Saturday, 27 June 2026

आत्महत्या तुम्हारा चुनाव या प्रेत प्रभाव

#आत्महत्या_तुम्हारा_चुनाव_या_प्रेत_प्रभाव

[एक गूढ़ केस स्टडी,एक व्यक्तिगत संवाद,वैज्ञानिक,दार्शनिक और आध्यात्मिक दृष्टि से परिपूर्ण,एक विस्तृत विमर्श]

असूर्या नाम ते लोका अन्धेन तमसावृता।
तास्ते प्रेत्यानिभगच्छन्ति ये के चात्महनो जना:।।

अर्थात्: आत्मघाती मनुष्य मृत्यु के पश्चात,अज्ञान और अंधकार से परिपूर्ण,सूर्य के प्रकाश से हीन,असूर्य नामक लोक को गमन करते हैं।ये ही "प्रेत योनि" कहलाई जाती है,
जो "आत्महत्या"करता है,वो "प्रेत योनि" में फंसता है,जहां न देह है,न शांति।वहां मात्र अंतहीन दंड और पश्चाताप है,उसके सिवाए,कुछ भी नहीं....कुछ भी नहीं.!

नाम: अविरल राजपूत
उम्र: 16 वर्ष
स्थान: कानपुर,उत्तर प्रदेश

अविरल राजपूत एक मेधावी छात्र था,लेकिन लॉकडाउन के दौरान,उसने ऑनलाइन मल्टीप्लेयर गेम्स (जैसे PUBG) खेलना शुरू किया।धीरे-धीरे,ये शौक,एक लत में बदल गया।गेमिंग के दौरान,उसे नशे की ओर भी आकर्षण हुआ,जिससे वो,नशीले पदार्थों का सेवन करने लगा।गेम में इन-ऐप खरीदारी और नशे की लत को,पूरा करने के लिए,अविरल ने माता-पिता के बैंक खातों से,पैसे चुराने शुरू किए।कुछ ही महीनों में उसने,₹1.5 लाख खर्च कर दिए,जब माता-पिता को इसकी जानकारी हुई,तो उन्होंने उसका मोबाइल फोन,छीन लिया और उसे गेम खेलने से रोक दिया।गेमिंग और नशे के कॉकटेल ने,अविरल के भीतर,कई बदलाव किए,लॉकडाउन के समय PUBG जैसे ऑनलाइन गेम्स में शामिल होने से,अविरल के मस्तिष्क ने,डोपामिन का अत्यधिक स्राव शुरू कर दिया,जिससे उसे कृत्रिम आनंद की लत लग गई,धीरे–धीरे,वास्तविक जीवन से उसका जुड़ाव,कम होने लगा और जब ये “इनाम प्रणाली”(Reward Circuit) रुकती है,जैसे मोबाइल छीन लिया जाए,जैसा अविरल के केस में हुआ,तो इससे उसके "डोपामिन" स्तर मे,भारी गिरावट हुई,इसके पश्चात,"सेरोटोनिन" की कमी ने,उसे अवसाद,चुप्पी और आत्मग्लानि की ओर ले गई,नशे के प्रभाव और माता–पिता से छुपकर व्यवहार करने की चिंता ने,उसके शरीर में,"कॉर्टिसोल" को बढ़ा दिया,जिससे उसके भीतर तनाव,चिड़चिड़ापन और आक्रोश पैदा हुआ।नशीले पदार्थों के सेवन और लगातार स्क्रीन एक्सपोजर से,उसका आभामंडल(AURA),आज्ञा चक्र एवं मणिपुर चक्र,तीनों भारी रूप से,प्रभावित हुए।उसका आभामंडल जो पहले एक स्थिर नीला और पीला था(नीला:आत्मचिंतनशील,पीला:कुछ नया सीखने की प्रबल इच्छा)जो कि दिखाता है कि,अविरल आरंभ में,एक मेधावी,सकारात्मक और आत्मसंतुलित बच्चा था,फिर उसका आभामंडल धीरे–धीरे धुंधला,
थरथराता और विकृत हो गया।

आभामंडल की यह दुर्बलता,विशेष रूप से तब गंभीर होती है,जब कोई किशोर,नशा+गेमिंग+अकेलापन जैसी
"त्रयी" में,फंसता है।

