Monday, 10 August 2026

वाणी और मन

#स्पीच_एंड_माइंड: वाणी और मन 

ॐ वाक् मे मनसि प्रतिष्ठिता।
मनो मे वाचि प्रतिष्ठिता।।
- सरस्वती रहस्योपनिषद

ऋषि का आग्रह है कि मेरी वाणी मेरे मन मे प्रतिष्ठित हो जाय। और मेरा मन मेरी वाणी में प्रतिष्ठित हो जाय। कहने का तात्पर्य है वाणी और मन मे तालमेल बैठ जाए। दोनों में भेद न रहे। दोनों एक ही हो जाय। 

हमारे विचार ही उपद्रव हैं। हमारे अंदर चलने वाले समस्त झगड़ा, झन्थट, अशांति, बेचैनी, सब के सब विचारों की देन है।
 मन का स्वभाव है कि वह खाली नहीं बैठ सकता। उसको कोई सहारा चाहिए। माइंड अर्थात बन्दर। उसे उछल कूद ही पसंद है। मन को चाहिए उपद्रव, व्यस्तता, ऑक्यूपेशन। वे कहते हैं खाली दिमाग शैतान का घर। Empty mind is devil's workshop. 

और वाणी है संसार मे होने वाले झगड़ा झंझटों की जड़। सारे विवादों की जड़ है वाणी। और हमारी वाणी का शत प्रतिशत हिस्सा प्रायः प्रतिक्रिया है, रिएक्शन है। क्योंकि हमारा स्वभाव ही रैक्टिइनरी है। हमारी वाणी प्रायः किसी न किसी विचार या किसी न किसी व्यक्ति की प्रतिक्रिया में निकलती है। यंत्रवत, रोबोटिक।
 हम हर बात पर रियेक्ट करते हैं। हर उस बात पर, जो हमें उकसाती है, उस पर हम रियेक्ट करते हैं - पहले माइंड से, फिर वाणी से।

 रियेक्ट क्यों करते हैं? इसलिए कि हमने पहले से तय कर रखा है कि सही क्या है गलत क्या है। हमने संसार को अपने लाइक और dislike मे बांट रखा है।

"इन्द्रियस्यइन्द्रियर्थेषु राग द्वेष व्यवस्थितौ" - भगवतवीता। हमारा जब भी किसी वस्तु व्यक्ति भाव या विचार से साक्षात्कार होता है तो हम निर्णयात्मक रूप से उसे या तो पसंद करते हैं या नापसंद। अपने संस्कारों, संस्कृतियों, शिक्षा आदि के कारण ऐसा होता है। यह सामान्य बात है। लाइक और dislike हमारी मनोदशा का अंग है। यह प्राकृतिक स्वभाव है माइंड का। across the globe mind works with this inherent attitude. So mind is not only individual but cosmic too. ऐसे ही हम संसार को देखते हैं। जिसको अटटीच्यूड कहते हैं आजकल। 

ऋषि कहता है कि उसकी वाणी उसके मन मे प्रतिष्ठित हो जाय। अर्थात जो मन मे हो वह ही वाणी से निकले। वही मुखरित हो तो मन में विचार चल रहा हो। 

 लेकिन यदि ऐसा हो तो संसार मे उपद्रव खड़ा हो जाय। कोई मिलता है, उसके लिए हमारे मन मे क्रोध है, घृणा है, अनादर है, उसका गला दबाने की इच्छा हो रही है मन में, लेकिन उसे व्यक्त नहीं कर सकते? हम कहते हैं - अहोभाग्य मित्र, बड़े दिनों बाद दर्शन हो रहे हैं। वह भी प्रतिक्रिया में यही बोलेगा। परंतु संभबतः उसके अंदर भी हमारे प्रति वही भाव और विचार हों मन मे। इसलिये हम मुखौटा ओढ़ लेते हैं, सभ्यता का मुखौटा, असली अटटीच्यूड नहीं दिखाते उसे अपना। हम कहते हैं कि अहोभाग्य मित्र, बड़े दिन बाद आपके दर्शन हो रहे हैं। 

बारम्बार यही अभ्यास करते करते धीरे धीरे ऐसा ही व्यक्तित्व हमारा बन जाता हैं - झूंठा व्यक्तित्व। बाहर से कुछ और अंदर से कुछ और। इसको हम पर्सनालिटी बिल्डिंग कहते हैं। लेकिन यह बेचैनी और अशांति की जड़ है। क्योंकि यह विभक्त व्यक्तित्व है। साइकेट्रिस्ट इसे कहते हैं - split Personality. Dissociated Personality Disorder ( भूल भुलैया नामक फ़िल्म इसी पर बनी है) 

इसीलिये ऋषि की प्रार्थना है कि जो मेरे मन मे हो, वही मेरी वाणी में हो। वाणी से वही बात निकले - जो मेरे मन मे हो। चाहे भला और चाहे बुरा। 

लेकिन संसार मे समस्या यह है कि जो मन में हो, और यदि वही बात निकल भी आवे तो लात खाने की संभावना बढ़ती जाएगी -
"बातहिं हांथी पाइए।
बातहिं हांथी पाव।।"

तो फिर जीवन कैसे सम्भब होगा? 
मन को निर्मल करने से, यह संभव होगा कि मन में वही विचार और भाव उत्पन्न हों जिन्हें छुपाने की आवश्यकता न पड़े। वह कैसे होगा।
 
राग द्वेष, लाइक और dislike को पीछे रखकर संसार को देखने का अभ्यास करना होगा। "See the things as they are." कठिन है। तभी तो ऋषि प्रार्थना कर रहा है सरस्वती जी से। 

ऋषि की दूसरी प्रार्थना है कि मेरा मन मेरी वाणी में प्रतिष्ठित हो जाय। अर्थात मुझे जब बोलने की आवश्यकता हो तभी मेरा मन, मेरा माइंड काम करे। वरना वह शांत बैठा रहे। यह और भी कठिन है। लेकिन यह एडवांस्ड कोर्स है। पहले वाला बेसिक कोर्स था। बेसिक वाला कोर्स होने के बाद ही इस कोर्स में प्रवेश मिलेगा।
  हमारा मन तो चलता ही रहता है दिन रात। 24 घण्टे, अनवरत, दिन रात माइंड चलता ही रहता है। लेकिन माइंड और बॉडी हमारे टूल हैं, यंत्र हैं। उनको हमारे हिसाब से चलना चाहिए न?

हमारे कमरे में ए सी लगा है, पंखा लगा है, कंप्यूटर लगा है। सभी यंत्र हैं। सब हमारे हिसाब से चलते हैं। जब हम उन्हें चलाना चाहते हैं तो स्विच ऑन कर देते हैं। जब बन्द करना होता है तो स्विच ऑफ कर देते हैं।

 माइंड को भी ऐसे ही काम करने की ट्रेनिंग देनी होगी कि जब वाणी की आवश्यकता हो, जब बोलने की आवश्यकता हो तो माइंड काम करे, अन्यथा चुपचाप बैठा रहे - शांत, चैन से, आराम से - At ease, Not disease। Completely silent. शून्य, सन्नाटा। बहुत कठिन है। इसीलिए प्रार्थना की जा रही है सरस्वती जी से। 

वैदिक साइंस में जिस शक्ति को सरस्वती के नाम से पुकारा जाता रहा है, उसे आज की भाषा मे बोला जाय तो सरस्वती हमारे माइंड और वाणी को को-ऑर्डिनेट करने वाली आंतरिक ऊर्जा या शक्ति का नाम है। 

हम हर एनर्जी को प्रणाम करते हैं। परमात्मा भी हमारे अंदर है एनर्जी के रूप में। जिसे हम चेतना या चैतन्य कहते हैं - Counciousness. 
Counciousness is fundamental - Max Plank, Nobel Prize winner Quantum Physicist. 

इसीलिए हमारे शास्त्रों में सरस्वती जी की पूजा की जाती है - क्योंकि वे माइंड और वाणी की कंट्रोलर हैं। कंट्रोलर की कृपा बनी रहे तो हांथी मिल जाय पुरस्कार स्वरूप। और कृपा न बन पायी तो - हांथी के पैर के नीचे कुचले भी जा सकते हैं:

बातहिं हांथी पाइए।
बातहिं हांथी पाव।।

इसीलिये हम जब हम प्रार्थना करते हैं:

वर दे वीणा वादनि
वर दे। 

तो हम अपने अंदर की उस ऊर्जा और शक्ति से प्रार्थना करते हैं कि हे माँ मुझे ऐसा वरदान दे कि बुद्द्धि और वाणी हमें हांथी तो दिलवावे, हांथी पाव न दिलवावे।

®त

Sunday, 9 August 2026

सरस्वती पुराण ब्रह्मा ने सरस्वती

अक्सर मुस्लिम और वामपंथी दुष्प्रचार करते हैं कि ब्रह्मा ने सरस्वती से शादी किया था लेकिन जब आप उनसे पूछोगे यह किस किताब में लिखा है तब वह कहेंगे #सरस्वती पुराण में लिखा है। 

उसके बाद जब आप उनके सामने 18 पुराणों के नाम बता देंगे और फिर आप पूछेंगे इन 18 पुराणों में कोई सरस्वती पुराण तो है ही नही, तो वह गूगल पर सर्च करेगा और कहेगा #डीएनझा की किताब में लिखा है। 

यह डीएन झा, रोमिला थापर, इरफान हबीब यह भारत के सभी इतिहासकार एक ऐसी संस्था की उपज है, जो संस्था मार्कसिस्ट हिस्टोग्राफी कहलाती है।

चीन में कम्युनिस्ट पार्टी के अधिवेशन में वामपंथी नेताओं ने एक प्लानिंग बनाया कि भारत जैसे देश पर वामपंथ का शासन कैसे हो सकता है क्योंकि भारत के युवा वामपंथियों के जाल में इतनी आसानी से नहीं फंसने वाले है।

तब एक क्यूबा का वामपंथी जिसका नाम में भूल रहा हूं उसने कहा था कि हमें 10 साल या 20 साल की प्लानिंग नहीं करनी होगी, हमें सबसे पहले जिस भी देश पर कब्जा करना है उस देश के इतिहास को विकृत करना पड़ेगा, उस देश के शिक्षा संस्थानों में घुसना पड़ेगा । फिर उन शिक्षा संस्थानों में पढ़ने वाले बच्चों में हम उनकी मूल संस्कृति मूल धर्म के प्रति ऐसा जहर बोयेंगे कि वह धीरे-धीरे वामपंथी विचारधारा का हो जाएगा । इसके लिए हमें कम से कम 50 से 80 साल की प्लानिंग लेकर चलनी होगी। 

 जब भारत को आजादी मिली तब वामपंथी दलों ने नेहरू से एक समझौता किया । समझौता ये कि आप देश चलाइए हम आपको देश चलाने में कोई डिस्टर्ब नहीं करेंगे और हमें आप देश के कुछ शिक्षा संस्थान दे दीजिए, इतिहास लिखने का काम दे दीजिए और हमारी पसंद का शिक्षा मंत्री नियुक्त करते रहिए। 

