Friday, 28 August 2026

अंबेडकर का झूठ और शूद्र

लाल किताब है ज्योतिष निराली, जो किस्मत सोई को जगा देती है। और लाल किताब एक ऐसी किताब है आज के युग की, जिससे कि आप किसी भी समस्या का हल ले सकते हैं। हां, यह मैं नहीं सौ percent नहीं कह सकता। जो भी आपको सौ percent कहेगा कभी भी, वह झूठ बोलता होगा।

जो मैं सोचता हूं। तो तालीम, विद्या या education, यह बड़ी जरूरी है life में। तो बच्चे का या व्यक्ति जो भी हो तालीम क्योंकि कभी मुकम्मल नहीं होती। चाहे वह बचपन में है, चाहे वह जवानी में, चाहे बुढ़ापे में। तालीम का जो process है वह चलता ही रहता है।

विद्या का, पढ़ाई का, education का। तो तालीम पर लगाया हुआ क्या पैसा को investment करते हैं हम। यह विद्या पर भी पैसा लगाया आजकल investment ही है। तो क्या इसको वापस कैसे लाना है? क्या आपने जितना पैसा लगाया है उससे कई multiplication होकर वह multiply होगा,

सौ गुना हो जाए, हजार हो जाए, लाख हो जाए, उससे ज्यादा हो जाए तो वह क्या आपको वापस मिलेगा कि नहीं मिलेगा? तो लाल किताब में लिखा है कि चंद्रमा से भी हम तालीम, विद्या का, education का पता कर सकते हैं। बृहस्पति इसका देवता है।

मगर चंद्रमा अगर ठीक हो तो बृहस्पति से भी लाभ लिया जा सकता है। तो तालीम पर लगाया पैसा अगर किसी व्यक्ति का चंद्रमा number एक में है, कुंडली के खाना number एक। राशि छोड़ नक्षत्र भूला ना ही कोई पंचांग लिया। राशि नहीं देखनी।

पहले खाने में हो, पहले भाव में हो, कुंडली के लग्न में हो तो कभी खाली नहीं जाता पैसा लगाया हुआ। वापस आएगा ही आएगा। क्योंकि इसको लगाने के बाद आपने जो विद्या प्राप्त की है उससे आपको लाभ हो ही होगा।

कारामत, मदद। तालीम लिखा हुआ है कि इससे अच्छी तालीम मिलेगी जो कारामत होगी, आपको अच्छा लाभ देगी। तो घर में रखे हुए घड़े का, बर्तन का पानी कहा गया है। क्योंकि चंद्रमा पानी भी है तो पानी कहा गया है।

पानी इसलिए कहा गया है कि चंद्रमा जो है धरती माता भी है, पानी भी है। और यह दोनों ही चीजें जो हैं, यह बड़ी जरूरी है इंसान की life के लिए। तो इसमें घड़े का पानी क्यों कहा गया चंद्रमा पहले को?

क्योंकि घड़े का पानी होता है जब मर्जी उठाकर आप अपने घर में glass भरें और पी लें। मतलब you can use it, इस्तेमाल कर सकते हैं। इसका मतलब है जो विद्या आपने प्राप्त की है उससे आपको लाभ हो ही होगा। ऐसी बात नहीं है कि भाई लाभ नहीं होगा।

यह note कर लें। number दो में अगर भाव में किसी के चंद्रमा है तो पहाड़ से निकलता शह-जोर उम्दा पानी। माता के रहते-रहते कहता है तालीम उत्तम फल ही देगी। जितनी देर माता की इज्जत करता रहे, माता के पांव छूता रहे,

माता की सेवा करता रहे तो तालीम, विद्या जो है, पढ़ाई जो है उससे लाभ होगा ही होगा। number तीन में किसी का चंद्रमा है। अच्छा होता है। भाई बहनों के घर में है,

