Saturday, 27 June 2026

भगवान जगन्नाथ और काष्ठ


जगत को चलाने वाले जगन्नाथ भले ही षडैश्वर्य गुण संपन्न हो, पर उनको  भी अपना ही घर चलाने में मैया याद आ जाती है। वैसे देखा जाए तो यह गृहस्थों के लिए एक सीख भी है कि गृह स्वामी को भीतर-बाहर काठ के कुंद की तरह धैर्य धारण करना पड़ता है। तभी गृहस्थी रूपी रथ आगे बढ़ता है।
भगवान मुरारी को काठ क्यों होना पड़ा, इसका रहस्य  पढ़िए। संस्कृत साहित्य में हास्य बोध उच्च कोटि का है,






भगवान हैं तो मनुष्य की चिंता करेंगे ही। करना भी चाहिए। किंतु उनके भक्त भी इस मामले में कम नहीं हैं। वे भगवान की चिंता करते हैं। खासी चिंता करते हैं।
ऐसे ही एक चिंता प्रवण भक्त जब जगन्नाथ जी के दर्शन को गये तो वह चिंता में पड़ गये है। उन्हें यह बात बड़ी विचित्र लगी कि ‘‘पुरुषsएवेदं सर्व्वं यद्भूतं यच्चं भाव्यम्’’ वाले भगवान आखिर काठ के कैसे हो सकते हैं? हो ना हो, इसके पीछे बहुत बड़ा कोई रहस्य है। 
चिंतन प्रवण भक्त ने चिंता शुरू कर दी । बहुत दिन तक चिंतन चला। अंत में उन्होंने सारा रहस्य ढूंढ मारा। वह रहस्य इस श्लोक में आबद्ध कर दिया:-

‘‘एका भार्या प्रखर मुखरा चंचला सा द्वितीया, एको पुत्र: त्रिभुवन विजयी मन्मथ दुर्निवार:
शेष: शैया, उदधि भवन: वाहन पन्निगार:, स्मारं स्मारं स्वगृहे चरितं दारू भूतो मुरारि।’’

इसका चलताऊ भाषा में मोटा-मोटी यह अनुवाद हो सकता है कि एक पत्नी बहुत बोलने वाली। दूसरी अति चंचला, कहीं टिकती ही नहीं। एक पुत्र है कामदेव है जिसको जीतना बहुत ही कठिन है और वह तीनों लोक को जीत लेता है। शेष नाग की शैया। ऊपर से गहरे सागर का निवास। वाहन है नागों के शत्रु गरूड़। भगवान की जरा सी दृष्टि चूके तो शैया और वाहन आपस में भिड़ जाए। बेचारे भगवान मुरारी अपने घर की चिंता कर करके काठ के हो गये हैं। 
सोचिए लोग अपने घर की जरा जरा सी परेशानियों से परेशान हो उठते हैं।

मुरारी बापू की पत्नी का मरण और उनके लिए सूतक

मुरारी बापू की पत्नी का मरण और उनके लिए सूतक 
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मुरारी बापू गुजरात प्रांत से वामपंथी विचारधारा में राम कथा कहने के लिए विश्व में विख्यात हैं।
अभी कुछ समय पहले उनकी पत्नी का निधन हो गया। उन्होंने तीन दिन के बाद काशी में कथा कहने के लिए गंगा में स्नान किया और बाबा विश्वनाथ का दर्शन भी किया ।
इसके साथ ही विद्वानों ,संतो और शंकराचार्य जी महाराज ने धर्म की मर्यादा का उल्लंघन देखकर उन्हें शास्त्र की मर्यादा का संदेश दिया।
मुरारी ने भी अपनी तीखी प्रक्रिया में क्षमा याचना की और सब पोल खोल देंगे कह कर सभी साधु संतों पर आक्रमण किया। अपने को निम्बार्काचार्य सम्प्रदाय का साधु घोषित करके कहा कि उन्हें सूतक नहीं लगता है।
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समाधान
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वेद, स्मृति और पुराण को मानने वाले सनातनी प्राणी के लिए मरणाशौच में दशगात्र विधान करना जरूरी है ।अन्यथा वह अपवित्र है और उसके हाथ का पानी पीना भी दोषपूर्ण है। अशौच में पड़ा हुआ व्यक्ति न तो किसी से पैर छुआ सकता है न किसी का पैर छू सकता है न किसी को प्रणाम कर सकता है।
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उनके सूतक का पालन न करने के लिए सभी आचार्यों ने तीखी प्रतिक्रिया की।
यहां राम कथा के माध्यम से मरणाशौच को समझिए।
महाराज दशरथ की मृत्यु के बाद भरत जी ने अपने पिता की वेद,पुराण,स्मृतियों के अनुसार विधियों का पालन किया।
सोधि सुमृति सब वेद पुराना।
कीन्ह भरत दसगात विधाना।।
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भये विशुद्ध दिए सब दाना।
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पितु हित भरत कीन्हि जस करनी।

इससे भरत जी की सूतक से निवृत्ति हो गई। अब भरत जी के निर्णय से सब राम जी को मनाने चित्रकूट पहुंच गये।
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जब राम जी ने सुना कि पिता जी सुरपुर चलेगये। बहुत दुखी होकर प्रथम दिन की तरह सूतक माना । जबकि भरत जी तो सब विधान पहले ही पूरे कर चुके थे।
व्रत निरम्बु तेहि दिन प्रभु कीन्हां।
मुनिहु कहें जलु काहु न लीन्हां।।
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करि पितु क्रिया वेद जस वरनी।
भे पुनीत पातक तम तरनी।।
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चित्रकूट में रहते हुए और भरत जी द्वारा सब क्रिया विधान पूरा करने पर भी...
शुद्ध भये दुई वासर बीते।
दो दिन बीत जाने के बाद तीसरे दिन अपने को शुद्ध माना।
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मुरारी जी राम कथा करते हैं।राम कथा सापेक्ष उनका चिंतन स्थिर रहता तो सूतक मान्य करते।उनकी कथा में वामपन्थ स्पष्ट रहता है। इसलिए उनका सूतक समाप्त नहीं हो सकता है। उन्होंने वेद विहित मार्ग का त्याग किया है। 
तजि श्रुति पन्थ वाम पथ चलिहीं।
वंचक विरचि वेष जगु छलहीं।
मुरारी बापू और उनके समर्थक श्रोता दोनों सनातन धर्म में वामपन्थ की प्रविष्टि के लिए सूतक के पात्र हैं।

श्राद्ध में खाने-खिलाने वाले सावधान मौन रहें

🦀श्राद्ध में खाने-खिलाने वाले सावधान- जो मृतपितरों के निमित्त एकोद्दिष्ट, पार्वण आदि में ब्राह्मणभोजन करते-कराते हैं; वे सावधान रहें। मरे हुए माता-पिता आदि के श्राद्धनिमित्तक भोजन में पितर तभी तृप्त होते हैं, जब भोज्यपदार्थों के गुणों को कहे विना मौन होकर भोजन किया जाय। मौन भोजनपर्यन्त ही ब्राह्मणरूप पितर भोजन करते हैं। मौन भोजन के अभाव में भोजन का सूक्ष्म तत्त्व पितरों तक पहुँचता नहीं। व्यर्थ बकवास करते हुए भोजन करनेवाले ब्राह्मणों के सप्तधातुओं में श्राद्धीयान्न का सूक्ष्म-स्थूलांश टिक जाता है, परिणामत: अतृप्त पितर उन अमौनभोजी ब्राह्मणों को भी विविध प्रकार से व्यथित करते रहते हैं। खाने-खिलाने वाले इस पर ध्यान नहीं दे सकते तो श्राद्धनिमित्तक खाना-खिलाना बन्द कर दें, अन्यथा वह श्राद्धान्न ही दोनों के तेज को खा जाएगा। आजकल हमारे समाज में भी एक गन्दी परिपाटी चल गयी है कि माँ-बाप की मृततिथि में चतुर्वर्णेतर मित्र एवं स्टाफों को समान पंक्ति में बैठा कर नियमबद्ध ब्राह्मणों की उपेक्षा करना चाहते हैं! ऐसा संक्रमित भोजन दोनों के पतन का कारण होता है। हमारे समाज में भी ऐसे घिनौने कृत्यों का बढ़ना दु:खद है। सार्ववर्णिक श्राद्धीय सहभोजन में बुफेलो सिस्टम या जूते पहने ही लाल कुर्सी-टेबल पर श्राद्धपार्टी मनाना बहुत व्यथाकर है। बन्धो! आप किसी को खिलाना चाहते हो तो उसे खिलाने की योग्यता अपनाओ; कोई तुम्हारी श्राद्धपार्टी के भरोसे नहीं जी रहा! आश्चर्य तो तब बढ़ जाता है जब उस असंस्कृत माहौल में भी कोई कुछ नियम पालन करना चाहते हैं तो ये ब्रह्मासुरसमूह उनकी खिल्ली उड़ाते हैं! सावधान! तुम अमुक को खिलाने में सक्षम नहीं हो; तो ब्राह्मण के नाम पर उन्हें खिलाना-बुलाना एकदम बन्द करो। तुम्हारे यहाँ एक ज़ूम की पार्टी कर भ्रष्ट होना आवश्यक नहीं!.




👺बान्धवो! बहुरूपियों को बहुत बखारिए परन्तु सनातन को सुसंरक्षित करने में हमी लोग काम आएँगे। हम्हीं लोग नमक-रोटी खाकर भी अन्तिम साँस तक सनातन को समृद्ध करते रहेंगे। मोहमाया के ब़ाज़ार में अमिथ्या कुछ नहीं!...

तिथि अनुसार आहार-विहार

तिथि अनुसार आहार-विहार
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प्रतिपदा को कूष्माण्ड(कुम्हड़ा, पेठा) न खाये, क्योंकि यह धन का नाश करने वाला है।

द्वितीया को बृहती (छोटा गन या कटेहरी) खाना निषिद्ध है।

तृतीया को परवल खाना शत्रुओं की वृद्धि करने वाला है।

चतुर्थी को मूली खाने से धन का नाश होता है।

पंचमी को बेल खाने से कलंक लगता है।

षष्ठी को नीम की पत्ती, फल या दातुन मुँह में डालने से नीच योनियों की प्राप्ति होती है।

सप्तमी को ताड़ का फल खाने से रोग बढ़ता है था शरीर का नाश होता है।

अष्टमी को नारियल का फल खाने से बुद्धि का नाश होता है।

नवमी को लौकी खाना गोमांस के समान त्याज्य है।

एकादशी को शिम्बी(सेम), 

द्वादशी को पूतिका(पोई) अथवा 

त्रयोदशी को बैंगन खाने से पुत्र का नाश होता है।
(ब्रह्मवैवर्त पुराण, ब्रह्म खंडः 27.29-34)

अमावस्या, पूर्णिमा, संक्रान्ति, चतुर्दशी और अष्टमी तिथि, रविवार, श्राद्ध और व्रत के दिन स्त्री-सहवास तथा तिल का तेल खाना और लगाना निषिद्ध है।
(ब्रह्मवैवर्त पुराण, ब्रह्म खंडः 27.29-38)

रविवार के दिन मसूर की दाल, अदरक और लाल रंग का साग नहीं खाना चाहिए।(ब्रह्मवैवर्त पुराण, श्रीकृष्ण खंडः 75.90)

सूर्यास्त के बाद कोई भी तिलयुक्त पदार्थ नहीं खाना चाहिए। (मनु स्मृतिः 4.75)

लक्ष्मी की इच्छा रखने वाले को रात में दही और सत्तू नहीं खाना चाहिए। यह नरक की प्राप्ति कराने वाला है।
(महाभारतः अनु. 104.93)

दूध के साथ नमक, दही, लहसुन, मूली, गुड़, तिल, नींबू, केला, पपीता आदि सभी प्रकार के फल, आइसक्रीम, तुलसी व अदरक का सेवन नहीं करना चाहिए। यह विरूद्ध आहार है।

दूध पीने के 2 घंटे पहले व बाद के अंतराल तक भोजन न करें। 

बुखार में दूध पीना साँप के जहर के समान है।

काटकर देर तक रखे हुए फल तथा कच्चे फल जैसे कि आम, अमरूद, पपीता आदि न खायें। 

फल भोजन के पहले खायें। रात को फल नहीं खाने चाहिए।

एक बार पकाया हुआ भोजन दुबारा गर्म करके खाने से शरीर में गाँठें बनती हैं, जिससे टयूमर की बीमारी हो सकती है।

अभक्ष्य-भक्षण करने (न खाने योग्य खाने) पर उससे उत्पन्न पाप के विनाश के लिए पाँच दिन तक गोमूत्र, गोमय, दूध, दही तथा घी का आहार करो।
(वसिष्ठ स्मृतिः 370) प्रश्न नहीं स्वध्याय करें ।।।

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भोजनपात्र में कुछ अन्नशेष बचाना चाहिए


भोजनपात्र में कुछ अन्नशेष बचाना चाहिए या पात्रों को धो-पोंछकर पी-चाट जाना चाहिए?

 धर्मशास्त्रों के अनुसार भोजनपात्र में किञ्चित् अन्नशेष बचाना चाहिए; बर्तनों को धो-पोंछकर पी-चाट जाना निषिद्ध है। कात्यायनभोजनसूत्रम् में स्पष्ट लिखा है- "न सर्वभोजी स्यात्किञ्चिद्भोज्यं परित्यजेदन्यत्र घृतपायसदधिसक्तुपललमधुभ्य:" भोजनपात्रस्थ अन्न को पोंछ-पाछकर सर्वग्रास नहीं कर जाना चाहिए। घृत, पायस, दधि, सक्तु, पलल और मधु से अतिरिक्त भोज्यपदार्थ को किञ्चित् बचा लेना चाहिए। नारदजी ने भी कहा है- "सर्वं सशेषमश्नीयाद्घृतपायसवर्जितम्।" 

🌸धर्मशास्त्रनियन्त्रित गृहस्थों की परम्परा में #उच्छिष्टभोजी पितृगण भी हैं, जिनके लिए भोजनपात्र में बचे हुए उच्छिष्ट अन्न ही ग्राह्य होते हैं; तदर्थ चित्राहुति के रूप में- "मद्भुक्तोच्छिष्टशेषं ये भुञ्जन्ति पितरोsधमा:। तेषामन्नं मया दत्तमक्षय्यमुपतिष्ठतु।।" बदरीफलप्रमाण उच्छिष्टान्न ही देने का विधान है। देवल ने भी यही बात कही है- "भुक्तोच्छिष्टं समाघ्राय सर्वेभ्यो घृतवर्ज्जितम्। उच्छिष्टभागधेयेभ्य: सोदकं निर्वपेद्भुवि।।" पुन: भोजनपात्र में बचे शेषान्न अथवा चित्राहुति वाला अन्न लेकर कौओं को खिलाये। भोजनान्त में ही "श्वानौ द्वौ श्यावशवलौ वैवस्वतकुलोद्भवौ। ताभ्यामन्नं प्रदास्यामि स्यातामेतावहिंसकौ।।" से श्वानबलि देने का विधान है। 

🌸धर्मनियन्त्रित समुदार गृहस्थों को उत्तममध्यमाधम मृतपितृगणों की भी चिन्ता रहती है, अत: उच्छिष्टभोजी पितरों के भाग को भी स्वयं खा-पचा जाना सही नहीं है। धार्मिकों के द्वारा यथासाध्य शास्त्राज्ञा का पालन करना चाहिए; अन्यथा अतृप्त और बली पितृगण को "अतर्पिता: पितरो देहाद्रुधिरं पिबन्ति" से कौन रोक सकता है??

रामायण फर्जी शम्बूक असली

शंभुक का वध श्री राम में किया पर राम जी काल्पनिक है शम्भूक वास्तविक है ! वाल्मीकि हमारा दलित है पर उसकी रामायण को हम नहीं मानते ! कृष्ण काल्पनिक है महाभारत काल्पनिक है पर उस महाभारत का एकलव्य दलित था उसपे अत्याचार हुए यह सच है यह क्या फ्रॉड देश में चल रहा है ?

चलो शम्बूक असली हो या नकली, अगर नियम है कि आप घर के कपडों में आप्रेशन थियेटर, ISRO के वैज्ञानिक और वर्जित क्षेत्र में नहीं,जा सकते तो आज भी अगर आप घुसने की कोशिश करो गे तो धक्के मार कर बाहर निकाल दिये जाओ गे, अरेस्ट तो हों गे ही, गोली भी मारी जा सकती है चाहे आप अपनो योग्यता और पहचान का बखान भी करते जाओ।
रामयाण की घटना में शाम्बूक वर्जित हथियारों और साधनाओं का प्राप्त कर के स्वर्ग में अपने भौतिक शरीर के साथ जाना चाहता था जोवचि विधान के अनुसार वृजित था। राम के समझाने के बाद भी वह अपनी जिद पर ही अडा रहा तब राम ने ऐक आदर्श और अनुशासन प्रिय राजा के कर्तव्य का पालन किया और उस का सिर काट दिया। झूठी सच्ची घटना पर किसी को मिर्ची लगती रहै तो वह भी समन्दर में छलांग लगा कर डूब मरे।

समाज कई तरह के चित्त के लोगों से भरा हुआ है।

समाज कई तरह के चित्त के लोगों से भरा हुआ है।
उपनिषद्, रामायण, महाभारत से लेकर अनेकों दार्शनिकों ने एक दर्शन दिया वो यूरोप पहुंचकर Socrates द्वारा कुछ इस तरह कहा गया।

"Great minds discuss ideas; average minds discuss events; small minds discuss people."

अर्थात्
"निम्न कोटि का व्यक्ति व्यक्ति पर चर्चा करता है।"
"मध्यम कोटि का व्यक्ति घटनाओं/विचारों पर चर्चा करता है।" और "उत्तम कोटि का व्यक्ति विषय/विचारों पर चर्चा करता है।"

पर इसमें एक और तथ्य जोड़ने की आवश्यकता है और वो है कि विक्षिप्त व्यक्ति कुतर्क करता है, असंबद्ध बातें करता है, ऐसी बातें करता है जो किसी के द्वारा न कहीं गई और न सुनी गई। वो अपने मन में कुछ कहानियां बनाता और बस बकता है। वस्तुतः ये मानसिक रोग का एक गंभीर चरण है।

आज का समाज और लगभग हर परिवार ऐसे विक्षिप्त लोगों से भरा हुआ है, जिन्हें ये होश नहीं होता कि क्या बक रहे हैं, क्या सोच रहे हैं, क्या कर रहे हैं, क्या पढ़ रहे हैं उन्हें बस बकना होता है। बुद्धिमान लोग इनसे दूर हो जाते हैं क्योंकि इन्हें समझाया नहीं जा सकता, उनकी क्लेश को कुछ भी करके शांत नहीं किया जा सकता। इसका एक बड़ा लक्षण यह है कि ऐसे लोग अपने आसपास या परिजनों में से किसी न किसी को अपने विनाश, अपने पतन का जिम्मेदार जीवनभर मानते हैं और इस तरह वे जीवन में जो उन्नति कर सकते थे उसकी संभावनाओं को भी खत्म कर देते हैं।

15 वर्ष पहले मैंने विविध भारती के किसी कार्यक्रम में एक मनोचिकित्सक से सुना था कि अमेरिका के किसी मनोवैज्ञानिक ने कहा है कि अगले 30 वर्षों में हर घर में एक "पागल" होगा लेकिन मैं समझता हूं कि बदले हुए युग में उनका अनुमान समय से पहले सही सिद्ध हुआ है और आज सामान्यतः हर घर में एक से ज्यादा पागल हैं अर्थात गंभीर रूप से मानसिक रोगी हैं या मानसिक रोगी होने की ओर तीव्रता से बढ़ रहे हैं। इसका कारण हैं इंटरनेट का युग, अस्तव्यस्त दिनचर्या, धर्महीन चिंतन, ईर्ष्या द्वेष से भरा मन, दोहरा चरित्र और अध्यात्महीन लक्ष्य हैं।

कई बार अनुभव करता हूं कि समाज विक्षिप्त और मानसिक रोगियों से तीव्रता से भरता जा रहा है। स्वस्थ मानसिकता का व्यक्ति यदि आपके परिवार और मित्र मंडली में है तो इसे अपना सौभाग्य समझना चाहिए।

मैं लोगों को विशेषकर युवाओं को यही सुझाव दूंगा कि अपने मानसिक स्वास्थ्य को अच्छा रखते हुए अपने परिवेश अपने वातावरण को अच्छा बनाने का प्रयास करें अन्यथा आप भी उन्हीं की तरह मानसिक रोगी, विक्षिप्त होते जायेगे और आपका आने वाला परिवार भी एक नरकीय जीवन जीने के लिए विवश होगा। इसलिए कलुषित और विक्षिप्त लोगों से भरे हुए परिवार को छोड़ना भी पड़े तो छोड़ने में हिचकिचाना नहीं चाहिए क्योंकि जिन लोगों की हर दिन, हर घंटे, सुबह शाम, दिन रात क्लेश करने की मानसिकता बन चुकी हो वह आपको भी मानसिक बीमार कर देंगे, आपको भी अपना जैसा पागल कर देंगे। आप कितना भी उनका शुभ चाहना, शुभ की कामना करना पर आपका हर बार का प्रयास असफल ही होगा क्योंकि विक्षिप्त लोगों की सुनने और सोचने की क्षमता खत्म हो चुकी होती है। वे अपने निर्णय हर घंटे बदलते हैं, सुबह किए अपने किए वादे पर शाम तक नहीं टिकते, वे अपने शब्दों पर नहीं टिकते। इनका चित्त उसी तरह स्थित होता है जैसे कि समुद्र का पानी लहरों के कारण अस्थिर रहता है। इनके व्यवहार में तनिक स्थिरता नहीं होती। वे केवल वही बकते हैं, जो उनके मन मस्तिष्क में उन्होंने कोई कहानी बना रखी होती है। इन लोगों का चित्त पत्थर की तरह हो चुका होता है, जिस पर आप कितना भी प्रयास करें कोई बीज अंकुरित नहीं हो सकता।

हजारों वर्ष पूर्व महर्षि पतंजलि ने भी अपने योगदर्शन में इसी तरह चित्त की पांच अवस्थाओं का वर्णन किया है पर निश्चित ही महर्षि के काल में इतने विक्षिप्त लोग नहीं रहे होंगे अर्थात विक्षिप्तता की परिभाषा इतनी ज्यादा कलुषित नहीं रही होगी।

श्राद्ध कार्य में स्त्री का रजस्वला हो जाने पर क्या

पितृपक्ष पर विशेष भाग - ( 10 )
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श्राद्ध कार्य में स्त्री का रजस्वला हो जाने पर क्या करना चाहिए। 

कुछ श्राद्ध ऐसे हैं कि यदि कर्ता की पत्नी रजस्वला भी हो जाए और पाक / भोजन बनाने वाला कोई और हो, तो उसी दिन श्राद्ध हो सकते हैं और यदि भोजन बनाने वाला कोई नहीं हो तो आमान्न / कच्चा अन्न / सीधा दान करके आमान्नदानात्म उसी दिन श्राद्ध किया जा सकता हैं।

उन श्राद्धों के नाम हैं
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दर्श श्राद्ध
युगादि श्राद्ध
मन्वादि श्राद्ध
अष्टका_श्राद्ध
अन्वष्टका श्राद्ध
सकृन्महालय श्राद्ध
दौहित्र कर्तृक मातामह श्राद्ध

प्रमाण
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अथभार्यारजोदोषे - तत्रदर्शयुगादिमन्वाद्यष्टकान्वष्टकादिश्राद्धानि,
पाककर्त्रंतरसत्त्वेन्ने तद्दिने कार्याण्यन्यथामादिद्रव्येण,
कालादर्शोदर्शश्राद्धं_पंचमेहनीतिपक्षांतरमाह,
सकृन्महालयस्तु दर्शभार्यारजसि मुख्यकालातिक्रमभिया तत्रैवकार्यः,
एवमाश्विनशुक्लपंचम्यंतकालेप्यूहम्। (धर्मसिन्धौ)

यदि कोई महालय में पिता की मृत्यु तिथि में श्राद्ध न करके अष्टमी आदि शास्त्रों में बताए गए अन्य विकल्पों में श्राद्ध करता है, तब यदि पत्नी ऋतुमती हो जाती है तो उस दिन श्राद्ध नहीं करे। 4 दिन बाद जब भी कोई अमावस्या आदि शास्त्रोचित विकल्प हो उस दिन महालय श्राद्ध करें।

अष्टम्यादौसकृन्महालयो भार्यारजोदोषे न कार्य:,
कालान्तरसत्त्वादित्यादिमहालयप्रकरणोक्त मनुसंधेयम्। (धर्मसिन्धौ)

कुछ श्राद्ध ऐसे हैं, जिनके लिए शास्त्रों में विकल्प हैं...

