Friday, 31 July 2026

अम्बेडकर और अछूत

ये हिंदी है अम्बेडकर के लेख की। 
उन्होंने लिखा - Touchable and Untouchable. 
उन्होंने अंग्रेजो के उस शब्द का नग्रेजी नाम दिया - Polluted by touch. 
कब 1911 की जनगणना में। 
उस समय एक ही कास्ट में दो तरह के लोग पाए जाते थे - Touchable and Untouchable. 

जिसको कुतर्क के द्वारा अम्बेडकर ने नकार दिया।
जो अंग्रेजों के मनोअनुकूल था।
वे वही चाहते थे कि कोई भारतीय पिछलग्गू उनकी बात का समर्थन कर दे। वही हुवा। 

अनेक उद्धरण हैं - विल दुरान्त, रोमेश दत्त, गणेश सखाराम देउस्कर, handyman और जे सुन्दरलैंड के प्रामाणिक ग्रन्थ हैं जो यह बताते हैं कि 1850 से 1947 के बीच लगभग 4 करोड़ भारतीय भुखमरी और संक्रामक रोगों की चपेट में आकर काल के गाल में समा गए। 

जैसा आज कोविड के समय हो रहा है। 
कि छूने से व्यक्ति संक्रमित हो सकता है।
इसलिए छूने से परहेज रखो।
उस समय भी ऐसा ही दृश्य था - जिसे अंग्रेजो और उनके सेवक अम्बेडकर ने नाम दिया - Untouchability. 

...ये हिंदीबाजी है अम्बेडकर के लेख की। 
उन्होंने लिखा - Touchable and Untouchable. 
उन्होंने अंग्रेजो के उस शब्द का नग्रेजी नाम दिया - Polluted by touch. 
कब 1911 की जनगणना में। 
उस समय एक ही कास्ट में दो तरह के लोग पाए जाते थे - Touchable and Untouchable. 

जिसको कुतर्क के द्वारा अम्बेडकर ने नकार दिया।
जो अंग्रेजों के मनोअनुकूल था।
वे वही चाहते थे कि कोई भारतीय पिछलग्गू उनकी बात का समर्थन कर दे। वही हुवा। 

अनेक उद्धरण हैं - विल दुरान्त, रोमेश दत्त, गणेश सखाराम देउस्कर, handyman और जे सुन्दरलैंड के प्रामाणिक ग्रन्थ हैं जो यह बताते हैं कि 1850 से 1947 के बीच लगभग 4 करोड़ भारतीय भुखमरी और संक्रामक रोगों की चपेट में आकर काल के गाल में समा गए। 

जैसा आज कोविड के समय हो रहा है। 
कि छूने से व्यक्ति संक्रमित हो सकता है।
इसलिए छूने से परहेज रखो।
Social distancing का फार्मूला पूरे विश्व में अपनाया गया। जिस मोहल्ले में एक कोविड का मरीज मिल जाय उसको पुलिस धकेलकर अस्पताल में भर्ती करवाती थी और पूरे मोहल्ले को बांस के बाड़े लगाकर घेर दिया जाता था। 
तो यह socual distancing की हिन्दीकरण क्यों नहीं किया गया?
क्योंकि उसका अर्थ ही होता है कि जो संक्रमित हो, उससे दूरी बनाओ। छुआछूत बरतो। छुआछूत शब्द प्रयोग करते ही संविधान की नजर टेढ़ी हो जाती। 

उस समय भी ऐसा ही दृश्य था - जिसे अंग्रेजो और उनके सेवक अम्बेडकर ने नाम दिया - Untouchability. 

...

भाषा

वायर में एक दलित लेखक लिखते हैं और मैं उसका अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ: 

“हर पीढ़ी अपनी एक अलग भाषा गढ़ती है। जनरेशन-ज़ी की भाषा संयोग से ऐसी है जिसमें गालियाँ हैं, तीखा व्यंग्य है, और इस तरह बोलने के लिए किसी से अनुमति लेने में उसे तनिक भी रुचि नहीं है। जंतर-मंतर के पोस्टर, इंस्टाग्राम की रीलें और शिक्षा मंत्री के आवास के बाहर लगे प्लेकार्ड भारतीय विरोध-प्रदर्शनों की उस पुरानी परंपरा जैसे नहीं थे, जो गंभीर नैतिक आग्रह और संयमित भाषा के लिए जानी जाती थी।

वे अधिक किसी ग्रुप-चैट की तरह दिखाई देते थे—गाली-गलौज से भरे, अश्लील, बेतुके और उल्लासपूर्वक मर्यादा-भंजक। और ठीक यही उनकी मंशा भी थी। उनका उद्देश्य उन्हीं लोगों को आहत करना था जिन्हें वे आहत करना चाहते थे— ….उस परिवेश से जुड़े स्वयंभू 'संस्कारी' आस्थावानों को, और उन 'भक्तों' को जिनके लिए नेता के प्रति श्रद्धा लगभग एक नागरिक धर्म का रूप ले चुकी है।

यह आहत करना कोई रणनीतिक भूल नहीं थी; बल्कि यही पूरी रणनीति का केंद्र था। वास्तव में, इस आंदोलन की सफलता के कारणों में इसे भी गिना जाना चाहिए। क्योंकि जब किसी ऐसी सत्ता के विरुद्ध, जिसे पवित्र या अछूत मान लिया गया हो, जान-बूझकर अश्लीलता और अभद्रता का प्रयोग किया जाता है, तो उसकी राजनीतिक उपयोगिता का इतिहास कहीं अधिक पुराना और कहीं अधिक सफल रहा है, जितना कि तथाकथित शालीन और सम्मानजनक टिप्पणीकार स्वीकार करने को तैयार होते हैं।”

यह स्टैंड पहली दृष्टि में आकर्षक और आधुनिक प्रतीत होता है, परन्तु इसके भीतर कई दार्शनिक, समाजशास्त्रीय और तार्किक भ्रम छिपे हुए हैं।

सबसे पहला भ्रम यह है कि यह ध्यान आकर्षित करने (attention) और विश्वास अर्जित करने (persuasion) को एक ही चीज़ मान लेता है। अश्लीलता, व्यंग्य और गाली निश्चित रूप से लोगों का ध्यान खींच सकती हैं; वे समाचारों की सुर्खियाँ बन सकती हैं, सोशल मीडिया पर वायरल हो सकती हैं। किन्तु किसी बात का अधिक दिखाई देना इस बात का प्रमाण नहीं है कि उसने लोगों के विचार भी बदल दिए। लोकतंत्र में किसी आंदोलन की वास्तविक सफलता केवल अपने समर्थकों का मनोरंजन करने में नहीं, बल्कि उन लोगों को भी अपने पक्ष में लाने में है जो अभी तक निर्णय की स्थिति में नहीं हैं। गाली इस कार्य में प्रायः बाधा बनती है, साधन नहीं।

दूसरा भ्रम यह है कि लेखक पीढ़ीगत भाषा (Generational Slang) और लोकतांत्रिक राजनीतिक भाषा के बीच का अंतर मिटा देता है। यह सत्य है कि प्रत्येक पीढ़ी अपनी अलग शब्दावली गढ़ती है। किन्तु इससे यह निष्कर्ष नहीं निकलता कि वही भाषा सार्वजनिक विमर्श और राजनीतिक संघर्ष की आदर्श भाषा भी है। घर, मित्र-मंडली और ग्रुप चैट की भाषा तथा संसद, न्यायालय, विश्वविद्यालय और जनांदोलन की भाषा का उद्देश्य अलग-अलग होता है। निजी संवाद में जो स्वीकार्य है, वह सार्वजनिक संस्कृति का मानक नहीं बन जाता। "Gen-Z ऐसे बोलती है"—यह एक समाजशास्त्रीय तथ्य हो सकता है; किन्तु "अतः राजनीति भी ऐसी ही बोले"—यह निष्कर्ष तार्किक रूप से नहीं निकलता। यह 'जो है' (is) से 'जो होना चाहिए' (ought) निकालने की त्रुटि है।

तीसरा भ्रम यह है कि यह अपमान को साहस का पर्याय बना देता है। सत्ता से असहमति व्यक्त करना और सत्ता को गाली देना दो अलग-अलग बातें हैं। इतिहास के सबसे प्रभावशाली प्रतिरोध—महात्मा गांधी, डॉ. भीमराव आंबेडकर, मार्टिन लूथर किंग जूनियर, नेल्सन मंडेला—इसलिए सफल नहीं हुए कि वे अपने विरोधियों को सबसे तीखी गालियाँ देते थे। उनकी शक्ति इस बात में थी कि वे प्रतिरोध करते हुए भी अपनी नैतिक ऊँचाई बनाए रखते थे। नैतिक अधिकार (moral authority) अक्सर भाषा के संयम से जन्म लेता है, भाषा के विघटन से नहीं।

चौथा भ्रम इतिहास का चयनात्मक पाठ (Selective Reading) है। लेखक कहता है कि अश्लीलता का राजनीति में एक लंबा और सफल इतिहास रहा है। यदि यह सत्य है, तो उतना ही सत्य यह भी है कि गरिमा, संयम और नैतिक अनुशासन का इतिहास उससे कहीं अधिक लंबा और कहीं अधिक स्थायी है। भारत का स्वतंत्रता आंदोलन, अमेरिकी नागरिक अधिकार आंदोलन, दक्षिण अफ्रीका का रंगभेद-विरोधी संघर्ष—इनकी विजय का आधार सार्वजनिक मर्यादा, नैतिक विश्वसनीयता और तर्कपूर्ण संवाद था, न कि अश्लीलता। इतिहास में मसखरे भी रहे हैं और महात्मा भी; केवल मसखरों को चुन लेना इतिहास नहीं, इतिहास का संपादित संस्करण है।

पाँचवाँ भ्रम यह है कि लेखक पवित्रता (Sacredness) और सत्ता (Power) को एक ही वस्तु मान लेता है। निस्संदेह, अनेक बार सत्ता स्वयं को पवित्र घोषित कर आलोचना से बचना चाहती है। परन्तु इससे यह निष्कर्ष नहीं निकलता कि समाज में जो कुछ भी किसी के लिए पवित्र है, उसका अपमान राजनीतिक सद्गुण बन जाता है। लोकतंत्र का अर्थ पवित्रताओं का विनाश नहीं, बल्कि पवित्रताओं के बीच सह-अस्तित्व है। यदि प्रत्येक समूह दूसरे की आस्थाओं को अपमानित करने लगे, तो अंततः राजनीति विचारों का संघर्ष न रहकर घृणा का प्रतियोगिता-मंच बन जाएगी।

छठा भ्रम मनोविज्ञान से जुड़ा है। लेखक मानकर चलता है कि किसी नेता या विचारधारा का अपमान उसके समर्थकों को कमजोर कर देगा। सामाजिक मनोविज्ञान इसके विपरीत अनेक उदाहरण प्रस्तुत करता है। जब किसी समूह की पहचान पर सार्वजनिक आक्रमण होता है, तो वह समूह प्रायः और अधिक संगठित हो जाता है। अपमान विरोधियों को तोड़ने से अधिक, उन्हें एकजुट भी कर सकता है। इस दृष्टि से गाली हमेशा राजनीतिक अस्त्र नहीं होती; अनेक बार वह विरोधी पक्ष के लिए सबसे प्रभावी प्रचार-सामग्री बन जाती है।

सातवाँ भ्रम यह है कि लेखक आहत कर देने (offence) को ही सफलता का प्रमाण मान लेता है। यदि किसी आंदोलन का उद्देश्य केवल विरोधी को क्रोधित करना रह जाए, तो वह आंदोलन धीरे-धीरे लोकतांत्रिक संवाद से हटकर नाटकीय प्रदर्शन (performance) में बदल जाता है। राजनीति का अंतिम लक्ष्य प्रतिद्वंद्वी को चिढ़ाना नहीं, समाज को बदलना है। समाज परिवर्तन तर्क, संगठन, नेतृत्व, धैर्य और विश्वसनीयता से होता है; केवल उत्तेजना से नहीं।

सबसे गहरी आपत्ति इस तर्क के दार्शनिक आधार पर है। यह मान लिया गया है कि क्योंकि कभी-कभी सत्ता पवित्रता का आवरण ओढ़ लेती है, इसलिए पवित्रता स्वयं संदेहास्पद है और उसका उपहास करना लोकतांत्रिक कर्तव्य है। यह निष्कर्ष अत्यंत खतरनाक है। किसी भी सभ्यता की स्थिरता केवल अधिकारों से नहीं, बल्कि कुछ साझा मर्यादाओं से भी निर्मित होती है। लोकतंत्र का अर्थ यह नहीं कि किसी के प्रति श्रद्धा असंभव हो जाए; लोकतंत्र का अर्थ केवल इतना है कि श्रद्धा आलोचना से ऊपर नहीं है। आलोचना आवश्यक है, परन्तु आलोचना और अवमानना समानार्थी नहीं हैं।

वास्तव में किसी भी लोकतांत्रिक संस्कृति की परिपक्वता इस बात से नहीं मापी जाती कि वह कितनी निर्भीक गालियाँ दे सकती है, बल्कि इस बात से मापी जाती है कि वह कितनी तीखी असहमति को भी भाषा की गरिमा के भीतर व्यक्त कर सकती है। भाषा केवल विचारों का वाहन नहीं होती; वह समाज के संस्कारों का भी दर्पण होती है। जिस दिन राजनीति का सबसे प्रभावी अस्त्र तर्क के स्थान पर गाली बन जाए, उस दिन केवल भाषा ही नहीं, लोकतंत्र भी निर्धन हो जाता है।

