Monday, 2 February 2026

शबर शब्द शबरी

शबर शब्द जाति सूचक नहीं है। शिव के द्वारा उपदिष्ट तान्त्रिक मन्त्रों को शाबर मन्त्र कहते हैं। दक्षिण ओड़िशा तथा उसके निकट के छत्तीसगढ़ और आन्ध्र प्रदेश के क्षेत्रों को शबर क्षेत्र कहते हैं। मीमांसा दर्शन का शाबर भाष्य प्रसिद्ध है जो उस क्षेत्र के एक विद्वान् द्वारा प्रणीत था। यह वराह अवतार तथा वैखानस दर्शन से सम्बन्धित क्षेत्र है।

जाति और ब्राह्मण

ब्राह्मणों को जातिवाद के लपेटे में जबरन लिया जाता है। यदि जाति ब्राह्मण को पसंद होती तो स्वयं ब्राह्मणों के भीतर ही वैसी ही जातियाँ नहीं होतीं जैसी आरक्षितों में मिलती हैं? 

ब्राह्मण जाति से नहीं गोत्र से चला। जाति और गोत्र में फर्क है। जाति सामाजिक ( social) है, गोत्र पैतृक( patrilineal)। भारद्वाज, कश्यप, अत्रि, विश्वामित्र, वशिष्ठ , गौतम, जमदग्नि सबके गोत्र हैं। गोत्र व्यवस्था सगोत्र विवाह का निषेध करती थी। जाति व्यवस्था अपनी जाति में विवाह को प्रोत्साहित करती है। 

ब्राह्मणों की श्रेणियाँ अवश्य हैं। पर वे स्थानिकता के आधार पर हैं। कोंकणस्थ हैं, देशस्थ हैं, कान्यकुब्ज हैं, सरयूपारीण हैं, गौड़ हैं, कश्मीरी हैं, सारस्वत हैं, मैथिल हैं, उत्कल हैं, द्रविड़ हैं। जाति जैसी चीज उनके यहाँ नहीं है। ये सब एक ही वर्ण — ब्राह्मण — के अलग-अलग भौगोलिक समूह हैं। पर इनमें से कोई भी एक दूसरे की जाति नहीं है। मतलब, कोंकणस्थ और कान्यकुब्ज के बीच वह दीवार नहीं है जो दो अलग जातियों के बीच होती है। ये स्थानिक भेद हैं, जैसे कि एक देश में अलग-अलग क्षेत्रों के लोग होते हैं।और सबसे ज़रूरी बात — इनमें से कोई भी दूसरे को "नीचा" नहीं मानता। जाति व्यवस्था में ऊँचा-नीचा होता है। पर ब्राह्मणों के इन स्थानिक समूहों में वह पदानुक्रम (hierarchy) नहीं है जो जाति व्यवस्था बनाती है। वहाँ फर्क था भी तो वेद पाठ के आधार पर था। द्विवेदी थे, त्रिवेदी थे, चतुर्वेदी थे। दो तीन चार - जितने वेद पढ़े हों। फर्क का आधार ज्ञान था। 

यह समझिये कि तब ‘ब्राह्मणों’ की बात करनी कुछ लोगों की मजबूरी क्यों हो जाती है।इसलिए कि ब्राह्मण एक जाति है ही नहीं, वह वर्ण है।

यानी ब्राह्मण इस बात के सर्वश्रेष्ठ उदाहरण हैं कि practice before you preach.

तब आरक्षित और अनुसूचित जातियां भी वैसी ही जातिमुक्तता क़ायम करें जैसी ब्राह्मण वर्ण ने करके दिखाई। खुद जाति के मोह में रहें, टोह में रहें और दूसरों पर दोषारोपण करते रहें- यह हमारा पाखंड है। पहले हम स्वयं खंड खंड में बँटे न रहें, फिर आगे बढ़ें।  

कम ऑन, फ्रेंड्स लेट्’स डू इट। चैरिटी बिगिन्स एट होम।

Friday, 30 January 2026

ज्ञान के प्रति एक द्वेष रहता ही रहता है

ज्ञान के प्रति एक द्वेष रहता ही रहता है। लोग दूसरे के धन प्राचुर्य को सह लेते हैं पर ज्ञान प्राखर्य नहीं सहा जाता। किसी भी सभ्यता को नष्ट करना हो तो सबसे पहले उसके ज्ञान-ग्रिड पर आक्रमण करना होता है। 

राक्षस क्यों ब्राह्मणों और यज्ञों पर आक्रमण करते थे? द्विजभोजन मख होम सराधा/ सब कै जाइ करहु तुम्ह बाधा। यज्ञ होम हवन में ही बाधा नहीं, श्रद्धा में भी बाधा। देखत जग्य निसाचर धावहिं/ करहिं उपद्रव मुनि दुख पावहिं। यह अत्याचार जो ब्राह्मणों पर हुए, उनके विवरणों से हमारी पुस्तकें भरी हुई हैं। जेहिं जेहिं देस धेनु द्विज पावहिं/ नगर गाऊँ पुर आगि लगावहिं। 

