Saturday, 11 July 2026

राम और रामा

#Yoga_and_Rama ? 

जो लोग योग को योगा लिखते हैं, और उसकी ट्रेनिंग देते हैं।
वही लोग राम को रामा लिखते हैं।

लेकिन उनको इनका अर्थ नहीं पता।

उद्धरण स्वरूप : कठोपनिषद में रामा शब्द का प्रयोग हुवा है - सुंदर स्त्री के लिए - अप्सरा।

क्यों न इनको जूता मारकर भगाया जाय ?

भगवान् के नाम

भगवान् के नाम
१. सहस्रनाम-
वेद तथा पुराणों में ब्रह्म या भगवान् के अनेक नाम हैं। सहस्र नामों का संग्रह महाभारत के अनुशासन पर्व, अध्याय १४९ में है, जिसे विष्णु सहस्रनाम कहते हैं। ये ऋषियों द्वारा गुणों के अनुसार कहे गये हैं। इसका अर्थ मध्व सम्प्रदाय के राघवेन्द्र स्वामी ने किया है कि ऋग्वेद के १००० सूक्तों के प्रतीक १००० नाम हैं। 
यानि नामानि गौणानि विख्यातानि महात्मनः।
ऋषिभिः परिगीतानि तानि वक्ष्यामि भूतये॥१३॥
गीता में भी कहा है कि वेद में भगवान् का ही वर्णन है-वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यं, वेदान्तकृद् वेदविदेव चाहम् (गीता, १५/१५)
बलदेव विद्याभूषण (ओड़िशा में बालेश्वर जिला में रेमुना ग्राम में जन्म-रमना शक्तिपीठ-देवी भागवत पुराण, ७/३०/६७) ने अर्थ किया है कि इससे ४ प्रकार के पुरुषार्थ (भूति) की सिद्धि होती है। विष्णु सहस्रनाम के अन्त में स्पष्ट लिखा है कि इसके पाठ से कोई अशुभ नहीं होता, ब्राह्मण को वेद का ज्ञान होता है, क्षत्रिय विजयी होता है, वैश्य धन से समृद्ध होता है, शूद्र सुखी होता है, वाञ्छित फल, यश, समाज में मुख्य स्थान, परम श्रेय मिलता है (सहस्रनाम, १२२-१३२)।
विष्णु सहस्रनाम मन्त्र मे वेदव्यास ऋषि हैं, अनुष्टुप् छन्द, कृष्ण देवता हैं, अमृतांशूद्भव बीज, कृष्ण शक्ति हैं, त्रिसामा (विष्णु सहस्रनाम का एक नाम) हृदय है, जिसकी शान्ति इसका विनियोग (उद्देश्य) है।
ऋषिर्नाम्नां सहस्रस्य वेदव्यासो महामुनिः।
छन्दोऽनुष्टुप् तथा देवो भगवान् देवकीसुतः॥
अमृतांशूद्भवो बीजं शक्तिर्देवकीनन्दनः।
त्रिसामा हृदयं तस्य शान्त्यर्थे विनियुज्यते॥
इसकी भूमिका के अनुसार वेद के ३ अर्थ, महाभारत के १० अर्थ, तथा विष्णु सहस्रनाम के १०० अर्थ हैं।
त्रयार्थाः सर्व वेदेषु दशार्थाः सर्व भारते। विष्णोः सहस्रनामापि निरन्तर शतार्थकम्॥
सहस्रनाम या वेद में कई नाम एक से अधिक बार हैं, उनके भिन्न अर्थ हैं। प्रति सन्दर्भ कुछ मुख्य अर्थों की चर्चा की जाती है।
२. विविध ब्रह्म-इन्द्रं मित्रं वरुणमग्निरथो दिव्यः स सुपर्णो गरुत्मान्।
एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्त्यग्निं यमं मातरिश्वानमाहुः॥ (ऋक्, १/१६४/४६, अथर्व, ९/१०/२८)
यहां अग्नि तथा गरुड के २-२ उल्लेख हैं।
(१) अग्नि १-अग्रि या अग्रणी- आगे चलने वाला, नेता-
स यत् अस्य सर्वस्य अग्रं असृज्यत, तस्मात् अग्रिः, अग्रिः ह वै तं अग्निः इति आचक्षते परोऽक्षम्। (शतपथ ब्राह्मण, ६/१/१/११, २/२/४२)
अग्ने नय सुपथा राये अस्मान् (ईशावास्य उपनिषद्, १८, ऋक्, १/१८९/१, वाज. यजु, ५/३६, ७/४३, ४०/१६ आदि)  
= हे अग्रणी या नेता, हमें अच्छे मार्ग से ले चलो।
अग्निं ईळे पुरोहितम् (ऋक्, १/१/१) = सामने या आगे हित के लिए स्थित अग्नि की उपासना करते हैं। (पुरोहित = सामने रह कर हित करे, वकील, प्रतिनिधि आदि)।
लोकभाषा में इसे अग्रसेन कहते थे। भारत के शासक या नेता को अग्नि कहते थे। वह विश्व का भरण पोषण करता था, अतः इस अग्नि को भरत कहते थे, जिससे इस देश का नाम भारत हुआ। 
अग्नेर्महाँ ब्राह्मण भारतेति । एष हि देवेभ्य हव्यं भरति । (तैत्तिरीय संहिता २/५/९/१, तैत्तिरीय ब्राह्मण३/५/३/१, शतपथ ब्राह्मण १/४/१/१) 
= ब्रह्मा ने अग्नि को महान् कहा था क्योंकि यह देवों को भोजन देता है।
(२) अग्नि २-सघन ऊर्जा या पदार्थ-आग, वह्नि-धूः असि, धूर्वं तं योऽस्मान् धूर्वति (वाज. यजु, १/८, तैत्तिरीय सं, १/१/४/१ आदि) = धू धू शब्द कर जलना, ध्वस्त करना।
अग्निः वै ज्योति रक्षोहा (शतपथ ब्राह्मण, ७/४/१/३४)
अग्निः वा अर्कः (शतपथ ब्राह्मण, २/५/१/४, १०/६/२/५)
तेज रूप में सभी देवता अग्नि हैं-
सर्व देवत्यो अग्निः (शतपथ ब्राह्मण, ६/१/२/२८)
पृथ्वी (घनीभूत पदार्थ या ऊर्जा)-
इयं पृथिवी हि अग्निः (शतपथ ब्राह्मण, ६/१/२/१४, ६/१/१/२९ आदि)
(३) इन्द्र-सर्वव्यापी-नेन्द्रात् ऋते पवते धाम किञ्चन । (ऋक्, ९/६९/६) 
यह शून्य में भी वर्तमान है, अतः इसे शुनः इन्द्र कहते हैं इस इन्द्र से इद्दर, ईथर (Ether) हुआ है, जो शून्य में भी वर्तमान है। 
शुनं हुवेम मघवानमिन्द्रम्। (ऋक्, ३/३०/२२)। 
जैसे इन्द्र शून्य में भी है उसी प्रकार कुत्ता खाली घर देख कर उसमें घुस जाता है, अतः उसे श्वान (शुनः) कहते हैं। अकेली स्त्री को देखकर युवक (युवन्) भी उसके पीछे लग जाता है, जैसे इन्द्र गौतम पत्नी को अकेले देख कर उनके घर में घुस गये थे। अतः श्वन्, युवन्, मघवन्-इन ३ शब्दों के रूप एक जैसे चलते हैं- श्वयुवमघोनामतद्धिते (पाणिनि अष्टाध्यायी, ६/१/३३) 
सरिस श्वान मघवान जुबानू॥ (रामचरितमानस, २/३०१/८)
शुनेव यूना प्रसभं मघोना प्रधर्षिता गौतमधर्मपत्नी।
विचारवान् पाणिनिरेकसूत्रे श्वानं युवानं मघवानमाह॥
इन्द्र सृष्टि निर्माण के लिए ऊर्जा है।
(देवस्य त्वा सवितुः प्रसवे) इन्द्रियस्य इन्द्रियेण। (तैत्तिरीय ब्राह्मण, २/६/५/३)
इन्द्रस्य इन्द्रियेण अभिषिंचामि (शतपथ ब्राह्मण, ५/४/२/२, ऐतरेय ब्राह्मण, ८/७)
(३-४) मित्र-वरुण-इनके कई अर्थ हैं। जिस ऊर्जा से निर्माण होता है वह मित्र है, जिससे निर्माण नहीं होता वह वरुण है। वरुण वाः (वारि) का क्षेत्र है जहां जल जैसा बहुत विरल पदार्थ फैला हुआ है। उसके कुछ भाग में निर्माण होता है, वह मित्र है। आकाश में ब्रह्माण्ड के अप् का क्षेत्र वरुण है। सौर मण्डल के भीतर ऊर्जा का प्रसार मित्र है। आकाश के ३ धामों में मूल स्वरूप अन्तरिक्ष में दीखता है। मूल रूप से आदि हुआ था, अतः इनको आदित्य कहते हैं। स्वयम्भू मण्डल १०० अरब ब्रह्माण्डों का समूह है, जिसके भीतर अन्तरिक्ष (ब्रह्माण्डों के बीच खाली स्थान) अर्यमा है। ब्रह्माण्ड में १०० अरब ताराओं के बीच का स्थान वरुण है। सौर मण्डल का आदित्य मित्र है। ब्रह्माण्ड या ब्रह्माण्ड में तारा संख्या की गणना शतपथ ब्राह्मण (१२/३/२/५) में है।
ब्रह्मैव मित्रः (शतपथ बाह्मण, ४/१/४/१, ५/३/२/४)
मित्रः (एवैनं) सत्यानां (सुवते(। (तैत्तिरीय ब्राह्मण, १/७/४/१)
क्रिया भाग दक्षिण तथा निष्क्रिय भाग वाम हस्त है। अतः मित्र को दक्षिण और वरुण को वाम कहा है।
मैत्रो वै दक्षिणः। वरुणः सव्यः। (तैत्तिरीय ब्राह्मण, १/७/१०/१)
अप्सु वै वरुणः (तैत्तिरीय ब्राह्मण, १/६/५/६) 
आभिर्वा अहमिदं सर्वं आप्स्यामि यदिदं किं चेति। तस्मादापोऽभवन्। तदपामप्त्वम्। (गोपथ ब्राह्मण, पूर्व, १/१/२)
ता या अमू रेतः समुद्रं वृत्वातिष्ठंस्ताः प्राच्यो दक्षिणाच्यः प्रतीच्य उदीच्यः समवद्रवन्त। तद्यत्समवद्रवन्त तस्मात्समुद्र उच्यते। ता भीता अब्रुवन्। भगवन्तमेव वयं राजानं वृणीमह इति। यच्च वृत्वातिष्ठंस्तद्वरणोऽभवत्। तं वा एतं वरणं सन्तं वरुण इत्याचक्षते परोक्षेण। (गोपथ ब्राह्मण, पूर्व, १/१/७)
सबसे ऊपर अर्यमा-एषा वा ऊर्ध्वा बृहस्पतेः दिक् तदेष उपरिष्टाद् अर्यम्णः पन्थाः। (शतपथ ब्राह्मण, ५/५/१/१२)
तिस्रो भूमीर्धारयन् त्रीरुत द्यून्त्रीणि व्रता विदथे अन्तरेषाम् ।
ऋतेनादित्या महि वो महित्वं तदर्यमन् वरुण मित्र चारु ॥ (ऋग्वेद, २/२७/८)
(५-६) सुपर्ण-गरुत्मान्-इनका प्रायः एक साथ प्रयोग है। सुपर्ण इसके अंगों का समन्वय है, गरुत्मान् इसकी क्रिया है।
सुपर्ण चिति मूल बलों के मिलन से बना रूप है। विश्व के ४ मूल बल पक्षी के शरीर कहे गये हैं। इसके २ पक्ष (पंख) साम्य हैं। विषमता पुच्छ है। 
त इद्धाः सप्त नाना पुरुषानसृजन्त। स एतान् सप्त पुरुषानेकं पुरुषमकुर्वन्-यदूर्ध्वं नाभेस्तौ द्वौ समौब्जन्, यदवाङ् नाभेस्तौ द्वौ। पक्षः पुरुषः, पक्षः पुरुषः। प्रतिष्ठैक आसीत्। अथ या एतेषां पुरुषाणां श्रीः, यो रस आसीत्-तमूर्ध्व समुदौहन्। तदस्य शिरोऽभवत्। स एवं पुरुषः प्रजापतिरभवत्। स यः सः पुरुषः-प्रजापतिरभवत्, अयमेव सः, योऽयमग्निश्चीयते(कायरूपेण-शरीररूपेण-मूर्त्तिपिण्डरूपेण-भूतपिण्डरूपेण)। स वै सप्तपुरुषो भवति। सप्तपुरुषो ह्ययं, पुरुषः-यच्चत्वार आत्मा, त्रयः पशुपुच्छानि। (शतपथ ब्राह्मण, ६/१/१/२-६)
विश्व में ३ प्रकार के ७ लोकों का मिलन भी सुपर्ण के २१ पर्ण हैं। 
एकविंशतिः हि इमानि प्रत्यञ्चि सुपर्णस्य पत्त्राणि भवन्ति। (ऐतरेय आरण्यक, १/४/२)
ये त्रिषप्ताः परियन्ति विश्वा रूपाणि बिभ्रतः॥ (अथर्व, शौनक संहिता, १/१/१)
