Wednesday, 30 September 2026

रोमिला थापर: ऐतिहासिक मोतियाबिंद से ग्रसित डिस्टोरियन

रोमिला थापर: ऐतिहासिक मोतियाबिंद से ग्रसित डिस्टोरियन

रोमिला थापर पिछले कई दशक से अकादमिक और सिविल के पाठ्यक्रम में अनिवार्य विषय के तौर पर मौजूद है। तथ्यों के नाम पर अहंकार और कपोल कल्पनाओं को परोसती यह इस डिस्टोरियन के लेखन की पहली चाल पहचान पर हमला करने की थी। रोमिला के फर्जीफिकेशन को एक एक कर समझते हैं।

1. थापर ने लगातार ये स्थापित किया कि "हिंदू धर्म जैसा हम आज जानते हैं, वह उन्नीसवीं सदी का निर्माण है। पूर्व-औपनिवेशिक भारत में कोई एकल एकीकृत हिंदू पहचान नहीं थी।" उसके अनुसार प्राचीन भारत में केवल शैव, वैष्णव, शाक्त जैसे बिखरे हुए पंथ थे, जिनमें कोई साझा सभ्यतागत चेतना नहीं थी। इस एक तर्क से भारत की हजारों साल की सांस्कृतिक निरंतरता को तोड़ दिया जाता है और देश को एक आधुनिक, कृत्रिम निर्माण के रूप में पेश किया जाता है।

2. उसका दूसरा कार्य हिन्दू स्रोतों को अवैध घोषित करना था। रामायण, महाभारत, पुराण, वेद और अर्थशास्त्र जैसे ग्रंथों को ब्राह्मण एलीट वर्ग का प्रोपेगेंडा बताकर इतिहास के दायरे से बाहर कर दिया गया। इन ग्रंथों में दिए गए नगरों, राज्यों, वंशों और युद्धों के विस्तृत विवरणों को मिथक कह दिया गया। मजे की बात यह है कि यही कठोरता इस्लामिक काल के दरबारी इतिहासों पर कभी नहीं दिखाई गई, वहाँ तारीख-ए-फिरोजशाही या बाबरनामा जैसे एकतरफा ग्रंथ भी प्रामाणिक स्रोत बन जाते हैं।

3.थापर की तीसरी बात हिंदू धर्म को पूरी तरह जाति व्यवस्था में समेत देना थी। उसके इतिहास में भक्ति आंदोलन, अद्वैत, योग, न्याय दर्शन, गणित और खगोल जैसी बौद्धिक उपलब्धियों के लिए कोई जगह नहीं बची। हर कालखंड, हर राजवंश और हर परम्परा को केवल ब्राह्मण बनाम शूद्र के शोषण के फ्रेम में पढ़ाया गया, ताकि छात्र अपने धर्म को ज्ञान की परम्परा के बजाय केवल शोषण की व्यवस्था के रूप में देखें।

4. रोमिला की चौथी रणनीति पुरातात्विक और मंदिर परम्परा के भाषा के सौंदर्य, विन्यास, विधान को सिरे से नकारना था। अयोध्या, मथुरा और काशी जैसे स्थलों पर मंदिर के स्पष्ट अवशेष मिलने पर भी उन्हें धार्मिक संरचना नहीं बल्कि सामान्य आर्किटेक्चरल फीचर्स कहा गया। साथ ही एक बराबरी का झूठा नैरेटिव बनाया गया कि "महामूद गजनवी का मंदिर से जुड़ाव धार्मिक कट्टरता से ज्यादा धन के लिए विजय का मामला था।" और हिंदू राजाओं ने भी बौद्ध और जैन मठ तोड़े थे, इसलिए सोमनाथ से लेकर काशी विश्वनाथ तक का विध्वंस कोई धार्मिक कट्टरता नहीं बल्कि मध्यकालीन राजनीति का सामान्य हिस्सा था।

5. रोमिला का सबसे विषैला, हाइपोथेटिकल पैटर्न नैतिक मॉडल गढ़ने का था। अशोक जो युद्ध छोड़कर बौद्ध बन गया, वह सेक्युलर और महान है, जबकि समुद्रगुप्त, चाणक्य या पुष्यमित्र शुंग जैसे साम्राज्य निर्माता और राज्य की अवधारणा देने वाले लोग ब्राह्मणवादी और कट्टर हैं। इसका संदेश साफ था, हिंदू तभी अच्छा और प्रगतिशील माना जाएगा जब वह अपनी सत्ता, अपने प्रतीक और अपनी सभ्यतागत पहचान को खुद ही छोड़ दे।

6. हिंदू डी कंस्ट्रक्शन का मॉडल रोमिला ने तैयार किया और मार्क्सिस्ट डिस्टोरियन की कई पीढ़ी उसी के आधार पर बनाई। इस डी कंस्ट्रक्शन मॉडल में गजनी, गोरी, तुगलक, खिलजी, बाबर हीरो हैं, हिंदू राजा मार्क्स का बुर्जुआ है। इस पूरी डी-कंस्ट्रक्शन का सबसे बेतुका उदाहरण तब सामने आया जब थापर ने अपने एक लेक्चर में कहा कि "आज कुछ इतिहासकार कह रहे हैं कि शायद जब युधिष्ठिर ने कहा कि मैं राजा नहीं बनना चाहता, तो उसके मन में अशोक की छवि थी।" यानी 5000 साल पहले का महाभारत का नायक 2300 साल बाद हुए अशोक से प्रेरणा ले रहा है। इसी सोच का विस्तार अयोध्या पर दिया गया उसका वह हलफनामा है जिसमें उन्होंने कहा था कि "अयोध्या में बाबरी मस्जिद के नीचे ऐसे किसी मंदिर का कोई पुरातात्विक प्रमाण नहीं है जिसे राम का जन्मस्थान माना जा सके," जबकि बाद में ASI को वहां 50 से ज्यादा मंदिर स्तंभों के बेस मिले थे।

कोर्ट ने थापर की बात को नहीं माना लेकिन पिछले कई दशकों से थापर के झूठ को लिख पढ़ कर भारत के प्रोफेसर, सिविल सर्वेंट तैयार हुए। आप स्वयं सोचिए रोमिलाई स्कूल में प्रशिक्षित लोगों का भारत बोध क्या होगा।

भविष्य का सटीक वर्णन असम्भव है।

भविष्य का सटीक वर्णन असम्भव है। केवल भगवत् कृपा या ऋषि प्रेरणा कह सकते हैं, उससे भविष्य की कुछ घटनाओं का बोध होता है। 
फलानि ग्रहचारेण सूचयन्ति मनिषिणः।
को वक्ता तारतम्यस्य तमेकं वेधसं विना॥
तन्त्रालोक के अनुसार भविष्य के काल का अनुमान ३ दिन, मास, या वर्ष में होता है। उससे सटीक काल का पता नहीं चलता। एक प्रचलित उक्ति है-
अवश्यमेव भोक्तव्यं कृत कर्मं शुभाशुभम्।
त्रिभिर्मासैः, त्रिभिर्पक्षैः, त्रिभिर्वर्षैः, त्रिभिर्दिनैः॥
ओड़िशा में ६०० वर्ष पूर्व के महात्मा अच्युतानन्द की १५ पोथियां हैं, १ पोथी अनाचार के कारण नष्ट हो गयी। काकटपुर मंगला मन्दिर के पण्डित अमरेश मिश्र के पास ताम्र पोथी थी। उसी मन्दिर में जगन्नाथ मन्दिर के पुजारियों को निर्देश मिलता है कि जगनाथ विग्रह के लिए शंख-चक्र आदि चिह्नों वाला नीम वृक्ष कहां पर है। वहां मैं कुछ आईपीएस अधिकारियों के साथ १९९६ में गया था। उनका उद्देश्य यह जानना था कि मेरे मन में क्या षड्यन्त्र चल रहा है। किन्तु मेरे मन में केवल गणित ज्योतिष सम्बन्धी चिन्ता थी कि कुछ नियमों की कैसे व्याख्या की जाय। वहां पोथी के नाम पर ताम्बा की ५० प्लेट थी-हथेली के आकार की। एक खल्ली से अपने ललाट को छुआ और एक प्लेट निकाल कर उसे छुआ। मेरे मन में जो सन्देह या प्रश्न था उसका उत्तर ५०० वर्ष पुरानी संस्कृत मिश्रित ओड़िया् में उत्कीर्ण हो कर आने लगा। एक बार में ट्वी स्क्रीन की तरह ६ पंक्ति आती थी। पढ़ने के बाद वह समतल हो कर पुनः ६ पंक्ति उत्कीर्ण होती थी। बार बार अक्षर उत्कीर्ण होने से प्लेट गर्म हो जाती थी और उसे पानी में डुबा कर ठण्ढा करना पड़ता था। ३० मिनट का टेप रेकार्डर का कैसेट समाप्त होने पर ५ मिनट और आया। आश्चर्य की बात थी कि प्राचीन गणित सब्दों के साथ आधुनिक गणित के अंग्रेजी /ग्रीक शब्द भी आ रहे थे। मुझ लगा कि मेरे विचार को अच्युतानन्द का समर्थन प्राप्त है और मैं०ने लिखना आरम्भ किया। पूर्णता के लिये प्रतीक्षा करता तो जीवन भर नहीं लिख पाता। बाद में अनुभव हुआ कि मेरे ही विचार उत्कीर्ण हो रहे थे। पर आधुनिक विज्ञान के लिए भी आश्चर्य है कि मन का विचार ताम्र पत्र पर कैसे आया तथा बिना सांचा के कैसे उत्कीर्ण हुआ।

हिंदी साहित्य का बड़ा फ्रॉड राहुल सांकृत्यायन

केदार पांडेय उर्फ राहुल सांकृत्यायन: महापंडित के मुखौटे वामपंथी मिथ्याचारी

हिंदी साहित्य में एक बहुत बड़ा फ्रॉड बड़े प्यार से पाला गया है - राहुल सांकृत्यायन को महापंडित और महान इतिहासकार बताना। सच ये है कि फिरेला आदमी था, साहित्यकार था, पर उनके ख्याली पुलाव को बहुत तरीके से इतिहास बना कर प्रस्तुत किया गया और उन्हें इतिहासकार बना दिया गया।

राहुल सांकृत्यायन के 3 काम थे - डिस्टॉर्ट, डिफेम, और डिवाइड।

1. डिस्टॉर्ट - इतिहास को तोड़ो-मरोड़ो

वोल्गा से गंगा: इसका सबसे बड़ा सबूत है। 6000 BC से 1942 तक का 8000 साल का इतिहास बिना एक भी पुरातात्विक सबूत के लिख दिया।

तथ्य क्या दिया? शून्य।
फुटनोट कितने? शून्य।
शिलालेख, सिक्का, कार्बन डेटिंग? कुछ भी नहीं।

बस क्या था? गप्प। निशा थी, दिवा थी, अमृताश्व ने घोड़ा पाला, पुरुहूत ने लड़ाई की। ये सब वेदों के नामों से उठा कर बनाई गई काल्पनिक कहानियां हैं, जिनके मुंह में लेनिन के भाषण डाल दिए गए।

इसे इतिहास नहीं, वामपंथी फिक्शन कहते हैं।

2. डिफेम - अपनी ही सभ्यता को गाली दो

राहुल का पूरा प्रोजेक्ट एक ही था - वैदिक सभ्यता को विदेशी साबित करो।

अंग्रेजों की बनाई हुई सड़ी हुई आर्यन इनवेजन थ्योरी को उठाया, उस पर लाल रंग पोता और कहा - देखो आर्य वोल्गा से आए, भारत के मूल निवासी तो दस्यु थे।

मतलब हिंदू सभ्यता ही बाहर की है, तो हिंदू का इस जमीन पर हक ही क्या?

आज साइंस इस थ्योरी को कचरे में फेंक चुकी है, पर राहुल के झूठ की दुकान आज भी यूनिवर्सिटियों में चल रही है।

और दूसरा - अकबर महान, महाराणा प्रताप सामंती। चित्तौड़ में 30,000 हिंदुओं का कत्ल करने वाला अकबर इनके लिए सेक्युलर है, क्योंकि उसने जजिया हटाया। ये है इनका इतिहास का पैमाना।

3. डिवाइड - समाज को बांटो

राहुल का इतिहास हमेशा दो हिस्सों में बंटा है - शोषक और शोषित, आर्य और अनार्य, ब्राह्मण और शूद्र।

हर कहानी में एक ही जहर - ब्राह्मण ने तुम्हें लूटा। क्षत्रिय ने तुम्हें मारा। मंदिर ने तुम्हें ठगा।

उद्देश्य इतिहास बताना नहीं, नफरत बोना था। ताकि हिंदू समाज कभी जुड़ ही न पाए। यही वामपंथी डिस्टोरियन का असली काम है - अतीत में आग लगाओ ताकि वर्तमान में वोट सेको।

झूठ की खेती से क्या मिला?

- तिब्बत से ग्रंथ लाए, पर अनुवाद में बुद्ध को जबरदस्ती कम्युनिस्ट बना दिया।
- रूस गए, स्टालिन के अकाल और हत्याओं पर आंख बंद कर ली और _स्तालिन_ नाम की चापलूसी भरी जीवनी लिख दी।
- खुद को घुमक्कड़ कहते रहे, पर घुमक्कड़ी से बड़ा कोई अहंकार नहीं पाला - 150 किताबें लिख कर खुद को ही अंतिम सत्य घोषित कर दिया।

अंतिम बात

राहुल सांकृत्यायन कोई इतिहासकार नहीं थे। वो एक विचारधारा का प्रचारक थे जिसने गप्प को इतिहास की पैकेजिंग में बेचा।

उन्होंने तथ्य नहीं दिए, कल्पना दी।
उन्होंने सबूत नहीं दिए, कहानियां दी।
उन्होंने इतिहास नहीं लिखा, एजेंडा लिखा।

यह बहुत कठिन होता है मेरे लिए किसी के लिए इस तरह से लिखना, लेकिन मैं क्या ही करूं, इतना झूठ, इतना झूठ वामपंथियों ने फैलाया है कि मेरी मजबूरी बन गई उनके मुखौटे उतारना।

राहुल सांकृत्यायन समेत ये वामपंथी स्टॉक होम सिंड्रोम के उदाहरण बनने के अतिरिक्त अपने धर्म संस्कृति के लिए कुछ नहीं बन पाए, जिस मातृ संस्कृति का दूध पीकर पोषित हुए उस ऋण की एक पाई भी नहीं वापस कर पाए, केवल अपने इन्द्रिय आनंद में कीड़े के तरह भोग करते रहे।

भारतीय नदियाँ


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मैं जैसे ही किसी नदी का दर्शन करता हूँ मेरी हृत्तन्त्री के तार झङ्कृत होने लगते हैं। जब पड़ोसी तहसील सरदारपुर के श्री राजेन्द्रसूरि महाविद्यालय में अध्यापन करता था तब निकट ही प्रवहमान माही नदी के दर्शन का अनेको बार लाभ हुआ। निकट ही मालव पठार के मिन्डा ग्राम से निकल तुरन्त उत्तरवाहिनी हो जाने वाली मिहिरकन्या माही का स्वरूप जैसे गौमुख से निकल हमें गंगोत्री में प्राप्त होता है वैसे ही दर्शन सरदारपुर सेतु पार करते हुए होते हैं। सेतु समापन पर पूर्व तट पर नवग्रह मंदिर में सूर्यदेव की प्रतिमा के साथ विराजित माही माता के दर्शन लाभ भी हुए हैं।

वेगड़ जी उचित ही कहते हैं - 'संस्कृतियों का जन्म नदियों की कोख से हुआ है।' दीर्घावधि इतिहास हमें स्मरण हो, न हो, लिखा गया हमें मिला हो, न मिला हो, लेकिन लोकमन ने जो अपनी स्मृतियों में संजो लिया वह परम्परा में अक्षुण्ण हो जाता है! इतिहासकार अपनी विचारधारा अनुसार दोगलापंथी कर सकते हैं लेकिन लोकमन पवित्र होता है। हमारे पुराणों में पंजीबद्ध कथाएँ भले ही अन्यान्य ग्रंथों में गड्डमड्ड करती भी हो लेकिन है तो वे हमारी पुरासम्पदा ही। बाह्य सभ्यताएँ हमें उन्हें विस्मृत करने के लिए अपने कुकर्म करती रहेगी पर हम इन निधियों से अपनी संस्कृति सहेजते है और उसी से सभ्यता संरक्षित होती है। माया और एज़्टेक सभ्यता आज कहाँ है?

जब पुराणों की बात करता हूँ तो माही माता की स्कन्द पुराण में वर्णित प्रार्थना सहज मन में स्फुट होने लगती है - महीदोहे महानन्दसन्दोहे विश्वमोहिनि। 
      जाता हि सरितां राज्ञि पापम् हर महिद्रवे ॥

('हे देवी ! तू इस पृथ्वीकी दुग्ध है, परमानन्दकी राशि है, सम्पूर्ण विश्वको मोहनेवाली है तथा आप समस्त सरिताओं की महारानी के रूप में प्रकट हुई हैं, इसलिए हे महीद्रवे, मेरे समस्त पाप हर लीजिए!) कितनी अभिभूत करने वाली वन्दना है! माही उत्तरवाहिनी होकर अपना दीर्घपथ चुनती है। यदि मिन्डा ग्राम से दक्षिणपथ चुन लेती तो मात्र ८० किमी की दूरी पार कर नर्मदा जी की सहायक नदी बन जाती, वैसे ही जैसे मालवा पठार की क्रोढ़ से बाघनी नदी निकल कर मेरे ग्राम से होते हुए नर्मदा माई में संगम ले लेती है। विश्व प्रसिद्ध बाघ की बौद्ध गुफाएँ बाघनी के तट पर ही है। माही को अपना स्वतंत्र पथ चुनना था। मालवा के महाराजा भोज शासित अञ्चल को सींचते हुए उत्तर से फिर पश्चिमवाहिनी कहलाना था, कर्क रेखा को पार करते हुए पुनः अपने देशांतर आरेख में लौटना था, वागड़ (व्याघ्रवाट) अञ्चल को सिंचित करना था, बेणेश्वर तीर्थ निर्माण करना था, सोम, जाखम, भादर, अनास, चाप और मोरन जैसी अनेक सखियों को अपना आलिङ्गन देना था। म. प्र., राजस्थान और गुर्जरभूमि तो हमारी खींची हुई रेखाएँ हैं लेकिन वसुधा ने जिस माही को अपने अंक से प्रकट किया वह तो किसी बड़े लक्ष्य के लिए ही होगा न? 

