Saturday, 3 October 2026

श्राद्ध पितृ कर्म

🌷 पितरों का परिचय, महत्व, कर्म एवं विधान।
       (ऋग्वेद, महाभारत, मनुस्मृति, गरुड़पुराण, विष्णुपुराण,      
         स्कंदपुराण, वायुपुराण आदि के आधार पर विवरण)
🍁1. पितरों का परिचय
‘पितृ’ शब्द संस्कृत के ‘पिता’ से निष्पन्न है, जिसका अर्थ पूर्वज या पिता-पितामह आदि है।
शास्त्रों में पितर दो प्रकार के माने गए हैं—
व्यक्तिगत पितर (व्यक्ति विशेष के दिवंगत पिता, पितामह, प्रपितामह आदि)
सार्वभौम पितर (मनुष्य जाति के आदि पूर्वज)

ऋग्वेद (मंडल 10, सूक्त 15 – पितृ सूक्त) में पितरों को ‘सोमवन्त:’, ‘बर्हिषद:’ और ‘अग्निष्वात्ता:’ नाम से तीन श्रेणियों में वर्णित किया गया है। वे परलोक में स्थित हैं और वंशजों के कर्म, दान एवं श्राद्ध से संतुष्ट होकर आशीर्वाद देते हैं।
उनकी उपेक्षा से जीवन में बाधाएँ आ सकती हैं, जबकि श्रद्धापूर्वक तर्पण-श्राद्ध से परिवार में सुख, समृद्धि, संतान और शांति की प्राप्ति होती है।

🍁2. पितृस्थान (पितृलोक)
पितरों का निवास स्थान पितृलोक है।
यह मर्त्यलोक (पृथ्वी) और सूर्यलोक के मध्य या चंद्रमा के पथ के निकट माना गया है। कुछ पुराणों में इसे भुवर्लोक के निकट बताया गया है।
यमराज को पितृसम्राट कहा गया है। पितर सूक्ष्म शरीर में रहते हैं और श्राद्ध-तर्पण के समय पृथ्वी पर आकर अर्पण ग्रहण करते हैं।गरुड़ पुराण एवं विष्णु पुराण में स्पष्ट है कि पितृलोक में वे तृप्ति की प्रतीक्षा करते हैं।

🍁3. पितृकर्म (मुख्य अनुष्ठान)
शास्त्रों में पितृयज्ञ को पंच महायज्ञों में से एक माना गया है (मनुस्मृति 3.70)। मुख्य कर्म निम्नलिखित हैं—
श्राद्ध – श्रद्धापूर्वक पितरों के निमित्त भोजन, दान एवं ब्राह्मण भोजन।
तर्पण (जलदान) – काले तिल, कुश एवं जल से अर्घ्य अर्पण। तीन-तीन अंजलियाँ दी जाती हैं।
पिंडदान – जौ/चावल के आटे में दूध, घी, शहद, शक्कर मिलाकर गोल पिंड बनाकर दक्षिणाभिमुख होकर समर्पण।
दान एवं ब्राह्मण भोजन – गौ, कौआ, कुत्ता, चींटी, गरीब एवं ब्राह्मण को भोजन-वस्त्र दान।
गरुड़ पुराण एवं मत्स्य पुराण में कहा गया है कि पिंडदान से पशु-पक्षी योनि में पड़े पितर भी तृप्त होते हैं।

🍁4. पितरों का प्रभाव
अनुग्रह होने पर – आयु, स्वास्थ्य, सुसंतति, धन-धान्य, यश, बल, वैभव एवं मोक्ष की प्राप्ति।
असंतोष होने पर – कलह, रोग, आर्थिक कठिनाई, मानसिक अशांति, संतान संबंधी बाधाएँ।
महाभारत एवं पुराणों में स्पष्ट है कि पितर प्रसन्न होकर वंशजों को वरदान देते हैं।

🍁5. वैदिक एवं पुराणिक दृष्टि
ऋग्वेद (10.15 एवं 10.14) में पितरों का आह्वान एवं यम-वरुण का उल्लेख।
महाभारत (अनुशासन पर्व) में भीष्म पितामह युधिष्ठिर को श्राद्ध की महिमा बताते हैं। महर्षि निमि को प्रथम श्राद्धकर्ता माना गया।
भागवत पुराण, गरुड़ पुराण, विष्णु पुराण, मत्स्य पुराण में श्राद्ध की विस्तृत महिमा।
पितरों को देवताओं के समान अन्न-जल से तृप्त करना आवश्यक बताया गया है। विश्वेदेव पितरों के रक्षक हैं, अतः पहले उनकी पूजा की जाती है।

