मनु स्मृति का जब जब उल्लेख होगा तो विलियम जोन्स का नाम मनु के साथ जुड़ा ही रहेगा। कारण ये है कि वर्तमान मनु स्मृति का मूल संपादन तो विलियम जोन्स ने ही किया था। इस प्रकार मनु स्मृति के नाम पर जो संकलन है, उसकी एक-एक पंक्ति यदि किसी की निगाह से प्रकाशन के पहले गुजरी थी तो वह विलियम जोन्स ही थे। इसीलिए मैं इसे जोन्स स्मृति कहने से नहीं हिचकता।
मुझे विलियम जोन्स से जुड़े अनेक मौलिक दस्तावेजों को देखने का अवसर मिला है। मेरे गुरुदेव पूज्य प्रो. स्व. कमलेश दत्त त्रिपाठी की प्रेरणा थी कि मैं इस पर ध्यान दे सका।
हुआ यह था कि मैं कौटिल्य अर्थशास्त्र पर एक लेक्चर की तैयारी कर रहा था। उसी समय कौटिल्य अर्थशास्त्र में मुझे अनेक स्थानों पर मनु के उद्धरण दिखाई दिए। कौटिल्य ने बड़े सम्मान से मनु का जिक्र अनेक नीतिपरक वाक्यों में किया है।
जनपद स्थापना के अध्याय में कौटिल्य ने शूद्र वर्ण के अधिकारों की चर्चा की है, ग्राम बसावट में शूद्र वर्ण की पूरी व्यवस्था सुनिश्चित की और विद्या अधिकार में भी शूद्र वर्ण को संपूर्ण सुविधा के निर्देश हैं।
तभी मेरे मन में प्रश्न उठा था कि ये जो आज की मनु स्मृति है, इसके भीतर के विभेदकारी वाक्यों को कौटिल्य ने आखिर क्यों स्वीकार नहीं किया? अथवा ये मनु स्मृति कौटिल्य के सामने थी ही नहीं, कोई और थी? गुरुवर ने तब समाधान दिया।
उन्होंने मुझे अनेेक अनुभव सुनाए और प्रेरित किया कि मैं विलियम जोन्स के पत्रों के संग्रह का अवलोकन करूं जिसे उनकी मौत के बाद उनके मित्र लॉर्ड टीगनमाउथ ने 1807 में Memoirs of the life, writings and correspondence of Sir William Jones के नाम से पुस्तक रूप में लंदन से प्रकाशित किया है। टीगनमाउथ ही वारेन हेस्टिंग्स के बाद 1793 में बंगाल के गवर्नर जनरल नियुक्त हुए थे। उन्हें जॉन शोर के रूप में जाना गया।
उल्लेखनीय है कि विलियम जोन्स का निधन 27 अप्रैल 1794 को हुआ था। इसी वर्ष उन्होंने मनु स्मृति का संपादित दूसरा अंग्रेजी संस्करण भी इंस्टीट्यूट ऑफ हिंदू लॉ के रूप में प्रकाशित कर दिया था। यही प्रारंभिक दौर था जबकि अंग्रेज जाति मनु स्मृति की खोज कर उसे प्रकाशित करने में सबसे ज्यादा दिलचस्पी दिखा रही थी।
इस पुस्तक में अनेक मौलिक और विचारणीय संदर्भ हैं। 14 सितंबर 1790 दिनांकित एक चिट्ठी मूल रूप में ऊपर वर्णित पुस्तक में है। विलियम जोन्स ने इसे कृष्णा नगर, कोलकाता से किन्हीं डॉ. प्राइस को लिखा है। वह अपने कार्य का ब्यौरा देते हुए लिखते हैं कि-
"हमारे नियंत्रण में बीस मिलियन (दो करोड़) भारतीय नागरिक/प्रजा हैं (मैं यह बात पुख्ता जानकारी के साथ कह रहा हूँ), जिनकी पारंपरिक विधिशास्त्र को मैं इस समय संकलित और व्यवस्थित कर रहा हूँ, इस आशा के साथ कि उनकी संपत्ति उनके और उनके उत्तराधिकारियों के लिए सुरक्षित की जा सके।" (पृ. 422, टिगनमाउथ)
