🔥ज्ञातव्य- वेदार्थसाधन के कई नैरुक्त प्रकार होते हैं। निरुक्त में "ऋचस्त्रिविधा:" कहकर "परोक्षकृता: प्रत्यक्षकृता आध्यात्मिक्यश्च" से वेदार्थ के त्रैविध्य का प्रतिपादन किया गया है। पुन: इन तीनों वेदार्थवृत्तियों के कई अवान्तर भेद भी हैं। वेदार्थ करने के लिए व्याकरण-कोशादि के साथ विनियोगज्ञान की आवश्यकता होती है। विनियोग में मन्त्र के ऋषि, छन्द, देवता और कर्मप्रयोग का बोध होता है। तदनन्तर ही अर्थवत्ता की तात्पर्यसिद्धि होती है- "ऋषिच्छन्दोsथ दैवत्यं विनियोगस्तथैव च। मन्त्रजिज्ञासमानानां वेदितव्यं पदे पदे।।" विनियोगज्ञान के बिना वेदार्थ की स्वल्पसिद्धि भी सम्भव नहीं। व्यापक विनियोगज्ञान के अभाव में "गणानान्त्वा" मन्त्र अश्वस्तावक बन कर रह जायगा; गणपतिस्तावक नहीं हो सकता। "शन्नो देवी" मन्त्र जलस्तावक तो रहेगा शनिग्रहस्तावक नहीं हो सकता।
🔥नैरुक्त निर्वचनसिद्धान्त के अनुसार "अक्षरवर्णसामान्यान्निर्ब्रूयात्" वर्णसामान्य के साम्य से मन्त्र का विनियोग और विनियोगानुकूल अर्थ का निश्चय होता है। शाकपूणि ने और आगे बढ़कर "वर्णसाम्यान्निर्ब्रूते" कह दिया है; यानी दग्ध और अग्नि में गकार मात्र के साम्य से यथाप्रकरण वेदार्थ के लिए विनियोग की प्रवृत्ति हो जाती है। "दधिक्क्राव्व्ण:" में दधि शब्द के साम्य से "दधिस्नानादौ विनियोग:", "अक्क्षन्नमीमदन्त" में अक्ष के साम्य से "अक्षतार्पणे विनियोग:" आदि शास्त्रसिद्ध हैं। उसी प्रकार वैदिकसिद्धान्तों के मर्म्मज्ञ आप्त महानुभावों ने शिवार्चन में परम्परया "व्विज्ज्यं धनु:" का विजयास्नानादि में विनियोग किया है तो वह सर्वथा स्तुत्य और ग्राह्य है। आपकी गुरुपरम्परया तप:पूता वैदिकी मेधा हो तो तद्वत् ही वेदार्थ करने का प्रयास करें; सत्परम्परा पर प्रहार न करें। "वेदार्थस्यानन्त्यात्" वेद के अनन्त अर्थों की इयत्ता नहीं होती। पुन: अनावश्यक अत्यधिक वेदमन्त्रों को प्रसारित करते रहने वाले महाशय भी इस तप:साध्य वेदार्थप्रक्रिया पर ध्यान देते हुए फेसबुक के चौराहे पर वेदभगवान् को फेंकने से बचें। "बिभेत्यल्पश्रुताद्वेद:" को न भूलें एवम् आप वस्तुत: वेदभगवान् को किञ्चित् भी बोलना-समझना चाहते हैं तो "जपादौ नाधिकारोsस्ति सम्यक्पाठमजानत:। प्रातिशाख्यादिकं ज्ञेयं सम्यक्पाठस्य सिद्धये।।" पर चिन्तन करें।
☹️ऐसे ही दो-चार सन्धि-विच्छेद रट लेने मात्र से वेदतुल्य श्रीमद्भागवतार्थ की सर्वार्थसिद्धि नहीं हो सकती। श्रीमद्भागवत के प्रथम पद्य में ही वेदान्त के "जन्माद्यस्य यत:" आदि मुख्यतम सूत्रचतुष्टय का व्याख्यान किया गया है और "मुह्यन्ति यत्सूरय:" कहकर वक्ता-श्रोताओं को सावधान भी कर दिया गया है। ध्यातव्य- पारमहंस्यसंहिता श्रीमद्भागवत में विद्यार्थियों की नहीं; "विद्यावतां भागवते परीक्षा" विद्यावानों की परीक्षा होती है। आप सच में सामर्थ्यवान् हैं तो श्रीमद्भागवत के प्रत्येक पद ही नहीं; प्रत्येक वर्ण में "शब्दात्मिका" भगवती श्रीराधा रानी का साक्षात्कार करें। सीतोपनिषत् में "प्रथमा शब्दमयी देवी" के अनुसार भगवती का प्रथम स्वरूप शब्दमय ही है। महाभागवत श्रीवंशीधरजी ने श्रीमद्भागवत के प्रथम श्लोक के सौ अर्थ किये हैं; जिनमें तीसवाँ अर्थ श्रीराधापरक ही है। बङ्गप्रदेश के महामहोपाध्याय श्रीपञ्चानन तर्करत्न भट्टाचार्यजी ने सम्पूर्ण ब्रह्मसूत्रों का शक्तिपरक भाष्य किया है। नैषधमहाकाव्यादि की भाष्यचमत्कृति से अचम्भित हुए बिना कोई विद्वान् रह नहीं सकते। "यथा प्रियङ्गुपत्रेषु गूढमारुण्यमिष्यते। श्रीमद्भागवते शास्त्रे राधिकातत्त्वमीदृशम्।।" जिस प्रकार प्रियङ्गुपत्रों के अण्वणु में आरुण्य है; परन्तु बाह्यचक्षुर्दृश्य नहीं होता। अपितु अङ्गुल्यादि के मर्द्दन से पत्राभ्यन्तर में प्रवेश करने की चेष्टा करते ही उनकी लालिमा प्रकट हो जाती है। उसी प्रकार श्रीमद्भागवत के बाह्य सन्धि-विच्छेदों से कृष्णप्राणेश्वरी श्रीराधा महारानी का साक्षात्कार सम्भव नहीं; परन्तु राधारमण श्रीकृष्ण का वाङ्मयविग्रह श्रीभागवतरूप भगवान् की आत्मा "आत्मा तु राधिका तस्य" भगवती राधिका श्रीमद्भागवत से पृथक् कैसे हो सकती हैं?। अत: प्रलापत्यागपूर्वक निश्छलबुद्ध्या भगवद्भागवतकृपया "यमेवैष वृणुते तेन लभ्य:" के लिए सदैव स्वेष्ट की आराधना-उपासना करते रहनी चाहिए...
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