उनसे प्यार भी रहता है तो रेगिस्तान का पानी इसको कहा गया है। जिस कदर तालीम बढ़ती जावे, पिता की आय कम होती जाए। अब देखिए इसमें पिता का संबंध कहां से आ गया तीसरे खाने का। क्योंकि दसवां खाना जो है पिता का है। और छठी दृष्टि और आठवीं दृष्टि से चंद्रमा देखता है।

चंद्रमा तीसरे, तीसरे में भाई बहनों के लिए तो ठीक है। मगर पिता को अगर तालीम लेगा तो लिखा हुआ है थोड़ी खराबी करेगा। और पढ़ाई रुकेगी उसकी। अगर रुक भी जाए तो दोबारा चालू हो जाएगी। ऐसा नहीं है कि पढ़ाई बिल्कुल ही खत्म हो जाएगी।

और जब तक केतु कुंडली में उम्दा हो तो ना पिता को नुकसान तो ना जो है उसकी पढ़ाई में रुकावट आए। और उसकी पढ़ाई से लाभ भी रहेगा, रहेगा। अब चौथे भाव में किसी के चंद्रमा है तो चश्मे का पानी मीठा हरदम मुबारक लिखा हुआ है।

माता के असली खून का सबूत होगा। माता की तालीम अच्छी हो तो उत्तम फल मिलेगा। माता अगर ज्यादा पढ़ी लिखी नहीं है तो उत्तम फल कम होगा। मगर फिर भी चश्मे का पानी कहा गया है तो उत्तम फल तो हो ही होगा।

चंद्रमा जो है आपके बच्चे को पढ़ाई अच्छी देगा। अगर पांचवे भाव में किसी के चंद्रमा है तो लिखा हुआ है आबादी के अंदर का दरिया का पानी। मतलब जैसे कोई नदी है जो कि शहर के अंदर से होकर गुजरती, गुजरती है या आपके गांव के पास से

होकर गुजरती है तो यह वह पानी है। आबादी के अंदर का दरिया। और तालीम पर लगाया हुआ जो पैसा है, अगर आप तालीम पर पैसा लगाते हैं तो पूरी लिखा हुआ है वह ज्यादा उसका लाभ नहीं प्राप्त हो सक,

हो सकता है। खुद, खुद को बजाते खुद उसको लाभ नहीं होगा। मगर ऐसे बच्चे या ऐसे आगे जब वह बड़ा हो जाता है उस व्यक्ति की। जिसका चंद्रमा पांचवें में है उसके बच्चों की तालीम बड़ी अच्छी रहेगी और technical degree वो प्राप्त कर सकते हैं।

अगर उनकी हो तो technical degree जो है वो प्राप्त करते हैं। अअ मतलब कोई भी mechanical है, engineering line है, like that। और अगर छहवें में हो तो पताल, पताल का पानी कह दिया गया है कि मगर hand pump का पानी कारामद लिखा हुआ है,

अच्छा फल देने वाला है और तकलीफें तो आएंगी। अगर आपका चंद्रमा छठे भाव में है, तकलीफें तो आएंगी मगर आप overpower कर सकते हैं। तकलीफों के बावजूद भी आपकी विद्या जो है वो अच्छा लाभ ही देगी आपको। अगर सातवें में है, सातवें भाव में कुंडली के,

आपका राशि नहीं देखनी, कुंडली के सातवें भाव में है तो खेती का, जमीन का पानी, मैदान का पानी कहा गया है। जमीन का मतलब खेती की जमीन को जो पानी लगते हैं। कि शादी होने से पहले तालीम पूरी कर लेगा। ऐसा शख्स, ऐसा जो शख्स है खुद लक्ष्मी अवतार होगा।

