यह पैटर्न कि नाम जाति-विरोध का दो और खलनायक ब्राह्मणों को बनाओ कमोबेश सभी अमेरिकी विश्वविद्यालयों ने अपना लिया है। केलीफोर्निया विश्वविद्यालय ने 2021 से जाति पर चर्चा को अपनी विभेदाचार विरोध की प्रोटेस्टेंट कैटेगरी में डाल दिया है। श्वेता मजुमदार अदुर और अंजना नारायणन अमेरिका के भारतीय डायस्पोरा में ब्राह्मण सुपीरियारिटी को देखती हैं। ब्रांडीज विश्वविद्यालय ने 2019 से। अरीजोना राज्य विश्वविद्यालय ब्राह्मण विशेषाधिकारों पर अध्ययन कराता है। इंदुलता प्रसाद मैक्स वेबर की ब्राह्मणों पर की गई टीप को लेकर inherited privileges पर काम इसी विश्वविद्यालय से करती हैं। मेरीलैंड विश्वविद्यालय ने ब्राह्मण सुपीरियरिटी पर काम कराया है। सोनल्दे देसाई ने इसी विश्वविद्यालय से शोध की थी। मेसाचुसेट्स विश्वविद्यालय ब्राह्मण प्रभावों पर। भरत राठौर ने यहाँ से अमेरिकी कैंपसों में ब्राह्मण विरोधी एक्टीविज्म पर अध्ययन किया है।
विश्वविद्यालय विदेशी हैं पर यहाँ बुद्धिजीवी दिखने के शौक में ब्राह्मण विरोधी शोध भारतीयों के कंधे पर रखकर हो रही है।
दुनिया में कहीं भी किसी अन्य समूह को ऐसे निशाने पर नहीं लिया जा रहा। केवल यही नहीं है कि भारत में हाल के वर्षों में ब्राह्मणों को जातीय घृणा का शिकार बनाया जा रहा है बल्कि यह है कि ठीक उसी समय अमेरिकी एकेडेमिक्स और स्कॉलरशिप भी यह काम बौद्धिक तरह से कर रही है।
कभी इस कदमताल को ध्यान से दीजिए। यह संयोग भर नहीं है। उससे कुछ अधिक है।
उसकी तुलना में भारत के विश्वविद्यालयों को देखिए। क्या उन्होंने अमेरिका की व्हाइट सुप्रीमेसी पर, लगातार छोड़िये, कभी एक बार भी शोध कराये? कभी उन्होंने अमेरिका के तथाकथित फर्स्ट नेशन पर शोध करवाये?
तब आप काहे के विश्वविद्यालय कहलाते हो जब आपके पास कोई विश्व-दृष्टि ही नहीं है।
और यह मानकर नहीं चलिये कि यह सिर्फ ब्राह्मणों पर हमला है, हमें क्या करना। भूल गए कि अभी दो बरस पहले Dismantling Hindutva के नाम से 49 विश्वविद्यालयों ने एक साथ आयोजन किया था। इसमें आगे बढ़कर भूमिका निभाने वाला प्रिंसटन विश्वविद्यालय प्रेस्बिटेरियन संप्रदाय द्वारा स्थापित किया गया था। येल विश्वविद्यालय प्यूरिटनों के द्वारा, कोलंबिया विश्वविद्यालय एंग्लिकन के द्वारा, ब्राउन विश्वविद्यालय बैप्टिस्ट के द्वारा, डर्टमाउथ काल्विनिस्ट के द्वारा, जार्जटाउन व बोस्टन जेसुइट्स के द्वारा स्थापित हुए। ब्राह्मणों की जड़ों को दिखाने वाले ये विश्वविद्यालय कभी इस पर भी शोध कराते कि खुद इनकी धार्मिक/ सांप्रदायिक जड़ें इनके शोध और शिक्षण को प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष रूप से कितना प्रभावित करती रही हैं।
पिछले एक दशक से अमेरिकी बौखलाहट बहुत बढ़ गयी है। और वह सिर्फ अध्ययन का प्रायोजन नहीं है, भारतीय समाज की दरारों को चौड़ा करने का प्रयास है। मिशनरी अपने लक्ष्य में ब्राह्मणों को सबसे बड़ी बाधा के रूप में दो सौ वर्षों से अधिक समय से चीन्हते आये हैं।
हमारे विश्वविद्यालय उनके तथाकथित शोध को फाश करने वाले शोध नहीं कराते, बल्कि वे उन्हें प्रतिध्वनित करते हैं।
पहले ब्राह्मिनिज्म का विरोध किया जाता था। तब भी वह एक पर्दा भर था अन्यथा निशाने पर तब भी ब्राह्मण थे। इन दिनों तो वाद का वह पर्दा भी जरूरी नहीं रहा। अब तो सीधे ब्राह्मण निशाने पर हैं।
उस सलाहकार का बयान इसका प्रमाण है।
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