( 1 ) : - प्रतिसांवत्सरिक श्राद्ध
( 2 ) : - मासिक श्राद्ध

प्रथम पक्ष👉 उपर्युक्त दोनों श्राद्धों को नियत तिथि पर ही करें चाहे पत्नी रजस्वला हो या न हो यह प्रथम पक्ष है। यही मुख्य-पक्ष है।

द्वितीय पक्ष👉 उपर्युक्त दोनों श्राद्धों को पत्नी के रजस्वला होने पर पाँचवें दिन में करें, यह दूसरा पक्ष भी है।

प्रत्याब्दिकं मासिकं च रजोदोषेपि तद्दिनएवकार्यमित्येक: पक्ष:,
पंचमेहनिकार्यमित्यपर: पक्षद्वयेपियंथसंमति: शिष्टाचारसमतिश्च। (धर्मसिन्धौ)

यदि किसी की दो पत्नियाँ हों...तो श्राद्ध नियत काल पर ही होगा, यह सर्व सम्मत मत है।

"भार्यान्तरसत्त्वे तद्दिन एवेति सर्वसंमतम्।"

#रजस्वला के दिन श्राद्ध किये जाने पर..

श्राद्धकाले रजस्वला दर्शनादिकं वर्ज्यं। (धर्मसिन्धौ)

अर्थ 👉 जिस दिन पत्नी रजस्वला हो और उस दिन यदि श्राद्ध करें तो श्राद्ध काल में रजस्वला को नहीं देखना चाहिए तथा रजस्वला के द्वारा भी श्राद्ध संभारादि का दर्शन नहीं होना चाहिए।

श्राद्धकल्पे च दैवे च तैर्थिके पर्वणीषु च ।
रजस्वला च या नारी श्वित्रिकापुत्रिका च या ।।
एताभिश्चक्षुषा दृष्टं हविर्नाश्नन्ति देवता:।
पितरश्च न तुष्यन्ति वर्षाण्यपि त्रयोदश ।। (महाभारत_अनु.127/12-14)

छोटा घर एवं रजस्वला की स्थिति पर 
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योग्यपाककर्त्रसंभवे_च
पंचमेहनीतिपक्षःश्रेयान्। (धर्मसिन्धौ)

अर्थ 👉 यदि किसी का घर इस प्रकार का नहीं हो, इतना बड़ा न हो कि श्राद्धकाल में रजस्वला को न दिखे अथवा श्राद्ध का भोजन बनाने वाला कोई दूसरा न हो, तो सभी प्रकार के श्राद्धों को पांचवे दिन (रजस्वला के शुद्ध होने पर) करना चाहिए अथवा आमान्नदानात्मक (कच्चा अन्न/सीधा) श्राद्ध करना चाहिए।

अपत्नीकः प्रवासी च यस्य भार्या रजस्वला।
आमश्राद्धं दीवारों कार्यं शूद्रेण तु सदैव हि।। (श्राद्धविवेक)

पुत्र विहीन विधवा के रजस्वला के होने पर
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भर्तुराब्दिकादिकं पंचमेहनि_कुर्यान्नत्वन्यद्वातरातद्दिने। (धर्मसिन्धौ)

अर्थ 👉 अपुत्रा विधवा स्त्री को रजस्वलावस्था में अपने पति का श्राद्ध पांचवें दिन में करना चाहिए।

रजस्वला अवस्था में 5 दिन से पहले किसी ब्राह्मण आदि से भी नहीं कराना चाहिए।

श्राद्ध संबंधित नियमपालन पूर्वक विधिवत् श्राद्ध अवश्य करना चाहिए ,,,

क्रमशः...
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श्राद्ध के दान का अधिकारी कौन

✅पितृ पक्ष -- श्राद्ध के दान का अधिकारी कौन ? 
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मनुस्मृति में श्राद्ध के कुछ नियम बतायें गयें है जिसे हमें समझना चाहिये ! आज इसी लेख में हम इसी विषय पर चिंतन मनन करेंगे ! बहुत ही गंभीर नियम मनुस्मृति मे बतायें गयें है ! किसी की घर में मृत्यु हो गयी तो हम बारहव या तेरहवें दिन भोज करते हैं जिसे शास्त्रों के अनुसार ब्रह्म भोज कहाँ गया है ! ब्रह्म भोज अर्थात वह वो भोज जो विषेश रुप से ब्राह्मणों के लिये हैं लेकिन उसका अधिकारी भी हर ब्राह्मण नहीं होता ! मुख्य विषय है श्राद्ध में जो दान होता है उसका अधिकारी कौन होता है ! दान भी दो प्रकार के होते हैं ! एक होता है हव्य और एक होता है कव्य ! हव्य वह होता है जो की यज्ञ आदि में, पुजा पाठ, हवन आदि में जो दान किया जाता है , देवताओं का जो दान हैं वह हव्य है और पितरों का जो दान हैं वह कव्य हैं ! तो पितरों के नाम पर या श्राद्ध के नाम पर जो दान किया जाता हैं उसे हर कोई ग्रहण नहीं कर सकता ! पितृ पक्ष या किसी की मृत्यु घर में हो जायें तो श्राद्ध के दान का अधिकारी कौन है ? इस विषय पर महाराज मनु ने मनुस्मृति के तीसरे अध्याय में चर्चा की हैं ! तो महाराज मनु कहते हैं कि पितृ कर्म श्राद्ध या प्रेत कर्म के रूप में भी इसे जाना जाता हैं ! अमावस्या के दिन पितृ श्राद्ध करने वाला पुरुष नित्य किये जाने वाले लौकिक श्राद्ध के फल को भी प्राप्त कर लेता है ! इसलिये अमावस्या के दिन श्राद्ध जरूर करना चाहिये अपने पितरों का ! 128-129 वे श्लोक में महाराज मनु कहते हैं कि दाताओं को चाहिये केवल श्रोत्रिय अर्थात ज्ञानी ( जो ब्रह्म ज्ञानी , आत्म ज्ञानी , ज्ञाननिष्ठ ) ब्रहामण हो उसी को हव्य कव्य समर्पित करें ! जीतने अधिक योग्य विद्धान को यह दिया जायेगा उतना ही अधिक फल लाभ होगा ! देव यज्ञ या पित्र यज्ञ में एक ही विद्वान ब्रहामण की पुजा करने से जिस बड़े भारी पुण्य का लाभ होता है , अनेक मुर्ख ब्राहमणों की पुजा करने से वह कभी नहीं मिलता है ! वेद विद्या में प्रविण ब्राह्मण की पहले से ही पुछताछ और परिक्षा कर लेनी चाहिए ! संतुष्ट होने पर ही उसे निमंत्रित करना चाहिये ! ज्ञानी ब्राह्मण ही देव बली और पित्र बली ग्रहण करने का सच्चा अधिकारी हैं ! ऐसे ब्राह्मण ही एक प्रकार का अथिति भी हैं ! वेद ज्ञान से रहित लाखों ब्राह्मण के भोजन व दान आदि के संतुष्ट होने पर भी श्राद्ध सफल नहीं माना जाता हैं ! इस बात का विशेष ध्यान रखना होगा ! जबकि इसके विपरीत एक ही ब्रह्म ज्ञानी, तपस्वी ब्राह्मण को आपने संतुष्ट कर दिया , उस भोजन करा दिया, उसे दान दे दिया , तो आपका श्राद्ध पुर्ण सफल हो जाता हैं ! इसके विपरीत आप लाखों लोगों को भी भोजन खिला दो पर आपको उसका फल मिलने वाला नहीं है ! यहाँ पर उसका फल न तो खाने वालों को और ना ही खिलाने वाले को मिलता है ! यहाँ पर दोनों ही पाप के भागीदार बन जाते हैं ! क्योंकि यह श्राद्ध का विषय है , सामान्य विषय नहीं है ! जिस प्रकार रक्त से सने हाथ रक्त से नहीं धोये जा सकते , उनकी शुद्धि जल से ही होयीं जा सकतीं हैं उसी प्रकार ब्रह्म ज्ञान रहित ब्रहामण को कव्य या हव्य देने से कोई लाभ नहीं होता ! वेद ज्ञान से रहित ब्रह्मामण को श्राद्ध में हव्य कव्य आदि ग्रहण ही नहीं करना चाहिये ! वेद तत्व का ज्ञान याने सिर्फ वेदों का ज्ञान नहीं है , वेदों का पठन नहीं है ! इसलिये तपस्वी ब्रहामण लिखा गया है मतलब जिसने अपने तप से , साधना से वेद के ज्ञान को प्रकट किया है अपने हदय में ! क्योंकि वेदों का ज्ञान हदय में प्रगट होता है ! तो वेद कैसे आये तो वेद अपुरशय है क्योंकि वेदों को किसी परमात्मा ने भी नहीं लिखा है बल्कि ॠषियों के हदय में वेद प्रगट हुये हैं और उन ॠषियों ने ही वेदों की रचना की , तो उन्होंने भी अपने आप को रचियेता नहीं माना ! तो वेद ज्ञान प्रगट होता है ! तो जो वेद तत्व का ज्ञान रखते हैं वहीं ब्रहामण श्राद्ध में हव्य कव्य ग्रहण करने योग्य है और जो वेद तत्व ज्ञान से रहित ब्रहामण हैं उन्हें हव्य कव्य आदि ग्रहण ही नहीं करना चाहिए ! ये विचार उन्हें स्वत: से करना चाहिये ! वस्तुतः ऐसा व्यक्ति श्राद्ध में जितना ग्रास खाता है मरने पर उसे शुल और लोहे के उतनें ही गोले खाने पड़ते हैं ! उसे ऐसा दोष लगता हैं क्योंकि ऐसा भोजन वास्तव में जिस कारण से घर में किसी की मृत्यु हुई है तो उस कर्म को घटाने के लिये यह दान किया जाता हैं !इसलिए श्राद्ध का जो दान हैं उसे पचाना आसान नहीं होता ! इसलिये बहुत विचार करके श्राद्ध का भोज ग्रहण न किया करें यद्यपि वहाँ खुद दान देकर आ जायें ! लेकिन जब आप वहाँ से दान ग्रहण करते हैं और आपको अपनें कर्मो को जलाने की क्षमता नहीं है ! भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं कि हे अर्जुन उसे पंडित जानों जो अपने कर्मो को ज्ञान अग्नि में जला सकता हैं ! कर्मो को भस्म कर सकता हैं ! वैसा ही योगी, तपस्वी, ब्रहामण ही श्राद्ध का दान ग्रहण करने योग्य है! इस संसार में कुछ ब्रहामण ऐसे होते हैं जिन्हें तत्व ज्ञान संपन्न कहाँ जा सकता है , कुछ दुसरे तपोनिष्ठ होते हैं , कुछ तप के साथ स्वाध्याय में निरत होने वाले होते हैं और यज्ञ या आदि में निरत कर्म कांड करने वाले होते हैं ! इनमें तत्व ज्ञान से संपन्न ही ब्रहामण श्रैष्ठ हैं ! श्राद्ध में तो केवल तत्व ज्ञान से संपन्न ब्रहामण को ही भोजन कराना चाहिये और उसे ही केवल दान देना चाहिए ! सभी ब्रहामण इसके योग्य नहीं है क्योंकि वैसा दान उनके ही पतन का कारण बनेगा , उनके ही कष्टों का कारण बनेगा , इसलिये दान पर निर्भर जीवन नहीं जीना चाहिये ! यज्ञ, पुजा, हवन लोग करते हैं ! कर्म कांड के अंतर्गत पांच प्रकार के कर्म बतायें गयें है नित्य, निमित्त, काम्य , निषिद्ध और प्राश्चित ! इसमें जो काम्य कर्म और निमित्त कर्म के अंतर्गत जो यज्ञ पुजा होती हैं उसका दान तो ग्रहण किया जा सकता हैं ! इसलिये यहाँ पर लिखा गया है कि यज्ञों में चारों ज्ञाननिष्ठा, तपोनिष्ठ, स्वाध्याय प्रायण कर्मनिष्ठ! ये चारों के दान ग्रहण कर सकते हैं लेकिन श्राद्ध में ऐसा नहीं है ! श्राद्ध में तत्व ज्ञान से संपन्न ब्रहामण को ही दान ग्रहण करना चाहिये और तत्व ज्ञान से संपन्न हैं वह प्रकृति के रहस्य जानता है ! वह खुद ही दान लेने के लिए प्रेरित नहीं होगा जब तक उसे लगेगा कि इसमें इस व्यक्ति का कल्याण हैं और इस श्राद्ध के अन्न को या दान को हजम में ही कर सकता हूँ ! जो तत्व ज्ञान से संपन्न है वो स्थूल जगत में अनासक्त होगा और स्थूल आसक्ति किसी भी रुप में रह जायें तो मुक्ति संभव नहीं है , मोक्ष संभव नहीं है ! तो जो तत्व ज्ञान से संपन्न ब्रहामण है वो वैसे ही दान के ऊपर जीवन जीने से बचता रहेग

डुप्लिकेट पैराग्राफ़ों को ढूंढना मैक्रो

डुप्लिकेट पैराग्राफ़ों को ढूंढना मैक्रो की सहायता से काफी आसानी से किया जा सकता है, जैसे:


Sub DemoA()
Application.ScreenUpdating = False
Options.DefaultHighlightColorIndex = wdYellow
Dim RngA As Range, RngB As Range, i As Long, j As Long, strFnd As String
With ActiveDocument
  For i = 2 To .Paragraphs.Count - 1
    Set RngA = .Paragraphs(i - 1).Range
    Set RngB = .Range(.Paragraphs(i).Range.Start, .Range.End)
    With RngA
      strFnd = Trim(Split(.Text, vbCr)(0))
      If Len(strFnd) > 0 Then
        If .HighlightColorIndex <> wdYellow Then
          With RngB.Find
            .ClearFormatting
            .Replacement.ClearFormatting
            .Text = strFnd
            .Replacement.Text = "^&"
            .Replacement.Highlight = True
            .Format = True
            .Forward = True
            .Wrap = wdFindStop
            .MatchWildcards = True
            .Execute Replace:=wdReplaceAll
            If .Found = True Then RngA.HighlightColorIndex = wdBrightGreen
          End With
        End If
      End If
    End With
    If i Mod 100 = 0 Then DoEvents
  Next
End With
Application.ScreenUpdating = True
End Sub


For PC macro installation & usage instructions, see: http://www.gmayor.com/installing_macro.htm


300 पेज प्रोसेस करने के लिए बहुत ज़्यादा हैं, इसलिए तुरंत नतीजों की उम्मीद न करें। जहाँ डुप्लिकेट मिलेंगे, वहाँ सबसे पहले दिखने वाले पेज को चमकीले हरे रंग से हाइलाइट किया जाएगा; और डुप्लिकेट पेज को पीले रंग से हाइलाइट किया जाएगा।

मैक्रो चलाने के बाद, चमकीले हरे रंग से हाइलाइट किए गए किसी भी पैराग्राफ़ को चुनकर और रीडिंग हाइलाइट सेटिंग के साथ 'ढूँढें' का इस्तेमाल करके, आप मूल और उसके डुप्लिकेट, दोनों को संपादन के लिए देख पाएँगे। ऐसा करने के बाद, बस वर्ड के हाइलाइटिंग टूल का इस्तेमाल करके बाकी सभी हाइलाइट्स हटा दें। 

वाक्य ज़्यादा समस्याग्रस्त होते हैं, क्योंकि VBA को व्याकरणिक वाक्यों का कोई अंदाज़ा नहीं होता। उदाहरण के लिए, इस उदाहरण पर विचार करें:श्री स्मिथ ने डॉ. जॉन्स ग्रोसरी स्टोर पर $1,234.56 खर्च करके ये चीज़ें खरीदीं: 10.25 किलो आलू; 10 किलो एवोकाडो; और 15.1 किलो मिसेज़ ग्रीन्स माउंट प्लेज़ेंट मैकाडामिया नट्स।आपके और मेरे लिए, यह एक वाक्य के बराबर होगा; VBA के लिए यह 5 वाक्यों के बराबर होगा। अगर आप इसके साथ रहने को तैयार हैं, तो आप निम्न मैक्रो चला सकते हैं। शुरुआती और डुप्लिकेट हाइलाइट क्रमशः गुलाबी और चैती रंग के हैं । ज़्यादा लंबे इंतज़ार के लिए तैयार रहें।


 


Sub DemoB()
Application.ScreenUpdating = False
Options.DefaultHighlightColorIndex = wdTeal
Dim RngA As Range, RngB As Range, i As Long, j As Long, strFnd As String
With ActiveDocument
  For i = 2 To .Sentences.Count - 1
    Set RngA = .Sentences(i - 1)
    Set RngB = .Range(.Sentences(i).Start, .Range.End)
    With RngA
      strFnd = Trim(Split(.Text, vbCr)(0))
      If Len(strFnd) > 0 Then
        If .HighlightColorIndex <> wdTeal Then
          With RngB.Find
            .ClearFormatting
            .Replacement.ClearFormatting
            .Text = strFnd
            .Replacement.Text = "^&"
            .Replacement.Highlight = True
            .Format = True
            .Forward = True
            .Wrap = wdFindStop
            .MatchWildcards = True
            .Execute Replace:=wdReplaceAll
            If .Found = True Then RngA.HighlightColorIndex = wdPink
          End With
        End If
      End If
    End With
    If i Mod 100 = 0 Then DoEvents
  Next
End With
Application.ScreenUpdating = True
End Sub

वामन जयन्ती

आज वामन जयन्ती है। ओनम। वामन होकर भी आप बड़ी से बड़ी उपलब्धि हासिल कर सकते हो। तीनों लोक आपसे बाहर नहीं है। अक्सर अपनी शार्ट हाइट को लेकर लोग ग्रंथियों का शिकार रहते हैं। वामन अवतार की धर्मनिरपेक्ष व्याख्या, यदि बहुत आवश्यक हुआ तो, यों ही की जा सकती थी कि महाबली भी वामन जब अपनी पर आ जाये तो उसके सामने नहीं टिक सकते। आज भी अंग्रेजी में achieving great feats में शायद उन्हीं तीन पदों की स्मृति बची हो किसी क्रास-कल्चरल संवाद के कारण। यूरी गगारिन की हाइट कितनी कम थी लेकिन वह अंतरिक्ष का पहला यात्री था। वामन का एक पद तो अंतरिक्ष भी तय कर आया था। बीथोफेन की संगीत लहरियों पर उसके वामन होने का क्या असर पड़ा। आज हम कम हाइट की एक महिला आई ए एस को सफलतापूर्वक काम करते हुए देखते हैं। कीमती और अच्छा माल छोटे पैकेट में ही बंद रहता है। तो वामन अवतार की एक सेकुलर व्याख्या शूमाखर की तरह हो सकती थी कि स्मॉल इज ब्यूटीफुल। कवि की तरह हो सकती थी कि रहिमन देख बड़ेन को लघु न दीजिये डारि। कि एक छोटा सा वायरस, एक छोटा सा बैक्टीरिया, एक छोटा सा एटम क्या कहर बरपा सकता है - हम उन सारे अनुभवों से गुजर चुके हैं। आज के दिन हम विभिन्न ऐसे कार्यक्रम कर, जिनमें अपने अपने अपने क्षेत्र में कम हाइट के बावजूद विराट उपलब्धि हासिल करने वालों का सम्मान होता, मना सकते थे। बचपन में तो हम सभी वामन होते हैं तो यह दिन child prodigies के सम्मान का दिन भी हो सकता था। वामन तो बटुक ही थे। एक इनफीरियोरिटी की, अहसासे कमतरी की ग्रंथि जो इस कारण रहती है कि हम वामन हैं, उससे मुक्त होने का दिन है आज। यह अकारण नहीं है कि वामन स्तुति में स्पष्टत: ‘खर्वग्रन्थिविमुक्तसन्धिविलसद्वक्षःस्फुरत्कौस्तुभं’ की बात की गई है। खर्व ग्रंथि - बौने होने की ग्रंथि से विमुक्त होने का दिन। 

हमारी सभ्यता में पिग्मी असभ्य होने की तरह देखे जाते हैं। आज जब हम वालमार्ट जो अकेले 159 देशों की अर्थव्यवस्था से बड़ा है, Big Oil, Big Pharma, Big Tech, Big Tobacco के दौर से गुजर रहे हैं तब वामन अवतार की उत्सवी स्मृति हमें हमारे लघु उद्योगों, हमारे हथकरघा मज़दूरों, हमारे छोटे कर्मचारियों के लिए कितनी प्रेरणास्पद हो सकती थी। 

मेरी दृष्टि में यही धर्मनिरपेक्षीकरण है। पर वाम दृष्टि में धर्मनिरपेक्षीकरण एक ऐसी चीज है जिसमें वामन अवतार को एक उत्तरी भारत की तरह और महाबलि को दक्षिण भारत की तरह पेश किया जाए और भारत में क्षेत्रीय अहं को प्रोत्साहित किया जाये। जबकि वामन स्वयं दक्षिण भारतीय ही प्रतीत होते हैं क्योंकि उनका जन्म श्रावण द्वादशी को माना जाता है जो मलयालम कैलेंडर का दिन है। उत्तर भारत का सावन तो कब का गुजर चुका। 

आज के केरल में ओनम को सेकुलर बनाने के चक्कर में उसे उसकी पौराणिकता से विच्युत ही नहीं किया जा रहा, विकृत भी किया जा रहा है। एक क्रिश्चयन केरली महोदया हैं जो कह रही हैं : 

“Onam is not a Hindu festival. Onam does not glorify a Hindu god. Onam is celebrated in memory of the Asura Dravidian king, the one who was banished by Vamana out of jealousy. Apparently, they couldn’t accept the fact that a Dravidian Asura was a better king than the Aryan Devas!”