ऐसी स्थिति में,अविरल प्रेतों के लिए,एक "उपयुक्त टारगेट" बन चुका था,विशेष रूप से,वो सूक्ष्म आत्माएं,वो प्रेत,जो स्वयं भी नशा,लत या अपराध के चलते,मृत्यु को प्राप्त हुई हों।ऐसी नेगेटिव एंटिटी,अक्सर वही लत,वही विचार और वही विनाश दूसरों में,पुनः दोहराने का प्रयास करती हैं।अविरल के आभामंडल की जर्जरता ने,उन्हें उसके भीतर प्रवेश की अनुमति दी।अविरल से उसके माता–पिता द्वारा,उसका फोन छीने जाने को तीन दिन बीत चुके थे।तीन दिन तक,मोबाइल से दूर रहने के कारण,उसका जो डोपामिन क्रैश हुआ,उसने अविरल को गहरे Withdrawal में धकेल दिया,जहां उसका शरीर और मस्तिष्क दोनों,“सिस्टम शटडाउन” की स्थिति में आ गए।इसी मेंटल–ब्रेकडाउन के समय,प्रेत ने “मरने” का विकल्प, उसके समक्ष ऐसा रखा,जैसे ये ही उसकी मुक्ति हो।उस समय उसका विवेक,उसका आत्म–संयम और उसकी आत्मा,तीनों पीछे हट चुके थे।

अविरल ने अपनी मां की साड़ी से फंदा बनाकर,अपने कमरे के पंखे से लटक कर,आत्महत्या कर ली...

पुलिस को उसके कमरे से कोई सुसाइड नोट नहीं मिला,लेकिन उसके मोबाइल में गेमिंग ऐप्स और नशे से संबंधित सामग्री पाई गई।जब एक किशोर,वर्चुअल दुनिया के आनंद को ही,जीवन मान लेता है,तो उसके आभामंडल का क्षय,वास्तविक संसार से उसका रिश्ता तोड़ देता है,और तब नशा,प्रेत और मृत्यु,उसके लिए सबसे "आसान विकल्प" बन जाते हैं।

वर्ष 2021 में,भारत में,नशे और शराब के कारण आत्महत्या: 10,560 मामले हुए,जो वर्ष 2020 की तुलना में,
15% अधिक थे।

2021 में छात्र आत्महत्या दर: 13,089 मामले,जिनमें से अधिकांश,15-24 आयु वर्ग के थे।ऑनलाइन गेमिंग के कारण,आत्महत्या के मामले: विभिन्न रिपोर्टों के अनुसार,कई किशोरों ने गेमिंग लत के कारण,
आत्महत्या की है।

नाम: ओम पाण्डेय 
उम्र: 15 वर्ष
स्थान: कोटा,राजस्थान

ओम,तीन वर्षों से,मेडिकल की तैयारी कर रहा था।परिवार से दूर,भीड़ में खोया हुआ।कोचिंग संस्थानों की,चमकदार होर्डिंग्स के नीचे,उसका चेहरा था,पर मन अंधकार में था।न कोई उसे समझने वाला था,न सुनने वाला।वहां पढ़ाने वाले तो कई थे,पर बाल–मन को पढ़ने वाला,सुनने वाला और समझने वाला कोई भी नहीं।दिन भर के शेड्यूल,मॉक टेस्ट,दूसरे बच्चों से तुलना,रैंक, और फिर रात का अकेलापन सब एक खतरनाक कॉकटेल बन चुका था।मेडिकल की तैयारी के नाम पर,15 वर्षीय ओम,(जो एडमिशन के समय,मात्र 12 साल का था)पर जो मानसिक भार डाला गया,उसने उसके शरीर में कोर्टिसोल (Cortisol) को अत्यधिक बढ़ा दिया,यह तनाव का मुख्य हार्मोन है।इसी के साथ,डोपामिन और सेरोटोनिन,जो आनंद,प्रेरणा और संतुलन के लिए,ज़िम्मेदार होते हैं,उनका स्तर तेजी से गिरने लगा।बचपन से किशोरावस्था में,प्रवेश कर रहे शरीर में,ये असंतुलन और भी तीव्र होता है,क्योंकि इस उम्र में,"टेस्टोस्टेरोन" और "ग्रोथ हार्मोंस" भी सक्रिय रहते हैं,और मानसिक अस्थिरता से,ये हार्मोंस भी डगमगाने लगते हैं।

