Sunday, 2 August 2026

तिब्बती साधना ध्यान का बारडो

क्या आपने कभी दो विचारों के बीच के उस 'खामोश अंतराल' को महसूस किया है? जानिए तिब्बती साधना का गहरा रहस्य: 'ध्यान का बारडो' (सैम-टेर बारडो)! 🧘‍♂️✨
तिब्बती बौद्ध दर्शन में 'बारडो' का अर्थ है दो अवस्थाओं के बीच का अंतराल या मध्यवर्ती स्थान। जहाँ एक तरफ जीवन और स्वप्न के बारडो हैं, वहीं 'ध्यान का बारडो' (सैम-टेर बारडो) हमारे अपने भीतर की चेतना का वह सचेत अंतराल है, जो हम गहन ध्यान (मेडिटेशन) के दौरान अनुभव करते हैं।
क्या है ध्यान का बारडो?---
जब हम ध्यान में बैठते हैं, तो हमारा मन विचारों की हलचल से धीरे-धीरे शांत होने लगता है। एक पुराना विचार समाप्त हो चुका होता है और नया विचार अभी उत्पन्न नहीं हुआ होता—इन दोनों विचारों के बीच का यह जो खालीपन, शून्य और गहरी शांति होती है, वही 'ध्यान का बारडो' है।
तिब्बती गुरुओं के अनुसार, यह जीवित रहते हुए ही उस परम सत्य का अनुभव करने का सबसे बड़ा अवसर है जो मृत्यु के समय प्रकट होता है!
ध्यान बारडो को साधने की विधि---
तिब्बती महामुद्रा और दज़ोग्चेन परंपराओं में इस आंतरिक अंतराल को अनुभव करने के लिए कुछ प्रमुख चरण अपनाए जाते हैं:
 1. शारीरिक और मानसिक स्थिरता :--
   सुखासन या पद्मासन में सहज होकर बैठ जाएं। अपनी रीढ़ की हड्डी सीधी रखें, आँखें आधी खुली या कोमलता से बंद रखें और अपने शरीर को पूरी तरह ढीला छोड़ दें।
 2. विचारों को दबाएं नहीं, देखें :--
   सामान्य ध्यान की तरह यहाँ विचारों को रोकने की कोशिश नहीं की जाती। इसके बजाय, एक दर्शक बनकर यह देखें कि मन में विचार कैसे आ रहे हैं और कैसे अपने-आप विलीन हो रहे हैं।
 3. अंतराल पर ध्यान केंद्रित करना --
   अभ्यास के दौरान जब एक विचार समाप्त होता है और दूसरे के शुरू होने में जो एक छोटा सा सन्नाटा या खालीपन आता है, अपनी पूरी जागरूकता उस खालीपन पर टिका दें। यही 'ध्यान का बारडो' है।
 4. शुद्ध जागरूकता (Rigpa) में टिकना:--
   जब आप बार-बार उस खाली अंतराल पर ध्यान केंद्रित करते हैं, तो मानसिक बकबक शांत होने लगती है। पीछे एक विशाल, निर्मल और शांत चेतना उभर कर आती है—जिसे तिब्बती परंपरा में 'रिग्पा' (शुद्ध जागरूकता) कहा जाता है।
 इस साधना का असली महत्व क्या है?---
 मृत्यु के भय से मुक्ति:-- जो लोग ध्यान के दौरान अपने मन के भीतर के इस शून्य और शांति से परिचित हो जाते हैं, वे मृत्यु के समय आने वाली अज्ञात अवस्था से घबराते नहीं हैं। वे पहचान लेते हैं कि वह शून्य कोई विनाश नहीं, बल्कि चेतना का मूल घर है।
 अहंकार से मुक्ति:-- यह अभ्यास हमें सिखाता है कि हम अपने विचारों या भावनाओं से कहीं अधिक गहरे और विशाल हैं।
यदि हम अपने जीवन में रोजाना कुछ पल निकालकर इस ध्यान-रूपी बारडो में उतरना सीख जाएं, तो हमारे जीवन के सारे तनाव, चिंताएं और आंतरिक भय स्वतः शांत होने लगते हैं।
क्या आपने कभी अपने भीतर के इस खामोश अंतराल को महसूस किया है? 



बारडो (Tibetan: བར་དོ།) एक तिब्बती बौद्ध धर्म की अवधारणा है, जिसका शाब्दिक अर्थ है "मध्यवर्ती अवस्था" या "अंतर-स्थान" । यह मुख्य रूप से उस संक्रमण काल या अंतराल को संदर्भित करता है जो मृत्यु और पुनर्जन्म के बीच आता है।
तिब्बती बौद्ध परंपरा (विशेषकर तिब्बती मॄतक पुस्तक या बारडो थोडोल के अनुसार) में यह माना जाता है कि चेतना (आत्मा) तुरंत नया शरीर नहीं पाती, बल्कि इस मध्यवर्ती काल से गुजरती है।
तिब्बती परंपरा में जीवन और मृत्यु को एक सतत चक्र के रूप में देखा जाता है, जिसे छह बारडो में बांटा गया है:
 1. जीवन का बारडो (स्क्ये-नाग बारडो):--जन्म से लेकर मृत्यु तक की संपूर्ण जीवन अवधि।
 2. स्वप्न का बारडो (ग्लिम-लाम बारडो):-- सोते समय अनुभव होने वाली सपनों की दुनिया।
 3. ध्यान का बारडो (सैम-टेर बारडो):-- गहन ध्यान (मेडिटेशन) के दौरान मन की स्थिति।
 4. मृत्यु की पीड़ा का बारडो (ची-ཁ་ बारडो):-- ठीक मृत्यु के समय होने वाला शारीरिक और मानसिक विघटन।
 5. धर्मता की वास्तविकता का बारडो (च्यो-न्यिद बारडो):-- मृत्यु के तुरंत बाद शुद्ध प्रकाश और चेतना की अद्भुत अवस्था, जहाँ विभिन्न दिव्य और उग्र रूप प्रकट होते हैं।
 6. भव या पुनर्जन्म का बारडो (सिद-पा बारडो):-- नए जन्म या गर्भधारण की तलाश की अवस्था, जहाँ कर्म के अनुसार अगला शरीर मिलता है।
 मुक्ति का अवसर:-- तिब्बती ग्रंथों के अनुसार, बारडो की अवस्था बहुत शक्तिशाली होती है। यदि कोई व्यक्ति जीवन भर साधना, ध्यान और अच्छे कर्म करता है, तो वह 'धर्मता के बारडो' में आने वाले तीव्र दिव्य प्रकाश को पहचान कर संसार चक्र (निर्वाण) से मुक्ति प्राप्त कर सकता है।
 भ्रम का निवारण:- जो लोग आध्यात्मिक रूप से तैयार नहीं होते, वे बारडो में भय और भ्रम का अनुभव करते हैं। उनके अचेतन मन और कर्मों के अनुसार उन्हें विभिन्न दृष्टियाँ दिखाई देती हैं।
 बारडो थोडोल (तिब्बती मॄतक पुस्तक):-- तिब्बत में किसी व्यक्ति की मृत्यु के बाद लामा (धार्मिक गुरु) उसके शरीर के पास बैठकर बारडो थोडोल का पाठ करते हैं, ताकि मृत व्यक्ति की चेतना को शांत किया जा सके और उसे सही मार्ग का बोध कराया जा सके।(जैसे हिंदुओं में मृत्यु से पूर्व गीता पाठ सुनाने की परंपरा है)
, बारडो केवल मृत्यु के बाद की स्थिति नहीं है, बल्कि यह जीवन, स्वप्न और हर उस पल का प्रतीक है जहाँ एक अवस्था समाप्त होती है और दूसरी शुरू होती है 

