Sunday, 1 March 2026

सूर्य ग्रहण चंद्र ग्रहण


#पुनरुपनयननिमित्त- ( सूर्य-चन्द्रग्रहणे भोजन प्रायश्चित्त)-

[देवलः] सूर्यसोमोपरागे च उक्तकालं विना द्विजाः। 
              तदन्नं मांसमित्याहुः तद्भुक्त्वा मांसभुग्भवेत् ।। 
[मरीचिः] सूर्यग्रहे तु नाश्नीयात् पूर्वं यामचतुष्टयम्। 
               चन्द्रग्रहे तु यामांस्त्रीन् भुक्त्वा पापं समश्नुते ।। 
इमं धर्मं परित्यज्य यो विप्रस्त्वन्यथाचरेत् ।। 
               (पुनः) #तस्योपनयनं भूयस्तप्तं सान्तपनं स्मृतम् । (सूर्यग्रहभोजने तप्तं चन्द्रग्रहणे सान्तपनम् ) 
तदेवाह [मनुः] सूर्योपरागे यो भुंक्ते तस्य पापं महत्तरम् । 
                            तस्य पापविशुद्ध्यर्थं तप्तकृच्छ्रमुदीरितम् । चन्द्रोपरागकाले भुक्त्वा कायं समाचरेत् ।। 
                           उभयोर्भोजने विप्रः पुनः संस्कारमर्हति ।।
{ तत् प्रायश्चित्ते पुनःसंस्कारे च पराङ्गमुखः स अयाज्यो भवति}
चतुर्वर्गचिंतामणि प्रायश्चित्त खंड 🙏


सूर्य या चन्द्र ग्रहण के समय (निर्दिष्ट काल को छोड़कर) यदि द्विज भोजन करता है, तो उस अन्न को मांस के समान कहा गया है; और उसे खाने वाला मानो मांस खाने वाला हो जाता है।(देवल)
सूर्यग्रहण में पहले चार याम (लगभग बारह घंटे) तक भोजन नहीं करना चाहिए।
चन्द्रग्रहण में तीन याम तक भोजन नहीं करना चाहिए; यदि कोई इस समय भोजन करता है तो वह पाप का भागी होता है। जो ब्राह्मण इस धर्म को छोड़कर अन्यथा आचरण करता है, उसका पुनः उपनयन करना चाहिए।
सूर्यग्रहण में भोजन करने पर ‘तप्त’ कृच्छ्र और चन्द्रग्रहण में ‘सान्तपन’ कृच्छ्र प्रायश्चित्त बताया गया है। -(मरीचि)
जो व्यक्ति सूर्यग्रहण में भोजन करता है, उसका पाप अत्यन्त बड़ा होता है। उस पाप की शुद्धि के लिए ‘तप्तकृच्छ्र’ प्रायश्चित्त बताया गया है। और जो चन्द्रग्रहण के समय भोजन करे, उसे भी विधिपूर्वक प्रायश्चित्त करना चाहिए। दोनों (सूर्य और चन्द्र ग्रहण) में भोजन करने वाला द्विज पुनः संस्कार (उपनयन) का अधिकारी होता है।(मनुः)
अतः जो इन प्रायश्चित्तों और पुनःसंस्कार से विमुख रहता है, वह अयाज्य (यज्ञादि कर्म के अयोग्य) माना जाता है।
(चतुर्वर्गचिंतामणि प्रायश्चित्त खंड)

सरदार सिख

श्री तेजोमल जी (गुरु तेग बहादुर) को (सिख समुदाय का कोलेजियम) गुरु पद के योग्य नहीं मानता था। आठवें गुरु हरकिशन जी अल्प आयु में ही चेचक के कारण प्रलोक सिधार गये थे। काफी समय तक गुरु पद खाली रहा। तेजोमल जी हरि मन्दिर से भी निष्कासित रहै और झारखण्ड में जा बसे थे। पटना में उन के स्पुत्र गोबिन्द राय ( गुरु गोबिन्द सिंह) का जन्म हुआ था।बाद में तेजोमल जी जम्मु के पास शिफ्ट हो गये थे और कशमीरी पण्डितों के आग्रह पर औरंगजेब के सामने गये थे। बीच में बहुत कुछ विवादस्पद घटनायें हैं जिनका जिक्र मैं अभी नहीं कर रहा हूं। औरंगजेब ने उन से कई कारणों से सफाई मांगी थी जिस का अपेक्षित उत्तर ना मिलने के कारण उन्हें मौत की सजा सुनाई थी। गुरु गोबिन्द सिहं पिता की शहादत के पश्चात (जो उस समय 13-14 वर्ष के थे) ने हिम कुण्ड स्थान पर शिव आराधना कर के देवी भगवती की प्रेरणा से खालसा पंथ की नीवं रख कर वीरता के साथ कर्तव्य पथ पर कर्म योग सिखाया।