सप्तास्यासन् परिधयस्त्रिः सप्त समिधः कृताः। देवा यद्यज्ञं तन्वाना अबध्नन् पुरुषं पशुम्। (पुरुष सूक्त, यजुर्वेद, ३१/१५)
सुपर्ण रूप १, २ या ३ हैं-
एकः सुपर्णः स समुद्रमाविवेश स इदं भुवनं वि चष्टे । (ऋक्, १०/११४/४)
द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया, समानं वृक्षं परिषस्वजाते। 
तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्ति, अनश्नन्नन्यो अभिचाकषीति॥
(मुण्डक उप. ३/१/१, श्वेताश्वतर उप. ४/६, ऋक् १/१६४/२०, अथर्व ९/९/२०)
(इनमें एक सुपर्ण निर्विशेष ब्रह्म है, अन्य कर्त्ता ब्रह्म है। व्यक्ति स्तर पर ये आत्मा-जीव हैं।
ऋग्वेद (१०/११४) त्रिसुपर्ण सूक्त है। तैत्तिरीय आरण्यक, अनुवाक् (३८-४०) भी त्रिसुपर्ण सूक्त है।तीन सुपर्ण गायत्री मन्त्र के ३ पादों की तरह हैं। प्रथम पाद में सृष्टि होती है, जो ७ अंगों वाले गरुड़ के विभिन्न स्तरों द्वारा होता है। द्वितीय पाद में युग्म सुपर्णों द्वारा सृष्टि क्रिया चलती है, वह पालनकर्ता विष्णु का वाहन हुआ। तृतीय पाद आकाश की सृष्टि तथा उसकी क्रियाओं का मनुष्य पर प्रभाव है। यह प्रभाव पहले मन पर होता है जिसे वेद में धीयोग कहा गया है। मन से बाकी शरीर नियन्त्रित होता है। यह त्रिसुपर्ण है, जिसका मेधा जनन के लिये प्रयोग होता है। मेधा के ३ स्तर हैं-मन, बुद्धि तथा उसका स्थान चित्त आकाश।
गरुड गतिशील रूप है, जिसे विष्णु का वाहन कहा गया है। इसकी गति को छन्द कहा गया है-
छन्दोमयेन गरुड़ेन समुह्यमानश्चक्रायुधोभ्यगमदाशु यतो गजेन्द्रः (गजेन्द्र मोक्ष, भागवत पुराण, ८/३/३१)
छन्द रूपी गरुड़ को वयः छन्द या मूर्धा वयः छन्द कहा गया है (वाजसनेयि संहिता, १५/४-५)। छन्द माप है। काव्य में अक्षर माप, दूरी, गति या काल की माप तथा मात्रा की माप भी छन्द हैं। गायत्री पृथ्वी तथा उससे बड़े लोकों की माप है, जो मनुष्य से आरम्भ कर क्रमशः १-१ कोटि अर्थात् २ घात २४ गुणा बड़े हैं (गायत्री २४ अक्षर का छन्द है)। एक सामान्य समुद्र में जल विन्दुओं की संख्या १० घात १४ है, अतः इस संख्या को समुद्र या समुद्रिय छन्द कहते हैं। मनुष्य की तुलना में पृथ्वी का भार २ घात ८० है, अतः अशीति का अर्थ ८० तथा भोजन है। काल माप-महिदास ऐतरेय को उद्धृत कर छान्दोग्य उपनिषद् (३/१६/१-७) में कहा है कि जीवन यज्ञ को उसने ३ सवन में विभाजित कर ११६ वर्ष की आयु प्राप्त की। (१) प्रथम सवन गायत्री के २४ अक्षर अनुसार २४ वर्ष तक प्राण का विकास किया, (२) द्वितीय माध्यन्दिन सवन त्रिष्टुप् (११ x ४ अक्षर) में प्राणों से परिश्रम कर रोया, रोने वाला रुद्र = ११। (३) तृतीय सवन जगती (१२ x ४ = ४८ अक्षर) ६८ वर्ष के बाद आदित्य (१२) रूपी प्राणों का रक्षण करता है। 
गरुड़ का प्रभाव क्षेत्र तथा उससे प्राप्त बुद्धि वाक् सुपर्णी है-सुपर्णी (माया) वागेव सुपर्णी। (शतपथ ब्राह्मण, ३/६/२/२) 
महर्षि दैवरात् ने वाक् सुधा (पृष्ठ २९०) में सुपर्णी वाक् के ३ खण्ड कहे हैं जो त्रिसुपर्ण का एक अर्थ है-
सौपर्णी परसंज्ञया सुरसरित् सा वाक् सुपर्णी त्रिधा, वर्णाभ्यां डयते सुपर्ण इव सा माता सुपर्णाभिधा।
चिज्ज्योतिः सुहिरण्यरूपतनुभृत् सत्त्वात्मसौपर्णिका, पञ्चाशीह षडुत्तराऽतति मनःप्राणात्मचित्कर्षिका॥२६॥
(७) मातरिश्वा-मातरिश्वा-अप् में पदार्थों के मिश्रण के लिए गति आवश्यक है, जिससे नया निर्माण है। इस गति या वायु से माता जैसा निर्माण होता है, अतः इसे मातरिश्वा वायु कहते हैं।
तस्मिन् अपो मातरिश्वा दधाति (वाज. यजु, ४०/४, ईशावास्य उपनिषद्, ४)
यावन् मात्रं उषसो न प्रतीकं सुपर्ण्यो वसते मातरिश्वः (ऋक्, १०/८८/१९)
(८) यम-विष्णु सहस्रनाम में यम (१६२) नियम (८६४) तथा अयम (८६६) नाम हैं। ऋग्वेद में यम सूक्त (१०/१४), तथा पितर सूक्त (१०/१५) हैं। अथर्व वेद, काण्ड १८ में ४ बड़े सूक्त पितृमेध हैं, जिनमें २८३ मन्त्र हैं।
पृथ्वी पर विवस्वान् (सूर्य,११वें व्यास) के २ वंशज थे-भारत के सूर्य वंशी तथा भारत के वरुण खण्ड (इराक-अरब) की पश्चिम सीमा पर यम थे (यमन, अम्मान, सना-संयमनी आदि-मत्स्य पुराण, १२४/२०-३२)। वहां के यम के पास नचिकेता ज्ञान के लिए गया था (कठोपनिषद्, वल्ली १/१)। ब्रह्म रूप में अर्थ-
(क) सृष्टि का लय रूप-जन्माद्यस्य यतः (ब्रह्म सूत्र, १/१/२)-जिससे जगत् का जन्म, वृद्धि, क्षरण, मृत्यु आदि हो वह यम है। सृष्टि के आरम्भ में एक ही ऋषि था जिसे पूषा (पोषण करने वाला) या अत्रि (जिसका ३ में विभाजन नहीं हुआ है) कहते थे। स्रोत रूप ब्रह्म सूर्य है (विष्णु सहस्रनाम, ८८३), परिणति या अन्त रूप यम है। सूर्य से यम रूप तक की सृष्टि क्रिया (प्राजापत्य) एकर्षि पूषा से होती है।
पूषन् एकर्षे यम सूर्य प्राजापत्य व्यूहरश्मीन् समूह। (ईशावास्य उपनिषद्, १६)
सौर मण्डल में सौर वायु इषा है (वाज. यजु, १/१), इषा-दण्ड की परिधि ९,००० योजन या सौर व्यास है (यूरेनस कक्षा तक- विष्णु पुराण, २/८/३)। वह अन्धकार भाग यम है। प्रकाशित भाग शनि धर्म है। शनि वलय के ३ क्षेत्रों को पीलुमती, उदन्वती तथा प्रद्यौ कहा गया है-उदन्वती द्यौरवमा पीलुमतीति मध्यमा। तृतीया ह प्रद्यौरिति यस्यां पितर आसते॥ (अथर्व १८/२/४८)।
(ग) नियन्ता-नियन्ता (ऽ) नियमो (७) यमः (सहस्रनाम, १०५)। ब्रह्म का ईश्वर रूप सभी भूतों के हृदय में रह कर नियन्त्रण करता है-
ईश्वरः सर्व भूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति।
भ्रामयन् सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया॥ (गीता, १८/६१)
नियन्त्रण के नियम भी वही बनाते हैं। विकल्प से अनियम का अर्थ है कि वह स्वयं किसी नियम से बन्धे नहीं है। योग सूत्र (२/३०-३४) के अनुसार ५ यम निषेध रूप हैं, १० नियम पालन रूप हैं।
(घ) पितर रूप-पितर का सामान्य अर्थ है माता-पिता। व्यापक अर्थ में सभी पूर्वज पितर हैं। सभी भूतों के उत्पत्ति स्रोत पितर हैं जो ५० से अधिक प्रकार के हैं। 
ऋषिभ्यः पितरो जाताः, पितृभ्यो देव-दानवाः (मनु स्मृति, ३/२०१)।
(ङ) मृत पितर-मृत्यु के बाद कई प्रकार के पितर होते हैं, उन्हीं से पुनः जन्म होता है। उदाहरण-
अङ्गिरसो नः पितरो नवग्वा अथर्वाणो भृगवः सोम्यासः।
तेषां वयं सुमतौ यज्ञियानामपि भद्रे सौमनसे स्याम॥६॥
प्रेहि प्रेहि पथिभिः पूर्व्येभिर्यत्रा नः पूर्वे पितरः परेयुः।
उभा राजाना स्वधया मदन्ता यमं पश्यासि वरुणं च देवम्॥७॥ (ऋक्, १०/१४)
३. जगन्नाथ रूप-
तत्र गत्वा जगन्नाथं वासुदेवं वृषाकपि। पुरुषं पुरुषसूक्तेन उपतस्थे समाहिताः॥ (भागवत पुराण, १०/१/२०) 
इसमें ४ नाम हैं-जगन्नाथ, वासुदेव, वृषाकपि, पुरुष।
(१-२) जगन्नाथ-विष्णु-सुप्त रूप विष्णु तथा जाग्रत रूप जगन्नाथ है। दुर्गा सप्तशती, अध्याय १-
निद्रां भगवतीं विष्णोरतुलां तेजसः प्रभुः॥७१॥
विष्णुः शरीरग्रहणमहमीशान एव च॥८४॥
विष्णोः प्रबोधनार्थाय निहन्तुं मधुकैटभौ॥९०॥
जाग्रत होने के बाद-उत्तस्थौ च जगन्नाथस्तत्या मुक्तो जनार्दनः॥९१॥
प्रबोधं च जगत्स्वामी नीयतामच्युतो लघु॥८६॥
सूर्य जीवन का आधार रूप में विष्णु का रूप है। यह आकर्षण द्वारा पृथ्वी को अपनी कक्षा में धारण किये हुए है। यह विष्णु रूप है। उससे जो किरण तथा तेज निकलता है, वह इन्द्र है। किरणों द्वारा यह जीवन का पालन करता है वह जाग्रत रूप या जगन्नाथ है। 
(३) विश्वनाथ-लोकभाषा में जगत् तथा विश्व समान हैं। किन्तु विष्णु को जगन्नाथ, तथा शिव को विश्वनाथ कहते हैं। वेद विज्ञान में इनके अलग अर्थ हैं। विश्व वह रचना है जो एक सीमा के भीतर प्रायः पूर्ण है तथा हृदय केन्द्र से संचालित है। इसका संचालक चेतन तत्त्व जगत् है जो अव्यक्त या अदृश्य है। 
जगदव्यक्तमूर्तिना (गीता ९/४) जगज्जीवनं जीवनाधारभूतं (नारद परिव्राजक उपनिषद् ४/५०)
वालाग्रमात्रं हृदयस्य मध्ये विश्वं देवं जातरूपं वरेण्यं (अथर्वशिर उपनिषद् ५)
अनाद्यनन्तं कलिलस्य मध्ये विश्वस्य स्रष्टारमनेकरूपम् । 
विश्वस्यैकं परिवेष्टितारं ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्व पाशैः ॥ (श्वेताश्वतर उपनिषद्, ५/१३)
(४) वासुदेव-सूर्य सिद्धान्त (१२/१२-२५) में पाञ्चरात्र, सांख्य, पुराण तथा वेद समन्वित सृष्टि क्रम है। हिरण्यगर्भ से पहले वासुदेव हुए। उसके बाद क्रम से संकर्षण, प्रद्युम्न तथा अनिरुद्ध हुए। यह भागवत पुराण में भगवान कृष्ण, उनके भाई, पुत्र तथा पौत्र के भी नाम हैं। पर इस वर्णन से लगता है कि सृष्टि का आधार प्रथम उत्पन्न आकाश ही वासुदेव रूप है। वास = रहने का स्थान। संकर्षण = परस्पर आकर्षण। आकर्षण के केन्द्र के रूप में स्वयं वासुदेव ही कृष्ण हैं। पर सम् उपसर्ग का अर्थ है सभी पिण्डों के आकर्षण का योग। परस्पर आकर्षण द्वारा ही ब्रह्माण्ड, ग्रह, नक्षत्र आदि रूपों में पदार्थ एक सीमा के भीतर गठित हुआ। प्रद्युम्न = प्रकाशित या तेज का स्रोत। यह स्पष्ट रूप से सूर्य को कहा गया है जो तेज के कारण संसार की आत्मा है और त्रयी रूप में ऋक् (पिण्ड), यजु (जीवन), साम (तेज) तथा आधार (अथर्व) है। उसके बाद विविध सृष्टि अनिरुद्ध है जो अनन्त प्रकार की है। इसका विभाजन १२ प्रकार के आदित्यों से हुआ। 