ओम का आभामंडल,जो पहले "हल्का नीला" और "नारंगी" था (ज्ञान और आशा का संकेत),धीरे-धीरे "धूसर"(grey),"फीका" और नीचे की ओर सिकुड़ता चला गया।"मूलाधार","मणिपुर" और "आज्ञा चक्र" उसकी इस स्थिति में,सबसे अधिक प्रभावित हुए,जिससे उसका आत्मबल,स्थिरता और विवेक तीनों छिन्न–भिन्न हो गए।आभामंडल में दरारें बन जाने के बाद,विशेषकर,जब कोई किशोर ये सोचने लगे कि,“मरने से ही मैं अपने माता–पिता को,दुःख से बचा सकता हूं” तो वो स्थिति,प्रेत–प्रेरणा के लिए सबसे उपयुक्त होती है।ये वो भटकी हुई आत्माएं होती हैं,जो पहले कभी,कड़ी अपेक्षाओं,परीक्षा–दबाव या आत्मग्लानि में मरी होती हैं,और अब दूसरों को भी,उसी मार्ग पर प्रेरित करती हैं।ओम जैसे,"संवेदनशील बच्चे",जिनका आभामंडल,जागरूकता के बिना अकेलेपन में टूटता है,वो इन प्रेतों की इस छाया से बच नहीं पाते।कोटा,दिल्ली,प्रयागराज जैसी जगहों पर तो,बिल्कुल भी नहीं।जब उसने आत्महत्या का निर्णय लिया,तब उसका विवेक नहीं,बल्कि उसकी प्रेरित चेतना सक्रिय थी,जिसे प्रेतों ने एक ही विचार में बांध दिया था,“मरना ही समाधान है।”
ये साहस नहीं था,ये भय और मोह का विकृत रूप था,जो आभामंडल के पूर्ण पतन से जन्मा था।ओम लड़ नहीं पाया, क्योंकि उसकी आध्यात्मिक,पारिवारिक और भावनात्मक सुरक्षा–परतें पहले ही बहुत कमजोर थीं।उसके आसपास कोई ऐसा नहीं था,जो उसे सिर्फ़ सुने और वो भी,बिना जज किए।प्रेतों को,किसी मासूम के आभामंडल में प्रवेश के लिए और कुछ नहीं चाहिए,सिर्फ़ एक अकेला,टूटा हुआ हृदय पर्याप्त है।किशोर–किशोरियों को,जब हम सिर्फ़ रैंक,नंबरों और पैकेज से तोलते हैं,तो वे सूक्ष्म स्तर पर आत्महीन हो जाते हैं और यही शून्यता,प्रेतों के लिए सबसे आसान प्रवेशद्वार बन जाती है।ओम भी प्रेत-प्रेरणा का शिकार हो गया।उसे बस एक ही खयाल आ रहा था,"मुझे मरना है,मुझे मरना है,मर जाऊंगा तो मम्मी पापा को निराश नहीं करूंगा और,उनको ये सुनने को नहीं मिलेगा कि उनका ओम,नालायक निकला,जब रहूंगा ही नहीं,
तो किसको नालायक बोलेंगे सब"

उसने कुछ और नहीं सोचा,मां की दी हुई,चादर से ही,फांसी का फंदा बनाया और अपने हॉस्टल के कमरे में आत्महत्या कर ली...

भारत में छात्रों की आत्महत्या के वार्षिक आंकड़े
(2015– 2022)–:

वर्ष: आत्महत्या के मामले

2016: 9,478 
2017: 9,905 
2018: 10,159 
2019: 10,335 
2020:12,526
2021: 13,089
2022:13,044

नाम: अंशिका सक्सेना
उम्र: 23 वर्ष
स्थान: इंदौर,मध्य प्रदेश

तीन वर्षों का प्रेम,एक संबंध,जो जीवन का आधार लगने लगा था अंशिका को,जब उस संबंध में,सर्वेश ने उसे धोखा दिया,तो उसका मानसिक संतुलन डगमगाने लगा।प्रेम–विछोह के पश्चात,अंशिका के शरीर में सेरोटोनिन और डोपामिन का स्तर तेजी से गिरा,जिससे उसे जीवन में कोई आनंद या उद्देश्य नहीं दिखा।उसके भीतर “मैं अस्वीकार्य हूं”, जैसी आत्म-नकारात्मक धारणाएं जन्म लेने लगीं,जिससे "कोर्टिसोल" (Cortisol) का स्तर लगातार बढ़ा,और वो "क्रॉनिक–तनाव" में डूबती चली गई।गर्मी के मौसम में,जहां हार्मोनल उतार-चढ़ाव अधिक तीव्र होते हैं,वहां अंशिका के "एंडोक्राइन–सिस्टम" पर,तनाव का असर और गहरा हो गया।इस काल में,उसका आभामंडल(AURA),जो पहले हल्का गुलाबी और नीला था(प्रेम व कोमलता का प्रतीक),धीरे-धीरे धूसर(Grey),फीका और विकृत होता गया।जब आभामंडल में दरारें उत्पन्न होती हैं और चक्र (विशेषकर स्वाधिष्ठान और अनाहत)अवरुद्ध हो जाते हैं,तब प्रेत-जैसी सूक्ष्म नकारात्मक शक्तियां व्यक्ति की चेतना में प्रवेश कर सकती हैं,
अंशिका के साथ भी,वही हुआ।