इसलिए ब्रह्महत्या के विरुद्ध इतने कड़े नियम बनाने पड़े थे। तपस्वियों, ऋषियों मुनियों की हिंसा राक्षसों का प्रिय शगल बन गया था। अरण्यकांड में राम को ज्ञात होता हैः "इस वन में रहने वाला वानप्रस्थ महात्माओं का यह महान समुदाय जिसमें ब्राह्मणों की ही संख्या अधिक है तथा जिसके रक्षक आप ही हैं, राक्षसों के द्वारा अनाथ की तरह मारा जा रहा है इस मुनि समुदाय का बहुत अधिक मात्रा में संहार हो रहा है। (श्लोक 15, सर्ग 6, अरण्यकांड)।' आइये, देखिये, ये भयंकर राक्षसों द्वारा बार- बार अनेक प्रकार से मारे गये बहुसंख्यक पवित्रात्मा मुनियों के शरीर शव-कंकाल दिखायी देते हैं। “(अगला श्लोक)" पंपा सरोवर और उसके निकट बहने वाली तुंगभद्रा नदी के तट पर जिनका निवास है, जो मंदाकिनी के किनारे रहते हैं तथा जिन्होंने चित्रकूट पर्वत के किनारे अपना निवास स्थान बना लिया है, उन सभी ऋषि-महर्षियों का राक्षसों द्वारा महान संहार किया जा रहा है। " (अगला)" इन भयानक कर्म करने वाले राक्षसों ने इस वन में तपस्वी मुनियों का जो ऐसा भयंकर विनाशकांड मचा रखा है, वह हम लोगों से सहा नहीं जाता है। “(अगला)

तो जिन लोगों ने लगातार अत्याचार सहे, उन लोगों की गलती यह रही कि उन्होंने अपने विक्टिमहुड का नैरेटिव तैयार नहीं किया। बार बार उनका ईश्वर उनकी रक्षा के लिए अवतार लेता रहा पर बार बार उसका आना ही इस कारण होता रहा कि वे ही बार बार अतिचार के शिकार होते रहे। सिर्फ पौराणिक इतिहास ही नहीं बाद का इतिहास भी ब्राह्मणों के उत्पीड़न का साक्षी रहा। 

जो विप्र परंपरा यह कहती थी कि 'यो हि यस्यान्न मश्नाति स तस्याश्नाति किल्विषम्" कि जो जिसका अन्न खाता है, वह उसका पाप भी खाता है'; उस परंपरा को दूसरे के मुंह का निवाला छीन लेने का आरोपी बनाया गया। 

जिस परंपरा में विप्र को अकिंचन होना सिखाया गया हो- 'अनन्तसुखमाप्नोति तद् विद्वान यस्त्वाकिंचनः' कि जो अकिंचन है, वह विद्वान अनन्त सुख पाता है- उस परंपरा को इस बात के लिए जिम्मेदार ठहराया गया कि जो पददलित हैं, जो पीड़ित है, उनकी दुर्दशा का दायित्व इन्हीं लालची पेटू ब्राह्मणों का है। 

ऐसे में भारत में एक दल का खुलेआम ( खुलेआम इसलिए कि यह उनकी वेबसाइट पर उपलब्ध है) यह दावाः-कि Brahmanism is an ideology of graded inequality and oppression. Its origins lie in the Vedic period, thousands of years ago. A class that has emerged and established its rule, "ब्राह्मणवाद श्रेणीकृत असमानता और दमन की विचारधारा है। इसकी उत्पत्ति वैदिक काल में हजारों साल पहले हुई। एक वर्ग उभरा और उसने अपनी सत्ता स्थापित की" :-हास्यास्पद और अनपढ़ लगता है। 

ध्यान दीजिए कि स्वयं अंबेडकर भी बहुत परिश्रम के बावजूद वेदों में जाति व्यवस्था नहीं ढूँढ पाये थे पर इस दल को वैदिक काल को बदनाम करने में कोई संकोच नहीं है।

देखें कि इस एक बिन्दु पर साम्राज्यवादी और मार्क्सवादी, दलित चिंतक, मिशनरी और अल्पसंख्यकवादी सब एक हो जाते है। 

गेल ओम्वेद मिल्ली गजट में 'हावी' ब्राह्मणवाद के विरुद्ध मुस्लिम दलित एकता की वकालत इस आधार पर करते हैं कि बौद्ध धर्म की पराजय के बाद इस्लाम ने ही भारत में शताब्दियों तक समानता (egalitarianism) और बंधुत्व (ब्रदरहुड) के मूल्यों को जिंदा रखा। 

सैय्यद शहाबुद्ददीन भी मिल्ली गजट में दलित-मुस्लिम गठजोड़ की संभावनाओं की चर्चा करते हैं और इस बात पर दुःख जताते हैं कि 'शूद्र ब्राह्मनिकल व्यवस्था में ही एकोमोडेशन चाहते हैं। 

समानता के मूल्य इन भले मानुसों के लिए उस वेद में नहीं है जो यह कहता हैः "असंबाधं मध्यतो मानवानां यस्या उदवतः /ऊंचनीच की असमानता नहीं है। समता बहुत है।), प्रवतः समंबेहु.” (हमारी मातृभूमि में रहने वालों में उन्हें शंकराचार्य के उस उद्‌घोष में 'मूल्य' नहीं दिखता कि It has been established that every one has the right to the knowledge and that the supreme goal is achieved by that knowledge alone. कि "यह स्थापित सत्य है कि प्रत्येक को ज्ञान का अधिकार है और महत्तम लक्ष्य ज्ञान मात्र से ही प्राप्त किया जाता है।" (भाष्य, तैत्तिरीय उपनिषद् 2.2)। वह सर्वहाराओं के उन स्वनामधन्य शुभ 'चिंतको' में नहीं था जो व्यवस्था के उच्छिष्ट पर पलते हैं। 

