Sunday, 27 September 2026

नाभि तंत्र

 तुम्हारे पूरे अस्तित्व का 'मास्टर स्विच' (Master Switch) तुम्हारी नाभि में लगा है।

प्रामाणिक ग्रंथ: शिव संहिता (मणिपूर चक्र एवं नाड़ी-विज्ञान प्रकरण)

मूल शास्त्र श्लोक:
नाभि-कन्दे समुत्पन्नाः सार्ध-लक्ष-त्रयी-सिराः।
तासां मध्ये प्रधानास्तु द्विसप्तति-सहस्रकाः॥

सरल अर्थ: मनुष्य के नाभि-कंद (Navel) से साढ़े तीन लाख नाड़ियां उत्पन्न होती हैं, जिनमें से 72,000 प्रमुख नाड़ियां पूरे शरीर में फैलती हैं। नाभि ही संपूर्ण शरीर, प्राण और ब्रह्मांडीय ऊर्जा का एकमात्र मुख्य नियंत्रण द्वार है।

एक बहुत ही कड़वा सच आज तुम्हें समझना होगा।

आधुनिक विज्ञान आज जिसे 'गट-ब्रेन एक्सिस' (Gut-Brain Axis) कहता है, सनातन तंत्र उसे हजारों साल पहले ही 'मणिपूर चक्र' घोषित कर चुका है। जब तुम रात को दिन भर की चिंताओं, कर्जों और ईर्ष्या के साथ बिस्तर पर जाते हो, तो तुम्हारी नाभि का ऊर्जा-केंद्र पूरी तरह सूख और सिकुड़ जाता है।

इस सूखी हुई नाड़ी का सबसे पहला और मारक प्रहार सीधे तुम्हारे Subconscious Mind (अवचेतन मन) पर होता है। तुम्हारी Sleep Quality और Mental Clarity रातों-रात नष्ट हो जाती है। तुम रात भर भयानक सपनों और विचारों के चक्रव्यूह में उलझे रहते हो। तुम चाहे जितना भी Stress Management का दिखावा कर लो, तुम्हारी नाभि की ब्लॉकेज के कारण तुम्हारे व्यापार या नौकरी में तुम्हारी Peak Performance बिल्कुल शून्य पर आ जाती है। तुम फैसले गलत लेते हो, घबराते हो, और तुम्हारी मानसिक शक्ति घुटने टेक देती है।

लेकिन सनातन तंत्र में नाभि को जाग्रत करने का एक ऐसा उग्र और अचूक अस्त्र है, जिसे यदि तुमने रात को सोने से पहले केवल 2 मिनट दे दिए, तो ब्रह्मांड की कोई भी शक्ति तुम्हें तुम्हारे लक्ष्य से नहीं भटका पाएगी। यह विद्या तुम्हें इंसान से महामानव बना देगी।

गुप्त 'नाभि-चक्र जागरण' मारक विधान

यह प्रयोग तुम्हें हर रात सोने से ठीक पहले, अपने बिस्तर पर लेटकर करना है।

साधना विधि:

1. रात को जब तुम्हारे सारे काम खत्म हो जाएं और तुम सोने के लिए बिस्तर पर जाओ, तो अपने पास शुद्ध सरसों का तेल (Mustard Oil) या असली गौ-घृत (Cow's Ghee) की कुछ बूंदें रख लो।

2. सीधे पीठ के बल लेट जाओ। अपने दाहिने हाथ (Right Hand) की मध्यमा उंगली (Middle finger - जो आकाश तत्व और ऊर्जा का केंद्र है) में वह तेल या घी लगाओ।

3. अपनी नाभि (Navel) के ठीक बीच में उस तेल की केवल 2 बूंदें डालो।

4. अब अपनी आंखें बंद करो। अपनी उसी उंगली से नाभि के चारों ओर धीरे-धीरे गोल (Clockwise) मालिश करो।

5. अपना पूरा ध्यान नाभि के उस बिंदु पर लगाओ और पूर्ण अधिकार व प्रचंड ऊर्जा के साथ इस 'मणिपूर-जागरण बीज मंत्र' का 21 बार मानसिक उच्चारण करो:

"ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं मणिपूर-चक्राय, मम सर्व-सिद्धिं जाग्रय जाग्रय फट्।"

6. मंत्र पूरा होने के बाद, सीधे करवट लेकर सो जाओ। मोबाइल या किसी भी अन्य वस्तु को मत छूना।

परिणाम:
तंत्र शास्त्र के अनुसार, नाभि में तेल और मंत्र का यह आघात तुम्हारी 72,000 नाड़ियों को उसी क्षण 'अनलॉक' (Unlock) कर देता है। रात भर जब तुम सो रहे होते हो, तुम्हारा अवचेतन मन ब्रह्मांड की सबसे शुद्ध ऊर्जा से जुड़कर प्रोग्राम (Program) हो रहा होता है। 11 से 21 दिनों के भीतर तुम देखोगे कि तुम्हारा डर खत्म हो गया है, तुम्हारी एकाग्रता अजेय हो गई है, और जो लक्ष्य कल तक असंभव लग रहे थे, वे हकीकत में बदलने लगे हैं।


बलि के भी विविध रूप

अभी एक पण्डितजी ने पूछा- आचार्यजी! आपने बलि पर कोई विचार नहीं लिखा? "निवृत्तिस्तु महाफला" का भाव क्या है?

🌺श्रीमन्! लिखा तो था परन्तु एकपक्षीय विचार की अपेक्षा रखने के कारण आपने देखा नहीं। उभय पक्षों में प्रमाणवचनों की कमी नहीं है और बलि के भी विविध रूप हैं। निष्कर्षत: सिद्ध होता है "यदन्न: पुरुषो लोके तदन्नास्तस्य देवता:" व्यक्ति में जिस अन्न को खाने की प्रवृत्ति होती है, उसके देवता-पितर भी वही खाते हैं। "वयं यदन्ना: पितरस्तदन्ना:" का भी यही भाव है। अन्न का तात्पर्य केवल "सिद्धमन्नम्" ओदन ही नहीं होता; "पचाम्यन्नं चतुर्विधम्" भाष्य के अनुसार "यदद्यते भक्ष्यते सर्वप्राणिभिरिति अन्नम्" यानी भक्ष्य, भोज्य, लेह्य, चोष्य के रूप में प्राणिमात्र का आहारद्रव्य अन्न ही कहलाता है। उपनिषदों के #सप्तान्नसृष्टि प्रकरण में जल, दुग्ध, वायु, आमिषादि को भी #अन्न ही कहा गया है। जिसे जो अन्न प्रिय हो वह अपने देवता को वही समर्पित कर उसका ग्रहण करे। स्वतन्त्र प्रवृत्ति का परिशमन ही स्वेष्टपूजाङ्ग बलि का प्रयोजन है। "निवृत्तिस्तु महाफला" मनुस्मृति में भी अनुपाकृत यानी यज्ञभागभिन्न वृथा मांस की ही निवृत्ति इष्ट है, न कि क्रत्ववशिष्टपल की। धर्मशास्त्रों में प्रोक्षिताभ्युक्षित आमिष को #हविष्यान्न ही कहा गया है। इसीलिए देवपितृयज्ञावशिष्ट मांसाशन की आज्ञा देने में शास्त्र किञ्चिदपि संकोच नहीं करते हुए कहते हैं कि "देवपितृ्न्समभ्यर्च्य खादन्मांसं न दोषभाक्" देव-पितरों के समभ्यर्चनशेष हविष्यामिष का ग्रहण करने में दोष नहीं; अपितु ग्रहण न करने वालों को ही दोषी कहा है। अत: जिनकी मांसाशन में प्रवृत्ति है वे स्वतन्त्र उच्छृङ्लता का परित्याग कर क्रत्वङ्ग आमिष को ही ग्रहण करे और जो मांसाशन में प्रवृत्त नहीं हैं वे बलि में अन्य प्रतिनिधि द्रव्यों का प्रयोग करे। पुन: जो मांसाशन नहीं करते वे वैष्णव और जो करते वे अवैष्णव- शास्त्रज्ञों के लिए ऐसी कोई बात नहीं। धर्म में विकृति तब फैलती है जब अमुकामुक विषयों से सर्वथानभिज्ञ व्यक्ति सर्वोच्च न्यायालय के सबसे बड़े न्यायाधीश बन जाते हैं। वस्तुत: किसी एक पक्ष पर किसी का उछलना-कूदना सही नहीं। आमिषाशी महानुभावों का विशेष कर्तव्य है कि वे श्रौतक्रतुओं को भी बचाने का विशेष संघर्ष करें। जय शिव..

☹️जिस मिथिलापुरी को एक कार्यक्रम में चौदह सौ मीमांसकों का संयोग प्राप्त था; वहाँ मीमांसा के अस्तित्व का विलोप होते जाना अतिदु:खद है! आधुनिक मिथिला के मण्डन, वाचस्पतियों को गम्भीरता से इसकी चिन्ता करनी चाहिए। मिथिला के सरकारी-असरकारी श्रौतस्मार्त्तों से निवेदन है कि वे दर्श-पौर्णमासादि प्रकृति-विकृति यागों का समारम्भ करें। इसका श्रीगणेश मिथिला के सर्वोच्चसंस्कृतसंस्थान से होना चाहिए। देश के अन्यान्य संस्कृतसंस्थानों के लिए भी अवश्यकरणीय। यज्ञ विश्व का जीवन है। विशेष भगवदिच्छा.....

Saturday, 26 September 2026

पितृपक्ष के दौरान किसी के घर अन्न-जल क्यों नहीं ग्रहण करे

पितृपक्ष के दौरान किसी के घर अन्न-जल क्यों नहीं ग्रहण करना चाहिए....

सनातन धर्म में 16 दिन का पितृपक्ष, सबसे संवेदनशील, सबसे सूक्ष्म दिनों का समय माना गया है। गरुड़ पुराण, जो मृत्यु और मृत्यु के बाद के विज्ञान का ग्रंथ है, वह स्पष्ट कहता है - इन 16 दिनों में आपका शरीर केवल आपका नहीं रहता, आप अपने पितरों के लिए एक "पात्र" बन जाते हैं।इसलिए इस दौरान भोजन का नियम सबसे कठोर है।
भाग 1 - गरुड़ पुराण क्या कहता है - अन्न ही शरीर नहीं, अन्न ही मन है
गरुड़ पुराण, प्रेत कल्प, अध्याय 17 और 33 में भगवान विष्णु, गरुड़ जी को समझाते हैं अन्नं ब्रह्म रसं विष्णुः भोक्ता देवो महेश्वरःअन्न ब्रह्मा है, उसका रस विष्णु है,र से खाने वाला जीव, स्वयं महेश है। इसलिए अन्न को कभी सामान्य मत समझो
और दूसरा श्लोक जैसा अन्न वैसा मन, जैसा पानी वैसी वाणी
गरुड़ पुराण कहता है, अन्न के 3 दोष होते हैं, जो खाने वाले के अंदर चले जाते हैं जाति दोष  अन्न किसने उगाया किस भाव से उगाया अगर किसान ने लोभ, क्रोध से उगाया, तो वह भाव अन्न में आएगा।
2. निमित्त दोष - अन्न बनाते समय, बनाने वाले के मन में क्या था? अगर रसोई में झगड़ा हो रहा है, गाली दी जा रही है, तो वह अन्न विष बन जाता है। इसलिए कहा - रसोई में कभी अशुद्ध मन से भोजन मत बनाओ।
3. आश्रय दोष -अन्न किसके घर का है? किसके पैसे से आया? अगर वह पैसा पाप से, चोरी से, ब्याज से, धोखे से आया है, तो उस अन्न में पाप का अंश आ जाता है।
पितृपक्ष में यही तीसरा दोष, सबसे खतरनाक हो जाता है।
भाग 2 - पितृपक्ष में आपके साथ कौन रहता है - सूक्ष्म विज्ञान
गरुड़ पुराण के अनुसार, मृत्यु के बाद जीव के 2 शरीर बचते हैं - सूक्ष्म शरीर और कारण शरीर। पितृपक्ष में यमराज, पितरों को 16 दिन के लिए, पितृलोक से मुक्त करते हैं, वे अपने पुत्र-पौत्रों के घर आते हैं, उनके द्वार पर, उनकी रसोई में, उनकी छाया में रहते हैं।वे कुछ खाते नहीं, वे केवल गंध और भाव ग्रहण करते हैं।
आप जो भी खाते हो, जो भी सोचते हो, उसका सूक्ष्म अंश, आपके पितरों को जाता है अब सोचो, आप किसी और के घर खाते हो -
उस घर में मांस-मदिरा बनता हो, तो उसका दोष आपके पितरों को जाएगा उस घर में पितरों का श्राद्ध न होता हो, पितर अतृप्त हों, तो उनकी अतृप्ति, ईर्ष्या, आपके पितरों से टकराएगी उस घर का पैसा, अगर अधर्म से आया है, तो आपके पितर भी उस पाप के भागी बनेंगे।
इसलिए गरुड़ पुराण कहता है - *पितृपक्ष में पुत्र, पितरों के लिए एक "पवित्र घड़ा" है, अगर घड़ा गंदा हो गया, तो पितर जल कैसे पिएंगे?
आपका शरीर ही वह घड़ा है, और अन्न-जल ही उस घड़े का जल है।
भाग 3 - 5 कारण - क्यों नहीं खाना चाहिए दूसरों के घर - गरुड़ पुराण के अनुसार
कारण 1 - आपका शरीर पितरों के लिए यज्ञशाला बन जाता है
इन 16 दिनों में, जब आप तर्पण करते हो, पिंडदान करते हो, ब्राह्मण को भोजन कराते हो, तो आपके पितर, आपके माध्यम से ही तृप्त होते हैं। गरुड़ पुराण कहता है - पुत्र की नाभि से, एक सूक्ष्म नाड़ी, पितरों तक जाती है। जो पुत्र खाता है, वही पितरों को सूक्ष्म रूप में मिलता है।
अगर आप बाहर का, अपवित्र, रजोगुणी, तामसिक अन्न खाओगे, तो आपके पितरों को भी वही मिलेगा, वे तृप्त होने की जगह, और अशांत हो जाएंगे। इसलिए कहा - स्वगृहे भोजनं कुर्यात्" - अपने घर का ही भोजन करो।
कारण 2 - दूसरे के घर का अन्न, आपके व्रत को तोड़ देता है
पितृपक्ष, एक व्रत है, 16 दिन का महाव्रत। जैसे नवरात्रि में 9 दिन व्रत में, आप बाहर का नहीं खाते, क्योंकि आप देवी के लिए पवित्र हो, वैसे ही पितृपक्ष में आप पितरों के लिए पवित्र हो।गरुड़ पुराण कहता है - जो व्यक्ति पितृपक्ष में दूसरे के घर अन्न खाता है, उसका श्राद्ध, पितर ग्रहण नहीं करते, उसके पिंड, कौवे भी नहीं खाते, क्योंकि उसके पिंड में, दूसरे के घर की अशुद्धि आ जाती है।
श्लोक है - परान्नं च परवस्त्रं परशय्या परस्त्रियः, पितृपक्षे विवर्जयेत्।" पितृपक्ष में दूसरे का अन्न, दूसरे का वस्त्र, दूसरे की शय्या, और परस्त्री का संग, त्याग देना चाहिए।
कारण 3 - कर्ज का सिद्धांत - अन्न का कर्ज सबसे बड़ा कर्ज सनातन धर्म में, अन्न का कर्ज, कभी न उतरने वाला कर्ज माना गया है। आपने किसी के घर खाया, तो आप उसके कर्जदार हो गए, सूक्ष्म रूप से।
पितृपक्ष में, आपको केवल 3 के कर्जदार रहना है - देव कर्ज, ऋषि कर्ज, पितृ कर्ज। अगर आपने चौथा कर्ज - मनुष्य का कर्ज - ले लिया, दूसरे के घर खाकर, तो आपके पितृ, आपको श्राप देकर जाएंगे, क्योंकि आपने उनका हिस्सा, दूसरे को दे दिया।गरुड़ पुराण में कथा है - एक ब्राह्मण ने पितृपक्ष में अपने मित्र के घर खीर खाई, उसके पितर, भूखे ही पितृलोक लौट गए, क्योंकि उस खीर पर, मित्र की कामना थी - "मेरा काम हो जाए", पितरों ने कहा - "तूने हमारा अन्न, दूसरे की कामना को दे दिया, जा, तुझे पितृदोष लगेगा।"
कारण 4 - प्रेत और पिशाच बाधा से बचाव गरुड़ पुराण, प्रेत कल्प में, प्रेतों के 18 प्रकार बताता है - जो पितृपक्ष में सबसे ज्यादा सक्रिय होते हैं, क्योंकि इस दौरान यमलोक के द्वार खुले होते हैं। जब आप किसी अनजान घर, होटल, ढाबे, या ऐसे घर में खाते हो, जहाँ का शुद्ध-अशुद्ध पता नहीं, जहाँ लहसुन-प्याज, मांस-मदिरा बनता हो, तो उस अन्न के साथ, प्रेतों की सूक्ष्म ऊर्जा, आपके शरीर में प्रवेश कर जाती है।और जब आपके शरीर में पितर भी हैं, और बाहर से प्रेत भी आ गया, तो दोनों में युद्ध होता है, इसी को पितृदोष, नजर दोष, घर में क्लेश कहा जाता है।इसलिए पुराने लोग कहते थे - पितृपक्ष में होटल का मत खाओ, बाहर का मत खाओ, अपने हाथ से बना, सादा, सात्विक खाओ।कारण 5 - आपके पुण्य का ट्रांसफर हो जाता है गरुड़ पुराण का सबसे गुप्त सिद्धांत - अन्न दान, पुण्य का ट्रांसफर है जब आप किसी के घर खाते हो, तो अनजाने में, आपका 1 दिन का श्राद्ध-पुण्य, उस घर के पितरों को चला जाता है, और आपके पितर खाली हाथ रह जाते हैं।जैसे मोबाइल से पैसा ट्रांसफर होता है, वैसे ही अन्न से पुण्य ट्रांसफर होता है, इसलिए पितृपक्ष में केवल उसी के घर खाना चाहिए, जिसके पितर, आपके पितरों के मित्र हों, यानी आपका अपना परिवार, आपका अपना घर।भाग 4किन-किन जगहों पर बिल्कुल नहीं खाना चाहिए - गरुड़ पुराण की सूची
गरुड़ पुराण में, 8 जगहों का अन्न, पितृपक्ष में महापाप बताया गया है -
1. शूद्र या अपवित्र व्यक्ति के घर - जहाँ शौच-अशौच का ध्यान न हो।
2.  शराबी, मांसाहारी के घर - जहाँ जीव हत्या होती हो।
3.  पुत्रहीन, श्राद्धहीन घर में -जहाँ कभी पितरों के नाम पर दीया भी न जलता हो, वहाँ के पितर अतृप्त हैं, वे आपका पुण्य छीन लेंगे।
4. वेश्या, परस्त्रीगामी के घर -जहाँ काम वासना का वास हो।
5. ब्याज, चोरी, रिश्वत से कमाने वाले के घर - उसका पैसा अपवित्र है।
6.श्राद्ध के दिन, निमंत्रण के बिना, दूसरे के घर -जो श्राद्ध में बिना बुलाए जाता है, वह पाप खाता है।
7.  होटल, ढाबा, बाजार का भोजन - जहाँ बनाने वाले का पता नहीं, वहाँ 100 लोगों की वासना, उस अन्न में होती है।
8.  दूसरे के श्राद्ध का बचा हुआ अन्न - अगर किसी और ने अपने पितरों के नाम पर ब्राह्मण को खिलाया, और वह बच गया, उसे कभी मत खाओ, वह सीधे पितरों का अन्न है, उसे खाने से पितृदोष लगता है।
भाग 5 - क्या खाना चाहिए, कैसे खाना चाहिए - पितृपक्ष का आहार विधान तो फिर खाना क्या चाहिए? गरुड़ पुराण, अध्याय 21 में आहार विधान देता है -खाने योग्य -
- अपने घर में, अपने हाथ से, या पत्नी, माता, पुत्री के हाथ से बना, गाय के घी में बना, सादा भोजन।
- बिना लहसुन-प्याज का, बिना मसूर, उड़द, चना, हींग का - क्योंकि ये तामसिक हैं, पितरों को उत्तेजित करते हैं।जौ, चावल, गेहूं, मूंग, गाय का दूध, दही, घी, शहद, फल, कंद-मूल। एक बार भोजन, ब्रह्म मुहूर्त में नहीं, दिन में एक बार, सात्विक।
- भोजन से पहले, अपने पितरों के नाम पर, गाय, कौवा, कुत्ता, चींटी के लिए, थोड़ा निकालना, जिसे पंचबलि कहते हैं।न खाने योग्य -
- 16 दिन - मांस, मछली, अंडा, शराब, लहसुन, प्याज, मसूर, चना, उड़द, बैंगन, लौकी (कुछ जगह), पान, तंबाकू।बासी, जूठा, दोबारा गर्म किया हुआ भोजन।जल का नियम -पितृपक्ष में पानी भी, किसी के घर का नहीं पीना चाहिए, खासकर जो तामसिक हो। अपना पानी, अपने घर का, या गंगा जल, या कुएं का साफ पानी। क्योंकि जल भी, अन्न की तरह, भाव ग्रहण करता है।कहा गया है - जलं पीत्वा परगृहे, पितृणां तृप्ति नश्यति।" दूसरे के घर जल पीने से, पितरों की तृप्ति नष्ट हो जाती है।
भाग 6 - अपवाद - कब दूसरे के घर खा सकते हैं?गरुड़ पुराण, कठोर है, पर करुण भी है, 3 अपवाद देता है -
1. गुरु के घर -अपने गुरु, आचार्य, ज्ञानी ब्राह्मण के घर, पितृपक्ष में खा सकते हैं, क्योंकि गुरु का अन्न, अमृत है, वह आपके पितरों को भी तृप्त करता है।
2. पुत्री के घर -पिता, अपनी विवाहित पुत्री के घर, पितृपक्ष में अन्न नहीं खाता, यह नियम है, पर पुत्री, अपने पिता के घर खा सकती है, क्योंकि पुत्री का संबंध, पिता के पितरों से भी है।
3. आपातकाल में - अगर आप यात्रा में हो, बीमार हो, और अपना भोजन संभव नहीं, तो फल, दूध, गंगा जल लेकर, पितृभ्यो नमः"कहकर, भगवान विष्णु को अर्पण करके, खा सकते हैं, दोष नहीं लगेगा, क्योंकि भाव शुद्ध है।पर होटल, मित्र के घर पार्टी, शादी, बर्थडे में, पितृपक्ष में जाना, और वहां खाना, गरुड़ पुराण में महादोष कहा गया है, इससे पितृ नाराज होकर, पितृदोष देते हैं - घर में क्लेश, संतान बाधा, धन हानि, बीमारी।भाग 7 - आज के जीवन में कैसे पालन करें - प्रैक्टिकल उपाय
आज तो नौकरी है, बाहर रहना पड़ता है, तो कैसे करें? 5 उपाय -
1. टिफिन ले जाओ - 16 दिन, अपने घर से टिफिन ले जाओ, ऑफिस में भी अपना ही खाओ।
2. फलाहार करो -अगर बाहर हो, तो केवल फल, दूध, मूंगफली, गंगा जल, तुलसी दल लो, यह पवित्र है।
3. मानसिक क्षमा मांगो - अगर गलती से, बाहर खा लिया, तो रात को, दक्षिण दिशा में मुंह करके, हाथ में जल लेकर, कहो - "हे मेरे पितरो, आज मैंने अज्ञान में, परान्न ग्रहण किया, मुझे क्षमा करो, मैं कल से ध्यान रखूंगा, और इसके प्रायश्चित में, मैं एक ब्राह्मण को भोजन कराऊंगा, या गाय को चारा दूंगा।"
4. गायत्री मंत्र से शुद्धि - भोजन से पहले, 3 बार गायत्री मंत्र पढ़कर, भोजन पर फूंक मारो, तो उसका दोष 50% कम हो जाता है, यह गरुड़ पुराण का ही उपाय है।
5. तुलसी दल डालो - कोई भी भोजन, जल, अगर बाहर का लेना ही पड़े, तो उसमें तुलसी का पत्ता डाल दो, तुलसी, विष्णु प्रिया है, वह हर अन्न को पवित्र कर देती है, प्रेत बाधा नहीं आने देती।अंतिम - पितृपक्ष, भूखे रहने का नहीं, पवित्र रहने का पर्व हैपितृपक्ष, डरने का पर्व नहीं, प्रेम का पर्व है, 16 दिन, आपके पितर, आपके मेहमान हैं, जैसे घर में मेहमान आए तो आप घर साफ रखते हो, बाहर का गंदा नहीं खाते, वैसे ही।गरुड़ पुराण का सार, एक ही लाइन में -"पितृपक्षे परान्नं यस्तु भुंक्ते मोहात् नराधमः, तस्य पितरो निराशा वै प्रयान्ति यममंदिरम्।"जो मनुष्य, मोहवश, पितृपक्ष में दूसरे का अन्न खाता है, उसके पितर निराश होकर, यमलोक लौट जाते हैं, और उसे श्राप देकर जाते हैं।और जो व्यक्ति, 16 दिन, अपने घर का, पवित्र, सात्विक अन्न, पितरों को याद करके खाता है, उसके पितर, उसे आशीर्वाद देते हैं - धनं धान्यं संतानं, सुखं समृद्धि वर्धताम्।इसलिए इस पितृपक्ष, प्रण लो - बाहर का नहीं, अपना खाऊंगा, पवित्र खाऊंगा, पितरों को तृप्त करूंगा।क्योंकि अन्न ही मन है, और मन ही पितरों तक जाता है।
 इति गरुड़ पुराणोक्त पितृपक्ष परान्न निषेध कथा संपूर्णा --