महाबली को द्रविड़ राजा बताना भी उसी तर्ज पर है जिस पर रावण को द्रविड़ बताया गया। वही पेरियारवादी स्ट्रेटेजी। यहाँ वामन वैसे ही आर्य देव हैं जैसे राम सबसे झूठी रामायण में बताये गये। सारे असुर इस साज़िश में द्रविड़ हैं। याद कीजिये इसी तर्ज पर महिषासुर को द्रविड़ बताया गया और दुर्गा को आर्य। यानी यहां यह ग़लतफ़हमी भी है कि जो तथाकथित द्रविड़ थे वे हिन्दू नहीं थे। रावण भी कथित रूप से शिवभक्त था, जैसे बलि विष्णु भक्त। आपके रिलीजन या मज़हब में कोई द्रविड़ कभी न था। 

उसी केरल के एक दूसरे महोदय हैं जो कह रहे हैं कि :
 
“Happy Onam! We celebrate Mahabali who did not discriminate by caste or creed, not Vamana who cheated him.” 

ये सज्जन भी ईसाई हैं। ये लोग हिन्दुत्व की व्याख्या करेंगे? ओनम् शब्द संस्कृत ‘ श्रोणम्’  या ‘श्रावण’ से बना है, इसकी पुष्टि स्वयं दक्षिण भारतीय स्तोत्र करते हैं।15 वीं शती के तमिलनाडु के कवि उद्दान शास्त्रिन यह बताते हैं। भागवत पुराण वामन अवतार का जन्म श्रावण द्वादशी को बताता है। तमिल और मलयालम परंपरा ओनम को वामन अवतार का जन्म मानती आईं हैं।590-599 के बीच की मदुरैक कांची कविता ओनम को वामन अवतरण से सम्बद्ध करती है। दसवीं शताब्दी के दक्षिणी साहित्य मसलन दिव्य प्रबंधम् में ओनम को भगवान वामन के अवतरण का दिन कहा गया। उसमें बताया गया कि कैसे आज के दिन विष्णु को चावल और फलों का भोग चढ़ाया जाता है। यह भी संदर्भ मिलता है कि आज के दिन महाबली वामन का पद चूमने के लिए सुतल से बाहर निकल कर पृथ्वी पर आते हैं और थ्रिक्कारा मंदिर में वामन का जन्म मनाने पहुंचते हैं। इस मंदिर का नाम ही बताता है कि यह प्रकरण का अर्थ क्या है। इसका मतलब होता है कि पवित्र पग का स्थान। यह कोची में है और यह वामन मंदिर है। अभी भी यहाँ वामन मूर्ति एक जुलूस की शक्ल में ले जाई जाती है।

यह भी मान लें कि ये सब हिन्दू स्रोत हैं तो हम 17 वीं शती के आंग्ल एद्नोग्राफर फ्रांसिस डे की पुस्तक को ही ले लें तो वे बताते हैं कि ओनम का दिन विष्णु के पृथ्वी पर आने के रूप में मलाबार में मनाया जाता है। हम विलियम लोगन की पुस्तक मलाबार मैनुअल की साक्षी ले लेते हैं जो मलाबार में 19 वीं सदी में कलेक्टर थे। वे इस पुस्तक में बताते हैं कि इस दिन वामन अवतार का जन्मदिन मनाया जाता है और विष्णु आज भी अपने भक्त बली को मिलने इस दिन आते हैं। 

आज के दिन थ्रिक्क्रारा अप्पन के रूप में विष्णु पूजा की जाती है। श्रीमद्भागवत के अनुसार राजा बलि ने उनके साथ का आशीर्वाद माँगा था। सो विष्णु सुतल में वामन के द्वारपाल बन जाते हैं क्योंकि बलि की दानशीलता से प्रसन्न होकर उन्होंने यह वर दिया था कि वे इस रूप में उसकी सेवा करेंगे। उन्होंने सुतल को बीमारियों, भय और घृणा से मुक्त करने का वर दिया था।

लेकिन घृणा से हमारे वामपंथी कैसे मुक्त हो सकते हैं जबकि उनकी दालरोटी ही द्वन्द्व के सिद्धांत पर चलती है। राजा बलि तो वरदान के पूर्व और पश्चात् वामन के भक्त रहे और किसी प्राचीन साहित्य में चाहे वह उत्तर भारत का हो या दक्षिण का, कहीं भी उन दोनों के बीच द्वन्द्व का नाम नहीं आया। सो इसमें आर्य और द्रविड़ उतर आये। आर्य गोरे वामन काले। जबकि मानकोट की एक सत्रहवीं शती की पेंटिंग वामन को काला और राजा बलि को गोरा बताती है। बलि यहाँ चोटी और यज्ञोपवीत धारण किये हुए ब्राह्मण के रूप में बताये गये हैं क्योंकि वे ऋषि कश्यप के वंशज हैं। गरुड़ पुराण यह बताता है कि भगवान वामन की पूजा  
छाता और पादुका अर्पित कर की जानी चाहिए तो वह परंपरा केरल में आज भी यथावत है।

पर वामपंथियों को ओनम का सर पैर नहीं पता तो छत्र-पादुका क्या पता होंगे। 

वह समावेशन नहीं है जब आप ओनम की रांगोली में क्रॉस बनाते हुए वास्तव में विभाजनकारी व्याख्याएँ परोसते रहते हो। तब वह inclusivity नहीं, camouflage करना है। तमाम कोशिशें कर लें पर राजा बलि ईसाई नहीं था। तमाम कोशिशें कर लें पर राजा बलि मुस्लिम नहीं था। द फैक्ट रिमेंस कि वह विष्णु भक्त था और आज भी वह यदि पृथ्वी पर आता है तो विष्णु को ही अपनी श्रद्धा अर्पित करने आता है। उसके सुतल को स्वर्ग से भी भव्यतर होने का वामन-आशीष मिला है। आज आपको ओनम के जरिये क्रिश्चियनिटी में स्थानीय आबादी का inculturation करने की बड़ी उत्सुकता है पर 1604 में केरल के चर्च फादर्स ईसाइयों को ओनम गतिविधियों में शामिल होने से मना करते थे।

इन्हें संव्यवहार की वह सौंदर्यशास्त्रीय गतिकी पता ही नहीं जिसमें विष्णु और बलि का नित्य साहचर्य साक्षात्कृत होता है।

तब उत्तर भारत को पृथ्वी और दक्षिण भारत  को पाताल से समीकृत करने की औंधी खोपड़ी को ही वाम कहा जा सकता है।

उसे harvest festival मात्र के रूप में बताना धर्मनिरपेक्षता नहीं है, वह सिर्फ उन लोगों के लिए भूमिका बनाना है जिनका लक्ष्य harvesting of souls है। अन्यथा हार्वेस्टिंग किसी consumer state में कैसे होगी? अलबत्ता कैश क्रॉप की हार्वेस्टिंग से आप अवश्य संतोष कर सकते हैं। केरल में 90% कृषि क्षेत्र में तो नकद फसल होती है। हार्वेस्टिंग करेंगे Food deficit state बनकर! खेतों में काम करने को मजदूर उत्तरपूर्वी राज्यों से बुलायेंगे और हार्वेस्ट फेस्टिवल मनायेंगे!!


धरा की रक्षा एवं कल्याण के लिए सदा तत्पर रहते हैं भगवान वामन
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एक अमेरिकी मूर्खाधिराज है नवारो। उसने हाल में ब्राह्मणों को लेकर एक मूर्खतापूर्ण टिप्पणी की है। अब उसके बारे में आखिर क्या ही कहा जाए?

ब्राह्मण परिवार में भगवान के एक अवतार का जन्म हुआ। इन्हें वामन अवतार के नाम से जानते हैं। वामन भगवान का कद छोटा था। यह एक संकेत है कि ब्राह्मण को अपना अहंकार सीमित रखना चाहिए। किंतु जब बात इस धरा को बचाने पर आ जाए तो उसे त्रिविक्रम स्वरूप अपनाना चाहिए। त्रिविक्रम के शास्त्रों में तमाम अर्थ हैं। पर एक सरल सा अर्थ शायद आपको पसंद आये कि संकट आने पर तीन गुना प्रयास, प्रयत्न और पुरूषार्थ करने चाहिए। इस बात को इस उदाहरण से समझ सकते हैं कि यदि आपके घर में आ लग जाए तो आप जैसे भी हों, अपने परिजनों, अपने सामान तथा स्वयं अपने को बचाने का एकसाथ प्रयास करेंगे, साथ ही आपका यह भी प्रयत्न रहेगा कि आग को कैसे नियंत्रित किया जाए। 

शास्त्रों में एक बड़ी मजेदार कथा आती है। बाल कृष्ण जब पूतना का वध करते हैं और वह जब महाध्वनि करते हुए अपने प्राण त्यागती है तो यशोदा मैया और नंद बाबा सहित पूरा नंदगांव उस स्थान पर दौड़ा आता है। यशोदा माता अपने लाल की यह दशा देखकर बहुत भयभीत हो उठती हैं और वे गाय की पूंछ से अपने लाला की नजर उतारती हैं, झाड़ा करती हैं। नंदबाबा (नन्दगोप) अपने बालक की रक्षा के लिए भगवान विष्णु का स्मरण करते हैं। यह स्मरण ठीक किसी कवच की तरह है। इसमें एक बड़े पते की बात आती है:-

वामनो रक्षतु सदा भवन्तं य: क्षणादभूत्।
त्रिविक्रम: क्रमाक्रान्तत्रैलोक्य: स्फुरदायुध:।।
(जिन्होंने क्षण मात्र में सशस्त्र त्रिविक्रमरूप धारण करके अपने तीन पदों से त्रिलोकी को नाप लिया था, वे वामन भगवान तेरी सर्वदा रक्षा करें।–विष्णु पुराण)

अत: वामन भगवान इस त्रिलोक की रक्षा के लिए सदैव तत्पर रहते हैं और उनका स्मरण करने मात्र से वह अपना त्रिविक्रम स्वरूप धारण कर क्षण मात्र में आ जाते हैं। 

इस पृथ्वी के कल्याण और रक्षा के लिए जो कोई भी शांति के साथ अपने प्रयास कर रहा है, वह भगवान वामन का अंश है। वही ब्राह्मण कहलाने का अधिकारी है।

वामन जयंती की राम राम

छुआछूत


कोरोना_वायरस_से_भयभीत मूषक की तरह विश्व ने, इसके प्रसार और इससे बचने हेतु, छुआछूत फैलाने और अपनाने को एक मात्र रास्ता बताया है।

मैंने प्रमाणों के साथ इस अफवाह का खंडन किया है कि छुआछूत का हिन्दू धर्म से कोई सम्बन्ध है। 

हिन्दू धर्म के दस अंग हैं जिन्हें धारण करना ही हिंदुत्व है:
धृति क्षमा दमो अस्तेयं शौच इन्द्रिय निग्रह।
धी विद्या सत्यं अक्रोधो दशकम् धर्म लक्षणम्।
- मनुस्मृति 6.91 

याज्ञवल्क्य ने भी धर्म की यही परिभाषा दिया है।

#शौच अर्थात सैनिटेशन और हाइजीन धर्म का लक्षण है। 

इसी की बात WHO भी कर रहा है। 
भारतीय सरकार भी यही काम करने की राष्ट्रीय योजना बना रही है। 

भारत को लूटने वाले दस्यु ईसाई उस समय भारत के शासक भी थे, जब करोड़ो भारतीय, उनके निरंतर 200 वर्षो के लूट के कारण, 1850 के बाद ऐसी स्थिति में आ गए कि उनको दो जून की रोटी भी मिलना मुश्किल हो गया। भारत को सभ्य बनाने आने का दावा करने वाले दस्युवों ने नमक तक पर इतना टैक्स लगा रखा था कि आम आदमी के लिए नून रोटी मिलना मुश्किल था। गांधी को राष्ट्रीय आंदोलन करना पड़ा। 

ऐसी परिस्थितियों में संक्रामक रोगों के कारण 1850 से 1900 के बीच 3 से 4 करोड़ भारतीयों की भुखमरी और संक्रामक रोगों से मृत्यु हुयी।
 
अकेले 1918 में इन्फ़्लुएन्ज़ा से 12.5 करोड़ लोग प्रभावित हुए, जिनमे से 1.25 करोड़ लोगों की मौत हो गयी। - विल दुरान्त The Case For India. 

इन संक्रामक रोगों से निबटने की किसकी जिम्मेदारी थी? सरकार की या समाज की? 
सरकार तो हिंदुओं को मारने में लगी थी - बीमारी से गोला बम बारूद से। 

"जलियांवाला बाग में दस हजार निहत्थे हिन्दुओ पर गोलीबारी बारे करके 3,600 लोगो को घायल करने और 1200 लोगों की हत्या करने वाले जेनरल डायर को हाउस लॉर्ड्स ने दोषी पाया, और हाउस ऑफ कॉमन्स ने दोषमुक्त पाया और उसको पेंशन देकर कार्यमुक्त किया। इस पुरस्कार को अपर्याप्त मानते हुए फ़ौजिवादियो ने चंदा एकत्रित करके उसे 150,000 ( डेढ़ लाख) डॉलर के साथ एक रत्नजड़ित तलवार भेंट किया"।
- विल दुरान्त The Case For India. P. 135-136

ये था चरित्र उन लोगों का जिनके ऊपर अपनी जनता को संक्रामक रोगों और भुखमरी से बाहर निकालने का उत्तरदायित्व था। 

समाज ने इन संकामक रोगों से लड़ने हेतु शुचिता ( शौच) की प्रथा अपनाया, जिसे #Untochability का नाम देकर हिन्दू धर्म के अंधविश्वास से जोड़ा गया। 

उनकी सहायता किया श्री भीम राव अम्बेडकर जी ने #लोथियन_समिति में अपनी रिपोर्ट देकर, जो सर्वदा असत्य और अफवाह पर आधारित थी। मैं चुनौती देता हूँ, समस्त वामियों और दलित चिंतको को इस रिपोर्ट के संदर्भ में शास्त्रार्थ करने हेतु।

आज इतिहास ने भारत ही नही, विश्व को उसी मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया है, जब वह अंतराष्ट्रीय स्तर पर छुआछूत की नीति को एक राष्टीय और अंतरराष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति की तरह अपनाने को बाध्य है। 

WHO ने इस कार्य के लिए विभिन्न देशों को 19 मिलियन अमेरिकी डॉलर देने की घोषणा की है। 

बहुत से शब्द नग्रेजी में लिखे गए है इस प्लान में -
Quarantine
Containment.
Social distancing - key intervention.
Cluster containment.
Buffer zone - 5 किलोमीटर से लेकर जिले के चारो ओर अन्य जिलों तक। 

इन सबका हिंदी और अंग्रेजी में अर्थ निकालिए तो आपको यह रहस्य एकदम दर्पण की तरह स्पष्ट हो जाएगा।

भारत ही नहीं, विश्व के बुद्द्धि खटमल, तथ्यों के आधार पर भारत के बारे में अपनी राय नहीं बनाते। वे अपनी राय विलियम जोंस, मैक्समूलर, HH Risley जैसे झोलाछाप संस्कृत विद्वानों के द्वारा लिखे गए फिक्शन के आधार पर राय बनाते हैं। रोमिला थापर और अमेरिका तथा यूरोप के विश्वविद्यालयों में साउथ एशियाई विभाग के बुद्द्धि खटमल उन्ही झोलाछाप संस्कृतज्ञों के अफवाहों को आगे बढ़ा रहे हैं। 

©त्रिभुवन सिंह

भोजन के समय जल ग्रहण

🙁किसी ने भोजन के समय वाम हस्त से जल पीने में मना किया है; तदर्थ "वामहस्ते जलं धृत्वा मणिबन्धे निधाय च।भुञ्जमान: पिबन्वारि नोच्छिष्टं मनुरब्रवीत्।।" अन्यदपि "जलपात्रं तु नि:क्षिप्य मणिबन्धे च दक्षिणे। विप्रो भोजनकाले तु पिबेद्वामेन पाणिना।। धारया नोदकं पेयं पीत्वा दोषमवाप्नुयात्। जलपात्रेण तत्पेयमिति शातातपोब्रवीत्।।" भोजनकाल में जलपात्र को वाम हस्त से उठाकर दक्षिण मणिबन्ध पर रखे और वाम हस्त से शनै: जलपान करे। भोजनकाल में दक्षिणहस्त से जल पीना कुछ आश्वलायनों के लिए है, यथा "दक्षिणेनैव भुञ्जान उदकं पिबेत्" इति। जलपात्र को ऊपर उठाकर मुख में जलधारा से जल पीना दोषावह है। भोजनेतर काल में- "न पिबेन्न च भुञ्जीत द्विज: सव्येन पाणिना। नैकहस्तेन च जलं शूद्रेणावर्जितं पिबेत्।।" दायें हाथ से जल पीना चाहिए। देशशाखाद्यवच्छेदेन वैविध्य का बोध न हो तो चञ्चुचालन करते रहना कथमपि सही नहीं...

