शंकर
शंकर ३ रूपों का समन्वय है-
(१) शं ब्रह्म (शान्त, लोकों की स्थिति) +
(२) कं ब्रह्म (कर्ता ब्रह्म, प्रजापति) +
(३) रं ब्रह्म (ऊर्जा या गति)
यह खं = आकाश रूपी ब्रह्म में स्थित है, जो ब्रह्म की प्रथम सृष्टि है।
१. शं ब्रह्म-शं - शान्ति, कल्याण।
विश्व के ६ भागों द्वारा षड्विध ऐश्वर्य-
ऐश्वर्यस्य समग्रस्य धर्मस्य यशसश्श्रियः।
ज्ञानवैराग्ययोश्चैव षण्णां भग इतीरणा॥ (विष्णु पुराण, ६/५/७४)
शं नो मित्रः शं वरुणः, शं नो भवत्यर्यमा।
शं न इन्द्रो बृहस्पतिः, शं नो विष्णुरुरुक्रमः॥
(ऋक्, १/९०/९, अथर्व वेद, १९/९/६, ७, वाज. यजु, ३६/९, तैत्तिरीय आरण्यक, ७/१/१,)
नः = हम लोगों का। नः + इन्द्रः = न इन्द्रः।
(१) आकाश के क्षेत्र-आकाश के ३ धाम हैं-परम धाम-स्वयम्भू मण्डल = पूर्ण विश्व,
मध्यम धाम = परमेष्ठी मण्डल = ब्रह्माण्ड या आकाशगंगा,
अवम धाम - सौर मण्डल = सूर्य का प्रकाश क्षेत्र।
या ते धामानि परमाणि यावमा या मध्यमा विश्वकर्मन्नुतेमा । (ऋक्, १०/८१/४)
हर धाम में जो दृश्य पिण्ड है, वह भूमि, उसका प्रभाव क्षेत्र (साम) आकाश या द्यु, तथा बीच का क्षेत्र (अन्तरिक्ष या व्रत) है। पिण्ड निर्माण का आदि रूप आदित्य है, जो अभी अन्तरिक्ष में दीखता है। तीन धामों के आदित्य हैं-अर्यमा, वरुण, मित्र। भूमि = माता (स्त्रीलिंग), द्यु = पिता (पुल्लिंग), अन्तरिक्ष = नपुंसक लिंग।
तिस्रो भूमीर्धारयन् त्रीरुत द्यून्त्रीणि व्रता विदथे अन्तरेषाम् ।
ऋतेनादित्या महि वो महित्वं तदर्यमन् वरुण मित्र चारु ॥ (ऋक्, २/२७/८)
तिस्रो मातॄस्त्रीन्पितॄन्बिभ्रदेक ऊर्ध्वतस्थौ नेमवग्लापयन्ति ।
मन्त्रयन्ते दिवो अमुष्य पृष्ठे विश्वमिदं वाचमविश्वमिन्वाम् ॥ (ऋक्, १/१६४/१०)
(२) सौर मण्डल-३ क्षेत्र सौर मण्डल के भीतर हैं-
इन्द्र सृष्टि निर्माण के लिए ऊर्जा है-
(देवस्य त्वा सवितुः प्रसवे) इन्द्रियस्य इन्द्रियेण। (तैत्तिरीय ब्राह्मण, २/६/५/३)
इन्द्रस्य इन्द्रियेण अभिषिंचामि (शतपथ ब्राह्मण, ५/४/२/२, ऐतरेय ब्राह्मण, ८/७)
इन्धन रूप में भी इन्द्र कहा गया है-इन्धो वै नामैष
सौर मण्डल ३३ धाम तक है, जिसमें इन्द्र का विस्तार है। इसे धामच्छद (धाम को ढंकने वाला, छद = छत) कहा है। ३३ अक्षर त्रिष्टुप् छन्द (११ x ४ = ४४ अक्षर) के ३ पाद हैं। मेरुदण्ड में ३३ जोड़ होते हैं, अतः सौर मण्डल मंत इन्द्र के वज्र को दधीचि की हड्डी से बना कहते हैं।
