Friday, 14 August 2026

उच्छिष्ट गणपति साधना

● उच्छिष्ट गणपति साधना करने में अत्यन्त सरल, शीघ्र फल को प्रदान करने वाला, अन्न और धन की वृद्धि के लिए, वशीकरण को प्रदान करने वाला भगवान गणेश जी का ये दिव्य तांत्रिक साधना है । इसकी साधना करते हुए मुँह को जूठा रखा जाता है एवं सुबह दातुन भी करना वर्जित है ।

उच्छिष्ट गणपति साधना को जीवन की पूर्ण साधना कहा है। मात्र इस एक साधना से जीवन में वह सब कुछ प्राप्त हो जाता है, जो अभीष्ट लक्ष्य होता है। अनेक इच्छाएं और मनोरथ पूरे होते हैं। इससे समस्त कर्जों की समाप्ति और दरिद्रता का निवारण,निरंतर आर्थिक व्यापारिक उन्नति,लक्ष्मी प्राप्ति,रोजगार प्राप्ति,भगवान गणपति के प्रत्यक्ष दर्शनों की संभावना भी है। यह साधना प्रयोग किसी भी बुधवार को रात्रि में संपन्न किया जा सकता है।

साधक निम्न सामग्री को पहले से ही तैयार कर लें, जिसमें जल पात्र, केसर, कुंकुम, चावल, पुष्प, माला, नारियल, दूध,गुड़ से बना खीर, घी का दीपक, धूप-अगरबत्ती, मोदक आदि हैं। इनके अलावा उच्छिष्ट गणपति यंत्र और मूंगे की माला की आवश्यकता होती है।

सर्वप्रथम साधक, स्नान कर,लाल वस्त्र पहन कर,आसन भी लाल रंग का हो, पूर्व/उत्तर की ओर मुख कर के बैठ जाए और सामने उच्छिष्ट गणपति सिद्धि यंत्र को एक थाली में, कुंकुम से स्वस्तिक बनाकर, स्थापित कर ले और फिर हाथ जोड़ कर भगवान गणपति का ध्यान करें।

विनियोग :-ॐ अस्य श्री उच्छिष्ट गणपति मंत्रस्य कंकोलऋषि:, विराट छन्द : उच्छिष्ट गणपति देवता सर्वाभीष्ट सिद्ध्यर्थे जपे विनियोग: ।

ध्यान मंत्र:
सिंदुर वर्ण संकाश योग पट समन्वितं लम्बोदर महाकायं मुखं करि करोपमं अणिमादि गुणयुक्ते अष्ट बाहुत्रिलोचनं विग्मा विद्यते लिंगे मोक्ष कमाम पूजयेत।

ध्यान मंत्र बोलने के बाद अपना कोइ भी एक इच्छा बोलकर यंत्र पर एक लाल रंग का पुष्प अर्पित करे।

द्वादशाक्षर मन्त्र :- ॐ ह्रीं गं हस्ति पिशाचि लिखे स्वाहा।

om hreeng gang hasti pishaachi likhe swaha

मंत्र का नित्य 21 माला जप 11 दिनो तक मूंगे की माला से करना है! 

अंत में अनार का बलि प्रदान करें।

बलि मंत्र:- ॐ गं हं क्लौं ग्लौं उच्छिष्ट गणेशाय महायक्षायायं बलि:।

अंत में शुद्ध घृत से भगवान गणपति की आरती संपन्न करें और प्रसाद वितरित करें। इस प्रकार से साधक की मनोवांछित कामनाएं निश्चय ही पूर्ण हो जाती हैं और कई बार तो यह प्रयोग संपन्न होते ही साधक को अनुकूल फल प्राप्त हो जाता है।

कलियुग में यह साधना शीघ्र फलदायी है

Wednesday, 12 August 2026

मोदी modi

2075 तक इस्लाम भारत को टेक ओवर कर लेगा 
FCRA: 4 पादरियों ने मिलकर सरकार की गेंद फाड़ दी 
कुछ चापलूस यूट्यूबर्स की पुष्पवर्षा भी बेकार चली गई

-दिलीप पाण्डेय

भारत के एक बहुत ही प्रसिद्ध ज्योतिषी ने कल भविष्यवाणी की है कि अगर ऐसी ही स्थिति बनी रही तो 2075 तक इस्लाम भारत पर कब्जा कर लेगा । हिंदू इस वक्त भारत में अपने आस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है । पाकिस्तान बनने के बाद से ही भारत लगातार गजवा ए हिंद की तरफ बढ़ने लगा । हिंदुओं को उम्मीद थी कि मोदी सरकार में ये रफ्तार घटेगी लेकिन अफसोस की बात ये है कि मोदी सरकार ने विभिन्न योजनाओं में अकूत लाभ देकर भारत के मुगलमानों को धन संपदा से  गच्च कर दिया है । मनमोहन सरकार से ज्यादा तेज इस्लामीकरण मोदी राज में हुआ है । इन 15 सालों में सबसे  ज्यादा वक्फ की जमीनें हड़पी गईं और वक्फ के संशोधन में सरकार अपने इस पाप का प्रायश्चित करने में नाकाम रही । ये व्यवस्था नहीं हो सकी कि हिंदुस्तान की जो जमीन हड़प ली गई है वो अब वापस कैसे आएगी ? 370 हटाने का कोई लाभ नहीं हुआ, कश्मीर में जनसंख्या अनुपात बदलने का सरकार का कोई टारगेट ही नहीं नजर आता है बल्कि रोहिंग्या को बसाकर जम्मू में भी हिंदुओं का प्रतिशत इन्हीं 15 सालों में कम कर दिया गया । अब जम्मू में यही रोहिंग्या खरगोश की तरह बच्चे पैदा करके हिंदुओं के  लिए संकट पैदा कर रहे हैं और ये सब मोदी राज में ही हो रहा है । मोदी की रीढ़ इतनी कमजोर है कि वो इन रोहिंग्या को देश से बाहर निकालने का फैसला भी नहीं ले सकता है !

