Saturday, 19 September 2026

गाली उसकी उत्पत्ति

गाली
१. शब्दार्थ-इसे संस्कृत में अपशब्द कहा गया है। व्याकरण या उच्चारण की अशुद्धि, अशुद्ध शब्दों का प्रयोग भी अपशब्द है। इसके अतिरिक्त किसी की निन्दा या उसे दुःखी करने के लिए कहा वाक्य भी अपशब्द है, जिसे गाली कहते हैं। संस्कृत में इसके लिए गालिः शब्द भी है। इसका मूल है-गल्ह कुत्सायाम् (धातु पाठ, १/२७५)। 
ददतु ददतु गालिर्गालिवन्तो भवन्तो, वयमपि तदभावाद् गालिदाने‍ऽप्यशक्ताः।
जगति विदितमेतद् दीयते विद्यमानं, ददतु शशाविषाणं ये महात्यागिनोऽपि॥ 
(भर्तृहरि का वैराग्य शतक, १३३)
= आप कर्म दोष से गाली दें, गालीवान् बनें। हमारे पास यह नहीं है, अतः गाली देने में असमर्थ हैं। संसार में प्रसिद्ध है कि जिसके पास जो है वही दे सकता है। खरहे के सींग जैसा जो नहीं है उसे कैसे दे सकता है?
२. गाली प्रवृत्ति-बचपन से जिसे संगति के कारण गाली देने का अभ्यास है, वही गाली दे सकता है। अभ्यास नहीं रहने पर वह अन्य शब्दों से विरोध करेगा, या उसका फल नहीं होने पर चुप रहेगा।
सारल्यं खलगालिदानसहनं येषां न तत् संनिधौ।
किञ्चित् कर्म कुकर्म दोष इति यद् विज्ञाय संत्यज्यते॥ (राजतरंगिणी, ७-३०४)
= (राजा कलश के विषय में) दुष्टों का गाली-दान सहन करना सरलता मानता था। ऐसी स्थिति में उसके सामने कौन सा कर्म कुकर्म मान कर त्यागा जा सकता था? 
गाली का प्रयोग म्लेच्छ लोगों द्वारा होता था और अशुद्ध भाषा बोलने वाले को भी म्लेच्छ कहते थे।
तेऽसुरा आत्तवचसो-हेलवो हेलव इति वदन्तः पराबभूवुः॥२३॥ तत्रैतामपि वाचमूदुरुपजिज्ञास्याम्। स म्लेच्छः। तस्मान्न ब्राह्मणो म्लेच्छेत्। असुर्या हैषा वाक्। एवमेवैष द्विषतां सपत्नानामादत्ते वाचम्। (शतपथ ब्राह्मण, (३/२/१/२३-२४)
(देवों ने शुद्ध वाणी ले ली) तो असुर कुछ कह न सके और ’हे ऽलवो, हे लवः (हाय वाक्, Hi, Hello) कह कर पराजित हो गये॥२३॥ इस प्रकार उन्होंने अर्थहीन वाणी बोली। ऐसी वाणी जो बोलता है, वह म्लेच्छ है। इस लिए कोई ब्राह्मण म्लेच्छ भाषा न बोले, क्योंकि यह असुरों की भाषा है। इसी प्रकार वह शत्रु को भाषा से वञ्चित कर सकता है॥२४॥ 
३. गाली परम्परा-
(१) महाभारत, कर्ण पर्व के अध्याय ३६-४१ तक कर्ण और उनके सारथि शल्य में विवाद हुआ। अध्याय ३९ में शल्य ने कर्ण को अर्जुन रूपी सिंह के सामने गीदड़, चूहा. बिल्ली, कुत्ता आदि कहा, तो अध्याय ४० में कर्ण ने शल्य तथा उनके मद्र देश के निवासियों तथा उनकी स्त्रियों के दुश्चरित्र का वर्णन किया।
मद्रदेश का अधम मनुष्य सदा मित्रद्रोही होता है। जो हमलोगों से अकारण द्वेष करता है वह मद्र देश का ही अधम मनुष्य है। क्षुद्रतापूर्ण वचन बोलने वाले मद्र देश के निवासियों में किसी के प्रति सौहार्द्र नहीं होता। मद्रदेश निवासी सदा ही दुरात्मा, सर्वदा झूठ बोलने वाला और कुटिल होता है। सुना है कि मरते समय तक उनमें कुटिलता रहती है। सत्तू और मांस खाने वाले जिन अशिष्ट मद्र निवासियों के घरों में पिता, पुत्र, माता, सास, ससुर, मामा, बेटी, दामाद, भाई, नाती, पोते, अन्यान्य बन्धु-बान्धव, समवयस्क मित्र, दूसरे अभ्यागत अतिथि और दास-दासी-ये सभी अपनी इच्छा के अनुसार एक दूसरे से मिलते हैं। परिचित-अपरिचित स्त्रियां सभी पुरुषों से सम्पर्क करलेती हैं और गोमांस सहित मदिरा पीकर रोती, हंसती, गाती, असंगत बातें करती तथा कामभावना से किये जाने वाले कार्यों में प्रवृत्त होती हैं। जिनके यहां सभी स्त्री-पुरुष एक दूसरे से काम सम्बन्धी प्रलाप करते हैं, जिनके पाप कर्म सर्वत्र विख्यात हैं, उन घमण्डी मद्र निवासियों में धर्म कैसे रह सकता है? मद्र निवासी के साथ न वैर करे, न मित्रता। 
इसके बाद मद्र देश की स्त्रियों की बहुत प्रकार से निन्दा की गयी है। (अध्याय ४०, श्लोक २०-४३)।
(२) पाश्चात्य प्रभाव-मद्र देश ईरान के उत्तर पश्चिम था। उसके निकट कम्बोज भी था जिसकी व्युत्पत्ति काम-भोज या स्वेच्छाचारी की गयी है। स्त्रियों के चरित्र सम्बन्धी गाली भारतीय स्वभाव नहीं था। शिशुपाल ने भी भगवान् कृष्ण को युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ में १०० गालियां दीं, उनमें कोई भी स्त्री निन्दा नहीं थी। वे कृष्ण को दुश्चरित्र कह रहा था।
(३) लुटेरा आक्रमण- स्त्रियों से बलात्कार सम्बन्धी गालियां मुस्लिम आक्रमण के बाद आरम्भ हुईं, जिनके लिए वे लूट की सम्पत्ति (माल-ए-गनीमत) थीं।
भारत में जो सम्मानित थे, उनका सम्बोधन भी गाली हो गया। स्त्रियां २-३ चोटी रखती थी, अतः चोट्टी एक गाली हो गया। ब्राह्मण या संन्यासी भी चोटी रखते थे, उनके लिए चोट्टा गाली हुआ। जैन और कई अन्य संन्यासी मुण्डन या लुञ्चन करते थे। उनके लिए लुच्चा गाली हुई।
४. कुछ गाली शब्दों के स्रोत-
(१) चुद-प्रेरणा अर्थ में २ धातु हैं-नुद् प्रेरणे (धातु पाठ, ६/२); चुद् संचोदने (१०/३३)। नुद का बाहरी प्रभाव होता है, चुद् से भीतरी प्रेरणा तथा प्रभाव होता है, जैसा गायत्री मन्त्र के तृतीय चरण में है-धियो यो नः प्रचोदयात्।
(२) बूर-हिन्दी शब्द कोष के अनुसार अर्थ-
बूर : पुं० [देश०] १. पश्चिमी भारत में होनेवाली एक प्रकार की घास जिसके खाने से गौओं, भैसों आदि का दूध और अन्य पशुओं का बल बहुत बढ़ जाता है। खोई। २. पशुओं के खाने का कटा हुआ चारा। ३. निकम्मी, फालतू या रद्दी चीज। ४. कुछ विशिष्ट प्रकार के कपड़ों के ऊपर निकले हुए रोएँ। जैसे—बूरदार कम्बल, बूरदार तौलिया। ५. एक प्रकार की मिठाई जो अन्न की भूसी या छिलके से तैयार की जाती है। उदा०—बूर के लड्डू खाये तो पछताये, न खाये तो पछताये। (कहा०) 
स्त्री०= बुर (भग)। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
बूरा  : पु० [हिं० भूरा] १. कच्ची चीनी जो भूरे रंग की होती है। शक्कर। २. एक प्रकार की साफ की हुई बढ़िया चीनी। ३. महीन चूर्ण।
(३) चूत, चूतिया- मूल धातु-चुत् स्रवणे = चूना, गीला करना। च्युतिर् (च्युत्) आसेचने (१/३३) -सींचना, गीला करना। च्युङ् गतौ (१/६८४)-गिरना, भटकना।
च्युङ् से च्युत (गिरा हुआ), अच्युत (कभी गिरा नहीं। इन्द्र को अच्युत-च्युतः कहते थे-जो अभी तक किसी से नहीं हारा, उसे भी इन्द्र हराते थे। 
यो विश्वस्य प्रतिमानं बभूव यो अच्युतच्युत स जनास इन्द्रः॥ (ऋक्, २/१२/९)
जो विश्व के लिए मापदण्ड है, अच्युत को भी च्युत कर सके, वह इन्द्र है।
शिष्टाचार नियम के अनुसार राजा, गुरु, पति, पत्नी और ज्येष्ठ पुत्र को नाम से नहीं बुलाते थे। अतः इन्द्र या पति को स-जना = वह व्यक्ति कहते थे।
इन्द्र पूर्व के लोकपाल थे, अतः असम में राजा के लिए अच्युत-च्युत या चूतिया शब्द प्रचलित हुआ। चूतिया राजवंश ने असम में ५०० वर्ष शासन किया था। शासक अत्याचार करने के कारण लोकप्रिय नहीं होते, अतः चूतिया शब्द निन्दित हुआ। या चूत में लिप्त रहने वाला चूतिया है।
चूतियापा का मूल हिब्रू शब्द चुतपा (Chutzpah) है, जो किसी से दबे नहीं, अच्युतच्युतः। 
(४) छिनार, छिनाल-हिन्दी शब्दसागर-छिनाल ^१ वि॰ स्त्री॰ [सं॰ छिन्ना+नारी; देशी छिणणालिआ, छिणणाली पू॰ हिं॰ छिनारि] व्यभिचारिणी । कुलटा । परपुरुषगामिनी । उ॰—अरे यह छिनाल बड़ी छतीसी है ।— भारतेंदु ग्रं॰, भा॰ १, पृ॰ ३१ ।
(५) बीया-भोजपुरी में बीज का अपभ्रंश है, पर ओड़िया में गाली है, चूत अर्थ में।
(६) घिंया = ओड़िया गाली-घृणित अर्थ में। या घञ् सम्प्रसारणे-घूंसा, भोजपुरी में मार के छितरा द। पंजाबी में छित्तर।
(७) पिल्ला-हिन्दी में यह गाली है। मूल अर्थ है कुत्ता का बच्चा। दक्षिण भारत में हर बच्चे को पिला कहते हैं। माता के शरीर से पुत्र का शरीर बनता है, पार्वती के उबटन लेप से गणेश का जन्म हुआ। अतः गणेश को पिल्लैयार कहते हैं। मूल धातु है- पिल क्षेपे (१०/५९)-फेंकना, काम में लगाये रखना, छिलका उतारना। पार्वती के आवरण से गणेश बने थे। केरल में पिल्लै उपाधि है।
(८) चुहाड़-मुष स्तेये (१/४५८)-चोरी अर्थ में। इससे मूषिक (मूस) हुआ है जो घर के अन्न चुरा कर अपने बिल में जमा करता है। मूस को चूहा भी कहते हैं-वह काटता है, चूर्ण करता है -चुडि (चुण्ड) अल्पीभावे (१/२१६) या चुडि (चुण्ड) छेदने (१०/१२८)। अतः धान को चूर्ण करने पर चूड़ा बनता है। चूहा जैसा चोरी करने वाले को चुहाड़ या चोर चुहाड़ कहते हैं। पंजाबी में चूहड़ लिखते हैं, किन्तु उच्चारण चूड़ करते हैं। अतः हिन्दी का चूड़ा पंजाबी में गाली हो जाता है।
(९) उधिया जा, ऊफर पड़-मृत पितर को पिण्डदान के समय भूमि के प्रेतों से कहा जाता है कि वह थोड़ा खिसक जायें (उदीरताम्), बीच में हवा के प्रेत कुछ और ऊपर जायें (उत्परासः), जिससे प्रेत के भोजन के लिए स्थान बन जाये। 
उदीरतां अवर, उत्परास उन् मध्यमाः, पितरः सोम्यासः (ऋक्, १०/१५/१)
उदीरतां = उधिया जा, उत्परासः = ऊफर पर। यह मृतक को कहते हैं, अतः जीवित के लिए गाली है।