होलिका स्तोत्र

*होलिका स्तोत्र*  
होली दहन समय या होली दहन के बाद और तीन या पांच परिक्रमा करने के पश्चात होलिका को दोनों हाथो से नमस्कार करके यह स्तोत्र बोलने से होलिका मनुष्य के सभी पापो को हर लेती है, सभी सन्तापों को हर लेती है, और सभी प्रकार से कल्याण करती है होलिका जगन्माता बनके सर्वसिद्धियाँ प्रदान करती है सुखशान्ति प्रदान करती है।
यह स्तोत्र को तीन परिक्रमा करने के बाद दोनों हाथो से नमस्कार करके होलिका स्तोत्र पढ़ना चाहिए
   होलिका स्तोत्र   
ॐ महाज्वालाय विद्महे अग्निदेवाय धीमहि। तन्नो अग्निः प्रचोदयात्।
(अर्थ --ॐ, मैं उस महान् ज्योति का, अग्निदेव का ध्यान करता हूँ। वह (शुभ) अग्नि हमें (समृद्धि और कल्याण की ओर) प्रेरित करे।)
पापं तापं च दहनं कुरु कल्याणकारिणि | 
होलिके त्वं जगद्धात्री होलिकायै नमो नमः || 
होलिके त्वं जगन्माता सर्वसिद्धिप्रदायिनी | 
ज्वालामुखी दारूणा त्वं सुखशान्तिप्रदा भव || 
वन्दितासि सुरेन्द्रेण ब्रह्मणा शंकरेण च । 
अतस्त्वं पाहिनो देवि भूते भूतिप्रदा भव || 
अस्माभिर्भय सन्त्रस्तैः कृत्वा त्वं होलि बालिशैः |
अतस्त्वां पूजयिष्यामि भूते भूतिप्रदा भव ||
त्वदग्नि त्रिः परिक्रम्य गायन्तु च हसंतु च ।
होलिके त्वं जगद्धात्री होलिकायै नमो नमः || 
होलिके त्वं जगन्माता सर्वसिद्धिप्रदायिनी | 
ज्वालामुखी दारूणा त्वं सुखशान्तिप्रदा भव ||
वन्दितासि सुरेन्द्रेण ब्रह्मणा शंकरेण च | 
अतस्त्वं पाहिनो देवि भूते भूतिप्रदा भव || 
अस्माभिर्भय सन्त्रस्तैः कृत्वा त्वं होलि बालिशैः | 
अतस्त्वां पूजयिष्यामि भूते भूतिप्रदा भव || 
त्वदग्नि त्रिः परिक्रम्य गायन्तु च हसंतु च | 
जल्पन्तु स्वेछ्या लोकाः निःशङ्का यस्य यन्मतम्
ॐ नमो भगवते महासुदर्शनाय महाचक्राय महाज्वालाय दीप्तिरूपाय सर्वतो रक्ष रक्ष मां महाबलाय नमः।
ॐ क्लीं कृष्णाय गोविन्दाय गोपीजनवल्लभाय पराय परम पुरूषाय परमात्मने परकर्म मंत्र यंत्र औषध अस्त्र शस्त्राणि संहर संहर मृत्योर्मोचय मोचय ओम नमो भगवते सुदर्शनाय दीप्ते ज्वालादित्याय ,सर्वदिक् क्षोभण कराय हूं फट् ब्रहणे परं ज्योतिषे नमः।
.ॐ नमो भगवते सुदर्शनाय वासुदेवाय, धन्वंतराय अमृतकलश हस्ताय, सकला भय विनाशाय, सर्व रोग निवारणाय त्रिलोक पतये, त्रिलोकीनाथाय ॐ श्री महाविष्णु स्वरूपाय ॐ श्रीं ह्मीं ऐं औषधि चक्र नारायणाय फट्!!
ॐ ऐं ऐं अपराजितायै क्लीं क्लीं नमः।
ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं हूं हूं त्रैलोक्यमोहन विष्णवे नमः।
ॐ त्रैलोक्यमोहनाय च विदमहे आदिकामदेवाय धीमहि 
तन्नो विष्णु: प्रचोदयात्।
ॐ तेजोरूपाय च विदमहे विष्णु पत्न्यै धीमहि तन्नो;
श्री: प्रचोदयात्।
                