मुझे मोदी पर गुस्सा इसीलिए आता है क्योंकि उन्होंने देश के इस्लामीकरण की रफ्तार को धीमा करने के लिए कुछ भी ठोस नहीं किया है ।

मोदी के समर्थकों के पास बस एक ही रटा रटाया जवाब है राम मंदिर । उनको ये सोचना चाहिए कि राम मंदिर तब तक ही उपलब्धि था जब तक वो नहीं बना था जब वो बन गया तो अब ये कोई उपलब्धि नहीं बल्कि हिंदू समाज पर एक भारी, बड़ी और गंभीर जिम्मेदारी है कि आगे 1000 साल तक ये राम मंदिर जिहादियों से कैसे सेफ रह पाएगा ? मैं आगे देख रहा हूं जबकि मोदी समर्थक पुरानी बातों में खोए हुए हैं जिसका अब कोई अर्थ नहीं रह जाता है ।

यूजीसी आंदोलन भी मोदी राज की ही देन है । हिंदुओं के अंदर सोई हुई जातीय घृणा को गलत नीतियों के माध्यम से खूंखार रूप देकर जगाने का घटिया काम भी मोदी सरकार ने ही किया है । इस साल कई नई पार्टियों की तरफ से मुझको अप्रोच किया गया कि पाण्डेय जी आप भी हमारी पार्टी में शामिल हो जाइए लेकिन मैंने उनको हमेशा इग्नोर किया है मैंने कभी ऐसे लोगों की एक भी पोस्ट को लाइक तक नहीं किया है उसकी वजह यही है कि मैं अच्छी तरह जानता और समझता हूं कि जातिवाद भारत की असल चुनौती है ही नहीं । भारत में कभी जातिवादी युद्ध हुए ही नहीं, जैसा कि दुनिया में शिया सुन्नी युद्धों में नजर आता है । भारत का असली संकट जिहाद है । ये यूजीसी के बाद बन रही पार्टियां कुछ निश्चित समय का सर्कस है । इसमें से वही पार्टी आगे सर्वाइव कर पाएगी जो हिंदुत्व के मसले पर लड़ने के योग्य होगी । 

इस वक्त मोदी सरकार एक रीढ़विहीन सरकार साबित हो चुकी है । वक्फ के समय भी 4 मौलानाओं की मेल मुलाकातों ने सरकार का सिस्टम फाड़ दिया था और अब FCRA में 4 पादरियों ने मोदी और अमित शाह की गेंद फाड़ दी । यही कटु सत्य है कि ये बिल ठंडे बस्ते में जा चुका है जबकि इस बिल में ईसाइयों के  खिलाफ कुछ भी ठोस काम नहीं होने जा रहा था । मोदी की चापलूसी में रत रहने वाले कुछ यूट्यूबर्स और फिल्म सिटी के मेन मीडिया ने FCRA को बहुत महान मास्टरस्ट्रोक साबित करने के लिए जो झूठा यशोगान और पुष्पवर्षा शुरू की, उसका असर ये हुआ कि 4 पादरी अमित शाह से आकर मिले और बिल को ठंडे बस्ते में पहुंचा दिया जबकि ये बिल पहले भी कोई विशेष महत्व का नहीं था । लेकिन मोदी की चापलूूसी में रत रहने वाले यूट्यूबर्स ने इसे विशेष बता कर प्रचारित किया जिसका असर ये हुआ कि पादरियों ने सरकार की गेंद आसानी से फाड़ दी ।

गुरुकुलों को नष्ट करने के लिए कौन्वैंट खोले


मैकौले के सर्वेक्षण और निष्कर्ष के बाद गुरुकुलों को नष्ट करने के लिए कौन्वैंट खोले गए जिन्हें फ्री स्कूल कहा जाता था परंतु गुरुकुल बदस्तूर चलते रहे,साढे़ सात लाख गांवों में सात लाख के करीब गुरुकुल थे जिनका भार ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर ही था!
जब गुरु कुलों को खत्म ना किया जा सका तब 1912 में बाकायदा कानून बनाकर गुरु कुलों को गैरकानूनी घोषित कर नष्ट किया गया और गुरुओं को परिवार सहित उत्पीड़न किया गया,सहायक ग्रामीणों का भी वही हाल हुआ!
तब गुरु कुल स्थानीय मंदिरों से सम्बद्ध हुआ करते थे तो मंदिरों का भी सरकार ने अधिग्रहण कर लिया और मंदिरों की सुनियोजित लूट हुई और ये सिलसिला तथाकथित आजादी के बाद भी जारी है जबकि ईसाई धर्मस्थल चर्च और इस्लामी धर्म स्थल मस्जिद दरगाहें सरकारी नियंत्रण से बाहर रहे!
जैसे शिकार के लिए कुत्तों का इस्तेमाल होता है अंग्रेजों ने मुसलमानों का इस्तेमाल सनातनियों को निपटाने के लिए किया!
ब्रिटिश संगठन कांग्रेस ने वही काम कानून बनाकर तथाकथित आजादी से पहले से ही शुरू कर दिया था जो जारी रहा!
फर्जी पंडित बाबर वंशी नैहरू ने हिंदू कोड बिल लाकर परिवार को नष्ट करने के विवाह संस्था पर हमला किया तलाक की व्यवस्था कर के और मंदिर व्यवस्था और वंशानुगत संपत्ति वितरण पर प्राविधान किए!

Tuesday, 11 August 2026

पुरुष

एक उम्र के बाद
आदमी को कुछ नहीं चाहिए होता
न कोई जीत,
न कोई प्रमाण,
न कोई ताली।

बस एक ऐसी जगह चाहिए होती है
जहाँ उससे कोई सवाल न किया जाए।

जहाँ उसे हर बात के लिए
अपने होने का कारण न बताना पड़े।

शायद पचास के आसपास
आदमी पहली बार समझता है
कि थकान शरीर में नहीं होती,
थकान उन तमाम जवाबों में होती है
जो उसने पूरी ज़िंदगी देते-देते जमा कर लिए हैं।

बचपन में
माँ ने पूछा
“इतनी देर से क्यों आए?”