18 अक्टूबर 1791 दिनांकत पत्र जोसेफ बैंक्स ( अध्यक्ष, रॉयल एशियाटिक सोसायटी ऑफ लंदन) को संबोधित है। इसमें विलियम जोन्स ने बहुत सी दुर्लभ भारतीय वानस्पतिक प्रजातियों का विस्तृत ब्यौरा दिया है।
इसके अंतिम पैरा में उन्होंने अपने स्वास्थ्य से आशंकित होकर लिखा है कि-
''मैं आपको संस्कृत, अरबी की अनमोल पांडुलिपियों से भरा बक्सा भेज रहा हूं। यह आपके संरक्षण में रहेगी। मेरे इंग्लैंड लौटने पर आप इसे मुझे सौंप दीजिएगा।...और यदि मैं चीन की समुद्री यात्रा के बीच ही मर जाता हूं या ईरान की समुद्री यात्रा के मध्य ही मेरा निधन हो जाता है तो आप अपनी इच्छा से इन पांडुलिपियों का निस्तारण कर दीजिएगा।'' (p.434, टीगनमाउथ)
20 अक्टूबर 1791 को वॉरेन हेस्टिंग्स को संबोधित पत्र में विलियम जोन्स ने लिखा है कि-
यहां पंडितों के साथ मैं उनकी देववाणी संस्कृत में धाराप्रवाह बातचीत करता हूं। कोर्ट के काम के अतिरिक्त मैं मनु के अनुवाद में जुटा हूं। इस बारे में मेरे कहे अनुसार ग्रंथ संपादित हो रहा है।
...सैमुएल डेविस ने सूर्य सिद्धांत का अंग्रेजी अनुवाद किया है, उसे इंडियन एस्ट्रोनॉमी (भारतीय खगोल विज्ञान) के अध्ययन में लगाया है और विल्फोर्ड मेरे मार्गदर्शन में बनारस का भोगौलिक अध्ययन कर रहे हैं. मुझे पता चला है कि स्कंद पुराण में उन्हें अफ्रीका, यूरोप और यहां तक कि ब्रिटेन का भी संदर्भ मिल गया है। भारत के राजनीतिक मामलों में बहुत निश्चितता के साथ नहीं कह सकता लेकिन मैसूर में हालात हमारे अनुकूल नहीं हैं।
इसी पुस्तक के पृष्ठ क्रमांक 438 पर लेखक टीगनमाउथ मनु स्मृति के अनुवाद के पीछे के कारण को स्पष्ट करते हुए लिखते हैं-
"In the beginning of 1794, Sir William Jones published a work in which he had long been engaged: a translation of the Ordinances of Manu, comprising the Indian system of religious and civil duties. This task was suggested by the same motives that had induced him to undertake the compilation of the Digest, to aid the benevolent intentions of the Legislature of Great Britain..."
"1794 के प्रारंभ में, सर विलियम जोन्स ने एक ऐसी कृति प्रकाशित की जिसमें वे लंबे समय से जुटे थे: मनु के निर्देशों (मनुस्मृति) का एक अनुवाद, जिसमें धार्मिक और नागरिक कर्तव्यों की भारतीय संहिता शामिल थी। इस कार्य की प्रेरणा उन्हीं उद्देश्यों से मिली थी जिन्होंने उन्हें 'डाइजेस्ट' (कानूनी संकलन) तैयार करने के लिए प्रेरित किया था, ताकि ग्रेट ब्रिटेन की संसद (विधायिका) के परोपकारी इरादों को पूरा करने में सहायता दी जा सके..."
