Friday, 3 July 2026

अपराजितः सात्यकि

गीता: प्रथम अध्याय श्लोक १७-१८(१३)

महाभारत के प्रथम अध्याय में शंखों का वर्णन केवल युद्ध-पूर्व सूचना नहीं है; वह चरित्रों का एक सूक्ष्म सांकेतिक परिचय भी है। व्यास यहाँ प्रत्येक पात्र को उसके सम्पूर्ण जीवन-वृत्त से नहीं, बल्कि एक ऐसे शब्द से उद्घाटित करते हैं जो उसके व्यक्तित्व का केन्द्रबिन्दु बन जाता है।

कृष्ण "अच्युत" हैं—जो कभी अपने स्वरूप से च्युत नहीं होते। अर्जुन "धनञ्जय" हैं—जिन्होंने केवल धन नहीं, दिशाओं को जीता है। भीम "वृकोदर" हैं—अतृप्त प्राणशक्ति के प्रतीक। युधिष्ठिर यहाँ "कुन्तीपुत्र" हैं—धर्म का भी एक मानवीय, मातृसंबद्ध रूप। प्रत्येक विशेषण अपने भीतर एक सम्पूर्ण आख्यान समेटे हुए है।
किन्तु इन्हीं सबके बीच व्यास एक ऐसा शब्द रखते हैं जो एकाएक पाठक का ध्यान खींच लेता है—
"सात्यकिश्चापराजितः।"

युद्धभूमि में इतने महावीर उपस्थित हैं। भीष्म हैं, द्रोण हैं, अर्जुन हैं, भीम हैं, कृष्ण स्वयं हैं। पर "अपराजित" केवल सात्यकि हैं।

यह केवल विशेषण नहीं, मौन घोषणा है।

और उसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वह सात्यकि का परिचय यह बताकर नहीं देता कि वे क्या हैं; बल्कि यह बताकर देता है कि वे क्या नहीं हुए।

वे पराजित नहीं हुए।

यहीं से यह शब्द एक अद्भुत दार्शनिक गहराई ग्रहण करता है।

भाषा सामान्यतः मनुष्य को सकारात्मक गुणों से परिभाषित करती है। वह कहती है—यह वीर है, यह ज्ञानी है, यह तपस्वी है, यह दानी है। ऐसी प्रत्येक परिभाषा किसी न किसी सीमा का निर्माण करती है। जैसे ही हम कहते हैं—"वह वीर है"—हम उसे वीरता की एक निश्चित अवधारणा के भीतर बाँध देते हैं।किन्तु "अपराजित" ऐसा नहीं करता।

यह कोई उपलब्धि नहीं बताता; यह केवल एक अनुपस्थिति बताता है।

पराजय का अभाव।

और अभाव की यह भाषा भारतीय दार्शनिक परम्परा के लिए अपरिचित नहीं है।उपनिषद् जब ब्रह्म का निरूपण करते हैं, तो अन्ततः "नेति, नेति" पर पहुँचते हैं। ब्रह्म को किसी एक गुण में सीमित नहीं किया जा सकता। इसलिए उसे इस प्रकार कहा जाता है—यह नहीं, वह नहीं। निषेध यहाँ रिक्तता नहीं है; वह अनन्तता का संकेत है। प्रत्येक निषेध किसी सीमित अवधारणा को हटाता है ताकि असीम की सम्भावना बनी रहे।इसी प्रकार "अपराजित" भी किसी उपलब्धि की सूची नहीं है। वह केवल यह कहता है कि अब तक किसी ने उसकी सीमा का स्पर्श नहीं किया।यह एक प्रकार की via negativa है—निषेध के माध्यम से उद्घाटन।

ईसाई रहस्यवादी परम्परा में Pseudo-Dionysius the Areopagite इसी प्रकार की भाषा का प्रयोग करते हैं। उनके लिए परमात्मा का सर्वोच्च निरूपण सकारात्मक विशेषणों से नहीं, बल्कि उन सब विशेषणों के अतिक्रमण से होता है। प्रत्येक सकारात्मक कथन ईश्वर को सीमित करता है; प्रत्येक निषेध उस सीमा को हटाता है।

निश्चय ही व्यास का उद्देश्य यहाँ अपोफैटिक थियोलॉजी का प्रतिपादन नहीं है। दोनों परम्पराएँ ऐतिहासिक रूप से स्वतंत्र हैं। किन्तु दोनों में एक समान बौद्धिक संरचना अवश्य दिखाई देती है—जब भाषा किसी असाधारण सत्ता को पूरी तरह बाँध नहीं पाती, तब वह निषेध का सहारा लेती है।

सात्यकि के लिए "अपराजित" इसी अर्थ में अत्यन्त अर्थवान है।

ध्यान दीजिए—यदि व्यास उन्हें "महावीर" कहते, तो वे अनेक महावीरों में एक हो जाते। यदि "महारथ" कहते, तो वे अन्य महारथियों की श्रेणी में खड़े दिखाई देते। यदि "परमेष्वास" कहते, तो उनका परिचय केवल धनुर्विद्या तक सीमित हो जाता।

किन्तु "अपराजित" इन सब सीमाओं से बच जाता है।

यह कोई कौशल नहीं बताता।यह परिणाम बताता है।और परिणाम भी ऐसा जिसे कोई प्रतिवाद न कर सके।क्योंकि पराजय एक सार्वजनिक घटना है; वह छिपाई नहीं जा सकती। विजय का स्वरूप विवादास्पद हो सकता है; पराजय का तथ्य नहीं।इसीलिए "अपराजित" एक प्रकार का ऐतिहासिक प्रमाण भी है और दार्शनिक संकेत भी।परन्तु सम्भवतः इस शब्द की सबसे गहरी प्रतिध्वनि महाभारत के व्यापक सन्दर्भ में सुनाई देती है।
महाभारत बार-बार यह बताती है कि विजेता भी अन्ततः हारते हैं। युधिष्ठिर जीतकर भी शोक से भर जाते हैं। अर्जुन विजय के बाद गांडीव रख देते हैं। भीम प्रतिशोध पूरा करके भी रिक्त रह जाते हैं। स्वयं कृष्ण का यदुवंश भी विनष्ट होता है। इस महाकाव्य में कोई विजय अन्तिम नहीं है।