Thursday, 17 September 2026

क्षेत्रपाल कौन

💥क्षेत्र पाल कौन है और विशेषता क्या है💥
🏵️ बहुत से लोग पूछते हैं कि क्षेत्रपाल कौन हैं ?
🎷1. ये स्वरूप किसका है ?
🙏शास्त्रों के अनुसार क्षेत्रपाल साक्षात् भगवान शिव के अंश , कालभैरव का ही स्वरूप हैं ।
🫵 लिंगपुराण में इन्हें "क्षेत्रपाल भैरव" कहा गया है । लोक भाषा में इन्हें ही खेतल,खेतपाल , भैरू बाबा, खंडोबा कहा जाता है।
🫵 शिवपुराण के अनुसार राक्षसों से पृथ्वी की रक्षा के लिए भगवान शिव ने ही क्षेत्रपालों को प्रकट किया ।
🎷2. कितने माने गए हैं ?
🙏मुख्य रूप से 8 क्षेत्रपाल माने गए हैं - जो 8 दिशाओं के रक्षक होते हैं, और ये 8 भैरव 
🔥1. असितांग भैरव 🔥2. रुद्र भैरव 
🔥3. चन्द्र भैरव 
🔥4. क्रोध भैरव 
🔥5. उन्मत्त भैरव 
🔥6. कपाल भैरव 
🔥7. भीषण भैरव 
🔥8. संहार भैरव 
🎷आगम शास्त्रों में इनका विस्तार 52 भैरव, 64 क्षेत्रपाल और 96 तक बताये गये है । 💐 जैन परम्परा में 96 क्षेत्रपाल का वर्णन है । हर गाँव, नगर, तीर्थ और श्मशान का अलग अलग क्षेत्रपाल होता है ।
💢3. कार्य क्या है ?
शब्द ही अर्थ है "क्षेत्रं पालयति इति क्षेत्रपाल:" जो क्षेत्र की रक्षा करे वो क्षेत्रपाल ।
💥शास्त्रों में 3 मुख्य कार्य बताए गए हैं 💥
💐 सुरक्षा करना ...
गाँव, खेत, मंदिर की सीमा और मर्यादा की रक्षा। इसीलिए इनका मंदिर गाँव के बाहर या शिव मंदिर के ईशान कोण में बनाया जाता है ।
💐न्याय करना ...
 ये न्याय के देवता हैं । अच्छे को पुरस्कार और बुरे को दण्ड देते हैं।
💐विघ्न हटाना ...
 वास्तु पूजा में क्षेत्रपाल की पूजा इसलिए अनिवार्य है कि बिना इनकी आज्ञा के उस भूमि पर कोई भी देवता पूजा स्वीकार नहीं करते । नया घर, खेत लेने पर पहले क्षेत्रपाल को रोट, भोग लगाया जाता है । 
🫵 इसलिए कहा भी गया है ...
जिस क्षेत्र में रहो, उस क्षेत्र के क्षेत्रपाल को प्रणाम ( पूजा ) करके रहो तो कोई संकट नहीं आता है ।
🙏जय श्री क्षेत्रपाल भैरव नाथ🙏
#क्षेत्रपाल #भैरव #सनातनधर्म

मनुस्मृति 2

कुपुत्रों के कंधे और मनुस्मृति की पालकी

मनुष्य की स्मृति केवल देखे और सुने से नहीं बनती. इतिहास उसमें एक महत्वपूर्ण तत्व बनकर शामिल रहता है. इसी इतिहास और सांस्कृतिक परंपरा से व्यक्ति अपने श्रेष्ठ को समझता है, गर्व को पहचानता है, शक्ति का अनुमान लेता है, पराजयों से सबक लेता है और मलिनताओं को स्वीकारता है. लेकिन कल्पना कीजिए कि हम स्मृतिबोध का चश्मा किसी और को सौंपकर ख़ुद आंखें मूंदें रहें और उसकी सुविधा के समायोजन को ही सत्य मानकर स्वीकार कर बैठें? इससे बड़ी आत्महंता अवस्था क्या हो सकती है. क्योंकि किराए की आंखों से दूसरे की सुविधा दिखती है, अपनी सच्चाई नहीं. भारतीय धर्म-परंपरा, जातिगत राजनीति और संविधान को एकसाथ प्रभावित करनेवाली इसी सच्चाई का नाम है मनुस्मृति.

मनुस्मृति पर जितना शोर है, उतना शोध नहीं है. जितने मत हैं, उतने तथ्य नहीं हैं. जितने फैसले हैं, उतने प्रमाण नहीं हैं. कोई उसे सामाजिक विषमता की जड़ कहता है. कोई हिंदू सभ्यता का आधारग्रंथ. कोई उसे जलाने की बात करता है. कोई उसे बचाने की. लेकिन इस पूरे शोर में एक सवाल है, जो मुझे बेचैन करता है. वह है. हम जिस मनुस्मृति पर बहस कर रहे हैं, क्या वह सचमुच वही मनुस्मृति है, जिसे कभी मनु ने लिखा था? यही सवाल मेरी बेचैनी की वजह है.

मैं यह सिद्ध करने नहीं बैठा हूँ कि मनुस्मृति सही है या गलत. मैं केवल इतना जानना चाहता हूँ कि अगर आज हमारे हाथ में जो मनुस्मृति है, वही मूल मनुस्मृति है, तो उसके भीतर इतने गहरे अंतर्विरोध क्यों हैं? और अगर वह मूल नहीं है… अगर सचमुच उसके साथ छेड़छाड़ हुई… अगर उसमें क्षेपक जोड़े गए तो फिर आजादी के लगभग अस्सी वर्ष बाद भी हम उसी कथित दूषित पाठ का बोझ क्यों ढो रहे हैं? उसकी प्रामाणिकता पर हमारी इस चुप्पी का मतलब क्या है? 

धर्मध्वजाधारियों और धर्माचार्यों को यह बताना होगा कि इस किताब का कौन-सा पाठ प्राचीन और प्रामाणिक है…कौन-सा संदिग्ध. यह नहीं हो सकता कि एक ही सांस में हम कहें- मनुस्मृति पवित्र भी है… और उसी सांस में यह भी कहें- उसमें अंग्रेजों ने मिलावट भी कर दी थी. इन दोनों बातों के बीच की दूरी केवल नारे नहीं भर सकते. उसके लिए अनुसंधान चाहिए. पांडुलिपियों का तुलनात्मक अध्ययन चाहिए. विद्वानों का धैर्य चाहिए. धर्माचार्यों का साहस चाहिए. और सबसे बढ़कर चाहिए- सत्य को स्वीकार करने का साहस. मुझे लगता है, पिछले सौ वर्षों में हमने मनुस्मृति पर जितनी राजनीति की, उस श्रम का दसवां हिस्सा भी उसकी प्रामाणिकता पर नहीं लगाया. हमने उसके पक्ष में भाषण दिए. उसके विरोध में आंदोलन किए. लेकिन यह जानने की बेचैनी बहुत कम दिखाई कि असल मनुस्मृति कौन-सी है?

अगर भारतीय परंपरा के सबसे सुंदर सूत्र- वाक्यों में से किसी एक को चुनना हो, तो मेरी पहली पसंद होगी-

यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः.
यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफलाः क्रियाः॥
(मनुस्मृति, अध्याय 3, श्लोक 56)

यानी- जहां स्त्री का सम्मान होता है, वहीं देवताओं का वास होता है. जहां स्त्री का सम्मान नहीं होता, वहां सारे शुभ कर्म निष्फल हो जाते हैं.

बहुत कम लोगों को पता है कि यह श्लोक मनुस्मृति का ही है. हर बार इसे पढ़ता हूँ तो मन श्रद्धा से भर जाता है. लेकिन हर बार एक सवाल भी जन्म लेता है. जो ग्रंथ स्त्री के सम्मान को देवत्व की शर्त बना सकता है… वही यह कैसे कह सकता है कि स्त्री जीवन भर पिता, पति या पुत्र के संरक्षण में रहे? और वही यह कैसे कह सकता है-

स्वभाव एष नारीणां नराणामिह दूषणम्.
अतोऽर्थान्न प्रमाद्यन्ति प्रमदासु विपश्चितः॥

मतलब- स्त्री का स्वभाव ही पुरुष को दूषित करने वाला है (मनुस्मृति, अध्याय 2, श्लोक 213 — कुछ संस्करणों में क्रम भिन्न मिलता है).

यहीं मैं ठहर जाता हूँ. इतना बड़ा अंतर्विरोध सहज नहीं लगता. या तो मैं मनुस्मृति को ठीक से नहीं समझ पाया हूँ. या फिर मनुस्मृति की कहानी, मनुस्मृति से कहीं अधिक जटिल है. लेकिन विरोधाभास यहीं समाप्त नहीं होता. जाति के प्रश्न पर भी मनुस्मृति ऐसे ही कठिन सवाल खड़े करती है.

सहासनमभिप्रेप्सुरुत्कृष्टस्यापकृष्टजः.
कट्यां कृताङ्को निर्वास्यः स्फिचं वाऽस्यावकर्तयेत्॥
(मनुस्मृति, अध्याय 8, श्लोक 280 — कुछ संस्करणों में 281)

यानी- यदि निम्न वर्ण का व्यक्ति उच्च वर्ण के साथ समान आसन पर बैठने का प्रयास करे, तो उसे दंडित किया जाए. उसके नितंब काट दिए जाए. एक दूसरा
श्लोक कहता है-

शक्तेनापि हि शूद्रेण न कार्यो धनसञ्चयः.
शूद्रो हि धनमासाद्य ब्राह्मणानेव बाधते॥
(मनुस्मृति, अध्याय 10, श्लोक 126 — कुछ संस्करणों में 129)

मतलब - शूद्र को धन संचय नहीं करना चाहिए, क्योंकि उसके धनवान होने से ब्राह्मणों को कष्ट पहुंचता है.

राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने 
इन्हीं श्लोकों को सदन में उद्धृत किया जिस पर हंगामा हुआ. सत्ता पक्ष को कहना पड़ा यह मनुस्मृति का है ही नहीं, जबकि जबाब यह होना चाहिए था कि भले यह लाईने मनुस्मृति में हो, हम इन श्लोकों का समर्थन नहीं करते, कोई भी सभ्य समाज इसके पक्ष में खड़ा नहीं हो सकता. हम इसकी निंदा करते हैं.

“एकजातिर्द्विजातींस्तु वाचा दारुणया क्षिपन्।
जिह्वायाः प्राप्नुयाच्छेदं जघन्यप्रभवो हि सः॥
(मनुस्मृति, अध्याय 8, श्लोक 269 — कुछ संस्करणों में 270)

शुद्र यदि द्विजातियों- ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य- को गाली देता है, तो उसकी जीभ काट देनी चाहिए, क्योंकि नीच वर्ण का होने से वह इसी दण्ड का अधिकारी है.

एक और श्लोक देखिए-

नामजातिग्रहं त्वेषां अभिद्रोहेण कुर्वतः।
निक्षेप्योऽयोमयः शङ्कुर्ज्वलन्नास्ये दशाङ्गुलः॥
(मनुस्मृति, अध्याय 8, श्लोक 270 — कुछ संस्करणों में 271)

यानी- शूद्र द्वारा अहंकारवश उपेक्षा से द्विजातियों- ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य- के नाम और जाति का उच्चारण करने पर उसके मुंह पर दस अंगुल लम्बी लोहे की जलती कील ठोंक देनी चाहिए.

धर्मोपदेशं दर्पेण विप्राणामस्य कुर्वतः ।
तप्तमासेचयेत् तैलं वक्त्रे श्रोत्रे च पार्थिवः ॥
(मनुस्मृति, अध्याय 8, श्लोक 271 — कुछ संस्करणों में 272)

मतलब - शूद्र दारा अहंकारवश ब्राह्मणों को धर्मोपदेश देने का दुस्साहस करने पर राजा को उसके मुँह और कान में गरम तेल डलवा देना चाहिए.

अगर आज कोई व्यक्ति सार्वजनिक मंच से ऐसी बातें कहे, तो समाज भी उसका विरोध करेगा और भारतीय संविधान भी. इसलिए इन विचारों का आधुनिक भारत में कोई नैतिक बचाव संभव नहीं है. लेकिन यहीं सबसे बड़ा प्रश्न खड़ा होता है. अगर ये श्लोक मूल हैं, तो उनका सामना कीजिए. लेकिन अगर ये मूल नहीं हैं… अगर ये वही क्षेपक हैं, जिनका वर्षों से दावा किया जाता रहा है… तो फिर ये आज भी हर संस्करण में यह क्यों छप रहे हैं? आखिर ये विवादित श्लोक हमारे घरों तक पहुंचे कैसे? और अगर पहुंच गए… तो हमने उन्हें अगली पीढ़ी तक पहुंचने क्यों दिया?

मनुस्मृति को लेकर सबसे अधिक चर्चा उसके विवादित श्लोकों की होती है. लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि यही ग्रंथ धर्म के दस लक्षण भी बताता है—

धृतिः क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः.
धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम्॥
(मनुस्मृति, अध्याय 6, श्लोक 92)

धैर्य, क्षमा, संयम, चोरी न करना, शुचिता, इंद्रियों पर नियंत्रण, बुद्धि, विद्या, सत्य और अक्रोध— यही धर्म के दस लक्षण हैं.

मनु स्मृति पर हमेशा यह आरोप भी लगता है कि इसने समाज के निचले तबके के प्रति न्याय नहीं किया. केवल उनके शोषण की बात कही. कहीं-कही यह सच भी लगती है. स्मृति को पूरा पढ़ें तो कहीं ब्राह्मणो के प्रति भी तल्खी दिखेगी. स्मृति ब्राह्मण कर्म को लेकर ज़्यादा सजग और सचेत दिखती है. जैसे ब्राह्मण होने की जो शर्त मनुस्मृति बताती है वह वेदपाठी होना चाहिए और उसे शिक्षा का व्यापार नहीं करना चाहिए. स्मृति इस बात पर पूरा जोर देती है.इस व्यवस्था में कोई व्यक्ति सिर्फ़ इसलिए ब्राह्मण नहीं है क्योंकि वह ब्राह्मण कुल में पैदा हुआ है. हर व्यक्ति को ब्राह्मण होने के प्रतिमानों को व्यक्तिगत रूप में पूरा करना पड़ता है यहाँ जन्मना ब्राह्मण के लिए कोई स्थान नहीं है,ब्राह्मण अर्थात् योग्यता. ब्राह्मण वर्ग की पक्षधरता को लेकर तुलसीदास पर जो आरोप लगाएं जाते हैं वह मनुस्मृति के संदर्भ में सच नहीं प्रतीत होते. तुलसीदास सील गुन हीन विप्र को भी पूज्य कहते हैं लेकिन मनुस्मृति इसका विरोध करती है. 

