Wednesday, 1 July 2026

चम्पु उपहास भाव का शब्द नहीं है

"चम्पु" - उपहास भाव का शब्द नहीं है, - संस्कृत‌ भाषा का सम्मानजनक शब्द है , क्या आप इस तथ्य को समझा सकते हैं?
मूल वर्तनी है चम्पू —

यह गद्यपद्यमय काव्य है, वह काव्यग्रंथ जिसमें गद्य के बीच बीच में पद्य भी हो, ऐसा नाटक या काव्य जिसका कुछ अंश गद्य में हो और कुछ अंश पद्य में लिखता हो।

सुन्दर, विचित्र के तात्पर्य में इसका अर्थ विस्तार हुआ है।

पहाड़ी धान्य विशेष ; गंगाजली को भी चम्पू कहते हैं।

बुन्देली भाषा में चम्पू लोटे के अर्थ में है।

'चम्प्' (चम्पिँ गत्यां गदने च) धातु को उ प्रत्यय लगाकर चम्पू शब्द रचा गया है।

बद्री नारायण ने लिखा है "कविता का छंद” में —

कोई उसे छंद में, कोई चम्पू गद्य में

कोई उसे सरस संगीत में कर रहा था आबद्ध

किन्तु चम्पू का वक्रोक्ति के रूप में यह अर्थ परिवर्तन इस शब्द से नहीं जुड़ा है। यह जुड़ा है चम्पी से!

चम्पी शब्द संस्कृत चपति से रचित है। जोकि चप् (चपँ सान्त्वने भ्वादिः परस्मैपदी सकर्मकः सेट् ; शान्त करना) धातु से रचित है। चम्पी शरीर को शान्त करने हलका करने की क्रिया है।

भारतीय संस्कृति में चम्पी केश प्रसाधन परम्परा का एक महत्वपूर्ण अङ्ग रही है। चम्पी करने के लिए सिर में अधिक तेल लगाकर मला जाता था। इससे सिर की त्वचा और केश दोनों का स्वास्थ्य सुधरता है। फिर इन तेल से सने केशों में कंघी की जाती थी तो केश कपाल से चिपके रहते थे।

भारतीय महानगरों में 1950 के दशक में भी “चम्पी तेल-मालिश” लोकप्रिय थी; और “प्यासा” (1958) में जॉनी वॉकर का चरित्र यही काम करता है; और “सर जो तेरा चकराए या दिल डूबा जाए” गीत में यह टेर भी सुनाई देगी।

वैसे, इसी चम्पी को पश्चिम ने कुछ परिवर्तन के साथ शैम्पू शब्द के रूप में केश प्रसाधन सामग्री के नाम के लिए अपनाया है। वैसे 1762 का शैम्पू शब्द का प्रथम उल्लेख मिलता है, जब इसे औषधीय तेलों की चम्पी के अर्थ में प्रयोग किया गया। लगभग सौ वर्ष उपरान्त इस शब्द का प्रयोग बालों को झागदार पदार्थ से धोने के अर्थ में प्रयोग किया जाने लगा; और फिर उस पदार्थ को शैम्पू कहने लगे।

फिर धीरे धीरे (लगभग 1950 के आसपास) पाश्चात्य संस्कृति का अनुकरण करने वाले लोगों ने इस प्रकार के केश विन्यास को गँवारू होने से जोड़ दिया। वैसे भी ऐसे केश विन्यास वाले अधिकांश व्यक्ति ग्रामीण परिवेश से थे। इस प्रकार के लोगों को चम्पू कहने का प्रचलन बन गया। जो सीधे, सज्जन, ग्रामीण व्यक्तियों के लिए वक्रोक्ति के रूप में प्रयोग किया जाने लगा; और फिर इसका पुरातनपन्थी के तात्पर्य में अर्थ विस्तार हुआ है। और शैम्पू करने वाले इस प्रकार चम्पी करने वाले चम्पू को अपमानित करने लगे।

