Friday, 24 July 2026

गाली और नाम

कभी आपको लगता है कि ऋग्वेद के वाक्-सूक्त, भर्तृहरि के शब्द-ब्रह्म, तांत्रिक परंपरा की परा, पश्यन्ती, मध्यमा और वैखरी वाक् का देश किस स्तर तक के कीचड़ में लोटने में किसी पशु की तरह आनंदित युवाओं को देखेगा? वाक् के साधकों की चेतना विकास की दिशा में बढ़ती है—आवेग से विवेक की ओर, प्रतिक्रिया से उत्तरदायित्व की ओर, हिंसा से संवाद की ओर। गाली इस विकास-यात्रा का उलटा मार्ग है। वह चेतना को पुनः आदिम प्रतिक्रियाओं की ओर ले जाती है। ये गालियाँ भारतीय चेतना के अवरोह (Regression of Consciousness) का संकेत हैं।

भारतीय दर्शन में नाम और रूप केवल पहचान नहीं हैं; वे अस्तित्व के आयाम हैं। किसी का नाम लेना उसकी सत्ता को स्वीकार करना है। इसीलिए भारतीय परंपरा में नामकरण संस्कार है। नाम व्यक्ति को समाज में प्रतिष्ठित करता है। इसके विपरीत गाली नाम का अपहरण करती है। वह व्यक्ति को उसके वास्तविक नाम से नहीं पुकारती; उसे एक अपमानजनक संकेत में बदल देती है।

गाली का सबसे बड़ा भ्रम यह है कि उसे केवल अशिष्ट भाषा समझ लिया जाता है। वस्तुतः गाली भाषा का नहीं, चेतना का विषय है। शब्द केवल उसका माध्यम हैं; उसका वास्तविक निवास मनुष्य की मानसिक संरचना में है। किसी व्यक्ति की गालियाँ केवल उसके शब्दकोश का परिचय नहीं देतीं; वे उसके भावनात्मक संगठन, उसकी असुरक्षाओं, उसकी आक्रामकता, उसके आत्म-नियंत्रण और उसके सांस्कृतिक संस्कारों का भी परिचय देती हैं। गालियाँ प्रायः उस व्यक्ति के अचेतन का दर्पण होती हैं जो उन्हें उच्चार रहा है। वे विरोधी की वास्तविकता से अधिक वक्ता की भीतरी संरचना को उद्घाटित करती हैं।

गाली और तर्क का मूलभूत अंतर स्पष्ट है। जब मस्तिष्क का प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स सक्रिय रहता है, तब मनुष्य कारण देता है, प्रमाण प्रस्तुत करता है, तर्क करता है और स्वयं को नियंत्रित रखता है। परंतु जब वह निष्क्रिय हो तो उसकी अमिग्डाला खतरे या अपमान का अनुभव करती है और नियंत्रण अपने हाथ में ले लेती है, तब भाषा का स्वरूप बदल जाता है। तर्क की जगह विस्फोट आ जाता है। आधुनिक मनोविज्ञान इसे Emotional Hijacking कहता है—एक ऐसी स्थिति जिसमें भावनाएँ संज्ञानात्मक नियंत्रण पर अस्थायी विजय प्राप्त कर लेती हैं। इस दृष्टि से गाली विवेकपूर्ण संप्रेषण नहीं, भावनात्मक अपहरण की भाषाई अभिव्यक्ति है।

गालियों का अध्ययन करें तो स्पष्ट होगा कि लगभग प्रत्येक गाली किसी-न-किसी सांस्कृतिक पवित्रता पर आघात करती है। कहीं मातृत्व को अपवित्र किया जाता है, कहीं स्त्री-देह को, कहीं धर्म को, कहीं जातीय पहचान को। यह कोई संयोग नहीं है। गाली वहीं प्रहार करती है जहाँ समाज ने सबसे अधिक पवित्रता स्थापित की होती है। इसलिए गाली का वास्तविक कार्य सूचना देना नहीं, पवित्र का अपवित्रीकरण करना है। इन गालियों का आश्चर्यजनक विरोधाभास यह है कि वे लगभग कभी भी यौन सुख (sexual pleasure) के बारे में नहीं होतीं; वे यौन सत्ता (sexual power) के बारे में होती हैं। वे कामुकता की भाषा नहीं, प्रभुत्व (domination), अपमान (humiliation) और अधिकार-हरण (violation) की भाषा हैं। इसलिए यदि कोई व्यक्ति यह मानता है कि यौन गालियाँ केवल काम-वासना का भाषिक रूप हैं, तो वह उनके वास्तविक मनोविज्ञान को नहीं समझ रहा। वे इच्छा की नहीं, हिंसा की भाषा हैं। उस स्थान पर अभिव्यक्त हो रही वे गालियाँ केवल अश्लील नहीं हैं; वे सांस्कृतिक अपवित्रीकरण (cultural profanation) का अनुभव कराने की नई वामपंथी स्ट्रेटेजी हैं।

विकासवादी मनोविज्ञान गालियों को प्रभुत्व-प्रदर्शन (Dominance Display) के रूप में भी देखता है। गाली का उद्देश्य सामने वाले को कोई नई सूचना देना नहीं होता; उसका उद्देश्य उसे मनोवैज्ञानिक रूप से दबाना होता है। इस प्रकार गाली संवाद की नहीं, शक्ति-प्रदर्शन की भाषा बन जाती है।

सोशल मीडिया पर गाली केवल भावनात्मक प्रतिक्रिया नहीं रहती; वह सामाजिक पुरस्कार (social reward) प्राप्त करने का साधन भी बन जाती है। यदि किसी अपमानजनक टिप्पणी पर हजारों लाइक, शेयर और प्रशंसा मिलती है, तो मस्तिष्क का डोपामिन तंत्र उसे सफलता के रूप में दर्ज करता है। धीरे-धीरे व्यक्ति सीख जाता है कि संयमित तर्क की अपेक्षा उत्तेजक अपमान अधिक लोकप्रिय है। यही वह प्रक्रिया है जिसे आज कई विचारक "Outrage Economy" कहते हैं—एक ऐसी अर्थव्यवस्था जिसमें ध्यान (attention) सबसे मूल्यवान वस्तु है और गाली उसे प्राप्त करने का सबसे सस्ता साधन।

गाली का प्रयोजन तर्क को परास्त करना नहीं, प्रतिद्वंद्वी की आत्म-प्रतिष्ठा को आहत करना है। यही कारण है कि गाली मूलतः degradation ritual है—एक ऐसा भाषिक अनुष्ठान जिसके माध्यम से बोलने वाला दूसरे व्यक्ति को उसके मानवीय स्तर से नीचे धकेलना चाहता है।

और वह भी इसलिए कि वह स्वयं नीचा महसूस करता है। एरिख फ्रॉम ने अपनी प्रसिद्ध कृति The Anatomy of Human Destructiveness में विनाशकारी प्रवृत्ति और जीवनोन्मुख प्रवृत्ति का अंतर किया है। फ्रॉम के अनुसार स्वस्थ व्यक्ति अपनी शक्ति का अनुभव सृजन द्वारा करता है, जबकि असुरक्षित व्यक्ति अपनी शक्ति का अनुभव दूसरे को छोटा करके करता है। इस दृष्टि से गाली कई बार शक्ति का प्रदर्शन नहीं, शक्ति के अभाव की क्षतिपूर्ति (Compensation) होती है। जिस व्यक्ति को अपने तर्क, अपने व्यक्तित्व या अपनी नैतिक ऊँचाई पर विश्वास नहीं होता, वह शब्दों की तीव्रता से उस रिक्ति को भरने का प्रयास करता है। इसलिए गाली अनेक बार साहस की नहीं, सृजनशक्ति के अभाव की भाषा होती है।

फ्रायड का कहना था कि गाली हिंसा का स्थानापन्न ( substitute) है। मैं उससे असहमत हूँ। मेरे विचार से गाली हिंसा की भूमिका है। प्रत्येक समाज अपनी हिंसा को वैध ठहराने से पहले अपने शिकार का नैतिक अवमूल्यन करता है। किसी व्यक्ति को सीधे नष्ट करना कठिन है; पहले उसे सम्मान के योग्य न रहने वाला सिद्ध करना पड़ता है। इतिहास के प्रत्येक बड़े नरसंहार से पहले भाषा बदलती है। लोग व्यक्तियों को नाम से नहीं, अपमानसूचक विशेषणों से पुकारना प्रारम्भ करते हैं। यह हिंसा की पूर्वपीठिका होती है । यानी गाली हिंसा का विकल्प नहीं, अनेक बार उसकी प्रस्तावना होती है। गाली संवाद को समाप्त नहीं करती; वह संवाद की संभावना को ही समाप्त कर देती है।

