Tuesday, 6 October 2026

भोजन नियम

भर्तुर्भोजनसमये पत्नया समीपे न स्थेयम् ।
पति के भोजन करने के समय पत्नी को उसके समीप नहीं रहना चाहिए।

तथा च याज्ञवल्क्यः -
याज्ञवल्क्य कहते हैं—

न भार्यादर्शनेऽश्नीयान्नैकवासा न संस्थितः ।।
पत्नी के सामने भोजन नहीं करना चाहिए और न ही एक ही वस्त्र में उसके सामने बैठना चाहिए।

पत्नयाः सन्निधाने दोषमाह श्रुतिः -जायाया अन्ते नाश्नीया दवीर्यवदपत्यं भवतीति ।।
श्रुति में पत्नी की उपस्थिति में भोजन करने का दोष बताया गया है—पत्नी के समीप भोजन नहीं करना चाहिए, क्योंकि ऐसा करने से दुर्बल वीर्य वाली सन्तान उत्पन्न होती है।

परिवेषणसमये अन्नादिकं हस्तेन न परिवेषणीयम् ।।
भोजन परोसते समय अन्न आदि पदार्थ हाथ से नहीं परोसने चाहिए।

तथा च शातातपः -
शातातप कहते हैं—

हस्तदत्तानि चान्नानि प्रत्यक्षलवणं तथा । मृत्तिकाभक्षणं चैव गोमांसाभ्यशनं स्मृतम् ।।
हाथ से दिया हुआ अन्न, प्रत्यक्ष रूप से हाथ से दिया हुआ नमक, मिट्टी का भक्षण तथा गोमांस का सेवन—इन सबको अनुचित माना गया है।

लवणं व्यञ्जनं चैव घृतं तैलं तथैव च । लेह्यं पेयं च विविधं हस्तदत्तं न भक्षयेत् ।।
नमक, व्यञ्जन, घी, तेल तथा विभिन्न प्रकार के लेह्य और पेय पदार्थ हाथ से दिए हुए हों तो उनका सेवन नहीं करना चाहिए।

यमः - हस्तदत्ता तु या मिक्षा लवणव्यञ्जनानि च । भोक्ता ह्यशुचितां याति दाता स्वर्ग न गच्छति ।।
यम कहते हैं—हाथ से दी हुई भिक्षा तथा नमक और व्यञ्जन का सेवन करने वाला अशुचिता को प्राप्त होता है और उन्हें देने वाला स्वर्ग को प्राप्त नहीं होता।

हस्तदत्तास्तु ये स्नेहा लवणव्यञ्जनानि च । दातारं नोपतिष्ठते भोक्ता भुञ्जीत किल्विषम् ।।
हाथ से दिए हुए स्नेहद्रव्य, नमक और व्यञ्जन देने वाले को प्राप्त नहीं होते तथा उनका सेवन करने वाला पाप का भागी होता है।

अत्रिः-- घृतं वा यदि वा तैलं ब्राह्मण्या नखनिस्सृतम् । अभोज्यं तद्विजानीयात् भुत्क्त्वा चांद्रायणं चरेत् ।।
अत्रि कहते हैं—यदि घी अथवा तेल ब्राह्मणी के नख से निकला हुआ हो तो उसे अभोज्य समझना चाहिए। उसका सेवन कर लेने पर चान्द्रायण व्रत करना चाहिए।

आपस्तंबः -- घृतं तैलं च लवणं पानीयं पायसं तथा । मिक्षा च हस्तदत्ता तु न ग्राह्या यत्र कुत्रचित् ।।
आपस्तम्ब कहते हैं—घी, तेल, नमक, पानी और पायस आदि के सम्बन्ध में हाथ से दी हुई भिक्षा कहीं भी ग्रहण नहीं करनी चाहिए।

तस्मादन्तर्हितं चान्नं पर्णेन च तृणेन वा ।।
इसलिए अन्न को पत्ते अथवा तृण से ढककर रखना चाहिए।

प्रदद्यान्न तु हस्तेनेति ।।
अन्न हाथ से नहीं देना चाहिए।

तच्च परिवेषणं दर्व्यादिना कर्तव्यम् ।।
भोजन का परोसना दर्वी आदि साधन से करना चाहिए।

तथा चापस्तंवः -दर्व्या देयं कृतानं च समस्तव्यञ्जनानि चेति ।।
आपस्तम्ब कहते हैं—पका हुआ अन्न और सभी प्रकार के व्यञ्जन दर्वी से देने चाहिए।