वैसे आर्यसमाज के पण्डित चमूपति, जिनका मूल नाम था चम्पक राय, उन्हें भी अनेक लोग पण्डित चम्पू कहते हैं। उन्होंने अनेक पुस्तकें लिखीं, जिनमें से एक है "रंगीला रसूल” (1924)! तथापि, इस बात की क्षीण सम्भावना है कि उनके उपहास में चम्पू शब्द का वर्तमान प्रचलित अर्थ बना है। उनके उपनाम चमूपति के चमू का अर्थ सेना है; ऐसी सेना जिसमें 129 हाथी, इतने ही रथ, 2187 अश्वारोही, तथा 3685 पायिक‌ / पादभट (पैदल सैनिक) हों, उसका सेनापति चमूपति कहलाता है।

अशोक चक्रधर की "चौं रे चम्पू” और 'कुछ कर न चम्पू' में चम्पू भोला-भाला एक पढ़े-लिखे, समझदार, लेकिन व्यवस्था के सामने असहाय और निष्क्रिय मध्यवर्गीय बुद्धिजीवी के व्यक्तित्व पर तीखी वक्रोक्ति (कटाक्ष) है। जो परम्परा से बन्धा हुआ किसी भी प्रकार की आत्मरक्षात्मक प्रतिक्रिया भी नहीं कर पाता।

वैसे, चम्पू का अर्थ विस्तार होकर अब न केवल पुरातनपन्थी, अपितु, देश की राजनीति पर (पुरातनपन्थी) प्रभाव डालने वाले व्यक्ति, असहिष्णु और अंहकारी व्यक्ति, विशेष रूप से स्वयं को पीड़ित बताने वाले किन्तु किसी अन्य के मानवाधिकार न समझने वाले व्यक्ति के अर्थ तक में अर्थ विस्तार हो गया है।

यह संजय चतुर्वेदी की ग़ज़ल — चम्पू-चरित्तर-चंद्रिका नित हरण भवभय दारुणम् से स्पष्ट है। इस कविता का आनन्द लें। इस अर्थ में सम्भव है कि यह शब्द चम्प् धातु को शतृ प्रत्यय लगाकर रचा चम्पत् (गतिमान, चलता हुआ) अथवा कर्तरि लटलकार मध्यम पुरुष स्वरूप चम्पत (गए, ओझल हो गए) से रचा प्रतीत होता है। चम्पत होना — ओझल होना, चले जाना, लोप हो जाना के अर्थ में प्रयुक्त होने वाला शब्द है; और बहुधा चम्पत होने वाला व्यक्ति धोखाधड़ी कर चाल चलकर अन्तर्धान हो जाता है। जिस प्रकार प्यारे लगते व्यक्ति को प्यारु, लपकने वाले को लपकू, फैंकने वाले को फैंकू, कहते हैं; उसी प्रकार चपत लगा कर चम्पत होने वाले को चम्पू कहना एक सहज भाषाई वृत्ति है।

Saturday, 27 June 2026

भगवान जगन्नाथ और काष्ठ


जगत को चलाने वाले जगन्नाथ भले ही षडैश्वर्य गुण संपन्न हो, पर उनको  भी अपना ही घर चलाने में मैया याद आ जाती है। वैसे देखा जाए तो यह गृहस्थों के लिए एक सीख भी है कि गृह स्वामी को भीतर-बाहर काठ के कुंद की तरह धैर्य धारण करना पड़ता है। तभी गृहस्थी रूपी रथ आगे बढ़ता है।
भगवान मुरारी को काठ क्यों होना पड़ा, इसका रहस्य  पढ़िए। संस्कृत साहित्य में हास्य बोध उच्च कोटि का है,






भगवान हैं तो मनुष्य की चिंता करेंगे ही। करना भी चाहिए। किंतु उनके भक्त भी इस मामले में कम नहीं हैं। वे भगवान की चिंता करते हैं। खासी चिंता करते हैं।
ऐसे ही एक चिंता प्रवण भक्त जब जगन्नाथ जी के दर्शन को गये तो वह चिंता में पड़ गये है। उन्हें यह बात बड़ी विचित्र लगी कि ‘‘पुरुषsएवेदं सर्व्वं यद्भूतं यच्चं भाव्यम्’’ वाले भगवान आखिर काठ के कैसे हो सकते हैं? हो ना हो, इसके पीछे बहुत बड़ा कोई रहस्य है। 
चिंतन प्रवण भक्त ने चिंता शुरू कर दी । बहुत दिन तक चिंतन चला। अंत में उन्होंने सारा रहस्य ढूंढ मारा। वह रहस्य इस श्लोक में आबद्ध कर दिया:-