शंकर

शंकर
शंकर ३ रूपों का समन्वय है-
(१)  शं ब्रह्म  (शान्त, लोकों की स्थिति) + 
(२) कं ब्रह्म (कर्ता ब्रह्म, प्रजापति) + 
(३) रं ब्रह्म (ऊर्जा या गति)
यह खं = आकाश रूपी ब्रह्म में स्थित है, जो ब्रह्म की प्रथम सृष्टि है। 
१. शं ब्रह्म-शं - शान्ति, कल्याण।
विश्व के ६ भागों द्वारा षड्विध ऐश्वर्य- 
ऐश्वर्यस्य समग्रस्य धर्मस्य यशसश्श्रियः। 
ज्ञानवैराग्ययोश्चैव षण्णां भग इतीरणा॥ (विष्णु पुराण, ६/५/७४)
शं नो मित्रः शं वरुणः, शं नो भवत्यर्यमा।
शं न इन्द्रो बृहस्पतिः, शं नो विष्णुरुरुक्रमः॥ 
(ऋक्, १/९०/९, अथर्व वेद, १९/९/६, ७, वाज. यजु, ३६/९, तैत्तिरीय आरण्यक, ७/१/१,)
नः = हम लोगों का। नः + इन्द्रः = न इन्द्रः।
(१) आकाश के क्षेत्र-आकाश के ३ धाम हैं-परम धाम-स्वयम्भू मण्डल = पूर्ण विश्व, 
मध्यम धाम = परमेष्ठी मण्डल = ब्रह्माण्ड या आकाशगंगा, 
अवम धाम - सौर मण्डल = सूर्य का प्रकाश क्षेत्र। 
या ते धामानि परमाणि यावमा या मध्यमा विश्वकर्मन्नुतेमा । (ऋक्, १०/८१/४)
हर धाम में जो दृश्य पिण्ड है, वह भूमि, उसका प्रभाव क्षेत्र (साम) आकाश या द्यु, तथा बीच का क्षेत्र (अन्तरिक्ष या व्रत) है। पिण्ड निर्माण का आदि रूप आदित्य है, जो अभी अन्तरिक्ष में दीखता है। तीन धामों के आदित्य हैं-अर्यमा, वरुण, मित्र। भूमि = माता (स्त्रीलिंग), द्यु = पिता (पुल्लिंग), अन्तरिक्ष = नपुंसक लिंग।
तिस्रो भूमीर्धारयन् त्रीरुत द्यून्त्रीणि व्रता विदथे अन्तरेषाम् ।
ऋतेनादित्या महि वो महित्वं तदर्यमन् वरुण मित्र चारु ॥ (ऋक्, २/२७/८)
तिस्रो मातॄस्त्रीन्पितॄन्बिभ्रदेक ऊर्ध्वतस्थौ नेमवग्लापयन्ति । 
मन्त्रयन्ते दिवो अमुष्य पृष्ठे विश्वमिदं वाचमविश्वमिन्वाम् ॥ (ऋक्, १/१६४/१०)
(२) सौर मण्डल-३ क्षेत्र सौर मण्डल के भीतर हैं-
इन्द्र सृष्टि निर्माण के लिए ऊर्जा है-
(देवस्य त्वा सवितुः प्रसवे) इन्द्रियस्य इन्द्रियेण। (तैत्तिरीय ब्राह्मण, २/६/५/३)
इन्द्रस्य इन्द्रियेण अभिषिंचामि (शतपथ ब्राह्मण, ५/४/२/२, ऐतरेय ब्राह्मण, ८/७)
इन्धन रूप में भी इन्द्र कहा गया है-इन्धो वै नामैष 
सौर मण्डल ३३ धाम तक है, जिसमें इन्द्र का विस्तार है। इसे धामच्छद (धाम को ढंकने वाला, छद = छत) कहा है। ३३ अक्षर त्रिष्टुप् छन्द (११ x ४ = ४४ अक्षर) के ३ पाद  हैं। मेरुदण्ड में ३३ जोड़ होते हैं, अतः सौर मण्डल मंत इन्द्र के वज्र को दधीचि की हड्डी से बना कहते हैं।
इन्द्रो दधीचो अस्थभिर्वृत्राण्यप्रतिष्कुतः। जघान नवतीर्नव॥। (ऋक्, १/८४/१३)
वज्रो वै त्रिष्टुप् (शतपथ ब्राह्मण, ७/४/२/२४, ऐतरेय ब्राह्मण, २/१६, २/२)
संवत्सरो (१ संवत्सर में जितनी दूर सूर्य का प्रकाश जाता है-सौर क्षेत्र) वज्रः (शतपथ ब्राह्मण, ३/६/४/१९)
त्रैष्टुभो वा एष य एष (सूर्यः) तपति (कौषीतकि ब्राह्मण, २५/४)
अन्तो वै त्रयस्त्रिंशः परमो वै त्रयस्त्रिंश स्तोमानाम् (ताण्ड्य महाब्राह्मण, ३/३/२)
तं (त्रयस्त्रिंशं स्तोमं) उ नाक इत्याहुः। (ताण्ड्य महाब्राह्मण, १०/१/१८)
बृहस्पति सौर मण्डल के अन्तरिक्ष का मुख्य ग्रह है। सोम (आकाश का विरल पदार्थ) के ३ क्षेत्रों में यह मध्य में है।
(१) चान्द्र मण्डल का देवसोम या राजसोम, (२) जहां तक सौर वायु जाती है वह पवमान सोम है। इसका केन्द्र बृहस्पति होने से यह बृहस्पति सोम है। (३) ब्रह्माण्ड सीमा तक ब्रह्मणस्पति सोम है।
एतद्वै देवसोमं यत् चन्द्रमाः (ऐतरेय ब्राह्मण, ७/११)
सोमो राजा चन्द्रमाः (शतपथ ब्राह्मण, १०/४/२/१)
अयं वायुः पवमानः (शतपथ ब्राह्मण, २/५/१/५) 
सोमो वै पवमानः। (शतपथ ब्राह्मण, २/२/३/२२) 
बृहस्पतिर्ब्रह्म ब्रह्मपतिः। (तैत्तिरीय ब्राह्मण, २/५/७/४) 
वाग् वै बृहती तस्या एष पतिस्तस्मादु बृहस्पतिः।(शतपथ ब्राह्मण, १४/४/१/२२) 
(यजु ३८/८) अयं वै बृहस्पतिर्योऽयं (वायुः) पवते। (शतपथ ब्राह्मण, १४/२/२/१०)
ब्रह्म वै ब्रह्मणस्पतिः (कौषीतकि ब्राह्मण, ८/५, ९/५, ताण्ड्य महाब्राह्मण, १६/५/८)
व्यवहार में बृहस्पति ही दीखता है, अतः उसे भी ब्रह्मणस्पति कहा गया है।
(३) उरुक्रम विष्णु-विष्णु के कई विक्रम वेदों में निर्दिष्ट हैं। 
विष्णु का प्रत्यक्ष रूप सूर्य है, जिससे पृथ्वी पर सृष्टि चल रही है। इसके ३ विक्रम सौर मण्डल के ३ क्षेत्र हैं, जिनको अग्नि, वायु, रवि (११, २२, ३३ अहर्गण तक) कहा गया है।
इदं विष्णुर्विचक्रमे त्रेधा निदधे पदम्। समूळ्हमस्य पांसुरे॥ (ऋक्, १/२२/१७)
तद् विष्णोः परमं पदं सदा पश्यन्ति सूरयः। दिवीव चक्षुराततम्॥ (ऋक्, १/२२/२०)
सूर्य सिद्धान्त (१२/८१, ९०) में ब्रह्माण्ड को सूर्य का परम पद कहा है जहां तक सूर्य विन्दुमात्र दीखता है, तथा ब्रह्माण्ड की सटीक माप दी गयी है।
अग्नि-वायु-रविभ्यस्तु त्रयं ब्रह्म सनातनम्।
दुदोह यज्ञ सिद्ध्यर्थं ऋग्-यजुः साम लक्षणम्॥ (मनु स्मृति, १/२३)
परम पद को बड़े आकार के कारण उरुक्रम भी कहा गया है।
उरुक्रमस्य स हि बन्धुरित्था विष्णोः पदे परमे मध्व उत्सः॥ (ऋक्, १/१५४/५)
पृथ्वी पर मनुष्य की सबसे बड़ी रचना नगर है, जिसे उरु या उर कहते हैं, जैसे बंगलूरु, मैसूरु, चित्तूर, तञ्जाउर, आदि। शिल्पशास्त्र के अनुसार विष्णु (मनुष्य रूप, सम्भवतः वामन) ने नगरों का प्रारूप तैयार किया था, इस अर्थ में उनको उरुक्रम कहा गया है। बाद में वरुण ने भी उरु प्रारूप का नगर बनाया जो इराक का सबसे प्राचीन नगर है।
उरुं हि राजा वरुण श्चकार (ऋग् वेद १/२४/८) 
यज्ञ या सृष्टि अर्थ में विष्णु को विक्रान्त = विभाजन, उत्क्रान्त (वाहर निकलना), न्यक्रामत् (परिणत होना) आदि कहा है। लोकों का निर्माण और उनकी स्थिति भी विष्णु का विक्रम है।  
यज्ञो विष्णुः स देवेभ्य इमां विक्रान्तिं विचक्रमे यैषामियं विक्रान्तिरिदमेव प्रथमेन पदेन पस्पाराथेदमन्तरिक्षं द्वितीयमेन दिवमुत्तमेन। (शतपथ ब्राह्मण, १/९/३/९)
इमे वै लोका विष्णोर्विक्रमणं विक्रान्तं विष्णोः क्रान्तम्। (शतपथ ब्राह्मण, ५/४/२/६)
स उदक्रामत् सा गार्हपत्ये न्यक्रामत्॥२॥
यज्ञ चक्र रूप में दिन-रात भी विष्णु-क्रम है।
तद्वाऽहोरात्रेऽएव विष्णुक्रमा भवन्ति। (शतपथ ब्राह्मण, ६/७/४/१०)
विष्णु का विचक्रम गो रूप यज्ञ है। प्रति व्यक्ति सबसे अधिक गो वाला देश भी दक्षिण अमेरिका का उरुगुए है।
विचक्रमाणस्त्रेधोरुगायः (ऋक् १/१५४/१, अथर्व ७/२६/१, वाज.सं. ५/१८, तैत्तिरीय सं. १/२/१३/३, काण्व सं. २/१०, मैत्रायणी सं. १/२९/१९/९)
२. कं ब्रह्म- कः = प्रजापति, स्रष्टा रूप ब्रह्म।
कस्मै देवाय हविषा विधेम (हिरण्यगर्भ सूक्त, १/१२१/१, ९, अथर्व, ४/२/१, ७, ८, वाज. यजु, १२/१०२, १३/४, २३/१, ३, २५/१०, ११, १२, १३, २७/२५, २६, आदि)
सृष्टि या निर्माण में कुछ सामग्री लगती है, अतः कर्ता रूप ’क’ ब्रह्म ले लिए हवि देनी पड़ती है।
वेद संहिताओं में कई स्थान पर कः, कं आया है, पर वह प्रजापति का वाचक है, या प्रश्नवाचक सर्वनाम, इसमें सन्देह है। ब्राह्मण ग्रन्थों में स्पष्ट परिभाषा है।
प्रजापतिर्वै कः (ऐतरेय ब्राह्मण, २/३८, ६/२१, कौषीतकि ब्राह्मण, ५/४, २४/४, ५, ९, ताण्ड्य महाब्राह्मण, ७/८/३, शतपथ ब्राह्मण, ६/४/३/४, ७/३/१/२०, तैत्तिरीय ब्राह्मण, २/२/५/५, जैमिनीय उपनिषद्, ३/२/१०, गोपथ ब्राह्मण, उत्तर, १/२२, ६/३)
कं वै प्रजापतिः। (शतपथ ब्राह्मण, २/५/२/१३) 
सृष्टि निर्माण के लिए ऊर्जा या प्राण भी ’क’ है।
प्राणो वाव कः (जैमिनीय उपनिषद्, ४/२३/४)
कं ब्रह्म द्वारा निर्माण कं है। उपभोग्य वस्तु अन्न या उससे प्राप्त सुख कं है।
अन्नं वै कम् (ऐतरेय ब्राह्मण, ६/२१, गोपथ ब्राह्मण, उत्तर, ६/३)
सुखं वै कम् (गोपथ ब्राह्मण, उत्तर, ६/३)
अथो सुखस्य वा एतत् नामधेयं कं इति (गोपथ ब्राह्मण, उत्तर, १/२२, कौषीतकि ब्राह्मण, ५/४)
कं ह वा अस्मैभवति य एवमेतत् अर्कस्य अर्कत्वं वेद (बृहदारण्यक उपनिषद्, १/२/१)
देवी के लिए स्त्रीलिंग में ’कां’ प्रयुक्त है-
कां सोस्मितां हिरण्य प्राकारां (श्री सूक्त, ४, ऋक् खिल भाग, अष्टक ४/४/३२ के बाद का परिशिष्ट)
एक व्यक्ति ने इसका अर्थ किया है कि इस मन्त्र द्वारा कांसा से स्वर्ण (हिरण्य) बनाया जा सकता है। पर कांस्य या स्वर्ण अर्थ में यहां प्रयोग नहीं है।
काम्-(१) वाणी तथा मन से जिसका ज्ञान नहीं होता। (२) अव्यक्त, अमूर्त्त ब्रह्म। (३) सुख स्वरूपा। (४) चिन्मयी लक्ष्मी, जो अन्तःकरण में आवाज करती है (कै शब्दे, धातु पाठ, १/६५३)। (५) वाणी, वाक्य रूपा (वाग्देवी)। (६) सभी वेद जिस के बारे में जिज्ञासा करते हैं-का = कौन है? (७) क = ब्रह्म के रूप वाली। कस्मै देवाय हविषा विधेम (ऋक्, १०/१२१/१)-कर्त्ता रूप देव के लिए हवि दें। जड़ चेतन गुण दोषमय विश्व कीन्ह करतार (क)-रामचरितमानस (१/६/०)। (८) कर्त्ता रूपिणी।
(३) खं ब्रह्म-
ख का अर्थ आकाश है। गणित ज्योतिष में शून्य अर्थ में ख, व्योम (जहां ॐ भी नही है), आकाश आदि कूट शब्दों का प्रयोग है। खग = ख में गमन करने वाला पक्षी।
खं वेपसा तुविजात स्तवानः (ऋक्, ४/११/२)
अंङ्घि खं वर्तया पणिम् (ऋक्, १०/१५६/३)
ॐ खं ब्रह्म (ईशावास्योपनिषद्, १७, वाज. यजु, ४०/१७)
खं (आकाश) मनो बुद्धिरेव च (गीता, ७/४)
ॐ खं ब्रह्म, खं पुराणं, वायु रं, खं-इति (बृहदारण्यक उपनिषद्, ५/१/१)
अव्यक्त ब्रह्म की प्रथम सृषी आकाश भी उसी का स्वरूप है। वास स्थान रूप में इसे वासुदेव भी कहा है।
(४) रं ब्रह्म-प्राण या गति रूप ब्रह्म ’रं’ है।
रं इति, प्राणो वै रं, प्राणे हि इमानि भूतानि रमन्ते (बृहदारण्यक उपनिषद्, ५/१२/१, शतपथ ब्राह्मण, १४/८/१३/३)
र इति-रञ्जयति इमानि भूतानि (मैत्रायणी उपनिषद्, ६/७)
रकारो अण्डं विराड् भवति (तारसार उपनिषद्, १/४)
रकारं अग्नि बीजं (ध्यानबिन्दु उपनिषद्, ९५)
स चित्रेण चिकिते रंसु भासा (ऋक्, २/४/५)

Thursday, 30 July 2026

पूर्व का भारत

5000 साल पहले ब्राह्मणों ने हमारा बहुत शोषण किया ब्राह्मणों ने हमें पढ़ने से रोका। यह बात बताने वाले महान इतिहासकार यह नहीं बताते कि,100 साल पहले अंग्रेजो ने हमारे साथ क्या किया। 500 साल पहले मुगल बादशाहों ने क्या किया।।

हमारे देश में शिक्षा नहीं थी लेकिन 1897 में शिवकर बापूजी तलपडे ने हवाई जहाज बनाकर उड़ाया था मुंबई में जिसको देखने के लिए उस टाइम के हाई कोर्ट के जज महा गोविंद रानाडे और मुंबई के एक राजा महाराज गायकवाड के साथ-साथ हजारों लोग मौजूद थे जहाज देखने के लिए।

उसके बाद एक डेली ब्रदर नाम की इंग्लैंड की कंपनी ने शिवकर बापूजी तलपडे के साथ समझौता किया और बाद में बापू जी की मृत्यु हो गई यह मृत्यु भी एक षड्यंत्र है हत्या कर दी गई और फिर बाद में 1903 में राइट बंधु ने जहाज बनाया।

आप लोगों को बताते चलें कि आज से हजारों साल पहले की किताब है महर्षि भारद्वाज की विमान शास्त्र जिसमें 500 जहाज 500 प्रकार से बनाने की विधि है उसी को पढ़कर शिवकर बापूजी तलपडे ने जहाज बनाई थी।

लेकिन यह तथाकथित नास्तिक लंपट बताते कि भारत में तो कोई शिक्षा ही नहीं था कोई रोजगार नहीं था।

अमेरिका के प्रथम राष्ट्रपति जॉर्ज वाशिंगटन 14 दिसंबर 1799 को आये थे। सर्दी और बुखार की वजह से उनके पास बुखार की दवा नहीं थी। उस टाइम भारत में प्लास्टिक सर्जरी होती थी और अंग्रेज प्लास्टिक सर्जरी सीख रहे थे हमारे गुरुकुल में अब कुछ वामपंथी बोलेंगे यह सरासर झूठ है।

तो ऑस्ट्रेलियन कॉलेज ऑफ सर्जन मेलबर्न में ऋषि सुश्रुत ऋषि की प्रतिमा "फादर ऑफ सर्जरी" टाइटल के साथ स्थापित है।

महर्षि सुश्रुत: ये शल्य चिकित्सा विज्ञान यानी सर्जरी के जनक व दुनिया के पहले शल्यचिकित्सक (सर्जन) माने जाते हैं। वे शल्यकर्म या आपरेशन में दक्ष थे। महर्षि सुश्रुत द्वारा लिखी गई ‘सुश्रुतसंहिता’ ग्रंथ में शल्य चिकित्सा के बारे में कई अहम ज्ञान विस्तार से बताया है। इनमें सुई, चाकू व चिमटे जैसे तकरीबन 125 से भी ज्यादा शल्यचिकित्सा में जरूरी औजारों के नाम और 300 तरह की शल्यक्रियाओं व उसके पहले की जाने वाली तैयारियों, जैसे उपकरण उबालना आदि के बारे में पूरी जानकारी बताई गई है।

जबकि आधुनिक विज्ञान ने शल्य क्रिया की खोज तकरीबन चार सदी पहले ही की है। माना जाता है कि महर्षि सुश्रुत मोतियाबिंद पथरी हड्डी टूटना जैसे पीड़ाओं के उपचार के लिए शल्यकर्म यानी आपरेशन करने में माहिर थे। यही नहीं वे त्वचा बदलने की शल्यचिकित्सा भी करते थे।

भास्कराचार्य: आधुनिक युग में धरती की गुरुत्वाकर्षण शक्ति (पदार्थों को अपनी ओर खींचने की शक्ति) की खोज का श्रेय न्यूटन को दिया जाता है। किंतु बहुत कम लोग जानते हैं कि गुरुत्वाकर्षण का रहस्य न्यूटन से भी कई सदियों पहले भास्कराचार्यजी ने उजागर किया। भास्कराचार्यजी ने अपने ‘सिद्धांतशिरोमणि’ ग्रंथ में पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण के बारे में लिखा है कि ‘पृथ्वी आकाशीय पदार्थों को विशिष्ट शक्ति से अपनी ओर खींचती है। इस वजह से आसमानी पदार्थ पृथ्वी पर गिरता है’।

आचार्य कणाद: कणाद परमाणु की अवधारणा के जनक माने जाते हैं। आधुनिक दौर में अणु विज्ञानी जॉन डाल्टन के भी हजारों साल पहले महर्षि कणाद ने यह रहस्य उजागर किया कि द्रव्य के परमाणु होते हैं।

उनके अनासक्त जीवन के बारे में यह रोचक मान्यता भी है कि किसी काम से बाहर जाते तो घर लौटते वक्त रास्तों में पड़ी चीजों या अन्न के कणों को बटोरकर अपना जीवनयापन करते थे। इसीलिए उनका नाम कणाद भी प्रसिद्ध हुआ।

गर्गमुनि: गर्ग मुनि नक्षत्रों के खोजकर्ता माने जाते हैं। यानी सितारों की दुनिया के जानकार। ये गर्गमुनि ही थे, जिन्होंने श्रीकृष्ण एवं अर्जुन के बारे में नक्षत्र विज्ञान के आधार पर जो कुछ भी बताया, वह पूरी तरह सही साबित हुआ। कौरव-पांडवों के बीच महाभारत युद्ध विनाशक रहा। इसके पीछे वजह यह थी कि युद्ध के पहले पक्ष में तिथि क्षय होने के तेरहवें दिन अमावस थी। इसके दूसरे पक्ष में भी तिथि क्षय थी। पूर्णिमा चौदहवें दिन आ गई और उसी दिन चंद्रग्रहण था। तिथि-नक्षत्रों की यही स्थिति व नतीजे गर्ग मुनिजी ने पहले बता दिए थे।

आचार्य चरक: ‘चरकसंहिता’ जैसा महत्वपूर्ण आयुर्वेद ग्रंथ रचने वाले आचार्य चरक आयुर्वेद विशेषज्ञ व ‘त्वचा चिकित्सक’ भी बताए गए हैं। आचार्य चरक ने शरीर विज्ञान, गर्भविज्ञान, औषधि विज्ञान के बारे में गहन खोज की। आज के दौर में सबसे ज्यादा होने वाली बीमारियों जैसे डायबिटीज, हृदय रोग व क्षय रोग के निदान व उपचार की जानकारी बरसों पहले ही उजागर कर दी।

पतंजलि: आधुनिक दौर में जानलेवा बीमारियों में एक कैंसर या कर्करोग का आज उपचार संभव है। किंतु कई सदियों पहले ही ऋषि पतंजलि ने कैंसर को भी रोकने वाला योगशास्त्र रचकर बताया कि योग से कैंसर का भी उपचार संभव है।

बौद्धयन: भारतीय त्रिकोणमितिज्ञ के रूप में जाने जाते हैं। कई सदियों पहले ही तरह-तरह के आकार-प्रकार की यज्ञवेदियां बनाने की त्रिकोणमितिय रचना-पद्धति बौद्धयन ने खोजी। दो समकोण समभुज चौकोन के क्षेत्रफलों का योग करने पर जो संख्या आएगी, उतने क्षेत्रफल का ‘समकोण’ समभुज चौकोन बनाना और उस आकृति का उसके क्षेत्रफल के समान के वृत्त में बदलना, इस तरह के कई मुश्किल सवालों का जवाब बौद्धयन ने आसान बनाया।

15 साल साल पहले का 2000 साल पहले का मंदिर मिलते हैं जिसको आज के वैज्ञानिक और इंजीनियर देखकर हैरान में हो जाते हैं कि मंदिर बना कैसे होगा अब हमें इन वामपंथी लोगो से हमें पूछना चाहिए कि मंदिर बनाया किसने

ब्राह्मणों ने हमें पढ़ने नहीं दिया यह बात बताने वाले महान इतिहासकार हमें यह नहीं बताते कि सन 1835 तक भारत में 700000 गुरुकुल थे इसका पूरा डॉक्यूमेंट Indian house में मिलेगा।

भारत गरीब देश था तो फिर दुनिया के तमाम आक्रमणकारी भारत ही क्यों आए हमें अमीर बनाने के लिए।


बौद्ध बुद्ध

अय्याश बौद्धों की कहानियां सुनिये 

पहली बात , घुंघराले बाल मोटे होंठ और लंबे कान, ये भारतीयों की पहचान हे ही नहीं, ये पहचान अफ्रीकन या ग्रीक लोगों की हे

बौद्ध ग्रन्थ सुत्तपिटक (खुद्दक_निकाय) के "बुद्धवंस के अनुसार गौतम बुद्ध से पहले 24 और बुद्ध अवतार लेकर दुनिया मे आये थे! " 

इन बुद्धावतारों की कहानियाँ भी पाखण्डों से कम नहीं हैं,सबसे पहली बात तो ये सारे के सारे बुद्ध अय्याश थे, क्योंकि इनके अन्तःपुर (हरम) मे हजारों महिलायें थीं! और दूसरी बात त्रिपिटक मे गौतम बुद्ध ने अपने से पूर्व के बुद्धावतारों की जितनी आयु और शारीरिक लम्बाई बतायी है, उससे तो लगता है गौतम बुद्ध भी काफी हद तक "बुद्धू" ही था।  

"बुद्धवंस" में गौतम बुद्ध ने बताया है कि "दीपङ्कर_बुद्ध" की तीन हजार रानियाँ थी, और इनकी सम्पूर्ण आयु एक लाख वर्ष थी! साथ ही इनकी शारीरिक ऊँचाई अस्सी हाथ थी!!