मगर तालीम जो है वो ज्यादा कारामद नहीं होगी। ज्यादा कारामद नहीं होगी मगर फिर भी कुछ ना कुछ उसको लाभ देगी। तो अगर आठवें में कहा गया है आबे हयात वरना जहर खाली। यहां तो बहुत ही उत्तम, यहां बहुत ही मंदा। तालीम zero या तालीम जो है पूरी तरह से

highest degree जो है वो ले सकता है और उस तालीम से फायदा भी होगा। मगर तालीम बढ़ती जाए तो माता का कष्ट भी बढ़ता जाए। इसलिए माता के कष्ट के लिए चंद्रमा आठ का उपाय जो है वह करते रहना चाहिए। पितरों के नाम पर दूध देना चाहिए।

श्मशान के कुएं का पानी घर में रखना चाहिए। ये तो आगे उपाय है ना जी, कि आगे देखना पड़ता है उसका टकराव दूसरे घर में है, दूसरे घर से छठे घर को है आठवें का, तो वो देखना पड़ेगा कि वो क्या फल देता है।

मगर तालीम पर जो है वो उसका ध्यान ना देगा। अपनी तालीम पर देगा तो औलाद की पर नहीं देगा। बेफिक्रा सा हो जाएगा। कोई बात नहीं मेरा बच्चा पढ़ रहा है तो कोई, कोई ऐसी बात नहीं, नहीं पढ़ रहा तब भी कोई बात नहीं।

अब नौवें में हो तो सागर सबसे उत्तम, आराम देने वाली तालीम। इंद्र राजा की तरह सबका पालनहारा कहा गया है। इसके बाद दसवें में अगर चंद्रमा हो किसी का तो पहाड़ों की रुकावट में बना, बनाया हुआ पानी जैसे आप कह सकते हो dam।

आजकल dam जो हैं वो पहाड़ों को बीच में जहां पर ज्यादा पहाड़ आसपास हो उसके बीच में वो पानी इकट्ठा करके बाद में जब जरूरत होती है तो वो वहां पर उधर भेज देते हैं। चाहे खेती के लिए, चाहे और किसी काम के लिए।

तो कम फायदा। मगर वो हकीम जो हो तो बड़ा अच्छा है। डॉक्टरी line adopt कर ले अच्छा है। डॉक्टरी सहायता के लिए जो साथ में worker होते हैं, सहायक होते हैं, assistant हैं, वो काम कर ले तो बड़ा अच्छा है।

जैसे कोई surgery कर रहा है doctor से, उसका assistant बन जाए। उसका काम जो है वो हकीमी और डॉक्टरी के संबंधित हो तो अच्छा फल ही मिलेगा उसको। अब अगर ग्यारह में किसी का है। ग्यारहवें भाव में किसी का है चंद्रमा तो बरसाती लाला कहा गया है।

तो पढ़ेगा तो पूरा, अगर नहीं पढ़ेगा तो अनपढ़ हाफिज तो जरूर होगा। अनपढ़ भी हो मगर उसको knowledge पूरी होगी कि क्या काम करना है, किस बात में कैसे। जैसे कई लोग जो हैं उनके पास degree नहीं होती। वैसे education का मतलब ही यही है कि degree ना

भी हो आपको कोई उसका हुनर तो होना चाहिए। आपका दिमाग ठीक चलना चाहिए तो ग्यारह वाले व्यक्ति का ऐसा दिमाग चलेगा। अगर बारहवें में हो किसी का चंद्रमा तो आसमानी पानी कहा गया है ओले। ओले जो पड़ते हैं गड़े, बर्फ। अगर शनि, राहु, केतु कुंडली में मंदे तो तालीम का फायदा ना होगा।

और श-शनि जहां है मंदा कहां पर होगा? पहले भाव में ज्यादातर मंदा माना जाता है। नीच राहु जो है वो बारहवें में, केतु छठे में। तो ये हो तो तालीम से पूरा फायदा न होगा पर पढ़े-लिखे का बाप भी होगा।

इसलिए अ-लाल किताब में इसके उपाय भी दिए गए हैं। हर एक अ-अगर तालीम प्राप्त नहीं हो रही बच्चे की तो उसमें बृहस्पति और चंद्रमा को देखकर ही उपाय बताए जा सकते हैं। मगर चंद्रमा को उत्तम करने का सिर्फ एक ही उपाय है