सोमनाथ मंदिर और इतिहास

सोमनाथ, अरबों की देवी अल मनात और महमूद...
क्या गजनवी ने लूट के लिए सोमनाथ पर हमला किया था❓ 

क्या कहते हैं उसके समकालीन मुस्लिम इतिहासकार❓

👀👉 सर्दियों का मौसम था।

ग़ज़नी का सुल्तान महमूद बिन सुबुक्तगीन, जिसे इतिहास महमूद ग़ज़नवी के नाम से जानता है, भारत की ओर एक और अभियान की तैयारी कर रहा था।

लेकिन इस बार उसकी दिशा पहले के अभियानों से अलग थी।

लक्ष्य था समुद्र के किनारे स्थित एक ऐसा प्रसिद्ध हिंदू तीर्थ, जिसकी ख्याति गजनी में महमूद तक पहुँच चुकी थी।

नाम था सोमनाथ (द्वादश ज्योतिर्लिंगों में प्रथम)।

साल था हिजरी (इस्लामी कैलेंडर) 416, अर्थात 1025–26 ईस्वी।

इस अभियान का सबसे महत्वपूर्ण प्रारंभिक विवरण हमें  उन्हीं मुस्लिम लेखकों से मिलता है जो महमूद के समय में ही लिख रहे थे।

उनमें सबसे महत्वपूर्ण नाम हैं : अबू रेहान अल-बिरूनी, अबू सईद अब्दुल-हय गारदीज़ी और महमूद के दरबार से जुड़े कवि फर्रुख़ी सिस्तानी।

👉  सबसे पहले सोमनाथ मंदिर को देखें।

अल-बिरूनी ने अपनी प्रसिद्ध कृति " तहकीक मा लिल हिन्द मिन माकूलात माकूलात फी अलीअकबाल आम माजुला", या "किताबुल हिंद" में सोमनाथ विध्वंस का उल्लेख किया है।

वे उसके नाम की व्याख्या करते हुए बताते हैं कि सोम का अर्थ चंद्रमा और नाथ का अर्थ स्वामी है अर्थात चंद्रमा का स्वामी।

उनके अनुसार सोमनाथ समुद्र के किनारे स्थित था और सरस्वती नदी के मुहाने से लगभग तीन मील की दूरी पर था।

वे वहाँ के धार्मिक विश्वास का वर्णन करते हुए बताते हैं कि समुद्र का ज्वार बढ़ने पर उसका पानी मंदिर में स्थित शिवलिंग तक पहुँचता था। इस प्रकार समुद्र स्वयं शिवलिंग का जलाभिषेक करता था। 

अल-बिरूनी केवल भौगोलिक स्थिति नहीं बताते।

वे उस पौराणिक कथा को भी दर्ज करते हैं जिसके अनुसार सोम अर्थात चंद्रमा ने प्रजापति की पुत्रियों से विवाह किया था, लेकिन रोहिणी के प्रति विशेष प्रेम के कारण उसे शाप मिला। प्रायश्चित के लिए उसने शिव लिंग की स्थापना की और वही शिवलिंग सोमनाथ नाम से प्रसिद्ध हुआ।

इस प्रकार अल-बिरूनी ने सोमनाथ के नाम और उसकी पौराणिक प्रतिष्ठा दोनों को दर्ज किया। 

📜 अल-बिरूनी ने सोमनाथ के विनाश के बारे में क्या लिखा?

सोमनाथ की भौगोलिक स्थिति, प्रसिद्धि और उसकी धार्मिक कथा बताने के बाद अल-बिरूनी एक ऐसी सूचना देते हैं जिसे इस घटना के इतिहास में विशेष महत्व प्राप्त है।

वे लिखते हैं कि हिजरी 416 (1025–26 ईस्वी) में अमीर महमूद ने सोमनाथ के विग्रह को नष्ट कर दिया। महमूद ने उसके ऊपरी भाग को तोड़ने का आदेश दिया और शेष भाग को उसके सोने, रत्नों तथा कढ़ाईदार वस्त्रों सहित ग़ज़नी ले जाने का आदेश दिया।

अल-बिरूनी के अनुसार, ग़ज़नी पहुँचने के बाद उस विग्रह का एक भाग नगर के हिप्पोड्रोम(मैदान-ए-गज़नी) में थानेसर से लाई गई कांस्य मूर्ति चक्रस्वामिन् के साथ डाल दिया गया। दूसरा भाग ग़ज़नी की मस्जिद के दरवाजे के सामने रखा गया, जहाँ लोग उस पर अपने पैर रगड़कर मिट्टी और गंदगी साफ करते हुए मस्जिद में प्रवेश करते थे।

अर्थात अल-बिरूनी के वृत्तांत में केवल यह नहीं है कि “मंदिर पर हमला हुआ” या “मूर्ति तोड़ी गई”; वे यह भी बताते हैं कि विग्रह (मूर्ति) के साथ विजय के बाद क्या किया गया और उसके टुकड़ों को ग़ज़नी में किस प्रकार प्रदर्शित किया गया।

यही कारण है कि सोमनाथ पर महमूद के हमले के लिए अल-बिरूनी का विवरण विशेष महत्व रखता है। यह घटना के कुछ दशकों के भीतर लिखा गया एक ऐसे मुस्लिम विद्वान का स्पष्ट विवरण है जिसने महमूद को और इन चीजों को बहुत ही नजदीक से देखा था।

👉  अब गारदीज़ी का दिया विवरण देखते हैं।

अबू सईद अब्दुल-हय गारदीज़ी ने अपनी फ़ारसी इतिहास-कृति "ज़ैन-अल-अख़बार (Zayn al-Akhbar)" में महमूद के जीवन और ग़ज़नवी अभियानों का वर्णन किया है।

यह पुस्तक महमूद की मृत्यु के लगभग दो दशक बाद की ही है और गारदीज़ी ग़ज़नवी दरबार तथा प्रशासन से निकट रूप से जुड़े हुए थे। उनकी पुस्तक में महमूद के शासन का विवरण 999 ईस्वी के बाद अधिक विस्तृत हो जाता है। 

गारदीज़ी बताते हैं कि महमूद को एक ऐसी जगह के बारे में समाचार मिला जो महासागर के किनारे स्थित एक महान नगर थी।

नाम था सोमनाथ।

वे लिखते हैं कि भारतीय उस स्थान को उसी प्रकार पूजते थे जिस प्रकार मुसलमान मक्का को पवित्र मानते हैं।

वहाँ सोने और चाँदी की अनेक मूर्तियाँ थीं।

उनमें एक मूर्ति के बारे में गारदीज़ी मनात (Manāt) जो इस्लाम पूर्व के अरब की प्रमुख देवी थी, का नाम लेते हैं और लिखते हैं कि वह सोने से अलंकृत तथा रत्नों से जड़ी हुई थी।

📜 मनात कौन थी और सोमनाथ से उसका क्या संबंध  था ?

मनात (Manāt) इस्लाम-पूर्व अरब की प्रमुख देवियों में से एक थी। उसका नाम अल-लात और अल-उज़्ज़ा के साथ आता है। पश्चिमी अरब में उसका एक प्रमुख तीर्थ था और उसे भाग्य अथवा नियति की देवी माना जाता था। इस्लाम के उदय से पहले अरब के धार्मिक जीवन में इन देवियों की पूजा महत्वपूर्ण थी।

लेकिन ग़ज़नवी इतिहासकार अबू सईद गारदीज़ी ज़ैन-अल-अख़बार में सोमनाथ के संबंध में एक अलग और अत्यंत रोचक कथा दर्ज करते हैं।

स्वयं गारदीज़ी के  शब्दों में 
"और अमीर महमूद—अल्लाह उस पर दया करे—बल्ख से ग़ज़नी आया और गर्मी का मौसम वहीं बिताया। और जब सर्दी आई, तो अपनी प्रथा और आदत के अनुसार युद्ध के लिए हिंदुस्तान की ओर गया।
और उसके सामने यह बात कही गई कि समुद्र-ए-मुहीत के किनारे एक बड़ा नगर है, जिसे सोमनात कहते हैं। और वह नगर हिंदुओं के लिए वैसा ही है जैसा मुसलमानों के लिए मक्का।
और उसमें सोने और चाँदी की बहुत-सी मूर्तियाँ हैं।
और मनात, जिसे सैय्यद (अर्थात इस्लाम के पैग़ंबर) के समय काबा से अदन के रास्ते वहाँ से निकालकर ले जाया गया था, वहीं है। और उन्होंने उसे सोने से मढ़ रखा है तथा उसमें रत्न जड़े हुए हैं। और उस मूर्तिगृह के खज़ानों में बहुत बड़ी संपत्ति रखी हुई है।
लेकिन वहाँ तक पहुँचने का रास्ता बहुत ख़तरनाक, भयावह और अत्यन्त कष्टपूर्ण है।"

गारदीजी आगे लिखता है:
"और जब अमीर महमूद—अल्लाह उस पर दया करे—ने यह समाचार सुना, तो उसके मन में उस नगर तक जाने, उन मूर्तियों को नष्ट करने और एक ग़ज़ा/धार्मिक सैन्य अभियान करने की इच्छा उत्पन्न हुई।
और वह हिंदुस्तान से सोमनाथ की ओर, नहरवाला के रास्ते, चला।
जब वह नहरवाला नगर पहुँचा, तो वह खाली किया जा चुका था और उसके सभी लोग भाग गए थे। उसने सेना को वहाँ से चारे की व्यवस्था करने का आदेश दिया और वहाँ से सोमनाथ की ओर चला।"

"और जब वह नगर के निकट पहुँचा और श्रमणों तथा ब्राह्मणों ने उसे देखा, तो वे सभी मूर्तियों की पूजा में लग गए।
और उस नगर का सरदार नगर से बाहर निकला और अपने परिवार तथा सामान के साथ नाव में बैठा और समुद्र में चला गया।
और एक द्वीप पर उतर गया। वे वहीं तब तक रहे जब तक इस्लामी सेना उस प्रदेश से चली नहीं गई; वे उस द्वीप से बाहर नहीं आए।"

"और जब इस्लामी सेना नगर के निकट पहुँची, तो नगर के लोगों ने स्वयं को किलेबंदी के भीतर कर लिया और युद्ध में लग गए।
बहुत समय नहीं बीता कि किलेबंदी टूट गई और अमीर महमूद की सेना उसमें प्रवेश कर गई।
और उन्होंने बहुत भयंकर युद्ध किया, और बहुत से “काफ़िर” मारे गए।"

आगे गारदीजी लिखता है :
"और अमीर महमूद—अल्लाह उस पर दया करे—ने आदेश दिया कि मुअज्ज़िन मंदिर की छत/ऊपरी भाग पर जाए और नमाज़ की पुकार (अज़ान) दे।
और उन सभी मूर्तियों को तोड़ दिया गया, जला दिया गया और नष्ट कर दिया गया।
और मनात के पत्थर को जड़ से उखाड़ दिया गया, उसके टुकड़े-टुकड़े किए गए और उसके कुछ टुकड़े खच्चरों/अस्तरों पर रखकर ग़ज़नी लाए गए।"

"और मूर्तियों के नीचे एक खज़ाना था।
उसने वह खज़ाना ले लिया और वहाँ से बहुत बड़ी संपत्ति प्राप्त की।
अर्थात चाँदी की मूर्तियाँ, रत्नों से जड़ी मूर्तियाँ और दूसरे खज़ानों की लूट—इन सबको ऊँटों पर लादा गया और ग़ज़नी लाया गया।"

"और वहाँ से वह वापस लौट गया।
भीमदेव, हिंदुओं का राजा, रास्ते में था।
अमीर महमूद ने कहा कि ऐसा न हो कि इस महान विजय को कोई क्षति पहुँच जाए। इसलिए वह सीधे रास्ते से नहीं गया और मुल्तान की ओर मुड़ गया।
उस रास्ते में सेना को बहुत कठिनाई हुई और इस यात्रा में इस्लामी सेना के बहुत से लोग मारे गए। यहाँ तक कि मुल्तान पहुँचने से पहले मनुष्यों से अधिक पशु मारे गए।
और वहाँ से वे ग़ज़नी की ओर चले गए।"

👉  अब एक तीसरा विवरण देखते हैं। 

महमूद के दरबार के कवि फर्रुख़ी सिस्तानी ने महमूद ग़ज़नवी के सोमनाथ अभियान पर एक विस्तृत क़सीदा लिखा।  ध्यान रहे कि सिस्तानी इतिहासकार नहीं, एक शायर था।

उसी के शब्द  हिंदी में अनुदित:
"तालाब के चारों ओर एक हजार छोटे-छोटे मंदिर थे। उनके आगे एक विशाल मंदिर था और उसके बीच एक मूर्ति थी—सुंदरता में चंद्रमा जैसी, लेकिन कद में सरू के वृक्ष जैसी। एक दूसरी विशाल आकृति थी, जो सफेद दैत्य जैसी, रास्ते के बीच सिर उठाए दिखाई देती थी। वहाँ नारियल और पोपल के वृक्ष थे, जिनमें हर वृक्ष वर्ष में बार-बार फल देता था। शहर की सीमा पर एक मजबूत किला था और उसमें मूर्तिपूजकों का एक बड़ा समुदाय इकट्ठा था।"

"उसने लोगों को मारा और मंदिरों को तोड़ा तथा जला दिया, जैसे उसने दारनी और थानेसर के मंदिरों के साथ किया था। रास्ते में उससे केवल वही बच पाया जो किसी तिनके या झाड़ी के नीचे छिपा रहा, जैसे कोई दुर्भाग्यशाली पशु। उसने उन छिपे हुए लोगों को खोजे बिना छोड़ दिया, क्योंकि उस राजा का उद्देश्य कुछ और था। जो सोमनाथ के मंदिर को नष्ट करने जा रहा हो, वह छिपे हुए लोगों को खोजने में अपना समय व्यर्थ नहीं करता।"

"बादशाह मनात को नष्ट करने के लिए ही तेजी से आगे बढ़ रहा था; शायद उसकी यही जल्दी इसी कारण थी। मनात, लात और उज़्ज़ा मक्का में तीन मूर्तियाँ थीं—उस समय के मूर्तिकार आज़र के हाथों से बनी हुई। पूरी दुनिया उन तीनों मूर्तियों की पूजा करती थी, सिवाय उस व्यक्ति के जिस पर खुदा की दृष्टि थी। उनमें से दो को पैग़ंबर ने तोड़ दिया और उस दिन दोनों को काबा के सामने डाल दिया गया। मनात को काफ़िरों के बीच से चुरा लिया गया और उस देश से निकालकर किसी दूसरे देश में ले जाया गया। उसे ऐसी जगह ले जाया गया जहाँ आदम के समय से उस भूमि पर किसी काफ़िर के अतिरिक्त कोई बैठा या गया नहीं था।"

"उस मूर्ति के लिए एक मंदिर बनाया गया, जिसमें एक लाख प्रतिमाएँ और एक लाख आकृतियाँ थीं। उस मंदिर पर चारों ओर से श्रद्धा के लिए सोने की पट्टियाँ इस तरह लगाईं गई थीं कि वे पत्थर की पट्टियों जैसी दिखाई देती थीं। मंदिर के भीतर उस मूर्ति के लिए एक ख़ज़ाना बनाया गया था और उस ख़ज़ाने में बड़े-बड़े संदूकों में रत्न रखे थे। उसके लिए नगर-नगर से इतने रत्न खरीदे गए कि रत्न खरीदने वाला रत्न-विक्रेताओं से ही तृप्त हो गया।"

"मूर्ति के सिर के ऊपर एक मुकुट या शिरोभूषण लटकाया गया था, जिस पर माणिकों का काम था और मोतियों की बुनावट थी। उसके लिए शुद्ध सोने का एक शिरस्त्राण बनाया गया था, जो अग्नि के पर्वत जैसा था और उस पर जड़ा रत्न चिंगारी जैसा था। उसका मुकुट और शिरोभूषण किसी पूरे राज्य के कर के बराबर मूल्य का था; और उसकी सबसे कम मूल्यवान वस्तुओं में भी वही मुकुट और शिरोभूषण थे।"

"फिर उन्होंने उसे सोमनात नाम दिया। ऐसा कौन-सा नाम देखा गया है जिसके भीतर उसका दूसरा नाम छिपा हुआ हो? " (यहाँ फर्रुख़ी “सोमनात” के भीतर “मनात” नाम छिपा होने की ओर संकेत करता है।)

"उन्होंने संसार में यह बात फैलाई कि समुद्र से ऐसी आकृति वाली एक मूर्ति निकली है। वह सारे लोगों का नियंता और संसार का कर्ता है; वह सूर्य को प्रकाश देने वाला और चंद्रमा को प्रकाश देने वाला है। उसके ज्ञान से संसार की भलाई और बुराई निर्धारित होती है और उसके आदेश से संसार में भाग्य और नियति चलती है। दूसरे समूह ने कहा—नहीं, इस मूर्ति का स्थान उच्च आकाश में था। किसी मनुष्य ने इसे यहाँ नहीं लाया; यह स्वयं आकाश से यहाँ आई है। यह इसे दिन कहती है और उसे रात; इसे समुद्र कहती है और उसे स्थल। जब यह समुद्र से सिर उठाकर भूमि पर आई, तो सभी वनस्पतियों और वृक्षों ने इसके सामने सजदा किया।"

"गाय ने अपने दूध से इसे धोया और इसी कारण वे गाय को माता कहकर इसकी पूजा या निकटता का साधन मानते हैं। सिर्फ एक पत्थर के कारण ईश्वर की इतनी हजारों प्रजा शैतान की बात पर भरोसा करके संकट में पड़ गई। हर दिन उस पत्थर को धोना उनका कर्तव्य था—गंगा के जल, दूध, केसर और चीनी से। उस मूर्ति को गंगा के जल से धोने के लिए हर दिन दस बड़े प्यालों से भी अधिक जल पहुँचता था। गंगा के जल की क्या बात करूँ—वह सोमनाथ से कई फ़रसख़ ( दूरी मापने की फारसी इकाई) दूर है, उस स्थान से जहाँ यह पतन और अधर्म का स्थान है।"

"जब सूर्य ग्रहण लगता, तो एक लाख बच्चे और पुरुष उसके पास सहायता माँगने और क्षमा माँगने जाते। उन काफ़िरों में जो सोमनाथ हज के लिए जाते थे, उनकी भीड़ रास्ते में एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति से अलग नहीं होती थी। शमन उस पत्थर को ईश्वर कहते हैं—क्या ही व्यर्थ बात है; उनके सिर पर धूल पड़े!"