इसी में पृष्ठ क्रमांक 439 पर लिखा है कि-
"...yet I wish to complete the system of indian laws while I remain in India, because I wish to perform whatever I promise, with the least possible imperfection, so that they might administer justice to the Indians according to their own laws."
"...फिर भी मेरी इच्छा है कि मैं भारत में रहते हुए ही भारतीय कानूनों की इस प्रणाली (संकलन) को पूरा कर लूँ, क्योंकि मैं जो भी वादा करता हूँ, उसे न्यूनतम संभव त्रुटि (कम से कम कमियों) के साथ निभाना चाहता हूँ, ताकि वे (ब्रिटिश न्यायाधीश) भारतीयों को उनके अपने ही कानूनों के अनुसार न्याय प्रदान कर सकें।"
दरअसल ब्रिटिश सुप्रीम कोर्ट के जजों का बंगाली पंडितों से बहुत से न्यायिक विषयों में वाद-विवाद हो जाता था। जजों का आरोप था कि पंडित लोग मनमाने तरीके से व्याख्या कर रहे हैं। हर पंडित के पास अपनी अलग विधि संहिता है, जहां वह कई तरह से विधि की व्याख्या करता है। इसलिए एक कॉमन संहिता जरूरी हो गई। इसी कारण से विलियम जोन्स जो पहले से भाषाविद् थे, उन्होंने संस्कृत भाषा के लिए पंडित रामलोचन को अपना शिक्षक नियुक्त किया। और कुछ ही वर्षों में वह खुद भी विद्वान बन गए।
उन्होंने उस समय के बड़े बंगाली विद्वानों की सूची तैयार की। सबके पास जो भी विधि संहिता की मूल पांडुलिपियां थीं, उन्होंने मुंहमांगे दाम पर एकत्रित करनी प्रारंभ कर दी। 11 बंगाली पंडितों की समिति गठित की गई। उस समिति को देश भर से जुटाए गई पोथियां दी गईं। इसमें अनेक पाठ, मत-मतांतर शामिल थे।
विलियम जोन्स जीवन भर खुद को भारत की विद्याओं के लिए समर्पित करते रहे। लेकिन चुपके से उन्होंने कई विषबीज रोप दिए। आर्यों के आगमन का सिद्धांत वही लेकर आए। उन्होंने सिद्धांत दिया कि संस्कृत, ग्रीक, लैटिन, जर्मनिक और पर्शियन (फारसी) भाषाओं के व्याकरण और शब्दों में गहरी समानता है। ये सभी भाषाएँ एक ही मूल भाषा परिवार से निकली हैं, जिसे बाद में 'इंडो-यूरोपियन भाषा परिवार' कहा गया।
भाषा विज्ञान से जुड़ी जोन्स की इस खोज ने ही अनजाने में यूरोप और भारत के लोगों के एक ही मूल (आर्य) से जुड़े होने के विचार की नींव रखी, जिसमें यह संकेत उन्होंने ही दिया कि आर्यों का बाहर से आगमन हुआ था। इसके साथ वह बहुत सी गलत व्याख्याएं करते चले गए। किसी ने उस समय उन्हें चुनौती नहीं दी।
बहुत से विद्वान विलियम जोन्स की विद्वत्ता पर मुग्ध रहते हैं। उनके विरुद्ध कोई शब्द सुनना ही नहीं चाहते। तर्क दिया जाता है कि वह शुद्ध वि्दवान थे, उनके मन में कोई और दूषित तत्व नहीं था। हालांकि लॉर्ड टीगनमाउथ ने पृष्ठ 453 पर स्वयं ही लिखा है कि-
The conversion of the hindus to the Christian religion would have afforded him the sincerest pleasure, his wish that it should take place , is still more clearly expressed in his hymns to Lachsmi.