भारत के निकटवर्त्ती द्वीप- वायु पुराण,

भारत के निकटवर्त्ती द्वीप-(१) वायु पुराण, अध्याय ३८ के अनुसार-(१) भारत वर्ष के दक्षिण १०,००० योजन का महासागर है जिसमें ३००० योजन विस्तार का ३ भागों में विभक्त एक द्वीप है जिसमें विद्युत्वान् नामक महाशैल है। असभ्य नील वर्ण मनुष्य। हजारों नदिया, वापी। (मलगासी?)
(२) अंग द्वीप (या अग्नि द्वीप, अग्नि = दक्षिण पूर्व दिशा में)-सुवर्ण, विद्रुम आदि की खान। चक्रगिरि में कई निर्झर और कन्दरा हैं। यह नागदेश के मध्य में है। (आस्ट्रेलिया, अग्नि कोण में, स्वर्ण खान, पूर्वी तट पर अर्ध चक्राकार पर्वत)
(३) यम द्वीप-धातु मण्डित द्युतिमान् पर्वत। यम का अर्थ युग्म है, यम दक्षिण दिशा का स्वामी है। अण्टार्कटिका में भी २ भूखण्ड हैं तथा यह सबसे दक्षीण में यम द्वीप है। इसके निकट का बड़ा द्वीप न्यूजीलैण्ड भी २ द्वीप का है। यह यम द्वीप के निकट होने से यमकोटि द्वीप है तथा इसके तट पर यमकोटिपत्तन उज्जैन से ९० अंश पूर्व कहा गया है। 
(४) मलय द्वीप-स्वर्ण और बहुमूल्य रत्न, चन्दन, रजत खान। महामलय तथा मन्दार पर्वतों पर अगस्त्य आश्रम। त्रिकूट पर्वत पर सोने-चान्दी की खान। पश्चिमी तट के गोकर्ण में शंकर मन्दिर। यह भारत के केरल जैसा है, उसके भी उत्तर में गोकर्ण है। मलय द्वीप मलाया है जहां आज भी चान्दी की खान हैं।
(५) शङ्ख द्वीप-१०० योजन का, शंखगिरि पर्वत तथा शंखनाग नदी। शंख को अरबी में जञ्ज कहते हैं, यह जंजीबार द्वीप है (अफ्रीका के पूर्व तट पर)।
(६) कुश या कुमुद द्वीप-अफ्रीका को कुश महाद्वीप कहा गया है। यह अन्य द्वीप है। कुमुद पर्वत थाईलैण्ड का दक्षिणी भाग है, जो गदा के आकार का है (कौमोदकी गदा-विष्णु की)। यहां का मुख्य पशु भू कोमोडो है।
(७) वराह द्वीप, असभ्य लोग, कई नगर, पर्वत, वन। वराह पर्वत, वराही नदी। विष्णु की वराह रूप में पूजा। 
भागवत पुराण (५/१९) के अनुसार जम्बू द्वीप के ८ उपद्वीप-
(१) आवर्तन (ब्रिटेन)-अरबी में बर्तानिया।
(२) नारमणक-नार्वे-स्वीडेन। इनके स्थानीय नाम नोर्गे-स्वर्गे हैं। शीत स्थान में समतल भूमि स्वर्ग तथा उच्च पर्वतीय भूमि नार्वे नर्क है।
(३) पाञ्चजन्य-पूर्व भाग में ५ द्वीपों का जापान-सखालिन (अभी रूस के अधिकार में), होनशू, होकैडो, शिकोक्यू, क्यूशू।
(४) चन्द्र शुक्ल = फिलिपाइन।
(५) स्वर्ण प्रस्थ-बोर्निओ, जावा (यव आकार का), सुमात्रा (इन्द्र = सुत्रामा के नाम पर, वर्ण-विपर्यय), सिंगापुर, पेनांग, निकोबार, अण्डमान।
(७) सिंहल-वर्तमान श्रीलंका। लंका-लक्कादीव (लंकाद्वीप) से मालदीव (रामायण के अनुसार लंका के दक्षिणी भाग में माली द्वीप)। ३० योजन चौड़ा तथा १०० योजन लम्बा (रामायण, सुन्दरकाण्ड, १/११५, २०३, २/३-४, उत्तरकाण्ड ५/५,६,१९, २१-२९, ४५, ६/७, १५, ८/२३-२४)।
भारत के भाग-केन्द्रीय भाग कुमारिका खण्ड है। इसके दक्षिण का समुद्र भी कुमारिका खण्ड है। आज भी इसे भारत महासागर ही कहते हैं। अन्य ८ खण्ड हैं (मधुसूदन ओझा-इन्द्रविजय, अध्याय २-३)-
(१) इन्द्रद्वीप-इन्द्रमन = अण्डमान।
(२) नागद्वीप = निकोबार।
(३) सौम्य द्वीप-सोमत्रा या सुमात्रा, यवद्वीप, बालिद्वीप (जावा, बाली)।
(४) गान्धर्व-फिलीपीन-लुम्बक, सुम्बाफ्लोरिन।
(५) वारुण-बोर्निओ (ब्रूनी)।
(६) कशेरुमान-कसेरू (सेलेबिस)
(७) गभस्तिमान मलक्का।
(८) ताम्रपर्ण-ताम्रपर्णी-टापूरोवेन (श्रीलंका)
इन्द्रविजय पुस्तक के अनुसार भारत के पश्चिमी खण्ड-
(१) गान्धार-अफगानिस्तान का पूर्व भाग गान्धार या कन्दहार, पश्चिमी भाग मद्र, जिसके उत्तर और दक्षिण भाग थे।
(२) राजा सगर ने भारत के पश्चिमी भाग की ५ जातियों को निष्कासित किया था-पारद, पह्लव, कम्बोज, शक, यवन। यवन पारद जातियों ने कालकेय (काल्डिया, काकेसस) असुरों की रीति अपना ली। धनुष धारी को अरबी में पारद कहते हैं; इससे अंग्रेजी में पार्थिअन हो गया।
(३) पह्लव-इसी प्रकार का पल्लव वंश तमिलनाडु में शासन करता था। पल्लव का अर्थ पत्ता या फूल की पंखुड़ी है, जिसमें रेशे दीखते हैं। परिश्रम करने पर मांस पेशियों में भी रेशे दीखते हैं। अतः मल्ल को पल्लव = पहलवान् कहते हैं। इसे ऐतरेय ब्राह्मण (३२/१) में पुष्पित कहा गया है। बाद में पल्लवों को सासनी, पार्थव भी कहा गया। मार्कण्डेय पुरान, अध्याय ५४ के अनुसार कश्मीर के लोगों जैसी ये जातियां हैं-बाह्लीक, वाटधान, पह्लव, चर्मखण्डिक, गान्धार, पारद, हारभूषिक, काम्बोज, दरद।
(४) कम्बोज का मूल है काम-भोज, अर्थात् स्वेच्छाचारी। यह पश्चिम में था और थाइलैण्ड के दक्षिण के कम्बुज (कम्बोडिया) से भिन्न है।
(५) शक जाति जरथ-उष्ट्र (बूढ़ा ऊंट) या जोरोस्टर के अनुयायी थे। भविष्य पुराण (१३९/४३-४५, अध्याय १४) के अनुसार ये अफगानिस्तान के पश्चिम थे। शक द्वीप अलग है।
(६) यवन भारत की पश्चिमी सीमा पर थे। सगर द्वारा खदेड़े जाने पर ये ग्रीस चले गये जिससे उस देश का नाम यूनान हुआ।
(७) हेलि या हैलेय असुर ग्रीस में रहते थे} इनके विशाल शरीर के कारण इनको गिरिकाय कहते थे, जिससे ग्रीक नाम हुआ।
दुहरे नाम-विष्णु पुराण (२/३) के अनुसार शिक्षा और सभ्यता में भारत को प्रमाण मानते थे अतः इसके नामों का अनुकरण निकटवर्त्ती भागों में होता है-
(१) मलय -केरल में मलयगिरि तथा मलयालम भाषा है। केरल की राजधानी का समुद्र तट पर कोवलम है, मलयेसिया की राजधानी भी कुवालालम्-पुर है।
(२) उत्तर किष्किन्धा में बाली का प्रभुत्व था। इनके ओड़िशा में कई स्थान है-बालिकुदा, बालिगुड़ा, बालिमेला आदि। इसके जैसा इण्डोनेसिया में बाली द्वीप है।
(३) अंग-भारत में पश्चिम बंगाल है। आस्ट्रेलिया को भी अंग कहते थे।
(४) कन्या कुमारी-पूर्व अफ्रीका में केन्या है। इसका अनुवाद बाइबिल में वर्जिन मदर है।
(५) मुम्बई-पूर्व अफ्रीका में मोम्बासा।
(६) मालदीव-पश्चिम अफ्रीका में माली।
(७) बंग-बंगलादेश। बोर्निओ में कालीबंगन, कालीमन्तन।
(८) चम्पा-भागलपुर, चम्पारण। कम्बोडिया। 
(९) सुह्म-मिदनापुर, स्याम (थाईलैण्ड)।
इस प्रकार भारत की मुख्य भूमि तथाउसके अन्य ८ खण्डों के स्थान नाम समान हैं- 
(१) इन्द्रद्वीप (क) इरावती के पूर्व बर्मा का महेन्द्र पर्वत, लाओस जहां का हाथी ऐरावत श्वेत था। (ख) पश्चिम सीमा पर जहां पाक दैयों क दमन किया वहां इन्द्र का नाम पाकशासन हुआ। जहां इस प्रकार शक्ति प्रदर्शित की वह स्थान शक्र (सक्खर जिला, हक्कर नदी) हुआ (पाकिस्तान में)। वहां आक्रमण के लिये जहां छावनी बनाई वह इन्द्रप्रस्थ हुआ, जो नागों के अधिकार में खाण्डव-प्रस्थ तथा अर्जुन द्वारा कब्जा करने के बाद पुनः इन्द्रप्रस्थ हुआ।
(२) कशेरुमान-इण्डोनेसिया का दक्षिण पूर्व, वियतनाम (आन्ध्र तट पर अनाम), मेकांग (मा गंगा) तथा गोदावरी डेल्टा।
(३) गभस्तिमान-कशेरु के दक्षिण, मलक्का समुद्र। गोदावरी से महानदी के बीच ऋक्ष और मलय पर्वत।
(४) ताम्रपर्णी-तमिलनाडु का समुद्र तट, श्रीलंका का दक्षिण भाग।
(५) नागद्वीप-तमिलनाडु और श्रीलंका में नागपत्तनम्, अण्डमान-निकोबार।
(६) सौम्य (उत्तर में तिब्बत-ब्रह्मपुत्र, गंगा और सिन्धु के स्रोत ब्रह्म, शिव तथा विष्णु विटप हैं। सुमात्रा भी सौम्य है।
(७) वरुण-पूर्व में बोर्निओ। पश्चिम में अरब देश, जहां की ५ जातियां पञ्चजन थीं, इनको भगवान् कृष्ण ने पराजित कर अपहृत लोगों को छुड़ाया था।