लेकिन यह तो गाली देने वालों का मनोविज्ञान है, उन साहित्यकारों का मनोविज्ञान भी पढ़िए जो इन गालियों की Moral Licensing कर रहे हैं। यानी ये वे हैं जो यह विश्वास कर लेते हैं कि इनके उद्देश्य इतने पवित्र हैं कि उसके लिए सामान्य नैतिक नियम लागू नहीं होते। जब वे गालियों के इन क्षणों को अपवाद मानने के बजाय आदर्श या सामान्य घोषित करने लगते हैं, तब समस्या केवल भाषा की नहीं रहती; तब हमारी सामूहिक मनोसंरचना बदलने लगती है। उसी दिन गालियाँ शब्दकोश से निकलकर संस्कृति का हिस्सा बन जाती हैं। साहित्यकार जब गाली को नैतिक वैधता देता है, तब वह समाज के सामूहिक विवेक का पुनर्लेखन कर रहा होता है। वह केवल यह नहीं कह रहा कि "गाली दी गई"; वह यह कह रहा है कि "गाली उचित थी।"जबकि ऐसे माहौल में साहित्यकार का दायित्व सबसे अधिक बढ़ जाता है। क्योंकि साहित्य का संपूर्ण प्रयोजन मनुष्य को पुनः नाम देना है। उपन्यास, कविता, नाटक और कथा—ये सभी हमें याद दिलाते हैं कि प्रत्येक मनुष्य किसी विशेषण से बड़ा है। साहित्य व्यक्ति को उसकी जटिलता लौटाता है; गाली उसे उसकी जटिलता से वंचित कर देती है। साहित्य कहता है—"उसे समझो।" गाली कहती है—"उसे समाप्त करो।" साहित्य व्यक्ति के भीतर की कहानी खोजता है; गाली व्यक्ति को कहानी बनने से पहले ही एक निर्णय में बदल देती है।तो होना तो यह चाहिए था कि सभी साहित्यकार एक साथ एक संयुक्त ज्ञापन निकालते कि भाषा का सम्मान रखें पर होता यह देखा कि कुछ स्वनामधन्य उसी को जस्टिफ़ाई करने में लग गए। वे साहित्य को हमेशा चार खेमे और चौंसठ खूँटों में बांटे रहे तो यहाँ भी वे एक ingroup moral immunity की स्थिति से—अपने समूह को नैतिक छूट देने से- मुतमईन हैं। 

यौन-आधारित गालियों के समर्थन में एक और सूक्ष्म मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया कार्य करती है—प्रतीकात्मक दूरी (Symbolic Distance)। साहित्यकार स्वयं गाली नहीं देता; वह कहता है कि "यह जनता का क्रोध है", "यह प्रतिरोध की भाषा है", या "यह दमन के विरुद्ध स्वाभाविक प्रतिक्रिया है।" इस प्रकार वह अपने और गाली के बीच एक बौद्धिक दूरी निर्मित कर लेता है। परिणाम यह होता है कि वह स्वयं को अशिष्ट नहीं, बल्कि अशिष्टता का व्याख्याकार समझने लगता है। किंतु सामाजिक प्रभाव की दृष्टि से यह दूरी बहुत कम मायने रखती है। सार्वजनिक संस्कृति यह संदेश ग्रहण करती है कि यदि प्रतिष्ठित लेखक इसे उचित कह रहा है, तो यह नैतिक रूप से स्वीकार्य है। आधुनिक बौद्धिक संसार प्रायः लैंगिक समानता, स्त्री-अस्मिता और गरिमा की वकालत करता है। किंतु यदि वही बौद्धिक वर्ग ऐसी गालियों का समर्थन करे जिनकी संरचना स्त्री-देह, मातृत्व या पारिवारिक स्त्री-संबंधों को अपमान के औज़ार के रूप में प्रयोग करती है, तो वह अनजाने में उसी पितृसत्तात्मक भाषा को वैधता दे रहा होता है जिसकी वैचारिक आलोचना वह अन्यत्र करता है। यहाँ सबसे बड़ा विरोधाभास यह है कि सिद्धांत में स्त्री की गरिमा का समर्थन और व्यवहार में स्त्री-आधारित अपमान की स्वीकृति एक साथ उपस्थित हो जाती है।

क्या उन्हें अहसास है कि वे शब्दों की सीमा नहीं बदल रहे हैं ; वे समाज की नैतिक संवेदनशीलता की सीमा भी बदल दे रहे हैं?

सभ्यता का पालना मेसोपोटामिया नहीं बल्कि भारत है

निक कोलिंस समुद्री इतिहासकार, उन्होंने वेस्टर्न इतिहासकारों को धता बताते हुए दावा किया कि cradle of Civilization अर्थात सभ्यता का पालना मेसोपोटामिया नहीं बल्कि भारत है

इसके लिए उन्होंने लोथल में मिले बंदरगाह का उदाहरण दिया जो मानव निर्मित थी और ज्वारीय तरंगों को कंट्रोल करती थी, ये एक समय में 60 टन के तीस जहाज को सम्भाल सकती थी 

इसकी इंजीनियरिंग इतनी उन्नत थी कि यूरोप या पश्चिमी दुनिया को 4,000 साल का समय लगा इसे मैच करने में, औद्योगिक क्रांति के बाद जाकर वे इसे कंपीट कर पाए

उनके अनुसार मेसोपोटामिया को सभ्यता का पालना कैसे कहा जा सकता है जब वे भारत पर व्यापार के मामले डिपेंडेंट थे, मेसोपोटामिया के खत्म हो चुके शहरों में आज भी भारतीय मुहरे, मोती और कपास मिले है इसके अतिरिक्त सागौन की लकड़ी और खाद्यान्न भी भारत आपूर्ति करता था

वे आर्यन थ्योरी को नकारते है, वे कहते है कि आर्यन आक्रमण की थ्योरी इसलिए गढ़ी जाती है क्योंकि अंग्रेज ये स्वीकार नहीं कर पा रहे थे कि वे जो सबसे शक्तिशाली है उनके जैसे श्वेत लोगों के बिना ये गहरे रंग वाले भारतीय इतने महान कैसे हो सकते है

उन्होंने अपनी श्वेत प्रतिष्ठा को बचाने के लिए मेसोपोटामिया को तो प्राचीन माना बल्कि भारत की महान विरासत को भी यूरोपीय शाखा की देन घोषित कर दी

ब्रिटिशों ने अपने शासन को भी स्थाई बनाने के लिए ऐसा किया था ताकि उनका विरोध कम हो क्योंकि हम यहां शासन करने वाले नए थोड़े है 

निक के अनुसार भारत 4,000 साल तक दुनिया की समुद्री महाशक्ति थी, इसी को लेकर रोम सम्राट ने शिकायत की थी कि भारत से सामान लेने के कारण हमारा सारा सोना हर साल भारत चला जा रहा है, उन्होंने चीन से लेकर अफ्रीका और यूरोप तक फैले भारतीय व्यापार के बारे में जिक्र किया है 

उन्होंने सरस्वती नदी के बारे में भी बात की है, उनके अनुसार सरस्वती नदी को लेकर भ्रम फैला है कि वे काल्पनिक थी और केवल वेदों की लिखित थी, बल्कि वर्तमान वैज्ञानिक स्रोतों से पता चला है कि सरस्वती नदी वास्तव में एक्जिस्ट करती थी और वे इसे केवल सिंधु सभ्यता नहीं मानते बल्कि इसे सिंधु सरस्वती सभ्यता कहते है जिनके किनारों में पूरी जनसंख्या बसी थी

बाद में ये नदी भूकंपों की श्रृंखला के कारण सुख गई,

सामान्य व्यक्ति यदि क्रोध में गाली देता है

सामान्य व्यक्ति यदि क्रोध में गाली देता है तो वह अपनी निजी दुर्बलता प्रकट करता है। परन्तु जब कोई प्रतिष्ठित लेखक, कवि या बुद्धिजीवी उसी गाली को वैचारिक औचित्य प्रदान करता है, तब वह केवल स्वयं नहीं बोल रहा होता; उसके पीछे उसकी अर्जित सांस्कृतिक पूँजी की अल्पता बोल रही होती है। साहित्यकार की सबसे बड़ी शक्ति उसकी भाषा पर समाज का विश्वास है। वह विश्वास वर्षों की साधना से अर्जित होता है। जब वही व्यक्ति कहता है कि अमुक परिस्थिति में गाली उचित है, तब वह केवल एक अपशब्द का समर्थन नहीं करता; वह भाषा के नैतिक संविधान में संशोधन कर देता है।

समाज अपने शब्दकोश केवल विद्यालयों से नहीं सीखता; वह उन्हें कवियों, उपन्यासकारों, नाटककारों और सार्वजनिक बुद्धिजीवियों से भी सीखता है। यदि साहित्यकार भाषा की मर्यादा का प्रहरी न रहकर उसकी सीमा-भंग का वैचारिक अधिवक्ता बन जाए, तब समाज में यह धारणा बनने लगती है कि नैतिकता भी दलगत है—जिसे हम अपना विरोधी मान लें, उसके लिए कोई भी शब्द वैध हो जाता है।

कोई समाज एक दिन अचानक असभ्य नहीं हो जाता। पहले एक अपशब्द को अपवाद कहा जाता है, फिर उसे प्रतिक्रिया कहा जाता है, फिर प्रतिरोध कहा जाता है, और अन्ततः उसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का पर्याय बना दिया जाता है। इस क्रम में सबसे खतरनाक वह चरण है जहाँ बुद्धिजीवी उसका औचित्य सिद्ध करने लगते हैं। क्योंकि बुद्धिजीवी किसी प्रवृत्ति को जन्म भले न दें, उसे वैधता अवश्य दे सकते हैं।

सोशल मीडिया ने भाषा को तत्क्षण प्रतिक्रिया का माध्यम बना दिया है। अब शब्द तपस्या से नहीं, आवेग से जन्म लेते हैं। एल्गोरिद्म संयम को नहीं, उत्तेजना को पुरस्कृत करते हैं। सबसे अधिक साझा वही वाक्य होता है जो सबसे अधिक अपमानजनक हो। परिणाम यह हुआ कि भाषा का बाज़ार बन गया, जहाँ शालीनता की नहीं, सनसनी की माँग है। इस बाज़ार में यदि साहित्यकार भी वही बेचने लगे जो भीड़ खरीदना चाहती है, तो साहित्य और ट्रोलिंग के बीच का अंतर मिटने लगता है।

साहित्यकार को सत्ता से असहमति का पूरा अधिकार है; बल्कि अनेक बार वही उसका नैतिक दायित्व भी है। परन्तु यदि वह प्रतिरोध की भाषा को गाली की भाषा बना देता है, तो वह सत्ता का प्रतिरोध नहीं करता—वह भाषा की पराजय का उत्सव मनाता है। तब समझ लीजिए कि लोकतंत्र का संकट चुनावों में नहीं, भाषा में प्रारम्भ हो चुका है।