‘‘एका भार्या प्रखर मुखरा चंचला सा द्वितीया, एको पुत्र: त्रिभुवन विजयी मन्मथ दुर्निवार:
शेष: शैया, उदधि भवन: वाहन पन्निगार:, स्मारं स्मारं स्वगृहे चरितं दारू भूतो मुरारि।’’

इसका चलताऊ भाषा में मोटा-मोटी यह अनुवाद हो सकता है कि एक पत्नी बहुत बोलने वाली। दूसरी अति चंचला, कहीं टिकती ही नहीं। एक पुत्र है कामदेव है जिसको जीतना बहुत ही कठिन है और वह तीनों लोक को जीत लेता है। शेष नाग की शैया। ऊपर से गहरे सागर का निवास। वाहन है नागों के शत्रु गरूड़। भगवान की जरा सी दृष्टि चूके तो शैया और वाहन आपस में भिड़ जाए। बेचारे भगवान मुरारी अपने घर की चिंता कर करके काठ के हो गये हैं। 
सोचिए लोग अपने घर की जरा जरा सी परेशानियों से परेशान हो उठते हैं।

मुरारी बापू की पत्नी का मरण और उनके लिए सूतक

मुरारी बापू की पत्नी का मरण और उनके लिए सूतक 
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मुरारी बापू गुजरात प्रांत से वामपंथी विचारधारा में राम कथा कहने के लिए विश्व में विख्यात हैं।
अभी कुछ समय पहले उनकी पत्नी का निधन हो गया। उन्होंने तीन दिन के बाद काशी में कथा कहने के लिए गंगा में स्नान किया और बाबा विश्वनाथ का दर्शन भी किया ।
इसके साथ ही विद्वानों ,संतो और शंकराचार्य जी महाराज ने धर्म की मर्यादा का उल्लंघन देखकर उन्हें शास्त्र की मर्यादा का संदेश दिया।
मुरारी ने भी अपनी तीखी प्रक्रिया में क्षमा याचना की और सब पोल खोल देंगे कह कर सभी साधु संतों पर आक्रमण किया। अपने को निम्बार्काचार्य सम्प्रदाय का साधु घोषित करके कहा कि उन्हें सूतक नहीं लगता है।
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समाधान
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वेद, स्मृति और पुराण को मानने वाले सनातनी प्राणी के लिए मरणाशौच में दशगात्र विधान करना जरूरी है ।अन्यथा वह अपवित्र है और उसके हाथ का पानी पीना भी दोषपूर्ण है। अशौच में पड़ा हुआ व्यक्ति न तो किसी से पैर छुआ सकता है न किसी का पैर छू सकता है न किसी को प्रणाम कर सकता है।
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उनके सूतक का पालन न करने के लिए सभी आचार्यों ने तीखी प्रतिक्रिया की।
यहां राम कथा के माध्यम से मरणाशौच को समझिए।
महाराज दशरथ की मृत्यु के बाद भरत जी ने अपने पिता की वेद,पुराण,स्मृतियों के अनुसार विधियों का पालन किया।
सोधि सुमृति सब वेद पुराना।
कीन्ह भरत दसगात विधाना।।
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भये विशुद्ध दिए सब दाना।
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पितु हित भरत कीन्हि जस करनी।