🍁6. पितृदोष एवं निवारण
जन्मकुंडली में यदि पूर्वजों की अधूरी इच्छाएँ या अतृप्त आत्मा के कारण पितृदोष बनता है, तो संतान, विवाह, स्वास्थ्य एवं अर्थ संबंधी बाधाएँ आती हैं।
निवारण के शास्त्रोक्त उपाय –
नियमित श्राद्ध, तर्पण एवं पिंडदान
गायत्री मंत्र जप, रुद्राभिषेक
नारायण नागबलि, त्रिपिंडी श्राद्ध
गया, ब्रह्मकपाल, काशी आदि तीर्थों में श्राद्ध
दान, सेवा एवं गौ-सेवा
गरुड़ पुराण में कहा गया है – “गयाश्राद्धात् प्रमुच्यन्ते पितरो भवसागरात्।”

🍁7.  पितृ मंत्र
 (शास्त्रोक्त पितृ-तर्पण, श्राद्ध एवं पिण्डदान के प्रमुख मंत्र )
(ऋग्वेद, यजुर्वेद, पुराण एवं धर्मशास्त्रीय परम्परा के आधार पर)

🌷 १. पितृ-नमस्कार एवं स्वधा-मंत्र
🍁ॐ पितृभ्यः स्वधा नमः।
🍁ॐ सर्वपितृभ्यः स्वधा नमः।
🍁ॐ पितृदेवतायै नमः।
🍁ॐ सर्वपितृदेवताभ्यो नमः।
🍁ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं स्वधायै नमः।
🍁ॐ सर्वपितृभ्यः स्वधा नमः।

🌷 २. स्वधा देवी का मंत्र
🍁ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं स्वधायै नमः।
अर्थ—स्वधा देवी को प्रणाम। यह मंत्र पितृकर्म में स्वधा-तत्त्व की उपासना के लिए प्रयुक्त किया जा सकता है।

🌷 ३. सर्वपितृ प्रसन्नता प्रार्थना
🍁ॐ सर्वपितृ प्रसन्न भवः॥ या प्रार्थनात्मक रूप में—
🍁ॐ सर्वपितरः प्रसन्नाः भवन्तु॥
अर्थ—सभी पितृदेव प्रसन्न हों।
नोट: “ॐ सर्व पितृ प्रसन्न भवः” को वैदिक मूलमंत्र के रूप में प्रस्तुत न करके प्रार्थना-वाक्य के रूप में रखना अधिक उचित है।

🌷 ४. यजुर्वेदीय परम्परा के स्वधा-मंत्र
🍁ॐ पितृभ्यः स्वधायिभ्यः स्वधा नमः।
🍁ॐ पितामहेभ्यः स्वधायिभ्यः स्वधा नमः।
🍁ॐ प्रपितामहेभ्यः स्वधायिभ्यः स्वधा नमः।

🌷 ५. पितृ-आवाहन मंत्र
🍁ॐ आगच्छन्तु मे पितरः सर्वे, गृह्णन्तु जलाञ्जलिम्।
अर्थ—मेरे सभी पितर यहाँ पधारें और इस जलाञ्जलि को स्वीकार करें।

🌷 ६. पिता, पितामह एवं प्रपितामह के लिए तर्पण
🍁 पिता — वसु-स्वरूप
ॐ अद्य अस्मत्पिता [गोत्र]गोत्रः [नाम] शर्मा वसुस्वरूपः।
इदं सतिलं गोपुच्छोदकं तस्मै स्वधा नमः।
तस्मै स्वधा नमः। तस्मै स्वधा नमः॥
🍁 पितामह — रुद्र-स्वरूप
ॐ अद्य अस्मत्पितामहः [गोत्र]गोत्रः [नाम] शर्मा रुद्रस्वरूपः।
इदं सतिलं गोपुच्छोदकं तस्मै स्वधा नमः।
तस्मै स्वधा नमः।बतस्मै स्वधा नमः॥
🍁 प्रपितामह — आदित्य-स्वरूप
ॐ अद्य अस्मत्प्रपितामहः [गोत्र]गोत्रः [नाम] शर्मा आदित्यस्वरूपः।
इदं सतिलं गोपुच्छोदकं तस्मै स्वधा नमः।
तस्मै स्वधा नमः। तस्मै स्वधा नमः॥

🌷 ७. मातृ-पक्ष के तर्पण-मंत्र
🍁 माता — वसु-स्वरूपा
ॐ अद्य अस्मन्माता [गोत्र]गोत्रोत्पन्ना [नाम] देवी वसुस्वरूपा।
इदं सतिलं गोपुच्छोदकं तस्यै स्वधा नमः।
तस्यै स्वधा नमः। तस्यै स्वधा नमः॥
इसी प्रकार—
पितामही — रुद्रस्वरूपा
प्रपितामही — आदित्यस्वरूपा
मातामह — वसु/रुद्र/आदित्य परम्परा अनुसार
मातामही एवं अन्य ज्ञात-अज्ञात पितृगण
के लिए नाम एवं गोत्र के अनुसार तर्पण किया जाता है।

🌷 ८. सर्वपितृ तर्पण
🍁ॐ सर्वपितृणां तृप्तये इदं तिलोदकं स्वधा नमः।
🍁ॐ दिव्याय पितृगणाय नमः।
तृप्यन्ताम्। इदं जलं सतिलं सयवं गृह्णन्ताम्॥

