Thursday, 24 September 2026

पुराण और जातियां

##कल वानर वाले लेख पर आप सबके क आस्था और इतिहास दोनों का सम्मान होना चाहिए। इसलिए आज उसी कड़ी को आगे बढ़ाते हैं - *नाग, गंधर्व, किन्नर, यक्ष, मत्स्य कन्या क्या थीं?*
पुराणों में जब लिखा है - "वह नागकन्या थी" तो क्या सच में आधी स्त्री आधी सर्प थी? यही भ्रम हमें समझना है।
### पुराणों में सृष्टि का वर्गीकरण - मनुष्य ही मनुष्य के कई रूप हैं
हम आज सोचते हैं दुनिया में केवल एक ही मानव जाति है। पुराण कहते हैं नहीं, सृष्टि में 8 प्रकार के मानव-सदृश सभ्यताएं थीं। इसे *अष्ट-मानव योनि* कहा गया -
*1. नाग -*
नाग का अर्थ सांप नहीं, *नग में रहने वाला* - पहाड़ की गुफाओं, पाताल अर्थात भूमिगत नगरों में रहने वाली अत्यंत विकसित सभ्यता।
वे महान इंजीनियर थे। भोगवतीपुरी, जो आज के पाताल लोक में बताई जाती है, वह जल-निकासी और वास्तुकला का अद्भुत नमूना थी।
नागकन्या का अर्थ - नागवंश की कन्या। जैसे अर्जुन ने नागकन्या उलूपी से विवाह किया, भीम ने नागवंश की राजकुमारी से। वे इच्छाधारी नागिन नहीं, नाग-वंश की राजकुमारियां थीं, जो विष-विद्या, मणि-विद्या जानती थीं।
कालिया नाग - वह यमुना के एक टापू पर रहने वाला नागवंशी राजा था, जो यमुना के जल पर कर लगाता था। कृष्ण ने उस राज्य को जीता, उसे मारा नहीं, निर्वासित किया।
*2. गंधर्व -*
गंधर्व का अर्थ है - गंध को धारण करने वाला, अर्थात संगीत, सुगंध और कला का उपासक।
ये आज के गंधार - अफगानिस्तान, कश्मीर क्षेत्र के निवासी थे। ये परम सुंदर, संगीतज्ञ और वीर थे।
गंधर्व विवाह क्या है? - प्रेम विवाह। शकुंतला और दुष्यंत का गंधर्व विवाह ही था। यानी गंधर्व सभ्यता में प्रेम-विवाह मान्य था, जबकि आर्य सभ्यता में नहीं।
विश्वावसु, चित्ररथ - ये गंधर्वों के राजा थे, जिनके पास विमान विद्या थी।
*3. किन्नर - किं + नर = क्या यह मानव है?*
ये हिमालय की घाटियों में रहने वाली एक विशेष सभ्यता थी - अश्वमुखी नहीं, अश्व-पालक। घोड़े पालने वाले, तेज दौड़ने वाले, इसलिए चित्रकारों ने उनका मुंह घोड़े जैसा बना दिया।
वे महान वाद्यकार थे। आज भी हिमाचल के किन्नौर में किन्नर जाति रहती है।
*4. मत्स्य कन्या -*
सत्यवती मत्स्यगंधा थी। क्या वह आधी मछली थी? नहीं।
वह *धीवर-वंश* की थी, नाव चलाने वाली। दिन भर मछलियों में रहने से उसके शरीर से मत्स्य की गंध आती थी, इसलिए मत्स्यगंधा। वह मत्स्य-वंश की राजकुमारी थी, इसीलिए मत्स्यकन्या।
वैसे ही कश्यप ऋषि की पत्नी कद्रू नाग-माता कही गई, विनता गरुड़-माता। इसका अर्थ है - एक पत्नी नाग-वंश की मूल माता बनी, दूसरी गरुड़ अर्थात गरुत वंशी आर्य वंश की।
*5. यक्ष, राक्षस, वानर, विद्याधर -*
यक्ष - कुबेर के अनुचर, धन-रक्षक, आज के कुबेर क्षेत्र - तिब्बत के व्यापारी।
राक्षस - रक्षा करने वाले, रक्ष-संस्कृति के लोग। रावण राक्षस-वंशी राजा था, कोई दस सिर वाला प्राणी नहीं। दस सिर = दस दिशाओं का ज्ञाता।
विद्याधर - विज्ञान और विद्या के धारक। हनुमान, रावण सब विद्याधर थे।
### फिर चित्रों में उन्हें आधा पशु क्यों दिखाते हैं?
यह हमारे प्राचीन चित्र-संकेतों की भाषा है, जिसे हम भूल गए।
पुराणकार ने सांकेतिक भाषा लिखी -
- बलवान है तो पूंछ दिखा दी
- तेज दौड़ता है तो घोड़े का मुख
- जल में निपुण है तो मछली की पूंछ
- संगीतज्ञ है तो गंधर्व के पंख
यह *टोटम - ध्वज चिन्ह* है। जैसे आज भी हर रेजिमेंट का चिन्ह होता है - गोरखा की खुखरी, राजपूताना राइफल्स का कटार। वैसे ही नाग-वंश का चिन्ह सर्प, गरुड़-वंश का गरुड़, वानर-वंश का वानर।
### निष्कर्ष क्या निकला?
पुराण झूठ नहीं बोलते, हम पढ़ना भूल गए।
नागकन्या का अर्थ सांपिन नहीं, नागवंश की विदुषी राजकुमारी है।
मत्स्यकन्या का अर्थ मछली नहीं, मत्स्य देश की, धीवर कुल की कन्या है।
वानर का अर्थ बंदर नहीं, वानर-ध्वज धारी पराक्रमी मानव है।
देवता भी इसी मनुष्य समाज से उठ कर देवत्व पाए हुए लोग थे। तभी तो मनुष्य का देवता बनना, देवता का मनुष्य बनना संभव है।
पुराणों को चमत्कार कथा नहीं, मानव सभ्यताओं का भूगोल समझ कर पढ़िए, सब कुछ स्पष्ट हो जाएगा।##सबको जय जय श्री सीताराम🙏🙏 ##

Wednesday, 23 September 2026

संकल्प वाचन

आजकल बड़े-बड़े यज्ञों और अनुष्ठानों में एक बहुत बड़ी विडंबना देखने को मिलती है। लाखों रुपये खर्च करके महायज्ञ का आयोजन होता है, लेकिन जब 'संकल्प' की बारी आती है, तो मात्र देश-काल और गोत्र बोलकर इतिश्री कर दी जाती है।