ऐसे ग्रन्थ में यदि किसी योद्धा के लिए "अपराजित" शब्द आता है, तो वह केवल युद्धकौशल का विशेषण नहीं रह जाता; वह उस क्षण तक की उसकी अस्तित्वगत अखण्डता का संकेत बन जाता है।
व्यास मानो कह रहे हों—यह वह पुरुष है जिसके जीवन में अभी तक पराजय प्रवेश नहीं कर सकी है।

युद्ध आगे है।इतिहास आगे है।नियति आगे है।

पर इस क्षण—जब शंख बज रहे हैं और काल अभी अपना पृष्ठ नहीं पलटा है—सात्यकि उस सीमा-रेखा पर खड़े हैं जहाँ उनका परिचय किसी उपलब्धि से नहीं, बल्कि अपराजेयता की अभी तक अक्षुण्ण रही सम्भावना से होता है।

यही एक शब्द उन्हें अन्य सभी योद्धाओं से अलग कर देता है। व्यास कभी-कभी पूरे चरित्र का इतिहास नहीं लिखते; वे केवल एक शब्द चुनते हैं। और वह एक शब्द ही उस चरित्र का सम्पूर्ण व्याकरण बन जाता है। "अपराजितः" ऐसा ही एक शब्द है।

कुरुक्षेत्र को यदि केवल "पाण्डव बनाम कौरव" कहा जाए, तो महाभारत की राजनीतिक जटिलता का बहुत बड़ा भाग दृष्टि से ओझल हो जाता है। यह युद्ध दो भाइयों के बीच का संघर्ष भर नहीं था; यह अनेक राजवंशों, अनेक निष्ठाओं, अनेक वैवाहिक सम्बन्धों और अनेक पीढ़ियों से निर्मित एक विशाल सम्बन्ध-जाल का विस्फोट था।
एक ओर केवल पाण्डव नहीं थे। उनके साथ पाञ्चाल थे, मत्स्य थे, काशी थी, चेदि था, और सबसे बढ़कर यादवों का वह प्रभावशाली भाग था जो कृष्ण के नेतृत्व में उनके साथ खड़ा था। दूसरी ओर केवल कौरव नहीं थे। उनके साथ गान्धार था, सिन्धु था, मद्र था, अंग था, त्रिगर्त था और असंख्य अन्य राजवंश थे। कुरुक्षेत्र वास्तव में वंशों का युद्ध नहीं था; वह सम्बन्धों के नेटवर्क का युद्ध था।

इसी व्यापक परिप्रेक्ष्य में सात्यकि का महत्त्व असाधारण हो उठता है।

वे केवल एक वीर योद्धा नहीं हैं; वे दो महान् सम्बन्ध-परम्पराओं के संगम-बिन्दु हैं।

रक्त से वे वृष्णि हैं।
हृदय से वे कृष्ण के आत्मीय हैं।
विद्या से वे अर्जुन के शिष्य हैं।
और निष्ठा से वे पाण्डव-पक्ष के स्तम्भ हैं।

उनके भीतर यादव और कुरु—दोनों संसार एक-दूसरे से मिलते हैं। वे केवल एक सैनिक नहीं; वे एक जीवित सेतु हैं।

यदि इस सम्बन्ध-जाल को आधुनिक सामाजिक मानवशास्त्र की दृष्टि से देखें, तो रॉबिन डनबर का सामाजिक-वृत्त सम्बन्धी विचार एक रोचक रूपक प्रस्तुत करता है। डनबर का तर्क है कि मनुष्य के सम्बन्ध समान दूरी पर नहीं होते। उसके जीवन में कुछ व्यक्ति ऐसे होते हैं जो उसके सबसे भीतरी विश्वास-वृत्त में रहते हैं; फिर उससे बाहर मित्रों के वृत्त, सहयोगियों के वृत्त और व्यापक सामाजिक सम्पर्कों के वृत्त निर्मित होते जाते हैं। समाज केवल व्यक्तियों का समूह नहीं है; वह केन्द्र और परिधि वाले अनेक सम्बन्ध-वृत्तों की संरचना है।

इस रूपक की दृष्टि से देखें तो सात्यकि का स्थान विलक्षण है।

वे केवल कृष्ण के बाहरी सहयोगी नहीं हैं; वे उनके अत्यन्त निकटस्थ विश्वासपात्रों में हैं।
वे केवल अर्जुन के सहयोद्धा नहीं हैं; वे उनके शिष्य, प्रिय और युद्ध-सहचर हैं।
इस प्रकार वे दो ऐसे सम्बन्ध-वृत्तों को जोड़ते हैं जो महाभारत की राजनीति के सबसे प्रभावशाली केन्द्र हैं।

समाजशास्त्र की भाषा में कहें तो सात्यकि संबन्धात्मक केन्द्रीयता (relational centrality) का अद्भुत उदाहरण हैं। उनका महत्त्व केवल उनकी व्यक्तिगत शक्ति में नहीं, बल्कि इस तथ्य में है कि वे दो महाशक्तियों के बीच विश्वास का माध्यम हैं। ऐसे व्यक्ति किसी भी नेटवर्क में केवल सदस्य नहीं होते; वे उसके प्रवाह के वाहक होते हैं।

यहीं सात्यकि का "अपराजित" विशेषण एक नया अर्थ ग्रहण करता है।

उनकी अजेयता केवल उनके धनुष की तीक्ष्णता में नहीं है। वह उनके सम्बन्धों की अखण्डता में भी है।

