Thursday, 12 March 2026

मनु स्मृति

मनु स्मृति कब लिखी गई से ज्यादा बड़ा सवाल है कि इसमें संशोधन या प्रक्षेपण कब-कब हुआ? षड्यंत्रकारी अंग्रेजों के संपादन से, उनकी प्रेस से छपकर जो देश भर में बांटा गया, वही असली मनु स्मृति है, इसे कैसे सत्य मान लें? भारत में प्रेस प्रौद्योगिकी के विकास के साथ इस ग्रंथ मनु स्मृति को ही सबसे पहले ब्रिटिश प्रेस ने क्यों प्रकाशित किया? 

आंख मूंद कर, दिमाग बंदकर सब कुछ मानने का समय अब जा चुका है। अब तो हर मुद्दे पर सवाल उठकर ही रहेगा। कुछ बड़े लोग कुछ ज्यादा बोलने के आदी हो गए हैं, उनसे निवेदन है कि अब सावधान हो जाएं, बिना शोध और अनुसंधान के कुछ। भी बोलने से बचें। क्योंकि बोलेंगे तो सवाल भी उठेंगे। हर विषय को सवालों की तीखी बौछार से गुजरना होगा। सवाल उठाने से रोकना गैर-अकादमिक है।

सबसे बड़ा सवाल है कि मनु स्मृति के कथित विभेदकारी सूत्रों के बारे में अंग्रेजों के भारत आगमन के पूर्व के भारतीय बौद्धिक मन में कोई प्रश्न कभी भी क्यों नहीं उठा? क्यों भगवान बुद्ध से लेकर कामंदक, बाणभट्ट से लेकर रैदासजी, कबीर आदि तक किसी ने मनु स्मृति पर नाम लेकर कटाक्ष क्यों नहीं किए? आखिर मनु स्मृति के विभेदकारी सूत्रों पर भारतीय बौद्धिक मन का ध्यान अंग्रेजों के प्रकाशन के बाद ही क्यों गया? अंग्रेजों के पहले पूरे भारतीय भक्ति साहित्य या किसी अन्य साहित्य में बौद्ध-जैन आदि में मनु के विरूद्ध एक पंक्ति नहीं लिखी है तो क्यों नहीं लिखी है? क्या बुद्ध ने इसलिए मनु स्मृति के विरूद्ध बोलना उचित नहीं माना कि वह उन्हीं के कुल में जन्में थे? ध्यान रहे कि बुद्ध इक्ष्वाकु कुल के थे और इक्ष्वाकु कुल के मूल आदिपुरुष मनु महाराज ही बताए गए हैं।

तो इतना आसान नहीं है किसी निष्कर्ष पर पहुंचना। 

सदैव ध्यान में रखिए कि मनु स्मृति का पहला प्रकाशन (लेखन नहीं) ब्रिटिश राज में प्रिंटिंग प्रेस आने के बाद 1776 में विलियम जोन्स ने कराया था। इसके पीछे बंगाल (ब्रिटिश इंडिया) के पहले गवर्नर-जनरल वारेन हेस्टिंग्स का सीधा निर्देश था।

कहते हैं कि इसके प्रकाशन के पहले विलियम जोन्स की सलाह से 11 बड़े पंडितों की कमेटी बनाई गई। रॉयल एशियाटिक सोसायटी ऑफ बंगाल ने एक बड़े प्रोजेक्ट के अंतर्गत देश में तब तक मनु स्मृति की प्राप्त कथित पांडुलिपियों को जो भोजपत्र पर या ताड़पत्र पर अंकित थीं, उनका संकलन इस कमेटी के सुपुर्द किया। कहा गया कि न्याय को मानने वाली ब्रिटिश राज की कोर्ट हिंदू प्रजा को उसकी विधि से न्याय देगी, इसलिए हिंदुओं की विधि का संकलन, प्रकाशन आवश्यक है। मुस्लिम प्रजा को मुस्लिम विधि से न्याय दिया जाएगा। इसी घोषणा के द्वारा विभाजन के विषबीज को ब्रिटिश हुकूमत ने भारत में रोप दिया।

इस समिति में पंडित तर्कवाचस्पति, तर्क पंचानन, न्याय पंचानन, बाणेश्वर विद्यालंकार (बर्दवान) आदि अनेक शाही संरक्षण में अथवा सरकारी धन पर आश्रित बंगाली पंडित सम्मिलित थे। इस कमेटी में काशी की विद्वत्त पंरपरा या काशी की वैदिक पंरपरा में शिक्षित कोई ब्राह्मण सम्मिलित नहीं किया गया। क्यों ऐसा किया गया? क्योंकि काशी गणराज्य में कभी भी कोई अछूत जाति इतिहास के किसी काल में नहीं रही। आज तो होने का कोई प्रश्न ही नहीं। 

अंग्रेजी राज की पहली संपादन समिति विलियम जोन्स की अध्यक्षता में गठित की गई। इसमें जो 11 विद्वान थे, सभी बंगला भाषी, संस्कृत परंपरा से लिए गए। विधि के जानकार थे। सभी अंग्रेजों द्वारा उपकृत जमींदारों, राजपरिवारों की परंपरा से शिक्षा सेवा में जुटे थे, अनेक नए सरकारी स्कूलों में पद प्रतिष्ठित हो गए थे।
इस कमेटी के सभी विद्वानों को बड़ी भारी स्कॉलरशिप या फेलोशिप दी गई। मुंहमांगी कीमत दी गई। विलियम जोन्स ने इनके सामने एक समग्र विधि संग्रह और विशेष रूप से मनुस्मृति के प्रकाशन की अवधारणा प्रस्तुत की। 

इसके नोट्स रॉयल एशियाटिक सोसायटी ऑफ बंगाल की जिल्दों में मिल सकते हैं, काफी सामग्री लंदन स्थित ऑफिस से मिल सकती है, जैसा कि मेरे गुरुदेव प्रो. कमलेश दत्त त्रिपाठी ने मुझे बताया था कि मेधातिथि, कुल्लुक भट्ट की टीका या उनके भाष्य के साथ की कथित मनु स्मृति की पांडुलिपि की अनेक जीर्ण प्रतियां समिति को दे दी गईं। उनकी जांच परम आवश्यक है कि क्या वह सचमुच मनु स्मृति थी? वह प्रतियां विलियम जोन्स को सबसे पहले मिली तो कहां से मिली? किसने दी? उन प्रतियों का मिलान क्या दूसरी पांडुलिपियों से किया गया? केरल, कश्मीर, कोलकाता, काशी, जयपुर, पुणे, भुवनेश्वर, कांची, बदरीनाथ मठ, केदारनाथ, द्वारिका, उज्जैन से कौन कौन सी पांडुलिपियां मिलीं और क्या उनका भी मिलान किया गया? इन प्राचीन स्थानों से यदि मनु स्मृति की पांडुलिपि नहीं मिली तो क्यों नहीं मिली, और यदि मिली हैं तो वह कहां कहां सुरक्षित और संरक्षित हैं, आदि अनेक सवालों का उत्तर आज की नई पीढ़ी मांग रही है।

इस आरोप के संदर्भ में अनेक तथ्य प्रकाश में हैं कि इस संपादन प्रक्रिया में कालांतर में मनचाहे तरीके से भोजपत्रों के जीर्ण पन्ने इधर-उधर से लाकर मनु स्मृति के नाम पर घुसा दिए गए। और इसके लिए भी भारी षड्यंत्र सोसायटी के अंग्रेज अफसरों ने पहले ही रच रखा था।
पहला प्रकाशन 1776 में ही हो गया। किंतु बाद में ध्यान में आया कि बहुत कुछ नया कूट रचित श्लोक तो इसमें डाला ही नहीं जा सका। तो पुनः 1886 में, 1894 में मनु स्मृति का नए सिरे से ब्रिटिश प्रेस ने प्रकाशन किया।

यहां यह तथ्य उल्लेखनीय है कि अंग्रेजों ने इस बीच मुंह मांगी कीमत पर देश के प्रत्येक राजमहल के पुस्तकालयों को खंगाल डाला और जहां भी पांडुलिपियां थीं, उन्हें संरक्षण देने के नाम पर रॉयल एशियाटिक सोसायटी के दफ्तर में अनिवार्य रूप से जमा कराने का आदेश सभी जिलाधिकारियों, ऑर्कियालॉजी या प्राचीन इतिहास पर काम कर रहे अंग्रेज विद्वानों को जारी कर दिया।

यह भी कहा गया कि सभी का प्रकाशन सजिल्द सोसायटी के द्वारा करवाकर सभी को संरक्षित और सुरक्षित कर दिया जाएगा। देश के अनेक भोले विद्वानों ने, अंग्रेजी कृपा और धन से संरक्षित लोगों ने पांडुलिपि की प्रतियां अंग्रेजों के हवाल कर दीं।

इस प्रकार षड्यंत्रपूर्वक प्रथम संपादक विलियम जोन्स जो कि उस समय की सर्वोच्च ब्रिटिश अदालत का जज था, उसने मनु स्मृति का प्रकाशन कराया। नियमानुसार वही इसका प्रथम लेखक और संपादक हुआ, इस मनु स्मृति की प्रथम प्रकाशक ब्रिटिश हुकूमत है।

इसमें जितनी मिलावटें की गईं, इनके विरोधाभासी श्लोक मनु स्मृति में मिलते हैं तो यही कारण है कि मिलावट की गई, जिसमें विलियम जोन्स ने संपादन किया।
मुझे मेरे गुरुदेव ने बताया था कि पूरे भारतीय वांग्मय में मनु स्मृति के भेदभाव परक श्लोक अन्य नीतिग्रंथों में या प्रमुख नीतिकारों के ध्यान में क्यों नहीं आए? 
आखिर मनु स्मृति के श्लोकों पर महात्मा बुद्ध का ध्यान क्यों नहीं गया? क्यों कौटिल्य के ग्रंथ में भेदभाव का मनु स्मृति आधारित उल्लेख उद्धृत नहीं है? क्यों नीति मयूख में या कामंदकीय नीतिसार में जो पांचवीं सदी का नीति ग्रंथ है, या उसके बाद के नीतिकार सोमदेव सूरि के ग्रंथ में, वीर मित्रोदय में, मानसोल्लास में मनु स्मृति के भेदभावपरक श्लोक का कोई उल्लेख नहीं है?