वह सच्चा ब्राह्मण था जो 'भिक्षां देहि' का जीवन किसी बाहरी निर्देश से नहीं जिया, बल्कि अपने हालात और हकीकतों के कारण जिया। जिस तरह से ये सभी 'बंधु' एक हुए हैं, उससे इतना तो स्पष्ट है कि ब्राह्मणवाद की बोगी से इनके जरूर कुछ हित सधते हैं। अन्यथा क्रूसेड, विच ट्रायल्स इनक्वीजीशन, जेनोसाइड, उपनिवेशवाद, एटम-बम, स्लेवरी, नव-साम्राज्यवाद, जजिया, ईजियन द्वीप में इस्लामी आक्रामकों द्वारा 27,000 ईसाइयों का नरसंहार, कांस्टिनटिनोपल से लेकर दिल्ली तक मध्यकालीन मुस्लिम आक्रामकों के सामूहिक हत्याकांड, 1840-1860 के बीच खलीफाओं के हत्याकांड , 1847 में 30,000 असीरियन क्रिश्चियनों को मार डालना, लेबनान, दैर- अल- कमार, जाजिन, हस्बैया, राशय्या, जाला दामस्कस के भयावह नरसंहार जहां पहले ईसाइयों को शस्त्र जमा करने को कहा गया और बाद में सामूहिक किलिंग में 'रस' लिया गया, 1870 के दशक के बाल्कन हत्याकांड (जहां कभी 12,000 ईसाई एक साथ मार डाले गए, तो कभी 9000), 1890 के दशक के नरसंहार (जहां कभी इंस्तंबूल में 6000 आर्मीनियन ईसाइयों को) 'बूचर' किया गया तो कभी 3 लाख असीरियन ईसाइयों का 24 अप्रैल 1915 से शुरू हत्याकांडों की श्रृंखला (जब आटोमन मुस्लिम शासकों द्वारा 15 लाख आर्मीनियनों और 2.50 लाख असीरियनों की हत्या की गई); हिरोशिमा, नागासाकी लेनिन-स्टालिन के रूस, माओ के चीन, कम्पूचिया में 'ड्राप इयर', नक्सली नरसंहार ये सब समानता (egalitarianism) और बंधुत्व (brotherhood) के वाकई ऐसे उदाहरण हैं जिन्हें वैदिक समय से लेकर अभी तक ब्राह्मणवाद कभी जिंदा नहीं रख पाया लेकिन इन ‘बंधुओं’ ने कभी खत्म नहीं होने दिया। 

इस परिप्रेक्ष्य में पुनः उस दल के कथन के अगले हिस्से को पढ़िए Its outlook of graded superiority and inferiority has infected, to a greater or lesser degree, each and every caste and religious community. कि 'इसके श्रेणीकृत श्रेष्ठता और हीनता के दृष्टिकोण ने ज्यादातर और कमतर रूप में मगर हर जाति और धार्मिक समुदाय को संक्रमित किया।' यहां "Its" का अर्थ ब्राह्मणवाद से है। लेकिन 'ईच' एवं 'एवरी' पर ध्यान दें और ध्यान दें 'रिलीजस कम्युनिटी' शब्द पर। 

माने यह कि ऊपर गिनाए गए इन सारे शुभकामों के लिए भी ब्राह्मणवाद ही जिम्मेदार रहा होगा- यदि इनकी मानें तो। बुद्धि के ये जमींदार आगे कहते हैं: Marx has spoken about this advance as a process involving the elimination of all classes and class distinctions generally, all the relation of production on which they rest, all the social relations corresponding to them, and all the ideas that result from these social relations. This understanding was further deepend by Mao Tse Tung, especially through the Great Proletariat Cultural Revolution. In India, the task of continuing the revolution, all the way up till communism, is crucially dependent on advancing and deepening the struggle against Brahmanism and its concrete manifestations.

अर्थात, "मार्क्स ने इस प्रगति को एक ऐसी प्रक्रिया के रूप में बताया जो सभी वर्गों और वर्ग विशिष्टताओं को सामान्य तौर पर समाप्त करती है. सभी उत्पादन-संबंध जिन पर वे निर्भर हैं, उससे मिलते सभी सामाजिक रिश्ते, और सभी विचार जो इन सामाजिक रिश्तों का फल हैं। यह समझ आगे माओ-त्से-तुंग द्वारा गहरी की गई, खासकर महान सर्वहारा सांस्कृतिक क्रांति के जरिए। भारत में क्रांति को जारी रखने का काम- साम्यवाद के लक्ष्य तक- ब्राह्मणवाद और इसके ठोस स्वरूपों के विरुद्ध संघर्ष को बढ़ाने और गहरा करने पर अत्यंत महत्वपूर्ण रूप से निर्भर है।" 

तो यह स्पष्ट है कि ब्राह्मनिज्म रावण के समय से ही एक ऐसी सत्ता रहा है जिससे और जिसके मूर्त प्रतीकों से संघर्ष किए बिना न तो उनकी प्रगति (advancing) होती है, न 'खुदाई' (deepening)। उनकी यानी शेष सभी "समानता” और “भाईचारे” की विचारधाराओं की। उस सांस्कृतिक क्रांति की जिसमें करोड़ों लोग मारे गये, बुद्धिजीवी विशेष रूप से टारगेट किये गये - वह सांस्कृतिक क्रांति भारत में नहीं आ पा रही तो इस नामुराद ब्राह्मणवाद के कारण।

सोचिए तो कहां उनके पास स्टालिन, किम-इल-सुंग, माओत्सेतुंग, होचीमिन्ह, पोल पोट जैसे लोग हैं और ये 'ब्राह्मनिकल व्यवस्था’ जिसमें कभी वशिष्ठ, कभी विश्वामित्र, कभी शंकराचार्य, कभी कणाद, कभी कपिल, कभी जैमिनी, कभी चाणक्य हुए !