कुश या कुशा:

कुश या कुशा: कुशाग्र तथा कुशल शब्द इसी से बने हैं...
श्राद्ध कर्म, पूजा - पाठ तथा यज्ञ - हवन आदि कार्य इसके बिना अधूरे हैं। लेकिन क्या आप इसे पहचानते हैं?
                   कुश, कुशा या दर्भ एक पवित्र घास है, सनातनी परिवारों में पूजा पाठ के लिए कुशा का प्रयोग किया जाता है, किन्तु फिर भी कुशा की पहचान को लेकर हम आश्वश्त नही रहते। इस अध्याय में हम कुशा के विषय में विस्तार से जानेंगे। 

कुशा का केवल धार्मिक महत्व ही नही है, बल्कि इसका सामाजिक और वैज्ञानिक महत्व भी है। यह एक पवित्र घास है, जिसका धार्मिक अनुष्ठानों, पूजा, यज्ञ और औषधीय उपयोगों में महत्वपूर्ण स्थान है। इसे पवित्र माना जाता है, और इसके बारे में विभिन्न धार्मिक कथाएँ भी प्रचलित हैं, जैसे कि भगवान विष्णु के शरीर से इसकी उत्पत्ति होना। यह प्राकृतिक रूप से एक शुद्धिकरण एजेंट के रूप में भी काम करती है और ग्रहण के दौरान खाने की चीजों को खराब होने से बचाने के लिए इस्तेमाल की जाती है।

कुशा के दस प्रकार : धार्मिक कृत्यों और श्राद्ध आदि कर्मों में कुश का उपयोग होता है। ऐसी मान्यता है कि कुशा के बिना श्राद्ध कर्म पूरा ही नही हो सकता है। कुशा एक प्रकार की घास है। जो पोएसी कुल का सदस्य है। किंतु धार्मिक ग्रंथों में घास परिवार के 10 सदस्यों को कुशा की श्रेणी में रखा गया है, अलग अलग क्षेत्र में उपलब्धता के आधार पर इन सभी का प्रयोग प्रचलन में किन्तु सर्वोत्तम कुशा दर्भ को माना गया है, जिसका वैज्ञानिक नाम Desmostachya bipinnata या Eragrostis cynosuroides है। इसके कई और समानार्थी भी हैं जो भी शंशय का एक मुख्य कारण है। एक श्लोक से इस बात की पुष्टि होती है।

कुशा: काशा यवा दूर्वा उशीराच्छ सकुन्दका:। 
गोधूमा ब्राह्मयो मौन्जा दश दर्भा: सबल्वजा: ।।
           अर्थात कुशा दस प्रकार की होती है - काशा, यवा, दूर्वा, उशीर, सकुंद, गोधूमा, ब्राह्मयो, मौंजा, दश, दर्भा। इनमें से जो भी मिल जाए, उसे पूजा के लिए इस्तेमाल कर सकते हैं।

1. काशा अर्थात कांस (Saccharum spontaneum)
2. यवा अर्थात जौ (Hordeum vulgare) 
3. दूर्वा अर्थात दूव घास (Cynodon dactylon)
4. उशीर अर्थात खश(Chrysopogon zizanioides)
5. सकुंद अर्थात मोया घास जो बहुत बड़े कंद के रूप में उगती है (Pennisetum pilosum)
6. गोधूमा का अर्थ पूजन वाली उस घास से है जिसका प्रयोग करवाचौथ में किया जाता है 
7. ब्राम्ह्यो इसका अर्थ संभवतः देव झाडू या ब्रम्ह झाडू के पौधे से है (Thysanolaena latifolia)
8. मोंजा अर्थात मूंज (Saccharum munja)
9. दश अर्थात नरकुल या सरकंडा (Phragmites karka)
10. दर्भा अर्थात कुश या कुशा (Desmostachya bipinnata) 

कुशा की उत्पत्ति : कुशा, जिसे सनातन धर्म में पवित्र घास के रूप में जाना जाता है, का आध्यात्मिक और औषधीय महत्व अत्यंत गहन है। पुराणों के अनुसार, कुशा की उत्पत्ति भगवान श्रीमन्नारायण के वराह अवतार से हुई, जब उन्होंने अपने शरीर को हिलाकर जल और रोम (बाल) को धरती पर गिराया, जो बाद में कुशा के रूप में प्रकट हुआ। इसीलिए कुशा को भगवान का अंश माना जाता है, जिसके मूल में ब्रह्मा, मध्य में विष्णु और अग्रभाग में शिव का वास बताया गया है। सनातन धर्म के सभी संस्कारों और पूजन विधानों में कुशा का उपयोग अनिवार्य है, क्योंकि यह पवित्रता और त्रिदेवों की उपस्थिति का प्रतीक है। इसकी आध्यात्मिक महत्ता इसे यज्ञ, तर्पण और अन्य धार्मिक अनुष्ठानों में अपरिहार्य बनाती है, जो इसे सनातन परंपरा का अभिन्न अंग बनाता है।
            एक अन्य पौराणिक मान्यता अनुसार जब सीता जी पृथ्वी में समाई थीं तो राम जी ने जल्दी से दौड़ कर उन्हें रोकने का प्रयास किया था, किन्तु उनके हाथ में केवल सीता जी के केश ही आ पाए। ये केश राशि ही कुशा के रूप में परिणत हो गई। उत्तराखंड में सीतोंस्यु पौड़ी गढ़वाल एक स्थान है, यहाँ माना जाता है कि माता सीता इसी स्थान से धरती की गोद में समाई थी, उसके आसपास की घास अभी भी नहीं काटी जाती है। दस प्रकार की कुशा में से दर्भ Desmostachya bipinnata इस क्षेत्र में बहुतायात में पाई जाती है यही कारण है कि इस जाति की कुशा को सर्वाधिक पवित्र माना जाता है जबकि सभी दस प्रकार के कुशा का प्रभाव तथा धार्मिक महत्त्व एक सामान है।

कुशा का संग्रहण करना कब शुभ होता है? कुशा का संग्रहण एक खास दिन किया जाता है। जिसे कुश गृहणी अमावस्या या पिठौरी अमावस्या कहते हैं। यह भादो मास की कृष्ण पक्ष को आने वाली अमावस्या है। इस दिन देवी दुर्गा की पूजा की जाती है। पौराणिक मान्यता के अनुसार इस दिन माता पार्वती ने इंद्राणी को इस व्रत का महत्व बताया था। विवाहित स्त्रियों द्वारा संतान प्राप्ति एवं अपनी संतान के कुशल मंगल के लिए उपवास किया जाता है और देवी दुर्गा सहित सप्तमातृका व 64 अन्य देवियों की पूजा की जाती है। अत्यन्त पवित्र होने के कारण इसका एक नाम पवित्री भी है। इसके सिरे नुकीले होते हैं। इसको उखाड़ते समय सावधानी रखनी पड़ती है कि यह जड़ सहित उखड़े और हाथ भी न कटे। यह कार्य सही तरह से करने वाले कुशल कहलाते हैं, कुशल शब्द इसी से बना। " ऊँ हुम् फट " मन्त्र का उच्चारण करते हुए उत्तराभिमुख होकर कुशा उखाडी जाती है ।

धार्मिक एवं पूजन कार्यों में महत्त्व : आज भी नित्यनैमित्तिक धार्मिक कृत्यों और श्राद्ध आदि कर्मों में कुश का उपयोग होता है। सभी धार्मिक अनुष्ठानों में कुशा या दर्भ से निर्मित आसन बिछाया जाता है। पूजा पाठ आदि कर्मकांड करने से व्यक्ति के भीतर जमा आध्यात्मिक शक्ति पुंज का संचय कहीं भूमि के स्पर्श से पृथ्वी में न समा जाए, उसके लिए कुश का आसन विद्युत कुचालक का कार्य करता है। इस आसन के कारण पार्थिव विद्युत प्रवाह पैरों के माध्यम से शक्ति को नष्ट नहीं होने देता है।
           मान्यता है कि कुश के बने आसन पर बैठकर मंत्र जप करने से सभी मंत्र सिद्ध होते हैं। नास्य केशान् प्रवपन्ति, नोरसि ताडमानते। (देवी भागवत 19/3) अर्थात कुश धारण करने से सिर के बाल नहीं झड़ते और छाती में आघात यानी दिल का दौरा नहीं होता। उल्लेखनीय है कि वेदों में कुशा या कुश को तत्काल फल देने वाली, आयु की वृद्धि करने वाली और दूषित वातावरण को पवित्र करके संक्रमण फैलने से रोकने वाली महत्वपूर्ण वनस्पति बताया है। प्राचीन काल में राजा-महाराज भी कुशा से बनी चटाई पर सोते थे। रामायण से प्राप्त जानकारी के अनुसार भगवान् श्री राम के वनवास के बाद उनके अनुज राजा भरत ने भी चौदह वर्षों तक कुशा के आसन पर शयन किया था ।
कुश की पवित्री पहनना जरूरी क्यों? कुश की अंगूठी बनाकर अनामिका उंगली में पहनने का विधान है, ताकि हाथ द्वारा संचित आध्यात्मिक शक्ति पुंज दूसरी उंगलियों में न जाए । अनामिका के मूल में सूर्य का स्थान होने के कारण यह सूर्य का प्रतिनिधित्व करने वाली उंगली है। सूर्य से हमें जीवनी शक्ति, तेज और यश प्राप्त होता है। एसा करने के पीछे एक अन्य कारण पूजन, यज्ञकर्म एवं अनुष्ठान से उत्पन्न या प्राप्त इस ऊर्जा को पृथ्वी में जाने से रोकना है। कर्मकांड के दौरान यदि भूलवश हाथ भूमि पर लग जाए, तो बीच में कुश का ही स्पर्श होगा। इसलिए कुश को हाथ में भी धारण किया जाता है। यह ऊर्जा भूमि पर जाने से हमें सकारात्मक ऊर्जा का नुक्सान होगा । वैज्ञानिक रूप से भी देखा जाए तो विद्युत ऊर्जा जब किसी प्रवाह स्तोत्र से भूमि पर स्पर्श होती है तो वह भूमि में मिलकर शून्य हो जाती है । वैज्ञानिक भाषा में हम इसे अर्थिंग प्रभाव कहते हैं जिसका तात्पर्य भूमि या अर्थ का प्रभाव है । कुशा मानव शरीर और भूमि के बीच कुचालक का कार्य करता है और यज्ञ-पूजन, व धार्मिक अनुष्ठान द्वारा उत्पन्न सकारात्मक ऊर्जा को शरीर में संगृहीत करने या भूमि से जाने से रोकता है ।  

औषधीय महत्व: कुशा की जड़ से मूत्र संबंधी रोग, पाचन संबंधी रोग और प्रदर रोग में लाभ होता है। कुशा की पवित्रता सिर्फ धार्मिक और पौराणिक नही है बल्कि वैज्ञानिक भी है। कुशा की जड़ डालकर रातभर के लिए रखा गया जल प्रातः पीने से मूत्र संबंधी विकारों में आराम मिलता है। इसकी जड़ो में जल शुद्धिकरण की कमाल की क्षमता पाई जाती है। कृत्रिम आद्रभूमि (आर्टिफीसियल वेत्लेंड्स) या रूट ज़ोन टेक्नोलॉजी विषय को पढ़कर इस मामले में जिज्ञासा शांत की जा सकती है। आयुर्वेद में भी कुशा का विशेष स्थान है। प्राचीन आयुर्वेदिक ग्रंथों जैसे चरक संहिता और सुश्रुत संहिता में कुशा को मूत्रविरेचक, शीतल, और वात-पित्त नाशक औषधि के रूप में वर्णित किया गया है। यह मूत्र संबंधी रोगों, पथरी, रक्तपित्त, प्रदर, शुगर, और त्वचा संबंधी समस्याओं में लाभकारी है। उदाहरण के लिए, कुशा की जड़ का काढ़ा पथरी को तोड़ने और मूत्रमार्ग की रुकावट को दूर करने में सहायक है, जबकि इसका रस दस्त और उल्टी को नियंत्रित करता है। त्वचा पर इसका लेप जलन को शांत करता है और घाव भरने में मदद करता है। कुशा का एंटी-डायबिटिक गुण रक्त शर्करा को नियंत्रित करने में भी उपयोगी है, जिससे यह आधुनिक स्वास्थ्य समस्याओं के लिए भी प्रासंगिक है।

पौराणिक महत्व: कुशा की शक्ति के विषय मे धर्म ग्रंथो में भी पर्याप्त प्रमाण मिलते हैं। रामायण में उल्लेख मिलता है कि सीता जी ने एक कुशा के तिनके से रावण को अपने निकट आने से रोक दिया था। आगे चलकर माता सीता ने अपने पुत्र का नाम कुश रखा। महाराज कुश के वंशज ही आगे चलकर कुशवाहा कहलाये ऐसी मान्यता है। प्राचीन दस्तावेजों में भी हिन्दुकुश पर्वत का उल्लेख मिलता है। संभवतः वहाँ कुशा वनस्पति की अधिकता रही होगी। 
                एक अन्य विवरण अनुसार गरुड़ जी अपनी माता की दासत्व से मुक्ति के लिए स्वर्ग से अमृत कलश लाये थे, उसको उन्होंने कुशों पर रखा था। अमृत का संसर्ग होने से कुश को पवित्री कहा जाता है (महाभारत आदिपर्व के अध्याय 23 का 24 वां श्लोक)। इसीलिये कुशा को पवित्र मानकर इसका प्रयोग धार्मिक व पूजन कार्यो में किया जाता है। जिस प्रकार अमृतपान के कारण केतु को अमरत्व का वर मिला है, उसी प्रकार कुशा भी अमृत तत्त्व से युक्त है। अथर्ववेद में इसे क्रोधशामक और अशुभ निवारक बताया गया है.

कुशा और सर्पों का सम्बन्ध : मान्यता है कि सतयुग में सभी सांपों की जीभ कुशों के कारण फटी थी। उसकी कथा इस प्रकार से है- सतयुग काल में सभी साँप और गरुड़ के पूर्वज सौतेले भाई थे, लेकिन साँपों की माँ कद्रू ने गरुड़ की माँ विनता को छल से अपनी दासी बना लिया। सभी साँपों ने गरुड़ के सामने यह शर्त रखी कि अगर वह स्वर्ग से उनके लिए अमृत लेकर आयेगा तो उसकी माँ को दासता से मुक्त कर दिया जायेगा। यह सुनकर गरुड़ ने स्वर्ग पर आक्रमण कर दिया और सभी को परास्त कर दिया। युद्ध में स्वर्ग के देवता इन्द्र को भी उसने मारकर मूर्छित कर दिया। उसका यह पराक्रम देखकर भगवान विष्णु बहुत प्रसन्न हुए और उसे अपना वाहन बना लिया। गरुड़ ने भगवान् विष्णु से यह वरदान भी माँग लिया कि वह हमेशा अमर रहेगा और उसे कोई नहीं मार सकेगा। 
                          अमृत लेकर जब गरुड़ वापस धरती पर आ रहे थे, तभी इंद्र ने उस पर अपने वज्र से प्रहार कर दिया। गरुड़ को अमरता का वरदान मिला था, इसलिए उस पर वज्र के प्रहार का कोई असर नहीं हुआ, किन्तु बज्र के महर्षि दधीचि की अस्थियों से बने होने के कारन सम्मान स्वरूप गरुड़ ने अपना एक पंख गिरा दिया। यह देखकर इंद्र ने चेताया कि तुम जो अमृत साँपों के लिए ले जा रहे हो, उससे वह पूरी सृष्टि का विनाश कर देंगे, इसलिए अमृत को स्वर्ग में ही रहने दो। इंद्र की बात सुनकर गरुड़ ने कहा इस अमृत को देकर वह अपनी माँ को दासता से मुक्त कराना चाहता हूँ किन्तु जब मैं इस अमृत को भूमि पर रख दूंगा, तब आप इसे वहाँ से उठा लीजियेगा। गरुड़ की यह बात सुनकर इंद्र बहुत प्रसन्न हुए और बोले कि तुम मुझसे कोई वर मांगो। गरुड़ ने कहा कि जिन साँपों ने मेरी माँ को अपनी दासी बनाया है, वे सभी मेरा प्रिय भोजन बने। गरुड़ अमृत लेकर साँपों के पास पहुँचा और साँपों से बोला कि मैं अमृत ले आया हूं। अब तुम मेरी माँ को अपनी दासता से मुक्त कर दो। साँपों ने ऐसा ही किया और उसकी माँ को मुक्त कर दिया। गरुड़ अमृत को एक कुश के आसन पर रख कर बोलता है कि तुम सभी पवित्र होकर इसको पी सकते हो। सभी साँपों ने मिलकर विचार किया और स्नान करने चले गये। दूसरी तरफ इंद्र वहीं घात लगाकर बैठे हुए थे। जैसे ही सभी सांप चले जाते हैं, इन्द्र अमृत कलश लेकर स्वर्ग भाग जाते हैं। जब साँप वापस आये, तो उन्होंने देखा कि अमृत कलश कुश के आसन पर नहीं है। उन्होंने सोचा कि जिस तरह से हमने छल करके गरुड़ की माँ को अपनी दासी बनाया हुआ था, उसी तरह से हमारे साथ भी छल हुआ है, लेकिन उन्हें थोड़ी देर बाद ध्यान आता है कि अमृत इसी कुश के आसन पर रखा हुआ था, तो हो सकता है, इस पर अमृत की कुछ बूंदे गिरी हों! सभी सांप कुश को अपनी अपनी जीभ से चाटने लगते हैं और उनकी जीभ कुशों के कारण बीच से दो भागों में कट जाती है। अमृत कलश से स्पर्श के बाद कुशा को पवित्री नाम मिला।

ज्योतिषीय महत्त्व एवं गृह शांति : कुश का उपयोग ग्रहों की अशुभता को दूर करने के लिए किया जाता है । ज्योतिष शास्त्र में ऐसी भी मान्यता है कि जब किसी भी जातक के जन्म कुंडली या लग्न कुण्डली में राहु महादशा की आती है तो कुश के पानी मे ड़ालकर स्नान करने से राहु की कृपा प्राप्त होती है। माना जाता है कि कुशा नकारात्मक ऊर्जा से रक्षा करती है और ग्रहण काल में भोजन तथा जल में मिलाकर ग्रहण के दुष्प्रभावों से बचाने में सहायक होती है। ग्रहण के दौरान खाने की चीजों को खराब होने से बचाने के लिए कुश का इस्तेमाल किया जाता है, जो एक प्राकृतिक प्रिजर्वेटिव का काम करता है.
योग एवं ध्यान में महत्व:योग साधना व पूजन कार्यो में कुशा की चटाई पर बैठना उत्तम माना जाता है। कुशा विद्युत की कुचालक होती है तो योग व ध्यान के समय शरीर की ऊर्जा पृथ्वी में समाहित नही होती है। पुराने समय मे राजा महाराजा व ऋषि मुनि भी कुशा के आसन पर बैठते व शैया पर शयन करते थे।

वैज्ञानिक महत्त्व : कुशा एकबीजपत्री प्रकार की वनस्पति है। सभी दस प्रकार की कुशा वानस्पतिक रूप से एकबीज पत्री समूह के पोएसी कुल के सदस्य हैं। सभी कुशा धार्मिक पूजन कार्यों के लिए सामान महत्त्व के हैं किन्तु इसके अतिरिक्त इनके कई औषधीय महत्त्व भी हैं विशेषकर मूत्र संबंधी रोगों और विकिरण के प्रभाव संबंधी दोष निवारण में इनकी प्रमुख भूमिका है। ग्रामीण क्षेर्तों में आज भी ठनका लगने, पेशाब में जलन होने या पथरी जैसे रोगों के उपचार के लिए कुशा की जड़ का ही प्रयोग किया जाता है। इसके अलावा सूरज की तीव्र विकिरणों से उत्पन्न सन बर्न अर्थात त्वचा दाह तथा लू लगने जैसे रूगों में भी कुशा की जड़ को घिसकर पिलाया जाता है। पूर्व के समय में कुशा से तेल प्राप्त किया जाता था, उसे ही संगृहीत कर वर्ष भर औषधीय प्रयोग किया जाता था। ग्रहण के समय भी विकिरणों का नकारात्मक प्रभाव होता है, यह बात विज्ञान भी मानता है, कुशा के प्रयोग से विकिरणों के इन्ही हानिकारक प्रभावों को कम किया जा सकता है। 
         एक अन्य सिद्धांत के अनुसार कुशा के पौधों में किसी अन्य पौधे की तुलना में अधिक प्रदूषकों को अवशोषित करने की क्षमता होती है। इसी तरह कुशा की जड़ों में किसी अन्य पौधे की तुलना में सर्वाधिक प्रदूषकों को एकत्र कर उन्हें कम हानिकारक पदार्थों में ब्वादालने की क्षमता होती है। कुशा के इन्ही गुणों के कारन कुशा वर्गीय पौधों को रूट ज़ोन टेक्नोलॉजी नामक आधुनिक व वैज्ञानिक पद्धति के अंतर्गत प्रदुषण निवारण के लिए प्रयोग किया जाता है। 

कुशा से संरक्षण : रामायण काल में कुशा ने रावण से माता सीता का संरक्षण किया था और आज भी कुशा धरती माता का संरक्षण कर रहा है। जिस तरह माता सीता धरती की संतान हैं ठीक उसी तरह कुशा भी धरती माता की संतान है अतः वह रिश्ते में माता सीता का भाई हुआ। सभी प्रकार के कुशा उबड़ खाबड़ और बंजर भूमि में उग कर भूमि को उर्वर बनाते हैं। ये बहुत कम जल की उपलब्धता वाले स्थान स्थान से लेकर अत्यधिक जल भराव व दलदली स्थानों तक में आसानी से उग जाते हैं और फलते फूलते रहते हैं। अधिक जल भराव व तीव्र जल बहाव वाले स्थानों पर उगकर ये मिट्टी के कटाव को रोकते हैं और पारिस्थितिक तंत्र को संतुलित बनाये रखने में मदद करते हैं।

ब्राह्मण पंडित की दुर्दशा

🌺अतिसमादरणीय कर्मकाण्डी पण्डितो! ब्रह्मवृत्तिविघातक जिन मूढ़ प्रलापियों ने कर्मकाण्ड से परिवार पालने के संघर्ष का सामना नहीं किया है, उन क्रूर के कर्कश दुरुपदेशों का विधिवत् कर्मकाण्ड कर दो। ऐसे जन्तु अपनी दुकानदारी मात्र के लिए आपकी विगर्हणा का अपप्रदर्शन करते हैं। इससे इन लोगों को एक-दो विगर्ह्य प्रोग्राम मिल जाते हैं, जहाँ चढ़ावे और खुरपुजाई के लिए इन्हें वर्णाश्रमादि का कोई बन्धन स्वीकार्य नहीं। आप जैसे निरीह पण्डितों को फटकार कर ही ऐसे दुष्टों का दुर्धन्धा आगे बढ़ता है। आपने वेद-पुराणों में इन सबसे अधिक श्रम किया है, आप अपनी अस्मिता पर हो रहे दुष्प्रहार का प्रतीकार करो। इन बहुरूपियों को कर्मकाण्डियों की वेदना से कुछ लेना देना नहीं। आज देश के महानगर ही नहीं; गाँवों में भी शिखा-सूत्र धारण करने वाले द्विजों का दर्शन कठिन हो गया है। हिन्दुस्थान के ९९% ब्राह्मण भी शिखा-यज्ञोपवीत से विरहित हैं, अत्यल्प अपवाद छोड़ क्षत्रिय, वैश्यों के शिखा-सूत्र की कथा ही समाप्त हो चुकी है। ये सर्वथा विगर्हित उपदेशक इन बाबुओं से क्यों नहीं कहते कि तुम शिखा-सूत्रधारी नहीं होने के कारण हमारी खुरपुजाई के अधिकारी नहीं हो? आप पण्डितों का ही अपमान क्यों? आप विश्वास के साथ अस्मिता की रक्षा करो। ये दुष्ट जन वेद, कर्मकाण्ड बिल्कुल नहीं जानते। ये सत्समाज के उपयोगी नहीं होने से आप परशुरामवंशज निरीहों पर भड़ाँस निकालते रहते हैं। सावधान...