श्राद्धकर्म में केला का महत्त्व

🌹श्राद्धकर्म में केला का महत्त्व🌹

🌹सम्मान्य धर्मनिष्ठ मित्रामित्रो! आज मैं श्राद्धकर्म में केला के प्राशस्त्याप्राशस्त्य पर चर्चा कर रहा हूँ। शास्त्ररूप कल्पवृक्ष में देश, काल, पात्र, परिस्थिति और शाखादि के भेद से विविध प्रकार के वचन प्राप्त हो जाते हैं; जिनकी सङ्गति लगानी चाहिए।

🌹फेसबुक के कई विद्वानों एवम् अविद्वानों ने भी श्राद्धकर्म में #कदलीफल का विरोध किया है, जिसका विचार आवश्यक है। मैं पहले निषेधपरक वचनों को दिखाकर पुन: प्राशस्त्य का प्रस्थापन करूँगा। 

(१.)गीताप्रेस के अन्त्यकर्म श्राद्धप्रकाश के पृ. २९९ पार्वण श्राद्ध की सामग्रीसूची में कोई प्रमाणवाक्य दिये बिना ही केला का निषेध लिखा है। जिसको प्रमाण मानकर कई लोगों ने मेरे पार्वणकृत्य पर विपरीत टिप्पणियाँ कर दी हैं।

(२.)श्राद्धचन्द्रिका के भोजनपत्रप्रकरण पृ.२८ में "न जातीकुसुमानि दद्यान्न कदलीपत्रम्" (अङ्गिरस्) और "असुराणां कुले जाता रम्भा पूर्वपरिग्रहे। तस्या दर्शनमात्रेण निराशा: पितरो गता:।।" (क्रतु) असुरों के कुल में उत्पन्न होने से श्राद्ध में #रम्भा यानी केला का निषेध है। (तब तो आसुर होने से देवकर्म में भी निषेध ही होना चाहिये?)

(३.)श्राद्धकल्पलता के पृ.७३ में श्राद्धचन्द्रिका की ही पंक्तियाँ यथावत् रख दी गई हैं। (सर्वत्र पूर्वापर को देखना चाहिये।)

🔥विधिवाक्य और स्थल🔥

(१.)जिन श्राद्धचन्द्रिका और श्राद्धकल्पलताकार ने श्राद्ध में कदलीपत्र की निषेधपरक टिप्पणी दी है, वहीं पर मूलवचन देकर उन्होंने इसे वैध बताया है "कदलीचूतपनसजम्बुपुन्नागचम्पका:। अलाभे मुख्यपात्राणां ग्राह्या: स्यु: पितृकर्मणि।।" (बोपदेव स्मृतिसंग्रह) स्वर्णादि मुख्य पात्र के अभाव में कदलीपात्र ग्राह्य हैं। 

(२.)नृसिंहप्रसाद श्राद्धसार के पृ.१२० में "असुराणां कुले जाता जाती पूर्वपरिग्रहे। तस्या दर्शनमात्रेण निराशा: पितरो गता:।।" 'रम्भा' के स्थान में 'जाती' पुष्प का वैकल्पिक निषेध लिखा है, केला का नहीं। एक ही श्लोक के दो पाठभेद हैं। वहीं पृ.५१ में "लकुचं मोचमेव च" मोच यानी केला को श्राद्ध में प्रशस्त बताया है।

(३.)पितृकर्मनिर्णय पृ.१०६ में "लोचै: समोचैर्लकुचै: ..... दत्तेषु मासं प्रीयन्ते श्राद्धेषु पितरो नृणाम्।।" श्राद्ध में मोच यानी कदलीफल देने से मासपर्यन्त पितर तृप्त रहते हैं।

(४.)पितृकर्मनिर्णय पृ.१०७ "पनसाम्रनारिकेलकदली ..... फलानि श्राद्धे देयानि" कदलीफल श्राद्ध में देना चाहिये।

(५.)श्राद्धमञ्जरी पृ.३ "कदलीफलानि ... श्राद्धे प्रशस्तानि" कदलीफल श्राद्ध में प्रशस्त है।

(६.)श्राद्धमयूख पृ.३२ "कट्फलं काङ्कुणी द्राक्षा लकुचं मोचमेव च" श्राद्ध में मोचफल यानी केला प्रशस्त है।