यह पढ़कर मनुस्मृति से शिकायत नहीं होती. सम्मान बढ़ता है. लेकिन सम्मान के साथ फिर प्रश्न भी खड़ा हो जाता है. जो ग्रंथ अक्रोध को धर्म का लक्षण कहता है. वही ग्रंथ स्त्री और शूद्र के बारे में इतने घटिया वाक्य कैसे कह सकता है? अगर दोनों मूल हैं… तो विरोधाभास क्यों? और अगर दोनों मूल नहीं हैं…तो फिर असली मनुस्मृति कौन-सी है? यानी कुछ तो गड़बड़ है! जिस पर विद्वान सदियों से चुप हैं.

पूरा मामला समझने के लिए हमे पीछे जाना होगा. अपने दादा के भी परदादा के समय में. यही कोई ढाई सौ साल पहले. भारत पर अंग्रेजी सत्ता अपनी जड़ें जमा चुकी थी. प्लासी का युद्ध हो चुका था. ‘ईस्ट इंडिया कंपनी’ अब व्यापारी कम, शासक ज्यादा थी. लेकिन भारत पर शासन करना आसान था, भारत को समझना मुश्किल. एक ऐसा देश, जहां हर कुछ किलोमीटर पर भाषा बदल जाती थी. रीति बदल जाती थी. रिवाज बदल जाते थे. कई बार न्याय की परंपरा भी बदलती थी. अंग्रेज जल्दी समझ गए कि भारत को जीतना ही पर्याप्त नहीं है. भारत को पढ़ना भी पड़ेगा. यहीं से मनुस्मृति की कहानी नया मोड़ लेती है.

वर्ष 1772 में गवर्नर जनरल वॉरेन हेस्टिंग्स ने फैसला किया कि मुसलमानों के निजी मामलों में इस्लामी कानून लागू होगा और हिंदुओं के मामलों का निर्णय उनके धर्मशास्त्रों के आधार पर किया जाएगा. सुनने में यह व्यवस्था न्यायपूर्ण लगती है. लेकिन यहीं सबसे बडा प्रश्न फिर खड़ा हुआ. हिंदुओं का धर्मशास्त्र कौन-सा? भारत में तो एक नहीं, अनेक स्मृतियां थीं. याज्ञवल्क्य स्मृति. नारद स्मृति. बृहस्पति स्मृति. स्थानीय परंपराएं थीं. लोकाचार था. न्याय के पारंपरिक नियम थे. पारंपरिक उदाहरण भी थे. सामंतों के अपने नियम थे. जाति आधारित नियम और तरीके थे. धर्म और परंपरा के नाम पर कई अघोषित विधान थे. यहां तक कि ग्राम पंचायतों की अपनी व्यवस्था थी.

समस्या थी किस किताब को चुने. भारतीय समाज किसी एक पुस्तक से नहीं चलता था. जैसे हिंदू धर्म, ईसाइयत और इस्लाम की तरह किसी एक किताब से नहीं चलता. लेकिन औपनिवेशिक शासन को भारत की जटिलता नहीं, प्रशासन की सरलता चाहिए थी. उसे एक ऐसा ग्रंथ चाहिए था, जिसे सामने रखकर कहा जा सके- यही है हिंदू कानून. यहीं से मनुस्मृति अंग्रेजी शासन के लिए असाधारण महत्व की हो गई. अंग्रेजों ने मनुस्मृति को बंदरिया के मरे बच्चे की तरह सीने से चिपका लिया.

मनुस्मृति संस्कृत की पहली किताबों में से एक है, जिसका यूरोपीय अनुवादकों ने अध्ययन और अनुवाद किया. अंग्रेज़ी में इसका पहला अनुवाद सर विलियम जोंस ने 1776 में किया. Institutes of Hindu Law, के नाम से यह किताब 1794 में छपी. हलॉंकि भारत में पहला छापा खाना 1556 में ओल्ड गोवा के सेंट पॉल कॉलेज में पुर्तगाली लोगों ने स्थापित किया था. जहॉं भारत में पहली अंग्रेजी किताब 1794 में छपी 'The Travels of Dean Mahomet' . जबकि हिंदी में पहली किताब 1810 में छपी. यह लल्लू लाल जी की ‘प्रेम सागर’ थी.

वर्तमान मनुस्मृति के जो पाठ मिलते हैं उसका मूल संपादन विलियम जोंस ने ही किया था. बाद में लुई जैकोलॉयट ने “लॉ ऑफ मनु” नाम से मनु स्मृति का अनुवाद, 1867 से 1876 के बीच किया. अंग्रेज़ सरकार ने इस किताब का इस्तेमाल हिन्दू कोड तैयार करने में किया. 1886 में जर्मन विद्वान मैक्स मुलर ने मनुस्मृति को अपनी कृति ‘edited volume Sacred Books of the East’ में शामिल करने से पहले इसका फ्रेंच, जर्मन, पुर्तगाली और रूसी भाषा में अनुवाद किया.

मनुस्मृति या मानव धर्मशास्त्र. इसे मनु के नियम के नाम से भी जानते है. इसकी रचना कब हुई इसका निर्धारण कठिन है. मनुस्मृति में कुल 12 अध्याय तथा 2694 श्लोक हैं. इतना विशाल ग्रन्थ की एक दिन या एक वर्ष में तो लिखा नहीं जा सकता. माना जाता है कि इसे दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व और दूसरी शताब्दी ईसवी के बीच लिखा गया. मनुस्मृति श्लोक छंद में लिखी गयी. इसमें 16-16 शब्दों की दो अव्यक्त पंक्तियाँ हैं. वेदों को कानों से सुनने और मस्तिष्क में गुनने के बाद जब यह विचार ताड़पत्रों पर उतरे तो स्मृति कहलाए. अब तक तक़रीबन बीस प्रामाणिक स्मृतियाँ हैं जिनमें सबसे चर्चित मनु स्मृति है.

मनुस्मृति के पहले भाष्यकार मेधातिथि हैं. इनका समय लगभग 825-900 ई. के बीच माना जाता है. उन्होंने 'मनुमहाभाष्य' नाम की टीका लिखी. मेधातिथि का मानना है कि मनुस्मृति के श्लोकों का संकलन ई.पूर्व चौथी अथवा पांचवीं शताब्दी में किया गया होगा. मनुस्मृति पर एक अन्य टीकाकार कुल्लुक भट्ट (1200 ई.) ने भी टीका लिखी. उन्होंने मनुस्मृति का रचना काल चौथी सदी ईसा पूर्व माना. मनु ने यवन, शक, कम्बोज, गान्धार, पदलव आदि का वर्णन किया है. इसलिए वे ई. पू. तीसरी सदी से बहुत पहले के नहीं हो सकते. इतिहासकार काशी प्रसाद जायसवाल भी मनुस्मृति की रचना पुष्यमित्र शुंग और उसके उत्तराधिकारियों के शासन काल में ही मानते हैं.

मनुस्मृति के प्राचीन पाठ में चार प्रमुख हिस्से हैं. एक- दुनिया की रचना. दो- धर्म के स्रोत. तीन-चार सामाजिक वर्गों का धर्म. और चौथा-कर्म, पुनर्जन्म और अंतिम मुक्ति का नियम. तीसरा खंड सबसे लंबा और सबसे महत्वपूर्ण है. जिसमें वर्ण व्यवस्था के सिलसिले को बनाए रखते हर जाति को उसके नियम बताए गए हैं. ब्राह्मण को मानव जाति का उच्च प्रतिनिधि और शूद्र को नीच बताते उसे 'उच्च' जातियों की सेवा करने का एकमात्र कर्तव्य दिया गया है. कुछ छंदों में महिलाओं के जन्म के आधार पर उनके खिलाफ घटिया और बेहद अपमानजनक भावनाएँ हैं.

भारतीय राजदर्शन में मनु के सप्तांग राज्य सिद्धांत सबसे चर्चित है. इसके मुताबिक, राज्य एक शरीर की तरह है, जिसके सात अंग हैं. ये सभी राज्य- रूपी शरीर की प्रकृतियां है जिनके बिना राज्य संचालन की कल्पना करना कठिन है. मनुस्मृति के अध्याय 9 के श्लोक 294 में राज्य के सात अंग गिनाए गए हैं.  जैसे- स्वामी यानी राजा, (2) मंत्री, (3) पुर (दुर्ग), (4) राष्ट्र, (5) कोष, (6) दंड और (7) मित्र. इन सात अंगों से बने राज्य का प्रत्येक अंग एक विशिष्ट कार्य करता है और इसी कारण उसका महत्व है. मनु के अनुसार यदि इनमें से किसी भी एक हिस्से की उपेक्षा होती है तो राजा के लिए राज्य का कुशल संचालन संभव नहीं है. मनुस्मृति के पहले अध्याय में सृष्टि की उत्पत्ति और प्रलय के बारे में लिखा गया है. दूसरा अध्याय- आर्यावर्त की सीमा, जलवायु, सोलह संस्कार के बारे में बताता है. तीसरा अध्याय- गृहस्थ आश्रम में प्रवेश, आठ तरह के विवाह , कन्या की पात्रता, श्राद्ध आदि के बारे में है.

चौथा अध्याय- गृहस्थ के लिए नियम, दान की पात्रता तय करता है. पांचवें अध्याय में मांस सेवन के दोष, बारह शुद्धिकारक, ईमानदारी, स्त्री-पुरुष संबंध के क़ायदे कानून है. छठें अध्याय में वानप्रस्थ के नियमों के बारे में बताया गया है. सातवां अध्याय में राजा के धर्म, दंड, मंत्रियों के परामर्श आदि की जानकारी दी गई है. आठवां अध्याय- राजा के विवाद निपटाने के तरीकों के बारे में लिखा गया है. नवां अध्याय- स्त्री पुरुष के कर्तव्य, अधिकार, पित्ता का उत्तराधिकारी होने के बारे में बताता है. दसवें अध्याय में चारों वर्णों के कर्तव्य वर्णित हैं. ग्यारहवें अध्याय में गोवध, मांस सेवन और अन्य पापों के बारे में लिखा गया है. बारहवां अध्याय स्वर्गलाभ, नरक प्राप्ति के उपाय बताता है.

ब्रिटिश भारत में औपनिवेशिक अफ़सरों के लिए इस किताब का अनुवाद एक व्यवहारिक मकसद था. हिंदुओं के इस धर्मशास्त्र को अंग्रेज 'कानून' के रूप में देखते थे पर भारत में इसका इस्तेमाल उस तरह से नहीं होता था. बरतानियों को लगा कि जिस तरह मुस्लिमों के पास क़ानून की किताब के रूप में शरिया है, उसी तरह हिंदुओं के पास भी मनुस्मृति है. इसकी वजह से उन्होंने इस किताब के आधार पर मुक़दमों की सुनवाई शुरू कर दी. इसके साथ ही काशी के पंडितों ने भी अंग्रेज़ों से कहा कि वे मनुस्मृति को हिंदुओं का सूत्रग्रंथ बताकर प्रचार करें. इसकी वजह से ये धारणा बनी की मनुस्मृति हिंदुओं का मानक धर्मग्रंथ है.

दलितों और महिलाओं पर मनुस्मृति में जो कुछ कहा गया है, वह अपमानजनक है. अस्वीकार्य है. सनातन का झंडा उठाए लोगों को कम से कम इसकी निंदा तो करनी ही  चाहिए. मनुस्मृति ने वर्णाश्रम व्यवस्था को मज़बूत किया. उसके पक्षपाती नियम बनाए. जिसका सुधारवादी तो विरोध करते हैं पर हर मानवतावादी को इसका विरोध करना चाहिए. जो मनुस्मृति का समर्थन करते हैं, वो मानते हैं कि सृष्टि की रचना ब्रह्मा ने की थी और दुनिया का कानून मनु और भृगु की परंपरा से आया है. इसके बहुत से हिस्सों में समाज के कल्याण की बातें कही गई हैं. दलितों और महिलाओं के बारे में जो विवादित अंश हैं, वो शायद बाद में जोड़े गए हैं. क्षेपक हैं. ये मूल किताब में नहीं हैं. मनुस्मृति को विस्तार से पढ़ें तो समझ भी आता है कि इसमें सारा कुछ कूड़ा नहीं है. कुछ अच्छी और नीतिगत बातें भी हैं पर उन्हें घटिया और जातीय विभाजन वाली बातें ढक लेती हैं.