और आप जानते हैं कि देश की आजादी के बाद भारत का जो पहला शिक्षा मंत्री बना उसके पास कोई डिग्री नहीं थी बल्कि उसके पास मुफ्ती की डिग्री थी, वह मक्का में पैदा हुआ था और 30 साल से मक्का की मस्जिद में तकरीरें देता था। ऐसे व्यक्ति यानी मौलाना अबुल कलाम आजाद को देश का पहला शिक्षा मंत्री बनाया गया जो कट्टरपंथी हनफी की विचारधारा का मुस्लिम था और सऊदी अरब का आधिकारिक नागरिक था। 

उसके बाद वामपंथियों ने भारतीय इतिहास प्रतिष्ठान से लेकर जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी, दिल्ली यूनिवर्सिटी तमाम जगहों पर कब्जा किया। अपने विचारधारा के इतिहासकारों से किताब लिखवाई और यह सारी किताब झूठ का पुलिंदा साबित हुई।

नेहरू के बाद इंदिरा गांधी ने भी इस परंपरा को जारी किया इंदिरा गांधी ने भी वामपंथियों को खुली छूट दे दिया कि वह इतिहास को विकृत करते रहें, अपने मनपसंद शिक्षा संस्थानों में जो चाहे वह करते रहें बस उन्हें सत्ता में कभी डिस्टर्ब ना करें। इसीलिए वामपंथियों ने इंदिरा गांधी के खिलाफ कभी कोई आवाज नहीं उठाई बल्कि इन वामपंथियों ने आपातकाल का समर्थन किया था। आपको जानना चाहिए कि एक भी वामपंथी नेता आपातकाल के समय जेल नहीं गया था।

मार्क्सवादी इतिहास इतिहासकार में से सबसे बड़े इतिहासकार प्रोफेसर डीएन झा की गवाही राम मंदिर केस में हुई थी उन्होंने बयान दिया था राम कभी हुए ही नहीं थे मुस्लिम पक्ष ने प्रोफेसर डीएन झा को अपनी ओर से अदालत में पेश किया था।

डीएन झा ने अदालत में कहा कि उन्होंने जो शोध किया है उसके अनुसार भगवान राम अयोध्या में कभी थे ही नहीं, भगवान राम एक काल्पनिक हैं। उन्होंने यह भी दावा किया कि उनके ही शोध के आधार पर केंद्र की तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने रामसेतु तोड़ने का आदेश दिया था और सुप्रीम कोर्ट में जो हलफनामा दायर किया था कि भगवान राम काल्पनिक है वह मेरी ही शोध थी। 

हिंदू पक्ष के वकील ने डीएन झा का एक सेमिनार में दिया गया वीडियो चलाया जिसमें वह भगवान राम को शराबी और मांसाहारी बता रहे थे। उसके बाद जज ने उनसे सवाल किया कि आप एक व्यक्ति को काल्पनिक बताते हैं फिर दूसरे सेमिनार में उसी व्यक्ति को शराबी और मांसाहारी बताते हैं, ऐसा कैसे हो सकता है कि जो व्यक्ति काल्पनिक है तो आपने यह कैसे शोध कर लिया कि वह शराबी और मांसाहारी भी है? उसके बाद डीएन झा की बोलती बंद हो गई और उनकी गवाही को और उनके रिसर्च को सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया।

अभी रक्षाबंधन के दिन तमाम अखबारों में प्रोफेसर इरफान हबीब ने जो इसी मार्कशिष्ट हिस्ट्रोग्राफी के जुड़े हुए हैं, उन्होंने एक लेख लिखा कि रक्षाबंधन के दिन अकबर से लेकर जहांगीर के दरबार में लाखों महिलाएं आती थी और मुगल बादशाह सबसे राखी बधवाते थे।

 जबकि सच्चाई यह है कि अकबर ने अपनी सगी फुफेरी बहन जो बैरम खान की पत्नी थी। जब अकबर छोटा था तब से बैरम खां और बैरम खान की पत्नी सलीमा सुल्ताना बेगम अकबर की संरक्षक थी। अकबर ने अपने ही बहनोई बैरम खां का कत्ल करवा कर अपनी सगी फुफेरी बहन से निकाह कर लिया। 

अब ऐसे दरिंदे मुगलों के दरिंदे आचरण को किस तरह से यह इतिहासकार छुपाकर एक इनकी शानदार छवि बनाने की कोशिश करते हैं सोचिए ।
भारत के इतिहासकारों ने जो गंदगी फैलाई है उसे मिटाने में कई सदी लगेगी। 

साभार

प्रतीकों की मौन भाषा और उसका गहरा महत्व

प्रतीकों की मौन भाषा और उसका गहरा महत्व
मानव सभ्यता के विकास के साथ ही अभिव्यक्ति के साधन भी विकसित हुए। आज हम संवाद के लिए जिस लिखित या मौखिक भाषा का उपयोग करते हैं, वह विचारों के आदान-प्रदान का सबसे प्रचलित माध्यम अवश्य है, परंतु वह एकमात्र माध्यम नहीं है। "अधिकतम लोग प्रतीकों का महत्व नहीं समझते हैं, जबकि सबसे अधिक महत्वपूर्ण बात प्रतीकों में ही कही जाती है।" यह कथन इस सत्य को उजागर करता है कि भाषा की सीमाएँ जहाँ समाप्त होती हैं, वहाँ प्रतीकों की अनंत और गहरी दुनिया शुरू होती है।
भाषा का विस्तृत स्वरूप: शब्दों से परे अभिव्यक्ति
सामान्यतः हम भाषा को केवल व्याकरण, शब्दों और वाक्यों के दायरे में बांधकर देखते हैं। हमें लगता है कि जो कुछ भी कहा या लिखा जा रहा है, वही भाषा है। लेकिन वास्तविकता इसके विपरीत है। भाषा केवल अक्षर-आधारित शब्द नहीं होती; बल्कि अंक, चित्र, रंग, ध्वनि और इशारे भी अभिव्यक्ति के सशक्त साधन हैं।
एक रोता हुआ बच्चा, किसी सड़क किनारे लगा ट्रैफिक सिग्नल, या आसमान में उड़ता हुआ सफेद कबूतर—ये सभी बिना एक भी शब्द बोले बहुत कुछ कह जाते हैं। जब शब्द अपनी सीमाओं के कारण गूंगे होने लगते हैं, तब प्रतीक मुखर होकर सामने आते हैं।
प्रतीकों की अपनी एक विशिष्ट भाषा क्यों होती है?
प्रतीक केवल आकृतियाँ नहीं हैं, बल्कि वे संघनित विचारों, भावनाओं और संस्कृतियों के संवाहक हैं। प्रतीकों की भाषा की अपनी कुछ प्रमुख विशेषताएं होती हैं:
 सार्वभौमिकता : शब्दों की दीवारें भाषा, देश और काल की सीमाओं में बँधी होती हैं। हिंदी जानने वाला व्यक्ति जापानी नहीं समझ सकता, लेकिन प्रेम का प्रतीक (हार्ट शेप) या खतरे का प्रतीक (खोपड़ी और हड्डियाँ) पूरी दुनिया में एक ही अर्थ रखता है।
 संक्षिप्तता में गागर भरना: एक पूरा ग्रंथ या दर्शन जो बात सैकड़ों पन्नों में समझाता है, वह बात एक प्रतीक एकाएक स्पष्ट कर देता है। उदाहरण के लिए, न्याय की देवी की आँखों पर ब पट्टी और हाथ में तराजू—यह पूरा चित्र न्याय के संपूर्ण दर्शन को एक पल में बयां कर देता है।
  अचेतन मन से सीधा संवाद: प्रतीक सीधे हमारे अवचेतन मन को प्रभावित करते हैं। वे तर्क की पगडंडी से गुजरने के बजाय सीधे भावनाओं और अंतरात्मा तक पहुँचते हैं।
जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में प्रतीकों का प्रभाव
1. अंक और गणितीय प्रतीक
अंक केवल गिनती का साधन नहीं हैं, बल्कि ब्रह्मांडीय रहस्यों की चाबी हैं। शून्य (0) का आविष्कार भारत ने किया, जो केवल एक अंक नहीं बल्कि 'पूर्णता' और 'शून्यता' (निर्वाण) का द्योतक है। इसी प्रकार पाई (\pi) या अनंत (\infty) के प्रतीक गणितीय गणनाओं से परे ब्रह्मांड के अनंत विस्तार का बोध कराते हैं।
2. कला, संस्कृति और धर्म
धार्मिक और आध्यात्मिक परंपराओं में प्रतीकों का सबसे गहरा उपयोग हुआ है।
 ॐ (Om): सनातन संस्कृति में यह मात्र एक अक्षर नहीं, बल्कि संपूर्ण ब्रह्मांड की आदि-ध्वनि (प्रणव) का प्रतीक है।
 स्वास्तिक: यह प्रतीक सूर्य, ऊर्जा और मंगल का सूचक है, जो सदियों से हमारी संस्कृति का हिस्सा रहा है।
  कमल का फूल: कीचड़ में खिलकर भी पवित्र रहना—यह प्रतीक जीवन के सबसे बड़े दार्शनिक संदेश को सहजता से समझा देता है।
3. आधुनिक युग और तकनीक (डिजिटल प्रतीक)
आज की डिजिटल दुनिया पूरी तरह प्रतीकों पर टिकी है। हम चैटिंग के दौरान भावनाओं को व्यक्त करने के लिए इमोजी (Emojis) और GIFs का सहारा लेते हैं। एक मुस्कुराता हुआ चेहरा या दिल का निशान (❤️) हजारों शब्दों से अधिक प्रभावी ढंग से हमारी भावना सामने वाले तक पहुँचा देता है। इसके अलावा, रीसायकल बिन का आइकन, ब्लूटूथ का लोगो, या वाई-फाई के संकेत—यह सब आधुनिक तकनीक की अपनी प्रतीकात्मक भाषा है।
सबसे महत्वपूर्ण बातें प्रतीकों में क्यों छिपी होती हैं?
गहरे से गहरे दार्शनिक सत्य, जीवन के गूढ़ रहस्य, प्रेम, त्याग, और आध्यात्मिकता को शब्दों में पूरी तरह बांधना असंभव है। शब्दों की अपनी सीमाएँ हैं—वे बौद्धिक स्तर पर तो समझ आ सकते हैं, परंतु अनुभव नहीं कराए जा सकते।
जब कोई संत मौन रहता है, तो उसका मौन भी एक प्रतीक होता है। जब कोई प्रेमी अपनी बात बिना कहे आँखों से कह देता है, तो वह प्रतीकों की पराकाष्ठा होती है। जीवन के सबसे बड़े सत्य—जैसे जन्म, मृत्यु, प्रेम, और समर्पण—इतने विराट हैं कि उनके लिए शब्द छोटे पड़ जाते हैं। इसलिए, वे केवल प्रतीकों के माध्यम से ही महसूस किए जा सकते हैं।

प्रतीक केवल सांकेतिक चिह्न नहीं हैं, बल्कि वे हमारी चेतना की भाषा हैं। जो व्यक्ति प्रतीकों के मर्म को समझना सीख जाता है, वह जीवन की अदृश्य परतों को पढ़ने में सक्षम हो जाता है। आवश्यकता इस बात की है कि हम केवल साक्षर होने के साथ-साथ 'प्रतीक-साक्षर' भी बनें, ताकि हम उन अनकही बातों को भी सुन सकें जो शब्द कभी बयान नहीं कर सकते।