(५) वृषाकपि- पण्डित मधुसूदन ओझा ने इन्द्र विजय, अध्याय ३ में वृषाकपि को इन्द्र का मित्र असुर राज कहा है, जो एक साथ मद्यपान करते थे (ऋक् सूक्त, १०/८६)। ब्रह्म रूप में वृषा को इन्द्र, सूर्य, हिङ्कार या व्यक्ति रूप में मन, आत्मा कहा है।
इन्द्रो वृषा (शतपथ ब्राह्मण, १/४/१/३३)
समग्निरिध्यते वृषा (ऋक्, ३/२७/१३)-शतपथ ब्राह्मण (१/४/१/२९)
वृषा अग्नि रूप स्रष्टा है, उसका स्थान या वेदी योषा (स्त्री) है-
योषा वै वेदिः वृषा अग्निः (शतपथ ब्राह्मण, १/२/५/१५)
वृषा हि मनः (शतपथ ब्राह्मण, १/४/४/३)
वृषा हिङ्कारः (गोपथ ब्राह्मण, पूर्व, ३/२३)-सृष्टि का आरम्भ ब्रह्म के विभिन्न रूपों द्वारा होता है-कामना (निर्विशेष ब्रह्म-सो अकामयत्-तैत्तिरीय उपनिषद्, २/६, बृहदारण्यक उपनिषद्, १/२/४), ईक्षा (सृष्टि इच्छा-स इक्षांचक्रे-प्रश्नोपनिषद्, ६/३, स ईक्षत-ऐतरेय उपनिषद्, १/३), हिङ्कार (कार्य आरम्भ या प्रस्ताव-छान्दोग्य उपनिषद्, अध्याय २ में विविध हिङ्कार)।
सृष्टि का आरम्भ जल जैसे विरल पदार्थ से हुआ, जिसका मूल रूप रस या आनन्द था। उसमें तरंग होने से सलिल् हुआ, उसका आकार ग्रहण करने से सरिर् (शरीर) हुआ। उसमें द्रप्स (अंग्रेजी में ड्रॉप्स, drops) अलग (स्कन्न) हुए। प्रथम स्तर के द्रप्स ब्रह्माण्ड (गैलेक्सी), उसमें तारा रूप द्रप्स हुए। ब्रह्माण्ड में फैला पदार्थ अप् था, उसमें तरंग होने से अम्भ हुआ, अम्भ सहित साम्भ या साम्ब सदाशिव हुआ। सौर मण्डल में अप् का रूप मर है, जिसमें सूर्य मरीची है। 
 यद्वै तत्सुकृतं रसो वै सः । रसं ह्येवायं लब्ध्वाऽऽनन्दी भवति। (तैत्तिरीय उपनिषद्, २/७) 
वेदिर्वै सलिलम् (शतपथ ब्राह्मण, ३/६/२/५) 
अयं वै सरिरो योऽयं वायुः पवत एतस्माद्वै सरिरात् सर्वे देवाः सर्वाणि भूतानि सहेरते (शतपथ ब्राह्मण, १४/२/२/३)
स इमाँल्लोकनसृजत । अम्भो मरीचीर्मरमापोऽदोऽम्भः परेण दिवं द्यौः प्रतिष्ठान्तरिक्षं मरीचयः पृथिवी मरो या अधस्तात्ता आपः । (ऐतरेय उपनिषद्, १/१/२)
कर्म के आरम्भ रूप अप् के सभी रूप ’क’ हैं। ’क’ का पान करने वाला कपि, उसके बाद ब्रह्माण्ड रूपी विन्दुओं की वर्षा करने वाला वृषाकपि है।
तद् यत् कम्पाय-मानो रेतो वर्षति तस्माद् वृषाकपिः, तद् वृषाकपेः वृषा कपित्वम्। ... आदित्यो वै वृषाकपिः। (गोपथ ब्राह्मण, उत्तर, ६/१२) 
द्रप्सश्चस्कन्द प्रथमाँ अनु द्यूनिमं च योनिमनु यश्च पूर्वः॥ (ऋक्, १०/१७/११, वाज. यजु, १३/५)
यस्ते द्रप्सः स्कन्दति॥१२॥ (ऋक्, १०/१७/१२) 
एष द्रप्सो वृषभो विश्वरूपो इन्द्राय वृष्णे समकारि सोमः (ऋक्, ६/४१/३)
यह सृष्टि सदा पहले जैसी होती है, अतः अनुकरण करने वाले जीव को कपि (अंग्रेजी में कॉपी, copy) कहते हैं। 
सूर्या चन्द्रमसौ धाता यथा पूर्वमकल्पयत् । (ऋक्, १०/१९०/३)
(६) पुरुष-(क) सांख्य दर्शन के अनुसार सृष्टि का चेतन तत्त्व पुरुष है, निर्माण सामग्री प्रकृति है, जिसके २४ भेद हैं।
(ख) गीता के अनुसार सभी भूत पुरुष हैं, जिसके ४ प्रकार हैं। उनमें ३ का वर्णन हो सकता है। सभी का बाह्य रूप क्षर पुरुष है, उनका परिचय या कार्य रूप अक्षर पुरुष है, समष्टि के अंग रूप अव्यय पुरुष है।
द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च। क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते॥१६॥ 
उतमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः। यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्यव्यय ईश्वरः॥१७॥
समष्टि रूप में व्यय या कमी नही होती है, जिसे आधुनिक भौतिक विज्ञान में ५ प्रकार के संरक्षण सिद्धान्त कहा गया है। (Conservation of mass, energy, momentum, angular momentum, electric charge)
अति सूक्ष्म या अति विस्तृत रूप में भेद नहीं दीखता या अनुभव नही होता है (भागवत पुराण, ३/११/३-५), वह परात्पर पुरुष है। इसका वर्णन सम्भव नहीं है, उपवर्णन होता है।
अणोरणीयान् महतो महीयान् (कठोपनिषद्, २/२०)
स वै न देवासुर मर्त्य तिर्यङ् न स्त्री न षण्ढो न पुमान् न जन्तुः।
नायं गुणः कर्म न सन्न चासन्, निषेधशेषो, जयतादशेषः॥
एवं गजेन्द्रमुपवर्णित निर्विशेषं (गजेन्द्र मोक्ष, भागवत पुराण, अध्याय, ८/३)
(ग) पुरुष सूक्त में इसके सभी रूप वर्णित हैं अतः उसी सूक्त से उनकी उपासना हुई। पुरुष सूक्त के कुछ रूपों के क्रम हैं-(१) पूरुष = ४ पाद का मूल स्वरूप, (२) सहस्रशीर्ष-उससे १००० प्रकार के सृष्टि विकल्प या धारा, (३) सहस्राक्ष =हर स्थान अक्ष या केन्द्र मान सकते हैं, (३) सहस्रपाद-३ स्तरों की अनन्त पृथ्वी, (४) विराट् पुरुष-दृश्य जगत् जिसमें ४ पाद में १ पाद से ही सृष्टि हुई। १ अव्यक्त से ९ प्रकार के व्यक्त हुए जिनके ९ प्रकार के कालमान सूर्य सिद्धान्त (१५/१) में दिये हैं। अतः विराट् छन्द के हर पाद में ९ अक्षर हैं। (५) अधिपूरुष-दृश्य पिण्डों के बीच का विरल पदार्थ जो उनका ३ गुणा है, (६) देव, साध्य, ऋषि आदि, (६) ७ लोक का षोडषी पुरुष, (७) सर्वहुत यज्ञ का पशु पुरुष, (८) आरण्य और ग्राम्य पशु, (९) यज्ञ पुरुष (१०) अन्तर्यामी आदि।
पुरुष की सभी परिभाषा मधुसूदन ओझा जी ने श्लोकों में दी हैं-
पुरु व्यवस्यन् पुरुधा स्यति स्वतस्ततः स उक्तः पुरुषश्च पूरुषः।
पुरा स रुष्यत्यथ पूर्षुरुच्यते स पूरुषो वा पुरुषस्तदुच्यते। धी प्राणभूतस्य पुरे स्थितस्य सर्वस्य सर्वानपि पाप्मनः खे।
यत्सर्वतोऽस्मादपि पूर्व औषत् स पूरुषस्तेन मतोऽयमात्मा॥ स व्यक्तभूते वसति प्रभूते शरीरभूते पुरुषस्ततोऽसौ।
पुरे निवासाद्दहरादिके वा वसत्यतं ब्रह्मपुरे ततोऽपि॥ (ब्रह्म सिद्धान्त, ११/१७२-१७४) 
४. स्रष्टा और सृष्टि रूप
यह रूप दारु ब्रह्म भी कहा गया है। भगवान् सृष्टि क्रम रूप में वृक्ष का मूल, शाखा और पत्र हैं, निरपेक्ष द्रष्टा हैं, विश्व निर्माण की सामग्री हैं, सृष्टि चक्र या संकल्प-कर्म-फल का चक्र हैं, कई चक्रों के समन्वय रूप में वन तथा विश्व के आधार भी हैं। 
ब्रह्म वनं ब्रह्म स वृक्ष आसीत् यतो द्यावा पृथिवी निष्टतक्षुः।
मनीषिणो मनसा विब्रवीमि वो ब्रह्माध्यतिष्ठद् भुवनानि धारयन्॥ 
(तैत्तिरीय ब्राह्मण, २/८/९/१६)
= ब्रह्म ही वह वन और वृक्ष है जिसे काट कर जगत् का निर्माण हुआ। मनीषी चिन्तन कर कहते हैं कि ब्रह्म ने ही भुवनों का धारण किया। 
यस्मात् परं नापरमस्ति किञ्चित्, यस्मान्नाणीयो न ज्यायोऽस्ति कश्चित्।
वृक्ष इव स्तब्धो दिवि तिष्ठत्येनेदं पूर्णं पुरुषेण सर्वम्॥ (श्वेताश्वतर उपनिषद्, ३/९) 
= पूर्ण पुरुष वृक्ष के जैसा आकाश में स्तब्ध हो कर देख रहा है। इससे परे कुछ नहीं है, इससे सूक्ष्म नहीं है न इसके अतिरिक्त कुछ है। 
ऊर्ध्वमूलमधः शाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम्। 
छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित्। (गीता, १५/१) 
= जिसका मूल ऊपर है तथा शाखा नीचे है वह अविनाशी अश्वत्थ है। छन्द इसके पत्ते हैं। जो इस वृक्ष को जानता है, वही वेद जान सकता है।
अधश्चोर्ध्वं प्रसृतास्तस्य शाखा गुणप्रवृद्धा विषयप्रवालाः। 
अधश्च मूलान्यनुसन्ततानि कर्मानुबन्धीनि मनुष्यलोके॥२॥
न रूपमस्येह तथोपलभ्यते, नान्तो न चादिर्न च सम्प्रतिष्ठा। 
अश्वत्थमेनं सुविरूढ़मूलमसङ्गशस्त्रेण दृढ़ेन छित्वा॥३॥
= संकल्प, क्रिया, फल के चक्र रूपी वृक्ष का जो बन्धन है, उसे काटने पर ही मनुष्य मुक्त हो सकता है। 
अदो यद्दारुः प्लवते सिन्धोः पारे अपूरुषम्। 
तदारभस्व दुर्हणो येन गच्छ परस्तरम्॥ 
ऋक् , शाकल्य शाखा, १०/१५५/३)
= यह समुद्र (विश्व विस्तार) के पार जो अपौरुषेय दारु (काठ) तैर रहा
है, उसकी शरण में जाने से ही समुद्र को पार कर सकते हैं। 
५. गायत्री मन्त्र-
एको नैकः सवः कः किं यत् तत् पदमनुत्तमम् (सहस्रनाम, ९१)
गायत्री प्रथम पाद में सविता = स्रष्टा। यह सविता सूर्य पिता जैसा है।
उसका निर्माता ब्रह्माण्ड पितामह है, उसका भी निर्माता स्वयम्भू ब्रह्म
प्रपितामह, या तत् सविता है।
गायत्री मन्त्र तृतीय पाद में यत् = स्वयं, व्यक्ति। उसकी बुद्धि को प्रेरित
करने वाला ब्रह्म।
मध्यम पाद में भर्गः भी ब्रह्म का वाचक है, जो शिव का एक नाम है
(अमरकोष, १/१/३३)
एको नैकः(देव्यथर्वशीर्ष, २३)
कः = कर्ता रूप या स्रष्टा-कस्मै देवाय हविषा विधेम (ऋक्,
१०/१२१/१)
कं = क्रिया रूप, सृष्टि-कं लोकं अनुप्राविशत् (अथर्व, ११/८/११)