पिता ने पूछा
“पढ़ाई कैसी चल रही है?”

स्कूल ने पूछा
“कितने नंबर आए?”

रिश्तेदारों ने पूछा
“बड़े होकर क्या बनोगे?”

और वह हर बार
एक नया जवाब लेकर खड़ा हो गया।

फिर जवानी आई।

तब सवाल बदल गए

“कमा कितना लेते हो?”

“कहाँ काम करते हो?”

“अपना घर कब होगा?”

“शादी कब करोगे?”

“बच्चे कब होंगे?”

और उसने फिर
अपनी ज़िंदगी को
उन सवालों के हिसाब से काट-छाँटकर
एक ऐसा आदमी बनने की कोशिश की
जिसे दुनिया स्वीकार कर सके।

फिर प्रेम आया।

वहाँ सवाल और कठिन थे

“तुम मुझसे कितना प्यार करते हो?”

“तुम्हें मेरी परवाह क्यों नहीं दिखती?”

“तुमने ऐसा क्यों कहा?”

“तुमने वैसा क्यों नहीं किया?”

और उसने सीखा
कि कभी-कभी प्यार करने से ज्यादा मुश्किल होता है
अपने प्यार को समझाना।

उसने समझाया।

बहुत समझाया।

कभी शब्दों से,
कभी चुप रहकर,
कभी अपनी गलतियाँ मानकर,
कभी अपनी सही बात छोड़कर।

फिर घर आया।

फिर बच्चे आए।

फिर जिम्मेदारियाँ आईं।

फिर उसने जाना
कि पुरुष होना शायद
हर बार मजबूत होने का नाम नहीं है

बल्कि
हर बार टूटकर भी
सुबह उठ जाने का नाम है।

वह गिरा भी होगा,
डरा भी होगा,
कई रातें ऐसी भी रही होंगी
जब उसने छत को देखते हुए सोचा होगा

“क्या मैं सही कर रहा हूँ?”

लेकिन सुबह
उसने वही चेहरा पहना
जिस पर सबको भरोसा था।

क्योंकि घर में
पिता का डर
बच्चों के लिए कोई विकल्प नहीं होता।

उसने कमाया।

हार गया।

फिर कमाया।

कुछ लोगों को खोया।

कुछ रिश्ते बचाए।

कुछ रिश्तों को
बहुत कोशिश करके भी नहीं बचा पाया।

कुछ दोस्त
सिर्फ़ पुराने फोटो में रह गए।

कुछ सपने
बैंक बैलेंस, EMI, स्कूल फीस
और जिम्मेदारियों के नीचे दब गए।

और कुछ सपने
आज भी उसके भीतर
चुपचाप साँस लेते हैं।

फिर अचानक
उसे एहसास हुआ

कि अब वह हर बात का जवाब नहीं देना चाहता।

किसी ने गलत समझ लिया
तो समझ लिया।

किसी ने उसकी नीयत पर शक किया
तो किया।

किसी को उसका मौन अहंकार लगा
तो लगे।

किसी को उसका व्यस्त रहना बेरुखी लगा
तो लगे।

अब उसमें
हर गलतफहमी को ठीक करने की ऊर्जा नहीं बची।

क्योंकि उसने पूरी ज़िंदगी
लोगों को समझाते हुए बिताई है
कि वह बुरा नहीं है।

अब वह बस इतना जानता है

जिसे मेरे साथ रहना है,
वह मेरे मौन को भी पढ़ लेगा।

और जिसे हर बार
मेरे शब्दों की गवाही चाहिए,
शायद उसे मैं कभी समझा ही नहीं पाऊँगा।

पचास के बाद
पुरुष प्रेम करना नहीं छोड़ता।

बस प्रेम का शोर छोड़ देता है।

वह अब
किसी के पीछे भागकर
अपनी जगह नहीं माँगता।

वह अब
हर बहस जीतना नहीं चाहता।

वह अब
हर रिश्ता बचाना नहीं चाहता।

वह अब
हर चोट का हिसाब नहीं रखता।

वह बस चाहता है

अपने लोगों की सलामती।

बच्चों की हँसी।

अपने कमरे में कुछ घंटे की ख़ामोशी।

शरीर में थोड़ी ताकत।

मन में थोड़ा सुकून।

और कोई ऐसा इंसान
जिसके सामने उसे
अपने मन की सफाई देने की जरूरत न पड़े।

क्योंकि पचास का पुरुष
बहुत कुछ देख चुका होता है।

उसे मालूम होता है
कि हर बहस का अंत समझ नहीं होता।

हर माफ़ी के बाद रिश्ता नहीं बचता।

हर सच पर विश्वास नहीं किया जाता।

और हर अच्छा आदमी
हर किसी के लिए अच्छा साबित नहीं हो सकता।

इसलिए अब
वह चुप रहता है।

यह चुप्पी हार नहीं है।

यह उस आदमी की
आखिरी बची हुई ताकत है
जिसने जिंदगी भर
सब कुछ ठीक करने की कोशिश की है।

अब पचास पर
वह पहली बार
अपने लिए कुछ माँगता है

कि मुझे मत समझाओ।

मुझसे मत पूछो कि मैं ऐसा क्यों हूँ।

मुझे हर बात साबित मत करने दो।

मैं थक चुका हूँ
अपने होने का प्रमाण देते-देते।

अब अगर तुम मेरे पास हो,
तो बस मेरे पास रहो।

मेरी हर चुप्पी का अर्थ मत खोजो।

हर दूरी को नाराज़गी मत समझो।

हर थकान को बेरुखी मत कहो।

कभी-कभी
एक आदमी बस थका हुआ होता है।

और कभी-कभी
उसकी चुप्पी में
पूरी ज़िंदगी बोल रही होती है।

पचास के बाद
उसे दुनिया जीतनी नहीं होती।

उसे बस
अपने भीतर बचा हुआ आदमी
बचाना होता है।

और शायद यही
उम्र का सबसे कठिन सत्य है

एक उम्र के बाद पुरुष शांति नहीं माँगता…
वह सिर्फ़ उन चीज़ों से दूर हो जाता है
जो उसकी शांति छीनती हैं।