आभिजात्य और शासक वर्ग की प्रतीकात्मक कूटनीति: रहस्यों का भाषा-संसार
सत्ता, आभिजात्य वर्ग (Elite Class) और शासक वर्ग का इतिहास गवाह है कि उन्होंने कभी भी अपने सबसे महत्वपूर्ण निर्णयों, नीतियों और रणनीतियों को सीधे और सरल शब्दों में उजागर नहीं किया है। राजनीति, कूटनीति और गुप्त तंत्र (Espionage) के गलियारों में यह एक स्थापित नियम रहा है कि "जितना महत्वपूर्ण विषय होगा, उसकी अभिव्यक्ति उतनी ही प्रतीकात्मक होगी।"
शासक वर्ग अपनी कार्ययोजनाओं को सुरक्षित रखने, प्रतिद्वंद्वियों को गच्चा देने और अपने प्रभाव को बनाए रखने के लिए संकेतों, प्रतीकों और कूट-भाषा (Ciphers and Codes) का ही सहारा लेता है।
प्रतीकों के प्रयोग के पीछे की रणनीति और कारण
शासक और अभिजात वर्ग द्वारा प्रतीकों के अति-उपयोग के पीछे कई गहरे भू-राजनीतिक और मनोवैज्ञानिक कारण होते हैं:
 * प्रतिद्वंद्वियों से रणनीति छिपाना (Security through Obscurity): यदि राजा या शासक अपनी अगली सैन्य चाल, आर्थिक नीति या कूटनीतिक संधि को खुले शब्दों में घोषित कर दे, तो विरोधी पक्ष या शत्रु तुरंत उसका तोड़ (Counter-strategy) ढूंढ लेगा। प्रतीकों और कोड-वर्ड्स का उपयोग यह सुनिश्चित करता है कि संदेश केवल उन्हीं तक पहुँचे जिनके लिए वह बना है।
 * सुरक्षित अस्वीकारोक्ति (Plausible Deniability): कई बार शासक ऐसे निर्णय लेते हैं जो विवादित हो सकते हैं। प्रतीकात्मक भाषा या संकेतों का लाभ यह होता है कि यदि विरोध हो या बात खुले में आ जाए, तो शासक वर्ग आसानी से कह सकता है कि "हमारे कहने का वह अर्थ नहीं था जो आपने समझा," जिससे वे कानूनी या राजनीतिक फंदे से बच जाते हैं।
 * उच्च वर्ग की विशिष्टता बनाए रखना (Elitism): अभिजात वर्ग हमेशा आम जनता और अपने बीच एक बौद्धिक या सांस्कृतिक दूरी बनाए रखना चाहता है। गुप्त प्रतीक, विशेष मुहरें (Seals), आर्म्स के कोट (Coat of Arms), और विशेष शारीरिक संकेत (Body Gestures) इस बात का प्रमाण होते हैं कि केवल एक चुनिंदा समूह ही इन रहस्यों को समझ सकता है।
इतिहास और राजनीति में प्रतीकों का खेल
1. राजमुहरें और शाही प्रतीक (Royal Seals and Insignia)
प्राचीन और मध्यकाल में राजाओं के आदेशों, फरमानों और संधियों पर लगने वाली राजमुहरें (Royal Seals) केवल उनके हस्ताक्षर मात्र नहीं थीं, बल्कि वे सर्वोच्च सत्ता का प्रतीक थीं। एक विशेष धातु या अंगूठी से लगने वाली वह छाप बता देती थी कि आदेश सीधे सिंहासन से आया है। यदि कोई उस प्रतीक की नकल करता था, तो उसे राजद्रोह मानकर मृत्युदंड दिया जाता था, क्योंकि वह प्रतीक सत्ता की चाबी था।
2. कूटनीति और गुप्त संदेश (Diplomatic Ciphers)
युद्ध के मैदान में या दो देशों के बीच संधियों के दौरान राजाओं के राजदूत गुप्त संकेतों और प्रतीकों में पत्र भेजते थे। इन पत्रों को पढ़ने के लिए एक विशेष कुंजी (Decoder Key) होती थी, जो केवल शासक और उसके वफादार मंत्री के पास होती थी। यदि दुश्मन के हाथ संदेश लग भी जाए, तो वह केवल निरर्थक शब्दों या चित्रों का समूह प्रतीत होता था।
3. गुप्त संगठन और लॉज (Secret Societies & Fraternities)
इतिहास के सबसे प्रभावशाली आभिजात्य समूहों—चाहे वे फ्रीमेसन (Freemasons), इल्यूमिनाटी, या गुप्त राजनैतिक संगठन हों—उन्होंने पूरी तरह से प्रतीकों, इशारों (Handshakes) और ज्यामितीय आकृतियों पर अपनी संरचना खड़ी की है। वे सार्वजनिक रूप से आम आदमी की तरह रहते हैं, लेकिन उनके विशेष प्रतीक उन्हें पहचान दिलाते हैं कि कौन उनका अपना है और कौन विरोधी। आज भी कॉर्पोरेट घरानों के लोगो और राजनीतिक दलों के चुनाव चिन्ह इसी छिपे हुए मनोवैज्ञानिक प्रभाव का विस्तार हैं।
आधुनिक युग में प्रतीकात्मक राजनीति और छद्म संकेत (Dog Whistling)
समकालीन राजनीति और उच्च वर्गीय निगमों (Corporate Giants) में प्रतीकों का खेल और अधिक सूक्ष्म हो गया है। आज इसे राजनीति विज्ञान में 'डॉग व्हिसलिंग' (Dog Whistling) कहा जाता है।
 * राजनीतिक इशारे: राजनेता अपने भाषणों में ऐसे विशेष शब्दों, मुहावरों या संकेतों का प्रयोग करते हैं जो आम जनता को सामान्य लगेंगे, लेकिन उनके विशेष समर्थक या अभिजात वर्ग उसका असली भू-राजनीतिक अर्थ तुरंत समझ जाते हैं।
  आर्थिक और कॉर्पोरेट संकेत: बड़ी कंपनियाँ अपनी बैठकों में जिस शब्दावली और ब्रांडिंग का उपयोग करती हैं, वह उनके बाजार के प्रतिद्वंद्वियों को भ्रमित करने के लिए डिज़ाइन की जाती है। वे क्या करने वाले हैं, इसकी भनक केवल उनके शेयरधारकों और बोर्ड के सदस्यों को ही होती है।

सत्ता के गलियारों में यह अकाट्य सत्य है कि शब्द शोर मचाते हैं, और प्रतीक दिशा तय करते हैं। शासक वर्ग कभी भी अपनी असली कार्ययोजना को खुली किताब नहीं बनने देता। वे जानते हैं कि जो योजना जितनी अधिक सुरक्षित रखनी होगी, उसे उतना ही गहरा प्रतीकों के आवरण में छिपाना होगा। इसलिए, यदि राजनीति या इतिहास की गहरी चालों को समझना है, तो केवल बोले गए शब्दों को नहीं, बल्कि पर्दे के पीछे चल रहे संकेतों और प्रतीकों को पढ़ना सीखना होगा।
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Saturday, 8 August 2026

भारत के लेखक और स्त्री प्रसंग

हिप्पोक्रेट वामपंथी कबीले की कैफ़ियत - 3 

दयानंद पांडेय 

रामविलास शर्मा , नामवर सिंह , राजेंद्र यादव , मनोहरश्याम जोशी जैसे अध्ययनशील लोग भी ग़ज़ब थे। सहमति-असहमति होती रहती है। पर भाषा में इतना अश्लील , इतना अभद्र , इतना दरिद्र , इतना विपन्न होना क्या ज़रूरी होता है ? मुद्राराक्षस भी बहुत लोगों से बहुत मुद्दों पर अकसर नाराज रहते थे। मैं ने एक लंबा लेख भी लिखा है : हिंदी के चंबल का एक बाग़ी मुद्राराक्षस। पर मुद्रा ने कभी किसी के लिए ऐसी लंपट भाषा का इस्तेमाल नहीं किया। न बोलने में , न लिखने में। आप को याद ही होगा दिनमान में सर्वश्वर दयाल सक्सेना , श्रीकांत वर्मा की रघवीर सहाय से कितनी घोर असहमति थी। एक ही दफ़्तर में काम करते हुए कई बार युद्ध जैसी स्थिति आ जाती थी। लेकिन बोल कर या लिख कर किसी ने ऐसी कोई दरिद्रता नहीं दिखाई। न सहाय जी ने , न  श्रीकांत वर्मा और सर्वेश्वर जी ने। तब जब कि रघुवीर सहाय इन दोनों के बॉस थे , बतौर संपादक। धर्मयुग में कन्हैयालाल नंदन और धर्मवीर भारती के बीच एक साथ काम करते हुए लंबा शीतयुद्ध चला। पर दोनों ने कभी किसी से कोई बिलो द बेल्ट बात नहीं की , न कभी कहीं कुछ ऐसा लिखा। रवींद्र कालिया ने काला रजिस्टर जैसी कहानी लिखी , धर्मयुग के माहौल पर। पर भारती जी के लिए संकेतों में भी कुछ अभद्र नहीं लिखा। गो कि खलनायक वही थे कहानी के। बाद में ग़ालिब छुटी शराब में भी रवींद्र कालिया ने धर्मवीर भारती से और तमाम अन्य से अपनी मुश्किलों असहमतियों का वर्णन किया है। पर भाषा की मर्यादा बनाए रखी। रघुवीर सहाय के बाद कन्हैयालाल नंदन जब दिनमान के संपादक बनाए गए तो दिनमान में एक तरह से विद्रोह का मंज़र था। लेकिन नंदन जी ने अपनी विनम्रता से सारे विद्रोह को समाप्त कर दिया। तब जब कि पराग और सारिका के समय में उन से जल्दी किसी का मिल पाना कठिन हुआ करता था। पर दिनमान में वह सर्वेश्वर जी जैसों को अपने केबिन में बुलाने के बजाए , उन की टेबिल पर खुद पहुंच जाते थे। ऐसा अनेक बार देखा मैं ने। बाद में तो प्रबंधन से कह कर पराग का संपादक बनवा दिया सर्वेश्वर जी को। और भी बहुतेरी बातें हैं। फिर कभी।  

फिर विष्णु जी , आप किस मान्यता और मान्यता के कीड़े की बात कर रहे हैं ? अरे हम लोकतंत्र में जीते हैं। उस लोकतंत्र में जिस में संसद सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले को बदल देती है। और पसंद न आने पर जनता संसद के लोगों को बदल देती है। विधानसभा के लोगों को बदल देती है। प्रधान मंत्री , मुख्य मंत्री बदल देती है। हम उसी जनता जनार्दन यानी अपने आदरणीय पाठकों के लेखक हैं। किसी हिप्पोक्रेट वामपंथी कबीले के लेखक नहीं हैं। आप की मुश्किल आसान करने के लिए बताता चलूं कि हमारे आदरणीय पाठकों ने हमें हमारा समुचित प्राप्य सर्वदा ही दिया है। दिल खोल कर दोनों हाथ से दिया है। हमारे लेखकीय अवदान को जो चाहिए , सब कुछ दिया है। कहीं ज़्यादा दिया है। इतना कि एक पोस्ट लिख देता हूं एक ग़रीब और बीमार बच्ची के इलाज के लिए तो हफ्ते-दस दिन में लोग थोड़ा-थोड़ा कर के तीस-लाख से अधिक रुपए उस बच्ची के पिता अकाऊंट में डाल देते हैं। बीच कोरोना की बात है यह। जानिए कि हमारे ब्लॉग सरोकारनामा , जिस में सिर्फ़ मेरा लिखा हुआ ही होता है , बारह लाख से अधिक की हिट है। दुनिया भर में लोग पढ़ते हैं। देश ही नहीं , दुनिया भर की लाइब्रेरियों में मेरे उपन्यास और अन्य किताबें उपस्थित हैं। तमाम अन्य साइटों पर भी। 

तो क्या मुफ़्त में ? 