क्योंकि अनेक नीति ग्रंथ अंग्रेजों का हाथ नहीं लग सके। कौटिल्य अर्थशास्त्र का प्रकाशन तो गणपति शास्त्री और शाम शास्त्री ने 1904-05 में किया। अंग्रेज खोजते रह गए लेकिन कौटिल्य अर्थशास्त्र उन्हें नहीं मिला। 

वो उसे लेकर उसमें मिलावट कर पाते, उसके पहले ही मैसूर के महाराज ने उसे छाप दिया। अंग्रेज को काटो तो खून नहीं। इसलिए तब के अंग्रेज विद्वानों ने इस कौटिल्य अर्थशास्त्र को सच मानने से इंकार किया। ये तो बाद में एक पांडुलिपि बाली से मिल गई, कुछ मूल बौद्ध पांडुलिपियां श्रीलंका से मिलीं जिसमें कौटिल्य का जिक्र था, और इनका मूल से मिलान हुआ तब पता चला कि कौटिल्य अर्थशास्त्र सत्य है।

आज इन मौलिक प्रश्नों का उत्तर खोजा जाना अनिवार्य है कि

1-यदि मौजूदा मनु स्मृति सत्य है और इसमें मिलावट नहीं है तो इस तथ्य का स्पष्टीकरण दें कि आखिर बुद्ध, कौटिल्य, कामंदक, सोमदेवसूरि, बाण भट्ट, रामानुज, रामानंद, रैदास, कबीर आदि ने क्यों कभी मनु स्मृति पर प्रश्न नहीं उठाए? इसके उलट सभी ने मनु का नाम जब भी लिया है, आदर से लिया है। रैदास जी की वाणी में भी मनु का नाम आदर से लिया गया है।

2-यदि मिलावट नहीं है तो रॉयल एशियाटिक सोसायटी का मौजूदा ऑफिस सन् 1776 में प्रकाशित मनु स्मृति की मूल कॉपी को सार्वजनिक क्यों नहीं करता? क्यों पहली प्रति आउट ऑफ प्रिंट बताकर फिर से 1786, 1794 में मनु स्मृति का प्रकाशन किया गया? 

3-और जिन पांडुलिपियों के आधार पर मनु स्मृति प्रकाशित की गई, वह पांडुलिपियां आखिर रॉयल एशियाटिक सोसायटी ने क्यों जला दीं? 

4-जिन पांडुलिपियों को संरक्षित करने के नाम पर लिया गया था, वह पांडुलिपियां यदि आज भी सुरक्षित हैं तो कहां हैं, और उन्हें क्योें कभी विद्वानों के लिए दोबारा सार्वजनिक नहीं किया गया? केवल अंग्रेजों द्वारा संकलित प्रति ही क्यों देश भर में बांटी जाने लगी या वितरित कराई गई, फिर जलाने और उसे लेकर सरकारी संरक्षण में गुलामी के समय में बहस आदि का प्रबंध कराया जाने लगा। 

जबकि देश जानता है कि परंपरा से किसी हिंदू घर में कभी मनु स्मृति रखने का ही विधान नहीं रहा।

3-यह प्रश्न इसलिए क्योेंकि मेरे गुरुदेव् प्रो. कमलेश दत्त त्रिपाठी ने अनेक अवसरों पर रॉयल सोसायटी के दफ्तर जाकर मूल पांडुलिपियों को देखने और पढ़ने की इच्छा प्रकट की थी जिनके आधार पर आज की मनु स्मृति विलियम जोन्स के संपादन और स्वामित्व में प्रकाशित की गई थी। लेकिन कभी मूल पांडुलिपि की प्रति उन्हें उपलब्ध नहीं कराई गई।

4-संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार Narendra Modi PMO India Gajendra Singh Shekhawat और आईसीएचआर-भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद और आईसीएसएसआर- भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद से मेरा विनम्र निवेदन है कि
-तत्काल अंग्रेजों के आगमन के पूर्व की मनु स्मृति की पांडुलिपि की खोज के लिए देश भर के समाचार पत्रों में विज्ञापन प्रकाशित करना चाहिए। 
-जिस पांडुलिपि के आधार पर संपादक विलियम जोन्स ने मनु स्मृति का पहला प्रकाशन कराया, उन पांडुलिपियों का पता लगाकर उन्हें सार्वजनिक किया जाना चाहिए।
-इस शोध आधारित अध्ययन के लिए वरिष्ठ विद्वानों की देख-रेख में समिति बनाकर इस कार्य के लिए सुदीर्घ प्रोजेक्ट स्वीकृत किए जाने चाहिए। 

-शोध पूर्वक इनमें देखा जाना चाहिए कि ये पांडुलिपि मनु स्मृति की हैं भी या नहीं है? या बनावटी और जाली, फर्जी पांडुलिपियों के जरिए भारत में बंटवारे की राजनीति को ही पुस्तक के रूप में प्रथम प्रकाशित किया गया।

आईसीएचआर और आईसीएसएसआर में बैठे हुए बड़े विद्वान प्रोफेसरों से मेरा आग्रह है कि यदि उन्हें कठिनाई है तो मैं स्वयं इस कार्य में समय देने को तैयार हूं। और भी लोग हो सकते हैं जिनके संपर्क में विद्वान प्रोफेसरों की बड़ी टोली रहती है। उनमें से भी नाम लिए जा सकते हैं, क्योंकि यह राष्ट्रीय महत्व का कार्य है। जो इस कार्य को बड़े पवित्र रूप से, बिना किसी पूर्वाग्रह के करने को तैयार हैं और सारी शोध प्रक्रिया को पारदर्शी ढंग से करना जानते हैं, उन्हें इस कार्य में शीघ्र लगाया जाना चाहिए।

मनु स्मृति की वह मूल पांडुलिपि खोजने का यही सही समय है। वह पांडुलिपि जो कम से कम किसी इंग्लिश विद्वान के हाथ न लगी हो और कम से कम 300-400 साल पुरानी हो, तभी दूध का दूध पानी का पानी हो सकता है।

निवेदन है कि जब तक यह शोध कार्य समाप्त न हो जाए तब तक मनु के नाम से किसी भी पुस्तक को गलत तरीके से उद्धृत करने पर रोक लगाई जानी चाहिए। यदि ऐसा संभव नहीं है तो जो पुस्तक अंग्रेजी राज में षड्यंत्रपूर्वक संपादित, प्रकाशित है, उसे मनु स्मृति का नाम देने की बजाए विलियम जोन्स द्वारा संपादित कथित मनु स्मृति ही कहा और लिखा जाना चाहिए।

मेरे गुरुदेव प्रो. कमलेश दत्त त्रिपाठी का निष्कर्ष था कि वर्तमान मनु स्मृति में बहुत से प्रक्षिप्त अंश संपादक विलियम जोन्स और वॉरेन हेस्टिंग्स के षडयंत्र का परिणाम है। रॉयल एशियाटिक सोसायटी ने अनेक पौराणिक ग्रंथ की पांडुलिपि जुटाकर उसमें गड़बड़ी पैदा की थी।

Thursday, 5 March 2026

होली होलिका

सभी कहानियों का सारांश नारद पुराण में है। इस ऋतु में रेंगने वाले कीड़े (असृक्पा = खून चूसने वाले, ओड़िया में असर्पा) होते हैं जिनसे बच्चों को अधिक खतरा है। उनको मारने के लिए होलिका दहन की परम्परा थी। होलिका द्वारा प्रह्लाद को जलाने की चेष्टा की कथा भी वहीं लिखी है। होलिका का अवतार पूतना को भी कहा है। कहीं उसे राजा बलि की पुत्री का भी रूप कहा है। किन्तु होलिका, पूतना आदि का वर्णन मुख्यतः बच्चों के संक्रामक रोगों के रूप में ही है।
नारद पुराण, अध्याय २४-फाल्गुने पूर्णिमायां तु होलिका पूजनं नरम्॥७६॥
संचयं सर्वकाष्ठानां उपलानां च कारयेत्। तत्राग्निं विधिवद्धुत्वा रक्षोघ्नैर्मन्त्र विस्तरैः॥७७॥
असृक्पा भय संत्रस्तैः कृता त्वं होलि बालिशैः। अतस्त्वां पूजयिष्यामि भूते भूतिप्रदा भव॥७८॥
इति मन्त्रेण संदीप्य काष्ठादि क्षेपणैस्ततः। परिक्रम्योत्सवः कार्य्यो गीतवादित्र निःसवनै॥७९॥
होलिका राक्षसी चेयं प्रह्लाद भयदायिनी। ततस्तां प्रदहन्त्येवं काष्ठाद्यैर्गीतमंगलैः॥८०॥
संवत्सरस्य दाहोऽयं कामदाहो मतान्तरे। इति जानीहि विप्रेन्द्र लोके स्थितिरनेकधा॥८१॥
यहां होलिका के २ अन्य अर्थ दिये हैं-संवत्सर का दाह, या काम दाह। 
संवत्सर समाप्ति इस मास में होती है, इस अर्थ में उसका दाह करते हैं। यह संवत्सर रूपी सृष्टि चक्र का अन्त है। या वर्ष की अग्नि समाप्त होती है, उसे पुनः जलाते हैं। 
काम दहन कई प्रकार का है। काम (संकल्प) से सृष्टि होती है।
कामस्तदग्रे समवर्तताधि मनसो रेतः प्रथमं यदासीत्। 
सतो बन्धुमसति निरविन्दन् हृदि प्रतीष्या कवयो मनीषा॥ (ऋक् १०/१२९/४)
इस ऋतु में सौर किरण रूपी मधु से फल-फूल उत्पन्न होते हैं, अतः वसन्त को मधुमास भी कहते हैं-
(यजु ३७/१३) प्राणो वै मधु। (शतपथ ब्राह्मण १४/१/३/३०) = प्राण ही मधु है।
(यजु ११/३८) रसो वै मधु। (शतपथ ब्राह्मण ६/४/३/२, ७/५/१/४) = रस ही मधु है।
अपो देवा मधुमतीरगृम्भणन्नित्यपो देवा रसवतीरगृह्णन्नित्येवैतदाह। (शतपथ ब्राह्मण ५/३/४/३) 
= अप् (ब्रह्माण्ड) के देव सूर्य से मधु पाते हैं।
भगवान् शिव द्वारा भी काम दहन की कथा है। 
संवत्सर चक्र के दोलन के रूप में इसे दोल पूर्णिमा कहते हैं।
मधुमास में नये फल फूल उत्पन्न होते हैं। नवान्न भोजन के पर्व भारत के सभी भागों में हैं। होलक-तृणाग्नि भृष्टार्हपक्व शमी धान्यम् (होरा, होरहा)।
भाव प्रकाश, पूर्व खण्ड, द्वितीय भाग, कृतान्न वर्ग-
अर्धपक्वैः शमी धान्यैः तृणभृष्टैव होलकः।
होलकोऽल्पानिलो मेदः कफदोषत्रयापहः।
भवेद्यो होलको यस्य स च तत्तद्गुणो भवेत्॥१६२॥
भगवान् श्रीकृष्ण को बाल्यकाल में मारने के लिए कंस ने पूतना राक्षसी को भेजा था। वह स्तन में विष लगा कर भगवान् को दूध पिला रही थी। पर भगवान ने विष छोड़कर उसकी प्राण-शक्ति को ही पी लिया। भागवत पुराण के दशम स्कन्ध में इसका वर्णन है जिसकी भक्तों ने कई प्रकार से व्याख्या की है।
आयुर्वेद ग्रन्थों में बच्चों के रोग, संक्रामक बीमारियों को बाल ग्रह कहा है। इनमें एक बाल ग्रह पूतना है। इसका पुराण तथा वेद में भी उल्लेख है। आयुर्वेद का वर्णन इस लिंक पर पढ़ सकते हैं।
https://vaidyanamah.com/putna-graha/?fbclid=IwAR2C8_fF0kyB43YzxbMRoahar9at33JkQquDKkpsSf0604LZ-c0z1c3Xru0