इस वर्ष होलिका दहन 2 मार्च 2026 की रात्रि भद्रा उपरांत 5.28 से 6.30 के मध्य हैं । होलिका दहन के लिए लकड़ी और उपले आदि एकत्रित किए जाते हैं। होलिका दहन से पूर्व उसमें गुलाल समेत अन्य सामग्रियां डाली जाती हैं। होलिका की अग्नि को अत्यंत पवित्र माना गया है। मान्यता है कि होलिका की अग्नि में कुछ विशेष चीजों को डालने से जीवन में सुख-समृद्धि का आगमन होता है। जबकि होलिका में कोई भी अपवित्र चीज डालने की मनाही होती है। मान्यता है कि इसका जीवन में नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। 
जानें होलिका में क्या-क्या डालना चाहिए और क्या नहीं-
  होलिका में क्या-क्या डालना चाहिए- 
1.होलिका दहन की आग में सूखा नारियल डालना चाहिए। इसके अलावा अक्षत और ताजे फूल होलिका की अग्नि में चढ़ाएं। होलिका को साबुत मूंग की दाल, हल्दी के टुकड़े, और गाय के सूखे गोबर से बनी माला अर्पित करें।
होलिका की अग्नि में सूखा नारियल डालना अत्यंत शुभ माना गया है।
2. होली की अग्नि में गेहूं की बालियां सेंककर घर लेकर आएं 
बाद में इसके गेंहू के दानों को अन्न भंडार में मिला दें अथवा विसर्जित कर दें।
3. होलिका की अग्नि में नीम के पत्ते व कपूर का टुकड़ा अर्पित करना चाहिए।
4. होलिका की अग्नि में घी में भिगोए पान के पत्ते व बताशा अर्पित करना चाहिए।
5. होलिका दहन में चांदी या तांबे के कलश से जल और गुलाल अर्पित करना चाहिए।
6. होलिका की अग्नि में हल्दी व उपले अर्पित करने चाहिए।
7. होलिका दहन की अग्नि में अक्षत व ताजे फूल भी अर्पित करने चाहिए।
8.होली के दिन रंग खेलने के बाद घर में फिटकरी का पोछा लगाने से धन आपकी तरफ चुंबक की तरह चला आता है. एक बाल्टी में पानी लेकर उसके अंदर थोड़ा फिटकरी का पाउडर डाल दें और उससे पोंछा करें. 
होली पर बहुत सी नकारात्मक शक्तियां सक्रिय रहती है. 
वह दूर होती है।
  होलिका की अग्नि में क्या नहीं डालना चाहिए 
1. होलिका की अग्नि में पानी वाला नारियल नहीं चढ़ाना चाहिए। होलिका में हमेशा सूखा नारियल ही चढ़ाया जाता है। मान्यता है कि पानी वाला नारियल अर्पित करने से जन्मकुंडली में चंद्रमा की स्थिति खराब हो सकती है और जातक को जीवन में कई परेशानियों का सामना करना पड़ता है। पानी वाला नारियल फोड़कर प्रसाद रूप में ले सकते हैं।
2. 2.होलिका की अग्नि में टूटा-फूटा सामान जैसेपलंग, सोफा आदि नहीं डालना चाहिए। अथवा घर का कचरा न डालें।
मान्यता है कि ऐसा करने से शनि, राहु व केतु अशुभ फल प्रदान करते हैं।       
3. होलिका की आग में सूखी हुई गेहूं की बालियां न डालें 
बल्कि सेंक कर घर लाए।
और सूखे फूल नहीं अर्पित करने चाहिए।

Friday, 27 February 2026

एकलव्य शम्बूक शूद्र


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ये बहुत पुरानी id है।





पुरानी पोस्ट है : #एकलव्य_महाभारत को संदर्भित करके ऊंची नीची जाति तथा शोषण का प्रोपगंडा फैलाने वालों से अपेक्षा है कि वे मात्र कुछ सौ वर्ष पहले हमारे शिल्पकारों के अंगूठे काटे जाने के सत्य इतिहास से परिचित होंगे। 

1772 के #एकलव्यों का अंगूठा किस द्रोणाचार्य ने काटा था ? 

आज एक उद्भट विद्वान की वाल पर गया, जो उच्च शिक्षा आयोग में निरन्तर कई वर्ष तक सदस्य रहे हैं। 
#शम्बूक_कथा पर अपने पद के अनुरूप ही अति गर्वीली पोस्ट लिखी थी। 

मैंने मात्र दो कमेंट लिखा और वे धराशायी हो गए। 
सत्य एक ही होता है। असत्य के अनेकों स्वरूप और कलेवर होते हैं। एक बार आप जोर से दहाड़िये तो। 
पेंट गीली होना निश्चित है। 

#मिथक के एक #एकलव्य के #अंगूठा काटने को लेकर भारत मे 3000 या 5000 वर्षो के अत्याचार का #रंडी_रोना मचाए वामियों और दलित चिंतको , मात्र 250 साल पहले सिल्क के कपड़े बनाने वाले भारतीयों ने #अपने_अंगूठे_खुद काट लिए। वे कहां गए क्या हुवा उनका? 10,000 साल की कथा तुम्हे पता है और 200 साल की कथा तुम्हे नही याद है।
तुम निम्न किस्म के केंचुए हो। स्वार्थ घृणा और कुंठा से भरे हुए जोंक हो तुम। 
क्योंकि तुमको देश का खून चूसने और झूंठ का ढिंढोरा पीटने में आनंद आने लगा है। 

ब्रिटिश दस्युवो ने तुमको नष्ट किया बर्बाद किया और तुमको एकलव्य और शम्बूक का झुनझुना थमा दिया:

 “18वी शताब्दी मे विश्व के अन्य देशों की तरह ही, भारत मे भी सड़क या नदी से होने वाले व्यापार पर ड्यूटी लगा करती थी। लेकिन ईस्ट इंडिया कंपनी ने एक सरकारी फरमान प्राप्त कर लिया था जिसके माध्यम से आयातित या निर्यात होने वाली वस्तुओं को टैक्स फ्री कर दिया था। अतः कंपनी द्वारा निर्यातित या आयातित किसी भी वस्तु पर टैक्स नहीं लगता था”।