तेरह उपन्यास समेत विभिन्न विधाओं में छ दर्जन से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हैं मेरी। बिलकुल अभी-अभी वाणी प्रकाशन से विपश्यना में प्रेम उपन्यास छप कर आया है। जिस की ख़ूब चर्चा है। हां , वामपंथी कबीले के तमाम लेखकों की तरह  पैसे दे कर किताब नहीं छपवाता। गूगल पर एक बार मेरा नाम लिख कर देखिए , आप की तमाम शंकाओं का समाधान हो जाएगा। बहुत से प्रश्नों का उत्तर मिल जाएगा। अब और कैसी मान्यता खोज रहे हैं आप। कृपया बताएं। किसी हिप्पोक्रेट वामपंथी कबीले का ? तो पुन:-पुन: दुहराता हूं कि जानिए हम किसी हिप्पोक्रेट वामपंथी कबीले के लेखक नहीं हैं , न उन से किसी मान्यता की तलब है। 
हिंदी थिसारस के लिए जाने जाने वाले अरविंद कुमार घोषित कम्युनिस्ट थे। काफी समय तक पार्टी के कार्ड होल्डर भी रहे। लेकिन हिप्पोक्रेट वामपंथी नहीं थे। मैं ने उन के साथ सर्वोत्तम रीडर्स डाइजेस्ट में काम किया है। सर्वोत्तम रीडर्स डाइजेस्ट अमरीकी पत्रिका थी। अरविंद कुमार ने मेरे कई उपन्यासों पर विधिवत लिखा है। बिना कहे , अपने आप लिखा है। राजेंद्र यादव ने हंस में न सिर्फ़ मेरी कहानी छापी , किताबों की समीक्षा भी छापी। तेरी मेरी उस की बात के तहत चार पृष्ठ की संपादकीय भी मेरे लिए लिखी। बिना कुछ कहे लिखी। अरविंद कुमार से और विषैले लोग भले परिचित न हों पर आप तो विष्णु जी अच्छी तरह परिचित हैं। उन के लेखन , आचरण और व्यवहार से भी। अरविंद कुमार बहुत सहज और सरल थे ज़रूर पर लिखने- पढ़ने में बहुत सतर्क। आसानी से वह कुछ नहीं लिख सकते थे , किसी किताब पर। किसी दबाव में भी कभी नहीं आते थे आप की तरह। किसी के आगे झुकते नहीं थे। ख़ुद ही तय करते थे , क्या लिखना है क्या नहीं। हिंदी के चुनिंदा बेहतरीन संपादकों में शुमार हैं अरविंद कुमार। और भी कई आदरणीय लेखकों ने ख़ूब लिखा है , मेरी तमाम रचनाओं पर। मेरी आलोचना भी की है। लेकिन किसी कुंठा या हीन भावना के तहत मान्यता का कीड़ा किसी ने नहीं खोजा।  क्यों कि वह सहज ही मिली हुई है। 

फिर भी सुविधा के लिए देखें दयानंद पांडेय और उन का रचना संसार में लेखकों की सूची। यह किताब अरुण  प्रकाशन , दिल्ली ने 2015 में छापी है। जो इस लेख के साथ संलग्न है। मेरे कथा संसार पर दयानंद पांडेय का कथा संसार लंदन की शन्नो अग्रवाल ने पूरी एक किताब लिखी है। प्रेमनाथ एंड संस , दिल्ली ने 2017 में छापी है। कई विश्वविद्यालयों में पी एच डी और डी लिट् हुई है , मेरी रचनाओं पर। बहुत से शीर्ष सम्मान मिले हैं। दो लखटकिया सम्मान भी मिले हैं। जिन को पाने के लिए तमाम लोग नाक रगड़ देते हैं और नहीं पाते हैं। मुझे सहज ही मिले। कुछ लोग ऐसे ही एक सम्मान के लिए जातीय बन गए। लोहिया को फ़ासिस्ट बताते हैं , बोल कर भी और लिख कर भी। पर लोहियावादी सरकार से साहित्य भूषण पाने के लिए सारी वैचारिकी स्वाहा कर देते हैं। ख़ैर , यह उन का अपना विवेक है। उन का क्या ही ज़िक्र करना भला। 

अच्छा हिंदी में या भारतीय भाषाओं में कितने लेखक हैं जिन्हों ने हाईकोर्ट में किसी उपन्यास या किसी और रचना के लिए कंटेम्प्ट आफ कोर्ट का मुकदमा झेला हो ? पता कीजिएगा। मैं ने बरसों झेला है , कंटेम्प्ट आफ कोर्ट अपने-अपने युद्ध उपन्यास के लिए। और रवायत के मुताबिक़ माफ़ी भी नहीं मांगी। अपने-अपने युद्ध में न्याय व्यवस्था और न्याय पालिका की जिस तरह धज्जियां उड़ाई हैं , वामपंथी हिप्पोक्रेट लेखक कभी सोच नहीं सकते। साहस भी नहीं कर सकते। बीते दिनों में पाता हूं कि उदय प्रकाश के ख़िलाफ़ कोई कुछ अप्रिय लिख देता था तो उदय प्रकाश सिर्फ़ एक लीगल नोटिस भेज देते थे। और यह हिप्पोक्रेट वामपंथी घुटने के बल आ कर उदय प्रकाश से माफी मांग लेते रहे हैं। लिखे को वापस ले लेते रहे हैं। लिखना बंद कर देते रहे हैं। ऐसे तो हैं हमारे हिप्पोक्रेट वामपंथी लेखक गण। अपनी पीठ ख़ुद ठोंकना गुड बात नहीं है , जानता हूं। पर आप के प्रश्नों का शमन कहिए , समाधान कहिए ज़रूरी है। करूं भी तो क्या करूं। आप हमारे आदरणीय हैं। हमारे हितैषी हैं। 

वैसे भी विष्णु जी , बताऊं आप को कि हमें इस हिप्पोक्रेट वामपंथी कबीले की मान्यता की दरकार हरगिज नहीं।  है। बार-बार यह बात इस लिए कह रहा हूं क्यों कि वामपंथी हिप्पोक्रेटों ने साहित्य का बहुत नुकसान किया है। बर्बाद किया है। एक पाखंड गढ़ा है कि जो वामपंथी नहीं , वह लेखक नहीं। लेखन में जो वामपंथी नहीं , वह लेखक नहीं , इस भय का बड़ी धूर्तता के साथ व्यूह रचा है। वामपंथी , ग़ैर वामपंथी लेखक का फ्राड रचा है। नतीज़ा सामने है। बहुतेरे रीढ़हीन लेखक , जिन्हें लेखन का शऊर भी नहीं है , समझ भी नहीं , संवेदना से शून्य हैं , क ख ग भी नहीं मालूम , लाल सलाम बोल-बोल कर बड़े लेखक बने घूम रहे हैं। पैसा दे कर किताब छपवा रहे हैं। लेकिन रचना नहीं है इन के पास। अपने आस-पास देखिएगा तो ऐसे लाल सलामी लेखक झुंड के झुंड लहराते हुए मिलेंगे। संकोच में इन को आप कुछ कह भी नहीं सकते। कृपया सोचिएगा कि हिंदी के वामपंथी समाज को आज भी अपना कोई ब्रेख्त , कोई नेरुदा क्यों नहीं मिल सका है। उन्हीं के गीत गा कर सारा क्रांतिकारी माहौल बनाते हैं , हिंदी में। कभी इस पर भी सभी वामपंथी हिप्पोक्रेट लेखकों , कवियों को सोचना चाहिए। दुष्यंत कुमार के एक शेर में जो कहूं : तुम्हारे पाँव के नीचे कोई ज़मीन नहीं / कमाल ये है कि फिर भी तुम्हें यक़ीन नहीं। वामपंथी कबीले के पास सेक्यूलरिज्म का असली रचनाकार एक कबीर क्यों नहीं है। जो दोनों तरफ की सांप्रदायिकता पर प्रहार करे। सांप्रदायिकता क्या एकतरफा होती है ? इकहरी होती है ? तुलसीदास को गाली देने वाले तो बहुत हैं वामपंथियों के पास पर रामचरित मानस लिखने वाला तुलसीदास जैसा कोई जनप्रिय और लोकप्रिय रचनाकार नहीं है। महाभारत लिखने वाला वेद व्यास जैसा कथाकार नहीं है। वार एंड पीस लिखने वाला टालस्टाय भी नहीं। टालस्टाय जमींदार थे , गोर्की मज़दूर। यानी शोषक और शोषित। फिर भी टालस्टाय और गोर्की की मित्रता मशहूर है। आपस में सदभाव था। मतभेद ज़रूर थे पर नफ़रत और घृणा नहीं थी उन के बीच। हिंदी में कोई महाश्वेता देवी , अरुंधती राय भी क्यों नहीं है ? राहुल सांकृत्यायन , रामविलास शर्मा , निर्मल वर्मा जैसों को धकिया कर उन्हें शर्मशार करने वाला यह बंद हिंदी वामपंथी समाज तो हिंदी में एक ही नामवर सिंह का भी अपमान करने के लिए अब परिचित है।   

तमाम वामपंथी पद्म सम्मान लेने से अकसर इंकार करते रहे हैं। इंदिरा गांधी के समय से मोदी के समय तक। श्रीपाद डांगे से लगायत बुद्धदेव भट्टाचार्य तक। किस बुनियाद पर ? क्या भारतीय नहीं मानते ? तो तमाम अन्य पदों का रसगुल्ला कैसे खाते रहते हैं ? यह भी अनबूझ है। 