Thursday, 29 January 2026

ब्राह्मण अत्याचार

एक सज्जन टीवी चैनल पर चीख रहे थे - हमने शताब्दियों के अत्याचार सहे हैं। मैंने देखा कि कोई उन्हें चुनौती भी नहीं दे रहा था। अच्छे ज्ञानवान लोग भी इस विषय पर बात ही नहीं कर रहे थे। वे कोई ऐतिहासिक प्रमाण भी नहीं दे रहे थे लेकिन अंग्रेजों के द्वारा बुने नैरेटिव के आत्मविश्वास से बोलते जा रहे थे। 

मैंने सोचा यह भी ईकोसिस्टम की ही जीत है कि शताब्दियों से चले आ रहे ब्राह्मण नरसंहारों के ऐतिहासिक प्रमाण तक इन्हें याद नहीं आते। इस दुष्टता की कहीं कोई स्पर्धा है क्या? उन्हें इतिहास के प्रमाण नहीं चाहिए, उन्हें पुरातात्विक साक्ष्य नहीं चाहिए, उन्हें वर्तमान के अकाट्य और प्रत्यक्ष प्रमाणों से भी कोई मतलब नहीं। उनका कथन उनके गहरे ब्राह्मण -द्वेष की कंदरा से निकलता है। 'दलित व्हाइस' नामक एक पत्रिका तो ब्राह्मणों को यहूदियों की संतान बताते हुए उन पर fanaticism और arrogance का आरोप वैसे ही लगाती है जैसे यहूदियों पर लगाए गये थे। यदि शूद्रों ने कथित रूप से शताब्दियों अत्याचार सहे तो 1000 साल का विदेशी शासन क्या ब्राह्मणों पर कहर बन कर नहीं टूटा ? क्या किसी को ख्वाजा मसूद बिन सा' द बिन सल्मान द्वारा जालंधर के युद्ध का 'दीवान-ए-सलमान पुस्तक में किया गया वर्णन याद है: "Not one Brahmin remained unkilled or uncaptured, their heads were levelled with the ground." क्या फीरोजशाह बहमनी (1398-99) ने 2000 ब्राह्मण स्त्रियों का अपहरण नहीं किया था (तवारीख फरिश्ता)?

इतिहासकार हसन की "हिस्ट्री ऑफ काश्मीर" सिकंदर बादशाह के द्वारा ब्राह्मणों के नरसंहार का विस्तृत विवरण देती है। Brahmins were forced to convert to Islam, pay heavy jizya if they refused, or face death, exile, or suicide. Temples were systematically destroyed, Hindu practices banned, and sacred threads (zunnar) from killed Hindus were collected and burned (described as weighing several ass-loads or mounds). Many Brahmins fled, converted under duress, or died; some poisoned themselves to avoid forced conversion. Only a few Brahmin families reportedly remained in Kashmir. 

क्या बाबर के गवर्नर लाहौर ने पुनियाल में दत्त ब्राह्मणों को चुन चुन कर खत्म नहीं किया था? 

जिस तरह से मध्यकाल में ब्राह्मणों और भिक्खुओं को टारगेट करके तलवार के घाट उतारा गया था, वह किसी के ध्यान में है। 1456 ई. में कन्हाडे प्रबन्ध अलाउद्दीन खिलजी के गुजरात आक्रमण के बारे में लिखता है : "आक्रमणकारी सेना ने गाँव-दर-गाँव जलाए, जमीन उजाड़ दी, लोगों का धन लूटा, ब्राह्मणों और बच्चों और औरतों को बंदी बनाया, उन्हें कोड़ों से पीटा और बंदियों को तुर्क सेवकों में बदल दिया।" 

स्वयं विजेताओं की ओर से लिखा गया वर्णन देखिए। 1011 ई. में थानेसर पर सुल्तान महमूद का आक्रमण उसके मंत्री उत्बी के तारीख-ए-यामिनी के शब्दों में यों वर्णित हुआ: "The blood of the infidels flowed so copiously [at Thanesar] that the stream was discolored, notwithstanding its purity and people were unable to drink it. The Sultan returned with plunder which is impossible to count. Praise be to Allah for the honor he bestows on Islam and Muslims." यही उत्बी दिसंबर 1018 में मथुरा के महावन में महमूद की विजय का वर्णन यों देता है :

"The infidels deserted the fort and tried to cross the foaming river.... but many of them were slain, taken or drowned.... Nearly fifty thousand men were killed." यही उत्बी मथुरा की विजय के बारे में लिखता है: "The Sultan gave orders that all the temples should be burnt with naptha and fire, and levelled with the ground." 

उत्बी कन्नौज के 10 हजार मंदिरों के विध्वंस के बारे में आनंदपूर्वक लिखता है और यह भी कि
“The Brahmins of munj which was attacked next, fought to the last man after throwing their wives and children into fire. 

श्रावा के बारे में उत्बी ने कहा: "The Muslims paid no to the booty till they satisfied themselves with slaughters of the infidels and worshippers of sun and fire. The friends of Allah searched the bodies of the slain for 3 days in order to obtain booty..."

महमूद के लडके मसूद ने 1037 में जब हांसी किले पर आक्रमण किया तो तारीख-उस-सबक्तिगिन का विवरण यों है: "The Brahmins and other high ranking men were slain, and their women and children were held captive." 

मुहम्मद गौरी के दौर में इब्न असीर के 'कामिल-उत्-तवारीख' में लिखा गया : "The slaughter of Hindus (at varanasi) was immense; none were spared except women and children, and the carnage of men went on until the earth was weary." 

इसी वक्त सारनाथ के भिक्षुओं का भी नरसंहार हुआ था। गोरी के सिपहसालार कुतुबुद्दीन ऐबक ने 1193 ई. में कोल (आधुनिक अलीगढ़) में ब्राह्मणों की वो हालत की थी कि उनके मुंडों की तीन मीनारें-तत्कालीन इतिहासकार हसन निज़ामी के शब्दों में, 'as high as heaven'- खड़ी कर दी गई थीं और उनके शव शिकारी गिद्धों का खाद्य बन गए थे। 1196 ई. में कुतुबुद्दीन ऐबक ने तत्कालीन गुजरात की राजधानी पाटन में राजा करन से लड़ते हुए शहर में जो आतंक मचाया उसके बारे में यही इतिहासकार लिखता है: "fifty thousand infidels were dispatched to hell by the sword." 

