Tuesday, 17 March 2026

त्र्यम्बक" और "मृत्युञ्जय" श्रीराम के रूप

. 🌹अथ त्र्यम्बकमन्त्रार्थो राम:🌹
🌸वेद-वेदार्थ अनन्त असीम हैं। अतीत, वर्त्तमान और भविष्य में प्रकट होने वाली सकल विद्याओं के सूत्र वेद में अवस्थित हैं। वेद के अर्थों की इयत्ता नहीं। किसी के हृदय में "त्र्यम्बक" और "मृत्युञ्जय" श्रीराम के रूप में ही प्रकट हो गये तो "श्रीराम" के महामृत्युञ्जयत्व में किञ्चिदपि कोई बाधा नहीं। नैरुक्त प्रक्रिया के चतुर्विध बाहुलक में "क्वचिदप्रवृत्ति:" और "क्वचिदन्यदेव" का भी अपलाप नहीं किया जा सकता। बन्धो! "त्र्यम्बक" मन्त्र के प्रसिद्धार्थ शिवपरक तो प्रशस्त हैं ही; सद्युक्ति और व्युत्पत्ति के बल से अप्रसिद्धार्थ श्रीरामपरक भी प्रशस्त हो जाय तो अल्पापत्ति नहीं। रामार्थविरोधी ने विशेषरूपेण "त्र्यम्बक" शब्द के अर्थ पर कुछ श्लोक पढ़ा है और विनियोग के "रुद्रो देवता" पर अपनी उड़ान भरी है। सम्प्रति "त्र्यम्बक" मन्त्र के सभी पदार्थों पर विवाद का श्रवण न होने से केवल "त्र्यम्बक" और "विनियोग" पर विचार किया जाता है। 

🌸महामृत्युञ्जयमन्त्र- "महाँश्चासौ मृत्यु: महामृत्युस्तं जयति अनेन मन्त्रेण इति महामृत्युञ्जयो मन्त्र:" महामृत्यु पर विजय प्राप्त कराने वाले मन्त्र को महामृत्युञ्जय मन्त्र कहा जाता है। किसी प्रकार से भगवान् श्रीराम एवं श्रीरामपरक इस त्र्यम्बक मन्त्र के महामृत्युञ्जयत्व में कोई बाधा नहीं। कर्मठगुर्वादि में बहुविध महामृत्युञ्जय मन्त्रों को भी देखें।

. 🌸त्र्यम्बकपदार्था:🌸
(१)"त्रीणि अम्बकानि नेत्राणि यस्यासौ त्र्यम्बक:" जिनके तीन नेत्र हों, वे त्र्यम्बक। भगवान् श्रीराम त्रिनेत्र भी हैं। रामायणमीमांसा की श्रीरामोपासना और श्रीरामार्चनचन्द्रिकादि में भगवान् श्रीराम के अङ्गन्यास में "नेत्रत्रयाय" लिखा है। श्रीरामरहस्योपनिषत् के श्रीशिवोमात्मक भगवान् राम को "रामं त्रिनेत्रं या त्रिणेत्रम्" से प्रणाम किया गया है। मन्त्रसार में त्रिणेत्र और शुक्लवर्ण श्रीराम का वर्णन है- "दोर्भिः खड्गं त्रिशूलं डमरुमसिधनुर्दण्डबाणं कुठारं शङ्खं चक्रं कृपाणं हलमुसलगदाभिण्डिवालं च पाशम्। उद्यद्बाहुं च मुष्टिं ह्यभयवरकरं बिभ्रतं शुक्लवर्णं वन्दे रामं त्रिणेत्रं त्वमररिपुकुलं मर्दयन्तं प्रतापै:॥" इतना ही नहीं: महान् शिवोपासक श्रीमधुसूदन सरस्वती ने प्रसिद्ध श्रीशिवमहिम्नस्तोत्रम् की "हर" और "हरि" परक व्याख्याएँ की हैं। उन्होंने "अकाण्डब्रह्माण्ड" श्लोक के "त्रिनयन" पद की हरिपरक व्याख्या की है- "हे त्रिनयन! त्रयाणां लोकानां नयनवत् सर्वावभासक" एतादृश विविध आप्तार्ष प्रमाणों से भगवान् श्रीराम भी त्रिनेत्र होने से "त्र्यम्बक" सिद्ध हुए।