अरे गुरु! संकल्प केवल आपका नाम और पता नहीं है। यह ब्रह्मांड की उत्पत्ति से लेकर, 14 लोकों के निर्माण, ग्रहों की सूक्ष्म दशाओं और विश्व-कल्याण तक की एक 'कॉस्मिक उद्घोषणा' है।
मेरे उच्च कोटि के विद्वान आचार्य जन और प्रबुद्ध पाठक अक्सर मुझसे एक ऐसे 'विशुद्ध संकल्प' की मांग करते थे, जिसमें कुछ भी अछूता न रहे। जिसमें सृष्टि का दर्शन भी हो और यजमान की सूक्ष्मतम कामनाएं भी।

 आज मैं आपके समक्ष वही अद्भुत, गूढ़ और परिपूर्ण संकल्प प्रस्तुत कर रहा हूँ।  
यह कोई साधारण संकल्प नहीं है।

 जब कोई विद्वान आचार्य यज्ञ मंडप में इसे नाद स्वर में पढ़ेगा, तो सुनने वालों के रोंगटे खड़े हो जाएंगे और उन्हें लगेगा— "हाँ, इसे कहते हैं संकल्प!"
 जहाँ-जहाँ संस्कृत अत्यंत क्लिष्ट है, वहाँ मैंने कोष्ठक में उसका सरल अर्थ लिख दिया है, ताकि भाव पूरी तरह स्पष्ट हो।
इसे ध्यान से पढ़ें, कंठस्थ करें और अपने पास सहेज कर रख लें:

॥ बृहद अनुष्ठान एवं यज्ञ हेतु सम्पूर्ण विशुद्ध सङ्कल्पः ॥

🛑परब्रह्म और ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति का दार्शनिक स्मरण👇

ॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णुः स्वस्ति श्री मन्मुकुन्द सच्चिदानन्द-रूपस्य परब्रह्मणो निर्वाच्य मायया यथाशक्ति विजृम्भिता विद्यायोगात् कालकर्मस्वभावाविर्भूत महत्तोदिताहंकार त्रयोदभूतस्य वियदादि पञ्च केन्द्रिय देवता निर्मिताण्डकटाहे चतुर्दश लोकात्मके लीलयातन्तमध्यवर्ति भगवतः श्रीनारायणस्य  
(अर्थात: सच्चिदानंद परब्रह्म की अनिर्वचनीय माया, महत तत्त्व, अहंकार, पंचतन्मात्राओं और पंचमहाभूतों से निर्मित इस ब्रह्माण्ड रूपी अण्डकटाह (कड़ाहे) और चौदह लोकों के मध्य लीला करने वाले भगवान श्रीनारायण...)  

 🛑सृष्टि, देश और काल का विशुद्ध वर्णन

नाभिकमलोद्भूतस्य सकललोकस्य पितामहस्य ब्रह्मणः सृष्टि कुर्वतस्तदुद्धारणाय प्रजापति प्रार्थितस्य महापुरुषस्य श्री श्वेतवाराहावतारेण ध्रियमाणायामस्यां धरित्र्यां भूर्लोकसंज्ञितायां सप्तद्वीप मण्डितायां क्षीरोदादि समुद्रतद्वीज वलयीकृत लक्षयोजनविस्तीर्णेजम्बुद्वीपे स्वर्गादि सरिद्भिः पाविते निखिल जनपावन कर्तृभिः शौनकादि महामुनि निवास भूते नैमिष्यारण्यादि मोक्षसाधनभूते श्रीमद्भगवतो महापुरुषस्य विष्णोराज्ञया प्रवर्तमानस्य अद्य श्रीब्रह्मणोह्नि द्वितीयपरार्द्धे श्रीश्वेतवाराहकल्पे वैवश्वतमन्वन्तरे अष्टाविंशतितमे कलियुगे कलिप्रथम चरणे भूर्लोके भरतखण्डे भारतवर्षे आर्यावर्तान्तर्गते ब्रह्मावर्त्तैकदेशे पुण्यप्रदेशे

👉(यहाँ यदि काशी में हों तो यह पढ़ें: काश्यां-अविमुक्त वाराणसी क्षेत्रे महाश्मशाने गौरीमुखे त्रिकण्टक विराजिते भागीरथ्याः उत्तरवाहिन्याः गङ्गायाः वामे दिग्भागे)  
(अब अपना वर्तमान स्थान और काल बोलें)

(अमुक) प्रान्ते (अमुक) मण्डलान्तर्गत (अमुक) पुण्यपवित्र ग्रामे (अमुक अयने) (अमुक) ऋतौ (अमुक) संवत्सरे (अमुक) मासे (अमुक) पक्षे (अमुक) तिथौ (अमुक) वासरे (अमुक) राशिस्थिते श्रीसूर्ये (अमुक) राशिस्थिते श्रीचन्द्रे (अमुक) राशिस्थिते श्रीदेवगुरौ शेषेषु ग्रहेषु यथा यथा राशिस्थान स्थितेषु सत्सु एवं ग्रहगुणगण विशेषण-विशिष्टायां शुभपुण्यकाले...  

🛑 यजमान का परिचय एवं कामनाओं का महासागर

... (अमुक) गोत्रः (अमुक) शर्मा, वर्मा, गुप्तोऽहं वा सपत्नीकोऽहं (अत्रागत्यानां सर्वेषां जनानां प्रतिनिधि भूतोऽहं अस्मिन् (अमुक) यज्ञे श्रुतिस्मृतिपुराणोक्त शास्त्रोक्त वेदोक्त तन्त्रोक्त पुण्यफल प्राप्त्यर्थं मम सकुटुम्बस्य सपरिवारस्य तथा च अन्येषां जनानां विशेषतः एतत् प्रान्तीयानां सर्वेषां स्त्री पुंसां च नित्य कल्याण प्राप्त्यर्थं...  
...कायिक वाचिक मानसिक सांसर्गिक चतुर्विध पापक्षय पूर्वकं आध्यात्मिक, आधिदैविक, आधिभौतिक, त्रिविध तापोपशान्तिसकल दुःख शेष निवृत्ति पूर्वकं व्याधादि जरा मृत्यु रोगभय शोकाद्युपसर्ग निवृत्ति-पुरस्सरं...
(अर्थात: काया, वाणी, मन और संसर्ग से हुए चारों प्रकार के पापों का क्षय हो, तथा दैहिक, दैविक और भौतिक तीनों तापों एवं बुढ़ापा, रोग, मृत्युभय आदि शांत हों।)  