पौराणिक कथाओं में सूर्य की पत्नी संज्ञा से ताप्ती का जन्म और छाया से यमुना का जन्म माना जाता है। लेकिन सूर्य की तीसरी पुत्री माही है अपने उद्गम से वह सूर्य पुत्री के रूप में पूजित और प्रवाह पथ में स्थान स्थान पर बने मंदिरों में इसी परिचय के साथ विराजमान हैं।

माही मैया का जन्म माघ शुक्ल द्वितीया के दिन मनाया जाता है यानी नर्मदा जी के जन्म से ठीक पांच दिन पूर्व। एक सूर्यपुत्री तो दूसरी शिवपुत्री! माही नदी के जन्म माह को गुजराती भाषी लोग महा मास कहते हैं, महा मास की द्वितीया को माही का जन्म। क्या नामकरण में कोई संकेत छुपे हैं? मन करता है कि लोकमन को पूछूँ कि ५८० किमी लम्बाई में बहने वाली नदी को और उसके जन्मोत्सव को माही-बीज के रूप में उजवने वाले लोग किस शास्त्र को पढ़कर ऐसा अलिखित कैलेंडर सदियों से चला लेते हैं कि प्रतिवर्ष जन्मोत्सव धूमधाम से मना डालते हैं। मंदिरों में पूजन होता है, खगोलीय प्रभाव को साधने के लिए एक नदी को नवग्रह मंदिर में सूर्य की गोद में स्थित अंकन किया जाता है। शनिचरी अमावस्या के दिन माही का नहान करने के लिए मेरे ग्राम से कितने ही लोग सरदारपुर जाकर दर्शन, पूजन और ग्रहशांति के कर्म करते हैं। प्रतिवर्ष पंचकोशी परिक्रमा आयोजित होती है। हजारों नर नारी अपनी पोटलियाँ सिर पर रख परिक्रमा के लिए चल पड़ते हैं। स्कन्द पुराण में वर्णित माही के अठारह नामों का जप करते हैं - 
              ताम्रा रस्या पयोवाहा पितृप्रीतिप्रदा शुभा। 
              शस्यमाला महासिन्धुर्दातुर्दात्री पृथुस्तुता॥ 
              इन्द्रद्युम्नस्य कन्या च क्षितिजन्मा इरावती। 
              महीपर्णा महीशृङ्गा गङ्गा पश्चिमवाहिनी॥ 
              नदी राजनदी चेति नामाष्टादशमालिकाम्।
(ताम्रा, रस्या, पयोवाहा, पितृप्रीतिप्रदा, शुभा, शस्यमाला, महासिन्धु, दातृदात्री, पृथुस्तुता, इन्द्रद्युम्नकन्या, क्षितिजन्मा, इरावती, महीपर्णा, महीश्रृंगा, गंगा, पश्चिमवाहिनी, नदी तथा राजनदी-इन अठारह नामोंकी माला करें।) 

इतनी पुण्यदायिनी सरिता अपने प्रवणांक पथ की तीव्रता के कारण ऊँचे तटबंध निर्माण करते हुए बड़े बड़े खादर निर्मित करती है गुजराती में कहें तो भेखड़ रचती है। ये भेखड़ चोरों, लुटेरों के शरणस्थल बन जाते हैं। पुण्या नदी चोरों की जननी कही जाने लगती है। वागड़ी भाषा का यह दोहा देखिए - 

खड़, खाकड़ँ, खेजड़ गणा, कासड़ियाळो वेस! 
नपट नारि पियु लजामणी, इत बँट्यो वागड़ो देस! 
इतिहास के मध्यकाल में ऐसे कथन यथार्थ के अधिक निकट होंगे पर पूर्वकाल में इस बात को बड़े यत्न से कहा गया- वागड़े पञ्चरत्नानि, पत्राणि च शिलोदकम्! 
           चतुर्थ मधुप पुष्पम् च पञ्चमम् वस्त्रलुञ्चनम्!
यहाँ ऐसे लोग हुए हैं जो वस्त्र लुञ्चन कर पूर्ण नग्न कर भेजते होंगे तब ऐसे कथन ख्यात हुए होंगे। जो भी हो अपने भेखड़ों की शरण के कारण यह निम्न वर्ग कहे जाने वाले अकिञ्चन लोगों की भगिनी है, माई है। यह नदी अपने पूरे पथ में भील, बंजारा और पारदी जनजातियों को अपने भ्राता के रूप में गिनती है। साथ ही यह भी दृष्टव्य है कि अन्त्यज कहे जाने वाले ये समुदाय अपनी भगिनी, अपनी माई की शपथ जल-हस्त ले उठाते हैं तो शीश कट जाए लेकिन उस शपथ की आन रखते हैं - 
विवादे च समुत्पन्ने अपराधी च यो मतः।
जलहस्तः सदा वाच्यो महीसागरसंगमे ॥

माही नदी का विवाह समुद्र से हुआ तो समुद्र बारात लेकर ४५ मील भीतर तक चला आया, इतने भीतर आकर संगम लेने वाली यह एकमात्र नदी भी है। जो आणंद तहसील (गुजरात) के वहेराखाड़ी में स्थित है। लोकमान्यता है कि जब समुद्र माही के विवाह की भाँवर में चौथा फेरा चल रहा था तब रबारी जनजाति के लोगों ने कन्यादान किया था। इसलिए माही को बहन जैसा मानते हुए अपनी बहिनी के जन्मदिन पर प्रतिवर्ष वहेराखाड़ी और अन्य स्थानों पर अपनी गायों के दूध को न बेचते हुए उस दिन दुग्धाभिषेक करते हैं! अब एक पंथ विशेष के लोग पहले ही शिवजी पर दूध चढ़ाने को लेकर कुढ़ते रहे हैं, यह सुनेंगे तो दोगुना सिर धुनेंगे! पर धुनें तो धुनें! उनके भाग में ही सिर धुनना लिक्खा हो तो मैं क्या कर सकता हूँ? स्कन्द पुराण के अवन्ती खण्ड की पूज्या, आराधिता नदी लोक में आकर कैसे कैसे विरूद और कैसे कैसे कथानक, किम्वदन्तियों की गाथा बन जाती है इसका सबसे सशक्त उदाहरण माही है। गुजराती में माही माँ नो गरबो गाते हुए कवि कह देता है - 
नाख्यु घोड़ा पर जीन तारी ख्याता रे। 
सूध सान ने वीसरी मही माता रे। 
उछाळ्यु नीर अपार तारी ख्याता रे। 
गाम घणां ने घेरिया मही माता रे! 
तुं निकळी हद थी बहार तारी ख्याता रे! 
माही के रौद्र रूप का वर्णन बहुत अल्प शब्दों में हम समझ सकते हैं! 

माही को टॉलेमी नामक यात्रा वृत्तांतकार ने मेफिस के नाम से उद्धृत किया है और अल्बरुनी माही को महिन्द्री लिखता है! व्हेन सांग ने इसे मो-हे-ई नाम से अपने ग्रंथ में स्थान दिया है! इटैलियन यात्री लुडोविको डी वर्थेमा ने भी इसका उल्लेख किया है। इसका तात्पर्य है कि हजार वर्ष के इतिहास में इस नदी की कोख में सभ्यता के, संस्कृति के उत्थान गीत रचे जाते रहे हैं, तभी तो बाहरी यात्री इस नदी का सामिप्य पाने के लिए दौड़े चले आए होंगे!

ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित रचनाकार श्री पन्नालाल पटेल मूल गुजराती नहीं लेकिन वागड़ के निवासी थे। उनके ऐतिहासिक कथानक पर लिखे उपन्यास 'रक्त गुलाल' में श्री पटेल ने पूरे महीकाँठा को जो लिखा है उससे मुझे रेणु जी का मैला आँचल उपन्यास स्मरण हो आता है! गलालसिंह और पियोली के चरित्र चित्रण के साथ वागड़ की गलालेंग परम्परा जो आज भी निरन्तर है उसका विवरण भूल जाऊँ तो माही के साथ लेखन में मेरे द्वारा अन्याय होगा! ऐसा कैसे कर सकता हूँ? गलालेंग में गायी जाने वाली पंक्तियाँ पटेल जी रक्त गुलाल में लिखते हैं - 
खळभळ खळभळ मही नो काँठो, 
काँठे फरके माँ नी धजाओ! 
आवन जावन मनखा मेळो, 
ऊँट, घोड़ा कोई पालखी वाळो! 
(काँठो = किनारा या तट) 

पटेल जी ने गलालसिंह का वर्णन किया है लेकिन माही काँठे स्थित भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के दो क्रांतितीर्थ कहीं विस्मरण न हो जाए इसलिए लिखता हूँ। इस नदी की कोख में भारतीय स्वतंत्रता के दो क्रांतितीर्थ हैं। जो भोले भाले जनजातीय लोगों ने लड़े हैं। पहला तीर्थ है खानपुर (जहाँ १८५७ के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के समय का एक वटवृक्ष है जिस पर ३५० क्रांतिकारियों को फाँसी देने का भीषण कृत्य अंग्रेजों ने किया था, दूसरा है कडाणा बाँध की तराई में आया मानगढ़ (पहाड़ी) नामक तीर्थ, जहाँ १५०७ जनजातीय वीरों को गोलियों का भोग बनना पड़ा। इन दोनों क्रांतितीर्थों पर माही की कोख में ९ अगस्त को मेला लगता है। माही ने स्वतंत्रता के लिए मानों अपने जनजाति पुत्रों को प्रेरित कर अपनी ओर से स्वतंत्रता यज्ञ में आहुति अर्पित की हो। 

म. प्र., राजस्थान और फिर गुजरात का जलाभिषेक लेकर महिसागर नामक एक नया भौगोलिक लगून (पश्चजल) रचती है जो विश्व में दुर्लभ है। ठीक पास में जहाँ माही धुवारण की खाड़ी में समुद्र संगम करती है यह खम्भात की खाड़ी का उत्तर भाग है इसी खम्भात की खाड़ी में नर्मदा माई विश्व की १२ या १३ कुल नदियों की श्रेणी में Estuaries (ज्वारनदमुख) निर्माण करती है वहीं माही नदी धुवारण से लेकर वहेराखाड़ी तक महिसागर रुपी लगुन निर्माण करती है। कितना अद्भुत है न पास पास प्रकृति का यह अनुपम रचाव? हमारी संस्कृति नदियों को सामान्य कारणों से माँ उपमा नहीं देती! वे माँ हैं इसीलिए माँ कही जाती है। एक माँ अपने बेटे को आँचल की ओट में दूध पिलाती है, लेकिन नदियाँ खुले वक्ष अपनी संतति को सदैव अमृतपान कराती है। इसीलिए भारतीय चित्रकला नदियों का अंकन खुले स्तन के साथ करती है। आलेख समापन करते हुए बताता चलूँ कि धुवारण में समुद्र संगम करते हुए माही अपने जन्मस्थान की तरह पुनः उत्तरवाहिनी हो जाती है! समुद्र पर कावी स्थित स्तम्भेश्वर महादेव अग्निरूपी योनी को धारण करने वाली माही के सागर संगम के साक्षी बनते हैं! 

'अग्निश्च ते योनिरिडा च देहो रेतोऽथ विष्णोरमृतस्य नाभिः।' 
('हे महीनदी ! अग्नि तुम्हारी योनि (उत्पत्तिस्थान) और पृथ्वी तुम्हारी देह है। तुम यज्ञस्वरूप विष्णुके वीर्यसे उत्पन्न हुई हो और अमृतका केन्द्रस्थान हो।') 

हमारे मालव माटी के गहन गंभीर अध्येता डॉ वाकणकर जी ने अपनी शोधों के माध्यम से अपूर्व कार्य किए, उन्होंने ही अम्बीतमे सरस्वती के पथ का पंजाब, हरियाणा, राजस्थान और गुजरात होते हुए समुद्र के संगम की जानकारी भारतीय वाङ्मय के आधार पर सिद्ध करते हुए लोकमानस में यह रोपा। अन्धकार युग में लोकचेतना से विलुप्त तथ्यों को हमारा एक वर्ग सरस्वती को कपोल कल्पना मान रहा था। इस कथन के साथ मैं माही नदी के भू-गर्भ विषयक तथ्य को रखने जा रहा हूँ। श्री वाकणकर जी ख्यात किया कि सरस्वती नदी गुजरात में बहती रही है। हाल के अनुसंधानों से गुजराती में कुछ अनुसंधान हुए हैं कि सरस्वती नदी पूर्व में कच्छ के बड़े रण में होते हुए समुद्र में मिलती रही इससे पूर्वपथ वह सोमनाथ ज्योतिर्लिंग के निकट हीरण और कपिला के साथ समुद्र संगम कर त्रिवेणी संगम रचती रही। लेकिन जो भू-गर्भ तथ्य आ रहे हैं उसके अनुसार इससे भी पूर्वकाल में वह ताप्ती के सूरत स्थित संगम के ठीक सामने समुद्र में मिलती थी। ताप्ती और सरस्वती का यह एश्चुअरी क्षेत्र ऊँचा था, जबकि नर्मदा और माही का पाट नीचे था। फलस्वरूप जैसे जैसे गुजरात का आनर्त अंचल बाहर आता रहा, सरस्वती ने अपना पथ परिवर्तन किया। ताप्ती का प्रवणांक पथ तीव्र था इसलिए समुद्र की काप को काट कर सूरत का सुवाळी-बीच (बर्थ प्लेस ऑफ इंडियन नेवी) निर्मित किया। माही ने भी अपनी गहरी नदी घाटी की काप को काटकर गहरी घाटी निर्मित की। अपने लोथल की हड़प्पा संस्कृति से संबंधित लेख में भोगावो नदी के तथ्य के साथ समुद्र के पीछे हटना मैं लिख चुका हूँ। बाद में ज्ञात हुआ कि भोगावो की उस गहरी गाद में दिल्ली विश्वविद्यालय की एक शोध छात्रा लोथल के भू-गर्भ के प्रमाण एकत्रण हेतु उतरी थी और काप का भूखण्ड गिरा जिसमें वह दिवंगत हुई। 

हमारे प्राचीन ऋषियों ने जो हजारों नहीं बल्कि लाखों वर्षों के पृथ्वी के परिवर्तनों को नोटिस किया और कथाओं के माध्यम से उन्हें ज्योतित किया हम ऋणी हैं उनके। वरन सौ वर्ष पूर्व तक वायुयान भी भारतीय कथाओं का काल्पनिक विषय ही कहा जाता रहा। हमारे ऋषियों ने आज भी अल्पज्ञात इस माही नदी की महिमा में यह स्तुतिगान किया है वह हृदयाम्बुज में उतार अवगाहन करने के लिए ही तो है - 
मुखम् च यः सर्वनदीषु पुण्यः पाथोधिरम्बुप्रचुरा मही च। 
समस्ततीर्थाकृतिरेतयोश्च ददामि चार्ध्यम् प्रणमामि नौमि॥
सहस्रविंशतिश्चैव षट्‌शतानि तथैव च॥
तासां सारसमुद्भुतं महीतोयं प्रकीर्तितम्॥ 
पृथिव्यां सर्वतीर्थेषु स्नात्वा यत्फलमाप्यते॥
तन्महीसागरे प्रोक्तं कुमारस्य वचो यथा॥ 
एकत्र सर्वतीर्थानां यदि संयोगमिच्छथ॥
तद्गच्छथ महापुण्यं महीसागरसंगमम्॥
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भारतीय एतिहासिकता और विश्व

भारत में दुर्बल तथा पराधीन मानसिकता है। उसी लेख या पुस्तक को शोध मानते हैं जिसका समर्थन विदेश के विशेषकर ब्रिटेन तथा अमेरिका के लेखक करें। भारतीय पुस्तकों को बिना पढ़े झूठा मान लेते हैं, या उसका उल्टा निष्कर्ष निकालते हैं। (१) इन्द्र पूर्व दिशा के लोकपाल थे, उनके शब्द तथा स्थान नाम आज तक असम से वियतनाम तक प्रचलित हैं। पर उनको पश्चिम से आये आर्यों का नेता कहते हैं। (२) भागवत प्रवचन में कहते हैं कि द्रविड से ज्ञान का आरम्भ हुआ, कर्नाटक में वृद्धि हुई तथा महाराष्ट्र तक प्रसार हुआ। इसी कारण भारत को राष्ट्र तथा उसके खण्ड को महाराष्ट्र कहते हैं। पर अशिक्षित लेखक कहते हैं कि उत्तर के आर्यों ने दक्षिण भारत पर वेद थोप दिया। (३) भारत के खनिज क्षेत्रों में भी बाहर से आये मजदूरों के वंशज देखने से ही अफ्रीकी मूल के लगते हैं। इसमें किसी शोध की आवश्यकता नहीं है। आज तक उनकी उपाधि वही है जो ग्रीक भाषा में खनिजों के नाम हैं।(४) चण्डी पाठ में आक्रमण करने वाले महिषासुर को स्पष्ट कहा है कि जीवित रहना चाहते हो तो पाताल (अमेरिका) लौट जाओ। अमेरिकन इतिहास में भी पढ़ाया जाता है कि यूरोपीय लोगों के पूर्व यहा महिष (Bison) मुख्य पशु था। हिरण्यकशिपु का वंशज बलि भी देव क्षेत्र पर कब्जा छोड़ने के बाद अमेरिका लौट गया था। उसकी राजधानी भोगवती तट पर भोगवती नगरी थी जो आज भी है (बोगोटा तट पर कोलम्बिया की राजधानी बोगोटा)। पर नवरात्र का पाखण्ड करने वाले भी महिषासुर को मूल भारतीय कहते हैं। (५) आज तक विश्व में केवल एक जाति का समाज नहीं हुआ है। केवल ब्राह्मण, केवल मोची, या केवल क्षत्रिय का समाज एक दिन भी नहीं टिक सकता है। पर मतान्धों का प्रचार है कि ब्राह्मण बाहर से आकर भारतीयों को दास बना दिया। बिना किसान के तो भोजन भी नहीं मिलेगा, जीवित रहना ही असम्भव है।
(६) जिस किसी अन्न की चर्चा हो, उसके विषय में प्रचार है कि यह भारत में नहीं होता था। सरकार तथा संघ के प्रचार के अनुसार ५००० वर्ष तक भारतीय बिना अन्न के जीवित रहे। दलित तो पानी भी नहीं पी सके। ये प्रचार करने वाले केवल ३ दिन बिना पानी पिये रह कर दिखायें। (७) संस्कृत विश्वविद्यालय के प्राध्यापक तथा कुलपति भी अशिक्षा तथा भारत के अज्ञान में किसी से कम नहीं हैं। ज्योतिष के प्रायः सभी प्राध्यापक तथा पञ्चाङ्ग निर्माता युधिष्ठिर शक, विक्रमादित्य संवत् तथा शालिवाहन शक का प्रयोग करते हैं। पर अगले ही वाक्य में कहते हैं कि शक-संवत् विदेशी शकों का था। शक तथा संवत् भिन्न-भिन्न हैं, तथा किसी शक राजा ने आजतक कोई शक या संवत् आरम्भ नहीं किया। विक्रमादित्य संवत् की गणना करने के बाद उसके आधार वराहमिहिर, कालिदास तथा ब्रह्मगुप्त को विक्रमादित्य के ६०० वर्ष बाद का कहते हैं। इन लोगों के अनुसार बिना किसी गणित या शासक के विक्रमादित्य संवत् आरम्भ हो गया। (८) प्रयाग के राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान के कुलपति गयाचरण त्रिपाठी हर भाषण में कहते थे कि वेद में जगन्नाथ का ही वर्णन है तथा वे ज्ञान के स्रोत हैं। पर 'अन्तरराष्ट्रीय ख्याति' के लिए हरमन कुल्के के साथ मिलकर 'जगन्नाथ कल्ट' नाम की पुस्तक लिखी जिसके अनुसार जगन्नाथ हिन्दू देवता नहीं है, अशिक्षित आदिवासियों के टोटेम हैं, इस कारण उनकी मूर्ति बिना हाथ पैर के अनुसार। इन लेखकों के अनुसार प्रयाग तथा हार्वर्ड में पढ़ने के बाद ही पता चलता है कि मनुष्य के हाथ पैर भी होते हैं। २००४ में डाॅक्टर कर्ण सिंह की अध्यक्षता में त्रिपाठी जी जगन्नाथ को वेद स्वरूप कह रहे थे तो मैंने कहा कि आप बिल्कुल उल्टा अपनी पुस्तक में लिखते है। उन्होंने कही कि पुस्तक में भूल है, उसका सुधार करेंगे। अगले तीन सम्मेलनों में उनको याद दिलाया, पर वे जीवन भर सत्य लिखने का साहस नहीं कर सके।