30 दिनों तक डिप्रेशन में रहने के दौरान,अंशिका ने कई बार आत्महत्या का प्रयास किया,जो संकेत है कि,"एड्रीनलीन" और "नोराएड्रीनलीन" जैसे हार्मोन,जो "फाइट या फ्लाइट" मोड में सक्रिय होते हैं,उसके शरीर में अनियंत्रित रूप से रिलीज़ हो रहे थे।हर असफल प्रयास के बाद,उसका आत्म-बल एवं आभामंडल और भी क्षीण होता गया।आभामंडल की ये दुर्बलता,प्रेतों के लिए,"उपयुक्त द्वार" बन जाती है,खासकर उन आत्माओं के लिए,जो स्वयं भी प्रेम में छले गए और असमाप्त मृत्यु का अनुभव लेकर,"भटक" रही होती हैं।30 दिन के संघर्ष के पश्चात,जब अंशिका ने अपनी ही बिल्डिंग की सातवीं मंज़िल से छलांग लगाई,तो उसका वो निर्णय तर्क से नहीं,आत्मिक वशीकरण और नकारात्मक प्रेरणा से संचालित था।आत्मा जब आत्म-स्वीकृति छोड़ देती है और आभामंडल पूर्णतः क्षीण हो जाता है,तब वो "अपने होने" को ही मिटा देने को तैयार हो जाती है।ऐसे क्षणों में,प्रेत उसे हिम्मत नहीं देता,बल्कि उसके भीतर भय और पीड़ा को इतना बढ़ा देता है कि,मृत्यु कम पीड़ादायक लगने लगती है।

अंशिका उससे लड़ नहीं पाई,क्योंकि उसे यह पता ही नहीं था कि,वो लड़ रही है,और लड़ रही है,तो किस से लड़ रही है,उसके पास न ज्ञान था,न साधना,न आत्मरक्षा की शक्ति। आभामंडल(AURA) की रक्षा हेतु,जिस आध्यात्मिक जागरूकता की आवश्यकता होती है,वो आधुनिक समाज में न प्रेमियों को सिखाई जाती है,न पीड़ितों को दी जाती है। इसीलिए वो एक सूक्ष्म आत्मिक युद्ध में हार गई।प्रेम में छले गए हृदय,जब आत्म-स्वीकृति खो बैठते हैं,तब प्रेतों के लिए सबसे सरल शिकार बन जाते हैं।और तब मृत्यु उन्हें मुक्ति नहीं,भटकाव की अगली यात्रा पर ले जाती है।

2021 में,30 वर्ष से कम आयु की महिलाओं द्वारा आत्महत्या:45,026

18 से 29 वर्ष की आयु वर्ग: इस आयु वर्ग में आत्महत्या की दर 13.3 प्रति लाख जनसंख्या थी,जो महिलाओं के लिए, उच्चतम दरों में से,एक है।  

नाम: डॉक्टर विकास तलवार
उम्र: 36 वर्ष
स्थान: दिल्ली (मूल निवासी),केस दूसरे राज्य में

2 साल पहले विकास की नेहा से,"अरेंज मैरिज" हुई थी,विवाह के 3 महीने बाद ही,पत्नी ने झूठा दहेज प्रताड़ना का केस लगाया,1 साल से तलाक का केस भी चल रहा था,कोर्ट की तारीखें,पैसों का बोझ,नौकरी का जाना,सबने मिलकर,उसे घुटनों पर ला दिया।वह दिन–ब–दिन,थक रहा था,लगातार तनाव के कारण,उसके शरीर में कोर्टिसोल, सेरोटोनिन,डोपामिन और टेस्टोस्टेरोन जैसे हार्मोन,असंतुलित हो गए,जिससे वो अवसाद,निराशा और आत्मग्लानि से घिरता चला गया।उसका आभामंडल (AURA) जो पहले,"नीला" और "पीला" था,वो धीरे-धीरे धूसर(Grey) और काली दरारों से भर गया,विकास के विशेष रूप से,हृदय और मूलाधार चक्र कमज़ोर हो गए, आभामंडल के क्षीण होने से,विकास नकारात्मक सूक्ष्म शक्तियों और न्याय व्यवस्था से पीड़ित होकर,आत्महत्या कर चुके,प्रेत-विचारों के प्रभाव में आ गया।जब व्यक्ति का मन न्याय और जीवन से भरोसा खो देता है,तब उसकी चेतना प्रेत–प्रेरणा के लिए,संवेदनशील हो जाती है।विज्ञान का स्टूडेंट होते हुए भी,आभामंडल के टूटते ही विकास आत्महत्या की ओर अग्रसर हो गया,और अंततः एक होटल में अपने ही सर्जिकल ब्लेड से अपनी नसें काटकर जीवन समाप्त कर लिया,वही ब्लेड जिससे वो औरों की ज़िंदगियां बचाता था।ये केवल एक आत्महत्या नहीं,बल्कि पुरुष पीड़ा और न्यायिक अनसुनी का भयावह संकेत है।उसे ये ही लग रहा था,कि भारतीय न्याय व्यवस्था में,पुरुषों के लिए कोई सहारा नहीं,कोई सुनवाई नहीं।आख़िरी बार जब विकास,कोर्ट से लौटा,उसकी आंखों में जीवन नहीं था,वो पहले ही मर चुका था,और बाकी कार्य,प्रेत ने उसे प्रेरित करके कर दिया।