मम जन्म कुण्डल्यां प्रश्नकुण्डल्यां लग्न कुण्डल्यां गोचरे च तन्महादशायां अन्तर्दशायां प्रत्यन्तर्दशायां प्रतिप्रत्यन्तर्दशायां सूक्ष्मान्तर्दशायां केचिद्विरुद्ध चतुर्थाष्टम द्वादश स्थान स्थित क्रूर ग्रहास्तैः संसूचितं संसूचयिष्यमाणं पुत्रपौत्रादिसन्तते-रविच्छिन्नाभिवृद्ध्यर्थं...
(अर्थात: जन्मकुंडली, गोचर, या किसी भी सूक्ष्म दशा में यदि ४, ८ या १२वें भाव में क्रूर ग्रह बैठे हों, तो उनका दोष शांत हो।)  

...आदित्यादिनवग्रहानुकुलता सिद्ध्यर्थं इन्द्रादिदशदिक्पालप्रसन्नता सिद्ध्यर्थं धर्मार्थकाममोक्ष चतुर्विध पुरुषार्थ सिद्ध्यर्थं अप्राप्तलक्ष्मीप्राप्त्यर्थं प्राप्तलक्ष्म्याश्चिरकालसंरक्षणार्थं सकलमनेप्सितकामना सिद्ध्यर्थं लोके वा राजद्वारे, सभायां, न्यायालये, उद्योगे, कृषिकार्ये, व्यापारे, समाजेऽपि तद्वारे वा सर्वत्र यशोविजय कीर्तिलाभादि प्राप्त्यर्थं शत्रुप्रराजय सद्धिष्ट सकल्पोक्त कामना सिद्ध्यर्थं च...
(अर्थात: राजदरबार (सरकार), न्यायालय , व्यापार और कृषि हर जगह विजय हो और शत्रुओं का पराभव हो।)  

...इह जन्मनि जन्मान्तरे वा सकलदुरितोपशमनार्थं गृहे विपुल धन-धान्य ऐश्वर्यादि-अभिवृद्धिपूर्बकं गृहे सर्वेषां जनानां शरीरे उत्पन्न एवं उत्पत्स्यमाण समस्त रोग व्याधि कष्ट पीडा निवारणपूर्बकं शरीरे दीर्घायुष्यनैरोग्य कीर्तिलाभक्षेमस्थैर्य सद्धर्म सद्बुद्धि सद्विद्या सद्विवेक सदाचारादि प्राप्त्यर्थं सनातन धर्मेस्मिन् अतिशयश्रद्धाभक्तिसंवृद्ध्यर्थं, धार्मिकग्रन्थानां पुराणानां सर्वासामं विद्यानां संवृद्ध्यर्थं विशेषतः स्वधर्मे सनातनधर्मे प्रीतिविवर्द्धनार्थम-
सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु, मा कश्चिद् दुःखभाग्भवेत्।।  

🛑 प्राकृतिक आपदा निवारण एवं अनुष्ठान का अंतिम संकल्प

इति सदुद्देश्यसिद्धिद्वारा विश्वस्मिन् जगति सर्वविधशान्त्यर्थं धर्मग्लान्यधर्मधर्माभ्युत्थान निवृत्तिपूर्वकं धर्मसंस्थापनार्थं च पुण्यकालेऽस्मिन् सकलदुरितोपशमनार्थं दुर्भिक्ष, अतिवृष्टि, अनावृष्टि, विप्लव भूकम्प पशुरोग कृषिकार्ये च उत्पन्न समस्त बाधा निवारणार्थं निर्विघ्नतापूर्वक प्रचुर अन्न उत्पादनार्थं राजभय चौरभय सर्पभय शत्रुभय अग्निभय रोगभय यानपातानादिभय दुस्संगजन्याकस्मिकभय तथा नानागतभयनिवारणार्थं...
(अर्थात: अकाल, अतिवृष्टि, भूकंप, पशुओं के रोग, दुर्घटना, सर्प भय, अग्नि भय आदि सभी ज्ञात-अज्ञात भयों का निवारण हो।)  

...नवग्रह-जन्यपीडा शान्त्यर्थं उपस्थितानां समेषां जनानां कल्याणार्थं तथा डाकिनी-शाकिनी-भूत-प्रेत-पिशाच-वेतालादिभय निवारणार्थं विशेषतः जगन्नियन्ता अनन्तकोटि ब्रह्माण्डनायकस्य भगवतः सूर्यमण्डलावर्ति जगद्वीज पुरुषोत्तम वैकुण्ठाधिपतेः श्रीसीतारामयोः वा साम्बसदाशिवस्य वा लक्ष्मीनारायणयोः वा जगदम्बिकयोः अनुग्रह प्राप्त्यर्थं सग्रहमखं (शिवशक्ति या अपने हिसाब से यज्ञादि का नाम)
 यागकर्म एभिर्द्विजकुलावंतसैः शम-दमादि-निखिल-गुणगण-भरितैः विद्वद्भिः सह अद्यरभ्य पूर्णाहुति पर्यन्तं करिष्ये।  
तदङ्गत्वेन स्वस्तिपुण्याहवाचनं मातृकापूजनं, वसोर्धारा-पूजनमायुष्य मन्त्रजपं साङ्कल्पिकेन विधिना नान्दीश्राद्धमाचार्यादि वरणञ्च करिष्ये।
तथा च मण्डपप्रवेशपूर्वकं वास्तुपूजनं, मण्डपपूजनं, चतुःषष्टियोगिनीपूजनं क्षेत्रपालनवग्रहपूजनं असंख्यात् सर्वतोभद्रपूजनं च करिष्ये।
तत्रादौ निर्विघ्नतासंसिद्ध्यर्थं गणैशाम्बिकयोः पूजन महं करिष्ये।  

