Saturday, 29 August 2026

कृष्ण का एक अरबी version पकड़ा दिया गया कि तुम इसकी पूजा करो।

आज हम जिस योगेश्वर की पूजा करते हैं वो योगेश्वर कौन है? वो योगेश्वर एक वो कसर का एक अरबी अरेबियन version है, अरेबियन version. हमें एक मुसलमानी कसर पकड़ा दिया गया कि तुम इसकी पूजा करो। भाई साहब कहते हैं भागवत के करने वाले, कहते हैं सनातन धर्म के बड़े बड़े जानने वाले

कि जिस गांव में योगेश्वर ने जन्म लिया, जन्म तो उनका जेल में हुआ मथुरा के और फिर रहने लगे वो गोकुल में। गोकुल की प्रत्येक नारी उन्हें अपना पति, अपना वर समझती थी। भाई साहब आपका जन्म किसी गांव में हुआ या किसी शहर में हुआ था? मैं तो नगर में पैदा हुआ हूं।

भाई साहब मेरा जन्म एक गांव में पैदा हुआ। गांव की परंपरा है, जिस गांव में मेरा जन्म हुआ, उस गांव में प्रत्येक महिला हां मेरी बहन, मेरी शादी होकर आई, मेरी पत्नी के अलावा, उससे पहला रिश्ता मेरा परदादी का, दूसरा रिश्ता दादी का, तीसरा रिश्ता मां का,

चौथा रिश्ता बेटी समान भाई बहू, छोटे भाई की पत्नी, पांचवा रिश्ता पुत्र वधू, छठा रिश्ता पौत्र वधू। एक अपनी पत्नी को छोड़कर केवल यही मेरे रिश्ते उस गांव की महिलाओं से संभव है। और जिस भी महिला ने उस गांव में जन्म लिया,

सबसे पहला रिश्ता पिता की बुआ, फिर मेरी बुआ, फिर मेरी बहन, फिर मेरी बेटी, फिर मेरी पौती, फिर मेरी परपौती। भाई साहब क्या इनमें से कोई भी ऐसा रिश्ता है कि कोई भी महिला मुझे अपना पति मान ले? क्या यह भारतीय धर्म परंपरा में संभव है क्या भाई साहब?

ठीक बात है, बिल्कुल ठीक। यह कभी भी संभव नहीं था। और अगर मैं किसी महिला से यह रिश्ता जोड़ने की कोशिश करता हूं तो इसकी सजा हमारे धार्मिक संस्कारों में या तो death

sentence या परिवार का पूर्ण बहिष्कार, इसके अलावा कोई सजा नहीं थी। एक काम जो नरसिंगानंद नहीं कर सकता, पंडित विनय कसर चतुर्वेदी नहीं कर सकते, एक साधारण हिंदू नहीं कर सकता, तो हम सबका पिता,

जो हमारे धर्म का पिता है, वो ये काम कैसे कर सकता है भाई साहब? ये परंपरा कहां से आई? इस परंपरा को समझने के लिए आपको पचास, साठ और सत्तर के दशक की जो फिल्में हैं वो याद करनी पड़ेंगी।

ये संस्कार कहां से बोए गए? फिल्में दिखाती थी एक गांव में, एक घर में लड़का रहता है, बराबर के घर में लड़की रहती है, दोनों में प्यार हुआ, दोनों की शादी हो गई। गोत्र में भी शादी नहीं हो सकती।

गांव की तो बात छोड़ दीजिए। यह हमारी परंपरा नहीं, यह लुटेरों की परंपरा थी। जो अपनी बहनों से, अपनी बेटियों से, अपनी पौतियों से, अपनी माताओं से, अपनी पुत्र वधुओं से शादी और बलात्कार कर लेते थे। धर्म के नाम पर बिके हुए धर्मगुरुओं ने,

धर्म के नाम पर बिके हुए तथाकथित विद्वानों ने योगेश्वर के चरित्र को समाप्त करने के लिए, ताकि हिंदू मानस बिल्कुल कुचल जाए और हम इस गंदगी को स्वीकार करके गंदगी में लिप्त हो जाएं, इसके लिए यह अरेबियन परंपराएं, यह जाहिल लुटेरों की परंपराएं हम पर डाल दी।

यह तो धन्यवाद देता हूं, मैं अभी भी खाप पंचायतें हैं, अभी भी गांव का system है, जिसने इस बदतमीजी को रोके रखा है। वरना अपने आप को तथाकथित विद्वान कहने वाले तो बहुत दिन पहले से, अभी हमारे न्यायपालिका को देख लीजिए भाई साहब, हमारे विद्वान न्यायाधीशों को देख लीजिए,

वो तो तैयार बैठे रहते हैं कि गंदगी को अपने ऊपर थोप लो और समाज पर लगा दो। इन षड्यंत्रों से लड़ने के लिए आज बड़े धर्म के बारे में मनन, चिंतन, अध्ययन और सही धर्म के प्रचार प्रसार की आवश्यकता है भाई साहब।

लोग जयचंद को गद्दार बताते हैं।

हम लोग जयचंद को गद्दार बताते हैं। क्योंकि हमारी नसों में जो गुलामी है ना, सत्ता की गुलामी। आप पूरा जब पढ़ेंगे तो आपको पता चलेगा जयचंद और पृथ्वीराज चौहान सगे मौसेरे भाई थे। हां और वो गद्दार नहीं था।

एक साथ अमर के देखते थे दोनों। जयचंद छोटे थे, पृथ्वीराज चौहान बड़े थे। तो पृथ्वीराज चौहान को दिल्ली मिल गई। वरना पृथ्वीराज चौहान अजमेर के राजा थे और यह राजा थे कन्नौज के। दोनों एक ही आश्रम में रहकर पढ़े।

और जयचंद जो है पृथ्वीराज चौहान के बहुत ही आज्ञाकारी थे। पृथ्वीराज चौहान जब भी कोई लड़ाई लड़ते थे, बड़ी लड़ाई, जयचंद उनके general रहते थे। लेकिन 65 साल के बूढ़े ने जब अपने सगे छोटे मौसेरे भाई की 13

साल की बेटी का अपहरण कर लिया और लाखन जो था उनका मुँहबोला बेटा, उनका भतीजा था जयचंद का, उनका अपना बेटा तो था नहीं। तो लाखन को बुलाकर कत्ल कर दिया। तो जयचंद बेचारा क्या करता?

हम सच को स्वीकार ही नहीं कर पाते। हम केवल भाटों की भाषा बोलते हैं। हम केवल गुलामों की भाषा बोलते हैं। हम कभी भी सत्य का आकलन नहीं करते। तो गांधी नेहरू की गलती नहीं थी।

उस समय सावरकर को छोड़कर बाकी जितने सरदार पटेल को बहुत महान बताया जाता है। अगर सरदार पटेल चाहते तो क्या एक भी मुसलमान भारत में रह जाता? केवल दो नेता हैं एक भीमराव अंबेडकर और एक वीर सावरकर। ये दोनों चिल्लाते रहे। आज हमें महान लोग भी तो क्योंकि हमें गुजराती महान बनाने हैं।

तो मैं फिर कह रहा हूं अच्छे थे। सरदार पटेल ने रियासतों का एकीकरण किया। अच्छी बात है। लेकिन इस्लाम के बारे में तो वो गांधी के तो follower थे। और संघ पर प्रतिबंध किसने लगाया?

सरदार पटेल ने लगाया ना। लेकिन फिर भी आज संगी जो हैं सारे क्योंकि गुजराती अब चलो छोड़ो यार। ये मेरे बाद की बातें हैं। ये मेरे बाद लोग discuss करेंगे। लेकिन कुल मिलाकर बात यह है कि

कुल मिलाकर बात यह है कि सत्ता की गुलामी छोड़नी पड़ेगी। और हमें बातों के, देखिए हिंदू सत्य को नहीं पसंद करता। हिंदू केवल सत्ता की गुलामी को पसंद करता है। इसलिए आज तक हम जयचंद को गाली देते हैं। जयचंद जो सबसे बड़ा पीड़ित था उस समय का।

जो पृथ्वीराज चौहान का सबसे बड़ा वफादार था। आज भी हिंदू अगर गद्दार किसी को कहता है तो जयचंद को बताता है। ये नहीं कहता कि भाई किसी की बेटी को kidnap करने की जरूरत क्या थी पृथ्वीराज चौहान को? अपने भाई की तो बेटी kidnap कर ली और मोहम्मद गौरी को जिंदा छोड़ दिया।


तुलसीदास ने राम मंदिर का जिक्र नहीं किया

आज मुझे बहुत सारे लोग कहते हैं कि गोस्वामी तुलसीदास जी को अकबर ने बुलाया और उन्होंने जाने से इंकार कर दिया। लेकिन जिन जागीरदार, जिन जमींदारों के पास गोस्वामी तुलसीदास जी रहते थे, जिसमें बनारस में एक बहुत बड़ा नाम था राजा टोडरमल का। यह भूमिहार जमींदार थे भाई साहब।

इनके वंश के ही कुछ लोग बाद में काशी, जो यह काशी का जो राजाओं का परिवार है, इसी वंश से बना भाई साहब। काशी राजवंश ठाकुरों का नहीं है, ब्राह्मणों का है। जानता हूं, जानता हूं।

भूमिहारों का है। भाई साहब खुद राजा, ये टोडरमल के यहां रहते थे। और यह राजा टोडरमल वो नहीं जो नवरत्नों में जिसकी गिनती होती थी। यह दूसरे राजा टोडरमल हैं। और भाई साहब राजा टोडरमल अकबर के गुलाम थे, गुलाम।

पक्की बात, तो उस काल में और उनके धन पर पलने के कारण, गोस्वामी तुलसीदास जी ने अपने पूरे जीवन में इस्लाम के बारे में, इस्लाम के अत्याचारों के बारे में, जो अत्याचार उनके माता पिता पर हुए, उसके बारे में, जो नि-निर्संक हत्याकांड राम जन्मभूमि पर हुआ, उसके बारे में कहीं भी एक शब्द नहीं लिखा।

और कहीं इधर उधर दो चार लाइनें लिख दी हो भाई साहब स्पष्ट सी, तो मैं उसकी चर्चा तो नहीं करता। क्योंकि कुछ लोगों ने मुझे दो चार लाइनें बताई कि भैया तुलसीदास जी की लिखी हुई है, उसमें पीड़ा तो है, लेकिन सत्य संदेश कुछ भी नहीं है।

और भाई साहब, अकबर के, संभवतः अकबर के समय में ही दिल्ली में संतों की एक बहुत बड़ी सभा हुई और उस सभा में धर्मादेश दिया गया। वह धर्मादेश था दिल्लीश्वरोवा जगदीश्वरोवा। जो दिल्ली का अधिपति है, वही हमारा भगवान है।

और यह धर्मादेश किसी मुसलमान ने नहीं, हमारे बड़े बड़े संतों ने इकट्ठे होकर दिया। और उस समय दिल्ली इन अरब के लुटेरों के पास थी। अरब के भी नहीं, टर्की के। अरब तो भाई slightly थोड़े दिनों में समाप्त हो गए थे।

बाद में तो यह जिहाद का सारा ठेका ये टर्киयों ने ले लिया, टर्की के लुटेरों ने ले लिया था। जो अरब के लुटेरों से भी ज्यादा जाहिल और ज्यादा निर्दयी थे। आज भी हमारे कथावाचक, हमारे धर्माचार्य उसी परंपरा का पालन कर रहे हैं।

वैदिक काल स्त्रियां महिलाएं

यह धारणा आधी सच है कि आदि काल में स्त्रियाँ गुरुकुल नहीं जाती थीं। पूरा सच इससे ज्यादा गौरवशाली है।

आदि काल के 2 दौर समझिए -

### 1. वैदिक काल (1500 BC - 500 BC) - तब स्त्रियाँ गुरुकुल जाती थीं

उस समय दो प्रकार की विद्यार्थिनी होती थीं -

*क) ब्रह्मवादिनी -* जो आजीवन ब्रह्म-विद्या पढ़ती थीं, विवाह नहीं करती थीं। ये ऋषि ही बन जाती थीं।
- *लोपामुद्रा, घोषा, अपाला, विश्ववारा* - इन्होंने ऋग्वेद के सूक्त लिखे हैं। ऋषिका हैं।
- *गार्गी, मैत्रेयी* - जनक के दरबार में याज्ञवल्क्य जैसे ऋषियों से शास्त्रार्थ करती थीं।

*ख) सद्योवधू -* जो 15-16 साल तक गुरुकुल / आचार्य के आश्रम में पढ़ती थीं, फिर विवाह कर गृहस्थ बनती थीं।

तब उपनयन संस्कार लड़के-लड़की दोनों का होता था। अथर्ववेद कहता है - _"ब्रह्मचर्येण कन्या युवानं विन्दते पतिम्"_ - ब्रह्मचर्य से ही कन्या योग्य पति पाती है।

### 2. उत्तर वैदिक और स्मृति काल (500 BC के बाद) - तब व्यवस्था बदली

जब गुरुकुल घर से बहुत दूर जंगलों में चले गए, और समाज में बाल-विवाह, बाहरी आक्रमण शुरू हुए, तब लड़कियों को दूर भेजना असुरक्षित माना गया। तब से -

*स्त्रियों की शिक्षा के 3 केंद्र बने -*

*1. घर ही पहला गुरुकुल -* 
माता, पिता, भाई ही गुरु होते थे। मनु ने लिखा है - माता 1000 पिताओं से बड़ी आचार्य है। लड़की को पाकशास्त्र, आयुर्वेद, संगीत, गणित, धर्मशास्त्र माँ सिखाती थी। पिता वेदांग।

*2. अंतःपुर की शिक्षा -*
राजघरानों और श्रेष्ठी परिवारों में आचार्य घर आकर पढ़ाते थे। इसे अंतःपुर-शिक्षा कहते थे। कालिदास के नाटकों में शकुंतला, मालविका सब पढ़ी-लिखी हैं।

*3. पति ही गुरु -*
विवाह के बाद पति को गुरु माना गया। याज्ञवल्क्य ने मैत्रेयी को घर में ही ब्रह्मज्ञान दिया। यही परम्परा बाद में "पति ही पत्नी का गुरुकुल है" बन गई।

*4. कन्या गुरुकुल भी थे -*
पूरी तरह बंद नहीं थे। जैन और बौद्ध काल में भिक्षुणी संघ थे, जहाँ स्त्रियाँ रहकर पढ़ती थीं। विजयनगर साम्राज्य में कन्या पाठशालाओं के शिलालेख मिलते हैं।

तो सार यह है - वैदिक आदि काल में स्त्रियाँ गुरुकुल जाती थीं, बराबरी से वेद रचती थीं। बाद में सुरक्षा और सामाजिक कारणों से शिक्षा का स्थान गुरुकुल से घर में शिफ्ट हो गया, शिक्षा बंद नहीं हुई, उसका रूप बदल गया।

स्वर सिद्धि


गुप्त 'स्वर-सिद्धि' और कार्य-सफलता विधान

यह प्रयोग आपको तब करना है जब आप किसी बहुत ही महत्वपूर्ण कार्य के लिए घर से बाहर निकल रहे हों।

साधना विधि:
जब आप पूरी तरह तैयार होकर घर के मुख्य दरवाजे पर खड़े हों, तो चौखट पार करने से पहले एक क्षण के लिए रुक जाएं।

अपनी दोनों आंखें बंद करें और अपने दाहिने हाथ की उंगलियों को अपनी नाक के दोनों छिद्रों के पास लाएं।

एक गहरी सांस बाहर छोड़ें और महसूस करें कि किस नाक से सांस का प्रवाह तेज चल रहा है— दाहिने (Right) से या बाएं (Left) से।

जो भी स्वर (सांस) उस समय तेजी से चल रहा हो, उसी तरफ के हाथ से अपने उसी तरफ के चेहरे (गाल) को स्पर्श करें और मन ही मन भगवान शिव के परम नाद 'हंस:' (Hamsah) का मात्र 3 बार मानसिक उच्चारण करें। (हंस: वह नाद है जो हमारी हर सांस के साथ अपने आप उत्पन्न होता है)।

अब घर की चौखट से बाहर अपना वही पैर सबसे पहले निकालें, जिस तरफ की सांस (स्वर) तेजी से चल रही थी।

परिणाम: शिव स्वरोदय के अनुसार, जो स्वर उस समय चल रहा होता है, ब्रह्मांड की पूरी अनुकूल ऊर्जा उसी हिस्से में केंद्रित होती है। जब आप उसी पैर को आगे बढ़ाकर 'हंस:' नाद करते हैं, तो आपकी ऊर्जा ब्रह्मांड की गति के साथ पूरी तरह जुड़ (Sync) जाती है। आप जिस भी काम के लिए जाएंगे, सामने वाले का अवचेतन मन आपके प्रभाव में आ जाएगा और वह काम शत-प्रतिशत आपके पक्ष में ही पूरा होगा। बाधाएं आपके रास्ते से खुद हट जाएंगी।


चितपावन ब्राह्मण

ब्राह्मणों में एक ब्राह्मण होते हैं चितपावन ब्राह्मण जो बहुत ही शुद्ध और अपने धर्म के प्रति कट्टर माने जाते हैं। 30 January 1948 को गांधी की हत्या से ठीक 10 दिन पहले यानी 20 January 1948 को गांधी के ऊपर हमला होता है,

जिसमें मदनलाल पहवा नाम के एक व्यक्ति पकड़े जाते हैं। पुलिस की पूछताछ में मदनलाल पहवा, नाथूराम गोडसे जी और नारायण आपटे जी का नाम लेते हैं। पुलिस को सारी जानकारी होती है लेकिन पुलिस चुपचाप बैठ जाती है। उसके बाद आता है वह दिन 30 January,

1948 की शाम 5:17 पर नाथूराम गोडसे जी द्वारा गांधी के सीने में तीन गोलियां उतार दी जाती हैं और उसके बाद पूरे महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश में यह बात फैल जाती है कि नाथूराम गोडसे एक चितपावन ब्राह्मण हैं

और उन्होंने ही गांधी की हत्या की है। सोचिए उस जमाने में ना Twitter था, ना Instagram, ना Facebook, ना WhatsApp, ना ही कोई संचार का कोई ऐसा माध्यम। फिर यह बात पूरे भारत में फैलती है और उसके बाद कांग्रेसियों और गांधीवादी विचारधारा के

लोगों द्वारा पूरे देश में से चितपावन ब्राह्मणों को खोज-खोज कर निकाला जाता है। घरों से खींच-खींच कर निकाला जाता है और सड़कों पर घसीट कर जलाकर मार दिया जाता है। उसके बाद उनके मां बहनों के साथ अत्याचार किया जाता था।

महाराष्ट्र के कपस नाम के गांव में दो ऐसे भाई थे जिनका सरनेम गोडसे था। उनको चारपाई में बांधकर जलाकर गांधीवादी विचारधारा के लोगों ने मार दिया। सोचिए जो गांधी अपने जीते जी लाखों लोगों को मरवाया, जो गांधी मरने के बाद हजारों लोगों को मरवाया तो इस भारत में पता नहीं क्यों लोग उसे महात्मा का दर्जा देते हैं।

यह दुर्भाग्य है इस भारत का। हर हर महादेव।

Friday, 28 August 2026

अंबेडकर का झूठ और शूद्र

लाल किताब है ज्योतिष निराली, जो किस्मत सोई को जगा देती है। और लाल किताब एक ऐसी किताब है आज के युग की, जिससे कि आप किसी भी समस्या का हल ले सकते हैं। हां, यह मैं नहीं सौ percent नहीं कह सकता। जो भी आपको सौ percent कहेगा कभी भी, वह झूठ बोलता होगा।

जो मैं सोचता हूं। तो तालीम, विद्या या education, यह बड़ी जरूरी है life में। तो बच्चे का या व्यक्ति जो भी हो तालीम क्योंकि कभी मुकम्मल नहीं होती। चाहे वह बचपन में है, चाहे वह जवानी में, चाहे बुढ़ापे में। तालीम का जो process है वह चलता ही रहता है।

विद्या का, पढ़ाई का, education का। तो तालीम पर लगाया हुआ क्या पैसा को investment करते हैं हम। यह विद्या पर भी पैसा लगाया आजकल investment ही है। तो क्या इसको वापस कैसे लाना है? क्या आपने जितना पैसा लगाया है उससे कई multiplication होकर वह multiply होगा,

सौ गुना हो जाए, हजार हो जाए, लाख हो जाए, उससे ज्यादा हो जाए तो वह क्या आपको वापस मिलेगा कि नहीं मिलेगा? तो लाल किताब में लिखा है कि चंद्रमा से भी हम तालीम, विद्या का, education का पता कर सकते हैं। बृहस्पति इसका देवता है।

मगर चंद्रमा अगर ठीक हो तो बृहस्पति से भी लाभ लिया जा सकता है। तो तालीम पर लगाया पैसा अगर किसी व्यक्ति का चंद्रमा number एक में है, कुंडली के खाना number एक। राशि छोड़ नक्षत्र भूला ना ही कोई पंचांग लिया। राशि नहीं देखनी।

पहले खाने में हो, पहले भाव में हो, कुंडली के लग्न में हो तो कभी खाली नहीं जाता पैसा लगाया हुआ। वापस आएगा ही आएगा। क्योंकि इसको लगाने के बाद आपने जो विद्या प्राप्त की है उससे आपको लाभ हो ही होगा।

कारामत, मदद। तालीम लिखा हुआ है कि इससे अच्छी तालीम मिलेगी जो कारामत होगी, आपको अच्छा लाभ देगी। तो घर में रखे हुए घड़े का, बर्तन का पानी कहा गया है। क्योंकि चंद्रमा पानी भी है तो पानी कहा गया है।

पानी इसलिए कहा गया है कि चंद्रमा जो है धरती माता भी है, पानी भी है। और यह दोनों ही चीजें जो हैं, यह बड़ी जरूरी है इंसान की life के लिए। तो इसमें घड़े का पानी क्यों कहा गया चंद्रमा पहले को?