क्योंकि अब उसके पास
सिर्फ समय कम नहीं हुआ है

बल्कि
वह पहली बार समझ गया है
कि उसका समय
उसका अपना भी है।

Monday, 10 August 2026

वाणी और मन

#स्पीच_एंड_माइंड: वाणी और मन 

ॐ वाक् मे मनसि प्रतिष्ठिता।
मनो मे वाचि प्रतिष्ठिता।।
- सरस्वती रहस्योपनिषद

ऋषि का आग्रह है कि मेरी वाणी मेरे मन मे प्रतिष्ठित हो जाय। और मेरा मन मेरी वाणी में प्रतिष्ठित हो जाय। कहने का तात्पर्य है वाणी और मन मे तालमेल बैठ जाए। दोनों में भेद न रहे। दोनों एक ही हो जाय। 

हमारे विचार ही उपद्रव हैं। हमारे अंदर चलने वाले समस्त झगड़ा, झन्थट, अशांति, बेचैनी, सब के सब विचारों की देन है।
 मन का स्वभाव है कि वह खाली नहीं बैठ सकता। उसको कोई सहारा चाहिए। माइंड अर्थात बन्दर। उसे उछल कूद ही पसंद है। मन को चाहिए उपद्रव, व्यस्तता, ऑक्यूपेशन। वे कहते हैं खाली दिमाग शैतान का घर। Empty mind is devil's workshop. 

और वाणी है संसार मे होने वाले झगड़ा झंझटों की जड़। सारे विवादों की जड़ है वाणी। और हमारी वाणी का शत प्रतिशत हिस्सा प्रायः प्रतिक्रिया है, रिएक्शन है। क्योंकि हमारा स्वभाव ही रैक्टिइनरी है। हमारी वाणी प्रायः किसी न किसी विचार या किसी न किसी व्यक्ति की प्रतिक्रिया में निकलती है। यंत्रवत, रोबोटिक।
 हम हर बात पर रियेक्ट करते हैं। हर उस बात पर, जो हमें उकसाती है, उस पर हम रियेक्ट करते हैं - पहले माइंड से, फिर वाणी से।

 रियेक्ट क्यों करते हैं? इसलिए कि हमने पहले से तय कर रखा है कि सही क्या है गलत क्या है। हमने संसार को अपने लाइक और dislike मे बांट रखा है।

"इन्द्रियस्यइन्द्रियर्थेषु राग द्वेष व्यवस्थितौ" - भगवतवीता। हमारा जब भी किसी वस्तु व्यक्ति भाव या विचार से साक्षात्कार होता है तो हम निर्णयात्मक रूप से उसे या तो पसंद करते हैं या नापसंद। अपने संस्कारों, संस्कृतियों, शिक्षा आदि के कारण ऐसा होता है। यह सामान्य बात है। लाइक और dislike हमारी मनोदशा का अंग है। यह प्राकृतिक स्वभाव है माइंड का। across the globe mind works with this inherent attitude. So mind is not only individual but cosmic too. ऐसे ही हम संसार को देखते हैं। जिसको अटटीच्यूड कहते हैं आजकल। 

ऋषि कहता है कि उसकी वाणी उसके मन मे प्रतिष्ठित हो जाय। अर्थात जो मन मे हो वह ही वाणी से निकले। वही मुखरित हो तो मन में विचार चल रहा हो। 

 लेकिन यदि ऐसा हो तो संसार मे उपद्रव खड़ा हो जाय। कोई मिलता है, उसके लिए हमारे मन मे क्रोध है, घृणा है, अनादर है, उसका गला दबाने की इच्छा हो रही है मन में, लेकिन उसे व्यक्त नहीं कर सकते? हम कहते हैं - अहोभाग्य मित्र, बड़े दिनों बाद दर्शन हो रहे हैं। वह भी प्रतिक्रिया में यही बोलेगा। परंतु संभबतः उसके अंदर भी हमारे प्रति वही भाव और विचार हों मन मे। इसलिये हम मुखौटा ओढ़ लेते हैं, सभ्यता का मुखौटा, असली अटटीच्यूड नहीं दिखाते उसे अपना। हम कहते हैं कि अहोभाग्य मित्र, बड़े दिन बाद आपके दर्शन हो रहे हैं। 

बारम्बार यही अभ्यास करते करते धीरे धीरे ऐसा ही व्यक्तित्व हमारा बन जाता हैं - झूंठा व्यक्तित्व। बाहर से कुछ और अंदर से कुछ और। इसको हम पर्सनालिटी बिल्डिंग कहते हैं। लेकिन यह बेचैनी और अशांति की जड़ है। क्योंकि यह विभक्त व्यक्तित्व है। साइकेट्रिस्ट इसे कहते हैं - split Personality. Dissociated Personality Disorder ( भूल भुलैया नामक फ़िल्म इसी पर बनी है) 

इसीलिये ऋषि की प्रार्थना है कि जो मेरे मन मे हो, वही मेरी वाणी में हो। वाणी से वही बात निकले - जो मेरे मन मे हो। चाहे भला और चाहे बुरा। 

लेकिन संसार मे समस्या यह है कि जो मन में हो, और यदि वही बात निकल भी आवे तो लात खाने की संभावना बढ़ती जाएगी -
"बातहिं हांथी पाइए।
बातहिं हांथी पाव।।"

तो फिर जीवन कैसे सम्भब होगा? 
मन को निर्मल करने से, यह संभव होगा कि मन में वही विचार और भाव उत्पन्न हों जिन्हें छुपाने की आवश्यकता न पड़े। वह कैसे होगा।
 
राग द्वेष, लाइक और dislike को पीछे रखकर संसार को देखने का अभ्यास करना होगा। "See the things as they are." कठिन है। तभी तो ऋषि प्रार्थना कर रहा है सरस्वती जी से। 

ऋषि की दूसरी प्रार्थना है कि मेरा मन मेरी वाणी में प्रतिष्ठित हो जाय। अर्थात मुझे जब बोलने की आवश्यकता हो तभी मेरा मन, मेरा माइंड काम करे। वरना वह शांत बैठा रहे। यह और भी कठिन है। लेकिन यह एडवांस्ड कोर्स है। पहले वाला बेसिक कोर्स था। बेसिक वाला कोर्स होने के बाद ही इस कोर्स में प्रवेश मिलेगा।
  हमारा मन तो चलता ही रहता है दिन रात। 24 घण्टे, अनवरत, दिन रात माइंड चलता ही रहता है। लेकिन माइंड और बॉडी हमारे टूल हैं, यंत्र हैं। उनको हमारे हिसाब से चलना चाहिए न?