"हिंदुओं का ईसाई धर्म में परिवर्तन (धर्मातंरण) से उन्हें सबसे सच्ची प्रसन्नता मिलती; ऐसा होने की उनकी यह इच्छा, देवी लक्ष्मी को समर्पित उनकी कविता (Hymns to Lakshmi) में और भी अधिक स्पष्ट रूप से व्यक्त होती है।"
वस्तुतः विलियम जोन्स ने हिंदु ग्रंथों में वर्णित अनेक देवी-देवताओं पर मौलिक कविता जैसी पंक्तियां लिखी थीं। इसी में एक कविता लक्ष्मी माता पर है जिसमे उन्होंने अंत में संकेत में अपनी कुत्सित मनोवृत्ति का परिचय दिया है कि भारत के लोग अंततः 'अज्ञानता के अंधकार' से निकलकर 'ईसाई धर्म के प्रकाश' (सत्य) को स्वीकार कर लें, इसी में सबकी भलाई है।
कुछ यही विचार व्हाइट्स मेन बर्डेन में रूडयार्ड किपलिंग ने विलियम जोन्स के गुजर जाने के 100 साल बाद प्रकट किए थे।
जैसे जोन्स का मानना था कि हिंदू धर्म और उसकी संस्कृति कितनी भी समृद्ध क्यों न हो, वह ईसाई धर्म से नीचे है। उनकी इच्छा थी कि भारत के लोग अपनी अज्ञानता छोड़कर ईसाई धर्म को अपना लें।
रुडयार्ड किपलिंग की भी यही भावना दिखती है। किपलिंग ने 1899 में लिखी अपनी कविता में गैर-सफेद (एशियाई और अफ्रीकी) लोगों को नस्लभेद के आधार पर "अधूरे शैतान और अबोध" (Half devil and half child) कहा है।
उनका मानना था कि इन 'अंधकार में जीने वाले जंगली लोगों' को सभ्य बनाना, इन्हें ईसाई मूल्यों से परिचित कराना और इन पर शासन करना गोरे लोगों (White Men) का एक नैतिक और कष्टदायी कर्तव्य (Burden/बोझ) है।
इस प्रकार दोनों ही यह मानते हैं कि भारतीय या गैर-यूरोपीय लोग आध्यात्मिक और सामाजिक रूप से पिछड़े हुए हैं और उन्हें "सभ्यता के प्रकाश" (जो कि ईसाईयत और पश्चिमी तौर-तरीके हैं) की जरूरत है।
मनु स्मृति का अनुवाद ब्रिटिश सरकार ने जिस मकसद से किया था, उसका असर आज पूरे विषैले मकर-जंजाल के रूप में भारतीय जीवन धारा पर छाया दीख रहा है। इससे मुक्ति आवश्यक है।
विलियम जोन्स ने मनु स्मृति के रूप में वस्तुतः विषबीज का वपन किया था। इसमें उसने षड्यंत्र पूर्वक मिलावट की थी। यही ग्रंथ आगे मनु स्मृति के अन्य प्रकाशनों का मूल आधार बना। इसे स्वामी दयानंद सरस्वती ने चुनौती दी।
इसकी मिलावट को उन्होंने 1870-75 के आस-पास दिए गए अपने प्रवचनों में स्पष्ट बता दिया था। कालांतर में उनके शिष्यों ने भी शोधपूर्वक बताया कि मनुस्मृति के कुल 2,685 श्लोकों में से 1,471 श्लोक मिलावटी (नकली) हैं और केवल 1,214 श्लोक ही महर्षि मनु के मूल श्लोक हैं।
वस्तुतः पूरा एशियाटिक सोसायटी ऑफ बंगाल मिलावट के काम में चुपचाप सक्रिय था। रिश्वत देकर जो ब्रिटिश अफसरों ने चाहा, उसे लिखवाया गया। भारतीय राजनीति, प्रशासन, समाज और भारत की समस्त देशी संरचनाओं पर कहर बरपा दिया गया।