(रिफ्रेन्स – रोमेश दुत्त इकनॉमिक हिसटरि ऑफ ब्रिटिश इंडिया, पेज -18)

"1757 मे मीर जफर को बंगाल का नवाब बनाया गया लेकिन मात्र 3 साल बाद 1760 मे उसके ऊपर असमर्थ बताकर मीर कासिम को नवाब बनाया , जिसने कंपनी को बर्धमान मिदनापुर और चित्तगोंग नामक तीन जिलों का रवेनुए तथा मीरजाफ़र पर द्वारा दक्षिण भारत मे हुये युद्ध मे कंपनी द्वारा खर्च किए गए, देय उधार धन 5 लाख रुपये कंपनी के खाते मे जमा करवाया"।
 ( रोमेश दुत्त – पेज -19 )

लेकिन उसके बाद सभ्य अंग्रेजों ने जो आम जनता के द्वारा निर्मित वस्तुओं की लूट मचाई, वो किसी भी सभ्य समाज द्वारा एक अकल्पनीय घटना है। उस दृश्य को आप बंगाल के नवाब द्वारा मई 1762 को ईस्ट इंडिया कंपनी को लिखे पत्र से समझा जा सकता है:
 “ हर जिले, हर परगना , और हर फ़ैक्ट्री मे वे ( कंपनी के गुमाश्ते ) नमक, सुपाड़ी, घी , चावल धान का पुवाल ( सूखा डंठल, जरा सोचिए क्या क्या खरीद कर ये दरिद्र समुद्री डकैत खरीद कर यूरोप ले जाते थे ) बांस ,मछली ,gunnies अदरक चीनी तंबाकू अफीम और अन्य ढेर सारी वस्तुयेँ,जिनको लिख पान संभव नहीं है , को खरीदते बेंचेते रहते हैं । वे रैयत और व्यापारियों की वस्तुए ज़ोर जबर्दस्ती हिंसा और दमन करके ,उनके मूल्य के एक चौथाई मूल्य पर ले लेते हैं , पाँच रुपये की वस्तु एक रुपए मे लेकर भी वे रैयत पर अहसान करते हैं। 

 प्रत्येक जिले के ओफिसर अपने कर्तव्यो का पालन नहीं करते और उनके दमानात्मक रवैये और मेरा टैक्स न चुकाने के कारण मुझे प्रत्येक वर्ष 25 लाख रुपयों का नुकसान हो रहा है। मैं उनके द्वारा किए गए किसी समझौते का न उल्लंघन करता हूँ न भविष्य मे करूंगा , तो फिर क्यूँ अंग्रेज़ो के उच्च अधिकारी मेरा अपमान कर रहे हैं, और मेरा निरंतर नुकसान कर रहे हैं ”।
( रोमेश दुत्त पेज – 23 ) 

सभ्य बनाने आए इयसाइयों के नैतिक ऊंचाई को आप इस एक उद्धरण से ही माप सकते हैं।

यही बात ढाका का कलेक्टर महोम्मद अली ने कलकत्ता के अंग्रेज़ गवर्नर 26 मई 1762 मे लिखा “पहली बात तो ये है कि व्यापारी फ़ैक्टरी मे रुचि दिखा रहे हैं और अपने नावों पर अंग्रेजों का झण्डा लगाकर अपने को अंग्रेजो का समान होने का दिखावा करते हैं , जिससे कि उनको duty न देना पड़े। दूसरी बात ढाका और लकीपुर की फ़क्टरियाँ व्यापारियों को तंबाकू सूती कपड़े , लोहा और अनेक विविध वस्तुओं को बाज़ार से ज्यादा दामों मे खरीदने का प्रलोभन देते हैं, लेकिन बाद मे जबर्दस्ती वो पैसा उनसे छीन लेते हैं; वे व्यापारियों को पैसा एडवांस मे देते हैं।

लेकिन फिर उनके ऊपर एग्रीमंट तोड़ने का बहाना बनाकर उनके ऊपर फ़ाइन लगाते हैं । तीसरी बात लुकीपुर फैक्ट्री के गुमाश्ते तहसीलदार से ताल्लूकदारों से उनके ताल्लूक ( कृषि योग्य जमीन ) को निजी प्रयोग के लिए जबरन कब्जा कर लेते हैं , और उसका भाड़ा भी नहीं देते। कुछ लोगों के कहने पर ,कोई शिकायत होने पर वे यूरोपेयन लोगों को एक सरकारी आदेश का परवाना लेकर गावों मे जाकर उपद्रव करते हैं। वे टोल स्टेशन बनाते हैं और जो भी किसी गरीब के घर समान मिलता है उसको बैंचकर पैसा बनाते हैं। इन उपद्रवों के कारण पूरा देश नष्ट हो गया है और रैयत न अपने घरों मे रह सकते हैं और न ही मालगुजारी चुका सकते हैं। मिस्टर चवालीर ने कई स्तर पर झूँटे बाजार और झूंठे फक्ट्रिया बनाया हैं, और अपनी तरफ से झूंठे सिपाही बनाए हैं जो जिसको चाहे उसको पकड़कर उनसे जबरन अर्थदण्ड वसूलते हैं । उनके इस जबर्दस्ती के अत्याचारों के कारण कई हाट बाजार और परगना नष्ट हो गए हैं। ” 
( रोमेश दुत्त पेज 24- 25 )