(२)"तिस्र: अम्बा: मातरो यस्यासौ त्र्यम्ब: अम्ब ण्वुल् अम्ब कर्म्मणि घञ् स्वार्थे कन्वा त्र्यम्बक:" कौशल्या, सुमित्रा और कैकेयी- इन तीन माताओं वाले श्रीराम "त्र्यम्बक" हुए। किसी ने "एवं तिसृ्णामम्बानां गर्भे जातो यतो हर:" वाला श्लोक पढ़ कर प्रलाप किया है कि श्रीराम तीन माताओं के गर्भ से जन्म नहीं लिए तो इस अर्थ से "त्र्यम्बक" नहीं हो सकते! सावधान- अजन्मा अयोनिज भगवान् श्रीराम तो एक भी गर्भ से जन्म नहीं लिए। श्रीतुलसीदासजी ने भी "भए प्रगट" में भगवान् श्रीराम का ही जन्मग्रहणकर्तृत्व बताया है। तथापि श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण में अनेक बार "मातृ्णां तव राघव" मातृ्णाम् बहुवचन पदप्रयोग से एवं "तिसृ्णाम्" तिस्र: मातर:" आदि से भगवान् श्रीराम की तीन माताओं का स्पष्ट उल्लेख होने से उनके लिए "त्र्यम्बक" होने में बाधा नहीं। पुन: मन्वादि धर्मशास्त्रों के अनुसार कई भाइयों में किसी एक के पुत्रवान् हो जाने से सभी पुत्रवान् माने जाते हैं। कई माताओं में एक भी गर्भत: पुत्रवती हो जाय तो अन्य माताओं का भी अपुत्रत्व दोष समाप्त हो जाता है। उपलब्ध एक पुत्र ही सभी माताओं का वैध पिण्डद होता है। अत: इस अर्थ में भी तीन माताओं वाले भगवान् श्रीराम "त्र्यम्बक" सिद्ध हुए।

(३)"त्रयाणां ब्रह्मविष्णुरुद्राणां पितेति त्र्यम्बक:" जो ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र का भी पिता हो वह "त्र्यम्बक" राम। गोस्वामीजी ने तो लिखा ही है- "संभु बिरंचि बिष्नु भगवाना। उपजहिं जासु अंस तें नाना।।" इस अर्थ में भी भगवान् श्रीराम के "त्र्यम्बक" होने में अल्पापत्ति नहीं।
 
(४)"त्रयाणां लोकानामम्बक: पितेति त्र्यम्बक:" भगवान् श्रीराम त्रिलोकप. जगत्पिता या जगत्पालक होने से भी असन्दिग्ध "त्र्यम्बक" सिद्ध हुए।

(५)"तिसृ्णामम्बानां गर्भे जातत्वात्त्र्यम्बक:" तीन माता वाले होने के कारण श्रीराम के "त्र्यम्बक" होने की सिद्धि दूसरे बिन्दु में कर दी गयी है।

(६)"त्रीन् वेदानम्बते शब्दायते इति त्र्यम्बक:" श्रीरामचरितमानस के अनुसार "जाकी सहज स्वास श्रुति चारी" गद्य, पद्य, गीत्यात्मक वेदों का प्रादुर्भावक होने से इस अर्थ में भी अनादिपुरुष भगवान् श्रीराम "त्र्यम्बक" हुए।

(७)"त्रिषु लोकेषु कालेषु वा अम्ब: शब्दो वेदलक्षणो यस्येति त्र्यम्बक:" भगवान् श्रीराम के बुद्धिप्रयत्नानपेक्ष सहज श्वास से प्रादुर्भूत वेदों के त्रिकालाबाधित सत्यत्व से श्रीराम "त्र्यम्बक" सिद्ध हुए।
 
(८)"त्रयोऽकारोकारमकाराः अम्बाः शब्दाः प्रतिपादका वाचका वा अस्येति त्र्यम्बक:" अकार, उकार, मकाररूप "तस्य वाचक: प्रणव:" प्रणव ब्रह्म का वाचक होने से "राममोङ्कारम्" भगवान् श्रीराम "त्र्यम्बक" सिद्ध हुए। उपनिषदों में "राम" शब्द को भी प्रणव ही कहा गया है। 

(९)"त्रीणि पृथिव्यन्तरिक्षद्युलोकाख्यानि अम्बकानि स्थानानि यस्येति त्र्यम्बक:" भगवान् श्रीराम पृथिव्यन्तरिक्षद्युलोकत्रय के महानायक होने से भी "त्र्यम्बक" सिद्ध हुए। इत्यादय:

🌹नोट- कई जिज्ञासुओं ने एतद्विषयक वक्तव्य और प्रवाद भेज कर मेरा विचार पूछा। आज सुबह तीन बजे कम्प्यूटर में कुछ विस्तृत लिखना चाहा, परन्तु कुछ तकनीकी समस्या के कारण मोबाइल में ही संक्षिप्त विचार लिखना पड़ा। महामृत्युञ्जय मन्त्र को श्रीरामपरक भी मानने में केवल "त्र्यम्बक" शब्दार्थ की बाधा आ रही थी, जिसे मैंने दूर करने का उपक्रम किया। अन्य पदों के प्रसिद्धार्थ लेने से ही श्रीरामपरक सम्पूर्ण मन्त्रार्थ की सिद्धि हो जाएगी। 