भविष्य पुराण, उत्तर पर्व, अध्याय १३२-युधिष्ठिर ने भगवान् कृष्ण से पूछा कि फाल्गुन पूर्णिमा के दिन हर घर में उत्सव क्यों मनाते हैं तथा बच्चे अश्लील शब्द क्यों कहते हैं। होली क्यों जलाते हैं? अडाडा तथा शीतोष्णा किसे कहते हैं? 
राजा रघु के काल में लोगों ने शिकायत की कि ढौण्ढा बच्चों को पीड़ित कर रही है और उसे रोकना कठिन है। इसका इतिहास वसिष्ठ ने कहा कि माली राक्षस की पुत्री ढौण्ढा को शिव का आशीर्वाद था कि वह देव, मनुष्य और शास्त्रास्त्र से अवध्य होगी। अतः उसे मारने के लिये बच्चे आग जला कर ३ परिक्रमा करते हैं और खुशी से सिंहनाद करते और ताली बजाते हैं। ढौण्ढा राक्षसी अडाऽयेति नामक मन्त्र का जप कर घरों में प्रवेश कर बच्चों को पीड़ित करती थी अतः उसे अडाडया कहते हैं। फाल्गुन पूर्णिमा के समय शीत का अन्त और ऊष्ण का आरम्भ होता है, अतः इसे शीतोष्णा कहते हैं। अतः भगवान् कृष्ण ने युधिष्ठिर से कहा कि फाल्गुन पूर्णिमा को लोगों को अभय दें जिससे वे स्वच्छन्द हास्य विनोद कर सकें।

Wednesday, 4 March 2026

होलिका-प्रह्लाद की कथा होली

होलिका-प्रह्लाद की कथा का सर्वाधिक प्राचीन, सर्वाधिक भौतिक और सर्वाधिक उपेक्षित आयाम उसका कृषि-आयाम है। और इस आयाम की कुंजी स्वयं नामों में छिपी है।

संस्कृत में होलिका शब्द होला से आता है, जिसका अर्थ है अर्ध-पकी हुई फसल, विशेषकर गेहूँ की हरी बाली (green ear of grain) । कुछ शब्दकोशों में होलाका का अर्थ है वह फसल जो आग में भूनी जाए। प्रह्लाद शब्द का एक अर्थ है प्र + ह्लाद — वह जो आनंद से परिपूर्ण हो — किंतु कृषि-संदर्भ में यह उस जीवित बीज या दाने (kernel) का प्रतीक है जो बाली के भीतर संरक्षित रहता है, जो कि अग्नि में बाहरी छिलका जल जाने के बाद भी जीवित रहता है और अंकुरित होने की क्षमता धारण करता है।

यह कोई आकस्मिक भाषाई संयोग नहीं है। यह उस प्राचीन काल की स्मृति है जब कथा और कृषि-विज्ञान एक ही भाषा बोलते थे, जब किसान और ऋषि एक ही व्यक्ति थे।

होली फाल्गुन मास की पूर्णिमा को मनाई जाती है — फरवरी के अंत से मार्च के प्रारंभ के बीच। भारतीय उपमहाद्वीप में गेहूँ, जौ और चने की रबी फसल के पकने का ठीक यही समय है। इस ऋतु में खेतों में गेहूँ की बालियाँ सुनहरी होने लगती हैं, फसल कटाई के कगार पर होती है, और कृषक समाज में एक विशेष उत्साह और उल्लास का वातावरण होता है।

होलिका दहन की परंपरा में आज भी — विशेषकर उत्तर भारत, राजस्थान, मध्यप्रदेश और गुजरात के ग्रामीण क्षेत्रों में — नई फसल की हरी बालियाँ अग्नि में डाली जाती हैं। इसे होला या होलका कहते हैं। किसान अपने खेत से ताज़ी गेहूँ और जौ की बालियाँ तोड़कर लाता है, उन्हें होलिका की अग्नि में भूनता है, और फिर उन भुनी हुई बालियों का प्रसाद ग्रहण करता है। यह नई फसल का प्रथम भोग है — उसे देवता को अर्पित करने की परंपरा।

यह परंपरा इस विश्वास पर आधारित है कि जब तक फसल को अग्नि में अर्पित न किया जाए, तब तक उसे खाना शुभ नहीं। यह वैदिक अग्निहोत्र की परंपरा का ग्रामीण विस्तार था — अग्नि देवता को नई उपज का पहला भाग अर्पित करना।

कृषि-रूपक में होलिका वह सूखी, पकी हुई बाली है जो फसल के पकने के साथ अपना उद्देश्य पूरा कर चुकी है। बाली (straw, husk, chaff) का काम था — दाने को आकाश से प्रकाश दिलाना, वर्षा का जल संग्रह करना, हवा से सुरक्षा देना, और दाने को परिपक्व करना। किंतु जब दाना पक जाता है, तो बाली की आवश्यकता समाप्त हो जाती है। वह सूख जाती है, उसका हरापन चला जाता है, और वह अग्नि के लिए उचित बन जाती है।

होलिका का अग्निरोधक वस्त्र — वह वरदान जो उसे आग से बचाता था — प्रकृति की उस नियामक शक्ति का प्रतीक है जिसने बाली को तब तक सुरक्षित रखा जब तक दाने को उसकी आवश्यकता थी। किंतु जब दाना पूर्ण हो गया — जब प्रह्लाद (बीज) की परिपक्वता आ गई — तो वह सुरक्षा अपने-आप हट गई। प्रकृति का यह नियम है: आवरण तब तक जब तक सत्त्व को उसकी आवश्यकता हो, और तत्पश्चात उसका स्वयं विलय।

यह कृषि-सत्य अत्यंत सूक्ष्म है। किसान जानता है कि जब फसल पक जाए, तो उसे काटना होगा। जो काटता नहीं, जो पकी बाली को खेत में ही रहने देता है, वह अंततः फसल खो देता है — बाली सड़ जाती है, दाना गिर जाता है। होलिका का जलना उस पके आवरण का समय पर विसर्जन है जो जीवन-चक्र के लिए अनिवार्य है।

प्रह्लाद वह गेहूँ का दाना है जो बाली के भीतर छिपा होता है। अग्नि उसका क्या कर सकती है? यदि आप गेहूँ की बाली को हल्की आँच में भूनें — जैसा होलिका दहन की परंपरा में होता है — तो बाहरी तना और पत्तियाँ जल जाती हैं, किंतु भीतर का दाना न केवल सुरक्षित रहता है बल्कि पकता है, सुगंधित होता है, और खाने योग्य बन जाता है। अग्नि यहाँ विनाशक नहीं है — वह परिष्कारक (refiner) है।

यह भौतिक वास्तविकता पौराणिक रूपक बन गई। जो प्रह्लाद (दाना) है, वह अग्नि में नष्ट नहीं होता, वरन् परिपक्व होता है। अग्नि उसकी परीक्षा है, उसका विनाश नहीं। प्रत्येक वर्ष किसान इस सत्य को होलिका दहन में पुनः अनुभव करता है जब वह भुनी हुई बाली का स्वाद लेता है और पाता है कि दाना मीठा, सुगंधित और जीवनदायी है।

इससे एक गहरा कृषि-दर्शन उभरता है: जो वास्तविक है — जो जीवन का सार है — वह अग्नि में नहीं जलता। जो जलता है वह केवल आवरण है, छाल है, वह अनावश्यक परत है जो सत्त्व को ढके हुए थी।

आज भी उत्तर भारत के गाँवों में होलिका दहन की रात एक विशेष दृश्य होता है। किसान परिवार अपने खेत की नई गेहूँ और जौ की बालियाँ लेकर होलिका की अग्नि के पास आते हैं। वे उन बालियों को अग्नि के इर्द-गिर्द घुमाते हैं — परिक्रमा करते हैं — और फिर उन्हें आँच के पास रखकर भूनते हैं। भुनी हुई बालियों को होला कहते हैं।

इस अनुष्ठान का गहरा अर्थ है। किसान कह रहा है: "हे अग्निदेव, यह नई फसल पहले तुम्हारी है। तुम्हें अर्पित करने के बाद ही हम इसे ग्रहण करेंगे।" यह कृतज्ञता का भाव है — प्रकृति को उसकी देन लौटाने का प्रतीकात्मक कार्य।

इस परंपरा को नवान्न (नया अन्न) की परंपरा से जोड़कर देखें। भारत के अनेक प्रदेशों में नई फसल का पहला अन्न सीधे नहीं खाया जाता — पहले उसे अग्नि, देवता या पितरों को अर्पित किया जाता है। यह कृषि-अग्नि उत्सव की परंपरा केवल भारत तक सीमित नहीं है। विश्व के लगभग हर कृषि-समाज में ऐसे उत्सव रहे हैं जिनमें नई फसल के अवसर पर अग्नि जलाई जाती है, पुराना नष्ट किया जाता है, और नए का स्वागत किया जाता है।

यूरोप का बेल्टेन (Beltane) स्कॉटलैंड और आयरलैंड में बेल्टेन उत्सव ठीक उसी समय होता था जब होली — वसंत के आगमन पर, मई-दिन के आसपास। उसमें भी विशाल अलाव जलाए जाते थे, पशुओं को उनके बीच से निकाला जाता था, और नई फसल की बालियाँ अग्नि में डाली जाती थीं। बेल का अर्थ है उज्ज्वल अग्नि या सूर्य; यह उत्सव सूर्य की पुनर्विजय और कृषि-वर्ष की नई शुरुआत का प्रतीक था।

रूस और पूर्वी यूरोप में मास्लेनित्सा वसंत से पहले का उत्सव है जिसमें शीत ऋतु की पुतली जलाई जाती है — यह होलिका के समान ही है। पुरानी फसल के अवशेष जलाए जाते हैं और नई फसल का स्वागत किया जाता है।

ईरान का नौरोज़ (Nowruz) फारसी नव वर्ष है जो वसंत विषुव पर होता है, उसमें चहारशंबे सूरी की परंपरा है — अलाव जलाकर उनके ऊपर से छलाँग लगाना। यह भी शीत और पुराने वर्ष के विसर्जन और नई ऊर्जा के स्वागत का प्रतीक है।

मेसोपोटामिया और मिस्र प्राचीन सुमेरियन और मिस्री सभ्यताओं में वसंत में फसल की पहली कटाई से पहले अग्नि-अनुष्ठान किए जाते थे। तम्मूज़ देवता का उत्सव — जो मरता है और पुनर्जीवित होता है — गेहूँ के दाने के जीवन-मृत्यु-पुनर्जीवन के चक्र का प्रतीक था।