गाली का सबसे बड़ा अपराध यह नहीं कि वह अशिष्ट है। अशिष्टता तो कभी-कभी केवल सामाजिक प्रशिक्षण का अभाव भी हो सकती है। उसका वास्तविक अपराध यह है कि वह सामने वाले को संवाद के योग्य व्यक्ति नहीं रहने देती। वह उसे एक विचारशील अस्तित्व से घटाकर एक अपमानित वस्तु में बदल देती है। दर्शनशास्त्री इमैनुएल लेविनास ने कहा था कि दूसरे मनुष्य का चेहरा हमें नैतिक उत्तरदायित्व का आह्वान देता है। गाली उस चेहरे को मिटा देती है। वह दूसरे को एक चेहरा नहीं, एक लक्ष्य (target) बना देती है। जिस क्षण किसी व्यक्ति का नाम उसके लिए प्रयुक्त अपशब्द से प्रतिस्थापित हो जाता है, उसी क्षण संवाद समाप्त हो जाता है और केवल आक्रमण शेष रह जाता है।

समाज में प्रत्येक व्यक्ति की विश्वसनीयता समान स्रोत से नहीं आती। सैनिक की विश्वसनीयता उसके साहस से जन्म लेती है, न्यायाधीश की उसके निष्पक्ष विवेक से, चिकित्सक की उसकी करुणा और कौशल से। उसी प्रकार साहित्यकार की वास्तविक पूँजी न उसकी प्रसिद्धि है, न पुरस्कार, न पाठकों की संख्या; उसकी सबसे बड़ी पूँजी है—उसकी भाषा की नैतिक विश्वसनीयता। जो साहित्यकार सत्ता-विरोध और सभ्यता-विरोध में फर्क ही नहीं पहचान सके, वह साहित्यकार नहीं प्रोपेगंडिस्ट है जिसकी मानसिकता यह है कि यदि विरोधी को पराजित करना है, तो उसके लिए कोई भी साधन उचित है। यही मनोविज्ञान भाषा में भी प्रवेश करता है कि यदि विरोधी को पराजित करना है, तो उसके लिए कोई भी शब्द उचित है।

लोकतंत्र केवल सत्ता बदलने की व्यवस्था नहीं है; वह भाषा को हिंसा से बचाने की भी व्यवस्था है। जिस शब्दावली में कोई आंदोलन बोलना सीखता है, वही उसके राजनीतिक संस्कार का स्थायी हिस्सा बन जाती है। यदि कोई आंदोलन केवल घृणा की भाषा सुनता और बोलता रहे, तो अंततः वह घृणा उसके नैतिक व्यक्तित्व का हिस्सा बन जाती है। तब वह सत्ता बदलने के बाद भी उसी भाषा में शासन करता है। 

अन्यथा वाक्लाव हैवेल ने चेकोस्लोवाकिया के दमनकारी शासन का कठोर विरोध किया, किंतु उनकी भाषा में प्रतिशोध नहीं, नैतिक स्पष्टता थी। अलेक्ज़ेंडर सोल्झेनित्सिन ने सोवियत अत्याचारों का भंडाफोड़ किया, पर उनकी शक्ति अपशब्दों से नहीं, साक्ष्य और नैतिक साहस से आई। मार्टिन लूथर किंग जूनियर ने नस्लवाद के विरुद्ध ऐसी भाषा विकसित की जिसमें क्रोध था, किंतु घृणा नहीं; पीड़ा थी, किंतु अपमान नहीं। इसी कारण उनका शब्द इतिहास में टिक गया और उनके विरोधियों के नारे समय के साथ विलुप्त हो गए। यदि विश्व के सबसे सफल जनांदोलन—जहाँ दमन कहीं अधिक था, हिंसा कहीं अधिक थी, अन्याय कहीं अधिक था—अपनी भाषा को मर्यादित रख सकते थे, तो आज हम क्यों यह मान लें कि गाली प्रतिरोध की अपरिहार्य भाषा है? फिर इनकी भाषा अधिक हिंसक क्यों है? जिन आंदोलनों को अपने नैतिक बल पर विश्वास होता है, वे भाषा को गिराने की आवश्यकता नहीं समझते। जिन्हें अपने तर्क पर विश्वास होता है, वे गाली से परहेज़ करते हैं। गाली प्रायः वहाँ जन्म लेती है जहाँ व्यक्ति को लगता है कि उसके शब्द पर्याप्त प्रभावशाली नहीं रहे। वह अर्थ की कमी को तीव्रता से भरना चाहता है। इसलिए गाली अनेक बार शक्ति का नहीं, असुरक्षा का व्याकरण होती है।

यदि साहित्यकार, जिसे भाषा का ऋषि होना था, स्वयं भाषा की मर्यादा के विघटन का तर्कशास्त्री बन जाए, तो समाज किससे अपेक्षा करे? यदि प्रहरी ही द्वार खोल दे, तो आक्रमणकारी को परिश्रम नहीं करना पड़ता। इसलिए किसी साहित्यकार द्वारा गाली का औचित्यीकरण केवल एक व्यक्तिगत मत नहीं; वह भाषा की उस नैतिक परंपरा के विरुद्ध विद्रोह है जिसने साहित्य को सभ्यता का अंतःकरण बनाया था। सभ्यताएँ गालियों से नहीं टूटतीं।वे तब टूटती हैं जब उनके साहित्यकार गालियों को सांस्कृतिक वैधता (Cultural Legitimacy) देने लगते हैं।साधारण व्यक्ति गाली देता है, समाज उसे सुधार सकता है।राजनेता गाली देता है, चुनाव उसे दंडित कर सकता है।पर यदि साहित्यकार गाली को सिद्धांत बना दे, तब समाज के पास उसे सुधारने का कोई सहज साधन नहीं बचता।क्योंकि वह भाषा का न्यायाधीश माना जाता है।और जब न्यायाधीश ही अपराध को वैध घोषित कर दे, तब अपराधी को अपराध-बोध क्यों होगा? यहीं मुझे लगता है कि हमारे समय की वास्तविक त्रासदी केवल यह नहीं है कि सार्वजनिक जीवन में भाषा गिर रही है।
उससे कहीं बड़ी त्रासदी यह है कि भाषा के संरक्षक स्वयं उसके पतन के दार्शनिक बनने लगे हैं।यही वह क्षण है जहाँ सभ्यता भीतर से दरकने लगती है।क्योंकि किसी भी राष्ट्र की अंतिम रक्षा सेना नहीं करती।संविधान भी नहीं।उसकी अंतिम रक्षा उसकी भाषा करती है।

किसी सभ्यता का वास्तविक चरित्र इस बात से नहीं पहचाना जाता कि वह अपने मित्रों से कैसी भाषा बोलती है; बल्कि इस बात से पहचाना जाता है कि वह अपने विरोधियों से कैसी भाषा बोलती है।

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा के दावे करने वाले अभिव्यक्ति की साधना को लगभग भूल गए हैं। ऐसे समय जुर्गेन हैबरमास की संवाद-नैतिकता (Discourse Ethics) अत्यंत प्रासंगिक हो उठती है। उनके अनुसार लोकतंत्र का वास्तविक आधार केवल मतदान नहीं, संवाद है। किंतु संवाद तभी संभव है जब प्रतिभागी एक-दूसरे को तर्क के योग्य मनुष्य मानते हों। जिस क्षण हम विरोधी को अपमान के योग्य प्राणी मानने लगते हैं, उसी क्षण संवाद की नैतिक पूर्वशर्त समाप्त हो जाती है।

लोकतंत्र केवल मतपत्रों से नहीं बचता।वह शब्दों से बचता है।संविधान केवल अधिकारों की रक्षा करता है। भाषा उन अधिकारों के योग्य मनुष्य की।

भारत में चर्च ऑफ इंग्लैंड की संपत्तियों और व्यवस्था को संभालने के लिए

FCRA और MI6 का खेल, जिसपर आपका ध्यान इसलिए नही जाता कि MI6 कभी किसी मोसाद-सीआईए की तरह शो ऑफ नही करती।

ब्रिटिश कब्जे के दौरान भारत में जो भी चर्च, स्कूल और छावनियाँ(Cantts) बनीं, वे सब 'चर्च ऑफ इंग्लैंड' के तहत आती थीं। 1947 में जब अंग्रेज गए, तो वे भारत में एक बहुत बड़ा कानूनी और अचल संपत्ति का ढांचा छोड़ गए।
​भारत में चर्च ऑफ इंग्लैंड की सीधी दखल को समझने के लिए हमें इसके दो रूपों को देखना होगा।

पहली दखल है-​ CNI और CSI(चर्च ऑफ नॉर्थ इंडिया और चर्च ऑफ साउथ इंडिया)
​अंग्रेजों के जाने के बाद, भारत में चर्च ऑफ इंग्लैंड की संपत्तियों और व्यवस्था को संभालने के लिए दो बड़े आधिकारिक संगठन बनाए गए... ​CNI उत्तर भारत के राज्यों में... ​CSI दक्षिण भारत के राज्यों में। 

ये दोनों संगठन तकनीकी रूप से स्वतंत्र हैं, लेकिन ये वैश्विक 'एंग्लिकन कम्यूनियन'(लंदन) का हिस्सा हैं। इनका मुख्यालय आज भी भारत के सबसे महत्वपूर्ण और रणनीतिक शहरों में है(जैसे दिल्ली में CNI का मुख्यालय संसद भवन और बड़े सरकारी दफ्तरों के बेहद करीब है)।
दूसरी और सबसे बड़ी दखल है- जमीनों का मालिकाना हक क्योंकि ​चर्च ऑफ इंग्लैंड की सबसे बड़ी ताकत कोई धार्मिक प्रचार नहीं, बल्कि "अथााह जमीन और संपत्ति" है।
​भारत में रक्षा मंत्रालय के बाद चर्च ऑफ इंडिया(CNI/CSI) देश का दूसरा सबसे बड़ा जमीन का मालिक है।