मनुस्मृति का अनुवाद ब्रिटिश सरकार ने जिस मकसद से किया, उसका जहरीला असर मौजूदा समाज-जीवन में देखा जा सकता है. विलियम जोंस ने मनुस्मृति में षडयंत्रपूर्वक मनमानी मिलावट की. यही ग्रंथ बाद में भारत में छपी अलग-अलग मनुस्मृति का आधार बना. मार्च 1783 में ब्रिटिश सरकार ने जोंस को बंगाल सुप्रीम कोर्ट में जज बनाकर भेजा था. थोड़े ही दिनों बाद उन्हें ‘सर’ की उपाधि मिली. 15 जनवरी 1784 को गवर्नर जनरल वारेन हेस्टिंग्स ने “एशियाटिक सोसाइटी ऑफ़ बंगाल” की स्थापना कर उन्हें अध्यक्ष नामित किया. बस इसी के बाद उन्होंने भारतीय धर्मशास्त्र की अलग-अलग पांडुलिपियों को मँगाकर उनमें मिलावट का कारोबार शुरू किया. एक अनुमान के मुताबिक उन्हें मनुस्मृति के 50 से ज्यादा पाठ बंगाल के पंडितों ने सौंपे. पैसे और वजीफों के लालच में. हो सकता है कि ये मिलावट संकुचित जातीय दृष्टि और जातीय स्वार्थों से प्रेरित भी रही हों. विलियम जोंस का निधन 27 अप्रैल 1794 को हुआ. इसी साल उन्होंने संपादित मनुस्मृति का दूसरा अंग्रेजी संस्करण “इंस्टीट्यूट आफ हिंदू लॉ” प्रकाशित करा दिया. यह वह कालखंड था जब अंग्रेज सत्ता मनुस्मृति को खोज-खोज कर उसे छपवाने में सबसे ज्यादा बेताब थी.

20 अक्टूबर 1791 को वारेन हेस्टिंग्स को लिखी एक चिट्ठी में विलियम जोंस लिखते हैं, “यहां पंडितों के साथ मैं उनकी देववाणी संस्कृत सीख रहा हूँ. अब मैं संस्कृत में धाराप्रवाह बातचीत कर लेता हूँ. कोर्ट के काम के अलावा मैं मनुस्मृति के अनुवाद में जुटा हूँ. मेरी ही देखरेख में ग्रंथ संपादित हो रहा है”. उधर बंगाल के पंडित इसी बात पर बम-बम थे कि अंग्रेज संस्कृत बोल रहा है. उन्हें वज़ीफ़ा मिल रहा है. सरकारी सम्मान मिल रहा है. पर इस क़ीमत पर क्या बोया जा रहा है इसकी उन्हें परवाह नहीं थी. वह चमत्कृत थे. जोंस के संस्कृत शिक्षक कोई पंडित रामलोचन थे.

मित्रवर प्रो. राकेश उपाध्याय का इस विषय में अध्ययन है,वे कहते हैं, “दरअसल ब्रिटिश सुप्रीम कोर्ट के जजों का बंगाली पंडितों से बहुत से न्यायिक विषयों में वाद-विवाद हो जाता था. जजों का आरोप था कि पंडित लोग मनमाने तरीके से व्याख्या कर रहे हैं. हर पंडित के पास अपनी अलग-अलग विधि संहिता है, जहां वह कई तरह से विधि की व्याख्या करता है. इसलिए एक कॉमन संहिता जरूरी हो गई. उन्होंने उस समय के बड़े बंगाली विद्वानों की सूची तैयार की. सबके पास जो भी विधि संहिता की मूल पांडुलिपियां थीं, उन्होंने मुँह-मांगे दाम पर इकट्ठा करना शुरू कर दिया. ग्यारह बंगाली पंडितों की समिति गठित की गई. उस समिति को देशभर से जुटाई गई पोथियां दी गई. इसमें अनेक पाठ, मत-मतांतर शामिल थे.” यहीं से भारतीय समाज में विभाजन के बीज रोप दिए गए.

यूरोप ने पहली बार भारत को काफी हद तक मनुस्मृति की नजर से पढ़ना शुरू किया. यहीं से बहस शुरू होती है. इतिहास का एक पक्ष कहता है कि अंग्रेजों ने मनुस्मृति में कोई परिवर्तन नहीं किया. उन्होंने केवल उसे पूरे हिंदू समाज की प्रतिनिधि विधि-संहिता घोषित कर दिया, जबकि वास्तविक भारत उससे कहीं अधिक विविध था. पर एक दूसरा पक्ष इससे आगे जाता है. वह कहता है कि अंग्रेजों ने केवल मनुस्मृति का उपयोग नहीं किया. उन्होंने उसका उपयोग हथियार की तरह किया. स्त्री और जाति से जुड़े विवादित श्लोकों को आगे बढ़ाया. कुछ अंशों में क्षेपक जोड़े गए. कुछ को बढ़ा-चढ़ाकर प्रचारित किया गया. उद्देश्य था- भारतीय समाज की दरारों को और चौड़ा करना. यहीं सबसे अधिक सावधान होना पड़ता है. क्योंकि इतिहास यहां अंतिम निर्णय नहीं देता. इस दावे पर विद्वानों में मतभेद हैं. निर्णायक प्रमाण आज भी विवाद का विषय हैं. इसलिए इसे अंतिम सत्य नहीं कहा जा सकता.

लेकिन… क्षण भर के लिए मान भी लें कि यह मत सही है. मान लें कि मनुस्मृति के साथ सचमुच छेड़छाड़ हुई. मान लें कि उसमें क्षेपक जोड़े गए. मान लें कि स्त्रियों और शूद्रों के बारे में लिखे गए कुछ विवादित श्लोक बाद की मिलावट हैं. तो फिर सबसे बड़ा प्रश्न अंग्रेजों से नहीं, हमसे है. अंग्रेजों ने वही किया होगा, जो हर औपनिवेशिक सत्ता अपने हित में करती है. लेकिन हमने क्या किया? आजादी को लगभग अस्सी वर्ष हो चुके हैं. अगर यह हमारी मूल मनुस्मृति नहीं है… अगर इसमें मिलावट हुई… अगर इसमें स्त्री और जाति के खिलाफ लिखे गए विवादित श्लोक बाद में जोड़े गए… तो वे आज भी हर संस्करण में यह क्यों छप रहे हैं? और सारे धर्माचार्य, शंकराचार्य इस मनुस्मृति को अंतिम सत्य मान इसके पक्ष में क्यों खड़े हैं?

किसी प्रकाशक ने उनके नीचे यह लिखने की जरूरत क्यों नहीं समझी कि उनकी प्रामाणिकता विवादित है? किसी धर्माचार्य ने यह मांग क्यों नहीं उठाई कि देशभर की पांडुलिपियों का मिलान कर एक प्रमाणिक पाठ तैयार किया जाए? किसी कुलपति ने इसे राष्ट्रीय बौद्धिक परियोजना क्यों नहीं बनाया? हम हर बार अंग्रेजों को कठघरे में खड़ा करते हैं. लेकिन अपने मौन का हिसाब कौन देगा? आज हिन्दुत्व के जो झंडाबरदार चिल्ला-चिल्ला कर कह रहे हैं. यह ‘क्षेपक’ हैं. वह पिछले ढाई सौ साल से कहां थे. उनकी मरघटी चुप्पी ने इस विवादित मनुस्मृति को वैधता दे दी.

मुझे अंग्रेजों से शिकायत कम है. वे शासक थे. उन्होंने अपने साम्राज्य के हित में काम किया. शिकायत अगर किसी से है… तो हमसे है. अगर मनुस्मृति सचमुच मिलावट का शिकार हुई थी, तो सबसे बड़ी विफलता अंग्रेजों की नहीं थी. सबसे बड़ी विफलता हमारी थी. क्योंकि साजिश उन्होंने की होगी… लेकिन उसे पीढ़ी-दर-पीढ़ी हमने ढोया. यही वह प्रश्न है, जिससे बचना सबसे कठिन है. और शायद यहीं से मनुस्मृति की बहस इतिहास से निकलकर हमारे बौद्धिक चरित्र की बहस बन जाती है.

सिर्फ स्वामी दयानंद ने मनुस्मृति की मिलावट को चुनौती दी थी. 1875 से 80 के बीच अपने प्रवचनों में स्वामी जी ने उसके महिला, दलित विरोधी अंशों पर सवाल उठाते हुए इसे मूल मनुस्मृति का हिस्सा नहीं बताया था. बाद में उनके शिष्यों ने शोध करके 2685 श्लोकों में से 1471 को मिलावटी बताया. जिन्हें नकली कहा गया. वे मनुस्मृति का हिस्सा नहीं थे. यहीं महात्मा ज्योतिबा फुले और डॉ. भीमराव आंबेडकर का उल्लेख अनिवार्य हो जाता है. मैं यह नहीं कह रहा कि उनसे पहले किसी ने मनुस्मृति पर प्रश्न नहीं उठाए. भारतीय परंपरा में असहमति कोई नई बात नहीं थी. बुद्ध ने प्रश्न पूछे. महावीर ने प्रश्न पूछे. चार्वाक ने प्रश्न पूछे. कबीर ने पूछे. रविदास ने पूछे. गुरु नानक ने पूछे. लेकिन मनुस्मृति पहली बार एक बड़े सामाजिक और राजनीतिक प्रश्न के रूप में उन्नीसवीं शताब्दी में महात्मा ज्योतिबा फुले के साथ और फिर बीसवीं शताब्दी में डॉ. भीमराव आंबेडकर के साथ राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में आती दिखाई देती है. यह प्रश्न अभी भी विचारणीय है. डॉ. आंबेडकर ने सिर्फ प्रश्न ही नहीं पूछे. उन्होंने समारोह पूर्वक मनुस्मृति को जलाया भी.

क्या इसलिए कि अंग्रेजों ने उसे “हिंदू लॉ” का प्रतिनिधि ग्रंथ बनाकर पहले से कहीं अधिक प्रभावशाली बना दिया था? या इसलिए कि आधुनिक भारत पहली बार अपने ही ग्रंथों को नए प्रश्नों के साथ पढ़ रहा था? इतिहास इस पर अंतिम निर्णय नहीं देता. लेकिन प्रश्न अपनी जगह बना रहता है. जो किसी सनातन के झंडाबरदार ने नहीं पूछा. सब मनुस्मृति के पक्ष में बेहूदी दलीलें देते रहे.

25 दिसंबर 1927. महाड़. डॉ. भीमराव आंबेडकर ने मनुस्मृति का दहन किया. वह केवल एक पुस्तक नहीं जला रहे थे. वे उस सामाजिक व्यवस्था के विरुद्ध विद्रोह कर रहे थे, जिसे वे मनुष्य की समानता के विरुद्ध मानते थे. लेकिन आंबेडकर को केवल इस घटना से समझना भी पर्याप्त नहीं है. अपनी पुस्तक “Philosophy of Hinduism” में वे लिखते हैं कि मनु ने वर्णव्यवस्था का समर्थन किया और उसके बीज बोए, लेकिन यह निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता कि जाति-व्यवस्था का निर्माण स्वयं मनु ने किया. यह अंतर बहुत महत्वपूर्ण है. क्योंकि आंबेडकर भी इतिहास को नारे में नहीं बदलते. वे विचार का विरोध करते हैं. लेकिन जटिलताओं को सरल नहीं बनाते. शायद इसी कारण उन्हें पूरा पढ़ना चाहिए, टुकड़ों में नहीं. 1970 में कांशीराम ने ‘बामसेफ’ का गठन किया. इस एलान के साथ कि हमारा समाज दो हिस्सों में बंटा है, जिससे एक हिस्सा मनुवादी है दूसरा मूल निवासी. उनकी इस परम्परा को बाद में मायावती ने आगे बढ़ाया. यह दूसरी बात है कि कथित मनुवादियों के साथ सत्ता की साझेदारी के चलते उन्होंने कॉंशीराम और अम्बेडकर की लड़ाई को कमजोर किया. राजस्थान हाईकोर्ट में मनु की एक मूर्ति भी लगाई गई थी, जिसका बहुत विरोध हुआ.

फिर वहीं लौटता हूँ, जहां से चला था. इस पूरे लेख को लिखने के बाद मेरे पास उत्तर कम हैं. प्रश्न अधिक हैं. मैं भी  यह दावा नहीं कर सकता कि मनुस्मृति के सभी विवादित श्लोक क्षेपक हैं. इतिहास भी अभी यह दावा नहीं करता. मैं यह भी नहीं कह सकता कि अंग्रेजों ने निश्चित रूप से उसके पाठ में परिवर्तन किए. इस पर भी विद्वानों में मतभेद हैं. इस सवाल पर गीता प्रेस का अभिनंदन होना चाहिए. उसने समूचे हिंदू आर्ष ग्रन्थ छापे. वेद छापा. पुराण, उपनिषद, आरण्यक ग्रंथ छापे. रामायण, रामचरितमानस, महाभारत और गीता छापी. पर मनुस्मृति में हाथ नहीं लगाया. नहीं छापी, क्योंकि उसके पास प्रामाणिक ग्रंथ की किल्लत थी.

लेकिन मेरे मन में सबसे बड़ा सवाल मनुस्मृति में निहित विरोधाभास का है. समानता की वकालत करता यह ग्रंथ दलितों को प्रताड़ित करने की बात कैसे कह सकता है. स्त्री को पूज्य बताते बताते यही मनुस्मृति उनके प्रति कठोर और हिंसक कैसे हो सकती है. इससे यह अंदाज़ा लगता है कि हो न हो, इस ग्रंथ में बाद के समय में बहुत कुछ जोड़ा गया है. ज़ाहिर है, कि मूल पाठ में से श्लोक हटाए तो नहीं गए लेकिन अपनी बात और तर्क मनवाने के लिए नए जोड़ दिए गए. यहीं से मनुस्मृति का विरोधाभास सामने आ जाता है. मनुस्मृति का पक्ष या विरोध करने वाले लोग अगर अपनी पसंद के हिस्सों को पढ़ने के बजाए इसका पूरा पाठ करें तो उनको भी यह विरोधाभास सहज ही महसूस होगा.

