हिप्पोक्रेट वामपंथी कबीले की कैफ़ियत - 3
दयानंद पांडेय
रामविलास शर्मा , नामवर सिंह , राजेंद्र यादव , मनोहरश्याम जोशी जैसे अध्ययनशील लोग भी ग़ज़ब थे। सहमति-असहमति होती रहती है। पर भाषा में इतना अश्लील , इतना अभद्र , इतना दरिद्र , इतना विपन्न होना क्या ज़रूरी होता है ? मुद्राराक्षस भी बहुत लोगों से बहुत मुद्दों पर अकसर नाराज रहते थे। मैं ने एक लंबा लेख भी लिखा है : हिंदी के चंबल का एक बाग़ी मुद्राराक्षस। पर मुद्रा ने कभी किसी के लिए ऐसी लंपट भाषा का इस्तेमाल नहीं किया। न बोलने में , न लिखने में। आप को याद ही होगा दिनमान में सर्वश्वर दयाल सक्सेना , श्रीकांत वर्मा की रघवीर सहाय से कितनी घोर असहमति थी। एक ही दफ़्तर में काम करते हुए कई बार युद्ध जैसी स्थिति आ जाती थी। लेकिन बोल कर या लिख कर किसी ने ऐसी कोई दरिद्रता नहीं दिखाई। न सहाय जी ने , न श्रीकांत वर्मा और सर्वेश्वर जी ने। तब जब कि रघुवीर सहाय इन दोनों के बॉस थे , बतौर संपादक। धर्मयुग में कन्हैयालाल नंदन और धर्मवीर भारती के बीच एक साथ काम करते हुए लंबा शीतयुद्ध चला। पर दोनों ने कभी किसी से कोई बिलो द बेल्ट बात नहीं की , न कभी कहीं कुछ ऐसा लिखा। रवींद्र कालिया ने काला रजिस्टर जैसी कहानी लिखी , धर्मयुग के माहौल पर। पर भारती जी के लिए संकेतों में भी कुछ अभद्र नहीं लिखा। गो कि खलनायक वही थे कहानी के। बाद में ग़ालिब छुटी शराब में भी रवींद्र कालिया ने धर्मवीर भारती से और तमाम अन्य से अपनी मुश्किलों असहमतियों का वर्णन किया है। पर भाषा की मर्यादा बनाए रखी। रघुवीर सहाय के बाद कन्हैयालाल नंदन जब दिनमान के संपादक बनाए गए तो दिनमान में एक तरह से विद्रोह का मंज़र था। लेकिन नंदन जी ने अपनी विनम्रता से सारे विद्रोह को समाप्त कर दिया। तब जब कि पराग और सारिका के समय में उन से जल्दी किसी का मिल पाना कठिन हुआ करता था। पर दिनमान में वह सर्वेश्वर जी जैसों को अपने केबिन में बुलाने के बजाए , उन की टेबिल पर खुद पहुंच जाते थे। ऐसा अनेक बार देखा मैं ने। बाद में तो प्रबंधन से कह कर पराग का संपादक बनवा दिया सर्वेश्वर जी को। और भी बहुतेरी बातें हैं। फिर कभी।
फिर विष्णु जी , आप किस मान्यता और मान्यता के कीड़े की बात कर रहे हैं ? अरे हम लोकतंत्र में जीते हैं। उस लोकतंत्र में जिस में संसद सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले को बदल देती है। और पसंद न आने पर जनता संसद के लोगों को बदल देती है। विधानसभा के लोगों को बदल देती है। प्रधान मंत्री , मुख्य मंत्री बदल देती है। हम उसी जनता जनार्दन यानी अपने आदरणीय पाठकों के लेखक हैं। किसी हिप्पोक्रेट वामपंथी कबीले के लेखक नहीं हैं। आप की मुश्किल आसान करने के लिए बताता चलूं कि हमारे आदरणीय पाठकों ने हमें हमारा समुचित प्राप्य सर्वदा ही दिया है। दिल खोल कर दोनों हाथ से दिया है। हमारे लेखकीय अवदान को जो चाहिए , सब कुछ दिया है। कहीं ज़्यादा दिया है। इतना कि एक पोस्ट लिख देता हूं एक ग़रीब और बीमार बच्ची के इलाज के लिए तो हफ्ते-दस दिन में लोग थोड़ा-थोड़ा कर के तीस-लाख से अधिक रुपए उस बच्ची के पिता अकाऊंट में डाल देते हैं। बीच कोरोना की बात है यह। जानिए कि हमारे ब्लॉग सरोकारनामा , जिस में सिर्फ़ मेरा लिखा हुआ ही होता है , बारह लाख से अधिक की हिट है। दुनिया भर में लोग पढ़ते हैं। देश ही नहीं , दुनिया भर की लाइब्रेरियों में मेरे उपन्यास और अन्य किताबें उपस्थित हैं। तमाम अन्य साइटों पर भी।
तो क्या मुफ़्त में ?