गिलोय

आठ वर्ष पुरानी #नीम_गिलोय कलाई से भी मोटी हो गई है। गिलोय एक ही ऐसी बेल है, जिसे आप सौ मर्ज की एक दवा कह सकते हैं। इसलिए इसे संस्कृत में अमृता नाम दिया गया है। आयुर्वेदिक ग्रंथों में वर्णन हैं कि देवताओं और दानवों के बीच समुद्र मंथन के दौरान जब अमृत निकला और इस अमृत की बूंदें जहां-जहां छलकीं, वहां-वहां गिलोय की उत्पत्ति हुई।
  
        आयुर्वेद के #अमृता की कहानी गरीबों की डॉक्टर मानी जाने वाली #गिलोय_बेल 70 रोगों का सफाया करती है; गाँवों में यह आसानी से मिलती है। क्या ऐसा हो सकता है कि हम बारिश में भीगें लेकिन हमें जुकाम न हो... हम सर्दी में कैप लगाए बिना थोड़ी देर बाहर निकल जाएं तो भी हमें बुखार न हो...गर्मियों की दोपहर में अगर बाहर निकलना पड़े तो हमें लू न लगे...और कोरोना वायरस जैसी वैश्विक महामारी से भी बचे रहें...!

आयुर्वेद में मनुष्य की इम्यूनिटी को बढ़ाने के लिए कई जड़ी-बूटियों के बारे में बताया गया है... इनमें से सबसे असरदार गिलोय (Giloy) या अमृता (Amrita) को माना जाता है.....!

#गिलोय एक ही ऐसी बेल है, जिसे आप सौ मर्ज की एक दवा कह सकते हैं। इसलिए इसे संस्कृत में अमृता नाम दिया गया है। 

#गिलोय एक प्रकार की लता/बेल है, जिसके पत्ते पान के पत्ते की तरह होते है। यह इतनी अधिक गुणकारी होती है, कि इसका नाम अमृता रखा गया है। आयुर्वेद में गिलोय को बुखार की एक महान औषधि के रूप में माना गया है।

कहते हैं कि देवताओं और दानवों के बीच समुद्र मंथन के दौरान जब अमृत निकला और इस अमृत की बूंदें जहां-जहां छलकीं, वहां-वहां गिलोय की उत्पत्ति हुई।

#इसका वानस्पिक नाम( Botanical name) टीनोस्पोरा कॉर्डीफोलिया (tinospora cordifolia है। इसके पत्ते पान के पत्ते जैसे दिखाई देते हैं और जिस पौधे पर यह चढ़ जाती है, उसे मरने नहीं देती। इसके बहुत सारे लाभ आयुर्वेद में बताए गए हैं, जो न केवल आपको सेहतमंद रखते हैं, बल्कि आपकी सुंदरता को भी निखारते हैं। 

#आइए_जानते_हैं_गिलोय_के_फायदे…....

#गिलोय बढ़ाती है रोग प्रतिरोधक क्षमता

गिलोय एक ऐसी बेल है, जो व्यक्ति की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ा कर उसे बीमारियों से दूर रखती है। इसमें भरपूर मात्रा में एंटीऑक्सीडेंट्स होते हैं, जो शरीर में से विषैले पदार्थों को बाहर निकालने का काम करते हैं। यह खून को साफ करती है, बैक्टीरिया से लड़ती है। लिवर और किडनी की अच्छी देखभाल भी गिलोय के बहुत सारे कामों में से एक है। ये दोनों ही अंग खून को साफ करने का काम करते हैं।

#ठीक करती है बुखार

अगर किसी को बार-बार बुखार आता है तो उसे गिलोय का सेवन करना चाहिए। गिलोय हर तरह के बुखार से लडऩे में मदद करती है। इसलिए डेंगू के मरीजों को भी गिलोय के सेवन की सलाह दी जाती है। डेंगू के अलावा मलेरिया, स्वाइन फ्लू में आने वाले बुखार से भी गिलोय छुटकारा दिलाती है।

#गिलोय के फायदे – डायबिटीज के रोगियों के लिए

गिलोय एक हाइपोग्लाइसेमिक एजेंट है यानी यह खून में शर्करा की मात्रा को कम करती है। इसलिए इसके सेवन से खून में शर्करा की मात्रा कम हो जाती है, जिसका फायदा टाइप टू डायबिटीज के मरीजों को होता है।

#पाचन शक्ति बढ़ाती है

यह बेल पाचन तंत्र के सारे कामों को भली-भांति संचालित करती है और भोजन के पचने की प्रक्रिया में मदद कती है। इससे व्यक्ति कब्ज और पेट की दूसरी गड़बडिय़ों से बचा रहता है।

#कम करती है स्ट्रेस

गलाकाट प्रतिस्पर्धा के इस दौर में तनाव या स्ट्रेस एक बड़ी समस्या बन चुका है। गिलोय एडप्टोजन की तरह काम करती है और मानसिक तनाव और चिंता (एंजायटी) के स्तर को कम करती है। इसकी मदद से न केवल याददाश्त बेहतर होती है बल्कि मस्तिष्क की कार्यप्रणाली भी दुरूस्त रहती है और एकाग्रता बढ़ती है।

#बढ़ाती है आंखों की रोशनी

गिलोय को पलकों के ऊपर लगाने पर आंखों की रोशनी बढ़ती है। इसके लिए आपको गिलोय पाउडर को पानी में गर्म करना होगा। जब पानी अच्छी तरह से ठंडा हो जाए तो इसे पलकों के ऊपर लगाएं।

#अस्थमा में भी फायदेमंद

मौसम के परिवर्तन पर खासकर सर्दियों में अस्थमा को मरीजों को काफी परेशानी होती है। ऐसे में अस्थमा के मरीजों को नियमित रूप से गिलोय की मोटी डंडी चबानी चाहिए या उसका जूस पीना चाहिए। इससे उन्हें काफी आराम मिलेगा।

#गठिया में मिलेगा आराम

गठिया यानी आर्थराइटिस में न केवल जोड़ों में दर्द होता है, बल्कि चलने-फिरने में भी परेशानी होती है। गिलोय में एंटी आर्थराइटिक गुण होते हैं, जिसकी वजह से यह जोड़ों के दर्द सहित इसके कई लक्षणों में फायदा पहुंचाती है।

#अगर हो गया हो एनीमिया, तो करिए गिलोय का सेवन

भारतीय महिलाएं अक्सर एनीमिया यानी खून की कमी से पीडि़त रहती हैं। इससे उन्हें हर वक्त थकान और कमजोरी महसूस होती है। गिलोय के सेवन से शरीर में लाल रक्त कणिकाओं की संख्या बढ़ जाती है और एनीमिया से छुटकारा मिलता है।

#बाहर निकलेगा कान का मैल

कान का जिद्दी मैल बाहर नहीं आ रहा है तो थोड़ी सी गिलोय को पानी में पीस कर उबाल लें। ठंडा करके छान के कुछ बूंदें कान में डालें। एक-दो दिन में सारा मैल अपने आप बाहर जाएगा।

#कम होगी पेट की चर्बी

गिलोय शरीर के उपापचय (मेटाबॉलिजम) को ठीक करती है, सूजन कम करती है और पाचन शक्ति बढ़ाती है। ऐसा होने से पेट के आस-पास चर्बी जमा नहीं हो पाती और आपका वजन कम होता है।

#खूबसूरती बढ़ाती है गिलोय

गिलोय न केवल सेहत के लिए बहुत फायदेमंद है, बल्कि यह त्वचा और बालों पर भी चमत्कारी रूप से असर करती है….

#जवां रखती है गिलोय

गिलोय में एंटी एजिंग गुण होते हैं, जिसकी मदद से चेहरे से काले धब्बे, मुंहासे, बारीक लकीरें और झुर्रियां दूर की जा सकती हैं। इसके सेवन से आप ऐसी निखरी और दमकती त्वचा पा सकते हैं, जिसकी कामना हर किसी को होती है। अगर आप इसे त्वचा पर लगाते हैं तो घाव बहुत जल्दी भरते हैं। त्वचा पर लगाने के लिए गिलोय की पत्तियों को पीस कर पेस्ट बनाएं। अब एक बरतन में थोड़ा सा नीम या अरंडी का तेल उबालें। गर्म तेल में पत्तियों का पेस्ट मिलाएं। ठंडा करके घाव पर लगाएं। इस पेस्ट को लगाने से त्वचा में कसावट भी आती है।

#बालों की समस्या भी होगी दूर

अगर आप बालों में ड्रेंडफ, बाल झडऩे या सिर की त्वचा की अन्य समस्याओं से जूझ रहे हैं तो गिलोय के सेवन से आपकी ये समस्याएं भी दूर हो जाएंगी।

#गिलोय का प्रयोग ऐसे करें :--

अब आपने गिलोय के फायदे जान लिए हैं, तो यह भी जानिए कि गिलोय को इस्तेमाल कैसे करना है…

#गिलोय जूस

गिलोय की डंडियों को छील लें और इसमें पानी मिलाकर मिक्सी में अच्छी तरह पीस लें। छान कर सुबह-सुबह खाली पेट पीएं। अलग-अलग ब्रांड का गिलोय जूस भी बाजार में उपलब्ध है।

#काढ़ा

चार इंच लंबी गिलोय की डंडी को छोटा-छोटा काट लें। इन्हें कूट कर एक कप पानी में उबाल लें। पानी आधा होने पर इसे छान कर पीएं। अधिक फायदे के लिए आप इसमें लौंग, अदरक, तुलसी भी डाल सकते हैं।

#पाउडर

यूं तो गिलोय पाउडर बाजार में उपलब्ध है। आप इसे घर पर भी बना सकते हैं। इसके लिए गिलोय की डंडियों को धूप में अच्छी तरह से सुखा लें। सूख जाने पर मिक्सी में पीस कर पाउडर बनाकर रख लें।

#गिलोय वटी

बाजार में गिलोय की गोलियां यानी टेबलेट्स भी आती हैं। अगर आपके घर पर या आस-पास ताजा गिलोय उपलब्ध नहीं है तो आप इनका सेवन करें।