🌺ऐसी दु:स्थिति में वेदादिशास्त्रों का क्या उपयोग? वेदबहिष्कृतों के द्वारा भी वेद वेद क्यों चिल्लाये जा रहे हैं? कथा-पुजारीपन तो ब्राह्मणों से छिन ही चुके हैं; वेद-शास्त्र भी पढ़ कर ब्राह्मण क्या करेंगे? ये दुष्टजन अपने दुष्प्रारब्धवान् परिकरों को बाप का श्राद्ध करने में मना कर देते हैं और अपनी भागवतकथा से डायरेक्ट मुक्त कर देने का उपदेश देते हैं। सम्प्रति बड़े मञ्च का एक भी सर्वज्ञ ऐसा नहीं जो श्रीमद्भागवत के पहले श्लोक का ही पदार्थविवेचन मात्र कर दे। शुद्ध कर्मकाण्डजीवी पण्डितों को देश में कितने शुद्धतम यजमान मिलेंगे? यदि लाखों में एक तो क्या यह शोचनीय नहीं है? इन लाखों में एक से कितने विशुद्धतम कर्मकाण्डी अपने बच्चों का योगक्षेम चला सकते हैं? इन दुष्टों ने कर्मकाण्डी पण्डितों की जीविका के लिए कितने बृहद् यज्ञों का आयोजन किया-कराया है? इन्होंने देश में कितने शुद्ध द्विजश्रेष्ठ बनाये हैं? यदि कभी नहीं तो इन निकम्मे सर्वज्ञमन्य ब्रह्मद्रोहियों को बक बक करने का अधिकार कैसे? क्या वेद, धर्मशास्त्र या कर्मकाण्डादि का नामोनिशान मिटा दिया जाय? सरकारी वैदिक-धर्मशास्त्री भी कितने विधि-निषेधों का खुला व्याख्यान दे सकते हैं? पण्डितो! वेद, कर्मकाण्ड को आप कर्मकाण्डी लोग ही कुछ भी बचा रखे हो, इन साण्डों को वेद, कर्मकाण्ड के ककहरा का भी ज्ञान नहीं। ये अपनी दुकानदारी का खूब प्रचार करें परन्तु कर्मकाण्डियों के योगक्षेम में बाधा बनें तो आप उन बाधाओं का सद्य: कर्मकाण्ड करा दो। मुझे स्थायिवृत्तिविहीन कर्मकाण्डी पण्डित मिलते रहते हैं, जिनकी कौटुम्बिक मनोवेदना से दु:ख होता है। ये दुष्टसमुदाय क्या जाने वेद, कर्मकाण्ड और कर्मकाण्डियों का बुरा हाल⁉️ 

🌺ये धर्मभ्रष्ट उपदेशक क्षत्रिय, वैश्य, शूद्रों को नहीं फटकारते; कर्मकाण्डी निरीहतम ब्राह्मण ही इनके निशाने पर शिकार होते हैं। जो भ्रष्टतम धनपशु ब्राह्मण भी इनकी प्रचुर खुरपुजाई कर देता है; वह इनके दिल का महान् टुकड़ा हो जाता है। सावधान पण्डितो! जो कर्मकाण्ड की दयनीय दशा झेल रहे हैं, कदाचित् कुछ सुनना ही है तो उन्हीं की सुनो। अपने वृत्तिविघातकों का मुखमर्द्दन करने में पीछे मत रहो। दुनियाँ आपका कुछ नहीं बिगाड़ रही; कोई अपना ही आपका शुभेच्छु बन कर आपको खा रहा है। इनमें कोई एक भी जन्तु साङ्ग वेद, कर्मकाण्ड या कर्मकाण्डी पण्डितों का शुभ चिन्तक नहीं है। इन लोगों ने मात्र धन्धे के लिए वेदविद्यालय आदि खोल रखा है। आपको जो जन्तु नीचा दिखाए; उससे किसी शाखा के मात्र एक मन्त्र का सस्वर वीडियो माँगो, किसी शाखा की कुशण्डी या सपिण्डी का वीडियो माँगो, इन मूर्ख सर्वज्ञों की पोल खुल जायगी। कर्मकाण्डी पण्डितो! आपके योगक्षेम का जो चिन्तन करे, उसका सुनो। आप किसी के किये सोशल अपमान का बढ़ चढ़ कर प्रतीकार करो। आपसे ही वेद या कर्मकाण्ड बचेगा। यथासाध्य परम्परा की रक्षा करते हुए आगे बढ़ो और दुष्टमुखभञ्जन में भी पीछे मत रहो। पुन: सावधान- जिसे वेद, कर्मकाण्ड के ककहरा का भी ज्ञान होगा; वही ब्राह्मण होगा और वह आपका अपमान कभी नहीं कर सकता। आपको जो जैसे भजता है; उसे वैसे ही भजो.....

अम्बेडकर

#अंबेडकर के #पिता राम जी रमो जी सकपाल ब्रिटिश आर्मी में #सूबेदार के पद पर थे 
“अगर अंबेडकर के पिता सूबेदार थे, और उन्हें तनख़्वाह मिलती थी, तो फिर अंबेडकर को #गरीब कहना कैसे उचित है? आप दोनों बातें साथ में कैसे कह सकते हैं?”

शौरी ने यह तर्क दिया कि अंबेडकर को #अंग्रेजों ने पढ़ाई और करियर के लिए “स्पेशल ट्रीटमेंट” दिया, जिससे वे “settled professional” बन गए।
उन्होंने यह भी लिखा कि अंबेडकर ने मजदूरों, किसानों या आम दलितों की ज़िंदगी का सीधा #अनुभव नहीं किया।

कुछ #दक्षिणपंथी लेखक उन्हें “elitist” या “British-backed opportunist” कहकर पेश करते हैं। जो सच है बस इतना की वो हमेशा ऐशो आराम का जीवन जिए कभी कष्ट में नहीं रहे कभी, बड़ौदा #राजा के भरोसे 

एनजी रांधी ने कहा अम्बेडकर कभी #श्रमिकों की समस्या को नहीं उठाये बस उनके नाम का प्रयोग #अंग्रेजों के सामने अपनी राजनीति चमकाने के लिए करते रहे। 

मुझे कहना ये है की अंबेडकर कभी ना अपनी बिरादरी (महार) से ऊपर उठ पाए ना कभी अन्य डिप्रेस क्लास के लिए कुछ किए डिप्रेस्ड के लिए वास्तव में किसी ने कुछ किया तो थे महात्मा गांधी और जगजीवन राम उनसे ज़्यादा काम तो स्वामी अछूतानंद जी ने किया लेकिन आज का तथाकथित अगड़ा #दलित उनका नाम ही भूल गया। 

भूल तो अंबेडकर भी गए जिस #ब्राह्मण ने उनकी सामाजिक स्थिति बेहतर करने के लिए अपना #आस्पद (टाइटिल) #अंबेडकर तक दिया आज अंबेडकर की पूरी गोल उस ब्राह्मण के विनाश के सारे उपाय कर रही है, भूल तो गए उस #क्षत्रिय राजा #गायकवाड़ को जिसने पैसा देकर अंबेडकर की #शिक्षा पूरी की।
परन्तु राजनेताओं को राजनीति करने के लिए और हमारे शूद्र भाइयों को भड़काने के लिए 

पार्थिवलिङ्ग शिव लिंग

पार्थिवलिङ्ग निर्माण में एक तोला या दो तोला मिट्टी से त्रिसूत्रप्रमाण अपना अंगुष्ठपर्व परिमाण का शास्त्रीय प्रमाण है और इसी से बडे लिङ्ग में पूजन से पूजन का फल भी नहीं मिलता । परन्तु आजकल तो..........

#पार्थिवलिंग निर्माण में मृत्तिका का परिमाण का शास्त्रीय निर्देश 👇

मृत्तिकातोलकं ग्राह्यमथवा तोलकद्वयम् ।
एतदन्यन्न कुर्वीत कदाचिदपि पार्वति ! ॥

#पुनः

मृत्तिकातोलकं ग्राह्यमथवा तोलकद्वयम् ।
त्रिसूत्रस्य प्रमाणेन घटनं कारयेद्‌बुधः ॥
स्वांगुष्ठपर्वमाणन्तु कृत्वा लिङ्गं प्रपूजयेत् ।
मृदादिलिङ्गघटने प्रमाणं परिकीर्त्तितम् ।
फलमुक्तमवाप्नोति अन्यथा चेत्तदन्यथा ॥(६२७•त.तो.प्रा)

पूजा में सिर ढकने का शास्त्र निषेध

 पूजा में सिर ढकने को शास्त्र निषेध करता है। शौच के समय हीं सिर ढकने को कहा गया है। प्रणाम करते समय,जप व देव पूजा में सिर खुला रखें। तभी शास्त्रोचित फल प्राप्त होगा।

शास्त्र क्या कहते हैं ? आइए देखते हैं. 

उष्णीशी कञ्चुकी नग्नो मुक्तकेशो गणावृत।
अपवित्रकरोऽशुद्धः प्रलपन्न जपेत् क्वचित् ॥-
(शब्द कल्पद्रुम )
अर्थात्-- सिर ढककर,सिला वस्त्र धारण कर,बिना कच्छ के,शिखा खुलीं होने पर ,गले के वस्त्र लपेटकर । अपवित्र हाथों से,अपवित्र अवस्था में और बोलते हुए कभी जप नहीं करना चाहिए ।।


कर्ण दुर्योधन और द्रौपदी पुत्र आत्महीनहिन्दू

द्रौपदी के पुत्रों को लेकर रीपोस्ट:

ऐसा नहीं था कि उनका उल्लेख ग्रंथों में नहीं है, या वह वीर नहीं थे. बस वह विमर्श में नहीं थे! उनपर लिखा नहीं गया. जितना प्रयास कर्ण जैसे लोगों को नायक बनाने का किया गया या फिर दुर्योधन के पापों को कम करने का किया गया, उसमें से शतांश भी अग्निसुता द्रौपदी के पुत्रों को नहीं प्रदान नहीं किया गया.
किसी ने कहा, वर्णन नहीं है, किसी ने कहा कि कहा ही नहीं गया है! अपनी अकर्मण्यता को छिपाने के तमाम बहाने हैं. 
महाभारत के आदिपर्व में हरणाहर पर्व में द्रौपदी के पुत्रों के जन्म एवं उनके गुणों का वर्णन है. आइये देखते हैं कि क्या लिखा है 
शुभलक्षणा पांचाली ने भी अपने पाँचों पतियों से पाँच पर्वत समान बड़े वीर पुत्र प्राप्त किए। अदिति ने जिस प्रकार देवों को प्रसव किया था, वैसे ही पांचाली ने युधिष्ठिर से प्रतिविन्ध्य, वृकोदर से सुतसोम, अर्जुन से श्रुतकर्मा, नकुल से शतानीक, सहदेव से श्रुतसेन ये पांच महारथी वीरपुत्र प्रसव किए. ब्राह्मणों ने शास्त्रों के अनुसार यह जानकर कि युधिष्ठिर का पुत्र प्रतिविध्य पर्वत की भांति शत्रु को मारने के योग्य होगा, उसका नाम प्रतिविन्ध्य रखा. 
सहस्त्र सोमयज्ञ करने के पीछे भीमसेन से सोम के उजाले के समान तेजस्वी बड़े चापधारी सूत के उपजने से उसका नाम सुतसोम हुआ. किरीटधारी अर्जुन ने महान् एवं विख्यात कर्म करने के पश्चात् लौटकर द्रौपदी से पुत्र उत्पन्न किया था, इसलिये उनके पुत्र का नाम श्रुतकर्मा हुआ। कौरवकुल के महामना राजर्षि शतानीक के नाम पर नकुल ने अपने कीर्तिवर्धक पुत्र का नाम शतानीक रख दिया। 
और सहदेव से द्रौपदी के जिस पुत्र ने जन्म लिया था, वह कृतिका नक्षत्र में हुआ था, सेनापति कार्तिकेय कृत्तिका की सन्तान थे, अत: सहदेव के पुत्र का नाम श्रुतसेन रखा गया
द्रौपदी के कुमारों में वर्ष-वर्ष भर का अंतर था, वह सब एक दूसरे का हित चाहने वाले एवं यशस्वी हुए. इन सभी कुमारों को अर्जुन से दिव्य एवं मानुषी अस्त्रों की शिक्षा प्राप्त हुई थी. 
समस्या यह नहीं है कि हमारे ग्रंथों में किसी का उल्लेख नहीं है, समस्या यह है कि हमारी बुद्धि बी आर चोपड़ा के महाभारत के अनुसार चलती है. जैसा उसमें दिखाया गया, वैसे ही चली. चूंकि महाभारत कौन पढ़े इसलिए हम आश्रित हो गए, कभी किसी के द्वारा किए गए अंग्रेजी भाषांतरण पर, या फिर वामपंथी अनुकूलन पर, या फिर राष्ट्रवादी रैपर में वामपंथी विचारों के!
फिर रोना शुरू किया कि हाय यह नहीं लिखा, वह नहीं लिखा! हाय हाय! ये हाय हाय मचाने से पहले यदि पढ़ा जाए, अध्ययन किया जाए, यदि नहीं कर सकते हैं तो कम से कम किसी ऐसे व्यक्ति से पूछा जाए जिसने इन तमाम ग्रंथों का अध्ययन किया है!
द्रौपदी के महावीर पुत्र थे, जिन्होनें अश्वत्थामा के साथ युद्ध करते हुए अपने प्राण त्यागे थे, उनका सिर कोई सहज काटकर नहीं ले गया था. वह शूरवीर थे, एवं युद्ध के अंत तक बचे रहे थे. 
अभिमन्यु सहित सभी पांडव पुत्र शूरवीर थे! ये हमारे बालकों के आदर्श हो सकते हैं, हम इनकी वीरता के किस्से अपने बच्चों को सुना सकते हैं, परन्तु हम सुनाते हैं कर्ण की कथा, हम सुनाते हैं कर्ण के साथ हुआ अन्याय और इस कथित अन्याय की कृत्रिम पीड़ा में हमारे बच्चों के लिए जो वीरता के नायक हो सकते हैं वह खो जाते हैं और हम उन्हें वही कुंठित पीड़ा देते हैं, बल्कि उससे भी कहीं अधिक पीड़ा देते हैं, और उसके बाद क्या करते हैं, यह हम देख ही रहे हैं!
हम दुर्योधन के चरित्र को ऐसा कर देते हैं कि बच्चों को लगता है कि कर्ण और दुर्योधन के साथ अन्याय हुआ!
जब हम अपने नायकों के अपमान का विमर्श तैयार करते हैं, अपनी अगली पीढ़ियों को हम न जाने कहाँ धकेल देते हैं 
आत्महीनहिन्दू

आत्महत्या तुम्हारा चुनाव या प्रेत प्रभाव

#आत्महत्या_तुम्हारा_चुनाव_या_प्रेत_प्रभाव

[एक गूढ़ केस स्टडी,एक व्यक्तिगत संवाद,वैज्ञानिक,दार्शनिक और आध्यात्मिक दृष्टि से परिपूर्ण,एक विस्तृत विमर्श]

असूर्या नाम ते लोका अन्धेन तमसावृता।
तास्ते प्रेत्यानिभगच्छन्ति ये के चात्महनो जना:।।

अर्थात्: आत्मघाती मनुष्य मृत्यु के पश्चात,अज्ञान और अंधकार से परिपूर्ण,सूर्य के प्रकाश से हीन,असूर्य नामक लोक को गमन करते हैं।ये ही "प्रेत योनि" कहलाई जाती है,
जो "आत्महत्या"करता है,वो "प्रेत योनि" में फंसता है,जहां न देह है,न शांति।वहां मात्र अंतहीन दंड और पश्चाताप है,उसके सिवाए,कुछ भी नहीं....कुछ भी नहीं.!

नाम: अविरल राजपूत
उम्र: 16 वर्ष
स्थान: कानपुर,उत्तर प्रदेश

अविरल राजपूत एक मेधावी छात्र था,लेकिन लॉकडाउन के दौरान,उसने ऑनलाइन मल्टीप्लेयर गेम्स (जैसे PUBG) खेलना शुरू किया।धीरे-धीरे,ये शौक,एक लत में बदल गया।गेमिंग के दौरान,उसे नशे की ओर भी आकर्षण हुआ,जिससे वो,नशीले पदार्थों का सेवन करने लगा।गेम में इन-ऐप खरीदारी और नशे की लत को,पूरा करने के लिए,अविरल ने माता-पिता के बैंक खातों से,पैसे चुराने शुरू किए।कुछ ही महीनों में उसने,₹1.5 लाख खर्च कर दिए,जब माता-पिता को इसकी जानकारी हुई,तो उन्होंने उसका मोबाइल फोन,छीन लिया और उसे गेम खेलने से रोक दिया।गेमिंग और नशे के कॉकटेल ने,अविरल के भीतर,कई बदलाव किए,लॉकडाउन के समय PUBG जैसे ऑनलाइन गेम्स में शामिल होने से,अविरल के मस्तिष्क ने,डोपामिन का अत्यधिक स्राव शुरू कर दिया,जिससे उसे कृत्रिम आनंद की लत लग गई,धीरे–धीरे,वास्तविक जीवन से उसका जुड़ाव,कम होने लगा और जब ये “इनाम प्रणाली”(Reward Circuit) रुकती है,जैसे मोबाइल छीन लिया जाए,जैसा अविरल के केस में हुआ,तो इससे उसके "डोपामिन" स्तर मे,भारी गिरावट हुई,इसके पश्चात,"सेरोटोनिन" की कमी ने,उसे अवसाद,चुप्पी और आत्मग्लानि की ओर ले गई,नशे के प्रभाव और माता–पिता से छुपकर व्यवहार करने की चिंता ने,उसके शरीर में,"कॉर्टिसोल" को बढ़ा दिया,जिससे उसके भीतर तनाव,चिड़चिड़ापन और आक्रोश पैदा हुआ।नशीले पदार्थों के सेवन और लगातार स्क्रीन एक्सपोजर से,उसका आभामंडल(AURA),आज्ञा चक्र एवं मणिपुर चक्र,तीनों भारी रूप से,प्रभावित हुए।उसका आभामंडल जो पहले एक स्थिर नीला और पीला था(नीला:आत्मचिंतनशील,पीला:कुछ नया सीखने की प्रबल इच्छा)जो कि दिखाता है कि,अविरल आरंभ में,एक मेधावी,सकारात्मक और आत्मसंतुलित बच्चा था,फिर उसका आभामंडल धीरे–धीरे धुंधला,
थरथराता और विकृत हो गया।

आभामंडल की यह दुर्बलता,विशेष रूप से तब गंभीर होती है,जब कोई किशोर,नशा+गेमिंग+अकेलापन जैसी
"त्रयी" में,फंसता है।

ऐसी स्थिति में,अविरल प्रेतों के लिए,एक "उपयुक्त टारगेट" बन चुका था,विशेष रूप से,वो सूक्ष्म आत्माएं,वो प्रेत,जो स्वयं भी नशा,लत या अपराध के चलते,मृत्यु को प्राप्त हुई हों।ऐसी नेगेटिव एंटिटी,अक्सर वही लत,वही विचार और वही विनाश दूसरों में,पुनः दोहराने का प्रयास करती हैं।अविरल के आभामंडल की जर्जरता ने,उन्हें उसके भीतर प्रवेश की अनुमति दी।अविरल से उसके माता–पिता द्वारा,उसका फोन छीने जाने को तीन दिन बीत चुके थे।तीन दिन तक,मोबाइल से दूर रहने के कारण,उसका जो डोपामिन क्रैश हुआ,उसने अविरल को गहरे Withdrawal में धकेल दिया,जहां उसका शरीर और मस्तिष्क दोनों,“सिस्टम शटडाउन” की स्थिति में आ गए।इसी मेंटल–ब्रेकडाउन के समय,प्रेत ने “मरने” का विकल्प, उसके समक्ष ऐसा रखा,जैसे ये ही उसकी मुक्ति हो।उस समय उसका विवेक,उसका आत्म–संयम और उसकी आत्मा,तीनों पीछे हट चुके थे।

अविरल ने अपनी मां की साड़ी से फंदा बनाकर,अपने कमरे के पंखे से लटक कर,आत्महत्या कर ली...