तेरह उपन्यास समेत विभिन्न विधाओं में छ दर्जन से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हैं मेरी। बिलकुल अभी-अभी वाणी प्रकाशन से विपश्यना में प्रेम उपन्यास छप कर आया है। जिस की ख़ूब चर्चा है। हां , वामपंथी कबीले के तमाम लेखकों की तरह पैसे दे कर किताब नहीं छपवाता। गूगल पर एक बार मेरा नाम लिख कर देखिए , आप की तमाम शंकाओं का समाधान हो जाएगा। बहुत से प्रश्नों का उत्तर मिल जाएगा। अब और कैसी मान्यता खोज रहे हैं आप। कृपया बताएं। किसी हिप्पोक्रेट वामपंथी कबीले का ? तो पुन:-पुन: दुहराता हूं कि जानिए हम किसी हिप्पोक्रेट वामपंथी कबीले के लेखक नहीं हैं , न उन से किसी मान्यता की तलब है।
हिंदी थिसारस के लिए जाने जाने वाले अरविंद कुमार घोषित कम्युनिस्ट थे। काफी समय तक पार्टी के कार्ड होल्डर भी रहे। लेकिन हिप्पोक्रेट वामपंथी नहीं थे। मैं ने उन के साथ सर्वोत्तम रीडर्स डाइजेस्ट में काम किया है। सर्वोत्तम रीडर्स डाइजेस्ट अमरीकी पत्रिका थी। अरविंद कुमार ने मेरे कई उपन्यासों पर विधिवत लिखा है। बिना कहे , अपने आप लिखा है। राजेंद्र यादव ने हंस में न सिर्फ़ मेरी कहानी छापी , किताबों की समीक्षा भी छापी। तेरी मेरी उस की बात के तहत चार पृष्ठ की संपादकीय भी मेरे लिए लिखी। बिना कुछ कहे लिखी। अरविंद कुमार से और विषैले लोग भले परिचित न हों पर आप तो विष्णु जी अच्छी तरह परिचित हैं। उन के लेखन , आचरण और व्यवहार से भी। अरविंद कुमार बहुत सहज और सरल थे ज़रूर पर लिखने- पढ़ने में बहुत सतर्क। आसानी से वह कुछ नहीं लिख सकते थे , किसी किताब पर। किसी दबाव में भी कभी नहीं आते थे आप की तरह। किसी के आगे झुकते नहीं थे। ख़ुद ही तय करते थे , क्या लिखना है क्या नहीं। हिंदी के चुनिंदा बेहतरीन संपादकों में शुमार हैं अरविंद कुमार। और भी कई आदरणीय लेखकों ने ख़ूब लिखा है , मेरी तमाम रचनाओं पर। मेरी आलोचना भी की है। लेकिन किसी कुंठा या हीन भावना के तहत मान्यता का कीड़ा किसी ने नहीं खोजा। क्यों कि वह सहज ही मिली हुई है।
फिर भी सुविधा के लिए देखें दयानंद पांडेय और उन का रचना संसार में लेखकों की सूची। यह किताब अरुण प्रकाशन , दिल्ली ने 2015 में छापी है। जो इस लेख के साथ संलग्न है। मेरे कथा संसार पर दयानंद पांडेय का कथा संसार लंदन की शन्नो अग्रवाल ने पूरी एक किताब लिखी है। प्रेमनाथ एंड संस , दिल्ली ने 2017 में छापी है। कई विश्वविद्यालयों में पी एच डी और डी लिट् हुई है , मेरी रचनाओं पर। बहुत से शीर्ष सम्मान मिले हैं। दो लखटकिया सम्मान भी मिले हैं। जिन को पाने के लिए तमाम लोग नाक रगड़ देते हैं और नहीं पाते हैं। मुझे सहज ही मिले। कुछ लोग ऐसे ही एक सम्मान के लिए जातीय बन गए। लोहिया को फ़ासिस्ट बताते हैं , बोल कर भी और लिख कर भी। पर लोहियावादी सरकार से साहित्य भूषण पाने के लिए सारी वैचारिकी स्वाहा कर देते हैं। ख़ैर , यह उन का अपना विवेक है। उन का क्या ही ज़िक्र करना भला।