🌷 ९. ऋग्वैदिक पितृ-सूक्त के प्रमुख मंत्र
🍁 ऋग्वेद १०.१५
उदीरतामवर उत्परास उन्मध्यमाḥ पितरः सोम्यासः।
असुं य ईयुरवृका ऋतज्ञास्ते नोऽवन्तु पितरो हवेषु॥
🍁
इदं पितृभ्यो नमो अस्त्वद्य ये पूर्वासो य उपरास ईयुः।
ये पार्थिवे रजस्या निषत्ताः ये वा नूनं सुवृजनासु विक्षु॥

🌷 १०. पितृ-गायत्री
🍁ॐ पितृगणाय विद्महे जगद्धारिणे धीमहि।
तन्नः पितृः प्रचोदयात्।।
🍁ॐ पितृदेवाय विद्महे प्रपितामहाय धीमहि।
तन्नः पितृः प्रचोदयात्॥
महत्त्वपूर्ण: इन दोनों को वैदिक ऋचा न कहकर पितृ-गायत्री/प्रार्थना-मंत्र के रूप में रखना अधिक सुरक्षित है।

🌷 ११. सर्वपितृ गायत्री-प्रार्थना
🍁ॐ सर्वपितृभ्यो विद्महे।पितृदेवेभ्यो धीमहि।तन्नः पितरः प्रचोदयन्तु॥
यह भी प्रार्थनात्मक गायत्री-रचना के रूप में रखें, न कि किसी वेद की मूल ऋचा के रूप में।

🌷 १२. पितृ-संबोधन मंत्र
🍁ॐ नमो वः पितरो रसाय। नमो वः पितरः शोषाय।
नमो वः पितरो जीवाय। नमो वः पितरः स्वधायै।
नमो वः पितरो घोराय। नमो वः पितरो नमो नमः॥

🌷 १३. श्राद्ध में विष्णु-मंत्र
🍁ॐ नमो भगवते वासुदेवाय॥
अर्थ—भगवान वासुदेव को नमस्कार।

🌷 १४. विश्वेदेव आवाहन
🍁ॐ विश्वेदेवाः आगत शृणुत मे हवम्।
इदं बर्हिः निषीदत॥
श्राद्ध-विधि में पितृकर्म से पूर्व विश्वेदेवों का आवाहन परम्परानुसार किया जाता है।

🌷 १५. महामृत्युञ्जय मंत्र
🍁ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।
उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥
यह मूलतः मृत्यु-निवारण एवं अमृतत्व की वैदिक प्रार्थना है; इसे पितृकर्म में सहायक जप के रूप में रखा जा सकता है।

🌷 १६. तर्पण-संकल्प मंत्र
🍁ॐ अद्य [तिथि-नक्षत्र] अस्मत्पितृ-पितामह-प्रपितामहानां सपत्नीकानाम् अक्षयतृप्तिसम्पादनार्थं पितृतर्पणं करिष्ये॥

वैकल्पिक व्यापक संकल्प
🍁ॐ अद्य श्रुतिस्मृतिपुराणोक्त-सर्वसांसारिक ,सुखसमृद्धिप्राप्तये वंशवृद्धिहेतवे देवर्षिमनुष्यपितृतर्पणमहं करिष्ये॥

🌷 १७. पिण्डदान में पितृ-स्मरण
पिण्डदान के समय संबंधित पितृ का—
नाम + गोत्र + सम्बन्ध + स्वधा का उच्चारण किया जाता है।
उदाहरण—
🍁ॐ अस्मत्पितुः [नाम] [गोत्र]गोत्रस्य इदं पिण्डं स्वधा नमः॥
🍁ॐ अस्मत्पितामहस्य [नाम] [गोत्र]गोत्रस्य इदं पिण्डं स्वधा नमः॥
🍁ॐ अस्मत्प्रपितामहस्य [नाम] [गोत्र]गोत्रस्य इदं पिण्डं स्वधा नमः॥

🌷 १८. तर्पण की सामान्य समापन प्रार्थना
🍁ॐ सर्वे पितरः तृप्यन्तु।ॐ सर्वे पितरः प्रसन्नाः भवन्तु।
ॐ सर्वे पितरः स्वधां गृह्णन्तु।ॐ पितृभ्यः स्वधा नमः॥

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🍁8. विशेष प्रसंग – दानवीर कर्ण की कथा
महाभारत एवं लोक-परंपरा के अनुसार, कर्ण मृत्यु के बाद स्वर्ग पहुँचे तो उन्हें अन्न के स्थान पर स्वर्ण मिला, क्योंकि उन्होंने जीवन में अन्नदान एवं पितृ-तर्पण नहीं किया था।
इंद्र/यमराज की अनुमति से वे 15-16 दिनों के लिए पृथ्वी पर लौटे, पितरों का श्राद्ध-तर्पण-पिंडदान किया और अन्नदान किया। तभी उन्हें तृप्ति मिली।
यही 16 दिन आज पितृपक्ष के रूप में मनाए जाते हैं। यह कथा पितृऋण की महत्ता को सिद्ध करती है।