कल्पना करिए कि इसी मिलावटी मनु स्मृति को गढ़कर, फिर उसे पढ़ने के लिए राजा राम मोहन राय, ईश्वर चंद्र विद्यासागर, पुणे में ज्योतिराव फुले, बाद में डॉ. भीमराव अंबेडकर को भी यही मिलावटी ग्रंथ थमा दिया गया तो इनके मन में क्या विचार पनपा होगा।
बारी-बारी सभी अंग्रेजों की गलत शिक्षा, षड्यंत्र के शिकार हुए, किंतु किसी ने यह नहीं सोचा कि अंग्रेजों के आगमन के बाद ही मनु स्मृति आदि भारतीय इतिहास के पन्नों को लेकर विभ्रम पैदा किया जा रहा है तो क्यों किया जा रहा है। आखिर क्यों चोखामेला महार ने, या संत शिरोमणि रैदास ने मनु स्मृति पर तीखे सवाल नहीं किए थे। आखिर कबीर जैसा अध्येता क्यों मनु स्मृति पर खामोश रह गया। मतलब साफ है कि ऐसी कोई स्मृति थी ही नहीं।
विलियम जोन्स ने 1882 से 1894 के 12 सालों में(1782 से 1794 corrected) भारत के विध्वंस की पूरी तकनीकी तैयार की। इसी तकनीकी पर आगे बांटों और राज करो की राजनीति ब्रिटिश अफसरों ने विकसित की। इसी राजनीति को हमारे देश के अनेक नेता आज भी बढ़ाने में जुटे हैं। ऐसे तत्वों से मुक्ति का यही समय है, सही समय है। हमें अकादमिक रीति से प्रारंभ करना होगा। सप्रमाण आगे बढ़ना होगा।
(मार्च 1783 में ब्रिटिश सम्राट ने विलियम जोन्स को बंगाल सुप्रीम कोर्ट के जज के रूप में नियुक्त किया था और जोन्स ने सितंबर 1783 में भारत आकर कार्यभार ग्रहण कर लिया। उन्हें कालांतर में सर की उपाधि मिली। 15 जनवरी 1784 को गवर्नर जनरल वॉरेन हेस्टिंग्स के मार्गदर्शन में उन्होंने एशियाटिक सोसायटी ऑफ बंगाल की स्थापना की। पहले अध्यक्ष के रूप में वॉरेन हेस्टिंग्स का नाम प्रस्तावित था, किंतु व्यस्त होने के कारण हेस्टिंग्स ने अध्यक्ष के रूप में विलियम जोन्स को ही नामित किया। पहली बैठक की अध्यक्षता रॉबर्ट चैंबर्स ने की जो बाद में रॉयल एशियाटिक सोसायटी ऑफ लंदन के अध्यक्ष नियुक्त हुए।)
#उत्पीड़न_का_प्रपंच :
जो लोग मनुस्मृति के हवाले से जाति के नाम पर राजनैतिक खेल खेल रहे हैं उनको नश्लवादी अंग्रेज ईसाइयों की सच्चाई समझनी चाहिए।
1807 में दक्षिण भारत का सर्वे करने के बाद उसने हिन्दू समाज को 122 कास्ट/ ट्रेड में वर्णित किया। जाति का अर्थ था मैन्युफैक्चरिंग या ट्रेडिंग कम्युनिटी।
जीवंत शिल्प और वाणिज्य के समय भारत मे जाति एक शक्तिशाली सामाजिक ढांचा था, जिसमे हर जाति या समुदाय के स्वयं के विधान थे, और उनके पालन करवाने हेतु उनके स्वयं का समर्थवान सिस्टम था जिसको आज आप #खाप_पंचायत का एक विकसित स्वरूप समझ सकते हैं। वे किसी धार्मिक या राजनैतिक संस्था से अनुशासित न होकर स्वयं शासित समुदाय थे। इस बात को फ्रांसिस हैमिलटन बुचनान भी लिखता है अपनी पुस्तक में। बुचनान की पुस्तक तीन वॉल्यूम में है लगभग 1450 पेज में।
उसने किसी भी अछूत जाति या ऐसी किसी प्रथा के बारे में लिखा नही है।
क्यों ?