"कौण्डिन्य_बुद्ध" की तीन लाख रानियाँ थी, और इनकी भी आयु एक लाख वर्ष थी! जबकि इनकी शारीरिक ऊँचाई अट्ठासी हाथ थी!!

"मङ्गल_बुद्ध" की तीस हजार रानियाँ थी, और इनकी आयु नब्बे हजार वर्ष थी!!

"सुमन_बुद्ध" के हरम मे तिरसठ लाख स्त्रियाँ थी, और इनकी आयु नब्बे हजार वर्ष थी, तथा सुमन बुद्ध की लम्बाई भी नब्बे हाथ की थी!!

ऐसे ही "रेवत_बुद्ध" की तैंतीस हजार स्त्रियाँ थी और आयु साठ हजार वर्ष की थी, इनकी भी शारीरिक ऊँचाई अस्सी हाथ की थी!

अब विवशता यह है कि एक पोस्ट मे सारे चौबीस बुद्धों का वृतांत लिखने से पोस्ट बहुत बडी़ हो जायेगी! 
पर पाठकगण यह जान लें कि गौतम बुद्ध के अनुसार सभी बुद्धों की आयु कई हजार वर्षों की थी, और सभी के सभी अपने हरम मे कई हजार स्त्रियाँ रखते थे, साथ ही सभी की शारीरिक ऊँचाई भी 80-100 हाथ थी। 
वैसे यहाँ एक बात और विचारणीय है कि जब इन बुद्धों की शारीरिक लम्बाई अस्सी/नब्बे हाथ थी तो इनके शरीर के दूसरे अंग इसी अनुपात मे कितने लम्बे होते रहे होंगे?

क्या ये सब बातें विश्वास योग्य हैं और पहली ही नज़र में नहीं लगतीं कि गप्पें हैं? हम

टीकमगढ_जिले_का_संपूर्ण_इतिहास

 #टीकमगढ_जिले_का_संपूर्ण_इतिहास 
#हमारा_अतीत_हमारी_विरासत
#ओरछा_रियासत_की_टीकमगढ़_राजधानी 
बुन्देलखण्ड का टीकमगढ़ जिला ऐतिहासिक एवं पुरातात्वीय दृष्टि से भारतीय इतिहास में विशिष्ट स्थान रखता है। बुन्देलखण्ड की ओरछा रियासत मध्यकाल में सर्वाधिक चर्चित रियासत रही है। बुन्देला राजवंश के शासकों द्वारा ई. 1531 से 1783 तक ओरछा को राजधानी रूप में उपयोग करने के बाद ईस्वी 1783 में टेहरी को अपनी राजधानी बनाया गया। बुन्देला राजा विक्रमजीत सिंह द्वारा भगवान कृष्ण के एक नाम टीकम के आधार पर टीकमगढ़ नाम रखा।
ऐतिहासिक दृष्टि से देखा जावे तो यह भू-भाग पौराणिक काल में चेदी साम्राज्य का भाग था, जो चौथी शताब्दी ईस्वी पूर्व तक अस्तित्व में बना रहा। मगध साम्राज्य के उत्कर्ष के साथ ही यह भू-भाग मगध का अंग बना, किन्तु स्थानीय प्रशासन का मुख्यालय सागर जिले के एरण नामक स्थल पर बना रहा। एरण के स्थानीय शासकों ने समुद्रगुप्त के आक्रमण तक इस भू-भाग पर अपना अस्तित्व बनाये रखा।गुप्त काल के पश्चात् गुर्जर-प्रतीहार एवं चंदेल शासकों का शासन रहा।चंदेल शासन के बाद बुन्देला राजवंश ने लम्बे समय तक शासन किया। इस काल में बड़े पैमाने पर मंदिरों, महलों, छत्रियों, तालाबों एवं बावड़ियों का निर्माण हुआ, जो हमारी महत्वपूर्ण धरोहर हैं।

इसे क्रमवार ऐसे समझ सकते हैं 
1. पौराणिक काल:,पौराणिक कथानको के आधार पर ऐसा माना जाता है कि बाणासुर की पुत्री ऊषा कुंडेश्वर स्थित ऊषा कुंड पर शिव आराधना करने आती थीं। महाभारत काल में यह धसान के किनारे बसा क्षेत्र दशार्ण देश कहलाता था। यह भू-भाग पौराणिक काल में चेदि साम्राज्य का हिस्सा था।  

2. प्राचीन काल:
लिखित इतिहास से पहले के प्रमाण इस जिले में अनेक स्थान पर बिखरे खंडहरों में मिलते हैं। 
• नाग काल (10 ईसा पूर्व - 220 ईस्वी) का शिवलिंग देवरदा में मिला है जिसे बैजनाथ शिवजी कहा जाता है।  
 • वाकाटक (सन 300-520 ई.) शासकों का मूल स्थान अविभाजित टीकमगढ़ का बाघाट गांव माना जाता है।
 • गुप्त काल के प्रतीक मोहनगढ़ किले में विष्णु मय लक्ष्मी, शेषशायी विष्णु और भेलसी गाँव (बल्देवगढ़ के पास) में वराह की विशाल मूर्ति है। 
3. पूर्व-मध्यकाल:
• 5वीं शताब्दी में यहाँ गहरवार सत्ता और फिर उन्हें हटाकर प्रतिहारों का शासन रहा। प्रतिहार गुप्तों के मांडलिक रहे थे , मडखेरा और उमरी के सूर्य मंदिर प्रतिहार काल के प्रमाण हैं। 
6-पूरे टीकमगढ़ जिले में हर गांव में बने गौड़ बब्बा , गुरइया दाई के चबूतरे यह प्रमाणित करते हैं कि इस क्षेत्र में गौड़ सत्ता भी रही है । वैसे यहां बहुत प्राचीन समय से गौड़ भील इत्यादि रहने के प्रमाण मिलते हैं लेकिन गौड शासकों के बारे में क्रमबद्ध इतिहास प्राप्त नहीं होता है परंतु यह माना जाता है कि टीकमगढ़ जिला खटौला के गौड़ राजा से शासित रहा है । कहा जाता है कि सर्वप्रथम माँदेले ( लोधी ) और दाँगी शासकों ने गौडो को हराकर सत्ता हासिल की थी । टीकमगढ़ ज़िले में कई जगह गौडो के बनाए कौडुआ ( पत्थरों की बांगड) मिलती है जो यहां गौड़ सत्ता की निशानियां है । उत्तर प्रदेश मध्य प्रदेश सीमा पर स्थित रानीगंज महेबा चक्र की पहाड़ी पर जंगल जिसे पठारी जंगल कहते है , बनी विशाल बांगड और अन्य पुरा चिन्ह गौड़ शासकों की निशानियां हैं । 
• 6वीं शताब्दी में बेतवा और धसान के बीच मांदेले (लोधियों) की सत्ता भी प्रभावशाली रही। यह गौडों को प्रतिस्थापित कर सत्तासीन हुए माने जाते हैं । 
4. चंदेल काल - स्वर्ण युग (830 - 13वीं सदी):
प्रतिहारों के बाद टीकमगढ़ चंदेलों द्वारा शासित रहा और इसी काल में सबसे ज्यादा विकास हुआ। इस क्षेत्र को तब जैजाकभुक्ति कहा जाता था। लगभग हर गांव में बने चंदेलकालीन तालाब और मठ इसकी महत्ता प्रमाणित करते हैं।
• कीर्तिवर्मन चंदेल (1053-1100) के मंत्री महिपाल ने नारायणपुर में विष्णु मंदिर बनवाया। 
• सलक्षण वर्मन (1100-1110) ने उर नदी के तट पर सलक्षणपुर (आज का सरकनपुर) बसाया, वहां तालाब, मठ और मंदिर बनवाए।
 • मदनवर्मन (1129-1167) ने जतारा और अहार में मदनसागर तालाब, बल्देवगढ ( बांध) का ग्वालसागर तालाब , अहार में मदनेश्वर का विशाल शिवमठ बनवाया और इस जगह का नाम मदनेशपुरी रखा। उनके काल में बल्देवगढ़, अहार, पपावनी, जिनागढ ,झिनगुआं मे मदन बेर वनवाई गई और अहार के जैन मंदिर भी बने।
 • परमार्दिदेव चंदेल (1167-1237) के समय अहार में सन 1180 में प्रसिद्ध मूर्तिकार पापट ने 21 फीट ऊँची शांतिनाथ भगवान की जैन प्रतिमा बनाई।
परमार्दिदेव की सन 1182 में पृथ्वीराज चौहान से हुई पराजय के बाद भी टीकमगढ़ पर चंदेल शासन बने रहने के प्रमाण मिलते हैं । 
त्रिलौकवर्मन ( 1203-45) के समय ककददाहा ( संभवतः ककरवाहा ) में त्रिलोक वर्मन और मुसलमानों के बीच युद्ध होने और उनके सामंत राउत को मारे जाने के शिलालेख मिले हैं । 
वीर वर्मन ( 1246-1285 ) के समय पपावनी जिला टीकमगढ़ के मैदान में चंदेल सेनापति राउत आभी ने नरवर के राजा गोविंद और ग्वालियर के राजा हरिदेव से सन 1254 में युद्ध किया था जिसमें चंदेल सेनापति राउत आभी की विजय हुई थी । पपावनी के पास स्थित विजय स्तंभ ( जैत खंब ) एक बावड़ी और चंदेली पुरा चिन्ह इस बात की निशानी है ।

5- बुंदेला काल - गहरवार के रूप में इस क्षेत्र के शासक रहे थे लगभग 800 वर्ष बाद यही गहरवार क्षत्रिय बुंदेला के रूप में पुनः इस क्षेत्र में अपनी मजबूत पकड़ बनाने में कामयाब हुए थे । यह काशी से आए माने गए हैं और यह महौनी में अपनी राजधानी बनाए हुए थे । गढ़ कुडार में सोहनपाल बुंदेला द्वारा खंगार सत्ता पर कब्जा करने के बाद जतारा पर भी कब्जा करने के लेख मिलते हैं । सोहनपाल बुंदेला कुड़ार के राजा बनने के बाद सन 1501 तक बुंदेला सत्ता की राजधानी गढकुडार ही रही थी । 
1501 से बुंदेला सत्ता की राजधानी ओरछा बनी एवं इसका नाम ओरछा रियासत रखा गया । 
टीकमगढ़ ज़िला ओरछा रियासत का भाग रहा है । प्रसिद्ध बुंदेला शासक महराजा छत्रसाल की पैत्रिक जागीर महेवा एवं उनकी जन्म स्थली मोर पहाड़ी टीकमगढ़ जिले में ही स्थित है । महराजा छत्रसाल मूल रूप से ओरछा के बुंदेला राजा के वंशज ही रहे हैं । 
सन 1783 में ओरछा के महाराजा बिक्रमजीत में टीकमगढ़ को ओरछा रियासत की राजधानी बनाकर टीकमगढ़ को महत्त्वपूर्ण दर्जा प्रदान किया गया पहले यह टेहरी के नाम से जानी जाती थी और ओरछा रियासत की जागीर होती थी ।

टीकमगढ़ में विक्रमजीत सिंह के बाद हुए शासकों में धर्मपाल सिंह (1817-1834 ई.), तेजसिंह (1834-1841 ई.), सुजान सिंह (1841-1854 ई.), हमीर सिंह (1854-1874), प्रतापसिंह (1874-1930 ई.), वीरसिंह द्वितीय (1930-1947 ई.) शासक रहे।

ओरछा रियासत की टीकमगढ़ राजधानी के अंतिम राजा वीर सिंह जू देव द्वतीय रहे थे जिन्होंने 17 दिसम्बर 1947 को बुंदेलखंड के राजाओं में सर्वप्रथम राज्य शासन की बागडोर जनता के हाथ सौंपकर लोकप्रिय उत्तरदायी शासन की स्थापना कर दी थी । जिसके प्रथम प्रधानमंत्री लाला राम वाजपेयी वनाए गए । केबिनेट के अन्य सदस्यों में चतुर्भुज पाठक अर्थमंत्री , मिथिला प्रसाद गोस्वामी न्याय मंत्री , पं मनकामेश्वर नाथ जुत्सी गृहमंत्री ( शासकीय) बने । 
12 मार्च 1948 को बुंदेलखंड एवं बघेलखंड के राज्यों को मिलाकर विन्ध्य प्रदेश निर्माण हेतु भारत सरकार के गृह विभाग के सचिव वी पी मेनन नौगाँव आए थे । जिन्होंने बुंदेलखंड के सभी राजाओं से रियासतों के विलीनीकरण समझौते पर हस्ताक्षर करवाए थे । 
इस तरह टीकमगढ़ ज़िला विंध्य प्रदेश का हिस्सा बना । फिर 1 नवंबर 1956 को राज्यों के पुनर्गठन के बाद टीकमगढ़ ज़िला मध्य प्रदेश का एक ज़िला बना । 1 अक्टूबर 2018 को टीकमगढ़ ज़िले का विभाजन कर निवाडी जिला अस्तित्व में आया था ।
संकलन -पुष्पेन्द्र सिंह चौहान (कृप्या कापी पेस्ट न करें यह हमारी बौद्धिक संपदा है ) 
#टेहरी_से_टीकमगढ़_को_राजधानी_का_वैभव_प्रदान_करने_वाले_महाराजा_बिक्रमाजीत_की_पुरानी_फोटो_को_AI_से रंगीन किया है । #प्रथमबार_बिक्रमाजीत_महराज_के_दर्शन_करें_क्योंकि_समूचा_टीकमगढ़_इनका_सदैव_ऋणी_रहेगा

Wednesday, 29 July 2026

आरक्षण - जातिवाद

#आरक्षण ---#जातिवाद---#योग्यता
      बीजेपी के लगता है बुरे दिन नहीं बुरा साल 
चल रहा है एक मुसीबत जाती नहीं कि दूसरी पहुंच जाती है
 या खुद मुसीबत बुलाते हैं
अभी तिलचट्टों के हाथों पटखनी खाने के बाद आराम कर ही रहे थे कि 
#ReservationHataoAndolan शुरू हो गया 
      हालांकि मैं भी जानता हूं कि इसका परिणाम कुछ नहीं निकलेगा, सिर्फ सवर्ण समाज अपनी भड़ास निकालेगा तो बाकी दूसरे वर्ग एक दूसरे की मां बहन करेंगे 
    क्योंकि 75 वर्ष से जो आरक्षण की चाशनी चटाई गई है 
वो अब पूरा शक्कर की फैक्ट्री चाहते हैं 
मुझे लगता है अंग्रेज कभी गया ही नहीं आज भी उनके द्वारा फैलाया जाल में फंसा भारत फड़फड़ा रहा है 
एक अंग्रेज लार्ड था #मैकाले 
उसके आने के बाद एक सर्वे कराया गया था मद्रास प्रेसीडेंसी, बंगाल प्रेसीडेंसी, और भी कई इलाकों का ,
जिसमें शिक्षा की स्थिति की रिपोर्ट पेश की गई जिसमें पता चलता है कि भारत के सभी रजवाड़ों में जो भी गुरुकुल थे उस समय स्कूल तो थे नहीं तो जो अपने बच्चों को भेज सकते थे भेजते थे उसमें ऐसा नहीं था कि कोई जाति नहीं थी 
और जाति की अवधारणा भी अंग्रेज ही लेकर आए 
                हमारे भारत में वर्ण था ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य शूद्र 
अंग्रेजी शासन ने सबके काम के आधार पर उनकी जाति बना दी और सरनेम भी रिकार्ड में लिख लिया जो आज भी आर्काइव में मिल जाएगा 
   और चूंकि क्षत्रिय अनेकों जगह शासन किए और अपने राज्य की प्रजा की रक्षा करने और उनका पालन-पोषण की जिम्मेदारी थी तो उनको और ब्राह्मण जो प्रायः गरीब ही थे लेकिन ज्ञान रखते थे वेद शास्त्र पुराण उपनिषद और व्यापार करने वाले बनिया समाज और भी जोड़कर उसे उच्च वर्ग बना दिया, जो जिस काम में निपुण था उसकी जाति बन गई।
          और अंग्रेज़ ने जिस क्रम में लिखा उसे उससे ऊंचा और नीचा बना दिया।
    मैकाले ने शिक्षा नीति बनाई और जो 1947 के बाद भी हमारे देश के कर्णधारो ने वैसा ही अपना लिया, वहीं जाति विभाजन,
     ऊंच नीच , तो छोड़िए संविधान ने नया चार वर्ग बना दिया 
जनरल , ओबीसी, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति 
     कहते हैं कि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति गरीब थे पिछड़ा थे सामाजिक आर्थिक रूप से।
मानता हूं लेकिन बाकी वर्ग भी कोई अमीर नहीं था हमने तो 80 के दशक तक भी अपने गांव के सवर्ण परिवारो को देखा है 
जो अत्यंत गरीबी की जिंदगी जिए है जिनके पास ना पर्याप्त जमीन थी ना धन
लेकिन उनके माथे पर चिपका दिया गया कि तुम शोषण करते हो , हां मानता हूं भेदभाव था लेकिन वैसा नहीं था जेसा वामपंथियों ने प्रचार किया 
        ये तो अपने अपने इलाके में जनसंख्या के ऊपर था अब छत्तीसगढ़ और उड़ीसा, महाराष्ट्र के अनेक इलाकों को मैं जानता हूं जहां दूर दूर तक कोई सवर्ण है ही नहीं , फिर वह गरीब और पिछड़े क्यों रह गए 
असली बात है शिक्षा।
जो शिक्षा पाएगा या पाया था उसने उपयोग किया, भाई संपत्ति में था ही क्या, हमने देखा है सिर्फ जमीन थी और जैसा सबका मकान मिट्टी का और खपरैल वाला होता था सवर्णों का भी वैसा ही था 
      आसपास के आदिवासियों का एक तबका जो मेहनती थे वे काम करने आते थे और बदले में उस समय रूपया नहीं अनाज देते थे 
अब फिर आते हैं संविधान पर , अंबेडकर के अंदर चुल्ल मची थी अलग दलित कांस्टिटेंसी बनाने की जिसका जबर्दस्त विरोध हुआ 
तब संविधान में ही उनको 145 सीट दिए गए जिससे केवल वही चुनाव लड़ सकते थे
और आरक्षण दिया गया हर चीज में नौकरी में शिक्षा में
     चलो ठीक है दिया भाई ठीक है 
परंतु कोई आंकड़ा है कि इससे किसका फायदा हुआ किसका नहीं हुआ, कोई दस्तावेज नहीं बस यही कहानी है कि पांच हजार साल से अत्याचार हुआ, पानी नहीं पीने दिया।
      उसके बाद हमारे होनहार नेता भी समझ गया कि वोटबैंक बनाओ चुनाव जीतो बल्कि और बढ़ाओ ।
‌। ये चीज आगे जाकर विकराल रूप धारण करेगी , जिस हिसाब से दलितों के एक वर्ग में देवी देवताओं को लेकर अपशब्द पढ़ा दिया गया है और हर दिन अपमान करते हैं
   कभी ऐसी नौबत ना आ जाए कि खून की नदियां बह जाए
सच कह रहा हूं नफ़रत बढ रही है 
उधर जिहादी भी टकटकी निगाह लगाए हैं कि खुद तो लड़कर सब करके देख लिया, सवर्णों के कारण ना तो खुलकर धर्म परिवर्तन करवा पा रहे ना ईसाई मिशनरियों का मंसूबा पूरा हो रहा है 
इसलिए सवर्णों को दलितों से मारकाट करवा दो 
   सब गड़बड़झाला है भाई 
आरक्षण नहीं जाएगा मैं भी जानता हूं बल्कि बढ़ता जाएगा 
    जातिवाद को मंसूबा धारी साजिशकर्ता जाने नहीं देंगे 
देश ऐसे ही चलेगा 
जयश्री राम 🙏 🚩 
#castism #UGC #viralpost

Tuesday, 28 July 2026

शरीर वाणी और मन।

शरीर मनो वाक यत कर्म प्रारभते नर:।
न्यायम वा विपरीतम वा तस्य एतै पंच हेतवम्।।
भगवतगीता। 
वाणी से व्यक्त किए गए विचारों से व्यक्ति की पहचान संभव नहीं होती।

 क्योंकि कर्म करने के तीन साधन उपलब्ध हैं। शरीर वाणी और मन।

 अब इनमें मन सबसे महत्वपूर्ण है क्योंकि वह स्रोत है वाणी और शरीर द्वारा किए जाने वाले कर्म का।

और किसके मन में क्या खिचड़ी पक रही है यह जानना संभव नहीं होता साधारण जन के लिए। सिर्फ योगी और महात्मा ही झांक सकते हैं किसी दूसरे के मन में।

जो बोल देता है उसे आप पहचान लेते हो, जो बोलता नहीं है और सारे कृत्य या दुष्कृत्य करता रहता है उसे आप महात्मा मान लेते हो

किसी शायर ने कहा है:
हर आदमी में होते हैं दस बीस आदमी।
जिसको भी देखिए कई बार देखिए।

मुखौटे इतने होते हैं हमारे अंदर, कि कई बार हम स्वयं भी भ्रमित हो जाते हैं कि हमारा असली चेहरा कौन सा है?

