Saturday, 27 June 2026

पार्थिवलिङ्ग शिव लिंग

पार्थिवलिङ्ग निर्माण में एक तोला या दो तोला मिट्टी से त्रिसूत्रप्रमाण अपना अंगुष्ठपर्व परिमाण का शास्त्रीय प्रमाण है और इसी से बडे लिङ्ग में पूजन से पूजन का फल भी नहीं मिलता । परन्तु आजकल तो..........

#पार्थिवलिंग निर्माण में मृत्तिका का परिमाण का शास्त्रीय निर्देश 👇

मृत्तिकातोलकं ग्राह्यमथवा तोलकद्वयम् ।
एतदन्यन्न कुर्वीत कदाचिदपि पार्वति ! ॥

#पुनः

मृत्तिकातोलकं ग्राह्यमथवा तोलकद्वयम् ।
त्रिसूत्रस्य प्रमाणेन घटनं कारयेद्‌बुधः ॥
स्वांगुष्ठपर्वमाणन्तु कृत्वा लिङ्गं प्रपूजयेत् ।
मृदादिलिङ्गघटने प्रमाणं परिकीर्त्तितम् ।
फलमुक्तमवाप्नोति अन्यथा चेत्तदन्यथा ॥(६२७•त.तो.प्रा)

पूजा में सिर ढकने का शास्त्र निषेध

 पूजा में सिर ढकने को शास्त्र निषेध करता है। शौच के समय हीं सिर ढकने को कहा गया है। प्रणाम करते समय,जप व देव पूजा में सिर खुला रखें। तभी शास्त्रोचित फल प्राप्त होगा।

शास्त्र क्या कहते हैं ? आइए देखते हैं. 

उष्णीशी कञ्चुकी नग्नो मुक्तकेशो गणावृत।
अपवित्रकरोऽशुद्धः प्रलपन्न जपेत् क्वचित् ॥-
(शब्द कल्पद्रुम )
अर्थात्-- सिर ढककर,सिला वस्त्र धारण कर,बिना कच्छ के,शिखा खुलीं होने पर ,गले के वस्त्र लपेटकर । अपवित्र हाथों से,अपवित्र अवस्था में और बोलते हुए कभी जप नहीं करना चाहिए ।।


कर्ण दुर्योधन और द्रौपदी पुत्र आत्महीनहिन्दू

द्रौपदी के पुत्रों को लेकर रीपोस्ट:

ऐसा नहीं था कि उनका उल्लेख ग्रंथों में नहीं है, या वह वीर नहीं थे. बस वह विमर्श में नहीं थे! उनपर लिखा नहीं गया. जितना प्रयास कर्ण जैसे लोगों को नायक बनाने का किया गया या फिर दुर्योधन के पापों को कम करने का किया गया, उसमें से शतांश भी अग्निसुता द्रौपदी के पुत्रों को नहीं प्रदान नहीं किया गया.
किसी ने कहा, वर्णन नहीं है, किसी ने कहा कि कहा ही नहीं गया है! अपनी अकर्मण्यता को छिपाने के तमाम बहाने हैं. 
महाभारत के आदिपर्व में हरणाहर पर्व में द्रौपदी के पुत्रों के जन्म एवं उनके गुणों का वर्णन है. आइये देखते हैं कि क्या लिखा है 
शुभलक्षणा पांचाली ने भी अपने पाँचों पतियों से पाँच पर्वत समान बड़े वीर पुत्र प्राप्त किए। अदिति ने जिस प्रकार देवों को प्रसव किया था, वैसे ही पांचाली ने युधिष्ठिर से प्रतिविन्ध्य, वृकोदर से सुतसोम, अर्जुन से श्रुतकर्मा, नकुल से शतानीक, सहदेव से श्रुतसेन ये पांच महारथी वीरपुत्र प्रसव किए. ब्राह्मणों ने शास्त्रों के अनुसार यह जानकर कि युधिष्ठिर का पुत्र प्रतिविध्य पर्वत की भांति शत्रु को मारने के योग्य होगा, उसका नाम प्रतिविन्ध्य रखा. 
सहस्त्र सोमयज्ञ करने के पीछे भीमसेन से सोम के उजाले के समान तेजस्वी बड़े चापधारी सूत के उपजने से उसका नाम सुतसोम हुआ. किरीटधारी अर्जुन ने महान् एवं विख्यात कर्म करने के पश्चात् लौटकर द्रौपदी से पुत्र उत्पन्न किया था, इसलिये उनके पुत्र का नाम श्रुतकर्मा हुआ। कौरवकुल के महामना राजर्षि शतानीक के नाम पर नकुल ने अपने कीर्तिवर्धक पुत्र का नाम शतानीक रख दिया। 
और सहदेव से द्रौपदी के जिस पुत्र ने जन्म लिया था, वह कृतिका नक्षत्र में हुआ था, सेनापति कार्तिकेय कृत्तिका की सन्तान थे, अत: सहदेव के पुत्र का नाम श्रुतसेन रखा गया
द्रौपदी के कुमारों में वर्ष-वर्ष भर का अंतर था, वह सब एक दूसरे का हित चाहने वाले एवं यशस्वी हुए. इन सभी कुमारों को अर्जुन से दिव्य एवं मानुषी अस्त्रों की शिक्षा प्राप्त हुई थी. 
समस्या यह नहीं है कि हमारे ग्रंथों में किसी का उल्लेख नहीं है, समस्या यह है कि हमारी बुद्धि बी आर चोपड़ा के महाभारत के अनुसार चलती है. जैसा उसमें दिखाया गया, वैसे ही चली. चूंकि महाभारत कौन पढ़े इसलिए हम आश्रित हो गए, कभी किसी के द्वारा किए गए अंग्रेजी भाषांतरण पर, या फिर वामपंथी अनुकूलन पर, या फिर राष्ट्रवादी रैपर में वामपंथी विचारों के!
फिर रोना शुरू किया कि हाय यह नहीं लिखा, वह नहीं लिखा! हाय हाय! ये हाय हाय मचाने से पहले यदि पढ़ा जाए, अध्ययन किया जाए, यदि नहीं कर सकते हैं तो कम से कम किसी ऐसे व्यक्ति से पूछा जाए जिसने इन तमाम ग्रंथों का अध्ययन किया है!
द्रौपदी के महावीर पुत्र थे, जिन्होनें अश्वत्थामा के साथ युद्ध करते हुए अपने प्राण त्यागे थे, उनका सिर कोई सहज काटकर नहीं ले गया था. वह शूरवीर थे, एवं युद्ध के अंत तक बचे रहे थे. 
अभिमन्यु सहित सभी पांडव पुत्र शूरवीर थे! ये हमारे बालकों के आदर्श हो सकते हैं, हम इनकी वीरता के किस्से अपने बच्चों को सुना सकते हैं, परन्तु हम सुनाते हैं कर्ण की कथा, हम सुनाते हैं कर्ण के साथ हुआ अन्याय और इस कथित अन्याय की कृत्रिम पीड़ा में हमारे बच्चों के लिए जो वीरता के नायक हो सकते हैं वह खो जाते हैं और हम उन्हें वही कुंठित पीड़ा देते हैं, बल्कि उससे भी कहीं अधिक पीड़ा देते हैं, और उसके बाद क्या करते हैं, यह हम देख ही रहे हैं!
हम दुर्योधन के चरित्र को ऐसा कर देते हैं कि बच्चों को लगता है कि कर्ण और दुर्योधन के साथ अन्याय हुआ!
जब हम अपने नायकों के अपमान का विमर्श तैयार करते हैं, अपनी अगली पीढ़ियों को हम न जाने कहाँ धकेल देते हैं 
आत्महीनहिन्दू

आत्महत्या तुम्हारा चुनाव या प्रेत प्रभाव

#आत्महत्या_तुम्हारा_चुनाव_या_प्रेत_प्रभाव

[एक गूढ़ केस स्टडी,एक व्यक्तिगत संवाद,वैज्ञानिक,दार्शनिक और आध्यात्मिक दृष्टि से परिपूर्ण,एक विस्तृत विमर्श]

असूर्या नाम ते लोका अन्धेन तमसावृता।
तास्ते प्रेत्यानिभगच्छन्ति ये के चात्महनो जना:।।

अर्थात्: आत्मघाती मनुष्य मृत्यु के पश्चात,अज्ञान और अंधकार से परिपूर्ण,सूर्य के प्रकाश से हीन,असूर्य नामक लोक को गमन करते हैं।ये ही "प्रेत योनि" कहलाई जाती है,
जो "आत्महत्या"करता है,वो "प्रेत योनि" में फंसता है,जहां न देह है,न शांति।वहां मात्र अंतहीन दंड और पश्चाताप है,उसके सिवाए,कुछ भी नहीं....कुछ भी नहीं.!

नाम: अविरल राजपूत
उम्र: 16 वर्ष
स्थान: कानपुर,उत्तर प्रदेश

अविरल राजपूत एक मेधावी छात्र था,लेकिन लॉकडाउन के दौरान,उसने ऑनलाइन मल्टीप्लेयर गेम्स (जैसे PUBG) खेलना शुरू किया।धीरे-धीरे,ये शौक,एक लत में बदल गया।गेमिंग के दौरान,उसे नशे की ओर भी आकर्षण हुआ,जिससे वो,नशीले पदार्थों का सेवन करने लगा।गेम में इन-ऐप खरीदारी और नशे की लत को,पूरा करने के लिए,अविरल ने माता-पिता के बैंक खातों से,पैसे चुराने शुरू किए।कुछ ही महीनों में उसने,₹1.5 लाख खर्च कर दिए,जब माता-पिता को इसकी जानकारी हुई,तो उन्होंने उसका मोबाइल फोन,छीन लिया और उसे गेम खेलने से रोक दिया।गेमिंग और नशे के कॉकटेल ने,अविरल के भीतर,कई बदलाव किए,लॉकडाउन के समय PUBG जैसे ऑनलाइन गेम्स में शामिल होने से,अविरल के मस्तिष्क ने,डोपामिन का अत्यधिक स्राव शुरू कर दिया,जिससे उसे कृत्रिम आनंद की लत लग गई,धीरे–धीरे,वास्तविक जीवन से उसका जुड़ाव,कम होने लगा और जब ये “इनाम प्रणाली”(Reward Circuit) रुकती है,जैसे मोबाइल छीन लिया जाए,जैसा अविरल के केस में हुआ,तो इससे उसके "डोपामिन" स्तर मे,भारी गिरावट हुई,इसके पश्चात,"सेरोटोनिन" की कमी ने,उसे अवसाद,चुप्पी और आत्मग्लानि की ओर ले गई,नशे के प्रभाव और माता–पिता से छुपकर व्यवहार करने की चिंता ने,उसके शरीर में,"कॉर्टिसोल" को बढ़ा दिया,जिससे उसके भीतर तनाव,चिड़चिड़ापन और आक्रोश पैदा हुआ।नशीले पदार्थों के सेवन और लगातार स्क्रीन एक्सपोजर से,उसका आभामंडल(AURA),आज्ञा चक्र एवं मणिपुर चक्र,तीनों भारी रूप से,प्रभावित हुए।उसका आभामंडल जो पहले एक स्थिर नीला और पीला था(नीला:आत्मचिंतनशील,पीला:कुछ नया सीखने की प्रबल इच्छा)जो कि दिखाता है कि,अविरल आरंभ में,एक मेधावी,सकारात्मक और आत्मसंतुलित बच्चा था,फिर उसका आभामंडल धीरे–धीरे धुंधला,
थरथराता और विकृत हो गया।