उदकादेः अदर्व्या परिवेषणे दोषमाह स एव -
जल आदि को दर्वी के अतिरिक्त किसी अन्य साधन से परोसने के दोष को वे ही बताते हैं—

उदकं यच्च पक्वान्नं योऽदर्व्या दातुमिच्छति । स भ्रूणहा सुरापश्च स स्तेनो गुरुतल्पगः ।।
जो व्यक्ति जल अथवा पका हुआ अन्न दर्वी के अतिरिक्त किसी अन्य साधन से देना चाहता है, वह भ्रूणहन्ता, सुरापान करने वाला, चोर और गुरुपत्नीगमन करने वाले के समान दोष का भागी होता है।

तैलपक्वमपक्वं च न तु दर्ज्या कदाचन ।। इति ।।
तेल में पका हुआ अथवा कच्चा पदार्थ भी कभी दर्वी से नहीं देना चाहिए।

आयसेन पात्रेण परिवेषणे दोषमाह पराशरः-
पराशर लोहे के पात्र से भोजन परोसने के दोष को बताते हैं—

आयसेन तु पात्रेण यदन्नमुपदीयते । शुनोच्छिष्टमसौ भुंक्ते दाता तु नरकं व्रजेत् ।।
लोहे के पात्र से जो अन्न परोसा जाता है, उसे ग्रहण करने वाला कुत्ते के जूठे अन्न के समान भोजन करता है और उसे देने वाला नरक को प्राप्त होता है।

अयःपात्त्रमयोग्यं स्यात् स्नानाचमनकर्मसु ।। इति ।।
लोहे का पात्र स्नान और आचमन के कार्यों के लिए अनुपयुक्त माना गया है।

परिवेषणसमये एकपंत्क्त्युपविष्टानां स्नेहादिना विषमपरिवेषण न कर्तव्यम् ।
भोजन परोसते समय एक ही पंक्ति में बैठे हुए लोगों को स्नेह, भय अथवा धन आदि के कारण असमान रूप से भोजन नहीं परोसना चाहिए।

तथा च वसिष्ठः -
वसिष्ठ कहते हैं—

यस्त्वेकपङ्क्त्यां विषमं ददाति स्नेहाद्भयाद्वा यदि वार्थहेतोः ।वेदेषु दृष्टमृषिभिश्च गीतं तां ब्रह्महत्यां मुनयो वदन्ति ॥
जो व्यक्ति एक ही पंक्ति में बैठे लोगों को स्नेह, भय अथवा धन के कारण असमान रूप से भोजन देता है, उस कर्म को मुनिजन ब्रह्महत्या के समान बताते हैं। ऐसा वेदों में देखा गया है और ऋषियों द्वारा भी कहा गया है।

स्कान्दे- स्त्रीणां हि परमश्चैको नियमस्समुदाहृतः । अभ्यर्च्य चरणौ भर्तुः भोक्तव्यमिति निश्चयः ॥ इति ॥
स्कन्दपुराण में कहा गया है—स्त्रियों के लिए एक प्रमुख नियम बताया गया है कि वे पति के चरणों की पूजा करके भोजन करें।

भर्तुर्भुक्तोच्छिष्टं पत्नथा भोक्तव्यम् ।
पत्नी को पति के भोजन से बचे हुए अन्न का सेवन करना चाहिए।

तथा च मनुः -
मनु कहते हैं—

पीत्वाऽऽपोशनमश्नीयात् पात्रदत्तमगर्हितम् । भार्याभृतकदासेभ्यः उच्छिष्टं शेषयेत् ततः ।( भुक्तभिन्न पात्रेषु शेषभोजनमुच्छिष्टम्)
आचमन के लिए जल पी लेने के बाद पात्र में दिया हुआ निन्दित न होने वाला भोजन करना चाहिए और उसके बाद पत्नी, भृत्य तथा दास आदि के लिए भोजन का कुछ अंश बचाकर रखना चाहिए। भिन्न पात्र में भोजन करने के बाद बचा हुआ भोजन ‘उच्छिष्ट’ कहलाता है।

व्यासः - सेवेत भर्तुरुच्छिष्टमन्नपानफलादिकम् । महान् प्रसाद इत्युक्त्वा पतिदत्तं प्रतीच्छती ।।
व्यास कहते हैं—पत्नी को पति के बचे हुए अन्न, पेय, फल आदि का सेवन करना चाहिए और पति द्वारा दिए गए उस अवशेष को ‘महान् प्रसाद’ कहकर ग्रहण करना चाहिए।