वह अंधा था?
नही अभी ईसाइयो का पूरा ध्यान भारत के धन और वैभव को लूटना था, यहां के साइंस और टेक्नोलॉजी के मॉडल को चुराकर अपने देश मे मैन्युफैक्चरिंग शुरू करना था जिसको वे औद्योगिक क्रांति का नाम देंगे।
वही भारत के मैन्युफैक्चरिंग और ट्रेड को नष्ट करेंगे।
फिर अपने अपराधों पर पर्दा डालने तथा राजनैतिक और धर्म परिवर्तन का आधार गढ़ने हेतु फेक न्यूज़ की रचना करेंगे।
जाति के उस स्वरूप के जिंदा रहते उसमे ईसाइयत का प्रवेश संभव नही था। इसीलिये मैक्समुलर लिखता है -" जाति धर्म परिवर्तन में सबसे बड़ी बाधा है, लेकिन सम्भव है कि कभी यह पूरे समुदाय के धर्म परिवर्तन हेतु एक शक्तिशाली इंजन का काम करे"।
इसलिए उन्होंने कास्ट को टारगेट करके कास्ट को एक अमानवीय प्रथा घोसित करना शुरू किया।
पहले उन्होंने शिल्पकार और वाणिज्यिक समुदायों को आर्थिक रूप से विनष्ट किया फिर आने वाले समयकाल में अनेको कारणों से चार वर्ण वाले हिन्दू समाज को 2000 से अधिक जातियों में वैधानिक रूप से चिन्हित किया।
मेरी पुस्तक में आपको यह देखने को मिलेगा कि किस तरह ईसाई मिशनरी एम ए शेररिंग ( 1872) ने कास्ट के लिए ब्राम्हणों को अकारण ही भला बुरा कहा। और कास्ट को टारगेट किया। वह काम आज भी जारी है। लेकिन पूरी स्किप्ट उसी की लिखी हुई है। भाषा बदल सकती है लेकिन स्क्रिप्ट वही है।
1901 के जनगणना कमिश्नर रिसले और मैक्समुलर में अच्छी सांठ गांठ थी।
1901 में रिसले ने मैक्समुलर के #आर्यन_अफवाह से निर्मित तथाकथित सवर्णो को ऊंची जाति घोसित किया बाकी अन्य समुदायों को नीची जाति।
2378 जातियां।
एक आधुनिक लेखक निकोलस बी डर्क लिखता है:
“ रिसले के द्वारा तैयार किए गए सिस्टम की बुद्धिमत्ता का सबसे बड़ा प्रमाण इस बात से सिद्ध होता है कि इसके कारण बहुत लोगों ने बहुत सारे मुकदमों और प्रतिनिधित्व (memorials) अङ्ग्रेज़ी सरकार के पास भेजे । इसके पूर्व भी जनगणना अधिकारियों के पास शिकायते दर्ज हुयी थे , लेकिन रिसले द्वारा ये घोषणा होने के बाद कि जनगणना को सामाजिक तरजीह का आधार माना जाएगा ; जनगणना को एक ऐसा अभूतपूर्व राजनैतिक हथियार बना दिया”।
(निकोलस बी दर्क्स ; कास्ट ऑफ minds पेज- 221 )
“1911 के जनगणना कमिश्नर ने अपनी रिपोर्ट इस शिकायत के साथ शुरुवात की –‘ जनगणना की किसी भी अन्य मुद्दे ने इतनी उत्तेजना पैदा नहीं किया है जितना कि कास्ट की वापसी ने। बंगाल के लोगों को ऐसा लगता है कि जातिगत जनगणना उस कास्ट के लोगों की संख्या जानने के लिए नहीं बल्कि उनको उनकी सामाजिक हैसियत बताने के लिए की जा रही है ....लोगों की इस भावना का कारण पिछली जनगणना रिपोर्ट मे लोगों की सामाजिक हैसियत तय किए जाने के कारण है’।
