Tuesday, 7 July 2026

गया श्राद्ध के बाद भी श्राद्ध अनिवार्य



*गया श्राद्ध के बाद भी श्राद्ध अनिवार्य*

धर्मशास्त्रानुसार गया में जिन पितरों का श्राद्ध कर दिया गया है, उनके लिये भी तर्पण-पिण्डदान आदि अनिवार्यत: करने ही चाहिये। 

मान लिया- किसी के पिता ने अपने पिता आदि का गयाश्राद्ध कर दिया था, पुन: जब उनके पुत्र उनका सपिण्डीकरण श्राद्ध करेंगे तो प्रेतरूप पिता से अतिरिक्त त्रिक या पितामह, प्रपितामह और वृद्धप्रपितामह का पिण्डसहित श्राद्ध किये बिना पिण्डसम्मेलन कैसे सम्भव होगा? 

अपने यहाँ किसी भी यज्ञ या संस्कार में पिण्डरहित या पिण्डसहित त्रिकश्राद्ध के बिना आभ्युदयिकश्राद्ध कैसे सम्पन्न होगा? 

गयाश्राद्ध करके लौटे हुए पिता का ही यथासमय उनके पुत्र जब पिण्डसहित पार्वणश्राद्ध करेंगे तो त्रिक के पिण्डदान बिना कैसे करेंगे?

अत: जिनका गयाश्राद्ध हो चुका है उनका भी यथासमय श्राद्ध-तर्पण करना अनिवार्य है। गया पितरों का तीर्थ है, वहाँ प्रतिवर्ष एक पक्ष के पितृमहोत्सव में सबके पितर श्राद्ध की अपेक्षा रखते हैं। पुन: पुन: अवसर मिले तो वहाँ श्राद्ध करना चाहिये। यह उत्तम है। पञ्चमहायज्ञों में भी पितृयज्ञ यानी श्राद्ध-तर्पण तो नित्य ही है।

कृत्यसारसमुच्चय पृ.२१८ आदि के अनुसार सपिण्डीकरणश्राद्ध हो जाने पर वर्षाभ्यन्तर में भी गयाश्राद्ध किया जा सकता है। सपिण्डीकरणश्राद्ध द्वादशाह में (प्राय: बारहवें दिन) होना चाहिये। पहले एक वर्ष में होता था।

यदि किसी के पिता संन्यासी हो जाने से, पतित हो जाने से या तर्पण की योग्यता अथवा श्रद्धा नहीं रखने से अपने पूर्वजों का श्राद्ध-तर्पण नहीं करते हैं तो पिता के जीवित रहते भी पुत्र को ही पितामहादि का श्राद्ध-तर्पण करना चाहिये।

कोई मिथ्या प्रचार करते हैं कि गयाश्राद्ध के बाद श्राद्ध-तर्पण नहीं करने से प्रत्यवाय नहीं होता है और करने से अच्छा होता है। यह निर्णय श्राद्ध-तर्पणादि के अनधिकारी किसी अशास्त्रीय व्यक्ति का हो सकता है, धर्मशास्त्र का नहीं। बड़े नाम और ऊँचे सिंहासन देखकर सनातनी श्रद्धालु भ्रमित न हों।

धर्मशास्त्रीय विचार बहुत सूक्ष्म होता है, आपके प्रश्नों के उत्तर सामान्य रूप से देने पड़ते हैं। सर्वत्र विशेष चर्चा की आवश्यकता होती है।

अस्तु.....

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