(इतना बोलकर हाथ का जल, अक्षत और द्रव्य सामने पात्र में छोड़ दे

मंत्र यानी बांधने का उपाय-

मंत्र यानी बांधने का उपाय-
      

             मेरा जब जनेऊ हुआ तो उस समय मेरी उम्र 7साल की थी,पिता ने बड़े जतन के साथ वैदिक रीति से हम सब भाईयों का जनेऊ कराया। साथ में दो और भाईयों का जनेऊ हुआ। स्व.कामेश्वर नाथ चतुर्वेदी,श्रीजी मंदिर –यमुनाजी धर्मराज मंदिर वाले मेरे दीक्षागुरू बने, उन्होंने ही मंत्र दीक्षा दी,पहले गायत्री मंत्र की दीक्षा दी,साथ में बाला और भुवनेश्वरी के मंत्रों की दीक्षा दी,पिता के पास पहले से ही महात्रिपुरसुंदरी यंत्र थे।यानी बचपन से तीन देवियों गायत्री,बाला और भुवनेश्वरी की उपासना पद्धतियां जीवन में शामिल हो गयीं।बचपन के तकरीबन 12साल सघन आराधना-उपासना में बीते।मैं सुबह 4बजे उठता था,उठकर पढ़ता था, आधा गिलास चाय माँ बनाकर 4बजे ही दे देती थी।सात साल की उम्र से लेकर 12 साल की उम्र तक तो सुबह उठकर संध्या आदि करने के अलावा समूची तांत्रिक पद्धति से पूजा उपासना में पाँच-छह घंटे खर्च करता था। घर में ही पूजा की बढ़िया व्यवस्था थी।बाद में 11 साल की उम्र से माथुर चतुर्वेद संस्कृत महाविद्यालय पढ़ने जाने लगा तो दैनंदिन जीवन में बदलाव आया।पूजा के घंटे कम हो गए,पढाई के घंटे बढ़ गए। इनमें सुबह का पढ़ना शामिल हो गया,पहले सुबह उठकर कम पढ़ता था, पूजा-उपासना में मन ज्यादा लगाता था।

         मेरा घर यमुना के किनारे है और यमुना के उस पार एक बगीची खरीदी गयी उसका एकमात्र मकसद ही यही था कि पूजा के लिए फूलों को लाना।मेरी पूजा में तकरीबन डेढ़ दो किलो फूल लगते थे।इतने फूल रोज खरीदना संभव नहीं था। यह बगीची आज भी है,दुर्वासा ऋषि के आश्रम के पास ही ईसापुर ग्राम में, वहां भी पिता ने एक मंदिर बनवाया था, मैं सुबह ही सुबह पांच बजे के करीब रोज पिता के साथ वहां नाव में बैठकर निकल जाता और वहां घंटों रहता,नहाना-धोना-पूजा-भजन आदि करना,नाश्ता के तौर पर वहीं पर फल आदि तोड़कर खाना,यह दैनिक क्रिया तकरीबन 7-8 साल चली। दिलचस्प बात यह है कि मैंने जितना भजन-पूजन किया मेरे जीवन के दुख कम नहीं हुए।इससे एक बात बचपन में ही समझ में आ गयी कि भजन-पूजन-ईश्वरोपासना का दुख दूर करने से कोई संबंध नहीं है। हकीकत यह थी कि जितना भजन मैंने किया शायद मेरे साथ के किसी मित्र ने नहीं किया।जितनी पूजा मैंने की,उतनी किसी ने नहीं की।सब कुछ मंत्रबद्ध,सही पद्धति के साथ बेहतरीन गुरूओं के निर्देश में किया।इस मामले मैं मेरे असल गुरू तो पिताजी ही थे,वे तंत्र के पारंगत विद्वान हैं,वेदों का उन्होंने गंभीरता से अध्ययन किया है। दीक्षागुरू कामेश्वरनाथ जी निजी तौर पर बेहतरीन इंसान थे, हमें बेहद प्यार करते थे। इस वाकया को बताने के दो प्रधान कारण हैं ,पहला, निजी जीवन की तलाश,दूसरा,मंत्र के साथ अपने संबंध की नए सिरे से खोज।मंत्र जप मुझे आज भी प्रिय है,मैं मंत्र जप करता हूँ।आमतौर पर अजपा-जप करता हूँ।यानी मन ही मन मंत्र जप चलता रहता है।

मंत्र का एक रूप वह है जिसे पूजा-उपासना के संदर्भ में हमलोग जानते और मानते हैं लेकिन मंत्र का एक दूसरा बड़ा अर्थ भी जिसे आमतौर पर लोग नहीं जानते।मंत्र जप के संदर्भ में पहली बात यह कि मंत्र जप से मनोकामना कभी पूरी नहीं होती,मंत्र जप से सिद्धियां प्राप्त नहीं होतीं,ये सब बातें पाखंडियों की रची गयी हैं।मंत्र का प्रयोजनमूलक उद्देश्य पाखंडियों की सृष्टि है।मंत्र तो असल में जीवन को बाँधने का उपाय है।आप अपने जीवन को किस तरह के तारों से बाँधना चाहते हैं यह मंत्र से तय होता रहा है।मंत्र यानी जीवन बाँधने की कला।मंत्र को यदि जीवन जीने की कला के रूप में लें और देखें तो हमारे धर्म के अनेक संकट और व्याधियां खत्म हो जाएं।अनेक पाखंड खत्म हो जाएं।मंत्र का मतलब पाखंड से किसने जोड़ा हमें नहीं मालूम, लेकिन यही सच्चाई है कि मंत्र आज पाखंड का अंग है।जीवन जीने के अनेक रूप हैं उनमें से आपको चुनना होगा कि कैसे जिओगे,मंत्र असल में जीने के मार्ग को बांधने, नियोजित करने,संगठित,अनुशासित होकर जीने की कला है।

जीवन आज सबसे ज्यादा बिखरा हुआ है, भयानक अराजकता है, जीवनशैली के रूपों में अराजकता है , हमारे पास जीवनशैली को बांधने,संगठित करने का कोई उपाय नहीं है, पुराने जमाने में मंत्र का आविष्कार असल में जीवन बाँधने की कला के रूप में हुआ ,उसके हजारों-लाखों रूप हमें परंपरा में मिलते हैं, लाखों मंत्र मिलते हैं।जीवन जीने के लिए मंत्र जरूरी है,मंत्र के बिना जीवनशैली के अव्यवस्थित और अराजक हो जाने के चांस ज्यादा हैं।मंत्र का दूसरा पहलू है उदात्तता।मंत्र हमें क्षुत्रताओं से परे ले जाता है, निहित-स्वार्थों से परे ले जाता है।

