 
१४)ॐ नमो हनुमते रुद्रावताराय पंच वदनाय उत्तर मुखे आदि वराहाय निट मिसकल सम्पत् कराय रामदूताय स्वाहा।
१५) ॐ नमो हनुमते रुद्रावताराय पूर्व मुखे हयग्रीवाय सकल जन वशीकरण रामदूताय स्वाहा।
१६)ॐ नमो हनुमते रुद्रावताराय सर्वग्रहान् भूत भविष्यद् वर्तमानान् समीपस्थान् सर्वकाल दुष्टबुद्धीनुच्चाटयोच्चाटय परवलान् क्षोभय-क्षोभय मम सर्व कार्याणि साधय साधय स्वाहा।
१७) ॐ नमो हनुमते रुद्रावताराय परकृत यन्त्र मन्त्र पराहंकार भूत प्रेत पिशाच परदृ‌ष्टि परविघ्न तर्जन चेटक विद्या सर्वग्रहभयम् निवारय निवारय स्वाहा।
१८) ॐ नमो हनुमते रुद्रावताराय डाकिनी शाकिनी ब्रह्मराक्षस कुल पिशाचोरुभयं निवारय निवारय स्वाहा।
१९)ॐ नमो हनुमते रुद्रावताराय भूत ज्वर प्रेत ज्वर चातुर्थिक ज्वर विष्णु ज्वर महेशज्वरं निवारय निवारय स्वाहा ।
२०)ॐ नमो हनुमते रुद्रावताराय अक्षि शूल, पक्ष शूल शिरोभयं करशूल पित्त शूल ब्रह्म राक्षस शूल पिशाच कुलच्छेदनम् निवारय निवारय स्वाहा।

ॐ अंजनीसुताय च विद्यमहे,वायुपुत्राय च धीमहि तन्नो हनुमंत प्रचोदयात।।

Monday, 17 August 2026

अटल बिहारी बाजपेई

अटल बिहारी बाजपेई जी का मैने कभी सम्मान नहीं किया।इसकी कुछ ख़ास वजह है। 1989 में अटल बिहारी बाजपेयी ने विश्वनाथ प्रताप सिंह को समर्थन देकर केंद्र में उनकी सरकार बनवा दी। ये व्यक्ति दलितों का मसीहा बनने के लिए पागल था। इसने आते ही मण्डल कमीशन लागू करने के लिए अपनी पूरी शक्ति झोंक दी। केंद्र का पूरा अमला मण्डल कमीशन पर ध्यान केंद्रित किये हुए था। कश्मीर में दूसरा ही षड्यंत्र चल रहा था । राज्यपाल जगमोहन के हटने के बाद पाकिस्तान के सहयोग से कश्मीर में व्यापक रूप से हिन्दू नरसंहार की तैयारी चल रही थी और केंद्र बेखबर था। जबकि कश्मीर की मस्जिदों से हिंदुओं को कश्मीर से बाहर जाने की चेतावनी बार बार दी जा रही थी इसके बावजूद केंद्र सरकार कश्मीर से आँखे मुदें हुए थी। अंततः 19 जनवरी 1990 को हिन्दू नरसंहार का जो खेल खेला गया वो दिल दहला देने वाला था। लाखों हिंदुओं का सुनियोजित तरीके से बर्बरतापूर्ण कत्ल हुआ। बलात्कार की घटनाओं ने भारत पाक विभाजन के रिकार्ड को तोड़ दिया। विश्वनाथ प्रताप सिंह ने इस घटना को बैन करवाने में ज्यादा दिलचस्पी ली जबकि अटल जी ने केवल एक फीका सा दुःख व्यक्त किया। इस घटना पर अटल जी ने न वीपी सिंह से समर्थन वापस लिया और न उनकी इस बात के लिए आलोचना की कि 15 दिन से कश्मीरी मस्जिदों से जो चेतावनी जारी की जा रही थी उनका संज्ञान लेकर हिंदू और सिक्ख सुरक्षा के उपाय क्यों नहीं किए गए ? ये कैसे हिंदूवादी सम्राट थे, ये समझ से बाहर है। 

विश्वनाथ प्रताप सिंह का मण्डल आयोग हिंदुओं में विभाजन का बड़ा कारण साबित हुआ। जातीय खाई और गहरा गयी। हिन्दू खण्ड खण्ड हो गया। हज़ारों युवाओं ने आत्मदाह किया। ये सब जानते हुए भी अटल जी ने मण्डल आयोग पर वीपी का भरपूर समर्थन किया। क्या कोई अपने ही लोगों को खंड खंड करने का षड्यंत्र कर सकता है ?

अटल जी को अच्छी तरह पता था कश्मीर नरसंहार में पाकिस्तान का अहम रोल है इसके बावजूद वे पाकिस्तान से सम्बन्ध सुधारने को सबसे अधिक उत्सुक नज़र आये। अगर स्वर्गीय जनरल परवेज मुशर्रफ की मानें तो कुछ शर्तों पर अटल जी कश्मीर को पाकिस्तान को देने के लिए तैयार भी हो गए थे और इसका ड्राफ्ट मसौदा तैयार भी हो गया था पर अटल जी की सरकार दोबारा न आने से ये ड्राफ्ट परवान न चढ़ सका।समझौता एक्सप्रेस के जरिये हज़ारों आतंकी यात्री बनकर धड़ल्ले से भारत आये। इनकी गहन तलाशी इसलिए नहीं ली जा सकती थी क्योंकि इससे भारत पाक के बीच संबंध खराब होने का खतरा था। इस लापरवाही के फलस्वरूप भारत को कारगिल युद्ध का भी सामना करना पड़ा। 

अटल जी कारगिल युद्ध में वायुसेना का इस्तेमाल न करने की बार बार कसमें खा रहे थे और सीमा पार न करने के अपने वादे को बार बार दोहरा रहे थे, ऐसा कर वे किस नैतिकता का परिचय दे रहे थे ? जिस पाकिस्तान ने उनकी दोस्ती का सम्मान नहीं किया। उसके विरुद्ध वो इतने नैतिक क्यों थे ? अगर भारत वायुसेना का इस्तेमाल करता तो हमारे साढ़े पांच हज़ार सैनिक क्यों मारे जाते ?

अटल जी जिस इसराइल को पानी पी पीकर लगभग रोज कोसा करते थे उसी इसराइल ने अपने जीपीएस सिस्टम से आतंकियों के छिपे होने की स्थिति भारत को उपलब्ध कराई थी और वो भी तब जब दुनिया के सारे देशों ने अमेरिकी दबाव में भारत की किसी भी प्रकार की मदद करने से मना कर दिया था। अगर इसराइल जीपीएस सिस्टम से मदद न करता तो भारत किसी भी कीमत पर कारगिल को आतंकियों से मुक्त नहीं करा सकता था।

रोज़ शराब पीने वाले और टुंडे कबाब खाने वाले अटल जी किस तरफ से पंडित थे ये शोध का विषय है। अगर हिन्दू नेता ऐसे होते हैं तो नहीं चाहिए हमें ऐसे नेता। एक काम वो और कर गए थे जिस पेंशन के सहारे बुजुर्ग बुढ़ापा काटते थे उसे अटल जी ने रद्द कर दिया था और हज सब्सिडी तीन गुना कर गए थे।

लेकिन हां उनकी एक उपलब्धि की अवश्य तारीफ की जा सकती है और वो है पोखरण परमाणु विस्फोट।