#पुनरुपनयननिमित्त- ( सूर्य-चन्द्रग्रहणे भोजन प्रायश्चित्त)-
[देवलः] सूर्यसोमोपरागे च उक्तकालं विना द्विजाः।
तदन्नं मांसमित्याहुः तद्भुक्त्वा मांसभुग्भवेत् ।।
[मरीचिः] सूर्यग्रहे तु नाश्नीयात् पूर्वं यामचतुष्टयम्।
चन्द्रग्रहे तु यामांस्त्रीन् भुक्त्वा पापं समश्नुते ।।
इमं धर्मं परित्यज्य यो विप्रस्त्वन्यथाचरेत् ।।
(पुनः) #तस्योपनयनं भूयस्तप्तं सान्तपनं स्मृतम् । (सूर्यग्रहभोजने तप्तं चन्द्रग्रहणे सान्तपनम् )
तदेवाह [मनुः] सूर्योपरागे यो भुंक्ते तस्य पापं महत्तरम् ।
तस्य पापविशुद्ध्यर्थं तप्तकृच्छ्रमुदीरितम् । चन्द्रोपरागकाले भुक्त्वा कायं समाचरेत् ।।
उभयोर्भोजने विप्रः पुनः संस्कारमर्हति ।।
{ तत् प्रायश्चित्ते पुनःसंस्कारे च पराङ्गमुखः स अयाज्यो भवति}
चतुर्वर्गचिंतामणि प्रायश्चित्त खंड 🙏
सूर्यग्रहण में पहले चार याम (लगभग बारह घंटे) तक भोजन नहीं करना चाहिए।
चन्द्रग्रहण में तीन याम तक भोजन नहीं करना चाहिए; यदि कोई इस समय भोजन करता है तो वह पाप का भागी होता है। जो ब्राह्मण इस धर्म को छोड़कर अन्यथा आचरण करता है, उसका पुनः उपनयन करना चाहिए।
सूर्यग्रहण में भोजन करने पर ‘तप्त’ कृच्छ्र और चन्द्रग्रहण में ‘सान्तपन’ कृच्छ्र प्रायश्चित्त बताया गया है। -(मरीचि)
जो व्यक्ति सूर्यग्रहण में भोजन करता है, उसका पाप अत्यन्त बड़ा होता है। उस पाप की शुद्धि के लिए ‘तप्तकृच्छ्र’ प्रायश्चित्त बताया गया है। और जो चन्द्रग्रहण के समय भोजन करे, उसे भी विधिपूर्वक प्रायश्चित्त करना चाहिए। दोनों (सूर्य और चन्द्र ग्रहण) में भोजन करने वाला द्विज पुनः संस्कार (उपनयन) का अधिकारी होता है।(मनुः)
अतः जो इन प्रायश्चित्तों और पुनःसंस्कार से विमुख रहता है, वह अयाज्य (यज्ञादि कर्म के अयोग्य) माना जाता है।
(चतुर्वर्गचिंतामणि प्रायश्चित्त खंड)
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