## पाठ 1: प्राचीन ग्रंथों में भारत और रूस के ऐतिहासिक-पौराणिक संबंध

* पौराणिक संदर्भ: प्राचीन भारतीय ग्रंथों, पुराणों और महाभारत में रूस के संदर्भ मिलते हैं। देवराज इंद्र के तीन लोकों को रूस, चीन और भारत के निकटवर्ती क्षेत्रों से जोड़ा गया है, जिसमें उत्तर कुरु (साइबेरिया) का क्षेत्र भी शामिल है।
* भाषाई व सांस्कृतिक समानताएं: संस्कृत और रूसी भाषा के कई शब्दों में गहरी समानता है, जो दोनों देशों की साझा विरासत की ओर संकेत करती है।
* सूर्य पूजा और अकाइम का मंदिर: रूस में प्राचीन समय में सूर्य पूजा वैदिक परंपराओं से जुड़ी हुई थी। इसका सबसे बड़ा प्रमाण अकाइम (Arkaim) में स्थित प्राचीन सूर्य मंदिर (52° उत्तर अक्षांश) से मिलता है।
* महाभारत के साक्ष्य: महाभारत के सभा पर्व में अर्जुन की 'उत्तर कुरु यात्राओं' का वर्णन है। इसके अलावा भद्रा नदी (जिसे साइबेरिया की ओब, येनीसी और लेना नदियों के रूप में पहचाना जाता है) का विवरण प्राचीन भारत और रूस के घनिष्ठ संबंधों को दर्शाता है।

## पाठ 2: राधा तत्व की व्याख्या, छठ पर्व और रूस से जुड़ा शोध

* पुराणों में राधा जी का वर्णन: श्रीमद्भागवत पुराण मुख्य रूप से 'भागवत तत्व' की व्याख्या के लिए है, इसलिए उसमें राधा जी का केवल संक्षिप्त (छोटा) संकेत मिलता है। राधा तत्व की विस्तृत और गहन व्याख्या के लिए स्वतंत्र देवीभागवत पुराण प्रमुख ग्रंथ है, जिसमें राधा जी और अन्य देवी रूपों को तत्व रूप में विस्तार से समझाया गया है।
* ऋग्वेद और छठ के गीत: देवीभागवत पुराण के स्कंध 9 में वर्णित 'षष्ठी देवी' (छठ मैया) का जो वर्णन है, ठीक वही वर्णन ऋग्वेद में भी मिलता है। षष्ठी देवी के सूक्त में की गई प्रार्थना के अर्थ ही आज भोजपुरी, मैथिली और मगही भाषा के छठ गीतों में गाए जाते हैं, जिन्हें प्राचीन काल में विद्यापति जैसे विद्वान कवियों ने लिखा होगा।
* रूस में सूर्य पूजा और ठेकुआ: वर्ष 1930 में नवलकिशोर प्रेस से प्रकाशित पं. चन्द्रशेखर उपाध्याय और पण्डित मधुसूदन ओझा जी के लेखों के अनुसार, रूस में भी प्राचीन काल में सूर्य पूजा होती थी और वहाँ बिहार की तरह ही 'ठेकुआ' (छठ का मुख्य प्रसाद) बनता था।
* अकाइम मंदिर की पुष्टि: ओझा जी ने अपने 'इन्द्रविजय' ग्रंथ में रूस के सूर्य मंदिर का जो अक्षांश दिया था, उसके ठीक 78 वर्ष बाद रूसी राष्ट्रपति पुतिन ने गर्व के साथ अकाइम में उसी स्थान पर प्राचीन सूर्य मंदिर मिलने की आधिकारिक घोषणा की थी।
* भोजन का भ्रामक अंग्रेजी शोध: अंग्रेजी शोध पद्धति में यह तर्क दिया जाता है कि भागवत पुराण में आलू, दाल आदि की चर्चा नहीं है, अतः ये अन्न भारत के नहीं थे। जबकि सत्य यह है कि अंग्रेजों के भारत आने के पूर्व भी भारतीय लोग बिना इस आधुनिक भोजन के हजारों वर्षों से उत्कृष्ट जीवन जी रहे थे।

## पाठ 3: वेदों और पंच प्राणों में राधा शब्द के प्रमाण

* आकाश और 5 तन्मात्राएं: देवीभागवत पुराण (स्कंध 9, अध्याय 1) के अनुसार, राधा जी को भगवान के 5 प्राणों की अधिष्ठात्री देवी के रूप में माना गया है। आकाश में स्थित 5 पर्वों की 5 तन्मात्राएं इस प्रकार हैं:
1. स्वायम्भुव मण्डल — आकाश-शब्द गुण
   2. परमेष्ठी मण्डल — गति या वायु रूप-स्पर्श
   3. सौर मण्डल — तेज-रूप
   4. चान्द्र मण्डल — द्रव जैसा विरल पदार्थ-रस
   5. पृथ्वी मण्डल — ठोस भूमि-गन्ध गुण
* ऋग्वेद में राधा शब्द के साक्ष्य: कई लोग मानते हैं कि वेदों में राधा जी का नाम नहीं है, परंतु ऋग्वेद में कई स्थानों पर 'राधा' शब्द का स्पष्ट उल्लेख मिलता है। इसके कुछ प्रमुख सूक्त संदर्भ निम्नलिखित हैं:
* (1/30/5) — राध्नोति सकलान् कामान् तेन राधेति सा स्मृता स्तोत्रं राधाणां पते।
   * (1/10/7) — गवामप व्रजं वृधि कृणुष्व राधो अद्रिवः।
   * (1/32/11) — दासपत्नीरहिगोपा अतिष्ठन्।
   * (3/15/3) — त्वं नृचक्षा वृषभानु पूर्वीः कृष्णास्वग्ने अरुषो वि भाहि।
   * इसके अलावा ऋग्वेद के 1/42/7, 1/107/1, 1/141/7, 1/121/5 तथा कई अन्य ऋचाओं में भी राधा/राधस शब्द का प्रमाण मिलता है।

## पाठ 4: रासलीला के श्रवण और कीर्तन के अधिकारी की योग्यता

* श्रवण-मनन का प्रभाव: भगवान की दिव्य लीलाओं के श्रवण और कीर्तन के अधिकारी सभी साधारण लोग नहीं हो सकते। इसके लिए जातक में कुछ विलक्षणता होनी चाहिए, क्योंकि इसका चित्त पर सीधा प्रभाव पड़ता है। जैसे वीररस का काव्य पढ़ने से वीरता और करुणरस का ग्रंथ पढ़ने से चित्त करुणा से भर जाता है, वैसे ही श्रृंगाररस प्रधान रासलीला के श्रवण से चित्त में श्रृंगाररस का उद्रेक होना स्वाभाविक है।
* मुख्य अधिकारी: रासलीला के मुख्य अधिकारी वे महापुरुष हैं, जो संसार की समस्त वासनाओं को जीतकर, अपने मन का निरोध करके परब्रह्म परमात्मा का साक्षात्कार (दर्शन) कर चुके हैं।
* हृदयरोग (कामरूप) से मुक्ति का माध्यम: ग्रंथ का सूत्र कहता है— "हृद्रोगमाश्वपहिनोत्यचिरेण धीरः"। इससे यह भी सिद्ध होता है कि जो व्यक्ति कामरूप (वासना) के हृदयरोग से पीड़ित हैं, वे भी यदि पूर्ण निष्ठा और मुक्त होने की इच्छा से इसका श्रवण करते हैं, तो वे इस मानसिक रोग से शीघ्र ही मुक्त हो जाते हैं। परंतु श्रवण करने वाले के मन में इस रोग से छूटने की सच्ची इच्छा अवश्य होनी चाहिए।

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इस्लाम जातिवाद और छुआछूत

प्रायः वामपंथी इतिहासकार इस्लाम को भारतीय जाति व्यवस्था को डाइल्यूट करने का एक कारण बताते हैं, इस्लामी विद्वान देवदत्त पटनायक कहते हैं कि इस्लाम आने के बाद हिंदू जातियों में सुधार हुआ।

अव्वल इस्लाम में एक नुक्ता इधर से उधर करने की इजाजत और आजादी दोनों नहीं है। सुधार तो दूर की कौड़ी है लेकिन कुछ जाले मै साफ कर देना चाहता हूँ जो यह नैरेटिव बनाते हैं कि इस्लाम के जाति व्यवस्था हिंदुओं से आयी।

हिंदू संपर्क से पहले ही अरब और शुरुआती इस्लामी दुनिया में जातिवाद और छुआछूत का पूरा ढांचा तय हो चुका था। इस्लाम से पहले का अरब कोई बराबर समाज नहीं था, वो नसब यानी खून से बंटा हुआ था। सबसे ऊपर कुरैश कबीला था जो मक्का का मालिक था और कुरैश के अंदर भी बानू हाशिम को सबसे ऊंचा माना जाता था। उसके नीचे बानू तमीम, बानू असद जैसे दूसरे अरबी कबीले थे और सबसे नीचे मवाली और अबीद यानी गैर-अरबी और गुलाम, जिन्हें अरबी कभी अपने बराबर नहीं मानते थे। ये बंटवारा हिंदू समाज से सीखा हुआ नहीं था, ये रेगिस्तान का अपना कबीलाई सिस्टम था।

इस्लाम के आने के तुरंत बाद जब ईरान, सीरिया, मिस्र जीते गए और वहां के लोग मुसलमान बने तो अरबी मुसलमानों ने उन्हें मवाली कहा, यानी आजाद किया हुआ गुलाम जैसा। मवाली को मस्जिद में आगे की सफ में खड़े नहीं होने दिया जाता था, वो किसी अरबी औरत से निकाह नहीं कर सकता था और इसी के लिए क़ुफ़ यानी बराबरी का सिद्धांत बनाया गया कि अरबी औरत का क़ुफ़ सिर्फ अरबी मर्द ही हो सकता है। उमय्यद दौर में मवाली से मुसलमान होने के बाद भी जजिया जैसा टैक्स लिया जाता था और कहा जाता था कि तुम असली मुसलमान नहीं हो। गवर्नर हज्जाज बिन यूसुफ ने तो बसरा में हुक्म दिया था कि मवाली अरबी की तरह पगड़ी भी न पहनें। ये सब 8वीं सदी की बात है, भारत में इस्लाम के आने से लगभग 300 साल पहले की।

इसी तरह अफ्रीका से लाए गए काले मुसलमानों को जंज कहा जाता था और उनके साथ अछूत जैसा बर्ताव होता था। हजरत बिलाल को आजाद तो कर दिया गया पर उन्हें पूरी जिंदगी गुलाम पृष्ठभूमि से ही जोड़ा गया। 9वीं सदी में इराक में जंज गुलामों ने 14 साल तक विद्रोह किया क्योंकि उन्हें अलग बस्तियों में जानवरों की तरह रखा जाता था। उस दौर की कई अरबी किताबों में उनके लिए बहुत अपमानजनक बातें लिखी मिलती हैं।

इसके साथ ही सैय्यदवाद यानी जन्म से ऊंचा होने का सिद्धांत भी 8वीं सदी में ही बन गया था। पैगंबर के परिवार अहल-ए-बैत को पाक खून वाला माना गया, सैय्यद के लिए जकात लेना हराम बताया गया क्योंकि उसका दर्जा ऊंचा है, सैय्यद लड़की का निकाह गैर-सैय्यद से अमान्य माना गया और सैय्यद को गुलाम नहीं बनाया जा सकता था। ये सब जन्म से ऊंच-नीच का सिद्धांत था और ये अरब में ही बना था, भारत का इसमें कोई लेना-देना नहीं था।

तो निचोड़ ये है कि भारत में आने से पहले ही अरब समाज में तीन चीजें पूरी तरह मौजूद थीं - खून से जाति तय होना कि कुरैश ऊंचा और बाकी नीचे, पेशे और नस्ल से छुआछूत कि मवाली और जंज को अलग रखना और शादी में जाति देखना यानी क़ुफ़ का कानून। भारत में आकर इस्लाम ने जाति नहीं सीखी, उसने अपनी पुरानी अरबी जाति व्यवस्था को यहां सिर्फ नए नाम दे दिए - अशराफ, अजलाफ और अरजाल।

इरफान हबीब: मुगलई राज्य हिंदू कत्लेआम

इरफान हबीब: मुगलई डिस्टोरियन जिसने हिंदू कत्लेआम को वर्ग संघर्ष के रूप में स्थापित किया

इरफान हबीब को पढ़ना एक जादू देखना है। हाथ में फारसी स्रोत, मुँह पर मार्क्स का सिद्धांत, और बीच में से मजहब गायब। उसे वर्ग संघर्ष का नाम दे दिया ताकि मामला प्रगतिशील लगे, कत्लेआम रोमांटिक लगे।

उसका सबसे बड़ा काम - मुगल भारत की कृषि व्यवस्था इसी जादू की नींव है। इसमें उसने सिद्ध किया कि मुगल साम्राज्य जागीर संकट और लगान के दबाव से गिरा। पर उसी किताब में मुगल साम्राज्य के शोषण का मजहबी हथियार - जजिया, तीर्थयात्रा कर, मंदिरों की जमीन जब्त कर वक्फ बनाना, जबरन मतांतरण एक फुट नोट  भी नहीं।

क्यों? क्योंकि अगर जजिया का जिक्र कर दे तो मानना पड़ेगा कि किसान सिर्फ आर्थिक रूप से नहीं, धार्मिक रूप से भी निचोड़ा गया। साकी मुस्तइद खान लिख गया है कि जजिया का मकसद हिन्दुओं को अपमानित करना था। इस एक पंक्ति से पूरा वर्ग-संघर्ष का ढांचा गिर जाता है, इसलिए वह पंक्ति किताब में नहीं आती।

हबीब लिखता है मंदिर लूटे गए क्योंकि वे खजाना थे। पर खुद उसी के पढ़े हुए फारसी स्रोत में औरंगजेब का 1669 का फरमान है - काशी, मथुरा, सोमनाथ में काफिरों के विद्यालय और मंदिर तोड़ दो। इसमें खजाने का जिक्र नहीं, कुफ्र का जिक्र है। हबीब फरमान जानता है पर अनुवाद बदल देता है और इसे राजनीतिक विद्रोह दबाना बता देता है।

भारतीय इतिहास कांग्रेस में भगवाकरण के विरुद्ध प्रस्ताव लाकर खुद को धर्मनिरपेक्षता का ठेकेदार बना लिया पर उसी प्रस्ताव में मांग नहीं की कि मुगल काल के फारसी इतिहास में जो हिन्दुओं को काफिर, मुशरिक, हरबी लिखा है उस पर भी चर्चा हो। धर्मनिरपेक्षता एकतरफा हो गई - हिन्दू राष्ट्र की आलोचना करो, दार-उल-इस्लाम की नहीं।

यही धूर्तता है, सच को आधा बोलना। लगान का सच पूरा, जजिया का आधा। जागीर के संकट का सच पूरा, मूर्तिभंजन के जिहाद का आधा। इसी आधे सच से 60 वर्ष तक भारत के बच्चे पढ़ते रहे कि मध्यकाल में भाई-भाई थे बस जागीरदार खराब था। उन्हें बताया ही नहीं कि उसी काल में काशी में विश्वनाथ नहीं था क्योंकि तोड़ दिया गया था, मथुरा में कृष्ण जन्मभूमि पर ईदगाह थी, नालंदा में किताबें तीन महीने तक जली थीं और सोमनाथ के शिवलिंग को गजनी की मस्जिद की सीढ़ियों में गाड़ दिया गया ताकि रौंदा जा सके।

और जब यह आधा सच पकड़ा जाता है तो दूसरा औजार निकलता है - मिलावट। जो स्रोत में नहीं था वह जोड़ दिया। कहीं भी मंदिर को खजाना नहीं लिखा पर हबीब ने जोड़ा। कहीं गंगा-जमुनी तहजीब नहीं लिखी हबीब ने जोड़ी। अलबरूनी 1030 में किताब-उल-हिंद में हिन्दू को अलग पहचान लिख गया पर हबीब ने लिखा हिन्दू पहचान अंग्रेजों ने बनाई। 1857 के जिहाद वाले फतवे ब्रिटिश संग्रहालय में रखे हैं पर हबीब ने लिखा यह किसान विद्रोह था। धर्मसूत्र का आधा श्लोक उठा कर लिखा ब्राह्मण गोमांस खाते थे, अगली पंक्ति जिसमें गोहत्या को महापाप लिखा है छोड़ दी।

और जब कैंची और मिलावट दोनों पकड़ी जाएं तो तीसरा चेहरा आता है। 28 दिसंबर 2019 कन्नूर विश्वविद्यालय, 80वीं भारतीय इतिहास कांग्रेस का मंच। राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान मौलाना आजाद को उद्धृत कर रहे थे, हबीब उठा और कुर्सी छोड़ कर सीधे राज्यपाल की तरफ बढ़ आया, सहायक की कमीज फट गई, सुरक्षा गार्ड को आना पड़ा। राज्यपाल ने कहा वह सीधे मुझ पर हमला करने आया, यह काम सड़क के गुंडे का है।

किताब में जो काम कैंची करती थी मंच पर वही हाथ करने लगा।  मार्क्स की आड़ में मध्यकालीन मजहबी हुकूमत का वकील जो पहले फाइल से अपराध की धारा गायब करता है और जब न्यायाधीश पकड़ ले तो न्यायाधीश पर ही चढ़ जाता है।

यही पैटर्न है इन डिस्टोरियंस का जिसे वे पूरे भारत में लागू करने का स्वप्न देखते है।

Tuesday, 29 September 2026

देवदत्त पटनायक और नियोग

देवदत्त पटनायक की ब्राह्मणों द्वारा वीर्य बेचने वाली बात की पोल खोल

आजकल देवदत्त पटनायक एक थ्योरी चला रहा है - ब्राह्मण 6-8 रुपये में वीर्य बेचते थे।" इसमें 4 अलग-अलग कहानियां जोड़ दी गई हैं - महाभारत का नियोग, मनु का क्षेत्र-बीज न्याय, कथासरित्सागर की एक कहानी और केरल का संबन्धम। चारों को एक साथ जोड़ने से झूठ सच जैसा लगता है। इसी के सहारे वामपंथी इकोसिस्टम घृणा का नैरेटिव बनाता है।

आइए एक-एक परत खोलते हैं।

1. नियोग को पटनायक धंधा कहता है, इस नीच को कोई बताए कि यह एक आपातकालीन व्यवस्था थी और बाद में यह प्रतिबंधित हो गई ताकि इसके नाम पर समाज में विकृति न आए। मै पटनायक को नीच इसलिए कहता क्योंकि वह जानबूझ कर केवल हिंदू मान प्रतीकों के विरुद्ध अमर्श कहता है।

महाभारत में दो नियोग हैं। पहला - अम्बिका-अम्बालिका और व्यास। व्यास कोई बाजार का ब्राह्मण नहीं, विचित्रवीर्य की माँ सत्यवती के बेटे थे, यानी सौतेले भाई। ये दुनिया भर में मिलने वाली देवर प्रथा है। नातेदारी संज्ञाओं में लेविरेट और सारोरेट का चलन बहुत पहले से है।

दूसरा प्रसंग कुंती और धर्म-वायु-इंद्र के साथ का है, ये वैदिक देवता हैं, ब्राह्मण नहीं।