​देश के हर बड़े शहर के प्राइम लोकेशन(Civil Lines, Cantt इलाके, मॉल रोड) पर मौजूद ब्रिटिश कालीन चर्च, कब्रिस्तान, कॉन्वेंट स्कूल(जैसे सेंट स्टीफंस, सेंट जेवियर्स आदि) और विशाल बंगले इन्हीं के नियंत्रण में हैं।
इन जमीन की कीमत लाखों-करोड़ों में है और CNI और CSI के भीतर इन जमीनों को अवैध रूप से बेचने, लीज पर देने और लैंड-स्कैम के सैकड़ों मुकदमे चल रहे हैं। 
ED और आर्थिक अपराध शाखा ने कई बार इनके बड़े बिशपों को करोड़ों के घोटाले और फॉरेन फंडिंग के हेरफेर में गिरफ्तार किया है।

सीआईए का खेल--
पंजाब में इस समय जो बड़े पैमाने पर धर्मांतरण हो रहा है, वह वेटिकन या पारंपरिक CNI नहीं कर रहा। 
वहां अमेरिकी इवेंजेलिकल "पास्टर" सक्रिय हैं जो 'चंगाई सभा' के नाम पर सिखों का धर्मांतरण करा रहे हैं। इन्हें सीधे अमेरिका और कनाडा के इवेंजेलिकल डायस्पोरा से फंडिंग आ रही है।
लेकिन इन्हें ​चर्च ऑफ इंग्लैंड का मौन समर्थन है क्योंकि इस खेल में CNI सीधे तौर पर फ्रंट में नहीं आती, लेकिन वह इन नए इवेंजेलिकल समूहों को एक लेजिमेट अम्ब्रेला और अपने पुराने कानूनी नेटवर्क का परोक्ष सहयोग प्रदान करती है ताकि भारतीय कानून(जैसे FCRA) की नजरों से बचा जा सके।

भारत में चर्च ऑफ इंग्लैंड(CNI/CSI) के पास जो लाखों एकड़ जमीन है, उसकी मलाई का एक बहुत बड़ा हिस्सा 'ट्रस्ट' और 'शेल कंपनियों' के जरिए वैश्विक वित्तीय बाजारों(जैसे लंदन और केमैन आइलैंड्स) में घुमाया जाता है। 
भारत सरकार का FCRA कानून इसी पैसे को रोकने के लिए बना है।

यह पैसा सीधे तौर पर अमेरिकी इवेंजेलिकल चर्चों को दान नहीं दिया जाता, बल्कि इसका इस्तेमाल वैश्विक लॉबिंग में ज्यादा होता है। 
लंदन और यूरोप के ये पुराने ट्रस्ट उन अमेरिकी थिंक-टैंकों, एनजीओ और मीडिया घरानों को फंड करते हैं जो भारत में 'धर्मांतरण' और 'मानवाधिकार' के पक्ष में नैरेटिव बनाते हैं। शेष हिस्सा धर्मांतरण के लिए आता है।
इस तरह भारत की जमीन से कमाया गया पैसा घूम-फिरकर उसी अमेरिकी टूलकिट को मजबूत करता है जो भारत के खिलाफ इस्तेमाल होती है

साल 1999 में जब पोप जॉन पॉल द्वितीय भारत आया था, तो उसने दिल्ली में खड़े होकर आधिकारिक तौर पर यह बयान दिया था कि:
​"पहली सहस्राब्दी में यूरोप को ईसाई बनाया गया, दूसरी में अमेरिका और अफ्रीका को और तीसरी सहस्राब्दी में एशिया में ईसाइयत की फसल काटी जाएगी।"
​इसे ईसाई धर्मशास्त्र में "The Great Commission"(महान आदेश) कहा जाता है... यानी दुनिया के हर कोने तक ईसाइयत को पहुँचाना। 

इस बड़े लक्ष्य के लिए ये सभी चर्च(वेटिकन, एंग्लिकन और इवेंजेलिकल) अंदर से एक हैं।
भारत में इन्होंने अपना काम आपस में बांट रखा है ताकि "सब मलाई खा सकें।
​चर्च ऑफ इंग्लैंड(CNI/CSI) भारत का 'एलीट' और कानूनी चेहरा है। 
इसके पास लुटियंस दिल्ली में जमीनें हैं, बड़े कॉन्वेंट स्कूल हैं और इसके लोग न्यायपालिका, ब्यूरोक्रेसी और मीडिया में बैठे हैं। 
इनका काम है कानून और व्यवस्था को मैनेज करना।
​वेटिकन(कैथोलिक) का काम है ट्राइबल इलाकों(झारखंड, छत्तीसगढ़, ओडिशा) और दक्षिण भारत में अस्पताल और चैरिटी के नाम पर पैर जमाना।
​अमेरिकी इवेंजेलिकल(पास्टर्स) का काम है 'आक्रामक' फ्रंटलाइन वॉर... ये पंजाब के गांवों और आंध्र प्रदेश में 'चंगाई सभा' जैसी नौटंकी करके रातों-रात लाखों लोगों का धर्मांतरण कराते हैं।

असल मे धर्मांतरण एक बहुत बड़ा बिजनेस है। 
हर कनवर्टेड ईसाई का मतलब होता है चर्च को मिलने वाला 'Tithe'(दशमांश - अपनी कमाई का 10% हिस्सा चर्च को देना)।

लेकिन दुनिया मे चीजें बदल भी रही है।
इस समय वेटिकन और चर्च ऑफ इंग्लैड एक दूसरे के भी शत्रु बन रखे हैं।
क्योंकि ​अमेरिकी इवेंजेलिकल चर्च बहुत तेजी से बढ़ रहे हैं और इन्होंने लैटिन अमेरिका में वेटिकन के 'ग्राहकों'(कैथोलिकों) को तोड़कर अपने पाले में कर लिया। 
​भारत में भी, पंजाब और आंध्र प्रदेश में जो पारंपरिक कैथोलिक या सीएनआई चर्च थे, उनके लोग अब इन नए अमेरिकी पास्टर्स की तरफ भाग रहे हैं क्योंकि ये पास्टर्स "चमत्कार" का नाटक ज्यादा अच्छे से करते हैं। 
इसलिए वेटिकन और एंग्लिकन चर्च को डर है कि उनका बिजनेस(मार्केट शेयर) अमेरिका छीन रहा है।

हालांकि इसका मतलब ये नही कि इनका गठबंधन भारत जैसे जगह नही है।
क्योंकि साउथ अमरीका में तो तेरा ईसाई बनाम मेरा ईसाई चल रहा है, जबकि भारत में इनका हिसाब किताब इस तरह है कि "पहले ईसाई तो बना लें, फिर तय कर लेंगे कौन से वाला रहेगा"।

इसलिए सिर्फ रटे रटाये.. सीआईए तक सीमित न रहें।
सीआईए भले ही अग्रेसिव फ्रंटलाइन वॉर करता है, पर उसके पीछे हमेशा से MI6 रहा है।
भूलें नही कि आपके 45 ट्रिलियन(आज के दाम में तो 60 ट्रिलियन) जो यहां से लूटकर ले गया था वो ब्रिटेन था।
और 1945 से पहले जो ब्रिटेन अपना पैसा सिटी ऑफ लण्डन(लण्डन सिटी नही) में रखता था, दुनिया का रियल बैंकिंग पावरहाउस.. उसी ने अपने निवेश को वाल स्ट्रीट में डालकर अमरीका को बड़ा बनाया।

वो अलग बात है कि अमरीका जब अपने बाप को ही आंखे दिखाने लगा तो आजकल इनके यहां भीषण अंदरूनी लड़ाई चल रही है।
ग्लोबलिस्ट बनाम इम्पीरियलिस्ट के अलावा, केथलिक और प्रोटेस्टेंट में भी तलवारें खींच चुकी हैं।

Thursday, 23 July 2026

ध्रुव की कथा

ध्रुव की कथा और जेन-जी(१)

नारायणाष्टकम् पढ़ रहा था तो उसके सातवें छंद पर आँख अटक गई। 

पित्रा भ्रातरमुत्तमासनगतं चौत्तानपादिर्ध्रुवो दृष्ट्वा तत्सममारुरुक्षुरधृतो मात्रावमानं गतः। यं गत्वा शरणं यदाप तपसा हेमाद्रिसिंहासनमार्त न्नार्तत्राणपरायणः स भगवान्नारायणो मे गतिः।।७।। 

अपने भाई को पिता के साथ उत्तम राजसिंहासन पर बैठा देख उत्तानपाद के पुत्र ध्रुव ने जब स्वयं ही उस पर चढ़ना चाहा तो पिता ने उसे अंक में नहीं लिया और विमाता ने भी उसका अनादर किया, उस समय जिनकी शरण जाकर उसने तप के द्वारा सुमेरुगिरि के राजसिंहासन की प्राप्ति की, वे ही दीनरक्षक भगवान् नारायण मेरी एकमात्र गति हैं । 

इस एक श्लोक में जितनी वेदना समाई हुई है, उतनी शायद किसी बड़े महाकाव्य के अनेक सर्गों में भी न हो। एक बालक है। उसके सामने उसका भाई पिता की गोद में बैठा है। वह भी उसी गोद की ओर बढ़ता है। वह भी उसी सिंहासन पर बैठना चाहता है। किंतु उसका हाथ पकड़कर रोक दिया जाता है। उसे बताया जाता है कि यह स्थान उसके लिए नहीं है।