(७.)स्मृतिमुक्ताफल श्राद्धखण्ड पृ.७८१ "आम्रांश्च कदलीभेदान् ..... श्राद्धकालेऽपि दापयेत्" श्राद्ध में केला देना चाहिये।

(८.)स्मृतिमुक्ताफल श्राद्धखण्ड पृ.७८२ "कदलीजातय: पञ्च ..... श्राद्धे चात्यन्तमुन्नतम्" केला श्राद्ध में अत्यन्त श्रेष्ठ है।

(९.)स्मृतिमुक्ताफल श्राद्धखण्ड पृ.७८२ "कदलीफलानि .... मुन्यन्नानि च श्राद्धे प्रशस्यते" कदलीफल श्राद्ध में प्रशस्त है।

(१०.)स्मृतिमुक्ताफल श्राद्धखण्ड पृ.७८३ "मोचै: .... दत्तैस्तु मासं प्रीयन्ते श्राद्धेषु पितरो नृणाम्" श्राद्ध में केला देने से पितरों को एक मास की तृप्ति होती है।

(११.)श्राद्धक्रियाकौमुदी पृ.१७ "श्राद्धे मोचफलं देयम्" श्राद्ध में मोचफल यानी केला देना चाहिये।

(१२.)वीरमित्रोदय श्राद्धप्रकाश पृ.४२-४३ "लकुचं मोचकं तथा" मोचकफल यानी कदलीफल श्राद्ध में देय है।

(१३.)वीरमित्रोदय श्राद्धप्रकाश पृ.१५६ "कदलीचूत ..... ग्राह्या: स्यु: पितृकर्मणि" श्राद्ध में कदलीपत्र ग्राह्य है।

(१४.)चतुर्वर्गचिन्तामणि परिशेषखण्ड पृ.५५४ "लकुचं मोचमेव च ..... शस्तानि श्राद्धकर्मणि।।" श्राद्धकर्म में मोचफल यानी कदलीफल प्रशस्त है।

(१५.)स्मृतितत्त्वान्तर्गत श्राद्धतत्त्व पृ.२२६ "मोचं-कदलीफलं श्राद्धे शस्तम्" श्राद्ध में कदलीफल प्रशस्त है।

(१६.)निर्णयसिन्धु मूल पृ.३११ में भी श्राद्धचन्द्रिका वाली पंक्तियाँ ही लिखी हैं।

(१७.)धर्मसिन्धु मूल पृ.३०९ "भोजनपात्राणि हेमरौप्यकांस्यजानि वा पलाशकमलकदलीदलमधूकपत्रनिर्मितानि वा" श्राद्ध में कदलीपत्र को प्रशस्त बताया है।

(१८.)कृत्यसारसमुच्चय के हविष्यप्रकरण में निर्णयनिबन्ध का वाक्य है "यत्नपक्वमपि ग्राह्यं कदलीफलमुत्तमम्" पका कदलीफल ग्रहण करना चाहिये। 

(१९.)श्राद्धचिन्तामणि (वाचस्पति मिश्र) पृ.६८ पं.८म में "मोरमेव च- मोरं कदलीफलं श्राद्धे देयम्" श्राद्ध में कदलीफल देय है।

(२०.)शिवपुराण ६।१३।११-१२ "पात्राणि कदलीपत्राणि"", "दत्वा पदार्थान्कदली" आदि।

(२१.)मिथिला और बङ्गाल आदि में श्राद्ध के लिये कदलीपत्र और कदलीफल की अनिवार्यता है। पद्धतिकारों ने भी लिखा है।

(२२.)धर्मशास्त्र के अनुसार श्राद्ध में केला के पुष्प का निषेधवचन मिला है।

🌹सज्जनो! श्राद्धकर्म में केला की प्रशस्तता में मेरे पास और भी प्रमाण हैं। जय शिव... 
🌷आपका मङ्गल हो💐

महाभारत

पता नहीं किस आधार पर एक मित्र कह रहे थे कि अर्जुन अपने जीवन मे कुल 21 बार हारे है। उनके पास कोई भी प्रामाणिक संदर्भ या स्रोत नहीं हैं? श्रीकृष्ण ने युद्ध में 8 बार अर्जुन के प्राणों की रक्षा की। और यदि की भी तो वो पराजय किस प्रकार हो गयी?

समस्या ये है कि आज हम इस कदर उन वाहियात टीवी सीरियलों से जुड़े हुए हैं जो बिना किसी शोध एवं तथ्य के, केवल अपने शो को प्रचलित करने के लिए भारतीय दर्शकों के सामने कुछ भी परोस देते हैं। वर्षों से यही सब बकवास देखते देखते आज की लगभग पूरी पीढ़ी इसे ही सत्य मानने लगी है। रामायण, महाभारत और हमारे धार्मिक ग्रंथों की जैसी दुर्गति टीवी और सिनेमा ने की है उसका कोई और उदाहरण नही है। यदि आप उन्ही से अपना संदर्भ ले रहे हैं तो अर्जुन को 21 बार क्या, 210 बार हराइये, उससे सत्य नही बदल जाएगा।

दूसरी समस्या ये भी है कि आज मूल महाभारत, जिसे जय कहते थे, हमारे बीच है जी नही। आज महाभारत का जो स्वरूप हमारे बीच है उसमें बहुत मिलावट है। कहते हैं महर्षि वेदव्यास ने मूल ग्रंथ केवल 8800 श्लोकों का लिखा था जिसका नाम "जय" था। ये वही श्लोक थे जिनका अर्थ अत्यंत कठिन था और जिनकी रचना उन्होंने भगवान गणेश की लेखन गति कम करने के लिए की थी। बाद में उन्होंने उस ग्रंथ का 67200 श्लोकों तक और विस्तार किया और उसका नाम "भारत" रखा। देवताओं ने इस महान ग्रंथ को वेदों से भी श्रेष्ठ समझा और इसे "महाभारत" का नाम दिया। यहाँ तक ये रचना शुद्ध रूप से महर्षि वेदव्यास की ही थी।

बाद में उनके शिष्य ऋषि वेंशपायन ने 24000 श्लोकों की रचना कर इसे महाभारत में ही मिला दिया जिससे कुल श्लोकों की संख्या 100000 हो गयी। तत्पश्चात हरिवंश पुराण के सभी श्लोकों को भी इसी में जोड़ दिया गया जिससे श्लोकों की संख्या 120000 चली गयी। ध्यान रहे कि ये सभी श्लोक महर्षि वेदव्यास द्वारा रचित नही थे। इसी कारण आज महाभारत की कथाओं में हमें बहुत विरोधाभास भी देखने को मिलता है। बांकी रही सही कसर तो भारतीय टीवी ने पूरी कर ही दी।

अपने दिव्यास्त्रों के कारण अर्जुन लगभग अपराजेय थे, इसी कारण उनका एक नाम "विजय" भी था। ऐसा नही है कि उन्हें परास्त करना असंभव था किंतु मूल महाभारत में उनकी स्पष्ट पराजय का वर्णन मिलना दुर्लभ है। विराट युद्ध में तो उन्होंने अकेले ही पूरी कुरुसेना को परास्त कर दिया था जिसमें स्वयं भीष्म, द्रोण एवं कर्ण जैसे महारथी थे। यदि आपने बीआर चोपड़ा कृत महाभारत (1988) देखी हो तो उसमें विराट युद्ध बहुत अच्छे से दिखाया गया है, किन्तु यदि आपने स्टार प्लस वाले महाभारत, या उससे भी वाहियात सूर्यपुत्र कर्ण सीरियल देखा होगा तो उन्होंने पूरे विराट युद्ध को ऐसे दिखाया है जैसे वो अर्जुन और कर्ण का व्यक्तिगत युद्ध था, जिसमें कर्ण परास्त ही नहीं हुए। शुद्धता में मिलावट इसे ही कहते हैं।

महाभारत में केवल एक बार उनकी स्पष्ट पराजय का वर्णन है और वो है भगवान शंकर द्वारा। किन्तु इसे गिना नही जाता क्योंकि महादेव से भला कैसे जीत जा सकता है। अर्जुन तो फिर भी उनके सम्मुख कुछ क्षणों के लिए खड़े रह सके, यही देख कर महादेव अत्यंत प्रसन्न हुए और उन्हें पाशुपतास्त्र प्रदान किया। महादेव से परास्त होने का सौभाग्य भी इतिहास में विरलों को ही प्राप्त है। अब जिनके पास पाशुपतास्त्र हो उनसे भला और कौन जीत सकता है?