बल्बन और अलाउद्दीन खिलजी की तो कुख्यात हैं ही। फीरोजशाह तुगलक ने जाजनगर में अपने किए के बारे में कुछ लिखा है : "The swordsmen of Islam turned the island into abasin of blood by the massacre of the unbelievers." हिंदू औरतों के बारे में सिरात-ए- फिरूजशाह लिखता है : "Women with babies and pregnant ladies were haltered, manacled, fettered and enchained, and pressed as slaves into service in the house of every soldier." 

फरिश्ता कांगड़ा में फिरोजशाह तुगलक की वीरता यों बखानता है : "ज्वालामुखी की मूर्तियों का सुल्तान ने विध्वंस किया, उसके टुकड़ों को गायों के मांस में मिलाकर ब्राह्मणों के गले में थैले की तरह बांध दिया।" 

गुलबर्गा और बीदर के बहमनी सुल्तान हर साल एक लाख हिंदू आदमी-औरतों-बच्चों को मारना एक meritorious काम समझते थे। 1399 में तैमूर के अत्याचार इस तलवार-गाथा को शीर्ष पर पहुंचा देते हैं। तुज़्के-तिमूरी में लिखा है : "In a short span of time all the people in the fort were put to the sword, and in the course of one hour the heads of 10,000 infidels were cut off. The sword of Islam was washed in the blood of the infidels." 

दिल्ली से पहले लोनी में तैमूर की सेना ने कुछ मुस्लिमों को भी बंदी बना लिया था। तैमूर ने आदेश दिया कि "The Musalman prisoners should be separated and saved, but the infidels should all be dispatched to hell with the proselytizing sword." 

दिल्ली के आक्रमण में तलवार की इस तानाशाही को तुज़्के तिमूरी में स्वयं तैमूर ने यों लिखा : I proclaimed throughout the camp that every man who had infidel prisoners should put them to death.

पूरे मध्यकाल में जजिया ब्राह्मणों पर ही प्रथमतः और प्रमुखतः लगाया जाता था। और वसूलने का तरीका था मुँह खोलकर बैठने को विवश कर दिये गये ब्राह्मणों के मुँह में थूकना। 

पुर्तगाली साम्राज्यवादियों ने गोआ में ब्राह्मणों का जो नरसंहार किया वह याद है? सेंट - ऐसे हत्यारों को सेंट कहने पर इनकी भाषा आत्महत्या क्यों नहीं कर लेती- फ़्रांसिस ज़ेवियर 1542 में गोआ पहुँचने पर क्या सिद्धान्त प्रतिपादित किये थे : without Brahmins, Hindus would convert more easily. 1560–1812 तक ब्राह्मणों का पोर्तुगाली क्षेत्रों से उन्मूलन किया गया। लगभग तीन शताब्दी तक। ब्राह्मण कोई कार्यालय नहीं जा सकते थे। उन्हें अपने बच्चों को जेसुइट्स के पास छोड़ना पड़ता था ताकि उन्हें कन्वर्ट किया जा सके। उनके मंदिर ध्वस्त कर दिये गये थे।

क्या पेरियार के वक्त ब्राह्मणों पर हिंसक आक्रमण नहीं हुए जिन्होंने उन्हें सामूहिक पलायन (मॉस माइग्रेशन) के लिए वैसे ही बाध्य कर दिया जैसे काश्मीरी पंडितों को कर दिया गया। गोआ के पुर्तगालियों ने ब्राह्मणों का ही नरसंहार किया था। 

(क्रमशः)

Wednesday, 28 January 2026

इन एकलव्य का अंगूठा किस द्रोणाचार्य ने काटा था ?

#एकलव्य_महाभारत को संदर्भित करके ऊंची नीची जाति तथा शोषण का प्रोपगंडा फैलाने वालों से अपेक्षा है कि वे मात्र कुछ सौ वर्ष पहले हमारे शिल्पकारों के अंगूठे काटे जाने के सत्य इतिहास से परिचित होंगे। 

1772 के #एकलव्यों का अंगूठा किस द्रोणाचार्य ने काटा था ? 

आज एक उद्भट विद्वान की वाल पर गया, जो उच्च शिक्षा आयोग में निरन्तर कई वर्ष तक सदस्य रहे हैं। 
#शम्बूक_कथा पर अपने पद के अनुरूप ही अति गर्वीली पोस्ट लिखी थी। 

मैंने मात्र दो कमेंट लिखा और वे धराशायी हो गए। 
सत्य एक ही होता है। असत्य के अनेकों स्वरूप और कलेवर होते हैं। एक बार आप जोर से दहाड़िये तो। 
पेंट गीली होना निश्चित है। 

#मिथक के एक #एकलव्य के #अंगूठा काटने को लेकर भारत मे 3000 या 5000 वर्षो के अत्याचार का #रंडी_रोना मचाए वामियों और दलित चिंतको , मात्र 250 साल पहले सिल्क के कपड़े बनाने वाले भारतीयों ने #अपने_अंगूठे_खुद काट लिए। वे कहां गए क्या हुवा उनका? 10,000 साल की कथा तुम्हे पता है और 200 साल की कथा तुम्हे नही याद है।
तुम निम्न किस्म के केंचुए हो। स्वार्थ घृणा और कुंठा से भरे हुए जोंक हो तुम। 
क्योंकि तुमको देश का खून चूसने और झूंठ का ढिंढोरा पीटने में आनंद आने लगा है। 

ब्रिटिश दस्युवो ने तुमको नष्ट किया बर्बाद किया और तुमको एकलव्य और शम्बूक का झुनझुना थमा दिया:

 “18वी शताब्दी मे विश्व के अन्य देशों की तरह ही, भारत मे भी सड़क या नदी से होने वाले व्यापार पर ड्यूटी लगा करती थी। लेकिन ईस्ट इंडिया कंपनी ने एक सरकारी फरमान प्राप्त कर लिया था जिसके माध्यम से आयातित या निर्यात होने वाली वस्तुओं को टैक्स फ्री कर दिया था। अतः कंपनी द्वारा निर्यातित या आयातित किसी भी वस्तु पर टैक्स नहीं लगता था”।