आपके पास कि बड़े बुजुर्गों से आशीर्वाद लेते रहे। उनसे झुककर उनको सलाम करें, उनको, उनको नमस्ते करें, उनको सत श्री अकाल करें, उनको अपनी भाषा में जो भी है उनका regard करें

और तो आप जाकर आपको लाभ इसका मिल सकता है। सत श्री अकाल।

मनु स्मृति शूद्र वेद

वेदों को सुनने पर कान में पिघला सीसा डालने की गप्प सुनाने वालो, सीसे को पिघलाने की प्रक्रिया भी होती होगी? 

उस काल में सीसा पिघलाने के लिए धातु-कर्मी (metalsmith) और विशेष भट्टी चाहिए। क्या प्रत्येक ग्राम में यह व्यवस्था होती थी? 

क्या जब भी कोई शूद्र वेद-श्रवण करता तब तुरन्त सीसा पिघलाने की व्यवस्था होती थी? 

सीसे की तरल अवस्था कैसे बनाए रखी जाती थी? 

सीसे का गलनांक (Melting Point) 327.5 डिग्री सेल्सियस है। अर्थात् इसे पिघलाने के लिए इतना तापमान चाहिए।मानव शरीर का सामान्य तापमान 37 डिग्री सेल्सियस है।कान की नलिका (Ear Canal) की लम्बाई लगभग 25-35 मिलीमीटर और व्यास लगभग 7-9 मिलीमीटर है।

सीसे को 327 डिग्री से ऊपर रखना और उसे कान तक ले जाना — यह प्रक्रिया अत्यन्त जटिल है। कोई भी धातु-पात्र जिसमें इसे लाया जाए, वह स्वयं अत्यन्त गर्म होगा।

कोई भी व्यक्ति इस प्रक्रिया में सहयोग कैसे कर पाता होगा । उसे पकड़ा कैसे जाता होगा।

यदि यह दण्ड नियमित रूप से दिया जाता तो 
इसके साक्ष्य होते। धातु-कर्मियों का उल्लेख होता। दण्ड-प्रक्रिया का विवरण होता। पीड़ितों के नाम होते। कोई अभिलेख नहीं, कोई दरबारी इतिहास नहीं, कोई यात्रा-वृत्तान्त नहीं जो यह कहे कि किसी विशेष व्यक्ति के कानों में पिघला सीसा डाला गया।

क्या ऐलूष ऋषि के कानों में यह सीसा पड़ा जिनके बारे में ऐतरेय ब्राह्मण (2.19) में स्पष्ट उल्लेख है कि ये दासी के पुत्र थे, पिता जुआरी और निम्न चरित्र के थे, जिन्होंने ऋग्वेद पर शोध किया और ऋषियों ने इन्हें आचार्य-पद दिया? 

क्या वत्स ऋषि के कानों में यह सीसा पड़ा जिनके बारे मे ऐतरेय ब्राह्मण (2.19) में उल्लेख है कि ये शूद्र से उत्पन्न हुए और ऋषि बने? 

ये सत्यकाम के कानों में सीसा गिराया गया क्या? 

या कुक्षीवत के? 

या महीदास के? 

या पैजवन के ?

या मातंग ऋषि के?

या गृत्समद के? 

या वीतहव्य के? 

या गृत्संमति के?

ये सब तो वेदपरायण शूद्र ऋषि थे। इनके कान कैसे सुरक्षित रह गये? 

ये विदुर कैसे ऋषितुल्य हो गये?