2016–2020: इस अवधि में वैवाहिक समस्याओं के कारण,16,021 पुरुषों ने आत्महत्या करी
2020: तलाक के कारण,287 पुरुषों ने आत्महत्या करी
2022: 83,713 विवाहित पुरुषों ने आत्महत्या की
2022: कुल आत्महत्याओं में से 72% पुरुष थे,जिनमें से कई ने,घरेलू कारणों को,आत्महत्या का कारण बताया।  

नाम: अपराजिता अग्रवाल
उम्र: 27 वर्ष
स्थान: प्रयागराज,उत्तरप्रदेश

वर्ष 2021 में अपराजिता की एक ही शहर में संजय से अरेंज मैरिज हुई,शादी के तुरंत बाद,पहले दहेज के लिए,मिलने वाले ताने क्या कम थे,कि वो जब पहली बार,गर्भवती हुई तो अल्ट्रासाउंड में बेटी की जानकारी सामने आते ही,ससुराल वालों ने ज़बरदस्ती उसका अबॉर्शन करवा दिया।उसे हर रोज़,शारीरिक और मानसिक रूप से प्रताड़ित किया गया।मायके वालों ने कहा,"बेटी एडजस्ट कर लो,इतने बड़े घर परिवार के लिए,इतना तो एडजस्ट करना पड़ेगा ही.."अपराजिता को अब न ससुराल में शांति थी,न ही मायके वालों ने उसका साथ दिया।एक साल बाद,वो दुबारा गर्भवती हुई,फिर वही धमकी: “अगर फिर बेटी निकली तो जान से मार देंगे।”और अल्ट्रासाउंड में बेटी ही निकली,अपराजिता के शरीर में पिछले एक वर्ष में लगातार कई हार्मोंस में बदलाव हुए,उथल–पुथल हुई,जैसे कि,"प्रोजेस्टेरॉन",गर्भावस्था को बनाए रखता है,इसकी कमी होने से,उसे डिप्रेशन और मूड स्विंग्स होने लगे।"ऑक्सीटोसिन",जिसे लव–हार्मोन कहा जाता है,जो मां और शिशु के बीच,एक अनकहा,संबंध बनाता है,जब अपराजिता का गर्भपात हुआ,तो इसका प्रवाह अचानक रुक गया,जिससे वो भावनात्मक रूप से पूरी तरह,टूट गई।

इस स्थिति में,उसके शरीर में,"कॉर्टिसोल"अधिक हो गया,जिससे उसे एंग्जाइटी हुई,पैनिक अटैक्स आए,पोस्ट ट्रॉमेटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर(PTSD) हो गया,इसका ये प्रभाव हुआ कि,उसे नींद आना बंद हो गया,उसकी कमज़ोर पड़ी देह में,ऊर्जा की और कमी हो गई,वो "क्लिनिकल–डिप्रेशन" के स्टेज पर पहुंच गई और उसके मन में,अनियंत्रित भय रहने लगा।एक महिला जिसने एक बार "कन्या के कारण" जबरन गर्भपात झेला हो,वो अपने अस्तित्व को निष्क्रिय और अपमानित महसूस करती है।मानसिक आघात इतना गहरा होता है कि,वो आत्महत्या की ओर अग्रसर हो सकती है,अपराजिता के साथ भी,ये ही हुआ,वो लगातार,अपराधबोध में जीने लगी,“मैं बेटी को नहीं बचा पाई”,“मैं अपनी कोख की रक्षा नहीं कर पाई…”,वो पूरी तरह,स्वयं को असहाय अनुभव करने लगी,“मेरे शरीर पर भी मेरा अधिकार नहीं…”