इससे भरत जी की सूतक से निवृत्ति हो गई। अब भरत जी के निर्णय से सब राम जी को मनाने चित्रकूट पहुंच गये।
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जब राम जी ने सुना कि पिता जी सुरपुर चलेगये। बहुत दुखी होकर प्रथम दिन की तरह सूतक माना । जबकि भरत जी तो सब विधान पहले ही पूरे कर चुके थे।
व्रत निरम्बु तेहि दिन प्रभु कीन्हां।
मुनिहु कहें जलु काहु न लीन्हां।।
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करि पितु क्रिया वेद जस वरनी।
भे पुनीत पातक तम तरनी।।
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चित्रकूट में रहते हुए और भरत जी द्वारा सब क्रिया विधान पूरा करने पर भी...
शुद्ध भये दुई वासर बीते।
दो दिन बीत जाने के बाद तीसरे दिन अपने को शुद्ध माना।
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मुरारी जी राम कथा करते हैं।राम कथा सापेक्ष उनका चिंतन स्थिर रहता तो सूतक मान्य करते।उनकी कथा में वामपन्थ स्पष्ट रहता है। इसलिए उनका सूतक समाप्त नहीं हो सकता है। उन्होंने वेद विहित मार्ग का त्याग किया है। 
तजि श्रुति पन्थ वाम पथ चलिहीं।
वंचक विरचि वेष जगु छलहीं।
मुरारी बापू और उनके समर्थक श्रोता दोनों सनातन धर्म में वामपन्थ की प्रविष्टि के लिए सूतक के पात्र हैं।

श्राद्ध में खाने-खिलाने वाले सावधान मौन रहें

🦀श्राद्ध में खाने-खिलाने वाले सावधान- जो मृतपितरों के निमित्त एकोद्दिष्ट, पार्वण आदि में ब्राह्मणभोजन करते-कराते हैं; वे सावधान रहें। मरे हुए माता-पिता आदि के श्राद्धनिमित्तक भोजन में पितर तभी तृप्त होते हैं, जब भोज्यपदार्थों के गुणों को कहे विना मौन होकर भोजन किया जाय। मौन भोजनपर्यन्त ही ब्राह्मणरूप पितर भोजन करते हैं। मौन भोजन के अभाव में भोजन का सूक्ष्म तत्त्व पितरों तक पहुँचता नहीं। व्यर्थ बकवास करते हुए भोजन करनेवाले ब्राह्मणों के सप्तधातुओं में श्राद्धीयान्न का सूक्ष्म-स्थूलांश टिक जाता है, परिणामत: अतृप्त पितर उन अमौनभोजी ब्राह्मणों को भी विविध प्रकार से व्यथित करते रहते हैं। खाने-खिलाने वाले इस पर ध्यान नहीं दे सकते तो श्राद्धनिमित्तक खाना-खिलाना बन्द कर दें, अन्यथा वह श्राद्धान्न ही दोनों के तेज को खा जाएगा। आजकल हमारे समाज में भी एक गन्दी परिपाटी चल गयी है कि माँ-बाप की मृततिथि में चतुर्वर्णेतर मित्र एवं स्टाफों को समान पंक्ति में बैठा कर नियमबद्ध ब्राह्मणों की उपेक्षा करना चाहते हैं! ऐसा संक्रमित भोजन दोनों के पतन का कारण होता है। हमारे समाज में भी ऐसे घिनौने कृत्यों का बढ़ना दु:खद है। सार्ववर्णिक श्राद्धीय सहभोजन में बुफेलो सिस्टम या जूते पहने ही लाल कुर्सी-टेबल पर श्राद्धपार्टी मनाना बहुत व्यथाकर है। बन्धो! आप किसी को खिलाना चाहते हो तो उसे खिलाने की योग्यता अपनाओ; कोई तुम्हारी श्राद्धपार्टी के भरोसे नहीं जी रहा! आश्चर्य तो तब बढ़ जाता है जब उस असंस्कृत माहौल में भी कोई कुछ नियम पालन करना चाहते हैं तो ये ब्रह्मासुरसमूह उनकी खिल्ली उड़ाते हैं! सावधान! तुम अमुक को खिलाने में सक्षम नहीं हो; तो ब्राह्मण के नाम पर उन्हें खिलाना-बुलाना एकदम बन्द करो। तुम्हारे यहाँ एक ज़ूम की पार्टी कर भ्रष्ट होना आवश्यक नहीं!.




