मूल वर्तनी है चम्पू —
यह गद्यपद्यमय काव्य है, वह काव्यग्रंथ जिसमें गद्य के बीच बीच में पद्य भी हो, ऐसा नाटक या काव्य जिसका कुछ अंश गद्य में हो और कुछ अंश पद्य में लिखता हो।
सुन्दर, विचित्र के तात्पर्य में इसका अर्थ विस्तार हुआ है।
पहाड़ी धान्य विशेष ; गंगाजली को भी चम्पू कहते हैं।
बुन्देली भाषा में चम्पू लोटे के अर्थ में है।
'चम्प्' (चम्पिँ गत्यां गदने च) धातु को उ प्रत्यय लगाकर चम्पू शब्द रचा गया है।
बद्री नारायण ने लिखा है "कविता का छंद” में —
कोई उसे छंद में, कोई चम्पू गद्य में
कोई उसे सरस संगीत में कर रहा था आबद्ध
किन्तु चम्पू का वक्रोक्ति के रूप में यह अर्थ परिवर्तन इस शब्द से नहीं जुड़ा है। यह जुड़ा है चम्पी से!
चम्पी शब्द संस्कृत चपति से रचित है। जोकि चप् (चपँ सान्त्वने भ्वादिः परस्मैपदी सकर्मकः सेट् ; शान्त करना) धातु से रचित है। चम्पी शरीर को शान्त करने हलका करने की क्रिया है।
भारतीय संस्कृति में चम्पी केश प्रसाधन परम्परा का एक महत्वपूर्ण अङ्ग रही है। चम्पी करने के लिए सिर में अधिक तेल लगाकर मला जाता था। इससे सिर की त्वचा और केश दोनों का स्वास्थ्य सुधरता है। फिर इन तेल से सने केशों में कंघी की जाती थी तो केश कपाल से चिपके रहते थे।
भारतीय महानगरों में 1950 के दशक में भी “चम्पी तेल-मालिश” लोकप्रिय थी; और “प्यासा” (1958) में जॉनी वॉकर का चरित्र यही काम करता है; और “सर जो तेरा चकराए या दिल डूबा जाए” गीत में यह टेर भी सुनाई देगी।
वैसे, इसी चम्पी को पश्चिम ने कुछ परिवर्तन के साथ शैम्पू शब्द के रूप में केश प्रसाधन सामग्री के नाम के लिए अपनाया है। वैसे 1762 का शैम्पू शब्द का प्रथम उल्लेख मिलता है, जब इसे औषधीय तेलों की चम्पी के अर्थ में प्रयोग किया गया। लगभग सौ वर्ष उपरान्त इस शब्द का प्रयोग बालों को झागदार पदार्थ से धोने के अर्थ में प्रयोग किया जाने लगा; और फिर उस पदार्थ को शैम्पू कहने लगे।
फिर धीरे धीरे (लगभग 1950 के आसपास) पाश्चात्य संस्कृति का अनुकरण करने वाले लोगों ने इस प्रकार के केश विन्यास को गँवारू होने से जोड़ दिया। वैसे भी ऐसे केश विन्यास वाले अधिकांश व्यक्ति ग्रामीण परिवेश से थे। इस प्रकार के लोगों को चम्पू कहने का प्रचलन बन गया। जो सीधे, सज्जन, ग्रामीण व्यक्तियों के लिए वक्रोक्ति के रूप में प्रयोग किया जाने लगा; और फिर इसका पुरातनपन्थी के तात्पर्य में अर्थ विस्तार हुआ है। और शैम्पू करने वाले इस प्रकार चम्पी करने वाले चम्पू को अपमानित करने लगे।
वैसे आर्यसमाज के पण्डित चमूपति, जिनका मूल नाम था चम्पक राय, उन्हें भी अनेक लोग पण्डित चम्पू कहते हैं। उन्होंने अनेक पुस्तकें लिखीं, जिनमें से एक है "रंगीला रसूल” (1924)! तथापि, इस बात की क्षीण सम्भावना है कि उनके उपहास में चम्पू शब्द का वर्तमान प्रचलित अर्थ बना है। उनके उपनाम चमूपति के चमू का अर्थ सेना है; ऐसी सेना जिसमें 129 हाथी, इतने ही रथ, 2187 अश्वारोही, तथा 3685 पायिक / पादभट (पैदल सैनिक) हों, उसका सेनापति चमूपति कहलाता है।
अशोक चक्रधर की "चौं रे चम्पू” और 'कुछ कर न चम्पू' में चम्पू भोला-भाला एक पढ़े-लिखे, समझदार, लेकिन व्यवस्था के सामने असहाय और निष्क्रिय मध्यवर्गीय बुद्धिजीवी के व्यक्तित्व पर तीखी वक्रोक्ति (कटाक्ष) है। जो परम्परा से बन्धा हुआ किसी भी प्रकार की आत्मरक्षात्मक प्रतिक्रिया भी नहीं कर पाता।
वैसे, चम्पू का अर्थ विस्तार होकर अब न केवल पुरातनपन्थी, अपितु, देश की राजनीति पर (पुरातनपन्थी) प्रभाव डालने वाले व्यक्ति, असहिष्णु और अंहकारी व्यक्ति, विशेष रूप से स्वयं को पीड़ित बताने वाले किन्तु किसी अन्य के मानवाधिकार न समझने वाले व्यक्ति के अर्थ तक में अर्थ विस्तार हो गया है।
यह संजय चतुर्वेदी की ग़ज़ल — चम्पू-चरित्तर-चंद्रिका नित हरण भवभय दारुणम् से स्पष्ट है। इस कविता का आनन्द लें। इस अर्थ में सम्भव है कि यह शब्द चम्प् धातु को शतृ प्रत्यय लगाकर रचा चम्पत् (गतिमान, चलता हुआ) अथवा कर्तरि लटलकार मध्यम पुरुष स्वरूप चम्पत (गए, ओझल हो गए) से रचा प्रतीत होता है। चम्पत होना — ओझल होना, चले जाना, लोप हो जाना के अर्थ में प्रयुक्त होने वाला शब्द है; और बहुधा चम्पत होने वाला व्यक्ति धोखाधड़ी कर चाल चलकर अन्तर्धान हो जाता है। जिस प्रकार प्यारे लगते व्यक्ति को प्यारु, लपकने वाले को लपकू, फैंकने वाले को फैंकू, कहते हैं; उसी प्रकार चपत लगा कर चम्पत होने वाले को चम्पू कहना एक सहज भाषाई वृत्ति है।
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