आभामंडल की यह दुर्बलता,विशेष रूप से तब गंभीर होती है,जब कोई किशोर,नशा+गेमिंग+अकेलापन जैसी
"त्रयी" में,फंसता है।

ऐसी स्थिति में,अविरल प्रेतों के लिए,एक "उपयुक्त टारगेट" बन चुका था,विशेष रूप से,वो सूक्ष्म आत्माएं,वो प्रेत,जो स्वयं भी नशा,लत या अपराध के चलते,मृत्यु को प्राप्त हुई हों।ऐसी नेगेटिव एंटिटी,अक्सर वही लत,वही विचार और वही विनाश दूसरों में,पुनः दोहराने का प्रयास करती हैं।अविरल के आभामंडल की जर्जरता ने,उन्हें उसके भीतर प्रवेश की अनुमति दी।अविरल से उसके माता–पिता द्वारा,उसका फोन छीने जाने को तीन दिन बीत चुके थे।तीन दिन तक,मोबाइल से दूर रहने के कारण,उसका जो डोपामिन क्रैश हुआ,उसने अविरल को गहरे Withdrawal में धकेल दिया,जहां उसका शरीर और मस्तिष्क दोनों,“सिस्टम शटडाउन” की स्थिति में आ गए।इसी मेंटल–ब्रेकडाउन के समय,प्रेत ने “मरने” का विकल्प, उसके समक्ष ऐसा रखा,जैसे ये ही उसकी मुक्ति हो।उस समय उसका विवेक,उसका आत्म–संयम और उसकी आत्मा,तीनों पीछे हट चुके थे।

अविरल ने अपनी मां की साड़ी से फंदा बनाकर,अपने कमरे के पंखे से लटक कर,आत्महत्या कर ली...

पुलिस को उसके कमरे से कोई सुसाइड नोट नहीं मिला,लेकिन उसके मोबाइल में गेमिंग ऐप्स और नशे से संबंधित सामग्री पाई गई।जब एक किशोर,वर्चुअल दुनिया के आनंद को ही,जीवन मान लेता है,तो उसके आभामंडल का क्षय,वास्तविक संसार से उसका रिश्ता तोड़ देता है,और तब नशा,प्रेत और मृत्यु,उसके लिए सबसे "आसान विकल्प" बन जाते हैं।

वर्ष 2021 में,भारत में,नशे और शराब के कारण आत्महत्या: 10,560 मामले हुए,जो वर्ष 2020 की तुलना में,
15% अधिक थे।

2021 में छात्र आत्महत्या दर: 13,089 मामले,जिनमें से अधिकांश,15-24 आयु वर्ग के थे।ऑनलाइन गेमिंग के कारण,आत्महत्या के मामले: विभिन्न रिपोर्टों के अनुसार,कई किशोरों ने गेमिंग लत के कारण,
आत्महत्या की है।

नाम: ओम पाण्डेय 
उम्र: 15 वर्ष
स्थान: कोटा,राजस्थान

ओम,तीन वर्षों से,मेडिकल की तैयारी कर रहा था।परिवार से दूर,भीड़ में खोया हुआ।कोचिंग संस्थानों की,चमकदार होर्डिंग्स के नीचे,उसका चेहरा था,पर मन अंधकार में था।न कोई उसे समझने वाला था,न सुनने वाला।वहां पढ़ाने वाले तो कई थे,पर बाल–मन को पढ़ने वाला,सुनने वाला और समझने वाला कोई भी नहीं।दिन भर के शेड्यूल,मॉक टेस्ट,दूसरे बच्चों से तुलना,रैंक, और फिर रात का अकेलापन सब एक खतरनाक कॉकटेल बन चुका था।मेडिकल की तैयारी के नाम पर,15 वर्षीय ओम,(जो एडमिशन के समय,मात्र 12 साल का था)पर जो मानसिक भार डाला गया,उसने उसके शरीर में कोर्टिसोल (Cortisol) को अत्यधिक बढ़ा दिया,यह तनाव का मुख्य हार्मोन है।इसी के साथ,डोपामिन और सेरोटोनिन,जो आनंद,प्रेरणा और संतुलन के लिए,ज़िम्मेदार होते हैं,उनका स्तर तेजी से गिरने लगा।बचपन से किशोरावस्था में,प्रवेश कर रहे शरीर में,ये असंतुलन और भी तीव्र होता है,क्योंकि इस उम्र में,"टेस्टोस्टेरोन" और "ग्रोथ हार्मोंस" भी सक्रिय रहते हैं,और मानसिक अस्थिरता से,ये हार्मोंस भी डगमगाने लगते हैं।

ओम का आभामंडल,जो पहले "हल्का नीला" और "नारंगी" था (ज्ञान और आशा का संकेत),धीरे-धीरे "धूसर"(grey),"फीका" और नीचे की ओर सिकुड़ता चला गया।"मूलाधार","मणिपुर" और "आज्ञा चक्र" उसकी इस स्थिति में,सबसे अधिक प्रभावित हुए,जिससे उसका आत्मबल,स्थिरता और विवेक तीनों छिन्न–भिन्न हो गए।आभामंडल में दरारें बन जाने के बाद,विशेषकर,जब कोई किशोर ये सोचने लगे कि,“मरने से ही मैं अपने माता–पिता को,दुःख से बचा सकता हूं” तो वो स्थिति,प्रेत–प्रेरणा के लिए सबसे उपयुक्त होती है।ये वो भटकी हुई आत्माएं होती हैं,जो पहले कभी,कड़ी अपेक्षाओं,परीक्षा–दबाव या आत्मग्लानि में मरी होती हैं,और अब दूसरों को भी,उसी मार्ग पर प्रेरित करती हैं।ओम जैसे,"संवेदनशील बच्चे",जिनका आभामंडल,जागरूकता के बिना अकेलेपन में टूटता है,वो इन प्रेतों की इस छाया से बच नहीं पाते।कोटा,दिल्ली,प्रयागराज जैसी जगहों पर तो,बिल्कुल भी नहीं।जब उसने आत्महत्या का निर्णय लिया,तब उसका विवेक नहीं,बल्कि उसकी प्रेरित चेतना सक्रिय थी,जिसे प्रेतों ने एक ही विचार में बांध दिया था,“मरना ही समाधान है।”
ये साहस नहीं था,ये भय और मोह का विकृत रूप था,जो आभामंडल के पूर्ण पतन से जन्मा था।ओम लड़ नहीं पाया, क्योंकि उसकी आध्यात्मिक,पारिवारिक और भावनात्मक सुरक्षा–परतें पहले ही बहुत कमजोर थीं।उसके आसपास कोई ऐसा नहीं था,जो उसे सिर्फ़ सुने और वो भी,बिना जज किए।प्रेतों को,किसी मासूम के आभामंडल में प्रवेश के लिए और कुछ नहीं चाहिए,सिर्फ़ एक अकेला,टूटा हुआ हृदय पर्याप्त है।किशोर–किशोरियों को,जब हम सिर्फ़ रैंक,नंबरों और पैकेज से तोलते हैं,तो वे सूक्ष्म स्तर पर आत्महीन हो जाते हैं और यही शून्यता,प्रेतों के लिए सबसे आसान प्रवेशद्वार बन जाती है।ओम भी प्रेत-प्रेरणा का शिकार हो गया।उसे बस एक ही खयाल आ रहा था,"मुझे मरना है,मुझे मरना है,मर जाऊंगा तो मम्मी पापा को निराश नहीं करूंगा और,उनको ये सुनने को नहीं मिलेगा कि उनका ओम,नालायक निकला,जब रहूंगा ही नहीं,
तो किसको नालायक बोलेंगे सब"

उसने कुछ और नहीं सोचा,मां की दी हुई,चादर से ही,फांसी का फंदा बनाया और अपने हॉस्टल के कमरे में आत्महत्या कर ली...

भारत में छात्रों की आत्महत्या के वार्षिक आंकड़े
(2015– 2022)–:

वर्ष: आत्महत्या के मामले

2016: 9,478 
2017: 9,905 
2018: 10,159 
2019: 10,335 
2020:12,526
2021: 13,089
2022:13,044

नाम: अंशिका सक्सेना
उम्र: 23 वर्ष
स्थान: इंदौर,मध्य प्रदेश

तीन वर्षों का प्रेम,एक संबंध,जो जीवन का आधार लगने लगा था अंशिका को,जब उस संबंध में,सर्वेश ने उसे धोखा दिया,तो उसका मानसिक संतुलन डगमगाने लगा।प्रेम–विछोह के पश्चात,अंशिका के शरीर में सेरोटोनिन और डोपामिन का स्तर तेजी से गिरा,जिससे उसे जीवन में कोई आनंद या उद्देश्य नहीं दिखा।उसके भीतर “मैं अस्वीकार्य हूं”, जैसी आत्म-नकारात्मक धारणाएं जन्म लेने लगीं,जिससे "कोर्टिसोल" (Cortisol) का स्तर लगातार बढ़ा,और वो "क्रॉनिक–तनाव" में डूबती चली गई।गर्मी के मौसम में,जहां हार्मोनल उतार-चढ़ाव अधिक तीव्र होते हैं,वहां अंशिका के "एंडोक्राइन–सिस्टम" पर,तनाव का असर और गहरा हो गया।इस काल में,उसका आभामंडल(AURA),जो पहले हल्का गुलाबी और नीला था(प्रेम व कोमलता का प्रतीक),धीरे-धीरे धूसर(Grey),फीका और विकृत होता गया।जब आभामंडल में दरारें उत्पन्न होती हैं और चक्र (विशेषकर स्वाधिष्ठान और अनाहत)अवरुद्ध हो जाते हैं,तब प्रेत-जैसी सूक्ष्म नकारात्मक शक्तियां व्यक्ति की चेतना में प्रवेश कर सकती हैं,
अंशिका के साथ भी,वही हुआ।