हमारे कमरे में ए सी लगा है, पंखा लगा है, कंप्यूटर लगा है। सभी यंत्र हैं। सब हमारे हिसाब से चलते हैं। जब हम उन्हें चलाना चाहते हैं तो स्विच ऑन कर देते हैं। जब बन्द करना होता है तो स्विच ऑफ कर देते हैं।

 माइंड को भी ऐसे ही काम करने की ट्रेनिंग देनी होगी कि जब वाणी की आवश्यकता हो, जब बोलने की आवश्यकता हो तो माइंड काम करे, अन्यथा चुपचाप बैठा रहे - शांत, चैन से, आराम से - At ease, Not disease। Completely silent. शून्य, सन्नाटा। बहुत कठिन है। इसीलिए प्रार्थना की जा रही है सरस्वती जी से। 

वैदिक साइंस में जिस शक्ति को सरस्वती के नाम से पुकारा जाता रहा है, उसे आज की भाषा मे बोला जाय तो सरस्वती हमारे माइंड और वाणी को को-ऑर्डिनेट करने वाली आंतरिक ऊर्जा या शक्ति का नाम है। 

हम हर एनर्जी को प्रणाम करते हैं। परमात्मा भी हमारे अंदर है एनर्जी के रूप में। जिसे हम चेतना या चैतन्य कहते हैं - Counciousness. 
Counciousness is fundamental - Max Plank, Nobel Prize winner Quantum Physicist. 

इसीलिए हमारे शास्त्रों में सरस्वती जी की पूजा की जाती है - क्योंकि वे माइंड और वाणी की कंट्रोलर हैं। कंट्रोलर की कृपा बनी रहे तो हांथी मिल जाय पुरस्कार स्वरूप। और कृपा न बन पायी तो - हांथी के पैर के नीचे कुचले भी जा सकते हैं:

बातहिं हांथी पाइए।
बातहिं हांथी पाव।।

इसीलिये हम जब हम प्रार्थना करते हैं:

वर दे वीणा वादनि
वर दे। 

तो हम अपने अंदर की उस ऊर्जा और शक्ति से प्रार्थना करते हैं कि हे माँ मुझे ऐसा वरदान दे कि बुद्द्धि और वाणी हमें हांथी तो दिलवावे, हांथी पाव न दिलवावे।

®त

Sunday, 9 August 2026

सरस्वती पुराण ब्रह्मा ने सरस्वती

अक्सर मुस्लिम और वामपंथी दुष्प्रचार करते हैं कि ब्रह्मा ने सरस्वती से शादी किया था लेकिन जब आप उनसे पूछोगे यह किस किताब में लिखा है तब वह कहेंगे #सरस्वती पुराण में लिखा है। 

उसके बाद जब आप उनके सामने 18 पुराणों के नाम बता देंगे और फिर आप पूछेंगे इन 18 पुराणों में कोई सरस्वती पुराण तो है ही नही, तो वह गूगल पर सर्च करेगा और कहेगा #डीएनझा की किताब में लिखा है। 

यह डीएन झा, रोमिला थापर, इरफान हबीब यह भारत के सभी इतिहासकार एक ऐसी संस्था की उपज है, जो संस्था मार्कसिस्ट हिस्टोग्राफी कहलाती है।

चीन में कम्युनिस्ट पार्टी के अधिवेशन में वामपंथी नेताओं ने एक प्लानिंग बनाया कि भारत जैसे देश पर वामपंथ का शासन कैसे हो सकता है क्योंकि भारत के युवा वामपंथियों के जाल में इतनी आसानी से नहीं फंसने वाले है।

तब एक क्यूबा का वामपंथी जिसका नाम में भूल रहा हूं उसने कहा था कि हमें 10 साल या 20 साल की प्लानिंग नहीं करनी होगी, हमें सबसे पहले जिस भी देश पर कब्जा करना है उस देश के इतिहास को विकृत करना पड़ेगा, उस देश के शिक्षा संस्थानों में घुसना पड़ेगा । फिर उन शिक्षा संस्थानों में पढ़ने वाले बच्चों में हम उनकी मूल संस्कृति मूल धर्म के प्रति ऐसा जहर बोयेंगे कि वह धीरे-धीरे वामपंथी विचारधारा का हो जाएगा । इसके लिए हमें कम से कम 50 से 80 साल की प्लानिंग लेकर चलनी होगी। 

 जब भारत को आजादी मिली तब वामपंथी दलों ने नेहरू से एक समझौता किया । समझौता ये कि आप देश चलाइए हम आपको देश चलाने में कोई डिस्टर्ब नहीं करेंगे और हमें आप देश के कुछ शिक्षा संस्थान दे दीजिए, इतिहास लिखने का काम दे दीजिए और हमारी पसंद का शिक्षा मंत्री नियुक्त करते रहिए। 

और आप जानते हैं कि देश की आजादी के बाद भारत का जो पहला शिक्षा मंत्री बना उसके पास कोई डिग्री नहीं थी बल्कि उसके पास मुफ्ती की डिग्री थी, वह मक्का में पैदा हुआ था और 30 साल से मक्का की मस्जिद में तकरीरें देता था। ऐसे व्यक्ति यानी मौलाना अबुल कलाम आजाद को देश का पहला शिक्षा मंत्री बनाया गया जो कट्टरपंथी हनफी की विचारधारा का मुस्लिम था और सऊदी अरब का आधिकारिक नागरिक था। 