मालूम है वामपंथी अब सिर्फ़ इस्तेमाल होने के लिए ही रह गए हैं। वर्ष 2002 में जब अमरीका ईराक़ युद्ध हो रहा था तब अमरीका का बहुत दबाव था कि भारत अपनी सेना अमरीका की मदद के लिए ईराक भेजे। तब अटल बिहारी वाजपेयी प्रधान मंत्री थे। वह भारतीय फ़ौज ईराक नहीं भेजना चाहते थे। लेकिन दबाव जब ज़्यादा बढ़ गया तो उन्हों ने एक दिन कामरेड हरिकिशन सिंह सुरजीत को घर पर चाय पर बुलाया। सोमनाथ चटर्जी जैसे कुछ और कामरेडों को भी । कामरेड लोग जब अटल जी की चाय पर पहुंचे तो अटल जी ने खुद चाय बना कर परोसी। कामरेड लोग चौंके। सुरजीत ने कहा कि पंडत कोई ख़ास बात है क्या ? अटल जी ने कहा , हां कामरेड ! अमरीका - ईराक युद्ध में आप लोग कर क्या रहे हैं ? कामरेड लोग बोले , हम कर ही क्या सकते हैं ? अटल जी ने कहा , बहुत कुछ। कामरेडों ने पूछा , वह कैसे ? अटल जी ने कहा , सड़क से संसद तक अमरीका के ख़िलाफ़ आवाज़ तो उठा ही सकते हैं। यह काम सिर्फ़ आप ही लोग कर सकते हैं। कामरेड लोग दूसरे दिन से ही संसद से सड़क तक स्टार्ट हो गए। माहौल बनाने में वामपंथियों का आज भी जवाब नहीं है। भले खत्म हो गए हों पर माहौल बनाना नहीं भूले हैं। फिर क्या था अटल जी ने अमरीका को बता दिया कि हमारे देश में अमरीका के ख़िलाफ़ माहौल बहुत है। सेना नहीं भेज सकते। सेना भेजने पर भारत में माहौल ख़राब हो जाएगा। 

कामरेड हरिकिशन सिंह सुरजीत एक समय मुलायम सिंह यादव के पेरोल पर किस तरह काम कर रहे थे , लोग भूल गए हैं क्या ? मुलायम को प्रधान मंत्री बनाने के लिए कामरेड हरिकिशन सिंह सुरजीत ने जाने कितने शीर्षासन किए, लोग जानते हैं। वह तो वी पी सिंह ने लालू यादव को साथ ले कर मुलायम का पत्ता काट दिया। ऐसे अनेक क़िस्से हैं वामपंथियों के इस्तेमाल के। वी पी सिंह की ही एक कविता है जो वामपंथियों पर बड़ी फिट बैठती है। शीर्षक है लिफ़ाफ़ा : पैग़ाम उन का / पता तुम्हारा / बीच में फाड़ा मैं ही जाऊंगा। देखिए न बहुत तेज़ भभकने वाले जे एन यू फ़ेम कामरेड कन्हैया कैसे तो इस्तेमाल हुए। कश्मीरी आतंकियों ने इस्तेमाल किया। जेल यात्रा की। दिल्ली के वकीलों से बुरी तरह पिटे। जेल से ज़मानत पर निकले तो महत्वाकांक्षा ने अंगड़ाई ली। महाभ्रष्ट लालू के तलवे चाटने लगे। पांव छूने लगे। लोगों ने लालू को बताया कि कन्हैया आ गया पार्टी में तो तेजस्वी का क्या होगा। लालू ने कन्हैया को गेट आऊट कर दिया। कन्हैया राहुल शरणम गच्छामि हो गए। अब क्या हो गए ? वह सारी ऊर्जा , वह धार कहां बिला गई। कि चुनाव में ज़मानत ज़ब्त हो गई। तमाम कामरेडों का यही हाल है। हिंदी पट्टी से तो संसदीय राजनीति से विदा हुए दशकों हो गए वामपंथियों को। अपने गढ़ पश्चिम बंगाल में भी सिफ़र हो गए। लोग विषैला वामपंथ लिखने और कहने लग गए हैं। 

क्यों ?

वही हिप्पोक्रेसी ! अभी बहुत ज़्यादा समय नहीं बीता है साहित्य अकादमी अवार्ड वापसी के नाटक को। अशोक वाजपेयी और ओम थानवी कम्युनिस्ट नहीं हैं। पर साहित्य अकादमी के तत्कालीन अध्यक्ष विश्वनाथ प्रसाद तिवारी से विश्व कविता समारोह का अपना निजी खुन्नस निकालने के लिए कितना तो ख़ूबसूरत इस्तेमाल किया वामपंथी लेखकों का अशोक वाजपेयी ने। सब कुछ एकतरफ कर के आधार पत्र में नाम न होने के बावजूद , मैनेजर पांडेय के भरपूर विरोध के बावजूद उदय प्रकाश को साहित्य अकादमी दे दिया। यह उन का अधिकार था। कोई बात नहीं। अशोक वाजपेयी ने उदय प्रकाश से साहित्य अकादमी अवार्ड की वापसी की शुरुआत करवाई। फिर तो वामपंथी भेड़ों की कतार लग गई। कहीं पे निगाहें , कहीं पे निशाना के तर्ज़ पर देश भर में मोदी विरोध का जो माहौल बनवाया बरास्ता साहित्य अकादमी विश्वनाथ प्रसाद तिवारी को हटवाने के लिए वह तो न भूतो , न भविष्यति ! पर न विश्वनाथ प्रसाद तिवारी हटे , न सचमुच किसी ने अवार्ड वापस किया। न मोदी का कुछ हुआ। नियमत : साहित्य अकादमी अवार्ड कोई लौटा ही नहीं सकता। साहित्य अकादमी के संविधान में है यह। लोग इस बाबत लिखित सहमति भी देते हैं , साहित्य अकादमी को कि वह यह अवार्ड कभी लौटाएंगे नहीं। यह बात अशोक वाजपेयी भी जानते थे और उसे लौटाने वाले भी। पर ऐलान करने में , माहौल बनाने में क्या जाता है। अख़लाक़ की हत्या गाज़ियाबाद में हुई थी। क़ानून व्यवस्था उत्तर प्रदेश सरकार के जिम्मे थी। सब जानते थे। सभी यह भी जानते हैं कि सरकार कोई भी हो , साहित्य अकादमी में उस की एक नहीं चलती। पर वामपंथी हिप्पोक्रेट लेखक इस बात को कैसे नहीं जानते थे , आज तक समझ से बाहर है। वामपंथी गिरोह के लोग अपने को बहुत बड़ा इंटेलेक्चुवल मानते-मनवाते हैं पर हर बार , हर किसी से इस्तेमाल क्यों होते रहते हैं , समझना कुछ कठिन नहीं है। बशीर बद्र का एक शेर याद आता है :

चाबुक देखते ही झुक कर सलाम करते हैं 
शेर हम भी हैं सर्कस में काम करते हैं। 

तो आजकल यह वामपंथी शेर मोदी विरोध के बुखार में कांग्रेस के सर्कस में काम कर रहे हैं। जैसे यह वामपंथी हिप्पोक्रेटों के लिए ही इक़बाल लिख गए हैं :

'वतन की फ़िक्र कर नादां
मुसीबत आने वाली है
तेरी बरबादियों के मशविरे हैं आसमानों में
तुम्हारी दास्तान भी न होगी दास्तानों में।'

अब आते हैं आप की नाराजगी के मूल पर। प्रेमचंद पर मेरी एक पुरानी पोस्ट थी कोई चार लाइन की। बीते कई साल से वह मेरी वाल पर उपस्थित है। अभी भी है। साल दर साल। इस बार भी रिपोस्ट की। प्रेमचंद के स्त्री प्रसंग पर वह पोस्ट थी। जिस में प्रेमचंद की दूसरी पत्नी शिवरानी देवी की पुस्तक प्रेमचंद घर में के हवाले से प्रेमचंद का स्त्री प्रसंग का ज़िक्र है। शिवरानी देवी की यह किताब मैं ने विद्यार्थी जीवन में गोरखपुर की रेलवे लाइब्रेरी में पढ़ी थी। जब प्रेमचंद व्यक्तित्व और रचना दृष्टि किताब संपादित की तो अमृतलाल नागर ने जो लेख लिख कर दिया इस किताब के लिए , वह प्रेमचंद घर में किताब को ही आधार बना कर लिखा है। इस लेख में नागर जी ने भी प्रेमचंद के स्त्री प्रसंग का विवरण दिया है। जिस में प्रेमचंद की स्वीकारोक्ति है। सुविधा के लिए नागर जी के उस लेख को भी इस लेख के साथ नत्थी कर रहा हूं। 

अलीगढ़ यूनिवर्सिटी के शैलेश ज़ैदी ने तो अपनी एक किताब प्रेमचंद की उपन्यास यात्रा नवमूल्यांकन , जो अलीगढ़ यूनिवर्सिटी के अनुदान से प्रकाशित है ,  में इस प्रसंग को बहुत आगे बढ़ाया है। वेश्यागमन तक ले गए हैं। बहुत से तथ्य हैं , तर्क हैं प्रेमचंद के स्त्री प्रसंग के बाबत इस पुस्तक में। लेकिन आप जैसे मित्र इस बात पर भी उबाल खा गए। हमेशा संघी साज़िश देखने की बीमारी से पीड़ित इस बात में भी संघी एंगिल खोज लिया। ग़ज़ब है। जब आपत्ति और ऐतराज की बाढ़ आ गई तो जवाब में कुछ और पोस्ट लिखी। दिलचस्प यह कि इन पोस्टों की इतनी रिपोर्ट कर दी वामपंथी कबीले ने की और खट-खट सारी पोस्ट फेसबुक ने मिटा दी। सो इस बार यह लेख अपने ब्लॉग पर लिख रहा हूं। इस लिए भी कि जिन भी कबीलाई लोगों ने फेसबुक पर ब्लॉक कर रखा है , वह भी पढ़ना चाहें तो अपनी सुविधा से पढ़ लें। इन से , उन से मांगने का परिश्रम न करें। फिर यह लंबा लेख ब्लॉग में ही लिख पाना मुमकिन है। फ़ेसबुक पर नहीं। हो सकता है जल्दी ही एक किताब में भी हो। 

क्या इस तथ्य से कि प्रेमचंद के जीवन में कुछ स्त्री प्रसंग हैं , इस से प्रेमचंद का लेखक छोटा हो जाएगा ? सब का ज़िक्र हो सकता है तो प्रेमचंद का क्यों नहीं ? कालिदास , तुलसीदास से भी बड़े रचनाकार हैं क्या प्रेमचंद ? क्या कालिदास , तुलसीदास के स्त्री प्रसंगों की चर्चा नहीं होती ? किस की नहीं होती ? तुलसीदास के स्त्री प्रसंगों पर क्या-क्या नहीं लिखा गया है ? एक धारावाहिक तक में उन के स्त्री प्रसंग दिखाए गए हैं ? तुलसीदास आख़िरी समय में एक कोढ़ी स्त्री के साथ रहने लगे , ऐसा एक धारावाहिक में दिखाया गया। किसी ने ऐतराज किया ? कोई दंगा फ़साद हुआ क्या ? कि तुलसी को लोगों ने पढ़ना , छापना , गाना बंद कर दिया। स्त्री प्रसंग जीवन का हिस्सा है। लोहिया कहते थे अगर ज़बरदस्ती और शोषण नहीं है तो कोई संबंध अनैतिक नहीं है। सब जायज है। 