ध्यान दीजिए, ध्रुव की पीड़ा सिंहासन न मिलने की नहीं थी; पीड़ा यह थी कि उसे यह अनुभव करा दिया गया कि "तुम्हारा होना पर्याप्त नहीं है।" किसी भी मनुष्य के लिए इससे बड़ा अपमान क्या हो सकता है कि उसके अस्तित्व को ही कमतर मान लिया जाए? इसीलिए ध्रुव की कथा पाँच हजार वर्ष पुरानी होकर भी आज के युवक की कथा प्रतीत होती है। युग बदलते हैं, पर मनुष्य के अनुभव नहीं बदलते। आज भी किसी युवक को कभी आर्थिक विषमता रोकती है, कभी संसाधनों का अभाव, कभी प्रतियोगिता की विषम शर्तें, कभी सामाजिक परिस्थितियाँ, कभी परिवार की सीमाएँ, तो कभी उसे लगता है कि अवसरों का वितरण उसके अनुकूल नहीं है। हर युग का अपना एक "सिंहासन" होता है—किसी युग में वह राजसिंहासन था, आज वह विश्वविद्यालय की सीट हो सकती है, किसी प्रतिष्ठित संस्था का प्रवेशद्वार हो सकता है, कोई शोधवृत्ति, कोई प्रशासनिक सेवा, कोई व्यवसाय, कोई प्रतिष्ठा, कोई उपलब्धि। और हर युग में कुछ युवक ऐसे होते हैं जिन्हें लगता है कि सिंहासन के समीप पहुँचकर भी उनके हाथ खाली रह गए।

यहीं पुराण आधुनिक मनुष्य के कान में एक अत्यंत धीमी, किंतु अत्यंत प्रखर बात कहता है—तुम्हारी सबसे बड़ी लड़ाई सिंहासन के लिए नहीं है; तुम्हारी सबसे बड़ी लड़ाई अपने भीतर ध्रुव बनने की है।

ध्रुव की कथा का सबसे बड़ा चमत्कार यह नहीं कि उसे भगवान् मिले। सबसे बड़ा चमत्कार यह है कि उसने अपने अपमान को अपनी पहचान नहीं बनने दिया। अधिकांश मनुष्य अपने जीवन की सबसे दुखद घटना का स्मारक बन जाते हैं। वे जीवन भर उसी घटना को ढोते रहते हैं। कोई कहता है—मुझे अवसर नहीं मिला; कोई कहता है—मेरे साथ पक्षपात हुआ; कोई कहता है—समय मेरे विरुद्ध था; कोई कहता है—व्यवस्था दोषपूर्ण थी। इनमें से बहुत-सी बातें सत्य भी हो सकती हैं। संसार कभी पूर्ण न्यायपूर्ण नहीं रहा। महाभारत से लेकर आधुनिक इतिहास तक, हर युग में असमानताएँ रही हैं। किंतु ध्रुव का प्रश्न यह नहीं था कि संसार न्यायपूर्ण है या नहीं। उसका प्रश्न था—मैं अपने भीतर क्या करूँ?
यही वह क्षण है जहाँ पुराण मनोविज्ञान का ग्रंथ बन जाता है।

ध्रुव यदि चाहता तो वह राजमहल में रहकर प्रतिदिन अपने अपमान की कथा दोहराता। वह अपने मित्रों को बताता कि उसके साथ कितना अन्याय हुआ। वह अपने पिता को दोष देता, विमाता को दोष देता, भाग्य को दोष देता। धीरे-धीरे उसका संपूर्ण व्यक्तित्व शिकायत का दूसरा नाम बन जाता। इतिहास में ऐसे असंख्य लोग हुए जिनकी पहचान उनकी पीड़ा बन गई। वे अपनी प्रतिभा से नहीं, अपने आक्रोश से पहचाने गए।

पर ध्रुव ने दूसरा मार्ग चुना।वह वन चला गया।
पुराण में वन केवल वृक्षों का समूह नहीं होता। भारतीय साहित्य में वन का अर्थ है—अपने भीतर लौट जाना। जहाँ शोर समाप्त हो जाता है और साधना आरंभ होती है। जहाँ संसार की आवाज़ें मंद पड़ जाती हैं और आत्मा की आवाज़ सुनाई देने लगती है। इसीलिए हमारे ऋषि वन में गए, वाल्मीकि वन में मिले, व्यास वन में रहे, पाण्डव वन में तपे, राम वन में गए और ध्रुव भी वन गया।

आज का युवक यदि इस वन को केवल जंगल समझेगा तो कथा का आधा अर्थ ही समझ पाएगा। आज वन कहाँ है? आज का वन पुस्तकालय है। प्रयोगशाला है। अध्ययन-कक्ष है। अभ्यास का मैदान है। कंप्यूटर के सामने बिताए गए वे अनगिनत घंटे हैं जहाँ कोई ताली नहीं बजाता, कोई कैमरा नहीं होता, कोई प्रशंसा नहीं होती—केवल साधना होती है। आधुनिक वन वह एकांत है जहाँ मनुष्य अपने भविष्य का निर्माण करता है।इसीलिए ध्रुव की कथा पलायन की कथा नहीं है; वह एकांत की शक्ति की कथा है। वह कहती है कि संसार से क्षणभर हट जाना संसार से हार जाना नहीं है। कभी-कभी पीछे हटना ही सबसे बड़ी छलाँग की तैयारी होता है। आज का युवक एक विचित्र युग में जी रहा है। उसे अपने संघर्ष से अधिक दूसरों की सफलताएँ दिखाई देती हैं। सामाजिक माध्यमों ने तुलना को जीवन का स्थायी रोग बना दिया है। किसी का चयन, किसी का पुरस्कार, किसी का वेतन, किसी की उपलब्धि—सब कुछ प्रतिदिन उसकी आँखों के सामने है। परिणाम यह कि उसका ध्यान अपने तप पर कम और दूसरों के सिंहासन पर अधिक रहने लगा है।

ध्रुव की कथा इस रोग का उपचार है।ध्रुव ने अपने भाई को देखना छोड़ दिया। उसने अपना ध्यान अपने भीतर केंद्रित कर लिया। जिस दिन मनुष्य की दृष्टि प्रतिस्पर्धी से हटकर साधना पर आ जाती है, उसी दिन उसका वास्तविक विकास प्रारंभ होता है। क्योंकि तुलना ऊर्जा को बाहर खर्च करती है, जबकि तप उसी ऊर्जा को भीतर संचित करता है।यही कारण है कि भारतीय परंपरा ने "तप" शब्द का प्रयोग किया, केवल "परिश्रम" का नहीं।परिश्रम शरीर करता है; तप संपूर्ण व्यक्तित्व करता है।परिश्रम घंटे गिनता है; तप जीवन बदल देता है।परिश्रम लक्ष्य तक पहुँचाता है; तप मनुष्य को लक्ष्य से भी बड़ा बना देता है।

ध्रुव ने सिंहासन पाने के लिए तप नहीं किया था। उसने स्वयं को इतना ऊँचा बना लिया कि सिंहासन उसकी उपलब्धि का अंतिम बिंदु ही नहीं रह गया। उसे ध्रुवपद मिला—ऐसा स्थान जहाँ से वह स्वयं दिशा का प्रतीक बन गया।

ध्रुव और उत्तानपाद की यह कहानी आधुनिक युग की भी है। सिंहासन को अपने कुछ बेटे सगे लगते हैं और कुछ सौतेले। कुछ के लिए आरक्षण है, कुछ के लिए नहीं है। कुछ को 90 परसेंटाइल पर भी प्रवेश नहीं है, कुछ को -40 पर भी है। कुछ को अपने ही किसी सहपाठी की तुलना में ज्यादा गिरी आर्थिक स्थिति पर भी दस गुना शुल्क देना है। तब उन प्रतिभाशाली बेटों के पास रास्ता क्या है? शिकायत का नहीं। तप का। तप यानी परिश्रम ही नहीं असाधारण परिश्रम। ताकि यदि आरक्षण 90% भी हो जैसा तमिलनाडु में है तब भी उस पतली सी छूट गई गली से रास्ता बना पाओ। तप यानी दूसरों पर दोषारोपण नहीं। स्वयं अपना आत्म-परिष्कार। तमिल ब्राह्मण बच्चे ध्रुव की ही तरह अलग जाकर अपनी असाधारण मेहनत से बिज़नेस से लेकर शतरंज तक अपनी पहचान बना सके।

ध्रुव और उत्तानपाद की कथा केवल पुराण की कथा नहीं है; वह हर युग में जन्म लेती है। हर युग में कुछ ध्रुव होते हैं जिन्हें लगता है कि सिंहासन की गोद में बैठने का अधिकार जन्म से नहीं, योग्यता से मिलना चाहिए; फिर भी वे स्वयं को उस सिंहासन से दूर पाते हैं। आज भी अनेक युवाओं को यह अनुभव होता है कि अवसर समान नहीं हैं। किसी को प्रवेश की दौड़ में अधिक अंक लाने पड़ते हैं, किसी को अधिक शुल्क देना पड़ता है, किसी को प्रतिस्पर्धा की शर्तें अपने विरुद्ध प्रतीत होती हैं। ऐसे क्षणों में ध्रुव की कथा उन्हें एक अलग ही शिक्षा देती है।

ध्रुव ने अपने अपमान को अपने व्यक्तित्व की अंतिम परिभाषा नहीं बनने दिया। उसने प्रतिशोध का मार्ग नहीं चुना, न ही अपने जीवन को केवल शिकायत का आख्यान बनाया। वह वन की ओर गया—और वन यहाँ पलायन का नहीं, तप का प्रतीक है। तप का अर्थ केवल परिश्रम नहीं, बल्कि ऐसा अनुशासित, दीर्घकालिक और असाधारण पुरुषार्थ, जो परिस्थितियों की कठोरता से भी बड़ा सिद्ध हो जाए। ध्रुव ने सिंहासन माँगने के बजाय स्वयं को इतना ऊँचा बनाया कि उसे ध्रुवपद प्राप्त हुआ—ऐसा पद जिसे कोई छीन नहीं सकता।