इन्द्रो दधीचो अस्थभिर्वृत्राण्यप्रतिष्कुतः। जघान नवतीर्नव॥। (ऋक्, १/८४/१३)
वज्रो वै त्रिष्टुप् (शतपथ ब्राह्मण, ७/४/२/२४, ऐतरेय ब्राह्मण, २/१६, २/२)
संवत्सरो (१ संवत्सर में जितनी दूर सूर्य का प्रकाश जाता है-सौर क्षेत्र) वज्रः (शतपथ ब्राह्मण, ३/६/४/१९)
त्रैष्टुभो वा एष य एष (सूर्यः) तपति (कौषीतकि ब्राह्मण, २५/४)
अन्तो वै त्रयस्त्रिंशः परमो वै त्रयस्त्रिंश स्तोमानाम् (ताण्ड्य महाब्राह्मण, ३/३/२)
तं (त्रयस्त्रिंशं स्तोमं) उ नाक इत्याहुः। (ताण्ड्य महाब्राह्मण, १०/१/१८)
बृहस्पति सौर मण्डल के अन्तरिक्ष का मुख्य ग्रह है। सोम (आकाश का विरल पदार्थ) के ३ क्षेत्रों में यह मध्य में है।
(१) चान्द्र मण्डल का देवसोम या राजसोम, (२) जहां तक सौर वायु जाती है वह पवमान सोम है। इसका केन्द्र बृहस्पति होने से यह बृहस्पति सोम है। (३) ब्रह्माण्ड सीमा तक ब्रह्मणस्पति सोम है।
एतद्वै देवसोमं यत् चन्द्रमाः (ऐतरेय ब्राह्मण, ७/११)
सोमो राजा चन्द्रमाः (शतपथ ब्राह्मण, १०/४/२/१)
अयं वायुः पवमानः (शतपथ ब्राह्मण, २/५/१/५)
सोमो वै पवमानः। (शतपथ ब्राह्मण, २/२/३/२२)
बृहस्पतिर्ब्रह्म ब्रह्मपतिः। (तैत्तिरीय ब्राह्मण, २/५/७/४)
वाग् वै बृहती तस्या एष पतिस्तस्मादु बृहस्पतिः।(शतपथ ब्राह्मण, १४/४/१/२२)
(यजु ३८/८) अयं वै बृहस्पतिर्योऽयं (वायुः) पवते। (शतपथ ब्राह्मण, १४/२/२/१०)
ब्रह्म वै ब्रह्मणस्पतिः (कौषीतकि ब्राह्मण, ८/५, ९/५, ताण्ड्य महाब्राह्मण, १६/५/८)
व्यवहार में बृहस्पति ही दीखता है, अतः उसे भी ब्रह्मणस्पति कहा गया है।
(३) उरुक्रम विष्णु-विष्णु के कई विक्रम वेदों में निर्दिष्ट हैं।
विष्णु का प्रत्यक्ष रूप सूर्य है, जिससे पृथ्वी पर सृष्टि चल रही है। इसके ३ विक्रम सौर मण्डल के ३ क्षेत्र हैं, जिनको अग्नि, वायु, रवि (११, २२, ३३ अहर्गण तक) कहा गया है।
इदं विष्णुर्विचक्रमे त्रेधा निदधे पदम्। समूळ्हमस्य पांसुरे॥ (ऋक्, १/२२/१७)
तद् विष्णोः परमं पदं सदा पश्यन्ति सूरयः। दिवीव चक्षुराततम्॥ (ऋक्, १/२२/२०)
सूर्य सिद्धान्त (१२/८१, ९०) में ब्रह्माण्ड को सूर्य का परम पद कहा है जहां तक सूर्य विन्दुमात्र दीखता है, तथा ब्रह्माण्ड की सटीक माप दी गयी है।
अग्नि-वायु-रविभ्यस्तु त्रयं ब्रह्म सनातनम्।
दुदोह यज्ञ सिद्ध्यर्थं ऋग्-यजुः साम लक्षणम्॥ (मनु स्मृति, १/२३)
परम पद को बड़े आकार के कारण उरुक्रम भी कहा गया है।