सबसे बड़ी बात - मनुस्मृति 9.59-63 में नियोग के नियम हैं - वासना नहीं होगी, घी लगा कर शरीर, एक ही बेटा, और 9.46 में साफ लिखा है - "लोभ में नियोग करने वाले दोनों पतित हो जाते हैं - लुब्धौ तु पतितौ स्याताम्।" मतलब पैसे लेना ही पाप है।

और अगर ये धंधा इतना फायदेमंद था तो बाद में बृहस्पति स्मृति और आदित्य पुराण ने इसे कलिवर्ज्य - कलियुग में बैन क्यों कर दिया? फायदेमंद धंधे को शास्त्र खुद बैन नहीं करता।

2. क्षेत्र-बीज न्याय : पितृत्व का कानून है, रेट-लिस्ट नहीं

पटनायक झूठ नैरेटिव सेट करता है - "जैसे बछड़ा बैल वाले का नहीं होता, वैसे बच्चा बीज वाले ब्राह्मण का नहीं।" इस बहाने वह फिर ब्राह्मणों को वीर्य बेचने वाला कहता है।

ये मनुस्मृति 9.48-52 का क्षेत्र-बीज न्याय है। इसका मतलब है - बच्चा माँ के पति का माना जाएगा, ताकि बच्चा अनाथ न रहे। ये आज के कानून जैसा है - शादी जिसको पिता बताए वही पिता। 

आज स्पर्म डोनर का बच्चे पर हक नहीं होता, क्या उसे सेक्स-वर्कर कहेंगे? नहीं। हक छोड़ना बेचना नहीं होता।

3. कथासरित्सागर : कहानी को इतिहास बनाना

एक कहानी सुनाई जाती है - व्यापारी की बेटी ने 500 मोहर में ब्राह्मण से बच्चा लिया।

कथासरित्सागर 11वीं सदी का काव्य है, उसी किताब में वेताल, डाकिनी, उड़ने वाले लोग भी हैं। एक कहानी से पूरे समाज का नियम नहीं बनता।

उल्टा ये कहानी ही दावे के खिलाफ है। उसमें राजा फैसला देता है - ब्राह्मण ने पैसा ले लिया इसलिए बच्चा उसका नहीं। मतलब शास्त्र कह रहा है - पैसा लोगे तो पितृत्व खत्म। ये धंधे को जायज ठहराना नहीं, सजा देना है।

4. केरल का असली सच 

नंबूदरी-नायर संबन्धम 

केरल में नंबूदरी के पास जमीन बहुत थी। जमीन न बटे इसलिए सिर्फ बड़े बेटे की शादी अपनी जात में होती थी, छोटे बेटे कुंवारे रहते थे। दूसरी तरफ नायर मातृसत्ता थे - घर माँ का, बच्चा माँ का, मुखिया मामा।

तो छोटे बेटे नायर घरों में संबन्धम करते थे। रस्म सिर्फ साड़ी देना। 

और बच्चा? बच्चा नायर माना जाता था, ब्राह्मण नहीं। उसे नंबूदरी की जमीन में एक इंच भी हिस्सा नहीं मिलता था, हक मामा से मिलता था। अगर ये वीर्य बेचना होता तो ब्राह्मण कहता - "ये मेरा खून है, मेरी जमीन दो।" पर वो उल्टा कहता था - "ये तुम्हारा है।" बेचने वाला हक मांगता है, छोड़ता नहीं।

नायर महिला साड़ी वापस करके संबंध तोड़ भी सकती थी। 1891 में अंग्रेजों ने लिखा - पूरे भारत में यही महिला डाइवोर्स दे सकती है।

पटनायक 6 रुपया और 8 रुपया की क्या बातें बनाता है उसे जान लीजिए।

कोचीन राजकुमारियाँ नंबूदरी से शादी करती थीं, उन्हें इरिप्पुकार - महल में बैठने वाले कहते थे। नंबूदरी गैर-ब्राह्मण घर का खाना नहीं खाता, इसलिए राजा ने उनके लिए अलग घर 'ईश्वरा सेवा' बनाया, जहाँ ब्राह्मण रसोइया खाना बनाता था।

उस घर के महीने के खर्च के लिए 6 रुपया और 8 रुपया भत्ता मिलता था। इतिहासकार मनु पिल्लई ने इसे द आईवरी थ्रोन में प्रिंस कॉन्सर्ट अलाउंस कहा है। ये एक रात की फीस नहीं, पालन पोषण हेतु व्यवस्था थी। इस बात कोअंग्रेज यात्री ने मजाक में लिखा - "एक ही काम के दो रेट क्यों?" उसी मजाक को आज वेतन-पर्ची बना दिया गया।

आखिरी बात

यदि वीर्य बेचना इतना बड़ा बिजनेस था तो गरीब ब्राह्मण का अस्तित्व ही क्यों होता? भिक्षा मांगने वाला करोड़पति हो जाता।

संबन्धम बाजार नहीं था। एक ने अपनी जमीन बचाई, दूसरे ने अपना घर माँ के नाम रखा। बीच में जो बच्चा हुआ वो मामा के घर राजा बना।

इसे बाजार कहना इतिहास नहीं, इतिहास का मजाक है। यही मजाक पूरे भारत और हिंदू संस्कृति के साथ हो रहा है।

यह चित्र पटनायक ने ट्रिक लगाते हुए अपनी पोस्ट में लगाया ताकि उसका कहा देखने से सही प्रतीत हो।

पितृपक्ष के दौरान किसी के घर अन्न- नहीं ग्रहण करना चाहिए....

पितृपक्ष के दौरान किसी के घर अन्न-जल क्यों नहीं ग्रहण करना चाहिए....

सनातन धर्म में 16 दिन का पितृपक्ष, सबसे संवेदनशील, सबसे सूक्ष्म दिनों का समय माना गया है। गरुड़ पुराण, जो मृत्यु और मृत्यु के बाद के विज्ञान का ग्रंथ है, वह स्पष्ट कहता है - इन 16 दिनों में आपका शरीर केवल आपका नहीं रहता, आप अपने पितरों के लिए एक "पात्र" बन जाते हैं।इसलिए इस दौरान भोजन का नियम सबसे कठोर है।
भाग 1 - गरुड़ पुराण क्या कहता है - अन्न ही शरीर नहीं, अन्न ही मन है
गरुड़ पुराण, प्रेत कल्प, अध्याय 17 और 33 में भगवान विष्णु, गरुड़ जी को समझाते हैं अन्नं ब्रह्म रसं विष्णुः भोक्ता देवो महेश्वरःअन्न ब्रह्मा है, उसका रस विष्णु है,र से खाने वाला जीव, स्वयं महेश है। इसलिए अन्न को कभी सामान्य मत समझो
और दूसरा श्लोक जैसा अन्न वैसा मन, जैसा पानी वैसी वाणी
गरुड़ पुराण कहता है, अन्न के 3 दोष होते हैं, जो खाने वाले के अंदर चले जाते हैं जाति दोष अन्न किसने उगाया किस भाव से उगाया अगर किसान ने लोभ, क्रोध से उगाया, तो वह भाव अन्न में आएगा।
2. निमित्त दोष - अन्न बनाते समय, बनाने वाले के मन में क्या था? अगर रसोई में झगड़ा हो रहा है, गाली दी जा रही है, तो वह अन्न विष बन जाता है। इसलिए कहा - रसोई में कभी अशुद्ध मन से भोजन मत बनाओ।
3. आश्रय दोष -अन्न किसके घर का है? किसके पैसे से आया? अगर वह पैसा पाप से, चोरी से, ब्याज से, धोखे से आया है, तो उस अन्न में पाप का अंश आ जाता है।
पितृपक्ष में यही तीसरा दोष, सबसे खतरनाक हो जाता है।
भाग 2 - पितृपक्ष में आपके साथ कौन रहता है - सूक्ष्म विज्ञान
गरुड़ पुराण के अनुसार, मृत्यु के बाद जीव के 2 शरीर बचते हैं - सूक्ष्म शरीर और कारण शरीर। पितृपक्ष में यमराज, पितरों को 16 दिन के लिए, पितृलोक से मुक्त करते हैं, वे अपने पुत्र-पौत्रों के घर आते हैं, उनके द्वार पर, उनकी रसोई में, उनकी छाया में रहते हैं।वे कुछ खाते नहीं, वे केवल गंध और भाव ग्रहण करते हैं।
आप जो भी खाते हो, जो भी सोचते हो, उसका सूक्ष्म अंश, आपके पितरों को जाता है अब सोचो, आप किसी और के घर खाते हो -
उस घर में मांस-मदिरा बनता हो, तो उसका दोष आपके पितरों को जाएगा उस घर में पितरों का श्राद्ध न होता हो, पितर अतृप्त हों, तो उनकी अतृप्ति, ईर्ष्या, आपके पितरों से टकराएगी उस घर का पैसा, अगर अधर्म से आया है, तो आपके पितर भी उस पाप के भागी बनेंगे।
इसलिए गरुड़ पुराण कहता है - *पितृपक्ष में पुत्र, पितरों के लिए एक "पवित्र घड़ा" है, अगर घड़ा गंदा हो गया, तो पितर जल कैसे पिएंगे?
आपका शरीर ही वह घड़ा है, और अन्न-जल ही उस घड़े का जल है।
भाग 3 - 5 कारण - क्यों नहीं खाना चाहिए दूसरों के घर - गरुड़ पुराण के अनुसार
कारण 1 - आपका शरीर पितरों के लिए यज्ञशाला बन जाता है
इन 16 दिनों में, जब आप तर्पण करते हो, पिंडदान करते हो, ब्राह्मण को भोजन कराते हो, तो आपके पितर, आपके माध्यम से ही तृप्त होते हैं। गरुड़ पुराण कहता है - पुत्र की नाभि से, एक सूक्ष्म नाड़ी, पितरों तक जाती है। जो पुत्र खाता है, वही पितरों को सूक्ष्म रूप में मिलता है।
अगर आप बाहर का, अपवित्र, रजोगुणी, तामसिक अन्न खाओगे, तो आपके पितरों को भी वही मिलेगा, वे तृप्त होने की जगह, और अशांत हो जाएंगे। इसलिए कहा - स्वगृहे भोजनं कुर्यात्" - अपने घर का ही भोजन करो।
कारण 2 - दूसरे के घर का अन्न, आपके व्रत को तोड़ देता है
पितृपक्ष, एक व्रत है, 16 दिन का महाव्रत। जैसे नवरात्रि में 9 दिन व्रत में, आप बाहर का नहीं खाते, क्योंकि आप देवी के लिए पवित्र हो, वैसे ही पितृपक्ष में आप पितरों के लिए पवित्र हो।गरुड़ पुराण कहता है - जो व्यक्ति पितृपक्ष में दूसरे के घर अन्न खाता है, उसका श्राद्ध, पितर ग्रहण नहीं करते, उसके पिंड, कौवे भी नहीं खाते, क्योंकि उसके पिंड में, दूसरे के घर की अशुद्धि आ जाती है।
श्लोक है - परान्नं च परवस्त्रं परशय्या परस्त्रियः, पितृपक्षे विवर्जयेत्।" पितृपक्ष में दूसरे का अन्न, दूसरे का वस्त्र, दूसरे की शय्या, और परस्त्री का संग, त्याग देना चाहिए।
कारण 3 - कर्ज का सिद्धांत - अन्न का कर्ज सबसे बड़ा कर्ज सनातन धर्म में, अन्न का कर्ज, कभी न उतरने वाला कर्ज माना गया है। आपने किसी के घर खाया, तो आप उसके कर्जदार हो गए, सूक्ष्म रूप से।
पितृपक्ष में, आपको केवल 3 के कर्जदार रहना है - देव कर्ज, ऋषि कर्ज, पितृ कर्ज। अगर आपने चौथा कर्ज - मनुष्य का कर्ज - ले लिया, दूसरे के घर खाकर, तो आपके पितृ, आपको श्राप देकर जाएंगे, क्योंकि आपने उनका हिस्सा, दूसरे को दे दिया।गरुड़ पुराण में कथा है - एक ब्राह्मण ने पितृपक्ष में अपने मित्र के घर खीर खाई, उसके पितर, भूखे ही पितृलोक लौट गए, क्योंकि उस खीर पर, मित्र की कामना थी - "मेरा काम हो जाए", पितरों ने कहा - "तूने हमारा अन्न, दूसरे की कामना को दे दिया, जा, तुझे पितृदोष लगेगा।"
कारण 4 - प्रेत और पिशाच बाधा से बचाव गरुड़ पुराण, प्रेत कल्प में, प्रेतों के 18 प्रकार बताता है - जो पितृपक्ष में सबसे ज्यादा सक्रिय होते हैं, क्योंकि इस दौरान यमलोक के द्वार खुले होते हैं। जब आप किसी अनजान घर, होटल, ढाबे, या ऐसे घर में खाते हो, जहाँ का शुद्ध-अशुद्ध पता नहीं, जहाँ लहसुन-प्याज, मांस-मदिरा बनता हो, तो उस अन्न के साथ, प्रेतों की सूक्ष्म ऊर्जा, आपके शरीर में प्रवेश कर जाती है।और जब आपके शरीर में पितर भी हैं, और बाहर से प्रेत भी आ गया, तो दोनों में युद्ध होता है, इसी को पितृदोष, नजर दोष, घर में क्लेश कहा जाता है।इसलिए पुराने लोग कहते थे - पितृपक्ष में होटल का मत खाओ, बाहर का मत खाओ, अपने हाथ से बना, सादा, सात्विक खाओ।कारण 5 - आपके पुण्य का ट्रांसफर हो जाता है गरुड़ पुराण का सबसे गुप्त सिद्धांत - अन्न दान, पुण्य का ट्रांसफर है जब आप किसी के घर खाते हो, तो अनजाने में, आपका 1 दिन का श्राद्ध-पुण्य, उस घर के पितरों को चला जाता है, और आपके पितर खाली हाथ रह जाते हैं।जैसे मोबाइल से पैसा ट्रांसफर होता है, वैसे ही अन्न से पुण्य ट्रांसफर होता है, इसलिए पितृपक्ष में केवल उसी के घर खाना चाहिए, जिसके पितर, आपके पितरों के मित्र हों, यानी आपका अपना परिवार, आपका अपना घर।भाग 4किन-किन जगहों पर बिल्कुल नहीं खाना चाहिए - गरुड़ पुराण की सूची
गरुड़ पुराण में, 8 जगहों का अन्न, पितृपक्ष में महापाप बताया गया है -
1. शूद्र या अपवित्र व्यक्ति के घर - जहाँ शौच-अशौच का ध्यान न हो।
2. शराबी, मांसाहारी के घर - जहाँ जीव हत्या होती हो।
3. पुत्रहीन, श्राद्धहीन घर में -जहाँ कभी पितरों के नाम पर दीया भी न जलता हो, वहाँ के पितर अतृप्त हैं, वे आपका पुण्य छीन लेंगे।
4. वेश्या, परस्त्रीगामी के घर -जहाँ काम वासना का वास हो।
5. ब्याज, चोरी, रिश्वत से कमाने वाले के घर - उसका पैसा अपवित्र है।
6.श्राद्ध के दिन, निमंत्रण के बिना, दूसरे के घर -जो श्राद्ध में बिना बुलाए जाता है, वह पाप खाता है।
7. होटल, ढाबा, बाजार का भोजन - जहाँ बनाने वाले का पता नहीं, वहाँ 100 लोगों की वासना, उस अन्न में होती है।
8. दूसरे के श्राद्ध का बचा हुआ अन्न - अगर किसी और ने अपने पितरों के नाम पर ब्राह्मण को खिलाया, और वह बच गया, उसे कभी मत खाओ, वह सीधे पितरों का अन्न है, उसे खाने से पितृदोष लगता है।
भाग 5 - क्या खाना चाहिए, कैसे खाना चाहिए - पितृपक्ष का आहार विधान तो फिर खाना क्या चाहिए? गरुड़ पुराण, अध्याय 21 में आहार विधान देता है -खाने योग्य -
- अपने घर में, अपने हाथ से, या पत्नी, माता, पुत्री के हाथ से बना, गाय के घी में बना, सादा भोजन।
- बिना लहसुन-प्याज का, बिना मसूर, उड़द, चना, हींग का - क्योंकि ये तामसिक हैं, पितरों को उत्तेजित करते हैं।जौ, चावल, गेहूं, मूंग, गाय का दूध, दही, घी, शहद, फल, कंद-मूल। एक बार भोजन, ब्रह्म मुहूर्त में नहीं, दिन में एक बार, सात्विक।
- भोजन से पहले, अपने पितरों के नाम पर, गाय, कौवा, कुत्ता, चींटी के लिए, थोड़ा निकालना, जिसे पंचबलि कहते हैं।न खाने योग्य -
- 16 दिन - मांस, मछली, अंडा, शराब, लहसुन, प्याज, मसूर, चना, उड़द, बैंगन, लौकी (कुछ जगह), पान, तंबाकू।बासी, जूठा, दोबारा गर्म किया हुआ भोजन।जल का नियम -पितृपक्ष में पानी भी, किसी के घर का नहीं पीना चाहिए, खासकर जो तामसिक हो। अपना पानी, अपने घर का, या गंगा जल, या कुएं का साफ पानी। क्योंकि जल भी, अन्न की तरह, भाव ग्रहण करता है।कहा गया है - जलं पीत्वा परगृहे, पितृणां तृप्ति नश्यति।" दूसरे के घर जल पीने से, पितरों की तृप्ति नष्ट हो जाती है।
भाग 6 - अपवाद - कब दूसरे के घर खा सकते हैं?गरुड़ पुराण, कठोर है, पर करुण भी है, 3 अपवाद देता है -
1. गुरु के घर -अपने गुरु, आचार्य, ज्ञानी ब्राह्मण के घर, पितृपक्ष में खा सकते हैं, क्योंकि गुरु का अन्न, अमृत है, वह आपके पितरों को भी तृप्त करता है।
2. पुत्री के घर -पिता, अपनी विवाहित पुत्री के घर, पितृपक्ष में अन्न नहीं खाता, यह नियम है, पर पुत्री, अपने पिता के घर खा सकती है, क्योंकि पुत्री का संबंध, पिता के पितरों से भी है।
3. आपातकाल में - अगर आप यात्रा में हो, बीमार हो, और अपना भोजन संभव नहीं, तो फल, दूध, गंगा जल लेकर, पितृभ्यो नमः"कहकर, भगवान विष्णु को अर्पण करके, खा सकते हैं, दोष नहीं लगेगा, क्योंकि भाव शुद्ध है।पर होटल, मित्र के घर पार्टी, शादी, बर्थडे में, पितृपक्ष में जाना, और वहां खाना, गरुड़ पुराण में महादोष कहा गया है, इससे पितृ नाराज होकर, पितृदोष देते हैं - घर में क्लेश, संतान बाधा, धन हानि, बीमारी।भाग 7 - आज के जीवन में कैसे पालन करें - प्रैक्टिकल उपाय
आज तो नौकरी है, बाहर रहना पड़ता है, तो कैसे करें? 5 उपाय -
1. टिफिन ले जाओ - 16 दिन, अपने घर से टिफिन ले जाओ, ऑफिस में भी अपना ही खाओ।
2. फलाहार करो -अगर बाहर हो, तो केवल फल, दूध, मूंगफली, गंगा जल, तुलसी दल लो, यह पवित्र है।
3. मानसिक क्षमा मांगो - अगर गलती से, बाहर खा लिया, तो रात को, दक्षिण दिशा में मुंह करके, हाथ में जल लेकर, कहो - "हे मेरे पितरो, आज मैंने अज्ञान में, परान्न ग्रहण किया, मुझे क्षमा करो, मैं कल से ध्यान रखूंगा, और इसके प्रायश्चित में, मैं एक ब्राह्मण को भोजन कराऊंगा, या गाय को चारा दूंगा।"
4. गायत्री मंत्र से शुद्धि - भोजन से पहले, 3 बार गायत्री मंत्र पढ़कर, भोजन पर फूंक मारो, तो उसका दोष 50% कम हो जाता है, यह गरुड़ पुराण का ही उपाय है।
5. तुलसी दल डालो - कोई भी भोजन, जल, अगर बाहर का लेना ही पड़े, तो उसमें तुलसी का पत्ता डाल दो, तुलसी, विष्णु प्रिया है, वह हर अन्न को पवित्र कर देती है, प्रेत बाधा नहीं आने देती।अंतिम - पितृपक्ष, भूखे रहने का नहीं, पवित्र रहने का पर्व हैपितृपक्ष, डरने का पर्व नहीं, प्रेम का पर्व है, 16 दिन, आपके पितर, आपके मेहमान हैं, जैसे घर में मेहमान आए तो आप घर साफ रखते हो, बाहर का गंदा नहीं खाते, वैसे ही।गरुड़ पुराण का सार, एक ही लाइन में -"पितृपक्षे परान्नं यस्तु भुंक्ते मोहात् नराधमः, तस्य पितरो निराशा वै प्रयान्ति यममंदिरम्।"जो मनुष्य, मोहवश, पितृपक्ष में दूसरे का अन्न खाता है, उसके पितर निराश होकर, यमलोक लौट जाते हैं, और उसे श्राप देकर जाते हैं।और जो व्यक्ति, 16 दिन, अपने घर का, पवित्र, सात्विक अन्न, पितरों को याद करके खाता है, उसके पितर, उसे आशीर्वाद देते हैं - धनं धान्यं संतानं, सुखं समृद्धि वर्धताम्।इसलिए इस पितृपक्ष, प्रण लो - बाहर का नहीं, अपना खाऊंगा, पवित्र खाऊंगा, पितरों को तृप्त करूंगा।क्योंकि अन्न ही मन है, और मन ही पितरों तक जाता है।
 इति गरुड़ पुराणोक्त पितृपक्ष परान्न निषेध कथा संपूर्णा --