"खुदाई हुक्म ऐसा था कि वह दीन परवर शहरयार (बादशाह) उस मूर्ति को उसके स्थान से उखाड़ दे। इस उद्देश्य से कि वह उसे मक्का वापस ले जाए, उसने उसे उखाड़ दिया—और अब उसे हमारे साथ-साथ ले जा रहा है।"

"जब उसने उस मूर्ति को वहाँ से उखाड़ लिया और धन तथा सोना ले लिया, तो उसने अपने हाथ से मंदिर के भीतर आग डाल दी। जब सोमनाथ को जलाने का काम पूरा कर लिया, तो उसने लौटने वाले दूसरे लोगों के मार्ग पर प्रस्थान किया।"

महमूद की कशीदगी (प्रशंसा) में सिस्तानी उसे संबोधित करते हुए लिखता है, "तू बहमन के महीने में सोमनाथ जला रहा था, जबकि दूसरे बादशाह ऊद, सुगंधित पदार्थ और अंबर का आनंद ले रहे थे।"

⭐ इस विवरण में सबसे महत्वपूर्ण बात
फर्रुख़ी के वर्णन में मनात और सोमनाथ का संबंध आकस्मिक नहीं है। वह बाकायदा नाम के भीतर “मनात” को छिपा हुआ बताता है और फिर कहता है कि महमूद ने उस मूर्ति को मक्का वापस ले जाने के उद्देश्य से उखाड़ा।

इस प्रकार गारदीज़ी और फर्रुख़ी में एक उल्लेखनीय समानता दिखाई देती है:

- गारदीज़ी: मनात को पैग़ंबर मुहम्मद के समय काबा से अदन के रास्ते सोमनाथ लाए जाने की कथा देता है और उसे “मनात का पत्थर” कहता है।
- फर्रुख़ी: सोमनाथ/सोमनात नाम में “मनात” छिपा होने की व्याख्या करता है और महमूद द्वारा मूर्ति को मक्का वापस ले जाने की बात कहता है।

अर्थात दोनों महमूद के समकालीन स्रोतों में सोमनाथ की मूर्ति को मनात से जोड़ने वाली एक ही व्यापक परंपरा दिखाई देती है, यद्यपि दोनों का विवरण और भाषा अलग है।

👉 वामपंथी और हाल के मुस्लिम इतिहासकार यह सिद्ध करने की कोशिश करते हैं कि गजनवी बस एक लुटेरा था।

लेकिन, प्रथमदर्शी रचनाकारों के अनुसार यह केवल सोने की लूट की कहानी नहीं थी।

यदि उद्देश्य केवल धन प्राप्त करना होता, तो मंदिर से सोना, चाँदी, रत्न और अन्य संपत्ति लेकर वापस लौटना पर्याप्त था।

लेकिन प्रारंभिक मुस्लिम स्रोतों में जो चित्र दिखाई देता है, उसमें मूर्तिभंजन स्वयं विजय का हिस्सा था।

गारदीज़ी लिखते हैं कि महमूद सोमनाथ की मूर्तियों को नष्ट करने की इच्छा से वहाँ पहुँचा। 

अल-बिरूनी बताते हैं कि मूर्ति को तोड़कर उसके टुकड़ों को ग़ज़नी में सार्वजनिक रूप से अपमानित किया गया।

इसलिए प्रारंभिक मुस्लिम सामग्री में धार्मिक उद्देश्य को हटाकर केवल आर्थिक लूट की कहानी बनाना  स्रोतों के साथ न्याय नहीं होगा।

इतिहास की ऐसी ही छिपा दी गई तथ्यात्मक लेखों को पढ़ने के लिए फॉलो करें Prabhat Ranjan 

स्रोत:
1. अल-बिरूनी — किताब अल-हिंद (Kitāb al-Hind)
अंग्रेज़ी अनुवाद: Edward C. Sachau, Alberuni’s India: An Account of the Religion, Philosophy, Literature, Geography, Chronology, Astronomy, Customs, Laws and Astrology of India about A.D. 1030, 2 volumes, Trübner’s Oriental Series, 1887–1888. 
Google Books 

2. अबू सईद अब्दुल-हय गारदीज़ी — ज़ैन अल-अख़बार (Zayn al-Akhbār)
अंग्रेज़ी अनुवाद: C. Edmund Bosworth, The Ornament of Histories: A History of the Eastern Islamic Lands AD 650–1041, I.B. Tauris, 2011. यह गारदीज़ी के Zayn al-Akhbār का अंग्रेज़ी अनुवाद और टिप्पणी सहित संस्करण है। �

3. फर्रुख़ी सिस्तानी — दीवान-ए-फर्रुख़ी सिस्तानी (Dīvān of Farrukhī Sīstānī)
मूल पाठ का प्रमुख आलोचनात्मक संस्करण: मुहम्मद जाबिर दबीर-सियाक़ी (Muhammad Jabir Dabir-Siyāqi), Dīvān-i Farrukhī Sīstānī

सोमनाथ संबंधी अंश का अंग्रेज़ी अनुवाद और विश्लेषण: Th. Emil Homerin, “Saʿdi’s Somnatiyah,” Iranian Studies, जिसमें फर्रुख़ी के दीवान के pp. 69–71, lines 1338ff. का अनुवाद दिया गया है।

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Friday, 25 September 2026

हिंदू महासभा और आरएसएस

राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ (R.S.S.) तब और अब - भाग  2
 
#हिन्दू_महासभा_एवं_आर_एस_एस_के_बीच_कड़वाहट

लेख थोड़ा बड़ा है इसलिए टाइम निकाल कर पूरा पढ़े और कल भाग 1 लिखा था,, भाग 3 भी आयेगा, तीनों पढ़ो तभी फाइनल निष्कर्ष निकलेगा (भाग 1लिंक पिन कमेंट में है)

जैसा विदित है कि वीर सावरकर पहले ही कलकत्ता अधिवेशन के लिये अध्यक्ष चुन लिये गये थे, परन्तु हिन्दू महासभा के अन्य पदों के लिये चुनाव अधिवेशन के मैदान में हुए। सचिव पद के लिये तीन प्रत्याशी थे (1) महाशय इन्द्रप्रकाश, (2) श्री गोलवलकर और (3) श्री ज्योति शंकर दीक्षित। चुनाव हुए और परिणाम स्वरुप महाशय इन्द्रप्रकाश को 80 वोट, श्री गोलवलकर को 40 और श्री ज्योति शंकर दीक्षित को मात्र 2 वोट प्राप्त हुए और इस प्रकार महाशय इन्द्रप्रकाश हिन्दू महासभा कार्यालय सचिव के पद पर चयनित घोषित हुए।

श्री गोलवलकर जी को इस हार से इतनी चिढ़ हो गयी कि वे अपने कुछ साथियों सहित हिन्दू महासभा से दूर होना शुरू हो गये| जून 1940 में डा. हेडगेवार कि अकस्मात मृत्यु हो गयी और उनके स्थान पर श्री गोलवलकर को आर.एस.एस. प्रमुख बना दिया गया। आर.एस.एस. प्रमुख का पद संभालने के थोड़े समय पश्चात ही उन्होंने श्री मारतंडे राव जोग को सर संघ सेनापति के पद से हटा दिया, जिन्हें डा. हेडगेवार ने आर. एस. एस. के उच्च श्रेणी के स्वयं सेवको को सैन्य प्रशिक्षण देने के लिये नियुक्त किया था। इस प्रकार गोलवलकर जी ने अपने ही हाथों आर.एस.एस. की पराक्रमी शक्ति के निर्माण को प्राय: समाप्त ही कर दिया। जिस जुझारू संगठन (मिलीशिया) की स्थापना करना आर.एस.एस. के संस्थापक का उद्देश्य था| वह जुझारूपन, गोलवलकर जी के इस कदम से समाप्त ही हो गया| इसका दुष्परिणाम यह हुआ कि देश विभाजन, चीन व पकिस्तान के आक्रमण के समय जिस समर्पण व भागीदारी की आशा समाज इस राष्ट्रवादी संगठन आर.एस.एस. से करता था, उस दायित्व को आर.एस.एस. निभाने में असफल रहा|

देश विभाजन के समय हिंदू पिटता रहा,अपमानित होता रहा, पर संघ शाखाओं पर कब्बडी ही खेली जाती रही| हाँ हिन्दुओं के खंडित भारत में शरणार्थी के रूप में आने पर, उनके लिए लंगर जरूर लगाये गये| गुरूजी के नेतृत्व में संघ हिन्दुओं की रक्षा की बजाय सेवा कार्य को ही अपना मुख्य कार्य समझने लगा- यहीं इसकी स्थापना के उद्देश्य व ध्येय में अंतर दिखाई देने लगता है| वर्तमान में भी देश पर अंदर व बाहर से हो रहे आतंकी हमलों व सत्ताधीशों द्वारा हिंदू समाज कों जिस प्रकार अपमानित किया जा रहा है उसका मुकाबला करने में इस संगठन की कमजोरी स्पष्ट रूप से देखने को मिल रही है, जब हम और हमारे यह संगठन किसी आतंकी घटना-गुंडागर्दी या सरकार के हिंदू विरोधी कदम का प्रतिकार करने में सक्षम नहीं हो पाते |

यहाँ यह महत्वपूर्ण और उलेखनीय है कि वर्तमान सरसंघ प्रमुख मोहन भागवत जी ने भी आज देश में घटित हो रही आतंकी घटनाओं को देखते हुए हिंदू युवकों के सैन्य प्रशिक्षण की आवश्यकता की मांग की है| स्पष्ट होता है कि गोलवलकर जी वास्तव में किसी भी प्रकार दूरदर्शी नहीं थे| हिंदू समाज व इस राष्ट्र कि रक्षा हेतु जो आवश्यकता वीर सावरकर जी ने “हिन्दुओं के सैनिकीकरण के रूप में सन् 1936 से 1945 के बीच दर्शाई थी, गोलवलकर जी ने मारतंडे राव जोग को सरसंघ सेनापति के पद से हटा कर उससे पूर्णताः उलट कार्य किया| उसी सावरकर की सैनिकीकरण नीति की महत्ता गोलवलकर जी के उत्तराधिकारी मोहन भागवत जी को सावरकर के कथन के 70 वर्ष पश्चात समझ में आ पाई है| इसे क्या कहेंगे| इस बीच देश और समाज को हुई हानी का दायित्व कौन लेगा|

सन् 1935 तक संघ का कार्य धीमी गति परन्तु दृढ विचारधारा से चलता रहा और महाराष्ट्र तक ही सीमित रहा| सन् 1936 के बाद देश में हिंदू मुस्लिम तनाव पुरे उफान पर आया | मुस्लिम लीग ने पकिस्तान की मांग बड़े जोर शोर से उठानी शुरू कर दी थी| इस हेतु उनके द्वारा मुस्लिम नेशनल गार्ड की स्थापना भी की गई, अल्लामा-मशर्की ने बेल्चा पार्टी (मुसलमानों के एक अर्द्धसैनिक दल) की स्थापना की जिसके कार्यकर्त्ता/वोलंटियर/रजाकार- हिंदुओं के साथ छोटी-छोटी बातों को तूल देकर लड़ाई-झगड़े के लिए अमादा हो जाते थे| निजाम हैदराबाद व उसके रजाकारों द्वारा किये जा रहे अत्याचारों से वहां की हिंदू जनता आर्तनाद कर रही थी| निजाम ने राज्य के हिंदुओं के सभी धार्मिक कार्यों व अधिकारों पर रोक लगा दी थी| हिंदू न तो यज्ञोपवीत पहन सकते थे, न हवन कर सकते थे| मंदिरों में घंटे-घड़ियाल बजाना अथवा कीर्तन आदि करने को भी निजाम ने गैर क़ानूनी घोषित कर दिया था| जिस कारण आर्यसमाज और हिंदू महासभा को भारी आन्दोलन/सत्याग्रह करना पड़ा| सिंध प्रान्त में मुस्लिम लीगी सरकार ने स्वामी दयानंद द्वारा रचित धार्मिक ग्रन्थ “सत्यार्थ प्रकाश” पर प्रतिबंध लगा दिया था|

सन् 1945-46 में मुस्लिम लीग ने अंग्रेज सरकार और कांग्रेसी नेताओं कों पाकिस्तान की मांग मानने के लिए विवश करने के उद्देश्य से “डायरेक्ट एक्शन” नाम से कार्यवाही शुरू की, जिसके परिणाम स्वरूप बिहार, कलकत्ता आदि शहरों में हजारों हिंदुओं का नरसंहार हुआ | ऐसी स्थिति में हिंदू भयग्रस्त भी था और आक्रोशित भी, और वे चाहते थे कि हिंदुओं का भी एक युवा जुझारू संगठन हो जो उनकी सुरक्षा कर सके| इन्हीं कारणों से हिंदुओं का रुझान संघ की ओर बढ़ा और इसी समय संघ के स्वंयसेवकों और शाखाओं की संख्या बढ़ी और सन् 1946 के पहुंचते- पहुंचते युवा स्वंयसेवकों की संख्या लगभग 7 लाख हो गई|” संघ के स्वंयसेवकों की संख्या में यह विस्तार गोलवलकर जी के नेतृत्व से अधिक देश में उस समय उत्पन्न हो रही सामाजिक व राजनैतिक परस्थितियों के कारण ही मुख्य रूप से था, जिससे हिंदू समाज- उद्वेलित होकर संघ की ओर आशा लगाकर देखने लगा जो स्वाभाविक था|

श्री गोलवलकर एक रूढ़िवादी व्यक्ति थे जो पुरानी धार्मिक रीतियों पर अधिक विश्वास रखते थे, यहाँ तक कि उन्होंने अपने पूर्वजो के लिये ही नहीं अपितु अपने जीवन काल में ही अपना भी श्राद्ध कर्म संपन्न कर दिया था। वे गंडा-ताबीज के हार पहने रहते थे, जो सम्भवत: किसी संत ने उन्हें किसी बुरे प्रभाव से बचने के लिये दिए थे। गोलवलकर जी का हिंदुत्व श्री वीर सावरकर और डॉ. हेडगेवार के हिंदुत्व से किंचित भिन्न था। गोलवलकर जी के मन में वीर सावरकर के लिये उतना आदर सत्कार का भाव नहीं था जितना की डा. हेडगेवार के मन में था। डा. हेडगेवार, वीर सावरकर को आदर्श पुरुष मानते थे| यथार्थ में श्री गोलवलकर इतने दृढ़ विचार के न हो कर एक अपरिपक्व व्यक्ति थे, जो आर.एस.एस. विशाल संस्था का उत्तरदायित्व ठीक से उठाने के योग्य नही थे। राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ ने गोलवलकर जी के नेतृत्व में संघ कि शाखाओं और स्वयंसेवकों की संख्या तो बढाई परन्तु अपने मूल सिद्धांतों से दुरी बना लेने के कारण संगठन की ऊर्जा को प्रायः खो दिया| वही क्रमिक ह्रास, आज आर.एस.एस. जिस स्थिती में पहुँच गई है, में स्पष्ट रूप से दिखाई देता है|

गोलवलकर जी के आर.एस.एस. प्रमुख बनने के बाद हिन्दू महासभा एवं आर.एस.एस के बीच सम्बन्ध तनावपूर्ण होते चले गये। यहाँ तक की श्री गोलवलकर ने वीर सावरकर एवं हिन्दू महासभा द्वारा चलाये जा रहे उस अभियान की आलोचना करनी शुरू कर दी जिसके अंतर्गत हिन्दू युवको को सेना में भर्ती होने के लिये प्रेरित किया जाता था। यह अभियान 1938 से सफलता पूर्वक चलाया जा रहा था और डॉ. हेडगेवार ने 1940 में अपनी मृत्यु तक इसका समर्थन किया था। सुभाष चंद्र बोस ने भी सिंगापुर से रेडियो पर अपने भाषण में इन युवको को सेना में भर्ती कराने के लिये श्री वीर सावरकर के प्रयत्नों की बहुत प्रशंसा की थी। हिन्दू महासभा के इस अभियान के कारण सेना में हिंदुओ की संख्या बढ़ने लगी, जिस पर मुस्लिम लीग ने बहुत बवाल मचाया और अंग्रेज सरकार से आग्रह किया कि सेना में हिंदुओ कि भर्ती बंद की जाये। क्योँकि उस समय द्वितीय विश्व युद्ध चल रहा था इस कारण सरकार को सेना में बढ़ोतरी करनी थी अतः मुस्लिम लीग के विरोध को नकार दिया गया। यह इसी अभियान का ही नतीजा था कि सेना में हिंदुओ की संख्या 36% से बढ़ कर 65% हो गयी, और इसी कारण विभाजन के तुरंत बाद पाकिस्तान द्वारा कश्मीर पर आक्रमण का भारतीय सेना मुंह तोड़ जवाब दे पायी। परन्तु गोलवलकर जी के उदासीन व्यवहार एवं नकारात्मक सोच के कारण दोनों संगठनो के सम्बन्ध बिगड़ते चले गये।

यह भी उलेखनीय है कि एक ओर काँग्रेस व गाँधीजी ने अंग्रेजो को सहमति दे दी थी कि उनके द्वारा भारत छोड़े जाने से पहले, भारत कि सत्ता मुस्लिम लीग को सौपने पर उन्हें कोई आपत्ति नहीं है। दूसरी ओर वे लगातार यह प्रचार भी करते रहे कि वीर सावरकर और हिन्दू महासभा साम्प्रदायिक हैं। डा. हेडगेवार की मृत्यु के उपरान्त आर.एस.एस. ने भी श्री गोलवलकर के नेतृत्व में वीर सावरकर एवं हिन्दू महासभा के विरुद्ध एक द्वेषपूर्ण अभियान आरंभ कर दिया। श्री गंगाधर इंदुलकर (पूर्व आर.एस.एस. नेता) का कथन है कि श्री गोलवलकर यह सब वीर सावरकर की बढ़ती हुई लोकप्रियता (विशेषकर महाराष्ट्र के युवको में) के कारण कर रहे थे। उन्हें आशंका थी कि यदि सावरकर कि लोकप्रियता बढ़ती गयी तो युवक वर्ग उनकी ओर आकर्षित होगा और आर.एस.एस. से विमुख हो जायेगा।

इस टिप्पणी के बाद श्री इंदुलकर पूछते है कि “क्या ऐसा कर के आर.एस.एस. हिंदुओ को संगठित कर रही थी या कि विघटित कर रही थी|”