उरुक्रमस्य स हि बन्धुरित्था विष्णोः पदे परमे मध्व उत्सः॥ (ऋक्, १/१५४/५)
पृथ्वी पर मनुष्य की सबसे बड़ी रचना नगर है, जिसे उरु या उर कहते हैं, जैसे बंगलूरु, मैसूरु, चित्तूर, तञ्जाउर, आदि। शिल्पशास्त्र के अनुसार विष्णु (मनुष्य रूप, सम्भवतः वामन) ने नगरों का प्रारूप तैयार किया था, इस अर्थ में उनको उरुक्रम कहा गया है। बाद में वरुण ने भी उरु प्रारूप का नगर बनाया जो इराक का सबसे प्राचीन नगर है।
उरुं हि राजा वरुण श्चकार (ऋग् वेद १/२४/८)
यज्ञ या सृष्टि अर्थ में विष्णु को विक्रान्त = विभाजन, उत्क्रान्त (वाहर निकलना), न्यक्रामत् (परिणत होना) आदि कहा है। लोकों का निर्माण और उनकी स्थिति भी विष्णु का विक्रम है।
यज्ञो विष्णुः स देवेभ्य इमां विक्रान्तिं विचक्रमे यैषामियं विक्रान्तिरिदमेव प्रथमेन पदेन पस्पाराथेदमन्तरिक्षं द्वितीयमेन दिवमुत्तमेन। (शतपथ ब्राह्मण, १/९/३/९)
इमे वै लोका विष्णोर्विक्रमणं विक्रान्तं विष्णोः क्रान्तम्। (शतपथ ब्राह्मण, ५/४/२/६)
स उदक्रामत् सा गार्हपत्ये न्यक्रामत्॥२॥
यज्ञ चक्र रूप में दिन-रात भी विष्णु-क्रम है।
तद्वाऽहोरात्रेऽएव विष्णुक्रमा भवन्ति। (शतपथ ब्राह्मण, ६/७/४/१०)
विष्णु का विचक्रम गो रूप यज्ञ है। प्रति व्यक्ति सबसे अधिक गो वाला देश भी दक्षिण अमेरिका का उरुगुए है।
विचक्रमाणस्त्रेधोरुगायः (ऋक् १/१५४/१, अथर्व ७/२६/१, वाज.सं. ५/१८, तैत्तिरीय सं. १/२/१३/३, काण्व सं. २/१०, मैत्रायणी सं. १/२९/१९/९)
२. कं ब्रह्म- कः = प्रजापति, स्रष्टा रूप ब्रह्म।
कस्मै देवाय हविषा विधेम (हिरण्यगर्भ सूक्त, १/१२१/१, ९, अथर्व, ४/२/१, ७, ८, वाज. यजु, १२/१०२, १३/४, २३/१, ३, २५/१०, ११, १२, १३, २७/२५, २६, आदि)
सृष्टि या निर्माण में कुछ सामग्री लगती है, अतः कर्ता रूप ’क’ ब्रह्म ले लिए हवि देनी पड़ती है।
वेद संहिताओं में कई स्थान पर कः, कं आया है, पर वह प्रजापति का वाचक है, या प्रश्नवाचक सर्वनाम, इसमें सन्देह है। ब्राह्मण ग्रन्थों में स्पष्ट परिभाषा है।
प्रजापतिर्वै कः (ऐतरेय ब्राह्मण, २/३८, ६/२१, कौषीतकि ब्राह्मण, ५/४, २४/४, ५, ९, ताण्ड्य महाब्राह्मण, ७/८/३, शतपथ ब्राह्मण, ६/४/३/४, ७/३/१/२०, तैत्तिरीय ब्राह्मण, २/२/५/५, जैमिनीय उपनिषद्, ३/२/१०, गोपथ ब्राह्मण, उत्तर, १/२२, ६/३)
कं वै प्रजापतिः। (शतपथ ब्राह्मण, २/५/२/१३)