“इस तरह बंगाल के प्रत्येक महत्वपूर्ण जिले के व्यापार को कंपनी के नौकरों और अजेंटों ने नष्ट किया और इन वस्तुओं के निरमातों को निर्दयता के साथ अपना गुलाम बनाया । उसका वर्णन एक अंग्रेज़ व्यापारी विलियम बोल्ट्स ने आंखो देखी हाल खुद लिखा है :
“ अब इस बात को सत्यता के साथ बताया जा सकता है कि वर्तमान मे यह व्यापार जिस तरह इस देश मे हो रहा है , और जिस तरह कंपनी अपना इनवेस्टमेंट यूरोप मे कर रही है,वो एक दमनकारी प्रक्रिया है; जिसका अभिशाप इस देश का हर बुनकर और निर्माता भुगतने को मजबूर है, प्रत्येक उत्पाद को एकाधिकार मे बदला जा रहा है ; जिसमे अंग्रेज़ अपने बनियों और काले गुमाश्तों के मदद से, मनमाने तारीके से यह तय करते हैं कि कौन निर्माता किस वस्तु का कितनी मात्रा मे, और किस दर पर निर्मित करेगा ...गुमाश्ते औरंग या निर्माताओं के कस्बे मे पहुँचने के बाद वो एक दरबार लगाता है जिसको वह अपनी कचहरी कहता है। 

जिसमे वो अपने चपरासी और हरकारों की मदद से वो दलाल और पयकार और बुनकरों को बुलाता है, और अपने मालिक द्वारा दिये गए धन मे से कुछ पैसा उनको एडवांस मे देता है और उनसे एक एग्रीमंट पर दस्तखत करवाता है जिसके तहत एक विशेष प्रॉडक्ट , एक विशेष मात्रा मे, एक विशेष समय के अंदर डेलीवर करना है। उस मजबूर बुनकर की सहमति आवश्यक नहीं समझी जाती है। और ये गुमाश्ते, जो कंपनी के वेतनभोगी थे , प्रायः इस तरह के एग्रीमंट उनसे अपने मन मुताबिक करवाते रहते थे; और यदि बुनकरों ने ये एडवांस रकम स्वीकार करने से इंकार किया तो उनको बांधकर शारीरिक यातना दी जाती है.... कंपनी के गुमाश्तों के रजिस्टर मे बहुत से बुनकरों के नाम दर्ज रहते थे, जो किसी दूसरे के लिए काम नहीं कर सकते थे, और वे प्रायः एक गुलाम की तरह एक गुमाश्ते से दूसरे गुमाश्ते के हाथों तब्दील किए जाते रहते हैं, जिनके ऊपर दुष्टता और अत्याचार हर नए गुमाश्ते के हाँथो बढ़ता ही जाता है ... इस विभाग मे जो अत्याचार होता है वो अकल्पनीय है ; लेकिन इसका अंत इन बेचारे बुनकरों को धोखा देने मे ही होता है; क्योंकि गुमाश्तों और जांचकारो ( कपड़े की क्वालिटी जाँचने वाला ) द्वारा जो दाम उनके प्रोडक्टस का ताया किया जाता था वो कम से कम बाजार के दाम से 15 से 40 % कम होता है ...।

बंगाल के बुनकरों के साथ, कंपनी के अजेंटों द्वारा जबर्दस्ती किए गए इन अग्रीमेंट्स को पूरा न करने की स्थिति मे, उनके खिलाफ मुचलका जारी किया जाता था , उसके तहत उनके सारे सामान (कच्चा और पक्का माल ) उस एग्रीमंट की भरपाई के लिए कब्जा कर लिया जाता है और उसी स्थान पर उनको बेंच दिया जाता है ; कच्चे सिल्क को कपड़ों मे बुनने वाले लोगों के, जिनको Nagoads कहते हैं, उनके साथ भी इसी तरह का अन्याय होता है, और ऐसी घटनाए आम बात हैं जिसमे उन्होने जबर्दस्ती #सिल्क के #कपड़े #बनाने की #मजबूरी से बचने के लिए स्वयं ही अपने #अंगूठे #काट लिए / 

( and the winders of raw silk , called Nagoads, have been known of their cutting off their thumbs to prevent their being forced to wind silk ) 
(Ref: Consideration on India affairs (London 1772), p 191 to 194 : from Romesh Dutt ; Economic History of British India , page 25-27 )

इस सच्चाई तक तुम्हारी पहुंच नही है धूर्त और मक्कारों?
इसीलिये पुस्तक का नाम लिखा है। गूगल आर्काइव से डाउनलोड करो और पढो।

Thursday, 26 February 2026

सिद्ध कुंजिका स्तोत्र का होम न करने की आज्ञा

हवन नहीं करना चाहिए, अधोलिखित स्तोत्रों का...
चंडीपाठ में कवच, अर्गला ,कीलक और कुंजिका स्तोत्र से हवन नहीं करना चाहिए सप्रमाण प्रस्तुति~