(रिफ्रेन्स – रोमेश दुत्त इकनॉमिक हिसटरि ऑफ ब्रिटिश इंडिया, पेज -18)

"1757 मे मीर जफर को बंगाल का नवाब बनाया गया लेकिन मात्र 3 साल बाद 1760 मे उसके ऊपर असमर्थ बताकर मीर कासिम को नवाब बनाया , जिसने कंपनी को बर्धमान मिदनापुर और चित्तगोंग नामक तीन जिलों का रवेनुए तथा मीरजाफ़र पर द्वारा दक्षिण भारत मे हुये युद्ध मे कंपनी द्वारा खर्च किए गए, देय उधार धन 5 लाख रुपये कंपनी के खाते मे जमा करवाया"।
 ( रोमेश दुत्त – पेज -19 )

लेकिन उसके बाद सभ्य अंग्रेजों ने जो आम जनता के द्वारा निर्मित वस्तुओं की लूट मचाई, वो किसी भी सभ्य समाज द्वारा एक अकल्पनीय घटना है। उस दृश्य को आप बंगाल के नवाब द्वारा मई 1762 को ईस्ट इंडिया कंपनी को लिखे पत्र से समझा जा सकता है:
 “ हर जिले, हर परगना , और हर फ़ैक्ट्री मे वे ( कंपनी के गुमाश्ते ) नमक, सुपाड़ी, घी , चावल, धान का पुवाल ( सूखा डंठल, जरा सोचिए क्या क्या खरीद कर ये दरिद्र समुद्री डकैत खरीद कर यूरोप ले जाते थे ) बांस ,मछली ,gunnies अदरक चीनी तंबाकू अफीम और अन्य ढेर सारी वस्तुयेँ,जिनको लिख पान संभव नहीं है , को खरीदते बेंचेते रहते हैं । वे रैयत और व्यापारियों की वस्तुए ज़ोर जबर्दस्ती हिंसा और दमन करके ,उनके मूल्य के एक चौथाई मूल्य पर ले लेते हैं , पाँच रुपये की वस्तु एक रुपए मे लेकर भी वे रैयत पर अहसान करते हैं। 

 प्रत्येक जिले के ओफिसर अपने कर्तव्यो का पालन नहीं करते और उनके दमानात्मक रवैये और मेरा टैक्स न चुकाने के कारण मुझे प्रत्येक वर्ष 25 लाख रुपयों का नुकसान हो रहा है। मैं उनके द्वारा किए गए किसी समझौते का न उल्लंघन करता हूँ न भविष्य मे करूंगा , तो फिर क्यूँ अंग्रेज़ो के उच्च अधिकारी मेरा अपमान कर रहे हैं, और मेरा निरंतर नुकसान कर रहे हैं ”।
( रोमेश दुत्त पेज – 23 ) 

सभ्य बनाने आए इयसाइयों के नैतिक ऊंचाई को आप इस एक उद्धरण से ही माप सकते हैं।

यही बात ढाका का कलेक्टर महोम्मद अली ने कलकत्ता के अंग्रेज़ गवर्नर 26 मई 1762 मे लिखा “पहली बात तो ये है कि व्यापारी फ़ैक्टरी मे रुचि दिखा रहे हैं और अपने नावों पर अंग्रेजों का झण्डा लगाकर अपने को अंग्रेजो का समान होने का दिखावा करते हैं , जिससे कि उनको duty न देना पड़े। दूसरी बात ढाका और लकीपुर की फ़क्टरियाँ व्यापारियों को तंबाकू सूती कपड़े , लोहा और अनेक विविध वस्तुओं को बाज़ार से ज्यादा दामों मे खरीदने का प्रलोभन देते हैं, लेकिन बाद मे जबर्दस्ती वो पैसा उनसे छीन लेते हैं; जो व्यापारियों को पैसा एडवांस मे दिया था ।

लेकिन फिर उनके ऊपर एग्रीमंट तोड़ने का बहाना बनाकर उनके ऊपर फ़ाइन लगाते हैं । तीसरी बात लकीपुर फैक्ट्री के गुमाश्ते तहसीलदार से ताल्लूकदारों से उनके ताल्लूक ( कृषि योग्य जमीन ) को निजी प्रयोग के लिए जबरन कब्जा कर लेते हैं , और उसका भाड़ा भी नहीं देते। कुछ लोगों के कहने पर ,कोई शिकायत होने पर वे यूरोपेयन लोगों को एक सरकारी आदेश का परवाना लेकर गावों मे जाकर उपद्रव करते हैं। वे टोल स्टेशन बनाते हैं और जो भी किसी गरीब के घर समान मिलता है उसको बैंचकर पैसा बनाते हैं। इन उपद्रवों के कारण पूरा देश नष्ट हो गया है और रैयत न अपने घरों मे रह सकते हैं और न ही मालगुजारी चुका सकते हैं। मिस्टर चवालीर ने कई स्तर पर झूँटे बाजार और झूंठे फक्ट्रिया बनाया हैं, और अपनी तरफ से झूंठे सिपाही बनाए हैं जो जिसको चाहे उसको पकड़कर उनसे जबरन अर्थदण्ड वसूलते हैं । उनके इस जबर्दस्ती के अत्याचारों के कारण कई हाट बाजार और परगना नष्ट हो गए हैं। ” 
( रोमेश दुत्त पेज 24- 25 )