वे अकेले नहीं लड़ते।
उनके पीछे कृष्ण का विश्वास है।
उनके भीतर अर्जुन की शिक्षा है।
उनके चारों ओर वृष्णियों का गौरव है।
और उनके सामने है धर्मयुद्ध का उद्देश्य।

यही कारण है कि उनका व्यक्तित्व केवल सैन्य शक्ति का नहीं, बल्कि सम्बन्धों की शक्ति का भी प्रतीक बन जाता है।

महाभारत बार-बार यह संकेत करती है कि मनुष्य की सबसे बड़ी शक्ति उसके शस्त्र नहीं, उसके सम्बन्ध हैं। भीष्म अपने व्रत से महान् हैं; कर्ण अपनी मित्रता से; विदुर अपनी निष्ठा से; और सात्यकि अपने बहुस्तरीय सम्बन्धों से।
किन्तु सात्यकि की विशिष्टता केवल यह नहीं कि वे अनेक सम्बन्धों से जुड़े हैं। विशिष्टता यह है कि उन सम्बन्धों में कोई अन्तर्विरोध नहीं है। अनेक पात्रों के जीवन में सम्बन्ध उन्हें विभाजित करते हैं—भीष्म सिंहासन और धर्म के बीच, कर्ण जन्म और मित्रता के बीच, शल्य रक्त और दायित्व के बीच बँटे हुए हैं। सात्यकि के जीवन में ऐसा विभाजन नहीं है। कृष्ण के प्रति उनकी निष्ठा और अर्जुन के प्रति उनकी शिष्यता एक-दूसरे को पुष्ट करती हैं, विरोध नहीं करतीं।

यही उनकी वास्तविक अखण्डता है।

अतः यदि सात्यकि को महाभारत की सम्बन्ध-राजनीति में देखें, तो वे केवल एक योद्धा नहीं, बल्कि एक सजीव संगम हैं—वृष्णियों और पाण्डवों के बीच, रक्त और साधना के बीच, कुल और चयन के बीच, जन्म और अर्जित निष्ठा के बीच। उनके माध्यम से महाभारत एक गहरा सत्य प्रकट करती है—इतिहास केवल तलवारों से नहीं बनता; वह उन मनुष्यों से भी बनता है जो दो संसारों को जोड़ने की क्षमता रखते हैं। कई बार युद्ध का परिणाम रणभूमि में नहीं, उन अदृश्य सम्बन्धों में पहले ही तय हो चुका होता है जिन पर सेनाएँ खड़ी होती हैं। सात्यकि उन्हीं अदृश्य सम्बन्धों के सबसे उज्ज्वल प्रतीकों में से एक हैं।

सात्यकि के "अपराजितः" विशेषण को केवल युद्धनीति या वीरता की दृष्टि से पढ़ना पर्याप्त नहीं है। महाभारत के भीतर एक और सूक्ष्म संरचना कार्य करती दिखाई देती है—कृष्ण-सन्निधि की संरचना।

महाभारत बार-बार संकेत करती है कि कृष्ण के साथ सम्बन्ध केवल राजनीतिक नहीं है; वह अस्तित्वगत है। जो जितना कृष्ण के निकट आता है, उसका जीवन उतना ही किसी गहरे आध्यात्मिक केन्द्र से जुड़ता जाता है। यही कारण है कि गीता में कृष्ण कहते हैं—

"दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया।
मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते॥" (७.१४)

यहाँ "माया" केवल जगत् की सृष्टिशक्ति नहीं है; वह मोह, भ्रम, अविवेक और आत्मविस्मृति का भी नाम है। मनुष्य की सबसे बड़ी पराजय बाहरी युद्ध में नहीं होती; वह तब होती है जब उसका विवेक ही पराजित हो जाता है।
इस दृष्टि से देखें तो महाभारत के अनेक महान् योद्धा पहले भीतर हारते हैं, फिर बाहर।

भीष्म प्रतिज्ञा के बन्धन में बँध जाते हैं।

द्रोण पुत्र-मोह में विचलित हो जाते हैं।

कर्ण आत्मगौरव और अपमान की गाँठ से मुक्त नहीं हो पाते।

अर्जुन स्वयं युद्धारम्भ में विषाद से भर जाते हैं। उनका धनुष पहले मन में गिरता है, फिर हाथ से।

इन सबकी पराजय का प्रथम स्थल अन्तःकरण है।

किन्तु सात्यकि के चरित्र में ऐसा कोई आन्तरिक द्वन्द्व दिखाई नहीं देता।

वे न कभी संशयग्रस्त होते हैं, न किसी नैतिक अनिर्णय में पड़ते हैं, न व्यक्तिगत महत्त्वाकांक्षा से संचालित दिखाई देते हैं। उनका जीवन एक असाधारण स्पष्टता से भरा हुआ है। वे जानते हैं कि उनका स्वामी कौन है, उनका धर्म क्या है और उनका स्थान कहाँ है।

यहीं "अपराजितः" शब्द एक नया अर्थ ग्रहण करने लगता है।

यदि "पराजय" का सबसे सूक्ष्म अर्थ मोह द्वारा परास्त होना है, तो "अपराजित" वह है जिसकी अन्तर्चेतना अभी तक मोह से विचलित नहीं हुई।

इस अर्थ में सात्यकि की अजेयता केवल बाहुबल की नहीं, चित्तबल की भी है।

यहाँ यह कहना कि "माया उन्हें पराजित नहीं कर सकती थी" एक सुन्दर वैष्णव व्याख्या हो सकती है, पर इसे ऐतिहासिक निष्कर्ष नहीं, बल्कि धार्मिक-दार्शनिक पाठ (theological reading) के रूप में प्रस्तुत करना अधिक उचित होगा। क्योंकि गीता का "माया" सिद्धान्त और महाभारत का "अपराजितः" विशेषण प्रत्यक्ष रूप से एक-दूसरे की व्याख्या नहीं करते; परन्तु वैष्णव परम्परा के आलोक में दोनों का संवाद अत्यन्त अर्थपूर्ण हो उठता है।