🍁9. भरणी श्राद्ध
भरणी नक्षत्र में होने वाला श्राद्ध महाभरणी श्राद्ध कहलाता है।
यह गया श्राद्ध के समान फलदायी माना गया है। इस दिन कौवा, कुत्ता एवं गौ को भोजन अवश्य कराना चाहिए।

🍁10. श्राद्ध के नियम एवं विशेष बातें (शास्त्रोक्त)
गाय का घी, दूध, दही ही प्रयोग करें (दस दिन से अधिक बछड़े वाली गाय का)।
चांदी या चांदी-तांबे के बर्तन श्रेष्ठ हैं।
मौन ब्राह्मण भोजन आवश्यक।
समय – कुतप मुहूर्त (दिन का आठवाँ मुहूर्त, लगभग प्रातः 11:30 से दोपहर 12:30/1:00 तक) सर्वश्रेष्ठ। अपराह्न काल भी शुभ। रात्रि, संध्या एवं शुक्ल पक्ष निषिद्ध।
पितरों को प्रिय – खीर, दूध, दही, शहद, घी, जौ।
कौआ, गाय, कुत्ता, चींटी आदि को भोजन अर्पण (पंचबली)।
तुलसी, कुशा, काला तिल, गंगाजल अनिवार्य।
दक्षिण दिशा मुख करके, अपसव्य (जनेऊ दाएँ कंधे पर) होकर कर्म करें।
लहसुन-प्याज, मांस, मदिरा, बासी अन्न वर्जित।
तीन पीढ़ियों तक श्राद्ध का विधान।

🍁11. श्राद्ध स्थलों का शास्त्रोक्त महत्व 
     (गया के अतिरिक्त प्रमुख पितृतीर्थ)

गरुड़ पुराण, विष्णु पुराण, वायु पुराण, स्कंद पुराण एवं अन्य धर्मशास्त्रों में गया को पितृतीर्थराज कहा गया है, किन्तु कई अन्य स्थलों पर भी श्राद्ध-पिंडदान अत्यंत फलदायी एवं मोक्षदायी माना गया है। प्रमुख स्थान निम्नलिखित हैं—
1. गया (बिहार) – सर्वोच्च पितृतीर्थ। विष्णुपद मंदिर एवं फल्गु नदी तट पर पिंडदान से सात पीढ़ियों तक के पितरों को अक्षय तृप्ति एवं मोक्ष मिलता है। गरुड़ पुराण एवं वायु पुराण में इसकी महिमा सर्वोपरि कही गई है।
2. ब्रह्मकपाल (बद्रीनाथ, उत्तराखंड) – अलकनंदा नदी के तट पर स्थित। स्कंद पुराण (बदरीमहात्म्य) में इसे गया से आठ गुना अधिक फलदायी बताया गया है। यहाँ पिंडदान करने से पितरों को पूर्ण एवं अंतिम मुक्ति (मोक्ष) मिलती है, जिससे आगे वार्षिक श्राद्ध की आवश्यकता नहीं रहती। ब्रह्मा जी ने स्वयं यहाँ श्राद्ध किया था तथा शिव जी को ब्रह्महत्या से मुक्ति मिली थी। पांडवों ने भी यहाँ पिंडदान किया था। इसे अंतिम (अंतिम श्राद्ध) स्थल माना जाता है।
3. प्रयागराज (त्रिवेणी संगम, उत्तर प्रदेश) – तीर्थराज। गंगा-यमुना-सरस्वती संगम पर तर्पण-पिंडदान से 14 पीढ़ियों तक के पितर तृप्त होते हैं। मत्स्य पुराण एवं अन्य ग्रंथों में इसकी विशेष महिमा है।
4. काशी / वाराणसी (उत्तर प्रदेश) – मणिकर्णिका घाट एवं पिशाचमोचन कुंड। गरुड़ पुराण में कहा गया है कि यहाँ त्रिपिंडी श्राद्ध से प्रेतबाधा, अकाल मृत्यु एवं अन्य दोषों से मुक्ति मिलती है। शिव की नगरी होने से मोक्षदायी है।
5. रामेश्वरम (तमिलनाडु) – अग्नि तीर्थम्। भगवान राम ने लंका युद्ध में मृत योद्धाओं एवं पितरों का यहाँ श्राद्ध किया था। यहाँ पिंडदान से पितर पूर्ण संतुष्ट होते हैं।
6. हरिद्वार (उत्तराखंड) – हर की पैड़ी, नारायणी शिला एवं कुशावर्त घाट। गंगा तट पर तर्पण-पिंडदान अत्यंत पुण्यदायी है। स्कंद पुराण में उल्लेख।
7. अन्य प्रमुख शास्त्रोक्त स्थल –
देवप्रयाग (उत्तराखंड) – भागीरथी-अलकनंदा संगम।
कुरुक्षेत्र / पेहोवा (हरियाणा) – सरस्वती तट।
पुष्कर (राजस्थान) – ब्रह्मा की तपोभूमि।
उज्जैन / सिद्धवट (मध्य प्रदेश)।
त्र्यम्बकेश्वर (महाराष्ट्र)।
जगन्नाथ पुरी (ओडिशा)।
बिंदू सरोवर / सिद्धपुर (गुजरात)।
लोहार्गल (राजस्थान)।
नैमिषारण्य, अयोध्या, मथुरा, गंगासागर आदि।
विष्णुधर्मसूत्र, शंख स्मृति एवं पुराणों में कहा गया है कि नदी तट, पर्वत, तीर्थ, कुंज एवं गोबर से लिप्त पवित्र स्थलों पर किया गया श्राद्ध अक्षय फलदायी होता है। गया, प्रयाग, काशी, पुष्कर, कुरुक्षेत्र आदि पर दिया गया दान कोटि गुना फल देता है।