सृष्टि निर्माण के लिए ऊर्जा या प्राण भी ’क’ है।
प्राणो वाव कः (जैमिनीय उपनिषद्, ४/२३/४)
कं ब्रह्म द्वारा निर्माण कं है। उपभोग्य वस्तु अन्न या उससे प्राप्त सुख कं है।
अन्नं वै कम् (ऐतरेय ब्राह्मण, ६/२१, गोपथ ब्राह्मण, उत्तर, ६/३)
सुखं वै कम् (गोपथ ब्राह्मण, उत्तर, ६/३)
अथो सुखस्य वा एतत् नामधेयं कं इति (गोपथ ब्राह्मण, उत्तर, १/२२, कौषीतकि ब्राह्मण, ५/४)
कं ह वा अस्मैभवति य एवमेतत् अर्कस्य अर्कत्वं वेद (बृहदारण्यक उपनिषद्, १/२/१)
देवी के लिए स्त्रीलिंग में ’कां’ प्रयुक्त है-
कां सोस्मितां हिरण्य प्राकारां (श्री सूक्त, ४, ऋक् खिल भाग, अष्टक ४/४/३२ के बाद का परिशिष्ट)
एक व्यक्ति ने इसका अर्थ किया है कि इस मन्त्र द्वारा कांसा से स्वर्ण (हिरण्य) बनाया जा सकता है। पर कांस्य या स्वर्ण अर्थ में यहां प्रयोग नहीं है।
काम्-(१) वाणी तथा मन से जिसका ज्ञान नहीं होता। (२) अव्यक्त, अमूर्त्त ब्रह्म। (३) सुख स्वरूपा। (४) चिन्मयी लक्ष्मी, जो अन्तःकरण में आवाज करती है (कै शब्दे, धातु पाठ, १/६५३)। (५) वाणी, वाक्य रूपा (वाग्देवी)। (६) सभी वेद जिस के बारे में जिज्ञासा करते हैं-का = कौन है? (७) क = ब्रह्म के रूप वाली। कस्मै देवाय हविषा विधेम (ऋक्, १०/१२१/१)-कर्त्ता रूप देव के लिए हवि दें। जड़ चेतन गुण दोषमय विश्व कीन्ह करतार (क)-रामचरितमानस (१/६/०)। (८) कर्त्ता रूपिणी।
(३) खं ब्रह्म-
ख का अर्थ आकाश है। गणित ज्योतिष में शून्य अर्थ में ख, व्योम (जहां ॐ भी नही है), आकाश आदि कूट शब्दों का प्रयोग है। खग = ख में गमन करने वाला पक्षी।
खं वेपसा तुविजात स्तवानः (ऋक्, ४/११/२)
अंङ्घि खं वर्तया पणिम् (ऋक्, १०/१५६/३)
ॐ खं ब्रह्म (ईशावास्योपनिषद्, १७, वाज. यजु, ४०/१७)
खं (आकाश) मनो बुद्धिरेव च (गीता, ७/४)
ॐ खं ब्रह्म, खं पुराणं, वायु रं, खं-इति (बृहदारण्यक उपनिषद्, ५/१/१)
अव्यक्त ब्रह्म की प्रथम सृषी आकाश भी उसी का स्वरूप है। वास स्थान रूप में इसे वासुदेव भी कहा है।
(४) रं ब्रह्म-प्राण या गति रूप ब्रह्म ’रं’ है।
रं इति, प्राणो वै रं, प्राणे हि इमानि भूतानि रमन्ते (बृहदारण्यक उपनिषद्, ५/१२/१, शतपथ ब्राह्मण, १४/८/१३/३)
र इति-रञ्जयति इमानि भूतानि (मैत्रायणी उपनिषद्, ६/७)
रकारो अण्डं विराड् भवति (तारसार उपनिषद्, १/४)
रकारं अग्नि बीजं (ध्यानबिन्दु उपनिषद्, ९५)
स चित्रेण चिकिते रंसु भासा (ऋक्, २/४/५)