और इसी सन्दर्भ में एक रोचक तथ्य सामने आता है।

व्यास कृष्ण को "अपराजित" नहीं कहते।

यह इसलिए नहीं कि वे अजेय नहीं हैं, बल्कि इसलिए कि उनके लिए अजेयता कोई विशेषण ही नहीं है। वे स्वयं युद्ध की समस्त द्वैत-व्यवस्था से परे हैं। विजय और पराजय दोनों उनके लीलाक्षेत्र में घटित होते हैं। जो स्वयं माया के नियन्ता हैं, उन्हें माया से परे होने का विशेषण देना अनावश्यक है।

अर्जुन को भी "अपराजित" नहीं कहा गया।

क्योंकि अर्जुन की महानता उनकी अजेयता में नहीं, उनकी साध्यता में है। वे टूटते हैं, प्रश्न करते हैं, भ्रमित होते हैं और फिर ज्ञान के द्वारा पुनः उठते हैं। अर्जुन का आदर्श मनुष्य का आदर्श है—संशय से सत्य तक की यात्रा।

सात्यकि का स्वरूप भिन्न है।

वे न गुरु हैं, न ईश्वर।

वे सहचर हैं।

और शायद इसी कारण वे आरम्भ से अन्त तक एक अद्भुत आन्तरिक स्थिरता के साथ उपस्थित रहते हैं।

सात्यकि का अर्जुन से सम्बन्ध भी महाभारत का अत्यन्त सूक्ष्म अध्याय है।
ज्ञान की परम्परा यहाँ स्पष्ट दिखाई देती है—

द्रोण से अर्जुन।

अर्जुन से सात्यकि।

एक पीढ़ी दूसरी को केवल शस्त्र नहीं देती; वह दृष्टि भी देती है।

भारतीय परम्परा में इसे गुरु-परम्परा कहा गया है—ज्ञान का जैविक प्रवाह, जिसमें प्रत्येक पीढ़ी पूर्ववर्ती पीढ़ी का विस्तार होती है।

किन्तु सात्यकि इस परम्परा में केवल अनुकरण करने वाले शिष्य नहीं हैं।

चतुर्दश दिवस का युद्ध इसका प्रमाण है।

जब अर्जुन जयद्रथ की ओर अग्रसर हैं, तब सात्यकि स्वयं एक स्वतंत्र केन्द्र बनकर युद्ध करते हैं। वे गुरु की अनुपस्थिति में केवल प्रतिनिधि नहीं रहते; वे उसी परम्परा के स्वाधीन धारक बन जाते हैं। यहीं शिष्य अपनी मौलिकता प्राप्त करता है।

इस प्रसंग को यदि Harold Bloom के Anxiety of Influence के आलोक में देखें, तो एक रोचक भिन्नता दिखाई देती है।

ब्लूम का तर्क मुख्यतः आधुनिक काव्य-परम्परा के सन्दर्भ में है। उनके अनुसार प्रत्येक शक्तिशाली उत्तराधिकारी अपने पूर्ववर्ती से संघर्ष करता है। उसे अपनी स्वतंत्र पहचान बनाने के लिए किसी स्तर पर अपने गुरु या पूर्वज का सृजनात्मक अतिक्रमण करना पड़ता है। मौलिकता प्रतिस्पर्धा से जन्म लेती है।

महाभारत का यह प्रसंग एक भिन्न सम्भावना प्रस्तुत करता है।

सात्यकि अर्जुन से संघर्ष करके बड़े नहीं होते।

वे अर्जुन को अस्वीकार करके अपनी पहचान नहीं बनाते।

उनकी मौलिकता विद्रोह से नहीं, निष्ठा से जन्म लेती है।

वे अर्जुन की छाया नहीं बनते; पर वे अर्जुन से अलग होने के लिए अर्जुन का निषेध भी नहीं करते।

भारतीय गुरु-शिष्य परम्परा का यही अद्भुत रहस्य है।

यहाँ गुरु का सम्मान शिष्य की मौलिकता को दबाता नहीं; बल्कि उसी का आधार बनता है।

शिष्य गुरु का विस्तार बन सकता है, उसकी प्रतिकृति बने बिना।

उसकी ऊँचाई गुरु का खण्डन नहीं होती; गुरु की सिद्धि होती है।

इसीलिए सात्यकि का व्यक्तित्व किसी अन्तर्द्वन्द्व से ग्रस्त नहीं दिखाई देता।

उन्हें कृष्ण से प्रतिस्पर्धा नहीं करनी।

उन्हें अर्जुन से आगे निकलना सिद्ध नहीं करना।

उन्हें अपना पृथक् साम्राज्य नहीं चाहिए।

उनकी समस्त ऊर्जा बाहर की ओर प्रवाहित होती है, भीतर की ओर नहीं उलझती।

आधुनिक मनोविज्ञान भी इस तथ्य की पुष्टि करता है कि मनुष्य का बहुत-सा मानसिक बल आन्तरिक संघर्षों में व्यय हो जाता है। जिन व्यक्तियों में मूल्य, निष्ठा और आत्मबोध का एकीकरण (integration) होता है, उनमें निर्णय की स्पष्टता और कर्म की शक्ति असाधारण हो जाती है।