क्योंकि घड़े का पानी होता है जब मर्जी उठाकर आप अपने घर में glass भरें और पी लें। मतलब you can use it, इस्तेमाल कर सकते हैं। इसका मतलब है जो विद्या आपने प्राप्त की है उससे आपको लाभ हो ही होगा। ऐसी बात नहीं है कि भाई लाभ नहीं होगा।

यह note कर लें। number दो में अगर भाव में किसी के चंद्रमा है तो पहाड़ से निकलता शह-जोर उम्दा पानी। माता के रहते-रहते कहता है तालीम उत्तम फल ही देगी। जितनी देर माता की इज्जत करता रहे, माता के पांव छूता रहे,

माता की सेवा करता रहे तो तालीम, विद्या जो है, पढ़ाई जो है उससे लाभ होगा ही होगा। number तीन में किसी का चंद्रमा है। अच्छा होता है। भाई बहनों के घर में है,

उनसे प्यार भी रहता है तो रेगिस्तान का पानी इसको कहा गया है। जिस कदर तालीम बढ़ती जावे, पिता की आय कम होती जाए। अब देखिए इसमें पिता का संबंध कहां से आ गया तीसरे खाने का। क्योंकि दसवां खाना जो है पिता का है। और छठी दृष्टि और आठवीं दृष्टि से चंद्रमा देखता है।

चंद्रमा तीसरे, तीसरे में भाई बहनों के लिए तो ठीक है। मगर पिता को अगर तालीम लेगा तो लिखा हुआ है थोड़ी खराबी करेगा। और पढ़ाई रुकेगी उसकी। अगर रुक भी जाए तो दोबारा चालू हो जाएगी। ऐसा नहीं है कि पढ़ाई बिल्कुल ही खत्म हो जाएगी।

और जब तक केतु कुंडली में उम्दा हो तो ना पिता को नुकसान तो ना जो है उसकी पढ़ाई में रुकावट आए। और उसकी पढ़ाई से लाभ भी रहेगा, रहेगा। अब चौथे भाव में किसी के चंद्रमा है तो चश्मे का पानी मीठा हरदम मुबारक लिखा हुआ है।

माता के असली खून का सबूत होगा। माता की तालीम अच्छी हो तो उत्तम फल मिलेगा। माता अगर ज्यादा पढ़ी लिखी नहीं है तो उत्तम फल कम होगा। मगर फिर भी चश्मे का पानी कहा गया है तो उत्तम फल तो हो ही होगा।

चंद्रमा जो है आपके बच्चे को पढ़ाई अच्छी देगा। अगर पांचवे भाव में किसी के चंद्रमा है तो लिखा हुआ है आबादी के अंदर का दरिया का पानी। मतलब जैसे कोई नदी है जो कि शहर के अंदर से होकर गुजरती, गुजरती है या आपके गांव के पास से

होकर गुजरती है तो यह वह पानी है। आबादी के अंदर का दरिया। और तालीम पर लगाया हुआ जो पैसा है, अगर आप तालीम पर पैसा लगाते हैं तो पूरी लिखा हुआ है वह ज्यादा उसका लाभ नहीं प्राप्त हो सक,

हो सकता है। खुद, खुद को बजाते खुद उसको लाभ नहीं होगा। मगर ऐसे बच्चे या ऐसे आगे जब वह बड़ा हो जाता है उस व्यक्ति की। जिसका चंद्रमा पांचवें में है उसके बच्चों की तालीम बड़ी अच्छी रहेगी और technical degree वो प्राप्त कर सकते हैं।

अगर उनकी हो तो technical degree जो है वो प्राप्त करते हैं। अअ मतलब कोई भी mechanical है, engineering line है, like that। और अगर छहवें में हो तो पताल, पताल का पानी कह दिया गया है कि मगर hand pump का पानी कारामद लिखा हुआ है,

अच्छा फल देने वाला है और तकलीफें तो आएंगी। अगर आपका चंद्रमा छठे भाव में है, तकलीफें तो आएंगी मगर आप overpower कर सकते हैं। तकलीफों के बावजूद भी आपकी विद्या जो है वो अच्छा लाभ ही देगी आपको। अगर सातवें में है, सातवें भाव में कुंडली के,

आपका राशि नहीं देखनी, कुंडली के सातवें भाव में है तो खेती का, जमीन का पानी, मैदान का पानी कहा गया है। जमीन का मतलब खेती की जमीन को जो पानी लगते हैं। कि शादी होने से पहले तालीम पूरी कर लेगा। ऐसा शख्स, ऐसा जो शख्स है खुद लक्ष्मी अवतार होगा।

मगर तालीम जो है वो ज्यादा कारामद नहीं होगी। ज्यादा कारामद नहीं होगी मगर फिर भी कुछ ना कुछ उसको लाभ देगी। तो अगर आठवें में कहा गया है आबे हयात वरना जहर खाली। यहां तो बहुत ही उत्तम, यहां बहुत ही मंदा। तालीम zero या तालीम जो है पूरी तरह से

highest degree जो है वो ले सकता है और उस तालीम से फायदा भी होगा। मगर तालीम बढ़ती जाए तो माता का कष्ट भी बढ़ता जाए। इसलिए माता के कष्ट के लिए चंद्रमा आठ का उपाय जो है वह करते रहना चाहिए। पितरों के नाम पर दूध देना चाहिए।

श्मशान के कुएं का पानी घर में रखना चाहिए। ये तो आगे उपाय है ना जी, कि आगे देखना पड़ता है उसका टकराव दूसरे घर में है, दूसरे घर से छठे घर को है आठवें का, तो वो देखना पड़ेगा कि वो क्या फल देता है।

मगर तालीम पर जो है वो उसका ध्यान ना देगा। अपनी तालीम पर देगा तो औलाद की पर नहीं देगा। बेफिक्रा सा हो जाएगा। कोई बात नहीं मेरा बच्चा पढ़ रहा है तो कोई, कोई ऐसी बात नहीं, नहीं पढ़ रहा तब भी कोई बात नहीं।

अब नौवें में हो तो सागर सबसे उत्तम, आराम देने वाली तालीम। इंद्र राजा की तरह सबका पालनहारा कहा गया है। इसके बाद दसवें में अगर चंद्रमा हो किसी का तो पहाड़ों की रुकावट में बना, बनाया हुआ पानी जैसे आप कह सकते हो dam।

आजकल dam जो हैं वो पहाड़ों को बीच में जहां पर ज्यादा पहाड़ आसपास हो उसके बीच में वो पानी इकट्ठा करके बाद में जब जरूरत होती है तो वो वहां पर उधर भेज देते हैं। चाहे खेती के लिए, चाहे और किसी काम के लिए।

तो कम फायदा। मगर वो हकीम जो हो तो बड़ा अच्छा है। डॉक्टरी line adopt कर ले अच्छा है। डॉक्टरी सहायता के लिए जो साथ में worker होते हैं, सहायक होते हैं, assistant हैं, वो काम कर ले तो बड़ा अच्छा है।

जैसे कोई surgery कर रहा है doctor से, उसका assistant बन जाए। उसका काम जो है वो हकीमी और डॉक्टरी के संबंधित हो तो अच्छा फल ही मिलेगा उसको। अब अगर ग्यारह में किसी का है। ग्यारहवें भाव में किसी का है चंद्रमा तो बरसाती लाला कहा गया है।

तो पढ़ेगा तो पूरा, अगर नहीं पढ़ेगा तो अनपढ़ हाफिज तो जरूर होगा। अनपढ़ भी हो मगर उसको knowledge पूरी होगी कि क्या काम करना है, किस बात में कैसे। जैसे कई लोग जो हैं उनके पास degree नहीं होती। वैसे education का मतलब ही यही है कि degree ना

भी हो आपको कोई उसका हुनर तो होना चाहिए। आपका दिमाग ठीक चलना चाहिए तो ग्यारह वाले व्यक्ति का ऐसा दिमाग चलेगा। अगर बारहवें में हो किसी का चंद्रमा तो आसमानी पानी कहा गया है ओले। ओले जो पड़ते हैं गड़े, बर्फ। अगर शनि, राहु, केतु कुंडली में मंदे तो तालीम का फायदा ना होगा।

और श-शनि जहां है मंदा कहां पर होगा? पहले भाव में ज्यादातर मंदा माना जाता है। नीच राहु जो है वो बारहवें में, केतु छठे में। तो ये हो तो तालीम से पूरा फायदा न होगा पर पढ़े-लिखे का बाप भी होगा।

इसलिए अ-लाल किताब में इसके उपाय भी दिए गए हैं। हर एक अ-अगर तालीम प्राप्त नहीं हो रही बच्चे की तो उसमें बृहस्पति और चंद्रमा को देखकर ही उपाय बताए जा सकते हैं। मगर चंद्रमा को उत्तम करने का सिर्फ एक ही उपाय है

आपके पास कि बड़े बुजुर्गों से आशीर्वाद लेते रहे। उनसे झुककर उनको सलाम करें, उनको, उनको नमस्ते करें, उनको सत श्री अकाल करें, उनको अपनी भाषा में जो भी है उनका regard करें

और तो आप जाकर आपको लाभ इसका मिल सकता है। सत श्री अकाल।

मनु स्मृति शूद्र वेद

वेदों को सुनने पर कान में पिघला सीसा डालने की गप्प सुनाने वालो, सीसे को पिघलाने की प्रक्रिया भी होती होगी? 

उस काल में सीसा पिघलाने के लिए धातु-कर्मी (metalsmith) और विशेष भट्टी चाहिए। क्या प्रत्येक ग्राम में यह व्यवस्था होती थी? 

क्या जब भी कोई शूद्र वेद-श्रवण करता तब तुरन्त सीसा पिघलाने की व्यवस्था होती थी? 

सीसे की तरल अवस्था कैसे बनाए रखी जाती थी? 

सीसे का गलनांक (Melting Point) 327.5 डिग्री सेल्सियस है। अर्थात् इसे पिघलाने के लिए इतना तापमान चाहिए।मानव शरीर का सामान्य तापमान 37 डिग्री सेल्सियस है।कान की नलिका (Ear Canal) की लम्बाई लगभग 25-35 मिलीमीटर और व्यास लगभग 7-9 मिलीमीटर है।

सीसे को 327 डिग्री से ऊपर रखना और उसे कान तक ले जाना — यह प्रक्रिया अत्यन्त जटिल है। कोई भी धातु-पात्र जिसमें इसे लाया जाए, वह स्वयं अत्यन्त गर्म होगा।

कोई भी व्यक्ति इस प्रक्रिया में सहयोग कैसे कर पाता होगा । उसे पकड़ा कैसे जाता होगा।

यदि यह दण्ड नियमित रूप से दिया जाता तो 
इसके साक्ष्य होते। धातु-कर्मियों का उल्लेख होता। दण्ड-प्रक्रिया का विवरण होता। पीड़ितों के नाम होते। कोई अभिलेख नहीं, कोई दरबारी इतिहास नहीं, कोई यात्रा-वृत्तान्त नहीं जो यह कहे कि किसी विशेष व्यक्ति के कानों में पिघला सीसा डाला गया।

क्या ऐलूष ऋषि के कानों में यह सीसा पड़ा जिनके बारे में ऐतरेय ब्राह्मण (2.19) में स्पष्ट उल्लेख है कि ये दासी के पुत्र थे, पिता जुआरी और निम्न चरित्र के थे, जिन्होंने ऋग्वेद पर शोध किया और ऋषियों ने इन्हें आचार्य-पद दिया? 

क्या वत्स ऋषि के कानों में यह सीसा पड़ा जिनके बारे मे ऐतरेय ब्राह्मण (2.19) में उल्लेख है कि ये शूद्र से उत्पन्न हुए और ऋषि बने? 

ये सत्यकाम के कानों में सीसा गिराया गया क्या? 

या कुक्षीवत के? 

या महीदास के? 

या पैजवन के ?

या मातंग ऋषि के?

या गृत्समद के? 

या वीतहव्य के? 

या गृत्संमति के?

ये सब तो वेदपरायण शूद्र ऋषि थे। इनके कान कैसे सुरक्षित रह गये? 

ये विदुर कैसे ऋषितुल्य हो गये?

क्या मध्यकाल के इतने सारे शूद्र संतों के कानों में सीसा पड़ा जो वेदमार्ग नहीं छोड़ने के लिए इतने प्रतिबद्ध थे? वेद धर्म छोडूं नहीं चाहे गले चले कटार। 

ऐतिहासिक स्तर पर जिसके क्रियान्वयन का एक भी साक्ष्य नहीं, Narratological स्तर पर जो दण्ड नियमित रूप से दिया जाना बताया जा रहा उसके कोई precise details नहीं, न पीड़ितों के नाम, न स्थान, न काल, न प्रक्रिया, भौतिकी के स्तर पर जिसकी प्रक्रिया इतनी जटिल और अव्यावहारिक है कि नियमित दण्ड के रूप में जिसका उपयोग असम्भव था।

और शूद्र को वेद-श्रवण से स्थायी रूप से वंचित करना ही उद्देश्य होताअर्थात् कानों को बहरा करना तो इसके लिए पिघला सीसा जैसा अत्यन्त जटिल, महँगा, दुर्लभ और अव्यावहारिक उपाय क्यों बताया जाता? 

यदि लक्ष्य केवल बहरापन था तो उस काल में क्या सरल उपाय जैसे तेज आवाज़, कान में नुकीली वस्तु, ठंडा पानी अत्यधिक मात्रा में, कुछ वनस्पतियाँ आदि क्या उपलब्ध नहीं थे? इनमें से कोई भी विधान में क्यों नहीं है।

और यदि उद्देश्य ज्ञान से वंचित करना था, तो उसके लिए बहरा बनाना कभी भी पर्याप्त नहीं होता। बहरा व्यक्ति भी देख सकता है, पढ़ सकता है, स्मृति रख सकता है।

यहाँ तो महाकाव्यों को सुनने पर जैसे अन्य वर्णों की फलश्रुति है वैसे शूद्र की। 

यह कहीं ऐसा तो नहीं था कि जैसे मि श न री अपने यूरोप की हत्यारी सचाई जिसमें देशी भाषा में बाइबिल लिखने पर मृत्युदंड था और जिसके ढेरों उदाहरण हैं, छुपाने के लिए हमारे दो ग्रंथों में ऐसे प्रक्षेप करवा दिए? खुद जिनके यहाँ ज्ञान का उत्पादन और संरक्षण पूरी तरह चर्च के हाथ में था, जहाँ Scriptorium (मठों में लिखाई-कक्ष) में केवल चर्च भिक्षु ही पांडुलिपियाँ नकल करते थे, जहाँ छपाई मशीन (Gutenberg, 1440s) आने के बाद चर्च ने Imprimatur ("छापने की अनुमति") की व्यवस्था बनाई कि बिना चर्च की मुहर के कोई किताब नहीं छप सकती थी- उन्होंने भारत के ब्राह्मणों को अपनी छवि में वैसे ही गढ़ा जैसे उनके हिसाब से गॉड ने आदमी को अपनी छवि में गढ़ा था? 

क्योंकि हमारे यहाँ तो ‘विद्या बाँटने से बढ़ती है’ की मान्यता है-अपूर्वः कोऽपि कोशोऽयं विद्यते तव भारति। व्ययतो वृद्धिमायाति क्षयमायाति सञ्चयात्॥"कि हे सरस्वती माता! आपका विद्या रूपी खजाना अद्भुत है, जो व्यय (खर्च/बांटने) करने से बढ़ता है और संचय (इकट्ठा/छिपाकर रखने) करने से कम होता है। 

इसलिए पेटेंट और इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी राइट्स के विचार भारत में जन्मे ही नहीं।

मुझमें उनमें फर्क इतना ही है। उनका हमारे पुराणों में भरोसा नहीं। मेरा अंग्रेजों और उनके पिट्ठुओं द्वारा गढ़े गये मिथकों में भरोसा नहीं।

कोलंबिया यूनिवर्सिटी से ग़लतफहमी शुरू हुई तो उसे ले उड़े भाई। स्वयं मनुस्मृति पढ़ने की ज़हमत न उठाई गई।

यह तो आम्बेडकर ने Annihilation of Caste में लिखा — "मनुस्मृति शूद्र के लिए जीभ काटने या कानों में पिघला सीसा डालने जैसे भारी दण्ड निर्धारित करती है।" - That is why the Manu-Smriti prescribes such heavy sentences as cutting off the tongue, or pouring of molten lead in the ears, of the Shudra who recites or hears the Veda.” यह लिखा उन्होंने। वास्तव में मनुस्मृति में ऐसा कोई दण्ड विधान नहीं है। उन्होंने यह Columbia University के एक शैक्षणिक स्रोत से उद्धृत किया। फिर उन्होंने महाड सम्मेलन ( 1927) में घोषणा की कि मनुस्मृति — जो शूद्रों के वेद सुनने या पढ़ने पर कानों में पिघला सीसा डालने का निर्देश देती है — को सार्वजनिक रूप से जला दिया जाए। तब शशरबुधे, राजभोज और थोराट ने प्रस्ताव पास करवाया: “The Manusmriti which directed molten lead to be poured into the ears of such Shudras as would hear or read the Vedas… be publicly burnt.”
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रक्षाबंधन पर रक्षासूत्र

रक्षाबंधन पर रक्षासूत्र सबसे पहले भगवान शिव, हनुमानजी और ग्रामदेवता को बाँधना चाहिए। इसके बाद घर के गौवंश (गाय, बैल, बछड़ा) को, फिर गाड़ी एवं भारी सामान या मशीनों को, तत्पश्चात धार्मिक ग्रंथों को और अंत में घर के सदस्यों (भाई-भाभी ) को रक्षासूत्र बाँधने की बारी आती है।

Thursday, 27 August 2026

मुल्ला और मंदिर विध्वंस

जानती हो हमारे मंदिर अगर केवल मूर्तिपूजा के केंद्र होते और तोड़े जाते तो वजह समझ आती पर हमारे मंदिर तो हमारे लिए नृत्य कला को, ललित कला को, चित्र कला को, मूर्ति कला को, वास्तु कला को , रोजगार को, प्रकृति को, संस्कार और संस्कृति को संरक्षण देने के केंद्र भी थे।