साथ में अलग-अलग बीमारियों में आएगी काम

अरंडी यानी कैस्टर के तेल के साथ गिलोय मिलाकर लगाने से गाउट(जोड़ों का गठिया) की समस्या में आराम मिलता है।इसे अदरक के साथ मिला कर लेने से रूमेटाइड आर्थराइटिस की समस्या से लड़ा जा सकता है।खांड के साथ इसे लेने से त्वचा और लिवर संबंधी बीमारियां दूर होती हैं।आर्थराइटिस से आराम के लिए इसे घी के साथ इस्तेमाल करें।कब्ज होने पर गिलोय में गुड़ मिलाकर खाएं।

गिलोय का रस पीने से शरीर में पाए जाने वाली विभिन्न प्रकार की बीमारियाँ दूर होने लगती हैं। गिलोय की पत्तियों में कैल्शियम, प्रोटीन तथा फास्फोरस पाए जाते है। यह वात, कफ और पित्त नाशक होती है। यह हमारे शरीर की रोगप्रतिरोधक शक्ति को बढाने में सहायता करती है।

इसमें विभिन्न प्रकार के महत्वपूर्ण एंटीबायोटिक तथा एंटीवायरल तत्व पाए जाते है जिनसे शारीरिक स्वास्थ्य को लाभ पहुँचता है। यह गरीब के घर की डॉक्टर है क्योंकि यह गाँवो में सहजता से मिल जाती है।

 गिलोय में प्राकृतिक रूप से शरीर के दोषों को संतुलित करने की क्षमता पाई जाती है।
गिलोय एक बहुत ही महत्वपूर्ण आयुर्वेदिक जडीबूटी है। गिलोय बहुत शीघ्रता से फलने फूलनेवाली बेल होती है।

गिलोय की टहनियों को भी औषधि के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। गिलोय की बेल जीवन शक्ति से भरपूर होती है, क्योंकि इस बेल का यदि एक छोटा-सा टुकडा भी जमीन में डाल दिया गया तो वहाँ पर एक नया पौधा बन जाता है। 

गिलोय की रासायनिक संरचना का विश्लेषण करने पर यह पता चला है कि इसमें गिलोइन नामक कड़वा ग्लूकोसाइड, वसा अल्कोहल ग्लिस्टेराल, बर्बेरिन एल्केलाइड, अनेक प्रकार की वसा अम्ल एवं उड़नशील तेल पाये जाते हैं। पत्तियों में कैल्शियम, प्रोटीन, फास्फोरस और तने में स्टार्च भी मिलता है।

कई प्रकार के परीक्षणों से ज्ञात हुआ की वायरस पर गिलोय का प्राणघातक असर होता है। इसमें सोडियम सेलिसिलेट होने के कारण से अधिक मात्रा में दर्द निवारक गुण पाये जाते हैं। यह क्षय रोग के जीवाणुओं की वृद्धि को रोकती है। यह इन्सुलिन की उत्पत्ति को बढ़ाकर ग्लूकोज का पाचन करना तथा रोग के संक्रमणों को रोकने का कार्य करती है।

आइये हम गिलोय से होने वाले शारीरिक फायदे की ओर देखें :

रोग-प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाता है – गिलोय में हमारे शरीर की रोगप्रतिरोधक क्षमता को बढाने का एक बहुत ही महत्वपूर्ण गुण पाए जाते है।

गिलोय में एंटीऑक्सीडंट के विभिन्न गुण पाए जाते हैं, जिससे शारीरिक स्वास्थ्य बना रहता है, तथा भिन्न प्रकार की खतरनाक बीमारियाँ दूर रखने में सहायता मिलती है। गिलोय हमारे लीवर तथा किडनी में पाए जाने वाले रासायनिक विषैले पदार्थों को बाहर निकालने का कार्य भी करता है।

 गिलोय हमारे शरीर में होनेवाली बीमारीयों के कीटाणुओं से लड़कर लीवर तथा मूत्र संक्रमण जैसी समस्याओं से हमारे शरीर को सुरक्षा प्रदान करता है।
ज्वर से लड़ने के लिए उत्तम औषधी – गिलोय की वजह से लंबे समय तक चलने वाले बुखार को ठीक होने में काफी लाभ होता है। गिलोय में ज्वर से लड़ने वाले गुण पाए जाते हैं।

गिलोय हमारे शरीर में होने वाली जानलेवा बीमारियों के लक्षणों को उत्पन्न होने से रोकने में बहुत ही सहायक होता है। यह हमारे शरीर में रक्त के प्लेटलेट्स की मात्रा को बढ़ाता है जो कि किसी भी प्रकार के ज्वर से लड़ने में उपयोगी साबित होता है। डेंगु जैसे ज्वर में भी गिलोय का रस बहुत ही उपयोगी साबित होता है। यदि मलेरिया के इलाज के लिए गिलोय के रस तथा शहद को बराबर मात्रा में मरीज को दिया जाए तो बडी सफलता से मलेरिया का इलाज होने में काफी मदद मिलती है।
पाचन क्रिया करता है दुरुस्त – गिलोय की वजह से शारीरिक पाचन क्रिया भी संयमित रहती है।

विभिन्न प्रकार की पेट संबंधी समस्याओं को दूर करने में गिलोय बहुत ही प्रचलित है। हमारे पाचनतंत्र को सुनियमित बनाने के लिए यदि एक ग्राम गिलोय के पावडर को थोडे से आंवला पावडर के साथ नियमित रूप से लिया जाए तो काफी फायदा होता है।
बवासीर का भी इलाज है गिलोय – बवासीर से पीडित मरीज को यदि थोडा सा गिलोय का रस छांछ के साथ मिलाकर देने से मरीज की तकलीफ कम होने लगती है।
डॉयबिटीज का उपचार – अगर आपके शरीर में रक्त में पाए जाने वाली शुगर की मात्रा अधिक है तो गिलोय के रस को नियमित रूप से पीने से यह मात्रा भी कम होने लगती है।
उच्च रक्तचाप को करे नियंत्रित – गिलोय हमारे शरीर के रक्तचाप को नियमित करता है।
अस्थमा का बेजोड़ इलाज – अस्थमा एक प्रकार की अत्यंत ही खतरनाक बीमारी है, जिसकी वजह से मरीज को भिन्न प्रकार की तकलीफों का सामना करना पडता है, जैसे छाती में कसाव आना, साँस लेने में तकलीफ होना, अत्याधिक खांसी होना तथा सांसो का तेज तेज रूप से चलना। कभी कभी ऐसी परिस्थिती को काबू में लाना बहुत मुश्किल हो जाता है। लेकिन क्या आप जानते है, कि अस्थमा के उपर्युक्त लक्षणों को दूर करने का सबसे आसान उपाय है, गिलोय का प्रयोग करना।

जी हाँ अक्सर अस्थमा के मरीजों की चिकित्सा के लिए गिलोय का प्रयोग बडे पैमाने पर किया जाता है, तथा इससे अस्थमा की समस्या से छुटकारा भी मिलने लगता है।
आंखों की रोशनी बढ़ाने हेतु – गिलोय हमारी आंखों के स्वास्थ्य को बनाए रखने के लिए भी प्रयोग में लाया जाता है। यह हमारी आंखों की दृष्टी को बढाता है, जिसकी वजह से हमे बिना चश्मा पहने भी बेहतर रूप से दिखने लगता है।

 यदि गिलोय के कुछ पत्तों को पानी में उबालकर यह पानी ठंडा होने पर आंखों की पलकों पर नियमित रूप से लगाने से काफी फायदा होता है।
सौंदर्यता के लिए भी है कारगार – गिलोय का उपयोग करने से हमारे चेहरे पर से काले धब्बे, कील मुहांसे तथा लकीरें कम होने लगती हैं। चेहरे पर से झुर्रियाँ भी कम होने में काफी सहायता मिलती है।

यह हमारी त्वचा को युवा बनाए रखने में मदद करता है। गिलोय से हमारी त्वचा का स्वास्थ्य सौंदर्य बना रहता है। तथा उस में एक प्रकार की चमक आने लगती है।
खून से जुड़ी समस्याओं को भी करता है दूर – कई लोगों में खून की मात्रा की कमी पाई जाती है। जिसकी वजह से उन्हें शारीरिक कमजोरी महसूस होने लगती है।

गिलोय का नियमित इस्तेमाल करने से शरीर में खून की मात्रा बढने लगती है, तथा गिलोय हमारे खून को भी साफ करने में बहुत ही लाभदायक है।

दांतों में पानी लगना: गिलोय और बबूल की फली समान मात्रा में मिलाकर पीस लें और सुबह-शाम नियमित रूप से इससे मंजन करें इससे आराम मिलेगा।
रक्तपित्त (खूनी पित्त): 10-10 ग्राम मुलेठी, गिलोय, और मुनक्का को लेकर 500 मिलीलीटर पानी में उबालकर काढ़ा बनाएं। इस काढ़े को 1 कप रोजाना 2-3 बार पीने से रक्तपित के रोग में लाभ मिलता है।

खुजली: हल्दी को गिलोय के पत्तों के रस के साथ पीसकर खुजली वाले अंगों पर लगाने और 3 चम्मच गिलोय का रस और 1 चम्मच शहद को मिलाकर सुबह-शाम पीने से खुजली पूरी तरह से खत्म हो जाती है।

मोटापा: नागरमोथा, हरड और गिलोय को बराबर मात्रा में मिलाकर चूर्ण बना लें। इसमें से 1-1 चम्मच चूर्ण शहद के साथ दिन में 3 बार लेने से मोटापे के रोग में लाभ मिलता है। हरड़, बहेड़ा, गिलोय और आंवले के काढ़े में शुद्ध शिलाजीत पकाकर खाने से मोटापा वृद्धि रुक जाती है।

3 ग्राम गिलोय और 3 ग्राम त्रिफला चूर्ण को सुबह और शाम शहद के साथ चाटने से मोटापा कम होता जाता है।
हिचकी: सोंठ का चूर्ण और गिलोय का चूर्ण बराबर मात्रा में मिलाकर सूंघने से हिचकी आना बंद हो जाती है।
सभी प्रकार के बुखार: सोंठ, धनियां, गिलोय, चिरायता तथा मिश्री को बराबर मात्रा में मिलाकर इसे पीसकर चूर्ण बना लें। इस चूर्ण को रोजाना दिन में 3 बार 1-1 चम्मच की मात्रा में लेने से हर प्रकार के बुखार में आराम मिलता है।
कान का मैल साफ करने के लिए: गिलोय को पानी में घिसकर और गुनगुना करके कान में 2-2 बूंद दिन में 2 बार डालने से कान का मैल निकल जाता है और कान साफ हो जाता है।

कान में दर्द: गिलोय के पत्तों के रस को गुनगुना करके इस रस को कान में बूंद-बूंद करके डालने से कान का दर्द दूर हो जाता है।

संग्रहणी (पेचिश): अती, सोंठ, मोथा और गिलोय को बराबर मात्रा में लेकर पानी के साथ मिलाकर काढ़ा बना लें। इस काढ़े को 20-30 ग्राम की मात्रा में सुबह-शाम पीने से मन्दाग्नि (भूख का कम लगना), लगातार कब्ज की समस्या रहना तथा दस्त के साथ आंव आना आदि प्रकार के कष्ट दूर हो जाते हैं।

कब्ज : गिलोय का चूर्ण 2 चम्मच की मात्रा गुड़ के साथ सेवन करें इससे कब्ज की शिकायत दूर हो जाती है।
एसीडिटी: गिलोय के रस का सेवन करने से ऐसीडिटी से उत्पन्न अनेक रोग जैसे- पेचिश, पीलिया, मूत्रविकारों (पेशाब से सम्बंधित रोग) तथा नेत्र विकारों (आंखों के रोग) से छुटकारा मिल जाता है। गिलोय, नीम के पत्ते और कड़वे परवल के पत्तों को पीसकर शहद के साथ पीने से अम्लपित्त समाप्त हो जाती है।

खून की कमी (एनीमिया): गिलोय का रस शरीर में पहुंचकर खून को बढ़ाता है और जिसके फलस्वरूप शरीर में खून की कमी (एनीमिया) दूर हो जाती है।
हृदय की दुर्बलता : गिलोय के रस का सेवन करने से हृदय की निर्बलता (दिल की कमजोरी) दूर होती है।

