खीचा है, और बडा साफ । नायिका के तन्ल नेत्रों से प्रेम के आँसू बह रहे हैं। वह कुल-बाला अस्थिर हो रही है। वह क्षण-क्षण में उठनी है, और विरहाग्नि की ज्वाला द्विगुण बढ़ जाती है। मलय-चन्दन और मृग-मद आदि से अंगो मे जो कुछ लेप उसने शीतलता के लिए कर रक्खा था, उसके तप्न आँसुओं से कंचुकी के भीगने के साथ उसके हृदय तथा उगेजों पर लगाया हुआ वह लेप वह गया। कंचुकी भीग जाने से उसने उसे उतार डाला। प्रेम के पागल लोल लोचन ऐसे हो रहे है, जैसे व्याध के बाण से घायल वन्य हरिणी भीरु दृष्टि से चारो ओर हेरती है। कविशेखर विद्यापति और कविकुल-चूड़ामणि चण्डिदाम, दोनो महाकवि हैं। आकर्षण और पाण्डित्य कविशेखर मे मुझे अधिक मिला। कुछ लोग कविशेखर को अश्लील कहते हैं। उन नीतिज्ञ महापुरुषो की कविता समझने की शक्ति पर मुझे सन्देह है। चण्डिदास में अश्लीलता अवश्य नही आने पायी। इनकी उक्तियाँ एक साधक भक्त की-सी उक्तियाँ है। यह साधक थे भी। एक ही समय के, वंग और मिथिला के, ये दोनो महाकवि साहित्य के अमूल्य रत्न हैं, इसमें जरा भी सन्देह नही। कहते हैं, ये कवि महापुरुप थे, और श्रीचैतन्यदेव के आविर्भाव से पूर्व इन्हें इसलिए आना पड़ा कि ये श्रीकृष्ण-राधा के अलौकिक प्रेम पर अपनी-अपनी रस-सिद्ध रचनाएँ रख जायें। श्रीमहाप्रभु आकर रसास्वादन करेंगे। जिन कवियों के सम्बन्ध में भारतवर्ष के विद्वानों की यह घारणा है, उन पर अश्लीलता का दोष मढ़ने से पहले आजकल के समालोचक अगर कुछ विचार कर लिया करें, तो बुरा न होगा ।
['सुघा', मासिक, लखनऊ, अगस्त, 1928। प्रबन्ध-प्रतिमा में संकलित ('विद्या-पति और चण्डिदास' शीर्षक से)]
बंगाल के वैष्णव कवियों की शृ ंगार-वर्णना
"जय जय यदुकुल-जगनिधि चन्द्र। व्रजकुल गोकुल - आनंद-कन्द ।। जय जय जलघर-श्यामर-अंग। हेलन कल्पतरु - ललित त्रिभंग ।। सुधा सुधामय मुरलि-विलास। जग जन मोहन मधुरिम-हास ।। अवनि-विलम्वित-वनि-वनमाल। मधुकर झंकर ततहि रसाल ॥ तरुण-अरुण रुचि मुख अरविंद। नख-मणि निउछनि दास गोविन्द ।।
- गोविन्ददास
भगवान् श्रीकृष्ण की मधुर रस ने उपासना करते हुए भारतवर्ष के भक्तराज वैष्णव कवियों ने श्रृंगार की जो सुख-शान्ति-शीतल मन्द-मधुर मन्दाकिनी बहायी है, साहित्य के निष्कलुप हृदय का वह अमृत भगवान् श्रीकृष्णचन्द्र सदा ही मोहिनी
246 / निराला रचनावली-5
रचना के कारण ये 'मैथिलकोकिल' कहलाए वह इनकी पदावली है। इन्होंने अपने समय की प्रचलित मैथिली भापा का व्यवहार किया है। विद्यापति को बंगभाषावाले अपनी ओर खींचते हैं। सर जार्ज ग्रियर्सन ने भो विहारी और मैथिली को 'मागधी' से निकली होने के कारण हिंदी से अलग माना है। पर केबल भाषाशास्त्र की दृष्टि से कुछ प्रत्ययों के आधार पर ही साहित्यसामग्री का विभाग नहीं किया जा सकता। कोई भाषा कितनी दूर तक समझी जातो है, इसका विचार भी तो आवश्यक होता है। किसी भापा का समझा जाना अधिकतर उसकी शब्दावली (वाकेवुलरी) पर अवलंबित होता है। यदि ऐसा न होता तो उर्दू और हिंदी का एक ही साहित्य माना जाता ।
खड़ो बोलो, बाँगड़, व्रज, राजस्थानी, कन्नौजी, वैसवारो, अवधी इत्यादि में रूपों और प्रत्ययों का परस्पर इतना भेद होते हुए भी सब हिंदी के अंतर्गत मानी जाती हैं। इनके' बोलनेवाले एक दूसरे की बोलो समझते हैं। बनारस, गाजीपुर, गोरखपुर, बलिया आदि जिलों में 'आयल' ग्राइल', 'गयल' - 'गइल', 'हमरा'- 'तोहरा' आदि बोले जाने पर भी वहाँ की भाषा हिंदी के सिवाय दूसरी नहीं कही जाती। कारण है शब्दावली की एकता । अतः जिस प्रकार हिंदी साहित्य 'वीसलदेवरासो' पर अपना अधिकार रखता है उसी प्रकार विद्यापति की पदावली पर भी ।
विद्यापति के पद अधिकतर शृंगार के ही हैं. जिनमें नायिका और नायक राधाकृष्ण हैं। इन पदों की रचना जयदेव के गोतकाव्य के अनुकरण पर हो शायद की गई हो। इनका माधुर्य अद्भुत है। विद्यापति शैव थे। उन्होंने इन पद्मों की रचना श्रृंगार काव्य की दृष्टि से को है, भक्त के रूप में नहीं। विद्यापति को कृष्णभक्तों को परंपरा में न समझना चाहिए ।
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