Thursday, 9 July 2026

दलाई लामा

दलाई लामा के जन्म दिवस पर 
लामा परम्परा ओड़िशा से आरम्भ हुई थी। आचार्य नरेन्द्र देव की पुस्तक 'बौद्ध धर्म और दर्शन' बिहार राष्ट्रभाषा परिषद से प्रकाशित हुई थी। बाद में मोतीलाल बनारसीदास प्रकाशन ने पुनः प्रकाशित किया। इसमें दीपंकर बुद्ध का चरित्र वर्णित है। इन्होंने राजा सुचन्द्र को वज्र-योग का उपदेश दिया था। यह मार्ग वज्रयान कहा जाता है जिसमें उच्च कोटि की योग साधना की जाती है। इनके बुद्ध-तन्त्र का प्रचार हेवज्र ने किया तथा उस परम्परा में पद्म (सरोरुह) , वज्र, आनन्द-वज्र, अनङ्ग-वज्र हुये। अनङ्ग-वज्र का शिष्य ओडिशा का राजा इन्द्रभूति था जिसकी बहन लक्ष्मीङ्करा ने उनकी शिक्षा को गीतों के रूप में प्रचलित किया जिनको बंगाल में बाउल गीत कहा जाता है। इन्द्रभूति के पुत्र पद्मसम्भव ने तिब्बत में लामा परम्परा का आरम्भ किया। बौद्ध साधना शाक्त मत है जो ३६ तत्त्वों के शैव-दर्शन पर आधारित है। अतः इसके लिये ३६ अक्षरों की लिपि का प्रयोग होता था जो आज अरबी या लैटिन, रूसी है। बौद्ध विद्यालयों में सहपाठी को अबुस कहते थे जो प्रथम ३ वर्णों अ,ब, ज़ (a, b, c) का मिलन है। कम स्तर के व्यक्ति को केवल २ वर्णों से सम्बोधित किया जाता है-अबे (अलिफ + बे) जो तिरस्कार सूचक है। संख्या रूप में अबज़द् आदि १,२,-९ तक को सूचित करते थे। दहाई के अंक कलमन आदि से होते थे (k, l, m, n)। अतः कलाम का अर्थ गुरु, कलम = लेखनी, कलीम = विद्वान् आदि है। इसी प्रकार साधना करने वाले को अल्लामा कहा जाता है जो अ से ल तक (संस्कृत में अलम्) का ज्ञान रखता है। इसे ही लामा कहते हैं। लामा लोगों का प्रधान दलई-लामा है। दलई या दलवाइ ओडिशा, महाराष्ट्र, कर्णाटक में प्रचलित है।


बौद्ध जगन्नाथ और भुवनेश्वर महादेव मंदिर पर दावा कर रहे हैं। कहाँ उचित है?
 
उनके अनुसार वेद पुराण आदि भी बौद्ध शास्त्रों की निन्दा के लिए लिखे गये थे। केवल बुद्ध के बारे में पता नहीं है कि वे २८ बुद्धों में किस बुद्ध की बात कर रहे हैं। स्तूप वंश में २८ बुद्धों का वर्णन है, बौद्ध लेखक अश्वघोष के बुद्ध चरित में सिद्धार्थ बुद्ध ने अपने पूर्व के ७ बुद्धों का उल्लेख किया है। सिद्धार्थ के १३०० वर्ष बाद गौतम बुद्ध कौशाम्बी में हुए थे। फाहियान ने दोनों बुद्धों के अतिरिक्त ४ अन्य का समय तथा जन्म स्थान लिखा है। उसने सिद्धार्थ के आलोचक देवदत्त के मठों का उल्लेख किया है, जो सिद्धार्थ बुद्ध से अधिक लोकप्रिय थे। मौर्य अशोक के निगलिहवा शिलालेख में ४ बुद्धों का उल्लेख है।
कट्टर बौद्ध पुरी के जगन्नाथ मन्दिर का प्रसाद छूते भी नहीं हैं। वहां सम्मेलन में प्रायः वही खिलाया जाता है। बौद्ध विद्वान भूखे रह जाते हैं पर प्रसाद को देखते नहीं हैं।

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