आधुनिक भारत में अवसरों और सामाजिक न्याय पर मतभेद स्वाभाविक हैं। आरक्षण के समर्थन में भी गंभीर ऐतिहासिक और संवैधानिक तर्क हैं, और उसके आलोचकों के पास भी अवसरों की समानता तथा प्रतिस्पर्धा को लेकर अपने प्रश्न हैं। इन बहसों का समाधान न्यायालयों, विधायिकाओं और लोकतांत्रिक विमर्श में खोजा जाना चाहिए। किंतु ध्रुव की कथा का संदेश इन बहसों से भी ऊपर उठकर एक सार्वकालिक सत्य कहता है—परिस्थितियाँ चाहे जैसी हों, अपने पुरुषार्थ का विकल्प किसी के पास नहीं है।

भारतीय समाज में ऐसे अनेक समुदाय और परिवार मिलते हैं जिन्होंने सीमित अवसरों, कठिन प्रतिस्पर्धा अथवा अपनी अनुभूत बाधाओं के बीच भी शिक्षा, विज्ञान, उद्योग, उद्यमिता, कला और खेल के क्षेत्र में असाधारण उपलब्धियाँ अर्जित की हैं। यह किसी एक जाति, प्रदेश या वर्ग की कहानी नहीं, बल्कि उस भारतीय परंपरा की कहानी है जिसमें तप को भाग्य से बड़ा माना गया है। जहाँ अवसर संकरे हों, वहाँ तप और अधिक विराट होना पड़ता है।

ध्रुव की कथा इसलिए आज भी प्रासंगिक है कि वह हमें यह नहीं सिखाती कि व्यवस्था पर कभी प्रश्न मत उठाओ; वह यह सिखाती है कि प्रश्न उठाते हुए भी अपने पुरुषार्थ को शिथिल मत पड़ने दो। यदि मार्ग चौड़ा न मिले, तो अपनी साधना से उस संकरी पगडंडी को ही राजमार्ग बना दो। शिकायत क्षणिक संतोष दे सकती है, पर तप स्थायी सामर्थ्य देता है। ध्रुव इसी कारण ध्रुव है—क्योंकि उसने अपमान को अपनी नियति नहीं, अपनी साधना का आरंभ बना दिया।

ध्रुव इसलिए महान नहीं हुआ कि उसके साथ अन्याय हुआ। ध्रुव इसलिए महान हुआ कि उसने अन्याय को अपने व्यक्तित्व का अंतिम अध्याय नहीं बनने दिया। उसने उसे अपने तप का प्रथम अध्याय बना दिया।

अन्य सितारे केवल चमकते हैं; ध्रुव दिशा देता है क्योंकि जो अपनी पीड़ा को तप में रूपांतरित कर लेता है, वह केवल सफल नहीं होता, वह दूसरों का पथप्रदर्शक बन जाता है।

मनोज श्रीवास्तव जी का आलेख

रॉन्डा बर्न (Rhonda Byrne) की विश्व प्रसिद्ध पुस्तक 'द सीक्रेट'

रॉन्डा बर्न (Rhonda Byrne) की विश्व प्रसिद्ध पुस्तक 'द सीक्रेट'मुख्य रूप से आकर्षण के नियम पर आधारित है। यह पुस्तक बताती है कि हमारे विचार हमारे जीवन को कैसे आकार देते हैं।
इस पुस्तक की सबसे मुख्य और रहस्यमयी बातें निम्नलिखित हैं:
 1. आकर्षण का नियम ,मूलमंत्र:--"जैसा आप सोचते हैं, वैसा ही आप आकर्षित करते हैं।"
  यह ब्रह्मांड का सबसे शक्तिशाली नियम है। इसके अनुसार, आपकी भावनाएं और आपके विचार एक चुंबक की तरह काम करते हैं। आप जिस भी चीज़ के बारे में लगातार सोचते हैं (चाहे वह अच्छी हो या बुरी), वैसी ही परिस्थितियां और लोग आपके जीवन में खिंचे चले आते हैं।
2. ब्रह्मांड एक कैटलॉग की तरह है --
 इच्छा मांगना:-- ब्रह्मांड एक बड़े मेल-ऑर्डर कैटलॉग की तरह है। आप जो चाहते हैं, उसका ऑर्डर (इच्छा) ब्रह्मांड को देते हैं।
   1. मांगें :--स्पष्ट रूप से तय करें कि आप क्या चाहते हैं।
   2. विश्वास करें :-- ऐसा महसूस करें कि वह चीज़ आपको पहले ही मिल चुकी है।
   3. प्राप्त करें :- उस चीज़ को पाकर जो खुशी आपको होगी, उसे अभी महसूस करें।

 विचारों में ऊर्जा होती है-
  आपके हर एक विचार की एक आवृत्ति  होती है। जब आप कोई विचार सोचते हैं, तो वह ब्रह्मांड में जाता है और अपनी जैसी ही समान आवृत्तियों को चुंबक की तरह अपनी ओर खींचता है।
 सकारात्मकता:-- यदि आप किसी नकारात्मक चीज़ से बचने के बारे में भी बार-बार सोचते हैं, तो आप अनजाने में उसी नकारात्मक चीज़ को आकर्षित कर रहे होते हैं। इसलिए, हमेशा इस बात पर ध्यान दें कि आप *क्या चाहते हैं*, न कि इस पर कि आप *क्या नहीं चाहते*।
 4. कृतज्ञता की शक्ति ,धन्यवाद देना:-- यह जीवन को बदलने का सबसे तेज़ तरीका है। जो चीज़ें आपके पास वर्तमान में हैं, उनके प्रति आभार व्यक्त करना ब्रह्मांड को यह संकेत देता है कि आपके पास और अधिक अच्छी चीज़ें भेजी जानी चाहिए।
 चमत्कार:-- जब आप छोटी से छोटी चीज़ के लिए भी शुक्रगुजार होते हैं, तो आपके जीवन में और अधिक सुख, समृद्धि और आनंद के द्वार खुल जाते हैं।
 मानसिक अभ्यास:-- अपनी आँखें बंद करें और कल्पना करें कि आपकी इच्छा पूरी हो चुकी है। उस पल की खुशियों, महक और अनुभवों को महसूस करें।
  जब आप मन में किसी चीज़ का स्पष्ट चित्र बना लेते हैं और उसे पूरी शिद्दत से महसूस करते हैं, तो आपकी अवचेतन मन की शक्ति उसे वास्तविकता में बदलने के लिए रास्ते तलाशने लगती है।
 "आप अपने जीवन के रचयिता खुद हैं।" 'द सीक्रेट' का सबसे बड़ा रहस्य यह सिखाता है कि अपनी सोच को बदलकर, सकारात्मक भावनाओं को अपनाकर और ब्रह्मांड पर अटूट विश्वास रखकर आप अपने भाग्य को पूरी तरह बदल सकते हैं।
 आपकी भावनाएं इस बात का सबसे सटीक पैमाना हैं कि आप इस समय क्या आकर्षित कर रहे हैं।
  यदि आप खुशी, उत्साह, प्यार या कृतज्ञता महसूस कर रहे हैं, तो आप सही दिशा में हैं और अच्छी चीजें आकर्षित कर रहे हैं। यदि आप निराश, गुस्सा या दुखी महसूस कर रहे हैं, तो आप अपनी ऊर्जा को गलत दिशा में लगा रहे हैं।
  अगर आपका मूड खराब है, तो उसे तुरंत बदलें—कोई पसंदीदा गाना सुनें, हँसे, या किसी अच्छी बात के बारे में सोचें। खराब भावना को अच्छे में बदलना ही आकर्षण की दिशा बदलना है।
ज्यादातर लोग इस डर से जीते हैं कि पैसे, प्यार, या सफलता की कमी है। 'द सीक्रेट' सिखाता है कि यह ब्रह्मांड अनंत  है। यहाँ हर किसी के लिए प्रचुर मात्रा में सब कुछ मौजूद है।
  जब आप दूसरों को सफल या अमीर होते देख कर खुश होते हैं, तो आप ब्रह्मांड को यह संदेश देते हैं कि आप भी उसी प्रचुरता का हिस्सा बनना चाहते हैं। इसके विपरीत, ईर्ष्या की भावना आपको उस चीज़ से दूर कर देती है जो आप पाना चाहते हैं।
अगर आप पैसे की कमी से जूझ रहे हैं, तो आप धन को आकर्षित नहीं कर सकते, क्योंकि "कमी का अहसास" और अधिक कमी को ही खींचता है।
 अपने पास मौजूद थोड़े से पैसों के लिए भी धन्यवाद दें। जब आप महसूस करते हैं कि "मेरे पास पर्याप्त है" या "पैसा आसानी से मेरे पास आता है," तो धन की ऊर्जा आपकी ओर प्रवाहित होने लगती है। बिलों का भुगतान भी खुशी और आभार के साथ करें कि आपने उन सेवाओं का लाभ उठाया।
  दूसरों से प्यार पाने या उन्हें बदलने से पहले आपको खुद से प्यार करना होगा। यदि आप अपने अंदर कमियाँ निकालते रहेंगे, तो आप ऐसे लोग आकर्षित करेंगे जो आपकी आलोचना करें।
  रिश्तों को सुधारने का नियम यह है कि आप सामने वाले की कमियों या गलतियों पर ध्यान देने के बजाय, उनकी खूबियों और अच्छी बातों की सूची बनाएं। आप जिस चीज़ पर ध्यान देंगे, वह गुण और अधिक बढ़ता जाएगा।
 प्लेसीबो प्रभाव :--- शरीर खुद को ठीक करने की अद्भुत क्षमता रखता है। अगर कोई व्यक्ति यह मान ले कि वह ठीक हो रहा है (या उसे सिर्फ एक साधारण गोली दी जाए और वह समझे कि यह दवा है), तो उसका शरीर सचमुच ठीक होने लगता है।
  किसी बीमारी से लड़ने या उसके बारे में लगातार बात करने से बीमारी और मजबूत होती है। इसके बजाय, पूरी तरह से "स्वस्थ" होने की स्थिति पर ध्यान केंद्रित करें और महसूस करें कि आपका शरीर पूरी तरह से निरोगी है।
 आप केवल यह शारीरिक शरीर नहीं हैं, बल्कि आप एक ऊर्जावान प्राणी हैं जो ब्रह्मांड की ऊर्जा से जुड़ी हुई है।
 जब आप शांत होते हैं, ध्यान करते हैं और खुद से जुड़ते हैं, तो आपको अपनी असली शक्ति का अहसास होता है। आप ब्रह्मांड का ही एक रूप हैं, और जो शक्ति ब्रह्मांड को चला रही है, वही आपके भीतर भी है।
 समय सिर्फ एक बाधा है:-- हम अक्सर सोचते हैं कि हमारी इच्छा पूरी होने में समय क्यों लग रहा है। 'द सीक्रेट' के अनुसार, ब्रह्मांड के लिए बड़ी या छोटी कोई इच्छा नहीं होती। दस लाख डॉलर को आकर्षित करना उतना ही आसान है जितना कि एक कप कॉफी को।
  इच्छा पूरी होने में इसलिए देरी होती है क्योंकि हम बीच में संदेह , अविश्वास या डर ले आते हैं। जब आप अपनी इच्छा को लेकर सौ प्रतिशत आश्वस्त हो जाते हैं और उसमें कोई संशय नहीं रखते, तो वह तुरंत प्रकट हो सकती है। ब्रह्मांड आपके विश्वास की गति के अनुसार काम करता है।
  पुस्तक का एक बहुत ही आध्यात्मिक पहलू यह है कि आप इस ब्रह्मांड की उस महान शक्ति  से अलग नहीं हैं, बल्कि उसका एक हिस्सा हैं।
 जब आप यह समझ जाते हैं कि आपके भीतर वही ऊर्जा काम कर रही है जो पूरे ब्रह्मांड को चलाती है, तो आपके अंदर हीन भावना या डर खत्म हो जाता है। आप खुद को अपने जीवन का सर्वेसर्वा और भगवान का एक रूप महसूस करने लगते हैं।
 आप केवल 'वर्तमान'  में ही ऊर्जा पैदा कर सकते हैं। यदि आप अपने अतीत की असफलताओं या भविष्य की चिंताओं में उलझे रहते हैं, तो आप वर्तमान की शक्ति को खो देते हैं।
  यदि आप भविष्य में अमीर या खुश होना चाहते हैं, तो उसकी शुरुआत आपको अभी से करनी होगी। आपको वर्तमान क्षण में ही अमीर और खुश महसूस करना होगा, क्योंकि ब्रह्मांड भविष्य की नहीं बल्कि आपके वर्तमान विचारों और भावनाओं की प्रतिक्रिया देता है।
  हमारे दिमाग में रोजाना हजारों विचार आते हैं, जिनमें से ज्यादातर नकारात्मक या बेकार होते हैं। ध्यान वह जरिया है जो आपके विचारों को थामता है।
 जब आप ध्यान के जरिए अपने मन को शांत करते हैं, तो आप ब्रह्मांड की ऊर्जा से सीधे जुड़ जाते हैं। यह आपको मानसिक स्पष्टता देता है और आपके लिए सही फैसले लेना आसान बनाता है। दिन में केवल कुछ मिनट का मौन आपके पूरे जीवन को बदल सकता है।
 खुशी ही सबसे बड़ा मार्गदर्शक है: 'द सीक्रेट' का सबसे सरल और गहरा संदेश यह है कि "जो आपको सबसे ज्यादा खुशी दे, वही करें।"
 जब आप अपनी पसंद का काम करते हैं और हर पल आनंदित रहते हैं, तो आपकी ऊर्जा का स्तर सबसे ऊंचा होता है। इस उच्च ऊर्जा  की स्थिति में आप जो भी चाहते हैं, वह चुंबक की तरह आपकी तरफ खिंचा चला आता है। आनंद में रहना ही जीवन का सबसे बड़ा रहस्य है।