रवीन्द्र नाथ टैगोर ने सही लिखा है ´मंत्र नामक वस्तु जीवन बाँधने का एक उपाय है।मंत्र का सहारा लेकर हम चिंतन के विषय को मन के साथ बाँधे रहते हैं।यह मानो वीणा की खूँटी,उसके कान की तरह है।तार को ऐंठ कर बाँधे रखने का साधन,वह तार को खुलकर अलग नहीं होने देता,उसे कस कर बाँधे रखता है।विवाह के समय स्त्री-पुरूष के वस्त्रों को गाँठ लगाकर बाँध दिया जाता है।इसके साथ मंत्र पढ़ दिए जाते हैं,वे मंत्र मन में ग्रंथि-बंधन करते रहते हैं।ईश्वर के साथ हमारे ग्रंथि-बंधन की जो जरूरत है,मंत्र उसमें सहायता करता है। इस मंत्र के सहारे हम उनके साथ अपना कोई एक संबंध पक्का कर लेंगे। वैसा एक मंत्र है पिता नोsसि।आप मेरे पिता है।मंत्र के इस सुर में अपने जीवन को बाँध लेने पर सारी चिन्ताओं,सारे कर्मों में एक विशेष रागिनी झंकृत हो उठेगी।मैं उनका पुत्र हूँ यही उक्ति साकार होकर हमारे सारे कार्य कलापों में प्रकाशित होने लगेगी कि मैं उनका पुत्र हूं।´

कहने का आशय यह कि मंत्र के मर्म को हम भूल गए और उसे हमने व्यवहारवाद,अवसरवाद, फल प्राप्ति के उपायों का सहारा बना दिया।मैं भी कभी-कभी किसी के मन संतोष के लिए उपाय के तौर पर मंत्र सुझा देता हूँ लेकिन सच यही है कि मंत्र उपाय नहीं है बल्कि मंत्र जीवन को बाँधने की कला है।संगठित नियमित जीवन जीना है तो मंत्र से सीखो।किसी अन्य से नहीं।

Monday, 21 September 2026

गया श्राद्ध के लिए घर से प्रस्थान करने के नियम🌹

🌹गया श्राद्ध के लिए घर से प्रस्थान करने के नियम🌹

गया जी में पितृ श्राद्ध एवं पिंण्डदान के लिए जाने से पहले घर पर कुछ आवश्यक धार्मिक कार्य पूर्ण कर लेना चाहिए। यह सभी कार्य अपने कुलाचार एवं आचार्य पंडित जी के मार्गदर्शन में करना उचित है। नीचे दिए अनुसार नियमों का पालन करें -

① गया जी तीर्थ विष्णुपद का स्मरण करते हुए पूजन 
गया धाम तीर्थ में वैदिक विधि विधान से पिंडदान का संकल्प 
अपने समर्थ अनुसार खर्च श्रद्धा से करें 

② नान्दीमुख श्राद्ध

गया जी जाने से पहले घर पर नान्दीमुख श्राद्ध विधिपूर्वक करवाना चाहिए। इसमें देवताओं, पितरों एवं कुल के पूर्वजों का पूजन करके गया श्राद्ध के लिए संकल्प किया जाता है। यह कार्य आचार्य पंडित जी के निर्देशानुसार करें।

③ प्रस्थान से पूर्व की तैयारी

प्रातः स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें। भगवान श्री गणेश, कुलदेवता एवं पितरों का स्मरण करें । आचार्य पंडित जी के निर्देशानुसार यात्रा का संकल्प लें और घर के बड़े-बुजुर्गों का आशीर्वाद लेकर गया जी के लिए प्रस्थान करें।

④ साथ में ले जाने योग्य सामग्री

स्वच्छ धोती, गमछा, वस्त्र, तिल, कुश, पूजा की सामग्री (आवश्यकतानुसार), पितरों के नाम व गोत्र की सूची, व्यक्तिगत आवश्यक वस्तुएँ तथा यात्रा से संबंधित दस्तावेज अपने साथ रखें।

⑤ यात्रा के दौरान आचरण

यात्रा के दौरान सात्विक एवं संयमित जीवन का पालन करें। मांसाहार, मदिरा, तंबाकू, गुटखा एवं अन्य नशीले पदार्थों का पूर्ण त्याग रखें। क्रोध, विवाद, अनावश्यक मनोरंजन एवं अपशब्दों से बचें। पितरों का स्मरण करते हुए शांतिपूर्वक यात्रा करें।

⑥ भोजन संबंधी नियम

यात्रा एवं श्राद्ध के दिनों में यथासंभव सात्विक भोजन करें। बाहर का अनावश्यक भोजन न करें। भोजन के संबंध में अपने आचार्य पंडित जी के निर्देशों का पालन करें।

⑦ पितरों की सही जानकारी

जिन पितरों का श्राद्ध एवं पिंण्डदान करना है, उनके नाम, गोत्र, संबंध एवं कुल की सही जानकारी पहले से तैयार रखें, ताकि पूजा विधि में किसी प्रकार की त्रुटि न हो।

⑧ गया जी में पूजा-विधि

गया जी पहुँचने के बाद पिंण्डदान, तर्पण, श्राद्ध एवं विभिन्न वेदियों की पूजा आचार्य पंडित जी के मार्गदर्शन में विधिवत संपन्न करें। कोन-सी वेदी पर किस क्रम से पूजा करनी है, यह वहाँ के निर्धारित पांडत और आचार्य में निर्देशानुसार किया जाएगा।

⑨ क्षौर कर्म (मुंण्डन)

मुंडन अथवा क्षौर कर्म का नियम प्रत्येक कुल एवं परंपरा में अलग हो सकता है। इसे अपने आचार्य पंडित जी के निर्देशानुसार ही करें ।

विशेष

- गया श्राद्ध अत्यंत श्राद्धा एवं पितृ स्मरण का धार्मिक अनुष्ठान है। इसलिए पूरी यात्रा के दौरान मन, वचन और कर्म से संयम रखते हुए श्राद्धापूर्वक पितरों का स्मरण करें और सभी धार्मिक विधियौं आचार्य पंडित जी के मार्गदर्शन में पूर्ण करें