Monday, 28 September 2026

सोमनाथ मंदिर और झूठ

सोमनाथ के दरवाजे, एलेनबरो और वह झूठ कि पुजारी भजन करते रहे और महमूद गजनवी सोमनाथ लूटकर चला गया।

आज अमिताभ अग्निहोत्री जी की एक टिप्पणी सोमनाथ पर गजनवी के हमले और उस असत्य के बारे में थी जिसमें यह कहा गया कि वहां पुजारी भजन करते रहे और सोमनाथ मंदिर का विध्वंस गजनवी ने कर दिया। यह असत्य पिछले सत्तर सालों से पढ़ाया जा रहा है। अमिताभ जी ने इस असत्य का खंडन किया लेकिन मुझे लगा कि पूरी बात हिंदुओं को जानना चाहिए।

जब महमूद गजनवी 1026 में सोमनाथ पहुंचा, तो वहां पुजारी माला जपते हुए नहीं बैठे थे।

खुद आक्रांताओं के इतिहासकार लिखते हैं - अल-उत्बी, इब्न-अल-अथीर, फरिश्ता - कि मंदिर के परकोटे पर भीषण युद्ध हुआ। राजपूत सैनिक, चावड़ा और परमार के योद्धा, और मंदिर के नागर ब्राह्मण पुजारी, व्यापारी और सामान्य भक्त सबने मिलकर तलवार उठाई।

तीन दिन तक लगातार लड़ाई चली। 50,000 से ज्यादा पुजारी और भक्त लड़ते हुए, मंदिर की सीढ़ियों पर, गर्भगृह के द्वार पर बलिदान हो गए। उन्हें मारकर, उनकी लाशों को रौंदकर ही गजनवी अंदर घुस पाया।

ये कोई कर्मकांडी भीड़ नहीं थी जो चमत्कार का इंतजार कर रही थी, ये अपने देवता के लिए प्राण देने वाली लड़ाकू पंक्ति थी।

इसी बलिदान को झुठलाने के लिए 1843 का नाटक रचा गया।

1842 में अंग्रेज अफगानिस्तान में बुरी तरह हारे। अपनी बेइज्जती छुपाने के लिए गवर्नर जनरल लॉर्ड एडवर्ड एलेनबरो ने एक भावनात्मक चाल चली।

उसने गजनी में महमूद के मकबरे से दो लकड़ी के दरवाजे उखाड़वाए और ऐलान किया कि ये वही चंदन के दरवाजे हैं जो महमूद सोमनाथ से लूट ले गया था। अब अंग्रेज इसे हिंदुओं को लौटा रहे हैं।

16 नवंबर 1842 को उसने सभी राजाओं को घोषणा पत्र भेजा  कि सोमनाथ के गेट वापस लाए जा रहे हैं, हिंदुओं का काम अंग्रेजों ने किया।  800 साल के अपमान का बदला ले लिया गया। यह अपमान पुजारियों की अक्षमता का था कि जब आक्रमण हुआ तो वे भजन करते रह गए।

इन दरवाजों को एक पूरी रेजीमेंट - छठी जाट लाइट इन्फैंट्री कंधे पर उठाकर भारत लाई।

भारत आते ही पोल खुल गई - दरवाजे चंदन के नहीं देवदार के थे, और गजनी में ही बने थे, सोमनाथ के थे ही नहीं। आज भी वो आगरा किले के गोदाम में पड़े हैं।

9 मार्च 1843 - ब्रिटिश संसद में पक्ष विपक्ष में बहस हुई। बहस का लब्बोलुआब जो भी था इस एक नाटक ने यह  झूठ पक्का  कर दिया कि हिंदू कायर हैं, अपने मंदिर की रक्षा नहीं कर सकते, पुजारी भजन करते रह गए।

बाद में यही झूठ कांग्रेसी और वामपंथी इतिहासकार पीढ़ियों को पढ़ाते रहे। आज भी यही झूठ हिंदुओं के दिमाग में भर कर उन्हें गिल्ट में डाला जा रहा है।


Sunday, 27 September 2026

नाभि तंत्र

 तुम्हारे पूरे अस्तित्व का 'मास्टर स्विच' (Master Switch) तुम्हारी नाभि में लगा है।

प्रामाणिक ग्रंथ: शिव संहिता (मणिपूर चक्र एवं नाड़ी-विज्ञान प्रकरण)

मूल शास्त्र श्लोक:
नाभि-कन्दे समुत्पन्नाः सार्ध-लक्ष-त्रयी-सिराः।
तासां मध्ये प्रधानास्तु द्विसप्तति-सहस्रकाः॥

सरल अर्थ: मनुष्य के नाभि-कंद (Navel) से साढ़े तीन लाख नाड़ियां उत्पन्न होती हैं, जिनमें से 72,000 प्रमुख नाड़ियां पूरे शरीर में फैलती हैं। नाभि ही संपूर्ण शरीर, प्राण और ब्रह्मांडीय ऊर्जा का एकमात्र मुख्य नियंत्रण द्वार है।

एक बहुत ही कड़वा सच आज तुम्हें समझना होगा।

आधुनिक विज्ञान आज जिसे 'गट-ब्रेन एक्सिस' (Gut-Brain Axis) कहता है, सनातन तंत्र उसे हजारों साल पहले ही 'मणिपूर चक्र' घोषित कर चुका है। जब तुम रात को दिन भर की चिंताओं, कर्जों और ईर्ष्या के साथ बिस्तर पर जाते हो, तो तुम्हारी नाभि का ऊर्जा-केंद्र पूरी तरह सूख और सिकुड़ जाता है।

इस सूखी हुई नाड़ी का सबसे पहला और मारक प्रहार सीधे तुम्हारे Subconscious Mind (अवचेतन मन) पर होता है। तुम्हारी Sleep Quality और Mental Clarity रातों-रात नष्ट हो जाती है। तुम रात भर भयानक सपनों और विचारों के चक्रव्यूह में उलझे रहते हो। तुम चाहे जितना भी Stress Management का दिखावा कर लो, तुम्हारी नाभि की ब्लॉकेज के कारण तुम्हारे व्यापार या नौकरी में तुम्हारी Peak Performance बिल्कुल शून्य पर आ जाती है। तुम फैसले गलत लेते हो, घबराते हो, और तुम्हारी मानसिक शक्ति घुटने टेक देती है।

लेकिन सनातन तंत्र में नाभि को जाग्रत करने का एक ऐसा उग्र और अचूक अस्त्र है, जिसे यदि तुमने रात को सोने से पहले केवल 2 मिनट दे दिए, तो ब्रह्मांड की कोई भी शक्ति तुम्हें तुम्हारे लक्ष्य से नहीं भटका पाएगी। यह विद्या तुम्हें इंसान से महामानव बना देगी।

गुप्त 'नाभि-चक्र जागरण' मारक विधान

यह प्रयोग तुम्हें हर रात सोने से ठीक पहले, अपने बिस्तर पर लेटकर करना है।

साधना विधि:

1. रात को जब तुम्हारे सारे काम खत्म हो जाएं और तुम सोने के लिए बिस्तर पर जाओ, तो अपने पास शुद्ध सरसों का तेल (Mustard Oil) या असली गौ-घृत (Cow's Ghee) की कुछ बूंदें रख लो।

2. सीधे पीठ के बल लेट जाओ। अपने दाहिने हाथ (Right Hand) की मध्यमा उंगली (Middle finger - जो आकाश तत्व और ऊर्जा का केंद्र है) में वह तेल या घी लगाओ।

3. अपनी नाभि (Navel) के ठीक बीच में उस तेल की केवल 2 बूंदें डालो।

4. अब अपनी आंखें बंद करो। अपनी उसी उंगली से नाभि के चारों ओर धीरे-धीरे गोल (Clockwise) मालिश करो।

5. अपना पूरा ध्यान नाभि के उस बिंदु पर लगाओ और पूर्ण अधिकार व प्रचंड ऊर्जा के साथ इस 'मणिपूर-जागरण बीज मंत्र' का 21 बार मानसिक उच्चारण करो:

"ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं मणिपूर-चक्राय, मम सर्व-सिद्धिं जाग्रय जाग्रय फट्।"

6. मंत्र पूरा होने के बाद, सीधे करवट लेकर सो जाओ। मोबाइल या किसी भी अन्य वस्तु को मत छूना।

परिणाम:
तंत्र शास्त्र के अनुसार, नाभि में तेल और मंत्र का यह आघात तुम्हारी 72,000 नाड़ियों को उसी क्षण 'अनलॉक' (Unlock) कर देता है। रात भर जब तुम सो रहे होते हो, तुम्हारा अवचेतन मन ब्रह्मांड की सबसे शुद्ध ऊर्जा से जुड़कर प्रोग्राम (Program) हो रहा होता है। 11 से 21 दिनों के भीतर तुम देखोगे कि तुम्हारा डर खत्म हो गया है, तुम्हारी एकाग्रता अजेय हो गई है, और जो लक्ष्य कल तक असंभव लग रहे थे, वे हकीकत में बदलने लगे हैं।


बलि के भी विविध रूप

अभी एक पण्डितजी ने पूछा- आचार्यजी! आपने बलि पर कोई विचार नहीं लिखा? "निवृत्तिस्तु महाफला" का भाव क्या है?

🌺श्रीमन्! लिखा तो था परन्तु एकपक्षीय विचार की अपेक्षा रखने के कारण आपने देखा नहीं। उभय पक्षों में प्रमाणवचनों की कमी नहीं है और बलि के भी विविध रूप हैं। निष्कर्षत: सिद्ध होता है "यदन्न: पुरुषो लोके तदन्नास्तस्य देवता:" व्यक्ति में जिस अन्न को खाने की प्रवृत्ति होती है, उसके देवता-पितर भी वही खाते हैं। "वयं यदन्ना: पितरस्तदन्ना:" का भी यही भाव है। अन्न का तात्पर्य केवल "सिद्धमन्नम्" ओदन ही नहीं होता; "पचाम्यन्नं चतुर्विधम्" भाष्य के अनुसार "यदद्यते भक्ष्यते सर्वप्राणिभिरिति अन्नम्" यानी भक्ष्य, भोज्य, लेह्य, चोष्य के रूप में प्राणिमात्र का आहारद्रव्य अन्न ही कहलाता है। उपनिषदों के #सप्तान्नसृष्टि प्रकरण में जल, दुग्ध, वायु, आमिषादि को भी #अन्न ही कहा गया है। जिसे जो अन्न प्रिय हो वह अपने देवता को वही समर्पित कर उसका ग्रहण करे। स्वतन्त्र प्रवृत्ति का परिशमन ही स्वेष्टपूजाङ्ग बलि का प्रयोजन है। "निवृत्तिस्तु महाफला" मनुस्मृति में भी अनुपाकृत यानी यज्ञभागभिन्न वृथा मांस की ही निवृत्ति इष्ट है, न कि क्रत्ववशिष्टपल की। धर्मशास्त्रों में प्रोक्षिताभ्युक्षित आमिष को #हविष्यान्न ही कहा गया है। इसीलिए देवपितृयज्ञावशिष्ट मांसाशन की आज्ञा देने में शास्त्र किञ्चिदपि संकोच नहीं करते हुए कहते हैं कि "देवपितृ्न्समभ्यर्च्य खादन्मांसं न दोषभाक्" देव-पितरों के समभ्यर्चनशेष हविष्यामिष का ग्रहण करने में दोष नहीं; अपितु ग्रहण न करने वालों को ही दोषी कहा है। अत: जिनकी मांसाशन में प्रवृत्ति है वे स्वतन्त्र उच्छृङ्लता का परित्याग कर क्रत्वङ्ग आमिष को ही ग्रहण करे और जो मांसाशन में प्रवृत्त नहीं हैं वे बलि में अन्य प्रतिनिधि द्रव्यों का प्रयोग करे। पुन: जो मांसाशन नहीं करते वे वैष्णव और जो करते वे अवैष्णव- शास्त्रज्ञों के लिए ऐसी कोई बात नहीं। धर्म में विकृति तब फैलती है जब अमुकामुक विषयों से सर्वथानभिज्ञ व्यक्ति सर्वोच्च न्यायालय के सबसे बड़े न्यायाधीश बन जाते हैं। वस्तुत: किसी एक पक्ष पर किसी का उछलना-कूदना सही नहीं। आमिषाशी महानुभावों का विशेष कर्तव्य है कि वे श्रौतक्रतुओं को भी बचाने का विशेष संघर्ष करें। जय शिव..

☹️जिस मिथिलापुरी को एक कार्यक्रम में चौदह सौ मीमांसकों का संयोग प्राप्त था; वहाँ मीमांसा के अस्तित्व का विलोप होते जाना अतिदु:खद है! आधुनिक मिथिला के मण्डन, वाचस्पतियों को गम्भीरता से इसकी चिन्ता करनी चाहिए। मिथिला के सरकारी-असरकारी श्रौतस्मार्त्तों से निवेदन है कि वे दर्श-पौर्णमासादि प्रकृति-विकृति यागों का समारम्भ करें। इसका श्रीगणेश मिथिला के सर्वोच्चसंस्कृतसंस्थान से होना चाहिए। देश के अन्यान्य संस्कृतसंस्थानों के लिए भी अवश्यकरणीय। यज्ञ विश्व का जीवन है। विशेष भगवदिच्छा.....

Saturday, 26 September 2026

पितृपक्ष के दौरान किसी के घर अन्न-जल क्यों नहीं ग्रहण करे

पितृपक्ष के दौरान किसी के घर अन्न-जल क्यों नहीं ग्रहण करना चाहिए....