सत्य बोलने का साहस नहीं होता सबके अंदर, क्योंकि मनुष्य भविष्य में होने वाले लाभ और हानि का गणित सदैव करता रहता है। इसलिए अनेक मुखौटे धारण करना आवश्यक हो जाता है। मन में अपार घृणा को भी मीठे शब्दों की चाशनी में लपेटकर प्रस्तुत करता है, या करवाता है, यदि उसके अनुयाई हुए तो। और अनुयाई प्रायः वही होते हैं जो लोभ और लाभ की गणित में कुशल होते हैं: मनसा वाचा कर्मणा। 
ऋषियों ने कहा है:
मनसा में वाचा प्रतिष्ठा। 
वाचा में मनसा प्रतिष्ठा। 
अर्थात जो मेरे मन में हो वही मेरी वाणी से मुखरित और ध्वनित हो। और मेरी वाणी से वही मुखरित हो जो मेरे मन में हो।
साधारण सांसारिक जीवन में यदि ऐसा हो तो गर्दनें उतर जाएं, कपार फूट जाय, आपस में, घर परिवार में, पास पड़ोस में, यार मित्रों में, शत्रुओं की तो बात ही छोड़ दीजिए। 
तो क्या ऋषि गण असत्य बोल रहे हैं, गलत सीख दे रहे हैं? 
ऐसा नहीं है। वे असत्य नहीं बोल रहे हैं। असत्य नहीं है परंतु अव्यवहारिक है संसार में, संसारी जीव के लिए। 

 अव्यवहारिक इसलिए क्योंकि आज ही नहीं, पूर्व में भी, व्यवहार का सदैव यही अर्थ रहा है कि वह बोलो जिससे मामला न बिगड़े। सत्य ऐसा हो जो प्रिय हो। जो प्रायः संभव नहीं होता। इसीलिए लोग कहते हैं सत्य कड़वा होता है। 
 व्यवहारिक होना जीवन में सफल होने की कुंजी है। 
  इसे ही आजकल प्रैक्टिकल होना बोला जाता है। 

मुझसे बहुत से लोग बोलते थे कि भाई तुम प्रैक्टिकल नहीं हो। मैं उनसे पूछता था कि इसका अर्थ समझा दीजिए कि ऐसा कहने का तात्पर्य क्या है आपका। वे समझाते नहीं थे। शायद उन्हें स्वयं इसका तात्पर्य नहीं पता था, या संभवत: वे मुझे समझाना नहीं चाहते थे। 
परंतु मेरी समझ के अनुसार व्यवहारिक होने का अर्थ है मुखौटा धारण करना। जिसकी ट्रेनिंग बचपन से ऐसी होती है, वे जीवन में अत्यंत व्यवहारिक होते हैं, सफल होते हैं। सफलता का अर्थ अपने अपने अनुसार व्याख्या कीजिए। परंतु उन्हें अंतत: इतने मुखौटे धारण करने पड़ते हैं कि उन्हें स्वयं का अपना चेहरा विस्मृत हो जाता है। 
ऋषि जो कह रहा है वह उस मार्ग की बात कर रहा है जब आप अपने स्वरूप को जानने की ओर अग्रसर होते हैं। उसने निष्पत्ति बताई है, उस प्रक्रिया की, उस साधन की, जहां ये मार्ग हमें ले जायेगा। जब आप राग द्वेष से मुक्त होंगे, तो आपके मन में ऐसी कोई बात ऐसा कोई विचार आएगा ही नहीं, जिसे व्यक्त करने से किसी को आघात पहुंचे, किसी के मन को चोट पहुंचे। 
ऋषि वीतराग अवस्था के मन की स्थिति का वर्णन कर रहा है, जो है तो सत्य के अत्यंत निकट, परंतु व्यवहारिक नहीं है। इसलिए संसार में जब तक रहना है इस मार्ग को त्याग दें, व्यवहारिक बनें, मुखौटा धारण करें, वरना असफलता निश्चित है। 

इस पर गहन विचार कीजिए। 
❤️❤️

® त्रिभुवन सिंह

राजा राममोहन रॉय

"#राजा_राममोहन_रॉय को 31वर्ष की उम्र में ईस्ट इंडिया कंपनी ने अपने पेरोल (नौकरी) पर रखा। उसने अपना कैरियर क्लर्क के रूप में शुरू किया, और उत्तरी बंगाल के मुर्शिदाबाद अपीलेट कोर्ट के रजिस्ट्रार थॉमस वुडफोर्ड के प्राइवेट क्लर्क (मुंशी) के पद पर पदोन्नति पाया। अंततः उसे ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा दी गई "राजा" की उपाधि मिली। उसने विलियम केरी से सांठगांठ किया, और उसको ब्रिटिश द्वारा ब्रिटिश भारत में "भारतीयों" के लिए शिक्षा तंत्र के सुधारक के रूप में प्रचारित किया गया। बौद्धिक वेश्याएं प्रत्येक स्थान पर हैं। इस तरह "बंगाल माफिया" ब्रिटिश इंडिया में  सांठगांठ करने वाले अन्य लोगों से बाजी मार लिया"। 
: प्रदोष अईच 

यह लेख उद्धृत है प्रदोष aich द्वारा 2015 में लिखी गई एक रिसर्च पुस्तक "TRUTHS" में। पेज 407

इसलिए लिखा गया है कि लोगों को आज भी भ्रम है कि राम मोहन राय कोई राजा थे।
समाज सुधारक थे। 
 
पुस्तक की स्नैप शॉट भी है। 
इस पुस्तक ने विलियम जोन्स, मैक्समूलर मैकाले आदि समस्त फ्रॉडेस्टर का भांडा फोड़ किया है। 

राजा राम मोहन राय कोई राजा नहीं थे। मुंशी थे कचहरी में। 
 यह टाइटल अंग्रेजों ने उन्हें अपना पिट्ठू बनाने के लिए और अपना हित साधने के लिए उन्हें दिया था। 

लेकिन इतिहास में उन्हें समाज सुधारक बताया गया है। 
किस समाज का  सुधारक?
जो समाज अनंतकाल से ईसाई लुटेरों के आने के पूर्व तक विश्व की 25% जीडीपी का उत्पादक था। 
क्या सुधार करता वो व्यक्ति?
आज लोग जीडीपी से परिचित हैं। 
आज चीन की जीडीपी भारत की तुलना में पांच गुना है। अमेरिका से थोड़ा पीछे। 
वहां किसी सुधारक की आवश्यकता अनुभव नहीं करता कोई?
न चीनी, और न कोई ईसाई।
क्यों?
यही है #इति_हास्य का #इतिहास। 

आप उपरोक्त हैशटैग को दबाइए तो आपको ऐसे ऐसे लेख मिलेंगे कि आपको भ्रम हो जाएगा कि इस नाम का  कोई देवदूत अवतरित हुआ था भारत की धरती पर।

यही होती है नरेटिव बनाने की कला। पढ़े लिखे लोग इन्हीं अफवाहों के शिकार हैं। 
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फूलन देवी का असली सच

जानिये फूलन देवी का असली सच जो उसको बेफजूल वीरांगना माने बैठे हुए हैं,,😊🙏

दीदी जानती हो, आज पच्चीस जुलाई है?
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यह तो सच ही है कि बीहड़ के पानी की तासीर ही कुछ ऐसी है कि बदला गोलियों से लिया जाता है। खैर वह दौर तो नहीं रहा जब बीहड़ का मरद मेहरारू की जगह 315 माउजर साथ लेकर सोता था पर किस्सों में बीहड़ खूब जिंदा है।आज पच्चीस जुलाई है और नारीवादियों का नारीवाद उफान पर है। कारण है कि नारीवाद को बीहड़ में हांफ-हांफ कर जिंदा करने वाली बीहड़ की डकैत फूलन देवी की आज पुण्यतिथि है। 

फूलन को मरे एक अरसा हो गया लेकिन अब फूलन की गैंग बीहड़ से निकलकर कैम्पस और मीडिया मंडी तक पहुंच गई है। जितना कबाड़ा फूलन गैंग की बंदूक ने नहीं  किया उससे ज्यादा उसकी गैंग की कलम कर रही है। हमारा तो उसूल रहा है कि बंदूक की बगावत बंदूक से और कलम की बगावत कलम से होनी चाहिए। सिलसिलेवार उन सभी क्रांतिकारियों को यहां जवाब दिया जा रहा है जिन्हें फूलन में नारीवाद की मिसाल नजर आती है।

डार्लिंग, हालातों ने फूलन को डकैत नहीं बनाया और ना ही वह सच पूरा है जो तुम शेखर कपूर की बेंडिड क्वीन के आईने में देखती हो। लेखिका अरुंधति राय लिखती है कि अगर बलात्कार से कोई महिला डकैत बनती तो आज हजारों महिलाएं बंदूक उठाकर बीहड़ में घूम रही होती। 

बीहड़ के जितने भी बागी हुए है उनमें एक जो बात सबसे कॉमन मिलती है वो यह है कि हर गैंग का सरदार अपनी गैंग में एक लौंडिया जरूर रखता था। निर्भय सिंह गुर्जर तो इस मामले में इतना उस्ताद था कि बिग बॉस फेम सीमा परिहार,सरला जाटव,नीलम गुप्ता उसकी गैंग में हुआ करती थी। पुलिस ने भी अपनी सरकारी रायफल की गोलियां इन लौंडिया के कंधों पर रखकर ही दागी है। एक दौर में मुरैना जिले के नामी बागी हुए रमेश सिंह सिकरवार अपने इंटरव्यू में कहते है कि बीहड़ में बागी को लंगोट का पक्का होना चाहिए क्योंकि पुलिस जब रडार पर लेती है तो सबसे पहले बागी का लंगोट ही खोलती है।

खैर, हुआ यूँ था कि एक डकैत की यौन इच्छा ही फूलन को बीहड़ तक ले आई थी। फूलन उन दिनों अपनी रिश्तेदारी में गई हुई थी। वहां से बाबू सिंह गुर्जर नाम का एक डकैत फूलन को उठाकर बीहड़ में ले जाता है। बाबू सिंह गुर्जर की गैंग में ही एक रंगरूट होता है जिसका नाम विक्रम मल्लाह है। वह फूलन की ही जात का है और फूलन के यौवन पर लट्टू हो जाता है। बागियों की गैंग का एक ओर उसूल होता है कि लौंडिया पर पहला हक गैंग के सरदार का होगा। लेकिन विक्रम मल्लाह को फूलन का बाबू सिंह गुर्जर के साथ हमबिस्तर होना नागवार गुजरता है। फूलन यह बात भी भली भांति जानती है कि विक्रम उस पर लट्टू हुआ पड़ा है। लेकिन फूलन वह सब स्वीकार करती है जो गैंग का उसूल है। बागियों की सल्तनत में क्या ? उसूल और काहे की आजादी। 315 माउजर की 8 MM की नली के आगे या तो मरो या मार डालो। विक्रम मल्लाह एक दिन अचानक मौका देखकर अपने सरदार बाबू सिंह गुर्जर की हत्या कर देता है और खुद गैंग का सरदार बन बैठता है। बाबू सिंह गुर्जर की हत्या के बाद विक्रम को गैंग और फूलन दोनों मिल जाती है। लेकिन फूलन की किस्मत में अब भी हांफना ही बचता है बस मरद बदल जाता है।

वक्त गुजरता है और सलाखों में बन्द एक खूंखार बागी लालाराम वापस गिरोह में लौटता है। विक्रम मल्लाह भी इसी लालाराम का शार्गिद है तो एक बार फिर गैंग का सरदार और फूलन का मरद दोनों बदल जाते है। इस बात से परेशान विक्रम अपनी नई गैंग बना लेता है और ठाकुरों की गैंग से उसकी छिटपुट झड़पें चलती रहती है। एक दिन बड़ी मुठभेड़ में विक्रम मल्लाह ढेर हो जाता है। लालाराम की गैंग फूलन को उठाकर बेहमई गांव ले जाती है जहाँ उसके साथ बलात्कार होता है। 

अब यहां एक और बात समझने की जरूरत है कि फूलन को बेहमई गांव ही क्यों ले जाया जाता है। जबकि लालाराम और राम ठाकुर तो बेहमई गांव के नहीं थे। राम ठाकुर का गांव बेहमई गांव के पास ही दमनपुर है तो इस पूरी कहानी में बेहमई गांव की क्या भूमिका है। नदी के किनारे बसा यह गांव बागियों के छिपने का बढ़िया और सुरक्षित ठिकाना हुआ करता था। जबकि इस गांव के लोग ना तो राम ठाकुर की गैंग में शामिल थे और ना ही फूलन पर उन्होंने कोई अत्याचार किया। बल्कि बेहमई गांव के लोग तो खुद ही इन बागियों से परेशान थे। ये बागी जब मन आये तब ही इस गांव के लोगों को धमकाकर रासन, पैसे और जरूरी सामान ले जाया करते थे। 

बेहमई गांव से फूलन जैसे तैसे बच निकलती है और यहां से देश और बीहड़ दोनों के जातीय समीकरण तेजी से बदलते है। यह ठीक वहीं दौर था जब मान्यवर काशीराम 'तिलक तराजू और तलवार इनको मारो जूते चार' का झंडा उठाये हुए थे और लालू जैसे दोगले समाजवादियों ने भूरा बाल साफ करो कि अमल(अफीम का पानी) पिछड़ों को चटा दी थी।

ये सब कवायद तो संसद का समीकरण बदलने की थी लेकिन संसद से पहले इस समीकरण की चपेट में बीहड़ आ गया। उस वक्त बीहड़ में हर दूसरी गैंग ठाकुरों की थी। हर दूसरी गैंग का सरदार भी ठाकुर ही हुआ करता था। लेकिन बाकी जातियों ने तय कर किया कि अब ठाकुरों की गैंग में रहकर पिट्ठू लादने से अच्छा है कि खुद की गैंग बना ली जाए और फूलन ने इस काम के लिए एक बहाना दे दिया। ठाकुरों की गैंग से परेशान दूसरे रंगरूट फूलन को साथ लेते है और एक दिन बेहमई गांव पहुंच जाते है। वहां फूलन द्वारा एक आवाज दी जाती है कि राम ठाकुर और लालाराम कहाँ है। उसके बाद पूछा जाता है कि इस गांव से राम ठाकुर की गैंग को रसद कौन देता है। मतलब फूलन अपने साथ हुए बलात्कार का बदला लेने नहीं बल्कि उस गांव के लोगों को इस लिए मारने गई थी कि वे राम ठाकुर को रसद देते थे। 

एक रिपार्ट यह भी बताती है कि बेहमई कांड में गोली चलाने का आदेश खुद फूलन ने नहीं दिया था। जबकि फूलन तो गोलीबारी के बीच इतना कांप गई कि उससे बंदूक की एक गोली तक नहीं चली। गोली चलाने का आदेश फूलन के पीछे खड़े गैंग के दूसरे सरदार ने दिया। 

बेहमई गांव में फूलन की गैंग द्वारा की गई ठाकुरों की हत्या ने पूरे देश मे सनसनी ला दी। फूलन एक बड़ी आबादी के लिए आदर्श बन गई। लोकतंत्र में एक वर्ग का आदर्श बराबर एक वोटबैंक का ठेकेदार भी होता है। मीडिया अब तक इस हेड लाइन के साथ गाल बजाता है कि अपने ऊपर हुए अत्याचार का बदला लेने के लिए फूलन ने ठाकुरों को मौत के घाट उतार दिया। 

यहां से राजनीति की चौसर जमती है। ठाकुरों की गैंग फूलन को सलटाने के लिए बीहड़ छान मारती है लेकिन फूलन का जिंदा रहना अब राजनीतिक समीकरणों को जिंदा रखने के लिए जरूरी हो गया था। फूलन के साथ जिस मल्लाहों की गैंग ने बेहमई कांड किया था वह पूरी गैंग अचानक भूमिगत हो जाती है और उत्तर-प्रदेश के बीहड़ों को छोड़कर मध्य-प्रदेश के बीहड़ों में गुजर बसर करती है। मध्य-प्रदेश में उन दिनों दलित और पिछड़ों के मसीहा अर्जुन सिंह शासन कर रहे थे। फूलन का ठाकुरों की किसी गैंग के साथ सीधी मुठभेड़ में गिराया जाना एक वोटबैंक का बड़ा नुकसान था। इसलिए फूलन को भीतर से कितना राजनीतिक संरक्षण मिला इस बात से रत्तीभर भी इनकार नहीं किया जा सकता है। लेकिन फूलन को बहुत जल्दी समझ आ गया कि इन हालातों में बीहड़ में बसर करना ज्यादा दिन मुमकिन नहीं हो पायेगा। अंततः 14 फरवरी 1981 को फूलन मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह के सामने आत्मसमर्पण कर देती है। जेल काटने के बाद मुलायम सिंह यादव फूलन को संसद पहुंचा देते है। 