उसके बाद वामपंथियों ने भारतीय इतिहास प्रतिष्ठान से लेकर जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी, दिल्ली यूनिवर्सिटी तमाम जगहों पर कब्जा किया। अपने विचारधारा के इतिहासकारों से किताब लिखवाई और यह सारी किताब झूठ का पुलिंदा साबित हुई।

नेहरू के बाद इंदिरा गांधी ने भी इस परंपरा को जारी किया इंदिरा गांधी ने भी वामपंथियों को खुली छूट दे दिया कि वह इतिहास को विकृत करते रहें, अपने मनपसंद शिक्षा संस्थानों में जो चाहे वह करते रहें बस उन्हें सत्ता में कभी डिस्टर्ब ना करें। इसीलिए वामपंथियों ने इंदिरा गांधी के खिलाफ कभी कोई आवाज नहीं उठाई बल्कि इन वामपंथियों ने आपातकाल का समर्थन किया था। आपको जानना चाहिए कि एक भी वामपंथी नेता आपातकाल के समय जेल नहीं गया था।

मार्क्सवादी इतिहास इतिहासकार में से सबसे बड़े इतिहासकार प्रोफेसर डीएन झा की गवाही राम मंदिर केस में हुई थी उन्होंने बयान दिया था राम कभी हुए ही नहीं थे मुस्लिम पक्ष ने प्रोफेसर डीएन झा को अपनी ओर से अदालत में पेश किया था।

डीएन झा ने अदालत में कहा कि उन्होंने जो शोध किया है उसके अनुसार भगवान राम अयोध्या में कभी थे ही नहीं, भगवान राम एक काल्पनिक हैं। उन्होंने यह भी दावा किया कि उनके ही शोध के आधार पर केंद्र की तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने रामसेतु तोड़ने का आदेश दिया था और सुप्रीम कोर्ट में जो हलफनामा दायर किया था कि भगवान राम काल्पनिक है वह मेरी ही शोध थी। 

हिंदू पक्ष के वकील ने डीएन झा का एक सेमिनार में दिया गया वीडियो चलाया जिसमें वह भगवान राम को शराबी और मांसाहारी बता रहे थे। उसके बाद जज ने उनसे सवाल किया कि आप एक व्यक्ति को काल्पनिक बताते हैं फिर दूसरे सेमिनार में उसी व्यक्ति को शराबी और मांसाहारी बताते हैं, ऐसा कैसे हो सकता है कि जो व्यक्ति काल्पनिक है तो आपने यह कैसे शोध कर लिया कि वह शराबी और मांसाहारी भी है? उसके बाद डीएन झा की बोलती बंद हो गई और उनकी गवाही को और उनके रिसर्च को सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया।

अभी रक्षाबंधन के दिन तमाम अखबारों में प्रोफेसर इरफान हबीब ने जो इसी मार्कशिष्ट हिस्ट्रोग्राफी के जुड़े हुए हैं, उन्होंने एक लेख लिखा कि रक्षाबंधन के दिन अकबर से लेकर जहांगीर के दरबार में लाखों महिलाएं आती थी और मुगल बादशाह सबसे राखी बधवाते थे।

 जबकि सच्चाई यह है कि अकबर ने अपनी सगी फुफेरी बहन जो बैरम खान की पत्नी थी। जब अकबर छोटा था तब से बैरम खां और बैरम खान की पत्नी सलीमा सुल्ताना बेगम अकबर की संरक्षक थी। अकबर ने अपने ही बहनोई बैरम खां का कत्ल करवा कर अपनी सगी फुफेरी बहन से निकाह कर लिया। 

अब ऐसे दरिंदे मुगलों के दरिंदे आचरण को किस तरह से यह इतिहासकार छुपाकर एक इनकी शानदार छवि बनाने की कोशिश करते हैं सोचिए ।
भारत के इतिहासकारों ने जो गंदगी फैलाई है उसे मिटाने में कई सदी लगेगी। 