30 दिनों तक डिप्रेशन में रहने के दौरान,अंशिका ने कई बार आत्महत्या का प्रयास किया,जो संकेत है कि,"एड्रीनलीन" और "नोराएड्रीनलीन" जैसे हार्मोन,जो "फाइट या फ्लाइट" मोड में सक्रिय होते हैं,उसके शरीर में अनियंत्रित रूप से रिलीज़ हो रहे थे।हर असफल प्रयास के बाद,उसका आत्म-बल एवं आभामंडल और भी क्षीण होता गया।आभामंडल की ये दुर्बलता,प्रेतों के लिए,"उपयुक्त द्वार" बन जाती है,खासकर उन आत्माओं के लिए,जो स्वयं भी प्रेम में छले गए और असमाप्त मृत्यु का अनुभव लेकर,"भटक" रही होती हैं।30 दिन के संघर्ष के पश्चात,जब अंशिका ने अपनी ही बिल्डिंग की सातवीं मंज़िल से छलांग लगाई,तो उसका वो निर्णय तर्क से नहीं,आत्मिक वशीकरण और नकारात्मक प्रेरणा से संचालित था।आत्मा जब आत्म-स्वीकृति छोड़ देती है और आभामंडल पूर्णतः क्षीण हो जाता है,तब वो "अपने होने" को ही मिटा देने को तैयार हो जाती है।ऐसे क्षणों में,प्रेत उसे हिम्मत नहीं देता,बल्कि उसके भीतर भय और पीड़ा को इतना बढ़ा देता है कि,मृत्यु कम पीड़ादायक लगने लगती है।

अंशिका उससे लड़ नहीं पाई,क्योंकि उसे यह पता ही नहीं था कि,वो लड़ रही है,और लड़ रही है,तो किस से लड़ रही है,उसके पास न ज्ञान था,न साधना,न आत्मरक्षा की शक्ति। आभामंडल(AURA) की रक्षा हेतु,जिस आध्यात्मिक जागरूकता की आवश्यकता होती है,वो आधुनिक समाज में न प्रेमियों को सिखाई जाती है,न पीड़ितों को दी जाती है। इसीलिए वो एक सूक्ष्म आत्मिक युद्ध में हार गई।प्रेम में छले गए हृदय,जब आत्म-स्वीकृति खो बैठते हैं,तब प्रेतों के लिए सबसे सरल शिकार बन जाते हैं।और तब मृत्यु उन्हें मुक्ति नहीं,भटकाव की अगली यात्रा पर ले जाती है।

2021 में,30 वर्ष से कम आयु की महिलाओं द्वारा आत्महत्या:45,026

18 से 29 वर्ष की आयु वर्ग: इस आयु वर्ग में आत्महत्या की दर 13.3 प्रति लाख जनसंख्या थी,जो महिलाओं के लिए, उच्चतम दरों में से,एक है।  

नाम: डॉक्टर विकास तलवार
उम्र: 36 वर्ष
स्थान: दिल्ली (मूल निवासी),केस दूसरे राज्य में

2 साल पहले विकास की नेहा से,"अरेंज मैरिज" हुई थी,विवाह के 3 महीने बाद ही,पत्नी ने झूठा दहेज प्रताड़ना का केस लगाया,1 साल से तलाक का केस भी चल रहा था,कोर्ट की तारीखें,पैसों का बोझ,नौकरी का जाना,सबने मिलकर,उसे घुटनों पर ला दिया।वह दिन–ब–दिन,थक रहा था,लगातार तनाव के कारण,उसके शरीर में कोर्टिसोल, सेरोटोनिन,डोपामिन और टेस्टोस्टेरोन जैसे हार्मोन,असंतुलित हो गए,जिससे वो अवसाद,निराशा और आत्मग्लानि से घिरता चला गया।उसका आभामंडल (AURA) जो पहले,"नीला" और "पीला" था,वो धीरे-धीरे धूसर(Grey) और काली दरारों से भर गया,विकास के विशेष रूप से,हृदय और मूलाधार चक्र कमज़ोर हो गए, आभामंडल के क्षीण होने से,विकास नकारात्मक सूक्ष्म शक्तियों और न्याय व्यवस्था से पीड़ित होकर,आत्महत्या कर चुके,प्रेत-विचारों के प्रभाव में आ गया।जब व्यक्ति का मन न्याय और जीवन से भरोसा खो देता है,तब उसकी चेतना प्रेत–प्रेरणा के लिए,संवेदनशील हो जाती है।विज्ञान का स्टूडेंट होते हुए भी,आभामंडल के टूटते ही विकास आत्महत्या की ओर अग्रसर हो गया,और अंततः एक होटल में अपने ही सर्जिकल ब्लेड से अपनी नसें काटकर जीवन समाप्त कर लिया,वही ब्लेड जिससे वो औरों की ज़िंदगियां बचाता था।ये केवल एक आत्महत्या नहीं,बल्कि पुरुष पीड़ा और न्यायिक अनसुनी का भयावह संकेत है।उसे ये ही लग रहा था,कि भारतीय न्याय व्यवस्था में,पुरुषों के लिए कोई सहारा नहीं,कोई सुनवाई नहीं।आख़िरी बार जब विकास,कोर्ट से लौटा,उसकी आंखों में जीवन नहीं था,वो पहले ही मर चुका था,और बाकी कार्य,प्रेत ने उसे प्रेरित करके कर दिया।

2016–2020: इस अवधि में वैवाहिक समस्याओं के कारण,16,021 पुरुषों ने आत्महत्या करी
2020: तलाक के कारण,287 पुरुषों ने आत्महत्या करी
2022: 83,713 विवाहित पुरुषों ने आत्महत्या की
2022: कुल आत्महत्याओं में से 72% पुरुष थे,जिनमें से कई ने,घरेलू कारणों को,आत्महत्या का कारण बताया।  

नाम: अपराजिता अग्रवाल
उम्र: 27 वर्ष
स्थान: प्रयागराज,उत्तरप्रदेश

वर्ष 2021 में अपराजिता की एक ही शहर में संजय से अरेंज मैरिज हुई,शादी के तुरंत बाद,पहले दहेज के लिए,मिलने वाले ताने क्या कम थे,कि वो जब पहली बार,गर्भवती हुई तो अल्ट्रासाउंड में बेटी की जानकारी सामने आते ही,ससुराल वालों ने ज़बरदस्ती उसका अबॉर्शन करवा दिया।उसे हर रोज़,शारीरिक और मानसिक रूप से प्रताड़ित किया गया।मायके वालों ने कहा,"बेटी एडजस्ट कर लो,इतने बड़े घर परिवार के लिए,इतना तो एडजस्ट करना पड़ेगा ही.."अपराजिता को अब न ससुराल में शांति थी,न ही मायके वालों ने उसका साथ दिया।एक साल बाद,वो दुबारा गर्भवती हुई,फिर वही धमकी: “अगर फिर बेटी निकली तो जान से मार देंगे।”और अल्ट्रासाउंड में बेटी ही निकली,अपराजिता के शरीर में पिछले एक वर्ष में लगातार कई हार्मोंस में बदलाव हुए,उथल–पुथल हुई,जैसे कि,"प्रोजेस्टेरॉन",गर्भावस्था को बनाए रखता है,इसकी कमी होने से,उसे डिप्रेशन और मूड स्विंग्स होने लगे।"ऑक्सीटोसिन",जिसे लव–हार्मोन कहा जाता है,जो मां और शिशु के बीच,एक अनकहा,संबंध बनाता है,जब अपराजिता का गर्भपात हुआ,तो इसका प्रवाह अचानक रुक गया,जिससे वो भावनात्मक रूप से पूरी तरह,टूट गई।

इस स्थिति में,उसके शरीर में,"कॉर्टिसोल"अधिक हो गया,जिससे उसे एंग्जाइटी हुई,पैनिक अटैक्स आए,पोस्ट ट्रॉमेटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर(PTSD) हो गया,इसका ये प्रभाव हुआ कि,उसे नींद आना बंद हो गया,उसकी कमज़ोर पड़ी देह में,ऊर्जा की और कमी हो गई,वो "क्लिनिकल–डिप्रेशन" के स्टेज पर पहुंच गई और उसके मन में,अनियंत्रित भय रहने लगा।एक महिला जिसने एक बार "कन्या के कारण" जबरन गर्भपात झेला हो,वो अपने अस्तित्व को निष्क्रिय और अपमानित महसूस करती है।मानसिक आघात इतना गहरा होता है कि,वो आत्महत्या की ओर अग्रसर हो सकती है,अपराजिता के साथ भी,ये ही हुआ,वो लगातार,अपराधबोध में जीने लगी,“मैं बेटी को नहीं बचा पाई”,“मैं अपनी कोख की रक्षा नहीं कर पाई…”,वो पूरी तरह,स्वयं को असहाय अनुभव करने लगी,“मेरे शरीर पर भी मेरा अधिकार नहीं…”

जब कोई स्त्री बार-बार अनचाहे गर्भपात,अपमान और भय का शिकार होती है,तो उसका आभामंडल,धूसर(Grey) हो जाता है,जिससे आशा का लोप होता है।उसके आभामंडल में,काली दरारें पड़ती हैं,जिससे,आत्मिक रक्षा कमजोर होती है।उसका स्वाधिष्ठान चक्र (Reproductive),सबसे अधिक प्रभावित होता है।गर्भपात में मारे गए,भ्रूणों की आत्माएं,जो कभी–कभी अपनी मां से जुड़ी रहती हैं,वो भी इस समय,बहुत प्रभावी हो जाती हैं,वो धीरे–धीरे उसे खोखला करने लगती हैं,और फिर प्रेत को आभामंडल में छिद्र आसानी से मिल जाता है,जब ऐसा होता है,तो उसे काली छायाएं दिखने लगती हैं,गले में दबाव महसूस होने लगता है,नींद में घुटन होने लगती है।ये वही अवस्था है,जिसे “प्रेत प्रेरणा” कहा गया है,जो आत्महत्या के मार्ग को “मुक्ति” कहकर प्रस्तुत करती है।अपराजिता के साथ,ये सारी चीज़ें एक वर्ष से लगातार घट रहीं थीं,उसका मन,भय और अपमान से इतना भर चुका था कि,उसने रिपोर्ट देखते ही,बिना कुछ सोचे–समझे नए पुल से यमुना जी में छलांग लगा दी।

2016–2020: इस अवधि में,वैवाहिक समस्याओं के कारण,21,750 महिलाओं ने आत्महत्या करी।

2020: तलाक के कारण,264 महिलाओं ने आत्महत्या की।  

2022: 30,771 विवाहित महिलाओं ने आत्महत्या करी।

इन सब केस से इतर,वर्ष 2018 में,दिल्ली के बुराड़ी में एक ही परिवार के 11 लोगों की रहस्यमयी "सामूहिक आत्महत्या",आज भी आधुनिक मनोविज्ञान के लिए,एक पहेली है,परंतु यदि हम इस घटना को,धर्मशास्त्रों की दृष्टि से देखें,तो यह स्पष्ट होता है कि,ये घटना,किसी अदृश्य सत्ता के,वशीकरण की परिणति थी।