🍁12. पितृपक्ष का महत्व
भाद्रपद पूर्णिमा से आश्विन अमावस्या तक के 16 दिन पितृपक्ष कहलाते हैं।इस अवधि में पितर पृथ्वी पर आते हैं।
पितृऋण से मुक्ति, वंश की उन्नति, संतान, स्वास्थ्य एवं धन की वृद्धि, पूर्वजों की आत्मा को शांति एवं वंशजों को सुख-समृद्धि
मनुस्मृति एवं पुराणों में तीन ऋण बताए गए हैं – 
देवऋण, ऋषिऋण एवं पितृऋण। 
श्राद्ध से पितृऋण चुकता है।
निष्कर्ष – शास्त्रों का स्पष्ट निर्देश है कि श्रद्धापूर्वक श्राद्ध, तर्पण एवं पिंडदान करने से पितर तृप्त होते हैं और वंश पर उनकी कृपा बनी रहती है। गया सर्वश्रेष्ठ है, किन्तु ब्रह्मकपाल (बद्रीनाथ) को स्कंद पुराण में गया से भी अधिक शक्तिशाली अंतिम मुक्ति स्थल बताया गया है। यह केवल कर्मकांड नहीं, बल्कि कृतज्ञता एवं धर्म का पालन है।

(सभी विवरण ऋग्वेद, महाभारत, मनुस्मृति, गरुड़ पुराण, विष्णु पुराण, स्कंद पुराण, वायु पुराण एवं अन्य धर्मशास्त्रों पर आधारित हैं। व्यक्तिगत विधि के लिए योग्य पंडित से परामर्श लें।)

धार्मिक संदेश
━━━━━━━━पितृपक्ष में श्रद्धापूर्वक तर्पण, श्राद्ध, पिण्डदान, ब्राह्मण-सत्कार तथा यथाशक्ति दान अपनी कुल-परम्परा और योग्य आचार्य के निर्देशानुसार करना चाहिए।
“श्रद्धया दीयते यत् तत् श्राद्धम्।”
अर्थात् पितरों के निमित्त श्रद्धा और विधिपूर्वक किया गया कर्म ही श्राद्ध कहलाता है।

🙏 पितृदेवों की शान्ति, तृप्ति एवं सद्गति तथा समस्त वंश के कल्याण की मंगलकामना।
॥ ॐ पितृभ्यो नमः॥ ॐ स्वधायै नमः ॥ ॐ नारायणाय नमः ॥

