Wednesday, 2 September 2026

कन्याके आदर तथा अनादरके फल-

कन्याके आदर तथा अनादरके फल-
यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः । यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफलाः क्रियाः ॥ ५६ ॥

जिस कुलमें स्त्रियोंकी पूजा (वस्त्र, भूषण तथा मधुर वचनादि द्वारा आदर-सत्कार) होती है, उस कुलपर देवता प्रसन्न होते हैं और जिस कुलमें इन (स्त्रियों) की पूजा नहीं होती उस कुलमें सब कर्म निष्फत्त होते हैं (अत एव स्त्रियोंका अनादर कभी नहीं करना चाहिये) ॥ ५६ ॥

शोचन्ति जामयो यत्र विनश्यत्याशु तत्कुलम् । न शोचन्ति तु यत्रैता वर्धते तद्धि सर्वदा ।। ५७ ।।८ 
मनु०११४ मनुस्मृतिः
जिस कुलमें जामि (स्त्री, पुत्रवधू, बहन, भानजी, कन्या आदि) शोक करती हैं, वह कुल शीघ्र ही नष्ट हो जाता है और जिस कुत्तमें ये शोक नहीं करतीं (प्रसन्न रहती) हैं, वह कुत्त सर्वदा उन्नति करता है ॥ ५७ ॥
जामयो यानि गेहानि शपन्त्यप्रतिपूजिताः । तानि कृत्याहतानीव विनश्यन्ति समन्ततः ॥ ५८ ॥
जिस गृहको ये जामियां (स्त्री, पुत्रवधू, बहन, भानजी, कन्या आदि) अनादर पाकर शाप देती हैं, वह गृह कृत्या (अभिचारकर्म-मारण, मोहन, उच्चाटनादि) से हतके समान सब ओरसे (धन, धान्य, परिवार आदिके सहित) नष्ट हो जाता है ॥
उत्सवादिमें स्त्रियोंकी विशेष पूजनीयता -
तस्मादेताः सदा पूज्या भूषणाच्छादनाशनैः । भूतिकामैर्नरैर्नित्यं सत्कारेषुत्सवेषु च ।। ५६ ।।
इस कारण उन्नति चाहनेवाले मनुष्योंको (कौमुदी आदि) सत्कार तथा (यज्ञोपवीत आदि) उत्सवों के अवसरोंपर इन स्त्रियोंका वस्त्र, भूषण और भोजनादिसे विशेष आदर-सत्कार करना चाहिये ॥ ५९ ॥
दम्पतिकी सन्तुष्टिका फल-
सन्तुष्टो भार्यया भर्ता भर्ना भार्या तथैव च । यस्मिन्नेव कुले नित्यं कल्याणं तत्र वै ध्रुवम् ॥ ६० ॥
जिस कुत्तमें स्त्रीसे पति तथा पतिसे स्त्री सन्तुष्ट रहती है, उस कुलमें अवश्य ही सर्वदा कल्याण होता है ॥ ६० ॥
स्त्रीको अलङ्कारादिसे सन्तुष्ट नहीं करनेका फल-यदि हि स्त्री न रोचेत पुमांसं न प्रमोद्येत् । अप्रमोदात्पुनः पुंसः प्रजनं न प्रवर्तते ॥ ६१ ॥
यदि स्त्री वस्त्राभूषण आदि से रुचिकर नहीं होती है तो वह पतिको आनन्दित नहीं करती और हर्षित नहीं होनेसे वह पति गर्भाधान करनेमें प्रवृत्त (समर्थ) नही होता है ॥ ६१ ॥
१. "मेधातिथि-गोविन्दराजौ तु 'नत्रोढादुहितृस्नुषाद्या जामयः" इत्याहतुः” इति (म० मु०)। अमर-हेमचन्द्र हलायुध-मेदिनीकार-विश्वादयः कोषकारास्तु याभिः (यामिः) 'स्वसृकुलस्त्रियोः' इत्याहुः । शाश्वतस्तु 'तत्र कुलबालिकाया-बेत्याह ।