यो मूर्ख: कवचं हुत्वा प्रतिवाचं नरेश्वरः ।
स्वदेह - पतनं तस्य नरकं च प्रपद्यते ।।
अन्धकश्चैव महादैत्यो दुर्गाहोम-परायणः ।
कवचाहुति - प्रभावेण महेशेन निपातितः ।।

कवच में पाहि, अवतु, रक्ष रक्ष, रक्षतु, पातु आदि शब्दों का प्रयोग हुआ रहता है।
सप्तशती के चतुर्थ अध्याय के 4 मंत्र से इसी कारण होम नहीं होता है।
शास्त्री प्रवीण त्रिवेदी 
#सिद्ध #कुंजिका स्तोत्र का होम न करने की आज्ञा स्वयं महादेव नें दी है
इसका प्रथम कारण है की ,
कुंजिका देवी सिद्धियों की एकमात्र कुंजी है ।
ओर कुंजी का रक्षण किया जाता है आहूत नहीं किया जा सकता ।

यदि यदि कुंजी का ही लोप हो जाएगा तो सिद्धी के द्वार का खुलना असम्भव हो जाएगा ।
दूसरा कारण यह की 
सप्तशती में आता है की याचना स्तोत्र , कवच एवं कवच मन्त्रों की आहुति नहीं की जाती अन्यथा विनाश ही होता है ।
|| अथ प्रमाण ||

#कवचं #वार्गलाचैव ,#कीलकोकुंजिकास्तथा ।
#स्वप्नेकुर्वन्नहोमं #च ,#जुहुयात्सर्वत्रनष्ट्यते: ।।

भगवान शिव भैरव स्वरूप में स्थित होकर कहते हैं ! 
कवच , अर्गला , कीलक , तथा कुंजिका का होम स्वप्न में भी न करें
 स्वप्न मात्र में भी होम करने से सर्वत्र नाश की संभावनाएँ प्रकट हो जाती है ।

#बुद्धिनाषोहुजेत् #देवि,#अर्गलाऽनर्गलोभवेत् ।
#सिद्धीर्नाषगत:#होता, #विद्यां #च #विस्मृतोर्भभवेत् ।।

अर्गला के होमकर्म से सिद्धीयों का नाश हो जाता है । तथा होता की समस्त विद्याएँ विस्मृत हो जाती है , अर्गला अनर्गल सिद्ध हो जाती है ।

#कीलितोजायतेमन्त्र: ,#होमे #वा #कीलकस्तथा ।
#ममकण्ठसमंयस्य: ,#कीलकोत्कीलकं #हि #च ।।

कीलक के होमकर्म से होता के समस्त मन्त्र सदा सर्वदा के लिए कीलित हो जाते हैं ।
इसे मेरा उत्किलित कण्ठ ही जानें जो जो कीलक का कारक है ।
#धनधान्ययुतंभद्रे ,#पुत्र:#प्राण:#विनष्यते: ।
#रोगशोकोर्व्रिते:#कृत्वा,कवचंहोमकर्मण: ।।
कवच के होम से धन,धान्य, पुत्र तथा प्राण का विनाश निश्चित है एवं वह होता रोग तथा शोकों से घिर जाता है ।

स्वप्ने वा हुज्यते देवि ,* *कुंजिकायं च कुंजिकां ।

षड्मासे च भवेन्मृत्यु , सत्यं सत्यं न संशय: ।
होमे च कुंजिकायास्तु ,* *सकुटुम्बंविनाश्यती: ।

कुंजिका के होमकर्म के प्रभाव से होता की छः मास में मृत्यु निश्चित जानें तथा होता का सकूटुंब विनाश हो जाता है यह सत्य है परम सत्य है इसमें कोई संशय नहीं करना चाहिए ।

■यस्यं च दोषमात्रेण ,प्रसन्नार्मृत्युदेवता: ।
कुंजिकाहोममात्रेण ,रावण:प्रलयंगत: ।।

इसी के दोष से मृत्युदेवता अत्यंत प्रसन्न होकर होता का सकूटुंब भक्षण करते हैं ।

कुंजिका के होममात्र के प्रभाव से ही रावण का सम्पूर्ण विनाश सम्भव हुआ ।

■भैरवयामले भैरवभैरवी संवादे ।।
चतुर्विंश प्रभागे होमप्रकरणे ।।

■मातृका:बीजसंयुक्ता: ,प्राणाप्राणविबोधिनी ।
प्राणदा:कुंजिका:मायां ,सर्वप्राण:प्रभाविनी ।।

कुंजिका में बीज मातृकाएँ उपस्थित हैं ।
प्राण को देविप्राण का बोधप्रदान करती हैं ।
यह प्राणज्ञान प्रदान करने वाली महामाया कुंजिका प्राण को प्रभावित करने वाली हैं ।
।। शक्तियामले शक्तिहोमप्रकरणे ।।

Monday, 23 February 2026

शूद्र दलित

*चलिए हजारो साल पुराना इतिहास पढ़ते हैं। जातिवाद छुआछूत कैसे आया* 

*सम्राट शांतनु ने विवाह किया एक मछवारे की पुत्री सत्यवती से।उनका बेटा ही राजा बने इसलिए भीष्म ने विवाह न करके,आजीवन संतानहीन रहने की भीष्म ने प्रतिज्ञा की।*