अच्छा हिंदी में या भारतीय भाषाओं में कितने लेखक हैं जिन्हों ने हाईकोर्ट में किसी उपन्यास या किसी और रचना के लिए कंटेम्प्ट आफ कोर्ट का मुकदमा झेला हो ? पता कीजिएगा। मैं ने बरसों झेला है , कंटेम्प्ट आफ कोर्ट अपने-अपने युद्ध उपन्यास के लिए। और रवायत के मुताबिक़ माफ़ी भी नहीं मांगी। अपने-अपने युद्ध में न्याय व्यवस्था और न्याय पालिका की जिस तरह धज्जियां उड़ाई हैं , वामपंथी हिप्पोक्रेट लेखक कभी सोच नहीं सकते। साहस भी नहीं कर सकते। बीते दिनों में पाता हूं कि उदय प्रकाश के ख़िलाफ़ कोई कुछ अप्रिय लिख देता था तो उदय प्रकाश सिर्फ़ एक लीगल नोटिस भेज देते थे। और यह हिप्पोक्रेट वामपंथी घुटने के बल आ कर उदय प्रकाश से माफी मांग लेते रहे हैं। लिखे को वापस ले लेते रहे हैं। लिखना बंद कर देते रहे हैं। ऐसे तो हैं हमारे हिप्पोक्रेट वामपंथी लेखक गण। अपनी पीठ ख़ुद ठोंकना गुड बात नहीं है , जानता हूं। पर आप के प्रश्नों का शमन कहिए , समाधान कहिए ज़रूरी है। करूं भी तो क्या करूं। आप हमारे आदरणीय हैं। हमारे हितैषी हैं।
वैसे भी विष्णु जी , बताऊं आप को कि हमें इस हिप्पोक्रेट वामपंथी कबीले की मान्यता की दरकार हरगिज नहीं। है। बार-बार यह बात इस लिए कह रहा हूं क्यों कि वामपंथी हिप्पोक्रेटों ने साहित्य का बहुत नुकसान किया है। बर्बाद किया है। एक पाखंड गढ़ा है कि जो वामपंथी नहीं , वह लेखक नहीं। लेखन में जो वामपंथी नहीं , वह लेखक नहीं , इस भय का बड़ी धूर्तता के साथ व्यूह रचा है। वामपंथी , ग़ैर वामपंथी लेखक का फ्राड रचा है। नतीज़ा सामने है। बहुतेरे रीढ़हीन लेखक , जिन्हें लेखन का शऊर भी नहीं है , समझ भी नहीं , संवेदना से शून्य हैं , क ख ग भी नहीं मालूम , लाल सलाम बोल-बोल कर बड़े लेखक बने घूम रहे हैं। पैसा दे कर किताब छपवा रहे हैं। लेकिन रचना नहीं है इन के पास। अपने आस-पास देखिएगा तो ऐसे लाल सलामी लेखक झुंड के झुंड लहराते हुए मिलेंगे। संकोच में इन को आप कुछ कह भी नहीं सकते। कृपया सोचिएगा कि हिंदी के वामपंथी समाज को आज भी अपना कोई ब्रेख्त , कोई नेरुदा क्यों नहीं मिल सका है। उन्हीं के गीत गा कर सारा क्रांतिकारी माहौल बनाते हैं , हिंदी में। कभी इस पर भी सभी वामपंथी हिप्पोक्रेट लेखकों , कवियों को सोचना चाहिए। दुष्यंत कुमार के एक शेर में जो कहूं : तुम्हारे पाँव के नीचे कोई ज़मीन नहीं / कमाल ये है कि फिर भी तुम्हें यक़ीन नहीं। वामपंथी कबीले के पास सेक्यूलरिज्म का असली रचनाकार एक कबीर क्यों नहीं है। जो दोनों तरफ की सांप्रदायिकता पर प्रहार करे। सांप्रदायिकता क्या एकतरफा होती है ? इकहरी होती है ? तुलसीदास को गाली देने वाले तो बहुत हैं वामपंथियों के पास पर रामचरित मानस लिखने वाला तुलसीदास जैसा कोई जनप्रिय और लोकप्रिय रचनाकार नहीं है। महाभारत लिखने वाला वेद व्यास जैसा कथाकार नहीं है। वार एंड पीस लिखने वाला टालस्टाय भी नहीं। टालस्टाय जमींदार थे , गोर्की मज़दूर। यानी शोषक और शोषित। फिर भी टालस्टाय और गोर्की की मित्रता मशहूर है। आपस में सदभाव था। मतभेद ज़रूर थे पर नफ़रत और घृणा नहीं थी उन के बीच। हिंदी में कोई महाश्वेता देवी , अरुंधती राय भी क्यों नहीं है ? राहुल सांकृत्यायन , रामविलास शर्मा , निर्मल वर्मा जैसों को धकिया कर उन्हें शर्मशार करने वाला यह बंद हिंदी वामपंथी समाज तो हिंदी में एक ही नामवर सिंह का भी अपमान करने के लिए अब परिचित है।