जब कोई स्त्री बार-बार अनचाहे गर्भपात,अपमान और भय का शिकार होती है,तो उसका आभामंडल,धूसर(Grey) हो जाता है,जिससे आशा का लोप होता है।उसके आभामंडल में,काली दरारें पड़ती हैं,जिससे,आत्मिक रक्षा कमजोर होती है।उसका स्वाधिष्ठान चक्र (Reproductive),सबसे अधिक प्रभावित होता है।गर्भपात में मारे गए,भ्रूणों की आत्माएं,जो कभी–कभी अपनी मां से जुड़ी रहती हैं,वो भी इस समय,बहुत प्रभावी हो जाती हैं,वो धीरे–धीरे उसे खोखला करने लगती हैं,और फिर प्रेत को आभामंडल में छिद्र आसानी से मिल जाता है,जब ऐसा होता है,तो उसे काली छायाएं दिखने लगती हैं,गले में दबाव महसूस होने लगता है,नींद में घुटन होने लगती है।ये वही अवस्था है,जिसे “प्रेत प्रेरणा” कहा गया है,जो आत्महत्या के मार्ग को “मुक्ति” कहकर प्रस्तुत करती है।अपराजिता के साथ,ये सारी चीज़ें एक वर्ष से लगातार घट रहीं थीं,उसका मन,भय और अपमान से इतना भर चुका था कि,उसने रिपोर्ट देखते ही,बिना कुछ सोचे–समझे नए पुल से यमुना जी में छलांग लगा दी।

2016–2020: इस अवधि में,वैवाहिक समस्याओं के कारण,21,750 महिलाओं ने आत्महत्या करी।

2020: तलाक के कारण,264 महिलाओं ने आत्महत्या की।  

2022: 30,771 विवाहित महिलाओं ने आत्महत्या करी।

इन सब केस से इतर,वर्ष 2018 में,दिल्ली के बुराड़ी में एक ही परिवार के 11 लोगों की रहस्यमयी "सामूहिक आत्महत्या",आज भी आधुनिक मनोविज्ञान के लिए,एक पहेली है,परंतु यदि हम इस घटना को,धर्मशास्त्रों की दृष्टि से देखें,तो यह स्पष्ट होता है कि,ये घटना,किसी अदृश्य सत्ता के,वशीकरण की परिणति थी।

इस परिवार के मुखिया,ललित पर “पिता की आत्मा” का वशीकरण बताया गया,जो उसे निर्देश देती थी:कठोर व्रत, विशेष आसन,ध्यान की विधियां,
और अंततः “मोक्ष प्राप्ति हेतु” आत्मसमर्पण।

बुराड़ी जैसे कई और सामूहिक आत्महत्याएं के केस हुए हैं:

तमिलनाडु: 22 मामले, 45 मौतें
आंध्र प्रदेश: 19 मामले, 46 मौतें
मध्य प्रदेश: 18 मामले, 39 मौतें
राजस्थान: 15 मामले, 36 मौतें

इसके अलावा,53 प्रमुख शहरों में से 10 शहरों में सामूहिक आत्महत्याओं के 26 मामले दर्ज किए गए,जिनमें 63 लोगों ने आत्महत्या की।

यह सब गरुड़ पुराण और देवी भागवत की उन कथाओं की याद दिलाता है,जहां प्रेत आत्माएं,पूर्वज या देवस्वरूप(कुलदेवता,या जिस देव की तुम आराधना कर रहे हो)बनकर,प्रकट होती हैं और मनुष्य को भ्रमित करती हैं। 

श्रीमद्भागवत में वर्णित “प्रेतबाधित राजा” की कथा में भी, यही होता है,जहां एक प्रेत आत्मा,राजपुरोहित बनकर राज्य को अनिष्ट की ओर धकेलता है।

कई और घटनाएं भी देश भर में हुई हैं,जहां एक परिवार ने “पूर्वजों के आदेश” पर आत्महत्या की,जो इस सिद्धांत को और पुष्ट करती है।मृतकों के पास से मिले हस्तलिखित संदेशों में,‘पूर्वजों द्वारा स्वर्ग का निमंत्रण’ और ‘पुनर्जन्म में उच्च कुल में जन्म’ का उल्लेख था।ये वही तकनीक है,जो प्रेत आत्माएं अपनाती हैं: वे मनुष्य की श्रद्धा,मोह और भ्रम का उपयोग करती हैं।

कैसे करते हैं प्रेत यह मायावी षड्यंत्र?