क्या मध्यकाल के इतने सारे शूद्र संतों के कानों में सीसा पड़ा जो वेदमार्ग नहीं छोड़ने के लिए इतने प्रतिबद्ध थे? वेद धर्म छोडूं नहीं चाहे गले चले कटार। 

ऐतिहासिक स्तर पर जिसके क्रियान्वयन का एक भी साक्ष्य नहीं, Narratological स्तर पर जो दण्ड नियमित रूप से दिया जाना बताया जा रहा उसके कोई precise details नहीं, न पीड़ितों के नाम, न स्थान, न काल, न प्रक्रिया, भौतिकी के स्तर पर जिसकी प्रक्रिया इतनी जटिल और अव्यावहारिक है कि नियमित दण्ड के रूप में जिसका उपयोग असम्भव था।

और शूद्र को वेद-श्रवण से स्थायी रूप से वंचित करना ही उद्देश्य होताअर्थात् कानों को बहरा करना तो इसके लिए पिघला सीसा जैसा अत्यन्त जटिल, महँगा, दुर्लभ और अव्यावहारिक उपाय क्यों बताया जाता? 

यदि लक्ष्य केवल बहरापन था तो उस काल में क्या सरल उपाय जैसे तेज आवाज़, कान में नुकीली वस्तु, ठंडा पानी अत्यधिक मात्रा में, कुछ वनस्पतियाँ आदि क्या उपलब्ध नहीं थे? इनमें से कोई भी विधान में क्यों नहीं है।

और यदि उद्देश्य ज्ञान से वंचित करना था, तो उसके लिए बहरा बनाना कभी भी पर्याप्त नहीं होता। बहरा व्यक्ति भी देख सकता है, पढ़ सकता है, स्मृति रख सकता है।

यहाँ तो महाकाव्यों को सुनने पर जैसे अन्य वर्णों की फलश्रुति है वैसे शूद्र की। 

यह कहीं ऐसा तो नहीं था कि जैसे मि श न री अपने यूरोप की हत्यारी सचाई जिसमें देशी भाषा में बाइबिल लिखने पर मृत्युदंड था और जिसके ढेरों उदाहरण हैं, छुपाने के लिए हमारे दो ग्रंथों में ऐसे प्रक्षेप करवा दिए? खुद जिनके यहाँ ज्ञान का उत्पादन और संरक्षण पूरी तरह चर्च के हाथ में था, जहाँ Scriptorium (मठों में लिखाई-कक्ष) में केवल चर्च भिक्षु ही पांडुलिपियाँ नकल करते थे, जहाँ छपाई मशीन (Gutenberg, 1440s) आने के बाद चर्च ने Imprimatur ("छापने की अनुमति") की व्यवस्था बनाई कि बिना चर्च की मुहर के कोई किताब नहीं छप सकती थी- उन्होंने भारत के ब्राह्मणों को अपनी छवि में वैसे ही गढ़ा जैसे उनके हिसाब से गॉड ने आदमी को अपनी छवि में गढ़ा था? 

क्योंकि हमारे यहाँ तो ‘विद्या बाँटने से बढ़ती है’ की मान्यता है-अपूर्वः कोऽपि कोशोऽयं विद्यते तव भारति। व्ययतो वृद्धिमायाति क्षयमायाति सञ्चयात्॥"कि हे सरस्वती माता! आपका विद्या रूपी खजाना अद्भुत है, जो व्यय (खर्च/बांटने) करने से बढ़ता है और संचय (इकट्ठा/छिपाकर रखने) करने से कम होता है। 

इसलिए पेटेंट और इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी राइट्स के विचार भारत में जन्मे ही नहीं।

मुझमें उनमें फर्क इतना ही है। उनका हमारे पुराणों में भरोसा नहीं। मेरा अंग्रेजों और उनके पिट्ठुओं द्वारा गढ़े गये मिथकों में भरोसा नहीं।

कोलंबिया यूनिवर्सिटी से ग़लतफहमी शुरू हुई तो उसे ले उड़े भाई। स्वयं मनुस्मृति पढ़ने की ज़हमत न उठाई गई।