मुल्तान का भव्य सूर्य मंदिर, कश्मीर का मार्तंड सूर्य मंदिर, महोबा का सूर्य मंदिर, कोणार्क का सूर्य मंदिर, सूदूर पूर्वोत्तर के भुवन पहाड़ी पर बसे शिव मंदिर, 52 शक्तिपीठ, चार धाम और द्वादश ज्योतिर्लिंग, तमिलनाडु और दक्षिण के हम्पी आदि क्षेत्रों के भव्य मन्दिर से लेकर जावा, सुमात्रा, अंकोरवाट और बोरोबदूर के भव्य मंदिर ये सब हमारे लिए केवल मूर्तिपूजा के केंद्र नहीं थे बल्कि विश्व के सर्वोत्कृष्ट सभ्यता के हस्ताक्षर थे। 

हमारे ये मंदिर हिंदू एकात्मता और सहभागिता के भी सेंटर थे क्योंकि इनके निर्माण के लिये क्षत्रिय राजाओं ने लिए भूमि और संरक्षण दिये थे, ब्राह्मणों ने इसमें प्रतिष्ठित ईश्वर के लिए स्तुति और वंदनायें रची थी और कठोरता से शुचिताओं का पालन करते हुए इसकी पवित्रता को अक्षुण्ण रखा था। वैश्यों ने इसके निर्माण के लिए धन दिया था और आने वाले तीर्थयात्रियों के लिए धर्मशालाएं बनवाई, प्याऊ लगवाए थे और शूद्रों ने इन मंदिरों को वो वास्तु दी थी कि दुनिया आज भी विस्मित होकर दांतों तले अंगुली दबाए हैरान खड़ी है।

इसीलिए जब नोबेल विनर नायपॉल मार्तंड सूर्य मंदिर के ध्वंस स्तंभों के पास जाकर व्यथित हो गए थे तो वो व्यथा केवल एक मंदिर टूटने की व्यथा नहीं थी बल्कि वो व्यथा थी स्थापत्य के एक बेजोड़ नमूने के टूटने की जिसके पीछे उस समय के अभियंताओं का श्रेष्ठ मस्तिष्क और कारीगरों की श्रेष्ठ कला सम्मिलित थी। वो व्यथा थी उस मन्दिर में प्रांगण में उकेरी कर मूर्ति और चित्रों को रौंदे जाने की जो किसी मूर्तिकार और चित्रकार के जीवन भर का समर्पण था। वो व्यथा थी ज्ञान के उस केंद्र के ध्वंस का जिसे भारत भर के न जाने कितने ही ब्राह्मणों ने अपने तप और अनुष्ठान से सींचा था। वो व्यथा थी उस अर्थ तंत्र के तोड़े जाने की जो उस मन्दिर के कारण वहां बना हुआ था। वो व्यथा थी उस स्थल के ध्वंस की जो भारत की सांस्कृतिक एकबद्धत्ता का प्रमाण था। वो व्यथा थी कृतज्ञता ज्ञापन के उस प्रतीक के ध्वंस का जिसे हमारे पूर्वजों ने सृष्टि के संचालक और प्रकृति के रक्षक सूर्य नारायण की आराधना के लिए बनाया हुआ था।

और इसलिए जब वी एस नायपॉल ने भारत को एक "आहत सभ्यता" नाम दिया था तो उसकी वजह यही थी कि बर्बर आक्रांताओं के हमलों ने भारत की सभ्यता को ही लहूलुहान कर दिया था जिससे भारत को उबारना हमारे जैसों के जीवन का ध्येय है।


बानर बंदर बंदरगाह

वानर-वन का अर्थ वृक्षों का समूह है, पर इसका अर्थ जल-भण्डार रूप में समुद्र भी है-
बांध्यो वननिधि नीरनिधि जलधि सिन्धु वारीश। सत्य तोयनिधि कम्पति (कम् = जल) उदधि पयोधि नदीश॥ 
(रामचरितमानस, लङ्काकाण्ड, ५)
जो वननिधि में यात्रा कर सकता है, वह वानर है। आज भी समुद्री जहाज लगने का स्थान बन्दर कहते हैं-जैसे पोरबन्दर (गुजरात), बोरीबन्दर (मुम्बई), बन्दर श्रीभगवान् (बोर्निओ), बन्दर अब्बास (इरान)। रावण पर आक्रमण के लिये सिंगापुर तथा अन्य बन्दरगाहों पर कब्जा आवश्यक था।

शूद्र दलित


19वीं शताब्दी में एक अँग्रेज मिशनरी ने दलित वर्ग की कल्पना की। दलित को शूद्र से जोड़ा गया कि शूद्र दलित है, इसके आगे शूद्र को अनार्य से जोड़ा गया कि शूद्र अनार्य है और अनार्य को दलित से जोड़ा गया। 
इस प्रकार दलित सताने का 3000 वर्ष पुराना ऐतिहासिक क्रम बन गया।
बुनकरों का अँग्रेज ने हाथ काटा, उनके उद्योग को नष्ट कर भारत में अपने वस्त्रों का बाजार बनाया। 
इस इतिहास को ढ़कने के लिए एकलव्य के अँगूठा काटने की कहानी प्रचलित की गई, 
गोवा में हथकट्टा खंभा आज भी खड़ा है, उसकी क्रूर कहानी प्रचारित नहीं होने दी गई। 
क्योंकि अँग्रेज और पुर्तगाली रिस्तेदार हैं। अँग्रेजी राज में पुर्तगाली राज ने बेटी व्याही, अँग्रेज को दहेज में मुंबई दे दी। 
न हथकट्टे खंभे का और न बुनकरों के हाथ काटने का इतिहास पढ़ाया और न इस तथ्य को चर्चा में आने दिया गया।
एकलव्य का अँगूठा काटे की कहानी फैलायी गया। 
इनका उद्देश्य स्पष्ट है कि हिन्दू को तोड़- फोड़कर रखना है।
भारत कहने के लिए स्वतंत्र है। 
यहाँ चलती किसकी है? 
सेंट जेवियर की, मैकाले की, कामरेडों की, विदेशी विधर्मियों की। 
इन्हीं के मोहरे नैरेटिव खेला करते हैं। 3000 वर्षों से दलित, शूद्र , अनार्य सताए जाते रहे।
गाँधी वध के बाद 10, 000 पुणे में और पुणे के आसपास नगरों में हजारों ब्राह्मण का नरसंहार हुआ। 
किन लोगों ने किया यह नरसंहार? लोग कहते हैं काँग्रेसी गाँधी भक्तों ने। वे काँग्रेसी कौन लोग थे? 
अज्ञात हैं, उनकी खोज क्यों नहीं की गयी? इंदिरा गाँधी की हत्या काल में 3000 सिक्खों का नरसंहार हुआ उस मुकद्दमा चला, न्याय हुआ। 
पुणे में ब्राह्मण नरसंहार हो या काश्मीर में ब्राह्मण नरसंहार इन दोनों में केस का FIR तक नहीं हुआ।
 क्यों? 
महाराष्ट्र का इतिहास उत्तर भारत में दुहराने की कोशिश हो रही है। उत्तर प्रदेश, बिहार में अबेडकर की महार जाति का बामन मेश्राम जहर उगल रहा है। आत्मरक्षार्थ रणवीर सेना कमर कसने लगी है।

ऐसा लगता है कि भारत को एक बार फिर स्वाधीनता का संघर्ष करना होगा, अँग्रेज के उन मुहरों के खिलाफ संघर्ष करना होगा जो घूम- घूमकर जहर उगल रहे हैं।

Wednesday, 26 August 2026

भारत की अधिकतम जातियां या तो म्लेच्छ है या तो

भारत की अधिकतम जातियां या तो म्लेच्छ है या तो बाहर से आए हुए गुलामो से उपजी है । जैसे कि शक, हूण, सिद्दी, क्रिसाई, यहूदी, पारसी, मुगल और मंगोलियाई आदि साथ ही कुतुब, तुगलक, बहनवी, आदिलशाही, पश्तून (लोध) आदि ।। 

इसलिए इनमें देश के गुलामी विरुद्ध भाव आना संभव न है। इसलिए यह देश के मर मिटने से दूर भागते है । उन्हें बस इससे मतलब है कि इनकी रोजी रोटी चलती रहे, इन्हें मतलब नहीं की सत्ता में कौन है, शासक का धर्म व आइडियोलॉजी क्या है आदि आदि । तो या तो ये जातियां वर्णसंकर संबंधों से उपजी है या फिर उन्हीं के यहां गहन नौकरी में रही है । 

इनके अंदर #anti_brahman आइडियोलॉजी इनकी जेनेटिक आइडियोलॉजी हो चुकी है तो अगर ये जातीय कभी शासक भी बनी तो इनका मूल स्वभाव प्रजा हितैषी शासक न होकर या तो किसी का गुलाम बनना होगा या फिर लूटपाट जो कि इनके जेनेटिक में है। 

अतएव ऐसे लोगों को या तो आप इनके मूल कार्य की ओर लौटाओ या फिर इनसे दूरी बना लो अन्यथा आपका पतन निश्चित है ।

अगर कोई इस बात से इंकार करता है कि नहीं नहीं ऐसी जातियां इस देश में नहीं है तो उससे पूछिए कि शक, हूण, सिद्दी, अरब के लाये गुलाम, ब्रिटिश, फ्रांसीसी, पुर्तगाली आदि स्वयं व उनके गुलाम किधर है? 

किधर है तुगलकशाही, कुतुबशाही, निजामशाही आदिलशाही के संपर्क से उपजे लोग व उनके बनाए हुए गुलाम व नौकर ?

किधर है मंगोलियाई लोग आदि ?

ब्राह्मण समाज सुधारक

केशव कर्वे, ईश्वरचंद्र विद्यासागर, राजा राममोहन राय, गोपाल हरि देशमुख, पंडित रमाबाई, रानाडे, विनोबा भावे, दयानंद सरस्वती जैसे लोगों ने जो उच्च वर्ग से आते थे, ने समाज सुधार में अपनी अग्रणी भूमिका निभाई। 


Tuesday, 25 August 2026

सनातन शब्द

अथर्ववेद (10.8.28): "सनातनमेनमहुरुताद्य स्यात् पुनर्णवः" — "उसे (परमात्मा को) सनातन कहते हैं, जो आज भी नया है और सदैव नवीन रहता है।"
2. श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण में प्रयोग
रामायण में 'सनातन' शब्द का प्रयोग मुख्य रूप से शाश्वत धर्म (नियम/कर्तव्य) के लिए हुआ है:
अयोध्या काण्ड (18.31): "एष धर्मः सनातनः" — माता-पिता और गुरु की आज्ञा का पालन करना सनातन धर्म है।
सुन्दर काण्ड (15.51): "आनृशंस्यं परो धर्मः त्वमेवं धर्मवित् सनातनः" — दया और क्रूरता न करना ही परम और सनातन धर्म है।
3. महाभारत में प्रयोग
महाभारत में सैकड़ों बार 'सनातन' शब्द का उल्लेख मिलता है:
भगवद्गीता (2.24): "अच्छेद्योऽयमदाह्योऽयमक्लेद्योऽशोष्य एव च। नित्यः सर्वगतः स्थाणुरचलोऽयं सनातनः॥" — यहाँ श्री कृष्ण आत्मा को 'सनातन' (अजर-अमर और शाश्वत) कहते हैं।
भगवद्गीता (14.27): श्री कृष्ण को "शाश्वतस्य च धर्मस्य" और "सनातनः" कहकर संबोधित किया गया है।
अनुशासन पर्व: "अहिंसा परमो धर्मः... अहिंसा सत्यमणु सनातनम्" — अहिंसा और सत्य को सनातन धर्म कहा गया है।
4. उपनिषद और स्मृति ग्रंथों में
मनुस्मृति (2.138): "सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयात् न ब्रूयात् सत्यमप्रियम्। प्रियं च नानृतं ब्रूयात् एष धर्मः सनातनः॥" — (सत्य बोलो, प्रिय बोलो... यही सनातन धर्म है।)
कठोपनिषद (2.2.8): परमात्मा और ब्रह्म के स्वरूप को सनातन बताया गया है।

मनु स्मृति और महिलाएं

जब #मनुस्मृति थी तब #सावित्री ने अपने माता-पिता की मर्जी के बिना #सत्यवान के साथ विवाह किया था 
जब मनु स्मृति थी तब माता #सीता ने #स्वयंवर के माध्यम से 
अपना वर भगवान #राम को चुना था 
जब मनु स्मृति थी तब #गार्गी ने #वेदों की रचना में अपना योगदान दिया था 
जब मनु स्मृति थी तब #आपला और #घोषा ने #ऋग्वेद के 
दशम मंडल में सूक्त की रचना की थी 
जब मनुस्मृति थी तो #मंडन मिश्र की पत्नी #भारती ने अपने पति 
और शंकराचार्य के मध्य #शास्त्रार्थ के निर्णायक के पद को स्वीकार किया था और अपने पति की के विरुद्ध #निर्णय देने का काम किया था 
जब मनु स्मृति थी तो #शंकराचार्य जी का भारती के साथ-साथ शास्त्रार्थ हुआ था और शंकराचार्य जी ने उनकी विदुता का लोहा माना था 
जब मनु स्मृति थी तो एक #गड़रिये की बेटी अहिल्या का विवाह 
एक राजा के पुत्र के साथ हुआ था
जब मनु स्मृति थी तो एक नारी #देवीअहिल्या ने अपने राज्य का संचालन किया था जिसकी मिसाल आज भी दी जाती है 
जब मनु स्मृति थी तो #जीजाबाई ने #शिवाजी जैसे पुत्र का पालन पोषण करके उन्हें योग्य बनाया था जिन्होंने #हिंदीस्वराज की स्थापना की थी
जब मनुस्मृति थी तो #रविदास जी को #क्षत्रियों ने अपना गुरु बनाया था #मीराबाई ।
जब मनुस्मृति थी तो राजा के साथ राज सिंहासन पर उसकी पत्नी साथ में बैठती थी और राजकाज में अपनी भूमिका का निर्वाह करती थी
जब मनु स्मृति थी तो 22 महिलाएं #ब्रह्मवादिनी के रूप में जानी जाती थी
जब मनु स्मृति थी #लक्ष्मी बाई ने बचपन में ही #युद्ध कौशल सीखा था और बाद में युद्ध के मैदान में अंग्रेजों के को पराजित किया था 
जब मनुस्मृति थी तो भारत की #संविधान सभा में 15 महिला है बिना किसी #आरक्षण के चुनकर आई थी जिसमें #वंचित समाज की भी महिलाएं थी
लेकिन जब संविधान से व्यवस्थाएं संचालित होती हैं तो भारत में महिलाओं को उनका प्रतिनिधित्व देने के लिए आरक्षण की व्यवस्था करनी पड़ रही है
#मनस्मृति

पतिमङ्गलस्तोत्रं

पतिमङ्गलस्तोत्रम् -
*नमः कान्ताय भर्त्रे च शिवचन्द्रस्वरूपिणे। नमः शान्ताय दान्ताय सर्वदेवाश्रयाय च ॥ १॥

हे प्रिय पति! हे शिव और चन्द्रमा के समान स्वरूप वाले पति! आपको नमस्कार है। हे शान्तस्वरूप और जितेन्द्रिय! तथा समस्त देवताओं के आश्रयभूत पति! आपको नमस्कार है।

*नमो ब्रह्मण्यरूपाय सतीप्राणपराय च। नमस्याय च पूज्याय हृदाधाराय ते नमः ॥ २॥

ब्रह्मस्वरूप पति को नमस्कार है। पतिव्रता स्त्री के प्राणों के परम आश्रयभूत पति को नमस्कार है। हे नमस्कार और पूजा के योग्य पति! मेरे हृदय के आधारस्वरूप आपको नमस्कार है।

*पञ्चप्राणाधिदेवाय चक्षुषस्तारकाय च। ज्ञानाधाराय पत्नीनां परमानन्दरूपिणे ॥ ३॥

पाँचों प्राणों के अधिदेवता, नेत्रों के तारक अर्थात् रक्षक, पत्नियों के ज्ञान के आधार तथा परमानन्दस्वरूप पति को नमस्कार है।

*पतिर्ब्रह्मा पतिर्विष्णुः पतिरेव महेश्वरः। पतिश्च निर्गुणाधारी ब्रह्मरूप नमोऽस्तु ते ॥ ४॥

पति ही ब्रह्मा हैं, पति ही विष्णु हैं और पति ही महेश्वर हैं। पति ही निर्गुण ब्रह्म के आधार हैं। हे ब्रह्मस्वरूप पति! आपको नमस्कार है।

*क्षमस्व भगवन् दोषं ज्ञानाज्ञानकृतं च यत्। पत्नीबन्धो दयासिन्धो दासीदोषं क्षमस्व मे ॥ ५॥

हे भगवान्! ज्ञान अथवा अज्ञान से मुझसे जो भी दोष हुआ हो, उसे क्षमा करें। हे पत्नी के बन्धु! हे दया के समुद्र! मेरी दासी के समान सेवा में हुए दोष को क्षमा करें।

*इदं स्तोत्रं महापुण्यं सृष्ट्यादौ यन्मया कृतम्। सरस्वत्या च धरया गङ्गया च पुरा व्रजे ॥ ६॥

यह महापुण्यदायक स्तोत्र सृष्टि के आरम्भ में मेरे द्वारा रचा गया था। पूर्वकाल में सरस्वती, धरा और गङ्गा ने भी व्रज में इसका पाठ किया था।

*सावित्र्या च कृतं पूर्वं ब्रह्मणे चापि नित्यशः। पार्वत्या च कृतं भक्त्या कैलासे शङ्कराय च ॥ ७॥

पूर्वकाल में सावित्री ने ब्रह्मा के लिए इसका पाठ किया था और नित्य ही करती थीं। पार्वती ने भी कैलास पर भक्तिपूर्वक भगवान् शङ्कर के लिए इसका पाठ किया था।

*मुनीनां च सुराणां च पत्नीभिस्तु कृतं पुरा। पतिव्रतानां सर्वासां स्तोत्रमेतच्छुभावहम् ॥ ८॥

पूर्वकाल में मुनियों और देवताओं की पत्नियों ने भी इसका पाठ किया था। यह स्तोत्र सभी पतिव्रता स्त्रियों के लिए कल्याणकारी है।

*इदं स्तोत्रं महापुण्यं या शृणोति पतिव्रता। नरोऽन्यो वापि नारी वा लभते सर्वाञ्छितम् ॥ ९॥

जो पतिव्रता स्त्री इस महापुण्यदायक स्तोत्र को सुनती है, अथवा कोई अन्य पुरुष या स्त्री इसे सुनता है, वह अपने सभी इच्छित मनोरथों को प्राप्त करता है।

*अपुत्रो लभते पुत्रं निर्धनो लभते धनम्। रोगी च मुच्यते रोगाद्बद्धो मुच्येत बन्धनात् ॥ १०॥

पुत्रहीन को पुत्र प्राप्त होता है, निर्धन को धन प्राप्त होता है, रोगी रोग से मुक्त हो जाता है और बन्धन में पड़ा हुआ व्यक्ति बन्धन से मुक्त हो जाता है।

*पतिव्रता च स्तुत्वा च तीर्थस्नानफलं लभेत्। फलं च सर्वतपसां व्रतानां च व्रजेश्वर ॥ ११॥

हे व्रजेश्वर! पतिव्रता स्त्री पति की स्तुति करके तीर्थ-स्नान का फल प्राप्त करती है तथा समस्त तपों और व्रतों का फल भी प्राप्त करती है।

*इदं स्तुत्वा नमस्कृत्वा भुङ्क्ते सा तदनुज्ञया। एष पतिव्रताधर्म एष धर्मः सनातनः ॥ १२॥

इस स्तोत्र की स्तुति करके और पति को नमस्कार करके वह स्त्री पति की अनुमति से भोजन करती है। यही पतिव्रता स्त्री का धर्म है और यही सनातन धर्म है।

इति श्रीब्रह्मवैवर्ते श्रीकृष्णनन्दसंवादे पतिव्रतामाहात्म्ये पतिमङ्गलस्तोत्रं सम्पूर्णम्।

Monday, 24 August 2026

जबाला, सत्यकाम और हरिद्रुमत के पुत्र महर्षि गौतम की कथा

'छान्दोग्योपनिषद्' के चौथे अध्याय में जबाला, सत्यकाम और हरिद्रुमत के पुत्र महर्षि गौतम की कथा मिलती है। 

जबाला उस भारत का प्रतिनिधित्व करती है जहाँ नारी हर रूप में नारायणी है, सत्यकाम सत्य के उस प्रहरी के रूप में खड़े हैं जो कहता है कि जो धीर मनुष्य सत्य-पथ से कभी नहीं हटता, वही ब्रह्म-विद्या प्राप्त करने का अधिकारी है और महर्षि गौतम हिन्दू धर्म के उस स्वरुप के प्रदर्शक हैं जहाँ केवल और केवल स्वीकार्यता और समावेशन है और जो ये मानता है कि जन्म, गोत्र, कुल या जाति या किसी का ब्राहमण होना ब्रह्म-विधा का अधिकारी होना तय नहीं करती बल्कि मनुष्य की श्रेष्ठता के मानक उसकी सत्यनिष्ठा और सत्य को जानने की अभिलाषा है।

भारत को और हिन्दू धर्म को समझना है तो इन तीन चरित्रों का पारायण कर लीजिये लिये तो बहुत कुछ समझ में आ जायेगा।

जबाला स्त्री जाति और वंचित वर्ग की प्रतिनिधि है, दैवयोग या किसी दुर्भाग्य से उसे कई-कई पुरुषों की सेविका रूप में काम करना पड़ा था और उसी के नतीजे में उन्हें पुत्र प्राप्त हुआ। पुत्र जब पढ़ने योग्य हुआ तो एक दिन माँ के पास आया और कहा- 

माँ ! मैं शिक्षा प्राप्ति के लिये गुरुकुल जाना चाहता हूँ। जबाला प्रसन्न होकर पुत्र को अनुमति देती है पर पुत्र का एक सवाल उसे संकट में डाल देता है। पुत्र उस समय की गुरुकुल की रीति को जानता है इसलिये वो अपनी माँ से पूछता है, महर्षि मुझसे पूछेंगे, तुम्हारा नाम और गोत्र क्या है, तब मैं उन्हें क्या उत्तर दूँगा? 