एक बात पूरे विश्वास से कह सकता हूँ. हमने इस प्रश्न को कभी गंभीरता से लिया ही नहीं. अगर आज उपलब्ध मनुस्मृति ही मूल है… तो उसके विवादित श्लोकों का ईमानदारी से सामना कीजिए. उन्हें सही मानते हैं, तो तर्क दीजिए. गलत मानते हैं, तो स्पष्ट कहिए. लेकिन अगर आप स्वयं यह कहते हैं कि आज की मनुस्मृति में मिलावट है… तो फिर सबसे पहले उसी मिलावट को पहचानिए. उसे चिह्नित कीजिए. उसे प्रमाणित कीजिए.

किसी भी सभ्यता की सबसे बड़ी त्रासदी उसके ग्रंथों में मिलावट नहीं होती. सबसे बड़ी त्रासदी यह होती है कि वह उस मिलावट को पहचानने की कोशिश भी छोड़ दे. अगर कोई ग्रंथ सचमुच हमारी सभ्यता का हिस्सा है, तो उसकी रक्षा जयकारों से नहीं होती. उसकी रक्षा सत्य से होती है. और अगर किसी ग्रंथ पर मिलावट का आरोप है, तो उसका उत्तर आक्रोश नहीं, प्रमाण देते हैं. शायद इसलिए मेरा सवाल मनुस्मृति से कम, हमसे अधिक है. अगर वर्तमान मनुस्मृति ही मूल है, तो उसके विवादित श्लोकों का सामना कीजिए. स्वीकार कीजिए. अगर वह मूल नहीं है, तो उसकी प्रामाणिक प्रति खोजिए. लेकिन यह नहीं हो सकता कि हम एक ही सांस में उसे पवित्र भी कहें और दूषित भी. सभ्यताएं अपने ग्रंथों से नहीं हारतीं. वे तब हारती हैं, जब अपने ग्रंथों से, सत्य से और इतिहास से प्रश्न पूछना छोड़ देती हैं.

लेकिन देरी के बावजूद मैं आशावादी रहना चाहता हूं. समाज में हिंदुत्व के अलम्बरदार और विरोधी फिर से इस ग्रंथ को उठाएं. इसके मूल पाठ की खोज और कथावस्तु पर चर्चा करें. प्रश्नों का सामना करें.मिलावटों की पहचान करें. यह हमारा ग्रंथ है. इसे अपनी नज़र से देखें. अंग्रेज़ों की नज़र से नहीं. हंस बनें. दूध का दूध और पानी का पानी कर दें.

जय जय.

मनुस्मृति और अंग्रेज

श्री राहुल गांधी और श्री मल्लिकार्जुन खड़गे सहित अन्य राजनीतिक नेताओं को मनु स्मृति किसने दी है? मतलब कहां से मिली है? किस गुरु के मार्गदर्शन में उन्होंने मनु स्मृति पढ़ी है? किस शंकराचार्य से, किस आचार्य से, किस परंपरा से उन्हें यह स्मृति मिली है?

 सनातन धर्म की किसी भी प्रामाणिक पीठ (जैसे ज्योतिषपीठ, पुरी, द्वारका या श्रृंगेरी) या सनातन धर्म से जुड़े आस्तिक या नास्तिक किसी भी संप्रदाय के आचार्य ने उन्हें यह ग्रंथ नहीं सौंपा है। फिर ये कहां से, किस स्रोत से इसे लेकर घूम रहे हैं?

पूछो तो उत्तर में सिर्फ इतना है कि डॉ. अंबेडकर की सामाजिक न्याय की लड़ाई, और उनकी राजनीतिक विचारधारा के जरिए उन्हें यह मनु स्मृति मिली है। तो फिर सनातन धर्म के आचार्यों को दोष क्यों? यह स्मृति तो राजनीति के जरिए लोगों के मन में घुसाई गई।

वस्तुतः आजादी के पहले और बाद मनु स्मृति को हाथ में लेकर यदि कोई घूम रहा है तो चर्च के पादरी हैं, अब्राहमिक संप्रदाय के नेता हैं और लेफ्ट के कारिंदे हैं। किसी सनातनी ब्राह्मण के घर से या किसी सनातन धर्म के आचार्य के गुरुकुल से यह मनु स्मृति की पोथी न लेफ्ट को मिली, न चर्च को, और न कॉंग्रेस को। 

पंडित नेहरु की माता जी बहुत धार्मिक महिला थीं, क्या पंडितजी के घर में, या आनंद भवन में कोई प्रति रखी थी? 

हम लोग भी काशी से आते हैं, हमारे घर में तो हमें परंपरा से रामायण मिली, सत्यनारायण की कथा मिली, पर मनु स्मृति सचमुच नहीं मिली। 

गारंटी है कि पूरे उत्तर भारत में किसी भी ब्राह्मण परिवार में आज से 50-100 साल पहले या 200-250-300 साल पहले भी शायद ही मनु स्मृति की कोई पांडुलिपि रखी रही हो??? 

सबका जीवन ही मंड़ई और कच्चे घरों में गुजर रहा था तो फिर दुर्लभ पांडुलिपि रखने का प्रश्न ही नहीं। जब अंग्रेजी प्रेस से छपी तो भी सवाल ही नहीं कि किसी ने इसे रखा या पूजा।  

तो फिर इन्हें मिली कहां से? प्रश्न है।

हकीकत यही है कि शुरुआती वामपंथी इतिहासकारों (जैसे डी. डी. कोसंबी, आर. एस. शर्मा, रोमिला थापर आदि) ने सनातन परंपरा की किसी पाठशाला से मनु स्मृति ग्रहण नहीं की है। 

श्री ज्योतिराव फूले, डॉ. भीमराव अंबेडकर आदि को भी यह मनु स्मृति किसी आचार्य परंपरा से नहीं मिली है। बल्कि इन सहित आजादी के पूर्व सभी आधुनिक समाज चितंकों को भी मनु स्मृति चर्च के पादरियों के जरिए मिली है। 

लेफ्ट संगठन जो कि अब्राहमिक संप्रदायों की नाजायज बिगड़ैल औलाद हैं, इन्होंने भी इसे चर्च के षड्यंत्री पादरियों से ही हासिल किया, न कि किसी शंकराचार्य या किसी परंपरावादी ब्राह्मण के घर से।

इनने ब्रिटिश और यूरोपीय संपादकों के द्वारा ब्रिटिश सरकार के नियंत्रण वाले प्रेस से प्रकाशित मनुस्मृति को ही मूल अंग्रेजी में पढ़ा, फिर इसका मार्क्सवादी और औपनिवेशिक उपयोगवादी दृष्टिकोण (वर्ग संघर्ष और बांटो-राज करो) से इन सबने अलग-अलग विश्लेषण किया है।

वस्तुतः जिस रूप में आज राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे मनु स्मृति को हाथ में लेकर घूम-घूमकर संसद से सड़क तक बांच रहे हैं, यही काम आज से दो सौ साल पूर्व चर्च के पादरी रेवरेंड जॉन विल्सन, और पादरी डॉ. मरे मिशेल ने भारत में ब्रिटिश सरकार के इशारे पर कोलकाता और पुणे में शुरु किया था। फिर इसे मद्रास पहुंचाया गया।

यह बात सन 1820 की है। पहली मनु स्मृति 1776 में जेन्टू कोड के नाम से छपी थी। एनबी हेलहेड ने पहला संपादन किया। संस्कृत से पर्शियन में उसने संपादन सहित अनुवाद किया था। फिर पर्शियन से अंग्रेजी में अनुवाद हुआ। 

अंग्रेज तब हिंदू को जेन्टू कहता था, इसलिए इसका नाम जेन्टो कोड पड़ा। यह प्रथम प्रकाशित प्रति बाद में हटा दी गई। इसमें खूब इधर-उधर से चीजें ली गईं थीं, इसके प्रमाण विलियम जोन्स के पत्र व्यवहार में मिलते हैं। 1783 में वॉरेन हेस्टिंग्स ने इसके पुनः संपादन का ठेका नए निर्देशों के साथ विलियम जोन्स को दिया। बंगाल एशियाटिक सोसायटी बनी। 11 पंडितों की कमेटी पहले से थी, जिसमें बाद में कुछ और पंडित, फारसी जानने वाले मौलाना भी शामिल हुए। 

मनु स्मृति के नाम पर बहुत सी पोथियां बटोरी गईं। इसका विधिवत् संपादन विलियम जोन्स ने 1784 में प्रारंभ किया, ब्रिटिश प्रेस ने इसे 1794 में प्रकाशित किया। 

किन्तु बहुत से पंडितों ने इसे स्वीकार करने से उसी समय इन्कार किया क्योंकि वह जान रहे थे कि मिलावट की गई है, एक म्लेच्छ ने स्मृति को गढ़ा है, यह भी एक कारण था ही। लोगों ने तब से ही इसे विलियम जोन्स स्मृति कहना शुरु कर दिया था।

सवाल है कि आखिर जो पंडित अपनी विद्या किसी गैर ब्राह्मण को देने को भी राजी नहीं होते थे, अचानक वह एक अंग्रेज म्लेच्छ को देने  के लिए राजी कैसे हो गए? इस मुद्दे पर उसी समय बंगाल में पंडित बंट गए थे। जिस ग्रंथ को म्लेच्छ ने छू दिया, संपादन कर दिया, उसे भला ब्राह्मण कैसे स्वीकार कर लेंगे? बंगाल एशियाटिक सोसायटी की फेलोशिप वाले कथित पंडितों सहित किसी ने भी इसे तब स्वीकार ही नहीं किया। 
 
यही कारण है कि कालांतर में जब गीता प्रेस का जन्म हुआ तो इसे प्रकाशित करने के मुद्दे पर पंडित ही भिड़ गए। गीता प्रेस से जुड़े पंडितों ने विलियम जोन्स की संपादित प्रति को स्वीकार ही नहीं किया। प्रकाशित करना तो दूर की बात है। काशी के ब्राह्मणों की इस पूरे मामले में न कोई राय ली गई और न ही कोई भूमिका थी। इसके प्रकाशन की संपूर्ण प्रक्रिया से जगतगुरु शंकराचार्यों से कोई परामर्श कभी नहीं लिया गया।

फिर षड्यंत्र तो पूरा हो ही गया। ब्रिटिश सरकार अपने मिशन पर आगे बढ़ गई। उस समय पंडित इसे लेने को राजी नहीं हुए तो अंग्रेजी प्रेस से अंग्रेजी में प्रकाशित मनु स्मृति को चर्च के जरिए देश भर में नवस्थापित मिशनरी स्कूलों, सरकार प्रेरित सिस्टम, तंत्र में बांटा गया, और पढ़ाया गया। फिर प्रारंभ हुआ हिंदू धर्म को गाली देने का नया शगल जिसे ब्रिटिश सरकार का पूरा संरक्षण था ही।

सरकारी और अन्य निजी साधनों से मनु स्मृति को खूब छापा गया। मनु स्मृति को देश भर में पहुंचाने का कार्य यदि मिशनरी भाव से किसी ने किया तो वह चर्च के पादरियों ने किया। पुणे में चर्च ऑफ स्कॉटलैंड ने कमान संभाली। 

पुणे में रेवरेंड जॉन विल्सन नामक पादरी को मनु स्मृति पढ़ने-पढ़ाने में बहुत दिलचस्पी थी, वह केवल विवादित श्लोकों को ही पढ़ाता था, बाइबिल से तुलना करता था, पुणे के स्कॉटिश मिशनरी स्कूल में तब पढ़ने आए ज्योतिराव फूले के मन में इसी पादरी ने हिंदू धर्म के प्रति नफरत और चर्च के प्रति मतांतरण की हसरत पैदा करने की कोशिश की।

1925 के बाद चर्च से ठेका लेफ्ट के लोगों ने लिया क्योंकि देश में आजादी की चिंगारी तेज होने लगी थी। टू स्टेप फ्लो थ्योरी पर चल रहा चर्च रणनीति बदलने लगा था। अब लेफ्ट आगे, चर्च पीछे।

अब देश आजाद है, और एफसीआरए बिल संसद में है, चर्च के पेट में मरोड़ 
उठने लगी है, लिहाजा उसके सारे एजेंट रण में उतर पड़े हैं। जैसे 200 साल पहले हाथ में मनु स्मृति थी, फिर से मनु मनु मनु का जाप चल पड़ा है। देखिए कहां तक जाता है।

जाहिर तौर पर अंग्रेजों की ओर से प्रकाशित मनु स्मृति को चर्चित करने का कम चर्च ने ही किया है। इसमें किसी भारतीय गुरुकुल, आश्रम, शंकराचार्य या किसी आचार्य का सीधे तौर पर कोई रोल नहीं है। यूनिवर्सिटी सिस्टम आने के बाद उसे लेफ्ट ने अकादमिक चर्चा में समाजशास्त्र, राजनीति की मार्क्सवादी व्याख्या में जमकर इस्तेमाल किया है। 