इस तरह हृदय (दिल) को शक्ति मिलने से विभिन्न प्रकार के हृदय संबन्धी रोग ठीक हो जाते हैं।
हृदय के दर्द: गिलोय और काली मिर्च का चूर्ण 10-10 ग्राम की मात्रा में मिलाकर इसमें से 3 ग्राम की मात्रा में हल्के गर्म पानी से सेवन करने से हृदय के दर्द में लाभ मिलता है।
बवासीर, कुष्ठ और पीलिया: 7 से 14 मिलीलीटर गिलोय के तने का ताजा रस शहद के साथ दिन में 2 बार सेवन करने से बवासीर, कोढ़ और पीलिया का रोग ठीक हो जाता है।
बवासीर: मट्ठा (छाछ, तक्र) के साथ गिलोय का चूर्ण 1 चम्मच की मात्रा में दिन में सुबह और शाम लेने से बवासीर में लाभ मिलता है। 20 ग्राम हरड़, गिलोय, धनिया को लेकर मिला लें तथा इसे 5 किलोग्राम पानी में पकाएं जब इसका चौथाई भाग बाकी रह तब इसमें गुड़ डालकर मिला दें और फिर इसे सुबह-शाम सेवन करें इससे सभी प्रकार की बवासीर ठीक हो जाती है।
मूत्रकृच्छ (पेशाब करने में कष्ट या जलन): गिलोय का रस वृक्कों (गुर्दे) क्रिया को तेज करके पेशाब की मात्रा को बढ़ाकर इसकी रुकावट को दूर करता है। वात विकृति से उत्पन्न मूत्रकृच्छ (पेशाब में जलन) रोग में भी गिलोय का रस लाभकारी है।
रक्तप्रदर: गिलोय के रस का सेवन करने से रक्तप्रदर में बहुत लाभ मिलता है।
चेहरे के दाग-धब्बे: गिलोय की बेल पर लगे फलों को पीसकर चेहरे पर मलने से चेहरे के मुंहासे, फोड़े-फुंसियां और झाइयां दूर हो जाती है।
सफेद दाग : सफेद दाग के रोग में 10 से 20 मिलीलीटर गिलोय के रस को रोजाना 2-3 बार कुछ महीनों तक सफेद दाग के स्थान पर लगाने से लाभ मिलता है।
पेट के रोग : 18 ग्राम ताजी गिलोय, 2 ग्राम अजमोद और छोटी पीपल, 2 नीम की सींकों को पीसकर 250 मिलीलीटर पानी के साथ मिट्टी के बर्तन में फूलने के लिए रात के समय रख दें तथा सुबह उसे छानकर रोगी को रोजाना 15 से 30 दिन तक पिलाने से पेट के सभी रोगों में आराम मिलता है।

जोड़ों के दर्द (गठिया) : गिलोय के 2-4 ग्राम का चूर्ण, दूध के साथ दिन में 2 से 3 बार सेवन करने से गठिया रोग ठीक हो जाता है।
वातज्वर: गम्भारी, बिल्व, अरणी, श्योनाक (सोनापाठा), तथा पाढ़ल इनके जड़ की छाल तथा गिलोय, आंवला, धनियां ये सभी बराबर मात्रा में लेकर काढ़ा बना लें। इसमें से 20-30 ग्राम काढ़े को दिन में 2 बार सेवन करने से वातज्वर ठीक हो जाता है।
शीतपित्त (खूनी पित्त): 10 से 20 ग्राम गिलोय के रस में बावची को पीसकर लेप बना लें।

इस लेप को खूनी पित्त के दानों पर लगाने तथा मालिश करने से शीतपित्त का रोग ठीक हो जाता है।
जीर्णज्वर (पुराने बुखार): जीर्ण ज्वर या 6 दिन से भी अधिक समय से चला आ रहा बुखार व न ठीक होने वाले बुखार की अवस्था में उपचार करने के लिए 40 ग्राम गिलोय को अच्छी तरह से पीसकर, मिटटी के बर्तन में 250 मिलीलीटर पानी में मिलाकर रात भर ढककर रख दें और सुबह के समय इसे मसलकर छानकर पी लें। इस रस को रोजाना दिन में 3 बार लगभग 20 ग्राम की मात्रा में पीने से लाभ मिलता है। 20 मिलीलीटर गिलोय के रस में 1 ग्राम पिप्पली तथा 1 चम्मच शहद मिलाकर सुबह-शाम सेवन करने से जीर्णज्वर, कफ, प्लीहारोग (तिल्ली), खांसी और अरुचि (भोजन का अच्छा न लगना) आदि रोग ठीक हो जाते हैं।
वमन: गिलोय का रस और मिश्री को मिलाकर 2-2 चम्मच रोजाना 3 बार पीने से वमन (उल्टी) आना बंद हो जाती है। गिलोय का काढ़ा बनाकर ठण्डा करके पीने से उल्टी होना बंद हो जाती है।
पेचिश (संग्रहणी): 20 ग्राम पुनर्नवा, कटुकी, गिलोय, नीम की छाल, पटोलपत्र, सोंठ, दारुहल्दी, हरड़ आदि को 320 मिलीलीटर पानी में मिलाकर इसे उबाले जब यह 80 ग्राम बच जाए तो इस काढ़े को 20 ग्राम की मात्रा में सुबह-शाम पीने से पेचिश ठीक हो जाती है।

1 लीटर गिलोय रस का, तना 250 ग्राम इसके चूर्ण को 4 लीटर दूध और 1 किलोग्राम भैंस के घी में मिलाकर इसे हल्की आग पर पकाएं जब यह 1 किलोग्राम के बराबर बच जाए तब इसे छान लें। इसमें से 10 ग्राम की मात्रा को 4 गुने गाय के दूध में मिलाकर सुबह-शाम पीने से पेचिश रोग ठीक हो जाता है तथा इससे पीलिया एवं हलीमक रोग ठीक हो सकता है।
नेत्रविकार (आंखों की बीमारी): लगभग 11 ग्राम गिलोय के रस में 1-1 ग्राम शहद और सेंधानमक मिलाकर, इसे खूब अच्छी तरह से गर्म करें और फिर इसे ठण्डा करके आंखो में लगाने से आंखों के कई प्रकार के रोग ठीक हो जाते हैं। इसके प्रयोग से पिल्ल, बवासीर, खुजली, लिंगनाश एवं शुक्ल तथा कृष्ण पटल आदि रोग भी ठीक हो जाते हैं। गिलोय के रस में त्रिफला को मिलाकर काढ़ा बना लें।

इसे पीपल के चूर्ण और शहद के साथ सुबह-शाम सेवन करने से आंखों की रोशनी बढ़ जाती है तथा और भी आंखों से सम्बंधित कई प्रकार के रोग दूर हो जाते हैं।
क्षय (टी.बी.): गिलोय, कालीमिर्च, वंशलोचन, इलायची आदि को बराबर मात्रा में लेकर मिला लें। इसमें से 1-1 चम्मच की मात्रा में 1 कप दूध के साथ कुछ हफ्तों तक रोजाना सेवन करने से क्षय रोग दूर हो जाता है। कालीमिर्च, गिलोय का बारीक चूर्ण, छोटी इलायची के दाने, असली वंशलोचन और भिलावा समान भाग कूट-पीसकर कपड़े से छान लें। इसमें से 130 मिलीग्राम की मात्रा मक्खन या मलाई में मिलाकर दिन में 3 बार सेवन करने से टी.बी. रोग ठीक हो जाता है।
वातरक्त: गिलोय के 5-10 मिलीमीटर रस अथवा 3-6 ग्राम चूर्ण या 10-20 ग्राम कल्क अथवा 40-60 ग्राम काढ़े को प्रतिदिन निरन्तर कुछ समय तक सेवन करने से रोगी वातरक्त से मुक्त हो जाता है।
खूनी कैंसर: रक्त कैंसर से पीड़ित रोगी को गिलोय के रस में जवाखार मिलाकर सेवन कराने से उसका रक्तकैंसर ठीक हो जाता है।

गिलोय लगभग 2 फुट लम्बी तथा एक अंगुली जितनी मोटी, 10 ग्राम गेहूं की हरी पत्तियां लेकर थोड़ा सा पानी मिलाकर पीस लें फिर इसे कपड़े में रखकर निचोड़कर रस निकला लें। इस रस की एक कप की मात्रा खाली पेट सेवन करें इससे लाभ मिलेगा।
आन्त्रिक (आंतों) के बुखार: 5 ग्राम गिलोय का रस को थोड़े से शहद के साथ मिलाकर चाटने से आन्त्रिक बुखार ठीक हो जाता है। गिलोय का काढ़ा भी शहद के साथ मिलाकर पीना लाभकारी है।
अजीर्ण (असाध्य) ज्वर: गिलोय, छोटी पीपल, सोंठ, नागरमोथा तथा चिरायता इन सबा को पीसकर काढ़ा बना लें। इस काढ़े को पीने से अजीर्णजनित बुखार कम होता है।
पौरुष शक्ति : गिलोय, बड़ा गोखरू और आंवला सभी बराबर मात्रा में लेकर कूट-पीसकर चूर्ण बना लें।

इसमें से 5 ग्राम चूर्ण प्रतिदिन मिश्री और घी के साथ खाने से पौरूष शक्ति में वृद्धि होती है।
वात-कफ ज्वर: वात के बुखार होने के 7 वें दिन की अवस्था में गिलोय, पीपरामूल, सोंठ और इन्द्रजौ को मिलाकर काढ़ा बनाकर पीने से लाभ मिलता है।
दमा (श्वास का रोग): गिलोय की जड़ की छाल को पीसकर मट्ठे के साथ लेने से श्वास-रोग ठीक हो जाता है। 6 ग्राम गिलोय का रस, 2 ग्राम इलायची और 1 ग्राम की मात्रा में वंशलोचन शहद में मिलाकर खाने से क्षय और श्वास-रोग ठीक हो जाता है।
मलेरिया बुखार: गिलोय 5 अंगुल लम्बा टुकड़ा और 15 कालीमिर्च को मिलाकर कुटकर 250 मिलीलीटर पानी में डालकर उबाल लें। जब यह 58 ग्राम बच जाए तो इसका सेवन करें इससे मलेरिया बुखार की अवस्था में लाभ मिलेगा।
बुखार: गिलोय 6 ग्राम, धनिया 6 ग्राम, नीम की छाल 6 ग्राम, पद्याख 6 ग्राम और लाल चंदन 6 ग्राम इन सब को मिलाकर काढ़ा बना लें। इस बने हुए काढ़े को सुबह और शाम पीते रहने से हर प्रकार का बुखार ठीक हो जाता है।
कफ व खांसी: गिलोय को शहद के साथ चाटने से कफ विकार दूर हो जाता है।
जीभ और मुंख का सूखापन:- गिलोय (गुरुच) का रस 10 मिलीलीटर से 20 मिलीलीटर की मात्रा शहद के साथ मिलाकर खायें फिर जीरा तथा मिश्री का शर्बत पीयें।

इससे गले में जलन के कारण होने वाले मुंह का सूखापन दूर होता है।
जीभ की प्रदाह और सूजन: गिलोय, पीपल, तथा रसौत का काढ़ा बनाकर इससे गरारे करने से आराm मिलता है

Friday, 10 July 2026

भाषा का तिरस्कार

मैं जब-जब भाषा के उच्चतम मानक से गिरा हूँ तब-तब ग्लानिबोध से भरा हूँ क्योंकि दुःख के दिनों में मैंने नहीं चुना नस काटना या देह पर केरोसिन डालना। मैंने वरण किया “लिखना” और विषाद में मैंने ब्रह्म की भांति शब्दों को बरता है।

भाषा ने बचा लिया मेरा अस्तित्व उन दुर्दिन दिनों में जब कोई नहीं था मेरे साथ उस समय भाषा मेरे साथ थी।
सस्ती लोकप्रियता के मोह में उतर जाता हूँ कभी-कभी भदेस पर लेकिन जब भी एकांत में करता हूँ आत्मावलोकन तो ग्लानि व क्षोभ से भर उठता हूँ।

दुःख के दिनों में मेरी भाषा सजीव हो उठी थी और अब सस्ती लफ्फाजियों में कहीं खो सी गई है। सस्ती व फूहड़ चुटकुलेबाजी आपको थोड़ी देर खुश तो कर सकती है लेकिन असल आनन्द, सुख व तोष का अनुभव तो आपको भाषा के परिष्कृत, संस्कारित, प्रांजल व उच्चतम मानदंडों का पालन करके ही मिलता है।