इस परिवार के मुखिया,ललित पर “पिता की आत्मा” का वशीकरण बताया गया,जो उसे निर्देश देती थी:कठोर व्रत, विशेष आसन,ध्यान की विधियां,
और अंततः “मोक्ष प्राप्ति हेतु” आत्मसमर्पण।

बुराड़ी जैसे कई और सामूहिक आत्महत्याएं के केस हुए हैं:

तमिलनाडु: 22 मामले, 45 मौतें
आंध्र प्रदेश: 19 मामले, 46 मौतें
मध्य प्रदेश: 18 मामले, 39 मौतें
राजस्थान: 15 मामले, 36 मौतें

इसके अलावा,53 प्रमुख शहरों में से 10 शहरों में सामूहिक आत्महत्याओं के 26 मामले दर्ज किए गए,जिनमें 63 लोगों ने आत्महत्या की।

यह सब गरुड़ पुराण और देवी भागवत की उन कथाओं की याद दिलाता है,जहां प्रेत आत्माएं,पूर्वज या देवस्वरूप(कुलदेवता,या जिस देव की तुम आराधना कर रहे हो)बनकर,प्रकट होती हैं और मनुष्य को भ्रमित करती हैं। 

श्रीमद्भागवत में वर्णित “प्रेतबाधित राजा” की कथा में भी, यही होता है,जहां एक प्रेत आत्मा,राजपुरोहित बनकर राज्य को अनिष्ट की ओर धकेलता है।

कई और घटनाएं भी देश भर में हुई हैं,जहां एक परिवार ने “पूर्वजों के आदेश” पर आत्महत्या की,जो इस सिद्धांत को और पुष्ट करती है।मृतकों के पास से मिले हस्तलिखित संदेशों में,‘पूर्वजों द्वारा स्वर्ग का निमंत्रण’ और ‘पुनर्जन्म में उच्च कुल में जन्म’ का उल्लेख था।ये वही तकनीक है,जो प्रेत आत्माएं अपनाती हैं: वे मनुष्य की श्रद्धा,मोह और भ्रम का उपयोग करती हैं।

कैसे करते हैं प्रेत यह मायावी षड्यंत्र?

१. भ्रमित रूप धारण:
गरुड़ पुराण और ब्रह्मवैवर्त पुराण में वर्णन है कि,प्रेत आत्माएं देवताओं या पूर्वजों का रूप धारण कर सकती हैं।वे स्वप्न, ध्यान या साक्षात्कार के रूप में,प्रकट होकर,व्यक्ति को यह विश्वास दिलाती हैं,कि वह किसी "दिव्य सत्ता" से,
संवाद कर रहा है।

२. मिथ्या वचन:
“तुम्हें स्वर्ग मिलेगा”, “तुम्हारा पुनर्जन्म राजघराने में होगा”, “एक बार यह कृत्य करो, फिर दुख समाप्त”,ये वाक्य प्रेतों की शास्त्रीय भाषा है।वामाचार में तो यह भी वर्णन मिलता है कि,कैसे साधना में,विघ्न डालने हेतु,पिशाच रूपी शक्तियां, साधक को ‘सिद्धि’ का झूठा लालच देती हैं।

३. स्थानिक प्रेतबाधा:
बुराड़ी और अन्य घटनाओं में,ये देखा गया कि,घर के भीतर ही कोई विशेष स्थान या पेड़ आदि पूजा का केंद्र बन गए थे,ये “स्थूल प्रेतवृति” का संकेत है।

स्कंद–पुराण बताता है कि,जिस स्थान पर कोई अत्याचार या अपूर्ण क्रिया हुई हो,वहां प्रेत–गण वास करते हैं और वहां पूजा-पाठ आरंभ हो जाए,तो वे उसी माध्यम से,
नियंत्रण शुरू कर देते हैं।

अच्छा,ये प्रेत ऐसा करते क्यों हैं?
क्योंकि,वे स्वयं अधूरे हैं,पीड़ित हैं,न जाने कबसे,प्रेत योनि में कष्ट भोग रहे हैं,और इस कारण वो और क्रोधित,और ईर्ष्यालु,और विध्वंसकारी हो गए हैं।वो चाहते हैं,कि कोई और भी उनकी पीड़ा में सम्मिलित हो,जो वो झेल रहे हैं,वो भी उसकी अनुभूति करें,और साथ ही साथ,वो इन जीवों की प्रेत बनी आत्माओं को प्रताड़ित करें,एक गुलाम बना कर,
ऐसे समझ लो कि उन्हें जीवित संसार से तीव्र ईर्ष्या होती है,वो जानते हैं कि आत्महत्या करने वाला भी,उन्हीं की तरह प्रेत बनता है,बस इसलिए वो जीव को वही कष्ट देने हेतु,आत्महत्या के लिए प्रेरित करते हैं,जैसे जब कोई छात्र किसी मेडिकल या इंजीनियरिंग कॉलेज में फर्स्ट इयर में एडमिशन लेता है,और उसके साथ बहुत बुरी रैगिंग होती है,और रैगिंग करने वाले सीनियर,वही होते हैं,जिनके साथ,पूर्व में वैसी ही रैगिंग हुई थी,तो वो उसका दोहराव दूसरे नए छात्रों पर कर,एक डार्क प्लेजर की अनुभूति करते हैं,स्वयं को,"पॉवरफुल" फील करते हैं,बिलकुल वैसे ही प्रेतों का स्वभाव भी होता है,वो पीड़ित हैं,तो दूसरों को भी वही यातनाएं देते हैं,और हर बार,उनकी क्रूरता का स्तर बढ़ता जाता है,जो जितना पुराना प्रेत,उसकी उतनी शक्ति,उसकी उतनी अधिक क्रूरता।

अच्छा ये आभामंडल(AURA) क्या है?और ये कम कैसे होता है?कैसे इसके कम होने से हम किसी प्रेत का,किसी नेगेटिव एंटिटी का,आसान टारगेट बन जाते हैं?

बंधु,आभामंडल(AURA) एक सूक्ष्म ऊर्जा-क्षेत्र है,जो हर जीवित प्राणी के शरीर के चारों ओर मौजूद होता है।ये शरीर, मन और आत्मा की स्थिति को दर्शाता है।आयुर्वेद,योग और वेदांत के अनुसार,आभामंडल को सात सूक्ष्म स्तरों या परतों (layers) में विभाजित किया गया है।ये सात स्तर,हमारे शारीरिक,मानसिक,भावनात्मक और आध्यात्मिक अस्तित्व का प्रतिबिंब होते हैं।प्रत्येक स्तर,एक विशिष्ट प्रकार की ऊर्जा,चेतना और क्रिया से संबंधित होता है।

१. स्थूल शरीर स्तर (Physical Body Layer) - ये शरीर से सबसे निकटतम होता है।जीवनीय ऊर्जा (प्राण) यहीं बहती है।इसे "प्राणमय कोश" भी कहा जाता है।

२.भावनात्मक स्तर (Emotional Body Layer)- भावनाओं और अनुभवों को समेटे रहता है।Aura की रंगीन परत इसी में होती है।इससे ही व्यक्ति की "वाइब्स" महसूस होती हैं।

३. मानसिक स्तर (Mental Body Layer)- विचार,तर्क,निर्णय,और स्मृति की ऊर्जा।चिंतन और कल्पना यहीं से प्रसारित होते हैं।

४. हृदय स्तर (Astral Body Layer)- ये भावनात्मक और मानसिक शरीर का पुल है।प्रेम,सहानुभूति और संबंध यहीं पनपते हैं।इसे ही योग में "हृदयचक्र" से जोड़ा जाता है।

५. आध्यात्मिक स्तर (Etheric Template Layer)- ये आत्मा की छाया (Template) होता है।व्यक्ति की नियति, संस्कार और पूर्व जन्म के कर्म यहीं निहित होते हैं।

६.बौद्धिक-आध्यात्मिक स्तर (Celestial Body)- ध्यान, दिव्यता,उच्च चेतना और आत्मदर्शन का स्रोत।यहां आत्मा परमात्मा से संवाद करती है।

७. अति-आध्यात्मिक स्तर (Ketheric Template) Divine Body -आत्मा और ब्रह्म का एकत्व।परम शक्ति (Consciousness) से सीधा जुड़ाव।वेदांत में यही "अहम् ब्रह्मास्मि" की स्थिति है।

पहले तीन स्तर (१-३): स्थूल और सूक्ष्म शरीर से जुड़े हैं (शरीर,मन,भावना)

मध्य का चौथा स्तर(४): संबंधों और करुणा का सेतु है

अंतिम तीन स्तर (५-७): आध्यात्मिक प्रगति और आत्म-साक्षात्कार से संबंधित हैं

आभामंडल कमज़ोर होने के मुख्य कारण हैं,नकारात्मक विचार और भावनाएं,क्रोध,ईर्ष्या,चिंता,अवसाद,ये भावनाएं,ऊर्जा को नीचे खींचती हैं।लगातार नकारात्मक सोच से,आभामंडल की कम्पन-तरंगें (vibrations) धीमी और मलिन हो जाती हैं।शराब,सिगरेट,ड्रग्स,अत्यधिक प्रोसेस्ड फूड,आभामंडल को दूषित कर देते हैं।इससे आभामंडल की रक्षा-दीवार (protective shield) कमज़ोर हो जाती है।अत्यधिक डिजिटल स्क्रीन टाइम,फिर वो चाहे मोबाइल हो,वीडियो गेम हो,या अश्लीलता या हिंसक कंटेंट से जुड़ाव हो,ये सब,मस्तिष्क की ऊर्जा-संवेदना को कुंद करता है।इलेक्ट्रोमैग्नेटिक रेडिएशन (EMR) भी आभामंडल को असंतुलित करता है।नींद की कमी और अनियमित दिनचर्या भी,आभामंडल को प्रभावित करती है,6–8 घंटे की गहरी नींद न होना,शरीर की ऊर्जा-भरपाई रोक देता है।रात्रि जागरण,(विशेषकर रात 12 से 3 बजे तक का समय)आभामंडल को,सबसे अधिक प्रभावित करता है।जिन स्थानों में कलह,व्यभिचार या मृत्यु की घटनाएं,अधिक होती हैं,वहां आभामंडल क्षीण होता है।प्रेत-ग्रस्त स्थानों में रहने से,आभामंडल पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है,इसलिए कहा गया है,कि आमजनों को,विशेषकर बच्चों और युवक–युवतियों को अकारण,श्मशान घाटों पर विचरण या समय बिताना नहीं चाहिए,जब किसी अपने की मृत्यु