सात्यकि का "अपराजितः" शायद इसी एकीकृत व्यक्तित्व का भी संकेत है।

उनकी विजय का रहस्य केवल उनके बाणों में नहीं था।

वह उनके अन्तःकरण की अखण्डता में था।

जिस मनुष्य के भीतर विभाजन नहीं है, उसके बाहर की शक्ति भी अद्वितीय हो जाती है। और शायद इसी कारण व्यास ने उनके लिए कोई दीर्घ प्रशस्ति नहीं लिखी। उन्होंने केवल एक शब्द रखा—

"अपराजितः।"

मानो शेष सब कुछ उसी एक शब्द में पहले से समाहित हो।

Wednesday, 1 July 2026

चम्पु उपहास भाव का शब्द नहीं है

"चम्पु" - उपहास भाव का शब्द नहीं है, - संस्कृत‌ भाषा का सम्मानजनक शब्द है , क्या आप इस तथ्य को समझा सकते हैं?
मूल वर्तनी है चम्पू —

यह गद्यपद्यमय काव्य है, वह काव्यग्रंथ जिसमें गद्य के बीच बीच में पद्य भी हो, ऐसा नाटक या काव्य जिसका कुछ अंश गद्य में हो और कुछ अंश पद्य में लिखता हो।

सुन्दर, विचित्र के तात्पर्य में इसका अर्थ विस्तार हुआ है।

पहाड़ी धान्य विशेष ; गंगाजली को भी चम्पू कहते हैं।

बुन्देली भाषा में चम्पू लोटे के अर्थ में है।

'चम्प्' (चम्पिँ गत्यां गदने च) धातु को उ प्रत्यय लगाकर चम्पू शब्द रचा गया है।

बद्री नारायण ने लिखा है "कविता का छंद” में —

कोई उसे छंद में, कोई चम्पू गद्य में

कोई उसे सरस संगीत में कर रहा था आबद्ध

किन्तु चम्पू का वक्रोक्ति के रूप में यह अर्थ परिवर्तन इस शब्द से नहीं जुड़ा है। यह जुड़ा है चम्पी से!

चम्पी शब्द संस्कृत चपति से रचित है। जोकि चप् (चपँ सान्त्वने भ्वादिः परस्मैपदी सकर्मकः सेट् ; शान्त करना) धातु से रचित है। चम्पी शरीर को शान्त करने हलका करने की क्रिया है।

भारतीय संस्कृति में चम्पी केश प्रसाधन परम्परा का एक महत्वपूर्ण अङ्ग रही है। चम्पी करने के लिए सिर में अधिक तेल लगाकर मला जाता था। इससे सिर की त्वचा और केश दोनों का स्वास्थ्य सुधरता है। फिर इन तेल से सने केशों में कंघी की जाती थी तो केश कपाल से चिपके रहते थे।

भारतीय महानगरों में 1950 के दशक में भी “चम्पी तेल-मालिश” लोकप्रिय थी; और “प्यासा” (1958) में जॉनी वॉकर का चरित्र यही काम करता है; और “सर जो तेरा चकराए या दिल डूबा जाए” गीत में यह टेर भी सुनाई देगी।

वैसे, इसी चम्पी को पश्चिम ने कुछ परिवर्तन के साथ शैम्पू शब्द के रूप में केश प्रसाधन सामग्री के नाम के लिए अपनाया है। वैसे 1762 का शैम्पू शब्द का प्रथम उल्लेख मिलता है, जब इसे औषधीय तेलों की चम्पी के अर्थ में प्रयोग किया गया। लगभग सौ वर्ष उपरान्त इस शब्द का प्रयोग बालों को झागदार पदार्थ से धोने के अर्थ में प्रयोग किया जाने लगा; और फिर उस पदार्थ को शैम्पू कहने लगे।

फिर धीरे धीरे (लगभग 1950 के आसपास) पाश्चात्य संस्कृति का अनुकरण करने वाले लोगों ने इस प्रकार के केश विन्यास को गँवारू होने से जोड़ दिया। वैसे भी ऐसे केश विन्यास वाले अधिकांश व्यक्ति ग्रामीण परिवेश से थे। इस प्रकार के लोगों को चम्पू कहने का प्रचलन बन गया। जो सीधे, सज्जन, ग्रामीण व्यक्तियों के लिए वक्रोक्ति के रूप में प्रयोग किया जाने लगा; और फिर इसका पुरातनपन्थी के तात्पर्य में अर्थ विस्तार हुआ है। और शैम्पू करने वाले इस प्रकार चम्पी करने वाले चम्पू को अपमानित करने लगे।

वैसे आर्यसमाज के पण्डित चमूपति, जिनका मूल नाम था चम्पक राय, उन्हें भी अनेक लोग पण्डित चम्पू कहते हैं। उन्होंने अनेक पुस्तकें लिखीं, जिनमें से एक है "रंगीला रसूल” (1924)! तथापि, इस बात की क्षीण सम्भावना है कि उनके उपहास में चम्पू शब्द का वर्तमान प्रचलित अर्थ बना है। उनके उपनाम चमूपति के चमू का अर्थ सेना है; ऐसी सेना जिसमें 129 हाथी, इतने ही रथ, 2187 अश्वारोही, तथा 3685 पायिक‌ / पादभट (पैदल सैनिक) हों, उसका सेनापति चमूपति कहलाता है।

अशोक चक्रधर की "चौं रे चम्पू” और 'कुछ कर न चम्पू' में चम्पू भोला-भाला एक पढ़े-लिखे, समझदार, लेकिन व्यवस्था के सामने असहाय और निष्क्रिय मध्यवर्गीय बुद्धिजीवी के व्यक्तित्व पर तीखी वक्रोक्ति (कटाक्ष) है। जो परम्परा से बन्धा हुआ किसी भी प्रकार की आत्मरक्षात्मक प्रतिक्रिया भी नहीं कर पाता।