राजनीतिक समीकरण फिर बदलते है और उत्तर प्रदेश के दलित बहुजन समाज पार्टी के पीछे लामबंद होते है। मुलायम को समझ आ जाता है कि अब फूलन का पोलिटिकल माइलेज पहले वाला नहीं रहा क्योंकि दलित वोटबैंक मायावती के पीछे हो लिया था। समाजवादी पार्टी को समझ आया कि कैसे भी ठाकुरों को लपक लिया जाए तो माइलेज का मामला जम जाएगा। चरकनगर की एक राजनीतिक सभा से इसकी शुरुआत होती है जहां मंच पर फूलन और मुलायम सिंह दोनों होते है। फूलन का भाषण होता है वह कहती है कि "ठाकुरों का मेरे ऊपर बहुत उपकार है। जब मैं बीहड़ में चारो तरफ से घिर गई थी तो इसी इलाके के ठाकुर जसवंत सिंह सेंगर की कृपा से मेरी जान बच पाई।"

ओह माय गॉड व्हाट इज दिस? फेमिनिज्म का मेकअप उतार कर थोड़ा पॉलिटिक्स भी समझा करो ना डार्लिंग।

उसके बाद जानती हो क्या हुआ डार्लिंग ? एक कुसमा नाइन नाम की बागी भी हुई थी उसी बीहड़ में। फूलन से कहीं ज्यादा क्रूर और बर्बर। उन दिनों वह फूलन के जानी दुश्मन लालाराम की गैंग की कमांडर हुआ करती थी। एक दिन कुसमा बेहमई कांड का बदला लेने के लिए फूलन की जाति के 13 मल्लाहों को लाइन में लगाकर 325 माउजरों से भून देती है इस ऐलान के साथ कि मैंने ठाकुरों की हत्या का बदला लिया है।

फूलन और कुशमा की आपसी हत्या प्रतिस्पर्धा में ही भदेख रियासत अंतर्गत रोमाई देवरा गांव वीराने में बदल गया और उससे जुड़ी 2500 एकड़ उपजाऊ जमीन आज भी बंजर है ।

जो फूलन ने बोया वह कुसमा ने काट लिया। उधर 20 मारे गए। मैंने कहा था ना कि बीहड़ की तो तासीर ही ऐसी है कि गोली का बदला बस गोली होती है। दिल किया तो तुम्हें कभी कुसमा नाइन की कहानी भी सुना देंगे। 

साभार:- ✍️


सच्चाई थोड़ा अधूरी वही फूलन को उसके चाचा ने सबसे पहले परिवारिक झगड़े शोषण किया जेल भेजा ठाकुर ने जेल छुड़वाया था उसी समय फूलन खुद चाचा से बदला लेना चाहती थी प्रतिशोध की आग जल रही तभी उड़ने बीहड़ की तरफ़ गूजर की ओर गई थी दूसरी बात गांव। ठाकुर की हत्या वो प्लान मुलायम का सम्बन्ध मान अहीर डाकू से था उसने हत्या की थी ये डाकू के संग खुद गई कोई ठाकुर शोषण नहीं किया इश्का गैंग लाला राम श्रीराम की होती थी वो जेल जाने से गुजर और मल्लाह उसे चला रहे थे डाकू खुद सुंदरी सुरा रखते थे

भीमा कोरेगांव का सच

यह समुदाय से कोई झगड़ा नहीं है लेकिन भीमकोरेगांव 1818 के नाम पर गलत नॉरेटिव फैलाया जाएगा तो उसका 
जवाब दिया जाएगा हमारा किसी की जाति या संप्रदाय से कोई झगड़ा नहीं है लेकिन सत्य को असत्य नही लिखने दिया जाएगा 
इतिहासकारों की दृष्टि से जनवरी 1818 भीमा कोरेगांव का मंजर था पेशवाओं की 30000 सेना के सामने अंग्रेजों की 90 हजार सेना खड़ी है यह पेशवाओं और अंग्रेजों के मध्य तीसरी लड़ाई भी है इससे पहले दो लड़ाई अंग्रेज बुरी तरह से हार चुके हैं और अपनी पूरी शक्ति के साथ तीसरी लड़ाई में डटे हुए है इस हार का मतलब है अंग्रेज देश छोड़कर भाग जाते हैं इस युद्ध में भी पेशवाओं की सेना अंग्रेजो भारी पड़ रही है लेकिन इसी बीच में पेशवाओं ने अपने रेजीमेंट में महार जाति के 500 जमादारों को पेशवाओं के सेना में गद्दारी करने के लिये इनाम के लालच में भेज दिया जो अंग्रेजों की नौकरी करने के नाम पर वहां पर गए और वहां जाकर उन्होंने धोखे से पेशवाओं के रसद में जहर मिला दिया जिसके कारण पेशवा बीमार पड़ने लगे कुछ मर गए और पेशवा वह युद्ध हार गए जिसके कारण देश गुलाम हो गया और पेशवा को लाकर बिठूर के जेल में अंग्रेजों ने कैद कर दिया महारों की इस गद्दारी को इतिहास में लिखा गया और देशवासियो ने गद्दारी की सजा में सामाजिक बहिष्कार में #म्हारो_को_अछूत_घोषित कर दिया गया दूसरी ओर अंग्रेजों ने महारो को इस बात के लिए आरक्षण दिय और #महारों के नेता अम्बेडकर ने इस गद्दारी को छुपाने के लिए नया स्वांग रचते हुए 1926 में भीमा कोरेगांव में 30हजारसाहसी पेशवाओ पर 500 महारों की जीत का जश्न मनाना शुरू कर दिया जो आजाद भारत में भी 2018 तक मनाया गया... अंबेडकर ने अपनी किताब में लिखा है कि अगर महार ना होते तो अंग्रेज इस देश पर शासन न कर पाते.. इसको कहते हैं चोरी और सीना जोरी..
 क्या कभी संभव है कि 500 महार 30000 परम् वीर अदमय साहसी पेशवाओं के सामने एक मिनट भी टिक पाते.. जिन्होंने 41 लड़ाईया में विजित रहकर मुगलों का लगभग लगभग सफाया कर दिया था.. जिनके डर से दिल्ली का मुगल शासक 3 दिन तक बंकर में छुपा रहा हो.. उनके लिए 500 जमादार ऐसी बातें कहेंगे तो चुप नहीं रहूंगा..
 जो अंग्रेजों की सेना में जमादार थे वह लोग भी जब अपना इतिहास बताते हैं तब मुझको अपनी लेखनी चलानी पड़ती है ताकि सत्यता सामने आ जाए और लोग दिशा भ्रमित ना हो..
 अपनी गद्दारी से देश को गुलाम बनाने वाले अपने आप को तीस मार खाँ ना लिखें..
 जिसको ना पता हो वे इतिहास के किताब को उठाएं गूगल सर्च करें और इतिहास के प्रोफेसर से डिस्कशन करें

Sunday, 26 July 2026

मोदी और मुल्ला प्रेम 3

हिंदू बेवकूफ होता है.
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उसे बेवकूफ बनने में मजा भी आता है.
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बहुत जल्दी प्रचार तंत्र के झांसे में आ जाता है और झांसे में आकर व्यक्ति पूजा में जुट जाता है.
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पहले अंग्रेजों द्वारा भारतीय राजनीति में इंप्लांटेड मोहनदास को महात्मा बनाकर अपने सर पर बैठा लेता है और ईश्वर अल्लाह तेरो नाम गाना शुरू कर देता है.
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मोहन दास के गुणगान और पूजा शुरू कर देता है.
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करोड़ों की संख्या में कट जाता है अपनी मां, बहन, बेटियों की इज्जत लुटा कर... पीढियों की अपनी संपत्ति गंवाकर... जब आंखें खुलती हैं तो रोता हुआ गांधी को कोसता है और गोडसे को धन्यवाद देता है.
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फिर उसे बेवकूफ बनाने को दूसरा गुजराती आ जाता है. 56 मुस्लिम देशों की उम्मत द्वारा भारतीय राजनीति में इंप्लांटेड यह गुजराती, गुजरात दंगों में 300 से ज्यादा हिंदुओं की हत्या करने और 50,000 हिंदुओं को जेलों में ठूंस देने के बाद... त्रिपुंड लगाकर फोटो खिंचवाकर, खुद को हिंदू हृदय सम्राट बना कर दिखाने का प्रचार करता है, और देश की सत्ता प्राप्त करते ही मुसलमानों के विश्वास को जीतने का नारा देता है और जी जान से मुसलमानों का विश्वास जीतने में लग भी जाता है.  
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बेवकूफ हिंदू फिर झांसे में आकर आरती उतारने लगता है और अंधी भक्ति में जुट जाता है.
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उससे पूछो कि भैया 10 वर्षों में हमारे लिए काम क्या किया यह भी तो बताओ? 
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तो अनपढ़ अंध भक्त अपने भगवान पर उंगली उठाने के जुर्म में गाली गलौज पर उतर आता है.
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तो मेरे प्यारे... बहुत ही अकलमंद मोदी की तरह ही बिल्कुल असली डिग्री वाले हिंदूओ... जरा नीचे पूछे गए सवालों का जवाब तो देने की कोशिश तो करो.
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और नहीं दे पाओ तो आंखों पर एक पट्टी और बांधकर ईश्वर अल्लाह तेरो नाम का गाना चालू रखो.
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क्योंकि तुम बेवकूफ बनने... कटने... और मरने के लिए ही बने हो.
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हम हिंदुओं के वोटों से सत्ता सुख भोग रहे नरेंद्र मोदीजी... भाजपा... और मोहन भागवत जी कृपया हम हिंदुओं के प्रश्नों का जवाब दीजिए.
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1....... विपक्ष में रहते हुए पहले जिस सच्चर कमेटी का आप लोग स्वयं पुरजोर विरोध करते रहे... सत्ता में आने के बाद उसी सच्चर कमेटी के हिंदू विरोधी प्रावधानों को क्यों लागू कर दिया? 
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2....... CAA बना तो लिया पर उसे आज तक लागू क्यों नहीं किया? CAA के तहत जान बचाकर भारत के बॉर्डर पर इकट्ठा हुए बांग्लादेशी हिंदुओं को देश में शरण क्यों नहीं की गई??? उन्हें लुटने मरने के लिए बॉर्डर से वापस क्यों भेजा गया??? मोदी जी अपने रोहिंग्या और बांग्लादेशी मुसलमान को लाखों की संख्या में देश में बसाया है.. क्या रोते-बिलखते अपनी जान की भीख मांगते कुछ हजार हिंदुओं को हिंदुओं के देश में, हिंदुओं की सरकार, कुछ दिन भी शरण नहीं दे सकती थी???
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3....... मोदी जी द्वारा खुद गुजरात में और भाजपा द्वारा अनेक राज्यों में मुसलमानों को रिजर्वेशन का फायदा दिलाने के लिए OBC में शामिल क्यों किया गया? हमारे ओबीसी भाइयों का हक छीनकर मुसलमानों को फायदा क्यों पहुंचाया गया???
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4....... केवल दिखावे के लिए धारा 370 हटाकर 1 साल बाद ही एग्रीकल्चरल लैंड कानून बनाकर, 15 साल का डोमिसाइल लगाकर बैकडोर से धारा 370 वापस क्यों लागू कर दी गई? क्यों नहीं भारत देश के नागरिकों को कश्मीर में जमीन खरीदने का अधिकार नहीं दिया गया???
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5.... .. एन.आर.सी.... एन.आर.सी... का झुनझुना क्यों बजाते रहे... आज तक देश में एनआरसी क्यों नहीं लागू किया गया? क्यों नहीं देश में घुसे मुस्लिम घुसपैठियों की पहचान नहीं की जा रही???
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6....... मोदी जी 2014 के पहले जिन्हें देश से बाहर निकालने के लिए चीख-चीख कर भाषण देते फिर रहे थे, उन रोहिंग्या और बांग्लादेशी घुसपैठियों को देश से बाहर क्यों नहीं भेजा?
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7....... मोदी सरकार ने दिल्ली में रोहिंग्या / बांग्लादेशी मुसलमानों को पुलिस सुरक्षा के साथ EWS फ्लैट्स क्यों दिए?
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8....... कांग्रेस से मांग करते रहे पर खुद सत्ता में आने के बाद रामसेतु को राष्ट्रीय स्मारक घोषित क्यों नहीं किया? विपक्ष में रहकर मोदी जी अहमदाबाद का नाम बदलकर कर्णावती करने की मांग कांग्रेस से लगातार करते रहे... पर उन्हें खुद सत्ता में आए 11 वर्ष बीत गए, अहमदाबाद का नाम कर्णावती क्यों नहीं किया गया???
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9....... प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठते ही राम मंदिर के लिए ढाई एकड़ जमीन का अधिग्रहण करने के लिए एक लाइन का अध्यादेश क्यों नहीं लाए? लगभग 5 साल कोर्ट के निर्णय की प्रतीक्षा क्यों की गई और शंकराचार्यों, हिंदू संतो और हिंदू संगठनों द्वारा लड़े गए केस का निर्णय हिंदुओं के पक्ष में आने के बाद सारा क्रेडिट स्वयं क्यों ले लिया गया?
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10..... अयोध्या में 5 एकड़ जमीन मुसलमानों को मस्जिद बनाने के लिए देने वाले कोर्ट के आदेश पर आपत्ति क्यों नहीं की?
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11..... हमारी आस्था के केंद्र मथुरा और काशी के मंदिरों को अपने एजेंडे से बाहर क्यों किया?
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12..... ज्ञानवापी विवाद में हिंदुओं की ओर से लड़ रहे एडवोकेट विष्णु शंकर जैन का समर्थन क्यों नहीं किया?
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13..... मुसलमानों के सबसे बड़े संगठन तबलीगी जमात के मुखिया मौलाना साद को गिरफ्तार करने की बजाए आधी रात को देश के सर्वोच्च शक्तिशाली एनएसए अजीत डोभाल को उससे सलाह मशविरा करने के लिए भेज कर, उसे कहां और क्यों छिपा दिया गया? 
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14..... अनेक राज्यों में हिंदू हित के लिए अपनी आवाज उठा रहे आंदोलनरत हिंदुओं पर लाठियां क्यों चलवाई गईं?
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15..... बंगाल में हिंदुओं के ऊपर हिंसा, बलात्कार, आगजनी और पलायन क्यों नहीं रोका गया? क्या इसलिए कि मरता और पिटता हुआ हिंदू आप को वोट देता है और वोटों की खातिर आप उसे पिटने-मरने के लिए छोड़ देते हैं?
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16..... मणिपुर में कृष्ण भक्त मैतेयी हिंदुओं को मार रहे, उनके घरों और दुकानों को जला रहे कुकी आतंकियों के खिलाफ आप कार्रवाई क्यों नहीं कर रहे? क्यों नहीं उन बेकसूर हिंदुओं की हत्याओं और बलात्कार पर आपके मुंह से एक शब्द भी नहीं फूट रहा??? क्यों उन कृष्णभक्त मैंतेई हिंदुओं के ईसाई कुकी हत्यारों के साथ सरकार चला कर उन्हें बढ़ावा दिया जा रहा है??? क्या देश के हिंदुओं ने आपको हिंदुओं को मरवाने के लिए वोट देकर सत्ता सुख प्रदान किया था???
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17..... पूरे देश में हो रही स्वयंसेवकों, अपने कार्यकर्ताओं और अन्य हिन्दुओं की नृशंस हत्याओं पर दुख क्यों नहीं व्यक्त किया गया और शबाना आजमी को चोट लगने पर मोदी जी तुरंत संवेदना व्यक्त करने क्यों निकल आए? क्यों बाइक चोर तबरेज अंसारी, दो तस्कर पहलू खान और गौ हत्यारे अखलाक के लिए मोदी जी आंखों में आंसू लाकर बयान देने निकल आए???
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18..... हिंदू संस्कृति और धर्म की रक्षा के लिए के लिए अपनी जान पर खेलकर मुस्लिम तस्करों से लड़ते आ रहे जांबाज गौरक्षकों को गली का गुंडा क्यों कहा गया? उनके डोजियर तैयार करवाने का निर्देश देकर उन्हें अपराधी क्यों बनाया गया?
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19..... मेवात में दंगाई मुसलमानों से हिंदुओं की रक्षा के लिए आगे आए मोनू मानेसर और उसके साथी बहादुर हिंदू युवकों को गिरफ्तार क्यों किया गया?
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20..... केन्द्रीय स्तर पर आज तक गौहत्या निषेध कानून क्यों नहीं बनाया गया?
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21..... जीवित पशुओं को विदेश भेजकर कटवाने के लिए विक्रय करने का हिंदू धर्म विरोधी फैसला क्यों किया गया?
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22..... आतंकवादियों पर लगाम लगाने के लिए विदेशी चंदा कानून (FCRA) निरस्त क्यों नहीं किया गया?
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23..... कांग्रेसियों द्वारा बनाए गए और हिंदुओं की संपत्ति हड़प रहे वक्फ एक्ट और वक्फ बोर्ड को समाप्त क्यों नहीं किया गया?
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24..... हिंदुओं के मंदिरों पर कब्जे के लिए कांग्रेसियों द्वारा बनाए गए Places of Worship Act को निरस्त क्यों नहीं किया गया?
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25..... हिंदुओं के मंदिरों को सरकारी नियंत्रण से मुक्त क्यों नहीं किया? हमारे मंदिरों को दिए गए दान का पैसा मुस्लिमों और ईसाइयों के समाज के लिए खर्च करने पर रोक क्यों नहीं लगाई जा रही?
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26..... मोदी जी की डबल इंजन सरकार ने कर्नाटक में 2600 से ज्यादा हिंदू मंदिर क्यों तुड़वा दिए?और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ तथा विश्व हिंदू परिषद ने इसके विरोध में आवाज क्यों नहीं उठाई???
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27..... मोदी सरकार द्वारा काशी विश्वनाथ काॅरिडोर बनाने के लिए हजारों वर्ष पुराने सैकड़ों पुराणोक्त मंदिर व मूर्तियां क्यों तुड़वाए गए? और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ तथा विश्व हिंदू परिषद ने इसके विरोध में आवाज क्यों नहीं उठाई???
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28..... UPSC और अन्य सरकारी नौकरियों में मुसलमानों की अधिकाधिक भर्ती करने के लिए छात्रवृत्ति, मुफ्त कोचिंग आदि योजनाएं क्यों बनाईं गई? हिंदुओं पर राज करने के लिए एक एक लाख रुपए की सरकारी मदद दे दे कर और इंटरव्यू में 13-13 नंबर बढ़ाकर कांग्रेस के जमाने से 10 गुना ज्यादा मुस्लिम आईएएस और आईपीएस क्यों बनाए गए?
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29..... अयोध्या में राममंदिर के समूचे शिल्पकार्य का कान्ट्रैक्ट राम मंदिर के दुश्मन और राम मंदिर की लड़ाई के दौरान हजारों हिंदुओं के हत्यारे मुसलमानों की कंपनियों को क्यों दिया गया?
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30..... कांग्रेस से भी कई गुना ज्यादा मुस्लिम तुष्टिकरण क्यों किया जा रहा है?
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31..... पिछले 9 वर्षों के लंबे समय में आप लोगों ने अहिंसक और शांतिप्रिय हिंदुओं की रक्षा हिंसक मुसलमानों से उनकी जान माल की सुरक्षा और हितों के लिए क्या किया?
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32..... मुस्लिमों की तेजी से बढ़ती जनसंख्या पर नियंत्रण के लिए कानून क्यों नहीं लाए गए?
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33..... मुस्लिम समाज के लिए अपनी लड़कियों की शादी 15 साल में करके उनकी जनसंख्या तेजी से बढ़ा कर भारत पर कब्जा करने के षडयंत्र को रोकने के लिए कोई कानून क्यों नहीं बनाया गया. या फिर हिंदू लड़कियों की शादी 18 साल से कम पर नहीं हो सकती यह कानून क्यों नहीं हटाया गया?
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34..... ईसाइयों और मुसलमानों द्वारा हिंदुओं का तेजी से किया जाता धर्मांतरण रोकने के लिए कड़ा कानून क्यों नहीं बनाया गया?
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35..... 14% मुसलमानों को हिंदुओं के खून पसीने की कमाई का 40% हिस्सा उनके लिए 300 विशेष योजनाएं बनाकर क्यों दिया गया?
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36..... हिंदुओं से अनाधिकृत रूप से जजिया कर वसूल करने वाली और हिंदुओं के उस पैसे को हिंदुओं के ही विनाश में लगाने वाली लाखों करोड़ की हलाल सर्टिफिकेशन की व्यवस्था को क्यों समाप्त नहीं किया गया? आज हिंदू अपने परिवार के लिए जो भी खरीदता है उसमें मुसलमानों के हलाल सर्टिफिकेशन का जजिया कर भी चुकाता है. यहां तक कि बाबा रामदेव तक को अपने सारे प्रोडक्ट पर हलाल सर्टिफिकेशन का निशान मुसलमानों से खरीदना पड़ता है.
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37..... क्यों पिछले 9 वर्षों में हमारे ही देश में हमारे धर्म की शिक्षा हमारे बच्चों को देने की आजादी हम हिंदुओं को नहीं दी गई?
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38..... क्यों पिछले 9 वर्षों के लंबे समय में औरंगजेब बाबर हुमायू के नकली इतिहास को हटाकर हमारे गौरवशाली इतिहास को भारत की शिक्षण व्यवस्था में शामिल नहीं किया गया?
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39..... क्यों 9 राज्यों में अल्पसंख्यक हो चुके हिंदुओं को अल्पसंख्यक का दर्जा और सुविधाएँ नहीं दिलवा पाए? 
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40..... क्यों देश के शिक्षा तंत्र से ईसाईयों का नियंत्रण नहीं हटा पाए, जिनका एकमात्र मकसद भारत के हिंदुओं पर ईसाई सभ्यता और संस्कारों को थोप कर परोक्ष धर्मांतरण है. 
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41..... मुसलमानों की दादागिरी, गुंडागर्दी, लवजिहाद, हिंदुओं के हर त्यौहार पर पत्थरबाजी और सर तन से जुदा के विरुद्ध कानून क्यों नहीं बनाए गए?
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42..... क्यों हमारे देश की सबसे बड़ी मेजोरिटी मुसलमानों का अल्पसंख्यक दर्जा समाप्त नहीं किया गया?
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43..... अल्पसंख्यक मंत्रालय और अल्पसंख्यक आयोग को खत्म क्यों नहीं किया गया?
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44...... बिल्कुल असली डिग्री वाले मोदी जी हर साल दरगाहों पर चादर चढ़ाकर हिंदुओं को क्या संदेश देना चाहते हैं???
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45..... मोहन भागवत जी... 50 साल के लिए अपने देवी देवता भूल जाओ... मुसलमानों के बिना हिंदुत्व की परिकल्पना भी नहीं की जा सकती... हिंदू और मुसलमान का डीएनए एक है... हर मंदिर के नीचे शिवलिंग क्यों ढूंढना... राम मंदिर आंदोलन में हिस्सा लेना हमारी मजबूरी थी और संघ इसके बाद किसी भी मंदिर आंदोलन में कोई हिस्सा लेना नहीं चाहता... हिंदू समाज में समलैंगिकता महाभारत के जमाने से ही चली आ रही है... हिंदुओं में शादी एक कॉन्ट्रैक्ट होता है... जैसे ज्यादा अकलमंदी भरे आपके बयानों के पीछे हिंदू समाज को कौन सी दिशा देने का इरादा होता है?
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मोदी मुल्ला प्रेम 1