पाठ्यक्रमों में पढ़ाया गया कि लाश को नाव बना कर , नदी पार की। सांप को रस्सी समझ कर पत्नी से मिलने घर में घुस गए तुलसीदास। तो क्या तुलसीदास को पढ़ना और गाना छोड़ दिया लोगों ने ? तुलसीदास ने भारतीय जन-मानस को जितना संपन्न किया है , लगातार बदला है , तुलसीदास का जो प्रभाव है जन-मानस पर , ऐसा किसी और एक रचनाकार का हो तो कृपया बताइएगा। तुलसी के प्रशंसक , आलोचक और निंदक भी उन की रचना के आगे एक छोटी सी लकीर नहीं खींच सके हैं अभी तक। कालिदास के स्त्री प्रसंग पर तो मोहन राकेश ने आषाढ़ का एक दिन जैसा शानदार नाटक ही लिख दिया है। तो क्या कालिदास को पढ़ना लोगों ने बंद कर दिया। उन के जैसा नाटककार , वर्णन का रचनाकार ढूढे नहीं मिलता। कहते हैं कालिदास के बहाने अपनी व्यथा-कथा लिखी मोहन राकेश ने। नामवर सिंह बताते थे कि गुरुदेव तुलसीदास पर एक उपन्यास लिखना चाहते थे और तुलसीदास के बहाने अपनी व्यथा-कथा लिखना चाहते थे। गुरुदेव मतलब हजारी प्रसाद द्विवेदी। वह हजारी प्रसाद द्विवेदी जिन की भाषा का स्तर , वह लालित्य अभी तक किसी और हिंदी लेखक के हिस्से नहीं आई। थोड़ा बहुत एक अज्ञेय छू पाए हैं। पर वह भी छू कर बस निकल गए हैं। निर्मल वर्मा भी नहीं पहुंच पाए। मुक्तिबोध एक साहित्यिक की डायरी में अभ्यास ज़रूर करते हैं पर वह भी असफल हैं। 

भारतेंदु हरिश्चंद्र के स्त्री प्रसंगों के तमाम क़िस्से जन-मानस में हैं। भारतेंदु के स्त्री प्रसंगों पर तमाम किताबें लिखी गई हैं। उपन्यास लिखे गए हैं। नाम ले-ले कर लिखे गए हैं। मनीषा कुलश्रेष्ठ ने अभी हाल ही मल्लिका नाम से बहुत ही दिलचस्प और नायाब उपन्यास लिखा है। न मल्लिका का नाम छुपाया , न भारतेंदु हरिश्चंद का। भारतेंदु के वेश्या गमन का भी विस्तार से ज़िक्र है। इतना कि वेश्याओं के यहां सज-धज कर जाने के लिए अपने वस्त्र भी वह मल्लिका के घर ही रखते हैं। नीरजा माधव ने भी मल्लिका को ले कर लिखा है। वह मल्लिका जो बंकिम बाबू की ममेरी बहन थीं। बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय उस वक़्त बड़े रचनाकार ही नहीं , वंदे मातरम लिखने वाले ही नहीं , आई सी एस अफ़सर थे। तो क्या लोगों ने भारतेंदु के लिखे अंधेर नगरी , चौपट राजा और नाटकों का बहिष्कार कर दिया ? कि निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल / बिन निज भाषा-ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल। को बिसार दिया। शरत चंद्र चट्टोपाध्याय के भी तमाम स्त्री प्रसंग हैं। अमृता प्रीतम के पुरुष प्रसंग हैं। रमणिका गुप्ता के तमाम पुरुष प्रसंग हैं। अजीत कौर के पुरुष प्रसंग हैं। खुद ही इन स्त्रियों ने लिखे हैं। राजेंद्र यादव ने अपने तमाम स्त्री प्रसंग लिखे हैं। इस बाबत दो-दो किताब लिख गए हैं। मुड़-मुड़ के देखता हूं तथा एक बीमार आदमी के स्वस्थ विचार। जो कुछ छूट गया था मन्नू भंडारी ने पूरा कर दिया यह लिख कर कि तो यह भी देखा होता। कमलेश्वर की आत्मकथा में तो स्त्री प्रसंगों की भरमार है। मन्नू भंडारी ने कमलेश्वर की स्त्री कथा को भी और धार दे दिया। तो क्या कमलेश्वर का लेखक छोटा हो गया कि राजेंद्र यादव का ? मोहन राकेश , कमलेश्वर और राजेंद्र यादव की तिकड़ी थे। मोहन राकेश के भी तमाम स्त्री प्रसंग हैं। मोहन राकेश की चौथी पत्नी अनीता औलक राकेश ने अपनी आत्मकथा चंद सतरें और में अपनी मां से भी उन के संबंधों की और संकेत किया है। अपनी मां से जैनेंद्र , अज्ञेय तक को जोड़ दिया है। तो इन सब का लेखक क्या ख़त्म हो गया ? जैनेंद्र कुमार तो कहते ही थे कि लेखक को पत्नी के अतिरिक्त प्रेयसी भी चाहिए। ऐसे अनेक विवरण हैं। फ़िराक़ जैसे शायर और निराला जैसे कवियों के स्त्री प्रसंग के अलावा समलैंगिक प्रसंग भी हैं। तो क्या इस से उन का शायर , उन का कवि छोटा हो जाता है ? बंद दिमाग को खोलिए। दुनिया भर के बहुतेरे लेखकों , कवियों , राजनीतिज्ञों , अभिनेताओं , अभिनेत्रियों के जीवन यह और ऐसे तमाम प्रसंगों से भरे पड़े हैं। तो क्या उन का क़द , उन का काम घट जाता है ? प्रेमचंद भी मनुष्य थे , देवता नहीं। अच्छा देवताओं के यहां भी क्या तमाम स्त्री प्रसंग नहीं हैं ? क्या लोग उन की पूजा बंद कर चुके हैं। 

तो ? 

अभिनेता ओम पुरी के जो तमाम स्त्री प्रसंग उन की पत्रकार पत्नी ने किताब में लिखे , उसे ओम पुरी ने ही उन्हें बताए थे। इसी तरह प्रेमचंद की दूसरी पत्नी शिवरानी देवी ने जो प्रेमचंद के स्त्री प्रसंग लिखे हैं , आख़िरी समय में प्रेमचंद ने ही उन्हें बताए थे। कुछ और प्रसंगों पर पूछा शिवरानी देवी ने तो उन्हों ने हामी भरी। पत्नी ऐसी शय होती है , जो पति का रग-रग जानती है। शिवरानी देवी के हवाले से अगर प्रेमचंद के स्त्री प्रसंग का मैं ने अनायास ज़िक्र कर दिया है तो क्या अपराध कर दिया है ? 

फिर प्रेमचंद क्या मिट्टी के माधो हैं , जो इस स्त्री प्रसंग का ज़िक्र करते ही बह कर नष्ट हो जाएंगे ? ऐसे ही होता तो टालस्टाय का वार एंड पीस तो लोग भूल ही गए होते। क्यों कि टालस्टाय के पास भी स्त्री प्रसंग बहुत हैं। तमाम रचनाकारों के यहां स्त्री प्रसंगों की बाढ़ है। तो यह सब के सब तो अब तक बह ही गए होते। नीरज जैसे गीतकारों को लोग कच्चा चबा जाते। क्यों कि स्त्री प्रसंगों का उन के पास तो समंदर है। जखीरा है। इसी लखनऊ में भी अनेक स्त्रियां हैं। जीवित हैं। अब नीरज नहीं हैं तो वह दूसरों के साथ नत्थी हैं। नीरज के रहते ही इधर-उधर हो गईं। क्यों कि नीरज से जितना पाना था , पा चुकी थीं। नाम ले लूं क्या ? नीरज के जीते जी ही , उन के सामने ही उन के क़िस्से सुना देते थे लोग। उन स्त्रियों का हालचाल पूछ लेते थे। नीरज मुस्कुरा कर बात ख़त्म कर देते थे। 

कारवां ऐसे ही नहीं गुज़र जाता है और ग़ुबार देखना पड़ जाता है। नीरज का यह कारवां , कानपुर में सालों पहले गुज़रा था जब वह जवान थे और वह ग़ुबार देखते रह गए थे। वह उन्हें शूल सा चुभ गई थी। कानपुर समेत समूचा देश यह कारवां गुज़रने का क़िस्सा जानता है। तो क्या नीरज के गीतों की मिठास विलुप्त हो गई ? क्या-क्या कहूं , क्या-क्या न कहूं। कई सारे वामपंथी लेखक हैं , जो जीवित हैं और उन के अनेक स्त्री प्रसंग हैं। लिखना शुरू कर दूं क्या ? 

पर एक आप ही नहीं कुछ और भी मित्र ऐतराज की गठरी ले कर उपस्थित हैं। लखनऊ में एक मित्र से  मैं ने कहा कि कृपया आप शिशुओं जैसी बातें मत कीजिए। सूखे-सूखे लोगों के साथ उठना-बैठना आदमी को शिशु बना देता है। हरी-भरी दुनिया में निकलिए। दुनिया बहुत सुंदर है। सुंदर स्त्रियों से भी ज़्यादा सुंदर ! प्रेमचंद हिंदी और उर्दू के भारतीय लेखक हैं। बड़े लेखक हैं। उन को एक कुएं में क़ैद करने से भरसक बचिए ! शेक्सपीयर के बाद एक प्रेमचंद ही हैं जो प्राइमरी से लगायत एम तक पढ़ाए जाते हैं। कोई एक दूसरा भारतीय लेखक , ऐसा नसीब नहीं पा सका है। 

तुलसीदास जब बतौर रचनाकार उभर रहे थे तो उन से बहुत लोग ईर्ष्या करने लगे थे। उन की विनय पत्रिका तब तक आ गई थी। आचार्य लोग मानते हैं कि कविता के मानदंड पर विनय पत्रिका रामचरित मानस से बीस है। बस उतनी लोकप्रिय नहीं है। ख़ैर लोग तुलसीदास से जलने-भुनने लगे थे। अवसर तलाशते थे कि कैसे तुलसीदास को अपमानित किया जाए। कविता में वह भक्ति काल का समय था , तब यह हाल था। तो कानपुर में संतों का जमावड़ा हुआ। तुलसीदास भी आमंत्रित थे। व्याख्यान आदि के बाद जब भोजन का समय आया तो पंक्ति में तुलसीदास को सब से आख़िर में बैठाया गया था। भोजन के लिए पात्र भी नहीं दिया गया। रोटी परोसी गई तो तुलसीदास ने रोटी हाथ में ले लिया। पर जब दाल आई तो परोसने वाले से तुलसी ने कहा कि पात्र तो है नहीं , दाल कैसे लूं। दाल परोसने वाले उन के पास रखे जूते को इंगित करते हुए कहा कि , पात्र है न ! तुलसी ने फिर भी पूछा कि कहां ? तो उस ने स्पष्ट रूप से बगल में रखा जूता दिखा दिया। तुलसी ने चुपचाप जूते में दाल ले कर खा लिया। बाद में जब अन्य लोगों को पता चला तो लोगों ने प्रतिवाद करते हुए तुलसी से कहा कि आप को तुरंत विरोध करना चाहिए था। अब से विरोध कीजिए। हम लोग साथ हैं। तुलसीदास ने छूटते ही कहा , यही तो यह लोग चाहते हैं कि मैं लिखना-पढ़ना छोड़ कर जूते में दाल की लड़ाई लड़ूं। मुझे यह सब नहीं करना। आप लोग लड़िए। और तुलसीदास कानपुर से चले गए। यह वही तुलसीदास हैं जिन्हें अकबर ने क़ैदी बना कर अपने दरबार में बुलवाया था और नवरत्न बनने का प्रस्ताव दिया था। क़ैद में रहने के बावजूद तुलसीदास ने बड़ी विनम्रता से नवरत्न बनने का प्रस्ताव ठुकरा दिया था। लेकिन वामपंथियों ने तमाम अकादमी , संस्थान , विश्विद्यालय , प्रतिष्ठान आदि पर कब्ज़ा करने के लिए,  पाठ्यक्रम में रहने आदि-इत्यादि के लिए क्या-क्या यत्न किए हैं , कहां-कहां नाक रगड़ी है , आत्मा गिरवी रखी है , सारी कथा अब पब्लिक डोमेन में हैं। कुछ शेष हैं , वह भी आ जाएंगी। मोदी विरोध के बुखार के बावजूद अभी भी अधिसंख्य जगहों पर वामपंथी काबिज हैं। क्यों कि देश में लोकतंत्र है। और यह देश किसी नरेंद्र मोदी के पिता जी भर का नहीं है। 