पुलिस को उसके कमरे से कोई सुसाइड नोट नहीं मिला,लेकिन उसके मोबाइल में गेमिंग ऐप्स और नशे से संबंधित सामग्री पाई गई।जब एक किशोर,वर्चुअल दुनिया के आनंद को ही,जीवन मान लेता है,तो उसके आभामंडल का क्षय,वास्तविक संसार से उसका रिश्ता तोड़ देता है,और तब नशा,प्रेत और मृत्यु,उसके लिए सबसे "आसान विकल्प" बन जाते हैं।

वर्ष 2021 में,भारत में,नशे और शराब के कारण आत्महत्या: 10,560 मामले हुए,जो वर्ष 2020 की तुलना में,
15% अधिक थे।

2021 में छात्र आत्महत्या दर: 13,089 मामले,जिनमें से अधिकांश,15-24 आयु वर्ग के थे।ऑनलाइन गेमिंग के कारण,आत्महत्या के मामले: विभिन्न रिपोर्टों के अनुसार,कई किशोरों ने गेमिंग लत के कारण,
आत्महत्या की है।

नाम: ओम पाण्डेय 
उम्र: 15 वर्ष
स्थान: कोटा,राजस्थान

ओम,तीन वर्षों से,मेडिकल की तैयारी कर रहा था।परिवार से दूर,भीड़ में खोया हुआ।कोचिंग संस्थानों की,चमकदार होर्डिंग्स के नीचे,उसका चेहरा था,पर मन अंधकार में था।न कोई उसे समझने वाला था,न सुनने वाला।वहां पढ़ाने वाले तो कई थे,पर बाल–मन को पढ़ने वाला,सुनने वाला और समझने वाला कोई भी नहीं।दिन भर के शेड्यूल,मॉक टेस्ट,दूसरे बच्चों से तुलना,रैंक, और फिर रात का अकेलापन सब एक खतरनाक कॉकटेल बन चुका था।मेडिकल की तैयारी के नाम पर,15 वर्षीय ओम,(जो एडमिशन के समय,मात्र 12 साल का था)पर जो मानसिक भार डाला गया,उसने उसके शरीर में कोर्टिसोल (Cortisol) को अत्यधिक बढ़ा दिया,यह तनाव का मुख्य हार्मोन है।इसी के साथ,डोपामिन और सेरोटोनिन,जो आनंद,प्रेरणा और संतुलन के लिए,ज़िम्मेदार होते हैं,उनका स्तर तेजी से गिरने लगा।बचपन से किशोरावस्था में,प्रवेश कर रहे शरीर में,ये असंतुलन और भी तीव्र होता है,क्योंकि इस उम्र में,"टेस्टोस्टेरोन" और "ग्रोथ हार्मोंस" भी सक्रिय रहते हैं,और मानसिक अस्थिरता से,ये हार्मोंस भी डगमगाने लगते हैं।

ओम का आभामंडल,जो पहले "हल्का नीला" और "नारंगी" था (ज्ञान और आशा का संकेत),धीरे-धीरे "धूसर"(grey),"फीका" और नीचे की ओर सिकुड़ता चला गया।"मूलाधार","मणिपुर" और "आज्ञा चक्र" उसकी इस स्थिति में,सबसे अधिक प्रभावित हुए,जिससे उसका आत्मबल,स्थिरता और विवेक तीनों छिन्न–भिन्न हो गए।आभामंडल में दरारें बन जाने के बाद,विशेषकर,जब कोई किशोर ये सोचने लगे कि,“मरने से ही मैं अपने माता–पिता को,दुःख से बचा सकता हूं” तो वो स्थिति,प्रेत–प्रेरणा के लिए सबसे उपयुक्त होती है।ये वो भटकी हुई आत्माएं होती हैं,जो पहले कभी,कड़ी अपेक्षाओं,परीक्षा–दबाव या आत्मग्लानि में मरी होती हैं,और अब दूसरों को भी,उसी मार्ग पर प्रेरित करती हैं।ओम जैसे,"संवेदनशील बच्चे",जिनका आभामंडल,जागरूकता के बिना अकेलेपन में टूटता है,वो इन प्रेतों की इस छाया से बच नहीं पाते।कोटा,दिल्ली,प्रयागराज जैसी जगहों पर तो,बिल्कुल भी नहीं।जब उसने आत्महत्या का निर्णय लिया,तब उसका विवेक नहीं,बल्कि उसकी प्रेरित चेतना सक्रिय थी,जिसे प्रेतों ने एक ही विचार में बांध दिया था,“मरना ही समाधान है।”
ये साहस नहीं था,ये भय और मोह का विकृत रूप था,जो आभामंडल के पूर्ण पतन से जन्मा था।ओम लड़ नहीं पाया, क्योंकि उसकी आध्यात्मिक,पारिवारिक और भावनात्मक सुरक्षा–परतें पहले ही बहुत कमजोर थीं।उसके आसपास कोई ऐसा नहीं था,जो उसे सिर्फ़ सुने और वो भी,बिना जज किए।प्रेतों को,किसी मासूम के आभामंडल में प्रवेश के लिए और कुछ नहीं चाहिए,सिर्फ़ एक अकेला,टूटा हुआ हृदय पर्याप्त है।किशोर–किशोरियों को,जब हम सिर्फ़ रैंक,नंबरों और पैकेज से तोलते हैं,तो वे सूक्ष्म स्तर पर आत्महीन हो जाते हैं और यही शून्यता,प्रेतों के लिए सबसे आसान प्रवेशद्वार बन जाती है।ओम भी प्रेत-प्रेरणा का शिकार हो गया।उसे बस एक ही खयाल आ रहा था,"मुझे मरना है,मुझे मरना है,मर जाऊंगा तो मम्मी पापा को निराश नहीं करूंगा और,उनको ये सुनने को नहीं मिलेगा कि उनका ओम,नालायक निकला,जब रहूंगा ही नहीं,
तो किसको नालायक बोलेंगे सब"

उसने कुछ और नहीं सोचा,मां की दी हुई,चादर से ही,फांसी का फंदा बनाया और अपने हॉस्टल के कमरे में आत्महत्या कर ली...

भारत में छात्रों की आत्महत्या के वार्षिक आंकड़े
(2015– 2022)–:

वर्ष: आत्महत्या के मामले

2016: 9,478 
2017: 9,905 
2018: 10,159 
2019: 10,335 
2020:12,526
2021: 13,089
2022:13,044

नाम: अंशिका सक्सेना
उम्र: 23 वर्ष
स्थान: इंदौर,मध्य प्रदेश

तीन वर्षों का प्रेम,एक संबंध,जो जीवन का आधार लगने लगा था अंशिका को,जब उस संबंध में,सर्वेश ने उसे धोखा दिया,तो उसका मानसिक संतुलन डगमगाने लगा।प्रेम–विछोह के पश्चात,अंशिका के शरीर में सेरोटोनिन और डोपामिन का स्तर तेजी से गिरा,जिससे उसे जीवन में कोई आनंद या उद्देश्य नहीं दिखा।उसके भीतर “मैं अस्वीकार्य हूं”, जैसी आत्म-नकारात्मक धारणाएं जन्म लेने लगीं,जिससे "कोर्टिसोल" (Cortisol) का स्तर लगातार बढ़ा,और वो "क्रॉनिक–तनाव" में डूबती चली गई।गर्मी के मौसम में,जहां हार्मोनल उतार-चढ़ाव अधिक तीव्र होते हैं,वहां अंशिका के "एंडोक्राइन–सिस्टम" पर,तनाव का असर और गहरा हो गया।इस काल में,उसका आभामंडल(AURA),जो पहले हल्का गुलाबी और नीला था(प्रेम व कोमलता का प्रतीक),धीरे-धीरे धूसर(Grey),फीका और विकृत होता गया।जब आभामंडल में दरारें उत्पन्न होती हैं और चक्र (विशेषकर स्वाधिष्ठान और अनाहत)अवरुद्ध हो जाते हैं,तब प्रेत-जैसी सूक्ष्म नकारात्मक शक्तियां व्यक्ति की चेतना में प्रवेश कर सकती हैं,
अंशिका के साथ भी,वही हुआ।

30 दिनों तक डिप्रेशन में रहने के दौरान,अंशिका ने कई बार आत्महत्या का प्रयास किया,जो संकेत है कि,"एड्रीनलीन" और "नोराएड्रीनलीन" जैसे हार्मोन,जो "फाइट या फ्लाइट" मोड में सक्रिय होते हैं,उसके शरीर में अनियंत्रित रूप से रिलीज़ हो रहे थे।हर असफल प्रयास के बाद,उसका आत्म-बल एवं आभामंडल और भी क्षीण होता गया।आभामंडल की ये दुर्बलता,प्रेतों के लिए,"उपयुक्त द्वार" बन जाती है,खासकर उन आत्माओं के लिए,जो स्वयं भी प्रेम में छले गए और असमाप्त मृत्यु का अनुभव लेकर,"भटक" रही होती हैं।30 दिन के संघर्ष के पश्चात,जब अंशिका ने अपनी ही बिल्डिंग की सातवीं मंज़िल से छलांग लगाई,तो उसका वो निर्णय तर्क से नहीं,आत्मिक वशीकरण और नकारात्मक प्रेरणा से संचालित था।आत्मा जब आत्म-स्वीकृति छोड़ देती है और आभामंडल पूर्णतः क्षीण हो जाता है,तब वो "अपने होने" को ही मिटा देने को तैयार हो जाती है।ऐसे क्षणों में,प्रेत उसे हिम्मत नहीं देता,बल्कि उसके भीतर भय और पीड़ा को इतना बढ़ा देता है कि,मृत्यु कम पीड़ादायक लगने लगती है।

अंशिका उससे लड़ नहीं पाई,क्योंकि उसे यह पता ही नहीं था कि,वो लड़ रही है,और लड़ रही है,तो किस से लड़ रही है,उसके पास न ज्ञान था,न साधना,न आत्मरक्षा की शक्ति। आभामंडल(AURA) की रक्षा हेतु,जिस आध्यात्मिक जागरूकता की आवश्यकता होती है,वो आधुनिक समाज में न प्रेमियों को सिखाई जाती है,न पीड़ितों को दी जाती है। इसीलिए वो एक सूक्ष्म आत्मिक युद्ध में हार गई।प्रेम में छले गए हृदय,जब आत्म-स्वीकृति खो बैठते हैं,तब प्रेतों के लिए सबसे सरल शिकार बन जाते हैं।और तब मृत्यु उन्हें मुक्ति नहीं,भटकाव की अगली यात्रा पर ले जाती है।

2021 में,30 वर्ष से कम आयु की महिलाओं द्वारा आत्महत्या:45,026

18 से 29 वर्ष की आयु वर्ग: इस आयु वर्ग में आत्महत्या की दर 13.3 प्रति लाख जनसंख्या थी,जो महिलाओं के लिए, उच्चतम दरों में से,एक है।  

नाम: डॉक्टर विकास तलवार
उम्र: 36 वर्ष
स्थान: दिल्ली (मूल निवासी),केस दूसरे राज्य में

2 साल पहले विकास की नेहा से,"अरेंज मैरिज" हुई थी,विवाह के 3 महीने बाद ही,पत्नी ने झूठा दहेज प्रताड़ना का केस लगाया,1 साल से तलाक का केस भी चल रहा था,कोर्ट की तारीखें,पैसों का बोझ,नौकरी का जाना,सबने मिलकर,उसे घुटनों पर ला दिया।वह दिन–ब–दिन,थक रहा था,लगातार तनाव के कारण,उसके शरीर में कोर्टिसोल, सेरोटोनिन,डोपामिन और टेस्टोस्टेरोन जैसे हार्मोन,असंतुलित हो गए,जिससे वो अवसाद,निराशा और आत्मग्लानि से घिरता चला गया।उसका आभामंडल (AURA) जो पहले,"नीला" और "पीला" था,वो धीरे-धीरे धूसर(Grey) और काली दरारों से भर गया,विकास के विशेष रूप से,हृदय और मूलाधार चक्र कमज़ोर हो गए, आभामंडल के क्षीण होने से,विकास नकारात्मक सूक्ष्म शक्तियों और न्याय व्यवस्था से पीड़ित होकर,आत्महत्या कर चुके,प्रेत-विचारों के प्रभाव में आ गया।जब व्यक्ति का मन न्याय और जीवन से भरोसा खो देता है,तब उसकी चेतना प्रेत–प्रेरणा के लिए,संवेदनशील हो जाती है।विज्ञान का स्टूडेंट होते हुए भी,आभामंडल के टूटते ही विकास आत्महत्या की ओर अग्रसर हो गया,और अंततः एक होटल में अपने ही सर्जिकल ब्लेड से अपनी नसें काटकर जीवन समाप्त कर लिया,वही ब्लेड जिससे वो औरों की ज़िंदगियां बचाता था।ये केवल एक आत्महत्या नहीं,बल्कि पुरुष पीड़ा और न्यायिक अनसुनी का भयावह संकेत है।उसे ये ही लग रहा था,कि भारतीय न्याय व्यवस्था में,पुरुषों के लिए कोई सहारा नहीं,कोई सुनवाई नहीं।आख़िरी बार जब विकास,कोर्ट से लौटा,उसकी आंखों में जीवन नहीं था,वो पहले ही मर चुका था,और बाकी कार्य,प्रेत ने उसे प्रेरित करके कर दिया।

2016–2020: इस अवधि में वैवाहिक समस्याओं के कारण,16,021 पुरुषों ने आत्महत्या करी
2020: तलाक के कारण,287 पुरुषों ने आत्महत्या करी
2022: 83,713 विवाहित पुरुषों ने आत्महत्या की
2022: कुल आत्महत्याओं में से 72% पुरुष थे,जिनमें से कई ने,घरेलू कारणों को,आत्महत्या का कारण बताया।  

नाम: अपराजिता अग्रवाल
उम्र: 27 वर्ष
स्थान: प्रयागराज,उत्तरप्रदेश

वर्ष 2021 में अपराजिता की एक ही शहर में संजय से अरेंज मैरिज हुई,शादी के तुरंत बाद,पहले दहेज के लिए,मिलने वाले ताने क्या कम थे,कि वो जब पहली बार,गर्भवती हुई तो अल्ट्रासाउंड में बेटी की जानकारी सामने आते ही,ससुराल वालों ने ज़बरदस्ती उसका अबॉर्शन करवा दिया।उसे हर रोज़,शारीरिक और मानसिक रूप से प्रताड़ित किया गया।मायके वालों ने कहा,"बेटी एडजस्ट कर लो,इतने बड़े घर परिवार के लिए,इतना तो एडजस्ट करना पड़ेगा ही.."अपराजिता को अब न ससुराल में शांति थी,न ही मायके वालों ने उसका साथ दिया।एक साल बाद,वो दुबारा गर्भवती हुई,फिर वही धमकी: “अगर फिर बेटी निकली तो जान से मार देंगे।”और अल्ट्रासाउंड में बेटी ही निकली,अपराजिता के शरीर में पिछले एक वर्ष में लगातार कई हार्मोंस में बदलाव हुए,उथल–पुथल हुई,जैसे कि,"प्रोजेस्टेरॉन",गर्भावस्था को बनाए रखता है,इसकी कमी होने से,उसे डिप्रेशन और मूड स्विंग्स होने लगे।"ऑक्सीटोसिन",जिसे लव–हार्मोन कहा जाता है,जो मां और शिशु के बीच,एक अनकहा,संबंध बनाता है,जब अपराजिता का गर्भपात हुआ,तो इसका प्रवाह अचानक रुक गया,जिससे वो भावनात्मक रूप से पूरी तरह,टूट गई।

इस स्थिति में,उसके शरीर में,"कॉर्टिसोल"अधिक हो गया,जिससे उसे एंग्जाइटी हुई,पैनिक अटैक्स आए,पोस्ट ट्रॉमेटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर(PTSD) हो गया,इसका ये प्रभाव हुआ कि,उसे नींद आना बंद हो गया,उसकी कमज़ोर पड़ी देह में,ऊर्जा की और कमी हो गई,वो "क्लिनिकल–डिप्रेशन" के स्टेज पर पहुंच गई और उसके मन में,अनियंत्रित भय रहने लगा।एक महिला जिसने एक बार "कन्या के कारण" जबरन गर्भपात झेला हो,वो अपने अस्तित्व को निष्क्रिय और अपमानित महसूस करती है।मानसिक आघात इतना गहरा होता है कि,वो आत्महत्या की ओर अग्रसर हो सकती है,अपराजिता के साथ भी,ये ही हुआ,वो लगातार,अपराधबोध में जीने लगी,“मैं बेटी को नहीं बचा पाई”,“मैं अपनी कोख की रक्षा नहीं कर पाई…”,वो पूरी तरह,स्वयं को असहाय अनुभव करने लगी,“मेरे शरीर पर भी मेरा अधिकार नहीं…”

जब कोई स्त्री बार-बार अनचाहे गर्भपात,अपमान और भय का शिकार होती है,तो उसका आभामंडल,धूसर(Grey) हो जाता है,जिससे आशा का लोप होता है।उसके आभामंडल में,काली दरारें पड़ती हैं,जिससे,आत्मिक रक्षा कमजोर होती है।उसका स्वाधिष्ठान चक्र (Reproductive),सबसे अधिक प्रभावित होता है।गर्भपात में मारे गए,भ्रूणों की आत्माएं,जो कभी–कभी अपनी मां से जुड़ी रहती हैं,वो भी इस समय,बहुत प्रभावी हो जाती हैं,वो धीरे–धीरे उसे खोखला करने लगती हैं,और फिर प्रेत को आभामंडल में छिद्र आसानी से मिल जाता है,जब ऐसा होता है,तो उसे काली छायाएं दिखने लगती हैं,गले में दबाव महसूस होने लगता है,नींद में घुटन होने लगती है।ये वही अवस्था है,जिसे “प्रेत प्रेरणा” कहा गया है,जो आत्महत्या के मार्ग को “मुक्ति” कहकर प्रस्तुत करती है।अपराजिता के साथ,ये सारी चीज़ें एक वर्ष से लगातार घट रहीं थीं,उसका मन,भय और अपमान से इतना भर चुका था कि,उसने रिपोर्ट देखते ही,बिना कुछ सोचे–समझे नए पुल से यमुना जी में छलांग लगा दी।

2016–2020: इस अवधि में,वैवाहिक समस्याओं के कारण,21,750 महिलाओं ने आत्महत्या करी।

2020: तलाक के कारण,264 महिलाओं ने आत्महत्या की।  

2022: 30,771 विवाहित महिलाओं ने आत्महत्या करी।

इन सब केस से इतर,वर्ष 2018 में,दिल्ली के बुराड़ी में एक ही परिवार के 11 लोगों की रहस्यमयी "सामूहिक आत्महत्या",आज भी आधुनिक मनोविज्ञान के लिए,एक पहेली है,परंतु यदि हम इस घटना को,धर्मशास्त्रों की दृष्टि से देखें,तो यह स्पष्ट होता है कि,ये घटना,किसी अदृश्य सत्ता के,वशीकरण की परिणति थी।

इस परिवार के मुखिया,ललित पर “पिता की आत्मा” का वशीकरण बताया गया,जो उसे निर्देश देती थी:कठोर व्रत, विशेष आसन,ध्यान की विधियां,
और अंततः “मोक्ष प्राप्ति हेतु” आत्मसमर्पण।

बुराड़ी जैसे कई और सामूहिक आत्महत्याएं के केस हुए हैं:

तमिलनाडु: 22 मामले, 45 मौतें
आंध्र प्रदेश: 19 मामले, 46 मौतें
मध्य प्रदेश: 18 मामले, 39 मौतें
राजस्थान: 15 मामले, 36 मौतें

इसके अलावा,53 प्रमुख शहरों में से 10 शहरों में सामूहिक आत्महत्याओं के 26 मामले दर्ज किए गए,जिनमें 63 लोगों ने आत्महत्या की।

यह सब गरुड़ पुराण और देवी भागवत की उन कथाओं की याद दिलाता है,जहां प्रेत आत्माएं,पूर्वज या देवस्वरूप(कुलदेवता,या जिस देव की तुम आराधना कर रहे हो)बनकर,प्रकट होती हैं और मनुष्य को भ्रमित करती हैं। 

श्रीमद्भागवत में वर्णित “प्रेतबाधित राजा” की कथा में भी, यही होता है,जहां एक प्रेत आत्मा,राजपुरोहित बनकर राज्य को अनिष्ट की ओर धकेलता है।

कई और घटनाएं भी देश भर में हुई हैं,जहां एक परिवार ने “पूर्वजों के आदेश” पर आत्महत्या की,जो इस सिद्धांत को और पुष्ट करती है।मृतकों के पास से मिले हस्तलिखित संदेशों में,‘पूर्वजों द्वारा स्वर्ग का निमंत्रण’ और ‘पुनर्जन्म में उच्च कुल में जन्म’ का उल्लेख था।ये वही तकनीक है,जो प्रेत आत्माएं अपनाती हैं: वे मनुष्य की श्रद्धा,मोह और भ्रम का उपयोग करती हैं।

कैसे करते हैं प्रेत यह मायावी षड्यंत्र?

१. भ्रमित रूप धारण:
गरुड़ पुराण और ब्रह्मवैवर्त पुराण में वर्णन है कि,प्रेत आत्माएं देवताओं या पूर्वजों का रूप धारण कर सकती हैं।वे स्वप्न, ध्यान या साक्षात्कार के रूप में,प्रकट होकर,व्यक्ति को यह विश्वास दिलाती हैं,कि वह किसी "दिव्य सत्ता" से,
संवाद कर रहा है।

२. मिथ्या वचन:
“तुम्हें स्वर्ग मिलेगा”, “तुम्हारा पुनर्जन्म राजघराने में होगा”, “एक बार यह कृत्य करो, फिर दुख समाप्त”,ये वाक्य प्रेतों की शास्त्रीय भाषा है।वामाचार में तो यह भी वर्णन मिलता है कि,कैसे साधना में,विघ्न डालने हेतु,पिशाच रूपी शक्तियां, साधक को ‘सिद्धि’ का झूठा लालच देती हैं।

३. स्थानिक प्रेतबाधा:
बुराड़ी और अन्य घटनाओं में,ये देखा गया कि,घर के भीतर ही कोई विशेष स्थान या पेड़ आदि पूजा का केंद्र बन गए थे,ये “स्थूल प्रेतवृति” का संकेत है।

स्कंद–पुराण बताता है कि,जिस स्थान पर कोई अत्याचार या अपूर्ण क्रिया हुई हो,वहां प्रेत–गण वास करते हैं और वहां पूजा-पाठ आरंभ हो जाए,तो वे उसी माध्यम से,
नियंत्रण शुरू कर देते हैं।

अच्छा,ये प्रेत ऐसा करते क्यों हैं?
क्योंकि,वे स्वयं अधूरे हैं,पीड़ित हैं,न जाने कबसे,प्रेत योनि में कष्ट भोग रहे हैं,और इस कारण वो और क्रोधित,और ईर्ष्यालु,और विध्वंसकारी हो गए हैं।वो चाहते हैं,कि कोई और भी उनकी पीड़ा में सम्मिलित हो,जो वो झेल रहे हैं,वो भी उसकी अनुभूति करें,और साथ ही साथ,वो इन जीवों की प्रेत बनी आत्माओं को प्रताड़ित करें,एक गुलाम बना कर,
ऐसे समझ लो कि उन्हें जीवित संसार से तीव्र ईर्ष्या होती है,वो जानते हैं कि आत्महत्या करने वाला भी,उन्हीं की तरह प्रेत बनता है,बस इसलिए वो जीव को वही कष्ट देने हेतु,आत्महत्या के लिए प्रेरित करते हैं,जैसे जब कोई छात्र किसी मेडिकल या इंजीनियरिंग कॉलेज में फर्स्ट इयर में एडमिशन लेता है,और उसके साथ बहुत बुरी रैगिंग होती है,और रैगिंग करने वाले सीनियर,वही होते हैं,जिनके साथ,पूर्व में वैसी ही रैगिंग हुई थी,तो वो उसका दोहराव दूसरे नए छात्रों पर कर,एक डार्क प्लेजर की अनुभूति करते हैं,स्वयं को,"पॉवरफुल" फील करते हैं,बिलकुल वैसे ही प्रेतों का स्वभाव भी होता है,वो पीड़ित हैं,तो दूसरों को भी वही यातनाएं देते हैं,और हर बार,उनकी क्रूरता का स्तर बढ़ता जाता है,जो जितना पुराना प्रेत,उसकी उतनी शक्ति,उसकी उतनी अधिक क्रूरता।

अच्छा ये आभामंडल(AURA) क्या है?और ये कम कैसे होता है?कैसे इसके कम होने से हम किसी प्रेत का,किसी नेगेटिव एंटिटी का,आसान टारगेट बन जाते हैं?