बर्बरीक के बारे में बहुत चर्चा होती है किन्तु उनका वर्णन मूल महाभारत में है ही नहीं। इसके अतिरिक्त अर्जुन और चित्रांगदा के पुत्र बब्रुवाहन एवं सुभद्रा के कारण श्रीकृष्ण एवं अर्जुन के मध्य युद्ध का भी वर्णन मूल महाभारत में नही है। कर्ण द्वारा अर्जुन के पराजय के जितने किस्से टीवी में भर भर कर दिखाए जाते हैं वैसा कुछ भी महाभारत में नही है। इसके अतिरिक्त भी और घटनायें, जिसने आपकी सूची को 21 तक पहुंचा दिया है, उसके होने में भी स्पष्ट संशय ही है।

ये सत्य है कि श्रीकृष्ण के अतिरिक्त कुछ योद्धा थे जिनमें कदाचित अर्जुन को परास्त करने का समर्थ था, जैसे भीष्म एवं द्रोण, किन्तु फिर भी महाभारत में इनके द्वारा अर्जुन के स्पष्ट पराजय का कोई वर्णन नही है। कर्ण को मैं यहाँ नही जोड़ रहा क्योंकि वो मूल महाभारत में अर्जुन और उनके अतिरिक्त भीम और अन्य योद्धाओं से भी परास्त हुए। उस पर से बेचारे कई श्रापों से जूझ रहे थे।

यहाँ कर्ण का अपमान करने का मेरा कोई आशय नहीं है, वे एक महान प्रचण्ड योद्धा थे, इसमें कोई संदेह नही है। मैं आपको बताना चाहूंगा कि कर्ण महाभारत में मेरे प्रिय पात्रों में से एक है। किन्तु किसी के प्रेम में इतना भी नही डूब जाना चाहिए कि सत्य असत्य कुछ दिखे ही नही।

अंत मे जाते जाते केवल ये कहूंगा कि मुझे समझ में नही आता जब स्वयं महर्षि वेदव्यास ने अपने ग्रंथ में अर्जुन को कही परास्त नही किया, तो हम क्यों जबरदस्ती कई भ्रामक पराजयों को उनपर थोपना चाहते हैं? हम व्यास द्वारा रचित महाभारत को, जिसे पंचम वेद तक कहा गया है, अपनी सुविधा अनुसार बदलने का प्रयत्न क्यों करना चाहते हैं? यदि उन्होंने महाभारत में अर्जुन को श्रेष्ठ बताया है तो इसका अर्थ ये तो नहीं ना कि अन्य लोग श्रेष्ठ नहीं है? हमें ये बात मानने में क्यों आपत्ति है कि जो महर्षि वेदव्यास ने लिखा है केवल वही सही है, बांकी सब झूठ? क्या आपको नही लगता कि ऐसा कर हम महर्षि वेदव्यास की समझ और उनकी रचना पर ही प्रश्नचिन्ह उठा रहे हैं? सोचियेगा अवश्य।

मनु स्मृति और विलियम जोन्स

मनु स्मृति का जब जब उल्लेख होगा तो विलियम जोन्स का नाम मनु के साथ जुड़ा ही रहेगा। कारण ये है कि वर्तमान मनु स्मृति का मूल संपादन तो विलियम जोन्स ने ही किया था। इस प्रकार मनु स्मृति के नाम पर जो संकलन है, उसकी एक-एक पंक्ति यदि किसी की निगाह से प्रकाशन के पहले गुजरी थी तो वह विलियम जोन्स ही थे। इसीलिए मैं इसे जोन्स स्मृति कहने से नहीं हिचकता।

मुझे विलियम जोन्स से जुड़े अनेक मौलिक दस्तावेजों को देखने का अवसर मिला है। मेरे गुरुदेव पूज्य प्रो. स्व. कमलेश दत्त त्रिपाठी की प्रेरणा थी कि मैं इस पर ध्यान दे सका। 

हुआ यह था कि मैं कौटिल्य अर्थशास्त्र पर एक लेक्चर की तैयारी कर रहा था। उसी समय कौटिल्य अर्थशास्त्र में मुझे अनेक स्थानों पर मनु के उद्धरण दिखाई दिए। कौटिल्य ने बड़े सम्मान से मनु का जिक्र अनेक नीतिपरक वाक्यों में किया है। 
जनपद स्थापना के अध्याय में कौटिल्य ने शूद्र वर्ण के अधिकारों की चर्चा की है, ग्राम बसावट में शूद्र वर्ण की पूरी व्यवस्था सुनिश्चित की और विद्या अधिकार में भी शूद्र वर्ण को संपूर्ण सुविधा के निर्देश हैं। 

तभी मेरे मन में प्रश्न उठा था कि ये जो आज की मनु स्मृति है, इसके भीतर के विभेदकारी वाक्यों को कौटिल्य ने आखिर क्यों स्वीकार नहीं किया? अथवा ये मनु स्मृति कौटिल्य के सामने थी ही नहीं, कोई और थी? गुरुवर ने तब समाधान दिया।

उन्होंने मुझे अनेेक अनुभव सुनाए और प्रेरित किया कि मैं विलियम जोन्स के पत्रों के संग्रह का अवलोकन करूं जिसे उनकी मौत के बाद उनके मित्र लॉर्ड टीगनमाउथ ने 1807 में Memoirs of the life, writings and correspondence of Sir William Jones के नाम से पुस्तक रूप में लंदन से प्रकाशित किया है। टीगनमाउथ ही वारेन हेस्टिंग्स के बाद 1793 में बंगाल के गवर्नर जनरल नियुक्त हुए थे। उन्हें जॉन शोर के रूप में जाना गया।

उल्लेखनीय है कि विलियम जोन्स का निधन 27 अप्रैल 1794 को हुआ था। इसी वर्ष उन्होंने मनु स्मृति का संपादित दूसरा अंग्रेजी संस्करण भी इंस्टीट्यूट ऑफ हिंदू लॉ के रूप में प्रकाशित कर दिया था। यही प्रारंभिक दौर था जबकि अंग्रेज जाति मनु स्मृति की खोज कर उसे प्रकाशित करने में सबसे ज्यादा दिलचस्पी दिखा रही थी।

इस पुस्तक में अनेक मौलिक और विचारणीय संदर्भ हैं। 14 सितंबर 1790 दिनांकित एक चिट्ठी मूल रूप में ऊपर वर्णित पुस्तक में है। विलियम जोन्स ने इसे कृष्णा नगर, कोलकाता से किन्हीं डॉ. प्राइस को लिखा है। वह अपने कार्य का ब्यौरा देते हुए लिखते हैं कि-