तमाम वामपंथी पद्म सम्मान लेने से अकसर इंकार करते रहे हैं। इंदिरा गांधी के समय से मोदी के समय तक। श्रीपाद डांगे से लगायत बुद्धदेव भट्टाचार्य तक। किस बुनियाद पर ? क्या भारतीय नहीं मानते ? तो तमाम अन्य पदों का रसगुल्ला कैसे खाते रहते हैं ? यह भी अनबूझ है।
मालूम है वामपंथी अब सिर्फ़ इस्तेमाल होने के लिए ही रह गए हैं। वर्ष 2002 में जब अमरीका ईराक़ युद्ध हो रहा था तब अमरीका का बहुत दबाव था कि भारत अपनी सेना अमरीका की मदद के लिए ईराक भेजे। तब अटल बिहारी वाजपेयी प्रधान मंत्री थे। वह भारतीय फ़ौज ईराक नहीं भेजना चाहते थे। लेकिन दबाव जब ज़्यादा बढ़ गया तो उन्हों ने एक दिन कामरेड हरिकिशन सिंह सुरजीत को घर पर चाय पर बुलाया। सोमनाथ चटर्जी जैसे कुछ और कामरेडों को भी । कामरेड लोग जब अटल जी की चाय पर पहुंचे तो अटल जी ने खुद चाय बना कर परोसी। कामरेड लोग चौंके। सुरजीत ने कहा कि पंडत कोई ख़ास बात है क्या ? अटल जी ने कहा , हां कामरेड ! अमरीका - ईराक युद्ध में आप लोग कर क्या रहे हैं ? कामरेड लोग बोले , हम कर ही क्या सकते हैं ? अटल जी ने कहा , बहुत कुछ। कामरेडों ने पूछा , वह कैसे ? अटल जी ने कहा , सड़क से संसद तक अमरीका के ख़िलाफ़ आवाज़ तो उठा ही सकते हैं। यह काम सिर्फ़ आप ही लोग कर सकते हैं। कामरेड लोग दूसरे दिन से ही संसद से सड़क तक स्टार्ट हो गए। माहौल बनाने में वामपंथियों का आज भी जवाब नहीं है। भले खत्म हो गए हों पर माहौल बनाना नहीं भूले हैं। फिर क्या था अटल जी ने अमरीका को बता दिया कि हमारे देश में अमरीका के ख़िलाफ़ माहौल बहुत है। सेना नहीं भेज सकते। सेना भेजने पर भारत में माहौल ख़राब हो जाएगा।
कामरेड हरिकिशन सिंह सुरजीत एक समय मुलायम सिंह यादव के पेरोल पर किस तरह काम कर रहे थे , लोग भूल गए हैं क्या ? मुलायम को प्रधान मंत्री बनाने के लिए कामरेड हरिकिशन सिंह सुरजीत ने जाने कितने शीर्षासन किए, लोग जानते हैं। वह तो वी पी सिंह ने लालू यादव को साथ ले कर मुलायम का पत्ता काट दिया। ऐसे अनेक क़िस्से हैं वामपंथियों के इस्तेमाल के। वी पी सिंह की ही एक कविता है जो वामपंथियों पर बड़ी फिट बैठती है। शीर्षक है लिफ़ाफ़ा : पैग़ाम उन का / पता तुम्हारा / बीच में फाड़ा मैं ही जाऊंगा। देखिए न बहुत तेज़ भभकने वाले जे एन यू फ़ेम कामरेड कन्हैया कैसे तो इस्तेमाल हुए। कश्मीरी आतंकियों ने इस्तेमाल किया। जेल यात्रा की। दिल्ली के वकीलों से बुरी तरह पिटे। जेल से ज़मानत पर निकले तो महत्वाकांक्षा ने अंगड़ाई ली। महाभ्रष्ट लालू के तलवे चाटने लगे। पांव छूने लगे। लोगों ने लालू को बताया कि कन्हैया आ गया पार्टी में तो तेजस्वी का क्या होगा। लालू ने कन्हैया को गेट आऊट कर दिया। कन्हैया राहुल शरणम गच्छामि हो गए। अब क्या हो गए ? वह सारी ऊर्जा , वह धार कहां बिला गई। कि चुनाव में ज़मानत ज़ब्त हो गई। तमाम कामरेडों का यही हाल है। हिंदी पट्टी से तो संसदीय राजनीति से विदा हुए दशकों हो गए वामपंथियों को। अपने गढ़ पश्चिम बंगाल में भी सिफ़र हो गए। लोग विषैला वामपंथ लिखने और कहने लग गए हैं।
क्यों ?