आज भी मुगलों के अंडकोष पर झूला झूल रही है मोदी सरकार
कटु किंतु यही सत्य है 

-दिलीप पाण्डेय

ये लाइन लिखने के लिए इसलिए विवश हुआ क्योंकि धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद किसी चम्पू ने ये रोना रोया कि बताओ उस शिक्षा मंत्री को हटा दिया गया जिसने मुगलों को इतिहास से हटा दिया । 

ये पूरी तरह गलत है । आज भी भारत के स्कूलों में भोले भाले बच्चों को मुगलों का पाठ पढ़ाया जा रहा है । इतिहास में किसी का नाम लिखा जाना उसका महिमा मंडन ही होता है । या तो फिर नाम इस तरह लिखा जाए कि पाठक के मन में घृणा पैदा हो । लेकिन वर्तमान इतिहास की स्कूली पुस्तकें नीरस हैं जिनसे बच्चों को कोई भी प्रेरणा नहीं मिलती है ना ही विदेशी हमलावरों के खिलाफ कोई घृणा पैदा होती है । ये मर्द वाली बातें हैं जो जफर सरेशवाला के चरणचुंबक नपुंसक लोग कभी नहीं समझ पाएंगे । 

चलो वक्फ बोर्ड नहीं खत्म कर सके... एक कानून लाकर पुरानी अवैध वक्फ इमारतों को वैध कर दिखावे की मर्दानगी पर तालियां बटोर ली लेकिन कम से कम इतिहास तो सही कर सकते थे क्या इससे भी अमेरिका रोक रहा था ?

12 साल बहुत होते हैं । एक पीढ़ी तैयार हो जाती है । 12 साल हो गए मोदी सरकार को अगर इतिहास भी हिंदुत्ववादी लिख दिया होता तो भी हम मानते कि इस सरकार ने कम से कम कुछ तो सुधार किया स्कूली शिक्षा में ।

सीखो इजराइल से... क्या इजराइल ये पढ़ाता है कि हिटलर के नाजी साम्राज्य की वास्तुकला कैसी थी और उन्होंने कौन कौन से युद्धों में जीत दर्ज की थी ? 

सारी दुनिया मानती है कि इस्लामिक राज में हिंदुओं के साथ जो हुआ वो दुनिया के इतिहास में बर्बरता की पराकाष्ठा है लेकिन ये मोदी सरकार मुगलों की वास्तुकला का पाठ पढ़ाते हुए मुगलों के अंडकोष से खेलते हुए ये दावा भी करती है कि वो हिंदूवादी है । 

इसको वो मुगलिया वास्तुकला नजर नहीं आती जिसमें सिरों के मीनार बनाए गए थे । अरे ! तुम्हारे अंदर इतनी भी बौद्धिकता नहीं कि स्कूली इतिहास इस लायक लिख सको कि हिंदू बच्चों को हिंदुत्व की प्रेरणा मिले । 

कालापानी में जाकर सावरकर की फोटो के आगे मत्था रगड़ते रगड़ते बोर हो गए तो ब्रह्माजी को रंडीबाज बताने वाले ज्योतिराव फुले के कदमों में लेट गए । यही तुम्हारी बौद्धिकता है । तुम सावरकर के अनुयायी हो कि फुले के ये तो तय कर लो ? 

अगर सच में कोई सावरकर के विचारों पर चलने वाली सरकार 12 साल तक चली होती तो आज देश में आमूलचूल परिवर्तन देखने को मिलता जो हमें बिलकुल भी नजर नहीं आ रहा है । नजर आ रहे हैं तो प्रधानमंत्री आवास के तहत हिंदुओं के टैक्स से बने हुए जिहादियों के करोड़ों मकान और उनमें चल रहे लव जिहाद ! 

और देखो कैसी अहसान फरामोशी है । हमने यूजीसी के खिलाफ इतना लिखा, यहां फेसबुक पर जो लिखा जाता था वो 24 घंटे में सड़कों पर प्रदर्शनकारियों की जुबान से निकलता था । मां सरस्वती की कृपा से हमने अपनी लेखनी की ताकत से और लाखों बहादुर लोगों ने ऐसे काले कानून पर स्टे लगवाया । और मोदी समर्थकों की बहन बेटियों को ओबीसी जिहादियों से बचाया वरना यूजीसी के बाद तो ओबीसी जिहादी मोदी समर्थकों की बहन बेटियों को खुल्ले आम उड़ा ले जाते और किसी प्रधानमंत्री आवास योजना से बने मकान में ले जाकर अक्कड़ बक्कड़ खेलते । लेकिन इसके बाद भी निर्लज्ज मोदी के निर्लज्ज समर्थक हमारा अहसान ही नहीं मानते, इससे ज्यादा अहसानफरामोशी और क्या हो सकती है ? 


मोदी मुल्ला प्रेम 2

अगर आपमें मोदी जी के कपड़े, दाढ़ी, टोपी, झांकी और शानदार वीडियोज से ऊपर उठ कर देखने की दृष्टि हो... अगर तर्क करने की... प्रश्न पूछने की और सोचने की शक्ति हो आपमें... और साथ-साथ थोड़ा तथ्यों, थोड़ा घटनाओं का ज्ञान भी हो... तो जरा सोच कर बताएं...
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जिस तरह महाभारत और रामायण के युद्धों के अनुयाई... और अपने हर देवता को शस्त्रों के साथ पूजने वाले... लड़ाका हिंदुओं को अहिंसा का पाठ पढ़ाने के लिए, उनके हथियार छीन लेने के लिए और हमारे देश को लूटने के लिए अंग्रेजों ने मोहनदास गांधी को भारतीय राजनीति में इंप्लांट किया था...
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उसी तरह क्या मोदी भारतीय राजनीति में 57 मुस्लिम देशों की उम्मत (संगठन) द्वारा गजवा-ए-हिंद के लिए बढ़ाया गया एक मोहरा है?
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अगर इस दृष्टिकोण से... आप मोदी के मुख्यमंत्री शासन या प्रधानमंत्री शासन के पूरे कार्यकाल को देखेंगे तो मुसलमानों के विश्वास और मुसलमानों के तृप्तिकरण की सारी पिक्चर, सारा परिदृश्य बिल्कुल साफ साफ नजर आएगा... 
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1..... गुजरात का मुख्यमंत्री रहते 2002 के दंगों में 300 से ज्यादा हिंदुओं की हत्या मोदी ने क्यों कराई? ये पुलिस की गोलियों से मारे गए हिंदुओं की संख्या का गुजरात सरकार का ऑफिशियल फिगर है, याद रहे असली संख्या सरकारी फिगर से हमेशा कई गुना ज्यादा होती है. यहाँ ये भी याद रहे कि जलियांवालाबाग के हत्यारे जनरल डायर ने 379 मारे थे और मुल्ला मुलायम ने 28... मोदी के प्रचार तंत्र के चलते हम 28 हिन्दुओं को मारने वाले को मुल्ला मुलायम और 300 से ज्यादा हिंदुओं को मारने वाले मोदी को हिंदू हृदय सम्राट पुकारते हैं.
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2..... 50,000 से ज्यादा हिंदुओं को जेलों में क्यों डाल दिया गया? 
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3..... क्यों गुजरात का मुख्यमंत्री रहते हुए बजरंग दल, विश्व हिंदू परिषद और आर एस एस का संगठन तबाह कर दिया गया? क्यों गुजरात में सैकड़ो हिंदू मंदिरों को नष्ट किया गया? जिसके विरोध में विश्व हिंदू परिषद के अध्यक्ष अशोक सिंघल भी खड़े हुए थे. मोदी को गजनी ठहराते हुए उनका वीडियो इंटरनेट पर वायरल है.
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4..... क्यों हिंदुओं के गरजते शेर प्रवीण तोगड़िया को बर्बाद किया गया? 
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5..... क्यूँ हिंदू धर्म और हिंदुओं के लिए आवाज बुलंद करने वाले नूपुर शर्मा, नवीन जिंदल, अरुण यादव, काजल हिंदुस्तानी, पायल रोहतगी और राजा सिंह, बिट्टू बजरंगी, मोनू मानेसर का जीवन तबाह किया गया? क्यों हिंदुओं के लिए कानून बनाने की लगातार मांग करने वाले सुप्रीम कोर्ट के वकील अश्वनी उपाध्याय को झूठे आरोपों में जेल भेजा गया?
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6..... क्यों आधी रात को देश के सबसे ज्यादा शक्तिशाली व्यक्ति नेशनल सिक्योरिटी एडवाइजर अजित डोभाल को भेज कर मौलाना साद को फरार होने में मदद की गई?
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7..... क्यों मुसलमानों का विश्वास जीतने और उनका तृप्तिकरण करने की बात की गई, और मुसलमानों का तुष्टिकरण करने में कांग्रेस के भी रिकॉर्ड तोड़ दिए गए और गौ रक्षकों को गली का गुंडा ठहराया गया? 
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8..... क्यों हिंदुओं पर राज करने के लिए और गजवा ए हिंद के लक्ष्य पाने में मुसलमानों को मदद करने के लिए थोक के भाव कांग्रेस के जमाने से 10 गुना ज्यादा मुस्लिम आईएएस और आईपीएस... एक एक लाख की सरकारी मदद दे दे कर और फ्री कोचिंग फ्री रहना खाना दे देकर तैयार किए गए?
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9..... क्यों मुसलमानों को 300 विशेष योजनाएं प्रदान की गईं और हिंदुओं को एक भी नहीं?
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10..... कांग्रेस तक ने जिस सच्चर कमेटी को डस्टबिन में डाल के रखा था और जिसके हिंदू विरोधी प्रावधानों का भाजपा ने विपक्ष में रहते पुरजोर विरोध किया था, उसे क्यों लागू किया गया? 
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11... क्यों फ्री वैक्सीन अधिकतर मुस्लिम देशों को दिए गए? 
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12... क्यों मुस्लिम देशों पर संकट आने पर मोदी जी... हिन्दुओं के टेक्स का आटा, दाल, चावल, ट्रक्स, संसाधन और लाव-लश्कर लेकर तुरंत मदद को दौड़ पड़ते हैं? अफगानिस्तान हो या तुर्की, पाकिस्तान हो या हमास वाला फिलिस्तीन या हिंदुओं का कत्लेआम करने वाला बांग्लादेश.
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13... क्यों बड़े-बड़े मुस्लिम देश मोदी को अपने सर्वोच्च सम्मान से नवाज रहे हैं? ऐसा क्या किया है मोदी ने उनके लिए... जी बड़े-बड़े मुस्लिम देश मोदी को सर्वोच्च सम्मान से इसलिए नवाज रहे हैं इसलिए पुरस्कार दे रहे हैं क्योंकि मोदी मुस्लिम एजेंडे को फॉलो कर रहे हैं...हिंदुस्तान को तेजी से गजवा ए हिंद की तरफ ले जा रहे हैं.
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14... क्यों हर मुस्लिम की मौत पर मुखर होकर बयान देने वाले मोदी हिंदुओं के मरने पर जुबान सिल कर बैठ जाते हैं? गौ हत्यारे अखलाक की हत्या पर बोलने वाले, बाइक चोर तबरेज अंसारी और गौ तस्कर पहलू खान की हत्या पर दुख व्यक्त करने वाले, और तो और शबाना आजमी के पैर में चोट लग जाने पर दुख व्यक्त करने वाले मोदी बंगाल में हजारों हिंदुओं के मर जाने पर भी एक शब्द अपने मुंह से नहीं निकालते... पूरे हिंदुस्तान में हिंदुओं की हो रही हत्याओं पर मोदी ने एक बार भी मुंह खोला हो तो हमें जरूर बताइएगा.
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15... क्यों पिछले 9 सालों के लम्बे समय में हिंदुओं के लिए अति-आवश्यक मुद्दों जैसे मुस्लिम जनसँख्या पर लगाम... हमारे मंदिरों को शासन से मुक्ति... हमारे धर्म की शिक्षा हमारे बच्चों को देने की आजादी... हमारे गौरवशाली इतिहास को शिक्षण में शामिल करना और गुलामी का इतिहास समाप्त करना... 9 राज्यों में अल्पसंख्यक हो चुके हिंदुओं को अल्पसंख्यक दर्जा और सुविधाएँ दिलवाना... देश के शिक्षा तंत्र से ईसाईयों का नियंत्रण हटाना... धर्मांतरण के विरुद्ध सख्त से सख्त कानून बनाना... मुसलमानों की दादागिरी, गुंडागर्दी, लवजिहाद, सर तन से जुदा के विरुद्ध कानून बनाना... हिंदुओं के पैसे से आतंकवादियों को मदद में जुटी हलाल इकोनॉमी पर बैन लगाना... हिंदुओं की सम्पत्ति हथिया रहे वक्फ बोर्ड कानून को समाप्त करना... हमारे देश की सबसे बड़ी मेजोरिटी मुसलमानों का अल्पसंख्यक दर्जा समाप्त करना... अल्पसंख्यक मंत्रालय और अल्पसंख्यक आयोग समाप्त करना... हमारे हजारों मंदिरों पर मुसलमानों के कब्जे को बरकरार रखने के लिए बनाए गए प्लेसेज ऑफ वरशिप एक्ट को हटाना... के साथ हिंदू समाज की अनेकों समस्याओं पर कोई काम नहीं किया गया... सच तो ये है कि पिछले 9 सालों में हिंदू समाज और देश के 100 करोड़ हिंदुओं की भलाई के लिए के लिए कोई भी काम किया ही नहीं गया. अगर आपके हिसाब से हमारे देश के 100 करोड़ हिंदू समाज के लिए कुछ किया गया है तो उस योजना... उस एक काम को... मुझे जरूर बताएं.
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मुझे तो पूरा यकीन है कि एक दिन हमको जरूर पता चलेगा... कि मोदी को भारतीय राजनीति में आगे बढ़ाने के लिए ही 57 मुस्लिम देशों की उम्मत ने गोधरा ट्रेन का अग्निकांड और पुलवामा विस्फोट कराया था..