*सत्यवती के बेटे बाद में क्षत्रिय बन गए, जिनके लिए भीष्म आजीवन अविवाहित रहे, क्या उनका शोषण होता होगा?*

*महाभारत लिखने वाले वेद व्यास भी मछवारे थे, पर महर्षि बन गए, गुरुकुल चलाते थे वो।*

*विदुर, जिन्हें महा पंडित कहा जाता है वो एक दासी के पुत्र थे, हस्तिनापुर के महामंत्री बने, उनकी लिखी हुई विदुर नीति, राजनीति का एक महाग्रन्थ है।*

*भीम ने वनवासी हिडिम्बा से विवाह किया।*

*श्रीकृष्ण दूध का व्यवसाय करने वालों के परिवार से थे,*

*उनके भाई बलराम खेती करते थे, हमेशा हल साथ रखते थे।*

*यादव क्षत्रिय रहे हैं, कई प्रान्तों पर शासन किया और श्रीकृषण सबके पूजनीय हैं, गीता जैसा ग्रन्थ विश्व को दिया।*

*राम के साथ वनवासी निषादराज गुरुकुल में पढ़ते थे।*

*उनके पुत्र लव कुश महर्षि वाल्मीकि के गुरुकुल में पढ़े जो वनवासी थे*

*तो ये हो गयी वैदिक काल की बात, स्पष्ट है कोई किसी का शोषण नहीं करता था,सबको शिक्षा का अधिकार था, कोई भी पद तक पहुंच सकता था अपनी योग्यता के अनुसार।*

*वर्ण सिर्फ काम के आधार पर थे वो बदले जा सकते थे, जिसको आज इकोनॉमिक्स में डिवीज़न ऑफ़ लेबर कहते हैं वो ही।*

*प्राचीन भारत की बात करें, तो भारत के सबसे बड़े जनपद मगध पर जिस नन्द वंश का राज रहा वो जाति से नाई थे ।* 

*नन्द वंश की शुरुवात महापद्मनंद ने की थी जो की राजा नाई थे। बाद में वो राजा बन गए फिर उनके बेटे भी, बाद में सभी क्षत्रिय ही कहलाये।*

*उसके बाद मौर्य वंश का पूरे देश पर राज हुआ, जिसकी शुरुआत चन्द्रगुप्त से हुई,जो कि एक मोर पालने वाले परिवार से थे और एक ब्राह्मण चाणक्य ने उन्हें पूरे देश का सम्राट बनाया । 506 साल देश पर मौर्यों का राज रहा।*

*फिर गुप्त वंश का राज हुआ, जो कि घोड़े का अस्तबल चलाते थे और घोड़ों का व्यापार करते थे।140 साल देश पर गुप्ताओं का राज रहा।*

*केवल पुष्यमित्र शुंग के 36 साल के राज को छोड़ कर 92% समय प्राचीन काल में देश में शासन उन्ही का रहा, जिन्हें आज दलित पिछड़ा कहते हैं तो शोषण कहां से हो गया? यहां भी कोई शोषण वाली बात नहीं है।*

*फिर शुरू होता है मध्यकालीन भारत का समय जो सन 1100- 1750 तक है, इस दौरान अधिकतर समय, अधिकतर जगह मुस्लिम शासन रहा।*

*अंत में मराठों का उदय हुआ, बाजी राव पेशवा जो कि ब्राह्मण थे, ने गाय चराने वाले गायकवाड़ को गुजरात का राजा बनाया, चरवाहा जाति के होलकर को मालवा का राजा बनाया।*

*अहिल्या बाई होलकर खुद बहुत बड़ी शिवभक्त थी। ढेरों मंदिर गुरुकुल उन्होंने बनवाये।* 

*मीरा बाई जो कि राजपूत थी, उनके गुरु एक चर्मकार रविदास थे और रविदास के गुरु ब्राह्मण रामानंद थे|।*

*यहां भी शोषण वाली बात कहीं नहीं है।*

*मुग़ल काल से देश में गंदगी शुरू हो गई और यहां से पर्दा प्रथा, गुलाम प्रथा, बाल विवाह जैसी चीजें शुरू होती हैं।*

*1800 -1947 तक अंग्रेजो के शासन रहा और यहीं से जातिवाद शुरू हुआ । जो उन्होंने फूट डालो और राज करो की नीति के तहत किया।* 

*अंग्रेज अधिकारी निकोलस डार्क की किताब "कास्ट ऑफ़ माइंड" में मिल जाएगा कि कैसे अंग्रेजों ने जातिवाद, छुआछूत को बढ़ाया और कैसे स्वार्थी भारतीय नेताओं ने अपने स्वार्थ में इसका राजनीतिकरण किया।*

*इन हजारों सालों के इतिहास में देश में कई विदेशी आये जिन्होंने भारत की सामाजिक स्थिति पर किताबें लिखी हैं, जैसे कि मेगास्थनीज ने इंडिका लिखी, फाहियान, ह्यू सांग और अलबरूनी जैसे कई। किसी ने भी नहीं लिखा की यहां किसी का शोषण होता था।*