माँ संकट में पड़ गई क्योंकि पुत्र का गोत्र तो पिता का गोत्र होता है पर इसके पिता का तो मुझे पता ही नहीं है, अब इसे क्या उत्तर दूं? अगर झूठ बोलती हूँ तो झूठ के बुनियाद पर प्राप्त शिक्षा उसके बालक को क्या संस्कारित करेगी, इसलिये निडर और निर्भीक जबाला अपने पुत्र से कहती है- पुत्र ! निराश्रित होने के कारण और अपना तथा तुम्हारा लेट भरने हेतु यौवनावस्था में मुझे अनेक गृह स्वामियों की परिचर्या करनी पड़ी, वृत्ति बनाये रखने के लिए मुझे उनको अपना शरीर भी अर्पित करना पड़ता था। उन अनेक गृह स्वामियों में से तू किसका पुत्र है मैं यह नहीं जानती। इसलिए तेरा गोत्र मैं कैसे निर्धारित करूं? हाँ, मेरा नाम जाबाला है और तू अपने जीवन में सत्यकाम (सत्य से ही प्रयोजन रखने वाला) है, इसलिए जब तेरे गुरु तेरा नाम पूछें तो उन्हें अपना नाम सत्यकाम जाबाल बताना। फिर वो अपने पुत्र से कहती है - "वत्स ! तेरे जीवन का सत्य तेरी आत्म-कलुषता की निवृत्ति ही तुझे ईश्वर प्राप्ति का मार्ग दर्शन करेगी ऐसा मुझे विश्वास है।"

बालक अपनी माँ के चरणों में सर नवाकर गौतम ऋषि के आश्रम में जाता है और जब ऋषि उससे उसका गोत्र पूछ्तें हैं तो वो निर्भीक होकर वही जबाब देता है जो उससे उसकी माँ ने कहा था। 

ऋषि स्तंभित रह जाते हैं, सोचते हैं लोग ब्रह्मज्ञान पाने के लिये न जाने कितने झूठ गढ़तें हैं और ये बालक इतना साहसी कि सारा सत्य यथावत बयान कर दिया, उधर सारा आश्रम हतप्रभ ये सोचता है कि अब तो गौतम एक कुलटा के पुत्र को यहाँ से निकाल देंगें पर ऋषि गौतम सत्यकाम से कहतें हैं- पुत्र, तूने सत्य का परित्याग न कर अपनी विशिष्टता प्रतिपादित की है, मैं तुझे ब्रह्म विद्या का शिक्षण दूँगा। जा पुत्र ! जा कर यज्ञ के लिये समिधा लेकर आ, आज ही तेरा यज्ञोपवीत संस्कार करना है।

हिन्दू धर्म और हिन्दू समाज जब अपनी सभ्यता के ऊंचाइयों पर था तब उसने दुनिया को संदेश दिया था कि अवैध रिश्तें होतें हैं उस रिश्ते से जन्मीं संतान नहीं, गोत्र या जाति किसी का मान या योग्यता निर्धारित नहीं करती, इसे निर्धारित करती है 'आत्मा का पूर्ण निष्कलुष और निष्कपट होना तथा सत्य को यथारूप में स्वीकार करने का साहस'। 

उस काल में जन्मी एक महिला का अपने बारे में ऐसी स्वीकारोक्ति, पुत्र ब्रह्म-ज्ञानी बने इसकी अभिलाषा, ऋषि गौतम का अवैध रिश्ते और अज्ञात पिता से जन्में बालक को बयोग्य मानते हुये ब्रह्म-ज्ञानी बनाने का फैसला, सत्यकाम का खुद के बारे में वैसी पहचान जाहिर होने के बाबजूद विचलित न होना और न ही अपनी माँ के प्रति कोई कलुष भाव रखना - इन सबको जोड़िये और कल्पना करिये हमारा भारत, और हमारे पूर्वज और उनके आदर्श कितने ऊँचे थे। हमारा हिन्दू धर्म कितना ऊँचा था।

जबकि बाकी मजहबों के विधान को अगर आप देखेंगे तो उनके मजहब जब अपने उरूज पर थे तब उनके यहाँ स्त्री ने अगर किसी अवैध रिश्तों के एवज में कोई औलाद जनी होती तो उसे रज़म (पत्थरवाह) कर दिया जाता था यानि उन्मादी भीड़ उसपर तबतक पत्थर बरसाती थी जब तक कि वो बेचारी तड़प-तड़प पर मर नहीं जाती। 

मज़े की बात ये है कि उनके यहां ज़िना करने वाले पुरुष इस ख़ता में किसी भी अपराध से बरी माने जाते हैं।

किसी के गढ़े झूठ पर, किसी के लगाए आक्षेप पर स्वयं को अपराधी मान लेते की आत्मघाती हिन्दू प्रवृत्ति क्यों नहीं जाती, इसकी वजह है कि हमारे पास हिंदुत्व वाला "प्रोडक्ट" सौ प्रतिशत शुद्ध है पर उसे बेचने (फैलाने) की मार्केटिंग स्किल हमारे पास ज़ीरो है।

2020 में प्रकाशित अपनी पुस्तक का नाम #इनसाइड_द_हिन्दू_मॉल मैनें इसी वजह से रखा था कि इस मॉल के आकर्षक वस्तुओं को दुनिया के सामने हमको रखना होगा और इस वर्ष प्रकाशित पुस्तक का नाम #अमृत_कुंभ इस अमृत को समस्त विश्व को देने की कोशिश के रूप में रखी गई है।

जब तक हम में से हरेक हिन्दू धर्म की एक - एक अच्छी बातों का प्रचारक और प्रसारक नहीं बनेगा, हम सिमटते ही जाएंगे।

Abhijeet Singh

मनुस्मृति

युग के अनुसार स्मृति होती है, पर वह वेद विरुद्ध नहीं होना चाहिए। बाइबिल, जेनेसिस, अध्याय २ के अनुसार स्त्री को पुरुष की जंघा हड्डी से उत्पन्न मान कर उसे निर्जीव सम्पत्ति मानते थे। ब्रिटेन में १८२० ई. में उनको मनुष्य माना गया। आसुरी तथा भारतीय परम्परा का अन्तर दुर्गा सप्तशती में स्पष्ट है। महिषासुर का दूत देवी को सम्पत्ति मानता है। पर देवी पति को बराबरी का मानते हैं-यो मे प्रतिबलो लोके, स मे भर्ता भविष्यति।

राजनीतिक दल कार्पोरेट कंपनी की तरह सोचने लगें

जब राजनीतिक दल कार्पोरेट कंपनी की तरह सोचने लगें
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लोकतंत्र का पुराना सिद्धान्त था—जनता मालिक है, राजनीतिक दल उसके प्रतिनिधि हैं और सरकार जनता की सेवा के लिए बनी संस्था है।

लेकिन इक्कीसवीं सदी के भारतीय लोकतंत्र में दृश्य थोड़ा बदल गया है। अब राजनीतिक दलों के पास भी ब्रांड मैनेजर हैं, डेटा एनालिस्ट हैं, सोशल मीडिया वार रूम हैं, फंड-रेज़िंग मशीनरी है, इमेज कंसल्टेंट हैं और चुनाव के समय लगभग हर मतदाता को ग्राहक की तरह देखने की अद्भुत क्षमता है।

अंतर केवल इतना है कि कंपनी अपने उत्पाद के लिए ग्राहक खोजती है और राजनीतिक दल अपने उत्पाद—अर्थात् सत्ता—के लिए मतदाता। कंपनी कहती है—“हमारा ब्रांड सबसे विश्वसनीय है।” राजनीतिक दल कहता है—“हम ही राष्ट्र के सबसे विश्वसनीय रक्षक हैं।” कंपनी विज्ञापन करती है। राजनीतिक दल भी। कंपनी बाजार का सर्वेक्षण करती है।
राजनीतिक दल जाति, क्षेत्र, आयु, लिंग, धर्म, पेशा और सोशल मीडिया व्यवहार तक का सर्वेक्षण करता है।

कंपनी ग्राहक की पसंद बदलने के लिए अभियान चलाती है।
राजनीतिक दल मतदाता की पसंद बदलने के लिए।

और दोनों में एक और अद्भुत समानता है—बोर्डरूम में लाभ और हानि का हिसाब होता है, राजनीतिक कार्यालय में सीट और वोट का।

फर्क केवल इतना है कि कंपनी का सालाना टर्नओवर शेयरधारकों को जवाबदेह होता है; लोकतंत्र में राजनीतिक दल का असली “शेयरधारक” पाँच साल में एक बार वोट डालता है।
और यहीं से इस व्यंग्य की गंभीरता शुरू होती है।

राजनीति अब विचारधारा से अधिक ‘ब्रांड मैनेजमेंट’ है
भारतीय राजनीति में विचारधाराएँ आज भी मौजूद हैं। संविधान, समाजवाद, राष्ट्रवाद, धर्मनिरपेक्षता, सामाजिक न्याय, हिन्दुत्व, लोकतांत्रिक समाजवाद, क्षेत्रीय अस्मिता—सबके अपने ऐतिहासिक और वैचारिक आधार हैं।

लेकिन चुनावी राजनीति ने इन विचारों पर मार्केटिंग की एक चमकदार परत चढ़ा दी है।
आज राजनीतिक दल का मूल्यांकन कई बार इस आधार पर नहीं होता कि उसके पास दीर्घकालीन नीति-दृष्टि क्या है, बल्कि इस पर होता है कि—

उसका नेता कितना लोकप्रिय है,
उसका सोशल मीडिया कितना सक्रिय है,
उसका नैरेटिव कितना वायरल है,
उसकी रैली कितनी बड़ी है,
उसका विज्ञापन कितना प्रभावी है,
और उसका चुनावी माइक्रो-मैनेजमेंट कितना कुशल है।
यहाँ राजनीति धीरे-धीरे विचारधारा से ब्रांड और ब्रांड से उत्पाद बनने लगती है।
एक दल कहता है—हम विकास हैं।
दूसरा कहता है—हम सामाजिक न्याय हैं।
तीसरा कहता है—हम भ्रष्टाचार-विरोध हैं।
चौथा कहता है—हम क्षेत्रीय स्वाभिमान हैं।
और मतदाता सोचता है—“भाई, ऑफर में क्या मिलेगा?”
यहीं लोकतंत्र और उपभोक्तावाद एक-दूसरे को देखकर मुस्करा देते हैं।

राजनीतिक दलों की वित्तीय स्थिति का सबसे विश्वसनीय सार्वजनिक आधार उनके द्वारा चुनाव आयोग को प्रस्तुत किए गए योगदान और ऑडिट विवरण हैं। चुनाव आयोग स्वयं राजनीतिक दलों के contribution reports और expenditure reports प्रकाशित करता है।  
ADR द्वारा चुनाव आयोग में उपलब्ध विवरणों के विश्लेषण के अनुसार, वित्तीय वर्ष 2024-25 में छह राष्ट्रीय दलों को ₹20,000 से अधिक की घोषित कुल 11,343 चंदा प्रविष्टियों से लगभग ₹6,648.56 करोड़ प्राप्त हुए।
इनमें—भाजपा- ₹6,074.02 करोड़, कांग्रेस- ₹517.39 करोड़
अन्य राष्ट्रीय दल
लगभग ₹57 करोड़

अर्थात् ₹20,000 से ऊपर के घोषित चंदे में भाजपा का हिस्सा लगभग 91% बैठता है।
इसे केवल “भाजपा बहुत शक्तिशाली है” कहकर छोड़ देना भी गलत होगा और इसे “भाजपा का पैसा गलत है” कह देना भी।
सही प्रश्न यह है—
लोकतंत्र में इतनी विशाल आर्थिक असमानता राजनीतिक प्रतिस्पर्धा को किस सीमा तक प्रभावित करती है?
यही मूल प्रश्न है।

ADR के इसी विश्लेषण में एक और आंकड़ा अत्यंत महत्वपूर्ण है।
2024-25 में राष्ट्रीय दलों को प्राप्त ₹6,648.56 करोड़ के घोषित चंदे में से लगभग ₹6,128.79 करोड़ अर्थात् 92.18% कॉरपोरेट/व्यावसायिक स्रोतों से आया, जबकि व्यक्तियों का योगदान लगभग ₹505.66 करोड़ अर्थात् 7.61% था। 

अब जरा इस दृश्य की कल्पना कीजिए।
एक साधारण नागरिक राजनीतिक दल को ₹500 देता है।
एक कंपनी करोड़ों देती है।
दोनों का अधिकार संविधान में बराबर है।
लेकिन राजनीतिक अर्थव्यवस्था में उनका प्रभाव बराबर होना आवश्यक नहीं।
यही वह जगह है जहाँ लोकतंत्र का “एक व्यक्ति, एक वोट” सिद्धान्त और चुनावी वित्त का “एक रुपया, एक संसाधन” वाला संसार आमने-सामने खड़ा हो जाता है।
और यहीं से राजनीतिक दलों का कॉरपोरेट-सदृश व्यवहार समझ में आता है।
इस विषय पर चर्चा करते समय सबसे बड़ा खतरा यह है कि कोई इसे केवल भाजपा-विरोधी लेख बना दे।
वास्तविकता अधिक जटिल है।
भाजपा आज भारतीय राजनीति की सबसे बड़ी चुनावी मशीनरी है। उसके पास संगठन, संसाधन, डिजिटल पहुंच और वित्तीय क्षमता विपक्ष के अधिकांश दलों से कहीं अधिक है।
2024 के लोकसभा चुनाव और साथ हुए चार विधानसभा चुनावों के दौरान ADR के विश्लेषण में 32 राष्ट्रीय एवं क्षेत्रीय दलों का कुल घोषित चुनावी व्यय ₹3,352.81 करोड़ था। इसमें भाजपा का व्यय लगभग ₹1,493.91 करोड़ अर्थात् 44.56% था। कांग्रेस लगभग ₹620.14 करोड़, अर्थात् 18.50%, पर थी। 

यह आर्थिक शक्ति भाजपा को एक स्पष्ट प्रतिस्पर्धात्मक लाभ देती है।
लेकिन यहाँ आलोचना का नैतिक तरीका यह नहीं होना चाहिए कि—
“भाजपा पैसा खर्च करती है, इसलिए भाजपा गलत है।”
बल्कि प्रश्न होना चाहिए—
“क्या भारतीय चुनाव व्यवस्था में धन का इतना असमान वितरण स्वतंत्र और समान राजनीतिक प्रतिस्पर्धा के लिए स्वस्थ है?”
यह प्रश्न भाजपा से भी पूछा जाना चाहिए और व्यवस्था से भी।

यहाँ विपक्ष की भी परीक्षा होनी चाहिए।
कांग्रेस आज आर्थिक रूप से भाजपा से बहुत पीछे है, लेकिन भारतीय राजनीतिक वित्त की पुरानी संस्कृति में वह स्वयं लंबे समय तक सत्ता का केंद्रीय दल रही है।
2024-25 में कांग्रेस ने ₹517.39 करोड़ के ऐसे चंदे घोषित किए जो ₹20,000 से ऊपर थे। उसके कुल आय स्रोतों में लगभग ₹350.12 करोड़ कूपन बिक्री से आए, जो उसकी कुल आय का लगभग 38% था। 

अर्थात् विपक्ष का प्रश्न केवल यह नहीं हो सकता—
“सत्तारूढ़ दल को इतना पैसा क्यों मिलता है?”
उसे यह भी पूछना होगा—
“हमारी अपनी राजनीतिक वित्त व्यवस्था कितनी पारदर्शी, लोकतांत्रिक और जन-आधारित है?”
यदि सत्ता में रहते हुए एक दल कॉरपोरेट संसाधनों पर निर्भर होता है और विपक्ष में आने के बाद वही दल कॉरपोरेट फंडिंग की आलोचना करता है, तो जनता को यह अंतर समझ में आता है।
जनता की स्मृति राजनीतिक दलों की प्रेस कॉन्फ्रेंस से थोड़ी लंबी होती है।

अब आते हैं उस प्रयोग पर जिसने भारतीय राजनीतिक वित्त की बहस को बिल्कुल नए स्तर पर पहुँचा दिया—Electoral Bonds।
2017 में लाई गई व्यवस्था का उद्देश्य राजनीतिक चंदे को बैंकिंग प्रणाली के माध्यम से लाना था, लेकिन इसमें दाता की पहचान सार्वजनिक न होने के कारण पारदर्शिता पर गंभीर प्रश्न उठे।
फरवरी 2024 में सर्वोच्च न्यायालय ने Electoral Bond Scheme तथा उससे संबंधित कुछ कानूनी प्रावधानों को असंवैधानिक ठहराया। न्यायालय ने राजनीतिक फंडिंग की जानकारी को मतदाताओं के सूचना के अधिकार से जोड़ा और unlimited corporate contributions से जुड़े प्रावधान को भी Article 14 के संदर्भ में असंवैधानिक माना। 

यह फैसला केवल किसी एक दल के विरुद्ध निर्णय नहीं था।
यह भारतीय लोकतंत्र के लिए एक सिद्धान्त था—
राजनीतिक धन केवल राजनीतिक दल की निजी संपत्ति नहीं है; उसके स्रोत की जानकारी नागरिक के लोकतांत्रिक अधिकार से जुड़ी है।
यही वह बिंदु है जहाँ कॉरपोरेट संस्कृति और लोकतांत्रिक संस्कृति में मूलभूत अंतर दिखाई देता है।
कंपनी पूछ सकती है—
“मेरे शेयरधारक को यह जानने की आवश्यकता क्यों है?”
लोकतंत्र में नागरिक पूछ सकता है—
“जिस सरकार को मैं चुनने जा रहा हूँ, उसे पैसा कौन दे रहा है?”

