— #ब्राह्मणहीन श्राद्ध महापाप _*
`प्रसङ्ग — जब पितृ–तृप्ति का प्रश्न आया तो शास्त्र ने कहा — श्राद्ध विस्तार नहीं , पात्र–शुद्धि है ।`
`सन्दर्भ — आज लोग श्राद्ध को पार्टी बना देते हैं — मित्र , दिखावा , भीड़ ! यह लेख बताता है कि श्राद्ध में दस पात्र ही मुख्य हैं एवं मित्र–प्रधान श्राद्ध पितरों को तृप्त नहीं करता है ।`
*_मातामहं मातुलं च स्वस्रीयं श्वशुरं गुरुम् ।_*
*_दौहित्रं विट्पतिं बन्धुं ऋत्विजं याज्यौ च भोजयेत् ॥_*
[ `श्राद्ध–विधि १ — दश निमन्त्रणीय` ]
`शब्दार्थ 👉🏻` *_मातामहं_* `— नाना ,` *_मातुलं_* `— मामा ,` *_स्वस्रीयं_* `— भानजा ,` *_श्वशुरं_* `— ससुर ,` *_गुरुम्_* `— गुरु ,` *_दौहित्रं_* `— दौहित्र — बेटी का पुत्र ,` *_विट्पतिं_* `— जामाता — दामाद ,` *_बन्धुं_* `— बान्धव ,` *_ऋत्विजं_* `— ऋत्विक् ,` *_याज्यौ_* `— यज्ञकर्ता ब्राह्मण — इन दश को श्राद्ध में भोजन कराना चाहिए ।`
`गूढ़ सूत्र 👉🏻 पाँच कोस के भीतर रहने वाले दामाद , भानजे , बहन को जो काम–क्रोध–भय से नहीं बुलाता तथा सदैव दूसरों को ही खिलाता है — उसके श्राद्ध में पितर औऱ देवता अन्न ग्रहण नहीं करते हैं !`
*_नाश्नन्ति तस्य वै गेहे पितरो विप्रवर्जिताः ।_*
*_शापं दत्त्वा ततो यान्ति श्राद्धाद्विप्रं विवर्जितात् ।_*
*_महापापी भवेत् सोऽपि ब्रह्महा स च कथ्यते ॥_*
[ `श्राद्ध–विधि २ — ब्राह्मण–हीन दोष` ]
`अर्थात 👉🏻 जो ब्राह्मण–रहित श्राद्ध करता है , उसके घर पर पितर भोजन नहीं करते , शाप देकर लौट जाते हैं । ब्राह्मण–हीन श्राद्ध करने वाला महापापी , ब्रह्महत्यारा कहा जाता है ।`
*_द्वौ दैवे पितृकार्ये त्रीनेकैकमुभयत्र वा ।_*
*_भोजयेत् सुसमृद्धोऽपि न प्रसज्जेत विस्तरे ॥_*
[ `श्राद्ध–विधि ३ — संख्या–मर्यादा` ]
`अर्थात 👉🏻 देव–कार्य में दो एवं पितृ–कार्य में तीन — अथवा दोनों में एक–एक ब्राह्मण को भोजन कराना चाहिए । अत्यन्त धनी होने पर भी श्राद्ध में अधिक विस्तार नहीं करना चाहिए ।`
*_यस्य मित्रप्रधानानि श्राद्धानि च हवींषि च ।_*
*_न प्रीणन्ति पितॄन् देवान् स्वर्गं च न स गच्छति ॥_*
*_यश्च श्राद्धे कुरुते संगतानि न देवयानेन पथा स याति ।_*
*_स वै मुक्तः पिप्पलं बंधनाद्वा स्वर्गाल्लोकाच्च्यवते श्राद्धमित्रः ॥_*
*_तस्मान्मित्रं श्राद्धकृन्नाद्रियेत दद्यान्मित्रेभ्यः संग्रहार्थं धनानि ।_*
*_यन्मन्यते नैव शत्रून्नमित्रं तं मध्यस्थं भोजयेत्त् हव्यकव्ये ॥_*
[ `श्राद्ध–विधि ४ — मित्र–वर्जन` ]