यहूदी परंपरा का बिकूरीम (Bikkurim) भी यही है। तोरा में बिकूरीम की आज्ञा है — पहली फसल का पहला फल मंदिर में अर्पित करना। यह होला की परंपरा का हिब्रू समकक्ष है।

इन सभी परंपराओं में एक सार्वभौमिक कृषि-दर्शन है: पुराने को अग्नि में देना ताकि नया जन्म ले सके।

गेहूँ का दाना — जो ज़मीन में गाड़ा जाता है, "मरता" है, और तब अंकुरित होकर नई फसल बनता है — मृत्यु और पुनर्जन्म का सर्वाधिक प्राचीन और सार्वभौमिक प्रतीक रहा है।

न्यू टेस्टामेंट में स्वयं यीशु ने यह रूपक प्रयोग किया: "जब तक गेहूँ का दाना भूमि में गिरकर मरे नहीं, वह अकेला रहता है; परन्तु यदि मरे, तो बहुत फल लाता है।" And Jesus answered them, saying, The hour is come, that the Son of man should be glorified. Verily, verily, I say unto you, except a corn of wheat fall into the ground and die, it abideth alone: but if it die, it bringeth forth much fruit. He that loveth his life shall lose it; and he that hateth his life in this world shall keep it unto life eternal. यह वाक्य प्रह्लाद के कृषि-रूपक का लगभग शाब्दिक अनुवाद है। प्रह्लाद वह दाना है जो अग्नि (जो मृत्यु के समान है) में जाता है और जीवित निकलता है — और उसके जीवित निकलने से ही नई फसल का, नए युग का जन्म होता है।

एलेउसिनियन रहस्य (Eleusinian Mysteries) याद करना चाहिए। प्राचीन यूनान की इस सर्वाधिक पवित्र धार्मिक परंपरा का केंद्र भी यही था: डेमेटर (Demeter, अन्न-देवी) और उनकी पुत्री पर्सेफोन का मिथक, जो भूमि के नीचे (मृत्यु-लोक में) जाती है और वापस आती है। उनकी वापसी वसंत है, उनका प्रस्थान शीत है। रहस्य-दीक्षा में शिष्यों को गेहूँ की एक बाली दिखाई जाती थी — और यही उनकी परम दीक्षा थी। मृत्यु में से जीवन का उगना।

प्रह्लाद का वह दाना इसी ब्रह्मांडीय सत्य का हिंदू रूप है।

भारत की प्राचीन दृष्टि में कृषि-चक्र और ब्रह्मांडीय चक्र में कोई भेद नहीं था। जो ब्रह्मांड में होता है वही खेत में होता है; जो खेत में होता है वही मनुष्य की आत्मा में होता है। यही यथा पिंडे तथा ब्रह्मांडे का सिद्धांत है।

गेहूँ का बीज ज़मीन में जाता है → शीत में सोता है → वसंत में अंकुरित होता है → ग्रीष्म में पकता है → काटा जाता है → अग्नि में भूना जाता है → खाया जाता है → पुनः बीज बनता है। यह चक्र अनंत है। होली इस चक्र का उत्सव-बिंदु है — वह क्षण जब बीज ने अपनी यात्रा पूरी की, पकी बाली बनी, और अग्नि में अर्पित होकर अगले चक्र को आमंत्रित किया।

इसी ब्रह्मांडीय चक्र को रूपककथा में रखा गया: हिरण्यकशिपु (पुराना, शुष्क, विनाशकारी शीत का शासन), होलिका (वह बाली जो पक गई और जिसे जाना ही है), प्रह्लाद (वह जीवंत दाना जो अगले चक्र का वाहक है), और विष्णु (वह ब्रह्मांडीय व्यवस्था जो यह सुनिश्चित करती है कि जीवन का चक्र न रुके)।

होलिका दहन का अनुष्ठान, जब हम उसे कृषि-दृष्टि से देखते हैं, तो एक परिपूर्ण कृषि-विज्ञान के रूप में उभरता है: अग्नि से भूमि की शुद्धि होती है। होलिका दहन के पश्चात उस स्थान की राख (होली की राख) को शुभ माना जाता है। किसान उसे अपने खेत में मिलाते हैं। राख एक प्राकृतिक खाद है — पोटाश और अन्य खनिजों से भरपूर। यह अनुष्ठान भूमि को उर्वर बनाने का प्राचीन वैज्ञानिक तरीका था। मूल होली के रंग प्राकृतिक थे — टेसू (पलाश) के फूलों का केसरिया, हल्दी का पीला, नील का नीला। ये सभी वसंत में खिलने वाले पौधों से थे। रंग खेलना वास्तव में उस ऋतु के रंगों का उत्सव था — प्रकृति के स्वयं के रंगों से खेलना।होली के भोजन—गुजिया, ठंडाई, चना — होली के पारंपरिक व्यंजन हैं जो नई फसल के उत्पादों से बने हैं। गेहूँ का मैदा, गुड़ (गन्ने की नई फसल), छोले (नई चने की फसल) — यह नई फसल का प्रथम भोज है।

यों कृषि-रूपक और आत्मिक रूपक एक ही सत्य की ओर संकेत करते हैं।

कृषि में: बाली जलती है → दाना बचता है → नई फसल उगती है।वेदांत में: अहंकार (होलिका) जलता है → आत्मा (प्रह्लाद) बचती है → मुक्ति होती है। राजनीति में: अत्याचार जलता है → चेतना बचती है → नया युग आता है।

यह समानांतर संरचना आकस्मिक नहीं है। भारत के प्राचीन ऋषियों ने खेत में वही पढ़ा जो उन्होंने आत्मा में पढ़ा था। किसान जब अपनी फसल की बाली को आग में डालता था, तो वह अनजाने में उसी ब्रह्मांडीय सत्य को दोहरा रहा था जिसे योगी अपनी समाधि में अनुभव करता था।

यही भारतीय मिथक की महानता है: वह खेत को मंदिर बना देता है और मंदिर को खेत। वह किसान को योगी बना देता है और योगी को किसान। जब एक निरक्षर किसान होलिका दहन में अपनी गेहूँ की बाली जलाता है और भुने हुए दाने को प्रसाद के रूप में ग्रहण करता है — वह उतनी ही गहरी सच्चाई को जी रहा होता है जितनी शंकराचार्य अपने ब्रह्मसूत्र भाष्य में कह रहे थे।

इस कथा का सर्वाधिक दार्शनिक और तात्कालिक पाठ वेदांत की दृष्टि से है। अद्वैत वेदांत परंपरा में अस्तित्व की मूलभूत समस्या यह है कि आत्मा — जो ब्रह्म से अभिन्न है, सत्ता का सार्वभौमिक आधार — की अहंकार के साथ भ्रांत पहचान हो जाती है। यह निर्मित, सीमाबद्ध "मैं" की भावना है जो पृथकता, सत्ता और स्थायित्व का दावा करती है।

हिरण्यकशिपु का नाम ही शिक्षाप्रद है। "हिरण्य" का अर्थ है स्वर्ण; "कशिपु" का अर्थ है कोमल बिछौने या विलासी वस्त्र। वह, शाब्दिक अर्थ में, वह है जो सोने और रेशम पर विश्राम करता है — वह चेतना जो भौतिक पहचान में इस कदर विलीन हो गई है कि उसने अपने दिव्य मूल को भूल दिया है। वह अहंकार का सर्वाधिक फूला हुआ रूप है: एक वरदान प्राप्त करके जो उसे स्थायी बनाता है, उसने स्वयं को अमर, आत्मनिर्भर और वास्तविकता का सर्वोच्च सिद्धांत मान लिया है।

उसकी यह घोषणा कि वह, न कि विष्णु, सब कुछ का स्वामी है — अहंकार-चेतना का उद् घोष है। सीमित अनंत होने का दावा करता है, सशर्त नि:शर्त होने का दावा करता है। यही वेदांत में अहंकार है अपने सर्वाधिक विराट रूप में।

प्रह्लाद, इसके विपरीत, उस आत्मा का प्रतिनिधित्व करता है जो अपनी वास्तविक प्रकृति को जानती है। वह प्रह्लाद है — "जो आनंद देता है" या "जो आनंद से भरा है" — क्योंकि आत्मा, जब अपनी सच्ची प्रकृति में पहचानी जाती है, आनंद-स्वरूप होती है। वह अपने पिता का बल या तर्क से विरोध नहीं करता; वह बस वही है जो वह है। उसके होठों पर विष्णु का नाम केवल एक भक्तिपूर्ण कार्य नहीं है, बल्कि एक अद्वैत दार्शनिक कथन है: चेतना सदा अपने स्रोत की ओर संकेत करती रहती है।

यातना के प्रसंग — विष, हाथी, सर्प, चट्टानें — अहंकार के द्वारा साक्षी-चेतना को नष्ट या दबाने के बढ़ते प्रयासों का प्रतिनिधित्व करते हैं। अहंकार आत्मा की उपस्थिति को सहन नहीं कर सकता क्योंकि आत्मा का अस्तित्व ही अहंकार की सर्वोच्चता के दावे को झुठला देता है। और फिर भी, चूँकि प्रह्लाद आत्मा है, कुछ भी उसे अंततः हानि नहीं पहुँचा सकता। वेदांत की भाषा में, आत्मा नित्य (शाश्वत), चेतन (सचेतन) और निर्विकार (अपरिवर्तनशील) है। वह भौतिक जगत के विकारों से स्पर्शित नहीं हो सकती।

होलिका का अग्निरोधक वस्त्र गुप्त ज्ञान या तकनीक की शक्ति का प्रतीक है — यह विचार कि कोई अनुष्ठान, वरदान, या चतुर रणनीति द्वारा चेतना को स्थायी रूप से पराजित किया जा सकता है। किंतु जिस क्षण वह शक्ति शुद्ध भक्ति के विरुद्ध — अनंत की ओर उन्मुख आत्मा के विरुद्ध — लगाई जाती है, वह पलट जाती है। अग्नि, जो विश्व-शोधक है, अशुद्ध को (अहंकार-अस्त्र को) जलाती है और शुद्ध को (अनंत की ओर उन्मुख चेतना को) बचाती है।

यों दर्शन और पारिस्थितिकी एक ही सत्य की ओर संकेत करते हैं: चेतना को स्थायी रूप से कभी नष्ट नहीं किया जा सकता। वसंत हमेशा आता है; आत्मा हमेशा स्वयं को पुनः स्थापित करती है।

हिरण्यकशिपु की समस्या यह नहीं है कि वह बुरा था, वो तो था ही।उसकी त्रासदी यह है कि उसने अपना पूरा अस्तित्व इस दाँव पर लगाया कि शक्ति चेतना को पराजित कर सकती है, कि संप्रभुता प्रेम से अधिक टिकाऊ हो सकती है, कि अर्जित सुरक्षा वास्तविक अस्तित्व का विकल्प हो सकती है। उसका वरदान, उसकी सेनाएँ, उसका शाही अधिकार, उसकी पितृशक्ति — कोई भी उस बालक को नहीं छू सका जिसकी चेतना अविनाशी की ओर उन्मुख थी। वह उसे नहीं मार सका जिसे वह पहुँच नहीं सका। और वह प्रह्लाद तक नहीं पहुँच सका क्योंकि प्रह्लाद वहाँ नहीं था जहाँ अस्त्र संधान किए गए थे — वह पहले से ही कहीं ऐसी जगह था जो अस्त्रों की पहुँच से परे थी, उस अवकाश में जहाँ चेतना अपनी स्वयं की प्रकृति में विश्राम करती है।