यह तो आम्बेडकर ने Annihilation of Caste में लिखा — "मनुस्मृति शूद्र के लिए जीभ काटने या कानों में पिघला सीसा डालने जैसे भारी दण्ड निर्धारित करती है।" - That is why the Manu-Smriti prescribes such heavy sentences as cutting off the tongue, or pouring of molten lead in the ears, of the Shudra who recites or hears the Veda.” यह लिखा उन्होंने। वास्तव में मनुस्मृति में ऐसा कोई दण्ड विधान नहीं है। उन्होंने यह Columbia University के एक शैक्षणिक स्रोत से उद्धृत किया। फिर उन्होंने महाड सम्मेलन ( 1927) में घोषणा की कि मनुस्मृति — जो शूद्रों के वेद सुनने या पढ़ने पर कानों में पिघला सीसा डालने का निर्देश देती है — को सार्वजनिक रूप से जला दिया जाए। तब शशरबुधे, राजभोज और थोराट ने प्रस्ताव पास करवाया: “The Manusmriti which directed molten lead to be poured into the ears of such Shudras as would hear or read the Vedas… be publicly burnt.”
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रक्षाबंधन पर रक्षासूत्र

रक्षाबंधन पर रक्षासूत्र सबसे पहले भगवान शिव, हनुमानजी और ग्रामदेवता को बाँधना चाहिए। इसके बाद घर के गौवंश (गाय, बैल, बछड़ा) को, फिर गाड़ी एवं भारी सामान या मशीनों को, तत्पश्चात धार्मिक ग्रंथों को और अंत में घर के सदस्यों (भाई-भाभी ) को रक्षासूत्र बाँधने की बारी आती है।

Thursday, 27 August 2026

मुल्ला और मंदिर विध्वंस

जानती हो हमारे मंदिर अगर केवल मूर्तिपूजा के केंद्र होते और तोड़े जाते तो वजह समझ आती पर हमारे मंदिर तो हमारे लिए नृत्य कला को, ललित कला को, चित्र कला को, मूर्ति कला को, वास्तु कला को , रोजगार को, प्रकृति को, संस्कार और संस्कृति को संरक्षण देने के केंद्र भी थे।

मुल्तान का भव्य सूर्य मंदिर, कश्मीर का मार्तंड सूर्य मंदिर, महोबा का सूर्य मंदिर, कोणार्क का सूर्य मंदिर, सूदूर पूर्वोत्तर के भुवन पहाड़ी पर बसे शिव मंदिर, 52 शक्तिपीठ, चार धाम और द्वादश ज्योतिर्लिंग, तमिलनाडु और दक्षिण के हम्पी आदि क्षेत्रों के भव्य मन्दिर से लेकर जावा, सुमात्रा, अंकोरवाट और बोरोबदूर के भव्य मंदिर ये सब हमारे लिए केवल मूर्तिपूजा के केंद्र नहीं थे बल्कि विश्व के सर्वोत्कृष्ट सभ्यता के हस्ताक्षर थे। 

हमारे ये मंदिर हिंदू एकात्मता और सहभागिता के भी सेंटर थे क्योंकि इनके निर्माण के लिये क्षत्रिय राजाओं ने लिए भूमि और संरक्षण दिये थे, ब्राह्मणों ने इसमें प्रतिष्ठित ईश्वर के लिए स्तुति और वंदनायें रची थी और कठोरता से शुचिताओं का पालन करते हुए इसकी पवित्रता को अक्षुण्ण रखा था। वैश्यों ने इसके निर्माण के लिए धन दिया था और आने वाले तीर्थयात्रियों के लिए धर्मशालाएं बनवाई, प्याऊ लगवाए थे और शूद्रों ने इन मंदिरों को वो वास्तु दी थी कि दुनिया आज भी विस्मित होकर दांतों तले अंगुली दबाए हैरान खड़ी है।