भारत की काल गणना आधुनिक नासा सॉफ्टवेयर से अधिक शुद्ध है।

भारत की ऐतिहासिक काल गणना अभी भी आधुनिक नासा सॉफ्टवेयर से अधिक शुद्ध है। १९२३ के मिलांकोविच सिद्धान्त की तुलना में भारतीय गणना के अनुसार जल प्रलय अधिक शुद्ध हैं। सृष्टि काल की गणना तथा दोलन की भी सूक्ष्म माप है। २०,००० वर्ष पुराना इतिहास आज भी परम्परा रूप में जीवित है।
(१) १७५०० ई.पू. में कश्यप के समय पुनर्वसु नक्षत्र में सूर्य प्रवेश से वर्ष गणना होती थी, जिसका देवता अदिति है। शान्ति पाठ में यही कहते हैं-अदितिर्जायम्, अदितिर्जनित्वम् = अदिति नक्षत्र से संवत्सर का अन्त होता है तथा नया संवत्सर आरम्भ होता है। आज भी जब सूर्य पुनर्वसु नक्षत्र में आता है को जगन्नाथ की रथ यात्रा होती है। आगे-पीछे दोनों संवत्सरों का रूप अदिति है, अतः ग्रीस में इसके प्रतीक जूनो देवी का मुंह आगे-पीछे दोनों तरफ होता है।
(२) पुष्कर द्वीप (दक्षिण अमेरिका) में आमेजन तट पर हिरण्याक्ष का राज्य था। वे लोग वराह रूप में विष्णु भगवान् की पूजा करते थे। अतः उनसे मैत्री दिखाने के लिए विष्णु अपने १८ साथियों सहित वराह का मुखौटा लगा कर उनके पास गये। मित्र रूप में उनका स्वागत हुआ। एक दिन धोखे से हिरण्याक्ष को मार कर वे लोग भाग निकले। यह वर्णन जेन्द अवेस्ता का है। पुराणों में भी लिखा है कि इन्द्र की सहायता के लिए वराह ने धोखे से हिरण्याक्ष को मारा था अतः उसके प्रतिशोध के लिए हिरण्यकशिपु ने तप किया। वराह अवतार द्वारा वध होने के बाद से सूअर का मांस वर्जित गो गया, जो आज तक इस्लाम में चल रहा है।
(२) राजा पृथु द्वारा खेती के लिए पर्वतों को धनुष की नोक से समतल बनाया गया। धनुषाकार समतल बनाई भूमिको टेरेस फार्मिंग कहते हैं, जिसके प्राचीन अवशेष आज भी पेरु में हैं।
(३) शतपथ ब्राह्मण के अनुसार प्रथम बृहस्पति चीन में थे, जिन्होंने हर शब्द के लिए चिह्न दिया था। बहां आज भी शब्द-लिपि प्रचलित है। बाद में इन्द्र ने मरुत की सहायता से शब्दों को ध्वनि खण्डों में विभाजन किया। ३३ देवों के चिहन् ३३ व्यञ्जन तथा ४९ मरुत् रूप ४९ अक्षर बने।, अतः निर्माता को मरुत् कहा। चिह्न रूप में देवों का नगर होने के कारण यह देव-नागरी लिपि है। आज भी यह लिपि पूर्व के लोकपाल इन्द्र के स्थान से उत्तर पश्चिम के लोकपाल मरुत् क्षेत्र तक प्रचलित है। यह इन्द्र की त्रिलोकी (भारत-रूस-चीन) में प्रचलित हुआ, किन्तु चीन के लोग अपनी मूल लिपि पर बने रहे। बॄहस्पति के लाल में ब्रह्मा पुष्कर में रहते थे जिसे इज्जैन से १२ अंस पश्चिम तथा ३५ अंश उत्तर अक्षांश पर कहा गया है (पुष्कर = बुखारा)। ब्रह्मा के स्थान से उत्तर-पूर्व चीन-जापान में लिपि ऊपर से नीचे लिखते थे, दक्षिण पूर्व में बायें से दाहिने, तथा दक्षिण पश्चिम में दाहिने से बांये लिखते थे, जो आज तक प्रचलित है।
(४) नरसिंह अवतार में नरसिंह छोटी सेना लेकर मिस्र गये थे और हिरण्याकशिपु को मार कर प्रह्लाद को गद्दी पर वैठाया। हिरण्यकशिपु की अधिकांश सेना सीमा पर थी। अतः नरसिंह को मनुष्यों में सिंह कहते है< जो आज तक राजाओं की उपाधि है। शत्रु रूप में निन्दा के लिए उसे मिस्र में पशु रूप बनाते हैं-स्फिंक्स।
(५) बलि के यज्ञ में इन्द्र ने वामन की सहायता से ३ लोक वापस लिए (रामायण के अनुसार भारत-चीन-रूस)। बलि के पुरोहित कवि उशना का स्थान काबा है। वहां बलि की बाल देवता के रूप में पूजा होती थी।
(६) राजा वरुण के उर नगर बनाया था (उरुं हि राजा वरुणश्चकार-ऋग्वेद, १/२४/८)। यह इराक का प्राचीनतम नगर है। इस वरुण तथा रोहित की जो कथा शतपथ ब्राह्मण, ब्रह्माण्ड पुराण आदि में है, वही कथा उर निवासी अब्राहम और उनके पुत्र इस्माइल के विषय में बाइबिल में है।
(७) बलि के समय ही समुद्र मन्थन हुआ था जिसमें देव-असुर ने परस्पर सहायता की थी। इसके संयोजक इन्द्र के मित्र वासुकि थे, जिनका निवास रसातल (दक्षिण अमेरिका) में था (ब्रह्माण्ड पुराण, १/२/२० अध्याय)। खनिज कूर्म-पृष्ठ भूमि (ग्रेनाइट या अन्य कठिन भूमि) में ही मिलते हैं, अतः आयोजक को कूर्म कहा गया। खनन में असुर दक्ष थे अतः वे खनन के लिए अफ्रीका से भारत के खनिज क्षेत्र झारखण्ड आये। खान के नीचे गर्म होता है, अतः असुर कार्य वासुकि के मुंह की तरफ गर्म था। आज भी उनके वंशजों का चेहरा अफ्रीकियों से मिलता है। उसी भाषा क्षेत्र के यवनों को राजा सगर ने निष्कासित किया था, जो भाग कर ग्रीस चले गये, जिसे हेरोडोटस के अनुसार इयोनिआ कहने लगे। किन्तु आज भी अरबी चिकित्सा पद्धति को ही यूनानी कहते हैं। आज भी असुर वंशजों की वही उपाधि है जो ग्रीक भाषा में खनिजों के नाम हैं। देवता लोग विरल धातुओं के शोधन में दक्ष थे। अतः वे स्वर्ण के लिए जिम्बाबवे तथा चान्दी के लिए मेक्सिको गये। अतः जाम्बूनद स्वर्ण श्रेष्ठ कहते थे (दुर्गा स्तुति-जाम्बूनद स्वर्णाभां)। मेक्सिको के नाम पर चान्दी को माक्षिक कहते थे (आयुर्वेद का स्वर्ण-माक्षिक भस्म)। सिंहभूमि से भागलपुर में गंगा तट तक मन्दराचल (मन्दार) पर्वत है, जिसके छोर पर वासुकिनाथ मन्दिर है। 
(८) कार्त्तिकेय ने क्रौञ्च द्वीप (उत्तर अमेरिका) पर आक्रमण के लिए नौसेना गठित की थी। उसके पूर्व शक्ति द्वारा क्रौञ्च पर्वत पर प्रहार किया था (कुमारः क्रौञ्चदारणः)। जल और वायु में भी गति होने के कारण उनकी नौसेना को मयूर कहा गया। उसमें भारत के अतिरिक्त प्रशान्त क्षेत्र के भी सैनिक थे (वियतनाम-इण्डोनेसिया तक ९ खण्ड का भारत था)। आज भी मयूर सेना के मयूरी के वंशज (माओरी) हवाइ द्वीप, न्यूजीलैण्ड तथा आस्ट्रेलिया में एक ही भाषा कहते है। १८३३ में हवाई द्वीप से एक माओरी जेम्स कुक के साथ न्यूजीलैण्ड आया था तथा वहां की माओरी रानी के साथ सन्धि में दुभाषिया रूप में हस्ताक्षर किया था। जेम्स कुक को आश्चर्य हुआ कि इतने दूर क्षेत्र की एक ही भाषा कैसे है। उस दुभाषिये की प्रपौत्री श्रीमती युमा बोक्कासा ने मेरा लेख पढ़ कर मुझे लिखा कि उसके दादा ने वही कहानी बतायी थी।
(९) रामायण (४/४०/५४) के अनुसार पूर्व दिशा के अन्त का चिह्न देने के लिए ब्रह्मा ने एक द्वार बनवाया था। उज्जैन से १८० अंश पूर्व आज भी प्राचीन पिरामिड मेक्सिको में है जिसे प्रथम देवता का पिरामिड कहते हैं। प्राचीन समय क्षेत्रों की सीमा पर आज भी प्रायः ३० से अधिक क्षेत्र पुराने नामों से विश्व भर में फैले हुए हैं।
(१०) कार्त्तिकेय काल में अभिजित का पतन होने पर धनिष्ठा से वर्ष का आरम्भ हुआ (महाभारत, वन पर्व, २३०/८-१०)। यह प्रायः १५८०० ईपू. में था। मेगास्थनीज की मुल इण्डिका में था कि भारत अन्न और खनिज में स्वावलम्बी था अतः पिछले १५,००० वर्षों में किसी पर आक्रमण नहीं किया। सिकन्दर से प्रायः १५,५०० वर्ष पूर्व कार्तिकेय ने क्रौञ्च द्वीप पर आक्रमण किया था। इससे भारतीय सभ्यता अधिक प्राचीन लग रही थी, अतः बाद के संस्करण में इसे हटाया गया। मेगास्थनीज को इसलिए चुना क्योंकि उसकी पुस्तक उपलब्ध नहीं है तथा इच्छानुसार बार-बार परिवर्तन किया जा सकता है। कार्त्तिकेय के समय धनिष्ठा नक्षत्र से वर्षा होती थी, अतः संवत्सर को वर्ष कहा गया।
(११) कार्त्तिकेय का धनिष्ठा नक्षत्र से आरम्भ वर्ष वेदाङ्ग ज्योतिष में है, जिसमें १९ वर्ष का युग होता है। आज भी जगन्नाथ का नव कलेवर १९ वर्ष बाद होता है। उस समय ज्येष्ठ मास में शीत आरम्भ होता था, अतः पश्चिम ओड़िशा में ज्येष्ठ शुक्ल षष्ठी को शीतल षष्ठी कहते है, जिस दिन शिव पार्वती का विवाह होता है।
(१२) स्वातम्भुव मनु के समय २९१०१२ ईपू. से भारत में कई पञ्चाङ्ग आरम्भ हुए। भारत में युग तथा दिन का निर्णय ५-५ प्रकार से होता है (पञ्च संवत्सरमयं युगम्, पञ्चाङ्ग) जिसके द्वारा अशुद्धि दूर की जाती है। नासा के कैलेण्डर सॉफ्टवेयर में यह पद्धति नहीं है, अतः उससे गणना में महाभारत काल में ३ दिन तथा रामायन काल (४५०० ईपू) में ७ दिन की भूल होती है। पर आजकल नासा सॉफ्टवेयर द्वारा भारतीय तिथियों को बदलने का फैशन चला है।

Friday, 24 July 2026

गाली और नाम

कभी आपको लगता है कि ऋग्वेद के वाक्-सूक्त, भर्तृहरि के शब्द-ब्रह्म, तांत्रिक परंपरा की परा, पश्यन्ती, मध्यमा और वैखरी वाक् का देश किस स्तर तक के कीचड़ में लोटने में किसी पशु की तरह आनंदित युवाओं को देखेगा? वाक् के साधकों की चेतना विकास की दिशा में बढ़ती है—आवेग से विवेक की ओर, प्रतिक्रिया से उत्तरदायित्व की ओर, हिंसा से संवाद की ओर। गाली इस विकास-यात्रा का उलटा मार्ग है। वह चेतना को पुनः आदिम प्रतिक्रियाओं की ओर ले जाती है। ये गालियाँ भारतीय चेतना के अवरोह (Regression of Consciousness) का संकेत हैं।

भारतीय दर्शन में नाम और रूप केवल पहचान नहीं हैं; वे अस्तित्व के आयाम हैं। किसी का नाम लेना उसकी सत्ता को स्वीकार करना है। इसीलिए भारतीय परंपरा में नामकरण संस्कार है। नाम व्यक्ति को समाज में प्रतिष्ठित करता है। इसके विपरीत गाली नाम का अपहरण करती है। वह व्यक्ति को उसके वास्तविक नाम से नहीं पुकारती; उसे एक अपमानजनक संकेत में बदल देती है।

गाली का सबसे बड़ा भ्रम यह है कि उसे केवल अशिष्ट भाषा समझ लिया जाता है। वस्तुतः गाली भाषा का नहीं, चेतना का विषय है। शब्द केवल उसका माध्यम हैं; उसका वास्तविक निवास मनुष्य की मानसिक संरचना में है। किसी व्यक्ति की गालियाँ केवल उसके शब्दकोश का परिचय नहीं देतीं; वे उसके भावनात्मक संगठन, उसकी असुरक्षाओं, उसकी आक्रामकता, उसके आत्म-नियंत्रण और उसके सांस्कृतिक संस्कारों का भी परिचय देती हैं। गालियाँ प्रायः उस व्यक्ति के अचेतन का दर्पण होती हैं जो उन्हें उच्चार रहा है। वे विरोधी की वास्तविकता से अधिक वक्ता की भीतरी संरचना को उद्घाटित करती हैं।

गाली और तर्क का मूलभूत अंतर स्पष्ट है। जब मस्तिष्क का प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स सक्रिय रहता है, तब मनुष्य कारण देता है, प्रमाण प्रस्तुत करता है, तर्क करता है और स्वयं को नियंत्रित रखता है। परंतु जब वह निष्क्रिय हो तो उसकी अमिग्डाला खतरे या अपमान का अनुभव करती है और नियंत्रण अपने हाथ में ले लेती है, तब भाषा का स्वरूप बदल जाता है। तर्क की जगह विस्फोट आ जाता है। आधुनिक मनोविज्ञान इसे Emotional Hijacking कहता है—एक ऐसी स्थिति जिसमें भावनाएँ संज्ञानात्मक नियंत्रण पर अस्थायी विजय प्राप्त कर लेती हैं। इस दृष्टि से गाली विवेकपूर्ण संप्रेषण नहीं, भावनात्मक अपहरण की भाषाई अभिव्यक्ति है।

गालियों का अध्ययन करें तो स्पष्ट होगा कि लगभग प्रत्येक गाली किसी-न-किसी सांस्कृतिक पवित्रता पर आघात करती है। कहीं मातृत्व को अपवित्र किया जाता है, कहीं स्त्री-देह को, कहीं धर्म को, कहीं जातीय पहचान को। यह कोई संयोग नहीं है। गाली वहीं प्रहार करती है जहाँ समाज ने सबसे अधिक पवित्रता स्थापित की होती है। इसलिए गाली का वास्तविक कार्य सूचना देना नहीं, पवित्र का अपवित्रीकरण करना है। इन गालियों का आश्चर्यजनक विरोधाभास यह है कि वे लगभग कभी भी यौन सुख (sexual pleasure) के बारे में नहीं होतीं; वे यौन सत्ता (sexual power) के बारे में होती हैं। वे कामुकता की भाषा नहीं, प्रभुत्व (domination), अपमान (humiliation) और अधिकार-हरण (violation) की भाषा हैं। इसलिए यदि कोई व्यक्ति यह मानता है कि यौन गालियाँ केवल काम-वासना का भाषिक रूप हैं, तो वह उनके वास्तविक मनोविज्ञान को नहीं समझ रहा। वे इच्छा की नहीं, हिंसा की भाषा हैं। उस स्थान पर अभिव्यक्त हो रही वे गालियाँ केवल अश्लील नहीं हैं; वे सांस्कृतिक अपवित्रीकरण (cultural profanation) का अनुभव कराने की नई वामपंथी स्ट्रेटेजी हैं।

विकासवादी मनोविज्ञान गालियों को प्रभुत्व-प्रदर्शन (Dominance Display) के रूप में भी देखता है। गाली का उद्देश्य सामने वाले को कोई नई सूचना देना नहीं होता; उसका उद्देश्य उसे मनोवैज्ञानिक रूप से दबाना होता है। इस प्रकार गाली संवाद की नहीं, शक्ति-प्रदर्शन की भाषा बन जाती है।

सोशल मीडिया पर गाली केवल भावनात्मक प्रतिक्रिया नहीं रहती; वह सामाजिक पुरस्कार (social reward) प्राप्त करने का साधन भी बन जाती है। यदि किसी अपमानजनक टिप्पणी पर हजारों लाइक, शेयर और प्रशंसा मिलती है, तो मस्तिष्क का डोपामिन तंत्र उसे सफलता के रूप में दर्ज करता है। धीरे-धीरे व्यक्ति सीख जाता है कि संयमित तर्क की अपेक्षा उत्तेजक अपमान अधिक लोकप्रिय है। यही वह प्रक्रिया है जिसे आज कई विचारक "Outrage Economy" कहते हैं—एक ऐसी अर्थव्यवस्था जिसमें ध्यान (attention) सबसे मूल्यवान वस्तु है और गाली उसे प्राप्त करने का सबसे सस्ता साधन।

गाली का प्रयोजन तर्क को परास्त करना नहीं, प्रतिद्वंद्वी की आत्म-प्रतिष्ठा को आहत करना है। यही कारण है कि गाली मूलतः degradation ritual है—एक ऐसा भाषिक अनुष्ठान जिसके माध्यम से बोलने वाला दूसरे व्यक्ति को उसके मानवीय स्तर से नीचे धकेलना चाहता है।

और वह भी इसलिए कि वह स्वयं नीचा महसूस करता है। एरिख फ्रॉम ने अपनी प्रसिद्ध कृति The Anatomy of Human Destructiveness में विनाशकारी प्रवृत्ति और जीवनोन्मुख प्रवृत्ति का अंतर किया है। फ्रॉम के अनुसार स्वस्थ व्यक्ति अपनी शक्ति का अनुभव सृजन द्वारा करता है, जबकि असुरक्षित व्यक्ति अपनी शक्ति का अनुभव दूसरे को छोटा करके करता है। इस दृष्टि से गाली कई बार शक्ति का प्रदर्शन नहीं, शक्ति के अभाव की क्षतिपूर्ति (Compensation) होती है। जिस व्यक्ति को अपने तर्क, अपने व्यक्तित्व या अपनी नैतिक ऊँचाई पर विश्वास नहीं होता, वह शब्दों की तीव्रता से उस रिक्ति को भरने का प्रयास करता है। इसलिए गाली अनेक बार साहस की नहीं, सृजनशक्ति के अभाव की भाषा होती है।