अंबेडकर

बाबा साहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर को बड़ौदा महाराजा सयाजीराव गायकवाड़ ने अच्छी खासी छात्रवृत्ति दी थी। बड़ौदा महाराज से उनके बारे में पहली बार चर्चा एक संस्कृत के प्रकांड विद्वान पंडित अर्जुन केलुस्कर ने की थी। पंडित केलुस्कर बड़ौदा महाराजा के शिक्षा मंत्री जो कि ब्राह्मण थे, के नजदीकी थे, वह उनके जरिए ही महाराजा से मिले थे। उन ब्राह्मण शिक्षा मंत्री का नाम था नारायण केलकर।

पंडित अर्जुन केलुस्कर जाति से भंडारी थे। इसके पूर्व डॉ. अंबेडकर के जीवन में जिन शिक्षकों का बहुत भावनापूर्ण स्थान रहा है उनमें पंडित पेणसे गुरुजी और पंडित कृष्णाजी केशव आंबेडकर की भूमिका महत्वपूर्ण थे। ये दोनों ब्राह्मण थे। इसका भावपूर्ण उल्लेख स्वयं डॉ.अंबेडकर ने धनंजय कीर के द्वारा अंग्रेजी में लिखित, मराठी और हिंदी में अनूदित प्रामाणिक जीवनी में किया है। 

इसके अनुसार, पेणसे गुरु अक्सर बचपन में उन्हें अपने घर भी ले जाते थे, बरसात में कपड़े भी पहनने को देते थे। उन्हीं के घर में भीम स्नान करते थे। दोपहर का लंच वह दूसरे ब्राह्मण गुरु कृष्णाजी केशव आंबेडकर के साथ ही करते थे। इन्हीं आंबेडकर गुरुजी से उन्हें आंबेडकर उपनाम मिला जिसने भीम को नई पहचान दी।

पंडित केलुस्कर के कारण ही डॉ. अंबेडकर को अपनी प्रतिभा को निखारने का बड़ा अवसर तब मिला जबकि उनकी मुलाकात बड़ौदा महाराजा से हुई। उनकी प्रखर प्रतिभा देखकर स्नातक में ही उनकी स्कॉलरशिप महाराजा ने प्रारंभ की थी।  बाद में उन्हें 1913 में अमेरिका की कोलंबिया यूनिवर्सिटी में अध्ययन के लिए भारी भरकम छात्रवृत्ति बड़ौदा महाराजा ने प्रदान की। आज के हिसाब से यह स्कॉलरशिप उनकी स्नातक, परास्नातक आदि डिग्री के समय सब मिलाकर 3 करोड़ रुपये से कम नहीं थी।

1913 में इसी स्कॉलरशिप की बदौलत ही डॉ. अंबेडकर एलफिंस्टन कॉलेज, मुंबई से ग्रेजुएट हुए तो उन्हें बड़ौदा की सेना में लेफ्टिनेंट पद पर नियुक्ति मिली। उल्लेखनीय है कि डॉ. अंबेडकर के पिताजी सूबेदार मेजर थे, दादा, नाना आदि सभी तत्कालीन ब्रिटिश आर्मी और मराठा सेनाओं से परंपरा से जुड़े ही रहे थे।

23 जनवरी 1913 को डॉ. अंबेडकर लेफ्टिनेंट पद पर नियुक्त हुए। 9 दिन बीते थे कि पिताजी की बीमारी के कारण उन्हें लौटना पड़ा। 2 फरवरी 1913 को पिताजी का निधन हो गया। इस शोकांतिका से उबरकर 4 जून 1913 को डॉ. अंबेडकर पुनः महाराजा बड़ौदा की सेवा में उपस्थित हुए। 

वहां उन्होंने अमेरिका में उच्च शिक्षा के लिए स्कॉलरशिप की जरुरत बतायी और प्रार्थनापत्र दिया। वहीं बड़ौदा महाराज के एक ब्राह्मण जाति के  शिक्षा मंत्री नारायण केलकर, प्रधानमंत्री श्री बीएल गुप्ता, उपप्रधानमंत्री मनुभाई मेहता, राजस्व मंत्री श्रीमंत भद्र सिंह गायकवाड़, और अपने गुरु पंडित केलुस्कर आदि की उपस्थिति में उनकी अर्जी नारायण केलकर ने मंजूर की। 

महाराजा ने प्रसन्नतापूर्वक सभी को निर्देशित किया, और डॉ. अंबेडकर ने एग्रीमेंट या करार पर दस्तखत किए कि उच्च शिक्षा पूरी कर वह 10 साल तक महाराज की डिफेंस सर्विस (सिविल सेवा) में अधिकारी के रूप में सेवा प्रदान करेंगे।

डॉ. अंबेडकर पहले भी 9 दिन तक बड़ौदा महाराजा के डिफेंस सेवा में लेफ्टिनेंट के रूप में अतिथि गृह में रुक चुके थे। पुनः उनका आतिथ्य बड़ौदा के पूरे मंत्रिमंडल ने किया। संभवतः तीन दिन आतिथ्य लेकर वह मुंबई चले गए ताकि अमेरिका जाने की तैयारी कर सकें। जुलाई 1913 के तीसरे सप्ताह में डॉ. अंबेडकर अमेरिका रवाना हो गए। वहां ठहरने आदि के लिए भी महाराजा ने अपने संपर्कों का पूरा ब्यौरा उन्हें दिया।

इन 10-15 दिनों में डॉ. अंबेडकर के साथ किसी प्रकार से छुआछूत की कोई घटना घटी हो, कोई प्रमाण उपलब्ध नहीं है।

और तो और डॉ. अंबेडकर ने मास्टर डिग्री के लिए जो शोधप्रबंध लिखा था, उसमें भी उन्होंने जाति व्यवस्था को भारत के रिपब्लिक के रूप में लिखकर उसे सराहा था। एडमिनिस्ट्रेशन एंड फाइनेंस ऑफ ईस्ट इंडिया कंपनी नामक शोध प्रबंध उन्होंने 1915 में कोलंबिया यूनिवर्सिटी में लिखा तो यह उनकी पहली थीसिस थी।

इस शोध पत्र में उन्होंने ब्रिटिश हुकूमत और ईस्ट इंडिया कंपनी की आर्थिक नीतियों की इतनी बारीक और वैज्ञानिक चीरफाड़ की थी कि वह आज भी भारतीय अर्थशास्त्र के इतिहास में एक अनूठा दस्तावेज़ है।
बाबा साहेब ने ब्रिटिश सरकार के इस दावे पर तीखा प्रहार किया कि अंग्रेजों ने भारत में शांति स्थापित की।

बाबा साहेब ने लिखा कि अंग्रेजों की यह 'शांति' वास्तव में भारत की बरबादी की कीमत पर आई है। उन्होंने कहा कि कानून-व्यवस्था की आड़ में अंग्रेजों ने भारत और उसके स्वावलंबी ग्रामों का भयंकर आर्थिक शोषण किया है। इसी तथ्य के समर्थन में उन्होंने यह प्रसिद्ध उक्ति लिखी थी कि "कोई भी मनुष्य आर्थिक तबाही या दरिद्रता के मुकाबले केवल एक 'पशुवत शांति' (Mere Animal Peace) को चुने या नहीं, इसका फैसला लोग करेंगे।" साफ था कि उन्होंने पहले शोध प्रबंध में ब्रिटिश सरकार को ललकारा था कि भूखे पेट और गुलाम रखकर उनके द्वारा दा जा रही शांति किसी काम की नहीं है।
डॉ. अंबेडकर फाउंडेशन, नई दिल्ली से प्रकाशित वॉल्यूम-6 के पृष्ठ 16 पर इस थीसिस में वह लिखते हैं कि- भारत में ग्राम समाज अधिकांश रूप से उत्तर भारत में पाया जाता है। (हालांकि यह निष्कर्ष सही नहीं था, पर जिस भी संदर्भ से डॉ. अंबेडकर ने लिखा, शायद उसी में यह अंग्रेजों ने अंकित कर रखा हो)
ग्राम का प्रशासन निर्वाचित प्रधान करते थे, जिन्हें ग्राम समाज की जातियां मिलकर चुनती थीं, उसके पास हटाने का भी अधिकार था।...विभिन्न शिल्पी, कलावंत समूह और लोग ग्राम में अपने विशिष्ट अधिकार रखते थे। जैसे गांव में अध्यापक वर्ग था, धोबी, नाई, बढ़ई, लोहार, कर्मकार, पासवान , कायस्थ आदि सभी थे। ये सभी अधिकार संपन्न थे। इनके पास ग्राम समाज के हित में काम करने, खर्च करने, लोगों के आतिथ्य के लिए भी कुछ करने का अधिकार था। इन गांवों में अपरिचित, अनजान लोगों को भी सम्मान के साथ आतिथ्य मिलता था।....

इसी पैरे में डॉ. अंबेडकर ने स्वयं यह लिखा है, मतलब वह किसी को उद्धृत नहीं कर खुद कह रहे हैं कि- these village communities are little republics, having nearly everything that they want within themselves, and almost independent...। मतलब यह कि ये ग्राम समुदाय छोटे गणतंत्र की तरह हैं। लगभग उन्हें उनकी जरुरत की हर चीज आपसी सेवाओं से उपलब्ध है। वे आत्मनिर्भर हैं पूरी तरह। 
डॉ. अंबेडकर आगे लिखते हैं कि भारत में सत्ता बदलती रही लेकिन ये ग्राम समुदाय नहीं बदले। और तो और संकट के समय इन्होंने अपनी अंदुरुनी एकता मजबूत कर खुद को और अधिक शक्तिशाली बना लिया।
इन गांवों की खासियत थी कि इनमें से किसी कमजोर शख्स को यदि किसी बाहरी को कुछ देनदारी देनी है और अगर वह चुकाने में असमर्थ है तो पूरा गांव उसके साथ खड़ा हो जाता है।

इस शोधपत्र में डॉ. अंबेडकर ने ईस्ट इंडिया कंपनी और ब्रिटिश सरकार की ओर से भारत के गांवों की लूट का पर्दाफाश किया है। भारत की बरबादी के लिए ब्रिटिश शासन को जिम्मेदार ठहराया है। कंपनी की आय के स्रोतों में अफीम, नील की खेती से किसानों की बरबादी सहित नमक, चमड़े, कपड़े के व्यापार पर अंग्रेजी आघात की परत दर परत खोली है। युद्ध के नाम पर भारत के किसानों, उनके उत्पादकों से अवैध वसूली को रेखांकित किया है। 

डॉ. अंबेडकर लिखते हैं कि अंग्रेजों की लूट के कारण भारत के मजदूरों, कृषकों की आय घट गई। वह मुनरो के दिए आंकड़ों पर कहते हैं कि जमीन और फसलों पर अंग्रेजी शासन में लगाए गए लगान के कारण सन 1830 में किसान-मजदूर मासिक 4 से 6 रुपये की आय पर आ गए हैं। (आज के बाजार मूल्य से यह आय 6 हजार रूपये से 9 हजार रुपये तक होती है। अर्थात, उस जमाने में तमाम ब्रिटिश शोषण के बावजूद गरीब आदमी न्यूनतम 6000 रुपये से- 9000/10,000 रुपये मासिक तक अपने गांव में कमा ले रहा था, स्किल आदमी की आय इससे कहीं ऊपर ही थी) 

खैर, भारत की दुर्दशा का कारण डॉ. अंबेडकर ने अपनी थीसिस में अंग्रेजों की आर्थिक लूट को ही बताया है। इसमें उन्होंने कहीं पर भी भारत की जाति व्यवस्था, कथित ब्राह्मणवादी व्यवस्था पर कोई टिप्पणी नहीं की है। प्रख्यात आर्थिक इतिहासकार आरसी दत्त को अनेक जगहों पर उद्धृत किया है।

संयोग है कि जब उन्हें महाराजा गायकवाड़ ने अमेरिका जाने के लिए स्कॉलरशिप मंजूर की तो उस पर मुहर लगाने वालों में बड़ौदा के उपप्रधानमंत्री भी थे जिनका नाम मनुभाई नंदशंकर मेहता था। मतलब कि मनु तब भी डॉ. अंबेडकर के सामने  दूसरे रूप में सहायक बनकर मौजूद थे।

फिर भी पहली थीसिस में डॉ. अंबेडकर ने जाति, ब्राह्मण, मनु आदि पर कोई टिप्पणी नहीं लिखी है। कम-से-कम 15 दिन वह राजकीय आतिथ्य में बड़ौदा में रहे लेकिन उन्होंने किसी तकलीफ या छुआछूत की शिकायत भी नहीं की। 

हालांकि 1917 में अमेरिका से लौटने पर उनका संपर्क मुंबई के ब्रिटिश गर्वनर से हो चुका था। उन्होंने कोलंबिया यूनिवर्सिटी में पढ़ाई की, फिर लंदन स्कूल ऑफ इकनोमिक्स भी गए। 1917 में लौटे तो उनकी इच्छा पुनः लंदन स्कूल ऑफ इकनोमिक्स जाकर डीएससी और बार एट लॉ यानी बैरिस्टर की पढ़ाई की हो गई। मास्टर्स, पीएचडी कोलंबिया यूनिवर्सिटी, अमेरिका से हो ही चुकी थी। पीएचडी की डिग्री मिलनी बाकी थी। 

किंतु बड़ौदा के मंत्रिमंडल को इस बार लगा कि पहले कुछ साल इन्हें बड़ौदा में सेवा का अवसर दिया जाए। बाद में लगेगा तो फिर भेज देंगे। बड़ौदा के मंत्रिमंडल ने उनसे विनती की कि पहले एग्रीमेंट के मुताबिक 10 साल की नौकरी पूरी करें।