👺बान्धवो! बहुरूपियों को बहुत बखारिए परन्तु सनातन को सुसंरक्षित करने में हमी लोग काम आएँगे। हम्हीं लोग नमक-रोटी खाकर भी अन्तिम साँस तक सनातन को समृद्ध करते रहेंगे। मोहमाया के ब़ाज़ार में अमिथ्या कुछ नहीं!...

तिथि अनुसार आहार-विहार

तिथि अनुसार आहार-विहार
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प्रतिपदा को कूष्माण्ड(कुम्हड़ा, पेठा) न खाये, क्योंकि यह धन का नाश करने वाला है।

द्वितीया को बृहती (छोटा गन या कटेहरी) खाना निषिद्ध है।

तृतीया को परवल खाना शत्रुओं की वृद्धि करने वाला है।

चतुर्थी को मूली खाने से धन का नाश होता है।

पंचमी को बेल खाने से कलंक लगता है।

षष्ठी को नीम की पत्ती, फल या दातुन मुँह में डालने से नीच योनियों की प्राप्ति होती है।

सप्तमी को ताड़ का फल खाने से रोग बढ़ता है था शरीर का नाश होता है।

अष्टमी को नारियल का फल खाने से बुद्धि का नाश होता है।

नवमी को लौकी खाना गोमांस के समान त्याज्य है।

एकादशी को शिम्बी(सेम), 

द्वादशी को पूतिका(पोई) अथवा 

त्रयोदशी को बैंगन खाने से पुत्र का नाश होता है।
(ब्रह्मवैवर्त पुराण, ब्रह्म खंडः 27.29-34)

अमावस्या, पूर्णिमा, संक्रान्ति, चतुर्दशी और अष्टमी तिथि, रविवार, श्राद्ध और व्रत के दिन स्त्री-सहवास तथा तिल का तेल खाना और लगाना निषिद्ध है।
(ब्रह्मवैवर्त पुराण, ब्रह्म खंडः 27.29-38)

रविवार के दिन मसूर की दाल, अदरक और लाल रंग का साग नहीं खाना चाहिए।(ब्रह्मवैवर्त पुराण, श्रीकृष्ण खंडः 75.90)

सूर्यास्त के बाद कोई भी तिलयुक्त पदार्थ नहीं खाना चाहिए। (मनु स्मृतिः 4.75)

लक्ष्मी की इच्छा रखने वाले को रात में दही और सत्तू नहीं खाना चाहिए। यह नरक की प्राप्ति कराने वाला है।
(महाभारतः अनु. 104.93)

दूध के साथ नमक, दही, लहसुन, मूली, गुड़, तिल, नींबू, केला, पपीता आदि सभी प्रकार के फल, आइसक्रीम, तुलसी व अदरक का सेवन नहीं करना चाहिए। यह विरूद्ध आहार है।

दूध पीने के 2 घंटे पहले व बाद के अंतराल तक भोजन न करें। 

बुखार में दूध पीना साँप के जहर के समान है।

काटकर देर तक रखे हुए फल तथा कच्चे फल जैसे कि आम, अमरूद, पपीता आदि न खायें। 

फल भोजन के पहले खायें। रात को फल नहीं खाने चाहिए।

एक बार पकाया हुआ भोजन दुबारा गर्म करके खाने से शरीर में गाँठें बनती हैं, जिससे टयूमर की बीमारी हो सकती है।

अभक्ष्य-भक्षण करने (न खाने योग्य खाने) पर उससे उत्पन्न पाप के विनाश के लिए पाँच दिन तक गोमूत्र, गोमय, दूध, दही तथा घी का आहार करो।
(वसिष्ठ स्मृतिः 370) प्रश्न नहीं स्वध्याय करें ।।।

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भोजनपात्र में कुछ अन्नशेष बचाना चाहिए


भोजनपात्र में कुछ अन्नशेष बचाना चाहिए या पात्रों को धो-पोंछकर पी-चाट जाना चाहिए?