बंधु,आभामंडल(AURA) एक सूक्ष्म ऊर्जा-क्षेत्र है,जो हर जीवित प्राणी के शरीर के चारों ओर मौजूद होता है।ये शरीर, मन और आत्मा की स्थिति को दर्शाता है।आयुर्वेद,योग और वेदांत के अनुसार,आभामंडल को सात सूक्ष्म स्तरों या परतों (layers) में विभाजित किया गया है।ये सात स्तर,हमारे शारीरिक,मानसिक,भावनात्मक और आध्यात्मिक अस्तित्व का प्रतिबिंब होते हैं।प्रत्येक स्तर,एक विशिष्ट प्रकार की ऊर्जा,चेतना और क्रिया से संबंधित होता है।

१. स्थूल शरीर स्तर (Physical Body Layer) - ये शरीर से सबसे निकटतम होता है।जीवनीय ऊर्जा (प्राण) यहीं बहती है।इसे "प्राणमय कोश" भी कहा जाता है।

२.भावनात्मक स्तर (Emotional Body Layer)- भावनाओं और अनुभवों को समेटे रहता है।Aura की रंगीन परत इसी में होती है।इससे ही व्यक्ति की "वाइब्स" महसूस होती हैं।

३. मानसिक स्तर (Mental Body Layer)- विचार,तर्क,निर्णय,और स्मृति की ऊर्जा।चिंतन और कल्पना यहीं से प्रसारित होते हैं।

४. हृदय स्तर (Astral Body Layer)- ये भावनात्मक और मानसिक शरीर का पुल है।प्रेम,सहानुभूति और संबंध यहीं पनपते हैं।इसे ही योग में "हृदयचक्र" से जोड़ा जाता है।

५. आध्यात्मिक स्तर (Etheric Template Layer)- ये आत्मा की छाया (Template) होता है।व्यक्ति की नियति, संस्कार और पूर्व जन्म के कर्म यहीं निहित होते हैं।

६.बौद्धिक-आध्यात्मिक स्तर (Celestial Body)- ध्यान, दिव्यता,उच्च चेतना और आत्मदर्शन का स्रोत।यहां आत्मा परमात्मा से संवाद करती है।

७. अति-आध्यात्मिक स्तर (Ketheric Template) Divine Body -आत्मा और ब्रह्म का एकत्व।परम शक्ति (Consciousness) से सीधा जुड़ाव।वेदांत में यही "अहम् ब्रह्मास्मि" की स्थिति है।

पहले तीन स्तर (१-३): स्थूल और सूक्ष्म शरीर से जुड़े हैं (शरीर,मन,भावना)

मध्य का चौथा स्तर(४): संबंधों और करुणा का सेतु है

अंतिम तीन स्तर (५-७): आध्यात्मिक प्रगति और आत्म-साक्षात्कार से संबंधित हैं

आभामंडल कमज़ोर होने के मुख्य कारण हैं,नकारात्मक विचार और भावनाएं,क्रोध,ईर्ष्या,चिंता,अवसाद,ये भावनाएं,ऊर्जा को नीचे खींचती हैं।लगातार नकारात्मक सोच से,आभामंडल की कम्पन-तरंगें (vibrations) धीमी और मलिन हो जाती हैं।शराब,सिगरेट,ड्रग्स,अत्यधिक प्रोसेस्ड फूड,आभामंडल को दूषित कर देते हैं।इससे आभामंडल की रक्षा-दीवार (protective shield) कमज़ोर हो जाती है।अत्यधिक डिजिटल स्क्रीन टाइम,फिर वो चाहे मोबाइल हो,वीडियो गेम हो,या अश्लीलता या हिंसक कंटेंट से जुड़ाव हो,ये सब,मस्तिष्क की ऊर्जा-संवेदना को कुंद करता है।इलेक्ट्रोमैग्नेटिक रेडिएशन (EMR) भी आभामंडल को असंतुलित करता है।नींद की कमी और अनियमित दिनचर्या भी,आभामंडल को प्रभावित करती है,6–8 घंटे की गहरी नींद न होना,शरीर की ऊर्जा-भरपाई रोक देता है।रात्रि जागरण,(विशेषकर रात 12 से 3 बजे तक का समय)आभामंडल को,सबसे अधिक प्रभावित करता है।जिन स्थानों में कलह,व्यभिचार या मृत्यु की घटनाएं,अधिक होती हैं,वहां आभामंडल क्षीण होता है।प्रेत-ग्रस्त स्थानों में रहने से,आभामंडल पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है,इसलिए कहा गया है,कि आमजनों को,विशेषकर बच्चों और युवक–युवतियों को अकारण,श्मशान घाटों पर विचरण या समय बिताना नहीं चाहिए,जब किसी अपने की मृत्यु

,आभामंडल पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है,इसलिए कहा गया है,कि
आमजनों को,विशेषकर बच्चों और युवक–युवतियों को अकारण,
श्मशान घाटों पर विचरण या समय बिताना नहीं चाहिए,जब किसी
अपने की मृत्यु हो,तभीजाना चाहिए और शुद्धि करके ही घर लौटना
चाहिए,पर अब तो,श्मशान घाटों को भी रील और सेल्फियों का स्पॉट
बना दिया गया है,इस कारण,प्रेत बाधाएं भी अधिक हो चली हैं,अघोर
तंत्र के साधकों के लिए अलग नियम हैं,श्मशान के देवी–देवता उनकी
रक्षा करते हैं,क्योंकि वो वहां साधना के उपलक्ष्य हेतु आते हैं,साधना
करने से पूर्व वो आज्ञा मांगते हैं,शमशान में बैठे इन रक्षक देवी देवताओं
से,बाकी जो भी,मौज–मस्ती,गांजा फूंकते हुए,रील बनाने आते हैं,वो
अपनी जीवनशक्ति का अपव्यय,आभामंडल की चमक और सुरक्षा को
क्षीण करते हैं,नाना प्रकार के रोगों और दिक्कतों से वो कुछ वर्ष बाद,
घिर जाते हैं और उन्हें पता भी नहीं चलता,ये किस कारण उनके साथ
हो रहा है,कौनसा प्रेत,शमशान की भूमि से,उनके साथ,चिपट गया है।

आभामंडल(AURA),एक अदृश्य कवच है,जो हमें न केवल रोगों से,
अपितु,आत्मघाती विचारों और प्रेत प्रभावों से भी बचाता है।इसका
ध्यान रखना,हमारी मानसिक,भावनात्मक और आध्यात्मिक रक्षा के
लिए अति आवश्यक है।

बंधु,ये जान लो,आत्महत्या...एक देह की नहीं,अपितु एक "अवसर" की
हत्या है,एक अवसर,जो तुम्हें न जाने,कितनी योनियों में समय देने के
पश्चात,प्राप्त हुआ,और तुम हो कि,इस अवसर को ऐसे ही,गंवा देना
चाहते हो,बिना ये समझे कि,ये आत्मघाती निर्णय,तुम्हारा स्वयं का न
होकर,किसी ऊर्जा द्वारा प्रभावित होने पर लिया गया निर्णय है,और तुम
हो कि,इस भ्रम में हो कि,तुम स्वयं ये निर्णय ले रहे हो,और तुम्हारे
हिसाब से,ये ही सबसे उचित निर्णय है,तुम बस औरों की भांति,उसी
जाल में फंस रहे हो,जो तुम्हें इस जन्म के पश्चात,बस कष्ट ही कष्ट देगा,
और उस कष्ट के समक्ष,जीवन में इस समय मिल रहा,कष्ट,"नगण्य"
लगेगा।

तुम्हें लग रहा होगा,कि मैं ये सब बातें,इसलिए कह रहा हूं,कि मेरे जीवन
में,सबकुछ सही है,और मैं दूसरों को लंबा–लंबा ज्ञान बांटने और
कहानियां सुनाने आ गया हूं,तो सुनो बंधु,मैं वहां था,जहां तुम अभी हो,
और हां अभी भी मैं टूटा हुआ हूं,बहुत कुछ खोया है,और खोने की कगार
पर हूं,सबकुछ शून्य से,पुनः आरंभ करना पड़ेगा और वो आसान नहीं
होता,पर मैंने स्वयं को समेटना सीख लिया है,स्वीकार लिया है कि,ये
जीवन,ये जन्म भी पूर्व जन्मों की भांति,संघर्षमय होगा,स्वीकार लिया है
कि,कई लोग आएंगे,कई जाएंगे,परिवर्तन को स्वीकार लिया है,परिवर्तन
है तो मैं गतिमान हूं,एक तालाब की भांति रुका हुआ नहीं हूं,ये स्वीकार
लिया है,स्वीकार लिया है कि,मुझे पग–पग पर,ठोकरें भी मिलेंगी,
तिरस्कार भी मिलेगा,कर्म फल सिद्धांत से मैं भी सबकी भांति बंधा हूं,
पर मैं आगे बढ़ता रहूंगा,क्योंकि आगे बढ़ना,मेरी प्रवृति है,हर जन्म में
रही है,परिवर्तन को स्वीकार करता हुआ,इतिहास से सीख लेते हुए,आगे
बढ़ना,मेरी प्रवृति है,ये सारा संघर्ष,ये सारी ठोकरें,मुझे कुछ सिखाने के
लिए मिली हैं,और जो भी मैं सीख रहा हूं एक विद्यार्थी की भांति,वो मैं
तुमको सिखाऊंगा,फ्री ऑफ कॉस्ट,कोई हिडेन एजेंडा नहीं,कोई स्वार्थ
नहीं,मुझे जो आदेश मिला है,बस उसी की पूर्ति कर रहा हूं,समझ लो,
जैसे महाकुंभ के दौरान,प्रभु प्रेरणा से मेरी इस देह ने निःशुल्क सेवा दी
थी,बस ये भी एक सेवा ही है,मेरे इस जन्म का तुम सबके प्रति एक
कर्तव्य,जो कार्य अब तक मेरी इस देह ने पर्सनल काउंसलिंग करके दी
थी,और आज वही सब इस लेख के माध्यम से समझाने का प्रयास कर
रहा हूं,हां ये लंबा लेख है,जैसे लिखने में मुझे समय लगा,वैसे पढ़ने में
तुम्हें भी समय लगेगा,आज एकादशी के दिन,इस लेख की पूर्ति कर रहा
हूं,पालनकर्ता श्री हरि विष्णु चाहेंगे और तुम्हारे प्रारब्ध में समझना होगा,
तो तुम्हें ये बातें,अवश्य समझ आएंगी,नहीं तो जो हरि इच्छा...🙏🏻

हां तो सुनो बंधु,ये आत्महत्या करने के विचारों ने मुझे भी पूरी तरह
जकड़ लिया था,वर्ष 2007 में,पर प्रेत सफल नहीं हुआ,कई उद्देशों की
पूर्ति करनी थी मुझे शायद,इस जन्म में।मेरी मां की प्रार्थनाएं थीं,प्रभु की
कृपा थी,और पूर्व जन्मों का प्रारब्ध भी,तभी मैं उन नेगेटिव ऊर्जाओं के
वश से बाहर निकल पाया,नहीं तो आज मैं यहां,ये लेख तुम्हारे लिए,नहीं
लिख रहा होता।प्रेत बन,तुम में से किसी को,आत्महत्या के लिए उकसा
रहा होता,या बस किसी शक्तिशाली प्रेत द्वारा प्रताड़ित हो रहा होता,इस
जाल में फंसने के लिए स्वयं को कोस रहा होता,और तुमसे ईर्ष्या कर,
जल रहा होता।

ये लेख तुम्हारे लिए ही है,तुम जो कोई भी हो,तुम्हारी क्या आयु है,तुम
युवा हो,अधेड़ हो,स्त्री हो,पुरुष हो,तुम जो भी हो,ये स्मरण रखो,कि जब
तुम इसे पढ़ो,तो जान लो,कोई ऐसी "सकारात्मक शक्ति" है,जो तुम्हें

ब्राह्मण विरोध

उस बंदे के ब्राह्मण विरोध को उसकी व्यक्तिगत राय के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। पिछले कुछ समय से उस देश के विश्वविद्यालयों में ब्राह्मण विरोधी शोध लगातार सांस्थानिक रूप से प्रोत्साहित की जाती रही है। हावर्ड विश्वविद्यालय तो इसके लिए कुख्यात हो चुका है। इसके साउथ एशिया संस्थान में यह काम धड़ल्ले से किया जा रहा है और 2023 से जाति-विरोध को एक स्थायी नीति के रूप में घोषित कर दिया गया है और इस नाम को ब्राह्मणों को बदनाम करने का euphemism कहा जा सकता है। अजंता सुब्रमण्यम The Caste of Merit: Engineering Education in India (2019) के नाम से इसी विश्वविद्यालय में अपनी शोध की थीं जिसमें वे कहती हैं कि IIT जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में मेरिट के नाम पर ब्राह्मण विशेषाधिकार और संप्रभुत्व चलते हैं। सूरज येंग्दे इसी विश्वविद्यालय से शोध कर यह कहती हैं कि अमेरिका में भी जाति है और वह ब्राह्मिनिकल प्रभावों के चलते है। हार्वर्ड विश्वविद्यालय 1636 में प्यूरिटन कांग्रीगेशनलिस्ट द्वारा मैसाचुसेट्स खाड़ी के पुरोहितों को प्रशिक्षित करने के लिए स्थापित किया गया था। इसका सिद्धांत वाक्य था : Veritas Christo et Ecclesiae ("Truth for Christ and the Church"). सत्य को यह सत्य की तरह नहीं देखता। इसका सत्य क्राइस्ट और चर्च के लिए है। 

यह पैटर्न कि नाम जाति-विरोध का दो और खलनायक ब्राह्मणों को बनाओ कमोबेश सभी अमेरिकी विश्वविद्यालयों ने अपना लिया है। केलीफोर्निया विश्वविद्यालय ने 2021 से जाति पर चर्चा को अपनी विभेदाचार विरोध की प्रोटेस्टेंट कैटेगरी में डाल दिया है। श्वेता मजुमदार अदुर और अंजना नारायणन अमेरिका के भारतीय डायस्पोरा में ब्राह्मण सुपीरियारिटी को देखती हैं। ब्रांडीज विश्वविद्यालय ने 2019 से। अरीजोना राज्य विश्वविद्यालय ब्राह्मण विशेषाधिकारों पर अध्ययन कराता है। इंदुलता प्रसाद मैक्स वेबर की ब्राह्मणों पर की गई टीप को लेकर inherited privileges पर काम इसी विश्वविद्यालय से करती हैं। मेरीलैंड विश्वविद्यालय ने ब्राह्मण सुपीरियरिटी पर काम कराया है। सोनल्दे देसाई ने इसी विश्वविद्यालय से शोध की थी। मेसाचुसेट्स विश्वविद्यालय ब्राह्मण प्रभावों पर। भरत राठौर ने यहाँ से अमेरिकी कैंपसों में ब्राह्मण विरोधी एक्टीविज्म पर अध्ययन किया है। 

विश्वविद्यालय विदेशी हैं पर यहाँ बुद्धिजीवी दिखने के शौक में ब्राह्मण विरोधी शोध भारतीयों के कंधे पर रखकर हो रही है। 

दुनिया में कहीं भी किसी अन्य समूह को ऐसे निशाने पर नहीं लिया जा रहा। केवल यही नहीं है कि भारत में हाल के वर्षों में ब्राह्मणों को जातीय घृणा का शिकार बनाया जा रहा है बल्कि यह है कि ठीक उसी समय अमेरिकी एकेडेमिक्स और स्कॉलरशिप भी यह काम बौद्धिक तरह से कर रही है। 

कभी इस कदमताल को ध्यान से दीजिए। यह संयोग भर नहीं है। उससे कुछ अधिक है।

उसकी तुलना में भारत के विश्वविद्यालयों को देखिए। क्या उन्होंने अमेरिका की व्हाइट सुप्रीमेसी पर, लगातार छोड़िये, कभी एक बार भी शोध कराये? कभी उन्होंने अमेरिका के तथाकथित फर्स्ट नेशन पर शोध करवाये? 

तब आप काहे के विश्वविद्यालय कहलाते हो जब आपके पास कोई विश्व-दृष्टि ही नहीं है। 

और यह मानकर नहीं चलिये कि यह सिर्फ ब्राह्मणों पर हमला है, हमें क्या करना। भूल गए कि अभी दो बरस पहले Dismantling Hindutva के नाम से 49 विश्वविद्यालयों ने एक साथ आयोजन किया था। इसमें आगे बढ़कर भूमिका निभाने वाला प्रिंसटन विश्वविद्यालय प्रेस्बिटेरियन संप्रदाय द्वारा स्थापित किया गया था। येल विश्वविद्यालय प्यूरिटनों के द्वारा, कोलंबिया विश्वविद्यालय एंग्लिकन के द्वारा, ब्राउन विश्वविद्यालय बैप्टिस्ट के द्वारा, डर्टमाउथ काल्विनिस्ट के द्वारा, जार्जटाउन व बोस्टन जेसुइट्स के द्वारा स्थापित हुए। ब्राह्मणों की जड़ों को दिखाने वाले ये विश्वविद्यालय कभी इस पर भी शोध कराते कि खुद इनकी धार्मिक/ सांप्रदायिक जड़ें इनके शोध और शिक्षण को प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष रूप से कितना प्रभावित करती रही हैं। 

पिछले एक दशक से अमेरिकी बौखलाहट बहुत बढ़ गयी है। और वह सिर्फ अध्ययन का प्रायोजन नहीं है, भारतीय समाज की दरारों को चौड़ा करने का प्रयास है। मिशनरी अपने लक्ष्य में ब्राह्मणों को सबसे बड़ी बाधा के रूप में दो सौ वर्षों से अधिक समय से चीन्हते आये हैं। 

हमारे विश्वविद्यालय उनके तथाकथित शोध को फाश करने वाले शोध नहीं कराते, बल्कि वे उन्हें प्रतिध्वनित करते हैं।

पहले ब्राह्मिनिज्म का विरोध किया जाता था। तब भी वह एक पर्दा भर था अन्यथा निशाने पर तब भी ब्राह्मण थे। इन दिनों तो वाद का वह पर्दा भी जरूरी नहीं रहा। अब तो सीधे ब्राह्मण निशाने पर हैं। 

उस सलाहकार का बयान इसका प्रमाण है।

पितृ तर्पण विधानम्

*#पितृ_तर्पण_विधानम्*

अलग-अलग वेदकी शाखा वालोंके लिए अलग-अलग प्रकारसे तर्पणका विधान शास्त्रोंमें कहा गया है।

कुछ शाखा वालोंके लिए दाहिना हाथ मुख्य है, बाएं हाथसे केवल स्पर्श करके तर्पण करनेका भी विधान है-

*सव्यान्वारब्धदक्षिणेन वा अंजलिना वा तारतम्य।*
                     (#धर्मसिन्धौ) 

ऋग्वेदियोंको एक हाथसे ही तर्पण करना चाहिए, अन्य शाखावालोंको दोनों हाथोंसे तर्पण करना चाहिए तथा
#स्वधानमस्तर्पयामि ऐसा बोलकर तर्पण करना चाहिए-

*स्वधा नमस्तर्पयामीति बह्वृचैर्दक्षिणहस्तेनान्यदंजलिना त्रिस्त्रिस्तर्पयेत्।।*
                      (#धर्मसिन्धौ) 

माध्यन्दिन, कांण्व एवं तैत्तिरीय  शाखा वालोंके लिए दोनों हाथों की अंजलिसे तर्पणका विधान है।

 तथा इनके लिए तर्पण ब्रह्मयज्ञाङ्ग  नहीं है, अर्थात् ब्रह्मयज्ञसे पहले अथवा बादमें भी हो सकता है।

अन्य शाखा वालोंके लिए तर्पण ब्रह्मयज्ञांग है-

*अथतर्पणं- तच्च तैत्तरीयाणां ब्रह्मयज्ञाङ्गं न भवति तेन ब्रह्मयज्ञोत्तरं व्यवहितकालेपि ब्रह्मयज्ञात्प्रागपि भवति एवं काण्वमाध्यन्दिनानामपि।।*              
                    (#धर्मसिन्धौ) 