खैर! सच तो ये है कि भाषा का तिरस्कार एक तरह से ईश्वर का तिरस्कार है क्योंकि ईश्वर की भांति भाषा आपको दुःखों से उबार लेती है, एक सहारा देती है और पीठ थपथपाती है।

#आत्मचिंतन

ब्राह्मण शूद्र

अभी स्कन्द पुराण को पढ़ रहा था। इसके आरंभिक अध्याय में जो शिवपूजन की महिमा बताई गई है, उसमें कहा गया है कि : 

“जो निरन्तर शिवजी की पूजामें संलग्न रहते हैं, मनमें दृढ़ विश्वास रखकर सम्पूर्ण विश्वको शिवके रूपमें देखते हैं, उत्तम बुद्धिका आश्रय ले सदाचारका पालन करते तथा अपने वर्ण-धर्म और आश्रम-धर्ममें स्थित रहते हैं, वे ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र तथा कोई भी क्यों न हों, भगवान् शिवके परम प्रिय होते हैं। चाण्डाल हो या सर्वश्रेष्ठ ब्राह्मण, भजन करनेपर सभी भगवान् शंकरको अत्यन्त प्रिय लगते हैं।”

इसे मि श न - पोषित या हार्वर्ड पोषित या वामपंथी मानस में डाल दो तो वह भड़कायेगा कि यही तो भारतीय ब्राह्मणवादी व्यवस्था की सबसे परिष्कृत वैचारिक चाल है। ऊपर से यह घोषणा करता है कि 'चाण्डाल और ब्राह्मण दोनों शिव को समान प्रिय हैं', किन्तु उसी वाक्य में पहले यह भी सुनिश्चित कर देता है कि हर व्यक्ति 'अपने वर्ण-धर्म और आश्रम-धर्म में स्थित रहे।'

यदि सचमुच चाण्डाल और ब्राह्मण समान हैं, तो फिर चाण्डाल को चाण्डाल ही क्यों रहने दिया जा रहा है? उसे ब्राह्मण बनने का अधिकार क्यों नहीं? उसे वेद पढ़ने, यज्ञ कराने, मंदिर का महन्त बनने, सामाजिक नेतृत्व करने का अधिकार कहाँ है?

लेकिन धर्म यहाँ विद्रोह नहीं पैदा करता, समर्पण पैदा करता है। यदि कोई शूद्र अपनी जाति छोड़कर ज्ञान-सत्ता में प्रवेश करना चाहे, तो उसे नहीं कहा गया कि व्यवस्था बदलो; उसे कहा गया कि अपने वर्ण में रहकर भक्ति करो।

'चाण्डाल भी शिव को प्रिय है'—यह वाक्य पहली दृष्टि में उदार लगता है, किन्तु ध्यान दीजिए कि यह सामाजिक नहीं, केवल धार्मिक समावेशन है। यह नागरिक समानता नहीं देता; केवल आध्यात्मिक सांत्वना देता है।

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अब यह पूरी आलोचना एक ऐसे पूर्वग्रह पर टिकी है कि मनुष्य का अंतिम सत्य आर्थिक और सामाजिक संबंध हैं। इसलिए ये हर ग्रंथ को केवल सत्ता, वर्ग और वर्चस्व के दस्तावेज़ के रूप में पढ़ते हैं। किंतु सनातन दर्शन का आरंभ ही इस मान्यता से नहीं होता।

इनका पहला भ्रम यह है कि 'वर्ण' को आपने केवल 'विशेषाधिकार' (privilege) मान लिया है, जबकि शास्त्रों में उसका मूल विचार 'कर्तव्य' (duty) है। इसीलिए इस वाक्य में अधिकारों की नहीं, 'स्वधर्म में स्थित रहने' की बात कही गई है। यहाँ वर्ण किसी के शोषण का लाइसेंस नहीं, बल्कि उत्तरदायित्व का विधान है।

दूसरा भ्रम इससे भी बड़ा है।

आप कहते हैं कि 'यदि चाण्डाल शिव को प्रिय है तो वह ब्राह्मण क्यों नहीं बन जाता?'
सनातन दर्शन प्रत्युत्तर देता है—प्रश्न ही गलत है।

ब्राह्मण होना कोई सामाजिक प्रमोशन नहीं है। यदि ब्राह्मण होना केवल उच्च वेतनमान वाली सरकारी नौकरी की तरह है, तब आपका प्रश्न उचित है। परंतु शास्त्र में ब्राह्मण होना सबसे पहले सबसे कठिन अनुशासन है—त्याग, तप, स्वाध्याय, संयम, सत्य और आत्मनिग्रह का दायित्व। यह कोई 'प्रिविलेज' नहीं, एक कठोर व्रत है।

आप पूरी व्यवस्था को आधुनिक शक्ति-सिद्धांत (power theory) से पढ़ रहे हैं, जबकि यह ग्रंथ धर्म-सिद्धांत (dharma theory) में लिखा गया है।

तीसरा भ्रम यह है कि आप आध्यात्मिक समानता को 'सांत्वना' कहकर खारिज कर देते हैं।

परन्तु इतिहास में किसी भी स्थायी सामाजिक परिवर्तन का स्रोत पहले मनुष्य की चेतना में आया है।

यदि किसी सभ्यता में पहली बार यह घोषणा होती है कि 'चाण्डाल और ब्राह्मण दोनों ईश्वर को समान प्रिय हैं', तो यह सत्ता की घोषणा नहीं है; सत्ता की वैधता पर पहला प्रहार है।
क्योंकि यदि ईश्वर की दृष्टि में दोनों समान हैं, तो मनुष्य की दृष्टि में असमानता को अनंत काल तक वैध नहीं ठहराया जा सकता।

आप इसे व्यवस्था की रक्षा समझ रहे हैं; वास्तव में यह व्यवस्था के भीतर रखा गया ऐसा आध्यात्मिक विस्फोटक है, जो धीरे-धीरे बाहरी संरचनाओं को भी बदल देता है।
भक्ति आंदोलन इसी बीज से निकला। नन्दनार, रविदास, चोखामेला, कनकदास, कबीर—इन सबने इसी आध्यात्मिक समता को सामाजिक भाषा दी। यदि मूल ग्रंथों में यह बीज ही न होता, तो ऐसी परंपराएँ किस आधार पर विकसित होतीं?

आप कहते हैं कि धर्म विद्रोह को भक्ति में बदल देता है।
सनातन कहता है—भक्ति ही सबसे गहरा विद्रोह है।

जिस दिन चाण्डाल यह जान लेता है कि स्वयं महादेव उसे ब्राह्मण जितना ही प्रिय मानते हैं, उसी दिन सामाजिक अपमान की आध्यात्मिक वैधता समाप्त हो जाती है। उसके आत्मसम्मान का स्रोत समाज नहीं, शिव हो जाते हैं।यह परिवर्तन केवल राजनीतिक क्रांति से कहीं अधिक गहरा है।

आपकी दृष्टि में सत्ता ऊपर से नीचे आती है।
सनातन की दृष्टि में सत्ता भीतर से बाहर जाती है।

जब मनुष्य स्वयं को शिवस्वरूप देख लेता है, तब उसके सामने कोई भी सामाजिक भय स्थायी नहीं रह सकता।

आप ग्राम्शी का 'हेजेमनी' पढ़ते हैं; उपनिषद् 'अहं ब्रह्मास्मि' पढ़ाते हैं।

आप मार्क्स का 'वर्ग-संघर्ष' देखते हैं; गीता 'समदर्शित्व' की बात करती है।

आपका लक्ष्य सत्ता का पुनर्वितरण है।
सनातन का लक्ष्य अहंकार का विसर्जन है।

और यही दोनों परंपराओं का सबसे बड़ा दार्शनिक अंतर है।

सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि आपने इस वाक्य का सबसे क्रांतिकारी अंश देखा ही नही

'सम्पूर्ण विश्व को शिवरूप में देखना।'

यह कथन केवल समानता (equality) नहीं देता; यह अस्तित्वगत अभेद (ontological non-duality) की घोषणा करता है।

मार्क्सवाद मनुष्यों को समान बनाना चाहता है।
शैव दर्शन कहता है—वे मूलतः कभी असमान थे ही नहीं।

मार्क्सवाद सामाजिक संरचना बदलता है।
शैव दर्शन अस्तित्व की अनुभूति बदलता है।
एक बाहर से भीतर आता है; दूसरा भीतर से बाहर।

इसलिए यह कहना कि यह श्लोक केवल व्यवस्था-संरक्षक है, उसके आध्यात्मिक आशय को सामाजिक श्रेणियों तक सीमित कर देना है। यह वैसा ही है जैसे कोई संगीत-रचना को केवल कागज़ पर लिखी स्याही मान ले और ध्वनि, लय तथा अनुभूति को अप्रासंगिक घोषित कर दे।

नीत्शे

नीत्शे का यह उद्धरण पहली नज़र में अकेलेपन की बात करता हुआ लगता है, लेकिन वास्तव में यह मनुष्य की चेतना, सत्य और अस्तित्व की सबसे गहरी त्रासदी की ओर संकेत करता है। 

"True loneliness does not begin in the absence of people, but in the moment a man sees through every mask and can no longer pretend."

अर्थात सच्चा अकेलापन तब शुरू नहीं होता जब हमारे आसपास लोग नहीं होते, बल्कि तब शुरू होता है जब मनुष्य हर मुखौटे के पार देखना सीख जाता है और स्वयं भी दिखावा करना छोड़ देता है।

सामान्य रूप से हम अकेलेपन को लोगों की अनुपस्थिति से जोड़ते हैं। हमें लगता है कि यदि परिवार, मित्र, प्रेम या समाज हमारे साथ हो तो हम अकेले नहीं होंगे। लेकिन नीत्शे का कहना इससे बिल्कुल अलग है। उनके अनुसार सबसे बड़ा अकेलापन भीड़ के बीच पैदा होता है। यह वह क्षण होता है जब व्यक्ति समझ जाता है कि अधिकांश संबंध सुविधा पर टिके हैं, अधिकांश मुस्कानें औपचारिक हैं, अधिकांश नैतिकताएँ समाज द्वारा थोपी गई हैं, और अधिकांश लोग अपने वास्तविक स्वरूप में नहीं बल्कि मुखौटों के साथ जी रहे हैं। कोई सफलता का मुखौटा पहनता है, कोई धार्मिकता का, कोई प्रेम का, कोई विनम्रता का और कोई शक्ति का। धीरे-धीरे मनुष्य देखता है कि दुनिया का बड़ा हिस्सा अभिनय कर रहा है। यह समझ जितनी गहरी होती जाती है, उतना ही वो भीतर समाज से अलग होने लगता है।

लेकिन नीत्शे केवल दूसरों के मुखौटों की बात नहीं कर रहे। सबसे कठिन क्षण वह होता है जब व्यक्ति अपने ही चेहरे पर लगे मुखौटे को पहचान लेता है। वह देखता है कि उसने भी वर्षों तक समाज को खुश करने के लिए एक कृत्रिम व्यक्तित्व बनाया था। उसने वही बनने की कोशिश की जो लोग उससे चाहते थे। उसने अपने वास्तविक विचारों, इच्छाओं, भय और सपनों को छिपाकर रखा ताकि उसे स्वीकार किया जा सके। जब यह भ्रम टूटता है, तब पहली बार उसका सामना अपने वास्तविक अस्तित्व से होता है। यही वह क्षण है जहाँ अस्तित्ववादी दर्शन आरंभ होता है।

अस्तित्ववाद कहता है कि मनुष्य पहले अस्तित्व में आता है और फिर अपने अर्थ का निर्माण करता है। दुनिया उसे कोई निश्चित उद्देश्य नहीं देती। कोई अंतिम उत्तर पहले से तैयार नहीं होता। इसलिए मनुष्य को अपने जीवन का अर्थ स्वयं बनाना पड़ता है। लेकिन अधिकांश लोग इस स्वतंत्रता से डरते हैं। वे समाज, धर्म, परंपरा या भीड़ द्वारा दिए गए तैयार उत्तरों में शरण लेते हैं। इससे जीवन आसान लगता है क्योंकि तब स्वयं सोचने की ज़िम्मेदारी समाप्त हो जाती है। परंतु जो व्यक्ति स्वयं प्रश्न पूछता है, स्वयं सत्य खोजता है और हर भ्रम की परत हटाने लगता है, वह धीरे-धीरे भीड़ से अलग हो जाता है।