प्रह्लाद की कथा हर उस मानवीय चेतना की कथा है जिसने कभी यह खोजा कि उसकी गहनतम प्रकृति नष्ट नहीं की जा सकती — भय से नहीं, बल से नहीं, सामाजिक दबाव से नहीं, परंपरा के भार से नहीं, अपने साहस की विफलता से नहीं। प्रत्येक व्यक्ति जो अपने स्वयं के परीक्षण की अग्नि में बैठा और जिसने पाया कि उनमें कुछ ऐसा था जो नहीं टूटा — उसने प्रह्लाद की कथा का कुछ संस्करण जिया है।

सा प्रथमा संस्कृति विश्ववारा

मेरा प्रिय लेखक है जोसेफ कैंपबेल। उन्होंने मिथकों पर बहुत काम किया है।पाश्चात्य और पौर्वात्य दोनों पर। मैंने भारतीय पौराणिकी पर काम किया। पर उनमें और मुझमें एक फर्क है। वे मोनोमिथ की अवधारणा पर काम करते हैं। उनके हिसाब से एक ही मूल मिथकीय अवधारणा अलग-अलग रूप में अलग-अलग संस्कृतियों में व्यक्त हुई है। 

मैं भी ऐसी समानताएं नोट करता हूँ और जितना यह देखता हूँ उतना मेरी वो यजुर्वेदीय अवधारणा पुष्ट होती जाती है- सा प्रथमा संस्कृति विश्ववारा। यह वह प्रथम संस्कृति थी जिसका विश्व ने वरण किया।

मुझे लगता है कि कैंपबेल को यह स्वीकार करने में थोड़ी सी दिक्कत रही होगी या उन्होंने जानबूझकर इसे न्यूट्रल शब्दावली में वर्णित किया होगा। Monomyth के नाम से। 

पर मिथकों में स्वतंत्र परिवहन की कोई आंतरिक शक्ति नहीं होती। उनका वहन तो संस्कृति को ही करना होता है।

कुछ विचारक ऐसे होते हैं जो अजनबी नहीं लगते—वे दर्पण जैसे लगते हैं। जब मैंने पहली बार जोसेफ कैम्पबेल को पढ़ा, तो मुझे नहीं लगा कि मैं किसी विदेशी विद्वान को पढ़ रहा हूँ। लगा जैसे कोई ऐसा व्यक्ति पढ़ रहा हूँ जो उसी अग्नि के चारों ओर घूमा है, जिसके इर्द-गिर्द मैं अपने पूरे बौद्धिक जीवन में चक्कर लगाता रहा हूँ—केवल दूसरी दिशा से। वे पश्चिम से उस ज्वाला तक पहुँचे थे—कोलंबिया और सारा लॉरेंस के शीतल पुस्तकालयों से, तुलनात्मक पुराण-शास्त्र के अनुशासित गलियारों से। मैं भीतर से आया था—उस परंपरा के अंदर से, जिसका वे अध्ययन करते थे। संस्कृत ग्रंथों से, पुराणों से, एक ऐसी सभ्यता की जीवंत स्पंदन से जो अपनी कहानियाँ कहना कभी नहीं भूली। और फिर भी हम दोनों उसी अग्नि तक पहुँचे थे।यह पहचान गहरी है। लेकिन पहचान सहमति नहीं होती। और जितना अधिक मैंने कैम्पबेल को पढ़ा, उतना ही मुझे एक सौम्य किंतु दृढ़ मतभेद अनुभव होता गया—इसमें नहीं कि उन्होंने क्या देखा, बल्कि इसमें कि जो उन्होंने देखा उसके बारे में वे क्या कहने को तैयार थे।

कैम्पबेल की महान कृति The Hero with a Thousand Faces, जो १९४९ में प्रकाशित हुई, एक साहसिक प्रस्ताव लेकर आई: विश्व की पुराण-कथाओं की चकित कर देने वाली विविधता के नीचे—ग्रीक और हिंदू, नॉर्स और एज़्टेक, पॉलिनेशियाई और मूल अमेरिकी—एक ही सार्वभौमिक कथा प्रवाहित होती है। उन्होंने इसे मोनोमिथ कहा—एक शब्द जो उन्होंने जेम्स जॉयस से उधार लिया, लेकिन जिसे उन्होंने अपनी अनूठी दृष्टि से भर दिया। नायक अपनी सामान्य दुनिया से प्रस्थान करता है, एक अलौकिक आश्चर्य के क्षेत्र की दहलीज़ पार करता है, परीक्षाओं का सामना करता है, एक रूपान्तरकारी शक्ति या ज्ञान पाता है, और अपने समुदाय को उपहार देने के लिए वापस लौटता है।

यह ढाँचा—प्रस्थान, दीक्षा, वापसी—सुंदर है। और एक बार जब आप इसे देख लेते हैं, तो इसे अनदेखा करना असंभव हो जाता है। मैंने वर्षों भारतीय पुराण-शास्त्र में डूबकर बिताए हैं—रामायण और महाभारत की कथाएँ पढ़ते हुए, पौराणिक वंशावलियों को खोजते हुए, उन वैदिक स्तोत्रों में जो दर्ज इतिहास से परे पहुँचते हैं। और हाँ, वह पैटर्न वहाँ है। एक वर्णनात्मक उपकरण के रूप में मोनोमिथ भारतीय भूमि पर भी आश्चर्यजनक रूप से काम करता है। लेकिन यहीं से मैं अपने प्रिय गुरु से अलग होने लगता हूँ।

कैम्पबेल असाधारण बौद्धिक उदारता के व्यक्ति थे। वे सच में हर संस्कृति के मिथकों से प्रेम करते थे। बिल मोयर्स के साथ उनकी टेलीविज़न बातचीत में जो उष्मा और विस्मय झलकती थी, वह प्रामाणिक लगती थी, दिखावटी नहीं। वे आधुनिकता के उस दौर में लोगों को उनकी आध्यात्मिक कल्पनाशक्ति वापस देना चाहते थे जब वह सूख रही थी। इसके लिए वे मेरी स्थायी कृतज्ञता के पात्र हैं।

लेकिन एक ऐसी तटस्थता भी होती है जो अपनी अति-सावधानी में ही एक विकृति बन जाती है। कैम्पबेल का मोनोमिथ ऐसे प्रस्तुत किया गया है जैसे वह सभी संस्कृतियों में एक साथ उत्पन्न हुआ हो—जैसे मानव मानस ने इस कथा को उसी तरह स्वतः स्रावित किया जैसे शरीर हार्मोन स्रावित करता है—स्वचालित रूप से, सार्वभौमिक रूप से, बिना किसी ऐतिहासिक कारण के। यह काल से मुक्त है। यह भूगोल से मुक्त है। यह संचरण से मुक्त है।
और यही वह जगह है जहाँ मोनोमिथ न केवल अधूरा, बल्कि चुपचाप भ्रामक हो जाता है।

विचार अपने आप नहीं चलते। कहानियाँ पक्षियों की तरह किसी अंतर्निहित दिशाज्ञान से प्रवास नहीं करतीं। मिथकों को वाहकों की ज़रूरत होती है। उन्हें संस्कृतियों की ज़रूरत होती है—जीवित, साँस लेती, सिखाती संस्कृतियों की—जो उन्हें स्मृति में संजोती हैं, अनुष्ठान में एन्कोड करती हैं, पीढ़ियों और सीमाओं के पार ले जाती हैं। मोनोमिथ की सार्वभौमिकता, यदि हम गंभीर हों, तो केवल एक साझा मानव मनोविज्ञान का प्रमाण नहीं है। यह एक मूल संचरण का भी प्रमाण है—एक महान सांस्कृतिक स्रोत का, जिससे सहायक नदियाँ बहीं।

यजुर्वेद में यह जो वाक्यांश है यह मेरे मन में तब से बसा है जब से मैंने भारतीय पौराणिकी का अध्ययन आरंभ किया: सा प्रथमा संस्कृतिः विश्ववारा। यह असाधारण आत्मविश्वास की घोषणा है—"यह प्रथमा संस्कृति है, जिसे विश्व ने चुना।" केवल पुरानी नहीं। केवल आदरणीय नहीं। प्रथम। पूर्व। मूल। मैं इस वाक्यांश पर बार-बार लौटता हूँ—राष्ट्रवादी दंभ के रूप में नहीं, बल्कि एक वास्तविक बौद्धिक परिकल्पना के रूप में, जिसे मैं जितना अधिक देखता हूँ, उतनी ही अधिक पुष्टि होती पाता हूँ। भारतीय पुराण-शास्त्र में जितना गहरे उतरा हूँ—ग्रंथ पढ़ते हुए, प्रतीकवाद को खोजते हुए, ब्रह्माण्ड-वैज्ञानिक संरचनाओं का मानचित्र बनाते हुए—उतना ही अधिक मैंने पाया है कि कैम्पबेल ने जिसे मोनोमिथ कहा वह भारतीय स्रोतों में केवल समानांतर नहीं है, बल्कि अधिक पूर्णता से व्यक्त है। अधिक घनत्व से । अधिक दार्शनिक रूप से विस्तृत। जैसे भारतीय परंपरा इन अन्य पुराण-शास्त्रों की चचेरी बहन नहीं, बल्कि किसी मौलिक अर्थ में उनकी माँ या नानी हो।

मैंने कभी-कभी सोचा है, कैम्पबेल को पढ़ते हुए, कि क्या वे इस असमानता से पूरी तरह अवगत थे। वे एक प्रतिभाशाली विद्वान थे, वेदांत दर्शन और हिंदू प्रतिमा-शास्त्र में गहरे पारंगत। वे भारत से प्रेम करते थे। उन्होंने उपनिषदों और महाभारत के बारे में वास्तविक गहराई से लिखा। उनकी मोनोमिथ की संकल्पना पर भारतीय विचार का प्रभाव छुपा नहीं है—वह हर जगह उनके काम में है, यहाँ तक कि जब वे स्पष्टतः किसी सेल्टिक लोककथा या ग्रिम परी-कथा पर चर्चा कर रहे होते हैं।

लेकिन उन्होंने कभी ठीक-ठीक यह नहीं कहा कि इसका क्या अर्थ हो सकता है। उन्होंने कभी उस तर्क को उसके भौगोलिक और ऐतिहासिक मूल तक नहीं खींचा। उन्होंने अपने अवलोकनों को जुंगियन गहन मनोविज्ञान की भाषा में लपेटा—आर्केटाइप, सामूहिक अचेतन, सार्वभौमिक मनोवैज्ञानिक संरचनाएँ—जिसका प्रभाव यह हुआ कि पैटर्न को सार्वभौमिक बनाते हुए इसे विखंडित भी कर दिया गया। यह कहकर कि सभी मनुष्य इन कहानियों को अपने मनोवैज्ञानिक DNA में वहन करते हैं, उन्होंने उस अधिक असुविधाजनक प्रश्न को टाल दिया: यदि कहानियाँ इतनी समान हैं, यदि संरचनाएँ इतनी एकरूप हैं, तो क्या कोई उद्गम-स्थान हो सकता है?