सनातन धर्म में 16 दिन का पितृपक्ष, सबसे संवेदनशील, सबसे सूक्ष्म दिनों का समय माना गया है। गरुड़ पुराण, जो मृत्यु और मृत्यु के बाद के विज्ञान का ग्रंथ है, वह स्पष्ट कहता है - इन 16 दिनों में आपका शरीर केवल आपका नहीं रहता, आप अपने पितरों के लिए एक "पात्र" बन जाते हैं।इसलिए इस दौरान भोजन का नियम सबसे कठोर है।
भाग 1 - गरुड़ पुराण क्या कहता है - अन्न ही शरीर नहीं, अन्न ही मन है
गरुड़ पुराण, प्रेत कल्प, अध्याय 17 और 33 में भगवान विष्णु, गरुड़ जी को समझाते हैं अन्नं ब्रह्म रसं विष्णुः भोक्ता देवो महेश्वरःअन्न ब्रह्मा है, उसका रस विष्णु है,र से खाने वाला जीव, स्वयं महेश है। इसलिए अन्न को कभी सामान्य मत समझो
और दूसरा श्लोक जैसा अन्न वैसा मन, जैसा पानी वैसी वाणी
गरुड़ पुराण कहता है, अन्न के 3 दोष होते हैं, जो खाने वाले के अंदर चले जाते हैं जाति दोष  अन्न किसने उगाया किस भाव से उगाया अगर किसान ने लोभ, क्रोध से उगाया, तो वह भाव अन्न में आएगा।
2. निमित्त दोष - अन्न बनाते समय, बनाने वाले के मन में क्या था? अगर रसोई में झगड़ा हो रहा है, गाली दी जा रही है, तो वह अन्न विष बन जाता है। इसलिए कहा - रसोई में कभी अशुद्ध मन से भोजन मत बनाओ।
3. आश्रय दोष -अन्न किसके घर का है? किसके पैसे से आया? अगर वह पैसा पाप से, चोरी से, ब्याज से, धोखे से आया है, तो उस अन्न में पाप का अंश आ जाता है।
पितृपक्ष में यही तीसरा दोष, सबसे खतरनाक हो जाता है।
भाग 2 - पितृपक्ष में आपके साथ कौन रहता है - सूक्ष्म विज्ञान
गरुड़ पुराण के अनुसार, मृत्यु के बाद जीव के 2 शरीर बचते हैं - सूक्ष्म शरीर और कारण शरीर। पितृपक्ष में यमराज, पितरों को 16 दिन के लिए, पितृलोक से मुक्त करते हैं, वे अपने पुत्र-पौत्रों के घर आते हैं, उनके द्वार पर, उनकी रसोई में, उनकी छाया में रहते हैं।वे कुछ खाते नहीं, वे केवल गंध और भाव ग्रहण करते हैं।
आप जो भी खाते हो, जो भी सोचते हो, उसका सूक्ष्म अंश, आपके पितरों को जाता है अब सोचो, आप किसी और के घर खाते हो -
उस घर में मांस-मदिरा बनता हो, तो उसका दोष आपके पितरों को जाएगा उस घर में पितरों का श्राद्ध न होता हो, पितर अतृप्त हों, तो उनकी अतृप्ति, ईर्ष्या, आपके पितरों से टकराएगी उस घर का पैसा, अगर अधर्म से आया है, तो आपके पितर भी उस पाप के भागी बनेंगे।
इसलिए गरुड़ पुराण कहता है - *पितृपक्ष में पुत्र, पितरों के लिए एक "पवित्र घड़ा" है, अगर घड़ा गंदा हो गया, तो पितर जल कैसे पिएंगे?
आपका शरीर ही वह घड़ा है, और अन्न-जल ही उस घड़े का जल है।
भाग 3 - 5 कारण - क्यों नहीं खाना चाहिए दूसरों के घर - गरुड़ पुराण के अनुसार
कारण 1 - आपका शरीर पितरों के लिए यज्ञशाला बन जाता है
इन 16 दिनों में, जब आप तर्पण करते हो, पिंडदान करते हो, ब्राह्मण को भोजन कराते हो, तो आपके पितर, आपके माध्यम से ही तृप्त होते हैं। गरुड़ पुराण कहता है - पुत्र की नाभि से, एक सूक्ष्म नाड़ी, पितरों तक जाती है। जो पुत्र खाता है, वही पितरों को सूक्ष्म रूप में मिलता है।
अगर आप बाहर का, अपवित्र, रजोगुणी, तामसिक अन्न खाओगे, तो आपके पितरों को भी वही मिलेगा, वे तृप्त होने की जगह, और अशांत हो जाएंगे। इसलिए कहा - स्वगृहे भोजनं कुर्यात्" - अपने घर का ही भोजन करो।
कारण 2 - दूसरे के घर का अन्न, आपके व्रत को तोड़ देता है
पितृपक्ष, एक व्रत है, 16 दिन का महाव्रत। जैसे नवरात्रि में 9 दिन व्रत में, आप बाहर का नहीं खाते, क्योंकि आप देवी के लिए पवित्र हो, वैसे ही पितृपक्ष में आप पितरों के लिए पवित्र हो।गरुड़ पुराण कहता है - जो व्यक्ति पितृपक्ष में दूसरे के घर अन्न खाता है, उसका श्राद्ध, पितर ग्रहण नहीं करते, उसके पिंड, कौवे भी नहीं खाते, क्योंकि उसके पिंड में, दूसरे के घर की अशुद्धि आ जाती है।
श्लोक है - परान्नं च परवस्त्रं परशय्या परस्त्रियः, पितृपक्षे विवर्जयेत्।" पितृपक्ष में दूसरे का अन्न, दूसरे का वस्त्र, दूसरे की शय्या, और परस्त्री का संग, त्याग देना चाहिए।
कारण 3 - कर्ज का सिद्धांत - अन्न का कर्ज सबसे बड़ा कर्ज सनातन धर्म में, अन्न का कर्ज, कभी न उतरने वाला कर्ज माना गया है। आपने किसी के घर खाया, तो आप उसके कर्जदार हो गए, सूक्ष्म रूप से।
पितृपक्ष में, आपको केवल 3 के कर्जदार रहना है - देव कर्ज, ऋषि कर्ज, पितृ कर्ज। अगर आपने चौथा कर्ज - मनुष्य का कर्ज - ले लिया, दूसरे के घर खाकर, तो आपके पितृ, आपको श्राप देकर जाएंगे, क्योंकि आपने उनका हिस्सा, दूसरे को दे दिया।गरुड़ पुराण में कथा है - एक ब्राह्मण ने पितृपक्ष में अपने मित्र के घर खीर खाई, उसके पितर, भूखे ही पितृलोक लौट गए, क्योंकि उस खीर पर, मित्र की कामना थी - "मेरा काम हो जाए", पितरों ने कहा - "तूने हमारा अन्न, दूसरे की कामना को दे दिया, जा, तुझे पितृदोष लगेगा।"
कारण 4 - प्रेत और पिशाच बाधा से बचाव गरुड़ पुराण, प्रेत कल्प में, प्रेतों के 18 प्रकार बताता है - जो पितृपक्ष में सबसे ज्यादा सक्रिय होते हैं, क्योंकि इस दौरान यमलोक के द्वार खुले होते हैं। जब आप किसी अनजान घर, होटल, ढाबे, या ऐसे घर में खाते हो, जहाँ का शुद्ध-अशुद्ध पता नहीं, जहाँ लहसुन-प्याज, मांस-मदिरा बनता हो, तो उस अन्न के साथ, प्रेतों की सूक्ष्म ऊर्जा, आपके शरीर में प्रवेश कर जाती है।और जब आपके शरीर में पितर भी हैं, और बाहर से प्रेत भी आ गया, तो दोनों में युद्ध होता है, इसी को पितृदोष, नजर दोष, घर में क्लेश कहा जाता है।इसलिए पुराने लोग कहते थे - पितृपक्ष में होटल का मत खाओ, बाहर का मत खाओ, अपने हाथ से बना, सादा, सात्विक खाओ।कारण 5 - आपके पुण्य का ट्रांसफर हो जाता है गरुड़ पुराण का सबसे गुप्त सिद्धांत - अन्न दान, पुण्य का ट्रांसफर है जब आप किसी के घर खाते हो, तो अनजाने में, आपका 1 दिन का श्राद्ध-पुण्य, उस घर के पितरों को चला जाता है, और आपके पितर खाली हाथ रह जाते हैं।जैसे मोबाइल से पैसा ट्रांसफर होता है, वैसे ही अन्न से पुण्य ट्रांसफर होता है, इसलिए पितृपक्ष में केवल उसी के घर खाना चाहिए, जिसके पितर, आपके पितरों के मित्र हों, यानी आपका अपना परिवार, आपका अपना घर।भाग 4किन-किन जगहों पर बिल्कुल नहीं खाना चाहिए - गरुड़ पुराण की सूची
गरुड़ पुराण में, 8 जगहों का अन्न, पितृपक्ष में महापाप बताया गया है -
1. शूद्र या अपवित्र व्यक्ति के घर - जहाँ शौच-अशौच का ध्यान न हो।
2.  शराबी, मांसाहारी के घर - जहाँ जीव हत्या होती हो।
3.  पुत्रहीन, श्राद्धहीन घर में -जहाँ कभी पितरों के नाम पर दीया भी न जलता हो, वहाँ के पितर अतृप्त हैं, वे आपका पुण्य छीन लेंगे।
4. वेश्या, परस्त्रीगामी के घर -जहाँ काम वासना का वास हो।
5. ब्याज, चोरी, रिश्वत से कमाने वाले के घर - उसका पैसा अपवित्र है।
6.श्राद्ध के दिन, निमंत्रण के बिना, दूसरे के घर -जो श्राद्ध में बिना बुलाए जाता है, वह पाप खाता है।
7.  होटल, ढाबा, बाजार का भोजन - जहाँ बनाने वाले का पता नहीं, वहाँ 100 लोगों की वासना, उस अन्न में होती है।
8.  दूसरे के श्राद्ध का बचा हुआ अन्न - अगर किसी और ने अपने पितरों के नाम पर ब्राह्मण को खिलाया, और वह बच गया, उसे कभी मत खाओ, वह सीधे पितरों का अन्न है, उसे खाने से पितृदोष लगता है।
भाग 5 - क्या खाना चाहिए, कैसे खाना चाहिए - पितृपक्ष का आहार विधान तो फिर खाना क्या चाहिए? गरुड़ पुराण, अध्याय 21 में आहार विधान देता है -खाने योग्य -
- अपने घर में, अपने हाथ से, या पत्नी, माता, पुत्री के हाथ से बना, गाय के घी में बना, सादा भोजन।
- बिना लहसुन-प्याज का, बिना मसूर, उड़द, चना, हींग का - क्योंकि ये तामसिक हैं, पितरों को उत्तेजित करते हैं।जौ, चावल, गेहूं, मूंग, गाय का दूध, दही, घी, शहद, फल, कंद-मूल। एक बार भोजन, ब्रह्म मुहूर्त में नहीं, दिन में एक बार, सात्विक।
- भोजन से पहले, अपने पितरों के नाम पर, गाय, कौवा, कुत्ता, चींटी के लिए, थोड़ा निकालना, जिसे पंचबलि कहते हैं।न खाने योग्य -
- 16 दिन - मांस, मछली, अंडा, शराब, लहसुन, प्याज, मसूर, चना, उड़द, बैंगन, लौकी (कुछ जगह), पान, तंबाकू।बासी, जूठा, दोबारा गर्म किया हुआ भोजन।जल का नियम -पितृपक्ष में पानी भी, किसी के घर का नहीं पीना चाहिए, खासकर जो तामसिक हो। अपना पानी, अपने घर का, या गंगा जल, या कुएं का साफ पानी। क्योंकि जल भी, अन्न की तरह, भाव ग्रहण करता है।कहा गया है - जलं पीत्वा परगृहे, पितृणां तृप्ति नश्यति।" दूसरे के घर जल पीने से, पितरों की तृप्ति नष्ट हो जाती है।
भाग 6 - अपवाद - कब दूसरे के घर खा सकते हैं?गरुड़ पुराण, कठोर है, पर करुण भी है, 3 अपवाद देता है -
1. गुरु के घर -अपने गुरु, आचार्य, ज्ञानी ब्राह्मण के घर, पितृपक्ष में खा सकते हैं, क्योंकि गुरु का अन्न, अमृत है, वह आपके पितरों को भी तृप्त करता है।
2. पुत्री के घर -पिता, अपनी विवाहित पुत्री के घर, पितृपक्ष में अन्न नहीं खाता, यह नियम है, पर पुत्री, अपने पिता के घर खा सकती है, क्योंकि पुत्री का संबंध, पिता के पितरों से भी है।
3. आपातकाल में - अगर आप यात्रा में हो, बीमार हो, और अपना भोजन संभव नहीं, तो फल, दूध, गंगा जल लेकर, पितृभ्यो नमः"कहकर, भगवान विष्णु को अर्पण करके, खा सकते हैं, दोष नहीं लगेगा, क्योंकि भाव शुद्ध है।पर होटल, मित्र के घर पार्टी, शादी, बर्थडे में, पितृपक्ष में जाना, और वहां खाना, गरुड़ पुराण में महादोष कहा गया है, इससे पितृ नाराज होकर, पितृदोष देते हैं - घर में क्लेश, संतान बाधा, धन हानि, बीमारी।भाग 7 - आज के जीवन में कैसे पालन करें - प्रैक्टिकल उपाय
आज तो नौकरी है, बाहर रहना पड़ता है, तो कैसे करें? 5 उपाय -
1. टिफिन ले जाओ - 16 दिन, अपने घर से टिफिन ले जाओ, ऑफिस में भी अपना ही खाओ।
2. फलाहार करो -अगर बाहर हो, तो केवल फल, दूध, मूंगफली, गंगा जल, तुलसी दल लो, यह पवित्र है।
3. मानसिक क्षमा मांगो - अगर गलती से, बाहर खा लिया, तो रात को, दक्षिण दिशा में मुंह करके, हाथ में जल लेकर, कहो - "हे मेरे पितरो, आज मैंने अज्ञान में, परान्न ग्रहण किया, मुझे क्षमा करो, मैं कल से ध्यान रखूंगा, और इसके प्रायश्चित में, मैं एक ब्राह्मण को भोजन कराऊंगा, या गाय को चारा दूंगा।"
4. गायत्री मंत्र से शुद्धि - भोजन से पहले, 3 बार गायत्री मंत्र पढ़कर, भोजन पर फूंक मारो, तो उसका दोष 50% कम हो जाता है, यह गरुड़ पुराण का ही उपाय है।
5. तुलसी दल डालो - कोई भी भोजन, जल, अगर बाहर का लेना ही पड़े, तो उसमें तुलसी का पत्ता डाल दो, तुलसी, विष्णु प्रिया है, वह हर अन्न को पवित्र कर देती है, प्रेत बाधा नहीं आने देती।अंतिम - पितृपक्ष, भूखे रहने का नहीं, पवित्र रहने का पर्व हैपितृपक्ष, डरने का पर्व नहीं, प्रेम का पर्व है, 16 दिन, आपके पितर, आपके मेहमान हैं, जैसे घर में मेहमान आए तो आप घर साफ रखते हो, बाहर का गंदा नहीं खाते, वैसे ही।गरुड़ पुराण का सार, एक ही लाइन में -"पितृपक्षे परान्नं यस्तु भुंक्ते मोहात् नराधमः, तस्य पितरो निराशा वै प्रयान्ति यममंदिरम्।"जो मनुष्य, मोहवश, पितृपक्ष में दूसरे का अन्न खाता है, उसके पितर निराश होकर, यमलोक लौट जाते हैं, और उसे श्राप देकर जाते हैं।और जो व्यक्ति, 16 दिन, अपने घर का, पवित्र, सात्विक अन्न, पितरों को याद करके खाता है, उसके पितर, उसे आशीर्वाद देते हैं - धनं धान्यं संतानं, सुखं समृद्धि वर्धताम्।इसलिए इस पितृपक्ष, प्रण लो - बाहर का नहीं, अपना खाऊंगा, पवित्र खाऊंगा, पितरों को तृप्त करूंगा।क्योंकि अन्न ही मन है, और मन ही पितरों तक जाता है।
 इति गरुड़ पुराणोक्त पितृपक्ष परान्न निषेध कथा संपूर्णा --

सोमनाथ मंदिर और इतिहास

सोमनाथ, अरबों की देवी अल मनात और महमूद...
क्या गजनवी ने लूट के लिए सोमनाथ पर हमला किया था❓ 

क्या कहते हैं उसके समकालीन मुस्लिम इतिहासकार❓

👀👉 सर्दियों का मौसम था।

ग़ज़नी का सुल्तान महमूद बिन सुबुक्तगीन, जिसे इतिहास महमूद ग़ज़नवी के नाम से जानता है, भारत की ओर एक और अभियान की तैयारी कर रहा था।

लेकिन इस बार उसकी दिशा पहले के अभियानों से अलग थी।

लक्ष्य था समुद्र के किनारे स्थित एक ऐसा प्रसिद्ध हिंदू तीर्थ, जिसकी ख्याति गजनी में महमूद तक पहुँच चुकी थी।

नाम था सोमनाथ (द्वादश ज्योतिर्लिंगों में प्रथम)।

साल था हिजरी (इस्लामी कैलेंडर) 416, अर्थात 1025–26 ईस्वी।

इस अभियान का सबसे महत्वपूर्ण प्रारंभिक विवरण हमें  उन्हीं मुस्लिम लेखकों से मिलता है जो महमूद के समय में ही लिख रहे थे।

उनमें सबसे महत्वपूर्ण नाम हैं : अबू रेहान अल-बिरूनी, अबू सईद अब्दुल-हय गारदीज़ी और महमूद के दरबार से जुड़े कवि फर्रुख़ी सिस्तानी।

👉  सबसे पहले सोमनाथ मंदिर को देखें।

अल-बिरूनी ने अपनी प्रसिद्ध कृति " तहकीक मा लिल हिन्द मिन माकूलात माकूलात फी अलीअकबाल आम माजुला", या "किताबुल हिंद" में सोमनाथ विध्वंस का उल्लेख किया है।

वे उसके नाम की व्याख्या करते हुए बताते हैं कि सोम का अर्थ चंद्रमा और नाथ का अर्थ स्वामी है अर्थात चंद्रमा का स्वामी।

उनके अनुसार सोमनाथ समुद्र के किनारे स्थित था और सरस्वती नदी के मुहाने से लगभग तीन मील की दूरी पर था।

वे वहाँ के धार्मिक विश्वास का वर्णन करते हुए बताते हैं कि समुद्र का ज्वार बढ़ने पर उसका पानी मंदिर में स्थित शिवलिंग तक पहुँचता था। इस प्रकार समुद्र स्वयं शिवलिंग का जलाभिषेक करता था। 

अल-बिरूनी केवल भौगोलिक स्थिति नहीं बताते।

वे उस पौराणिक कथा को भी दर्ज करते हैं जिसके अनुसार सोम अर्थात चंद्रमा ने प्रजापति की पुत्रियों से विवाह किया था, लेकिन रोहिणी के प्रति विशेष प्रेम के कारण उसे शाप मिला। प्रायश्चित के लिए उसने शिव लिंग की स्थापना की और वही शिवलिंग सोमनाथ नाम से प्रसिद्ध हुआ।

इस प्रकार अल-बिरूनी ने सोमनाथ के नाम और उसकी पौराणिक प्रतिष्ठा दोनों को दर्ज किया। 

📜 अल-बिरूनी ने सोमनाथ के विनाश के बारे में क्या लिखा?

सोमनाथ की भौगोलिक स्थिति, प्रसिद्धि और उसकी धार्मिक कथा बताने के बाद अल-बिरूनी एक ऐसी सूचना देते हैं जिसे इस घटना के इतिहास में विशेष महत्व प्राप्त है।

वे लिखते हैं कि हिजरी 416 (1025–26 ईस्वी) में अमीर महमूद ने सोमनाथ के विग्रह को नष्ट कर दिया। महमूद ने उसके ऊपरी भाग को तोड़ने का आदेश दिया और शेष भाग को उसके सोने, रत्नों तथा कढ़ाईदार वस्त्रों सहित ग़ज़नी ले जाने का आदेश दिया।

अल-बिरूनी के अनुसार, ग़ज़नी पहुँचने के बाद उस विग्रह का एक भाग नगर के हिप्पोड्रोम(मैदान-ए-गज़नी) में थानेसर से लाई गई कांस्य मूर्ति चक्रस्वामिन् के साथ डाल दिया गया। दूसरा भाग ग़ज़नी की मस्जिद के दरवाजे के सामने रखा गया, जहाँ लोग उस पर अपने पैर रगड़कर मिट्टी और गंदगी साफ करते हुए मस्जिद में प्रवेश करते थे।

अर्थात अल-बिरूनी के वृत्तांत में केवल यह नहीं है कि “मंदिर पर हमला हुआ” या “मूर्ति तोड़ी गई”; वे यह भी बताते हैं कि विग्रह (मूर्ति) के साथ विजय के बाद क्या किया गया और उसके टुकड़ों को ग़ज़नी में किस प्रकार प्रदर्शित किया गया।

यही कारण है कि सोमनाथ पर महमूद के हमले के लिए अल-बिरूनी का विवरण विशेष महत्व रखता है। यह घटना के कुछ दशकों के भीतर लिखा गया एक ऐसे मुस्लिम विद्वान का स्पष्ट विवरण है जिसने महमूद को और इन चीजों को बहुत ही नजदीक से देखा था।

👉  अब गारदीज़ी का दिया विवरण देखते हैं।

अबू सईद अब्दुल-हय गारदीज़ी ने अपनी फ़ारसी इतिहास-कृति "ज़ैन-अल-अख़बार (Zayn al-Akhbar)" में महमूद के जीवन और ग़ज़नवी अभियानों का वर्णन किया है।

यह पुस्तक महमूद की मृत्यु के लगभग दो दशक बाद की ही है और गारदीज़ी ग़ज़नवी दरबार तथा प्रशासन से निकट रूप से जुड़े हुए थे। उनकी पुस्तक में महमूद के शासन का विवरण 999 ईस्वी के बाद अधिक विस्तृत हो जाता है। 

गारदीज़ी बताते हैं कि महमूद को एक ऐसी जगह के बारे में समाचार मिला जो महासागर के किनारे स्थित एक महान नगर थी।

नाम था सोमनाथ।

वे लिखते हैं कि भारतीय उस स्थान को उसी प्रकार पूजते थे जिस प्रकार मुसलमान मक्का को पवित्र मानते हैं।

वहाँ सोने और चाँदी की अनेक मूर्तियाँ थीं।

उनमें एक मूर्ति के बारे में गारदीज़ी मनात (Manāt) जो इस्लाम पूर्व के अरब की प्रमुख देवी थी, का नाम लेते हैं और लिखते हैं कि वह सोने से अलंकृत तथा रत्नों से जड़ी हुई थी।

📜 मनात कौन थी और सोमनाथ से उसका क्या संबंध  था ?