`अर्थात 👉🏻 जिसके श्राद्ध में मित्रों की प्रधानता होती है , उससे पितर–देवता तृप्त नहीं होते , वह स्वर्ग नहीं जाता । जो श्राद्ध को मित्रता जोड़ने का साधन बनाता है , वह स्वर्ग–भ्रष्ट होता है । इसलिए श्राद्ध में मित्र को न बुलाये — मित्र को धन देना उचित है । श्राद्ध में उसे ही खिलाये जो शत्रु–मित्र न होकर मध्यस्थ — समदर्शी , शास्त्रनिष्ठ ब्राह्मण हो !`
*_आयुः पुत्रान् यशः स्वर्गं कीर्तिं पुष्टिं बलं श्रियम् ।_*
*_पशून् सौख्यं धनं धान्यं प्राप्नुयात् पितृपूजनात् ॥_*
[ `श्राद्ध–फल ५ — पितृ–पूजन फल` ]
`अर्थात 👉🏻 पितृ–पूजन से आयु , पुत्र , यश , स्वर्ग , कीर्ति , पुष्टि , बल , श्री , पशु , सुख , धन , एवं धान्य — समस्त/सबकुछ प्राप्त होता है ।`
*_🚩श्राद्ध का अन्न ग्रहण करना चाहिए अथवा नहीं ??? _*
[ `श्राद्ध–अन्न विचार ६` ]
`प्रश्न 👉🏻 श्राद्ध का अन्न खाना चाहिए अथवा नहीं ?`
`उत्तर 👉🏻 घर के लोग खायें तो दोष नहीं — क्योंकि मरनेवाला अपना ही स्वजन है । परन्तु दूसरों को कभी नहीं खाना चाहिए । अन्न बच जाय तो ब्राह्मणों से पूछकर जैसा वे कहें वैसा उपयोग कर दे ।`
`विशेष 👉🏻 मृत्यु के बाद तीसरे तथा बारहवें दिन का अन्न अत्यधिक अशुद्ध होता है — अतः बचे अन्न को पृथ्वी में गाड़ देना चाहिए ।`
` नियम 👉🏻 वार्षिक पितृपक्ष के श्राद्ध का अन्न भी दूसरों को नहीं खाना चाहिए । श्राद्ध–भोजन ब्राह्मण को ही खिलाने का विधान है , निर्धनों आदि में बाँटने का नहीं । श्राद्ध का भोजन सबको , सब कहीं नहीं करना चाहिए !`
`गूढ़ सूत्र 👉🏻 श्राद्ध विस्तार नहीं , पात्र है ।` *_द्वौ दैवे त्रयः पित्र्ये_* `— यही मर्यादा है । अधिक भीड़ पितरों को नहीं , अपितु अहंकार को तृप्त करती है ।`
`मित्र–तत्त्व 👉🏻 मित्र/प्रधान श्राद्ध स्वर्ग से च्यवत — गिराता है । मित्र को धन दो , अन्न नहीं । मध्यस्थ ब्राह्मण ही हव्य–कव्य का अधिकारी है ।`
`अन्न–तत्त्व 👉🏻 श्राद्धान्न पितृ–उच्छिष्ट है — घर वालों हेतु प्रसाद , बाहर वालों के लिए निषिद्ध । तीसरे–दिन का अन्न तो गाड़ने योग्य — यह शुद्धि–विज्ञान है ।`
_निष्कर्ष —_
`श्राद्ध में ☆नाना , ☆मामा , ☆भानजा , ☆श्वसुर , ☆गुरु , ☆दौहित्र , ☆जामाता , ☆बन्धु , ☆ऋत्विक् , औऱ ☆याज्य ब्राह्मण — ये दस ही मुख्य हैं । ब्राह्मण के बिना श्राद्ध महापाप है — पितर शाप देकर लौट जाते हैं । धनवान भी` *_द्वौ दैवे त्रीणि पित्र्ये_*`से अधिक विस्तार न करे । मित्र–प्रधान श्राद्ध से पितर तृप्त नहीं होते हैं — मित्र को धन दो , श्राद्ध में मध्यस्थ ब्राह्मण को खिलाओ ! एवं श्राद्धान्न — घर का प्रसाद है , बाहर का निषेध — यही आयु–पुत्र–यश–स्वर्ग देने वाला मार्ग है !`
#सौजन्य से पंडित रज्जी राम उपाध्याय हनुमान गढं जं 🕉️ 💐
`जय पितृदेव``जय ब्राह्मणदेव🙏`
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