🌸मृत्युञ्जय एवं महामृत्युञ्जय शब्द के दस-बीस या तदधिक अर्थों की श्रीरामपरकता में अल्प समस्या भी नहीं। 

🌸विनियोग के लिए प्रयोगभेद से देवता और "अमुककार्ये विनियोग:" बदलने की विधा वैदिकों को ज्ञात है। जब यह मन्त्र रुद्र का स्तावक होगा तो "रुद्रो देवता" और जब इससे राम का स्तवन किया जाएगा तो "रामो देवता" कहने में कोई बाधा नहीं। एतादृश विनियोगरहस्य को परम्परया साङ्गोपाङ्ग वेदों को पढ़ने-गुनने वाले सर्वानुक्रमज्ञ ही समझ सकते हैं; स्वयं सर्वज्ञमन्य नहीं। विशेष पुन:; परन्तु वेदोच्चारण का स्वर निश्चित होने से मन्त्रों का विस्वर डुग्डुग्गीवादन अत्यन्त दोषावह है। 

🌸पुनर्ध्यातव्य- महान् शिव-कृष्णभक्त श्रीमधुसूदन सरस्वती महाभाग ने पूरे शिवमहिम्न:स्तोत्र की दो व्याख्याएँ की हैं- हरपरक और हरिपरक। "रामाभिधानो हरि:" से भगवान् श्रीराम हरि ही हैं। महाभागवत श्रीवंशीधरजी ने वैष्णवों का शिरोग्रन्थ श्रीमद्भागवत के प्रथम श्लोक की चौथी व्याख्या "शिव" पक्ष में की है; किसी की सामर्थ्य हो तो इसी क्रम से पूरे भागवत का अर्थ "शिव" परक कर दे। यद्यपि वेदभाष्यकार के रूप में प्रचलित श्रौतमुनिजी जन्मना वेदाधिकारी नहीं थे; तथापि जन्मान्तरीय संस्कारानुसार कपोत और सरमा को भी वेदसूक्तों का साक्षात्कार हुआ था। यदस्तु, श्रौतमुनिजी ने शुक्लयजुर्वेदीय माध्यन्दिन शाखा के प्रारम्भ के तीन अध्यायों के तीन भाष्य किये हैं; जहाँ "सात्वतभाष्य" में सभी मन्त्रों के अर्थ श्रीकृष्णपरक ही हैं। किसी की सामर्थ्य हो तो सम्पूर्ण वेदों को वेदविग्रह वेदवेद्य भगवान् श्रीराम-कृष्ण के तात्पर्यार्थ में पर्यवसित कर दे। राघवयादवीयम्, राघवपाण्डवीयम्, पार्वतीरुक्मिणीयम् के अर्थद्वैविध्य और राघवपाण्डवयादवीयम् के अर्थत्रैविध्य को कौन नकार सकता है? चिदम्बर कवि के पञ्चकल्याण चम्पू में एक ही साथ राम, कृष्ण, शिव, विष्णु और सुब्रह्मण्य के कथानकों का विचित्र चित्तहारी वर्णन है। अब तो नैषधीयचरित के अर्थवैविध्य को समझने वाले विरले ही कोई होंगे। सावधान- जब इन लोकमत्युत्पन्न महर्घ्य ग्रन्थों का इतना गाम्भीर्य; तो नैरुक्तप्रक्रियया "अतिपरोक्षवृत्ति" का साक्षात्कार होना केवल और केवल भगवद्गुरुकृपासाध्य ही हो सकता है। श्रीरामसहस्रनाम में शिव, शम्भु, शङ्कर, ईशान आदि भगवान् श्रीराम के नाम हैं। हरि-हर में अभेद प्रतिपादक वचनों की भरमार तो है ही। कोई अनन्यबुद्ध्यापि श्रीराम को ही सब कुछ मानें तो वेदार्थ को भी श्रीराम में पर्यवसित करना ही पड़ेगा; वे वेद के अमुक अंश को छोड़ तो नहीं सकते। तुलसीदासजी ने श्रीकृष्णविग्रह में भी धनुर्बाणधारी श्रीराम की भावना की तो श्रीराम का दर्शन हो गया। वेदप्रेमियो! वेद को पढ़ें ही नहीं, वेदभगवान् की उपासना करें; आपका और विश्व का मङ्गल होगा।

👉विशेष- विषयविशेषज्ञ पारम्परिक वैदिकों के विचारों का मन्थनपूर्वक सम्मान और उन्हीं प्रणम्यों के साथ यथामति संवाद किया जा सकता है। वेदार्थ का अगाध प्रवाह कुण्ठाग्रस्त न हो जाय, इसीलिए मैंने यथामति थोड़ा दिग्दर्शन किया। "बिभेत्यल्पश्रुताद्वेद:" को रटते हुए भी वेद को पङ्गु बनाना सही नहीं। वेदोsव्यान्मान्निरन्तरम्...

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