नवरात्रि पर साधना

नवरात्रि के पावन अवसर पर सभी साधकों को बहुत-बहुत शुभकामनाएं और ढेर सारी बधाई मित्रों में आपको तीन मंत्र दे रहा हूं यह मंत्र आपको कहीं नहीं मिलेंगे प्राचीन हस्थ लिखित किताब से मैं आपको दे रहा हूं आप नवरात्रि को इस मंत्र को सिद्ध करके अपना कार्य कर सकते हैं साधारण सीधी हैं 9 दिन तक प्रतिदिन एक माला 108 जप करें रुद्राक्ष की माला दीपक नालेर की जोत एक या दो प्रकार के धुप थोड़ा सा नवाद मिस्री का भोग दे अगरबत्ती जलाएं और देवता का फोटो सामने होनी चाहिए यह उसकी तस्वीर आपके सामने होनी जरूरी है शुद्ध आसन उनका या फिर कुछ आसान घाश फुस्का होना चाहिए 

Saturday, 19 September 2026

गाली उसकी उत्पत्ति

गाली
१. शब्दार्थ-इसे संस्कृत में अपशब्द कहा गया है। व्याकरण या उच्चारण की अशुद्धि, अशुद्ध शब्दों का प्रयोग भी अपशब्द है। इसके अतिरिक्त किसी की निन्दा या उसे दुःखी करने के लिए कहा वाक्य भी अपशब्द है, जिसे गाली कहते हैं। संस्कृत में इसके लिए गालिः शब्द भी है। इसका मूल है-गल्ह कुत्सायाम् (धातु पाठ, १/२७५)। 
ददतु ददतु गालिर्गालिवन्तो भवन्तो, वयमपि तदभावाद् गालिदाने‍ऽप्यशक्ताः।
जगति विदितमेतद् दीयते विद्यमानं, ददतु शशाविषाणं ये महात्यागिनोऽपि॥ 
(भर्तृहरि का वैराग्य शतक, १३३)
= आप कर्म दोष से गाली दें, गालीवान् बनें। हमारे पास यह नहीं है, अतः गाली देने में असमर्थ हैं। संसार में प्रसिद्ध है कि जिसके पास जो है वही दे सकता है। खरहे के सींग जैसा जो नहीं है उसे कैसे दे सकता है?
२. गाली प्रवृत्ति-बचपन से जिसे संगति के कारण गाली देने का अभ्यास है, वही गाली दे सकता है। अभ्यास नहीं रहने पर वह अन्य शब्दों से विरोध करेगा, या उसका फल नहीं होने पर चुप रहेगा।
सारल्यं खलगालिदानसहनं येषां न तत् संनिधौ।
किञ्चित् कर्म कुकर्म दोष इति यद् विज्ञाय संत्यज्यते॥ (राजतरंगिणी, ७-३०४)
= (राजा कलश के विषय में) दुष्टों का गाली-दान सहन करना सरलता मानता था। ऐसी स्थिति में उसके सामने कौन सा कर्म कुकर्म मान कर त्यागा जा सकता था? 
गाली का प्रयोग म्लेच्छ लोगों द्वारा होता था और अशुद्ध भाषा बोलने वाले को भी म्लेच्छ कहते थे।
तेऽसुरा आत्तवचसो-हेलवो हेलव इति वदन्तः पराबभूवुः॥२३॥ तत्रैतामपि वाचमूदुरुपजिज्ञास्याम्। स म्लेच्छः। तस्मान्न ब्राह्मणो म्लेच्छेत्। असुर्या हैषा वाक्। एवमेवैष द्विषतां सपत्नानामादत्ते वाचम्। (शतपथ ब्राह्मण, (३/२/१/२३-२४)
(देवों ने शुद्ध वाणी ले ली) तो असुर कुछ कह न सके और ’हे ऽलवो, हे लवः (हाय वाक्, Hi, Hello) कह कर पराजित हो गये॥२३॥ इस प्रकार उन्होंने अर्थहीन वाणी बोली। ऐसी वाणी जो बोलता है, वह म्लेच्छ है। इस लिए कोई ब्राह्मण म्लेच्छ भाषा न बोले, क्योंकि यह असुरों की भाषा है। इसी प्रकार वह शत्रु को भाषा से वञ्चित कर सकता है॥२४॥ 
३. गाली परम्परा-
(१) महाभारत, कर्ण पर्व के अध्याय ३६-४१ तक कर्ण और उनके सारथि शल्य में विवाद हुआ। अध्याय ३९ में शल्य ने कर्ण को अर्जुन रूपी सिंह के सामने गीदड़, चूहा. बिल्ली, कुत्ता आदि कहा, तो अध्याय ४० में कर्ण ने शल्य तथा उनके मद्र देश के निवासियों तथा उनकी स्त्रियों के दुश्चरित्र का वर्णन किया।
मद्रदेश का अधम मनुष्य सदा मित्रद्रोही होता है। जो हमलोगों से अकारण द्वेष करता है वह मद्र देश का ही अधम मनुष्य है। क्षुद्रतापूर्ण वचन बोलने वाले मद्र देश के निवासियों में किसी के प्रति सौहार्द्र नहीं होता। मद्रदेश निवासी सदा ही दुरात्मा, सर्वदा झूठ बोलने वाला और कुटिल होता है। सुना है कि मरते समय तक उनमें कुटिलता रहती है। सत्तू और मांस खाने वाले जिन अशिष्ट मद्र निवासियों के घरों में पिता, पुत्र, माता, सास, ससुर, मामा, बेटी, दामाद, भाई, नाती, पोते, अन्यान्य बन्धु-बान्धव, समवयस्क मित्र, दूसरे अभ्यागत अतिथि और दास-दासी-ये सभी अपनी इच्छा के अनुसार एक दूसरे से मिलते हैं। परिचित-अपरिचित स्त्रियां सभी पुरुषों से सम्पर्क करलेती हैं और गोमांस सहित मदिरा पीकर रोती, हंसती, गाती, असंगत बातें करती तथा कामभावना से किये जाने वाले कार्यों में प्रवृत्त होती हैं। जिनके यहां सभी स्त्री-पुरुष एक दूसरे से काम सम्बन्धी प्रलाप करते हैं, जिनके पाप कर्म सर्वत्र विख्यात हैं, उन घमण्डी मद्र निवासियों में धर्म कैसे रह सकता है? मद्र निवासी के साथ न वैर करे, न मित्रता। 
इसके बाद मद्र देश की स्त्रियों की बहुत प्रकार से निन्दा की गयी है। (अध्याय ४०, श्लोक २०-४३)।
(२) पाश्चात्य प्रभाव-मद्र देश ईरान के उत्तर पश्चिम था। उसके निकट कम्बोज भी था जिसकी व्युत्पत्ति काम-भोज या स्वेच्छाचारी की गयी है। स्त्रियों के चरित्र सम्बन्धी गाली भारतीय स्वभाव नहीं था। शिशुपाल ने भी भगवान् कृष्ण को युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ में १०० गालियां दीं, उनमें कोई भी स्त्री निन्दा नहीं थी। वे कृष्ण को दुश्चरित्र कह रहा था।