साभार

प्रतीकों की मौन भाषा और उसका गहरा महत्व

प्रतीकों की मौन भाषा और उसका गहरा महत्व
मानव सभ्यता के विकास के साथ ही अभिव्यक्ति के साधन भी विकसित हुए। आज हम संवाद के लिए जिस लिखित या मौखिक भाषा का उपयोग करते हैं, वह विचारों के आदान-प्रदान का सबसे प्रचलित माध्यम अवश्य है, परंतु वह एकमात्र माध्यम नहीं है। "अधिकतम लोग प्रतीकों का महत्व नहीं समझते हैं, जबकि सबसे अधिक महत्वपूर्ण बात प्रतीकों में ही कही जाती है।" यह कथन इस सत्य को उजागर करता है कि भाषा की सीमाएँ जहाँ समाप्त होती हैं, वहाँ प्रतीकों की अनंत और गहरी दुनिया शुरू होती है।
भाषा का विस्तृत स्वरूप: शब्दों से परे अभिव्यक्ति
सामान्यतः हम भाषा को केवल व्याकरण, शब्दों और वाक्यों के दायरे में बांधकर देखते हैं। हमें लगता है कि जो कुछ भी कहा या लिखा जा रहा है, वही भाषा है। लेकिन वास्तविकता इसके विपरीत है। भाषा केवल अक्षर-आधारित शब्द नहीं होती; बल्कि अंक, चित्र, रंग, ध्वनि और इशारे भी अभिव्यक्ति के सशक्त साधन हैं।
एक रोता हुआ बच्चा, किसी सड़क किनारे लगा ट्रैफिक सिग्नल, या आसमान में उड़ता हुआ सफेद कबूतर—ये सभी बिना एक भी शब्द बोले बहुत कुछ कह जाते हैं। जब शब्द अपनी सीमाओं के कारण गूंगे होने लगते हैं, तब प्रतीक मुखर होकर सामने आते हैं।
प्रतीकों की अपनी एक विशिष्ट भाषा क्यों होती है?
प्रतीक केवल आकृतियाँ नहीं हैं, बल्कि वे संघनित विचारों, भावनाओं और संस्कृतियों के संवाहक हैं। प्रतीकों की भाषा की अपनी कुछ प्रमुख विशेषताएं होती हैं:
 सार्वभौमिकता : शब्दों की दीवारें भाषा, देश और काल की सीमाओं में बँधी होती हैं। हिंदी जानने वाला व्यक्ति जापानी नहीं समझ सकता, लेकिन प्रेम का प्रतीक (हार्ट शेप) या खतरे का प्रतीक (खोपड़ी और हड्डियाँ) पूरी दुनिया में एक ही अर्थ रखता है।
 संक्षिप्तता में गागर भरना: एक पूरा ग्रंथ या दर्शन जो बात सैकड़ों पन्नों में समझाता है, वह बात एक प्रतीक एकाएक स्पष्ट कर देता है। उदाहरण के लिए, न्याय की देवी की आँखों पर ब पट्टी और हाथ में तराजू—यह पूरा चित्र न्याय के संपूर्ण दर्शन को एक पल में बयां कर देता है।
  अचेतन मन से सीधा संवाद: प्रतीक सीधे हमारे अवचेतन मन को प्रभावित करते हैं। वे तर्क की पगडंडी से गुजरने के बजाय सीधे भावनाओं और अंतरात्मा तक पहुँचते हैं।
जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में प्रतीकों का प्रभाव
1. अंक और गणितीय प्रतीक
अंक केवल गिनती का साधन नहीं हैं, बल्कि ब्रह्मांडीय रहस्यों की चाबी हैं। शून्य (0) का आविष्कार भारत ने किया, जो केवल एक अंक नहीं बल्कि 'पूर्णता' और 'शून्यता' (निर्वाण) का द्योतक है। इसी प्रकार पाई (\pi) या अनंत (\infty) के प्रतीक गणितीय गणनाओं से परे ब्रह्मांड के अनंत विस्तार का बोध कराते हैं।
2. कला, संस्कृति और धर्म
धार्मिक और आध्यात्मिक परंपराओं में प्रतीकों का सबसे गहरा उपयोग हुआ है।
 ॐ (Om): सनातन संस्कृति में यह मात्र एक अक्षर नहीं, बल्कि संपूर्ण ब्रह्मांड की आदि-ध्वनि (प्रणव) का प्रतीक है।
 स्वास्तिक: यह प्रतीक सूर्य, ऊर्जा और मंगल का सूचक है, जो सदियों से हमारी संस्कृति का हिस्सा रहा है।
  कमल का फूल: कीचड़ में खिलकर भी पवित्र रहना—यह प्रतीक जीवन के सबसे बड़े दार्शनिक संदेश को सहजता से समझा देता है।
3. आधुनिक युग और तकनीक (डिजिटल प्रतीक)
आज की डिजिटल दुनिया पूरी तरह प्रतीकों पर टिकी है। हम चैटिंग के दौरान भावनाओं को व्यक्त करने के लिए इमोजी (Emojis) और GIFs का सहारा लेते हैं। एक मुस्कुराता हुआ चेहरा या दिल का निशान (❤️) हजारों शब्दों से अधिक प्रभावी ढंग से हमारी भावना सामने वाले तक पहुँचा देता है। इसके अलावा, रीसायकल बिन का आइकन, ब्लूटूथ का लोगो, या वाई-फाई के संकेत—यह सब आधुनिक तकनीक की अपनी प्रतीकात्मक भाषा है।
सबसे महत्वपूर्ण बातें प्रतीकों में क्यों छिपी होती हैं?
गहरे से गहरे दार्शनिक सत्य, जीवन के गूढ़ रहस्य, प्रेम, त्याग, और आध्यात्मिकता को शब्दों में पूरी तरह बांधना असंभव है। शब्दों की अपनी सीमाएँ हैं—वे बौद्धिक स्तर पर तो समझ आ सकते हैं, परंतु अनुभव नहीं कराए जा सकते।
जब कोई संत मौन रहता है, तो उसका मौन भी एक प्रतीक होता है। जब कोई प्रेमी अपनी बात बिना कहे आँखों से कह देता है, तो वह प्रतीकों की पराकाष्ठा होती है। जीवन के सबसे बड़े सत्य—जैसे जन्म, मृत्यु, प्रेम, और समर्पण—इतने विराट हैं कि उनके लिए शब्द छोटे पड़ जाते हैं। इसलिए, वे केवल प्रतीकों के माध्यम से ही महसूस किए जा सकते हैं।

प्रतीक केवल सांकेतिक चिह्न नहीं हैं, बल्कि वे हमारी चेतना की भाषा हैं। जो व्यक्ति प्रतीकों के मर्म को समझना सीख जाता है, वह जीवन की अदृश्य परतों को पढ़ने में सक्षम हो जाता है। आवश्यकता इस बात की है कि हम केवल साक्षर होने के साथ-साथ 'प्रतीक-साक्षर' भी बनें, ताकि हम उन अनकही बातों को भी सुन सकें जो शब्द कभी बयान नहीं कर सकते।