,आभामंडल पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है,इसलिए कहा गया है,कि
आमजनों को,विशेषकर बच्चों और युवक–युवतियों को अकारण,
श्मशान घाटों पर विचरण या समय बिताना नहीं चाहिए,जब किसी
अपने की मृत्यु हो,तभीजाना चाहिए और शुद्धि करके ही घर लौटना
चाहिए,पर अब तो,श्मशान घाटों को भी रील और सेल्फियों का स्पॉट
बना दिया गया है,इस कारण,प्रेत बाधाएं भी अधिक हो चली हैं,अघोर
तंत्र के साधकों के लिए अलग नियम हैं,श्मशान के देवी–देवता उनकी
रक्षा करते हैं,क्योंकि वो वहां साधना के उपलक्ष्य हेतु आते हैं,साधना
करने से पूर्व वो आज्ञा मांगते हैं,शमशान में बैठे इन रक्षक देवी देवताओं
से,बाकी जो भी,मौज–मस्ती,गांजा फूंकते हुए,रील बनाने आते हैं,वो
अपनी जीवनशक्ति का अपव्यय,आभामंडल की चमक और सुरक्षा को
क्षीण करते हैं,नाना प्रकार के रोगों और दिक्कतों से वो कुछ वर्ष बाद,
घिर जाते हैं और उन्हें पता भी नहीं चलता,ये किस कारण उनके साथ
हो रहा है,कौनसा प्रेत,शमशान की भूमि से,उनके साथ,चिपट गया है।

आभामंडल(AURA),एक अदृश्य कवच है,जो हमें न केवल रोगों से,
अपितु,आत्मघाती विचारों और प्रेत प्रभावों से भी बचाता है।इसका
ध्यान रखना,हमारी मानसिक,भावनात्मक और आध्यात्मिक रक्षा के
लिए अति आवश्यक है।

बंधु,ये जान लो,आत्महत्या...एक देह की नहीं,अपितु एक "अवसर" की
हत्या है,एक अवसर,जो तुम्हें न जाने,कितनी योनियों में समय देने के
पश्चात,प्राप्त हुआ,और तुम हो कि,इस अवसर को ऐसे ही,गंवा देना
चाहते हो,बिना ये समझे कि,ये आत्मघाती निर्णय,तुम्हारा स्वयं का न
होकर,किसी ऊर्जा द्वारा प्रभावित होने पर लिया गया निर्णय है,और तुम
हो कि,इस भ्रम में हो कि,तुम स्वयं ये निर्णय ले रहे हो,और तुम्हारे
हिसाब से,ये ही सबसे उचित निर्णय है,तुम बस औरों की भांति,उसी
जाल में फंस रहे हो,जो तुम्हें इस जन्म के पश्चात,बस कष्ट ही कष्ट देगा,
और उस कष्ट के समक्ष,जीवन में इस समय मिल रहा,कष्ट,"नगण्य"
लगेगा।

तुम्हें लग रहा होगा,कि मैं ये सब बातें,इसलिए कह रहा हूं,कि मेरे जीवन
में,सबकुछ सही है,और मैं दूसरों को लंबा–लंबा ज्ञान बांटने और
कहानियां सुनाने आ गया हूं,तो सुनो बंधु,मैं वहां था,जहां तुम अभी हो,
और हां अभी भी मैं टूटा हुआ हूं,बहुत कुछ खोया है,और खोने की कगार
पर हूं,सबकुछ शून्य से,पुनः आरंभ करना पड़ेगा और वो आसान नहीं
होता,पर मैंने स्वयं को समेटना सीख लिया है,स्वीकार लिया है कि,ये
जीवन,ये जन्म भी पूर्व जन्मों की भांति,संघर्षमय होगा,स्वीकार लिया है
कि,कई लोग आएंगे,कई जाएंगे,परिवर्तन को स्वीकार लिया है,परिवर्तन
है तो मैं गतिमान हूं,एक तालाब की भांति रुका हुआ नहीं हूं,ये स्वीकार
लिया है,स्वीकार लिया है कि,मुझे पग–पग पर,ठोकरें भी मिलेंगी,
तिरस्कार भी मिलेगा,कर्म फल सिद्धांत से मैं भी सबकी भांति बंधा हूं,
पर मैं आगे बढ़ता रहूंगा,क्योंकि आगे बढ़ना,मेरी प्रवृति है,हर जन्म में
रही है,परिवर्तन को स्वीकार करता हुआ,इतिहास से सीख लेते हुए,आगे
बढ़ना,मेरी प्रवृति है,ये सारा संघर्ष,ये सारी ठोकरें,मुझे कुछ सिखाने के
लिए मिली हैं,और जो भी मैं सीख रहा हूं एक विद्यार्थी की भांति,वो मैं
तुमको सिखाऊंगा,फ्री ऑफ कॉस्ट,कोई हिडेन एजेंडा नहीं,कोई स्वार्थ
नहीं,मुझे जो आदेश मिला है,बस उसी की पूर्ति कर रहा हूं,समझ लो,
जैसे महाकुंभ के दौरान,प्रभु प्रेरणा से मेरी इस देह ने निःशुल्क सेवा दी
थी,बस ये भी एक सेवा ही है,मेरे इस जन्म का तुम सबके प्रति एक
कर्तव्य,जो कार्य अब तक मेरी इस देह ने पर्सनल काउंसलिंग करके दी
थी,और आज वही सब इस लेख के माध्यम से समझाने का प्रयास कर
रहा हूं,हां ये लंबा लेख है,जैसे लिखने में मुझे समय लगा,वैसे पढ़ने में
तुम्हें भी समय लगेगा,आज एकादशी के दिन,इस लेख की पूर्ति कर रहा
हूं,पालनकर्ता श्री हरि विष्णु चाहेंगे और तुम्हारे प्रारब्ध में समझना होगा,
तो तुम्हें ये बातें,अवश्य समझ आएंगी,नहीं तो जो हरि इच्छा...🙏🏻

हां तो सुनो बंधु,ये आत्महत्या करने के विचारों ने मुझे भी पूरी तरह
जकड़ लिया था,वर्ष 2007 में,पर प्रेत सफल नहीं हुआ,कई उद्देशों की
पूर्ति करनी थी मुझे शायद,इस जन्म में।मेरी मां की प्रार्थनाएं थीं,प्रभु की
कृपा थी,और पूर्व जन्मों का प्रारब्ध भी,तभी मैं उन नेगेटिव ऊर्जाओं के
वश से बाहर निकल पाया,नहीं तो आज मैं यहां,ये लेख तुम्हारे लिए,नहीं
लिख रहा होता।प्रेत बन,तुम में से किसी को,आत्महत्या के लिए उकसा
रहा होता,या बस किसी शक्तिशाली प्रेत द्वारा प्रताड़ित हो रहा होता,इस
जाल में फंसने के लिए स्वयं को कोस रहा होता,और तुमसे ईर्ष्या कर,
जल रहा होता।

ये लेख तुम्हारे लिए ही है,तुम जो कोई भी हो,तुम्हारी क्या आयु है,तुम
युवा हो,अधेड़ हो,स्त्री हो,पुरुष हो,तुम जो भी हो,ये स्मरण रखो,कि जब
तुम इसे पढ़ो,तो जान लो,कोई ऐसी "सकारात्मक शक्ति" है,जो तुम्हें

ब्राह्मण विरोध

उस बंदे के ब्राह्मण विरोध को उसकी व्यक्तिगत राय के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। पिछले कुछ समय से उस देश के विश्वविद्यालयों में ब्राह्मण विरोधी शोध लगातार सांस्थानिक रूप से प्रोत्साहित की जाती रही है। हावर्ड विश्वविद्यालय तो इसके लिए कुख्यात हो चुका है। इसके साउथ एशिया संस्थान में यह काम धड़ल्ले से किया जा रहा है और 2023 से जाति-विरोध को एक स्थायी नीति के रूप में घोषित कर दिया गया है और इस नाम को ब्राह्मणों को बदनाम करने का euphemism कहा जा सकता है। अजंता सुब्रमण्यम The Caste of Merit: Engineering Education in India (2019) के नाम से इसी विश्वविद्यालय में अपनी शोध की थीं जिसमें वे कहती हैं कि IIT जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में मेरिट के नाम पर ब्राह्मण विशेषाधिकार और संप्रभुत्व चलते हैं। सूरज येंग्दे इसी विश्वविद्यालय से शोध कर यह कहती हैं कि अमेरिका में भी जाति है और वह ब्राह्मिनिकल प्रभावों के चलते है। हार्वर्ड विश्वविद्यालय 1636 में प्यूरिटन कांग्रीगेशनलिस्ट द्वारा मैसाचुसेट्स खाड़ी के पुरोहितों को प्रशिक्षित करने के लिए स्थापित किया गया था। इसका सिद्धांत वाक्य था : Veritas Christo et Ecclesiae ("Truth for Christ and the Church"). सत्य को यह सत्य की तरह नहीं देखता। इसका सत्य क्राइस्ट और चर्च के लिए है। 

यह पैटर्न कि नाम जाति-विरोध का दो और खलनायक ब्राह्मणों को बनाओ कमोबेश सभी अमेरिकी विश्वविद्यालयों ने अपना लिया है। केलीफोर्निया विश्वविद्यालय ने 2021 से जाति पर चर्चा को अपनी विभेदाचार विरोध की प्रोटेस्टेंट कैटेगरी में डाल दिया है। श्वेता मजुमदार अदुर और अंजना नारायणन अमेरिका के भारतीय डायस्पोरा में ब्राह्मण सुपीरियारिटी को देखती हैं। ब्रांडीज विश्वविद्यालय ने 2019 से। अरीजोना राज्य विश्वविद्यालय ब्राह्मण विशेषाधिकारों पर अध्ययन कराता है। इंदुलता प्रसाद मैक्स वेबर की ब्राह्मणों पर की गई टीप को लेकर inherited privileges पर काम इसी विश्वविद्यालय से करती हैं। मेरीलैंड विश्वविद्यालय ने ब्राह्मण सुपीरियरिटी पर काम कराया है। सोनल्दे देसाई ने इसी विश्वविद्यालय से शोध की थी। मेसाचुसेट्स विश्वविद्यालय ब्राह्मण प्रभावों पर। भरत राठौर ने यहाँ से अमेरिकी कैंपसों में ब्राह्मण विरोधी एक्टीविज्म पर अध्ययन किया है। 

विश्वविद्यालय विदेशी हैं पर यहाँ बुद्धिजीवी दिखने के शौक में ब्राह्मण विरोधी शोध भारतीयों के कंधे पर रखकर हो रही है। 

दुनिया में कहीं भी किसी अन्य समूह को ऐसे निशाने पर नहीं लिया जा रहा। केवल यही नहीं है कि भारत में हाल के वर्षों में ब्राह्मणों को जातीय घृणा का शिकार बनाया जा रहा है बल्कि यह है कि ठीक उसी समय अमेरिकी एकेडेमिक्स और स्कॉलरशिप भी यह काम बौद्धिक तरह से कर रही है। 

कभी इस कदमताल को ध्यान से दीजिए। यह संयोग भर नहीं है। उससे कुछ अधिक है।

उसकी तुलना में भारत के विश्वविद्यालयों को देखिए। क्या उन्होंने अमेरिका की व्हाइट सुप्रीमेसी पर, लगातार छोड़िये, कभी एक बार भी शोध कराये? कभी उन्होंने अमेरिका के तथाकथित फर्स्ट नेशन पर शोध करवाये? 