राजनीति की प्रतिभा यह है कि वह रास्ते बंद होने पर नए रास्ते खोज लेती है।
Electoral Bonds समाप्त हुए तो Electoral Trusts और अन्य माध्यमों का महत्व बढ़ा।
ADR के 2024-25 के विश्लेषण के अनुसार, Prudent Electoral Trust ने भाजपा, कांग्रेस और AAP को मिलाकर लगभग ₹2,413.47 करोड़ दिए। इसमें भाजपा को लगभग ₹2,180.71 करोड़, कांग्रेस को ₹216.34 करोड़ और AAP को लगभग ₹16.42 करोड़ मिले। 

इसका अर्थ यह नहीं कि Electoral Trust अवैध हैं।
नहीं।
कानूनी होना और लोकतांत्रिक दृष्टि से पर्याप्त पारदर्शी होना दो अलग-अलग बातें हैं।
यही अंतर हमें समझना होगा।

कॉरपोरेट जगत का सबसे लोकप्रिय शब्द है—ROI: Return on Investment.
व्यवसायी निवेश करता है और प्रतिफल चाहता है।
लोकतांत्रिक व्यवस्था में राजनीतिक चंदे का प्रत्यक्ष “प्रतिफल” सिद्ध करना कठिन है, और हर कॉरपोरेट दान को quid pro quo कहना तथ्यात्मक रूप से गलत होगा।
लेकिन चिंता का प्रश्न वास्तविक है।
यदि कोई व्यवसायी किसी राजनीतिक दल को करोड़ों देता है तो नागरिक को यह जानने का अधिकार होना चाहिए कि—
क्या उसके बाद उस कंपनी को सरकारी ठेका मिला?
क्या कोई नीति बदली?
क्या कोई नियामकीय निर्णय हुआ?
क्या कोई कर-संबंधी लाभ मिला?
क्या कोई भूमि, लाइसेंस या परियोजना मिली?
क्या दान और सरकारी निर्णयों के बीच कोई असामान्य समय-संबंध है?
यही कारण है कि सर्वोच्च न्यायालय ने राजनीतिक वित्त और नागरिक के सूचना-अधिकार को गंभीरता से देखा। 

हर दान रिश्वत नहीं है। लेकिन हर बड़े दान की पारदर्शिता आवश्यक है।
यही स्वस्थ लोकतांत्रिक स्थिति है।

यह बीमारी केवल दिल्ली के बड़े दलों की नहीं है।
क्षेत्रीय राजनीति भी धीरे-धीरे बड़े संसाधनों की अर्थव्यवस्था बन चुकी है।
DMK, AIADMK, TMC, BRS, TDP, YSRCP, BJD, SP, AAP, JD(U)—हर दल का वित्तीय मॉडल अलग है, लेकिन चुनावी राजनीति में धन, संगठन और मीडिया की भूमिका लगातार बढ़ी है।
अगस्त 2026 में प्रकाशित ADR के नवीनतम विश्लेषण ने 40 क्षेत्रीय दलों के 2023-24 और 2024-25 के ₹20,000 से ऊपर के घोषित चंदों का अध्ययन किया है। 

यह बताता है कि समस्या को केवल “भाजपा बनाम कांग्रेस” बनाकर देखना वास्तविक समस्या को छोटा करना है।
यह समस्या भारतीय पार्टी-व्यवस्था की संरचनात्मक समस्या है।

अब जरा वामपंथ की ओर आइए।
जिस विचारधारा ने पूँजी और कॉरपोरेट सत्ता की आलोचना को अपना केंद्रीय राजनीतिक सिद्धान्त बनाया, उसकी चुनावी मशीनरी भी संसाधनों से मुक्त नहीं है।
अंतर यह है कि उसके वित्तीय स्रोत और आकार अलग हैं।

इसलिए वामपंथ से भी प्रश्न होना चाहिए—
क्या केवल कॉरपोरेट विरोध करना पर्याप्त है, या राजनीतिक दलों के भीतर लोकतंत्र, पारदर्शिता और वित्तीय जवाबदेही का आदर्श भी उतना ही आवश्यक है?
यदि पार्टी जनता के लिए लोकतांत्रिक समाज चाहती है तो पार्टी के भीतर भी लोकतांत्रिक संस्कृति दिखाई देनी चाहिए।

BSP का मामला विशेष रूप से दिलचस्प है।
ADR के अनुसार उसने 2024-25 में ₹20,000 से अधिक का कोई दान घोषित नहीं किया—और यह उसके पिछले कई वर्षों के पैटर्न के अनुरूप है। 

यह अपने आप में एक अलग राजनीतिक वित्त मॉडल की ओर संकेत करता है।
लेकिन इसका दूसरा पक्ष भी है—
जहाँ बड़े कॉरपोरेट चंदे की समस्या है, वहाँ छोटे दान की पारदर्शिता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।
सिर्फ यह कह देना कि “हम कॉरपोरेट से पैसा नहीं लेते” लोकतांत्रिक वित्तीय शुचिता का पूरा प्रमाण नहीं है।
प्रश्न होना चाहिए—
पैसा कहाँ से आया, कितना आया, किस माध्यम से आया और कहाँ खर्च हुआ?

नई राजनीति जब पुरानी राजनीति की आलोचना करती है तो जनता उससे अधिक उम्मीद करती है।
AAP का उदय छोटे चंदे, पारदर्शिता और वैकल्पिक राजनीतिक संस्कृति के वादे के साथ हुआ था।
लेकिन सत्ता की राजनीति का बाजार बड़ा है।
ADR के अनुसार 2024-25 में AAP को ₹39.22 करोड़ donations/contributions से मिले और उसकी कुल आय का लगभग 99.85% योगदान से आया। 

यहाँ प्रश्न किसी अपराध का नहीं है।
प्रश्न यह है कि—
क्या कोई राजनीतिक दल सत्ता में आने के बाद उसी वित्तीय संरचना से बच सकता है जिसकी आलोचना करके वह सत्ता में आया था?
शायद कठिन है।
और यही भारतीय लोकतंत्र का बड़ा व्यंग्य है।
क्रांति चुनाव जीतते ही बजट बनाना शुरू कर देती है।

चुनाव अब ‘उत्पाद लॉन्च’ जैसा क्यों लगता है?

2024 के लोकसभा चुनावों के साथ हुए चुनावों के दौरान 32 दलों के घोषित कुल खर्च में ₹2,008 करोड़ से अधिक यानी 53% से ज्यादा खर्च प्रचार पर हुआ। यात्रा पर लगभग ₹795 करोड़ खर्च हुए। 

इसका अर्थ समझना चाहिए।
राजनीति में अब केवल कार्यकर्ता नहीं चाहिए।
चाहिए—
Content.
Camera.
Campaign.
Consultant.
Data.
Digital distribution.
Narrative.
नेता पहले जनता से मिलता था।
अब कभी-कभी जनता से पहले कैमरा मिलता है।
सभा पहले जनसंवाद थी।
अब वह “event” भी है।
भाषण पहले राजनीतिक वक्तव्य था।
अब वह “content asset” भी है।
और मतदाता?
वह कभी नागरिक है, कभी target group, कभी booth cluster और कभी “swing voter segment”।
लोकतंत्र ने शायद MBA कर लिया है।

बड़े राजनीतिक दलों में आज नेतृत्व का केंद्रीकरण बढ़ा है।
कई दलों में निर्णय कुछ शीर्ष नेताओं के इर्द-गिर्द केंद्रित होते हैं।
उम्मीदवार चयन से लेकर संदेश, गठबंधन, अभियान और संसाधन वितरण तक सब कुछ अत्यधिक केंद्रीकृत हो सकता है।
यह कॉरपोरेट मॉडल से मिलता-जुलता है—
CEO → Core Team → Regional Management → Field Staff → Customer
और राजनीतिक मॉडल में—
शीर्ष नेतृत्व → केंद्रीय संगठन → प्रदेश नेतृत्व → बूथ संगठन → मतदाता
अंतर इतना है कि कंपनी में CEO को निदेशक मंडल हटाता है।
राजनीतिक दल में नेता को हटाने की प्रक्रिया कई बार इतनी कठिन होती है कि पार्टी का आंतरिक लोकतंत्र स्वयं विपक्ष में चला जाता है।

यह भाजपा की समस्या हो सकती है।
कांग्रेस की भी।
क्षेत्रीय दलों की भी।
वाम दलों की भी।
नयी पार्टियों की भी।
व्यक्तिपूजा का रंग अलग-अलग हो सकता है; उसका मनोविज्ञान प्रायः एक जैसा होता है।

भारतीय राजनीति में परिवारवाद की आलोचना खूब होती है।
होनी भी चाहिए।
लेकिन एक प्रश्न और पूछा जाना चाहिए—
यदि राजनीतिक दल एक परिवार की निजी संपत्ति जैसा व्यवहार करे, तो वह लोकतांत्रिक संस्था कैसे रहेगा?
और यदि कोई दल पूरी तरह कॉरपोरेट शैली के केंद्रीकृत प्रबंधन में बदल जाए तो?
दोनों स्थितियों में कार्यकर्ता की भूमिका घटती है और नेतृत्व की भूमिका बढ़ती है।
एक में सत्ता का उत्तराधिकार परिवार से आता है।

दूसरे में सत्ता का नियंत्रण संगठनात्मक केंद्रीकरण से।
दोनों में लोकतंत्र के भीतर लोकतंत्र कमजोर हो सकता है।
इसलिए समस्या केवल वंशवाद नहीं है।
समस्या आंतरिक लोकतंत्र का अभाव है।

अब थोड़ा दोष जनता का भी।
हम हर चीज मुफ्त चाहते हैं।
फिर पूछते हैं चुनाव इतने महँगे क्यों हैं।
हमें शानदार रैली चाहिए।
हेलीकॉप्टर चाहिए।
24 घंटे सोशल मीडिया चाहिए।
बड़े-बड़े विज्ञापन चाहिए।
चमकदार कार्यालय चाहिए।
हर शहर में पोस्टर चाहिए।
फिर पूछते हैं—
“इतना पैसा कहाँ से आया?”
लोकतंत्र में नागरिक केवल वोटर नहीं है।
वह राजनीतिक अर्थव्यवस्था का हिस्सा भी है।

यदि मतदाता जाति, धर्म, तत्काल लाभ, मुफ्त वस्तु, भावनात्मक भाषण और नेता की लोकप्रियता पर वोट करता है, तो राजनीतिक दल भी उसी बाजार के अनुसार अपना उत्पाद बनाएँगे।

बाजार केवल विक्रेता से नहीं बनता; ग्राहक भी उसे बनाता है।

यह कहना भी गलत होगा कि जनता जैसी है, राजनीति वैसी ही है।
राजनीतिक दलों के पास कहीं अधिक संसाधन हैं।
उनके पास नीति बनाने की क्षमता है।
उनके पास कानून बनाने की शक्ति है।
उनके पास संगठन है।
उनके पास सत्ता है।
इसलिए नैतिक जिम्मेदारी भी अधिक है।
एक नागरिक से उच्च राजनीतिक आदर्श की अपेक्षा की जा सकती है।
लेकिन राजनीतिक दल से संस्थागत ईमानदारी की अपेक्षा अनिवार्य है।

असली खतरा पैसा नहीं—पैसे की अपारदर्शिता है
यहाँ एक महत्वपूर्ण भेद करना चाहिए।
लोकतंत्र को धन की आवश्यकता है।
चुनाव मुफ्त नहीं होते।
पोस्टर, यात्रा, कार्यालय, कर्मचारी, संचार, तकनीक, प्रशिक्षण—सबमें पैसा लगता है।
इसलिए यह कहना कि—
“राजनीतिक दल को कॉरपोरेट पैसा बिल्कुल नहीं मिलना चाहिए”
व्यावहारिक समाधान नहीं है।
समस्या है—

अज्ञात पैसा + असमान पैसा + राजनीतिक प्रभाव + कमजोर पारदर्शिता

यदि ₹100 करोड़ का दान खुले रिकॉर्ड में है, तो नागरिक उसका विश्लेषण कर सकता है।
यदि वही धन ऐसे माध्यम से आए जहाँ वास्तविक स्रोत या संभावित हितों को समझना कठिन हो, तो लोकतंत्र कमजोर होता है।
धन का अस्तित्व समस्या नहीं; धन का अंधकार समस्या है।

यदि राजनीतिक दलों को वास्तव में लोकतांत्रिक संस्थाएँ बनाना है तो कुछ बुनियादी सुधार आवश्यक हैं।
पहला—Real-time political funding disclosure

चंदे की जानकारी चुनाव के वर्षों बाद नहीं, लगभग तत्काल सार्वजनिक होनी चाहिए।
दूसरा—Corporate donations की पूर्ण पारदर्शिता
कंपनी ने कितना दिया, किस दल को दिया और उसके स्वामित्व तथा संबंधित कंपनियों की स्थिति क्या है—यह स्पष्ट हो।
तीसरा—Political Trusts की भी पूरी transparency
Trust के पीछे कौन हैं, किन कंपनियों ने पैसा दिया और किस दल को कितना पहुँचा—जनता को पता होना चाहिए।
चौथा—Political parties के accounts का uniform audit
सभी दलों के लिए एक समान accounting standards हों।
पाँचवाँ—चुनावी खर्च की वास्तविक सीमा पर पुनर्विचार
जब आधिकारिक सीमा और वास्तविक चुनावी खर्च में बड़ा अंतर हो तो कानून स्वयं हास्यास्पद बन जाता है।
छठा—State funding of elections पर गंभीर बहस
यदि लोकतंत्र सार्वजनिक संस्था है तो उसके चुनावी खर्च का एक हिस्सा सार्वजनिक धन से क्यों न आए?

लेकिन इसके साथ कठोर transparency और समान अवसर की शर्त होनी चाहिए।
सातवाँ—Internal democracy
राजनीतिक दलों में नियमित आंतरिक चुनाव, सदस्यता का पारदर्शी रिकॉर्ड और उम्मीदवार चयन की संस्थागत प्रक्रिया हो।
आठवाँ—Political advertising की स्पष्ट regulation

विशेषतः डिजिटल micro-targeting, synthetic media और AI-generated political content के युग में।

और सबसे महत्वपूर्ण—दल को कंपनी बनने से रोकना होगा
कंपनी का मूल उद्देश्य है—
लाभ।
राजनीतिक दल का मूल उद्देश्य होना चाहिए—
लोककल्याण।
कंपनी ग्राहक को संतुष्ट करती है।
राजनीतिक दल नागरिक को सशक्त करे।
कंपनी बाजार हिस्सेदारी चाहती है।
राजनीतिक दल जनविश्वास।
कंपनी प्रतिस्पर्धी को बाजार से बाहर करना चाहती है।
लोकतंत्र में विपक्ष को समाप्त नहीं किया जाता—मजबूत किया जाता है।
यही अंतर यदि मिट गया तो लोकतंत्र केवल चुनावों का आयोजन रह जाएगा।
समापन : लोकतंत्र का ‘वार्षिक परिणाम’
कभी भारत में चुनाव आते थे तो दीवारों पर नारे लिखे जाते थे—
“जनता की सरकार।”
आज वही दीवार डिजिटल हो गई है।
नारे LED हो गए हैं।
प्रचार डेटा-driven हो गया है।
नेता ब्रांड हो गए हैं।
मतदाता target audience हो गया है।
और राजनीतिक दल धीरे-धीरे corporate management सीख रहे हैं।
लेकिन लोकतंत्र की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि—
कंपनी का ग्राहक खरीदकर निकल जाता है; नागरिक अपनी चुनी हुई सरकार के निर्णयों के साथ पाँच वर्ष जीता है।
इसलिए राजनीति को कंपनी की तरह कुशल होना बुरा नहीं है।

उसे कंपनी की तरह अपारदर्शी, लाभ-केंद्रित और नेतृत्व-केंद्रित होना खतरनाक है।
भाजपा कांग्रेस सपा से पूछा जाना चाहिए कि उसकी विशाल वित्तीय शक्ति लोकतांत्रिक प्रतिस्पर्धा को कितना प्रभावित करती है।

Sunday, 23 August 2026

मनुस्मृति

#पांचवांस्तंभ 
#मनुस्मृति - 
           आज जिस मनु स्मृति के नाम लेकर सनातन को गरियाने का प्रपंच विभिन्न मंचों से जार्ज सोरेस के पिठ्ठू कर रहे है उन्हें पता होना चाहिए कि मनु स्मृति न तो कोई नित्य पूजनीय धार्मिक ग्रंथ है न ही कोई कानूनन प्रतिबंधित साहित्यिक कृति है. न ही स्वतंत्र भारत वर्ष की संवैधानिक व्यवस्था में उसकी कोई कानूनी मान्यता है.!!!
           मनु स्मृति तात्कालिक राज व्यवस्था की तत्समय की सामाजिक व्यवस्था की नीति निर्धारक संहिता पुस्तक है जिसे समकालीन परिस्थितियों के रूप में ही जानना समझना हर समाजशास्त्री के लिए अध्ययन का विषय है क्योंकि उसके बहुसंख्यक प्रसंग आज भी मानव सभ्यता की अमूल्य निधि है..!!!
         आज मनु स्मृति के आधार पर न तो भारत का संविधान है न ही कानून व्यवस्था है न ही कोई सर्व मान्य सामाजिक व्यवहार है इसलिए मनु स्मृति को लेकर वर्तमान भारतीय समाज को लांक्षित करने का प्रयास एक विदेशी सोच की नियोजित सनातन विरोधी कुंठा है ..!!!
         मनु स्मृति का विरोध वस्तुत: प्रकारांतर सनातन गरिमा को धूमिल करने का कुचक्र है क्योंकि ऐसी मंचीय धृष्टता के दायरे में शरीयत शासन में मध्ययुगीन धार्मिक ग्रंथों के ज्यों का त्यों लागू करने का कोई उल्लेख आपने कहीं नहीं पाया होगा तो उनका तो नाम भी लेने में मैकाले पुत्र कांपते हैं..!!!
        जिस स्मृति ग्रन्थ की कोई विधि व्यवस्था नहीं है उसे लेकर सनातन स्मृति परम्परा को स्त्री विरोधी बताना दरसल सनातन विरोधी कुकृत्य है क्योंकि नारी सम्मान सनातन की धुरी है धुरी थी धुरी रहेगी इसे किसी विदेशी मानस संतति से सर्टिफिकेट की जरूरत नहीं है..!!!
      विचित्र केतु जैसे स्व नाम धन्य हालिया मनु स्मृति को कोस कोस कर उसके नाम पर नारी शक्ति के ठेकेदार बनने का जो नाटक कर रहे है उन्हें दूसरे पंथ की किताबों के स्त्री विरोधी उद्धरण देने में लकवा मार जाता है वैसे भी ऐसे तत्वों की महिला सशक्तिकरण की असलियत शाहबानो- तीन तलाक प्रकरण में दुनिया देख चुकी है और हालिया देख भी रही है..!!!
        मनु स्मृति भारतीय लोकतांत्रिक परम्परा का ऐसा हिस्सा है जो आलोचना समीक्षा से परे नहीं है उसकी समालोचना निरंतर होती रही है आगे भी होती रहनी चाहिए इस पर किसी सनातनी को कोई आपत्ति न थी न है न रहेगी उसके हर प्रसंग पर आम सहमति भी नहीं है ..!!!
       ऐसे में मनु स्मृति के नाम पर पूरी सनातन परंपरा को निशाने पर लिया जाना पूर्णतः सोचा समझा साम्प्रदायिक कृत्य है..बाकी जो पूरी मनुस्मृति न पढ़ पाए न समझ पाए उन्हें बौद्धिक समाधान हेतु आदरणीय श्री मनोज श्रीवास्तव सर की मनु स्मृति पर फेस बुक पोस्ट की श्रृंखला अवश्य पढ़नी चाहिए .. सत्यमेव जयते ..!!!
सादर -बृजेश कुमार त्रिपाठी

अंबेडकर

1927 में ब्रिटिश सरकार ने भारत के शासन को सुधारने के लिए एक कमीशन बनाया। इसका नाम साइमन कमीशन पड़ा क्योंकि इसके अध्यक्ष सर जॉन साइमन थे। इसमें 7 ब्रिटिश सांसद थे— और कोई भी भारतीय इसका सदस्य नहीं था। इसलिए कांग्रेस, मुस्लिम लीग और कई अन्य दलों ने इसका बहिष्कार किया। पूरे देश में “सायमन गो बैक” के नारे लग रहे थे।

लेकिन एक फलाना आदमी था जिसने इस अंग्रेज़ी कमिशन का बहिष्कार नहीं किया। वो बॉम्बे लेजिस्लेटिव काउंसिल की तरफ से प्रांतीय समिति का मेंबर बना और इस कमीशन के सामने आया। 23 अक्टूबर 1928, पूना में सर जॉन साइमन और अन्य सदस्यों के सामने उसने साफ कहा:---
"हम लोग "दा-ललित" हैं। और "दा-ललित" "हैंड-डू" समुदाय का हिस्सा नहीं है। बल्कि अलग और स्वतंत्र है। हम शिक्षा, पैसा और समाज में उनसे पिछड़े हैं। "हैंड-डू" नहीं हैं हम। इसलिए हमें उन (हैंड-डू) लोगों से मौसमलाम लोगों से भी ज्यादा राजनीतिक सुरक्षा चाहिए।"