मनात (Manāt) इस्लाम-पूर्व अरब की प्रमुख देवियों में से एक थी। उसका नाम अल-लात और अल-उज़्ज़ा के साथ आता है। पश्चिमी अरब में उसका एक प्रमुख तीर्थ था और उसे भाग्य अथवा नियति की देवी माना जाता था। इस्लाम के उदय से पहले अरब के धार्मिक जीवन में इन देवियों की पूजा महत्वपूर्ण थी।

लेकिन ग़ज़नवी इतिहासकार अबू सईद गारदीज़ी ज़ैन-अल-अख़बार में सोमनाथ के संबंध में एक अलग और अत्यंत रोचक कथा दर्ज करते हैं।

स्वयं गारदीज़ी के  शब्दों में 
"और अमीर महमूद—अल्लाह उस पर दया करे—बल्ख से ग़ज़नी आया और गर्मी का मौसम वहीं बिताया। और जब सर्दी आई, तो अपनी प्रथा और आदत के अनुसार युद्ध के लिए हिंदुस्तान की ओर गया।
और उसके सामने यह बात कही गई कि समुद्र-ए-मुहीत के किनारे एक बड़ा नगर है, जिसे सोमनात कहते हैं। और वह नगर हिंदुओं के लिए वैसा ही है जैसा मुसलमानों के लिए मक्का।
और उसमें सोने और चाँदी की बहुत-सी मूर्तियाँ हैं।
और मनात, जिसे सैय्यद (अर्थात इस्लाम के पैग़ंबर) के समय काबा से अदन के रास्ते वहाँ से निकालकर ले जाया गया था, वहीं है। और उन्होंने उसे सोने से मढ़ रखा है तथा उसमें रत्न जड़े हुए हैं। और उस मूर्तिगृह के खज़ानों में बहुत बड़ी संपत्ति रखी हुई है।
लेकिन वहाँ तक पहुँचने का रास्ता बहुत ख़तरनाक, भयावह और अत्यन्त कष्टपूर्ण है।"

गारदीजी आगे लिखता है:
"और जब अमीर महमूद—अल्लाह उस पर दया करे—ने यह समाचार सुना, तो उसके मन में उस नगर तक जाने, उन मूर्तियों को नष्ट करने और एक ग़ज़ा/धार्मिक सैन्य अभियान करने की इच्छा उत्पन्न हुई।
और वह हिंदुस्तान से सोमनाथ की ओर, नहरवाला के रास्ते, चला।
जब वह नहरवाला नगर पहुँचा, तो वह खाली किया जा चुका था और उसके सभी लोग भाग गए थे। उसने सेना को वहाँ से चारे की व्यवस्था करने का आदेश दिया और वहाँ से सोमनाथ की ओर चला।"

"और जब वह नगर के निकट पहुँचा और श्रमणों तथा ब्राह्मणों ने उसे देखा, तो वे सभी मूर्तियों की पूजा में लग गए।
और उस नगर का सरदार नगर से बाहर निकला और अपने परिवार तथा सामान के साथ नाव में बैठा और समुद्र में चला गया।
और एक द्वीप पर उतर गया। वे वहीं तब तक रहे जब तक इस्लामी सेना उस प्रदेश से चली नहीं गई; वे उस द्वीप से बाहर नहीं आए।"

"और जब इस्लामी सेना नगर के निकट पहुँची, तो नगर के लोगों ने स्वयं को किलेबंदी के भीतर कर लिया और युद्ध में लग गए।
बहुत समय नहीं बीता कि किलेबंदी टूट गई और अमीर महमूद की सेना उसमें प्रवेश कर गई।
और उन्होंने बहुत भयंकर युद्ध किया, और बहुत से “काफ़िर” मारे गए।"

आगे गारदीजी लिखता है :
"और अमीर महमूद—अल्लाह उस पर दया करे—ने आदेश दिया कि मुअज्ज़िन मंदिर की छत/ऊपरी भाग पर जाए और नमाज़ की पुकार (अज़ान) दे।
और उन सभी मूर्तियों को तोड़ दिया गया, जला दिया गया और नष्ट कर दिया गया।
और मनात के पत्थर को जड़ से उखाड़ दिया गया, उसके टुकड़े-टुकड़े किए गए और उसके कुछ टुकड़े खच्चरों/अस्तरों पर रखकर ग़ज़नी लाए गए।"

"और मूर्तियों के नीचे एक खज़ाना था।
उसने वह खज़ाना ले लिया और वहाँ से बहुत बड़ी संपत्ति प्राप्त की।
अर्थात चाँदी की मूर्तियाँ, रत्नों से जड़ी मूर्तियाँ और दूसरे खज़ानों की लूट—इन सबको ऊँटों पर लादा गया और ग़ज़नी लाया गया।"

"और वहाँ से वह वापस लौट गया।
भीमदेव, हिंदुओं का राजा, रास्ते में था।
अमीर महमूद ने कहा कि ऐसा न हो कि इस महान विजय को कोई क्षति पहुँच जाए। इसलिए वह सीधे रास्ते से नहीं गया और मुल्तान की ओर मुड़ गया।
उस रास्ते में सेना को बहुत कठिनाई हुई और इस यात्रा में इस्लामी सेना के बहुत से लोग मारे गए। यहाँ तक कि मुल्तान पहुँचने से पहले मनुष्यों से अधिक पशु मारे गए।
और वहाँ से वे ग़ज़नी की ओर चले गए।"

👉  अब एक तीसरा विवरण देखते हैं। 

महमूद के दरबार के कवि फर्रुख़ी सिस्तानी ने महमूद ग़ज़नवी के सोमनाथ अभियान पर एक विस्तृत क़सीदा लिखा।  ध्यान रहे कि सिस्तानी इतिहासकार नहीं, एक शायर था।

उसी के शब्द  हिंदी में अनुदित:
"तालाब के चारों ओर एक हजार छोटे-छोटे मंदिर थे। उनके आगे एक विशाल मंदिर था और उसके बीच एक मूर्ति थी—सुंदरता में चंद्रमा जैसी, लेकिन कद में सरू के वृक्ष जैसी। एक दूसरी विशाल आकृति थी, जो सफेद दैत्य जैसी, रास्ते के बीच सिर उठाए दिखाई देती थी। वहाँ नारियल और पोपल के वृक्ष थे, जिनमें हर वृक्ष वर्ष में बार-बार फल देता था। शहर की सीमा पर एक मजबूत किला था और उसमें मूर्तिपूजकों का एक बड़ा समुदाय इकट्ठा था।"

"उसने लोगों को मारा और मंदिरों को तोड़ा तथा जला दिया, जैसे उसने दारनी और थानेसर के मंदिरों के साथ किया था। रास्ते में उससे केवल वही बच पाया जो किसी तिनके या झाड़ी के नीचे छिपा रहा, जैसे कोई दुर्भाग्यशाली पशु। उसने उन छिपे हुए लोगों को खोजे बिना छोड़ दिया, क्योंकि उस राजा का उद्देश्य कुछ और था। जो सोमनाथ के मंदिर को नष्ट करने जा रहा हो, वह छिपे हुए लोगों को खोजने में अपना समय व्यर्थ नहीं करता।"

"बादशाह मनात को नष्ट करने के लिए ही तेजी से आगे बढ़ रहा था; शायद उसकी यही जल्दी इसी कारण थी। मनात, लात और उज़्ज़ा मक्का में तीन मूर्तियाँ थीं—उस समय के मूर्तिकार आज़र के हाथों से बनी हुई। पूरी दुनिया उन तीनों मूर्तियों की पूजा करती थी, सिवाय उस व्यक्ति के जिस पर खुदा की दृष्टि थी। उनमें से दो को पैग़ंबर ने तोड़ दिया और उस दिन दोनों को काबा के सामने डाल दिया गया। मनात को काफ़िरों के बीच से चुरा लिया गया और उस देश से निकालकर किसी दूसरे देश में ले जाया गया। उसे ऐसी जगह ले जाया गया जहाँ आदम के समय से उस भूमि पर किसी काफ़िर के अतिरिक्त कोई बैठा या गया नहीं था।"

"उस मूर्ति के लिए एक मंदिर बनाया गया, जिसमें एक लाख प्रतिमाएँ और एक लाख आकृतियाँ थीं। उस मंदिर पर चारों ओर से श्रद्धा के लिए सोने की पट्टियाँ इस तरह लगाईं गई थीं कि वे पत्थर की पट्टियों जैसी दिखाई देती थीं। मंदिर के भीतर उस मूर्ति के लिए एक ख़ज़ाना बनाया गया था और उस ख़ज़ाने में बड़े-बड़े संदूकों में रत्न रखे थे। उसके लिए नगर-नगर से इतने रत्न खरीदे गए कि रत्न खरीदने वाला रत्न-विक्रेताओं से ही तृप्त हो गया।"

"मूर्ति के सिर के ऊपर एक मुकुट या शिरोभूषण लटकाया गया था, जिस पर माणिकों का काम था और मोतियों की बुनावट थी। उसके लिए शुद्ध सोने का एक शिरस्त्राण बनाया गया था, जो अग्नि के पर्वत जैसा था और उस पर जड़ा रत्न चिंगारी जैसा था। उसका मुकुट और शिरोभूषण किसी पूरे राज्य के कर के बराबर मूल्य का था; और उसकी सबसे कम मूल्यवान वस्तुओं में भी वही मुकुट और शिरोभूषण थे।"

"फिर उन्होंने उसे सोमनात नाम दिया। ऐसा कौन-सा नाम देखा गया है जिसके भीतर उसका दूसरा नाम छिपा हुआ हो? " (यहाँ फर्रुख़ी “सोमनात” के भीतर “मनात” नाम छिपा होने की ओर संकेत करता है।)

"उन्होंने संसार में यह बात फैलाई कि समुद्र से ऐसी आकृति वाली एक मूर्ति निकली है। वह सारे लोगों का नियंता और संसार का कर्ता है; वह सूर्य को प्रकाश देने वाला और चंद्रमा को प्रकाश देने वाला है। उसके ज्ञान से संसार की भलाई और बुराई निर्धारित होती है और उसके आदेश से संसार में भाग्य और नियति चलती है। दूसरे समूह ने कहा—नहीं, इस मूर्ति का स्थान उच्च आकाश में था। किसी मनुष्य ने इसे यहाँ नहीं लाया; यह स्वयं आकाश से यहाँ आई है। यह इसे दिन कहती है और उसे रात; इसे समुद्र कहती है और उसे स्थल। जब यह समुद्र से सिर उठाकर भूमि पर आई, तो सभी वनस्पतियों और वृक्षों ने इसके सामने सजदा किया।"

"गाय ने अपने दूध से इसे धोया और इसी कारण वे गाय को माता कहकर इसकी पूजा या निकटता का साधन मानते हैं। सिर्फ एक पत्थर के कारण ईश्वर की इतनी हजारों प्रजा शैतान की बात पर भरोसा करके संकट में पड़ गई। हर दिन उस पत्थर को धोना उनका कर्तव्य था—गंगा के जल, दूध, केसर और चीनी से। उस मूर्ति को गंगा के जल से धोने के लिए हर दिन दस बड़े प्यालों से भी अधिक जल पहुँचता था। गंगा के जल की क्या बात करूँ—वह सोमनाथ से कई फ़रसख़ ( दूरी मापने की फारसी इकाई) दूर है, उस स्थान से जहाँ यह पतन और अधर्म का स्थान है।"

"जब सूर्य ग्रहण लगता, तो एक लाख बच्चे और पुरुष उसके पास सहायता माँगने और क्षमा माँगने जाते। उन काफ़िरों में जो सोमनाथ हज के लिए जाते थे, उनकी भीड़ रास्ते में एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति से अलग नहीं होती थी। शमन उस पत्थर को ईश्वर कहते हैं—क्या ही व्यर्थ बात है; उनके सिर पर धूल पड़े!"

"खुदाई हुक्म ऐसा था कि वह दीन परवर शहरयार (बादशाह) उस मूर्ति को उसके स्थान से उखाड़ दे। इस उद्देश्य से कि वह उसे मक्का वापस ले जाए, उसने उसे उखाड़ दिया—और अब उसे हमारे साथ-साथ ले जा रहा है।"

"जब उसने उस मूर्ति को वहाँ से उखाड़ लिया और धन तथा सोना ले लिया, तो उसने अपने हाथ से मंदिर के भीतर आग डाल दी। जब सोमनाथ को जलाने का काम पूरा कर लिया, तो उसने लौटने वाले दूसरे लोगों के मार्ग पर प्रस्थान किया।"

महमूद की कशीदगी (प्रशंसा) में सिस्तानी उसे संबोधित करते हुए लिखता है, "तू बहमन के महीने में सोमनाथ जला रहा था, जबकि दूसरे बादशाह ऊद, सुगंधित पदार्थ और अंबर का आनंद ले रहे थे।"

⭐ इस विवरण में सबसे महत्वपूर्ण बात
फर्रुख़ी के वर्णन में मनात और सोमनाथ का संबंध आकस्मिक नहीं है। वह बाकायदा नाम के भीतर “मनात” को छिपा हुआ बताता है और फिर कहता है कि महमूद ने उस मूर्ति को मक्का वापस ले जाने के उद्देश्य से उखाड़ा।

इस प्रकार गारदीज़ी और फर्रुख़ी में एक उल्लेखनीय समानता दिखाई देती है:

- गारदीज़ी: मनात को पैग़ंबर मुहम्मद के समय काबा से अदन के रास्ते सोमनाथ लाए जाने की कथा देता है और उसे “मनात का पत्थर” कहता है।
- फर्रुख़ी: सोमनाथ/सोमनात नाम में “मनात” छिपा होने की व्याख्या करता है और महमूद द्वारा मूर्ति को मक्का वापस ले जाने की बात कहता है।

अर्थात दोनों महमूद के समकालीन स्रोतों में सोमनाथ की मूर्ति को मनात से जोड़ने वाली एक ही व्यापक परंपरा दिखाई देती है, यद्यपि दोनों का विवरण और भाषा अलग है।

👉 वामपंथी और हाल के मुस्लिम इतिहासकार यह सिद्ध करने की कोशिश करते हैं कि गजनवी बस एक लुटेरा था।

लेकिन, प्रथमदर्शी रचनाकारों के अनुसार यह केवल सोने की लूट की कहानी नहीं थी।

यदि उद्देश्य केवल धन प्राप्त करना होता, तो मंदिर से सोना, चाँदी, रत्न और अन्य संपत्ति लेकर वापस लौटना पर्याप्त था।

लेकिन प्रारंभिक मुस्लिम स्रोतों में जो चित्र दिखाई देता है, उसमें मूर्तिभंजन स्वयं विजय का हिस्सा था।

गारदीज़ी लिखते हैं कि महमूद सोमनाथ की मूर्तियों को नष्ट करने की इच्छा से वहाँ पहुँचा। 

अल-बिरूनी बताते हैं कि मूर्ति को तोड़कर उसके टुकड़ों को ग़ज़नी में सार्वजनिक रूप से अपमानित किया गया।

इसलिए प्रारंभिक मुस्लिम सामग्री में धार्मिक उद्देश्य को हटाकर केवल आर्थिक लूट की कहानी बनाना  स्रोतों के साथ न्याय नहीं होगा।

इतिहास की ऐसी ही छिपा दी गई तथ्यात्मक लेखों को पढ़ने के लिए फॉलो करें Prabhat Ranjan 

स्रोत:
1. अल-बिरूनी — किताब अल-हिंद (Kitāb al-Hind)
अंग्रेज़ी अनुवाद: Edward C. Sachau, Alberuni’s India: An Account of the Religion, Philosophy, Literature, Geography, Chronology, Astronomy, Customs, Laws and Astrology of India about A.D. 1030, 2 volumes, Trübner’s Oriental Series, 1887–1888. 
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2. अबू सईद अब्दुल-हय गारदीज़ी — ज़ैन अल-अख़बार (Zayn al-Akhbār)
अंग्रेज़ी अनुवाद: C. Edmund Bosworth, The Ornament of Histories: A History of the Eastern Islamic Lands AD 650–1041, I.B. Tauris, 2011. यह गारदीज़ी के Zayn al-Akhbār का अंग्रेज़ी अनुवाद और टिप्पणी सहित संस्करण है। �

3. फर्रुख़ी सिस्तानी — दीवान-ए-फर्रुख़ी सिस्तानी (Dīvān of Farrukhī Sīstānī)
मूल पाठ का प्रमुख आलोचनात्मक संस्करण: मुहम्मद जाबिर दबीर-सियाक़ी (Muhammad Jabir Dabir-Siyāqi), Dīvān-i Farrukhī Sīstānī

सोमनाथ संबंधी अंश का अंग्रेज़ी अनुवाद और विश्लेषण: Th. Emil Homerin, “Saʿdi’s Somnatiyah,” Iranian Studies, जिसमें फर्रुख़ी के दीवान के pp. 69–71, lines 1338ff. का अनुवाद दिया गया है।

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Friday, 25 September 2026

हिंदू महासभा और आरएसएस

राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ (R.S.S.) तब और अब - भाग  2
 
#हिन्दू_महासभा_एवं_आर_एस_एस_के_बीच_कड़वाहट

लेख थोड़ा बड़ा है इसलिए टाइम निकाल कर पूरा पढ़े और कल भाग 1 लिखा था,, भाग 3 भी आयेगा, तीनों पढ़ो तभी फाइनल निष्कर्ष निकलेगा (भाग 1लिंक पिन कमेंट में है)

जैसा विदित है कि वीर सावरकर पहले ही कलकत्ता अधिवेशन के लिये अध्यक्ष चुन लिये गये थे, परन्तु हिन्दू महासभा के अन्य पदों के लिये चुनाव अधिवेशन के मैदान में हुए। सचिव पद के लिये तीन प्रत्याशी थे (1) महाशय इन्द्रप्रकाश, (2) श्री गोलवलकर और (3) श्री ज्योति शंकर दीक्षित। चुनाव हुए और परिणाम स्वरुप महाशय इन्द्रप्रकाश को 80 वोट, श्री गोलवलकर को 40 और श्री ज्योति शंकर दीक्षित को मात्र 2 वोट प्राप्त हुए और इस प्रकार महाशय इन्द्रप्रकाश हिन्दू महासभा कार्यालय सचिव के पद पर चयनित घोषित हुए।

श्री गोलवलकर जी को इस हार से इतनी चिढ़ हो गयी कि वे अपने कुछ साथियों सहित हिन्दू महासभा से दूर होना शुरू हो गये| जून 1940 में डा. हेडगेवार कि अकस्मात मृत्यु हो गयी और उनके स्थान पर श्री गोलवलकर को आर.एस.एस. प्रमुख बना दिया गया। आर.एस.एस. प्रमुख का पद संभालने के थोड़े समय पश्चात ही उन्होंने श्री मारतंडे राव जोग को सर संघ सेनापति के पद से हटा दिया, जिन्हें डा. हेडगेवार ने आर. एस. एस. के उच्च श्रेणी के स्वयं सेवको को सैन्य प्रशिक्षण देने के लिये नियुक्त किया था। इस प्रकार गोलवलकर जी ने अपने ही हाथों आर.एस.एस. की पराक्रमी शक्ति के निर्माण को प्राय: समाप्त ही कर दिया। जिस जुझारू संगठन (मिलीशिया) की स्थापना करना आर.एस.एस. के संस्थापक का उद्देश्य था| वह जुझारूपन, गोलवलकर जी के इस कदम से समाप्त ही हो गया| इसका दुष्परिणाम यह हुआ कि देश विभाजन, चीन व पकिस्तान के आक्रमण के समय जिस समर्पण व भागीदारी की आशा समाज इस राष्ट्रवादी संगठन आर.एस.एस. से करता था, उस दायित्व को आर.एस.एस. निभाने में असफल रहा|