"हमारे नियंत्रण में बीस मिलियन (दो करोड़) भारतीय नागरिक/प्रजा हैं (मैं यह बात पुख्ता जानकारी के साथ कह रहा हूँ), जिनकी पारंपरिक विधिशास्त्र को मैं इस समय संकलित और व्यवस्थित कर रहा हूँ, इस आशा के साथ कि उनकी संपत्ति उनके और उनके उत्तराधिकारियों के लिए सुरक्षित की जा सके।" (पृ. 422, टिगनमाउथ)

18 अक्टूबर 1791 दिनांकत पत्र जोसेफ बैंक्स ( अध्यक्ष, रॉयल एशियाटिक सोसायटी ऑफ लंदन) को संबोधित है। इसमें विलियम जोन्स ने बहुत सी दुर्लभ भारतीय वानस्पतिक प्रजातियों का विस्तृत ब्यौरा दिया है। 

इसके अंतिम पैरा में उन्होंने अपने स्वास्थ्य से आशंकित होकर लिखा है कि-
''मैं आपको संस्कृत, अरबी की अनमोल पांडुलिपियों से भरा बक्सा भेज रहा हूं। यह आपके संरक्षण में रहेगी। मेरे इंग्लैंड लौटने पर आप इसे मुझे सौंप दीजिएगा।...और यदि मैं चीन की समुद्री यात्रा के बीच ही मर जाता हूं या ईरान की समुद्री यात्रा के मध्य ही मेरा निधन हो जाता है तो आप अपनी इच्छा से इन पांडुलिपियों का निस्तारण कर दीजिएगा।'' (p.434, टीगनमाउथ)

20 अक्टूबर 1791 को वॉरेन हेस्टिंग्स को संबोधित पत्र में विलियम जोन्स ने लिखा है कि- 
यहां पंडितों के साथ मैं उनकी देववाणी संस्कृत में धाराप्रवाह बातचीत करता हूं। कोर्ट के काम के अतिरिक्त मैं मनु के अनुवाद में जुटा हूं। इस बारे में मेरे कहे अनुसार ग्रंथ संपादित हो रहा है।

...सैमुएल डेविस ने सूर्य सिद्धांत का अंग्रेजी अनुवाद किया है, उसे इंडियन एस्ट्रोनॉमी (भारतीय खगोल विज्ञान) के अध्ययन में लगाया है और विल्फोर्ड मेरे मार्गदर्शन में बनारस का भोगौलिक अध्ययन कर रहे हैं. मुझे पता चला है कि स्कंद पुराण में उन्हें अफ्रीका, यूरोप और यहां तक कि ब्रिटेन का भी संदर्भ मिल गया है। भारत के राजनीतिक मामलों में बहुत निश्चितता के साथ नहीं कह सकता लेकिन मैसूर में हालात हमारे अनुकूल नहीं हैं।

इसी पुस्तक के पृष्ठ क्रमांक 438 पर लेखक टीगनमाउथ मनु स्मृति के अनुवाद के पीछे के कारण को स्पष्ट करते हुए लिखते हैं-
"In the beginning of 1794, Sir William Jones published a work in which he had long been engaged: a translation of the Ordinances of Manu, comprising the Indian system of religious and civil duties. This task was suggested by the same motives that had induced him to undertake the compilation of the Digest, to aid the benevolent intentions of the Legislature of Great Britain..."

"1794 के प्रारंभ में, सर विलियम जोन्स ने एक ऐसी कृति प्रकाशित की जिसमें वे लंबे समय से जुटे थे: मनु के निर्देशों (मनुस्मृति) का एक अनुवाद, जिसमें धार्मिक और नागरिक कर्तव्यों की भारतीय संहिता शामिल थी। इस कार्य की प्रेरणा उन्हीं उद्देश्यों से मिली थी जिन्होंने उन्हें 'डाइजेस्ट' (कानूनी संकलन) तैयार करने के लिए प्रेरित किया था, ताकि ग्रेट ब्रिटेन की संसद (विधायिका) के परोपकारी इरादों को पूरा करने में सहायता दी जा सके..."

इसी में पृष्ठ क्रमांक 439 पर लिखा है कि-
"...yet I wish to complete the system of indian laws while I remain in India, because I wish to perform whatever I promise, with the least possible imperfection, so that they might administer justice to the Indians according to their own laws."

"...फिर भी मेरी इच्छा है कि मैं भारत में रहते हुए ही भारतीय कानूनों की इस प्रणाली (संकलन) को पूरा कर लूँ, क्योंकि मैं जो भी वादा करता हूँ, उसे न्यूनतम संभव त्रुटि (कम से कम कमियों) के साथ निभाना चाहता हूँ, ताकि वे (ब्रिटिश न्यायाधीश) भारतीयों को उनके अपने ही कानूनों के अनुसार न्याय प्रदान कर सकें।"

दरअसल ब्रिटिश सुप्रीम कोर्ट के जजों का बंगाली पंडितों से बहुत से न्यायिक विषयों में वाद-विवाद हो जाता था। जजों का आरोप था कि पंडित लोग मनमाने तरीके से व्याख्या कर रहे हैं। हर पंडित के पास अपनी अलग विधि संहिता है, जहां वह कई तरह से विधि की व्याख्या करता है। इसलिए एक कॉमन संहिता जरूरी हो गई। इसी कारण से विलियम जोन्स जो पहले से भाषाविद् थे, उन्होंने संस्कृत भाषा के लिए पंडित रामलोचन को अपना शिक्षक नियुक्त किया। और कुछ ही वर्षों में वह खुद भी विद्वान बन गए।

उन्होंने उस समय के बड़े बंगाली विद्वानों की सूची तैयार की। सबके पास जो भी विधि संहिता की मूल पांडुलिपियां थीं, उन्होंने मुंहमांगे दाम पर एकत्रित करनी प्रारंभ कर दी। 11 बंगाली पंडितों की समिति गठित की गई। उस समिति को देश भर से जुटाए गई पोथियां दी गईं। इसमें अनेक पाठ, मत-मतांतर शामिल थे। 

विलियम जोन्स जीवन भर खुद को भारत की विद्याओं के लिए समर्पित करते रहे। लेकिन चुपके से उन्होंने कई विषबीज रोप दिए। आर्यों के आगमन का सिद्धांत वही लेकर आए। उन्होंने सिद्धांत दिया कि संस्कृत, ग्रीक, लैटिन, जर्मनिक और पर्शियन (फारसी) भाषाओं के व्याकरण और शब्दों में गहरी समानता है। ये सभी भाषाएँ एक ही मूल भाषा परिवार से निकली हैं, जिसे बाद में 'इंडो-यूरोपियन भाषा परिवार' कहा गया। 

भाषा विज्ञान से जुड़ी जोन्स की इस खोज ने ही अनजाने में यूरोप और भारत के लोगों के एक ही मूल (आर्य) से जुड़े होने के विचार की नींव रखी, जिसमें यह संकेत उन्होंने ही दिया कि आर्यों का बाहर से आगमन हुआ था। इसके साथ वह बहुत सी गलत व्याख्याएं करते चले गए। किसी ने उस समय उन्हें चुनौती नहीं दी। 

बहुत से विद्वान विलियम जोन्स की विद्वत्ता पर मुग्ध रहते हैं। उनके विरुद्ध कोई शब्द सुनना ही नहीं चाहते। तर्क दिया जाता है कि वह शुद्ध वि्दवान थे, उनके मन में कोई और दूषित तत्व नहीं था। हालांकि लॉर्ड टीगनमाउथ ने पृष्ठ 453 पर स्वयं ही लिखा है कि-
The conversion of the hindus to the Christian religion would have afforded him the sincerest pleasure, his wish that it should take place , is still more clearly expressed in his hymns to Lachsmi.