सोर्स : फलाने की किताब Dr /B /R /AM : राइटिंग्स एंड स्पीचेस वॉल्यूम 2 में वो मेमोरेंडम और गवाही छपी हुई है। व्हाट्सप्प यूनिवर्सिटी, या औंध-भोक्त कह कर अपना दिल हल्का ना करें। क्योंकि जितना तुमको ज्ञान है, उतना मैं समाज में बांट कर भूल चुका हूँ।

(कुछ शब्द बिगाड़ दिए हैं क्योंकि बात की रीच कम हो जाती है सच लिखने से।)

चलो जो है, जो था, वो भी ठीक है। पर मुकेश जोशी का कहना है कि जब तुमने खुद को हैंड-डू माना ही नहीं, तो अब हैंड-डू रहकर, खुद को हैंड-डू जातियों की पैदाइश बता कर R-रकक्षण की मलाई लेने का क्या तुक है । तुम कह दो कि तुम हैंड-डू नहीं हो, तुम्हारी जाति, स्वतः ख़त्म हो जाएगी। और तुम्हारा तथाकथित चोचन भी । तुम्हें सदियों तलक क्यों चोचित ही बने रहना है। 💀

और एक बात। इसी साइमन कमिशन की वजह से लाला लाजपत राय की मौत हुई थी। इसी की कड़ी में भगत सिंह राजगुरु सुखदेव को फांसी हुई थी। 

मगर फलाने थे कि इन अंग्रेज़ो की चापलूसी में कोर्ट पहने, टाई लगाए, पलकें बिछाए खड़े रहते थे। 💀💀
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मुकेश जोशी ✍️
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कड़वा सच लिखना ही मेरा शौक है। सच सुनने का हौसला हो तो मुकेश जोशी को फॉलो करें। 🔥

स्तन टैक्स

ऐसी गलती ना करो... यही तो चाहते हैं अंबेडकरवादी
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- दिलीप पाण्डेय

हमारे देश के कुछ सामान्य वर्ग के क्रिएटर और लेखक बहुत बड़ी गलती कर रहे हैं । 

मटका झाडू और स्तन टैक्स की झूठी अवधारणाएं वामपंथियों और अंबेडकरवादियों द्वारा फ्लोट की गईं । आज जाने अनजाने कुछ सामान्य वर्ग के ही लोग अंबेडकरवादियों के झूठे नैरेटिव का हिस्सा बन रहे हैं ।

कई पोस्ट में लगातार देख रहा हूं कि अंबेडकरवादियों को जवाब में ये लिखा जा रहा है कि

तुम खुद भेजते थे अपनी मां को स्तन टैक्स देने हमारी क्या गलती है ? (ऐसे जवाब भोले भाले दलितों को दिखाकर भड़काया जा रहा है)

इसी तरह दलित माता नाम से फर्जी वीडियो कुछ सामान्य वर्ग के क्रिएडिव लेकिन मूर्ख लोगों के द्वारा गीत बनाकर प्रचारित किए जा रहे हैं जिसमें ये लाइन लिखी जा रही है कि दलित माता ने झाडू और मटका हटा दिया । जो कभी लगा ही नहीं वो हटाया कैसे जा सकता है ?

दोनों नैरेटिव झूठ हैं अगर कोई ये सब बोले तो उसको ये उत्तर दीजिए जो मैं लिख रहा हूं-

1- झाडू मटका बांधा गया- अंबेडकर ने खुद बहुत कोशिश की थी कि उनको इसका कोई प्रमाण मिल जाए लेकिन वो कोई प्रमाण नहीं दे सके । उन्होंने अपने साहित्य में इसका जिक्र भी किया है कि उनके पास इस घटना का कोई सबूूत ही नहीं है ।

2- स्तन टैक्स- ये केरल के त्रावणकोर साम्राज्य की घटनाएं कहकर झूठी प्रचारित की जाती हैं । पहली बात ये कि त्रावणकोर साम्राज्य के राजा नायर जाति के होते थे और नायर जाति केरल में ओबीसी के तहत आती है । इस साम्राज्य का सामान्य वर्ग से कोई रिश्ता ही नहीं है । दूसरी बात ऐसे फोटो मौजूद हैं कि तब त्रावणकोर के राजपरिवार की स्त्रियों के स्तन भी खुले हुए थे तो क्या वो भी स्तन टैक्स दे रही थीं ? इन्हीं तस्वीरों से ही ये प्रोपागेंडा पहले ही ध्वस्त हो चुका है ।

आप सभी सामान्य वर्ग के लोगों से निवेदन है कि व्यंग्य कसते वक्त भी इस तरह के झूठे नैरिटिव का हिस्सा कभी ना बनें नहीं तो एक झूठ बात सच हो जाएगी और इसका नुकसान आपको तो नहीं लेकिन आपकी आने वाली पीढ़ियों को पक्का उठाना पड़ेगा ।

क्योंकि आम तौर पर देश के लोग व्यंग्य को व्यंग्य की तरह ही देखें, या आपका व्यंग्य समझ पाएं, ये कोई जरूरी नहीं है ।

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बाकी मोदी तो खुद ही हिसाब चुक्ता करने की बात करता है वो खुद गलत नैरेटिव को आगे बढ़ा रहा है इसलिए आपकी चुनौतियां और ज्यादा बड़ी हैं । ये ध्यान रखना ।

-दिलीप पाण्डेय

Saturday, 22 August 2026

नहुष मेरा देवता भी और ऊंचा उठे मेरे साथ_

मेरा देवता भी और ऊंचा उठे मेरे साथ
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भारतीय पुराणों ने मनुष्य को सत्ता के बारे में बहुत पहले ही सावधान कर दिया था। इतना पहले कि तब न चुनाव होते थे, न प्रेस-कॉन्फ्रेंस, न सर्वेक्षण एजेंसियाँ, न सोशल मीडिया की ट्रोल-सेना। फिर भी सत्ता के चरित्र को लेकर मनुष्य की बीमारी वही थी—सिंहासन मिलते ही आदमी अपने कद को भूल जाता है और सिंहासन की ऊँचाई को अपना कद समझने लगता है।

महाराज नहुष इसका प्राचीनतम और शायद सबसे सुंदर उदाहरण हैं।
इंद्र के लुप्त हो जाने पर देवताओं ने नहुष को इंद्रपद दिया। नहुष में तेज था, तप था, पुण्य था, योग्यता थी। किंतु सत्ता की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि वह अयोग्य को योग्य नहीं बनाती—वह कई बार योग्य को भी अपने भ्रम में अयोग्य बना देती है।

नहुष को इंद्रासन मिला तो भीतर का मनुष्य धीरे-धीरे बाहर के पद में घुलने लगा। जो कभी विनम्र था, वह ऐश्वर्य का अभ्यासी हुआ। फिर अधिकार का अभ्यासी। फिर अधिकार के प्रदर्शन का। और अंततः उसे लगा कि देवताओं के ऊपर बैठने वाला व्यक्ति देवताओं से ऊपर हो गया है।
यहीं से पतन शुरू हुआ।

कहानी का सबसे मार्मिक दृश्य तब आता है जब नहुष ने सप्तर्षियों को अपनी पालकी उठाने के लिए लगा दिया। ऋषि पालकी ढो रहे थे और इंद्रासन पर बैठा हुआ नहुष अपने को विश्व का स्वामी समझ रहा था। अगस्त्य मुनि की चाल स्वाभाविक रूप से धीमी थी। नहुष अधीर हुआ।

“सर्प! सर्प!”—कहा जाता है कि उसने शीघ्र चलने के लिए प्रेरित किया।
और फिर सत्ता का व्याकरण बदल गया।
उसने अगस्त्य को पैर से स्पर्श किया। ऋषि का शाप मिला—“सर्प योनि में जाओ।”
नहुष गिरा।
जिस ऊँचाई पर वह पहुँचा था, उससे कहीं अधिक ऊँचाई से।

यह केवल एक राजा के सर्प बनने की कथा नहीं है। यह भारतीय राजनीतिक दर्शन का एक अद्भुत रूपक है।

सत्ता जब सेवा से कट जाती है, तो पहले वह अहंकार बनती है; अहंकार जब आलोचना से कट जाता है, तो उन्माद बनता है; और उन्माद जब मर्यादा से कट जाता है, तो पतन बन जाता है।

आज नहुष हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन नहुषत्व बिल्कुल जीवित है।

आज सप्तर्षियों को पालकी उठाने के लिए बुलाने की आवश्यकता नहीं। सत्ता ने तकनीक विकसित कर ली है। अब पालकी दिखाई नहीं देती; कुर्सी दिखाई देती है। ऋषि दिखाई नहीं देते; अधिकारी, कर्मचारी, समर्थक, पत्रकार, विशेषज्ञ, पार्टी कार्यकर्ता और नागरिक दिखाई देते हैं। और सबसे सुविधाजनक बात यह है कि पालकी भी अब अदृश्य है।

सत्ता में बैठे व्यक्ति को अब यह कहने की आवश्यकता नहीं पड़ती कि “मुझे उठाओ।”
व्यवस्था स्वयं उठाती है।

दरवाज़े स्वयं खुलते हैं। रास्ते स्वयं साफ होते हैं। स्वागत स्वयं होता है। कैमरे स्वयं घूमते हैं। जयकारे स्वयं उत्पन्न होते हैं। समर्थक स्वयं प्रमाणपत्र देते हैं कि जो हो रहा है, वह ऐतिहासिक है।

इतिहास भी बेचारा कई बार सोचता होगा—“मुझे कब बुलाया गया?”

सत्ता का नैतिक पतन किसी एक बड़े अपराध से नहीं होता। वह छोटी-छोटी सुविधाओं से शुरू होता है।
पहले नेता को सुरक्षा घेरे की आदत होती है।
फिर प्रशंसा की।
फिर विरोध से असुविधा होने लगती है।
फिर प्रश्न पूछने वाला शत्रु दिखाई देता है।
फिर आलोचक राष्ट्र-विरोधी, व्यवस्था-विरोधी, विकास-विरोधी या किसी अन्य सुविधाजनक श्रेणी में रख दिया जाता है।

और अंत में राजा को राजा नहीं, अवतार समझने वाले लोग चारों ओर खड़े हो जाते हैं।
यही नहुष का संकट था।

और यही किसी भी लोकतंत्र का संकट है।
लोकतंत्र में सिंहासन नहीं होना चाहिए—लेकिन कुर्सियाँ कभी-कभी सिंहासन से भी अधिक खतरनाक हो जाती हैं। क्योंकि सिंहासन पर बैठने वाला राजा जानता था कि उसके ऊपर देवता हैं, ऋषि हैं, धर्म है, लोकमत है और अंततः मृत्यु है।

आधुनिक सत्ता में समस्या यह है कि आदमी के पास पाँच साल का कार्यकाल होता है और उसके चारों ओर पाँच हजार लोग होते हैं जो उसे बताते रहते हैं कि वह अमर है।
यहाँ नहुष फिर मुस्कुराते हैं।

उन्हें याद आता है कि उन्होंने भी कभी सोचा था कि इंद्रासन स्थायी है।

सत्ता का सबसे बड़ा छल यही है कि वह अपने धारक को अस्थायित्व भूलने देती है।
कुर्सी स्थायी नहीं होती, लेकिन कुर्सी पर बैठे व्यक्ति की स्मृति बहुत जल्दी स्थायी हो जाती है।
उसे लगता है—यह सब मेरे कारण है।
वह भूल जाता है कि लोकतंत्र में जनता ने उसे नियुक्त नहीं, उधार दिया है।
जनादेश स्वामित्व-पत्र नहीं होता।
वह एक अस्थायी विश्वास है।

लेकिन जब विश्वास को अधिकार समझ लिया जाता है, तब नैतिकता धीरे-धीरे सरकारी फाइल की तरह नीचे दब जाती है।
और सत्ता पक्ष का नैतिक पतन यहीं से आरंभ होता है।

विरोधी दलों की गलतियाँ गिनाने में सत्ता जितनी दक्ष होती है, अपनी गलतियों को देखने में उतनी ही अंधी।

यह भी नहुष की ही परंपरा है।
क्योंकि अहंकार का सबसे मनोरंजक गुण यह है कि उसे आईना पसंद नहीं आता।
उसे चित्र पसंद आता है।
आईना बताता है—चेहरे पर दाग है।
चित्र बताता है—चेहरा शानदार है।
इसलिए सत्ता को आईने से अधिक चित्रकार चाहिए।

आज के चित्रकार आधुनिक हैं। वे शब्दों से चित्र बनाते हैं। आँकड़ों से बनाते हैं। प्रचार से बनाते हैं। उपलब्धियों की ऐसी माला बनाते हैं जिसमें कभी-कभी फूल कम और प्लास्टिक अधिक होता है।
पर जनता की आँखें अंततः चित्र से नहीं, जीवन से निर्णय करती हैं।
रसोई में महँगाई का दर्शन अलग होता है।
बेरोजगार युवक के कमरे में विकास की परिभाषा अलग होती है।
किसान के खेत में अर्थव्यवस्था का रंग अलग होता है।
और अस्पताल की कतार में नागरिकता का अनुभव किसी भाषण से बिल्कुल अलग।

राजनीति की विडंबना यह है कि सत्ता अक्सर राष्ट्र को नक्शे पर देखती है और जनता उसे रसोई, खेत, नौकरी, सड़क, विद्यालय और अस्पताल में देखती है।
यहीं नैतिकता और प्रचार के बीच दूरी पैदा होती है।
नहुष की कथा हमें यह नहीं बताती कि सत्ता बुरी है।
वह बताती है कि सत्ता के सामने मनुष्य की परीक्षा शुरू होती है।
योग्यता ने नहुष को ऊपर पहुँचाया था।
लेकिन चरित्र उसे वहाँ टिकाकर नहीं रख सका।
यही किसी भी सत्ता पक्ष के लिए सबसे बड़ा पाठ होना चाहिए।

किसी सरकार की सफलता केवल इस बात में नहीं है कि उसने कितनी सड़कें बनाईं, कितने भवन बनाए, कितनी योजनाएँ घोषित कीं या कितने चुनाव जीते।
उसकी वास्तविक सफलता इस बात में है कि सत्ता मिलने के बाद उसके भीतर विनम्रता कितनी बची।
क्या वह अपने आलोचक को सुन सकती है?
क्या वह अपनी भूल स्वीकार सकती है?
क्या वह अपने समर्थक को भी गलत कह सकती है?
क्या वह कानून को अपने विरोधी और अपने समर्थक के लिए समान रख सकती है?
क्या वह यह स्मरण रख सकती है कि जनता प्रजा नहीं है?
और सबसे महत्वपूर्ण—
क्या वह अगस्त्य को पैर लग जाने पर शाप से पहले क्षमा माँग सकती है?

नहुष की कथा का आधुनिक संस्करण शायद यही होगा।
एक दिन सत्ता की पालकी रुकती है।
नीचे खड़े लोग थक चुके होते हैं।
ऊपर बैठा हुआ व्यक्ति चिल्लाता है—“जल्दी चलो!”
कोई धीरे से कहता है—
“महाराज, हम थक गए हैं।”
सत्ता कहती है—
“तुम्हें समझ नहीं कि मैं कौन हूँ?”
और इतिहास बहुत धीरे से उत्तर देता है—
“हमें अच्छी तरह मालूम है। इसी लिए तो पालकी नीचे रख दी है।”
इतिहास का हास्य बड़ा निर्मम होता है।
वह किसी को तत्काल दंड नहीं देता।
वह पहले उसे ऊँचा उठाता है।
फिर उसकी स्मृति में उसका अहंकार सुरक्षित रखता है।
फिर समय बीतने देता है।
और जब लोग उस व्यक्ति का नाम लेते हैं, तो उसके महलों, भाषणों और विजय से अधिक उसकी भूल याद आती है।
नहुष इसलिए अमर नहीं हुए कि वे इंद्र बने थे।
वे इसलिए अमर हुए कि इंद्र बनकर भी मनुष्य रहना भूल गए थे।

आज के सत्ता पक्ष के लिए इससे बड़ा व्यंग्य और क्या होगा कि लोकतंत्र ने राजाओं को समाप्त कर दिया, लेकिन राजसी मानसिकता को नहीं।

राजा चला गया।
राजत्व बचा रहा।
सिंहासन चला गया।
सिंहासन-बोध बचा रहा।
और पालकी उठाने वाले सप्तर्षि अब भी कहीं न कहीं मौजूद हैं।
बस फर्क इतना है कि आज उनके हाथ में संविधान है।

और यदि कभी कोई नहुष फिर यह समझ बैठे कि संविधान उसके नीचे है, तो उसे नहुष की कथा एक बार फिर पढ़ लेनी चाहिए।
क्योंकि भारतीय परंपरा का सबसे गहरा राजनीतिक संदेश शायद यही है—
सत्ता सिर पर रखी जाने वाली वस्तु नहीं है; वह सिर झुकाने की परीक्षा है।

जो सिर झुका सकता है, वही लंबे समय तक ऊँचा रह सकता है।
और जो अपने लिए सप्तर्षियों को पालकी ढोने पर मजबूर करता है, उसके लिए इतिहास के पास एक ही पुराना शब्द है—
नहुष।

कर्ण karn

महाभारत में कर्ण नाम के एक पात्र हुए, एक नंबर के चूतिया और कुंठित. आज भी घोर चूतिया और बेईमान दोगले आदमी उनकी फर्जी कहानियों को अपना दोगलापन ढांपने के लिए हीरो बनाकर इस्तेमाल करते हैं. कर्ण कुमार को हमारे रूस पोषित वामपंथियों ने सिर्फ इसलिए ऊपर उठाया कि हमारा जो सबसे बड़ा हीरो था अर्जुन उसके जीवन से कोई प्रेरणा लेने को न सोचे. अर्जुन भगवान नहीं है, वो राम कृष्ण और परशुराम नहीं है, वो इंसान है, साधारण इंसान जिसने अपने जीवन में पराक्रम, सदाचरण और त्याग के उच्च आदर्श प्रस्तुत किए, और महाभारत जैसा युद्ध जीतकर धर्म की स्थापना की.

अब सोचिए कर्ण क्या था, दुर्योधन का गुर्गा, जैसे फिल्मों में खलनायक अमरीश पुरी का गुर्गा होता था वैसे. बॉस के लिए लड़की उठाने तक को तैयार रहता था अगला. लेकिन आधुनिक काल में कर्ण का क्या महिमामंडन हुआ है. एकदम टॉप क्लास. समझ से बाहर एकदम. एक फिल्म आई थी कल्कि, उसमें भी वही कहानी. कर्ण बड़े योद्धा थे अर्जुन से.

एक हुए राष्ट्र कवि रामधारी सिंह दिनकर जी, सर जी ने अपने जीवन में दो ही आदमी को महान माना, एक जवाहर लाल नेहरू और दूसरा कर्ण. दिनकर जी की एक कृति है लोकदेव नेहरू, और एक कृति है रश्मिरथी. उनकी और भी बहुत सारी उत्कृष्ट कृतियां हैं, जैसे उर्वशी जिसमें एक पंक्ति आती है कि मर्त्य मानव की विजय का तूर्य हूं मैं, उर्वशी अपने समय का सूर्य हूं मैं. ऐसी पंक्ति जिसकी तुलना आपको विश्व साहित्य में बहुत मुश्किल से मिलेगी. जैसे शेन वॉर्न की मैजिक बॉल, जिसपर उन्होंने माइक गेटिंग को आउट किया था. ऐसे में उनके साहित्य वांग्मय में ये दो नाम अलग से चमकते हैं. क्योंकि गले से नीचे नहीं उतरते. नेहरू और कर्ण.

महाभारत में एक उद्धरण है जब भगवान कृष्ण कर्ण के रोने पीटने से ऊबकर उसे बहुत सही से ज्ञान देते हैं, कि तुम क्या हर समय रोते पीटते रहते हो, क्या कष्ट और अपमान तुमने ही सहे हैं, कभी मेरे जीवन के बारे में सोचना.