*#तर्पणविधि*

(देव, ऋषि और पितृ सम्पूर्ण तर्पण विधि)

सर्वप्रथम पूर्व दिशाकी और मुँह करके, दाहिना घुटना जमीन पर लगाकर,सव्य होकर(जनेऊ व अंगोछेको बांया कंधे पर रखें) गायत्री मंत्रसे शिखा बांध कर, तिलक लगाकर, दोनों हाथोंकी अनामिका अँगुलीमें कुशोंका  पवित्री (पैंती) धारण करें । 

फिर हाथमें त्रिकुशा ,जौ, अक्षत और जल लेकर संकल्प पढें—

*ॐ विष्णवे नम: ३*
 
*हरि: ॐ तत्सदद्यैतस्य श्रीब्रह्मणो द्वितीयपरार्धे श्रीश्वेतवाराहकल्पे वैवस्वतमन्वन्तरे अष्टाविंशतितमे कलियुगे कलिप्रथमचरणे जम्बूद्वीपे भरतखण्डे भारतवर्षे आर्यावर्तैकदेशे अमुकसंवत्सरे अमुकमासे अमुकपक्षे अमुकतिथौ अमुकवासरे अमुकगोत्रोत्पन्न: अमुकशर्मा (वर्मा, गुप्तो) ऽहं श्रीपरमेश्वरप्रीत्यर्थं देवर्षिमनुष्यपितृतर्पणं करिष्ये।* 

तीनकुशको ग्रहणकर निम्नमंत्रको तीन बार कहें- 

*ॐ देवताभ्यः पितृभ्यश्च महायोगिभ्य एव च।* 
*नमः स्वाहायै स्वधायै नित्यमेव नमोनमः।।* 

तदनन्तर एक ताँवे अथवा चाँदीके पात्रमें श्वेत चन्दन, जौ, तिल, चावल, सुगन्धित पुष्प और तुलसीदल रखें, फिर उस पात्रमें तर्पणके लिये जल भरदें। 

फिर उसमें रखे हुए त्रिकुशोंको तुलसी सहित सम्पुटाकार दायें हाथमें लेकर, बायें हाथसे उसे ढँकलें और  देवताओंका आवाहन करें ।

#आवाहनमंत्र 

*ॐ विश्वेदेवास ऽआगत श्रृणुता म ऽइम@ हवम्। एदं वर्हिर्निषीदत॥*

‘हे विश्वेदेवगण  ! आप लोग यहाँ पदार्पण करें, हमारे प्रेमपूर्वक किये हुए इस आवाहनको सुनें, और इस कुशके आसन पर विराजें ।

इसप्रकार आवाहन कर कुशका आसन दें, और त्रिकुशा द्वारा दायें हाथकी समस्त अङ्गुलियोंके अग्रभाग अर्थात् देवतीर्थसे ब्रह्मादि देवताओंके लिये पूर्वोक्त पात्रमें से एक-एक अञ्जलि  चावल-मिश्रित जल लेकर दूसरे पात्रमें गिरावें, और निम्नाङ्कित रूपसे उन-उन देवताओंके नाममन्त्र पढ़ते रहें-

*1 #देवतर्पण*-

ॐ ब्रह्मास्तृप्यताम् ।

ॐ विष्णुस्तृप्यताम् ।

ॐ रुद्रस्तृप्यताम् ।

ॐ प्रजापतिस्तृप्यताम् ।

ॐ देवास्तृप्यन्ताम् ।

ॐ छन्दांसि तृप्यन्ताम् ।

ॐ वेदास्तृप्यन्ताम् ।

ॐ ऋषयस्तृप्यन्ताम् ।

ॐ पुराणाचार्यास्तृप्यन्ताम् ।

ॐ गन्धर्वास्तृप्यन्ताम् ।

ॐ इतराचार्यास्तृप्यन्ताम् ।

ॐ संवत्सरसावयवस्तृप्यताम् ।

ॐ देव्यस्तृप्यन्ताम् ।

ॐ अप्सरसस्तृप्यन्ताम् ।

ॐ देवानुगास्तृप्यन्ताम् ।

ॐ नागास्तृप्यन्ताम् ।

ॐ सागरास्तृप्यन्ताम् ।

ॐ पर्वतास्तृप्यन्ताम् ।

ॐ सरितस्तृप्यन्ताम् ।

ॐ मनुष्यास्तृप्यन्ताम् ।

ॐ यक्षास्तृप्यन्ताम् ।

ॐ रक्षांसि तृप्यन्ताम् ।

ॐ पिशाचास्तृप्यन्ताम् ।

ॐ सुपर्णास्तृप्यन्ताम् ।

ॐ भूतानि तृप्यन्ताम् ।

ॐ पशवस्तृप्यन्ताम् ।

ॐ वनस्पतयस्तृप्यन्ताम् ।

ॐ ओषधयस्तृप्यन्ताम् ।

ॐ भूतग्रामश्चतुर्विधस्तृप्यताम् ।

*2 #ऋषितर्पण*-

इसीप्रकार (देवधर्मसे ही)  निम्नाङ्कित मन्त्रवाक्योंसे मरीचि आदि ऋषियोंको भी एक-एक अञ्जलि जल दें—

ॐ मरीचिस्तृप्यताम् ।

ॐ अत्रिस्तृप्यताम् ।

ॐ अङ्गिरास्तृप्यताम् ।

ॐ पुलस्त्यस्तृप्यताम् ।

ॐ पुलहस्तृप्यताम् ।

ॐ क्रतुस्तृप्यताम् ।

ॐ वसिष्ठस्तृप्यताम् ।

ॐ प्रचेतास्तृप्यताम् ।

ॐ भृगुस्तृप्यताम् ।

ॐ नारदस्तृप्यताम् ॥

*3 #मनुष्यतर्पण*-

उत्तर दिशाकी ओर मुँह कर, जनेऊ व गमछेको मालाकी भाँति गलेमें धारण कर, सीधे बैठकर  निम्नाङ्कित मन्त्रोंको दो-दो बार पढते हुए

दिव्य मनुष्योंके लिये प्रत्येकको दो-दो अञ्जलि जौ सहित जल प्राजापत्यतीर्थ (कनिष्ठिकाके मूला-भाग) से अर्पण करें—

ॐ सनकस्तृप्यताम् -2

ॐ सनन्दनस्तृप्यताम् –2

ॐ सनातनस्तृप्यताम् -2

ॐ कपिलस्तृप्यताम् -2

ॐ आसुरिस्तृप्यताम् -2

ॐ वोढुस्तृप्यताम् -2

ॐ पञ्चशिखस्तृप्यताम् -2

*4 #पितृतर्पण*-

कुशोंके मूल ,और अग्रभागको दक्षिणकी ओर करके  

अंगूठे और तर्जनीके बीचमें रखे, स्वयं दक्षिणकी ओर मुँह करे, बायें घुटने को जमीन पर लगाकर अपसव्यभाव (जनेऊको दायें कंधेपर रखकर बाँये हाथके नीचे ले जायें ) पात्रस्थ जलमें काला तिल मिलाकर पितृतीर्थसे (अंगुठा और तर्जनी के मध्यभाग से ) दिव्य पितरोंके लिये निम्नाङ्कित मन्त्र-वाक्योंको पढते हुए तीन-तीन अञ्जलि जल दें—

*ॐ कव्यवाडनलस्तृप्यताम् इदं सतिलं जलं (गङ्गाजलं वा) तस्मै स्वधा नम: – 3*

*ॐ सोमस्तृप्यताम् इदं सतिलं जलं (गङ्गाजलं वा) तस्मै स्वधा नम: – 3*

*ॐ यमस्तृप्यताम् इदं सतिलं जलं (गङ्गाजलं वा) तस्मै स्वधा नम: – 3*

*ॐ अर्यमा तृप्यताम् इदं सतिलं जलं (गङ्गाजलं वा) तस्मै स्वधा नम: – 3*

*ॐ अग्निष्वात्ता: पितरस्तृप्यन्ताम् इदं सतिलं जलं (गङ्गाजलं वा) तेभ्य: स्वधा नम: – 3*

*ॐ सोमपा: पितरस्तृप्यन्ताम् इदं सतिलं जलं (गङ्गाजलं वा) तेभ्य: स्वधा नम: – 3*

*ॐ बर्हिषद: पितरस्तृप्यन्ताम् इदं सतिलं जलं (गङ्गाजलं वा) तेभ्य: स्वधा नम: – 3*

*5 #यमतर्पण*-

इसी प्रकार निम्नलिखित मन्त्रोंको पढते हुए चौदह यमोंके लिये भी पितृतीर्थसे ही तीन-तीन अञ्जलि तिल सहित जल दें—

ॐ यमाय नम: – 3

ॐ धर्मराजाय नम: – 3

ॐ मृत्यवे नम: – 3

ॐ अन्तकाय नम: – 3

ॐ वैवस्वताय नमः – 3

ॐ कालाय नम: – 3

ॐ सर्वभूतक्षयाय नम: – 3

ॐ औदुम्बराय नम: – 3

ॐ दध्नाय नम: – 3

ॐ नीलाय नम: – 3

ॐ परमेष्ठिने नम: – 3

ॐ वृकोदराय नम: – 3

ॐ चित्राय नम: – 3

ॐ चित्रगुप्ताय नम: – 3

*#विशेष*-

*जिनके पिता जीवित हों, वे लोग यहीं तक तर्पण करें, आगे का तर्पण नही करें।*

 *जिनके पिता नहीं हैं वे लोग आगे का भी तर्पण करें, परन्तु यदि माता आदि जीवित हों तो उन उनको छोड़करके अन्योंका तर्पण करें।*

*6 #मनुष्यपितृतर्पण*-
   
इसके पश्चात् निम्नाङ्कित मन्त्रोंसे पितरोंका आवाहन करें-

*ॐ आगच्छन्तु मे पितर इमं ग्रहणन्तु जलाञ्जलिम्।।*

 हे पितरों! पधारिये तथा जलांजलि ग्रहण कीजिए। 

तदनन्तर अपने पितृगणोंका नाम-गोत्र आदि उच्चारण करते हुए प्रत्येकके लिये पूर्वोक्त विधिसे ही तीन-तीन अञ्जलि तिल-सहित जल इस प्रकार दें-

*अस्मत्पिता अमुकशर्मा  वसुरूपस्तृप्यतांम् इदं सतिलं जलं (गङ्गाजलं वा) तस्मै स्वधा नम: – 3*

*अस्मत्पितामह: (दादा) अमुकशर्मा रुद्ररूपस्तृप्यताम् इदं सतिलं जलं (गङ्गाजलं वा) तस्मै स्वधा नम: – 3*

*अस्मत्प्रपितामह: (परदादा) अमुकशर्मा आदित्यरूपस्तृप्यताम् इदं सतिलं जलं (गङ्गाजलं वा) तस्मै स्वधा नम: – 3*

*अस्मन्माता अमुकी देवी वसुरूपा तृप्यताम् इदं सतिलं जलं तस्यै स्वधा नम: – 3*

*अस्मत्पितामही (दादी) अमुकी देवी  रुद्ररूपा तृप्यताम् इदं सतिलं जलं तस्यै स्वधा नम: – 3*

*अस्मत्प्रपितामही परदादी अमुकी देवी आदित्यरूपा तृप्यताम् इदं सतिलं जल तस्यै स्वधा नम: – 3*

इसके बाद वेदमंत्रोंसे जलधारा दी जाती है।

 उसके बाद द्वितीय गोत्र तर्पण करें ,द्वितीय गोत्र तर्पण अपने पिता माता आदि की तरह ही होगा।

 जिसमें नाना, परनाना, वृद्धपरनाना, नानी , परनानी एवं वृद्धपरनानीको तीन-तीन अंजलि तिल मिश्रित जल से दें

इसके बाद नाम गोत्रका उच्चारण करते हुए अन्य संबंधी (जो लोग मृत हो गए हों) उनके लिए भी एक-एक अंजलि दी जाती है।

 इन्हें #एकोद्दिष्टगण कहते हैं जिसमें हैं- पत्नी, पुत्र, पुत्री, पिताके भाई, मामा, अपना भाई ,सौतेला भाई, बुआ, मौसी, बहन, सौतेली बहन, श्वशुर, गुरु, आचार्य पत्नी, शिष्य, मित्र, आप्तपुरुष आदि प्रिय जनका  तर्पण करें।

इसके बाद सव्य होकर पूर्वाभिमुख हो नीचे लिखे श्लोकों को पढते हुए जल गिरावे—

*देवासुरास्तथा यक्षा नागा गन्धर्वराक्षसा:।* 
*पिशाचा गुह्यका: सिद्धा: कूष्माण्डास्तरव: खगा:॥*

*जलेचरा भूमिचराः वाय्वाधाराश्च जन्तव:।*
*प्रीतिमेते प्रयान्त्वाशु मद्दत्तेनाम्बुनाखिला:॥*

*#अर्थ*- : ‘देवता, असुर , यक्ष, नाग, गन्धर्व, राक्षस, पिशाच, गुह्मक, सिद्ध, कूष्माण्ड, वृक्षवर्ग, पक्षी, जलचर जीव और वायु के आधार पर रहनेवाले जन्तु-ये सभी मेरे दिये हुए जल से भीघ्र तृप्त हों ।

पितृधर्मसे जलधारा गिराए-

*नरकेषु समस्तेपु यातनासु च ये स्थिता:।* *तेषामाप्ययनायैतद्दीयते सलिलं मया॥*

*येऽबान्धवा बान्धवा वा येऽन्यजन्मनि बान्धवा:।*
*ते सर्वे तृप्तिमायान्तु ये चास्मत्तोयकाङ्क्षिण:॥*

*ॐआब्रह्मस्तम्बपर्यन्तं देवषिंपितृमानवा:।*
*तृप्यन्तु पितर: सर्वे मातृमातामहादय:॥*

*अतीतकुलकोटीनां सप्तद्वीपनिवासिनाम्।*
*आ ब्रह्मभुवनाल्लोकादिदमस्तु तिलोदकम्॥*

*येऽबान्धवा बान्धवा वा येऽन्यजन्मनि बान्धवा:।*
*ते सर्वे तृप्तिमायान्तु मया दत्तेन वारिणा॥*

*#अर्थ*- :  जो समस्त नरकों तथा वहाँ की यातनाओं में पङेपडे दुरूख भोग रहे हैं, उनको पुष्ट तथा शान्त करने की इच्छा से मैं यह जल देता हूँ। 

जो मेरे बान्धव न रहे हों, जो इस जन्म में बान्धव रहे हों, अथवा किसी दूसरे जन्म में मेरे बान्धव रहे हों, वे सब तथा इनके अतिरिक्त भी जो मुम्कसे जल पाने की इच्छा रखते हों, वे भी मेरे दिये हुए जल से तृप्त हों ।

ब्रह्माजी से लेकर कीटों तक जितने जीव हैं, वे तथा देवता, ऋषि, पितर, मनुष्य और माता, नाना आदि पितृगण-ये सभी तृप्त हों।

 मेरे कुलकी बीती हुई करोडों पीढियोंमें उत्पन्न हुए जो-जो पितर ब्रह्मलोकपर्यन्त सात द्वीपोंके भीतर कहीं भी निवास करते हों, उनकी तृप्ति के लिये मेरा दिया हुआ यह तिलमिश्रित जल उन्हें प्राप्त हो। 

जो मेरे बान्धव न रहे हों, जो इस जन्ममें या किसी दूसरे जन्मोंमें मेरे बान्धव रहे हों, वे सभी मेरे दिये हुए जलसे तृप्त हो जायँ ।

*#वस्त्रनिष्पीडन*-
 तत्पश्चात् वस्त्र को चार आवृत्ति लपेटकर जल में डुबावे और बाहरले आकर निम्नाङ्कित मन्त्र : 

*ये के चास्मत्कुले जाता अपुत्रा गोत्रिणो मृता।*
*ते गृह्णन्तु मया दत्तं वस्त्रनिष्पीडनोदकम्।।*

 को पढते हुए अपसव्य होकर अपने बाएँ भागमें भूमिपर उस वस्त्रको निचोड़े । 

 यदि घरमें किसी मृत पुरुषका वार्षिक श्राद्ध आदि कर्म हो तो वस्त्र-निष्पीडन नहीं करना चाहिये ।

*7 #भीष्मतर्पण*-

इसके बाद दक्षिणाभिमुख हो पितृतर्पणके समान ही, अनेऊ अपसव्य करके, हाथमें कुश धारण किये हुए ही बालब्रह्मचारी भक्तप्रवर भीष्मजीके लिये पितृतीर्थसे तिलमिश्रित जलके द्वारा तर्पण करे । 

उनके लिये तर्पण का मन्त्र निम्नाङ्कित श्लोक है–

*वैयाघ्रपदगोत्राय साङ्कृतिप्रवराय च।* 
*गङ्गापुत्राय भीष्माय प्रदास्येऽहं तिलोदकम्।* *अपुत्राय ददाम्येतत्सलिलं भीष्मवर्मणे॥*

*#अर्घ्यदान*-

फिर शुद्ध जलसे आचमन करके प्राणायाम करे । 

तदनन्तर यज्ञोपवीत सव्यकर एक पात्रमें शुद्ध जल भरकर उसमे श्वेत चन्दन, अक्षत, पुष्प तथा तुलसीदल छोड दे । 

फिर दूसरे पात्रमें चन्दन्से षड्दल-कमल बनाकर उसमें पूर्वादि दिशाके क्रमसे ब्रह्मादि देवताओंका आवाहन-पूजन करे 

तथा पहले पात् के जलसे उन पूजित देवताओंके लिये अर्ध्य अर्पण करे ।

अर्ध्यदान के मन्त्र निम्नाङ्कित हैं—

*ॐ ब्रह्म जज्ञानं प्रथमं पुरस्ताद्वि सीमत: सुरुचो व्वेन ऽआव:। स बुध्न्या ऽउपमा ऽअस्य व्विष्ठा: सतश्च योनिमसतश्व व्विव:॥*
 ॐ ब्रह्मणे नम:। 

*ॐ इदं विष्णुर्विचक्रमे त्रेधा निदधे पदम् । समूढमस्यपा, सुरे स्वाहा ॥*
ॐ विष्णवे नम:।

*ॐ नमस्ते रुद्र मन्यव ऽउतो त ऽइषवे नम: । वाहुब्यामुत ते नम: ॥*
 ॐ रुद्राय नम: । 

*ॐ तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि । धियो यो न: प्रचोदयात् ॥*
 ॐ सवित्रे नम: ।

*ॐ मित्रस्य चर्षणीधृतोऽवो देवस्य सानसि । द्युम्नं चित्रश्रवस्तमम् ॥*
ॐ मित्राय नम:।

*ॐ इमं मे व्वरुण श्रुधी हवमद्या च मृडय ।   त्वामवस्युराचके ॥*
ॐ वरुणाय नम: ।

*#सूर्यार्घ*- 

*एहि सूर्य सहस्त्राशो तेजो राशे जगत्पते।* 
*अनुकम्पय मां भक्त्या गृहाणार्घ्यं दिवाकर।*

हाथोंको उपर कर उपस्थान मंत्र पढ़ें –

*ॐचित्रं देवानामुदगादनीकं चक्षुर्मित्रस्य वरुणस्याग्नेः। आप्राद्यावापृथ्वी ऽअन्तरिक्ष@ सूर्यऽआत्माजगतस्तस्थुषश्च।*
खड़े होकर वहीं घूमते हुए 7 बार सूर्यकी प्रदक्षिणा करें।

फिर परिक्रमा करते हुए दशों दिशाओंको और 10 दिग्पालों को नमस्कार करें-

ॐ प्राच्यै नमः, इन्द्राय नमः। 
ॐ आग्नेयायै नमः,आग्नेय नमः। 
ॐ दक्षिणायै नमः, यमाय नमः। 
ॐ नैर्ऋत्यै नमः, निर्ऋतये नमः। 
ॐ पश्चिमायै नमः, वरूणाय नमः। 
ॐ वायव्यै नमः, वायवे नमः। 
ॐ उदीच्यै नमः, कुवेराय नमः।
ॐ ऐशान्यै नमः, ईशानाय नमः। 
ॐ ऊर्ध्वायै नमः,ब्रह्मणे नमः। 
ॐ अवाच्यै नमः, अनन्ताय नमः।

इस तरह दिशाओं और देवताओंको नमस्कार कर , बैठकर नीचे लिखे मन्त्रोंसे पुनः देवतीर्थसे तर्पण करें।

ॐ ब्रह्मणै नमः। 
ॐ अग्नयै नमः। 
ॐ पृथिव्यै नमः। 
ॐ औषधिभ्यो नमः। 
ॐ वाचे नमः। 
ॐ वाचस्पतये नमः। 
ॐ महद्भ्यो नमः। 
ॐ विष्णवे नमः। 
ॐ अद्भ्यो नमः। 
ॐ अपांपतये नमः। 
ॐ वरुणाय नमः। 

फिर तर्पणके जलको मुखपर लगायें और तीन बार
 ॐ अच्युताय नमः 
मंत्रका जप करें।

समर्पण- उपरोक्त समस्त तर्पण कर्म भगवानको समर्पित करें।

*ॐ तत्सद् कृष्णार्पण मस्तु।*
*श्रीविष्णवे नमः-12*

*#नोट*- यदि नदी आदिमें तर्पण किया जाय, तो दोनों हाथोंको मिलाकर जलसे भरकर गोसींग जितना ऊँचा उठाकर जलमें ही अंजलि डाल दें-

*द्वौ हस्तौ युग्मतः कृत्वा पूरयेदुदकाञ्जलिम्।* *गोश्रृङ्गमात्रमृद्धृत्य जलमध्ये जलं क्षिपेत्।।*

नमः पार्वतीपतये हर हर महादेव। 
राजेश राजौरिया वैदिक वृन्दावन।