मैं नहीं सोचता कि यह ठीक-ठीक बौद्धिक कायरता थी। कैम्पबेल अपने समय और अपनी अकादमी के व्यक्ति थे। वे बीसवीं सदी के मध्य के अमेरिकी विश्वविद्यालयों में काम करते थे, एक ऐसे बौद्धिक वातावरण में जो एक निश्चित उदार सार्वभौमवाद द्वारा आकारित था और सांस्कृतिक प्राथमिकता के किसी भी दावे से गहरी आशंका रखता था। सांस्कृतिक मौलिकता के दावे, युद्धोत्तर कल्पना में, राष्ट्रवादी पुराण-शास्त्र की सबसे बुरी अतिशयताओं से जुड़े थे। यह कहना कि एक संस्कृति "प्रथम" थी, उस वातावरण में, एक खतरनाक रास्ते पर पहला कदम जैसा लगता था।

इसलिए कैम्पबेल ने मोनोमिथ की सुंदर तटस्थ भाषा चुनी। उन्होंने कहा: सभी संस्कृतियाँ यही कहानी सुनाती हैं। जो उन्होंने नहीं जोड़ा—जो शायद वे जोड़ नहीं सके—वह यह था: और यहाँ, उन सभी जगहों में जहाँ यह कहानी सुनाई जाती है, यह वह जगह है जहाँ यह सबसे पूर्णता से, सबसे प्राचीनता से, और सबसे ब्रह्माण्डीय रूप से सुनाई जाती है।

मिथक स्वयं संचारित नहीं होते।मिथक अपने पैरों पर महाद्वीपों को पार नहीं करते। वे लोगों के मुँह और स्मृति और पांडुलिपियों में यात्रा करते हैं। वे व्यापार और प्रवास और विजय की धाराओं में यात्रा करते हैं। वे तब यात्रा करते हैं जब कोई संस्कृति इतनी जीवंत, इतनी विस्तारशील, इतनी आध्यात्मिक रूप से आकर्षक होती है कि दूसरों को अपनी कक्षा में खींच ले या अपने पुत्रों और पुत्रियों को शिक्षकों, व्यापारियों, पुजारियों या पथिकों के रूप में बाहर भेजे।

महान भारतीय महाकाव्य परंपराएँ भारत में नहीं रहीं। रामायण दक्षिण-पूर्व एशिया तक गई—जावा और बाली, थाईलैंड और कंबोडिया—सदियों में व्यापारियों, ब्राह्मण पुजारियों और बौद्ध भिक्षुओं द्वारा वहन की गई। उसने इन धरतियों में जड़ें जमाईं और नए रूपों में फूली-फली। वाल्मीकि की रामायण थाईलैंड की रामकियेन बन गई, जावा की काकावीन रामायण, कंबोडिया की रियामकेर। कहानी ने अपने कपड़े बदले लेकिन अपना कंकाल रखा। यह इसलिए हुआ क्योंकि एक जीवित संस्कृति—यदि आप चाहें तो एक प्रथम संस्कृति—में अपनी मौलिक कथाओं को बाहर प्रक्षेपित करने के लिए पर्याप्त शक्ति और सामंजस्य था।

यही वह चीज है कि जिसके चलते मोनोमिथ को जैसा कैम्पबेल ने तैयार किया, उससे नहीं समझा जा सकता। यह संचरण -तंत्र । यदि नायक की यात्रा केवल एक आर्केटाइपल संरचना है जो समस्त मानवता के सामूहिक अचेतन से स्वतःस्फूर्त रूप से उत्पन्न होती है, तो साक्ष्य इतनी निरंतरता से एक दिशा की ओर क्यों इशारा करता है? इस कहानी के सबसे पुराने, सबसे विस्तृत, सबसे दार्शनिक रूप से पूर्ण संस्करण भारतीय उपमहाद्वीप और उसके सांस्कृतिक प्रभाव-क्षेत्र में क्यों पाए जाते हैं? पुराण-शास्त्रीय समानता का रास्ता, जब आप इसे सावधानी से अनुसरण करते हैं, पूर्व और भीतर की ओर क्यों ले जाता है—गंगा के मैदानों तक, हिमालय की तराई तक, उन प्राचीन यज्ञ-भूमियों तक जहाँ वैदिक ऋषियों ने पहली बार एक ऐसे विश्व को अपनी ऋचाएँ मंत्र और श्लोक सुनाए जो अभी युवा था। 

मैं भारतीय पुराण-शास्त्र तक एक बाहरी पर्यवेक्षक के रूप में नहीं पहुँचा जो जिज्ञासाओं का वर्गीकरण कर रहा हो। मैं ऐसे व्यक्ति के रूप में आया जो उसकी कहानियों से बना है, उसके देखने के तरीके से आकारित हुआ है। यह भीतरी स्थिति एक ऐसा ज्ञान देती है जिसे तुलनात्मक स्कॉलरशिप, अपनी समस्त कठोरता के बावजूद, कभी-कभी चूक जाती है। यह ज्ञान कि एक जीवंत परंपरा भीतर से कैसी महसूस होती है—वह कैसे टिकी रहती है, कैसे पीढ़ियों में खुद को पुनः-उत्पन्न करती है, कैसे सहस्राब्दियों तक सुसंगत रहने का प्रबंधन करती है जबकि फिर भी गतिशील और खुली बनी रहती है। भारतीय पुराण-शास्त्रीय परंपरा प्राचीन कहानियों का संग्रहालय नहीं है। यह एक जीवित प्राणी है जो बढ़ती, अनुकूलित होती, नई परिस्थितियों से बोलती रहती है, अपनी मूल अंतर्दृष्टि का धागा बनाए रखते हुए।

यह केवल मोनोमिथ नहीं है। यह मेटा-मिथ है: वह कहानी कि क्यों कहानियाँ सुनाई जानी चाहिए, और उन्हें कैसे वहन किया जाना चाहिए, और उन्हें वहन करने की ज़िम्मेदारी कौन उठाता है।

Tuesday, 3 March 2026

यादव अहीर

तर्क से आओ!
मेरा उद्देश्य किसी समाज को नीचा दिखाना नहीं था। प्रत्येक जाति को खुद के जाति पर गर्व होना चाहिए।
अपनी जाति बताते वक़्त हीन भावना व असुरक्षा के भाव नहीं आने चाहिए।
कुछ वर्षों से मैं निरंतर देख रहा हूँ कि क्षत्रियों को नीचा दिखाया जा रहा है। क्षत्रिय इतिहास को राजपूत इतिहास से अलग बताकर उपहास उड़ाया जा रहा है।
मुगलों के साथ राजपूतों का संबंध बताकर उन्हें गद्दार घोषित किया जा रहा है।
वैसे तो इस कृत्य में कई समाज सम्मिलित है।
परन्तु मुख्य रूप से संलिप्त समाज है अहीर, जाट और गूजर।
लगभग महीने भर से मैं देख रहा हूँ की अहीर समाज द्वारा रोज - रोज सोशल मिडिया के माध्यम से जहर उगला जा रहा है।
इतिहास पर सवाल उठाये जा रहे हैं।
राजपूतों को मुग़लपूत बोला जा रहा है।
अहीर समाज काल्पनिक पात्र जोधा बाई और किसी एक पुराण( ब्रह्मवैर्त पुराण ) को कोट कर के राजपूतों पर ग़लत टिप्पणी किया जा रहा है।
वैसे देखा जाए तो ग्रंथ लिखने वालों ने लगभग जातियों में कमियाँ निकाल रखी है।
इसलिए हमें किसी दूसरे पर कीचड़ नहीं उछालना चाहिए।
परन्तु ज़ब कोई सवाल कर बार - बार उकसाए तो जबाव जरूर देना चाहिए।
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:: =अहिरों का ऐतिहासिक साक्ष्य =::
♦️ वाल्मीकि रामायण - 
1. युद्ध कांड (सर्ग 22) आभीर पापकर्म करने वाले दस्यू, लुटेरा...।
2. समुद्र ने अहीरों का वर्णन करते हुए कहा कि वे लोग उसके जल का स्पर्श कर उसे अपवित्र कर रहे हैं और वे स्वभाव से भयानक, पापी और लुटेरे हैं।
3. समुद्र देव ने प्रकट होकर राम से प्रार्थना की और उत्तर दिशा में स्थित 'द्रुमकुल्य' नामक स्थान के बारे में बताया, जहाँ आभीर (अहीर) जाति के लोग रहते थे।
4. उत्तरेणावकाशोऽस्ति कश्चित्पुण्यतमो मम।
द्रुमकुल्य इति ख्यातो लोके ख्यातो यथा भवान्॥ 29॥
तत्र पापकृतो धूर्ता आभीराः प्रमुखा दयः।
ते मे तोयं पिबन्त्येते न सह्ये पापकर्मिणः॥ 30॥
♦️ रामचरित मानस -
1. "आभीर जवन किरात खस स्वपचादि अति अघरूप जे। कहि नाम बारक तेपि पावन होहिं राम नमामि ते॥" 
2.रामचरितमानस में अहीरों को तेली, कुम्हार, कोल और कलवार जैसी अन्य जातियों के साथ 'वर्णाधम' (वर्णों में नीचे) या शूद्रवत श्रेणी में रखा गया है।
♦️  महाभारत ( जयसंहिता ) -
1. सभा पर्व (अध्याय 32, श्लोक 10)
शूद्राभीरगणाश्चैव ये चाश्रित्य सरस्वतीम्।
वर्तयन्ति च ये मत्स्यैर्ये च पर्वतवासिनः॥

अर्थ: जो शूद्र आभीर गण सरस्वती नदी के आश्रय में रहते हैं, जो मछलियों पर जीविका चलाते हैं और जो पर्वतों के निवासी हैं (उन पर नकुल ने विजय प्राप्त की)। 
2. अश्वमेधिक पर्व (अध्याय 29, श्लोक 16) 
आभीरा द्राविडाश्चैव काम्बोजा यवनास्तथा।
वृषलत्वं परिगता ब्राह्मणनामदर्शनात्॥

आभीर, द्रविड़, कम्बोज और यवन जाति के लोग ब्राह्मणों (संस्कारों) के दर्शन न होने या उनके संपर्क से दूर रहने के कारण वृषल  बन गए।
3. शल्य पर्व (अध्याय 37, श्लोक 1)
ततो विनशनं राजन् जगाम सरितं वरा।
शूद्राभीरान् प्रति द्वेषाद् यत्र नष्टा सरस्वती॥ 