17 सितंबर 1917 का महीना था। निर्देश के अनुसार वह बड़ौदा आ गए। 23 सितंबर को विधिपूर्वक उन्हें बड़ौदा राज्य का डिफेंस सेक्रेट्री(सैन्य सचिव, सिविल सेवा का ऊंचा पद) दिया गया। उनके रहने-खाने की व्यवस्था विगत अनुसार अतिथिगृह में थी, किंतु वह कुछ दिनों बाद स्वयं ही रहने के लिए एक पारसी संपर्कित के गेस्ट हाउस चले गए। 

फिर क्या हुआ और क्या नहीं हुआ, कौन बताएगा। डॉ. अंबेडकर कुछ बताते हैं, बड़ौदा महाराज के रिकॉर्ड कुछ और कहानी बताते हैं। इतना तो तय है कि जब डॉ. अंबेडकर ने 1935-36 में अपनी आत्मकथा वेटिंग फॉर अ वीजा में दो महीने के भीतर बड़ौदा का 10 साल का एग्रीमेंट तोड़कर वापस लौटने की कहानी के पीछे छुआछूत को कारण बताया तब तक इसे सही ठहराने का कोई भी दस्तावेज बड़ौदा में नहीं था। 

महाराजा को उन्होंने कभी इस बारे में कोई पत्र भी नहीं लिखा, कोई मौखिक जानकारी नहीं दी। क्योंकि बड़ौदा महाराजा के रिकॉर्ड में कुछ नहीं है। जो है वह यही कि एग्रीमेंट तोड़कर चले गए। उन्हें महाराजा की ओर से नोटिस भी तब भेजा गया था। कहा गया था कि पैसा वापस कर दीजिए। डॉ. अंबेडकर ने तब लिखित दिया था कि वह समय पर वापस कर देंगे। बाकी कारण अज्ञात हैं। हालांकि 1936-37 में 20 साल बाद डॉ. अंबेडकर ने बताया कि छुआछूत हो रहा था।

खैर, वह जब अचानक बड़ौदा छोड़कर चले गए तो ऐसी कोई बात उन्होंने महाराजा को नहीं लिखी, महाराजा के वह चहेते थे, क्योंकि महाराजा खुद सामाजिक न्याय के अगुवा थे। कालांतर में 1939 में महाराजा भी नहीं रहे। हालांकि दोनों की भेंट प्रथम गोलमेज सम्मेलन 1930 में लंदन में हुई। महाराजा ने उन्हें देखकर खुशी व्यक्त की थी कि चलो उनके कारण एक जीवन सार्थक हुआ।

10 अक्टूबर 1950 को डॉ. अंबेडकर ने भी महाराजा की स्मृति में उनके पोते प्रताप सिंह गायकवाड़ को पत्र लिखा था कि
"वे (महाराजा सयाजीराव) मेरे संरक्षक और मेरे भाग्य के निर्माता थे। उनके प्रति मुझ पर कृतज्ञता का एक ऐसा गहरा कर्ज है, जिसे मैं शायद कभी पूरी तरह नहीं चुका पाऊंगा।''

छुआछूत उनके साथ घटित हुआ तो पहले क्यों नहीं हुआ? बड़ौदा में जो एग्रीमेंट 1913 में साइन हुआ उसे ब्राह्मण शिक्षा मंत्री ने क्या डॉक्टर अंबेडकर से हस्ताक्षर कराते समय दूर से फेंक दिया था? इस पर कोई कमेंट इतिहास में दर्ज नहीं है।

बड़ौदा महाराजा से किसी भी बातचीत में डॉ. अंबेडकर ने उनके साथ छुआछूत किए जाने की घटना यदि संकेत में भी बता दी होती तो बड़ौदा में त्राहिमाम मच जाता। वो सारे अधिकारी और स्टॉफ के लोग उसी समय बर्खास्त हो जाते। क्योंकि बड़ौदा में सामाजिक सुधार कोल्हापुर महाराजा के साथ ही चल रहे थे। सभी जाति, वर्ग के लोग राजकीय कार्य में संलग्न थे। महाराष्ट्र, म.प्र., गोवा, गुजरात आदि के 50 के करीब अन्य गणराज्य के प्रधान मुखिया या राजा तो खुद ही अनुसूचित जनजाति के या अनुसूचित वर्ग के ही थे।

डॉ. अंबेडकर मुश्किल से 2 महीने बड़ौदा में रह सके। मुंबई के गवर्नर लॉर्ड विलिंगडन ने कुछ ही महीने बाद उन्हें प्रतिष्ठित सिडनेहम कॉलेज ऑफ कॉर्मस में प्रोफेसर के पद पर नियुक्ति का आमंत्रण भेज दिया। 
फिर जो हुआ, इतिहास में दर्ज है, केवल विश्लेषण करने और सोचने की जरूरत है। अनेक सवाल हैं, जिसका जवाब खोजा ही जाना चाहिए। क्योंकि यह पूरी भारतीय परंपरा पर थोपे गए वह प्रश्न हैं, जिनका सही सही तथ्यांकन, मूल्यांकन अब कहीं ज्यादा आवश्यक है।

1918 में डॉ. अंबेडकर मुंबई में प्रोफेसर बने। इधर लॉर्ड विलिंगडन को लंदन से जानकारी मिल चुकी थी कि साउथबरो कमेटी फ्रांसिस जॉन स्टीफेंस हॉपवुड की अगुवाई में  पृथक निर्वाचन (बांटो और राज करो नीति के अंतर्गत एक दांव) के लिए भारत आ रही है, कथित अछूत वर्ग की ओर से भी उस कमेटी के सामने एक प्रस्तुति मुंबई में होनी तय थी। लॉर्ड विलिंगडन को सभी डाटा स्रोतों को उस कमेटी के सामने उपस्थित करने का दायित्व था। विलिंगडन ने इस कार्य के लिए डॉ. अंबेडकर पर निगाह गड़ा दी थी।

नवंबर 1918 में साउथबरो कमेटी भारत आ गई। इसी नवंबर 1918 में डॉ. अंबेडकर को सरकारी सिडेनहम कॉलेज में प्रोफेसर पद के लिए नियुक्ति भी मिली। जनवरी 1919 में मुंबई में साउथबरो कमेटी के सामने डॉ. अम्बेडकर की ऐतिहासिक गवाही लॉर्ड विलिंगडन की उपस्थिति में दर्ज की गई। ब्रिटिश सरकार ने तय कर लिया था कि पृथक निर्वाचन मंडल लागू कर ही दम लेंगे।

खैर, डॉ. अंबेडकर उस समय महार जाति में और ब्रिटिश शासन द्वारा तैयार की गई अनुसूचित शेड्यूल हिंदू जाति की सूची में उल्लिखित समूचे अनुसूचित वर्ग में एकमात्र ऐसे व्यक्ति थे जिनके पास अमेरिका (कोलंबिया विश्वविद्यालय) से एम.ए. और पीएच.डी. जैसी उच्च और वैश्विक डिग्रियां थीं। ब्रिटिश अधिकारियों के लिए उनकी यह शैक्षणिक योग्यता अत्यंत प्रभावशाली थी, क्योंकि वे पश्चिमी राजनीतिक सिद्धांतों को गहराई से समझते थे।

साउथबरो कमेटी के सामने डॉ. अंबेडकर ने जब गवाही दी तो फिर उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। उन्होंने अपने द्वारा लिखित उस थिसिस को वस्तुतः खुद ही नकार दिया जिसमें जाति व्यवस्था और ग्राम को रिपब्लिक कहकर प्रशंसा की थी। गवाही ऐतिहासिक थी, लेकिन यह सत्य है कि इसमें उन्होंने उस थीसिस से नजरें हटा लीं थीं, या उसे नकार दिया था जिसके कारण ही उन्हें मास्टर डिग्री मिली। थीसिस झूठ थी या गवाही, इतिहास तय करेगा।

इस गवाही के बाद वह पुनः लंदन रवाना हो गए। इस बार कोल्हापुर के महाराजा ने उन्हें मदद की। लॉर्ड विलिंगडन का सामीप्य भी मिल ही गया था। अब वह इंग्लैंड के एक विशेष राजनीतिक वर्ग में अपनी गवाही के कारण चर्चित थे। मार्च 1920 तक डॉ. अंबेडकर सिडनेहम कॉलेज मे शिक्षक रहे, जुलाई 1920 में वह पुनः उच्च अध्ययन (पीएचडी) के लिए लंदन चले गए।
(क्रमशः)


ब्राह्मणवाद महार जाति और अछूत

बहुत सारे लोगों के मुंह में ब्राह्मणवाद ब्राह्मणवाद शब्द कुछ ज्यादा ही चढ़ गया है। वह जब देखो तब ही हर विषय पर ब्राह्मणवाद का जाप प्रारंभ कर देते हैं।

अभी मैं सम्राट अशोक के शिलालेखों का अध्ययन कर रहा हूं। आज के तर्क के हिसाब से तो सम्राट अशोक सबसे बड़े ब्राह्मणवादी थे। कोई शिलालेख नहीं है जिसमें ब्राह्मण का नाम आदर के साथ सम्राट अशोक ने नहीं लिया है। 

ब्राह्मण का नाम और सम्मान सम्राट अशोक के शिलालेखों में हमेशा श्रमण से पहले आया है, बहुत ही सम्मानजनक रूप में आया है। 

और तो और जाति शब्द भी सम्राट अशोक ने कम से कम 14 से अधिक स्थानों पर अंकित किया है। अपने सभी शिलालेखों में वह जाति को ज्ञाति कहते हैं। जाति का मूल नाम ज्ञाति है। ज्ञाति का अपभ्रंश जाति है। जाति मतलब ज्ञाति और हर जाति की अपनी ज्ञान परंपरा थी। जाति कभी भी कास्ट या CASTE न थी और न ही हो सकती है। किंतु सारे आधुनिक इतिहासकार, समाजशास्त्री, मार्क्सवादी अपनी मूर्खता को गर्वपूर्ण ढंग से व्यक्त करते हैं जब वह ज्ञाति को CASTE कहते हैं। जबकि कास्ट अलग है, जाति तो बिल्कुल अलग है। भारत की जाति व्यवस्था का यूरोपीय कास्ट सिस्टम से कोई साम्य है ही नहीं।

इतिहास में म्लेच्छ विदेशी आक्रमणों में बहुत सी ज्ञातियों की ज्ञान पंरपरा नष्ट हो गई, ब्राह्मण भी नष्ट हुए किन्तु उन्होंने छाती से चिपकाकर अपने ज्ञान का बड़ा हिस्सा बचा लिया, बहुत सी जातियां नहीं बचा पाईं, क्योंकि म्लेच्छों के हमलों में अस्तित्व के संघर्ष से गुजरना पड़ा। 

जाति तो इस संघर्ष में बच गई, लेकिन उनकी ज्ञान परंपरा खत्म हो गई। ब्राह्मणों ने किसी तरह से अपनी ज्ञान परंपरा बचा ली। तो अब सवाल है कि ब्राह्मणों ने कैसे अपनी ज्ञान परंपरा की रक्षा कर ली। अन्य जातियों की बिजनेस-युक्त ज्ञान परंपरा क्यों बिखर गई? शोध का विषय है।

पर अब आगे का विचार होना चाहिए। बीत गई सो बात गई। आखिर अब कौन रोक रहा है? भारत अपनी राख से पुनर्जीवित हो रहा है। सभी जातियां अंगड़ाई ले रही हैं। वह अपने मूल और अपनी ज्ञान परंपरा को पाने के लिए एकजुट हो रही हैं। 

इसका स्वागत होना ही चाहिए। लेकिन इसके लिए ब्राह्मणों के विरूद्ध राजनीतिक कारणों से चल रहा विषवमन हर हाल में बंद किया जाना आवश्यक है। 

और मजे की बात बताऊं। भारतीय इतिहास में सम्राट अशोक पहले थे जिन्होंने मांसाहार को प्रतिबंधित किया, जीवहत्या निषिद्ध हो गई। सभी चौपायों के वध पर राज्यादेश से रोक लगाई गई, यहां तक कि पशु-पक्षियों की सूची जारी कर दी गई कि यदि किसी ने किसी पक्षी जैसे मुर्गा या मछली को भी मार दिया तो उसे मृत्युदंड दिया जाएगा। 

सोचकर देखिए कि जब अशोक का जीववध प्रतिबंध कानून लागू हुआ होगा तब क्या गुजरी होगी इस देश के मांसाहारियों पर, जीववध के जरिए गुजारा करने वाली जातियों पर? लेकिन इस मुद्दे पर अशोक के शिलालेख में स्पष्ट आदेश होने के बावजूद कोई बहस नहीं है, कोई शोध नहीं है। कोई बोलने को राजी नहीं है। आखिर क्यों? गलती से भी जीवहिंसा किसी से हो गई तो उस कुटुंब के साथ क्या गुजरी?