“इस तरह बंगाल के प्रत्येक महत्वपूर्ण जिले के व्यापार को कंपनी के नौकरों और अजेंटों ने नष्ट किया और इन वस्तुओं के निरमातों को निर्दयता के साथ अपना गुलाम बनाया । उसका वर्णन एक अंग्रेज़ व्यापारी विलियम बोल्ट्स ने आंखो देखी हाल खुद लिखा है :
“ अब इस बात को सत्यता के साथ बताया जा सकता है कि वर्तमान मे यह व्यापार जिस तरह इस देश मे हो रहा है , और जिस तरह कंपनी अपना इनवेस्टमेंट यूरोप मे कर रही है,वो एक दमनकारी प्रक्रिया है; जिसका अभिशाप इस देश का हर बुनकर और निर्माता भुगतने को मजबूर है, प्रत्येक उत्पाद को एकाधिकार मे बदला जा रहा है ; जिसमे अंग्रेज़ अपने बनियों और काले गुमाश्तों के मदद से, मनमाने तारीके से यह तय करते हैं कि कौन निर्माता किस वस्तु का कितनी मात्रा मे, और किस दर पर निर्मित करेगा ...गुमाश्ते औरंग या निर्माताओं के कस्बे मे पहुँचने के बाद वो एक दरबार लगाता है जिसको वह अपनी कचहरी कहता है। 

जिसमे वो अपने चपरासी और हरकारों की मदद से वो दलाल और पयकार और बुनकरों को बुलाता है, और अपने मालिक द्वारा दिये गए धन मे से कुछ पैसा उनको एडवांस मे देता है और उनसे एक एग्रीमंट पर दस्तखत करवाता है जिसके तहत एक विशेष प्रॉडक्ट , एक विशेष मात्रा मे, एक विशेष समय के अंदर डेलीवर करना है। उस मजबूर बुनकर की सहमति आवश्यक नहीं समझी जाती है। और ये गुमाश्ते, जो कंपनी के वेतनभोगी थे , प्रायः इस तरह के एग्रीमंट उनसे अपने मन मुताबिक करवाते रहते थे; और यदि बुनकरों ने ये एडवांस रकम स्वीकार करने से इंकार किया तो उनको बांधकर शारीरिक यातना दी जाती है.... कंपनी के गुमाश्तों के रजिस्टर मे बहुत से बुनकरों के नाम दर्ज रहते थे, जो किसी दूसरे के लिए काम नहीं कर सकते थे, और वे प्रायः एक गुलाम की तरह एक गुमाश्ते से दूसरे गुमाश्ते के हाथों तब्दील किए जाते रहते हैं, जिनके ऊपर दुष्टता और अत्याचार हर नए गुमाश्ते के हाँथो बढ़ता ही जाता है ... इस विभाग मे जो अत्याचार होता है वो अकल्पनीय है ; लेकिन इसका अंत इन बेचारे बुनकरों को धोखा देने मे ही होता है; क्योंकि गुमाश्तों और जांचकारो ( कपड़े की क्वालिटी जाँचने वाला ) द्वारा जो दाम उनके प्रोडक्टस का तय किया जाता था वो कम से कम बाजार के दाम से 15 से 40 % कम होता है ...।

बंगाल के बुनकरों के साथ, कंपनी के अजेंटों द्वारा जबर्दस्ती किए गए इन अग्रीमेंट्स को पूरा न करने की स्थिति मे, उनके खिलाफ मुचलका जारी किया जाता था , उसके तहत उनके सारे सामान (कच्चा और पक्का माल ) उस एग्रीमंट की भरपाई के लिए कब्जा कर लिया जाता है और उसी स्थान पर उनको बेंच दिया जाता है ; कच्चे सिल्क को कपड़ों मे बुनने वाले लोगों के, जिनको Nagoads कहते हैं, उनके साथ भी इसी तरह का अन्याय होता है, और ऐसी घटनाए आम बात हैं जिसमे उन्होने जबर्दस्ती #सिल्क के #कपड़े #बनाने की #मजबूरी से बचने के लिए स्वयं ही अपने #अंगूठे #काट लिए ।

( and the winders of raw silk , called Nagoads, have been known of their cutting off their thumbs to prevent their being forced to wind silk ) 
(Ref: Consideration on India affairs (London 1772), p 191 to 194 : from Romesh Dutt ; Economic History of British India , page 25-27 )

इस सच्चाई तक तुम्हारी पहुंच नही है धूर्त और मक्कारों?
इसीलिये पुस्तक का नाम लिखा है। गूगल आर्काइव से डाउनलोड करो और पढो।

बाबा साहेब जैसे पढ़े लिखे लोग ही नहीं, तिलक और दिनकर जैसे लोग भी उस अफवाहबाजी का शिकार हुए जिसको इंडोलॉजी नामक #फेक_साइंस के नाम से उनको विश्वविद्यालय में पढ़ाया गया। 

कोई लुटेरा तुमको निम्न प्रमाणित करके ही तो अपने को श्रेष्ठ प्रमाणित कर सकेगा? 
उन्होंने तुम्हें उल्लू बनाया शिक्षा के माध्यम से।
और तुम उल्लू बनने को तैयार बैठे थे।
बने।

©त्रिभुवन सिंह

चंद्र शेखर रावण जैसे जाहिलों को पढ़ाओ।

Saturday, 24 January 2026

पूर्वजों (पितरों) की फोटो

हिंदू शास्त्रों और विशेष रूप से **वास्तु शास्त्र** के अनुसार, पूर्वजों (पितरों) की फोटो घर में दीवार पर लगाना **शुभ** माना जाता है, लेकिन यह **कुछ नियमों** और **सही दिशा** के साथ ही करना चाहिए। बिना नियमों के या गलत जगह पर लगाने से अशुभ प्रभाव पड़ सकता है, जैसे परिवार में कलह, आर्थिक परेशानी या पितृ दोष।