"हिंदुओं का ईसाई धर्म में परिवर्तन (धर्मातंरण) से उन्हें सबसे सच्ची प्रसन्नता मिलती; ऐसा होने की उनकी यह इच्छा, देवी लक्ष्मी को समर्पित उनकी कविता (Hymns to Lakshmi) में और भी अधिक स्पष्ट रूप से व्यक्त होती है।"

वस्तुतः विलियम जोन्स ने हिंदु ग्रंथों में वर्णित अनेक देवी-देवताओं पर मौलिक कविता जैसी पंक्तियां लिखी थीं। इसी में एक कविता लक्ष्मी माता पर है जिसमे उन्होंने अंत में संकेत में अपनी कुत्सित मनोवृत्ति का परिचय दिया है कि भारत के लोग अंततः 'अज्ञानता के अंधकार' से निकलकर 'ईसाई धर्म के प्रकाश' (सत्य) को स्वीकार कर लें, इसी में सबकी भलाई है।

कुछ यही विचार व्हाइट्स मेन बर्डेन में रूडयार्ड किपलिंग ने विलियम जोन्स के गुजर जाने के 100 साल बाद प्रकट किए थे। 

जैसे जोन्स का मानना था कि हिंदू धर्म और उसकी संस्कृति कितनी भी समृद्ध क्यों न हो, वह ईसाई धर्म से नीचे है। उनकी इच्छा थी कि भारत के लोग अपनी अज्ञानता छोड़कर ईसाई धर्म को अपना लें।

रुडयार्ड किपलिंग की भी यही भावना दिखती है। किपलिंग ने 1899 में लिखी अपनी कविता में गैर-सफेद (एशियाई और अफ्रीकी) लोगों को नस्लभेद के आधार पर "अधूरे शैतान और अबोध" (Half devil and half child) कहा है।

उनका मानना था कि इन 'अंधकार में जीने वाले जंगली लोगों' को सभ्य बनाना, इन्हें ईसाई मूल्यों से परिचित कराना और इन पर शासन करना गोरे लोगों (White Men) का एक नैतिक और कष्टदायी कर्तव्य (Burden/बोझ) है।

इस प्रकार दोनों ही यह मानते हैं कि भारतीय या गैर-यूरोपीय लोग आध्यात्मिक और सामाजिक रूप से पिछड़े हुए हैं और उन्हें "सभ्यता के प्रकाश" (जो कि ईसाईयत और पश्चिमी तौर-तरीके हैं) की जरूरत है।

मनु स्मृति का अनुवाद ब्रिटिश सरकार ने जिस मकसद से किया था, उसका असर आज पूरे विषैले मकर-जंजाल के रूप में भारतीय जीवन धारा पर छाया दीख रहा है। इससे मुक्ति आवश्यक है।  

विलियम जोन्स ने मनु स्मृति के रूप में वस्तुतः विषबीज का वपन किया था। इसमें उसने षड्यंत्र पूर्वक मिलावट की थी। यही ग्रंथ आगे मनु स्मृति के अन्य प्रकाशनों का मूल आधार बना। इसे स्वामी दयानंद सरस्वती ने चुनौती दी। 

इसकी मिलावट को उन्होंने 1870-75 के आस-पास दिए गए अपने प्रवचनों में स्पष्ट बता दिया था। कालांतर में उनके शिष्यों ने भी शोधपूर्वक बताया कि मनुस्मृति के कुल 2,685 श्लोकों में से 1,471 श्लोक मिलावटी (नकली) हैं और केवल 1,214 श्लोक ही महर्षि मनु के मूल श्लोक हैं।  

वस्तुतः पूरा एशियाटिक सोसायटी ऑफ बंगाल मिलावट के काम में चुपचाप सक्रिय था। रिश्वत देकर जो ब्रिटिश अफसरों ने चाहा, उसे लिखवाया गया। भारतीय राजनीति, प्रशासन, समाज और भारत की समस्त देशी संरचनाओं पर कहर बरपा दिया गया।

कल्पना करिए कि इसी मिलावटी मनु स्मृति को गढ़कर, फिर उसे पढ़ने के लिए राजा राम मोहन राय, ईश्वर चंद्र विद्यासागर, पुणे में ज्योतिराव फुले, बाद में डॉ. भीमराव अंबेडकर को भी यही मिलावटी ग्रंथ थमा दिया गया तो इनके मन में क्या विचार पनपा होगा। 

बारी-बारी सभी अंग्रेजों की गलत शिक्षा, षड्यंत्र के शिकार हुए, किंतु किसी ने यह नहीं सोचा कि अंग्रेजों के आगमन के बाद ही मनु स्मृति आदि भारतीय इतिहास के पन्नों को लेकर विभ्रम पैदा किया जा रहा है तो क्यों किया जा रहा है। आखिर क्यों चोखामेला महार ने, या संत शिरोमणि रैदास ने मनु स्मृति पर तीखे सवाल नहीं किए थे। आखिर कबीर जैसा अध्येता क्यों मनु स्मृति पर खामोश रह गया। मतलब साफ है कि ऐसी कोई स्मृति थी ही नहीं।

विलियम जोन्स ने 1882 से 1894 के 12 सालों में(1782 से 1794 corrected) भारत के विध्वंस की पूरी तकनीकी तैयार की। इसी तकनीकी पर आगे बांटों और राज करो की राजनीति ब्रिटिश अफसरों ने विकसित की। इसी राजनीति को हमारे देश के अनेक नेता आज भी बढ़ाने में जुटे हैं। ऐसे तत्वों से मुक्ति का यही समय है, सही समय है। हमें अकादमिक रीति से प्रारंभ करना होगा। सप्रमाण आगे बढ़ना होगा।

(मार्च 1783 में ब्रिटिश सम्राट ने विलियम जोन्स को बंगाल सुप्रीम कोर्ट के जज के रूप में नियुक्त किया था और जोन्स ने सितंबर 1783 में भारत आकर कार्यभार ग्रहण कर लिया। उन्हें कालांतर में सर की उपाधि मिली। 15 जनवरी 1784 को गवर्नर जनरल वॉरेन हेस्टिंग्स के मार्गदर्शन में उन्होंने एशियाटिक सोसायटी ऑफ बंगाल की स्थापना की। पहले अध्यक्ष के रूप में वॉरेन हेस्टिंग्स का नाम प्रस्तावित था, किंतु व्यस्त होने के कारण हेस्टिंग्स ने अध्यक्ष के रूप में विलियम जोन्स को ही नामित किया। पहली बैठक की अध्यक्षता रॉबर्ट चैंबर्स ने की जो बाद में रॉयल एशियाटिक सोसायटी ऑफ लंदन के अध्यक्ष नियुक्त हुए।)


#उत्पीड़न_का_प्रपंच :

जो लोग मनुस्मृति के हवाले से जाति के नाम पर राजनैतिक खेल खेल रहे हैं उनको नश्लवादी अंग्रेज ईसाइयों की सच्चाई समझनी चाहिए। 
1807 में दक्षिण भारत का सर्वे करने के बाद उसने हिन्दू समाज को 122 कास्ट/ ट्रेड में वर्णित किया। जाति का अर्थ था मैन्युफैक्चरिंग या ट्रेडिंग कम्युनिटी।