१. भ्रमित रूप धारण:
गरुड़ पुराण और ब्रह्मवैवर्त पुराण में वर्णन है कि,प्रेत आत्माएं देवताओं या पूर्वजों का रूप धारण कर सकती हैं।वे स्वप्न, ध्यान या साक्षात्कार के रूप में,प्रकट होकर,व्यक्ति को यह विश्वास दिलाती हैं,कि वह किसी "दिव्य सत्ता" से,
संवाद कर रहा है।

२. मिथ्या वचन:
“तुम्हें स्वर्ग मिलेगा”, “तुम्हारा पुनर्जन्म राजघराने में होगा”, “एक बार यह कृत्य करो, फिर दुख समाप्त”,ये वाक्य प्रेतों की शास्त्रीय भाषा है।वामाचार में तो यह भी वर्णन मिलता है कि,कैसे साधना में,विघ्न डालने हेतु,पिशाच रूपी शक्तियां, साधक को ‘सिद्धि’ का झूठा लालच देती हैं।

३. स्थानिक प्रेतबाधा:
बुराड़ी और अन्य घटनाओं में,ये देखा गया कि,घर के भीतर ही कोई विशेष स्थान या पेड़ आदि पूजा का केंद्र बन गए थे,ये “स्थूल प्रेतवृति” का संकेत है।

स्कंद–पुराण बताता है कि,जिस स्थान पर कोई अत्याचार या अपूर्ण क्रिया हुई हो,वहां प्रेत–गण वास करते हैं और वहां पूजा-पाठ आरंभ हो जाए,तो वे उसी माध्यम से,
नियंत्रण शुरू कर देते हैं।

अच्छा,ये प्रेत ऐसा करते क्यों हैं?
क्योंकि,वे स्वयं अधूरे हैं,पीड़ित हैं,न जाने कबसे,प्रेत योनि में कष्ट भोग रहे हैं,और इस कारण वो और क्रोधित,और ईर्ष्यालु,और विध्वंसकारी हो गए हैं।वो चाहते हैं,कि कोई और भी उनकी पीड़ा में सम्मिलित हो,जो वो झेल रहे हैं,वो भी उसकी अनुभूति करें,और साथ ही साथ,वो इन जीवों की प्रेत बनी आत्माओं को प्रताड़ित करें,एक गुलाम बना कर,
ऐसे समझ लो कि उन्हें जीवित संसार से तीव्र ईर्ष्या होती है,वो जानते हैं कि आत्महत्या करने वाला भी,उन्हीं की तरह प्रेत बनता है,बस इसलिए वो जीव को वही कष्ट देने हेतु,आत्महत्या के लिए प्रेरित करते हैं,जैसे जब कोई छात्र किसी मेडिकल या इंजीनियरिंग कॉलेज में फर्स्ट इयर में एडमिशन लेता है,और उसके साथ बहुत बुरी रैगिंग होती है,और रैगिंग करने वाले सीनियर,वही होते हैं,जिनके साथ,पूर्व में वैसी ही रैगिंग हुई थी,तो वो उसका दोहराव दूसरे नए छात्रों पर कर,एक डार्क प्लेजर की अनुभूति करते हैं,स्वयं को,"पॉवरफुल" फील करते हैं,बिलकुल वैसे ही प्रेतों का स्वभाव भी होता है,वो पीड़ित हैं,तो दूसरों को भी वही यातनाएं देते हैं,और हर बार,उनकी क्रूरता का स्तर बढ़ता जाता है,जो जितना पुराना प्रेत,उसकी उतनी शक्ति,उसकी उतनी अधिक क्रूरता।

अच्छा ये आभामंडल(AURA) क्या है?और ये कम कैसे होता है?कैसे इसके कम होने से हम किसी प्रेत का,किसी नेगेटिव एंटिटी का,आसान टारगेट बन जाते हैं?

बंधु,आभामंडल(AURA) एक सूक्ष्म ऊर्जा-क्षेत्र है,जो हर जीवित प्राणी के शरीर के चारों ओर मौजूद होता है।ये शरीर, मन और आत्मा की स्थिति को दर्शाता है।आयुर्वेद,योग और वेदांत के अनुसार,आभामंडल को सात सूक्ष्म स्तरों या परतों (layers) में विभाजित किया गया है।ये सात स्तर,हमारे शारीरिक,मानसिक,भावनात्मक और आध्यात्मिक अस्तित्व का प्रतिबिंब होते हैं।प्रत्येक स्तर,एक विशिष्ट प्रकार की ऊर्जा,चेतना और क्रिया से संबंधित होता है।