वैसे, चम्पू का अर्थ विस्तार होकर अब न केवल पुरातनपन्थी, अपितु, देश की राजनीति पर (पुरातनपन्थी) प्रभाव डालने वाले व्यक्ति, असहिष्णु और अंहकारी व्यक्ति, विशेष रूप से स्वयं को पीड़ित बताने वाले किन्तु किसी अन्य के मानवाधिकार न समझने वाले व्यक्ति के अर्थ तक में अर्थ विस्तार हो गया है।

यह संजय चतुर्वेदी की ग़ज़ल — चम्पू-चरित्तर-चंद्रिका नित हरण भवभय दारुणम् से स्पष्ट है। इस कविता का आनन्द लें। इस अर्थ में सम्भव है कि यह शब्द चम्प् धातु को शतृ प्रत्यय लगाकर रचा चम्पत् (गतिमान, चलता हुआ) अथवा कर्तरि लटलकार मध्यम पुरुष स्वरूप चम्पत (गए, ओझल हो गए) से रचा प्रतीत होता है। चम्पत होना — ओझल होना, चले जाना, लोप हो जाना के अर्थ में प्रयुक्त होने वाला शब्द है; और बहुधा चम्पत होने वाला व्यक्ति धोखाधड़ी कर चाल चलकर अन्तर्धान हो जाता है। जिस प्रकार प्यारे लगते व्यक्ति को प्यारु, लपकने वाले को लपकू, फैंकने वाले को फैंकू, कहते हैं; उसी प्रकार चपत लगा कर चम्पत होने वाले को चम्पू कहना एक सहज भाषाई वृत्ति है।

Saturday, 27 June 2026

भगवान जगन्नाथ और काष्ठ


जगत को चलाने वाले जगन्नाथ भले ही षडैश्वर्य गुण संपन्न हो, पर उनको  भी अपना ही घर चलाने में मैया याद आ जाती है। वैसे देखा जाए तो यह गृहस्थों के लिए एक सीख भी है कि गृह स्वामी को भीतर-बाहर काठ के कुंद की तरह धैर्य धारण करना पड़ता है। तभी गृहस्थी रूपी रथ आगे बढ़ता है।
भगवान मुरारी को काठ क्यों होना पड़ा, इसका रहस्य  पढ़िए। संस्कृत साहित्य में हास्य बोध उच्च कोटि का है,






भगवान हैं तो मनुष्य की चिंता करेंगे ही। करना भी चाहिए। किंतु उनके भक्त भी इस मामले में कम नहीं हैं। वे भगवान की चिंता करते हैं। खासी चिंता करते हैं।
ऐसे ही एक चिंता प्रवण भक्त जब जगन्नाथ जी के दर्शन को गये तो वह चिंता में पड़ गये है। उन्हें यह बात बड़ी विचित्र लगी कि ‘‘पुरुषsएवेदं सर्व्वं यद्भूतं यच्चं भाव्यम्’’ वाले भगवान आखिर काठ के कैसे हो सकते हैं? हो ना हो, इसके पीछे बहुत बड़ा कोई रहस्य है। 
चिंतन प्रवण भक्त ने चिंता शुरू कर दी । बहुत दिन तक चिंतन चला। अंत में उन्होंने सारा रहस्य ढूंढ मारा। वह रहस्य इस श्लोक में आबद्ध कर दिया:-

‘‘एका भार्या प्रखर मुखरा चंचला सा द्वितीया, एको पुत्र: त्रिभुवन विजयी मन्मथ दुर्निवार:
शेष: शैया, उदधि भवन: वाहन पन्निगार:, स्मारं स्मारं स्वगृहे चरितं दारू भूतो मुरारि।’’

इसका चलताऊ भाषा में मोटा-मोटी यह अनुवाद हो सकता है कि एक पत्नी बहुत बोलने वाली। दूसरी अति चंचला, कहीं टिकती ही नहीं। एक पुत्र है कामदेव है जिसको जीतना बहुत ही कठिन है और वह तीनों लोक को जीत लेता है। शेष नाग की शैया। ऊपर से गहरे सागर का निवास। वाहन है नागों के शत्रु गरूड़। भगवान की जरा सी दृष्टि चूके तो शैया और वाहन आपस में भिड़ जाए। बेचारे भगवान मुरारी अपने घर की चिंता कर करके काठ के हो गये हैं। 
सोचिए लोग अपने घर की जरा जरा सी परेशानियों से परेशान हो उठते हैं।

मुरारी बापू की पत्नी का मरण और उनके लिए सूतक

मुरारी बापू की पत्नी का मरण और उनके लिए सूतक 
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मुरारी बापू गुजरात प्रांत से वामपंथी विचारधारा में राम कथा कहने के लिए विश्व में विख्यात हैं।
अभी कुछ समय पहले उनकी पत्नी का निधन हो गया। उन्होंने तीन दिन के बाद काशी में कथा कहने के लिए गंगा में स्नान किया और बाबा विश्वनाथ का दर्शन भी किया ।
इसके साथ ही विद्वानों ,संतो और शंकराचार्य जी महाराज ने धर्म की मर्यादा का उल्लंघन देखकर उन्हें शास्त्र की मर्यादा का संदेश दिया।
मुरारी ने भी अपनी तीखी प्रक्रिया में क्षमा याचना की और सब पोल खोल देंगे कह कर सभी साधु संतों पर आक्रमण किया। अपने को निम्बार्काचार्य सम्प्रदाय का साधु घोषित करके कहा कि उन्हें सूतक नहीं लगता है।
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समाधान
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वेद, स्मृति और पुराण को मानने वाले सनातनी प्राणी के लिए मरणाशौच में दशगात्र विधान करना जरूरी है ।अन्यथा वह अपवित्र है और उसके हाथ का पानी पीना भी दोषपूर्ण है। अशौच में पड़ा हुआ व्यक्ति न तो किसी से पैर छुआ सकता है न किसी का पैर छू सकता है न किसी को प्रणाम कर सकता है।
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उनके सूतक का पालन न करने के लिए सभी आचार्यों ने तीखी प्रतिक्रिया की।
यहां राम कथा के माध्यम से मरणाशौच को समझिए।
महाराज दशरथ की मृत्यु के बाद भरत जी ने अपने पिता की वेद,पुराण,स्मृतियों के अनुसार विधियों का पालन किया।
सोधि सुमृति सब वेद पुराना।
कीन्ह भरत दसगात विधाना।।
.....
भये विशुद्ध दिए सब दाना।
.......
पितु हित भरत कीन्हि जस करनी।