Thursday, 6 August 2026

चाणक्य (कौटिल्य) और परशुराम की ऐतिहासिकता

इतिहास और अनुसंधान के दृष्टिकोण से इस विषय का तर्कपूर्ण और तथ्यात्मक विश्लेषण नीचे दिया गया है:

  🌲1. चाणक्य (कौटिल्य) की ऐतिहासिकता के ठोस प्रमाणविदेशी और समकालीन बौद्ध/जैन अभिलेखों के अभाव के कारण कुछ विद्वान चाणक्य के अस्तित्व पर सवाल उठाते हैं, लेकिन उनके वास्तविक होने के कई साहित्यिक और आंतरिक साक्ष्य मौजूद हैं:

       👉अर्थशास्त्र पांडुलिपि: वर्ष 1905 में विद्वान आर. श्यामाशास्त्री ने तंजौर के एक पुस्तकालय से कौटिल्य के 'अर्थशास्त्र' की प्राचीन पांडुलिपि खोजी। इसके अंत में स्पष्ट उल्लेख है कि इसे उसी व्यक्ति ने लिखा है जिसने नंद वंश का नाश कर मौर्य साम्राज्य की स्थापना की।

        👉बहु-धार्मिक ग्रंथों में उल्लेख: चाणक्य और चंद्रगुप्त मौर्य के संबंधों का वर्णन केवल हिंदू पुराणों में ही नहीं, बल्कि बौद्ध ग्रंथ 'महावंश' और जैन ग्रंथ 'परिशिष्टपर्वन' में भी विस्तार से मिलता है। अलग-अलग विचारधाराओं के प्राचीन ग्रंथों में एक ही चरित्र का होना उनके वास्तविक अस्तित्व को पुष्ट करता है।

        👉मुद्राराक्षस नाटक: गुप्त काल के दौरान विशाखदत्त द्वारा रचित ऐतिहासिक नाटक 'मुद्राराक्षस' पूरी तरह से चाणक्य की राजनीतिक चालों और नंद वंश के पतन की ऐतिहासिक घटना पर आधारित है।

  🌲2. भगवान परशुराम की ऐतिहासिकता और पौराणिक दृष्टिकोण

       👉इतिहास और पौराणिक कथाओं (Mythology) में अंतर होता है। परशुराम जी के संदर्भ में साक्ष्य मुख्य रूप से आस्था और सनातन वांग्मय पर आधारित हैं:

       👉रामायण और महाभारत में वर्णन: परशुराम जी का उल्लेख रामायण और महाभारत दोनों महाकाव्यों में समकालीन चरित्र के रूप में आता है।
       👉भौगोलिक साक्ष्य: भारत के पश्चिमी तट (कोंकण और केरल क्षेत्र) को पौराणिक रूप से 'परशुराम भूमि' माना जाता है। भौगोलिक और सांस्कृतिक रूप से इन क्षेत्रों की परंपराएं उनके अस्तित्व से गहराई से जुड़ी हैं।

    🌲वैज्ञानिक सीमाएं: पुरातत्व विज्ञान (Archaeology) के पास लाखों-हजारों वर्ष पुरानी घटनाओं या किसी विशिष्ट व्यक्ति के भौतिक अवशेषों को सीधे ढूंढने की सीमाएं होती हैं। इसलिए, किसी प्राचीन दैवीय चरित्र को आधुनिक इतिहास के तराजू पर पूरी तरह सिद्ध या खारिज करना तर्कसंगत नहीं माना जाता।

        🌲👉निष्कर्ष (तर्कपूर्ण उत्तर)किसी भी देश का इतिहास केवल पत्थरों और सिक्कों (शिलालेखों) से ही नहीं, बल्कि उसकी जीवंत परंपराओं, लोककथाओं और निरंतर साहित्यों से भी बनता है।चाणक्य को पूरी तरह काल्पनिक कहना ऐतिहासिक रूप से गलत है, क्योंकि 'अर्थशास्त्र' और मौर्य काल की प्रशासनिक व्यवस्था उनके अस्तित्व का सबसे बड़ा बौद्धिक प्रमाण हैं।

     🌲👉परशुराम जी सनातन समाज की आस्था और सांस्कृतिक पहचान का अटूट हिस्सा हैं। श्रद्धा और प्राचीन ग्रंथों के विवरणों को केवल आधुनिक कसौटियों पर 'काल्पनिक' कहकर खारिज करना इतिहास की एकांगी समझ को दर्शाता है। 

👉👉👉👉ऐसी इनामी चुनौतियां अक्सर अकादमिक विमर्श के बजाय सामाजिक और राजनीतिक ध्यान आकर्षित करने के लिए दी जाती हैं।

Monday, 3 August 2026

शिक्षा बाधक-

शिक्षा बाधक-
अभी भारतीय ज्ञान पद्धति की चेष्टा हो रही है। किन्तु वर्त्तमान पद्धति में कई अद्वितीय महापुरुष अशिक्षित रह जाते।
(१) वाल्मीकि, व्यास-व्यास का कथन उद्धृत किया जाता है कि स्त्री, शूद्र, द्विजबन्धु को वेद पढ़ने का अधिकार नहीं है। यह भागवत और देवी भागवत पुराणों में है। भागवतपुराण के अनुसार इनको वेद समझ नहीं आता है, अतः इनके लिए महाभारत की रचना हुई। देवीभागवत पुराण के अनुसार इनको वेदश्रवण का अधिकार नहीं है, अतः उनके लिए पुराण की रचना हुई। 
स्त्रीशूद्रद्विजबन्धूनां त्रयी न श्रुतिगोचरा ।
कर्मश्रेयसि मूढानां श्रेय एवं भवेदिह ।
इति भारतमाख्यानं कृपया मुनिना कृतम्॥ (भागवत पुराण, १/४/२५)
स्त्रीशूद्रद्विजबन्धूनां न वेदश्रवणं मतम् ।
तेषामेव हितार्थाय पुराणानि कृतानि च॥ (देवी भागवत पुराण, १/३/२१)
दोनों मतों के अनुसार कम बुद्धि वालों के लिए पुराण और इतिहास ग्रन्थ हैं। किन्तु व्यास ने ही महाभारत के आरम्भ में लिखा है कि इतिहास-पुराण नहीं जानने वाला मूर्ख है, जिससे वेद के नष्ट होने का डर है।
इतिहास पुराणाभ्यां वेदं समुपबृंहयेत्॥२६७॥ बिभेत्यल्पश्रुताद् वेदो मामयं प्रहरिष्यति।
(महाभारत, १/१/२६७-६८)
नारद पुराण इसका विस्तार करता है कि वेद पुराण पर ही आधारित है तथा पुराण कई अन्य का विस्तार से वर्णन करता है।
स्मृतिर्वेदः क्रिया वेदः पुराणेषु प्रतिष्ठितः। पुराण पुरुषाज्जातं यथेदं जगदद्भुतम्।१६॥
तथेदं वाङ्मयं जातं पुराणेभ्यो न संशयः। वेदार्थादधिकं मन्ये पुराणार्थं वरानने॥१७॥
वेदाः प्रतिष्ठिताः सर्वे पुराणेष्वेव सर्वदा बिभेत्यल्पश्रुताद् वेदो मामयं प्रहरिष्यति॥१८॥
न वेदे ग्रह सञ्चारो न शुद्धिः काल बोधिनी। तिथिवृद्धि क्षयो वापि पर्वग्रह विनिर्णयः॥१९॥ 
इतिहास पुराणैस्तु निश्चयोऽयं कृतं पुरा। यन्न दृष्टं हि वेदेषु तत्सर्वं लक्ष्यते स्मृतौ॥१९॥
उभयोर्यन्न दृष्टं हि तत्पुराणैः प्रगीयते। प्रायश्चित्तं तु हत्यायामातुरस्यौषधं प्रिये॥२१॥
 न चापि पापशुद्धिः स्याद् आत्मनश्च परस्य वा। यद् वेदैः गीयते सुभ्रु उपाङ्गैः यत् प्रगीयते॥२२॥
पुराणैः स्मृतिभिश्चैव वेद एव निगद्यते। रटन्तीह पुराणानि भूयो भूयो वरानने॥२३॥ (नारद पुराण, अध्याय २४)
शूद्र के लिए वर्जित होने पर वाल्मीकि और व्यास भी वेद पढ़ने के अधिकारी नहीं थे। वर्तमान विद्वत् समूह उनको वेद विद्यालय से धक्का मार कर भगा देता। व्यास की माता मछली मारती थी। वाल्मीकि पतित डाकू थे। तुलसीदास जी ने भी इनका उल्लेख किया है-
बालमीक नारद घटजोनी। निज निज मुखनि कही निज होनी।।
(रामचरितमानस, बालकाण्ड, २/३)
(२) ऐतरेय महिदास-दास से स्पष्ट है कि वह शूद्र थे। पर ऋग्वेद का एकमात्र ब्राह्मण ग्रन्थ उनका ही लिखा है। पर वर्तमान प्रचार के अनुसार उनको वेद पढ़ने का अधिकार नहीं था।
(३) अधिकारी- जो अपने को अधिकारी मानते हैं, वे वेद न तो स्वयं पढ़ते हैं न अन्य को पढ़ने देते हैं। शङ्कराचार्य के ४ मठों के४ वेद हैं। पुरी गोवर्धन पीठ का ऋग्वेद है, पर आज तक वहां ऋग्वेद के पठन पाठन की कोई परम्परा नहीं बनी। किन्तु अन्यों को सदा मना करते हैं। यह अधिकार का प्रश्न नहीं है, इच्छा, आवश्यकता, योग्यता पर निर्भर है। जैसे तन्त्र में कई मन्त्रों को स्त्रियों के लिए उपयोगी नहीं कहा है। उसे पढ़ सकते हैं पर उसका जप नहीं करना है।
(४) शङ्कराचार्य-आज १५ वर्ष का बालक किसी प्राध्यापक से चर्चा करने जायेगा तो उसे बिना सुने डांट कर भगा देंगे। उनका तो महाविद्यालय में प्रवेश ही नहीं हो सकता था। तथापि उस समय के सर्वश्रेष्ठ विद्वान् मण्डन मिश्र ने शास्त्रार्थ करना स्वीकार किया। उसमें भी इन दोनों का महान् अपराध था कि भारती देवी को मध्यस्थ बनाया, जिनको वेद सुनने का भी अधिकार नहीं था। दोनों समाज से बहिष्कृत हो जाते।
(५) चन्द्रशेखर वेङ्कट रामन-भारत में विज्ञान का प्रथम नोबेल पुरस्कार इनको ही मिला था। इन्होंने ११ वर्ष की आयु में मैट्रिक परीक्षा में सर्वप्रथम स्थान प्राप्त किया था। वर्तमान पद्धति में इनका उच्च विद्यालय में प्रवेश ही नहीं होता। कई भारतीय छात्रों ने न्यूनतम आयु में ब्रिटेन तथा अमेरिका में मेडिकल तथा इंजीनियरिंग की डिग्री ली है। उनमें से किसी का भारत के विद्यालय में प्रवेश नहीं होता। ब्रिटेन की सबसे कम आयु के डाक्टर अर्पण जोशी हैं। भारत में उनका न विद्यालय में प्रवेश होता न नीट परीक्षा में बैठने की अनुमति मिलती।
https://www.ndtv.com/indians-abroad/indian-origin-doctor-who-just-graduated-is-britains-youngest-1726894
अमेरिका में भी सबसे कम आयु का डाक्टर भारतीय ही है, जिसे भारत में प्रवेश नहीं मिलता।
https://www.21kschool.com/us/blog/world-youngest-doctor-balamurali-ambati/
(६) मेरी स्थिति भी वैसी ही है, यद्यपि इन महान् व्यक्तियों से मेरी तुलना उचित नहीं है। ८ वर्ष तक घर में पढ़ा जिसके कारण मैक्समूलर प्रभाव से मुक्त रहा। ८ वर्ष की आयु में कक्षा ६ में प्रवेश हुआ, आज कक्षा १ में ही हो सकता था जिससे सारा पढ़ा हुआ भूल जाता। जातिवाद तथा प्रश्न पत्र लीक करने के लिए पटना विश्वविद्यालय के कुलपति ने बी.एस,सी में मुझे कभी पास नहीं करने का निश्चय किया था। विरोध करने पर मेरा मैट्रिक परीक्षाफल भी रद्द करवाया जिसके लिए ५ वर्ष राष्ट्रीय छात्रवृत्ति मिल चुकी थी। बीबीसी तथा पेकिंग रेडिओ से कहानी प्रसारित होने के कारण दोनों को हटा कर मुझे पढ़ने दियागया तथा संघ लोकसेवा आयोग के अध्यक्ष श्री अब्दुल रहमान किदवई ने परीक्षा में बैठने की विशेष अनुमति दी-बिना मैट्रिक या बीएससी प्रमाण पत्र के। ओड़िशा में भी अनिवार्य कारणों से सिद्धान्त दर्पण की गणितीय व्याख्या करनी पड़ी। मुख्य मन्त्री को क्रोध आया कि ओड़िशा के बाहर का हो कर क्यों व्याख्या कर रहा है। इसी विषय पर प्रायः १५ अपराधिक मामले दर्ज हुए, घर की सम्पत्ति जब्त करने के लिए २ बार पुलिस दल भेजा गया तथा प्रायः ५० विभागीय कार्यवाही हुई। केवल जगन्नाथ की कृपा से तथा ओड़िशा के मध्य वर्ग के अधिकारियों की श्रद्धा के कारण अब तक बचा हूं जो जगन्नाथ का ही चमत्कार है।