सन् 1936-37 में श्री माधव राव सदाशिव राव गोलवलकर संघ में आये| 1938 में उन्होंने एक पुस्तक लिखी जिसका नाम “वी. आर. अवर नेशनहुड डिफाइंड”(हमारी राष्ट्रीयता)| इस पुस्तक में उन्होंने हिंदू, हिंदुत्व, हिंदू राष्ट्र की वही व्याख्यायें स्वीकार की जो वीर सावरकर द्वारा लिखित पुस्तक “हिंदुत्व” में तथा वीर सावरकर जी के बड़े भाई श्री बाबा राव सावरकर द्वारा लिखित पुस्तक “राष्ट्र मिमांसा” में दर्शायी गई थी | १५ मई १९६३ के दिन बम्बई में सावरकर सप्ताह का आयोजन किया गया था, उसमें श्री गोलवलकर ने अपने भाषण में कहा कि उन्होंने सावरकर जी की महान रचना ‘हिंदुत्व’ में राष्ट्रवाद के सिद्धांत का विवेचन पाया है| उनके लिए यह एक पाठ्य पुस्तक व एक वैज्ञानिक पुस्तक है|(हिंदू अस्मिता दि. १-११-९३)

परन्तु कुछ समय पश्चात, श्री गोलवलकर ने स्वंय अपने द्वारा सन् 1938 में लिखी गई पुस्तक ‘वी. आर. अवर नेशनहुड डिफाइंड’ पुस्तक को अस्वीकार करने की बात कही| उन्होंने यहाँ तक कहा कि भूल जाओ ‘ वी आर. अवर नेशनहुड डिफाइंड’ को| 1949 में संघ पर लगे प्रतिबंध के दौरान, राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ ने जो अपना संविधान बना कर सरकार को दिया उसमें हिंदू राष्ट्र शब्द का कहीं उल्लेख नहीं था परन्तु उसके बाद भी संघ की शाखाओं पर स्वंयसेवकों द्वारा “प्रभु शक्ति मम हिंदू राष्ट्रांग भूता” कि प्रार्थना अवश्य गाई जाती रही है| यह संविधान गोलवलकर जी द्वारा डॉ. हेडगेवार कि मृत्यु के बाद संघ पर प्रतिबन्ध लगने के पश्चात बनाया गया था|

दिनाँक 30-1-1948 को गाँधी जी की हत्या हुई| जिस समय गाँधी जी की मृत्यु का समाचार गोलवलकर जी को मिला, वह उस समय दि. 30-1-1948 को मद्रास (चैन्नई) में प्रवास पर थे| आल इंडिया रेडियो पर जब यह समाचार प्रसारित हुआ की गांधीजी की हत्या महाराष्ट्र के एक हिंदू-राष्ट्रवादी पंडित नाथूराम गोडसे ने की है| इसकी प्रतिक्रिया में गांधीवादियों द्वारा महाराष्ट्र में बहुत उत्पात मचाया गया है, साथ ही वीर सावरकर के छोटे भाई नारायण राव सावरकर जी को भी लाठियों से पीटा गया| गोडसे जी का परिवार भी घोर प्रताड़ना का शिकार हुआ| इसके अतिरिक्त वीर सावरकर जी के साथ-साथ हिंदू महासभा और राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के हजारों कार्यकर्ताओं को भी जेलों में ठूस दिया गया| उन लोगों को भी जिनका गाँधी वध से दूर दूर तक का कोई संबंध नहीं था|(संदर्भ- “गोडसे की आवाज सुनो” पृष्ठ सं.51-52)

इस कांड का सबसे दुखद पहलु यह रहा कि जिस पंडित नाथूराम गोडसे ने राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के कार्यकलापों में सदा बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया, जिसने महाराष्ट्र के सांगली जिले के बौद्धिक प्रमुख का महत्वपूर्ण दायित्व निभाया और दि. 15-11-1949 को- आर.एस.एस. की शाखा स्थल पर गाई जाने वाली प्रार्थना “नमस्ते सदा वत्सले मातृ भूमि” का स्वर गान करते हुए, भारत विभाजन के विरोध में, फांसी का फंदा चूमा और शाह्दत का जाम पिया| उसी संघ समर्पित गोडसे को, गाँधी वध के बाद आर.एस.एस. के तात्कालिक प्रमुख – सरसंघचालक श्री माधव राव सदाशिव राव गोलवलकर उपाख्य “गुरूजी” ने भयभीत होकर सिरे से नकार दिया, और तुरत-फुरत में दिनांक 31-1-1948 को जवाहरलाल नेहरु तात्कालिक प्रधानमंत्री को पत्र लिख कर गोडसे को “अविवेकी और दुराग्रही आत्मा के साथ देशद्रोही” तक लिख डाला| इसके विपरीत अखिल भारत हिंदू महासभा नें उस विषम परस्थितियों में भी निर्भीकता के साथ छाती ठोककर हुतात्मा नाथूराम गोडसे को न सिर्फ अपना कार्यकर्ता बताना स्वीकार किया वरन हिंदू महासभा के तात्कालिक अध्यक्ष बैरिस्टर एल.वी.भोपटकर ने नाथूराम गोडसे के साथ अन्य अभियुक्तों का मुकदमा निशुल्क और पूर्ण निष्ठा और समर्पण के साथ अंत तक लड़ा|

क्रमशः

Thursday, 24 September 2026

पूरे पितृपक्ष में अपने पितरों को जल दान करें विशेष विधि

'                        🌿🌕🌿
         *पितृ पक्ष 2026 विशेष सूचना--*

 *दिनांक 26 सितंबर 2026 दिन शनिवार से पितृपक्ष, महालयारंभ हो रहा है ।।*

  *पूरे पितृपक्ष में अपने पितरों को जल दान करें ।।  पितरों को जल देने, उनका सम्मान करने से पितृ दोष समाप्त होता है ।।*

*जो लोग मंत्र सहित तर्पण नहीं कर सकते -- साधारण रूप से तर्पण करने की जानकारी दी जा रही है---*
 
 पितरों के प्रसन्न करने से  अनेकों दुखों का शमन होता है ।। इस समय पुरुषों को, पितृपक्ष आरंभ होने से पहले अपने सर के बाल उतरवा देना चाहिए ।।
 
 *अपने पितरों का नाम ले लेकर के जल प्रदान कर आशीष प्राप्त करें, जिससे आप अपने जीवन में अच्छी प्रगति कर सकें ।।*
 '       *क्योंकि पितृपक्ष में पितरलोक और पृथ्वी लोक एक दूसरे लोक के बहुत निकट आ जाते हैं ।।*
, *ऐसे समय में पितर लोग जब देखते हैं पृथ्वी की ओर तो, अपने कुल खानदान से, जल की अपेक्षा करते हैं  तर्पण के लिए विशेष सामग्री जो तर्पण करते समय चाहिए वह है---*
१~  जल 
२~गंगाजल
३~ तुलसी का पत्ता
 ४~ देशी गौ का दूध
 ५~ सफेद चावल {धुलकर सुखाया हुआ}
६~ काला तिल {धुलकर सुखाया हुआ}
७~ जौ    {धुलकर सुखाया हुआ}
८~ श्रीखंड चंदन {घिसकर लेप बनाया हुआ}
९~  सफेद फूल 
१०~ शहद
यह सारा सामान एक-एक डिब्बे में सुरक्षित रख लें ।।

*बैठने के लिए आसन ।* 

दो भगौना, जिसमें कम से कम तीन- तीन लीटर से अधिक पानी आ जाये ।।

दो प्लेट सामने रखें 
एक प्लेट में थोड़ा सा तिल, जौ, चावल, सफेद फूल, मीठा एक प्लेट में रखें ।। एक छोटे कटोरी में जल रखें ।

दोनों हाथ के अनामिका अंगुली में पैंती पहन लें । उसको हाथों में लेकर दोनों हाथों से जल प्रदान करें ।।
पैंती नहीं है तो अंगुलियों में अंगूठी पहनें ।
 
जो सामने खाली प्लेट है उसमें थोड़ा सा चावल हाथ में लेकर के पितरों का आवाहन करें ।
और उसमें जल अक्षत पुष्प धूप दीप और मीठा अर्पित करें ।
खाली प्लेट में रख दें । और पितरों से कहें हे पितृगण !! आप यह भोग स्वीकार करें ।।
अब जो --
*१० प्रकार का समान लिखा हुआ है उसको एक भगौने में थोड़ा-थोड़ा रखें ।।*
जिस भगवान में सामग्री रखे है उस भगौने को जल गंगाजल से भर दें ।।

अब आप अपने पिता माता 
दादा-दादी 
आजा आजी 
तीन पीढ़ी को अपने {अंजुरी} अर्थात् *अंजलि से एक-एक अंजलि जल* खाली वाले भगौने में डालें -- 
पिता सहित तीन पीढ़ी को जल दें और कहें हे पिता यह जल स्वीकार करो हे माता यह जल स्वीकार करो, दादा दादी आजा आजी ।।
अपने मामा के तीन पीढ़ी मामा मामी नाना नानी बूढ़े नाना नानी
*इसी तरह आपकी मौसी मौसी, ससुर सास, मित्र, गुरु जितने भी लोग आपके जीवन में रहे हों और अब ना हों, उन्हें जल प्रदान करना चाहिए ।।*
अंतिम में तीन अंजलि जल चराचर जगत के लिए अर्पित करना चाहिए 
 और एक अंजलि जल भीष्म पितामह के लिए अर्पित करना चाहिए ।।
अंतिम में वह जल किसी पौधे में डाल देना चाहिए 
, जो पैर के नीचे ना पड़े ।।

पुराण और अर्थ

## प्रश्न बिलकुल वैज्ञानिक है - आज का बच्चा पूछता है, "पापा, ब्रह्मा जी हंस पर कैसे उड़ते हैं?"
हम उसे कथा सुना कर टाल देते हैं, पर ऋषि ने कथा नहीं, कोड लिखा था। आज के विज्ञान से ही उस कोड को खोलते हैं, जो वाहन अभी तक नहीं बताए, उन्हीं को लेते हैं।
### 1. सूर्य के सात घोड़े - S= सप्तरंगी प्रकाश
पुराण कहते है - सूर्य के रथ में सात घोड़े हैं।
आज का विज्ञान क्या कहता है? न्यूटन ने 1666 में प्रिज्म से सिद्ध किया - सूर्य का श्वेत प्रकाश सात रंगों से बना है - VIBGYOR।
हमारे ऋषि ने हजारों साल पहले कह दिया था - अश्व = आशु गमन करने वाला, अर्थात किरण। सात अश्व = सात किरणें।
प्रमाण - ऋग्वेद 1.164.2 - *"सप्त युज्यन्ति रथं एकचक्रम"* - एक चक्र वाले रथ में सात घोड़े जुते हैं। यह रथ सूर्य है, सात घोड़े प्रकाश के सात बैंड हैं।
### 2. चंद्रमा का हिरण और खरगोश - मृग लांछन
चंद्रमा के वाहन को मृग कहा है, इसीलिए चंद्रमा को मृगांक कहते हैं।
आज आप पूर्णिमा के चाँद को देखिए, नासा की तस्वीर में भी आपको चाँद पर काले धब्बे हिरण की तरह दिखेंगे। वे धब्बे क्या हैं? - वे चंद्रमा के विशाल गड्ढे - Maria हैं।
ऋषि ने कहा - चंद्रमा पर मृग बैठा है। अर्थात चंद्रमा के कलंक - क्रेटर ही उसका वाहन - चिन्ह है। वाहन का अर्थ है पहचान।
### 3. इंद्र का ऐरावत हाथी - बादल का वैज्ञानिक नाम
इंद्र वर्षा के देवता हैं, ऐरावत पर बैठते हैं। ऐरावत = जल को फेंकने वाला।
ऋग्वेद में ऐरावत को *"अभ्र-मातंग"* कहा है - अभ्र माने बादल, मातंग माने हाथी। बादल हाथी जैसा ही तो दिखता है। और हाथी जैसे ही सूंड से जल फेंकता है, बादल भी जल वैसे बरसाता है। 
आज मौसम विज्ञान में भी बादलों को हाथी की उपमा दी जाती है - Cumulonimbus को हाथी की पीठ जैसा कहा जाता है।
इंद्र का वज्र = बिजली, ऐरावत = मेघ। बिजली मेघ पर ही सवार हो कर आती है, यह तो सीधा विज्ञान है।
### 4. शनि का कौआ और यम का भैंसा - Decomposition का विज्ञान
ये दो वाहन सबसे ज्यादा डरावने लगते हैं।
शनि = न्याय, धीमी गति, दंड। कौआ क्या करता है? सड़ा-गला साफ करता है। प्रकृति का स्कैवेंजर है। वह किसी को ऐसे ही नहीं छोड़ता, घंटों देखता है। शनि भी वैसे ही - धीरे-धीरे कर्मों का फल देता है। कौआ काला है, शनि भी अंधकार, अर्थात अनुशासन का प्रतीक है।
यम का भैंसा - यम मृत्यु के देवता हैं। भैंसा सबसे ज्यादा बलशाली, पर आलसी प्राणी है, कीचड़ में बैठा रहता है। मृत्यु भी वैसी ही है - अचानक आएगी तो भैंसे जैसी ताकत से कोई नहीं रोक सकता। और भैंसा अंधेरे में सबसे ज्यादा देख सकता है, यम भी अंधकार - मृत्यु-लोक में देखता है।
आयुर्वेद प्रमाण - भैंसे के सींग में यम-गंध होती है, जो मृत्यु के समय निकलने वाली गैसों को सोख लेती है, इसलिए शव के पास भैंसे की बात कही गई।
### 5. वरुण का मगर - मकर
वरुण जल के देवता हैं, उनका वाहन मकर - मगरमच्छ।
मगर क्या है? जल में सबसे प्राचीन, सबसे शक्तिशाली प्राणी। वह जल के इको-सिस्टम का राजा है। वह जल को शुद्ध रखता है।
आज पर्यावरण विज्ञान कहता है - अगर मगरमच्छ न हो तो नदी सड़ जाएगी। वरुण का मकर पर बैठना = जल के पारिस्थितिकी तंत्र का संतुलन।
### 6. अग्नि का मेढ़ा और वायु का हरिण
अग्नि का वाहन मेढ़ा - मेढ़ा कभी सीधा नहीं चलता, कूद-कूद कर चलता है। अग्नि की लपटें भी वैसी ही हैं - कभी इधर, कभी उधर। और मेढ़े के बाल ज्वलनशील होते हैं।
वायु का वाहन हरिण - हवा से तेज क्या दौड़ता है? हरिण। वायु की गति को नापने का सबसे पुराना पैमाना हरिण की गति थी।
### वैज्ञानिक युग में अजीब क्यों लगता है?
क्योंकि हमने दो भाषाओं को मिला दिया।
ऋषि की भाषा थी - *प्रतीक भाषा - Symbolic Language।*
आज की भाषा है - *भौतिक भाषा - Literal Language।*
पुराणों में वाहन कोई चिड़ियाघर नहीं, *"गुण-परिवहन तंत्र"* है। हर देवता एक ऊर्जा है, हर पशु उस ऊर्जा की प्रकृति है।

जिस दिन आप यह समझ गए कि हंस का अर्थ सरस्वती की Ola नहीं, सरस्वती का विवेक है, उसी दिन पुराण वैज्ञानिक ग्रंथ लगने लगेंगे, कहानी नहीं।

पुराण और जातियां

##कल वानर वाले लेख पर आप सबके क आस्था और इतिहास दोनों का सम्मान होना चाहिए। इसलिए आज उसी कड़ी को आगे बढ़ाते हैं - *नाग, गंधर्व, किन्नर, यक्ष, मत्स्य कन्या क्या थीं?*
पुराणों में जब लिखा है - "वह नागकन्या थी" तो क्या सच में आधी स्त्री आधी सर्प थी? यही भ्रम हमें समझना है।
### पुराणों में सृष्टि का वर्गीकरण - मनुष्य ही मनुष्य के कई रूप हैं
हम आज सोचते हैं दुनिया में केवल एक ही मानव जाति है। पुराण कहते हैं नहीं, सृष्टि में 8 प्रकार के मानव-सदृश सभ्यताएं थीं। इसे *अष्ट-मानव योनि* कहा गया -
*1. नाग -*
नाग का अर्थ सांप नहीं, *नग में रहने वाला* - पहाड़ की गुफाओं, पाताल अर्थात भूमिगत नगरों में रहने वाली अत्यंत विकसित सभ्यता।
वे महान इंजीनियर थे। भोगवतीपुरी, जो आज के पाताल लोक में बताई जाती है, वह जल-निकासी और वास्तुकला का अद्भुत नमूना थी।
नागकन्या का अर्थ - नागवंश की कन्या। जैसे अर्जुन ने नागकन्या उलूपी से विवाह किया, भीम ने नागवंश की राजकुमारी से। वे इच्छाधारी नागिन नहीं, नाग-वंश की राजकुमारियां थीं, जो विष-विद्या, मणि-विद्या जानती थीं।
कालिया नाग - वह यमुना के एक टापू पर रहने वाला नागवंशी राजा था, जो यमुना के जल पर कर लगाता था। कृष्ण ने उस राज्य को जीता, उसे मारा नहीं, निर्वासित किया।
*2. गंधर्व -*
गंधर्व का अर्थ है - गंध को धारण करने वाला, अर्थात संगीत, सुगंध और कला का उपासक।
ये आज के गंधार - अफगानिस्तान, कश्मीर क्षेत्र के निवासी थे। ये परम सुंदर, संगीतज्ञ और वीर थे।
गंधर्व विवाह क्या है? - प्रेम विवाह। शकुंतला और दुष्यंत का गंधर्व विवाह ही था। यानी गंधर्व सभ्यता में प्रेम-विवाह मान्य था, जबकि आर्य सभ्यता में नहीं।
विश्वावसु, चित्ररथ - ये गंधर्वों के राजा थे, जिनके पास विमान विद्या थी।
*3. किन्नर - किं + नर = क्या यह मानव है?*
ये हिमालय की घाटियों में रहने वाली एक विशेष सभ्यता थी - अश्वमुखी नहीं, अश्व-पालक। घोड़े पालने वाले, तेज दौड़ने वाले, इसलिए चित्रकारों ने उनका मुंह घोड़े जैसा बना दिया।
वे महान वाद्यकार थे। आज भी हिमाचल के किन्नौर में किन्नर जाति रहती है।
*4. मत्स्य कन्या -*
सत्यवती मत्स्यगंधा थी। क्या वह आधी मछली थी? नहीं।
वह *धीवर-वंश* की थी, नाव चलाने वाली। दिन भर मछलियों में रहने से उसके शरीर से मत्स्य की गंध आती थी, इसलिए मत्स्यगंधा। वह मत्स्य-वंश की राजकुमारी थी, इसीलिए मत्स्यकन्या।
वैसे ही कश्यप ऋषि की पत्नी कद्रू नाग-माता कही गई, विनता गरुड़-माता। इसका अर्थ है - एक पत्नी नाग-वंश की मूल माता बनी, दूसरी गरुड़ अर्थात गरुत वंशी आर्य वंश की।
*5. यक्ष, राक्षस, वानर, विद्याधर -*
यक्ष - कुबेर के अनुचर, धन-रक्षक, आज के कुबेर क्षेत्र - तिब्बत के व्यापारी।
राक्षस - रक्षा करने वाले, रक्ष-संस्कृति के लोग। रावण राक्षस-वंशी राजा था, कोई दस सिर वाला प्राणी नहीं। दस सिर = दस दिशाओं का ज्ञाता।
विद्याधर - विज्ञान और विद्या के धारक। हनुमान, रावण सब विद्याधर थे।
### फिर चित्रों में उन्हें आधा पशु क्यों दिखाते हैं?
यह हमारे प्राचीन चित्र-संकेतों की भाषा है, जिसे हम भूल गए।
पुराणकार ने सांकेतिक भाषा लिखी -
- बलवान है तो पूंछ दिखा दी
- तेज दौड़ता है तो घोड़े का मुख
- जल में निपुण है तो मछली की पूंछ
- संगीतज्ञ है तो गंधर्व के पंख
यह *टोटम - ध्वज चिन्ह* है। जैसे आज भी हर रेजिमेंट का चिन्ह होता है - गोरखा की खुखरी, राजपूताना राइफल्स का कटार। वैसे ही नाग-वंश का चिन्ह सर्प, गरुड़-वंश का गरुड़, वानर-वंश का वानर।
### निष्कर्ष क्या निकला?
पुराण झूठ नहीं बोलते, हम पढ़ना भूल गए।
नागकन्या का अर्थ सांपिन नहीं, नागवंश की विदुषी राजकुमारी है।
मत्स्यकन्या का अर्थ मछली नहीं, मत्स्य देश की, धीवर कुल की कन्या है।
वानर का अर्थ बंदर नहीं, वानर-ध्वज धारी पराक्रमी मानव है।
देवता भी इसी मनुष्य समाज से उठ कर देवत्व पाए हुए लोग थे। तभी तो मनुष्य का देवता बनना, देवता का मनुष्य बनना संभव है।
पुराणों को चमत्कार कथा नहीं, मानव सभ्यताओं का भूगोल समझ कर पढ़िए, सब कुछ स्पष्ट हो जाएगा।##सबको जय जय श्री सीताराम🙏🙏 ##

Wednesday, 23 September 2026

संकल्प वाचन

आजकल बड़े-बड़े यज्ञों और अनुष्ठानों में एक बहुत बड़ी विडंबना देखने को मिलती है। लाखों रुपये खर्च करके महायज्ञ का आयोजन होता है, लेकिन जब 'संकल्प' की बारी आती है, तो मात्र देश-काल और गोत्र बोलकर इतिश्री कर दी जाती है।

अरे गुरु! संकल्प केवल आपका नाम और पता नहीं है। यह ब्रह्मांड की उत्पत्ति से लेकर, 14 लोकों के निर्माण, ग्रहों की सूक्ष्म दशाओं और विश्व-कल्याण तक की एक 'कॉस्मिक उद्घोषणा' है।
मेरे उच्च कोटि के विद्वान आचार्य जन और प्रबुद्ध पाठक अक्सर मुझसे एक ऐसे 'विशुद्ध संकल्प' की मांग करते थे, जिसमें कुछ भी अछूता न रहे। जिसमें सृष्टि का दर्शन भी हो और यजमान की सूक्ष्मतम कामनाएं भी।

 आज मैं आपके समक्ष वही अद्भुत, गूढ़ और परिपूर्ण संकल्प प्रस्तुत कर रहा हूँ।  
यह कोई साधारण संकल्प नहीं है।

 जब कोई विद्वान आचार्य यज्ञ मंडप में इसे नाद स्वर में पढ़ेगा, तो सुनने वालों के रोंगटे खड़े हो जाएंगे और उन्हें लगेगा— "हाँ, इसे कहते हैं संकल्प!"
 जहाँ-जहाँ संस्कृत अत्यंत क्लिष्ट है, वहाँ मैंने कोष्ठक में उसका सरल अर्थ लिख दिया है, ताकि भाव पूरी तरह स्पष्ट हो।
इसे ध्यान से पढ़ें, कंठस्थ करें और अपने पास सहेज कर रख लें:

॥ बृहद अनुष्ठान एवं यज्ञ हेतु सम्पूर्ण विशुद्ध सङ्कल्पः ॥

🛑परब्रह्म और ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति का दार्शनिक स्मरण👇

ॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णुः स्वस्ति श्री मन्मुकुन्द सच्चिदानन्द-रूपस्य परब्रह्मणो निर्वाच्य मायया यथाशक्ति विजृम्भिता विद्यायोगात् कालकर्मस्वभावाविर्भूत महत्तोदिताहंकार त्रयोदभूतस्य वियदादि पञ्च केन्द्रिय देवता निर्मिताण्डकटाहे चतुर्दश लोकात्मके लीलयातन्तमध्यवर्ति भगवतः श्रीनारायणस्य  
(अर्थात: सच्चिदानंद परब्रह्म की अनिर्वचनीय माया, महत तत्त्व, अहंकार, पंचतन्मात्राओं और पंचमहाभूतों से निर्मित इस ब्रह्माण्ड रूपी अण्डकटाह (कड़ाहे) और चौदह लोकों के मध्य लीला करने वाले भगवान श्रीनारायण...)  