तब आप काहे के विश्वविद्यालय कहलाते हो जब आपके पास कोई विश्व-दृष्टि ही नहीं है। 

और यह मानकर नहीं चलिये कि यह सिर्फ ब्राह्मणों पर हमला है, हमें क्या करना। भूल गए कि अभी दो बरस पहले Dismantling Hindutva के नाम से 49 विश्वविद्यालयों ने एक साथ आयोजन किया था। इसमें आगे बढ़कर भूमिका निभाने वाला प्रिंसटन विश्वविद्यालय प्रेस्बिटेरियन संप्रदाय द्वारा स्थापित किया गया था। येल विश्वविद्यालय प्यूरिटनों के द्वारा, कोलंबिया विश्वविद्यालय एंग्लिकन के द्वारा, ब्राउन विश्वविद्यालय बैप्टिस्ट के द्वारा, डर्टमाउथ काल्विनिस्ट के द्वारा, जार्जटाउन व बोस्टन जेसुइट्स के द्वारा स्थापित हुए। ब्राह्मणों की जड़ों को दिखाने वाले ये विश्वविद्यालय कभी इस पर भी शोध कराते कि खुद इनकी धार्मिक/ सांप्रदायिक जड़ें इनके शोध और शिक्षण को प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष रूप से कितना प्रभावित करती रही हैं। 

पिछले एक दशक से अमेरिकी बौखलाहट बहुत बढ़ गयी है। और वह सिर्फ अध्ययन का प्रायोजन नहीं है, भारतीय समाज की दरारों को चौड़ा करने का प्रयास है। मिशनरी अपने लक्ष्य में ब्राह्मणों को सबसे बड़ी बाधा के रूप में दो सौ वर्षों से अधिक समय से चीन्हते आये हैं। 

हमारे विश्वविद्यालय उनके तथाकथित शोध को फाश करने वाले शोध नहीं कराते, बल्कि वे उन्हें प्रतिध्वनित करते हैं।

पहले ब्राह्मिनिज्म का विरोध किया जाता था। तब भी वह एक पर्दा भर था अन्यथा निशाने पर तब भी ब्राह्मण थे। इन दिनों तो वाद का वह पर्दा भी जरूरी नहीं रहा। अब तो सीधे ब्राह्मण निशाने पर हैं। 

उस सलाहकार का बयान इसका प्रमाण है।

पितृ तर्पण विधानम्

*#पितृ_तर्पण_विधानम्*

अलग-अलग वेदकी शाखा वालोंके लिए अलग-अलग प्रकारसे तर्पणका विधान शास्त्रोंमें कहा गया है।

कुछ शाखा वालोंके लिए दाहिना हाथ मुख्य है, बाएं हाथसे केवल स्पर्श करके तर्पण करनेका भी विधान है-

*सव्यान्वारब्धदक्षिणेन वा अंजलिना वा तारतम्य।*
                     (#धर्मसिन्धौ) 

ऋग्वेदियोंको एक हाथसे ही तर्पण करना चाहिए, अन्य शाखावालोंको दोनों हाथोंसे तर्पण करना चाहिए तथा
#स्वधानमस्तर्पयामि ऐसा बोलकर तर्पण करना चाहिए-

*स्वधा नमस्तर्पयामीति बह्वृचैर्दक्षिणहस्तेनान्यदंजलिना त्रिस्त्रिस्तर्पयेत्।।*
                      (#धर्मसिन्धौ) 

माध्यन्दिन, कांण्व एवं तैत्तिरीय  शाखा वालोंके लिए दोनों हाथों की अंजलिसे तर्पणका विधान है।

 तथा इनके लिए तर्पण ब्रह्मयज्ञाङ्ग  नहीं है, अर्थात् ब्रह्मयज्ञसे पहले अथवा बादमें भी हो सकता है।

अन्य शाखा वालोंके लिए तर्पण ब्रह्मयज्ञांग है-

*अथतर्पणं- तच्च तैत्तरीयाणां ब्रह्मयज्ञाङ्गं न भवति तेन ब्रह्मयज्ञोत्तरं व्यवहितकालेपि ब्रह्मयज्ञात्प्रागपि भवति एवं काण्वमाध्यन्दिनानामपि।।*              
                    (#धर्मसिन्धौ) 

*#तर्पणविधि*

(देव, ऋषि और पितृ सम्पूर्ण तर्पण विधि)

सर्वप्रथम पूर्व दिशाकी और मुँह करके, दाहिना घुटना जमीन पर लगाकर,सव्य होकर(जनेऊ व अंगोछेको बांया कंधे पर रखें) गायत्री मंत्रसे शिखा बांध कर, तिलक लगाकर, दोनों हाथोंकी अनामिका अँगुलीमें कुशोंका  पवित्री (पैंती) धारण करें । 

फिर हाथमें त्रिकुशा ,जौ, अक्षत और जल लेकर संकल्प पढें—

*ॐ विष्णवे नम: ३*
 
*हरि: ॐ तत्सदद्यैतस्य श्रीब्रह्मणो द्वितीयपरार्धे श्रीश्वेतवाराहकल्पे वैवस्वतमन्वन्तरे अष्टाविंशतितमे कलियुगे कलिप्रथमचरणे जम्बूद्वीपे भरतखण्डे भारतवर्षे आर्यावर्तैकदेशे अमुकसंवत्सरे अमुकमासे अमुकपक्षे अमुकतिथौ अमुकवासरे अमुकगोत्रोत्पन्न: अमुकशर्मा (वर्मा, गुप्तो) ऽहं श्रीपरमेश्वरप्रीत्यर्थं देवर्षिमनुष्यपितृतर्पणं करिष्ये।* 

तीनकुशको ग्रहणकर निम्नमंत्रको तीन बार कहें- 

*ॐ देवताभ्यः पितृभ्यश्च महायोगिभ्य एव च।* 
*नमः स्वाहायै स्वधायै नित्यमेव नमोनमः।।* 

तदनन्तर एक ताँवे अथवा चाँदीके पात्रमें श्वेत चन्दन, जौ, तिल, चावल, सुगन्धित पुष्प और तुलसीदल रखें, फिर उस पात्रमें तर्पणके लिये जल भरदें। 

फिर उसमें रखे हुए त्रिकुशोंको तुलसी सहित सम्पुटाकार दायें हाथमें लेकर, बायें हाथसे उसे ढँकलें और  देवताओंका आवाहन करें ।

#आवाहनमंत्र 

*ॐ विश्वेदेवास ऽआगत श्रृणुता म ऽइम@ हवम्। एदं वर्हिर्निषीदत॥*

‘हे विश्वेदेवगण  ! आप लोग यहाँ पदार्पण करें, हमारे प्रेमपूर्वक किये हुए इस आवाहनको सुनें, और इस कुशके आसन पर विराजें ।

इसप्रकार आवाहन कर कुशका आसन दें, और त्रिकुशा द्वारा दायें हाथकी समस्त अङ्गुलियोंके अग्रभाग अर्थात् देवतीर्थसे ब्रह्मादि देवताओंके लिये पूर्वोक्त पात्रमें से एक-एक अञ्जलि  चावल-मिश्रित जल लेकर दूसरे पात्रमें गिरावें, और निम्नाङ्कित रूपसे उन-उन देवताओंके नाममन्त्र पढ़ते रहें-

*1 #देवतर्पण*-

ॐ ब्रह्मास्तृप्यताम् ।

ॐ विष्णुस्तृप्यताम् ।

ॐ रुद्रस्तृप्यताम् ।

ॐ प्रजापतिस्तृप्यताम् ।

ॐ देवास्तृप्यन्ताम् ।

ॐ छन्दांसि तृप्यन्ताम् ।

ॐ वेदास्तृप्यन्ताम् ।

ॐ ऋषयस्तृप्यन्ताम् ।

ॐ पुराणाचार्यास्तृप्यन्ताम् ।

ॐ गन्धर्वास्तृप्यन्ताम् ।

ॐ इतराचार्यास्तृप्यन्ताम् ।

ॐ संवत्सरसावयवस्तृप्यताम् ।

ॐ देव्यस्तृप्यन्ताम् ।

ॐ अप्सरसस्तृप्यन्ताम् ।

ॐ देवानुगास्तृप्यन्ताम् ।

ॐ नागास्तृप्यन्ताम् ।

ॐ सागरास्तृप्यन्ताम् ।

ॐ पर्वतास्तृप्यन्ताम् ।

ॐ सरितस्तृप्यन्ताम् ।

ॐ मनुष्यास्तृप्यन्ताम् ।

ॐ यक्षास्तृप्यन्ताम् ।

ॐ रक्षांसि तृप्यन्ताम् ।

ॐ पिशाचास्तृप्यन्ताम् ।

ॐ सुपर्णास्तृप्यन्ताम् ।

ॐ भूतानि तृप्यन्ताम् ।

ॐ पशवस्तृप्यन्ताम् ।

ॐ वनस्पतयस्तृप्यन्ताम् ।

ॐ ओषधयस्तृप्यन्ताम् ।

ॐ भूतग्रामश्चतुर्विधस्तृप्यताम् ।

*2 #ऋषितर्पण*-

इसीप्रकार (देवधर्मसे ही)  निम्नाङ्कित मन्त्रवाक्योंसे मरीचि आदि ऋषियोंको भी एक-एक अञ्जलि जल दें—

ॐ मरीचिस्तृप्यताम् ।

ॐ अत्रिस्तृप्यताम् ।

ॐ अङ्गिरास्तृप्यताम् ।

ॐ पुलस्त्यस्तृप्यताम् ।

ॐ पुलहस्तृप्यताम् ।

ॐ क्रतुस्तृप्यताम् ।

ॐ वसिष्ठस्तृप्यताम् ।

ॐ प्रचेतास्तृप्यताम् ।

ॐ भृगुस्तृप्यताम् ।

ॐ नारदस्तृप्यताम् ॥

*3 #मनुष्यतर्पण*-

उत्तर दिशाकी ओर मुँह कर, जनेऊ व गमछेको मालाकी भाँति गलेमें धारण कर, सीधे बैठकर  निम्नाङ्कित मन्त्रोंको दो-दो बार पढते हुए

दिव्य मनुष्योंके लिये प्रत्येकको दो-दो अञ्जलि जौ सहित जल प्राजापत्यतीर्थ (कनिष्ठिकाके मूला-भाग) से अर्पण करें—