जीवंत शिल्प और वाणिज्य के समय भारत मे जाति एक शक्तिशाली सामाजिक ढांचा था, जिसमे हर जाति या समुदाय के स्वयं के विधान थे, और उनके पालन करवाने हेतु उनके स्वयं का समर्थवान सिस्टम था जिसको आज आप #खाप_पंचायत का एक विकसित स्वरूप समझ सकते हैं। वे किसी धार्मिक या राजनैतिक संस्था से अनुशासित न होकर स्वयं शासित समुदाय थे। इस बात को फ्रांसिस हैमिलटन बुचनान भी लिखता है अपनी पुस्तक में। बुचनान की पुस्तक तीन वॉल्यूम में है लगभग 1450 पेज में।
उसने किसी भी अछूत जाति या ऐसी किसी प्रथा के बारे में लिखा नही है।
क्यों ?
वह अंधा था?
नही अभी ईसाइयो का पूरा ध्यान भारत के धन और वैभव को लूटना था, यहां के साइंस और टेक्नोलॉजी के मॉडल को चुराकर अपने देश मे मैन्युफैक्चरिंग शुरू करना था जिसको वे औद्योगिक क्रांति का नाम देंगे। 
वही भारत के मैन्युफैक्चरिंग और ट्रेड को नष्ट करेंगे।
फिर अपने अपराधों पर पर्दा डालने तथा राजनैतिक और धर्म परिवर्तन का आधार गढ़ने हेतु फेक न्यूज़ की रचना करेंगे। 

जाति के उस स्वरूप के जिंदा रहते उसमे ईसाइयत का प्रवेश संभव नही था। इसीलिये मैक्समुलर लिखता है -" जाति धर्म परिवर्तन में सबसे बड़ी बाधा है, लेकिन सम्भव है कि कभी यह पूरे समुदाय के धर्म परिवर्तन हेतु एक शक्तिशाली इंजन का काम करे"। 

इसलिए उन्होंने कास्ट को टारगेट करके कास्ट को एक अमानवीय प्रथा घोसित करना शुरू किया।

पहले उन्होंने शिल्पकार और वाणिज्यिक समुदायों को आर्थिक रूप से विनष्ट किया फिर आने वाले समयकाल में अनेको कारणों से चार वर्ण वाले हिन्दू समाज को 2000 से अधिक जातियों में वैधानिक रूप से चिन्हित किया। 

मेरी पुस्तक में आपको यह देखने को मिलेगा कि किस तरह ईसाई मिशनरी एम ए शेररिंग ( 1872) ने कास्ट के लिए ब्राम्हणों को अकारण ही भला बुरा कहा। और कास्ट को टारगेट किया। वह काम आज भी जारी है। लेकिन पूरी स्किप्ट उसी की लिखी हुई है। भाषा बदल सकती है लेकिन स्क्रिप्ट वही है।

1901 के जनगणना कमिश्नर रिसले और मैक्समुलर में अच्छी सांठ गांठ थी। 
1901 में रिसले ने मैक्समुलर के #आर्यन_अफवाह से निर्मित तथाकथित सवर्णो को ऊंची जाति घोसित किया बाकी अन्य समुदायों को नीची जाति। 
2378 जातियां।
एक आधुनिक लेखक निकोलस बी डर्क लिखता है:

“ रिसले के द्वारा तैयार किए गए सिस्टम की बुद्धिमत्ता का सबसे बड़ा प्रमाण इस बात से सिद्ध होता है कि इसके कारण बहुत लोगों ने बहुत सारे मुकदमों और प्रतिनिधित्व (memorials) अङ्ग्रेज़ी सरकार के पास भेजे । इसके पूर्व भी जनगणना अधिकारियों के पास शिकायते दर्ज हुयी थे , लेकिन रिसले द्वारा ये घोषणा होने के बाद कि जनगणना को सामाजिक तरजीह का आधार माना जाएगा ; जनगणना को एक ऐसा अभूतपूर्व राजनैतिक हथियार बना दिया”।
 
(निकोलस बी दर्क्स ; कास्ट ऑफ minds पेज- 221 )

“1911 के जनगणना कमिश्नर ने अपनी रिपोर्ट इस शिकायत के साथ शुरुवात की –‘ जनगणना की किसी भी अन्य मुद्दे ने इतनी उत्तेजना पैदा नहीं किया है जितना कि कास्ट की वापसी ने। बंगाल के लोगों को ऐसा लगता है कि जातिगत जनगणना उस कास्ट के लोगों की संख्या जानने के लिए नहीं बल्कि उनको उनकी सामाजिक हैसियत बताने के लिए की जा रही है ....लोगों की इस भावना का कारण पिछली जनगणना रिपोर्ट मे लोगों की सामाजिक हैसियत तय किए जाने के कारण है’।
कमिश्नर ने बताया कि विभिन्न कास्ट संस्थाओं से सैकड़ो मुकदमे दाखिल किए गए हैं, कि उनका वजन ही यदि तौला जाय तो डेढ़ मोन्द (120 पाउंड ) निकलेगा, जिनकी मांग है कि उनका नामकरण बदला जाय और सामाजिक तरजीह मे उनको ऊपर रखा जाय, और उनको तीन द्विज वर्ण मे रखा जाय । शेखर उपद्ध्याय ने नोट किया –‘ लोकल स्तर पर इन नीची (घोसित) जातियाँ का आंदोलन कभी कभी ऊंची जातियों के खिलाफ दुश्मनी पैदा कर रहा है, और कभी कभी नीची जातियों के हरकतों से ऊंची जतियों मे गुस्सा और विरोध देखने को मिल रहा है ?” 

 (निकोलस बी दर्क्स ; कास्ट ऑफ minds पेज- 223 )

1921 और 1931 मे भी जातिगत जनगणना होते है लेकिन 1941 मे जातिगत जनगणना बंद कर दी जाते है उसका कारण बताया गया कि दूसरे विश्व युद्ध के कारण जनगणना अधिकारियों की कमी आ गयी थी।
लेकिन शेखर उपदध्याय का नोट इस बात को प्रमाणित करने के लिए पर्याप्त है कि भारत मे 1857 के बाद हिंदुओं द्वारा उठ रहे विरोध के खिलाफ उनको बांटने की कूटनीति मे अंग्रेज़ सफल हो गए । हिंदुओं को एक दूसरे के सम्मुख खडा करके वे अपने विरोध खड़े हो रहे जन आंदोलन को खत्म करने की कूटनीतिक काट तैयार करने मे सफल हो रहे थे । अब उनको अपना एक नायक चुनना था जो मैकाले की शिक्षा नीति से निकला हुआ शक्ल से भारतीय परंतु अक्ल से अंग्रेज़ हो या उनकी शाजिश को भारत के लोगों की आकांक्षा के रूप प्रस्तुत करने को उद्धत हो। और आने वाले दिनों मे वे उसे खोज भी लेंगे। 
  पहला काम लेकिन ये होगा कि 1906 मे मुस्लिम लीग के नाम पर एक सहयोगी पार्टी तुरंत खोज लिया जाय ।

ब्रिटिश दस्युयों के विरुद्ध 1857 में मुश्लमान और हिन्दू एक साथ लड़े थे। 

50 वर्षो में वे हिन्दू और मुसलमानों को आमने सामने खड़ा करने में सफल रहे। नीति यही थी कि एक समुदाय को सरकारी संरक्षण देकर दूसरे समुदाय को चिढाना और प्रताड़ित करना। 

अगले 20 - 25 वर्षो में हिंदुओं को बांटने की योजना बनाएंगे और जनगणना को हन्थियार की तरह प्रयुक्त करते हुए विकृत इतिहास की मदद से हिंदुओं को बांटेंगे और उनके नायक चुनेंगे जिनको सरकारी प्रश्रय देकर स्थापित नायक बनाया जाएगा। 
इनके ऐतिहासिक नायक भी चुने जाएंगे #एकलव्य_और_शम्बूक के नाम से। 

और वर्तमान नायक भी। 
वे शक्ल से भारतीय और अक्ल से अंग्रेज होंगे - पेरियार और अम्बेडकर।
"एलियंस एंड स्टूपिड प्रोटागोनिस्ट" - मैकाले के शब्दों में।

साधो यह मुर्दों का देश।