इसी कार्य के लिए तो उसने विशेष रूप से रज्जुक यानी राजुक को अधिकार संपन्न बनाया कि मौके पर जाकर तीन दिन के भीतर दण्ड सुनिश्चित करे।

अब जो मांसाहारी थे, या जिनसे भूलवश पर पशु-पक्षी को मार देने का आरोप आ गया तो उन्हें फौरन गांव से बाहर की बस्ती में बहिष्कृत कर डाला जाने लगा। राजुक लोग सम्राट का फरमान सुनाकर सजा सुनाने लगे। तब पहली बार ग्रामों में ऐसी बस्तियां बनीं जिनमें वो बहिष्कृत लोग रखे गए जिन्हें अशोक के राजुकों ने दण्ड सुनाने के बाद क्षमादान कर जीवित रहने की इजाजत दी, किंतु उन्हें गांव के लोगों से रिश्ता रखने की भी इजाजत नहीं थी। शिलालेखों का संकेत तो यही है।

मैं तो इतिहास के सारे विद्वानों से कहता हूं कि इस मुद्दे पर लेखनी खामोश क्यों हो जाती है। यदि मैं गलत हूं तो बता दीजिए, मैं तो शिलालेख लेकर बात कर रहा हूं, चुनौती है कि कोई मुझे गलत साबित कर दे। या इतना ही बता दे कि सम्राट अशोक की करनी को संदेह के दायरे से बाहर कैसे किया जा सकता है कि उनके कारण भारत में बहिष्कृत जातियों की तस्वीर पहली बार दिखाई देती है?  

इस पर शोधपूर्ण आलेख कुछ ही दिन में प्रकाशित कर दूंगा। कुछ हिस्सा फेसबुक पर मैं डाल ही देता हूं। अब यदि किसी को बहस करनी है तो थोड़ा पढ़-लिखकर बात करे। कम से कम राजुक संबंधी शिलालेखों की प्रति लेकर ही बैठे। एक एक शब्द की मीमांसा को तैयार रहे।

अब स्वामी प्रसाद मौर्य में इतनी दम तो नहीं ही है कि सम्राट अशोक को गाली बके कि उसने ब्राह्मणों का इतना आदर क्यों किया। क्यों ब्राह्मण को इतने शिलालेखों में सम्मानित किया है। कम से कम ब्राह्मणों के कहने पर तो उसने ये नहीं ही किया होगा?

खैर, एक विदुषी ने अभी मुझे उपदेश भी किया है जिनसे मैंने सवाल पूछा था कि डॉ. अंबेडकर ने ब्राह्मणवाद को लेकर कुछ कहा था तो महारवाद पर कोई टिप्पणी क्यों नहीं की?

अब तो ये सवाल गंभीर है कि ये महारवाद क्या है भला? तो मेरा सांकेतिक उत्तर है कि जब डॉ. अंबेडकर का जन्म महू सैनिक छावनी में हुआ था तो 1893 में उनके पिताजी आदरणीय रामजी सकपाल सूबेदार मेजर और महू सैनिक छावनी स्कूल के हेडमास्टर थे या नहीं थे? 

और तो और डॉ. अंबेडकर के दादा भी आर्मी में सम्मानित पद से रिटायर हुए। उनके नाना, मामा आदि भी आर्मी में ही थे। जिसे जानकारी नहीं हो तो उसे बता दूं कि शिवाजी के प्रमुख अंगरक्षकों और सैन्य संचालन में शामिल योद्धाओँ में कई महार जाति के प्रमुख योद्धा थे। महारों के एक समूह का शिवाजी के बाद मराठों से मतभेद क्यों हुआ, यह अलग कहानी है कि आखिर क्यों मराठों और महारों में दुराव बढ़ता चला गया। इसकी मीमांसा इतिहास में अवश्य होनी चाहिए, होकर रहेगी।

तो जब डॉ. अंबेडकर के पिताजी सूबेदार मेजर बने, तो उसके 30 साल पहले फांसी पर चढ़ने वाले मंगल पांडेय का भी पद नाम पता लगा लिया जाना चाहिए। वह तो महज सिपाही थे। 

जबकि महार जाति के लोग मंगल पांडेय से ऊंचे पदों पर आर्मी में नियुक्ति पा रहे थे, इसीलिए मैंने कहा कि ब्राह्णणवाद शब्द प्रयोग किया जा रहा है तो महारवाद शब्द में आपत्ति क्यों हो रही है? 

शोध के अनुसार, 1892 में ब्रिटिश आर्मी में 70 के करीब सूबेदार मेजर और सूबेदार महार जाति से जुड़े लोग थे। महार रेजीमेंट भी थी ही जिस अंग्रेजों ने 1893 के बाद भंग किया, बाद में डॉ. अंबेडकर के निवेदन पर पुनर्जीवित भी किया। 

दूसरा मुद्दा ये कि मैं जब विद्वानों से पूछता हूं कि ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र तो चार वर्ण हैं, पंचम वर्ण भी माना गया है। 
फिर इनमें सिर्फ ब्राह्मण और क्षत्रिय को ही जाति क्यों पुकारा गया, वैश्य और शूद्र को जाति क्यों नहीं कहा गया। वैश्य और शूद्र नाम की जाति आखिर कहां हैं? इनके भीतर तो सैकड़ों जातियां गिन ली गईं, लेकिन ब्राह्मण, क्षत्रिय की जातियां गायब हो गईं? तो क्या हुआ आखिर?

संभव है कि मेरी बात कुछ लोगों के गले न उतरे। फिर से समझा देता हूं कि यदि वैश्य और शूद्र वर्ण में सैकड़ों जातियां उपजातियां हैं तो क्या ब्राह्मण और क्षत्रिय की जातियां उपजातियां नहीं हैं? मेरा कहना है कि हैं, पर सवाल है कि वह कहां हैं? कागज पर तो नदारद हैं। मेरा ख्याल है कि विद्वान लोग विचार करेंगे, जवाब मिलेगा।

और अंत में, कंटहा ब्राह्मण को भूल मत जाना। वही महापातर ब्राह्मण, जिसे गांव में घुसते ही दलित जातियों के लोग भी कंकर मारना, दुरदुराना नहीं भूलते। वही जो वास्तविक अछूत है लेकिन सामाजिक न्याय के मसीहा उसे शेड्यूल कास्ट में जगह देने को राजी नहीं हैंं, क्योंकि उसके नाम के साथ ब्राह्मण जो जुड़ा है। उसकी छाया से भी सारी ओबीसी, एससी जातियां भागती हैं। किसी शुभ में उसे ब्राह्मण और ठाकुर भी नहीं पूछते रहे सदियों तक। केवल मृत्यु के समय ही उसे गांव के बाहर बुलाया जाता है, पूरे घर का शोक उसे सौंपकर उसकी विदाई कर देने की रवायत आज भी है।

लेकिन, यहां सामाजिक न्याय के मुंह में ताला लग जाता है और संविधान के अनुच्छेदों को उसकी भावना के अनुसार पूर्ण रूप से लागू करने में किंतु-परंतु आ जाता है।
इसलिए कह रहा हूं कि ब्राह्मणवाद शब्द कर रहे हो तो सवाल सुनने के लिए तैयार भी रहो। लोग भी जवाब सुनेंगे, और पूछेंगे कि यदि अछूत होने से ही शेड्यूल कास्ट की सूची बनी थी तो महापातर ब्राह्मण का तो पहला हक बनता था। और ऐसी जातियां बहुत सी हैं जिन्हें न्याय की प्रतीक्षा है।

आखिर संसद और राजनीति क्यों खामोश हो जाती है? जवाब दिया जाना चाहिए। किसी महापात्र ब्राह्मण के घर जाकर, उसका पानी पीकर ही उसे संतुष्ट करने में किसी सामाजिक न्याय के मसीहा को क्या मुश्किल है।


Monday, 14 September 2026

कृष्ण कुब्जा से संभोग

आर्यसमाजी - ब्रह्मवैवर्त पुराण कृष्ण जन्म खंड अध्याय 72 में कहा गया है कि कृष्ण ने कुब्जा से संभोग करके वीर्याधान किया। अब कहिए, क्या पुराण ने कृष्ण को व्यभिचारी नहीं बनाया?

शचीन्द्र - इस प्रकरण में श्रीकृष्ण और कुब्जा के लिए पद प्रयुक्त हुआ है - "दंपत्ती रतिपण्डितौ"। दंपति शब्द पति-पत्नी के लिए संस्कृत में प्रयुक्त हुआ करता है, अवैध संबंध स्थापित करने वालो के लिए नहीं। यानि किसी आर्यसमाजी के घर की नियोगिनी, स्वामी दयानन्द के अनुसार, ग्यारह पुरुष नियोग के लिए चुन लेगी, तो ये सब दंपति नहीं कहलाए जाते हैं। पति-पत्नी ही दंपति कहे जाते हैं, जो कि यहाँ कहे गए हैं। अतः दंपति अगर समागम करें, तब वह व्यभिचार कहा हुआ?

एवं यदि पुराणकार व्यभिचार दिखाना चाहते, तो अगम्या, व्यभिचार आदि शब्दों का प्रयोग करते, किन्तु दंपति शब्द प्रयुक्त किया। इसके अतिरिक्त इस प्रकरण में 'भर्ता', 'कान्त', 'कान्ता', 'दंपति' आदि शब्द जो प्रयुक्त हुए हैं, वे व्यभिचार में प्रयुक्त नहीं होते हैं। अतः स्पष्ट है कि पुराण या पुराणकार यहाँ व्यभिचार नहीं कह रहे हैं, किन्तु आर्यसमाजी ही बलात् श्रीकृष्ण को व्यभिचारी कहना चाहते हैं।

एवं पूर्वापर प्रकरण भी देखा जाना चाहिए, उसे छोड़कर निष्कर्ष निकालना अन्याय है। नियम है - "सन्दिग्धेषु वाक्येषु प्रकरणं बलवत्तरम्।" अर्थात् यदि संदेह हो, तो सम्पूर्ण प्रकरण से वास्तविक अभिप्राय प्रकट होता है।

इसी प्रकरण में वर्णित है कि शूर्पणखा ने भगवान् को पति-रूप में प्राप्त करने के लिए उत्कट इच्छा से तप किया। तब ब्रह्माजी ने वरदान दिया था - "जन्मान्तरे च भर्तारं प्राप्स्यसि त्वं वरानने"

अर्थात् अगले जन्म में भगवान् तेरे पति होंगे। यही शूर्पणखा अगले जन्म में कुब्जा हुई - "देहं तत्याज सा वह्नौ सा च कुब्जा बभूव ह"

अतः यहाँ कोई आकस्मिक अवैध संबंध का प्रकरण नहीं है, न ही व्यभिचार है। पूर्वजन्म के वरदान की सिद्धि का यह प्रसंग है, जिसमें भगवान् पति-रूप में कुब्जा को प्राप्त हुए।

अब विचार करें, क्या आर्यसमाजी इसी प्रकरण की इस कथा को मानेंगे? उत्तर है - नहीं। वे पुराण की इस कथा को नहीं मानेंगे, किन्तु इसी प्रकरण के एक अंश को मानकर श्रीकृष्ण और पुराण पर दोष लगाएंगे क्योंकि इनका उद्देश्य समाधान नहीं, बल्कि श्रीकृष्ण और पुराण पर दोष लगाना ही है।

अतः यहाँ न तो व्यभिचार कहा गया है और न हुआ है? संबंध की वैधता का निर्णय शारीरिक संयोग के वर्णन से नहीं, उसके शास्त्रीय और प्रसंगगत स्वरूप से निश्चित  होता है।

दरअसल ये मूर्ख शृंगार को ही व्यभिचार समझ लेते हैं। ऐसा नहीं होता है। महाभारत में दुष्यन्त और शकुन्तला के गान्धर्व-विवाह का वर्णन है, उसे कहीं व्यभिचार नहीं कहा गया है।

यह भी देखना चाहिए कि इस पुराण में श्रीकृष्ण को ब्रह्म माना गया है। तब इस दृष्टि से भी विचार करना होगा। वीर्याधान शब्द में 'वीर्य' का अर्थ क्या होगा, जिसका आधान कुब्जा में किया गया?

यह वही वीर्य है, जिसके लिए आर्यसमाजियों की महिलाएँ परमात्मा से प्रार्थना करती हैं - "वीर्यमसि वीर्यं मयि धेहि"

तब क्या समाजी महिलाएँ अपने परमात्मा से शारीरिक वीर्य को अपने शरीर में प्रविष्ट कराने की प्रार्थना कर रही होती हैं?

इसी वीर्य का आधान श्रीकृष्ण ने कुब्जा में किया। फलस्वरूप उसकी सद्गति का यहाँ वर्णन है।

इस प्रकरण का परिणाम परमगति प्रकट हुआ है, कामतृप्ति नहीं। क्योंकि किसी भी कथा या प्रकरण का उद्देश्य यदि काम-भोग आदि दिखाना हो, तो भला निष्कर्ष मोक्ष, भगवत्प्राप्ति आदि क्यों उपसंहार में होगा?

अतः ब्रह्मवैवर्त पुराण के कुब्जा-प्रसंग से श्रीकृष्ण व्यभिचारी सिद्ध नहीं होते,किन्तु ऐसा झूठा आक्षेप करने वाले दयानन्दी अवश्य दयानन्द के कथित एकादश-नियोग-रूपी व्यभिचार से उत्पन्न हुए लगते हैं, अतः इन्हें सर्वत्र व्यभिचार ही दिखता है। नियम है - "तात्पर्यस्य ग्रहणम्" - ग्रंथकार का अभिप्रेत अर्थ भाव ग्रहण करना चाहिए, किन्तु ये मूर्ख सदैव उल्टा अर्थ ही ग्रहण करते हैं।

।। जय श्री राम ।।