श्राद्ध में किस किस को निमन्त्रित करें

*_श्राद्ध में किस किस को निमन्त्रित करें ??
— #ब्राह्मणहीन श्राद्ध महापाप _*
`प्रसङ्ग — जब पितृ–तृप्ति का प्रश्न आया तो शास्त्र ने कहा — श्राद्ध विस्तार नहीं , पात्र–शुद्धि है ।`
`सन्दर्भ — आज लोग श्राद्ध को पार्टी बना देते हैं — मित्र , दिखावा , भीड़ ! यह लेख बताता है कि श्राद्ध में दस पात्र ही मुख्य हैं एवं मित्र–प्रधान श्राद्ध पितरों को तृप्त नहीं करता है ।`
*_मातामहं मातुलं च स्वस्रीयं श्वशुरं गुरुम् ।_*
*_दौहित्रं विट्पतिं बन्धुं ऋत्विजं याज्यौ च भोजयेत् ॥_*
[ `श्राद्ध–विधि १ — दश निमन्त्रणीय` ]
`शब्दार्थ 👉🏻` *_मातामहं_* `— नाना ,` *_मातुलं_* `— मामा ,` *_स्वस्रीयं_* `— भानजा ,` *_श्वशुरं_* `— ससुर ,` *_गुरुम्_* `— गुरु ,` *_दौहित्रं_* `— दौहित्र — बेटी का पुत्र ,` *_विट्पतिं_* `— जामाता — दामाद ,` *_बन्धुं_* `— बान्धव ,` *_ऋत्विजं_* `— ऋत्विक् ,` *_याज्यौ_* `— यज्ञकर्ता ब्राह्मण — इन दश को श्राद्ध में भोजन कराना चाहिए ।`
`गूढ़ सूत्र 👉🏻 पाँच कोस के भीतर रहने वाले दामाद , भानजे , बहन को जो काम–क्रोध–भय से नहीं बुलाता तथा सदैव दूसरों को ही खिलाता है — उसके श्राद्ध में पितर औऱ देवता अन्न ग्रहण नहीं करते हैं !`
*_नाश्नन्ति तस्य वै गेहे पितरो विप्रवर्जिताः ।_*
*_शापं दत्त्वा ततो यान्ति श्राद्धाद्विप्रं विवर्जितात् ।_*
*_महापापी भवेत् सोऽपि ब्रह्महा स च कथ्यते ॥_*
[ `श्राद्ध–विधि २ — ब्राह्मण–हीन दोष` ]
`अर्थात 👉🏻 जो ब्राह्मण–रहित श्राद्ध करता है , उसके घर पर पितर भोजन नहीं करते , शाप देकर लौट जाते हैं । ब्राह्मण–हीन श्राद्ध करने वाला महापापी , ब्रह्महत्यारा कहा जाता है ।`
*_द्वौ दैवे पितृकार्ये त्रीनेकैकमुभयत्र वा ।_*
*_भोजयेत् सुसमृद्धोऽपि न प्रसज्जेत विस्तरे ॥_*
[ `श्राद्ध–विधि ३ — संख्या–मर्यादा` ]
`अर्थात 👉🏻 देव–कार्य में दो एवं पितृ–कार्य में तीन — अथवा दोनों में एक–एक ब्राह्मण को भोजन कराना चाहिए । अत्यन्त धनी होने पर भी श्राद्ध में अधिक विस्तार नहीं करना चाहिए ।`
*_यस्य मित्रप्रधानानि श्राद्धानि च हवींषि च ।_*
*_न प्रीणन्ति पितॄन् देवान् स्वर्गं च न स गच्छति ॥_*
*_यश्च श्राद्धे कुरुते संगतानि न देवयानेन पथा स याति ।_*
*_स वै मुक्तः पिप्पलं बंधनाद्वा स्वर्गाल्लोकाच्च्यवते श्राद्धमित्रः ॥_*
*_तस्मान्मित्रं श्राद्धकृन्नाद्रियेत दद्यान्मित्रेभ्यः संग्रहार्थं धनानि ।_*
*_यन्मन्यते नैव शत्रून्नमित्रं तं मध्यस्थं भोजयेत्त् हव्यकव्ये ॥_*
[ `श्राद्ध–विधि ४ — मित्र–वर्जन` ]
`अर्थात 👉🏻 जिसके श्राद्ध में मित्रों की प्रधानता होती है , उससे पितर–देवता तृप्त नहीं होते , वह स्वर्ग नहीं जाता । जो श्राद्ध को मित्रता जोड़ने का साधन बनाता है , वह स्वर्ग–भ्रष्ट होता है । इसलिए श्राद्ध में मित्र को न बुलाये — मित्र को धन देना उचित है । श्राद्ध में उसे ही खिलाये जो शत्रु–मित्र न होकर मध्यस्थ — समदर्शी , शास्त्रनिष्ठ ब्राह्मण हो !`
*_आयुः पुत्रान् यशः स्वर्गं कीर्तिं पुष्टिं बलं श्रियम् ।_*
*_पशून् सौख्यं धनं धान्यं प्राप्नुयात् पितृपूजनात् ॥_*
[ `श्राद्ध–फल ५ — पितृ–पूजन फल` ]
`अर्थात 👉🏻 पितृ–पूजन से आयु , पुत्र , यश , स्वर्ग , कीर्ति , पुष्टि , बल , श्री , पशु , सुख , धन , एवं धान्य — समस्त/सबकुछ प्राप्त होता है ।`
*_🚩श्राद्ध का अन्न ग्रहण करना चाहिए अथवा नहीं ??? _*
[ `श्राद्ध–अन्न विचार ६` ]
`प्रश्न 👉🏻 श्राद्ध का अन्न खाना चाहिए अथवा नहीं ?`
`उत्तर 👉🏻 घर के लोग खायें तो दोष नहीं — क्योंकि मरनेवाला अपना ही स्वजन है । परन्तु दूसरों को कभी नहीं खाना चाहिए । अन्न बच जाय तो ब्राह्मणों से पूछकर जैसा वे कहें वैसा उपयोग कर दे ।`
`विशेष 👉🏻 मृत्यु के बाद तीसरे तथा बारहवें दिन का अन्न अत्यधिक अशुद्ध होता है — अतः बचे अन्न को पृथ्वी में गाड़ देना चाहिए ।`
` नियम 👉🏻 वार्षिक पितृपक्ष के श्राद्ध का अन्न भी दूसरों को नहीं खाना चाहिए । श्राद्ध–भोजन ब्राह्मण को ही खिलाने का विधान है , निर्धनों आदि में बाँटने का नहीं । श्राद्ध का भोजन सबको , सब कहीं नहीं करना चाहिए !`
`गूढ़ सूत्र 👉🏻 श्राद्ध विस्तार नहीं , पात्र है ।` *_द्वौ दैवे त्रयः पित्र्ये_* `— यही मर्यादा है । अधिक भीड़ पितरों को नहीं , अपितु अहंकार को तृप्त करती है ।`
`मित्र–तत्त्व 👉🏻 मित्र/प्रधान श्राद्ध स्वर्ग से च्यवत — गिराता है । मित्र को धन दो , अन्न नहीं । मध्यस्थ ब्राह्मण ही हव्य–कव्य का अधिकारी है ।`
`अन्न–तत्त्व 👉🏻 श्राद्धान्न पितृ–उच्छिष्ट है — घर वालों हेतु प्रसाद , बाहर वालों के लिए निषिद्ध । तीसरे–दिन का अन्न तो गाड़ने योग्य — यह शुद्धि–विज्ञान है ।`
_निष्कर्ष —_
`श्राद्ध में ☆नाना , ☆मामा , ☆भानजा , ☆श्वसुर , ☆गुरु , ☆दौहित्र , ☆जामाता , ☆बन्धु , ☆ऋत्विक् , औऱ ☆याज्य ब्राह्मण — ये दस ही मुख्य हैं । ब्राह्मण के बिना श्राद्ध महापाप है — पितर शाप देकर लौट जाते हैं । धनवान भी` *_द्वौ दैवे त्रीणि पित्र्ये_*`से अधिक विस्तार न करे । मित्र–प्रधान श्राद्ध से पितर तृप्त नहीं होते हैं — मित्र को धन दो , श्राद्ध में मध्यस्थ ब्राह्मण को खिलाओ ! एवं श्राद्धान्न — घर का प्रसाद है , बाहर का निषेध — यही आयु–पुत्र–यश–स्वर्ग देने वाला मार्ग है !`
#सौजन्य से पंडित रज्जी राम उपाध्याय हनुमान गढं जं 🕉️ 💐 
`जय पितृदेव``जय ब्राह्मणदेव🙏`