वही हिप्पोक्रेसी ! अभी बहुत ज़्यादा समय नहीं बीता है साहित्य अकादमी अवार्ड वापसी के नाटक को। अशोक वाजपेयी और ओम थानवी कम्युनिस्ट नहीं हैं। पर साहित्य अकादमी के तत्कालीन अध्यक्ष विश्वनाथ प्रसाद तिवारी से विश्व कविता समारोह का अपना निजी खुन्नस निकालने के लिए कितना तो ख़ूबसूरत इस्तेमाल किया वामपंथी लेखकों का अशोक वाजपेयी ने। सब कुछ एकतरफ कर के आधार पत्र में नाम न होने के बावजूद , मैनेजर पांडेय के भरपूर विरोध के बावजूद उदय प्रकाश को साहित्य अकादमी दे दिया। यह उन का अधिकार था। कोई बात नहीं। अशोक वाजपेयी ने उदय प्रकाश से साहित्य अकादमी अवार्ड की वापसी की शुरुआत करवाई। फिर तो वामपंथी भेड़ों की कतार लग गई। कहीं पे निगाहें , कहीं पे निशाना के तर्ज़ पर देश भर में मोदी विरोध का जो माहौल बनवाया बरास्ता साहित्य अकादमी विश्वनाथ प्रसाद तिवारी को हटवाने के लिए वह तो न भूतो , न भविष्यति ! पर न विश्वनाथ प्रसाद तिवारी हटे , न सचमुच किसी ने अवार्ड वापस किया। न मोदी का कुछ हुआ। नियमत : साहित्य अकादमी अवार्ड कोई लौटा ही नहीं सकता। साहित्य अकादमी के संविधान में है यह। लोग इस बाबत लिखित सहमति भी देते हैं , साहित्य अकादमी को कि वह यह अवार्ड कभी लौटाएंगे नहीं। यह बात अशोक वाजपेयी भी जानते थे और उसे लौटाने वाले भी। पर ऐलान करने में , माहौल बनाने में क्या जाता है। अख़लाक़ की हत्या गाज़ियाबाद में हुई थी। क़ानून व्यवस्था उत्तर प्रदेश सरकार के जिम्मे थी। सब जानते थे। सभी यह भी जानते हैं कि सरकार कोई भी हो , साहित्य अकादमी में उस की एक नहीं चलती। पर वामपंथी हिप्पोक्रेट लेखक इस बात को कैसे नहीं जानते थे , आज तक समझ से बाहर है। वामपंथी गिरोह के लोग अपने को बहुत बड़ा इंटेलेक्चुवल मानते-मनवाते हैं पर हर बार , हर किसी से इस्तेमाल क्यों होते रहते हैं , समझना कुछ कठिन नहीं है। बशीर बद्र का एक शेर याद आता है :
चाबुक देखते ही झुक कर सलाम करते हैं
शेर हम भी हैं सर्कस में काम करते हैं।
तो आजकल यह वामपंथी शेर मोदी विरोध के बुखार में कांग्रेस के सर्कस में काम कर रहे हैं। जैसे यह वामपंथी हिप्पोक्रेटों के लिए ही इक़बाल लिख गए हैं :
'वतन की फ़िक्र कर नादां
मुसीबत आने वाली है
तेरी बरबादियों के मशविरे हैं आसमानों में
तुम्हारी दास्तान भी न होगी दास्तानों में।'
अब आते हैं आप की नाराजगी के मूल पर। प्रेमचंद पर मेरी एक पुरानी पोस्ट थी कोई चार लाइन की। बीते कई साल से वह मेरी वाल पर उपस्थित है। अभी भी है। साल दर साल। इस बार भी रिपोस्ट की। प्रेमचंद के स्त्री प्रसंग पर वह पोस्ट थी। जिस में प्रेमचंद की दूसरी पत्नी शिवरानी देवी की पुस्तक प्रेमचंद घर में के हवाले से प्रेमचंद का स्त्री प्रसंग का ज़िक्र है। शिवरानी देवी की यह किताब मैं ने विद्यार्थी जीवन में गोरखपुर की रेलवे लाइब्रेरी में पढ़ी थी। जब प्रेमचंद व्यक्तित्व और रचना दृष्टि किताब संपादित की तो अमृतलाल नागर ने जो लेख लिख कर दिया इस किताब के लिए , वह प्रेमचंद घर में किताब को ही आधार बना कर लिखा है। इस लेख में नागर जी ने भी प्रेमचंद के स्त्री प्रसंग का विवरण दिया है। जिस में प्रेमचंद की स्वीकारोक्ति है। सुविधा के लिए नागर जी के उस लेख को भी इस लेख के साथ नत्थी कर रहा हूं।