 🛑सृष्टि, देश और काल का विशुद्ध वर्णन

नाभिकमलोद्भूतस्य सकललोकस्य पितामहस्य ब्रह्मणः सृष्टि कुर्वतस्तदुद्धारणाय प्रजापति प्रार्थितस्य महापुरुषस्य श्री श्वेतवाराहावतारेण ध्रियमाणायामस्यां धरित्र्यां भूर्लोकसंज्ञितायां सप्तद्वीप मण्डितायां क्षीरोदादि समुद्रतद्वीज वलयीकृत लक्षयोजनविस्तीर्णेजम्बुद्वीपे स्वर्गादि सरिद्भिः पाविते निखिल जनपावन कर्तृभिः शौनकादि महामुनि निवास भूते नैमिष्यारण्यादि मोक्षसाधनभूते श्रीमद्भगवतो महापुरुषस्य विष्णोराज्ञया प्रवर्तमानस्य अद्य श्रीब्रह्मणोह्नि द्वितीयपरार्द्धे श्रीश्वेतवाराहकल्पे वैवश्वतमन्वन्तरे अष्टाविंशतितमे कलियुगे कलिप्रथम चरणे भूर्लोके भरतखण्डे भारतवर्षे आर्यावर्तान्तर्गते ब्रह्मावर्त्तैकदेशे पुण्यप्रदेशे

👉(यहाँ यदि काशी में हों तो यह पढ़ें: काश्यां-अविमुक्त वाराणसी क्षेत्रे महाश्मशाने गौरीमुखे त्रिकण्टक विराजिते भागीरथ्याः उत्तरवाहिन्याः गङ्गायाः वामे दिग्भागे)  
(अब अपना वर्तमान स्थान और काल बोलें)

(अमुक) प्रान्ते (अमुक) मण्डलान्तर्गत (अमुक) पुण्यपवित्र ग्रामे (अमुक अयने) (अमुक) ऋतौ (अमुक) संवत्सरे (अमुक) मासे (अमुक) पक्षे (अमुक) तिथौ (अमुक) वासरे (अमुक) राशिस्थिते श्रीसूर्ये (अमुक) राशिस्थिते श्रीचन्द्रे (अमुक) राशिस्थिते श्रीदेवगुरौ शेषेषु ग्रहेषु यथा यथा राशिस्थान स्थितेषु सत्सु एवं ग्रहगुणगण विशेषण-विशिष्टायां शुभपुण्यकाले...  

🛑 यजमान का परिचय एवं कामनाओं का महासागर

... (अमुक) गोत्रः (अमुक) शर्मा, वर्मा, गुप्तोऽहं वा सपत्नीकोऽहं (अत्रागत्यानां सर्वेषां जनानां प्रतिनिधि भूतोऽहं अस्मिन् (अमुक) यज्ञे श्रुतिस्मृतिपुराणोक्त शास्त्रोक्त वेदोक्त तन्त्रोक्त पुण्यफल प्राप्त्यर्थं मम सकुटुम्बस्य सपरिवारस्य तथा च अन्येषां जनानां विशेषतः एतत् प्रान्तीयानां सर्वेषां स्त्री पुंसां च नित्य कल्याण प्राप्त्यर्थं...  
...कायिक वाचिक मानसिक सांसर्गिक चतुर्विध पापक्षय पूर्वकं आध्यात्मिक, आधिदैविक, आधिभौतिक, त्रिविध तापोपशान्तिसकल दुःख शेष निवृत्ति पूर्वकं व्याधादि जरा मृत्यु रोगभय शोकाद्युपसर्ग निवृत्ति-पुरस्सरं...
(अर्थात: काया, वाणी, मन और संसर्ग से हुए चारों प्रकार के पापों का क्षय हो, तथा दैहिक, दैविक और भौतिक तीनों तापों एवं बुढ़ापा, रोग, मृत्युभय आदि शांत हों।)  

मम जन्म कुण्डल्यां प्रश्नकुण्डल्यां लग्न कुण्डल्यां गोचरे च तन्महादशायां अन्तर्दशायां प्रत्यन्तर्दशायां प्रतिप्रत्यन्तर्दशायां सूक्ष्मान्तर्दशायां केचिद्विरुद्ध चतुर्थाष्टम द्वादश स्थान स्थित क्रूर ग्रहास्तैः संसूचितं संसूचयिष्यमाणं पुत्रपौत्रादिसन्तते-रविच्छिन्नाभिवृद्ध्यर्थं...
(अर्थात: जन्मकुंडली, गोचर, या किसी भी सूक्ष्म दशा में यदि ४, ८ या १२वें भाव में क्रूर ग्रह बैठे हों, तो उनका दोष शांत हो।)  

...आदित्यादिनवग्रहानुकुलता सिद्ध्यर्थं इन्द्रादिदशदिक्पालप्रसन्नता सिद्ध्यर्थं धर्मार्थकाममोक्ष चतुर्विध पुरुषार्थ सिद्ध्यर्थं अप्राप्तलक्ष्मीप्राप्त्यर्थं प्राप्तलक्ष्म्याश्चिरकालसंरक्षणार्थं सकलमनेप्सितकामना सिद्ध्यर्थं लोके वा राजद्वारे, सभायां, न्यायालये, उद्योगे, कृषिकार्ये, व्यापारे, समाजेऽपि तद्वारे वा सर्वत्र यशोविजय कीर्तिलाभादि प्राप्त्यर्थं शत्रुप्रराजय सद्धिष्ट सकल्पोक्त कामना सिद्ध्यर्थं च...
(अर्थात: राजदरबार (सरकार), न्यायालय , व्यापार और कृषि हर जगह विजय हो और शत्रुओं का पराभव हो।)  

...इह जन्मनि जन्मान्तरे वा सकलदुरितोपशमनार्थं गृहे विपुल धन-धान्य ऐश्वर्यादि-अभिवृद्धिपूर्बकं गृहे सर्वेषां जनानां शरीरे उत्पन्न एवं उत्पत्स्यमाण समस्त रोग व्याधि कष्ट पीडा निवारणपूर्बकं शरीरे दीर्घायुष्यनैरोग्य कीर्तिलाभक्षेमस्थैर्य सद्धर्म सद्बुद्धि सद्विद्या सद्विवेक सदाचारादि प्राप्त्यर्थं सनातन धर्मेस्मिन् अतिशयश्रद्धाभक्तिसंवृद्ध्यर्थं, धार्मिकग्रन्थानां पुराणानां सर्वासामं विद्यानां संवृद्ध्यर्थं विशेषतः स्वधर्मे सनातनधर्मे प्रीतिविवर्द्धनार्थम-
सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु, मा कश्चिद् दुःखभाग्भवेत्।।  

🛑 प्राकृतिक आपदा निवारण एवं अनुष्ठान का अंतिम संकल्प

इति सदुद्देश्यसिद्धिद्वारा विश्वस्मिन् जगति सर्वविधशान्त्यर्थं धर्मग्लान्यधर्मधर्माभ्युत्थान निवृत्तिपूर्वकं धर्मसंस्थापनार्थं च पुण्यकालेऽस्मिन् सकलदुरितोपशमनार्थं दुर्भिक्ष, अतिवृष्टि, अनावृष्टि, विप्लव भूकम्प पशुरोग कृषिकार्ये च उत्पन्न समस्त बाधा निवारणार्थं निर्विघ्नतापूर्वक प्रचुर अन्न उत्पादनार्थं राजभय चौरभय सर्पभय शत्रुभय अग्निभय रोगभय यानपातानादिभय दुस्संगजन्याकस्मिकभय तथा नानागतभयनिवारणार्थं...
(अर्थात: अकाल, अतिवृष्टि, भूकंप, पशुओं के रोग, दुर्घटना, सर्प भय, अग्नि भय आदि सभी ज्ञात-अज्ञात भयों का निवारण हो।)  

...नवग्रह-जन्यपीडा शान्त्यर्थं उपस्थितानां समेषां जनानां कल्याणार्थं तथा डाकिनी-शाकिनी-भूत-प्रेत-पिशाच-वेतालादिभय निवारणार्थं विशेषतः जगन्नियन्ता अनन्तकोटि ब्रह्माण्डनायकस्य भगवतः सूर्यमण्डलावर्ति जगद्वीज पुरुषोत्तम वैकुण्ठाधिपतेः श्रीसीतारामयोः वा साम्बसदाशिवस्य वा लक्ष्मीनारायणयोः वा जगदम्बिकयोः अनुग्रह प्राप्त्यर्थं सग्रहमखं (शिवशक्ति या अपने हिसाब से यज्ञादि का नाम)
 यागकर्म एभिर्द्विजकुलावंतसैः शम-दमादि-निखिल-गुणगण-भरितैः विद्वद्भिः सह अद्यरभ्य पूर्णाहुति पर्यन्तं करिष्ये।  
तदङ्गत्वेन स्वस्तिपुण्याहवाचनं मातृकापूजनं, वसोर्धारा-पूजनमायुष्य मन्त्रजपं साङ्कल्पिकेन विधिना नान्दीश्राद्धमाचार्यादि वरणञ्च करिष्ये।
तथा च मण्डपप्रवेशपूर्वकं वास्तुपूजनं, मण्डपपूजनं, चतुःषष्टियोगिनीपूजनं क्षेत्रपालनवग्रहपूजनं असंख्यात् सर्वतोभद्रपूजनं च करिष्ये।
तत्रादौ निर्विघ्नतासंसिद्ध्यर्थं गणैशाम्बिकयोः पूजन महं करिष्ये।  

(इतना बोलकर हाथ का जल, अक्षत और द्रव्य सामने पात्र में छोड़ दे

मंत्र यानी बांधने का उपाय-

मंत्र यानी बांधने का उपाय-
      

             मेरा जब जनेऊ हुआ तो उस समय मेरी उम्र 7साल की थी,पिता ने बड़े जतन के साथ वैदिक रीति से हम सब भाईयों का जनेऊ कराया। साथ में दो और भाईयों का जनेऊ हुआ। स्व.कामेश्वर नाथ चतुर्वेदी,श्रीजी मंदिर –यमुनाजी धर्मराज मंदिर वाले मेरे दीक्षागुरू बने, उन्होंने ही मंत्र दीक्षा दी,पहले गायत्री मंत्र की दीक्षा दी,साथ में बाला और भुवनेश्वरी के मंत्रों की दीक्षा दी,पिता के पास पहले से ही महात्रिपुरसुंदरी यंत्र थे।यानी बचपन से तीन देवियों गायत्री,बाला और भुवनेश्वरी की उपासना पद्धतियां जीवन में शामिल हो गयीं।बचपन के तकरीबन 12साल सघन आराधना-उपासना में बीते।मैं सुबह 4बजे उठता था,उठकर पढ़ता था, आधा गिलास चाय माँ बनाकर 4बजे ही दे देती थी।सात साल की उम्र से लेकर 12 साल की उम्र तक तो सुबह उठकर संध्या आदि करने के अलावा समूची तांत्रिक पद्धति से पूजा उपासना में पाँच-छह घंटे खर्च करता था। घर में ही पूजा की बढ़िया व्यवस्था थी।बाद में 11 साल की उम्र से माथुर चतुर्वेद संस्कृत महाविद्यालय पढ़ने जाने लगा तो दैनंदिन जीवन में बदलाव आया।पूजा के घंटे कम हो गए,पढाई के घंटे बढ़ गए। इनमें सुबह का पढ़ना शामिल हो गया,पहले सुबह उठकर कम पढ़ता था, पूजा-उपासना में मन ज्यादा लगाता था।

         मेरा घर यमुना के किनारे है और यमुना के उस पार एक बगीची खरीदी गयी उसका एकमात्र मकसद ही यही था कि पूजा के लिए फूलों को लाना।मेरी पूजा में तकरीबन डेढ़ दो किलो फूल लगते थे।इतने फूल रोज खरीदना संभव नहीं था। यह बगीची आज भी है,दुर्वासा ऋषि के आश्रम के पास ही ईसापुर ग्राम में, वहां भी पिता ने एक मंदिर बनवाया था, मैं सुबह ही सुबह पांच बजे के करीब रोज पिता के साथ वहां नाव में बैठकर निकल जाता और वहां घंटों रहता,नहाना-धोना-पूजा-भजन आदि करना,नाश्ता के तौर पर वहीं पर फल आदि तोड़कर खाना,यह दैनिक क्रिया तकरीबन 7-8 साल चली। दिलचस्प बात यह है कि मैंने जितना भजन-पूजन किया मेरे जीवन के दुख कम नहीं हुए।इससे एक बात बचपन में ही समझ में आ गयी कि भजन-पूजन-ईश्वरोपासना का दुख दूर करने से कोई संबंध नहीं है। हकीकत यह थी कि जितना भजन मैंने किया शायद मेरे साथ के किसी मित्र ने नहीं किया।जितनी पूजा मैंने की,उतनी किसी ने नहीं की।सब कुछ मंत्रबद्ध,सही पद्धति के साथ बेहतरीन गुरूओं के निर्देश में किया।इस मामले मैं मेरे असल गुरू तो पिताजी ही थे,वे तंत्र के पारंगत विद्वान हैं,वेदों का उन्होंने गंभीरता से अध्ययन किया है। दीक्षागुरू कामेश्वरनाथ जी निजी तौर पर बेहतरीन इंसान थे, हमें बेहद प्यार करते थे। इस वाकया को बताने के दो प्रधान कारण हैं ,पहला, निजी जीवन की तलाश,दूसरा,मंत्र के साथ अपने संबंध की नए सिरे से खोज।मंत्र जप मुझे आज भी प्रिय है,मैं मंत्र जप करता हूँ।आमतौर पर अजपा-जप करता हूँ।यानी मन ही मन मंत्र जप चलता रहता है।

मंत्र का एक रूप वह है जिसे पूजा-उपासना के संदर्भ में हमलोग जानते और मानते हैं लेकिन मंत्र का एक दूसरा बड़ा अर्थ भी जिसे आमतौर पर लोग नहीं जानते।मंत्र जप के संदर्भ में पहली बात यह कि मंत्र जप से मनोकामना कभी पूरी नहीं होती,मंत्र जप से सिद्धियां प्राप्त नहीं होतीं,ये सब बातें पाखंडियों की रची गयी हैं।मंत्र का प्रयोजनमूलक उद्देश्य पाखंडियों की सृष्टि है।मंत्र तो असल में जीवन को बाँधने का उपाय है।आप अपने जीवन को किस तरह के तारों से बाँधना चाहते हैं यह मंत्र से तय होता रहा है।मंत्र यानी जीवन बाँधने की कला।मंत्र को यदि जीवन जीने की कला के रूप में लें और देखें तो हमारे धर्म के अनेक संकट और व्याधियां खत्म हो जाएं।अनेक पाखंड खत्म हो जाएं।मंत्र का मतलब पाखंड से किसने जोड़ा हमें नहीं मालूम, लेकिन यही सच्चाई है कि मंत्र आज पाखंड का अंग है।जीवन जीने के अनेक रूप हैं उनमें से आपको चुनना होगा कि कैसे जिओगे,मंत्र असल में जीने के मार्ग को बांधने, नियोजित करने,संगठित,अनुशासित होकर जीने की कला है।

जीवन आज सबसे ज्यादा बिखरा हुआ है, भयानक अराजकता है, जीवनशैली के रूपों में अराजकता है , हमारे पास जीवनशैली को बांधने,संगठित करने का कोई उपाय नहीं है, पुराने जमाने में मंत्र का आविष्कार असल में जीवन बाँधने की कला के रूप में हुआ ,उसके हजारों-लाखों रूप हमें परंपरा में मिलते हैं, लाखों मंत्र मिलते हैं।जीवन जीने के लिए मंत्र जरूरी है,मंत्र के बिना जीवनशैली के अव्यवस्थित और अराजक हो जाने के चांस ज्यादा हैं।मंत्र का दूसरा पहलू है उदात्तता।मंत्र हमें क्षुत्रताओं से परे ले जाता है, निहित-स्वार्थों से परे ले जाता है।

रवीन्द्र नाथ टैगोर ने सही लिखा है ´मंत्र नामक वस्तु जीवन बाँधने का एक उपाय है।मंत्र का सहारा लेकर हम चिंतन के विषय को मन के साथ बाँधे रहते हैं।यह मानो वीणा की खूँटी,उसके कान की तरह है।तार को ऐंठ कर बाँधे रखने का साधन,वह तार को खुलकर अलग नहीं होने देता,उसे कस कर बाँधे रखता है।विवाह के समय स्त्री-पुरूष के वस्त्रों को गाँठ लगाकर बाँध दिया जाता है।इसके साथ मंत्र पढ़ दिए जाते हैं,वे मंत्र मन में ग्रंथि-बंधन करते रहते हैं।ईश्वर के साथ हमारे ग्रंथि-बंधन की जो जरूरत है,मंत्र उसमें सहायता करता है। इस मंत्र के सहारे हम उनके साथ अपना कोई एक संबंध पक्का कर लेंगे। वैसा एक मंत्र है पिता नोsसि।आप मेरे पिता है।मंत्र के इस सुर में अपने जीवन को बाँध लेने पर सारी चिन्ताओं,सारे कर्मों में एक विशेष रागिनी झंकृत हो उठेगी।मैं उनका पुत्र हूँ यही उक्ति साकार होकर हमारे सारे कार्य कलापों में प्रकाशित होने लगेगी कि मैं उनका पुत्र हूं।´

कहने का आशय यह कि मंत्र के मर्म को हम भूल गए और उसे हमने व्यवहारवाद,अवसरवाद, फल प्राप्ति के उपायों का सहारा बना दिया।मैं भी कभी-कभी किसी के मन संतोष के लिए उपाय के तौर पर मंत्र सुझा देता हूँ लेकिन सच यही है कि मंत्र उपाय नहीं है बल्कि मंत्र जीवन को बाँधने की कला है।संगठित नियमित जीवन जीना है तो मंत्र से सीखो।किसी अन्य से नहीं।