अर्जुन को कभी राजा नहीं बनना था, युधिष्ठिर के बाद युवराज भी भीमसेन थे. अर्जुन केवल योद्धा था. उसकी कोई महत्वकांक्षा नहीं थी, लेकिन प्रकृति सर्वश्रेष्ठ जीन का चुनाव करती है, इसलिए अर्जुन के वंश का परीक्षित ही राजा बना. महाभारत की पूरी कहानी में वर्णित कोई भी महायोद्धा अर्जुन से नहीं जीत पाता है. एक प्रसंग में अर्जुन किरात वेश धारी महादेव के आगे नतमस्तक होते हैं, और उनको प्रसन्न करके पाशुपतास्त्र प्राप्त करते हैं. एक प्रसंग है जब अर्जुन द्रोणाचार्य जब चक्रव्यूह की रचना करते हैं, तब उनका सारा खेल इसपर आधारित होता है, कि अर्जुन को युद्ध भूमि से दूर कर दो, तभी मैं युधिष्ठिर को बंदी बना पाऊंगा. 

वहीं कर्ण विराट युद्ध में अर्जुन से हारते हैं, महाभारत के चौदहवें दिन भीमसेन से पराजित होते हैं, अभिमन्यु से अकेले पार नहीं पा पाते, और वो उनके सारे बाण और धनुष काट देता है, सात्यकि कई मौकों पर कर्ण पर भारी पड़ते हैं, गंधर्वराज चित्रसेन कर्ण को पराजित करके भगा देते हैं और दुर्योधन को बंदी बना लेते हैं, यहां तक कि भगवान कृष्ण के पुत्र प्रद्युम्न ने भी कर्ण को हरा कर बंदी बना लिया था. आखिर में कर्ण अर्जुन के हाथों मारे जाते हैं, जहां वो हथियार छोड़कर रथ का पहिया निकालने का बहाना कर रहे होते हैं. 
 
भगवान कृष्ण ने गीता का उपदेश देने को अर्जुन को ही चुना, जैसे महादेव ने माता पार्वती को अमरता का उपदेश दिया. इसलिए नहीं कि वो उनकी भार्या थीं, माता को कड़ी तपस्या और सौ जन्मों की साधना से गुजरना पड़ा.

राम पर, कृष्ण पर, अर्जुन पर इसलिए प्रहार होते रहे हैं, ताकि हमारे नौजवानों के दिमाग में नपुंसकता की खेती की जा सके. अर्जुन और कर्ण के युद्ध की केवल एक तस्वीर दिखाई जाती है, जिसमें अर्जुन पहिया निकालते कर्ण पर बाण तान रहे हैं. कर्ण जैसों का महिमामंडन इसलिए किया गया कि युवा पीढ़ी में दास्य भाव उत्पन्न हो, आदमी अवलंबन में ही स्वयं की उन्नति समझे. तर्क दिया जाता है कि मित्र हो तो कर्ण जैसा, अरे वो मित्र नहीं चमचा था, नौकर था, दलाल था दुर्योधन का. कर्ण को गाली देने के लिए द्यूत भवन में द्रौपदी को बोले गए अपशब्द ही पर्याप्त कारण हैं, बाकी जीवन में भी वो सारा समय दुर्योधन का मैला उठाता रहा. महर्षि व्यास ने पूरे महाभारत में कहीं भी नहीं लिखा है कि कर्ण अर्जुन के टक्कर का योद्धा भी था, कर्ण का महिमामंडन केवल वामपंथी प्रोपोगंडा है.

यह नाम कहीं से भी प्रेरणा नहीं देता, उल्टा मन में जुगुप्सा और जगाता है. अर्जुन ही भारत के इतिहास में सबसे बड़े नायक हैं जिनसे नौजवान प्रेरणा ले सकते हैं.

मनुस्मृति में महिलाये ओर डायन

उन्होंने अपने रिलिजीयस बुक को खोला। वहां एक आदेश था - :- "तुम जादूगरनी को जीवित नहीं रहने दोगे"

अपने बुक के इस एक आदेश का पालन करते हुए तकरीबन पांच शताब्दियों के अंदर केवल यूरोप में उन लोगों ने 90 लाख महिलाओं को चुड़ैल और डायन बताकर उनकी निर्मम हत्या कर दी।

उनके रिलीजियस लीडर्स ने 1486 में अपने अनुयाइयों के लिए एक किताब छपवाई, जिसका नाम था :-

The Malleus Maleficarum (The Witch Hammer)

ये वो किताब थी, जिसको मानव इतिहास के सबसे निर्मम और सबसे अधिक कत्लेआम की किताब माना जाता है। इस किताब में उन्होंने दुनिया भर में फैले अपने प्रतिनिधियों को निर्देश दिए कि डायनें और जादूगरनियाँ धरती पर शैतान की प्रतिनिधि हैं, इसलिए जादू-टोना करने वाली हर स्त्री को चुन-चुन कर जिन्दा जला दिया जाए।

जहाँ-जहाँ उनका रिलीजन पहुँचा, वहां के लोगों की मूल पूजा-विधि को उन्होंने डायन विधा और शैतानी अनुष्ठान घोषित कर दिया और उनकी नृशंस हत्या करवा दी।

रोचक ये कि किताब The Malleus Maleficarum के जो मुख्य भूमिकाकार थे, उनके नाम में "इनोसेंट" लगा था🙂

उनकी तरफ से दुनिया भर में ऐसे प्रचारक भेजे गए जिनका दावा था कि वो डायनों को देखतें ही पहचान सकतें हैं। डायनों को खोजने वाले इन एक्सपर्ट्स को "विच फाइंडर" कहा जाता था जिसमें सबसे बड़ा नाम है - इंग्लैंड के मैथ्यू हॉपकिन्स का जिसने अकेले सन 1645 से 1647 के बीच हज़ारों महिलाओं को डायन घोषित किया और जो महिला डायन होने के आरोप से इनकार करती थी, हॉपकिन्स उस पर तब तक जुल्म करता था जब तक वो डायन होना स्वीकार न ले और जब एक बार उसने स्वीकार कर लिया फिर उसे जिन्दा जला दिया जाता था।

अत्याचार की ये करुण कथा केवल मध्य युग की ही नहीं है. फ्रांस की महान देशभक्त महिला जॉन आफ आर्क (जिनके वीरता की कहानी हमने बचपन में पढ़ी थी और जो फ़्रांस-इंग्लैंड युद्ध की नायिका थी) को भी इन लोगों ने नहीं छोड़ा। उसे विधर्मी और 'चुडै़ल' घोषित कर देकर पूर्वी फ्रांस के बुरगुंडी शहर के राउन बाजार में जिंदा जला दिया गया।

अत्याचार की भीषण कहानी यही ख़त्म नहीं हुई, 1944 में इंग्लैंड में हेलेन डंकल नाम की एक महिला को 'डायन' होने के आरोप में गिरफ्तार कर उन पर मुकदमा चलाया गया।

आज किसी ने मनुस्मृति में महिलाओं के बारे पर कुछ झूठी बात की तो ये सब याद आ गया 


#मनु_और_उनकी_स्मृति 

मनुस्मृति कोई आज उनके निशाने पर नहीं आई। ये बहुत पहले से चल रहा है।

देश में अंग्रजों के आने के बाद भारत तोड़ने के जो सूत्रधार बने उनके निशाने पर सबसे अधिक महर्षि मनु और “मनुस्मृति” आई। मनु को गालियाँ दी गई, मनुस्मृति जलाए गए, ब्राह्मणों को "मनुवादी" कहकर कोसा गया।

आपने कभी सोचा है कि मनु उनके हमलों का शिकार क्यों बने, मनुस्मृति ही क्यों जलाई गई जबकि हिन्दू समाज के अंदर मनुस्मृति के अलावा आज सौ से अधिक स्मृतियाँ यथा याज्ञवल्क्य, अत्रि, बिष्णु, हारीत, औशनस, अंगिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, वृहस्पति, बिष्णु, पराशर, व्यास, शंख, देवल, लिखित, गौतम, शातातप, वशिष्ठ, प्रजापति मौजूद हैं?

इसकी वजह ये है कि घरवापसी, स्वदेशी और आत्मबोध के मन्त्र-प्रणेता महर्षि दयानंद सरस्वती ने अपने ग्रन्थ “सत्यार्थ प्रकाश” में “मनुस्मृति” को ही मूल आधार बनाया। अस्पृश्यता का निवारण हो, समाज में न्याय का प्रतिपादन हो, नारी सम्मान की बात हो, राष्ट्र के गौरव की स्थापना हो, दूसरे मतों का खंडन हो सबके सूत्र महर्षि ने मनुस्मृति से ही निकाले और यही मनुस्मृति से इनके चिढ़ने का मूल कारण है। 

अब तक बचाव के मुद्रा में रहने वाले हिन्दू समाज को महर्षि दयानंद ने मनुस्मृति को आधार बनाकर बौद्धिक हमलावर बना दिया और उन्होंने विभिन्न मतों और मजहबों के मूल पर ही चोट कर दी तो इनकी कुंठा स्वाभाविक थी। इसके अलावा मनु से इनकी पीड़ा इसलिए भी है, मनु इनको इसलिए भी बर्दाश्त नहीं हैं कि क्योंकि :-

💐 धर्म के दस लक्षणों का प्रतिपादन मनु महाराज ने ही किया था, जिसे धारण करने से एक सभ्य व सुसंकृत समाज बनता है, पर इन उदंडों को तो उच्छृंखल समाज चाहिए तो मनुस्मृति के रहते संभव नहीं है।

💐 मनु ने अपने ग्रन्थ में भारत की महिमा गाते हुए कहा है कि इस देश में उत्पन्न हुए ब्राहमण के समीप पृथ्वी के समस्त मानव अपने-अपने चरित्र की शिक्षा ग्रहण करें. भारत की महिमा का गायन भारत तोड़ने वाले कैसे सह सकते हैं, तो जाहिर है मनु को खलनायक बनाये बिना ये संभव नहीं है।

💐 मनु की शिक्षाओं में परिवार प्रबोधन के सूत्र, गुरुओं के सम्मान के निर्देश मिलते हैं, जो इन्हें बर्दाश्त नहीं हैं क्योंकि इनके लिए तो लंपट समाज ही आधुनिकता का पर्याय है; जबकि मनु कहते हैं कि माता की भक्ति से मनुष्य इस लोक को, पिता की भक्ति से मध्यलोक को और गुरु की भक्ति से ब्रह्मलोक को जीत लेता है। मनुष्य की उत्पत्ति के समय जो क्लेश माता-पिता सहते हैं, उसका बदला सौ वर्षों में भी उनकी सेवादि करके भी नहीं चुकाया जा सकता।

💐 मनु स्त्रियों की पूजा वाले घर को देवताओं का वास स्थान कहते हैं, तो ये तो इनको पचेगा क्योंकि फिर इनके "नारीवाद" की विकृत परिभाषाओं का क्या होगा।

💐 मनु ने सदाचार की महिमा गाई, चरित्र उज्जवल रखने का आदेश दिया तो जाहिर है जैसा यौन-कुंठित समाज ये हिन्दू अतीत को दिखाना चाहते हैं वो ये सिद्ध नहीं कर पायेंगे।

अगर किसी को इस बात से ही जिद हो कि स्मृति ग्रंथों को ही मानना हिन्दू समाज की मूल प्रवृति है तो इसके लिए उसे पराशर स्मृति के प्रणेता महर्षि पराशर के आदेश को देखना चाहिये, वो कहते हैं:- 

कृते तु मानवो धर्मस्त्रेतायां गौतम: स्मृत:
द्वापरे शंखलिखित: कलौ पाराशरः स्मृत:
क्योंकि मनु सदा सत्य बोलने के लिए निर्देशित करते हैं, 
क्योंकि मनु सदाचार के पालन हेतु निर्दिष्ट करते हैं।

Friday, 21 August 2026

रश्मिरथी :दिनकर की झूठी तथ्यहीन रचना कर्ण

#रश्मिरथी : #दिनकर  की झूठी तथ्यहीन रचना 

#कर्ण का नाम सुनते ही, मुझे बचपन के डीडी नेशनल पर कर्ण पर दिखाए गए धरावाहिक की स्मृतियां मस्तिष्क में घूमने लगती हैं।। और लगता है कि अहो! देखो उसके साथ कितना अत्याचार हुआ है। वह कितना महान था, कितना बड़ा दानी था, लेकिन पाण्डवों ने उसके साथ कितना अनुचित व्यवहार किया। ऐसा ही कुछ #B_R_Chopra के माहाभारत से प्रकट होता है। कैसे उस निहत्थे कर्ण को अर्जुन ने मार दिया। गुरु #द्रोणाचार्य ने उसको शिक्षा नहीं दी। कर्ण शोषित, वंचित है। ऐसा लगता है मानो उसका जन्म ही इसलिए हुआ था ताकि सब लोग मिलकर उसका शोषण कर सकें।

जबकि तथ्य यह है कि उस जैसा अधमी दुराचारी षड्यन्त्रकारी खोजने पर भी नहीं मिलता है। कर्ण के प्रति मन में जो सहानुभूति उत्तपन्न होती है।  कर्ण को पीड़ित के रूप स्थापित करना एवम उसको इसाईयों के दलित शब्द से जोड़कर प्रस्तुत करना, एक सुनियोजित षडयंत्र है। इसमें भारत के हिंदी के राष्ट्रवादी कवि कहे जाने वाले दिनकर सुविख्यात हैं। इनके साथ साथ #शिवाजी_सावंत द्वारा लिखित मृत्युञ्ज भी कर्ण के गुणगाण के लिए जाना जाता है। 

इसके पहले की कर्ण पर दिनकर की रश्मिरथी की तथ्यात्मक विवेचना की जाए, आप यह प्रश्न आवश्य विचार कीजिएगा की जब कोई कवि, जिसकी प्रस्तावना देश के प्रधानमंत्री #नेहरू करते हो, यदि वह तथ्यहीन मनगढ़ंत बातें प्रचारित करता हो, तो उसका कुछ न कुछ  तो उद्देश्य होगा ही। अब क्या होगा आप सब विचार कीजिएगा।

प्रस्तुत है हिन्दी लेखक प्रताप नारायण सिंह द्वारा संयोजित, समाजिक झूठी समरसता पर लिखी रश्मिरथी की तथ्यात्मक विवेचना: 

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◆रश्मिरथी -प्रथम सर्ग

ज्ञान-ध्यान, शस्त्रास्त्र, शास्त्र का कर सम्यक् अभ्यास, अपने गुण का किया कर्ण ने आप स्वयं सुविकास। निज समाधि में निरत, सदा निज कर्मठता में चूर, वन्यकुसुम-सा खिला कर्ण, जग की आँखों से दूर।

खंडकाव्य का आरम्भ ही महाझूठ से होता है, इन पंक्तियों को पढ़कर यही लगता है कि बेचारा कर्ण स्वयं ही शस्त्राभ्यास करके धनुर्विद्या में पारंगत हुआ। कविवर आगे लिखते हैं कि द्रौणाचार्य कर्ण को अपना शिष्य न बनाने का ठानते हैं -

सोच रहा हूँ क्या उपाय, मैं इसके साथ करूँगा, इस प्रचंडतम धूमकेतु का कैसे तेज हरूँगा? शिष्य बनाऊँगा न कर्ण को, यह निश्चित है बात; रखना ध्यान विकट प्रतिभट का, पर तू भी हे तात!'

किन्तु तथ्य क्या है वह #वेदव्यास के महाभारत में देखिए:  

#आदिपर्व - एकत्रिंशदधिकशततमोध्याय- श्लोक संख्या- ११&१२ - वृष्णिवंशी तथा अंधकवंशी क्षत्रिय, नाना देशों के राजकुमार तथा राधानंदन कर्ण -ये सभी आचार्य द्रोण के पास शिक्षा प्राप्त करने आये। कर्ण सदा अर्जुन से लाग-डाँट रखता और अत्यंत अमर्ष में भरकर दुर्योधन का सहारा ले पाण्डवों का अपमान करता था। ( यह आश्रम में शिक्षा ग्रहण करते समय का उल्लेख है। )  

#वन_पर्व - अध्याय ३०९-श्लोक १६-१८- - अधिरथ सूत ने अपने पुत्र को बड़ा होते देखकर उसे हस्तिनापुर भेज दिया। वहाँ उसने धनुर्वेद की शिक्षा लेने के लिए आचार्य द्रोण की शिष्यता स्वीकार की।  वह द्रोणाचार्य, #कृपाचार्य और #परशुराम से चारों प्रकार की अस्त्र विद्या सीखकर एक बड़ा धनुर्धर बना। 

इतने बड़े झूठ के आधार पर इस खंडकाव्य को लिखा गया है। इसे मूल रचना का चीरहरण नहीं तो और क्या कहेंगे? दिनकर ने वेदव्यास की बात ही पलट दी। पात्रों के चरित्र ही बदल दिए। कर्ण के अतिरिक्त  सभी को कुटिल दिखा दिया। और यही बात आज पूरे जन मानस में फैली है कि द्रोण ने कर्ण को शिक्षा नहीं दी। 
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◆ रश्मिरथी -प्रथम सर्ग - 

द्वन्द्व-युद्ध के लिए पार्थ को फिर उसने ललकारा, #अर्जुन को चुप ही रहने का गुरु ने किया इशारा। इसे कहते हैं सफेद झूठ।  'अर्जुन बङ़ा वीर क्षत्रिय है, तो आगे वह आवे, क्षत्रियत्व का तेज जरा मुझको भी तो दिखलावे। 

वेदव्यास क्या लिखते हैं - आदि पर्व -संभवपर्व-श्लोक २१ - 

"ततो द्रोणाभ्यनुज्ञातः पार्थः परपुरंजयः। भ्रातृभिस्त्वरया $$श्लिष्टो रणायोपाजगाम तम ।" तदनन्तर, शत्रुओं के नगर को जीतने वाले कुंतीनंदन अर्जुन आचार्य  द्रोणाचार्य की आज्ञा ले तुरंत अपने भाइयों से गले मिलकर युद्ध के लिए कर्ण की ओर  बढ़े।

यही योद्धा जो रश्मिरथी के प्रथम सर्ग में हुंकार भरता है और जिसके शौर्य का महिमामंडन दिनकर जी रश्मिरथी के सात सर्गों  में भूरि -भूरि  करते हैं। वह अगली बार जब अर्जुन के सम्मुख आता है तो क्या होता है?  

स्वयंवर पर्व- श्लोक ३० - अर्जुन से कर्ण के डर जाने पर सभी राजा युद्ध का विचार छोड़कर भीम के चारों और खड़े हो जाते हैं।  

इतना ही नहीं दिनकर जी का यह गरजने वाला महारथी वेदव्यास के #महाभारत में १४ बार पराजित होता है : 

द्रुपद से एक बार - (आदि पर्व /१३७ )- द्रुपद को बंदी बनाने गया था। अर्जुन से पाँच बार - क ) द्रौपदी स्वयंवर (आदि पर्व /१८९ ), ख ) विराट युद्ध (विराट पर्व / ६० ) , ग) कुरुक्षेत्र (द्रोण पर्व / १५९ ) , घ) कुरुक्षेत्र (द्रोण पर्व/145) ङ ) कुरुक्षेत्र (कर्ण पर्व / ९१ )। गंधर्व चित्रसेन से एक बार- (वन पर्व /२४१)। भीमसेन से चार बार (द्रोण पर्व /१२९, १३१, १३४,१३६, कर्ण पर्व / ५०)। युधिष्ठिर से एक बार ( (कर्ण पर्व /४९ )। अभिमन्यु से एक बार (द्रोण पर्व /४० )। अर्जुन के शिष्य सात्यकि से एक बार (द्रोण पर्व /१४७ )किन्तु दिनकर ने इस तरह से अपने खंडकाव्य में दिखाया है जैसे कि वह एक अजेय योद्धा था। 
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◆ रश्मिरथी -सर्ग ३

कर्ण के द्वारा #दुर्योधन का साथ देने की बात पर दिनकर ने भगवान से भी प्रशंसा करवा दिया ( यहाँ भी महाभारत का चीरहरण कर डाला ) -- 

"वीर शत बार धन्य,तुझसा न मित्र कोई अनन्य, तू कुरूपति का ही नही प्राण,नरता का है भूषण महान." हरि के सम्मुख भी न हार जिसकी निष्ठा ने मानी, धन्य धन्य राधेय! बंधुता के अद्भुत अभिमानी।

जबकि कर्ण के हठ पर वेदव्यास लिखते हैं - द्विचत्वारिंशदधिकशततमोघ्याय- श्लोक १- ७ --

"कर्ण की बात सुनकर भगवान ठठाकर हँस पड़े और बोले- कर्ण !  मैं जो राज्य प्राप्ति का उपाय बता रहा हूँ, लगता है वह तुम्हे ग्राह्य नहीं है।  पाण्डवों की विजय अवश्यम्भावी है। इस विषय में कोई संशय नहीं है| कर्ण ! युद्ध में जब मुझको सारथी बनाकर आए हुए अर्जुन को तुम ऐन्द्र, आग्नेय तथा वायव्य अस्त्र प्रकट करते देखोगे और जब गांडीव की वज्र-गर्जना के समान भयंकर टंकार तुम्हारे कानों में पड़ेगी, उस समय तुम्हें सतयुग, त्रेता और द्वापर की प्रतीति नहीं होगी बल्कि मात्र भयंकर कलि ही दृष्टिगोचर होगा।   

दिनकर ने कर्ण के महिमामंडन में लिखा - "नरता का है भूषण महान" - किसी की पत्नी को बलपूर्वक छीनने का प्रयत्न करना, किसी स्त्री को सभा में निर्वस्त्र करना, किसी को छल से विष देकर मारना, किसी को छल से जलाकर मारने का प्रयत्न करना - क्या यह सब मनुजता और उच्च चरित्र की परिभाषा है?