(३) लुटेरा आक्रमण- स्त्रियों से बलात्कार सम्बन्धी गालियां मुस्लिम आक्रमण के बाद आरम्भ हुईं, जिनके लिए वे लूट की सम्पत्ति (माल-ए-गनीमत) थीं।
भारत में जो सम्मानित थे, उनका सम्बोधन भी गाली हो गया। स्त्रियां २-३ चोटी रखती थी, अतः चोट्टी एक गाली हो गया। ब्राह्मण या संन्यासी भी चोटी रखते थे, उनके लिए चोट्टा गाली हुआ। जैन और कई अन्य संन्यासी मुण्डन या लुञ्चन करते थे। उनके लिए लुच्चा गाली हुई।
४. कुछ गाली शब्दों के स्रोत-
(१) चुद-प्रेरणा अर्थ में २ धातु हैं-नुद् प्रेरणे (धातु पाठ, ६/२); चुद् संचोदने (१०/३३)। नुद का बाहरी प्रभाव होता है, चुद् से भीतरी प्रेरणा तथा प्रभाव होता है, जैसा गायत्री मन्त्र के तृतीय चरण में है-धियो यो नः प्रचोदयात्।
(२) बूर-हिन्दी शब्द कोष के अनुसार अर्थ-
बूर : पुं० [देश०] १. पश्चिमी भारत में होनेवाली एक प्रकार की घास जिसके खाने से गौओं, भैसों आदि का दूध और अन्य पशुओं का बल बहुत बढ़ जाता है। खोई। २. पशुओं के खाने का कटा हुआ चारा। ३. निकम्मी, फालतू या रद्दी चीज। ४. कुछ विशिष्ट प्रकार के कपड़ों के ऊपर निकले हुए रोएँ। जैसे—बूरदार कम्बल, बूरदार तौलिया। ५. एक प्रकार की मिठाई जो अन्न की भूसी या छिलके से तैयार की जाती है। उदा०—बूर के लड्डू खाये तो पछताये, न खाये तो पछताये। (कहा०) 
स्त्री०= बुर (भग)। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
बूरा  : पु० [हिं० भूरा] १. कच्ची चीनी जो भूरे रंग की होती है। शक्कर। २. एक प्रकार की साफ की हुई बढ़िया चीनी। ३. महीन चूर्ण।
(३) चूत, चूतिया- मूल धातु-चुत् स्रवणे = चूना, गीला करना। च्युतिर् (च्युत्) आसेचने (१/३३) -सींचना, गीला करना। च्युङ् गतौ (१/६८४)-गिरना, भटकना।
च्युङ् से च्युत (गिरा हुआ), अच्युत (कभी गिरा नहीं। इन्द्र को अच्युत-च्युतः कहते थे-जो अभी तक किसी से नहीं हारा, उसे भी इन्द्र हराते थे। 
यो विश्वस्य प्रतिमानं बभूव यो अच्युतच्युत स जनास इन्द्रः॥ (ऋक्, २/१२/९)
जो विश्व के लिए मापदण्ड है, अच्युत को भी च्युत कर सके, वह इन्द्र है।
शिष्टाचार नियम के अनुसार राजा, गुरु, पति, पत्नी और ज्येष्ठ पुत्र को नाम से नहीं बुलाते थे। अतः इन्द्र या पति को स-जना = वह व्यक्ति कहते थे।
इन्द्र पूर्व के लोकपाल थे, अतः असम में राजा के लिए अच्युत-च्युत या चूतिया शब्द प्रचलित हुआ। चूतिया राजवंश ने असम में ५०० वर्ष शासन किया था। शासक अत्याचार करने के कारण लोकप्रिय नहीं होते, अतः चूतिया शब्द निन्दित हुआ। या चूत में लिप्त रहने वाला चूतिया है।
चूतियापा का मूल हिब्रू शब्द चुतपा (Chutzpah) है, जो किसी से दबे नहीं, अच्युतच्युतः। 
(४) छिनार, छिनाल-हिन्दी शब्दसागर-छिनाल ^१ वि॰ स्त्री॰ [सं॰ छिन्ना+नारी; देशी छिणणालिआ, छिणणाली पू॰ हिं॰ छिनारि] व्यभिचारिणी । कुलटा । परपुरुषगामिनी । उ॰—अरे यह छिनाल बड़ी छतीसी है ।— भारतेंदु ग्रं॰, भा॰ १, पृ॰ ३१ ।
(५) बीया-भोजपुरी में बीज का अपभ्रंश है, पर ओड़िया में गाली है, चूत अर्थ में।
(६) घिंया = ओड़िया गाली-घृणित अर्थ में। या घञ् सम्प्रसारणे-घूंसा, भोजपुरी में मार के छितरा द। पंजाबी में छित्तर।
(७) पिल्ला-हिन्दी में यह गाली है। मूल अर्थ है कुत्ता का बच्चा। दक्षिण भारत में हर बच्चे को पिला कहते हैं। माता के शरीर से पुत्र का शरीर बनता है, पार्वती के उबटन लेप से गणेश का जन्म हुआ। अतः गणेश को पिल्लैयार कहते हैं। मूल धातु है- पिल क्षेपे (१०/५९)-फेंकना, काम में लगाये रखना, छिलका उतारना। पार्वती के आवरण से गणेश बने थे। केरल में पिल्लै उपाधि है।
(८) चुहाड़-मुष स्तेये (१/४५८)-चोरी अर्थ में। इससे मूषिक (मूस) हुआ है जो घर के अन्न चुरा कर अपने बिल में जमा करता है। मूस को चूहा भी कहते हैं-वह काटता है, चूर्ण करता है -चुडि (चुण्ड) अल्पीभावे (१/२१६) या चुडि (चुण्ड) छेदने (१०/१२८)। अतः धान को चूर्ण करने पर चूड़ा बनता है। चूहा जैसा चोरी करने वाले को चुहाड़ या चोर चुहाड़ कहते हैं। पंजाबी में चूहड़ लिखते हैं, किन्तु उच्चारण चूड़ करते हैं। अतः हिन्दी का चूड़ा पंजाबी में गाली हो जाता है।
(९) उधिया जा, ऊफर पड़-मृत पितर को पिण्डदान के समय भूमि के प्रेतों से कहा जाता है कि वह थोड़ा खिसक जायें (उदीरताम्), बीच में हवा के प्रेत कुछ और ऊपर जायें (उत्परासः), जिससे प्रेत के भोजन के लिए स्थान बन जाये। 
उदीरतां अवर, उत्परास उन् मध्यमाः, पितरः सोम्यासः (ऋक्, १०/१५/१)
उदीरतां = उधिया जा, उत्परासः = ऊफर पर। यह मृतक को कहते हैं, अतः जीवित के लिए गाली है।