### मुख्य नियम (वास्तु शास्त्र के अनुसार):
- **शुभ दिशा** — सबसे अधिक सहमत राय यही है कि पूर्वजों की फोटो **दक्षिण** या **दक्षिण-पश्चिम** (South-West) दिशा की दीवार पर लगानी चाहिए।  
  कुछ स्रोत **पश्चिम** दिशा को भी ठीक बताते हैं।  
  इससे पितरों का आशीर्वाद बना रहता है और घर में सकारात्मक ऊर्जा आती है।

- **कुछ जगहों पर बिल्कुल न लगाएं** (ये अशुभ माने जाते हैं):
  - उत्तर या उत्तर-पूर्व दिशा में → इससे आर्थिक हानि, तनाव, कलह आ सकती है।
  - बेडरूम, किचन, बाथरूम या बच्चों के कमरे में।
  - पूजा घर/मंदिर में (भगवान की तस्वीरों के साथ कभी नहीं)।
  - ऐसी जगह जहां हर कोई बार-बार देखे या मेहमानों की नजर पड़ती हो।

- **अन्य महत्वपूर्ण नियम**:
  - फोटो आंखों की सीध में (न बहुत ऊंची, न बहुत नीची) लगाएं।
  - एक से ज्यादा या बहुत सारी फोटो न लगाएं — आमतौर पर 1-2 ही पर्याप्त।
  - जीवित लोगों की फोटो के साथ कभी न लगाएं (कुछ मान्यताओं में इससे आयु पर प्रभाव पड़ता है)।
  - कुछ परंपरागत राय में फोटो को **दीवार पर लटकाने** की बजाय स्टैंड या शेल्फ पर रखना बेहतर माना जाता है, लेकिन अधिकांश आधुनिक वास्तु विशेषज्ञ दीवार पर सही दिशा में लगाने को शुभ मानते हैं।

संक्षेप में:  
**हां, पूर्वजों की फोटो घर की दीवार पर लगाना शुभ है**, बशर्ते **दक्षिण या दक्षिण-पश्चिम दिशा** में सही तरीके से लगाई जाए। गलत दिशा या जगह में लगाने से अशुभ हो सकता है।

Wednesday, 21 January 2026

शीघ्रपतन आयुर्वेद इलाज


शीघ्रपतन
अचूक रामबाण इलाज
मैथुन के समय वीर्य के शीघ्र स्खलित हो जाने को 'शीघ्रपतन' कहा जाता है। यह भी एक प्रकार की 'नपुंसकता' ही है।

कारण-'प्रमेह' के अनुसार।

लक्षण-वीर्य का पतलापन, सहवास के समय स्तंभन शक्ति का अभाव अथवा

शीघ्र स्खलित हो जाना।

चिकित्सा-यह भी 'प्रमेह' का ही एक रूप है। अतः इसमें प्रमेह नाशक औषधीय योग लाभ करते हैं। निम्नलिखित योग वीर्य को पुष्ट बनाने तथा स्तंभन शक्ति को बढ़ाने वाले हैं-

1. सूखी शकरकन्द को कूट-छान कर चूर्ण तैयार करें, फिर उससे घी तथा चीनी के साथ हलवा तैयार करें अथवा आग में भुनी हुई शकरकन्द को घी में भूनकर चीनी की चाशनी में डालकर हलवा तैयार करें। इस हलवे का सेवन करने से वीर्य गाढ़ा तथा पुष्ट होता है एवं स्तंभन शक्ति भी बढ़ती है।

2. कौंच के बीजों की गिरी का चूर्ण तथा खसखस के बीजों का चूर्ण-दोनों को 4-4 या 6-6 माशे (बलाबल के अनुसार) लेकर चूर्ण तैयार करें। इस चूर्ण को फाँक कर ऊपर से गाय का दूध पीने से वीर्य पुष्ट होता है तथा स्तंभन शक्ति में वृद्धि होती है। इसे 4 महीने तक सेवन करना चाहिए।

3. गोखुरू, तालमखाना, शतावर, कौंच के बीजों की गिरी, बड़ी खिरेंटी और गंगेरन-इन सब को 10-10 तोला लेकर कूट-पीस छानकर चूर्ण बना लें। नित्य रात के समय 6 माशा से 1 तोला तक चूर्ण फाँक कर ऊपर से गरम दूध पीने से बल वीर्य की अत्यधिक वृद्धि होती है तथा स्तंभन शक्ति बढ़ती है। इसे 60 दिनों तक सेवन करना चाहिए।

4. तरबूज के बीजों की मींगी 6 माशा तथा मिश्री 6 माशा-दोनों को मिलाकर दो-तीन महीने तक सेवन करने से बल-वीर्य खूब पुष्ट होते हैं तथा स्तंभन शक्ति बढ़ती है

5. इमली के साफ किए हुए अच्छे बीज 1 सेर लेकर उन्हें चार दिनों तक पानी भीगने दें। फिर पानी से निकाल कर उनके ऊपरी छिलके दूर कर दें तथा बीजों क सुखाकर कूट-पीस छान लें। फिर उसमें समभाग मिश्री मिलाकर रख लें। इच क 2 माशे की मात्रा में नित्य 40 दिनों तक सेवन करने तथा ऊपर से गाय का दूध पीने वीर्य बहुत गाढ़ा हो जाता है तथा स्तंभन शक्ति में वृद्धि होती है।

2 6. ढाक के वृक्ष की छाल, ढाक का गोंद, गूलर के वृक्ष की छाल, गूलर का गोंद सेमल का सूखा मूसला, सेमल का गोंद, मौलश्री की छाल, बबूल का गोंद तथा भुने हु चने-इन सबको 3-3 तोला लेकर कूट-पीस छाल लें। इस चूर्ण को 4 से 6 माशे तक क मात्रा में नित्य प्रातः-सायं खाकर ऊपर से गाय का दूध पीने से धातु पुष्टीत स्तंभन शक्ति में वृद्धि होती है। इसे 1 मास तक सेवन करना चाहिए