यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः । यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफलाः क्रियाः ॥ ५६ ॥
जिस कुलमें स्त्रियोंकी पूजा (वस्त्र, भूषण तथा मधुर वचनादि द्वारा आदर-सत्कार) होती है, उस कुलपर देवता प्रसन्न होते हैं और जिस कुलमें इन (स्त्रियों) की पूजा नहीं होती उस कुलमें सब कर्म निष्फत्त होते हैं (अत एव स्त्रियोंका अनादर कभी नहीं करना चाहिये) ॥ ५६ ॥
शोचन्ति जामयो यत्र विनश्यत्याशु तत्कुलम् । न शोचन्ति तु यत्रैता वर्धते तद्धि सर्वदा ।। ५७ ।।८
मनु०११४ मनुस्मृतिः
जिस कुलमें जामि (स्त्री, पुत्रवधू, बहन, भानजी, कन्या आदि) शोक करती हैं, वह कुल शीघ्र ही नष्ट हो जाता है और जिस कुत्तमें ये शोक नहीं करतीं (प्रसन्न रहती) हैं, वह कुत्त सर्वदा उन्नति करता है ॥ ५७ ॥
जामयो यानि गेहानि शपन्त्यप्रतिपूजिताः । तानि कृत्याहतानीव विनश्यन्ति समन्ततः ॥ ५८ ॥
जिस गृहको ये जामियां (स्त्री, पुत्रवधू, बहन, भानजी, कन्या आदि) अनादर पाकर शाप देती हैं, वह गृह कृत्या (अभिचारकर्म-मारण, मोहन, उच्चाटनादि) से हतके समान सब ओरसे (धन, धान्य, परिवार आदिके सहित) नष्ट हो जाता है ॥
उत्सवादिमें स्त्रियोंकी विशेष पूजनीयता -
तस्मादेताः सदा पूज्या भूषणाच्छादनाशनैः । भूतिकामैर्नरैर्नित्यं सत्कारेषुत्सवेषु च ।। ५६ ।।
इस कारण उन्नति चाहनेवाले मनुष्योंको (कौमुदी आदि) सत्कार तथा (यज्ञोपवीत आदि) उत्सवों के अवसरोंपर इन स्त्रियोंका वस्त्र, भूषण और भोजनादिसे विशेष आदर-सत्कार करना चाहिये ॥ ५९ ॥
दम्पतिकी सन्तुष्टिका फल-
सन्तुष्टो भार्यया भर्ता भर्ना भार्या तथैव च । यस्मिन्नेव कुले नित्यं कल्याणं तत्र वै ध्रुवम् ॥ ६० ॥
जिस कुत्तमें स्त्रीसे पति तथा पतिसे स्त्री सन्तुष्ट रहती है, उस कुलमें अवश्य ही सर्वदा कल्याण होता है ॥ ६० ॥
स्त्रीको अलङ्कारादिसे सन्तुष्ट नहीं करनेका फल-यदि हि स्त्री न रोचेत पुमांसं न प्रमोद्येत् । अप्रमोदात्पुनः पुंसः प्रजनं न प्रवर्तते ॥ ६१ ॥
यदि स्त्री वस्त्राभूषण आदि से रुचिकर नहीं होती है तो वह पतिको आनन्दित नहीं करती और हर्षित नहीं होनेसे वह पति गर्भाधान करनेमें प्रवृत्त (समर्थ) नही होता है ॥ ६१ ॥
१. "मेधातिथि-गोविन्दराजौ तु 'नत्रोढादुहितृस्नुषाद्या जामयः" इत्याहतुः” इति (म० मु०)। अमर-हेमचन्द्र हलायुध-मेदिनीकार-विश्वादयः कोषकारास्तु याभिः (यामिः) 'स्वसृकुलस्त्रियोः' इत्याहुः । शाश्वतस्तु 'तत्र कुलबालिकाया-बेत्याह ।