भर्तुर्भोजनानन्तरमेव स्त्रिया भोजनमाह व्यासः -देवतातिथिभृत्यानां निर्वाप्य पतिना सह । शेषान्नमुपभुञ्जाना यथान्यायं यथाविधि ।। तुष्टपुष्टजना नित्यं नारी धर्मेण युज्यते ।। इति ।।
व्यास कहते हैं—स्त्री को पति के भोजन करने के बाद ही भोजन करना चाहिए। देवता, अतिथि और भृत्यों के लिए भोजन का अंश निकालकर, पति के साथ शेष अन्न को उचित रीति और विधि के अनुसार ग्रहण करने वाली स्त्री के घर में लोग सदा सन्तुष्ट और पुष्ट रहते हैं तथा वह धर्म से युक्त होती है।

स्वभोजनसमये स्त्रीभिज्येष्ठादेव्यै बलिदानं कर्तव्यम् । तथाच मनुः-
अपने भोजन के समय स्त्री को ज्येष्ठा देवी के लिए बलि अर्पित करनी चाहिए। मनु कहते हैं—

न ददाति च या नारी ज्येष्ठायै प्रत्यहं बलिम् । भोज्यादन्नाद्यथाशक्ति सा प्रेत्य नरकं व्रजेत् ।।
जो स्त्री प्रतिदिन अपनी सामर्थ्य के अनुसार भोजन आदि में से ज्येष्ठा देवी को बलि नहीं देती, वह मृत्यु के बाद नरक को प्राप्त होती है।

अवश्यमेव नारीभीर्ज्येष्ठायै बलिकर्मणा । प्रीणनं प्रत्यहं कार्य पुत्रपौत्रधनेप्सुभिः ।॥ इति ।।
पुत्र, पौत्र और धन की इच्छा रखने वाली स्त्रियों को प्रतिदिन बलि-कर्म के द्वारा ज्येष्ठा देवी को प्रसन्न करना चाहिए।

भर्त्रयुक्तमन्नपानादि पत्नया वर्जनीयम् । तथा च व्यासः -यच्च भर्ता न पिबति यच्च भर्ता न खादति । यच्च भर्ता न चाश्नाति तत् सर्वं वर्जयेत् सती ।। इति ।।
पत्नी को उन अन्न-पान आदि पदार्थों का त्याग करना चाहिए जिन्हें पति त्याग देता है। व्यास कहते हैं—

यच्च भर्ता न पिबति यच्च भर्ता न खादति । यच्च भर्ता न चाश्नाति तत् सर्वं वर्जयेत् सती ।।
पति जिस पेय को नहीं पीता, जिस खाद्य पदार्थ को नहीं खाता और जिस भोजन को ग्रहण नहीं करता, उस सबका सती स्त्री को भी त्याग करना चाहिए।

स्त्रिया भर्तारं विहाय मृष्टमन्नं न भोक्तव्यम् ।
स्त्री को पति को छोड़कर उत्तम अथवा स्वादिष्ट भोजन नहीं करना चाहिए।

तथा च स्कान्दे-या भर्तारं परित्यज्य मृष्टमश्नाति केवलम् । ग्रामे सा सूकरी भूया द्वल्गुली वा स्वविट्भुजा ।।
स्कन्दपुराण में कहा गया है—जो स्त्री पति को छोड़कर अकेले उत्तम भोजन करती है, वह अगले जन्म में सूकरी अथवा अपने ही मल का भक्षण करने वाली अन्य निम्न योनि में जन्म लेती है।

पश्यति प्रिये पत्नया न भोक्तव्यम् ।
पति के देखते हुए पत्नी को भोजन नहीं करना चाहिए।

तथा च व्यासः - भोजनं वमनं निद्रां परिधानं च वाससाम् । प्रारंभं मण्डनानां च न कुर्यात् पश्यति प्रिये ।। इति ।।
व्यास कहते हैं—जब पति देख रहा हो, तब पत्नी को भोजन करना, वमन करना, निद्रा लेना, वस्त्र धारण करना तथा आभूषण आदि धारण करने का आरम्भ नहीं करना चाहिए।
श्रीमती हैमवती 
❗जय महादेव❗
 ⭕प्रश्न नहीं स्वाध्याय करें‼️

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