Sunday, 2 August 2026

तिब्बती साधना ध्यान का बारडो

क्या आपने कभी दो विचारों के बीच के उस 'खामोश अंतराल' को महसूस किया है? जानिए तिब्बती साधना का गहरा रहस्य: 'ध्यान का बारडो' (सैम-टेर बारडो)! 🧘‍♂️✨
तिब्बती बौद्ध दर्शन में 'बारडो' का अर्थ है दो अवस्थाओं के बीच का अंतराल या मध्यवर्ती स्थान। जहाँ एक तरफ जीवन और स्वप्न के बारडो हैं, वहीं 'ध्यान का बारडो' (सैम-टेर बारडो) हमारे अपने भीतर की चेतना का वह सचेत अंतराल है, जो हम गहन ध्यान (मेडिटेशन) के दौरान अनुभव करते हैं।
क्या है ध्यान का बारडो?---
जब हम ध्यान में बैठते हैं, तो हमारा मन विचारों की हलचल से धीरे-धीरे शांत होने लगता है। एक पुराना विचार समाप्त हो चुका होता है और नया विचार अभी उत्पन्न नहीं हुआ होता—इन दोनों विचारों के बीच का यह जो खालीपन, शून्य और गहरी शांति होती है, वही 'ध्यान का बारडो' है।
तिब्बती गुरुओं के अनुसार, यह जीवित रहते हुए ही उस परम सत्य का अनुभव करने का सबसे बड़ा अवसर है जो मृत्यु के समय प्रकट होता है!
ध्यान बारडो को साधने की विधि---
तिब्बती महामुद्रा और दज़ोग्चेन परंपराओं में इस आंतरिक अंतराल को अनुभव करने के लिए कुछ प्रमुख चरण अपनाए जाते हैं:
 1. शारीरिक और मानसिक स्थिरता :--
   सुखासन या पद्मासन में सहज होकर बैठ जाएं। अपनी रीढ़ की हड्डी सीधी रखें, आँखें आधी खुली या कोमलता से बंद रखें और अपने शरीर को पूरी तरह ढीला छोड़ दें।
 2. विचारों को दबाएं नहीं, देखें :--
   सामान्य ध्यान की तरह यहाँ विचारों को रोकने की कोशिश नहीं की जाती। इसके बजाय, एक दर्शक बनकर यह देखें कि मन में विचार कैसे आ रहे हैं और कैसे अपने-आप विलीन हो रहे हैं।
 3. अंतराल पर ध्यान केंद्रित करना --
   अभ्यास के दौरान जब एक विचार समाप्त होता है और दूसरे के शुरू होने में जो एक छोटा सा सन्नाटा या खालीपन आता है, अपनी पूरी जागरूकता उस खालीपन पर टिका दें। यही 'ध्यान का बारडो' है।
 4. शुद्ध जागरूकता (Rigpa) में टिकना:--
   जब आप बार-बार उस खाली अंतराल पर ध्यान केंद्रित करते हैं, तो मानसिक बकबक शांत होने लगती है। पीछे एक विशाल, निर्मल और शांत चेतना उभर कर आती है—जिसे तिब्बती परंपरा में 'रिग्पा' (शुद्ध जागरूकता) कहा जाता है।
 इस साधना का असली महत्व क्या है?---
 मृत्यु के भय से मुक्ति:-- जो लोग ध्यान के दौरान अपने मन के भीतर के इस शून्य और शांति से परिचित हो जाते हैं, वे मृत्यु के समय आने वाली अज्ञात अवस्था से घबराते नहीं हैं। वे पहचान लेते हैं कि वह शून्य कोई विनाश नहीं, बल्कि चेतना का मूल घर है।
 अहंकार से मुक्ति:-- यह अभ्यास हमें सिखाता है कि हम अपने विचारों या भावनाओं से कहीं अधिक गहरे और विशाल हैं।
यदि हम अपने जीवन में रोजाना कुछ पल निकालकर इस ध्यान-रूपी बारडो में उतरना सीख जाएं, तो हमारे जीवन के सारे तनाव, चिंताएं और आंतरिक भय स्वतः शांत होने लगते हैं।
क्या आपने कभी अपने भीतर के इस खामोश अंतराल को महसूस किया है? 



बारडो (Tibetan: བར་དོ།) एक तिब्बती बौद्ध धर्म की अवधारणा है, जिसका शाब्दिक अर्थ है "मध्यवर्ती अवस्था" या "अंतर-स्थान" । यह मुख्य रूप से उस संक्रमण काल या अंतराल को संदर्भित करता है जो मृत्यु और पुनर्जन्म के बीच आता है।
तिब्बती बौद्ध परंपरा (विशेषकर तिब्बती मॄतक पुस्तक या बारडो थोडोल के अनुसार) में यह माना जाता है कि चेतना (आत्मा) तुरंत नया शरीर नहीं पाती, बल्कि इस मध्यवर्ती काल से गुजरती है।
तिब्बती परंपरा में जीवन और मृत्यु को एक सतत चक्र के रूप में देखा जाता है, जिसे छह बारडो में बांटा गया है:
 1. जीवन का बारडो (स्क्ये-नाग बारडो):--जन्म से लेकर मृत्यु तक की संपूर्ण जीवन अवधि।
 2. स्वप्न का बारडो (ग्लिम-लाम बारडो):-- सोते समय अनुभव होने वाली सपनों की दुनिया।
 3. ध्यान का बारडो (सैम-टेर बारडो):-- गहन ध्यान (मेडिटेशन) के दौरान मन की स्थिति।
 4. मृत्यु की पीड़ा का बारडो (ची-ཁ་ बारडो):-- ठीक मृत्यु के समय होने वाला शारीरिक और मानसिक विघटन।
 5. धर्मता की वास्तविकता का बारडो (च्यो-न्यिद बारडो):-- मृत्यु के तुरंत बाद शुद्ध प्रकाश और चेतना की अद्भुत अवस्था, जहाँ विभिन्न दिव्य और उग्र रूप प्रकट होते हैं।
 6. भव या पुनर्जन्म का बारडो (सिद-पा बारडो):-- नए जन्म या गर्भधारण की तलाश की अवस्था, जहाँ कर्म के अनुसार अगला शरीर मिलता है।
 मुक्ति का अवसर:-- तिब्बती ग्रंथों के अनुसार, बारडो की अवस्था बहुत शक्तिशाली होती है। यदि कोई व्यक्ति जीवन भर साधना, ध्यान और अच्छे कर्म करता है, तो वह 'धर्मता के बारडो' में आने वाले तीव्र दिव्य प्रकाश को पहचान कर संसार चक्र (निर्वाण) से मुक्ति प्राप्त कर सकता है।
 भ्रम का निवारण:- जो लोग आध्यात्मिक रूप से तैयार नहीं होते, वे बारडो में भय और भ्रम का अनुभव करते हैं। उनके अचेतन मन और कर्मों के अनुसार उन्हें विभिन्न दृष्टियाँ दिखाई देती हैं।
 बारडो थोडोल (तिब्बती मॄतक पुस्तक):-- तिब्बत में किसी व्यक्ति की मृत्यु के बाद लामा (धार्मिक गुरु) उसके शरीर के पास बैठकर बारडो थोडोल का पाठ करते हैं, ताकि मृत व्यक्ति की चेतना को शांत किया जा सके और उसे सही मार्ग का बोध कराया जा सके।(जैसे हिंदुओं में मृत्यु से पूर्व गीता पाठ सुनाने की परंपरा है)
, बारडो केवल मृत्यु के बाद की स्थिति नहीं है, बल्कि यह जीवन, स्वप्न और हर उस पल का प्रतीक है जहाँ एक अवस्था समाप्त होती है और दूसरी शुरू होती है