रॉन्डा बर्न (Rhonda Byrne) एक विश्व प्रसिद्ध ऑस्ट्रेलियाई लेखिका, टेलीविज़न निर्माता और उद्यमी हैं। उन्हें मुख्य रूप से उनकी क्रांतिकारी पुस्तक 'द सीक्रेट' (The Secret)और इसी नाम से बनी डॉक्यूमेंट्री फिल्म के लिए जाना जाता है, जिसने पूरी दुनिया में लाखों लोगों के जीवन को देखने का नजरिया बदल दिया।
 जन्म:-- रॉन्डा बर्न का जन्म 12 मार्च 1945 को ऑस्ट्रेलिया के मेलबर्न शहर में हुआ था।
 टेलीविज़न निर्माता:--'द सीक्रेट' लिखने से पहले, वह ऑस्ट्रेलिया में एक सफल टेलीविज़न निर्माता थीं। उन्होंने कई लोकप्रिय टीवी शो और वृत्तचित्र बनाए, जिससे मीडिया जगत में उनकी अच्छी पहचान बनी।
 जीवन का संकट:-- साल 2004 का दौर रॉन्डा के जीवन में बेहद कठिन था। उनके पिता का अचानक निधन हो गया था, वह व्यावसायिक रूप से भारी तनाव में थीं और उनका मानसिक व शारीरिक स्वास्थ्य भी बहुत बिगड़ चुका था।
 बदलाव का मोड़:--इस गहरी निराशा के दौर में उनकी बेटी ने उन्हें वॉटसन डी. वाटल्स की 1910 की एक पुरानी पुस्तक 'द साइंस ऑफ गेटिंग रिच' (The Science of Getting Rich) पढ़ने के लिए दी।
 उस किताब को पढ़ने के बाद रॉन्डा के मन में जिज्ञासा जागी कि दुनिया के इतिहास के महानतम लोगों (जैसे आइंस्टीन, बीथोवेन, प्लेटो) ने सफलता के किन नियमों का पालन किया था। उन्होंने दुनिया भर के धर्मों, दर्शन और इतिहास में छिपे आकर्षण के नियम (Law of Attraction) पर गहरी खोजबीन शुरू की।
 'द सीक्रेट' फिल्म और पुस्तक की सफलता (2006)
 डॉक्यूमेंट्री फिल्म:--अपनी खोज और दुनिया भर के आधुनिक विचारकों व गुरुओं के साक्षात्कारों को मिलाकर उन्होंने 2006 में 'द सीक्रेट' नाम से एक डॉक्यूमेंट्री फिल्म रिलीज़ की, जो ग्लोबल हिट साबित हुई।
 इसी वर्ष (2006) उन्होंने इसी नाम से पुस्तक भी प्रकाशित की। यह किताब रिलीज़ होते ही इतिहास की सबसे ज्यादा बिकنے वाली किताबों में शामिल हो गई। इसका अनुवाद दुनिया की दर्जनों भाषाओं में हो चुका है और करोड़ों कॉपियां बिक चुकी हैं।
'द सीक्रेट' की अपार सफलता के बाद रॉन्डा बर्न ने इसी श्रृंखला में कई अन्य बेहतरीन पुस्तकें लिखीं, जो व्यक्तिगत विकास और आध्यात्मिकता पर आधारित हैं:
 द पावर (The Power - 2010):--इसमें बताया गया है कि ब्रह्मांड की सबसे बड़ी शक्ति 'प्रेम' (Love) है और कैसे भावनाएं हमारे जीवन को संचालित करती हैं।
 द मैजिक (The Magic - 2012):-- यह पुस्तक पूरी तरह से 'कृतज्ञता' (Gratitude) और 28 दिनों के जादुई अभ्यासों पर आधारित है।
 हीरो (Hero - 2013):--इसमें बारह सफल हस्तियों के जीवन के संघर्ष और सफलता के रास्ते को दिखाया गया है।
 द ग्रेटेस्ट सीक्रेट (The Greatest Secret - 2020):-- यह पुस्तक भौतिक आकर्षण के नियम से आगे बढ़कर गहरे आध्यात्मिक सत्य और आंतरिक शांति  को प्राप्त करने पर जोर देती है।
 टाइम मैगजीन:--2007 में 'टाइम' (Time) पत्रिका ने रॉन्डा बर्न को दुनिया के 100 सबसे प्रभावशाली लोगों की सूची में शामिल किया था।
  उन्हें आधुनिक समय में 'आकर्षण के नियम' को आम जनमानस तक पहुँचाने और लोगों को सकारात्मक सोच व जीवन जीने की प्रेरणा देने के लिए दुनिया भर में याद किया जाता है

औपनिषदिक ज्ञान बनाम यूरोपीय रेनेसां:

औपनिषदिक ज्ञान बनाम यूरोपीय रेनेसां:

प्राचीन भारतीय ज्ञान को मानव जाति की सर्वोच्च उपलब्धि मानने में वर्तमान बौद्धिकों को भले ग्लानि हो रही हो किंतु पश्चिमी दार्शनिकों को इस सच्चाई को स्वीकार करने में कोई संकोच नहीं था।
जिन दार्शनिकों ने भारतीय संस्कृति की भूरि-भूरि प्रशंसा की उनमें जर्मन दार्शनिक फ्रेडरिक वोन श्लेगल और आर्थर शोपेनहावर प्रमुख हैं। इसी परंपरा में महान रूसी उपन्यासकार टाल्सटाय भी आते हैं ।