वेदव्यास ने क्या लिखा है - विदुरागमनराज्यलंभपर्व-श्लोक-२९- दुर्योधन, कर्ण,  शकुनि -ये अधर्मपरायण,  खोटी बुद्धि वाले और मूर्ख हैं। 

जहाँ तक मित्रता निभाने की बात है तो, देखिये जब जब #दुर्योधन को आवश्यकता पड़ी है तब तब कर्ण ने क्या किया है - आदि पर्व में -दुर्योधन जब द्रुपद के ऊपर आक्रमण करता है तब कर्ण बाणों से बिद्ध होकर भाग आता है| 
वन पर्व में -  जब दुर्योधन को गंधर्व बाँधकर ले जाते हैं तब कर्ण जान बचाकर भाग जाता है|  
विराट पर्व - जब दुर्योधन विराटनगर पर आक्रमण करता है , तब कर्ण व्यूह का मुहाना छोड़कर भाग जाता है|  
भीष्म  पर्व - जब कुरुक्षेत्र का युद्ध शुरू होता है तब अपने अहंकार के कारण पहले दस दिनों तक युद्ध भूमि में नहीं उतरता है। 

यह कौन सी मित्रता थी? किस मित्रता की दुहाई दी जाती है। हाँ, अंत में सेनापति बनता है और मारा जाता है। उससे तो बच भी नहीं सकता था। 
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◆ रश्मिरथी - सर्ग ४ -

कवि दिनकर ने कर्ण से कवच कुण्डल दान में दिलवा दिया और खूब महिमा मंडन किया: 

'भुज को छोड़ न मुझे सहारा किसी और सम्बल का, बड़ा भरोसा था, लेकिन, इस कवच और कुण्डल का, पर, उनसे भी आज दूर सम्बन्ध किये लेता हूँ, देवराज! लीजिए खुशी से महादान देता हूँ."

लेकिन वेदव्यास ने  महाभारत में क्या यह लिखा है --(वनपर्व - अध्याय ३१० - श्लोक संख्या १७ से २६ )- कर्ण ने सूर्य की आज्ञा को याद करके कहा- शक्र! आप कुछ बदला देकर इच्छानुसार मेरे कुण्डल और उत्तम कवच ले जाइये; अन्यथा मैं इन्हे नहीं दे सकता’। #इन्द्र बोले- कर्ण जब मैं तुम्हारे पास आ रहा था, उसके पहले ही सूर्यदेव को यह बात मालूम हो गयी थी। इसमें संदेह नहीं कि उन्होंने ही तुमसे सारी बातें बता दी हैं। तात कर्ण! तुम्हारी रुचि के अनुसार इन वस्तुओं का परिवर्तन ही हो जाये। मेरे वज्र को छोड़कर तुम जो चाहो, वही आयुध मुझसे माँग लो। वैशम्पायन जी कहते हैं- जनमेजय! तब कर्ण अत्यन्त प्रसन्न होकर देवराज इन्द्र के पास गया और सफल मनोरथ होकर उसने उनकी अमोघ शक्ति माँगी। कर्ण बोला- 'वासव! मेरे कवच और कुण्डल लेकर आप मुझे अपनी वह अमोघ शक्ति प्रदान कीजिये, जो सेना के अग्रभाग में शत्रुसमुदाय का संहार करने वाली है।'राजन तब इन्द्र ने शक्ति के विषय में दो घड़ी तक मन-ही-मन विचार करके कर्ण से इस प्रकार कहा- ‘कर्ण! तुम मुझे अपने दोनों कुण्डल और सहज कवच दे दो और मेरी यह शक्ति ग्रहण कर लो। इसी शर्त के अनुसार हम लोगों में इन वस्तुओं का विनिमय (बदला) हो जाये। कर्ण बोला- देवेन्द्र! मैं महासमर में अपने एक ही शत्रु को मारना चाहता हूँ, जो बहुत गर्जना करने वाला और प्रतापी है तथा जिससे मुझे हमेशा भय बना रहता है।  

इस तरह यह एक शुद्ध विनिमय था, दान नहीं।  

दूसरी सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि कवच-कुण्डल पूरे महाभारत में अप्रासंगिक रहता है। मात्र कुरुक्षेत्र के युद्ध के पहले प्रासंगिक हो जाता है। जब कर्ण #द्रुपद से हारता है तब वह कवच कुण्डल धारण किये रहता है, जब अर्जुन से द्रौपदी स्वयंवर के समय हारता है तब भी कवच कुण्डल धारण किये हुआ था। जब गंधर्वों से जान बचाकर भागता है तब भी कवच कुण्डल धारन किए हुए था। प्रश्न यह है कि उस समय कवच कुण्डल ने काम क्यों नहीं किया?  

कर्ण के दान के विषय में वन पर्व में वेदव्यास ने लिखा है - जब गन्धर्व कर्ण को हराकर दुर्योधन को बाँध ले जाते हैं और फिर अर्जुन उसे छुड़ाते हैं तो दुर्योधन का विश्वास कर्ण पर से उठ जाता है।  दुर्योधन को दुबारा विश्वास दिलाने के लिए कर्ण प्रतिज्ञा करता है- जब तक मैं अर्जुन को मार नहीं लेता तब तक न तो मैं  किसी से पैर धुलवाऊँगा और न ही किसी के कुछ माँगने पर मना करूँगा। --तो यह था कर्ण के दान के पीछे का सत्य। रश्मिरथी में जिस तरह से दानवीर दिखाया गया है वैसा महाभारत में कहीं नहीं है।  
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◆  रश्मिरथी-सर्ग-६ -

इन पंक्तियों में तो दिनकर की पांडवों के प्रति घृणा चरमोत्कर्ष पर है -

अर्जुन-कुमार की कथा, किन्तु, अब तक भी हृदय हिलाती है, सभ्यता नाम लेकर उसका अब भी रोती, पछताती है। 
पर, हाय, युद्ध अन्तक-स्वरूप, अन्तक-सा ही दारूण कठोर देखता नहीं ज्यायान्-युवा, देखता नहीं बालक-किशोर।

यहाँ भी तथ्य को किस तरह से कर्ण के पक्ष में मोड़ा है ! दिनकर बाबा ! #अभिमन्यु के नाम  पर सभ्यता इसलिए नहीं रोती है कि वह बालक था। वह बालक था ही नहीं। सत्रह-अठारह वर्ष का क्षत्रिय बालक नहीं होत है वह एक महायोद्धा था। सभ्यता रोती इसलिए है कि सात महारथियों ने मिलकर युद्ध के सारे नियमों को ताक पर रखकर मारा था। उसमें आपके काव्य का महानायक भी था। जिसमें  अकेले उस योद्धा का सामना करने की शक्ति नहीं थी। एक बार सामने आया तो परास्त होकर भाग गया था।    

‘‘है कहाँ पार्थ ? है कहाँ पार्थ ?’’ राधेय गरजता था क्षण-क्षण।
‘‘करता क्यों नही प्रकट होकर, अपने कराल प्रतिभट से रण ?
क्या इन्हीं मूलियों से मेरी रणकला निबट रह जायेगी ?
या किसी वीर पर भी अपना, वह चमत्कार दिखलायेगी ?

इन पंक्तियों को पढ़कर हँसी आती है | चमत्कार दिखाने के चक्कर में सब से तो हार चुका था। हालाँकि एक अध्याय में महाभारत में लिखा है कि कर्ण लोगों से पार्थ का पता  पूछता है। लेकिन यह नहीं समझ में आता कि पार्थ कहीं छुपे तो थे नहीं, उसी युद्ध भूमि में शत्रुओं का संहार कर रहे थे। फिर ऐसा क्योंं लिखा है, यह समझ से परे है। 

बहरहाल,  पार्थ के अतिरिक्त अन्य लोगोंंसे भी कर्ण कुरुक्षेत्र में कई बार परिजित हुआ और अपनी जान बचाकर भागा। जैसे अर्जुन से तीन बार  हार -  कुरुक्षेत्र (द्रोण पर्व / १५९ ), घ) कुरुक्षेत्र (द्रोण पर्व/145) ङ ) कुरुक्षेत्र (कर्ण पर्व / ९१ )। भीमसेन से चार बार हार  (द्रोण पर्व /१२९, १३१, १३४,१३६, कर्ण पर्व / ५० )। युधिष्ठिर से एक बार हार ( (कर्ण पर्व /४९ )। अभिमन्यु से एक बार हार  (द्रोण पर्व /४० )।  अर्जुन के शिष्य सात्यकि से एक बार हार  (द्रोण पर्व /१४७ )  

दिनकर ने यह नहीं लिखा कि कितनी बार कर्ण  भयाक्रांत  हुआ था जैसे: 

★#द्रौपदी स्वयंवर के बाद अर्जुन-कर्ण का पहला युद्ध आदि पर्व /१८९ -कर्ण थककर अर्जुन से कहता है - "आप मूर्तिमान् धनुर्वेद हैं? या परशुराम! अथवा आप स्‍वयं इन्‍द्र या अपनी महिमा से कभी च्‍युत न होने वाले साक्षात् भगवान् विष्णु हैं? मैं समझता हूं, आप इन्‍हीं में से कोई हैं और अपने स्‍वरुप को छिपाने के लिये यह ब्राह्मणवेष धारण करके बाहुबल का आश्रय ले मेरे साथ युद्ध कर रहे हैं।" यह कहकर वह युद्ध से हट जाता है।

★  विराट युद्ध (विराट पर्व / ६०)तत्पश्चात् पराक्रमी कुन्ती कुमार ने महान् तेजस्वी तथा अग्नि के समान प्रज्वलित दूसरे बाण द्वारा कर्ण की छाती में आघात किया। वह बाण कर्ण का कवच काटकर उसके वक्षःस्थल के भीतर घुस गया। इससे कर्ण को मूर्च्छा आ गयी और उसे किसी भी बात की सुध न रही। कर्ण को उस चोट से बड़ी भारी वेदना हुई और वह युद्ध भूमि को छोड़कर उत्तर दिशा की ओर भागा।

★ कुरुक्षेत्र - (कर्ण पर्व /५० -भीमसेन ने धनुष को जोर-जोर से कान तक खींचकर कर्ण को मार डालने की इच्छा से उस बाण को क्रोध पूर्वक छोड़ दिया। बलवान भीमसेन के हाथ से छूटकर वज्र और विद्युत के समान शब्द करने वाले उस बाण ने रणभूमि में कर्ण को चीर डाला, मानो वज्र के वेग ने पर्वत को विदीर्ण कर दिया हो। कुरुश्रेष्ठ! भीमसेन की गहरी चोट खाकर सेनापति सूतपुत्र कर्ण अचेत हो रथ की बैठक में धम्म से बैठ गया। उसका सारा शरीर रक्त से सिंच गया। शत्रुओं का दमन करने वाला वह वीर प्राणहीन सा हो गया था। इसी समय भीमसेन को कर्ण की जीभ काटने के लिये आते देख मद्रराज शल्य ने उन्हें सान्वना देते हुए इस प्रकार कहा- शल्य बोले- महाबाहु भीमसेन! मैं तुमसे जो युक्ति युक्त वचन कह रहा हूं, उसे सुनो और सुनकर उसका पालन करो। अर्जुन ने पराक्रमी कर्ण के वध की प्रतिज्ञा की है। तुम्हारा कल्याण हो। तुम सव्यसाची अर्जुन के उस प्रतिज्ञा को सफल करो।

★ कुरुक्षेत्र - (कर्ण पर्व /८४ ) -महाराज! जैसे प्रजावर्ग पर यमराज का बल काम करता है, उसी प्रकार भीमसेन का वह पराक्रम देखकर कर्ण के मन में महान भय समा गया। युद्ध में शोभा पाने वाले शल्य कर्ण की आकृति देखकर ही उसके मन का भाव समझ गये; अतः शत्रुदमन कर्ण से यह समयोचित वचन बोले- राधानन्दन! तुम खेद न करो तुम्हें यह शोभा नहीं देता है।   

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◆ रश्मिरथी -सर्ग ७ - 

राधेय जरा हंसकर बोला, ''रे कुटिल! बात क्या कहता है ? जय का समस्त साधन नर की अपनी बांहों में रहता है| जा भाग, मनुज का सहज शत्रु, मित्रता न मेरी पा सकता , मैं किसी हेतु भी यह कलंक अपने पर नहीं लगा सकता।

अश्वसेन को कर्ण भगा देता है। इस बात के लिए खूब महिमा मंडन किया है। किन्तु दिनकर इस बात को छिपा जाते हैं कि वह अश्वसेन को दूसरी बार भगाता है। एक बार तो अश्वसेन, कर्ण की बाण पर बैठकर चला ही जाता है।

वेदव्यास ने क्या लिखा है - कर्ण पर्व -नवतितमोघ्याय-श्लोक-४३-४८ -

कर्ण के हाथों से छूटा वह अग्नि और सूर्य के समान तेजस्वी, बहुमूल्य बाण, जो वास्तव में अर्जुन के साथ वैर रखने वाला महानाग था, उनके किरीट पर आघात करके पुनः कर्ण के तरकस में घुसना ही चाहता था कि कर्ण की दृष्टि उस पर पड़ गयी। तब उसने कर्ण से कहा- कर्ण! तुमने अच्छी तरह सोच-विचारकर मुझे नहीं छोड़ा था; इसीलिये मैं अर्जुन के मस्तक का अपहरण न कर सका। अब पुनः सोच-समझकर, ठीक से निशाना साधकर रणभूमि में शीघ्र ही मुझे छोड़ो, तब मैं अपने और तुम्हारे उस शत्रु का वध कर डालूँगा। युद्धस्थल में उस नाग के ऐसा कहने पर सूतपुत्र कर्ण ने उससे पूछा- पहले यह तो बताओ कि ऐसा भयानक रूप धारण करने वाले तुम हो कौन? तब नाग ने कहा- अर्जुन ने मेरा अपराध किया है। मेरी माता का उनके द्वारा वध होने के कारण मेरा उनसे वैर हो गया है। तुम मुझे नाग समझो। यदि साक्षात वज्रधारी इन्द्र भी अर्जुन की रक्षा के लिये आ जाय तो भी आज अर्जुन को यमलोक में जाना ही पड़ेगा। इतना कहकर सूर्य के श्रेष्ठ पुत्र कर्ण ने युद्धस्थल में उस नाग से फिर इस प्रकार कहा-मेरे पास सर्पमुख बाण है। मैं उत्तम यत्न कर रहा हूँ और मेरे मन में अर्जुन के प्रति पर्याप्‍त रोष भी है; अतः मैं स्वयं ही पार्थ को मार डालूँगा। तुम सुख पूर्वक यहाँ से पधारो।

एक बार नाग विफल हो चुका था तो आवश्यक तो था नहीं कि दूसरी बार सफल ही हो जाता। जब कर्ण उसे मना कर देता है तो वह स्वतः अर्जुन पर आक्रमण कर देता है और अर्जुन उसे मार डालते हैं। खैर, फिर भी कर्ण अश्वसेन को भगाता तो है। इस्का श्रेय दे सकते हैं, हालाँकि युद्ध पर उसका कोई प्रभाव नहीं पड़ने वाला था। 

इसके अतिरक्त भी पूरा खंडकाव्य महाभारत के विरोधी बातों से भरा पड़ा है। दिनकर ने अर्जुन को "मदांध" तक लिखा है। जबकि अर्जुन पर चाहे जो भी आरोप लगें, किन्तु मदांध नहीं कहा जा सकता। वे महाभारत मे सदैव विनीत दिखाए गए हैं। वेद व्यास ने उन्हें धर्मात्मा लिखा है और अवतार बताया है । 

रश्मिरथी पढ़कर ऐसा लगता है कि दिनकर पांडवों को घृणा की हद तक नापसंद करते थे। 
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◆ सप्तम सर्ग में कर्ण को दलित तारक कह सम्बोधित किया। 

माने एक राजा को दलित बतला दिया। 🤦 

दलित जैसी कोई पहचान आज भी न है। यदि शोषित वंचित कहना चाहते तो, यदि कोई था तो वह पाण्डव ही थे। 
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हद की बात तो यह है कि जिस कर्ण को पूरे खंडकाव्य में धर्म की धुरी बनाकर दिनकर ने प्रस्तुत किया है, उसके अधर्म  और पापों को सातवें सर्ग में स्वयं ही  गिनवाते हैं, लेकिन मात्र चार पदों में इस तरह समेट  देते हैं जैसे कि वह कोई बात ही न हो।  फलस्वरूप ७ सर्गों से झूठी महिमामंडन पढता आया पाठक उन पदों का संज्ञान ही नहीं लेता है। जबकि कर्ण का मूल चरित्र इन्हींं चार-पाँच पदों में है-   
'
'रुको तब तक, चलाना बाण फिर तुम ;
हरण करना, सको तो, प्राण फिर तुम .
नहीं अर्जुन ! शरण मैं मागंता हूं ,
समर्थित धर्म से रण मागंता हूं .''

उपस्थित देख यों न्यायार्थ अरि को ,
निहारा पार्थ ने हो खिन्न हरि को .
मगर, भगवान् किञ्चित भी न डोले ,
कुपित हो वज्र-सी यह वात बोले _

''प्रलापी ! ओ उजागर धर्म वाले !
बड़ी निष्ठा, बड़े सत्कर्म वाले !
मरा, अन्याय से अभिमन्यु जिस दिन ,
कहां पर सो रहा था धर्म उस दिन ?''

''हलाहल भीम को जिस दिन पड़ा था ,
कहां पर धर्म यह उस दिन धरा था ?
लगी थी आग जब लाक्षा-भवन में,
हंसा था धर्म ही तब क्या भुवन में ?''

''सभा में द्रौपदी को खींच लाके ,
सुयोधन की उसे दासी बता के ,
सुवामा-जाति को आदर दिया जो ,
बहुत सत्कार तुम सबने किया जो ,''

''नहीं वह और कुछ, सत्कर्म ही था ,
उजागर, शीलभूषित धर्म ही था .
जुए में हारकर धन-धाम जिस दिन ,
हुए पाण्डव यती निष्काम जिस दिन ,''

इतने दुर्गुणों के बाद भी उस पात्र का महिमामंडन करना और उसे धर्म की धुरी दिखाना महाभारत की अवहेलना करना नहीं है तो और क्या है?  

इस पूरे खंडकाव्य में कोई चीज अच्छी है तो वह है भगवान् श्रीकृष्ण का संवाद। 

जब उन्हें पता चलता है कि दुर्योधन उन्हें बांधना चाहता है, उस समय जो उन्होंने कहा है वह दिनकर ने महाभारत से लिया है। उसमें कोई नकारात्मक परिवर्तन नहीं किया गया है।

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यह तो वैचारिक हाल है राष्ट्रवादी राष्ट्रकवि का, तो सोचिए कि राष्ट्रद्रोहियों की क्या बात करना। अभी समझता है कि हिन्दू इतना मूलविहीन क्यों है?