ॐ सनकस्तृप्यताम् -2

ॐ सनन्दनस्तृप्यताम् –2

ॐ सनातनस्तृप्यताम् -2

ॐ कपिलस्तृप्यताम् -2

ॐ आसुरिस्तृप्यताम् -2

ॐ वोढुस्तृप्यताम् -2

ॐ पञ्चशिखस्तृप्यताम् -2

*4 #पितृतर्पण*-

कुशोंके मूल ,और अग्रभागको दक्षिणकी ओर करके  

अंगूठे और तर्जनीके बीचमें रखे, स्वयं दक्षिणकी ओर मुँह करे, बायें घुटने को जमीन पर लगाकर अपसव्यभाव (जनेऊको दायें कंधेपर रखकर बाँये हाथके नीचे ले जायें ) पात्रस्थ जलमें काला तिल मिलाकर पितृतीर्थसे (अंगुठा और तर्जनी के मध्यभाग से ) दिव्य पितरोंके लिये निम्नाङ्कित मन्त्र-वाक्योंको पढते हुए तीन-तीन अञ्जलि जल दें—

*ॐ कव्यवाडनलस्तृप्यताम् इदं सतिलं जलं (गङ्गाजलं वा) तस्मै स्वधा नम: – 3*

*ॐ सोमस्तृप्यताम् इदं सतिलं जलं (गङ्गाजलं वा) तस्मै स्वधा नम: – 3*

*ॐ यमस्तृप्यताम् इदं सतिलं जलं (गङ्गाजलं वा) तस्मै स्वधा नम: – 3*

*ॐ अर्यमा तृप्यताम् इदं सतिलं जलं (गङ्गाजलं वा) तस्मै स्वधा नम: – 3*

*ॐ अग्निष्वात्ता: पितरस्तृप्यन्ताम् इदं सतिलं जलं (गङ्गाजलं वा) तेभ्य: स्वधा नम: – 3*

*ॐ सोमपा: पितरस्तृप्यन्ताम् इदं सतिलं जलं (गङ्गाजलं वा) तेभ्य: स्वधा नम: – 3*

*ॐ बर्हिषद: पितरस्तृप्यन्ताम् इदं सतिलं जलं (गङ्गाजलं वा) तेभ्य: स्वधा नम: – 3*

*5 #यमतर्पण*-

इसी प्रकार निम्नलिखित मन्त्रोंको पढते हुए चौदह यमोंके लिये भी पितृतीर्थसे ही तीन-तीन अञ्जलि तिल सहित जल दें—

ॐ यमाय नम: – 3

ॐ धर्मराजाय नम: – 3

ॐ मृत्यवे नम: – 3

ॐ अन्तकाय नम: – 3

ॐ वैवस्वताय नमः – 3

ॐ कालाय नम: – 3

ॐ सर्वभूतक्षयाय नम: – 3

ॐ औदुम्बराय नम: – 3

ॐ दध्नाय नम: – 3

ॐ नीलाय नम: – 3

ॐ परमेष्ठिने नम: – 3

ॐ वृकोदराय नम: – 3

ॐ चित्राय नम: – 3

ॐ चित्रगुप्ताय नम: – 3

*#विशेष*-

*जिनके पिता जीवित हों, वे लोग यहीं तक तर्पण करें, आगे का तर्पण नही करें।*

 *जिनके पिता नहीं हैं वे लोग आगे का भी तर्पण करें, परन्तु यदि माता आदि जीवित हों तो उन उनको छोड़करके अन्योंका तर्पण करें।*

*6 #मनुष्यपितृतर्पण*-
   
इसके पश्चात् निम्नाङ्कित मन्त्रोंसे पितरोंका आवाहन करें-

*ॐ आगच्छन्तु मे पितर इमं ग्रहणन्तु जलाञ्जलिम्।।*

 हे पितरों! पधारिये तथा जलांजलि ग्रहण कीजिए। 

तदनन्तर अपने पितृगणोंका नाम-गोत्र आदि उच्चारण करते हुए प्रत्येकके लिये पूर्वोक्त विधिसे ही तीन-तीन अञ्जलि तिल-सहित जल इस प्रकार दें-

*अस्मत्पिता अमुकशर्मा  वसुरूपस्तृप्यतांम् इदं सतिलं जलं (गङ्गाजलं वा) तस्मै स्वधा नम: – 3*

*अस्मत्पितामह: (दादा) अमुकशर्मा रुद्ररूपस्तृप्यताम् इदं सतिलं जलं (गङ्गाजलं वा) तस्मै स्वधा नम: – 3*

*अस्मत्प्रपितामह: (परदादा) अमुकशर्मा आदित्यरूपस्तृप्यताम् इदं सतिलं जलं (गङ्गाजलं वा) तस्मै स्वधा नम: – 3*

*अस्मन्माता अमुकी देवी वसुरूपा तृप्यताम् इदं सतिलं जलं तस्यै स्वधा नम: – 3*

*अस्मत्पितामही (दादी) अमुकी देवी  रुद्ररूपा तृप्यताम् इदं सतिलं जलं तस्यै स्वधा नम: – 3*

*अस्मत्प्रपितामही परदादी अमुकी देवी आदित्यरूपा तृप्यताम् इदं सतिलं जल तस्यै स्वधा नम: – 3*

इसके बाद वेदमंत्रोंसे जलधारा दी जाती है।

 उसके बाद द्वितीय गोत्र तर्पण करें ,द्वितीय गोत्र तर्पण अपने पिता माता आदि की तरह ही होगा।

 जिसमें नाना, परनाना, वृद्धपरनाना, नानी , परनानी एवं वृद्धपरनानीको तीन-तीन अंजलि तिल मिश्रित जल से दें

इसके बाद नाम गोत्रका उच्चारण करते हुए अन्य संबंधी (जो लोग मृत हो गए हों) उनके लिए भी एक-एक अंजलि दी जाती है।

 इन्हें #एकोद्दिष्टगण कहते हैं जिसमें हैं- पत्नी, पुत्र, पुत्री, पिताके भाई, मामा, अपना भाई ,सौतेला भाई, बुआ, मौसी, बहन, सौतेली बहन, श्वशुर, गुरु, आचार्य पत्नी, शिष्य, मित्र, आप्तपुरुष आदि प्रिय जनका  तर्पण करें।

इसके बाद सव्य होकर पूर्वाभिमुख हो नीचे लिखे श्लोकों को पढते हुए जल गिरावे—

*देवासुरास्तथा यक्षा नागा गन्धर्वराक्षसा:।* 
*पिशाचा गुह्यका: सिद्धा: कूष्माण्डास्तरव: खगा:॥*

*जलेचरा भूमिचराः वाय्वाधाराश्च जन्तव:।*
*प्रीतिमेते प्रयान्त्वाशु मद्दत्तेनाम्बुनाखिला:॥*

*#अर्थ*- : ‘देवता, असुर , यक्ष, नाग, गन्धर्व, राक्षस, पिशाच, गुह्मक, सिद्ध, कूष्माण्ड, वृक्षवर्ग, पक्षी, जलचर जीव और वायु के आधार पर रहनेवाले जन्तु-ये सभी मेरे दिये हुए जल से भीघ्र तृप्त हों ।

पितृधर्मसे जलधारा गिराए-

*नरकेषु समस्तेपु यातनासु च ये स्थिता:।* *तेषामाप्ययनायैतद्दीयते सलिलं मया॥*

*येऽबान्धवा बान्धवा वा येऽन्यजन्मनि बान्धवा:।*
*ते सर्वे तृप्तिमायान्तु ये चास्मत्तोयकाङ्क्षिण:॥*

*ॐआब्रह्मस्तम्बपर्यन्तं देवषिंपितृमानवा:।*
*तृप्यन्तु पितर: सर्वे मातृमातामहादय:॥*

*अतीतकुलकोटीनां सप्तद्वीपनिवासिनाम्।*
*आ ब्रह्मभुवनाल्लोकादिदमस्तु तिलोदकम्॥*

*येऽबान्धवा बान्धवा वा येऽन्यजन्मनि बान्धवा:।*
*ते सर्वे तृप्तिमायान्तु मया दत्तेन वारिणा॥*

*#अर्थ*- :  जो समस्त नरकों तथा वहाँ की यातनाओं में पङेपडे दुरूख भोग रहे हैं, उनको पुष्ट तथा शान्त करने की इच्छा से मैं यह जल देता हूँ। 

जो मेरे बान्धव न रहे हों, जो इस जन्म में बान्धव रहे हों, अथवा किसी दूसरे जन्म में मेरे बान्धव रहे हों, वे सब तथा इनके अतिरिक्त भी जो मुम्कसे जल पाने की इच्छा रखते हों, वे भी मेरे दिये हुए जल से तृप्त हों ।

ब्रह्माजी से लेकर कीटों तक जितने जीव हैं, वे तथा देवता, ऋषि, पितर, मनुष्य और माता, नाना आदि पितृगण-ये सभी तृप्त हों।

 मेरे कुलकी बीती हुई करोडों पीढियोंमें उत्पन्न हुए जो-जो पितर ब्रह्मलोकपर्यन्त सात द्वीपोंके भीतर कहीं भी निवास करते हों, उनकी तृप्ति के लिये मेरा दिया हुआ यह तिलमिश्रित जल उन्हें प्राप्त हो। 

जो मेरे बान्धव न रहे हों, जो इस जन्ममें या किसी दूसरे जन्मोंमें मेरे बान्धव रहे हों, वे सभी मेरे दिये हुए जलसे तृप्त हो जायँ ।

*#वस्त्रनिष्पीडन*-
 तत्पश्चात् वस्त्र को चार आवृत्ति लपेटकर जल में डुबावे और बाहरले आकर निम्नाङ्कित मन्त्र : 

*ये के चास्मत्कुले जाता अपुत्रा गोत्रिणो मृता।*
*ते गृह्णन्तु मया दत्तं वस्त्रनिष्पीडनोदकम्।।*

 को पढते हुए अपसव्य होकर अपने बाएँ भागमें भूमिपर उस वस्त्रको निचोड़े । 

 यदि घरमें किसी मृत पुरुषका वार्षिक श्राद्ध आदि कर्म हो तो वस्त्र-निष्पीडन नहीं करना चाहिये ।

*7 #भीष्मतर्पण*-

इसके बाद दक्षिणाभिमुख हो पितृतर्पणके समान ही, अनेऊ अपसव्य करके, हाथमें कुश धारण किये हुए ही बालब्रह्मचारी भक्तप्रवर भीष्मजीके लिये पितृतीर्थसे तिलमिश्रित जलके द्वारा तर्पण करे । 

उनके लिये तर्पण का मन्त्र निम्नाङ्कित श्लोक है–

*वैयाघ्रपदगोत्राय साङ्कृतिप्रवराय च।* 
*गङ्गापुत्राय भीष्माय प्रदास्येऽहं तिलोदकम्।* *अपुत्राय ददाम्येतत्सलिलं भीष्मवर्मणे॥*

*#अर्घ्यदान*-

फिर शुद्ध जलसे आचमन करके प्राणायाम करे । 

तदनन्तर यज्ञोपवीत सव्यकर एक पात्रमें शुद्ध जल भरकर उसमे श्वेत चन्दन, अक्षत, पुष्प तथा तुलसीदल छोड दे । 