Thursday, 1 October 2026

जीवित्पुत्रिका व्रत=जीमूतवाहन व्रत महा अष्टमी व्रत

1. जीवित्पुत्रिका व्रत= लक्ष्मी का व्रत= धन-संपत्ति तथा सौभाग्य की कामना= उदयव्यापिनी अष्टमी में।
2. जीमूतवाहन-पूजा= जीमूतवाहन की पूजा=संतान की रक्षा हेतु व्रत= प्रदोषव्यापिनी अष्टमी में।

दोनों को एक मान लेना भ्रम का कारण है।

मिथिला में विशुद्ध जीमूतवाहन व्रत को जितिया कहते हैं।

19वीं शती में लिखा गया शब्दकल्पद्रुम सनातन धर्म से सम्बन्धित एक महाकोष है। यह राधाकांतदेव बहादुर द्वारा निर्मित है। इसका प्रकाशन 1828-1854 ई० में हुआ। यह पूर्णतः संस्कृत का एकभाषीय कोश है और सात खण्डों में विरचित है। इस कोश में यथासंभव समस्त उपलब्ध संस्कृत साहित्य के वाङ्मय का उपयोग किया गया है। इसके अतिरिक्त अंत में परिशिष्ट भी दिया गया है जो अत्यंत महत्वपूर्ण है। ऐतिहसिक दृष्टि से भारतीय-कोश-रचना के विकासक्रम में इसे विशिष्ट कोश कहा जा सकता है। परवर्ती संस्कृत कोशों पर ही नहीं, भारतीय भाषा के सभी कोशों पर इसका प्रभाव व्यापक रूप से पड़ता रहा है।। इसके द्वितीय खण्ड, पृ. के पृष्ठ 531-32 पर जिताष्टमी शीर्षक से विवरण है जिसमें जीमूतवाहन-पूजा तथा लक्ष्मीव्रत का एक स्थल पर वर्णन आया है।

इसमें भी स्पष्टतः उल्लेख है कि यह अष्टमी प्रदोषव्यापिनी होती है। पहले दिन या दूसरे दिन जब अष्टमी हो तब यह व्रत होगा। यदि दोनों दिन हो तो पर दिन होगा और यदि किसी दिन न हो तो उदयगामिनी तिथि में यह व्रत होगा।

भ्रान्ति तब आरम्भ हुई जब इसी जिताष्टमी या जीमूताष्टमी के साथ राधाकान्त देव ने लक्ष्मीव्रत का उल्लेख कर दिया।