अलीगढ़ यूनिवर्सिटी के शैलेश ज़ैदी ने तो अपनी एक किताब प्रेमचंद की उपन्यास यात्रा नवमूल्यांकन , जो अलीगढ़ यूनिवर्सिटी के अनुदान से प्रकाशित है , में इस प्रसंग को बहुत आगे बढ़ाया है। वेश्यागमन तक ले गए हैं। बहुत से तथ्य हैं , तर्क हैं प्रेमचंद के स्त्री प्रसंग के बाबत इस पुस्तक में। लेकिन आप जैसे मित्र इस बात पर भी उबाल खा गए। हमेशा संघी साज़िश देखने की बीमारी से पीड़ित इस बात में भी संघी एंगिल खोज लिया। ग़ज़ब है। जब आपत्ति और ऐतराज की बाढ़ आ गई तो जवाब में कुछ और पोस्ट लिखी। दिलचस्प यह कि इन पोस्टों की इतनी रिपोर्ट कर दी वामपंथी कबीले ने की और खट-खट सारी पोस्ट फेसबुक ने मिटा दी। सो इस बार यह लेख अपने ब्लॉग पर लिख रहा हूं। इस लिए भी कि जिन भी कबीलाई लोगों ने फेसबुक पर ब्लॉक कर रखा है , वह भी पढ़ना चाहें तो अपनी सुविधा से पढ़ लें। इन से , उन से मांगने का परिश्रम न करें। फिर यह लंबा लेख ब्लॉग में ही लिख पाना मुमकिन है। फ़ेसबुक पर नहीं। हो सकता है जल्दी ही एक किताब में भी हो।
क्या इस तथ्य से कि प्रेमचंद के जीवन में कुछ स्त्री प्रसंग हैं , इस से प्रेमचंद का लेखक छोटा हो जाएगा ? सब का ज़िक्र हो सकता है तो प्रेमचंद का क्यों नहीं ? कालिदास , तुलसीदास से भी बड़े रचनाकार हैं क्या प्रेमचंद ? क्या कालिदास , तुलसीदास के स्त्री प्रसंगों की चर्चा नहीं होती ? किस की नहीं होती ? तुलसीदास के स्त्री प्रसंगों पर क्या-क्या नहीं लिखा गया है ? एक धारावाहिक तक में उन के स्त्री प्रसंग दिखाए गए हैं ? तुलसीदास आख़िरी समय में एक कोढ़ी स्त्री के साथ रहने लगे , ऐसा एक धारावाहिक में दिखाया गया। किसी ने ऐतराज किया ? कोई दंगा फ़साद हुआ क्या ? कि तुलसी को लोगों ने पढ़ना , छापना , गाना बंद कर दिया। स्त्री प्रसंग जीवन का हिस्सा है। लोहिया कहते थे अगर ज़बरदस्ती और शोषण नहीं है तो कोई संबंध अनैतिक नहीं है। सब जायज है।
पाठ्यक्रमों में पढ़ाया गया कि लाश को नाव बना कर , नदी पार की। सांप को रस्सी समझ कर पत्नी से मिलने घर में घुस गए तुलसीदास। तो क्या तुलसीदास को पढ़ना और गाना छोड़ दिया लोगों ने ? तुलसीदास ने भारतीय जन-मानस को जितना संपन्न किया है , लगातार बदला है , तुलसीदास का जो प्रभाव है जन-मानस पर , ऐसा किसी और एक रचनाकार का हो तो कृपया बताइएगा। तुलसी के प्रशंसक , आलोचक और निंदक भी उन की रचना के आगे एक छोटी सी लकीर नहीं खींच सके हैं अभी तक। कालिदास के स्त्री प्रसंग पर तो मोहन राकेश ने आषाढ़ का एक दिन जैसा शानदार नाटक ही लिख दिया है। तो क्या कालिदास को पढ़ना लोगों ने बंद कर दिया। उन के जैसा नाटककार , वर्णन का रचनाकार ढूढे नहीं मिलता। कहते हैं कालिदास के बहाने अपनी व्यथा-कथा लिखी मोहन राकेश ने। नामवर सिंह बताते थे कि गुरुदेव तुलसीदास पर एक उपन्यास लिखना चाहते थे और तुलसीदास के बहाने अपनी व्यथा-कथा लिखना चाहते थे। गुरुदेव मतलब हजारी प्रसाद द्विवेदी। वह हजारी प्रसाद द्विवेदी जिन की भाषा का स्तर , वह लालित्य अभी तक किसी और हिंदी लेखक के हिस्से नहीं आई। थोड़ा बहुत एक अज्ञेय छू पाए हैं। पर वह भी छू कर बस निकल गए हैं। निर्मल वर्मा भी नहीं पहुंच पाए। मुक्तिबोध एक साहित्यिक की डायरी में अभ्यास ज़रूर करते हैं पर वह भी असफल हैं।
भारतेंदु हरिश्चंद्र के स्त्री प्रसंगों के तमाम क़िस्से जन-मानस में हैं। भारतेंदु के स्त्री प्रसंगों पर तमाम किताबें लिखी गई हैं। उपन्यास लिखे गए हैं। नाम ले-ले कर लिखे गए हैं। मनीषा कुलश्रेष्ठ ने अभी हाल ही मल्लिका नाम से बहुत ही दिलचस्प और नायाब उपन्यास लिखा है। न मल्लिका का नाम छुपाया , न भारतेंदु हरिश्चंद का। भारतेंदु के वेश्या गमन का भी विस्तार से ज़िक्र है। इतना कि वेश्याओं के यहां सज-धज कर जाने के लिए अपने वस्त्र भी वह मल्लिका के घर ही रखते हैं। नीरजा माधव ने भी मल्लिका को ले कर लिखा है। वह मल्लिका जो बंकिम बाबू की ममेरी बहन थीं। बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय उस वक़्त बड़े रचनाकार ही नहीं , वंदे मातरम लिखने वाले ही नहीं , आई सी एस अफ़सर थे। तो क्या लोगों ने भारतेंदु के लिखे अंधेर नगरी , चौपट राजा और नाटकों का बहिष्कार कर दिया ? कि निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल / बिन निज