अर्थ: हे राजन! शूद्रों आभीरों के प्रति द्वेष के कारण वह श्रेष्ठ नदी (सरस्वती) विनशन नामक स्थान पर लुप्त हो गई।
4. मौसल पर्व (अध्याय 7) 
ततस्ते पापकर्माणो लोभोपहतचेतसः।
आभीरा मन्त्रयामासुः समेत्येदममर्षणः॥
अर्थ: तब उन पापकर्म करने वाले और लोभ से भ्रष्ट बुद्धि वाले आभीरों ने एक साथ मिलकर क्रोधपूर्वक यह सलाह की (कि अर्जुन अकेला है और इनके पास बहुत धन है, अतः इन्हें लूट लिया जाए)। 
5. वन पर्व अध्याय  188
आन्ध्राः शकाः पुलिन्दाश्च यवनाश्च नराधिपाः।
काम्बोजा बाह्लिकाश्चैव शूराश्चाभीरा नरोत्तम॥ 35॥
न तदा ब्राह्मणः कश्चित् स्वधर्ममुपपालयेत्।
शूद्रतुल्या भविष्यन्ति त्रयो वर्णा नरोत्तम॥ 36॥
♦️ मनुस्मृति -
1. मनुस्मृति (अध्याय 10, श्लोक 15)
आभीर की उत्पत्ति: ब्राह्मण पिता और अम्बष्ठ जाति की माता के संसर्ग से जो संतान उत्पन्न होती है, उसे 'आभीर' कहा जाता है।
2.मनुस्मृति के दसवें अध्याय में विभिन्न जातियों की उत्पत्ति का वर्णन है, जहाँ आभीरों (अहीरों) की उत्पत्ति और उनके सामाजिक वर्ग को स्पष्ट किया गया है। मनुस्मृति में इन्हें 'वर्णसंकर' (मिश्रित जाति) की श्रेणी में रखा गया है।
♦️  व्यास स्मृति -
1.व्यास स्मृति के अनुसार, अहीरों (आभीर) को शूद्र श्रेणी के अंतर्गत रखा गया है। ग्रंथ के प्रथम अध्याय के श्लोक 10, 11 और 12 में विशेष रूप से 'अहीर, गोप और ग्वाले' का उल्लेख करते हुए उन्हें शूद्र वर्ण का बताया गया है।
2.मूल श्लोक (व्यासस्मृति, 1.10-12)
बर्द्धिको नापितो गोप: आशापः कुम्भकारकः।
वणिक् किरातः कायस्थः मालाकारः कुटुम्बिनः॥
वरटो मेदश्चाण्डालः दासः श्वपच कोलकः।
एते अन्त्याः समाख्याता ये चान्ये गवासनाः॥ 
♦️ पुराण - पुराणों के अनुसार अहीर शूद्र और अंत्यज है।
1.वायु पुराण
2.मत्स्य पुराण 
3.भागवत पुराण 
4.विष्णु पुराण 
5.ब्रह्मांड पुराण 
इन पुराणों में अहिरों को नीच व पापी माना गया है।
♦️ मध्यकाल में - मध्यकाल में अभीरों कन्याओं को राजपूतों के रखैल के रूप में वर्णित है।
♦️ अकादमिक किताबों और साहित्यों में - 
अकादमिक किताबों और साहित्यों में अहिरों को शूद्र और पिछड़ा बताया गया है।
♦️ इतिहास के किताबों में - इतिहास के किताबों में अहिरों को शूद्र बताया गया है।
♦️ सरकारी आंकड़ों में - सरकारी आंकड़ों में अहिरों को पिछड़े वर्ग में रखा गया है।
♦️ सरकारी गजेटियर - 
सरकारी गजेटियर (जैसे 'इम्पीरियल गजेटियर ऑफ इंडिया') और ब्रिटिश कालीन जनगणना अभिलेखों में अहीरों की सामाजिक स्थिति के बारे में मिश्रित विवरण मिलते हैं:
1. कई पुराने ब्रिटिश गजेटियर और ऐतिहासिक स्रोतों में अहीरों को उनके पशुपालन और कृषि संबंधी व्यवसायों के कारण पारंपरिक हिंदू वर्ण व्यवस्था में शूद्र श्रेणी के अंतर्गत वर्गीकृत किया गया था।
2.उत्तर प्रदेश और बिहार के कुछ गजेटियर में उन्हें "स्वच्छ शूद्र" (Clean Shudra) माना गया है, जिनसे उच्च वर्ण के लोग जल ग्रहण कर सकते थे।
♦️ आरक्षण - पिछड़े वर्ग का आरक्षण भी शूद्र होने की वज़ह से ही मिला था।
♦️1990 के दशक - अहिरों की स्थिति 1990 तक बदतर हुआ करती थी। अन्य दलित और अहिरों में विशेष फ़र्क नहीं था।
♦️ वर्तमान सामाजिक स्थिति - क्षत्रिय बनना ही जीवन का उद्देश्य है।
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तुम एक जोधा बाई का नाम लेकर राजपूतों को नीचा दिखाते हो जिसका कोई ऐतिहासिक साक्ष्य भी नहीं है।
लेकिन तुम्हारे विरुद्ध अनगिनत साक्ष्य है...।
मैं प्रस्तुत करना नहीं चाह रहा था किन्तु तुमलोगों ने मजबूर किया।
किसी पुराण को कोट करते हुए तुमने माँ सरस्वती पर अभद्र टिप्पणी की।
तुमने कहा बेटीचोद शब्द तब से प्रचलित है ज़ब से ब्राह्मण ब्रह्मा ने अपनी बेटी सरस्वती से विवाह किया।
ये बात सच है की ब्रह्मा का किसी पुराण में सरस्वती से विवाह का जिक्र है...।
किन्तु बेटीचोद बोलना कितना नैतिक था?
ज़ब तुमने ब्रम्हा वाले मुद्दे को सच मान लेते हो क्योंकि कहीं लिखा हुआ है।
ज़ब तुम जोधा को सच मान लेते हो क्योंकि कहीं लिखा हुआ है। फिर तो अहिरों के बारे में बहुत कुछ लिखा है धर्म ग्रंथों में।
सबको सच मान लो...।
एक बात याद रखना अहिरों! तुम्हारे क्षत्रिय बनने का भूत न उतार दिया तो मेरा नाम भी रूद्र प्रताप सिंह नहीं।
आज से तुम्हारी खुदाई शुरू कर चुका हूँ।
अभी राणा समर, विक्रांत ठाकुर और निशांत सिंह राजपूत के पोस्ट आने बाकि ही है।
जबाव और प्रतिकार तैयार रखो।
तार्किक तौर पर.... बकैती नहीं करनी है।

✍️ रूद्र प्रताप सिंह 
क्षत्रिय शौर्य 

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होलिका प्रह्लाद प्रसंग होली

जो लोग होलिका प्रह्लाद प्रसंग को भक्ति की नास्तिकता पर जीत के रूप में पढ़ते हैं वे भी इस प्रसंग का अर्थ संकोच ही करते हैं, हालाँकि वे जेनेऊ के उन ढोरों से फिर भी बेहतर हैं जिन्हें यह प्रसंग एक दलित स्त्री पर अत्याचार की तरह लगता है।

भारत में फर्जी दलित असली दलितों का हिस्सा  खा रहे हैं, फर्जी अत्याचार कथाएँ असली अत्याचारों को छुपाने के लिए गढ़ी गई हैं, यह जेनेऊ-निगमित अर्थान्वयन से पता चलता है। 

और ये कथाएँ इसलिए उलटपंथियों को रास आती हैं क्योंकि इनका तथाकथित दलित उसी तरह से इन कथाओं में सत्ता के अधिकतम संघनन का प्रतिनिधित्व करता है जैसे स्वयं वामपंथी राज्य।जैसे मार्क्सवादी-लेनिनवादी सिद्धांत में साम्यवादी राज्य में विधायी, कार्यकारी और न्यायिक शक्तियाँ एक ही सर्वोच्च संस्था (जैसे सुप्रीम सोवियत) में केंद्रित होती हैं। शक्तियों का पृथक्करण नहीं होता, जिससे अधिकतम शक्ति का संकेंद्रण सुनिश्चित होता है। केवल एक पार्टी को राजनीतिक शक्ति का एकाधिकार प्राप्त होता है। अन्य पार्टियों पर प्रतिबंध लगाया जाता है, जिससे सारी निर्णय-प्रक्रिया पार्टी के शीर्ष नेतृत्व में केंद्रित हो जाती है। निजी उद्यम या बाजार की स्वतंत्रता नहीं रहती, जिससे आर्थिक शक्ति भी पार्टी-राज्य में केंद्रित हो जाती है। विरोधी दलों, स्वतंत्र यूनियनों और हड़तालों पर पूर्ण प्रतिबंध रहता है और KGB/स्टासी जैसी गुप्त पुलिस और आतंक के माध्यम से असहमति को कुचल दिया जाता है, जिससे दमनात्मक शक्ति (coercive power) का अधिकतम संकेंद्रण होता है।
सभी मीडिया, प्रचार और सूचना प्रवाह राज्य/पार्टी के नियंत्रण में होते हैं। सेंसरशिप और प्रोपेगैंडा से वैकल्पिक विचारों को दबाया जाता है, जिससे वैचारिक शक्ति भी पूरी तरह केंद्रित रहती है।शीर्ष (पोलित ब्यूरो या एक नेता) के फैसले सभी पर बाध्यकारी होते हैं। आंतरिक लोकतंत्र नाममात्र का होता है, जिससे शक्ति छोटे से अभिजात वर्ग में केंद्रित रहती है। केंद्रीकृत शक्ति की आवश्यकता के कारण साम्यवादी व्यवस्था स्वाभाविक रूप से तानाशाही/सर्वसत्तावादी बन जाती है। इतिहास में स्टालिन, माओ आदि के शासन इसका प्रमाण हैं, जहाँ शक्ति एक व्यक्ति या छोटे समूह में केंद्रित रही। जीवित साम्यवादी राज्यों (चीन, वियतनाम, उत्तर कोरिया) में शक्ति पार्टी नेता (जैसे शी जिनपिंग) में और अधिक केंद्रित हो रही है। मजदूर वर्ग नाममात्र का मालिक होता है, लेकिन वास्तव में नियंत्रण पार्टी अभिजात वर्ग के पास रहता है।

यह मॉडल आप ध्यान से देखें तो चाहे हिरण्यकशिपु हो, चाहे रावण, चाहे महिषासुर सबके शासन में नज़र आता है। हिरण्यकशिपु ने क्या किया था ? वह तीनों लोकों को प्रताड़ित करने लगा। वह चाहता था कि सब लोग उसे ही भगवान मानें और उसकी पूजा करें। विष्णु पुराण में कहा गया है कि : 

