Thursday, 26 February 2015

बुंदेलखंड:-3 बेतवा, लोकगीत

मदन चतुर्वेदी:-

बुंदेलखंड की गंगा है वेतवा नदी
वेतवा का उल्लेख कालिदास ने
मेघदूत में किया है-

तेषां दिक्षु प्रथित विदिशा लक्षणां राजधानीं
गत्वा सद्यः फलमविकलं कामुकत्वस्य लब्धा।
तीरोपांत स्तनित सुभगं पास्यसि स्वादु यस्मात्स
भ्रूभंगं मुखमिव पयो वेत्रवत्याश्चलोर्मि।।

कालिदास का प्रवासी यक्ष अपने संदेशवाहक मित्र मेघ को रास्ते की जानकारी देते हुए कहता है - हे मित्र! जब तू इस दशार्ण देश की राजधानी विदिशा में पहुँचेगा, तो तुझे वहाँ विलास की सब सामग्री मिल जाएगी। जब तू वहाँ सुहानी और मनभावनी नाचती हुई लहरों वाली वेत्रवती के तट पर गर्जन करके उसका मीठा जल पीएगा, तब तुझे ऐसा लगेगा कि मानो तू किसी कँटीली भौहों वाली कामिनी के ओठों का रस पी रहा है।

बेतवा का ही पुराना नाम है 'वेत्रवती' और संस्कृत में 'वेत्र' का अर्थ बेंत है। कालिदास का यह वर्णन किसी हद तक आज भी सही लगता है। प्रदूषण का दानव अभी बेतवा पर वैसा कब्जा नहीं जमा सका है, जैसा उसने अपने किनारे महानगर बसा चुकी नदियों पर जमा लिया है। इसके सौंदर्य की प्रशंसा बाणभट्ट ने भी कादंबरी में की है। वैसे वराह पुराण में इसी वेत्रवती को वरुण की पत्नी और राक्षस वेत्रासुर की माँ बताया गया है। शायद इसीलिए इसमें दैवी और दानवीय दोनों शक्तियाँ समाहित हैं। गंगा, यमुना, मंदाकिनी आदि पवित्र नदियों की तरह बेतवा के तट पर भी रोज शाम को आरती होती है

शिशुपाल चंदेरी का राजा था जिसकी मोत पर यहाँ के ठाकुर कृष्न से बैर बांध गए थे
चूँकि उनका बिगाड़ तो कुछ नहीं सकते थे तो उनको बेज्जित्त करने को उनका सर की पहचान मोरपंख को जूतों की नोक पर लगाने लगे थे कालान्तर मे ये फेसन बसन गया

इस सम्बन्ध मे एक लोकगीत सुनो

इतै कृष्ण रणछोड़ कहाए ढुकत फिरै ओली में।
 मिश्री सी है घुरै इतै की बुन्देली बोली में।।
त्रेता को औतार डांग में पर्ण कुटी सिंगारै।
वीर भूमि बुन्देलखण्ड को सबरो देश निहारे।।
चन्देरी शिशुपाल से कृष्णचन्द्र की ठनी रही,
 भले प्रान की हानि हो गयी। आन शान की बनी रही,
झब्बूदार पनइया देखों जिसकी मुकुट निशानी में,
बुन्देलों की सुनो कहानी, बुन्देलों की बानी में,

पानी दार यहां का पानी, आग यहां के पानी में
 बुन्देलों की सुनो कहानी...

चम्बल केन यमुना के तीर, नर्मदा वेत्रवती के नीर।
विन्ध्य घाटी की स्वस्थ समीर, हमें ई जान से प्यारी है।
मातृभूमि बुन्देलखण्ड भगवान से प्यारी है।
धूल इन खोरन की,
है काजल कोरन की

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