इससे भरत जी की सूतक से निवृत्ति हो गई। अब भरत जी के निर्णय से सब राम जी को मनाने चित्रकूट पहुंच गये।
.................
जब राम जी ने सुना कि पिता जी सुरपुर चलेगये। बहुत दुखी होकर प्रथम दिन की तरह सूतक माना । जबकि भरत जी तो सब विधान पहले ही पूरे कर चुके थे।
व्रत निरम्बु तेहि दिन प्रभु कीन्हां।
मुनिहु कहें जलु काहु न लीन्हां।।
.......
करि पितु क्रिया वेद जस वरनी।
भे पुनीत पातक तम तरनी।।
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चित्रकूट में रहते हुए और भरत जी द्वारा सब क्रिया विधान पूरा करने पर भी...
शुद्ध भये दुई वासर बीते।
दो दिन बीत जाने के बाद तीसरे दिन अपने को शुद्ध माना।
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मुरारी जी राम कथा करते हैं।राम कथा सापेक्ष उनका चिंतन स्थिर रहता तो सूतक मान्य करते।उनकी कथा में वामपन्थ स्पष्ट रहता है। इसलिए उनका सूतक समाप्त नहीं हो सकता है। उन्होंने वेद विहित मार्ग का त्याग किया है। 
तजि श्रुति पन्थ वाम पथ चलिहीं।
वंचक विरचि वेष जगु छलहीं।
मुरारी बापू और उनके समर्थक श्रोता दोनों सनातन धर्म में वामपन्थ की प्रविष्टि के लिए सूतक के पात्र हैं।

श्राद्ध में खाने-खिलाने वाले सावधान मौन रहें

🦀श्राद्ध में खाने-खिलाने वाले सावधान- जो मृतपितरों के निमित्त एकोद्दिष्ट, पार्वण आदि में ब्राह्मणभोजन करते-कराते हैं; वे सावधान रहें। मरे हुए माता-पिता आदि के श्राद्धनिमित्तक भोजन में पितर तभी तृप्त होते हैं, जब भोज्यपदार्थों के गुणों को कहे विना मौन होकर भोजन किया जाय। मौन भोजनपर्यन्त ही ब्राह्मणरूप पितर भोजन करते हैं। मौन भोजन के अभाव में भोजन का सूक्ष्म तत्त्व पितरों तक पहुँचता नहीं। व्यर्थ बकवास करते हुए भोजन करनेवाले ब्राह्मणों के सप्तधातुओं में श्राद्धीयान्न का सूक्ष्म-स्थूलांश टिक जाता है, परिणामत: अतृप्त पितर उन अमौनभोजी ब्राह्मणों को भी विविध प्रकार से व्यथित करते रहते हैं। खाने-खिलाने वाले इस पर ध्यान नहीं दे सकते तो श्राद्धनिमित्तक खाना-खिलाना बन्द कर दें, अन्यथा वह श्राद्धान्न ही दोनों के तेज को खा जाएगा। आजकल हमारे समाज में भी एक गन्दी परिपाटी चल गयी है कि माँ-बाप की मृततिथि में चतुर्वर्णेतर मित्र एवं स्टाफों को समान पंक्ति में बैठा कर नियमबद्ध ब्राह्मणों की उपेक्षा करना चाहते हैं! ऐसा संक्रमित भोजन दोनों के पतन का कारण होता है। हमारे समाज में भी ऐसे घिनौने कृत्यों का बढ़ना दु:खद है। सार्ववर्णिक श्राद्धीय सहभोजन में बुफेलो सिस्टम या जूते पहने ही लाल कुर्सी-टेबल पर श्राद्धपार्टी मनाना बहुत व्यथाकर है। बन्धो! आप किसी को खिलाना चाहते हो तो उसे खिलाने की योग्यता अपनाओ; कोई तुम्हारी श्राद्धपार्टी के भरोसे नहीं जी रहा! आश्चर्य तो तब बढ़ जाता है जब उस असंस्कृत माहौल में भी कोई कुछ नियम पालन करना चाहते हैं तो ये ब्रह्मासुरसमूह उनकी खिल्ली उड़ाते हैं! सावधान! तुम अमुक को खिलाने में सक्षम नहीं हो; तो ब्राह्मण के नाम पर उन्हें खिलाना-बुलाना एकदम बन्द करो। तुम्हारे यहाँ एक ज़ूम की पार्टी कर भ्रष्ट होना आवश्यक नहीं!.




👺बान्धवो! बहुरूपियों को बहुत बखारिए परन्तु सनातन को सुसंरक्षित करने में हमी लोग काम आएँगे। हम्हीं लोग नमक-रोटी खाकर भी अन्तिम साँस तक सनातन को समृद्ध करते रहेंगे। मोहमाया के ब़ाज़ार में अमिथ्या कुछ नहीं!...