 धर्मशास्त्रों के अनुसार भोजनपात्र में किञ्चित् अन्नशेष बचाना चाहिए; बर्तनों को धो-पोंछकर पी-चाट जाना निषिद्ध है। कात्यायनभोजनसूत्रम् में स्पष्ट लिखा है- "न सर्वभोजी स्यात्किञ्चिद्भोज्यं परित्यजेदन्यत्र घृतपायसदधिसक्तुपललमधुभ्य:" भोजनपात्रस्थ अन्न को पोंछ-पाछकर सर्वग्रास नहीं कर जाना चाहिए। घृत, पायस, दधि, सक्तु, पलल और मधु से अतिरिक्त भोज्यपदार्थ को किञ्चित् बचा लेना चाहिए। नारदजी ने भी कहा है- "सर्वं सशेषमश्नीयाद्घृतपायसवर्जितम्।" 

🌸धर्मशास्त्रनियन्त्रित गृहस्थों की परम्परा में #उच्छिष्टभोजी पितृगण भी हैं, जिनके लिए भोजनपात्र में बचे हुए उच्छिष्ट अन्न ही ग्राह्य होते हैं; तदर्थ चित्राहुति के रूप में- "मद्भुक्तोच्छिष्टशेषं ये भुञ्जन्ति पितरोsधमा:। तेषामन्नं मया दत्तमक्षय्यमुपतिष्ठतु।।" बदरीफलप्रमाण उच्छिष्टान्न ही देने का विधान है। देवल ने भी यही बात कही है- "भुक्तोच्छिष्टं समाघ्राय सर्वेभ्यो घृतवर्ज्जितम्। उच्छिष्टभागधेयेभ्य: सोदकं निर्वपेद्भुवि।।" पुन: भोजनपात्र में बचे शेषान्न अथवा चित्राहुति वाला अन्न लेकर कौओं को खिलाये। भोजनान्त में ही "श्वानौ द्वौ श्यावशवलौ वैवस्वतकुलोद्भवौ। ताभ्यामन्नं प्रदास्यामि स्यातामेतावहिंसकौ।।" से श्वानबलि देने का विधान है। 

🌸धर्मनियन्त्रित समुदार गृहस्थों को उत्तममध्यमाधम मृतपितृगणों की भी चिन्ता रहती है, अत: उच्छिष्टभोजी पितरों के भाग को भी स्वयं खा-पचा जाना सही नहीं है। धार्मिकों के द्वारा यथासाध्य शास्त्राज्ञा का पालन करना चाहिए; अन्यथा अतृप्त और बली पितृगण को "अतर्पिता: पितरो देहाद्रुधिरं पिबन्ति" से कौन रोक सकता है??

रामायण फर्जी शम्बूक असली

शंभुक का वध श्री राम में किया पर राम जी काल्पनिक है शम्भूक वास्तविक है ! वाल्मीकि हमारा दलित है पर उसकी रामायण को हम नहीं मानते ! कृष्ण काल्पनिक है महाभारत काल्पनिक है पर उस महाभारत का एकलव्य दलित था उसपे अत्याचार हुए यह सच है यह क्या फ्रॉड देश में चल रहा है ?

चलो शम्बूक असली हो या नकली, अगर नियम है कि आप घर के कपडों में आप्रेशन थियेटर, ISRO के वैज्ञानिक और वर्जित क्षेत्र में नहीं,जा सकते तो आज भी अगर आप घुसने की कोशिश करो गे तो धक्के मार कर बाहर निकाल दिये जाओ गे, अरेस्ट तो हों गे ही, गोली भी मारी जा सकती है चाहे आप अपनो योग्यता और पहचान का बखान भी करते जाओ।
रामयाण की घटना में शाम्बूक वर्जित हथियारों और साधनाओं का प्राप्त कर के स्वर्ग में अपने भौतिक शरीर के साथ जाना चाहता था जोवचि विधान के अनुसार वृजित था। राम के समझाने के बाद भी वह अपनी जिद पर ही अडा रहा तब राम ने ऐक आदर्श और अनुशासन प्रिय राजा के कर्तव्य का पालन किया और उस का सिर काट दिया। झूठी सच्ची घटना पर किसी को मिर्ची लगती रहै तो वह भी समन्दर में छलांग लगा कर डूब मरे।