फ्रायड का कहना था कि गाली हिंसा का स्थानापन्न ( substitute) है। मैं उससे असहमत हूँ। मेरे विचार से गाली हिंसा की भूमिका है। प्रत्येक समाज अपनी हिंसा को वैध ठहराने से पहले अपने शिकार का नैतिक अवमूल्यन करता है। किसी व्यक्ति को सीधे नष्ट करना कठिन है; पहले उसे सम्मान के योग्य न रहने वाला सिद्ध करना पड़ता है। इतिहास के प्रत्येक बड़े नरसंहार से पहले भाषा बदलती है। लोग व्यक्तियों को नाम से नहीं, अपमानसूचक विशेषणों से पुकारना प्रारम्भ करते हैं। यह हिंसा की पूर्वपीठिका होती है । यानी गाली हिंसा का विकल्प नहीं, अनेक बार उसकी प्रस्तावना होती है। गाली संवाद को समाप्त नहीं करती; वह संवाद की संभावना को ही समाप्त कर देती है।

लेकिन यह तो गाली देने वालों का मनोविज्ञान है, उन साहित्यकारों का मनोविज्ञान भी पढ़िए जो इन गालियों की Moral Licensing कर रहे हैं। यानी ये वे हैं जो यह विश्वास कर लेते हैं कि इनके उद्देश्य इतने पवित्र हैं कि उसके लिए सामान्य नैतिक नियम लागू नहीं होते। जब वे गालियों के इन क्षणों को अपवाद मानने के बजाय आदर्श या सामान्य घोषित करने लगते हैं, तब समस्या केवल भाषा की नहीं रहती; तब हमारी सामूहिक मनोसंरचना बदलने लगती है। उसी दिन गालियाँ शब्दकोश से निकलकर संस्कृति का हिस्सा बन जाती हैं। साहित्यकार जब गाली को नैतिक वैधता देता है, तब वह समाज के सामूहिक विवेक का पुनर्लेखन कर रहा होता है। वह केवल यह नहीं कह रहा कि "गाली दी गई"; वह यह कह रहा है कि "गाली उचित थी।"जबकि ऐसे माहौल में साहित्यकार का दायित्व सबसे अधिक बढ़ जाता है। क्योंकि साहित्य का संपूर्ण प्रयोजन मनुष्य को पुनः नाम देना है। उपन्यास, कविता, नाटक और कथा—ये सभी हमें याद दिलाते हैं कि प्रत्येक मनुष्य किसी विशेषण से बड़ा है। साहित्य व्यक्ति को उसकी जटिलता लौटाता है; गाली उसे उसकी जटिलता से वंचित कर देती है। साहित्य कहता है—"उसे समझो।" गाली कहती है—"उसे समाप्त करो।" साहित्य व्यक्ति के भीतर की कहानी खोजता है; गाली व्यक्ति को कहानी बनने से पहले ही एक निर्णय में बदल देती है।तो होना तो यह चाहिए था कि सभी साहित्यकार एक साथ एक संयुक्त ज्ञापन निकालते कि भाषा का सम्मान रखें पर होता यह देखा कि कुछ स्वनामधन्य उसी को जस्टिफ़ाई करने में लग गए। वे साहित्य को हमेशा चार खेमे और चौंसठ खूँटों में बांटे रहे तो यहाँ भी वे एक ingroup moral immunity की स्थिति से—अपने समूह को नैतिक छूट देने से- मुतमईन हैं। 

यौन-आधारित गालियों के समर्थन में एक और सूक्ष्म मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया कार्य करती है—प्रतीकात्मक दूरी (Symbolic Distance)। साहित्यकार स्वयं गाली नहीं देता; वह कहता है कि "यह जनता का क्रोध है", "यह प्रतिरोध की भाषा है", या "यह दमन के विरुद्ध स्वाभाविक प्रतिक्रिया है।" इस प्रकार वह अपने और गाली के बीच एक बौद्धिक दूरी निर्मित कर लेता है। परिणाम यह होता है कि वह स्वयं को अशिष्ट नहीं, बल्कि अशिष्टता का व्याख्याकार समझने लगता है। किंतु सामाजिक प्रभाव की दृष्टि से यह दूरी बहुत कम मायने रखती है। सार्वजनिक संस्कृति यह संदेश ग्रहण करती है कि यदि प्रतिष्ठित लेखक इसे उचित कह रहा है, तो यह नैतिक रूप से स्वीकार्य है। आधुनिक बौद्धिक संसार प्रायः लैंगिक समानता, स्त्री-अस्मिता और गरिमा की वकालत करता है। किंतु यदि वही बौद्धिक वर्ग ऐसी गालियों का समर्थन करे जिनकी संरचना स्त्री-देह, मातृत्व या पारिवारिक स्त्री-संबंधों को अपमान के औज़ार के रूप में प्रयोग करती है, तो वह अनजाने में उसी पितृसत्तात्मक भाषा को वैधता दे रहा होता है जिसकी वैचारिक आलोचना वह अन्यत्र करता है। यहाँ सबसे बड़ा विरोधाभास यह है कि सिद्धांत में स्त्री की गरिमा का समर्थन और व्यवहार में स्त्री-आधारित अपमान की स्वीकृति एक साथ उपस्थित हो जाती है।

क्या उन्हें अहसास है कि वे शब्दों की सीमा नहीं बदल रहे हैं ; वे समाज की नैतिक संवेदनशीलता की सीमा भी बदल दे रहे हैं?

सभ्यता का पालना मेसोपोटामिया नहीं बल्कि भारत है

निक कोलिंस समुद्री इतिहासकार, उन्होंने वेस्टर्न इतिहासकारों को धता बताते हुए दावा किया कि cradle of Civilization अर्थात सभ्यता का पालना मेसोपोटामिया नहीं बल्कि भारत है

इसके लिए उन्होंने लोथल में मिले बंदरगाह का उदाहरण दिया जो मानव निर्मित थी और ज्वारीय तरंगों को कंट्रोल करती थी, ये एक समय में 60 टन के तीस जहाज को सम्भाल सकती थी 

इसकी इंजीनियरिंग इतनी उन्नत थी कि यूरोप या पश्चिमी दुनिया को 4,000 साल का समय लगा इसे मैच करने में, औद्योगिक क्रांति के बाद जाकर वे इसे कंपीट कर पाए

उनके अनुसार मेसोपोटामिया को सभ्यता का पालना कैसे कहा जा सकता है जब वे भारत पर व्यापार के मामले डिपेंडेंट थे, मेसोपोटामिया के खत्म हो चुके शहरों में आज भी भारतीय मुहरे, मोती और कपास मिले है इसके अतिरिक्त सागौन की लकड़ी और खाद्यान्न भी भारत आपूर्ति करता था

वे आर्यन थ्योरी को नकारते है, वे कहते है कि आर्यन आक्रमण की थ्योरी इसलिए गढ़ी जाती है क्योंकि अंग्रेज ये स्वीकार नहीं कर पा रहे थे कि वे जो सबसे शक्तिशाली है उनके जैसे श्वेत लोगों के बिना ये गहरे रंग वाले भारतीय इतने महान कैसे हो सकते है

उन्होंने अपनी श्वेत प्रतिष्ठा को बचाने के लिए मेसोपोटामिया को तो प्राचीन माना बल्कि भारत की महान विरासत को भी यूरोपीय शाखा की देन घोषित कर दी

ब्रिटिशों ने अपने शासन को भी स्थाई बनाने के लिए ऐसा किया था ताकि उनका विरोध कम हो क्योंकि हम यहां शासन करने वाले नए थोड़े है 

निक के अनुसार भारत 4,000 साल तक दुनिया की समुद्री महाशक्ति थी, इसी को लेकर रोम सम्राट ने शिकायत की थी कि भारत से सामान लेने के कारण हमारा सारा सोना हर साल भारत चला जा रहा है, उन्होंने चीन से लेकर अफ्रीका और यूरोप तक फैले भारतीय व्यापार के बारे में जिक्र किया है 

उन्होंने सरस्वती नदी के बारे में भी बात की है, उनके अनुसार सरस्वती नदी को लेकर भ्रम फैला है कि वे काल्पनिक थी और केवल वेदों की लिखित थी, बल्कि वर्तमान वैज्ञानिक स्रोतों से पता चला है कि सरस्वती नदी वास्तव में एक्जिस्ट करती थी और वे इसे केवल सिंधु सभ्यता नहीं मानते बल्कि इसे सिंधु सरस्वती सभ्यता कहते है जिनके किनारों में पूरी जनसंख्या बसी थी

बाद में ये नदी भूकंपों की श्रृंखला के कारण सुख गई,

सामान्य व्यक्ति यदि क्रोध में गाली देता है

सामान्य व्यक्ति यदि क्रोध में गाली देता है तो वह अपनी निजी दुर्बलता प्रकट करता है। परन्तु जब कोई प्रतिष्ठित लेखक, कवि या बुद्धिजीवी उसी गाली को वैचारिक औचित्य प्रदान करता है, तब वह केवल स्वयं नहीं बोल रहा होता; उसके पीछे उसकी अर्जित सांस्कृतिक पूँजी की अल्पता बोल रही होती है। साहित्यकार की सबसे बड़ी शक्ति उसकी भाषा पर समाज का विश्वास है। वह विश्वास वर्षों की साधना से अर्जित होता है। जब वही व्यक्ति कहता है कि अमुक परिस्थिति में गाली उचित है, तब वह केवल एक अपशब्द का समर्थन नहीं करता; वह भाषा के नैतिक संविधान में संशोधन कर देता है।

समाज अपने शब्दकोश केवल विद्यालयों से नहीं सीखता; वह उन्हें कवियों, उपन्यासकारों, नाटककारों और सार्वजनिक बुद्धिजीवियों से भी सीखता है। यदि साहित्यकार भाषा की मर्यादा का प्रहरी न रहकर उसकी सीमा-भंग का वैचारिक अधिवक्ता बन जाए, तब समाज में यह धारणा बनने लगती है कि नैतिकता भी दलगत है—जिसे हम अपना विरोधी मान लें, उसके लिए कोई भी शब्द वैध हो जाता है।

कोई समाज एक दिन अचानक असभ्य नहीं हो जाता। पहले एक अपशब्द को अपवाद कहा जाता है, फिर उसे प्रतिक्रिया कहा जाता है, फिर प्रतिरोध कहा जाता है, और अन्ततः उसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का पर्याय बना दिया जाता है। इस क्रम में सबसे खतरनाक वह चरण है जहाँ बुद्धिजीवी उसका औचित्य सिद्ध करने लगते हैं। क्योंकि बुद्धिजीवी किसी प्रवृत्ति को जन्म भले न दें, उसे वैधता अवश्य दे सकते हैं।

सोशल मीडिया ने भाषा को तत्क्षण प्रतिक्रिया का माध्यम बना दिया है। अब शब्द तपस्या से नहीं, आवेग से जन्म लेते हैं। एल्गोरिद्म संयम को नहीं, उत्तेजना को पुरस्कृत करते हैं। सबसे अधिक साझा वही वाक्य होता है जो सबसे अधिक अपमानजनक हो। परिणाम यह हुआ कि भाषा का बाज़ार बन गया, जहाँ शालीनता की नहीं, सनसनी की माँग है। इस बाज़ार में यदि साहित्यकार भी वही बेचने लगे जो भीड़ खरीदना चाहती है, तो साहित्य और ट्रोलिंग के बीच का अंतर मिटने लगता है।

साहित्यकार को सत्ता से असहमति का पूरा अधिकार है; बल्कि अनेक बार वही उसका नैतिक दायित्व भी है। परन्तु यदि वह प्रतिरोध की भाषा को गाली की भाषा बना देता है, तो वह सत्ता का प्रतिरोध नहीं करता—वह भाषा की पराजय का उत्सव मनाता है। तब समझ लीजिए कि लोकतंत्र का संकट चुनावों में नहीं, भाषा में प्रारम्भ हो चुका है।

गाली का सबसे बड़ा अपराध यह नहीं कि वह अशिष्ट है। अशिष्टता तो कभी-कभी केवल सामाजिक प्रशिक्षण का अभाव भी हो सकती है। उसका वास्तविक अपराध यह है कि वह सामने वाले को संवाद के योग्य व्यक्ति नहीं रहने देती। वह उसे एक विचारशील अस्तित्व से घटाकर एक अपमानित वस्तु में बदल देती है। दर्शनशास्त्री इमैनुएल लेविनास ने कहा था कि दूसरे मनुष्य का चेहरा हमें नैतिक उत्तरदायित्व का आह्वान देता है। गाली उस चेहरे को मिटा देती है। वह दूसरे को एक चेहरा नहीं, एक लक्ष्य (target) बना देती है। जिस क्षण किसी व्यक्ति का नाम उसके लिए प्रयुक्त अपशब्द से प्रतिस्थापित हो जाता है, उसी क्षण संवाद समाप्त हो जाता है और केवल आक्रमण शेष रह जाता है।

समाज में प्रत्येक व्यक्ति की विश्वसनीयता समान स्रोत से नहीं आती। सैनिक की विश्वसनीयता उसके साहस से जन्म लेती है, न्यायाधीश की उसके निष्पक्ष विवेक से, चिकित्सक की उसकी करुणा और कौशल से। उसी प्रकार साहित्यकार की वास्तविक पूँजी न उसकी प्रसिद्धि है, न पुरस्कार, न पाठकों की संख्या; उसकी सबसे बड़ी पूँजी है—उसकी भाषा की नैतिक विश्वसनीयता। जो साहित्यकार सत्ता-विरोध और सभ्यता-विरोध में फर्क ही नहीं पहचान सके, वह साहित्यकार नहीं प्रोपेगंडिस्ट है जिसकी मानसिकता यह है कि यदि विरोधी को पराजित करना है, तो उसके लिए कोई भी साधन उचित है। यही मनोविज्ञान भाषा में भी प्रवेश करता है कि यदि विरोधी को पराजित करना है, तो उसके लिए कोई भी शब्द उचित है।

लोकतंत्र केवल सत्ता बदलने की व्यवस्था नहीं है; वह भाषा को हिंसा से बचाने की भी व्यवस्था है। जिस शब्दावली में कोई आंदोलन बोलना सीखता है, वही उसके राजनीतिक संस्कार का स्थायी हिस्सा बन जाती है। यदि कोई आंदोलन केवल घृणा की भाषा सुनता और बोलता रहे, तो अंततः वह घृणा उसके नैतिक व्यक्तित्व का हिस्सा बन जाती है। तब वह सत्ता बदलने के बाद भी उसी भाषा में शासन करता है। 

अन्यथा वाक्लाव हैवेल ने चेकोस्लोवाकिया के दमनकारी शासन का कठोर विरोध किया, किंतु उनकी भाषा में प्रतिशोध नहीं, नैतिक स्पष्टता थी। अलेक्ज़ेंडर सोल्झेनित्सिन ने सोवियत अत्याचारों का भंडाफोड़ किया, पर उनकी शक्ति अपशब्दों से नहीं, साक्ष्य और नैतिक साहस से आई। मार्टिन लूथर किंग जूनियर ने नस्लवाद के विरुद्ध ऐसी भाषा विकसित की जिसमें क्रोध था, किंतु घृणा नहीं; पीड़ा थी, किंतु अपमान नहीं। इसी कारण उनका शब्द इतिहास में टिक गया और उनके विरोधियों के नारे समय के साथ विलुप्त हो गए। यदि विश्व के सबसे सफल जनांदोलन—जहाँ दमन कहीं अधिक था, हिंसा कहीं अधिक थी, अन्याय कहीं अधिक था—अपनी भाषा को मर्यादित रख सकते थे, तो आज हम क्यों यह मान लें कि गाली प्रतिरोध की अपरिहार्य भाषा है? फिर इनकी भाषा अधिक हिंसक क्यों है? जिन आंदोलनों को अपने नैतिक बल पर विश्वास होता है, वे भाषा को गिराने की आवश्यकता नहीं समझते। जिन्हें अपने तर्क पर विश्वास होता है, वे गाली से परहेज़ करते हैं। गाली प्रायः वहाँ जन्म लेती है जहाँ व्यक्ति को लगता है कि उसके शब्द पर्याप्त प्रभावशाली नहीं रहे। वह अर्थ की कमी को तीव्रता से भरना चाहता है। इसलिए गाली अनेक बार शक्ति का नहीं, असुरक्षा का व्याकरण होती है।

यदि साहित्यकार, जिसे भाषा का ऋषि होना था, स्वयं भाषा की मर्यादा के विघटन का तर्कशास्त्री बन जाए, तो समाज किससे अपेक्षा करे? यदि प्रहरी ही द्वार खोल दे, तो आक्रमणकारी को परिश्रम नहीं करना पड़ता। इसलिए किसी साहित्यकार द्वारा गाली का औचित्यीकरण केवल एक व्यक्तिगत मत नहीं; वह भाषा की उस नैतिक परंपरा के विरुद्ध विद्रोह है जिसने साहित्य को सभ्यता का अंतःकरण बनाया था। सभ्यताएँ गालियों से नहीं टूटतीं।वे तब टूटती हैं जब उनके साहित्यकार गालियों को सांस्कृतिक वैधता (Cultural Legitimacy) देने लगते हैं।साधारण व्यक्ति गाली देता है, समाज उसे सुधार सकता है।राजनेता गाली देता है, चुनाव उसे दंडित कर सकता है।पर यदि साहित्यकार गाली को सिद्धांत बना दे, तब समाज के पास उसे सुधारने का कोई सहज साधन नहीं बचता।क्योंकि वह भाषा का न्यायाधीश माना जाता है।और जब न्यायाधीश ही अपराध को वैध घोषित कर दे, तब अपराधी को अपराध-बोध क्यों होगा? यहीं मुझे लगता है कि हमारे समय की वास्तविक त्रासदी केवल यह नहीं है कि सार्वजनिक जीवन में भाषा गिर रही है।
उससे कहीं बड़ी त्रासदी यह है कि भाषा के संरक्षक स्वयं उसके पतन के दार्शनिक बनने लगे हैं।यही वह क्षण है जहाँ सभ्यता भीतर से दरकने लगती है।क्योंकि किसी भी राष्ट्र की अंतिम रक्षा सेना नहीं करती।संविधान भी नहीं।उसकी अंतिम रक्षा उसकी भाषा करती है।

किसी सभ्यता का वास्तविक चरित्र इस बात से नहीं पहचाना जाता कि वह अपने मित्रों से कैसी भाषा बोलती है; बल्कि इस बात से पहचाना जाता है कि वह अपने विरोधियों से कैसी भाषा बोलती है।

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा के दावे करने वाले अभिव्यक्ति की साधना को लगभग भूल गए हैं। ऐसे समय जुर्गेन हैबरमास की संवाद-नैतिकता (Discourse Ethics) अत्यंत प्रासंगिक हो उठती है। उनके अनुसार लोकतंत्र का वास्तविक आधार केवल मतदान नहीं, संवाद है। किंतु संवाद तभी संभव है जब प्रतिभागी एक-दूसरे को तर्क के योग्य मनुष्य मानते हों। जिस क्षण हम विरोधी को अपमान के योग्य प्राणी मानने लगते हैं, उसी क्षण संवाद की नैतिक पूर्वशर्त समाप्त हो जाती है।

लोकतंत्र केवल मतपत्रों से नहीं बचता।वह शब्दों से बचता है।संविधान केवल अधिकारों की रक्षा करता है। भाषा उन अधिकारों के योग्य मनुष्य की।