इसीलिए जब नोबेल विनर नायपॉल मार्तंड सूर्य मंदिर के ध्वंस स्तंभों के पास जाकर व्यथित हो गए थे तो वो व्यथा केवल एक मंदिर टूटने की व्यथा नहीं थी बल्कि वो व्यथा थी स्थापत्य के एक बेजोड़ नमूने के टूटने की जिसके पीछे उस समय के अभियंताओं का श्रेष्ठ मस्तिष्क और कारीगरों की श्रेष्ठ कला सम्मिलित थी। वो व्यथा थी उस मन्दिर में प्रांगण में उकेरी कर मूर्ति और चित्रों को रौंदे जाने की जो किसी मूर्तिकार और चित्रकार के जीवन भर का समर्पण था। वो व्यथा थी ज्ञान के उस केंद्र के ध्वंस का जिसे भारत भर के न जाने कितने ही ब्राह्मणों ने अपने तप और अनुष्ठान से सींचा था। वो व्यथा थी उस अर्थ तंत्र के तोड़े जाने की जो उस मन्दिर के कारण वहां बना हुआ था। वो व्यथा थी उस स्थल के ध्वंस की जो भारत की सांस्कृतिक एकबद्धत्ता का प्रमाण था। वो व्यथा थी कृतज्ञता ज्ञापन के उस प्रतीक के ध्वंस का जिसे हमारे पूर्वजों ने सृष्टि के संचालक और प्रकृति के रक्षक सूर्य नारायण की आराधना के लिए बनाया हुआ था।

और इसलिए जब वी एस नायपॉल ने भारत को एक "आहत सभ्यता" नाम दिया था तो उसकी वजह यही थी कि बर्बर आक्रांताओं के हमलों ने भारत की सभ्यता को ही लहूलुहान कर दिया था जिससे भारत को उबारना हमारे जैसों के जीवन का ध्येय है।


बानर बंदर बंदरगाह

वानर-वन का अर्थ वृक्षों का समूह है, पर इसका अर्थ जल-भण्डार रूप में समुद्र भी है-
बांध्यो वननिधि नीरनिधि जलधि सिन्धु वारीश। सत्य तोयनिधि कम्पति (कम् = जल) उदधि पयोधि नदीश॥ 
(रामचरितमानस, लङ्काकाण्ड, ५)
जो वननिधि में यात्रा कर सकता है, वह वानर है। आज भी समुद्री जहाज लगने का स्थान बन्दर कहते हैं-जैसे पोरबन्दर (गुजरात), बोरीबन्दर (मुम्बई), बन्दर श्रीभगवान् (बोर्निओ), बन्दर अब्बास (इरान)। रावण पर आक्रमण के लिये सिंगापुर तथा अन्य बन्दरगाहों पर कब्जा आवश्यक था।