*योगी आदित्यनाथ जो ब्राह्मण नहीं हैं, गोरखपुर मंदिर के महंत हैं, पिछड़ी जाति की उमा भारती महा मंडलेश्वर रही हैं। जन्म आधारित जातीय व्यवस्था हिन्दुओ को कमजोर करने के लिए लाई गई थी।*

*इसलिए भारतीय होने पर गर्व करें और घृणा, द्वेष और भेदभाव के षड्यंत्रों से खुद भी बचें और औरों को भी बचाएं

वैदिक गणित

1947, नवंबर 3 तारीख। तारीख याद रखिये। भारत को कागजों मे स्वाधीन हुए 3 महीना भी नही हुआ था । वेद-कर्मकांड स्कूल में प्राइज़ गिविंग सेरिमनी चल रहा था। उस समय में गवर्नर थे कैलाशनाथ काट्जू। वे आयेथे मुख्य अतिथि बनकर। प्रधान आचार्य पंण्डित राम चन्द्र रथ भी वहाँ उपस्थित थे और सभापतित्व कर रहे थे। भारतिकृष्ण तीर्थजी, जो कि कितने ही विषयों मे फर्स्ट क्लास फास्ट थे आप अनुमान भी नही कर सकते। भारतिकृष्ण जी गोवर्धन मठ के मुख्य(शंकराचार्य) थे और उस कार्यक्रम के सभापति थे। 
सभापति गवर्नर को इंट्रोड्यूस करते हुए बोले की वेद में ऐसे 16 मंत्र है जिससे कोईभी गणित संबंधी समस्या का समाधान हो सकता है। इसको सुनते ही काटजू उठ खड़े हुए और बोले की वेद की प्रशंसा करना अच्छी बात है। क्यों कि वेद, हिन्दू धर्म का सर्वश्रेष्ठ शास्त्र है। वेद हमारा मूल है और जगन्नाथजी को भी वेदपुरुष कहा गया है। इसलिए वेद की प्रशस्ति गाने में कोई असुविधा नहीँ है। पर शंकराचार्य के पीठ में बैठे हुए भारतिकृष्ण जी के द्वारा यह कहना की वेद में सारी समस्या का समाधान हो सकता है- अतिश्योक्ति है। इसको सुनकर शंकराचार्य भारतिकृष्ण जी फिर से उठे और बोले "ठीक है। आप मुझे कोई गणित संबंधित प्रश्न दीजिये और मेरे वैदिक समाधान आप देखिये। 
देखते देखते प्राइज़ गिविंग सेरिमनी, एक शास्त्रार्थ सभा में बदल गयी। ब्लैकबोर्ड लाया गया। उसके बाद शंकराचार्य भारतिकृष्ण जी काट्जू जी से बोले कृपया आप अपना प्रश्न लिखिये। काटजू गणित में एम.ए. थे। उन्होंने ब्लैकबोर्ड में एक प्रश्न हिंदी में लिखा। इसे देखकर भारतिकृष्ण जी ने उस प्रश्न को अंग्रेजी में लिखने केलिये बोला। काटजू ने तुरंत उस प्रश्न को अंग्रेजी में भाषांतर कर दिया। शंकराचार्य जी ने पूछा की यह ट्रांसलेसन ठीक हुआ है ? उन्होंने बोला "यह ठीक है" । इसका समाधान करना था शंकराचार्य जी को।

पर उन्होंने अपने एक 15 बर्ष के शिष्य को बुलाया। संस्कृत में शिष्य को बोले कि आकर समाधान कर दो। शंकराचार्य जी ने खुद नहीँ किया। वह शिष्य आया, और सीधे उसका उत्त्तर लिख डाला। जैसेही उसने लिखा, काटजू ने उसका प्रतिवाद किया "नहीँ, यह सही नही है। आप एक एक स्टेप करके बताइये। यह कोई जादू भी हो सकता है ! आप कोई मंत्र या तंत्र जानते होंगे। इसको सोपानित करिये" । शंकराचार्य जी ने अपने शिष्य को कहा, बेटा, इसको तुम एक एक स्टेप में कराके दिखाओ" । 

शिष्य ने फिरसे चाक पकड़ा और एक एक स्टेप करके वह उत्तर तक पहुंचा। उस समय काटजू का शिर झुका हुआ था और आँख से आँसू आ रहे थे। उन्होंने खड़े होकर सबके सामने बोला की में निःसर्त क्षमा माँगता हूं। में नहीँ जानता था की वेद में ऐसा भी ज्ञान है और आप नहीँ आपके पंदरह साल के शिष्य ने मेरे प्रश्न का समाधान करदिया ! इसके बाद काट्जू ने हाथ जोड़ कर पूछा कि वैदिक गणित सीखने केलिये कितने दिन लगेंगे ? शंकराचार्य जी ने कहा की छह महीने तक आप अगर मेरे पास आएंगे यो मैं आपको वैदिक गणित सीखा दूँगा। उसके बाद छह महीेने तक गोवर्धन मठ के सामने गवर्नर की गाड़ी खड़ी होने लगी।