भाषा-ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल। को बिसार दिया। शरत चंद्र चट्टोपाध्याय के भी तमाम स्त्री प्रसंग हैं। अमृता प्रीतम के पुरुष प्रसंग हैं। रमणिका गुप्ता के तमाम पुरुष प्रसंग हैं। अजीत कौर के पुरुष प्रसंग हैं। खुद ही इन स्त्रियों ने लिखे हैं। राजेंद्र यादव ने अपने तमाम स्त्री प्रसंग लिखे हैं। इस बाबत दो-दो किताब लिख गए हैं। मुड़-मुड़ के देखता हूं तथा एक बीमार आदमी के स्वस्थ विचार। जो कुछ छूट गया था मन्नू भंडारी ने पूरा कर दिया यह लिख कर कि तो यह भी देखा होता। कमलेश्वर की आत्मकथा में तो स्त्री प्रसंगों की भरमार है। मन्नू भंडारी ने कमलेश्वर की स्त्री कथा को भी और धार दे दिया। तो क्या कमलेश्वर का लेखक छोटा हो गया कि राजेंद्र यादव का ? मोहन राकेश , कमलेश्वर और राजेंद्र यादव की तिकड़ी थे। मोहन राकेश के भी तमाम स्त्री प्रसंग हैं। मोहन राकेश की चौथी पत्नी अनीता औलक राकेश ने अपनी आत्मकथा चंद सतरें और में अपनी मां से भी उन के संबंधों की और संकेत किया है। अपनी मां से जैनेंद्र , अज्ञेय तक को जोड़ दिया है। तो इन सब का लेखक क्या ख़त्म हो गया ? जैनेंद्र कुमार तो कहते ही थे कि लेखक को पत्नी के अतिरिक्त प्रेयसी भी चाहिए। ऐसे अनेक विवरण हैं। फ़िराक़ जैसे शायर और निराला जैसे कवियों के स्त्री प्रसंग के अलावा समलैंगिक प्रसंग भी हैं। तो क्या इस से उन का शायर , उन का कवि छोटा हो जाता है ? बंद दिमाग को खोलिए। दुनिया भर के बहुतेरे लेखकों , कवियों , राजनीतिज्ञों , अभिनेताओं , अभिनेत्रियों के जीवन यह और ऐसे तमाम प्रसंगों से भरे पड़े हैं। तो क्या उन का क़द , उन का काम घट जाता है ? प्रेमचंद भी मनुष्य थे , देवता नहीं। अच्छा देवताओं के यहां भी क्या तमाम स्त्री प्रसंग नहीं हैं ? क्या लोग उन की पूजा बंद कर चुके हैं।
तो ?
अभिनेता ओम पुरी के जो तमाम स्त्री प्रसंग उन की पत्रकार पत्नी ने किताब में लिखे , उसे ओम पुरी ने ही उन्हें बताए थे। इसी तरह प्रेमचंद की दूसरी पत्नी शिवरानी देवी ने जो प्रेमचंद के स्त्री प्रसंग लिखे हैं , आख़िरी समय में प्रेमचंद ने ही उन्हें बताए थे। कुछ और प्रसंगों पर पूछा शिवरानी देवी ने तो उन्हों ने हामी भरी। पत्नी ऐसी शय होती है , जो पति का रग-रग जानती है। शिवरानी देवी के हवाले से अगर प्रेमचंद के स्त्री प्रसंग का मैं ने अनायास ज़िक्र कर दिया है तो क्या अपराध कर दिया है ?
फिर प्रेमचंद क्या मिट्टी के माधो हैं , जो इस स्त्री प्रसंग का ज़िक्र करते ही बह कर नष्ट हो जाएंगे ? ऐसे ही होता तो टालस्टाय का वार एंड पीस तो लोग भूल ही गए होते। क्यों कि टालस्टाय के पास भी स्त्री प्रसंग बहुत हैं। तमाम रचनाकारों के यहां स्त्री प्रसंगों की बाढ़ है। तो यह सब के सब तो अब तक बह ही गए होते। नीरज जैसे गीतकारों को लोग कच्चा चबा जाते। क्यों कि स्त्री प्रसंगों का उन के पास तो समंदर है। जखीरा है। इसी लखनऊ में भी अनेक स्त्रियां हैं। जीवित हैं। अब नीरज नहीं हैं तो वह दूसरों के साथ नत्थी हैं। नीरज के रहते ही इधर-उधर हो गईं। क्यों कि नीरज से जितना पाना था , पा चुकी थीं। नाम ले लूं क्या ? नीरज के जीते जी ही , उन के सामने ही उन के क़िस्से सुना देते थे लोग। उन स्त्रियों का हालचाल पूछ लेते थे। नीरज मुस्कुरा कर बात ख़त्म कर देते थे।
कारवां ऐसे ही नहीं गुज़र जाता है और ग़ुबार देखना पड़ जाता है। नीरज का यह कारवां , कानपुर में सालों पहले गुज़रा था जब वह जवान थे और वह ग़ुबार देखते रह गए थे। वह उन्हें शूल सा चुभ गई थी। कानपुर समेत समूचा देश यह कारवां गुज़रने का क़िस्सा जानता है। तो क्या नीरज के गीतों की मिठास विलुप्त हो गई ? क्या-क्या कहूं , क्या-क्या न कहूं। कई सारे वामपंथी लेखक हैं , जो जीवित हैं और उन के अनेक स्त्री प्रसंग हैं। लिखना शुरू कर दूं क्या ?