आभिजात्य और शासक वर्ग की प्रतीकात्मक कूटनीति: रहस्यों का भाषा-संसार
सत्ता, आभिजात्य वर्ग (Elite Class) और शासक वर्ग का इतिहास गवाह है कि उन्होंने कभी भी अपने सबसे महत्वपूर्ण निर्णयों, नीतियों और रणनीतियों को सीधे और सरल शब्दों में उजागर नहीं किया है। राजनीति, कूटनीति और गुप्त तंत्र (Espionage) के गलियारों में यह एक स्थापित नियम रहा है कि "जितना महत्वपूर्ण विषय होगा, उसकी अभिव्यक्ति उतनी ही प्रतीकात्मक होगी।"
शासक वर्ग अपनी कार्ययोजनाओं को सुरक्षित रखने, प्रतिद्वंद्वियों को गच्चा देने और अपने प्रभाव को बनाए रखने के लिए संकेतों, प्रतीकों और कूट-भाषा (Ciphers and Codes) का ही सहारा लेता है।
प्रतीकों के प्रयोग के पीछे की रणनीति और कारण
शासक और अभिजात वर्ग द्वारा प्रतीकों के अति-उपयोग के पीछे कई गहरे भू-राजनीतिक और मनोवैज्ञानिक कारण होते हैं:
 * प्रतिद्वंद्वियों से रणनीति छिपाना (Security through Obscurity): यदि राजा या शासक अपनी अगली सैन्य चाल, आर्थिक नीति या कूटनीतिक संधि को खुले शब्दों में घोषित कर दे, तो विरोधी पक्ष या शत्रु तुरंत उसका तोड़ (Counter-strategy) ढूंढ लेगा। प्रतीकों और कोड-वर्ड्स का उपयोग यह सुनिश्चित करता है कि संदेश केवल उन्हीं तक पहुँचे जिनके लिए वह बना है।
 * सुरक्षित अस्वीकारोक्ति (Plausible Deniability): कई बार शासक ऐसे निर्णय लेते हैं जो विवादित हो सकते हैं। प्रतीकात्मक भाषा या संकेतों का लाभ यह होता है कि यदि विरोध हो या बात खुले में आ जाए, तो शासक वर्ग आसानी से कह सकता है कि "हमारे कहने का वह अर्थ नहीं था जो आपने समझा," जिससे वे कानूनी या राजनीतिक फंदे से बच जाते हैं।
 * उच्च वर्ग की विशिष्टता बनाए रखना (Elitism): अभिजात वर्ग हमेशा आम जनता और अपने बीच एक बौद्धिक या सांस्कृतिक दूरी बनाए रखना चाहता है। गुप्त प्रतीक, विशेष मुहरें (Seals), आर्म्स के कोट (Coat of Arms), और विशेष शारीरिक संकेत (Body Gestures) इस बात का प्रमाण होते हैं कि केवल एक चुनिंदा समूह ही इन रहस्यों को समझ सकता है।
इतिहास और राजनीति में प्रतीकों का खेल
1. राजमुहरें और शाही प्रतीक (Royal Seals and Insignia)
प्राचीन और मध्यकाल में राजाओं के आदेशों, फरमानों और संधियों पर लगने वाली राजमुहरें (Royal Seals) केवल उनके हस्ताक्षर मात्र नहीं थीं, बल्कि वे सर्वोच्च सत्ता का प्रतीक थीं। एक विशेष धातु या अंगूठी से लगने वाली वह छाप बता देती थी कि आदेश सीधे सिंहासन से आया है। यदि कोई उस प्रतीक की नकल करता था, तो उसे राजद्रोह मानकर मृत्युदंड दिया जाता था, क्योंकि वह प्रतीक सत्ता की चाबी था।
2. कूटनीति और गुप्त संदेश (Diplomatic Ciphers)
युद्ध के मैदान में या दो देशों के बीच संधियों के दौरान राजाओं के राजदूत गुप्त संकेतों और प्रतीकों में पत्र भेजते थे। इन पत्रों को पढ़ने के लिए एक विशेष कुंजी (Decoder Key) होती थी, जो केवल शासक और उसके वफादार मंत्री के पास होती थी। यदि दुश्मन के हाथ संदेश लग भी जाए, तो वह केवल निरर्थक शब्दों या चित्रों का समूह प्रतीत होता था।
3. गुप्त संगठन और लॉज (Secret Societies & Fraternities)
इतिहास के सबसे प्रभावशाली आभिजात्य समूहों—चाहे वे फ्रीमेसन (Freemasons), इल्यूमिनाटी, या गुप्त राजनैतिक संगठन हों—उन्होंने पूरी तरह से प्रतीकों, इशारों (Handshakes) और ज्यामितीय आकृतियों पर अपनी संरचना खड़ी की है। वे सार्वजनिक रूप से आम आदमी की तरह रहते हैं, लेकिन उनके विशेष प्रतीक उन्हें पहचान दिलाते हैं कि कौन उनका अपना है और कौन विरोधी। आज भी कॉर्पोरेट घरानों के लोगो और राजनीतिक दलों के चुनाव चिन्ह इसी छिपे हुए मनोवैज्ञानिक प्रभाव का विस्तार हैं।
आधुनिक युग में प्रतीकात्मक राजनीति और छद्म संकेत (Dog Whistling)
समकालीन राजनीति और उच्च वर्गीय निगमों (Corporate Giants) में प्रतीकों का खेल और अधिक सूक्ष्म हो गया है। आज इसे राजनीति विज्ञान में 'डॉग व्हिसलिंग' (Dog Whistling) कहा जाता है।
 * राजनीतिक इशारे: राजनेता अपने भाषणों में ऐसे विशेष शब्दों, मुहावरों या संकेतों का प्रयोग करते हैं जो आम जनता को सामान्य लगेंगे, लेकिन उनके विशेष समर्थक या अभिजात वर्ग उसका असली भू-राजनीतिक अर्थ तुरंत समझ जाते हैं।
  आर्थिक और कॉर्पोरेट संकेत: बड़ी कंपनियाँ अपनी बैठकों में जिस शब्दावली और ब्रांडिंग का उपयोग करती हैं, वह उनके बाजार के प्रतिद्वंद्वियों को भ्रमित करने के लिए डिज़ाइन की जाती है। वे क्या करने वाले हैं, इसकी भनक केवल उनके शेयरधारकों और बोर्ड के सदस्यों को ही होती है।

सत्ता के गलियारों में यह अकाट्य सत्य है कि शब्द शोर मचाते हैं, और प्रतीक दिशा तय करते हैं। शासक वर्ग कभी भी अपनी असली कार्ययोजना को खुली किताब नहीं बनने देता। वे जानते हैं कि जो योजना जितनी अधिक सुरक्षित रखनी होगी, उसे उतना ही गहरा प्रतीकों के आवरण में छिपाना होगा। इसलिए, यदि राजनीति या इतिहास की गहरी चालों को समझना है, तो केवल बोले गए शब्दों को नहीं, बल्कि पर्दे के पीछे चल रहे संकेतों और प्रतीकों को पढ़ना सीखना होगा।
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