कमिश्नर ने बताया कि विभिन्न कास्ट संस्थाओं से सैकड़ो मुकदमे दाखिल किए गए हैं, कि उनका वजन ही यदि तौला जाय तो डेढ़ मोन्द (120 पाउंड ) निकलेगा, जिनकी मांग है कि उनका नामकरण बदला जाय और सामाजिक तरजीह मे उनको ऊपर रखा जाय, और उनको तीन द्विज वर्ण मे रखा जाय । शेखर उपद्ध्याय ने नोट किया –‘ लोकल स्तर पर इन नीची (घोसित) जातियाँ का आंदोलन कभी कभी ऊंची जातियों के खिलाफ दुश्मनी पैदा कर रहा है, और कभी कभी नीची जातियों के हरकतों से ऊंची जतियों मे गुस्सा और विरोध देखने को मिल रहा है ?”
(निकोलस बी दर्क्स ; कास्ट ऑफ minds पेज- 223 )
1921 और 1931 मे भी जातिगत जनगणना होते है लेकिन 1941 मे जातिगत जनगणना बंद कर दी जाते है उसका कारण बताया गया कि दूसरे विश्व युद्ध के कारण जनगणना अधिकारियों की कमी आ गयी थी।
लेकिन शेखर उपदध्याय का नोट इस बात को प्रमाणित करने के लिए पर्याप्त है कि भारत मे 1857 के बाद हिंदुओं द्वारा उठ रहे विरोध के खिलाफ उनको बांटने की कूटनीति मे अंग्रेज़ सफल हो गए । हिंदुओं को एक दूसरे के सम्मुख खडा करके वे अपने विरोध खड़े हो रहे जन आंदोलन को खत्म करने की कूटनीतिक काट तैयार करने मे सफल हो रहे थे । अब उनको अपना एक नायक चुनना था जो मैकाले की शिक्षा नीति से निकला हुआ शक्ल से भारतीय परंतु अक्ल से अंग्रेज़ हो या उनकी शाजिश को भारत के लोगों की आकांक्षा के रूप प्रस्तुत करने को उद्धत हो। और आने वाले दिनों मे वे उसे खोज भी लेंगे।
पहला काम लेकिन ये होगा कि 1906 मे मुस्लिम लीग के नाम पर एक सहयोगी पार्टी तुरंत खोज लिया जाय ।
ब्रिटिश दस्युयों के विरुद्ध 1857 में मुश्लमान और हिन्दू एक साथ लड़े थे।
50 वर्षो में वे हिन्दू और मुसलमानों को आमने सामने खड़ा करने में सफल रहे। नीति यही थी कि एक समुदाय को सरकारी संरक्षण देकर दूसरे समुदाय को चिढाना और प्रताड़ित करना।
अगले 20 - 25 वर्षो में हिंदुओं को बांटने की योजना बनाएंगे और जनगणना को हन्थियार की तरह प्रयुक्त करते हुए विकृत इतिहास की मदद से हिंदुओं को बांटेंगे और उनके नायक चुनेंगे जिनको सरकारी प्रश्रय देकर स्थापित नायक बनाया जाएगा।
इनके ऐतिहासिक नायक भी चुने जाएंगे #एकलव्य_और_शम्बूक के नाम से।
और वर्तमान नायक भी।
वे शक्ल से भारतीय और अक्ल से अंग्रेज होंगे - पेरियार और अम्बेडकर।
"एलियंस एंड स्टूपिड प्रोटागोनिस्ट" - मैकाले के शब्दों में।
साधो यह मुर्दों का देश।