पर एक आप ही नहीं कुछ और भी मित्र ऐतराज की गठरी ले कर उपस्थित हैं। लखनऊ में एक मित्र से मैं ने कहा कि कृपया आप शिशुओं जैसी बातें मत कीजिए। सूखे-सूखे लोगों के साथ उठना-बैठना आदमी को शिशु बना देता है। हरी-भरी दुनिया में निकलिए। दुनिया बहुत सुंदर है। सुंदर स्त्रियों से भी ज़्यादा सुंदर ! प्रेमचंद हिंदी और उर्दू के भारतीय लेखक हैं। बड़े लेखक हैं। उन को एक कुएं में क़ैद करने से भरसक बचिए ! शेक्सपीयर के बाद एक प्रेमचंद ही हैं जो प्राइमरी से लगायत एम तक पढ़ाए जाते हैं। कोई एक दूसरा भारतीय लेखक , ऐसा नसीब नहीं पा सका है।
तुलसीदास जब बतौर रचनाकार उभर रहे थे तो उन से बहुत लोग ईर्ष्या करने लगे थे। उन की विनय पत्रिका तब तक आ गई थी। आचार्य लोग मानते हैं कि कविता के मानदंड पर विनय पत्रिका रामचरित मानस से बीस है। बस उतनी लोकप्रिय नहीं है। ख़ैर लोग तुलसीदास से जलने-भुनने लगे थे। अवसर तलाशते थे कि कैसे तुलसीदास को अपमानित किया जाए। कविता में वह भक्ति काल का समय था , तब यह हाल था। तो कानपुर में संतों का जमावड़ा हुआ। तुलसीदास भी आमंत्रित थे। व्याख्यान आदि के बाद जब भोजन का समय आया तो पंक्ति में तुलसीदास को सब से आख़िर में बैठाया गया था। भोजन के लिए पात्र भी नहीं दिया गया। रोटी परोसी गई तो तुलसीदास ने रोटी हाथ में ले लिया। पर जब दाल आई तो परोसने वाले से तुलसी ने कहा कि पात्र तो है नहीं , दाल कैसे लूं। दाल परोसने वाले उन के पास रखे जूते को इंगित करते हुए कहा कि , पात्र है न ! तुलसी ने फिर भी पूछा कि कहां ? तो उस ने स्पष्ट रूप से बगल में रखा जूता दिखा दिया। तुलसी ने चुपचाप जूते में दाल ले कर खा लिया। बाद में जब अन्य लोगों को पता चला तो लोगों ने प्रतिवाद करते हुए तुलसी से कहा कि आप को तुरंत विरोध करना चाहिए था। अब से विरोध कीजिए। हम लोग साथ हैं। तुलसीदास ने छूटते ही कहा , यही तो यह लोग चाहते हैं कि मैं लिखना-पढ़ना छोड़ कर जूते में दाल की लड़ाई लड़ूं। मुझे यह सब नहीं करना। आप लोग लड़िए। और तुलसीदास कानपुर से चले गए। यह वही तुलसीदास हैं जिन्हें अकबर ने क़ैदी बना कर अपने दरबार में बुलवाया था और नवरत्न बनने का प्रस्ताव दिया था। क़ैद में रहने के बावजूद तुलसीदास ने बड़ी विनम्रता से नवरत्न बनने का प्रस्ताव ठुकरा दिया था। लेकिन वामपंथियों ने तमाम अकादमी , संस्थान , विश्विद्यालय , प्रतिष्ठान आदि पर कब्ज़ा करने के लिए, पाठ्यक्रम में रहने आदि-इत्यादि के लिए क्या-क्या यत्न किए हैं , कहां-कहां नाक रगड़ी है , आत्मा गिरवी रखी है , सारी कथा अब पब्लिक डोमेन में हैं। कुछ शेष हैं , वह भी आ जाएंगी। मोदी विरोध के बुखार के बावजूद अभी भी अधिसंख्य जगहों पर वामपंथी काबिज हैं। क्यों कि देश में लोकतंत्र है। और यह देश किसी नरेंद्र मोदी के पिता जी भर का नहीं है।