Monday, 21 September 2026

गया श्राद्ध के लिए घर से प्रस्थान करने के नियम🌹

🌹गया श्राद्ध के लिए घर से प्रस्थान करने के नियम🌹

गया जी में पितृ श्राद्ध एवं पिंण्डदान के लिए जाने से पहले घर पर कुछ आवश्यक धार्मिक कार्य पूर्ण कर लेना चाहिए। यह सभी कार्य अपने कुलाचार एवं आचार्य पंडित जी के मार्गदर्शन में करना उचित है। नीचे दिए अनुसार नियमों का पालन करें -

① गया जी तीर्थ विष्णुपद का स्मरण करते हुए पूजन 
गया धाम तीर्थ में वैदिक विधि विधान से पिंडदान का संकल्प 
अपने समर्थ अनुसार खर्च श्रद्धा से करें 

② नान्दीमुख श्राद्ध

गया जी जाने से पहले घर पर नान्दीमुख श्राद्ध विधिपूर्वक करवाना चाहिए। इसमें देवताओं, पितरों एवं कुल के पूर्वजों का पूजन करके गया श्राद्ध के लिए संकल्प किया जाता है। यह कार्य आचार्य पंडित जी के निर्देशानुसार करें।

③ प्रस्थान से पूर्व की तैयारी

प्रातः स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें। भगवान श्री गणेश, कुलदेवता एवं पितरों का स्मरण करें । आचार्य पंडित जी के निर्देशानुसार यात्रा का संकल्प लें और घर के बड़े-बुजुर्गों का आशीर्वाद लेकर गया जी के लिए प्रस्थान करें।

④ साथ में ले जाने योग्य सामग्री

स्वच्छ धोती, गमछा, वस्त्र, तिल, कुश, पूजा की सामग्री (आवश्यकतानुसार), पितरों के नाम व गोत्र की सूची, व्यक्तिगत आवश्यक वस्तुएँ तथा यात्रा से संबंधित दस्तावेज अपने साथ रखें।

⑤ यात्रा के दौरान आचरण

यात्रा के दौरान सात्विक एवं संयमित जीवन का पालन करें। मांसाहार, मदिरा, तंबाकू, गुटखा एवं अन्य नशीले पदार्थों का पूर्ण त्याग रखें। क्रोध, विवाद, अनावश्यक मनोरंजन एवं अपशब्दों से बचें। पितरों का स्मरण करते हुए शांतिपूर्वक यात्रा करें।

⑥ भोजन संबंधी नियम

यात्रा एवं श्राद्ध के दिनों में यथासंभव सात्विक भोजन करें। बाहर का अनावश्यक भोजन न करें। भोजन के संबंध में अपने आचार्य पंडित जी के निर्देशों का पालन करें।

⑦ पितरों की सही जानकारी

जिन पितरों का श्राद्ध एवं पिंण्डदान करना है, उनके नाम, गोत्र, संबंध एवं कुल की सही जानकारी पहले से तैयार रखें, ताकि पूजा विधि में किसी प्रकार की त्रुटि न हो।

⑧ गया जी में पूजा-विधि

गया जी पहुँचने के बाद पिंण्डदान, तर्पण, श्राद्ध एवं विभिन्न वेदियों की पूजा आचार्य पंडित जी के मार्गदर्शन में विधिवत संपन्न करें। कोन-सी वेदी पर किस क्रम से पूजा करनी है, यह वहाँ के निर्धारित पांडत और आचार्य में निर्देशानुसार किया जाएगा।

⑨ क्षौर कर्म (मुंण्डन)

मुंडन अथवा क्षौर कर्म का नियम प्रत्येक कुल एवं परंपरा में अलग हो सकता है। इसे अपने आचार्य पंडित जी के निर्देशानुसार ही करें ।

विशेष

- गया श्राद्ध अत्यंत श्राद्धा एवं पितृ स्मरण का धार्मिक अनुष्ठान है। इसलिए पूरी यात्रा के दौरान मन, वचन और कर्म से संयम रखते हुए श्राद्धापूर्वक पितरों का स्मरण करें और सभी धार्मिक विधियौं आचार्य पंडित जी के मार्गदर्शन में पूर्ण करें

नवरात्रि पर साधना

नवरात्रि के पावन अवसर पर सभी साधकों को बहुत-बहुत शुभकामनाएं और ढेर सारी बधाई मित्रों में आपको तीन मंत्र दे रहा हूं यह मंत्र आपको कहीं नहीं मिलेंगे प्राचीन हस्थ लिखित किताब से मैं आपको दे रहा हूं आप नवरात्रि को इस मंत्र को सिद्ध करके अपना कार्य कर सकते हैं साधारण सीधी हैं 9 दिन तक प्रतिदिन एक माला 108 जप करें रुद्राक्ष की माला दीपक नालेर की जोत एक या दो प्रकार के धुप थोड़ा सा नवाद मिस्री का भोग दे अगरबत्ती जलाएं और देवता का फोटो सामने होनी चाहिए यह उसकी तस्वीर आपके सामने होनी जरूरी है शुद्ध आसन उनका या फिर कुछ आसान घाश फुस्का होना चाहिए 

Saturday, 19 September 2026

गाली उसकी उत्पत्ति

गाली
१. शब्दार्थ-इसे संस्कृत में अपशब्द कहा गया है। व्याकरण या उच्चारण की अशुद्धि, अशुद्ध शब्दों का प्रयोग भी अपशब्द है। इसके अतिरिक्त किसी की निन्दा या उसे दुःखी करने के लिए कहा वाक्य भी अपशब्द है, जिसे गाली कहते हैं। संस्कृत में इसके लिए गालिः शब्द भी है। इसका मूल है-गल्ह कुत्सायाम् (धातु पाठ, १/२७५)। 
ददतु ददतु गालिर्गालिवन्तो भवन्तो, वयमपि तदभावाद् गालिदाने‍ऽप्यशक्ताः।
जगति विदितमेतद् दीयते विद्यमानं, ददतु शशाविषाणं ये महात्यागिनोऽपि॥ 
(भर्तृहरि का वैराग्य शतक, १३३)
= आप कर्म दोष से गाली दें, गालीवान् बनें। हमारे पास यह नहीं है, अतः गाली देने में असमर्थ हैं। संसार में प्रसिद्ध है कि जिसके पास जो है वही दे सकता है। खरहे के सींग जैसा जो नहीं है उसे कैसे दे सकता है?
२. गाली प्रवृत्ति-बचपन से जिसे संगति के कारण गाली देने का अभ्यास है, वही गाली दे सकता है। अभ्यास नहीं रहने पर वह अन्य शब्दों से विरोध करेगा, या उसका फल नहीं होने पर चुप रहेगा।
सारल्यं खलगालिदानसहनं येषां न तत् संनिधौ।
किञ्चित् कर्म कुकर्म दोष इति यद् विज्ञाय संत्यज्यते॥ (राजतरंगिणी, ७-३०४)
= (राजा कलश के विषय में) दुष्टों का गाली-दान सहन करना सरलता मानता था। ऐसी स्थिति में उसके सामने कौन सा कर्म कुकर्म मान कर त्यागा जा सकता था? 
गाली का प्रयोग म्लेच्छ लोगों द्वारा होता था और अशुद्ध भाषा बोलने वाले को भी म्लेच्छ कहते थे।
तेऽसुरा आत्तवचसो-हेलवो हेलव इति वदन्तः पराबभूवुः॥२३॥ तत्रैतामपि वाचमूदुरुपजिज्ञास्याम्। स म्लेच्छः। तस्मान्न ब्राह्मणो म्लेच्छेत्। असुर्या हैषा वाक्। एवमेवैष द्विषतां सपत्नानामादत्ते वाचम्। (शतपथ ब्राह्मण, (३/२/१/२३-२४)
(देवों ने शुद्ध वाणी ले ली) तो असुर कुछ कह न सके और ’हे ऽलवो, हे लवः (हाय वाक्, Hi, Hello) कह कर पराजित हो गये॥२३॥ इस प्रकार उन्होंने अर्थहीन वाणी बोली। ऐसी वाणी जो बोलता है, वह म्लेच्छ है। इस लिए कोई ब्राह्मण म्लेच्छ भाषा न बोले, क्योंकि यह असुरों की भाषा है। इसी प्रकार वह शत्रु को भाषा से वञ्चित कर सकता है॥२४॥ 
३. गाली परम्परा-
(१) महाभारत, कर्ण पर्व के अध्याय ३६-४१ तक कर्ण और उनके सारथि शल्य में विवाद हुआ। अध्याय ३९ में शल्य ने कर्ण को अर्जुन रूपी सिंह के सामने गीदड़, चूहा. बिल्ली, कुत्ता आदि कहा, तो अध्याय ४० में कर्ण ने शल्य तथा उनके मद्र देश के निवासियों तथा उनकी स्त्रियों के दुश्चरित्र का वर्णन किया।
मद्रदेश का अधम मनुष्य सदा मित्रद्रोही होता है। जो हमलोगों से अकारण द्वेष करता है वह मद्र देश का ही अधम मनुष्य है। क्षुद्रतापूर्ण वचन बोलने वाले मद्र देश के निवासियों में किसी के प्रति सौहार्द्र नहीं होता। मद्रदेश निवासी सदा ही दुरात्मा, सर्वदा झूठ बोलने वाला और कुटिल होता है। सुना है कि मरते समय तक उनमें कुटिलता रहती है। सत्तू और मांस खाने वाले जिन अशिष्ट मद्र निवासियों के घरों में पिता, पुत्र, माता, सास, ससुर, मामा, बेटी, दामाद, भाई, नाती, पोते, अन्यान्य बन्धु-बान्धव, समवयस्क मित्र, दूसरे अभ्यागत अतिथि और दास-दासी-ये सभी अपनी इच्छा के अनुसार एक दूसरे से मिलते हैं। परिचित-अपरिचित स्त्रियां सभी पुरुषों से सम्पर्क करलेती हैं और गोमांस सहित मदिरा पीकर रोती, हंसती, गाती, असंगत बातें करती तथा कामभावना से किये जाने वाले कार्यों में प्रवृत्त होती हैं। जिनके यहां सभी स्त्री-पुरुष एक दूसरे से काम सम्बन्धी प्रलाप करते हैं, जिनके पाप कर्म सर्वत्र विख्यात हैं, उन घमण्डी मद्र निवासियों में धर्म कैसे रह सकता है? मद्र निवासी के साथ न वैर करे, न मित्रता। 
इसके बाद मद्र देश की स्त्रियों की बहुत प्रकार से निन्दा की गयी है। (अध्याय ४०, श्लोक २०-४३)।
(२) पाश्चात्य प्रभाव-मद्र देश ईरान के उत्तर पश्चिम था। उसके निकट कम्बोज भी था जिसकी व्युत्पत्ति काम-भोज या स्वेच्छाचारी की गयी है। स्त्रियों के चरित्र सम्बन्धी गाली भारतीय स्वभाव नहीं था। शिशुपाल ने भी भगवान् कृष्ण को युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ में १०० गालियां दीं, उनमें कोई भी स्त्री निन्दा नहीं थी। वे कृष्ण को दुश्चरित्र कह रहा था।
(३) लुटेरा आक्रमण- स्त्रियों से बलात्कार सम्बन्धी गालियां मुस्लिम आक्रमण के बाद आरम्भ हुईं, जिनके लिए वे लूट की सम्पत्ति (माल-ए-गनीमत) थीं।
भारत में जो सम्मानित थे, उनका सम्बोधन भी गाली हो गया। स्त्रियां २-३ चोटी रखती थी, अतः चोट्टी एक गाली हो गया। ब्राह्मण या संन्यासी भी चोटी रखते थे, उनके लिए चोट्टा गाली हुआ। जैन और कई अन्य संन्यासी मुण्डन या लुञ्चन करते थे। उनके लिए लुच्चा गाली हुई।
४. कुछ गाली शब्दों के स्रोत-
(१) चुद-प्रेरणा अर्थ में २ धातु हैं-नुद् प्रेरणे (धातु पाठ, ६/२); चुद् संचोदने (१०/३३)। नुद का बाहरी प्रभाव होता है, चुद् से भीतरी प्रेरणा तथा प्रभाव होता है, जैसा गायत्री मन्त्र के तृतीय चरण में है-धियो यो नः प्रचोदयात्।
(२) बूर-हिन्दी शब्द कोष के अनुसार अर्थ-
बूर : पुं० [देश०] १. पश्चिमी भारत में होनेवाली एक प्रकार की घास जिसके खाने से गौओं, भैसों आदि का दूध और अन्य पशुओं का बल बहुत बढ़ जाता है। खोई। २. पशुओं के खाने का कटा हुआ चारा। ३. निकम्मी, फालतू या रद्दी चीज। ४. कुछ विशिष्ट प्रकार के कपड़ों के ऊपर निकले हुए रोएँ। जैसे—बूरदार कम्बल, बूरदार तौलिया। ५. एक प्रकार की मिठाई जो अन्न की भूसी या छिलके से तैयार की जाती है। उदा०—बूर के लड्डू खाये तो पछताये, न खाये तो पछताये। (कहा०) 
स्त्री०= बुर (भग)। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
बूरा  : पु० [हिं० भूरा] १. कच्ची चीनी जो भूरे रंग की होती है। शक्कर। २. एक प्रकार की साफ की हुई बढ़िया चीनी। ३. महीन चूर्ण।
(३) चूत, चूतिया- मूल धातु-चुत् स्रवणे = चूना, गीला करना। च्युतिर् (च्युत्) आसेचने (१/३३) -सींचना, गीला करना। च्युङ् गतौ (१/६८४)-गिरना, भटकना।
च्युङ् से च्युत (गिरा हुआ), अच्युत (कभी गिरा नहीं। इन्द्र को अच्युत-च्युतः कहते थे-जो अभी तक किसी से नहीं हारा, उसे भी इन्द्र हराते थे। 
यो विश्वस्य प्रतिमानं बभूव यो अच्युतच्युत स जनास इन्द्रः॥ (ऋक्, २/१२/९)
जो विश्व के लिए मापदण्ड है, अच्युत को भी च्युत कर सके, वह इन्द्र है।
शिष्टाचार नियम के अनुसार राजा, गुरु, पति, पत्नी और ज्येष्ठ पुत्र को नाम से नहीं बुलाते थे। अतः इन्द्र या पति को स-जना = वह व्यक्ति कहते थे।
इन्द्र पूर्व के लोकपाल थे, अतः असम में राजा के लिए अच्युत-च्युत या चूतिया शब्द प्रचलित हुआ। चूतिया राजवंश ने असम में ५०० वर्ष शासन किया था। शासक अत्याचार करने के कारण लोकप्रिय नहीं होते, अतः चूतिया शब्द निन्दित हुआ। या चूत में लिप्त रहने वाला चूतिया है।
चूतियापा का मूल हिब्रू शब्द चुतपा (Chutzpah) है, जो किसी से दबे नहीं, अच्युतच्युतः। 
(४) छिनार, छिनाल-हिन्दी शब्दसागर-छिनाल ^१ वि॰ स्त्री॰ [सं॰ छिन्ना+नारी; देशी छिणणालिआ, छिणणाली पू॰ हिं॰ छिनारि] व्यभिचारिणी । कुलटा । परपुरुषगामिनी । उ॰—अरे यह छिनाल बड़ी छतीसी है ।— भारतेंदु ग्रं॰, भा॰ १, पृ॰ ३१ ।
(५) बीया-भोजपुरी में बीज का अपभ्रंश है, पर ओड़िया में गाली है, चूत अर्थ में।
(६) घिंया = ओड़िया गाली-घृणित अर्थ में। या घञ् सम्प्रसारणे-घूंसा, भोजपुरी में मार के छितरा द। पंजाबी में छित्तर।
(७) पिल्ला-हिन्दी में यह गाली है। मूल अर्थ है कुत्ता का बच्चा। दक्षिण भारत में हर बच्चे को पिला कहते हैं। माता के शरीर से पुत्र का शरीर बनता है, पार्वती के उबटन लेप से गणेश का जन्म हुआ। अतः गणेश को पिल्लैयार कहते हैं। मूल धातु है- पिल क्षेपे (१०/५९)-फेंकना, काम में लगाये रखना, छिलका उतारना। पार्वती के आवरण से गणेश बने थे। केरल में पिल्लै उपाधि है।
(८) चुहाड़-मुष स्तेये (१/४५८)-चोरी अर्थ में। इससे मूषिक (मूस) हुआ है जो घर के अन्न चुरा कर अपने बिल में जमा करता है। मूस को चूहा भी कहते हैं-वह काटता है, चूर्ण करता है -चुडि (चुण्ड) अल्पीभावे (१/२१६) या चुडि (चुण्ड) छेदने (१०/१२८)। अतः धान को चूर्ण करने पर चूड़ा बनता है। चूहा जैसा चोरी करने वाले को चुहाड़ या चोर चुहाड़ कहते हैं। पंजाबी में चूहड़ लिखते हैं, किन्तु उच्चारण चूड़ करते हैं। अतः हिन्दी का चूड़ा पंजाबी में गाली हो जाता है।
(९) उधिया जा, ऊफर पड़-मृत पितर को पिण्डदान के समय भूमि के प्रेतों से कहा जाता है कि वह थोड़ा खिसक जायें (उदीरताम्), बीच में हवा के प्रेत कुछ और ऊपर जायें (उत्परासः), जिससे प्रेत के भोजन के लिए स्थान बन जाये। 
उदीरतां अवर, उत्परास उन् मध्यमाः, पितरः सोम्यासः (ऋक्, १०/१५/१)
उदीरतां = उधिया जा, उत्परासः = ऊफर पर। यह मृतक को कहते हैं, अतः जीवित के लिए गाली है।

असम में 'चूतिया' या 'चूटिया' एक प्रतिष्ठित जाति व सरनेम है, लेकिन इस नाम की उत्पत्ति का मुख्य कारण आम के बगीचे होना नहीं है। इस समुदाय का नाम उनकी अपनी मूल देओरी-चूतिया भाषा से आया है, जिसमें 'चु' का अर्थ शुद्ध या अच्छा, 'ति' का अर्थ पानी और 'या' का अर्थ मूल निवासी होता है, जिसका पूरा मतलब "शुद्ध पानी या नदियों के किनारे रहने वाले मूल निवासी" है। प्राचीन ग्रंथों में इन्हें 'च्युतिका' भी कहा गया है जिसका अर्थ उत्कृष्ट या शुद्ध वंश से उपजे लोग होता है, जो समय के साथ स्थानीय उच्चारण के कारण 'चूतिया' (उच्चारण: शुतिया या सुतिया) बन गया। संक्षेप में, यह असम का एक गौरवशाली शाही उपनाम है जिसका हिंदी भाषा के किसी अपशब्द या आम की खेती से कोई संबंध नहीं है। 

12वीं से 16वीं शताब्दी (1187 से 1524 ईस्वी) तक असम में 'चूतिया' राजवंश का शक्तिशाली साम्राज्य रहा है।

गाल, गाली और गालियाँ ...
खरी खरी सुनाने, चुहल करने, व्यंग्य और ... औकात 
दिखाने के लिए... ये मूल कारण है। 
1990 में जब शोध कर रहा था, गाली गायन रीति वाली सगे समधी की गालिया भी जमा की। 
गाली वाले शिलालेख भी मिले और आश्चर्य कि ये शिलालेख मंदिरों, देवस्थानों पर खड़े किए जाते। हरियाणा से तेलंगाना तक गद्देगाल जैसी भयानक / असहनीय / निष्कृष्ट गाली वाले शिलालेख चित्र सहित मिलते हैं... गद्देगाल यानी यह आज्ञा जो दी जा रही है, स्वीकारनी होगी अन्यथा तुम्हारी मां पर गधा पूगेगा! इस गाली के शिलालेख कोई डेढ़ हजार साल से मिल रहे हैं। हर क्षेत्रीय भाषा और नंदीनागरी से देवनागरी तक! 