1808 में श्लेगल ने भारतीय ज्ञान की प्रशंसा में एक किताब लिखी थी, जिसका नाम ' आन द लैंग्वेज एंड विज्डम आफ इंडियन्स ( On the Language and Wisdom of the Indians) है।
 विदित हो कि उन्होंने उपनिषदों में निहित ज्ञान की तुलना यूरोप के रेनेसां से की थी। फलत: विदेशों में यूरोपीय विचारकों के बीच हिंदू धर्म और संस्कृत साहित्य के प्रति भारी जिज्ञासा पैदा हो गई। इनके अध्ययन के लिए यूरोप के विश्वविद्यालयों में इंडोलोजी विभाग तक खुल गए। अपने भाई की सहायता से स्वयं श्लेगल ने संस्कृत भाषा का प्रेस खोला।
उनका मानना था कि विश्व की सभी भाषाओं की जननी संस्कृत है तथा दुनिया की सभी सभ्यताओं ने राजनीतिक गठन के तौर तरीके भारत से सीखे।

 शोपेनहावर ने तो यहां तक कह दिया कि उपनिषदों के अध्ययन से अधिक कल्याणकारी और उत्थान प्रवण दुनिया में कोई दूसरा ग्रंथ नहीं है। वेद , उपनिषद और श्रीमद्भागवत के बारे उनकी उक्ति बहुत प्रेरणास्पद है।
 उनका मानना था कि ये ग्रंथ मानव बुद्धि की उच्चतम अभिव्यक्ति हैं । अपने इस विचार को उन्होंने 'वर्ल्ड ऐज विल एंड रिप्रेजेंटेशन ' में कलम बद्ध किया है। 
बताते चलें कि भारतीय ज्ञान परंपरा को यूरोप तक पहुंचाने में मुसलमानों का हाथ रहा है। इस्लामिक विद्वानों ने ही पहले उपनिषदों का अनुवाद फारसी में किया था। दारशिकोह के शासन काल में यह कार्य संपन्न हुआ था।
  फिर उपनिषद फारसी से लैटिन भाषा में अनुदित हुए। शोपेनहावर ने जिस भाषा में उपनिषदों को पढ़ा , वह लैटिन भाषा ही थी। दरअसल उपनिषदों का लैटिन में अनुवाद फ्रांस के एक विद्वान ने किया था।
 शोपेनहावर उक्त ग्रंथों से इतने अविभूत थे कि उन्होंने यह विश्वास व्यक्त किया था कि भारतीय ज्ञान एक न एक दिन पश्चिम में प्रवाहित होगा और यूरोपीय विचारों और संस्कृति में मौलिक बदलाव लाएगा । विडंबना है कि उसी ज्ञान और दार्शनिक परंपरा को हम कीड़ा -मकोड़ा समझते हैं। 

एक ओर विदेशी धरती की ओर से भारतीय ज्ञान की इतनी अभिपुष्टि और इतना सम्मान और दूसरी ओर भारतीय माटी से इस ज्ञान का इस रूप में खंडन व अपमान, यह समझ से परे है! 
पर ज्ञान है क्या? 
ज्ञान कोई दिखाई पड़ने वाली चीज नहीं है। यह फुदकने वाली कोई चिड़िया नहीं है। बल्कि यह चीजों के बारे में आंतरिक समझ को व्यक्त करने वाला एक प्रत्यय ( आइडिया ) और प्रत्ययों का समूह है जो शाब्दिक अभिव्यक्ति पाकर एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति तक तथा एक समाज के दूसरे समाज तक संचरित होता है।

दृष्टांत के तौर पर वेदांत और उपनिषदों की यह स्थापना कि' सभी चीजों में ईश्वर या परमात्मा का अंश है ' , एक ज्ञान है जिसका सहज संदेश यह है कि संसार के चर- चराचर सभी प्राणियों व पदार्थो के प्रति हमें आदर का भाव रखना चाहिए व उनसे प्रेम करना चाहिए।
दूसरी ओर बाइबल के पूराने विधान ( ओल्ड टेस्टामेंट) का यह प्रावधान भी एक ज्ञान है कि दुनिया के सभी चर चराचर पदार्थ मनुष्य और खासकर पुरुषों के उपभोग के लिए ईश्वर द्वारा बनाए गए हैं। बाइबल के जेनेसिस नामक किताब ( अध्याय) में यह विचार देखा जा सकता है।   
बाइबल के इसी अध्याय में यह भी लिखा है कि औरतें पुरषों के मनोरंजन के लिए बनाई गई हैं। 
एक तरफ ' तेन त्यक्तेन भुंजीथा:" ईशावास्य उपनिषद का श्लोक है जहां त्याग के साथ भोग करने की शिक्षा है वही बाइबल हमें मह सिखाता है कि दुनिया खाकर- पीकर हजम करने के लिए है। स्त्रियों पर पुरूष वर्चस्व ही नहीं, सामी धर्म के राजनीतिक वर्चस्व की जड़ भी बाइबिल के पुराने विधान में है।

सवाल है कि कौन सा ज्ञान मनुष्योचित है? भारत का वह ज्ञान जहां स्त्री अर्धनारीश्वर के रूप में समता की अधिकारी है या वह जहां स्त्री पुरूषों के लिए केवल मौज- मस्ती की वस्तु है। 
आप कहेंगे कि भारत में भी तो स्त्रियों की दुर्दशा है। यहां तो स्त्रियां यूरोप से भी तुच्छ अवस्था में हैं। हां, हो सकती हैं पर मैं बात वर्तमान यथार्थ की नहीं कर रहा हूं, बल्कि बात उस कसौटी की कर रहा हूं, जिसे हमने जाने- अनजाने पीछे धकेल दिया है। 
कसौटी निखारने से निखरती है। यह निरंतर व्याख्या से संवरती और दैनिक जीवन में उतरती है। 
क्या वर्ग संघर्ष के विचारों का संश्रव भारतीय मार्क्सवादियों के मानस में एक दिन में हुआ है या दशकों के प्रचार-प्रसार से यह संभव हुआ ? 
वस्तुत: जब शोपेनहावर यूरोपीय संस्कृति में मौलिक बदलाव की बात करते हैं तो उनका संदर्भ यही है।
 यह सन्दर्भ महान विचारक और उपन्यासकार लियो टाल्सटाय तक आते-आते कितना खुल कर सामने आ जाता है, यह उनके लेखन और उनके अपने जीवन में स्पष्ट झलकता है।

 टॉलस्टॉय कुलीन घराने से आते थे। हजारों दास थे और अपार संपत्ति थी। परंतु उनपर उपनिषद, श्रीमद्भागवत और वेदांत का प्रभाव इस कदर हुआ कि उन्होंने स्वेच्छा से न केवल दरिद्रता का जीवन अपनाया बल्कि इसके प्रवक्ता बन गए।

स्वेच्छा से दरिद्रता अपनाने की बात हमें अटपटी लग सकती है, पर यह ज्ञान भारतीय जीवन दर्शन का अभिन्न अंग है और कई- कई आदर्शों में यह एक प्रमुख आदर्श है। और आदर्श अटपटे ही होते हैं।
वस्तुत: मनुष्यता और इंसानियत की रट लगाने से हम मनुष्य नहीं बन जाएंगे। उसके लिए आदर्श प्रस्तुत करने पड़ते हैं।
 जब महर्षि याग्यबल्क्य अपनी पत्नी मैत्रेयी को सांसारिक संपत्ति सौंपने लगे तो मैत्रेयी ने कहा कि जो धन और ऐश्वर्य आदमी को मनुष्य न रहने दे, वह लेकर हमें क्या करना है।
"तवैव वाहास्तव नृत्यगीते , 
येनाहं नामृता स्यां किमहं तेन कुर्याम।"

 दरअसल दरिद्रता अभिशाप तब है जब किसी पर आरोपित की जाए, किंतु जब इसे अपनी इच्छा से अंगीकार किया जाय तो यह एक मानवीय आदर्श बन जाता है। स्वार्थ और कर्तव्य के बीच द्वंद्व में कर्तव्य की जीत ही आदर्श है।

 दरिद्रता एक बरदान भी है क्योंकि यह धन- दौलत, यश और पैसे के प्रलोभन से हमें रोकती है। हमारे सामने इसके अनन्य उदाहरण हैं किंतु हम टाल्सटाय का ही अभी उल्लेख करते हैं।

टॉलस्टॉय पहले माशांहारी थे, वे शाकाहारी बन गए। दासों को मुक्त कर दिया और एक परीब्राजक का जीवन अपना लिया। वे एक ईसाई थे तथा ईसा मसीह द्वारा दिए गये " सरमन आफ दि माउंट" को ईसाई धर्म की रीढ़ मानते थे किंतु नए तरीके का जो जीवन टाल्सटाय ने अपनाया , उसकी प्रेरणा उन्होंने बाइबल से नहीं ली बल्कि भारतीय जीवन दर्शन और उपनिषदों से ली।

 गौरतलब है कि अहिंसा में श्रद्धा रखने और चर्च के बर्चस्ववादी रूप की भर्त्सना के कारण उन्हें 1901 में चर्च से निष्कासित कर दिया गया। दरअसल स्वामी विवेकानंद की शिक्षाओं और भाषणों को सुनने और उनकी पुस्तकों के अध्ययन से रूढ़िवादी ईसाई धर्म से टाल्सटाय का मोहभंग हो गया था । 
गरज यह कि हमने बाइबल और पश्चिम के उपभोगवादी दर्शन को हृदयंगम कर लिया है, हम अचानक वेदांत और उपनिषदों द्वारा विहित त्याग और मूल्यों पर आधारित जीवन अख्तियार करने से रहे किन्तु उन ग्रंथों को अपमानित करने तथा भारतीय ज्ञान परंपरा को कोसने की अपनी धृष्टता पर थोड़ा अंकुश तो लगा ही सकते हैं!