देश विभाजन के समय हिंदू पिटता रहा,अपमानित होता रहा, पर संघ शाखाओं पर कब्बडी ही खेली जाती रही| हाँ हिन्दुओं के खंडित भारत में शरणार्थी के रूप में आने पर, उनके लिए लंगर जरूर लगाये गये| गुरूजी के नेतृत्व में संघ हिन्दुओं की रक्षा की बजाय सेवा कार्य को ही अपना मुख्य कार्य समझने लगा- यहीं इसकी स्थापना के उद्देश्य व ध्येय में अंतर दिखाई देने लगता है| वर्तमान में भी देश पर अंदर व बाहर से हो रहे आतंकी हमलों व सत्ताधीशों द्वारा हिंदू समाज कों जिस प्रकार अपमानित किया जा रहा है उसका मुकाबला करने में इस संगठन की कमजोरी स्पष्ट रूप से देखने को मिल रही है, जब हम और हमारे यह संगठन किसी आतंकी घटना-गुंडागर्दी या सरकार के हिंदू विरोधी कदम का प्रतिकार करने में सक्षम नहीं हो पाते |

यहाँ यह महत्वपूर्ण और उलेखनीय है कि वर्तमान सरसंघ प्रमुख मोहन भागवत जी ने भी आज देश में घटित हो रही आतंकी घटनाओं को देखते हुए हिंदू युवकों के सैन्य प्रशिक्षण की आवश्यकता की मांग की है| स्पष्ट होता है कि गोलवलकर जी वास्तव में किसी भी प्रकार दूरदर्शी नहीं थे| हिंदू समाज व इस राष्ट्र कि रक्षा हेतु जो आवश्यकता वीर सावरकर जी ने “हिन्दुओं के सैनिकीकरण के रूप में सन् 1936 से 1945 के बीच दर्शाई थी, गोलवलकर जी ने मारतंडे राव जोग को सरसंघ सेनापति के पद से हटा कर उससे पूर्णताः उलट कार्य किया| उसी सावरकर की सैनिकीकरण नीति की महत्ता गोलवलकर जी के उत्तराधिकारी मोहन भागवत जी को सावरकर के कथन के 70 वर्ष पश्चात समझ में आ पाई है| इसे क्या कहेंगे| इस बीच देश और समाज को हुई हानी का दायित्व कौन लेगा|

सन् 1935 तक संघ का कार्य धीमी गति परन्तु दृढ विचारधारा से चलता रहा और महाराष्ट्र तक ही सीमित रहा| सन् 1936 के बाद देश में हिंदू मुस्लिम तनाव पुरे उफान पर आया | मुस्लिम लीग ने पकिस्तान की मांग बड़े जोर शोर से उठानी शुरू कर दी थी| इस हेतु उनके द्वारा मुस्लिम नेशनल गार्ड की स्थापना भी की गई, अल्लामा-मशर्की ने बेल्चा पार्टी (मुसलमानों के एक अर्द्धसैनिक दल) की स्थापना की जिसके कार्यकर्त्ता/वोलंटियर/रजाकार- हिंदुओं के साथ छोटी-छोटी बातों को तूल देकर लड़ाई-झगड़े के लिए अमादा हो जाते थे| निजाम हैदराबाद व उसके रजाकारों द्वारा किये जा रहे अत्याचारों से वहां की हिंदू जनता आर्तनाद कर रही थी| निजाम ने राज्य के हिंदुओं के सभी धार्मिक कार्यों व अधिकारों पर रोक लगा दी थी| हिंदू न तो यज्ञोपवीत पहन सकते थे, न हवन कर सकते थे| मंदिरों में घंटे-घड़ियाल बजाना अथवा कीर्तन आदि करने को भी निजाम ने गैर क़ानूनी घोषित कर दिया था| जिस कारण आर्यसमाज और हिंदू महासभा को भारी आन्दोलन/सत्याग्रह करना पड़ा| सिंध प्रान्त में मुस्लिम लीगी सरकार ने स्वामी दयानंद द्वारा रचित धार्मिक ग्रन्थ “सत्यार्थ प्रकाश” पर प्रतिबंध लगा दिया था|

सन् 1945-46 में मुस्लिम लीग ने अंग्रेज सरकार और कांग्रेसी नेताओं कों पाकिस्तान की मांग मानने के लिए विवश करने के उद्देश्य से “डायरेक्ट एक्शन” नाम से कार्यवाही शुरू की, जिसके परिणाम स्वरूप बिहार, कलकत्ता आदि शहरों में हजारों हिंदुओं का नरसंहार हुआ | ऐसी स्थिति में हिंदू भयग्रस्त भी था और आक्रोशित भी, और वे चाहते थे कि हिंदुओं का भी एक युवा जुझारू संगठन हो जो उनकी सुरक्षा कर सके| इन्हीं कारणों से हिंदुओं का रुझान संघ की ओर बढ़ा और इसी समय संघ के स्वंयसेवकों और शाखाओं की संख्या बढ़ी और सन् 1946 के पहुंचते- पहुंचते युवा स्वंयसेवकों की संख्या लगभग 7 लाख हो गई|” संघ के स्वंयसेवकों की संख्या में यह विस्तार गोलवलकर जी के नेतृत्व से अधिक देश में उस समय उत्पन्न हो रही सामाजिक व राजनैतिक परस्थितियों के कारण ही मुख्य रूप से था, जिससे हिंदू समाज- उद्वेलित होकर संघ की ओर आशा लगाकर देखने लगा जो स्वाभाविक था|

श्री गोलवलकर एक रूढ़िवादी व्यक्ति थे जो पुरानी धार्मिक रीतियों पर अधिक विश्वास रखते थे, यहाँ तक कि उन्होंने अपने पूर्वजो के लिये ही नहीं अपितु अपने जीवन काल में ही अपना भी श्राद्ध कर्म संपन्न कर दिया था। वे गंडा-ताबीज के हार पहने रहते थे, जो सम्भवत: किसी संत ने उन्हें किसी बुरे प्रभाव से बचने के लिये दिए थे। गोलवलकर जी का हिंदुत्व श्री वीर सावरकर और डॉ. हेडगेवार के हिंदुत्व से किंचित भिन्न था। गोलवलकर जी के मन में वीर सावरकर के लिये उतना आदर सत्कार का भाव नहीं था जितना की डा. हेडगेवार के मन में था। डा. हेडगेवार, वीर सावरकर को आदर्श पुरुष मानते थे| यथार्थ में श्री गोलवलकर इतने दृढ़ विचार के न हो कर एक अपरिपक्व व्यक्ति थे, जो आर.एस.एस. विशाल संस्था का उत्तरदायित्व ठीक से उठाने के योग्य नही थे। राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ ने गोलवलकर जी के नेतृत्व में संघ कि शाखाओं और स्वयंसेवकों की संख्या तो बढाई परन्तु अपने मूल सिद्धांतों से दुरी बना लेने के कारण संगठन की ऊर्जा को प्रायः खो दिया| वही क्रमिक ह्रास, आज आर.एस.एस. जिस स्थिती में पहुँच गई है, में स्पष्ट रूप से दिखाई देता है|

गोलवलकर जी के आर.एस.एस. प्रमुख बनने के बाद हिन्दू महासभा एवं आर.एस.एस के बीच सम्बन्ध तनावपूर्ण होते चले गये। यहाँ तक की श्री गोलवलकर ने वीर सावरकर एवं हिन्दू महासभा द्वारा चलाये जा रहे उस अभियान की आलोचना करनी शुरू कर दी जिसके अंतर्गत हिन्दू युवको को सेना में भर्ती होने के लिये प्रेरित किया जाता था। यह अभियान 1938 से सफलता पूर्वक चलाया जा रहा था और डॉ. हेडगेवार ने 1940 में अपनी मृत्यु तक इसका समर्थन किया था। सुभाष चंद्र बोस ने भी सिंगापुर से रेडियो पर अपने भाषण में इन युवको को सेना में भर्ती कराने के लिये श्री वीर सावरकर के प्रयत्नों की बहुत प्रशंसा की थी। हिन्दू महासभा के इस अभियान के कारण सेना में हिंदुओ की संख्या बढ़ने लगी, जिस पर मुस्लिम लीग ने बहुत बवाल मचाया और अंग्रेज सरकार से आग्रह किया कि सेना में हिंदुओ कि भर्ती बंद की जाये। क्योँकि उस समय द्वितीय विश्व युद्ध चल रहा था इस कारण सरकार को सेना में बढ़ोतरी करनी थी अतः मुस्लिम लीग के विरोध को नकार दिया गया। यह इसी अभियान का ही नतीजा था कि सेना में हिंदुओ की संख्या 36% से बढ़ कर 65% हो गयी, और इसी कारण विभाजन के तुरंत बाद पाकिस्तान द्वारा कश्मीर पर आक्रमण का भारतीय सेना मुंह तोड़ जवाब दे पायी। परन्तु गोलवलकर जी के उदासीन व्यवहार एवं नकारात्मक सोच के कारण दोनों संगठनो के सम्बन्ध बिगड़ते चले गये।

यह भी उलेखनीय है कि एक ओर काँग्रेस व गाँधीजी ने अंग्रेजो को सहमति दे दी थी कि उनके द्वारा भारत छोड़े जाने से पहले, भारत कि सत्ता मुस्लिम लीग को सौपने पर उन्हें कोई आपत्ति नहीं है। दूसरी ओर वे लगातार यह प्रचार भी करते रहे कि वीर सावरकर और हिन्दू महासभा साम्प्रदायिक हैं। डा. हेडगेवार की मृत्यु के उपरान्त आर.एस.एस. ने भी श्री गोलवलकर के नेतृत्व में वीर सावरकर एवं हिन्दू महासभा के विरुद्ध एक द्वेषपूर्ण अभियान आरंभ कर दिया। श्री गंगाधर इंदुलकर (पूर्व आर.एस.एस. नेता) का कथन है कि श्री गोलवलकर यह सब वीर सावरकर की बढ़ती हुई लोकप्रियता (विशेषकर महाराष्ट्र के युवको में) के कारण कर रहे थे। उन्हें आशंका थी कि यदि सावरकर कि लोकप्रियता बढ़ती गयी तो युवक वर्ग उनकी ओर आकर्षित होगा और आर.एस.एस. से विमुख हो जायेगा।

इस टिप्पणी के बाद श्री इंदुलकर पूछते है कि “क्या ऐसा कर के आर.एस.एस. हिंदुओ को संगठित कर रही थी या कि विघटित कर रही थी|”

सन् 1936-37 में श्री माधव राव सदाशिव राव गोलवलकर संघ में आये| 1938 में उन्होंने एक पुस्तक लिखी जिसका नाम “वी. आर. अवर नेशनहुड डिफाइंड”(हमारी राष्ट्रीयता)| इस पुस्तक में उन्होंने हिंदू, हिंदुत्व, हिंदू राष्ट्र की वही व्याख्यायें स्वीकार की जो वीर सावरकर द्वारा लिखित पुस्तक “हिंदुत्व” में तथा वीर सावरकर जी के बड़े भाई श्री बाबा राव सावरकर द्वारा लिखित पुस्तक “राष्ट्र मिमांसा” में दर्शायी गई थी | १५ मई १९६३ के दिन बम्बई में सावरकर सप्ताह का आयोजन किया गया था, उसमें श्री गोलवलकर ने अपने भाषण में कहा कि उन्होंने सावरकर जी की महान रचना ‘हिंदुत्व’ में राष्ट्रवाद के सिद्धांत का विवेचन पाया है| उनके लिए यह एक पाठ्य पुस्तक व एक वैज्ञानिक पुस्तक है|(हिंदू अस्मिता दि. १-११-९३)

परन्तु कुछ समय पश्चात, श्री गोलवलकर ने स्वंय अपने द्वारा सन् 1938 में लिखी गई पुस्तक ‘वी. आर. अवर नेशनहुड डिफाइंड’ पुस्तक को अस्वीकार करने की बात कही| उन्होंने यहाँ तक कहा कि भूल जाओ ‘ वी आर. अवर नेशनहुड डिफाइंड’ को| 1949 में संघ पर लगे प्रतिबंध के दौरान, राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ ने जो अपना संविधान बना कर सरकार को दिया उसमें हिंदू राष्ट्र शब्द का कहीं उल्लेख नहीं था परन्तु उसके बाद भी संघ की शाखाओं पर स्वंयसेवकों द्वारा “प्रभु शक्ति मम हिंदू राष्ट्रांग भूता” कि प्रार्थना अवश्य गाई जाती रही है| यह संविधान गोलवलकर जी द्वारा डॉ. हेडगेवार कि मृत्यु के बाद संघ पर प्रतिबन्ध लगने के पश्चात बनाया गया था|

दिनाँक 30-1-1948 को गाँधी जी की हत्या हुई| जिस समय गाँधी जी की मृत्यु का समाचार गोलवलकर जी को मिला, वह उस समय दि. 30-1-1948 को मद्रास (चैन्नई) में प्रवास पर थे| आल इंडिया रेडियो पर जब यह समाचार प्रसारित हुआ की गांधीजी की हत्या महाराष्ट्र के एक हिंदू-राष्ट्रवादी पंडित नाथूराम गोडसे ने की है| इसकी प्रतिक्रिया में गांधीवादियों द्वारा महाराष्ट्र में बहुत उत्पात मचाया गया है, साथ ही वीर सावरकर के छोटे भाई नारायण राव सावरकर जी को भी लाठियों से पीटा गया| गोडसे जी का परिवार भी घोर प्रताड़ना का शिकार हुआ| इसके अतिरिक्त वीर सावरकर जी के साथ-साथ हिंदू महासभा और राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के हजारों कार्यकर्ताओं को भी जेलों में ठूस दिया गया| उन लोगों को भी जिनका गाँधी वध से दूर दूर तक का कोई संबंध नहीं था|(संदर्भ- “गोडसे की आवाज सुनो” पृष्ठ सं.51-52)

इस कांड का सबसे दुखद पहलु यह रहा कि जिस पंडित नाथूराम गोडसे ने राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के कार्यकलापों में सदा बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया, जिसने महाराष्ट्र के सांगली जिले के बौद्धिक प्रमुख का महत्वपूर्ण दायित्व निभाया और दि. 15-11-1949 को- आर.एस.एस. की शाखा स्थल पर गाई जाने वाली प्रार्थना “नमस्ते सदा वत्सले मातृ भूमि” का स्वर गान करते हुए, भारत विभाजन के विरोध में, फांसी का फंदा चूमा और शाह्दत का जाम पिया| उसी संघ समर्पित गोडसे को, गाँधी वध के बाद आर.एस.एस. के तात्कालिक प्रमुख – सरसंघचालक श्री माधव राव सदाशिव राव गोलवलकर उपाख्य “गुरूजी” ने भयभीत होकर सिरे से नकार दिया, और तुरत-फुरत में दिनांक 31-1-1948 को जवाहरलाल नेहरु तात्कालिक प्रधानमंत्री को पत्र लिख कर गोडसे को “अविवेकी और दुराग्रही आत्मा के साथ देशद्रोही” तक लिख डाला| इसके विपरीत अखिल भारत हिंदू महासभा नें उस विषम परस्थितियों में भी निर्भीकता के साथ छाती ठोककर हुतात्मा नाथूराम गोडसे को न सिर्फ अपना कार्यकर्ता बताना स्वीकार किया वरन हिंदू महासभा के तात्कालिक अध्यक्ष बैरिस्टर एल.वी.भोपटकर ने नाथूराम गोडसे के साथ अन्य अभियुक्तों का मुकदमा निशुल्क और पूर्ण निष्ठा और समर्पण के साथ अंत तक लड़ा|

क्रमशः

Thursday, 24 September 2026

पूरे पितृपक्ष में अपने पितरों को जल दान करें विशेष विधि

'                        🌿🌕🌿
         *पितृ पक्ष 2026 विशेष सूचना--*

 *दिनांक 26 सितंबर 2026 दिन शनिवार से पितृपक्ष, महालयारंभ हो रहा है ।।*

  *पूरे पितृपक्ष में अपने पितरों को जल दान करें ।।  पितरों को जल देने, उनका सम्मान करने से पितृ दोष समाप्त होता है ।।*

*जो लोग मंत्र सहित तर्पण नहीं कर सकते -- साधारण रूप से तर्पण करने की जानकारी दी जा रही है---*
 
 पितरों के प्रसन्न करने से  अनेकों दुखों का शमन होता है ।। इस समय पुरुषों को, पितृपक्ष आरंभ होने से पहले अपने सर के बाल उतरवा देना चाहिए ।।
 
 *अपने पितरों का नाम ले लेकर के जल प्रदान कर आशीष प्राप्त करें, जिससे आप अपने जीवन में अच्छी प्रगति कर सकें ।।*
 '       *क्योंकि पितृपक्ष में पितरलोक और पृथ्वी लोक एक दूसरे लोक के बहुत निकट आ जाते हैं ।।*
, *ऐसे समय में पितर लोग जब देखते हैं पृथ्वी की ओर तो, अपने कुल खानदान से, जल की अपेक्षा करते हैं  तर्पण के लिए विशेष सामग्री जो तर्पण करते समय चाहिए वह है---*
१~  जल 
२~गंगाजल
३~ तुलसी का पत्ता
 ४~ देशी गौ का दूध
 ५~ सफेद चावल {धुलकर सुखाया हुआ}
६~ काला तिल {धुलकर सुखाया हुआ}
७~ जौ    {धुलकर सुखाया हुआ}
८~ श्रीखंड चंदन {घिसकर लेप बनाया हुआ}
९~  सफेद फूल 
१०~ शहद
यह सारा सामान एक-एक डिब्बे में सुरक्षित रख लें ।।

*बैठने के लिए आसन ।* 

दो भगौना, जिसमें कम से कम तीन- तीन लीटर से अधिक पानी आ जाये ।।

दो प्लेट सामने रखें 
एक प्लेट में थोड़ा सा तिल, जौ, चावल, सफेद फूल, मीठा एक प्लेट में रखें ।। एक छोटे कटोरी में जल रखें ।

दोनों हाथ के अनामिका अंगुली में पैंती पहन लें । उसको हाथों में लेकर दोनों हाथों से जल प्रदान करें ।।
पैंती नहीं है तो अंगुलियों में अंगूठी पहनें ।
 
जो सामने खाली प्लेट है उसमें थोड़ा सा चावल हाथ में लेकर के पितरों का आवाहन करें ।
और उसमें जल अक्षत पुष्प धूप दीप और मीठा अर्पित करें ।
खाली प्लेट में रख दें । और पितरों से कहें हे पितृगण !! आप यह भोग स्वीकार करें ।।
अब जो --
*१० प्रकार का समान लिखा हुआ है उसको एक भगौने में थोड़ा-थोड़ा रखें ।।*
जिस भगवान में सामग्री रखे है उस भगौने को जल गंगाजल से भर दें ।।

अब आप अपने पिता माता 
दादा-दादी 
आजा आजी 
तीन पीढ़ी को अपने {अंजुरी} अर्थात् *अंजलि से एक-एक अंजलि जल* खाली वाले भगौने में डालें -- 
पिता सहित तीन पीढ़ी को जल दें और कहें हे पिता यह जल स्वीकार करो हे माता यह जल स्वीकार करो, दादा दादी आजा आजी ।।
अपने मामा के तीन पीढ़ी मामा मामी नाना नानी बूढ़े नाना नानी
*इसी तरह आपकी मौसी मौसी, ससुर सास, मित्र, गुरु जितने भी लोग आपके जीवन में रहे हों और अब ना हों, उन्हें जल प्रदान करना चाहिए ।।*
अंतिम में तीन अंजलि जल चराचर जगत के लिए अर्पित करना चाहिए 
 और एक अंजलि जल भीष्म पितामह के लिए अर्पित करना चाहिए ।।
अंतिम में वह जल किसी पौधे में डाल देना चाहिए 
, जो पैर के नीचे ना पड़े ।।