त्रैलोक्यं वशमानिन्ये ब्रह्मणो वरदर्पितः ॥
इन्द्रत्वमकरोदैत्यः स चासीत्सविता स्वयम् ।
वायुरग्निरपां नाथः सोमश्चाभून्महासुरः ॥ धनानामधिपः सोऽभूत्स एवासीत्स्वयं यमः ।
यज्ञभागानशेषांस्तु स स्वयं बुभुजेऽसुरः ॥
 देवाः स्वर्गं परित्यज्य तत्त्रासान्मुनिसत्तम ।
विचेरुरवनौ सर्वे बिभ्राणा मानुषीं तनुम् ॥ जित्वा त्रिभुवनं सर्वं त्रैलोक्यैश्वर्यदर्पितः ।
उपगीयमानो गन्धर्वैर्बुभुजे विषयान्प्रियान् ॥ पानासक्तं महाकायं हिरण्यकशिपुं तदा।
उपासान् चक्रिरे सर्वे सिद्धगन्धर्वपन्नगाः ॥ अवादयन् जगुश्चान्ये जयशब्दं तथापरे।
दैत्यराजस्य पुरतश्चक्रुः सिद्धा मुदान्विता:॥

त्रैलोक्यं वशमानिन्ये - में सर्वाधिकारवाद की वही भूख है। दर्पित: में वही अहंकार है। ‘धनानामधिप:’ में वही धनलिप्सा है। बुभुजेऽसुर: में वही तानाशाही भूख है। सूर्य, वायु, अग्नि, वरुण और चंद्रमा की अधीनता में प्रकृति को रौंदने वाला वही उपभोक्तावाद और भौतिकवाद है।विषयान्प्रियान और मद्यपान आसक्ति में वही विलासिता है जो एकाधिकारवाद में होती है। उस दैत्यराजके सामने सिद्धगण के बाजे बजाकर उसका यशोगान करने और जयजयकार करने में वही मीडिया कंट्रोल है।

और ईश्वर इन लोगों को वास्तविक रूप से खतरा नज़र आता है। क्योंकि धर्म सोच की आजादी देता है, वह ब्रेनवाशिंग नहीं करता। विष्णु पुराण में जब प्रह्लाद से उसके शिक्षित होने पर हिरण्यकशिपु उसकी शिक्षा का सार पूछता है कि ‘वत्स ! अबतक अध्ययन में निरन्तर तत्पर रहकर तुमने जो कुछ पढ़ा है उसका सारभूत शुभ भाषण हमें सुनाओ’ तो प्रह्लाद कहते हैं : 

श्रूयतां तात वक्ष्यामि सारभूतं तवाज्ञया । समाहितमना भूत्वा यन्मे चेतस्यवस्थितम् ॥
अनादिमध्यान्तमजमवृद्धिक्षयमच्युतम् । प्रणतोऽस्म्यन्तसन्तानं सर्वकारणकारणम् ॥

कि पिताजी ! मेरे मनमें जो सबके सारांशरूपसे स्थित है वह मैं आपकी आज्ञानुसार सुनाता हूँ, सावधान होकर सुनिये।जो आदि, मध्य और अन्तसे रहित, अजन्मा, वृद्धि-क्षय-शून्य और अच्युत हैं, समस्त कारणोंके कारण तथा जगत् की स्थिति और अन्तकर्ता उन श्रीहरिको मैं प्रणाम करता हूँ। 

तब हिरण्यकशिपुने क्रोधसे नेत्र लाल कर प्रह्लादके गुरुकी ओर देखकर काँपते हुए ओठोंसे कहा- 

ब्रह्मबन्धो किमेतत्ते विपक्षस्तुतिसंहितम् । असारं ग्राहितो बालो मामवज्ञाय दुर्मते ॥

रे दुर्बुद्धि ब्राह्मणाधम ! यह क्या ? तूने मेरी अवज्ञा कर इस बालकको मेरे विपक्षीकी स्तुतिसे युक्त असार शिक्षा दी है ! 

गुरुजी बेचारे नर्वस हो जाते हैं। उनके employer का विश्वास उसी शिक्षा में है जो संस्थानीकृत हो। वही जो स्वार्जित न हो। ईवान ईलिच ने यही सोच कर शायद deschooling society की बात की थी।

पर हड़बड़ाये गुरुजी कहते हैं : दैत्यराज ! आपको क्रोधके वशीभूत न होना चाहिये। आपका यह पुत्र मेरी सिखायी हुई बात नहीं कह रहा है। 

हिरण्यकशिपु बोला- बेटा प्रह्लाद ! बताओ तो तुमको यह शिक्षा किसने दी है? तुम्हारे गुरुजी कहते हैं कि मैंने तो इसे ऐसा उपदेश दिया नहीं है।

प्रह्लादजी बोले - पिताजी ! हृदयमें स्थित भगवान् विष्णु ही तो सम्पूर्ण जगत्के उपदेशक हैं। उन परमात्माको छोड़कर और कौन किसीको कुछ सिखा सकता है?

हिरण्यकशिपु बोला - अरे मूर्ख ! जिस विष्णुका मुझ जगदीश्वरके सामने धृष्टतापूर्वक निश्शंक होकर परम्बार वर्णन करता है, वह कौन है ?

प्रह्लादजी बोले- योगियोंके ध्यान करनेयोग्य इसका परमपद वाणीका विषय नहीं हो सकता तथा जिससे विश्व प्रकट हुआ है और जो स्वयं विश्वरूप वह परमेश्वर ही विष्णु है॥ २२ ॥

हिरण्यकशिपु बोला- अरे मूढ। मेरे रहते हुए कौन परमेश्वर कहा जा सकता है?

कभी ध्यान दें कि सर्वाधिकारवादी सत्ताओं  के भीतर भी ईश-निषेध की ऐसी ही झक सवार है।उन्हें वह शिक्षा हिरण्यकशिपु की तरह असार लगती है जिसमें सत्ता की ईशविरोधी प्राथमिकताएँ प्रतिबिंबित नहीं होतीं। मसलन रूस के सेकंडरी स्कूल में 1964 से Osnovy Naucnogo Ateizma या  Fundamentals of Scientific Atheism के नाम से एक पाठ्यपुस्तक चलती थी जो कहती है कि Religion is a fantasy, a distortion of reality; there is no God, only materialist science explains the world. वहाँ कक्षाओं में Bezbozhnik नामक पुस्तक में लिखा जाता है : There is no God! Science proves religion is superstition and backwardness. चीन की पाठ्यपुस्तक Common Knowledge of Philosophy में कहा गया कि God did not create living creatures, but living creatures created God. उत्तर कोरिया में Juche guidelines पाठ्यक्रम के लिए बनाई गई हैं : The Juche idea is based on the philosophical principle that man is the master of everything and decides everything. It is the man-centred world outlook. क्रांतिकारी इतिहास वाले पाठ्यपुस्तक में कहा गया है कि Having faith in God is an act of espionage. Only Kim Il Sung is a god in North Korea.

वामपंथ प्रह्लाद का प्रतिलोम तो है वह हिरण्यकशिपु की तरह सर्वशक्तिमान सत्ता का निर्माता भी है। 

लगभग ऐसा ही सर्वाधिकारवादी ट्रोप रावण और महिषासुर के प्रसंगों में भी आता है। शक्ति का एकछत्र संकेंद्रण करने वाले जिन्हें दलित  नज़र आते हैं, वे प्राध्यापक या छात्र छात्राएँ ढोर ही हो सकते हैं। उन्हें ऐसी ही सत्ताएँ अपने आदर्श के रूप में नज़र आती हैं। 

दरअसल जैसे सर्वाधिकारवादी सत्ताएँ दलित की सत्ता होने का भरम dictatorship of the proletariat के नाम पर रचती हैं, वैसे ही इन ढोरों को भी यह जरूरी हो जाता है कि वे ऐसे अत्याचारी राजसत्ताधारियों को दलित बताएँ।

Sunday, 1 March 2026

सूर्य ग्रहण चंद्र ग्रहण


#पुनरुपनयननिमित्त- ( सूर्य-चन्द्रग्रहणे भोजन प्रायश्चित्त)-

[देवलः] सूर्यसोमोपरागे च उक्तकालं विना द्विजाः। 
              तदन्नं मांसमित्याहुः तद्भुक्त्वा मांसभुग्भवेत् ।। 
[मरीचिः] सूर्यग्रहे तु नाश्नीयात् पूर्वं यामचतुष्टयम्। 
               चन्द्रग्रहे तु यामांस्त्रीन् भुक्त्वा पापं समश्नुते ।। 
इमं धर्मं परित्यज्य यो विप्रस्त्वन्यथाचरेत् ।। 
               (पुनः) #तस्योपनयनं भूयस्तप्तं सान्तपनं स्मृतम् । (सूर्यग्रहभोजने तप्तं चन्द्रग्रहणे सान्तपनम् ) 
तदेवाह [मनुः] सूर्योपरागे यो भुंक्ते तस्य पापं महत्तरम् । 
                            तस्य पापविशुद्ध्यर्थं तप्तकृच्छ्रमुदीरितम् । चन्द्रोपरागकाले भुक्त्वा कायं समाचरेत् ।। 
                           उभयोर्भोजने विप्रः पुनः संस्कारमर्हति ।।
{ तत् प्रायश्चित्ते पुनःसंस्कारे च पराङ्गमुखः स अयाज्यो भवति}
चतुर्वर्गचिंतामणि प्रायश्चित्त खंड 🙏


सूर्य या चन्द्र ग्रहण के समय (निर्दिष्ट काल को छोड़कर) यदि द्विज भोजन करता है, तो उस अन्न को मांस के समान कहा गया है; और उसे खाने वाला मानो मांस खाने वाला हो जाता है।(देवल)
सूर्यग्रहण में पहले चार याम (लगभग बारह घंटे) तक भोजन नहीं करना चाहिए।
चन्द्रग्रहण में तीन याम तक भोजन नहीं करना चाहिए; यदि कोई इस समय भोजन करता है तो वह पाप का भागी होता है। जो ब्राह्मण इस धर्म को छोड़कर अन्यथा आचरण करता है, उसका पुनः उपनयन करना चाहिए।
सूर्यग्रहण में भोजन करने पर ‘तप्त’ कृच्छ्र और चन्द्रग्रहण में ‘सान्तपन’ कृच्छ्र प्रायश्चित्त बताया गया है। -(मरीचि)
जो व्यक्ति सूर्यग्रहण में भोजन करता है, उसका पाप अत्यन्त बड़ा होता है। उस पाप की शुद्धि के लिए ‘तप्तकृच्छ्र’ प्रायश्चित्त बताया गया है। और जो चन्द्रग्रहण के समय भोजन करे, उसे भी विधिपूर्वक प्रायश्चित्त करना चाहिए। दोनों (सूर्य और चन्द्र ग्रहण) में भोजन करने वाला द्विज पुनः संस्कार (उपनयन) का अधिकारी होता है।(मनुः)
अतः जो इन प्रायश्चित्तों और पुनःसंस्कार से विमुख रहता है, वह अयाज्य (यज्ञादि कर्म के अयोग्य) माना जाता है।
(चतुर्वर्गचिंतामणि प्रायश्चित्त खंड)