शूद्र दलित


19वीं शताब्दी में एक अँग्रेज मिशनरी ने दलित वर्ग की कल्पना की। दलित को शूद्र से जोड़ा गया कि शूद्र दलित है, इसके आगे शूद्र को अनार्य से जोड़ा गया कि शूद्र अनार्य है और अनार्य को दलित से जोड़ा गया। 
इस प्रकार दलित सताने का 3000 वर्ष पुराना ऐतिहासिक क्रम बन गया।
बुनकरों का अँग्रेज ने हाथ काटा, उनके उद्योग को नष्ट कर भारत में अपने वस्त्रों का बाजार बनाया। 
इस इतिहास को ढ़कने के लिए एकलव्य के अँगूठा काटने की कहानी प्रचलित की गई, 
गोवा में हथकट्टा खंभा आज भी खड़ा है, उसकी क्रूर कहानी प्रचारित नहीं होने दी गई। 
क्योंकि अँग्रेज और पुर्तगाली रिस्तेदार हैं। अँग्रेजी राज में पुर्तगाली राज ने बेटी व्याही, अँग्रेज को दहेज में मुंबई दे दी। 
न हथकट्टे खंभे का और न बुनकरों के हाथ काटने का इतिहास पढ़ाया और न इस तथ्य को चर्चा में आने दिया गया।
एकलव्य का अँगूठा काटे की कहानी फैलायी गया। 
इनका उद्देश्य स्पष्ट है कि हिन्दू को तोड़- फोड़कर रखना है।
भारत कहने के लिए स्वतंत्र है। 
यहाँ चलती किसकी है? 
सेंट जेवियर की, मैकाले की, कामरेडों की, विदेशी विधर्मियों की। 
इन्हीं के मोहरे नैरेटिव खेला करते हैं। 3000 वर्षों से दलित, शूद्र , अनार्य सताए जाते रहे।
गाँधी वध के बाद 10, 000 पुणे में और पुणे के आसपास नगरों में हजारों ब्राह्मण का नरसंहार हुआ। 
किन लोगों ने किया यह नरसंहार? लोग कहते हैं काँग्रेसी गाँधी भक्तों ने। वे काँग्रेसी कौन लोग थे? 
अज्ञात हैं, उनकी खोज क्यों नहीं की गयी? इंदिरा गाँधी की हत्या काल में 3000 सिक्खों का नरसंहार हुआ उस मुकद्दमा चला, न्याय हुआ। 
पुणे में ब्राह्मण नरसंहार हो या काश्मीर में ब्राह्मण नरसंहार इन दोनों में केस का FIR तक नहीं हुआ।
 क्यों? 
महाराष्ट्र का इतिहास उत्तर भारत में दुहराने की कोशिश हो रही है। उत्तर प्रदेश, बिहार में अबेडकर की महार जाति का बामन मेश्राम जहर उगल रहा है। आत्मरक्षार्थ रणवीर सेना कमर कसने लगी है।

ऐसा लगता है कि भारत को एक बार फिर स्वाधीनता का संघर्ष करना होगा, अँग्रेज के उन मुहरों के खिलाफ संघर्ष करना होगा जो घूम- घूमकर जहर उगल रहे हैं।

Wednesday, 26 August 2026

भारत की अधिकतम जातियां या तो म्लेच्छ है या तो

भारत की अधिकतम जातियां या तो म्लेच्छ है या तो बाहर से आए हुए गुलामो से उपजी है । जैसे कि शक, हूण, सिद्दी, क्रिसाई, यहूदी, पारसी, मुगल और मंगोलियाई आदि साथ ही कुतुब, तुगलक, बहनवी, आदिलशाही, पश्तून (लोध) आदि ।। 

इसलिए इनमें देश के गुलामी विरुद्ध भाव आना संभव न है। इसलिए यह देश के मर मिटने से दूर भागते है । उन्हें बस इससे मतलब है कि इनकी रोजी रोटी चलती रहे, इन्हें मतलब नहीं की सत्ता में कौन है, शासक का धर्म व आइडियोलॉजी क्या है आदि आदि । तो या तो ये जातियां वर्णसंकर संबंधों से उपजी है या फिर उन्हीं के यहां गहन नौकरी में रही है । 

इनके अंदर #anti_brahman आइडियोलॉजी इनकी जेनेटिक आइडियोलॉजी हो चुकी है तो अगर ये जातीय कभी शासक भी बनी तो इनका मूल स्वभाव प्रजा हितैषी शासक न होकर या तो किसी का गुलाम बनना होगा या फिर लूटपाट जो कि इनके जेनेटिक में है। 

अतएव ऐसे लोगों को या तो आप इनके मूल कार्य की ओर लौटाओ या फिर इनसे दूरी बना लो अन्यथा आपका पतन निश्चित है ।

अगर कोई इस बात से इंकार करता है कि नहीं नहीं ऐसी जातियां इस देश में नहीं है तो उससे पूछिए कि शक, हूण, सिद्दी, अरब के लाये गुलाम, ब्रिटिश, फ्रांसीसी, पुर्तगाली आदि स्वयं व उनके गुलाम किधर है? 

किधर है तुगलकशाही, कुतुबशाही, निजामशाही आदिलशाही के संपर्क से उपजे लोग व उनके बनाए हुए गुलाम व नौकर ?

किधर है मंगोलियाई लोग आदि ?