असम में 'चूतिया' या 'चूटिया' एक प्रतिष्ठित जाति व सरनेम है, लेकिन इस नाम की उत्पत्ति का मुख्य कारण आम के बगीचे होना नहीं है। इस समुदाय का नाम उनकी अपनी मूल देओरी-चूतिया भाषा से आया है, जिसमें 'चु' का अर्थ शुद्ध या अच्छा, 'ति' का अर्थ पानी और 'या' का अर्थ मूल निवासी होता है, जिसका पूरा मतलब "शुद्ध पानी या नदियों के किनारे रहने वाले मूल निवासी" है। प्राचीन ग्रंथों में इन्हें 'च्युतिका' भी कहा गया है जिसका अर्थ उत्कृष्ट या शुद्ध वंश से उपजे लोग होता है, जो समय के साथ स्थानीय उच्चारण के कारण 'चूतिया' (उच्चारण: शुतिया या सुतिया) बन गया। संक्षेप में, यह असम का एक गौरवशाली शाही उपनाम है जिसका हिंदी भाषा के किसी अपशब्द या आम की खेती से कोई संबंध नहीं है। 

12वीं से 16वीं शताब्दी (1187 से 1524 ईस्वी) तक असम में 'चूतिया' राजवंश का शक्तिशाली साम्राज्य रहा है।

गाल, गाली और गालियाँ ...
खरी खरी सुनाने, चुहल करने, व्यंग्य और ... औकात 
दिखाने के लिए... ये मूल कारण है। 
1990 में जब शोध कर रहा था, गाली गायन रीति वाली सगे समधी की गालिया भी जमा की। 
गाली वाले शिलालेख भी मिले और आश्चर्य कि ये शिलालेख मंदिरों, देवस्थानों पर खड़े किए जाते। हरियाणा से तेलंगाना तक गद्देगाल जैसी भयानक / असहनीय / निष्कृष्ट गाली वाले शिलालेख चित्र सहित मिलते हैं... गद्देगाल यानी यह आज्ञा जो दी जा रही है, स्वीकारनी होगी अन्यथा तुम्हारी मां पर गधा पूगेगा! इस गाली के शिलालेख कोई डेढ़ हजार साल से मिल रहे हैं। हर क्षेत्रीय भाषा और नंदीनागरी से देवनागरी तक! 

Thursday, 17 September 2026

क्षेत्रपाल कौन

💥क्षेत्र पाल कौन है और विशेषता क्या है💥
🏵️ बहुत से लोग पूछते हैं कि क्षेत्रपाल कौन हैं ?
🎷1. ये स्वरूप किसका है ?
🙏शास्त्रों के अनुसार क्षेत्रपाल साक्षात् भगवान शिव के अंश , कालभैरव का ही स्वरूप हैं ।
🫵 लिंगपुराण में इन्हें "क्षेत्रपाल भैरव" कहा गया है । लोक भाषा में इन्हें ही खेतल,खेतपाल , भैरू बाबा, खंडोबा कहा जाता है।
🫵 शिवपुराण के अनुसार राक्षसों से पृथ्वी की रक्षा के लिए भगवान शिव ने ही क्षेत्रपालों को प्रकट किया ।
🎷2. कितने माने गए हैं ?
🙏मुख्य रूप से 8 क्षेत्रपाल माने गए हैं - जो 8 दिशाओं के रक्षक होते हैं, और ये 8 भैरव 
🔥1. असितांग भैरव 🔥2. रुद्र भैरव 
🔥3. चन्द्र भैरव 
🔥4. क्रोध भैरव 
🔥5. उन्मत्त भैरव 
🔥6. कपाल भैरव 
🔥7. भीषण भैरव 
🔥8. संहार भैरव 
🎷आगम शास्त्रों में इनका विस्तार 52 भैरव, 64 क्षेत्रपाल और 96 तक बताये गये है । 💐 जैन परम्परा में 96 क्षेत्रपाल का वर्णन है । हर गाँव, नगर, तीर्थ और श्मशान का अलग अलग क्षेत्रपाल होता है ।
💢3. कार्य क्या है ?
शब्द ही अर्थ है "क्षेत्रं पालयति इति क्षेत्रपाल:" जो क्षेत्र की रक्षा करे वो क्षेत्रपाल ।
💥शास्त्रों में 3 मुख्य कार्य बताए गए हैं 💥
💐 सुरक्षा करना ...
गाँव, खेत, मंदिर की सीमा और मर्यादा की रक्षा। इसीलिए इनका मंदिर गाँव के बाहर या शिव मंदिर के ईशान कोण में बनाया जाता है ।
💐न्याय करना ...
 ये न्याय के देवता हैं । अच्छे को पुरस्कार और बुरे को दण्ड देते हैं।
💐विघ्न हटाना ...
 वास्तु पूजा में क्षेत्रपाल की पूजा इसलिए अनिवार्य है कि बिना इनकी आज्ञा के उस भूमि पर कोई भी देवता पूजा स्वीकार नहीं करते । नया घर, खेत लेने पर पहले क्षेत्रपाल को रोट, भोग लगाया जाता है । 
🫵 इसलिए कहा भी गया है ...
जिस क्षेत्र में रहो, उस क्षेत्र के क्षेत्रपाल को प्रणाम ( पूजा ) करके रहो तो कोई संकट नहीं आता है ।
🙏जय श्री क्षेत्रपाल भैरव नाथ🙏
#क्षेत्रपाल #भैरव #सनातनधर्म