भर वंश

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भर वंश

भर जाति भारशिव ही है। जो दयनीय दशा में जीवन व्यतीत कर रहे हैं। यह लोग अपनी जाति के आगे अपने पुराने राजमोह को नहीं छोड़ पाए और अपने को राजभर कहने लगे। 12वीं शताब्दी तक बनारस राज्य इन्हीं के अधिकार में था। कहा जाता है कि सारनाथ के पास चंदो तालाब इन्ही ने बनवाया था। यह लोग नाग और सूर्य की पूजा करते थे। शकों के पराजय के बाद उस क्षेत्र में इनका अखंड राज्य स्थापित हो गया था। गहरवारों के पराजय के बाद आक्रमणकारी तुर्कों से भरों ने डट कर लोहा लिया था। लगभग 200 वर्षों तक युद्ध चलता रहा।

तुर्की शासकों ने इस वीर जाति और रणबांकुरों के विनाश में कोई कसर नहीं उठा रखी, सुल्तान अल्तमश के पुत्र ने बहराइच में भरों के विनाश करने में डेढ़ लाख सिपाही कटवा दिए थे। बलबन ने कालिंजर में ऐसा ही किया था। जौनपुर के इब्राहिम शाह शर्की ने भरो का विनाश करने में कोई कसर न उठा रखी थी। सेमरौता के राजा केशरी सिंह ने रायबरेली के हरदोई नामक स्थान में भरों को परास्त कर शेरपुर कटरा बसाया। इलाहाबाद जिले के पास कड़े नामक स्थान को भरों के राजा कड़े चंद ने बसाया था। इनके भाई मानिक चंद्र ने मानिकपुर बसाया था। जिनके दुर्ग आज भी खंडहर के रूप में मौजूद है। जायस का पुराना नाम उजालक नगर था। 505 जिसे भरो के राजा उजालक ने बसाया था। जौनपुर के इब्राहिम शाह शर्की को रायबरेली डलमऊ तथा सुदामन पुर नामक स्थान पर भरों से कठिन लोहा लेना पड़ा था।

भर वंश

जिन पल्लवों ने दक्षिण को पवित्र हिंदू राष्ट्र बनाया था। वे ब्राह्मण थे। उन लोगों ने विकट और उग्र राजनैतिक कार्य करके अपनी मर्यादा बढ़ाई थी। पल्लव वंश के संस्थापक का नाम वीर्यकूर्च था। जिसका विवाह नागवंशी राजा की कन्या से हुआ था। इसलिए वह पूर्ण राज चिन्हों से अलंकृत हुआ था। उस समय अर्थात तीसरी शताब्दी के उत्तरार्ध में जो नागवंशी सम्राट था। वह भारशिव नाग था। जिसका राज्य नागपुर और बस्तर होता हुआ आंध्र तक पहुंच गया था। वीर्य कुर्च (वीर कोर्च) के पौत्र के एक शिलालेख जो आंध्र प्रदेश से प्राप्त हुआ था। जिसमें अंकित है कि "परम ब्रह्मणस्य स्वबाहु बलार्जित क्षत्र तपो निधे विंधि विहित सर्वा मर्यादस्य"

जिसका तात्पर्य यह है कि वीर्य कूर्च ब्राह्मणों के सर्वोच्च लक्षणों से युक्त था। उसने क्षत्रिय का पद प्राप्त किया था और इन्हीं नागवंशी से महात्मा बुद्ध के उस दांत का कुछ अंश सिंघल ले जाने की आज्ञा प्राप्त की गई थी। जो आंध्र प्रदेश के दंत पुर नामक स्थान पर था। आंध्र प्रदेश के इस स्थान को मजेरिक कहते हैं। जो संभवत गोदावरी के उस शाखा का नाम है जिसे आजकल मंझिर कहते हैं।

बौद्धों ने जिस नागराज का वर्णन किया है वह पल्लव वंश का होना चाहिए। जो नाग साम्राज्य के अधीन था। यह नागवंशी सम्राट वह होना चाहिए जिसने अपनी कन्या का विवाह वीर्य कूर्च से किया था। यह समय 300 ई० के आसपास होना चाहिए।

सन 300 ई के जिन पल्लव वंशियों के ताम्र लेख मिले हैं 78 इसमें उन्होंने अपने को भारद्वाज कहा है। पल्लव वंश में वीर्य कूर्य (कुमार विष्णु), शिव स्कंद बर्मन, वीर बर्मन, विजय (स्कंद) बर्मन, सिंह बर्मन, स्कंद बर्मन तृतीय, गोप विष्णु, सिंह बर्मन द्वितीय ने 265 ई० से 360 ई० तक राज्य किया। पल्लव वंश का उल्लेख करते हुए वी० ए० स्मिथ ने लिखा है कि "All these people doubless to "Naga"