लक्ष्मीव्रत के लिए ‘निर्णयामृतसिन्धु’ से उद्धरण दिया कि अष्टमी के चन्द्रोदय का समय यानी अर्धराति में यदि अष्टमी हो तो लक्ष्मीव्रत होगा और यदि सूर्योदय के समय अष्टमी रहे तो वह लक्ष्मी जीवित्पुत्रिका हो जाती है।

जो पण्डित धर्मशास्त्रीय ग्रन्थों की भाषा और शैली नहीं जानते थे उन्हें अब यहाँ भ्रान्ति उत्पन्न हुई। उन्होंने ‘जीवित्पुत्रिका’ शब्द देखकर इसे जीमूतवाहन-व्रत समझ लिया। नामसाम्य के कारण ऐसा भ्रम उत्पन्न हुआ होगा।

लेकिन उन्होंने यह नहीं देखा कि परस्पर विरोधी वचन एकत्र क्यों लिखे गये? ऊपर जीमूतवाहन व्रत में प्रदोषव्यापिनी लिख चुके हैं और यहाँ फिर निशीथव्यपिनी और उदयव्यापिनी लिख रहे हैं?

कारण स्पष्ट है कि दो व्रतों का विधान यहाँ एक स्थान पर किया गया और भ्रम उत्पन्न हो गया।

तथाकथित धर्मशास्त्रियों को देखना चाहिए कि ऊपर जीमूतवाहन व्रत में पूज्य देवता जीमूतवाहन हैं और यहाँ पूज्य देवता लक्ष्मी हैं।

इन दोनों व्रतों के घाल-मेल में सारा विवाद उत्पन्न हो गया है।

आश्विन में लक्ष्मी दुर्गा का रूप हैं तो विधान शुक्लपक्ष की अष्टमी के समान हुआ, जिसमें सप्तमी विद्धा का निषेध है। उस पर से ‘निर्णयामृतसिन्धुकार’ ने अपने वचन में लक्ष्मी के लिए ‘जीवित्पुत्रिका’ शब्द का भी प्रयोग कर दिया। लोग जीमूतवाहन की पूजा में लक्ष्मीपूजा का विधान जोड़ने लगे। जीमूतवाहन व्रत की ऐसी कोई कथा थी नहीं, तो कथा भी लिख दी गयी! लोगों ने जीमूतवाहन पूजा और लक्ष्मीव्रत को एक कह दिया।

जहाँ से यह भ्रान्ति उत्पन्न हुई वहाँ का उद्धरण पढ़ लेने के बाद अब शायद कोई भ्रान्ति न रहे, इसलिए मैं मूल भी दे रहे हूँ-

जिताष्टमी, स्त्री. (जिता पुत्त्रसौभाग्यदानेन सर्व्वोत्कर्षेण स्थिता या अष्टमी।) गौणाश्विनकृष्णाष्टमी । सैव जीमूताष्टमी। यथा, “आश्विन-कृष्णाष्टम्यां जीमूतवाहनपूजा । तत्राष्टमी प्रदोषव्यापिनी ग्राह्या।

भविष्योत्तरे-

“इषे मास्यसिते पक्षे अष्टमी या तिथिर्भवेत् ।

पुत्त्रसौभाग्यदा स्त्रीणां ख्याता सा जीवपुत्त्रिका ॥

शालिवाहनराजस्य पुत्त्रो जीमूतवाहनः ।

तस्यां पूज्यः स नारीभिः पुत्त्रसौभाग्यलिप्सया॥

प्रदोषसमये स्त्रीभिः पूज्यो जीमूतवाहनः।

पुस्करिणीं विधायाथ प्राङ्गणे चतुरस्रिकाम्॥”

किञ्च विष्णुधर्म्मोत्तरे।

“पूर्व्वेद्युरपरेद्युर्व्वा प्रदोषे यत्र चाष्टमी।

तत्र पूज्यः सदा स्त्रीभी राजा जीमूतवाहनः ॥”

तथा च । यद्दिने प्रदोषव्यापिनी अष्टमी तत्रैव व्रतं, उभयदिने चेत् परदिने त्रिसन्ध्यव्यापित्वात्। उभयदिने प्रदोषाव्याप्तौ उदयगामिन्याम्।

तदुक्तं निर्णयामृतसिन्धौ।

“लक्ष्मीव्रतं चाभ्युदिते शशाङ्के यत्राष्टमी चाश्विनकृष्णपक्षे।

तत्रोदयं वै कुरुते दिनेशस्तदा भवेज्जीवितपुत्त्रिका सा॥” इति।

अस्यामष्टम्यां स्त्रीभिर्न भोक्तव्यम्।

“आश्विनस्यासिताष्ठम्यां याः स्त्रियोऽन्नं हि भुञ्जते ।

मृतवत्सा भवेयुस्ता वैधव्यञ्च भवेद्ध्रुवम्॥” इति वचनात् ।