Thursday, 17 September 2026

क्षेत्रपाल कौन

💥क्षेत्र पाल कौन है और विशेषता क्या है💥
🏵️ बहुत से लोग पूछते हैं कि क्षेत्रपाल कौन हैं ?
🎷1. ये स्वरूप किसका है ?
🙏शास्त्रों के अनुसार क्षेत्रपाल साक्षात् भगवान शिव के अंश , कालभैरव का ही स्वरूप हैं ।
🫵 लिंगपुराण में इन्हें "क्षेत्रपाल भैरव" कहा गया है । लोक भाषा में इन्हें ही खेतल,खेतपाल , भैरू बाबा, खंडोबा कहा जाता है।
🫵 शिवपुराण के अनुसार राक्षसों से पृथ्वी की रक्षा के लिए भगवान शिव ने ही क्षेत्रपालों को प्रकट किया ।
🎷2. कितने माने गए हैं ?
🙏मुख्य रूप से 8 क्षेत्रपाल माने गए हैं - जो 8 दिशाओं के रक्षक होते हैं, और ये 8 भैरव 
🔥1. असितांग भैरव 🔥2. रुद्र भैरव 
🔥3. चन्द्र भैरव 
🔥4. क्रोध भैरव 
🔥5. उन्मत्त भैरव 
🔥6. कपाल भैरव 
🔥7. भीषण भैरव 
🔥8. संहार भैरव 
🎷आगम शास्त्रों में इनका विस्तार 52 भैरव, 64 क्षेत्रपाल और 96 तक बताये गये है । 💐 जैन परम्परा में 96 क्षेत्रपाल का वर्णन है । हर गाँव, नगर, तीर्थ और श्मशान का अलग अलग क्षेत्रपाल होता है ।
💢3. कार्य क्या है ?
शब्द ही अर्थ है "क्षेत्रं पालयति इति क्षेत्रपाल:" जो क्षेत्र की रक्षा करे वो क्षेत्रपाल ।
💥शास्त्रों में 3 मुख्य कार्य बताए गए हैं 💥
💐 सुरक्षा करना ...
गाँव, खेत, मंदिर की सीमा और मर्यादा की रक्षा। इसीलिए इनका मंदिर गाँव के बाहर या शिव मंदिर के ईशान कोण में बनाया जाता है ।
💐न्याय करना ...
 ये न्याय के देवता हैं । अच्छे को पुरस्कार और बुरे को दण्ड देते हैं।
💐विघ्न हटाना ...
 वास्तु पूजा में क्षेत्रपाल की पूजा इसलिए अनिवार्य है कि बिना इनकी आज्ञा के उस भूमि पर कोई भी देवता पूजा स्वीकार नहीं करते । नया घर, खेत लेने पर पहले क्षेत्रपाल को रोट, भोग लगाया जाता है । 
🫵 इसलिए कहा भी गया है ...
जिस क्षेत्र में रहो, उस क्षेत्र के क्षेत्रपाल को प्रणाम ( पूजा ) करके रहो तो कोई संकट नहीं आता है ।
🙏जय श्री क्षेत्रपाल भैरव नाथ🙏
#क्षेत्रपाल #भैरव #सनातनधर्म

मनुस्मृति 2

कुपुत्रों के कंधे और मनुस्मृति की पालकी

मनुष्य की स्मृति केवल देखे और सुने से नहीं बनती. इतिहास उसमें एक महत्वपूर्ण तत्व बनकर शामिल रहता है. इसी इतिहास और सांस्कृतिक परंपरा से व्यक्ति अपने श्रेष्ठ को समझता है, गर्व को पहचानता है, शक्ति का अनुमान लेता है, पराजयों से सबक लेता है और मलिनताओं को स्वीकारता है. लेकिन कल्पना कीजिए कि हम स्मृतिबोध का चश्मा किसी और को सौंपकर ख़ुद आंखें मूंदें रहें और उसकी सुविधा के समायोजन को ही सत्य मानकर स्वीकार कर बैठें? इससे बड़ी आत्महंता अवस्था क्या हो सकती है. क्योंकि किराए की आंखों से दूसरे की सुविधा दिखती है, अपनी सच्चाई नहीं. भारतीय धर्म-परंपरा, जातिगत राजनीति और संविधान को एकसाथ प्रभावित करनेवाली इसी सच्चाई का नाम है मनुस्मृति.

मनुस्मृति पर जितना शोर है, उतना शोध नहीं है. जितने मत हैं, उतने तथ्य नहीं हैं. जितने फैसले हैं, उतने प्रमाण नहीं हैं. कोई उसे सामाजिक विषमता की जड़ कहता है. कोई हिंदू सभ्यता का आधारग्रंथ. कोई उसे जलाने की बात करता है. कोई उसे बचाने की. लेकिन इस पूरे शोर में एक सवाल है, जो मुझे बेचैन करता है. वह है. हम जिस मनुस्मृति पर बहस कर रहे हैं, क्या वह सचमुच वही मनुस्मृति है, जिसे कभी मनु ने लिखा था? यही सवाल मेरी बेचैनी की वजह है.

मैं यह सिद्ध करने नहीं बैठा हूँ कि मनुस्मृति सही है या गलत. मैं केवल इतना जानना चाहता हूँ कि अगर आज हमारे हाथ में जो मनुस्मृति है, वही मूल मनुस्मृति है, तो उसके भीतर इतने गहरे अंतर्विरोध क्यों हैं? और अगर वह मूल नहीं है… अगर सचमुच उसके साथ छेड़छाड़ हुई… अगर उसमें क्षेपक जोड़े गए तो फिर आजादी के लगभग अस्सी वर्ष बाद भी हम उसी कथित दूषित पाठ का बोझ क्यों ढो रहे हैं? उसकी प्रामाणिकता पर हमारी इस चुप्पी का मतलब क्या है? 

धर्मध्वजाधारियों और धर्माचार्यों को यह बताना होगा कि इस किताब का कौन-सा पाठ प्राचीन और प्रामाणिक है…कौन-सा संदिग्ध. यह नहीं हो सकता कि एक ही सांस में हम कहें- मनुस्मृति पवित्र भी है… और उसी सांस में यह भी कहें- उसमें अंग्रेजों ने मिलावट भी कर दी थी. इन दोनों बातों के बीच की दूरी केवल नारे नहीं भर सकते. उसके लिए अनुसंधान चाहिए. पांडुलिपियों का तुलनात्मक अध्ययन चाहिए. विद्वानों का धैर्य चाहिए. धर्माचार्यों का साहस चाहिए. और सबसे बढ़कर चाहिए- सत्य को स्वीकार करने का साहस. मुझे लगता है, पिछले सौ वर्षों में हमने मनुस्मृति पर जितनी राजनीति की, उस श्रम का दसवां हिस्सा भी उसकी प्रामाणिकता पर नहीं लगाया. हमने उसके पक्ष में भाषण दिए. उसके विरोध में आंदोलन किए. लेकिन यह जानने की बेचैनी बहुत कम दिखाई कि असल मनुस्मृति कौन-सी है?

अगर भारतीय परंपरा के सबसे सुंदर सूत्र- वाक्यों में से किसी एक को चुनना हो, तो मेरी पहली पसंद होगी-

यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः.
यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफलाः क्रियाः॥
(मनुस्मृति, अध्याय 3, श्लोक 56)

यानी- जहां स्त्री का सम्मान होता है, वहीं देवताओं का वास होता है. जहां स्त्री का सम्मान नहीं होता, वहां सारे शुभ कर्म निष्फल हो जाते हैं.

बहुत कम लोगों को पता है कि यह श्लोक मनुस्मृति का ही है. हर बार इसे पढ़ता हूँ तो मन श्रद्धा से भर जाता है. लेकिन हर बार एक सवाल भी जन्म लेता है. जो ग्रंथ स्त्री के सम्मान को देवत्व की शर्त बना सकता है… वही यह कैसे कह सकता है कि स्त्री जीवन भर पिता, पति या पुत्र के संरक्षण में रहे? और वही यह कैसे कह सकता है-

स्वभाव एष नारीणां नराणामिह दूषणम्.
अतोऽर्थान्न प्रमाद्यन्ति प्रमदासु विपश्चितः॥

मतलब- स्त्री का स्वभाव ही पुरुष को दूषित करने वाला है (मनुस्मृति, अध्याय 2, श्लोक 213 — कुछ संस्करणों में क्रम भिन्न मिलता है).

यहीं मैं ठहर जाता हूँ. इतना बड़ा अंतर्विरोध सहज नहीं लगता. या तो मैं मनुस्मृति को ठीक से नहीं समझ पाया हूँ. या फिर मनुस्मृति की कहानी, मनुस्मृति से कहीं अधिक जटिल है. लेकिन विरोधाभास यहीं समाप्त नहीं होता. जाति के प्रश्न पर भी मनुस्मृति ऐसे ही कठिन सवाल खड़े करती है.

सहासनमभिप्रेप्सुरुत्कृष्टस्यापकृष्टजः.
कट्यां कृताङ्को निर्वास्यः स्फिचं वाऽस्यावकर्तयेत्॥
(मनुस्मृति, अध्याय 8, श्लोक 280 — कुछ संस्करणों में 281)

यानी- यदि निम्न वर्ण का व्यक्ति उच्च वर्ण के साथ समान आसन पर बैठने का प्रयास करे, तो उसे दंडित किया जाए. उसके नितंब काट दिए जाए. एक दूसरा
श्लोक कहता है-

शक्तेनापि हि शूद्रेण न कार्यो धनसञ्चयः.
शूद्रो हि धनमासाद्य ब्राह्मणानेव बाधते॥
(मनुस्मृति, अध्याय 10, श्लोक 126 — कुछ संस्करणों में 129)

मतलब - शूद्र को धन संचय नहीं करना चाहिए, क्योंकि उसके धनवान होने से ब्राह्मणों को कष्ट पहुंचता है.

राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने 
इन्हीं श्लोकों को सदन में उद्धृत किया जिस पर हंगामा हुआ. सत्ता पक्ष को कहना पड़ा यह मनुस्मृति का है ही नहीं, जबकि जबाब यह होना चाहिए था कि भले यह लाईने मनुस्मृति में हो, हम इन श्लोकों का समर्थन नहीं करते, कोई भी सभ्य समाज इसके पक्ष में खड़ा नहीं हो सकता. हम इसकी निंदा करते हैं.

“एकजातिर्द्विजातींस्तु वाचा दारुणया क्षिपन्।
जिह्वायाः प्राप्नुयाच्छेदं जघन्यप्रभवो हि सः॥
(मनुस्मृति, अध्याय 8, श्लोक 269 — कुछ संस्करणों में 270)

शुद्र यदि द्विजातियों- ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य- को गाली देता है, तो उसकी जीभ काट देनी चाहिए, क्योंकि नीच वर्ण का होने से वह इसी दण्ड का अधिकारी है.

एक और श्लोक देखिए-

नामजातिग्रहं त्वेषां अभिद्रोहेण कुर्वतः।
निक्षेप्योऽयोमयः शङ्कुर्ज्वलन्नास्ये दशाङ्गुलः॥
(मनुस्मृति, अध्याय 8, श्लोक 270 — कुछ संस्करणों में 271)

यानी- शूद्र द्वारा अहंकारवश उपेक्षा से द्विजातियों- ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य- के नाम और जाति का उच्चारण करने पर उसके मुंह पर दस अंगुल लम्बी लोहे की जलती कील ठोंक देनी चाहिए.

धर्मोपदेशं दर्पेण विप्राणामस्य कुर्वतः ।
तप्तमासेचयेत् तैलं वक्त्रे श्रोत्रे च पार्थिवः ॥
(मनुस्मृति, अध्याय 8, श्लोक 271 — कुछ संस्करणों में 272)

मतलब - शूद्र दारा अहंकारवश ब्राह्मणों को धर्मोपदेश देने का दुस्साहस करने पर राजा को उसके मुँह और कान में गरम तेल डलवा देना चाहिए.

अगर आज कोई व्यक्ति सार्वजनिक मंच से ऐसी बातें कहे, तो समाज भी उसका विरोध करेगा और भारतीय संविधान भी. इसलिए इन विचारों का आधुनिक भारत में कोई नैतिक बचाव संभव नहीं है. लेकिन यहीं सबसे बड़ा प्रश्न खड़ा होता है. अगर ये श्लोक मूल हैं, तो उनका सामना कीजिए. लेकिन अगर ये मूल नहीं हैं… अगर ये वही क्षेपक हैं, जिनका वर्षों से दावा किया जाता रहा है… तो फिर ये आज भी हर संस्करण में यह क्यों छप रहे हैं? आखिर ये विवादित श्लोक हमारे घरों तक पहुंचे कैसे? और अगर पहुंच गए… तो हमने उन्हें अगली पीढ़ी तक पहुंचने क्यों दिया?

मनुस्मृति को लेकर सबसे अधिक चर्चा उसके विवादित श्लोकों की होती है. लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि यही ग्रंथ धर्म के दस लक्षण भी बताता है—

धृतिः क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः.
धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम्॥
(मनुस्मृति, अध्याय 6, श्लोक 92)

धैर्य, क्षमा, संयम, चोरी न करना, शुचिता, इंद्रियों पर नियंत्रण, बुद्धि, विद्या, सत्य और अक्रोध— यही धर्म के दस लक्षण हैं.

मनु स्मृति पर हमेशा यह आरोप भी लगता है कि इसने समाज के निचले तबके के प्रति न्याय नहीं किया. केवल उनके शोषण की बात कही. कहीं-कही यह सच भी लगती है. स्मृति को पूरा पढ़ें तो कहीं ब्राह्मणो के प्रति भी तल्खी दिखेगी. स्मृति ब्राह्मण कर्म को लेकर ज़्यादा सजग और सचेत दिखती है. जैसे ब्राह्मण होने की जो शर्त मनुस्मृति बताती है वह वेदपाठी होना चाहिए और उसे शिक्षा का व्यापार नहीं करना चाहिए. स्मृति इस बात पर पूरा जोर देती है.इस व्यवस्था में कोई व्यक्ति सिर्फ़ इसलिए ब्राह्मण नहीं है क्योंकि वह ब्राह्मण कुल में पैदा हुआ है. हर व्यक्ति को ब्राह्मण होने के प्रतिमानों को व्यक्तिगत रूप में पूरा करना पड़ता है यहाँ जन्मना ब्राह्मण के लिए कोई स्थान नहीं है,ब्राह्मण अर्थात् योग्यता. ब्राह्मण वर्ग की पक्षधरता को लेकर तुलसीदास पर जो आरोप लगाएं जाते हैं वह मनुस्मृति के संदर्भ में सच नहीं प्रतीत होते. तुलसीदास सील गुन हीन विप्र को भी पूज्य कहते हैं लेकिन मनुस्मृति इसका विरोध करती है. 

यह पढ़कर मनुस्मृति से शिकायत नहीं होती. सम्मान बढ़ता है. लेकिन सम्मान के साथ फिर प्रश्न भी खड़ा हो जाता है. जो ग्रंथ अक्रोध को धर्म का लक्षण कहता है. वही ग्रंथ स्त्री और शूद्र के बारे में इतने घटिया वाक्य कैसे कह सकता है? अगर दोनों मूल हैं… तो विरोधाभास क्यों? और अगर दोनों मूल नहीं हैं…तो फिर असली मनुस्मृति कौन-सी है? यानी कुछ तो गड़बड़ है! जिस पर विद्वान सदियों से चुप हैं.

पूरा मामला समझने के लिए हमे पीछे जाना होगा. अपने दादा के भी परदादा के समय में. यही कोई ढाई सौ साल पहले. भारत पर अंग्रेजी सत्ता अपनी जड़ें जमा चुकी थी. प्लासी का युद्ध हो चुका था. ‘ईस्ट इंडिया कंपनी’ अब व्यापारी कम, शासक ज्यादा थी. लेकिन भारत पर शासन करना आसान था, भारत को समझना मुश्किल. एक ऐसा देश, जहां हर कुछ किलोमीटर पर भाषा बदल जाती थी. रीति बदल जाती थी. रिवाज बदल जाते थे. कई बार न्याय की परंपरा भी बदलती थी. अंग्रेज जल्दी समझ गए कि भारत को जीतना ही पर्याप्त नहीं है. भारत को पढ़ना भी पड़ेगा. यहीं से मनुस्मृति की कहानी नया मोड़ लेती है.

वर्ष 1772 में गवर्नर जनरल वॉरेन हेस्टिंग्स ने फैसला किया कि मुसलमानों के निजी मामलों में इस्लामी कानून लागू होगा और हिंदुओं के मामलों का निर्णय उनके धर्मशास्त्रों के आधार पर किया जाएगा. सुनने में यह व्यवस्था न्यायपूर्ण लगती है. लेकिन यहीं सबसे बडा प्रश्न फिर खड़ा हुआ. हिंदुओं का धर्मशास्त्र कौन-सा? भारत में तो एक नहीं, अनेक स्मृतियां थीं. याज्ञवल्क्य स्मृति. नारद स्मृति. बृहस्पति स्मृति. स्थानीय परंपराएं थीं. लोकाचार था. न्याय के पारंपरिक नियम थे. पारंपरिक उदाहरण भी थे. सामंतों के अपने नियम थे. जाति आधारित नियम और तरीके थे. धर्म और परंपरा के नाम पर कई अघोषित विधान थे. यहां तक कि ग्राम पंचायतों की अपनी व्यवस्था थी.

समस्या थी किस किताब को चुने. भारतीय समाज किसी एक पुस्तक से नहीं चलता था. जैसे हिंदू धर्म, ईसाइयत और इस्लाम की तरह किसी एक किताब से नहीं चलता. लेकिन औपनिवेशिक शासन को भारत की जटिलता नहीं, प्रशासन की सरलता चाहिए थी. उसे एक ऐसा ग्रंथ चाहिए था, जिसे सामने रखकर कहा जा सके- यही है हिंदू कानून. यहीं से मनुस्मृति अंग्रेजी शासन के लिए असाधारण महत्व की हो गई. अंग्रेजों ने मनुस्मृति को बंदरिया के मरे बच्चे की तरह सीने से चिपका लिया.

मनुस्मृति संस्कृत की पहली किताबों में से एक है, जिसका यूरोपीय अनुवादकों ने अध्ययन और अनुवाद किया. अंग्रेज़ी में इसका पहला अनुवाद सर विलियम जोंस ने 1776 में किया. Institutes of Hindu Law, के नाम से यह किताब 1794 में छपी. हलॉंकि भारत में पहला छापा खाना 1556 में ओल्ड गोवा के सेंट पॉल कॉलेज में पुर्तगाली लोगों ने स्थापित किया था. जहॉं भारत में पहली अंग्रेजी किताब 1794 में छपी 'The Travels of Dean Mahomet' . जबकि हिंदी में पहली किताब 1810 में छपी. यह लल्लू लाल जी की ‘प्रेम सागर’ थी.

वर्तमान मनुस्मृति के जो पाठ मिलते हैं उसका मूल संपादन विलियम जोंस ने ही किया था. बाद में लुई जैकोलॉयट ने “लॉ ऑफ मनु” नाम से मनु स्मृति का अनुवाद, 1867 से 1876 के बीच किया. अंग्रेज़ सरकार ने इस किताब का इस्तेमाल हिन्दू कोड तैयार करने में किया. 1886 में जर्मन विद्वान मैक्स मुलर ने मनुस्मृति को अपनी कृति ‘edited volume Sacred Books of the East’ में शामिल करने से पहले इसका फ्रेंच, जर्मन, पुर्तगाली और रूसी भाषा में अनुवाद किया.

मनुस्मृति या मानव धर्मशास्त्र. इसे मनु के नियम के नाम से भी जानते है. इसकी रचना कब हुई इसका निर्धारण कठिन है. मनुस्मृति में कुल 12 अध्याय तथा 2694 श्लोक हैं. इतना विशाल ग्रन्थ की एक दिन या एक वर्ष में तो लिखा नहीं जा सकता. माना जाता है कि इसे दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व और दूसरी शताब्दी ईसवी के बीच लिखा गया. मनुस्मृति श्लोक छंद में लिखी गयी. इसमें 16-16 शब्दों की दो अव्यक्त पंक्तियाँ हैं. वेदों को कानों से सुनने और मस्तिष्क में गुनने के बाद जब यह विचार ताड़पत्रों पर उतरे तो स्मृति कहलाए. अब तक तक़रीबन बीस प्रामाणिक स्मृतियाँ हैं जिनमें सबसे चर्चित मनु स्मृति है.

मनुस्मृति के पहले भाष्यकार मेधातिथि हैं. इनका समय लगभग 825-900 ई. के बीच माना जाता है. उन्होंने 'मनुमहाभाष्य' नाम की टीका लिखी. मेधातिथि का मानना है कि मनुस्मृति के श्लोकों का संकलन ई.पूर्व चौथी अथवा पांचवीं शताब्दी में किया गया होगा. मनुस्मृति पर एक अन्य टीकाकार कुल्लुक भट्ट (1200 ई.) ने भी टीका लिखी. उन्होंने मनुस्मृति का रचना काल चौथी सदी ईसा पूर्व माना. मनु ने यवन, शक, कम्बोज, गान्धार, पदलव आदि का वर्णन किया है. इसलिए वे ई. पू. तीसरी सदी से बहुत पहले के नहीं हो सकते. इतिहासकार काशी प्रसाद जायसवाल भी मनुस्मृति की रचना पुष्यमित्र शुंग और उसके उत्तराधिकारियों के शासन काल में ही मानते हैं.

मनुस्मृति के प्राचीन पाठ में चार प्रमुख हिस्से हैं. एक- दुनिया की रचना. दो- धर्म के स्रोत. तीन-चार सामाजिक वर्गों का धर्म. और चौथा-कर्म, पुनर्जन्म और अंतिम मुक्ति का नियम. तीसरा खंड सबसे लंबा और सबसे महत्वपूर्ण है. जिसमें वर्ण व्यवस्था के सिलसिले को बनाए रखते हर जाति को उसके नियम बताए गए हैं. ब्राह्मण को मानव जाति का उच्च प्रतिनिधि और शूद्र को नीच बताते उसे 'उच्च' जातियों की सेवा करने का एकमात्र कर्तव्य दिया गया है. कुछ छंदों में महिलाओं के जन्म के आधार पर उनके खिलाफ घटिया और बेहद अपमानजनक भावनाएँ हैं.