फिर दूसरे पात्रमें चन्दन्से षड्दल-कमल बनाकर उसमें पूर्वादि दिशाके क्रमसे ब्रह्मादि देवताओंका आवाहन-पूजन करे 

तथा पहले पात् के जलसे उन पूजित देवताओंके लिये अर्ध्य अर्पण करे ।

अर्ध्यदान के मन्त्र निम्नाङ्कित हैं—

*ॐ ब्रह्म जज्ञानं प्रथमं पुरस्ताद्वि सीमत: सुरुचो व्वेन ऽआव:। स बुध्न्या ऽउपमा ऽअस्य व्विष्ठा: सतश्च योनिमसतश्व व्विव:॥*
 ॐ ब्रह्मणे नम:। 

*ॐ इदं विष्णुर्विचक्रमे त्रेधा निदधे पदम् । समूढमस्यपा, सुरे स्वाहा ॥*
ॐ विष्णवे नम:।

*ॐ नमस्ते रुद्र मन्यव ऽउतो त ऽइषवे नम: । वाहुब्यामुत ते नम: ॥*
 ॐ रुद्राय नम: । 

*ॐ तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि । धियो यो न: प्रचोदयात् ॥*
 ॐ सवित्रे नम: ।

*ॐ मित्रस्य चर्षणीधृतोऽवो देवस्य सानसि । द्युम्नं चित्रश्रवस्तमम् ॥*
ॐ मित्राय नम:।

*ॐ इमं मे व्वरुण श्रुधी हवमद्या च मृडय ।   त्वामवस्युराचके ॥*
ॐ वरुणाय नम: ।

*#सूर्यार्घ*- 

*एहि सूर्य सहस्त्राशो तेजो राशे जगत्पते।* 
*अनुकम्पय मां भक्त्या गृहाणार्घ्यं दिवाकर।*

हाथोंको उपर कर उपस्थान मंत्र पढ़ें –

*ॐचित्रं देवानामुदगादनीकं चक्षुर्मित्रस्य वरुणस्याग्नेः। आप्राद्यावापृथ्वी ऽअन्तरिक्ष@ सूर्यऽआत्माजगतस्तस्थुषश्च।*
खड़े होकर वहीं घूमते हुए 7 बार सूर्यकी प्रदक्षिणा करें।

फिर परिक्रमा करते हुए दशों दिशाओंको और 10 दिग्पालों को नमस्कार करें-

ॐ प्राच्यै नमः, इन्द्राय नमः। 
ॐ आग्नेयायै नमः,आग्नेय नमः। 
ॐ दक्षिणायै नमः, यमाय नमः। 
ॐ नैर्ऋत्यै नमः, निर्ऋतये नमः। 
ॐ पश्चिमायै नमः, वरूणाय नमः। 
ॐ वायव्यै नमः, वायवे नमः। 
ॐ उदीच्यै नमः, कुवेराय नमः।
ॐ ऐशान्यै नमः, ईशानाय नमः। 
ॐ ऊर्ध्वायै नमः,ब्रह्मणे नमः। 
ॐ अवाच्यै नमः, अनन्ताय नमः।

इस तरह दिशाओं और देवताओंको नमस्कार कर , बैठकर नीचे लिखे मन्त्रोंसे पुनः देवतीर्थसे तर्पण करें।

ॐ ब्रह्मणै नमः। 
ॐ अग्नयै नमः। 
ॐ पृथिव्यै नमः। 
ॐ औषधिभ्यो नमः। 
ॐ वाचे नमः। 
ॐ वाचस्पतये नमः। 
ॐ महद्भ्यो नमः। 
ॐ विष्णवे नमः। 
ॐ अद्भ्यो नमः। 
ॐ अपांपतये नमः। 
ॐ वरुणाय नमः। 

फिर तर्पणके जलको मुखपर लगायें और तीन बार
 ॐ अच्युताय नमः 
मंत्रका जप करें।

समर्पण- उपरोक्त समस्त तर्पण कर्म भगवानको समर्पित करें।

*ॐ तत्सद् कृष्णार्पण मस्तु।*
*श्रीविष्णवे नमः-12*

*#नोट*- यदि नदी आदिमें तर्पण किया जाय, तो दोनों हाथोंको मिलाकर जलसे भरकर गोसींग जितना ऊँचा उठाकर जलमें ही अंजलि डाल दें-

*द्वौ हस्तौ युग्मतः कृत्वा पूरयेदुदकाञ्जलिम्।* *गोश्रृङ्गमात्रमृद्धृत्य जलमध्ये जलं क्षिपेत्।।*

नमः पार्वतीपतये हर हर महादेव। 
राजेश राजौरिया वैदिक वृन्दावन।

न तस्य प्रतिमा अस्ति

मूर्त-अमूर्त 
न तस्य प्रतिमा अस्ति, यस्य नाम महद्यशः। (वाज. यजुर्वेद, ३२/३)
इसके २ अर्थ हैं-
(१) जिसका नाम महद्यश है, उसकी बराबरी कोई नहीं कर सकता। यह भाव महद् शब्द में भी है- सबसे महान् का अर्थ ही है, उससे सभी कम हैं, कोई बराबर नहीं है।
(२) महान् व्यक्ति या वस्तु की प्रतिमा होती है, जैसा पुरुष सूक्त आदि में है- सहस्र शीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात्। इसी अर्थ में अर्जुन ने गीता में कहा है-तेनैव रूपेण चतुर्भुजेन सहस्रबाहो भव विश्वमूर्ते। (गीता, ११/४६)।
महान् के यश की प्रतिमा नहीं होती। जैसे व्यक्ति रूप में मेरा रूप रंग, आकार आदि है। पर मेरे यश, विद्या, प्रभाव आदि का रूप या आकार नहीं है। इस अर्थ में लक्ष्मी के भी दो रूप वेद में हैं-जो सम्पत्ति दीखती है, वह लक्ष्मी है, जो नहीं दीखता वह श्री है-श्रीश्च ते लक्ष्मीश्च पत्न्यौ (वाज. यजुर्वेद, ३१/२२)। श्री अर्थात् तेज, महिमा को इसी अर्थ में अलक्ष्मी भी कहा है-या श्रीः स्वयं सुकृतिनां भवनेष्वलक्ष्मीः (चण्डी पाठ, ४/५)।
अतः सभी पदार्थों के मूर्त-अमूर्त भेद किये गये हैं। वैशेषिक दर्शन में काल भी एक पदार्थ है। सूर्य सिद्धान्त के अनुसार उसके मूर्त-अमूर्त रूप हैं। अपनी श्वास क्रिया का अनुभव होता है। उसका ४ सेकण्ड का चक्र असु है। उससे छोटे कालमान अमूर्त है, बड़े कालमान मूर्त हैं।
सांख्य दर्शन के अनुसार वस्तुओं का कई कारणों से अनुभव नहीं होता-बहुत बड़ा या बहुत सूक्ष्म, (भागवत पुराण, ३/११/१-४ भी), अपने परिवेश से भिन्न नहीं हो। अनुभव से परे को असत् कहते हैं, उसकी सत्ता है, पर पता नहीं चलता। यदि असत् की सत्ता नहीं है तो उससे सत् या दृश्य जगत् का निर्माण नहीं हो सकता। असतो सदजायत (तैत्तिरीय उपनिषद्, २/७/१)। गीता में भी कहा है कि यदि असत् का अस्तित्व नहीं होता, उससे कुछ उत्पन्न नहीं होता -नासतो विद्यते भावो, नाभावो विद्यते सतः (गीता, २/१६)।
किसकी प्रतिमा है-
ऋग्भ्यो जातां सर्वशो मूर्तिमाहुः, 
सर्वा गतिः याजुषी हैव शश्वत्।
सर्वं तेजं सामरूप्यं ह शश्वत्,
सर्वं हीदं ब्रह्मणा हैव सृष्टम्॥
(तैत्तिरीय ब्राह्मण, ३/१२/९/३)
ऋग्वेद स्पष्टतः मूर्ति रूप है।
यजुर्वेद गति रूप है, जब चक्रीय गति से उपयोगी उत्पादन हो (गीता, ३/१०, १६)। अतः यज्ञ की प्रक्रिया यजुर्वेद में है। इसमें प्रायः मूर्ति होती है, वस्तु की गति देख सकते है। यज्ञ की हवि (निर्माण के लिए प्रयुक्त सामग्री), निर्मित पदार्थ, यज्ञ वेदी तथा उपकरण आदि दृश्य हैं। उनकी मूर्ति है, कई प्रकार की वेदी निर्माण के आकार वैदिक साहित्य में वर्णित हैं। किन्तु कुछ गति नहीं दीखती है, जैसे शरीर के भीतर श्वास या रक्त सञ्चार, पाचन क्रिया। इनको भी उपकरणों से देखा जा सकता है। मानसिक विचार अमूर्त हैं, पर विचारों का क्रम लिखा जा सकता है। ऋग्वेद के अस्य वामीय सूक्त के अनुसार वाक् के तीन पद गुहा में अदृश्य हैं, बाहरी व्यक्त वाक् वैखरी का अनुभव दूसरे को भी होता है। उसे मूर्त अक्षरों में लिखा भी जाता है।
सामवेद महिमा है। उसकी मूर्ति नहीं होती। किन्तु उसकी माप के लिए चित्र बना कर गणना होती है, जैसे गुरुत्वाकर्षण बल, विद्युत् चुम्बकीय क्षेत्र आदि। महिमा या साम को प्रायः ३ भाग में देखते है, विष्णु सहस्रनाम में एक नाम है-त्रिसामा। सूर्य के प्रभाव क्षेत्र या साम को भी तीन क्षेत्रों में बांटा है-
अग्नि वायु रविभ्यस्तु त्रयं ब्रह्म सनातन (मनु स्मृति, १/२३)
पृथ्वी कक्षा तक ताप या अग्नि क्षेत्र, यूरेनस कक्षा तक सौर वायु, सौर मण्डल की सीमा ३० धाम तक प्रकाश क्षेत्र (ऋक्, १०/१८९/३)। इनको विष्णु के तीन पद भी कहा है। यह मूर्त नहीं है, पर इनकी सीमा की माप वेद में है तथा उनके चित्र बन सकते हैं।
गीता के अध्याय १५ में सभी पदार्थों को पुरुष कहा है। क्षर सभी पदार्थ हैं, उनकी मूर्ति है। उसकी क्रिया या परिचय अदृश्य है। क्रिया दीखती है। यह मूर्त-अमूर्त दोनों है।
क्षरः सर्वाणि भूतानि, कूटस्थोऽक्षर उच्यते।
अव्यय पुरुष की मूर्ति नहीं है, उसकी प्रक्रिया समझने के लिए उसे रेखांकित करते है, या वर्णन करते है।
परात्पर पुरुष कल्पना से परे है।