तिथि अनुसार आहार-विहार

तिथि अनुसार आहार-विहार
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प्रतिपदा को कूष्माण्ड(कुम्हड़ा, पेठा) न खाये, क्योंकि यह धन का नाश करने वाला है।

द्वितीया को बृहती (छोटा गन या कटेहरी) खाना निषिद्ध है।

तृतीया को परवल खाना शत्रुओं की वृद्धि करने वाला है।

चतुर्थी को मूली खाने से धन का नाश होता है।

पंचमी को बेल खाने से कलंक लगता है।

षष्ठी को नीम की पत्ती, फल या दातुन मुँह में डालने से नीच योनियों की प्राप्ति होती है।

सप्तमी को ताड़ का फल खाने से रोग बढ़ता है था शरीर का नाश होता है।

अष्टमी को नारियल का फल खाने से बुद्धि का नाश होता है।

नवमी को लौकी खाना गोमांस के समान त्याज्य है।

एकादशी को शिम्बी(सेम), 

द्वादशी को पूतिका(पोई) अथवा 

त्रयोदशी को बैंगन खाने से पुत्र का नाश होता है।
(ब्रह्मवैवर्त पुराण, ब्रह्म खंडः 27.29-34)

अमावस्या, पूर्णिमा, संक्रान्ति, चतुर्दशी और अष्टमी तिथि, रविवार, श्राद्ध और व्रत के दिन स्त्री-सहवास तथा तिल का तेल खाना और लगाना निषिद्ध है।
(ब्रह्मवैवर्त पुराण, ब्रह्म खंडः 27.29-38)

रविवार के दिन मसूर की दाल, अदरक और लाल रंग का साग नहीं खाना चाहिए।(ब्रह्मवैवर्त पुराण, श्रीकृष्ण खंडः 75.90)

सूर्यास्त के बाद कोई भी तिलयुक्त पदार्थ नहीं खाना चाहिए। (मनु स्मृतिः 4.75)

लक्ष्मी की इच्छा रखने वाले को रात में दही और सत्तू नहीं खाना चाहिए। यह नरक की प्राप्ति कराने वाला है।
(महाभारतः अनु. 104.93)

दूध के साथ नमक, दही, लहसुन, मूली, गुड़, तिल, नींबू, केला, पपीता आदि सभी प्रकार के फल, आइसक्रीम, तुलसी व अदरक का सेवन नहीं करना चाहिए। यह विरूद्ध आहार है।

दूध पीने के 2 घंटे पहले व बाद के अंतराल तक भोजन न करें। 

बुखार में दूध पीना साँप के जहर के समान है।

काटकर देर तक रखे हुए फल तथा कच्चे फल जैसे कि आम, अमरूद, पपीता आदि न खायें। 

फल भोजन के पहले खायें। रात को फल नहीं खाने चाहिए।

एक बार पकाया हुआ भोजन दुबारा गर्म करके खाने से शरीर में गाँठें बनती हैं, जिससे टयूमर की बीमारी हो सकती है।

अभक्ष्य-भक्षण करने (न खाने योग्य खाने) पर उससे उत्पन्न पाप के विनाश के लिए पाँच दिन तक गोमूत्र, गोमय, दूध, दही तथा घी का आहार करो।
(वसिष्ठ स्मृतिः 370) प्रश्न नहीं स्वध्याय करें ।।।

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भोजनपात्र में कुछ अन्नशेष बचाना चाहिए


भोजनपात्र में कुछ अन्नशेष बचाना चाहिए या पात्रों को धो-पोंछकर पी-चाट जाना चाहिए?

 धर्मशास्त्रों के अनुसार भोजनपात्र में किञ्चित् अन्नशेष बचाना चाहिए; बर्तनों को धो-पोंछकर पी-चाट जाना निषिद्ध है। कात्यायनभोजनसूत्रम् में स्पष्ट लिखा है- "न सर्वभोजी स्यात्किञ्चिद्भोज्यं परित्यजेदन्यत्र घृतपायसदधिसक्तुपललमधुभ्य:" भोजनपात्रस्थ अन्न को पोंछ-पाछकर सर्वग्रास नहीं कर जाना चाहिए। घृत, पायस, दधि, सक्तु, पलल और मधु से अतिरिक्त भोज्यपदार्थ को किञ्चित् बचा लेना चाहिए। नारदजी ने भी कहा है- "सर्वं सशेषमश्नीयाद्घृतपायसवर्जितम्।" 

🌸धर्मशास्त्रनियन्त्रित गृहस्थों की परम्परा में #उच्छिष्टभोजी पितृगण भी हैं, जिनके लिए भोजनपात्र में बचे हुए उच्छिष्ट अन्न ही ग्राह्य होते हैं; तदर्थ चित्राहुति के रूप में- "मद्भुक्तोच्छिष्टशेषं ये भुञ्जन्ति पितरोsधमा:। तेषामन्नं मया दत्तमक्षय्यमुपतिष्ठतु।।" बदरीफलप्रमाण उच्छिष्टान्न ही देने का विधान है। देवल ने भी यही बात कही है- "भुक्तोच्छिष्टं समाघ्राय सर्वेभ्यो घृतवर्ज्जितम्। उच्छिष्टभागधेयेभ्य: सोदकं निर्वपेद्भुवि।।" पुन: भोजनपात्र में बचे शेषान्न अथवा चित्राहुति वाला अन्न लेकर कौओं को खिलाये। भोजनान्त में ही "श्वानौ द्वौ श्यावशवलौ वैवस्वतकुलोद्भवौ। ताभ्यामन्नं प्रदास्यामि स्यातामेतावहिंसकौ।।" से श्वानबलि देने का विधान है। 

🌸धर्मनियन्त्रित समुदार गृहस्थों को उत्तममध्यमाधम मृतपितृगणों की भी चिन्ता रहती है, अत: उच्छिष्टभोजी पितरों के भाग को भी स्वयं खा-पचा जाना सही नहीं है। धार्मिकों के द्वारा यथासाध्य शास्त्राज्ञा का पालन करना चाहिए; अन्यथा अतृप्त और बली पितृगण को "अतर्पिता: पितरो देहाद्रुधिरं पिबन्ति" से कौन रोक सकता है??