Sunday, 4 October 2026

इबादत" का अर्थ होता है गुलाम.

इस्लाम और हिन्दू धर्म की फिलोसॉफी पर तुलना में एक पोस्ट लिखी जिसमें "इबादत" की उत्पत्ति अरबी के शब्द "अब्द" से बताई जिसका शाब्दिक और व्यावहारिक अर्थ होता है गुलाम.. यानि इस्लाम में अल्लाह से एक मुस्लिम का संबंध गुलामी का है.. और यह एक ऐसी विवेचना है जो न तो मौलिक है, न विवादित है और ना ही कोई मुस्लिम इसको लेकर डिफेंसिव है या इससे कन्नी काटता है. 

    पर इसको लेकर आपत्ति हुई एक हिंदी के कविराज को, जिन्होंने कहा कि चूँकि मैं अरबी का विद्वान नहीं हूँ इसलिए मेरी यह व्याख्या गलत है और किसी उलटबांसी से इबादत एक संस्कृत शब्द से निकला है जिसका अर्थ होता है तपस्या..

    यह एक एबरेशन नहीं है, एक कंसिस्टेंट पैटर्न है.. यदि किसी की बात काटनी है तो उसके तथ्यों को चुनौती देने के बदले उसकी ऑथोरिटी को चुनौती दो, एक बड़ी ऑथोरिटी से. क्योंकि उनका सत्य ऑब्जेक्टिव नहीं होता, सब्जेक्टिव होता है, इसलिए उनकी दुनिया में सत्य की अपनी कोई ऑथोरिटी नहीं होती, कहने वाले की ऑथोरिटी होती है. चूँकि आप किसी विषय के स्पेशलिस्ट नहीं हैं और आप सबकुछ नहीं जानते इसलिए आप जो जानते हैं वह वैलिड नहीं है. 

   अरबी के एक शब्द का अर्थ जानने के लिए अरबी का विद्वान होना आवश्यक नहीं है. एक दर्जी पजामा सिलते हुए कपड़ा सेंटीमीटर में नापता है. वहीं एक स्पेस साइंटिस्ट के लिए माइक्रोन और एंगस्ट्रम के मेजरमेंट भी महत्वपूर्ण होते हैं जबकि दर्जी ने उनका नाम भी नहीं सुना. बेशक लंबाई और दूरी की माप के मामले में स्पेस साइंटिस्ट दर्जी से अधिक जानता है लेकिन दर्जी पजामे का कपड़ा कटवाने के लिए स्पेस साइंटिस्ट के पास नहीं जाता. आप कितना जानते हैं, इससे अधिक महत्व की बात है कि आपके काम का क्या है और आप वह जानते हैं या नहीं.

    अर्थशास्त्री और सोशल फिलॉसफर फ्रेडरिक हायेक ने अगर एक महत्व की बात कही है तो वह है कि नॉलेज समाज में बिखरा पड़ा है. नॉलेज असीमित है और हर किसी के पास अपने काम के लिए रेलेवेंट नॉलेज ही होता है. वहीं वामपंथ की सोच है कि नॉलेज सीमित है, और उसका सेंट्रलाइज्ड कंट्रोल होना चाहिए और डिसीजन मेकिंग प्रॉसेस सेंट्रलाइज्ड होना चाहिए. 

  इसकी अति देखिए.. कविराज ने कहा कि हिन्दू धर्म में भक्ति का स्वरूप भी सेंट्रलाइज्ड निर्णय से निर्धारित होगा. उनके अनुसार तुलसीदास सबके लिए भक्ति का स्वरूप निर्धारित करके गए हैं कि श्रीराम की भक्ति सिर्फ दास्य भाव से की जा सकती है..

     हनुमान जी ने या तुलसीदास ने प्रभु श्रीराम से कहा कि मैं आपका दास हूँ.. प्रभु श्रीराम ने किसी को नहीं कहा कि तुम मेरे दास हो. हिन्दू होने का अर्थ है स्वतंत्रता. यहाँ भक्त निर्धारित करता है कि उसका अपने इष्ट से क्या सम्बन्ध होगा.. वह भक्ति दास्य भाव से करेगा, या प्रेम भाव से या वात्सल्य भाव से. ईश्वर यह आदेश नहीं करते. यह स्वतंत्रता इस्लाम में या अन्य मोनोथेइस्ट रिलिजन में नहीं है. 

   कविवर "वैदिक समाजवाद" के आग्रही हैं.. यह भक्ति और अध्यात्म का वामपंथ है. इसीलिये इसका स्वरूप इस्लाम से इतना मिलता जुलता है. समाजवाद को चाहे आप कोई भी नाम दें, अपने हर रूप में एक समान ही परिणाम देता है. चाहे वह हिटलर का नेशनल सोशलिज्म हो, या मामदानी का डेमोक्रेटिक सोशलिज्म हो या फेबियन्स का वेलफेयर सोशलिज्म हो, या माओ, मार्क्स, लेनिन का कम्युनिज्म हो.. सबकी मूल आत्मा एक ही है और सबका परिणाम भी एक है. सबकी आत्मा है निर्णय प्रक्रिया का केन्द्रीकरण किसी न किसी बहाने से...और सबका अंतिम परिणाम है व्यक्तिगत स्वतंत्रता की हत्या.. कहीं झटके से तो कहीं धीरे धीरे हलाल से और कहीं वेलफेयर का एनेस्थीसिया देकर.

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