यहीं से सच्चा अकेलापन जन्म लेता है। यह अकेलापन कमरे में अकेले बैठने का नहीं, बल्कि चेतना का अकेलापन है। अब वह पहले जैसी बातचीत नहीं कर सकता क्योंकि उसे शब्दों के पीछे छिपे स्वार्थ दिखाई देने लगते हैं। वह पहले जैसी प्रशंसा स्वीकार नहीं कर सकता क्योंकि उसे उसमें अपेक्षाएँ दिखाई देती हैं। वह पहले जैसी मान्यताओं पर विश्वास नहीं कर सकता क्योंकि उसने उनके भीतर के विरोधाभास देख लिए हैं। उसकी आँखें खुल चुकी हैं, और जो एक बार सच देख लेता है, उसके लिए पुराने भ्रमों में लौटना लगभग असंभव हो जाता है।

नीत्शे के विचारों में यह स्थिति "ऊँचे मनुष्य" की यात्रा का हिस्सा है। जो व्यक्ति सामान्य चेतना से ऊपर उठने की कोशिश करता है, उसे भीड़ की स्वीकृति नहीं मिलती। वह अक्सर गलत समझा जाता है, उसका उपहास किया जाता है, या उससे दूरी बना ली जाती है। क्योंकि सत्य हमेशा आरामदायक नहीं होता। सत्य मनुष्य से उसका भ्रम छीन लेता है, और अधिकांश लोग भ्रम खोना नहीं चाहते। इसलिए सत्य देखने वाला व्यक्ति अक्सर अकेला रह जाता है।

यहाँ एक और गहरी बात छिपी है। नीत्शे कहते हैं कि जब व्यक्ति दिखावा करना छोड़ देता है, तभी उसका वास्तविक जीवन शुरू होता है। अब वह केवल इसलिए मुस्कुराता नहीं क्योंकि समाज उससे मुस्कुराने की अपेक्षा करता है। अब वह केवल इसलिए किसी विचार को स्वीकार नहीं करता क्योंकि बहुमत उसे सही मानता है। अब वह केवल इसलिए प्रेम नहीं करता क्योंकि अकेले रहने से डरता है। वह अपने हर निर्णय की ज़िम्मेदारी स्वयं लेने लगता है। यही स्वतंत्रता है, और यही स्वतंत्रता सबसे भारी बोझ भी है।

अस्तित्ववादी दार्शनिकों ने बार-बार कहा कि स्वतंत्रता और अकेलापन एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। जब तक कोई व्यक्ति भीड़ के अनुसार जीता है, तब तक उसे अकेलापन कम महसूस होता है क्योंकि भीड़ उसे पहचान देती है। लेकिन जैसे ही वह स्वयं के अनुसार जीना शुरू करता है, वह भीड़ से दूर होने लगता है। अब उसकी पहचान बाहर से नहीं, भीतर से आती है। यही कारण है कि गहरे विचारक अक्सर अकेले दिखाई देते हैं। उनका अकेलापन लोगों की कमी नहीं, बल्कि चेतना की गहराई का परिणाम होता है।

यह उद्धरण हमें यह भी सिखाता है कि हर मुखौटा हटाना सुखद अनुभव नहीं होता। सच कभी-कभी बहुत कठोर होता है। जब भ्रम टूटते हैं, तब व्यक्ति शून्यता का अनुभव करता है। उसे लगता है कि जिन चीज़ों पर उसने भरोसा किया था, वे स्थायी नहीं थीं। जिन लोगों को वह पूरी तरह समझता था, वे भी अपने-अपने अभिनय में बंधे हुए थे। और सबसे बड़ा झटका तब लगता है जब वह स्वयं को भी एक अभिनय करते हुए पकड़ लेता है। यह पीड़ा आवश्यक है, क्योंकि इसी से वास्तविक आत्मबोध जन्म लेता है।

नीत्शे के अनुसार जीवन का उद्देश्य आराम नहीं, बल्कि आत्म-विकास है। जो व्यक्ति सत्य के कारण अकेला पड़ जाता है, वह वास्तव में एक गहरी आंतरिक यात्रा पर निकल चुका होता है। उसका अकेलापन उसकी हार नहीं, बल्कि उसके जागरण की कीमत है। वह अब बाहरी स्वीकृति की बजाय अपने अंतःकरण के साथ जीना सीखता है। धीरे-धीरे वह समझता है कि सच्ची शक्ति भीड़ में घुल जाने से नहीं, बल्कि अपने सत्य के साथ खड़े रहने से आती है।

अंततः यह उद्धरण हमें एक कठिन लेकिन मुक्त करने वाला सत्य देता है। सच्चा अकेलापन लोगों की कमी से नहीं, बल्कि चेतना के जागरण से जन्म लेता है। जब मनुष्य हर मुखौटे के आर-पार देख लेता है, जब वह स्वयं भी अभिनय करने से इनकार कर देता है, तब उसका पुराना संसार समाप्त हो जाता है। उस क्षण वह बाहर से अकेला दिखाई दे सकता है, लेकिन भीतर पहली बार वह अपने वास्तविक अस्तित्व के साथ खड़ा होता है। यही अस्तित्ववादी दर्शन का मूल है—मनुष्य को भ्रमों में नहीं, बल्कि सत्य में जीना चाहिए, चाहे उस सत्य की कीमत गहरा अकेलापन ही क्यों न हो। क्योंकि वही अकेलापन अंततः आत्म-ज्ञान, प्रामाणिकता और वास्तविक स्वतंत्रता का द्वार बन जाता है।

🙏🙏 आदरणीय अजय तिवारी जी के पटल से साभार।

वेदार्थसाधन के कई नैरुक्त प्रकार होते हैं।

☹️एक सर्वज्ञ पाणिनि की पोस्ट और कमेण्ट में ''व्विज्ज्यं धनु:'' के विजयार्थ (भङ्गार्थ-भाँग) पर विपत्तियाँ बरस रही हैं। 

🔥ज्ञातव्य- वेदार्थसाधन के कई नैरुक्त प्रकार होते हैं। निरुक्त में "ऋचस्त्रिविधा:" कहकर "परोक्षकृता: प्रत्यक्षकृता आध्यात्मिक्यश्च" से वेदार्थ के त्रैविध्य का प्रतिपादन किया गया है। पुन: इन तीनों वेदार्थवृत्तियों के कई अवान्तर भेद भी हैं। वेदार्थ करने के लिए व्याकरण-कोशादि के साथ विनियोगज्ञान की आवश्यकता होती है। विनियोग में मन्त्र के ऋषि, छन्द, देवता और कर्मप्रयोग का बोध होता है। तदनन्तर ही अर्थवत्ता की तात्पर्यसिद्धि होती है- "ऋषिच्छन्दोsथ दैवत्यं विनियोगस्तथैव च। मन्त्रजिज्ञासमानानां वेदितव्यं पदे पदे।।" विनियोगज्ञान के बिना वेदार्थ की स्वल्पसिद्धि भी सम्भव नहीं। व्यापक विनियोगज्ञान के अभाव में "गणानान्त्वा" मन्त्र अश्वस्तावक बन कर रह जायगा; गणपतिस्तावक नहीं हो सकता। "शन्नो देवी" मन्त्र जलस्तावक तो रहेगा शनिग्रहस्तावक नहीं हो सकता। 

🔥नैरुक्त निर्वचनसिद्धान्त के अनुसार "अक्षरवर्णसामान्यान्निर्ब्रूयात्" वर्णसामान्य के साम्य से मन्त्र का विनियोग और विनियोगानुकूल अर्थ का निश्चय होता है। शाकपूणि ने और आगे बढ़कर "वर्णसाम्यान्निर्ब्रूते" कह दिया है; यानी दग्ध और अग्नि में गकार मात्र के साम्य से यथाप्रकरण वेदार्थ के लिए विनियोग की प्रवृत्ति हो जाती है। "दधिक्क्राव्व्ण:" में दधि शब्द के साम्य से "दधिस्नानादौ विनियोग:", "अक्क्षन्नमीमदन्त" में अक्ष के साम्य से "अक्षतार्पणे विनियोग:" आदि शास्त्रसिद्ध हैं। उसी प्रकार वैदिकसिद्धान्तों के मर्म्मज्ञ आप्त महानुभावों ने शिवार्चन में परम्परया "व्विज्ज्यं धनु:" का विजयास्नानादि में विनियोग किया है तो वह सर्वथा स्तुत्य और ग्राह्य है। आपकी गुरुपरम्परया तप:पूता वैदिकी मेधा हो तो तद्वत् ही वेदार्थ करने का प्रयास करें; सत्परम्परा पर प्रहार न करें। "वेदार्थस्यानन्त्यात्" वेद के अनन्त अर्थों की इयत्ता नहीं होती। पुन: अनावश्यक अत्यधिक वेदमन्त्रों को प्रसारित करते रहने वाले महाशय भी इस तप:साध्य वेदार्थप्रक्रिया पर ध्यान देते हुए फेसबुक के चौराहे पर वेदभगवान् को फेंकने से बचें। "बिभेत्यल्पश्रुताद्वेद:" को न भूलें एवम् आप वस्तुत: वेदभगवान् को किञ्चित् भी बोलना-समझना चाहते हैं तो "जपादौ नाधिकारोsस्ति सम्यक्पाठमजानत:। प्रातिशाख्यादिकं ज्ञेयं सम्यक्पाठस्य सिद्धये।।" पर चिन्तन करें। 

☹️ऐसे ही दो-चार सन्धि-विच्छेद रट लेने मात्र से वेदतुल्य श्रीमद्भागवतार्थ की सर्वार्थसिद्धि नहीं हो सकती। श्रीमद्भागवत के प्रथम पद्य में ही वेदान्त के "जन्माद्यस्य यत:" आदि मुख्यतम सूत्रचतुष्टय का व्याख्यान किया गया है और "मुह्यन्ति यत्सूरय:" कहकर वक्ता-श्रोताओं को सावधान भी कर दिया गया है। ध्यातव्य- पारमहंस्यसंहिता श्रीमद्भागवत में विद्यार्थियों की नहीं; "विद्यावतां भागवते परीक्षा" विद्यावानों की परीक्षा होती है। आप सच में सामर्थ्यवान् हैं तो श्रीमद्भागवत के प्रत्येक पद ही नहीं; प्रत्येक वर्ण में "शब्दात्मिका" भगवती श्रीराधा रानी का साक्षात्कार करें। सीतोपनिषत् में "प्रथमा शब्दमयी देवी" के अनुसार भगवती का प्रथम स्वरूप शब्दमय ही है। महाभागवत श्रीवंशीधरजी ने श्रीमद्भागवत के प्रथम श्लोक के सौ अर्थ किये हैं; जिनमें तीसवाँ अर्थ श्रीराधापरक ही है। बङ्गप्रदेश के महामहोपाध्याय श्रीपञ्चानन तर्करत्न भट्टाचार्यजी ने सम्पूर्ण ब्रह्मसूत्रों का शक्तिपरक भाष्य किया है। नैषधमहाकाव्यादि की भाष्यचमत्कृति से अचम्भित हुए बिना कोई विद्वान् रह नहीं सकते। "यथा प्रियङ्गुपत्रेषु गूढमारुण्यमिष्यते। श्रीमद्भागवते शास्त्रे राधिकातत्त्वमीदृशम्।।" जिस प्रकार प्रियङ्गुपत्रों के अण्वणु में आरुण्य है; परन्तु बाह्यचक्षुर्दृश्य नहीं होता। अपितु अङ्गुल्यादि के मर्द्दन से पत्राभ्यन्तर में प्रवेश करने की चेष्टा करते ही उनकी लालिमा प्रकट हो जाती है। उसी प्रकार श्रीमद्भागवत के बाह्य सन्धि-विच्छेदों से कृष्णप्राणेश्वरी श्रीराधा महारानी का साक्षात्कार सम्भव नहीं; परन्तु राधारमण श्रीकृष्ण का वाङ्मयविग्रह श्रीभागवतरूप भगवान् की आत्मा "आत्मा तु राधिका तस्य" भगवती राधिका श्रीमद्भागवत से पृथक् कैसे हो सकती हैं?। अत: प्रलापत्यागपूर्वक निश्छलबुद्ध्या भगवद्भागवतकृपया "यमेवैष वृणुते तेन लभ्य:" के लिए सदैव स्वेष्ट की आराधना-उपासना करते रहनी चाहिए...