भारतीय राजदर्शन में मनु के सप्तांग राज्य सिद्धांत सबसे चर्चित है. इसके मुताबिक, राज्य एक शरीर की तरह है, जिसके सात अंग हैं. ये सभी राज्य- रूपी शरीर की प्रकृतियां है जिनके बिना राज्य संचालन की कल्पना करना कठिन है. मनुस्मृति के अध्याय 9 के श्लोक 294 में राज्य के सात अंग गिनाए गए हैं.  जैसे- स्वामी यानी राजा, (2) मंत्री, (3) पुर (दुर्ग), (4) राष्ट्र, (5) कोष, (6) दंड और (7) मित्र. इन सात अंगों से बने राज्य का प्रत्येक अंग एक विशिष्ट कार्य करता है और इसी कारण उसका महत्व है. मनु के अनुसार यदि इनमें से किसी भी एक हिस्से की उपेक्षा होती है तो राजा के लिए राज्य का कुशल संचालन संभव नहीं है. मनुस्मृति के पहले अध्याय में सृष्टि की उत्पत्ति और प्रलय के बारे में लिखा गया है. दूसरा अध्याय- आर्यावर्त की सीमा, जलवायु, सोलह संस्कार के बारे में बताता है. तीसरा अध्याय- गृहस्थ आश्रम में प्रवेश, आठ तरह के विवाह , कन्या की पात्रता, श्राद्ध आदि के बारे में है.

चौथा अध्याय- गृहस्थ के लिए नियम, दान की पात्रता तय करता है. पांचवें अध्याय में मांस सेवन के दोष, बारह शुद्धिकारक, ईमानदारी, स्त्री-पुरुष संबंध के क़ायदे कानून है. छठें अध्याय में वानप्रस्थ के नियमों के बारे में बताया गया है. सातवां अध्याय में राजा के धर्म, दंड, मंत्रियों के परामर्श आदि की जानकारी दी गई है. आठवां अध्याय- राजा के विवाद निपटाने के तरीकों के बारे में लिखा गया है. नवां अध्याय- स्त्री पुरुष के कर्तव्य, अधिकार, पित्ता का उत्तराधिकारी होने के बारे में बताता है. दसवें अध्याय में चारों वर्णों के कर्तव्य वर्णित हैं. ग्यारहवें अध्याय में गोवध, मांस सेवन और अन्य पापों के बारे में लिखा गया है. बारहवां अध्याय स्वर्गलाभ, नरक प्राप्ति के उपाय बताता है.

ब्रिटिश भारत में औपनिवेशिक अफ़सरों के लिए इस किताब का अनुवाद एक व्यवहारिक मकसद था. हिंदुओं के इस धर्मशास्त्र को अंग्रेज 'कानून' के रूप में देखते थे पर भारत में इसका इस्तेमाल उस तरह से नहीं होता था. बरतानियों को लगा कि जिस तरह मुस्लिमों के पास क़ानून की किताब के रूप में शरिया है, उसी तरह हिंदुओं के पास भी मनुस्मृति है. इसकी वजह से उन्होंने इस किताब के आधार पर मुक़दमों की सुनवाई शुरू कर दी. इसके साथ ही काशी के पंडितों ने भी अंग्रेज़ों से कहा कि वे मनुस्मृति को हिंदुओं का सूत्रग्रंथ बताकर प्रचार करें. इसकी वजह से ये धारणा बनी की मनुस्मृति हिंदुओं का मानक धर्मग्रंथ है.

दलितों और महिलाओं पर मनुस्मृति में जो कुछ कहा गया है, वह अपमानजनक है. अस्वीकार्य है. सनातन का झंडा उठाए लोगों को कम से कम इसकी निंदा तो करनी ही  चाहिए. मनुस्मृति ने वर्णाश्रम व्यवस्था को मज़बूत किया. उसके पक्षपाती नियम बनाए. जिसका सुधारवादी तो विरोध करते हैं पर हर मानवतावादी को इसका विरोध करना चाहिए. जो मनुस्मृति का समर्थन करते हैं, वो मानते हैं कि सृष्टि की रचना ब्रह्मा ने की थी और दुनिया का कानून मनु और भृगु की परंपरा से आया है. इसके बहुत से हिस्सों में समाज के कल्याण की बातें कही गई हैं. दलितों और महिलाओं के बारे में जो विवादित अंश हैं, वो शायद बाद में जोड़े गए हैं. क्षेपक हैं. ये मूल किताब में नहीं हैं. मनुस्मृति को विस्तार से पढ़ें तो समझ भी आता है कि इसमें सारा कुछ कूड़ा नहीं है. कुछ अच्छी और नीतिगत बातें भी हैं पर उन्हें घटिया और जातीय विभाजन वाली बातें ढक लेती हैं.

मनुस्मृति का अनुवाद ब्रिटिश सरकार ने जिस मकसद से किया, उसका जहरीला असर मौजूदा समाज-जीवन में देखा जा सकता है. विलियम जोंस ने मनुस्मृति में षडयंत्रपूर्वक मनमानी मिलावट की. यही ग्रंथ बाद में भारत में छपी अलग-अलग मनुस्मृति का आधार बना. मार्च 1783 में ब्रिटिश सरकार ने जोंस को बंगाल सुप्रीम कोर्ट में जज बनाकर भेजा था. थोड़े ही दिनों बाद उन्हें ‘सर’ की उपाधि मिली. 15 जनवरी 1784 को गवर्नर जनरल वारेन हेस्टिंग्स ने “एशियाटिक सोसाइटी ऑफ़ बंगाल” की स्थापना कर उन्हें अध्यक्ष नामित किया. बस इसी के बाद उन्होंने भारतीय धर्मशास्त्र की अलग-अलग पांडुलिपियों को मँगाकर उनमें मिलावट का कारोबार शुरू किया. एक अनुमान के मुताबिक उन्हें मनुस्मृति के 50 से ज्यादा पाठ बंगाल के पंडितों ने सौंपे. पैसे और वजीफों के लालच में. हो सकता है कि ये मिलावट संकुचित जातीय दृष्टि और जातीय स्वार्थों से प्रेरित भी रही हों. विलियम जोंस का निधन 27 अप्रैल 1794 को हुआ. इसी साल उन्होंने संपादित मनुस्मृति का दूसरा अंग्रेजी संस्करण “इंस्टीट्यूट आफ हिंदू लॉ” प्रकाशित करा दिया. यह वह कालखंड था जब अंग्रेज सत्ता मनुस्मृति को खोज-खोज कर उसे छपवाने में सबसे ज्यादा बेताब थी.

20 अक्टूबर 1791 को वारेन हेस्टिंग्स को लिखी एक चिट्ठी में विलियम जोंस लिखते हैं, “यहां पंडितों के साथ मैं उनकी देववाणी संस्कृत सीख रहा हूँ. अब मैं संस्कृत में धाराप्रवाह बातचीत कर लेता हूँ. कोर्ट के काम के अलावा मैं मनुस्मृति के अनुवाद में जुटा हूँ. मेरी ही देखरेख में ग्रंथ संपादित हो रहा है”. उधर बंगाल के पंडित इसी बात पर बम-बम थे कि अंग्रेज संस्कृत बोल रहा है. उन्हें वज़ीफ़ा मिल रहा है. सरकारी सम्मान मिल रहा है. पर इस क़ीमत पर क्या बोया जा रहा है इसकी उन्हें परवाह नहीं थी. वह चमत्कृत थे. जोंस के संस्कृत शिक्षक कोई पंडित रामलोचन थे.

मित्रवर प्रो. राकेश उपाध्याय का इस विषय में अध्ययन है,वे कहते हैं, “दरअसल ब्रिटिश सुप्रीम कोर्ट के जजों का बंगाली पंडितों से बहुत से न्यायिक विषयों में वाद-विवाद हो जाता था. जजों का आरोप था कि पंडित लोग मनमाने तरीके से व्याख्या कर रहे हैं. हर पंडित के पास अपनी अलग-अलग विधि संहिता है, जहां वह कई तरह से विधि की व्याख्या करता है. इसलिए एक कॉमन संहिता जरूरी हो गई. उन्होंने उस समय के बड़े बंगाली विद्वानों की सूची तैयार की. सबके पास जो भी विधि संहिता की मूल पांडुलिपियां थीं, उन्होंने मुँह-मांगे दाम पर इकट्ठा करना शुरू कर दिया. ग्यारह बंगाली पंडितों की समिति गठित की गई. उस समिति को देशभर से जुटाई गई पोथियां दी गई. इसमें अनेक पाठ, मत-मतांतर शामिल थे.” यहीं से भारतीय समाज में विभाजन के बीज रोप दिए गए.

यूरोप ने पहली बार भारत को काफी हद तक मनुस्मृति की नजर से पढ़ना शुरू किया. यहीं से बहस शुरू होती है. इतिहास का एक पक्ष कहता है कि अंग्रेजों ने मनुस्मृति में कोई परिवर्तन नहीं किया. उन्होंने केवल उसे पूरे हिंदू समाज की प्रतिनिधि विधि-संहिता घोषित कर दिया, जबकि वास्तविक भारत उससे कहीं अधिक विविध था. पर एक दूसरा पक्ष इससे आगे जाता है. वह कहता है कि अंग्रेजों ने केवल मनुस्मृति का उपयोग नहीं किया. उन्होंने उसका उपयोग हथियार की तरह किया. स्त्री और जाति से जुड़े विवादित श्लोकों को आगे बढ़ाया. कुछ अंशों में क्षेपक जोड़े गए. कुछ को बढ़ा-चढ़ाकर प्रचारित किया गया. उद्देश्य था- भारतीय समाज की दरारों को और चौड़ा करना. यहीं सबसे अधिक सावधान होना पड़ता है. क्योंकि इतिहास यहां अंतिम निर्णय नहीं देता. इस दावे पर विद्वानों में मतभेद हैं. निर्णायक प्रमाण आज भी विवाद का विषय हैं. इसलिए इसे अंतिम सत्य नहीं कहा जा सकता.

लेकिन… क्षण भर के लिए मान भी लें कि यह मत सही है. मान लें कि मनुस्मृति के साथ सचमुच छेड़छाड़ हुई. मान लें कि उसमें क्षेपक जोड़े गए. मान लें कि स्त्रियों और शूद्रों के बारे में लिखे गए कुछ विवादित श्लोक बाद की मिलावट हैं. तो फिर सबसे बड़ा प्रश्न अंग्रेजों से नहीं, हमसे है. अंग्रेजों ने वही किया होगा, जो हर औपनिवेशिक सत्ता अपने हित में करती है. लेकिन हमने क्या किया? आजादी को लगभग अस्सी वर्ष हो चुके हैं. अगर यह हमारी मूल मनुस्मृति नहीं है… अगर इसमें मिलावट हुई… अगर इसमें स्त्री और जाति के खिलाफ लिखे गए विवादित श्लोक बाद में जोड़े गए… तो वे आज भी हर संस्करण में यह क्यों छप रहे हैं? और सारे धर्माचार्य, शंकराचार्य इस मनुस्मृति को अंतिम सत्य मान इसके पक्ष में क्यों खड़े हैं?

किसी प्रकाशक ने उनके नीचे यह लिखने की जरूरत क्यों नहीं समझी कि उनकी प्रामाणिकता विवादित है? किसी धर्माचार्य ने यह मांग क्यों नहीं उठाई कि देशभर की पांडुलिपियों का मिलान कर एक प्रमाणिक पाठ तैयार किया जाए? किसी कुलपति ने इसे राष्ट्रीय बौद्धिक परियोजना क्यों नहीं बनाया? हम हर बार अंग्रेजों को कठघरे में खड़ा करते हैं. लेकिन अपने मौन का हिसाब कौन देगा? आज हिन्दुत्व के जो झंडाबरदार चिल्ला-चिल्ला कर कह रहे हैं. यह ‘क्षेपक’ हैं. वह पिछले ढाई सौ साल से कहां थे. उनकी मरघटी चुप्पी ने इस विवादित मनुस्मृति को वैधता दे दी.

मुझे अंग्रेजों से शिकायत कम है. वे शासक थे. उन्होंने अपने साम्राज्य के हित में काम किया. शिकायत अगर किसी से है… तो हमसे है. अगर मनुस्मृति सचमुच मिलावट का शिकार हुई थी, तो सबसे बड़ी विफलता अंग्रेजों की नहीं थी. सबसे बड़ी विफलता हमारी थी. क्योंकि साजिश उन्होंने की होगी… लेकिन उसे पीढ़ी-दर-पीढ़ी हमने ढोया. यही वह प्रश्न है, जिससे बचना सबसे कठिन है. और शायद यहीं से मनुस्मृति की बहस इतिहास से निकलकर हमारे बौद्धिक चरित्र की बहस बन जाती है.

सिर्फ स्वामी दयानंद ने मनुस्मृति की मिलावट को चुनौती दी थी. 1875 से 80 के बीच अपने प्रवचनों में स्वामी जी ने उसके महिला, दलित विरोधी अंशों पर सवाल उठाते हुए इसे मूल मनुस्मृति का हिस्सा नहीं बताया था. बाद में उनके शिष्यों ने शोध करके 2685 श्लोकों में से 1471 को मिलावटी बताया. जिन्हें नकली कहा गया. वे मनुस्मृति का हिस्सा नहीं थे. यहीं महात्मा ज्योतिबा फुले और डॉ. भीमराव आंबेडकर का उल्लेख अनिवार्य हो जाता है. मैं यह नहीं कह रहा कि उनसे पहले किसी ने मनुस्मृति पर प्रश्न नहीं उठाए. भारतीय परंपरा में असहमति कोई नई बात नहीं थी. बुद्ध ने प्रश्न पूछे. महावीर ने प्रश्न पूछे. चार्वाक ने प्रश्न पूछे. कबीर ने पूछे. रविदास ने पूछे. गुरु नानक ने पूछे. लेकिन मनुस्मृति पहली बार एक बड़े सामाजिक और राजनीतिक प्रश्न के रूप में उन्नीसवीं शताब्दी में महात्मा ज्योतिबा फुले के साथ और फिर बीसवीं शताब्दी में डॉ. भीमराव आंबेडकर के साथ राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में आती दिखाई देती है. यह प्रश्न अभी भी विचारणीय है. डॉ. आंबेडकर ने सिर्फ प्रश्न ही नहीं पूछे. उन्होंने समारोह पूर्वक मनुस्मृति को जलाया भी.

क्या इसलिए कि अंग्रेजों ने उसे “हिंदू लॉ” का प्रतिनिधि ग्रंथ बनाकर पहले से कहीं अधिक प्रभावशाली बना दिया था? या इसलिए कि आधुनिक भारत पहली बार अपने ही ग्रंथों को नए प्रश्नों के साथ पढ़ रहा था? इतिहास इस पर अंतिम निर्णय नहीं देता. लेकिन प्रश्न अपनी जगह बना रहता है. जो किसी सनातन के झंडाबरदार ने नहीं पूछा. सब मनुस्मृति के पक्ष में बेहूदी दलीलें देते रहे.

25 दिसंबर 1927. महाड़. डॉ. भीमराव आंबेडकर ने मनुस्मृति का दहन किया. वह केवल एक पुस्तक नहीं जला रहे थे. वे उस सामाजिक व्यवस्था के विरुद्ध विद्रोह कर रहे थे, जिसे वे मनुष्य की समानता के विरुद्ध मानते थे. लेकिन आंबेडकर को केवल इस घटना से समझना भी पर्याप्त नहीं है. अपनी पुस्तक “Philosophy of Hinduism” में वे लिखते हैं कि मनु ने वर्णव्यवस्था का समर्थन किया और उसके बीज बोए, लेकिन यह निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता कि जाति-व्यवस्था का निर्माण स्वयं मनु ने किया. यह अंतर बहुत महत्वपूर्ण है. क्योंकि आंबेडकर भी इतिहास को नारे में नहीं बदलते. वे विचार का विरोध करते हैं. लेकिन जटिलताओं को सरल नहीं बनाते. शायद इसी कारण उन्हें पूरा पढ़ना चाहिए, टुकड़ों में नहीं. 1970 में कांशीराम ने ‘बामसेफ’ का गठन किया. इस एलान के साथ कि हमारा समाज दो हिस्सों में बंटा है, जिससे एक हिस्सा मनुवादी है दूसरा मूल निवासी. उनकी इस परम्परा को बाद में मायावती ने आगे बढ़ाया. यह दूसरी बात है कि कथित मनुवादियों के साथ सत्ता की साझेदारी के चलते उन्होंने कॉंशीराम और अम्बेडकर की लड़ाई को कमजोर किया. राजस्थान हाईकोर्ट में मनु की एक मूर्ति भी लगाई गई थी, जिसका बहुत विरोध हुआ.

फिर वहीं लौटता हूँ, जहां से चला था. इस पूरे लेख को लिखने के बाद मेरे पास उत्तर कम हैं. प्रश्न अधिक हैं. मैं भी  यह दावा नहीं कर सकता कि मनुस्मृति के सभी विवादित श्लोक क्षेपक हैं. इतिहास भी अभी यह दावा नहीं करता. मैं यह भी नहीं कह सकता कि अंग्रेजों ने निश्चित रूप से उसके पाठ में परिवर्तन किए. इस पर भी विद्वानों में मतभेद हैं. इस सवाल पर गीता प्रेस का अभिनंदन होना चाहिए. उसने समूचे हिंदू आर्ष ग्रन्थ छापे. वेद छापा. पुराण, उपनिषद, आरण्यक ग्रंथ छापे. रामायण, रामचरितमानस, महाभारत और गीता छापी. पर मनुस्मृति में हाथ नहीं लगाया. नहीं छापी, क्योंकि उसके पास प्रामाणिक ग्रंथ की किल्लत थी.

लेकिन मेरे मन में सबसे बड़ा सवाल मनुस्मृति में निहित विरोधाभास का है. समानता की वकालत करता यह ग्रंथ दलितों को प्रताड़ित करने की बात कैसे कह सकता है. स्त्री को पूज्य बताते बताते यही मनुस्मृति उनके प्रति कठोर और हिंसक कैसे हो सकती है. इससे यह अंदाज़ा लगता है कि हो न हो, इस ग्रंथ में बाद के समय में बहुत कुछ जोड़ा गया है. ज़ाहिर है, कि मूल पाठ में से श्लोक हटाए तो नहीं गए लेकिन अपनी बात और तर्क मनवाने के लिए नए जोड़ दिए गए. यहीं से मनुस्मृति का विरोधाभास सामने आ जाता है. मनुस्मृति का पक्ष या विरोध करने वाले लोग अगर अपनी पसंद के हिस्सों को पढ़ने के बजाए इसका पूरा पाठ करें तो उनको भी यह विरोधाभास सहज ही महसूस होगा.

एक बात पूरे विश्वास से कह सकता हूँ. हमने इस प्रश्न को कभी गंभीरता से लिया ही नहीं. अगर आज उपलब्ध मनुस्मृति ही मूल है… तो उसके विवादित श्लोकों का ईमानदारी से सामना कीजिए. उन्हें सही मानते हैं, तो तर्क दीजिए. गलत मानते हैं, तो स्पष्ट कहिए. लेकिन अगर आप स्वयं यह कहते हैं कि आज की मनुस्मृति में मिलावट है… तो फिर सबसे पहले उसी मिलावट को पहचानिए. उसे चिह्नित कीजिए. उसे प्रमाणित कीजिए.

किसी भी सभ्यता की सबसे बड़ी त्रासदी उसके ग्रंथों में मिलावट नहीं होती. सबसे बड़ी त्रासदी यह होती है कि वह उस मिलावट को पहचानने की कोशिश भी छोड़ दे. अगर कोई ग्रंथ सचमुच हमारी सभ्यता का हिस्सा है, तो उसकी रक्षा जयकारों से नहीं होती. उसकी रक्षा सत्य से होती है. और अगर किसी ग्रंथ पर मिलावट का आरोप है, तो उसका उत्तर आक्रोश नहीं, प्रमाण देते हैं. शायद इसलिए मेरा सवाल मनुस्मृति से कम, हमसे अधिक है. अगर वर्तमान मनुस्मृति ही मूल है, तो उसके विवादित श्लोकों का सामना कीजिए. स्वीकार कीजिए. अगर वह मूल नहीं है, तो उसकी प्रामाणिक प्रति खोजिए. लेकिन यह नहीं हो सकता कि हम एक ही सांस में उसे पवित्र भी कहें और दूषित भी. सभ्यताएं अपने ग्रंथों से नहीं हारतीं. वे तब हारती हैं, जब अपने ग्रंथों से, सत्य से और इतिहास से प्रश्न पूछना छोड़ देती हैं.

लेकिन देरी के बावजूद मैं आशावादी रहना चाहता हूं. समाज में हिंदुत्व के अलम्बरदार और विरोधी फिर से इस ग्रंथ को उठाएं. इसके मूल पाठ की खोज और कथावस्तु पर चर्चा करें. प्रश्नों का सामना करें.मिलावटों की पहचान करें. यह हमारा ग्रंथ है. इसे अपनी नज़र से देखें. अंग्रेज़ों की नज़र से नहीं. हंस बनें. दूध का दूध और पानी का पानी कर दें.

जय जय.