१. स्थूल शरीर स्तर (Physical Body Layer) - ये शरीर से सबसे निकटतम होता है।जीवनीय ऊर्जा (प्राण) यहीं बहती है।इसे "प्राणमय कोश" भी कहा जाता है।

२.भावनात्मक स्तर (Emotional Body Layer)- भावनाओं और अनुभवों को समेटे रहता है।Aura की रंगीन परत इसी में होती है।इससे ही व्यक्ति की "वाइब्स" महसूस होती हैं।

३. मानसिक स्तर (Mental Body Layer)- विचार,तर्क,निर्णय,और स्मृति की ऊर्जा।चिंतन और कल्पना यहीं से प्रसारित होते हैं।

४. हृदय स्तर (Astral Body Layer)- ये भावनात्मक और मानसिक शरीर का पुल है।प्रेम,सहानुभूति और संबंध यहीं पनपते हैं।इसे ही योग में "हृदयचक्र" से जोड़ा जाता है।

५. आध्यात्मिक स्तर (Etheric Template Layer)- ये आत्मा की छाया (Template) होता है।व्यक्ति की नियति, संस्कार और पूर्व जन्म के कर्म यहीं निहित होते हैं।

६.बौद्धिक-आध्यात्मिक स्तर (Celestial Body)- ध्यान, दिव्यता,उच्च चेतना और आत्मदर्शन का स्रोत।यहां आत्मा परमात्मा से संवाद करती है।

७. अति-आध्यात्मिक स्तर (Ketheric Template) Divine Body -आत्मा और ब्रह्म का एकत्व।परम शक्ति (Consciousness) से सीधा जुड़ाव।वेदांत में यही "अहम् ब्रह्मास्मि" की स्थिति है।

पहले तीन स्तर (१-३): स्थूल और सूक्ष्म शरीर से जुड़े हैं (शरीर,मन,भावना)

मध्य का चौथा स्तर(४): संबंधों और करुणा का सेतु है

अंतिम तीन स्तर (५-७): आध्यात्मिक प्रगति और आत्म-साक्षात्कार से संबंधित हैं

आभामंडल कमज़ोर होने के मुख्य कारण हैं,नकारात्मक विचार और भावनाएं,क्रोध,ईर्ष्या,चिंता,अवसाद,ये भावनाएं,ऊर्जा को नीचे खींचती हैं।लगातार नकारात्मक सोच से,आभामंडल की कम्पन-तरंगें (vibrations) धीमी और मलिन हो जाती हैं।शराब,सिगरेट,ड्रग्स,अत्यधिक प्रोसेस्ड फूड,आभामंडल को दूषित कर देते हैं।इससे आभामंडल की रक्षा-दीवार (protective shield) कमज़ोर हो जाती है।अत्यधिक डिजिटल स्क्रीन टाइम,फिर वो चाहे मोबाइल हो,वीडियो गेम हो,या अश्लीलता या हिंसक कंटेंट से जुड़ाव हो,ये सब,मस्तिष्क की ऊर्जा-संवेदना को कुंद करता है।इलेक्ट्रोमैग्नेटिक रेडिएशन (EMR) भी आभामंडल को असंतुलित करता है।नींद की कमी और अनियमित दिनचर्या भी,आभामंडल को प्रभावित करती है,6–8 घंटे की गहरी नींद न होना,शरीर की ऊर्जा-भरपाई रोक देता है।रात्रि जागरण,(विशेषकर रात 12 से 3 बजे तक का समय)आभामंडल को,सबसे अधिक प्रभावित करता है।जिन स्थानों में कलह,व्यभिचार या मृत्यु की घटनाएं,अधिक होती हैं,वहां आभामंडल क्षीण होता है।प्रेत-ग्रस्त स्थानों में रहने से,आभामंडल पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है,इसलिए कहा गया है,कि आमजनों को,विशेषकर बच्चों और युवक–युवतियों को अकारण,श्मशान घाटों पर विचरण या समय बिताना नहीं चाहिए,जब किसी अपने की मृत्यु

,आभामंडल पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है,इसलिए कहा गया है,कि
आमजनों को,विशेषकर बच्चों और युवक–युवतियों को अकारण,
श्मशान घाटों पर विचरण या समय बिताना नहीं चाहिए,जब किसी
अपने की मृत्यु हो,तभीजाना चाहिए और शुद्धि करके ही घर लौटना
चाहिए,पर अब तो,श्मशान घाटों को भी रील और सेल्फियों का स्पॉट
बना दिया गया है,इस कारण,प्रेत बाधाएं भी अधिक हो चली हैं,अघोर
तंत्र के साधकों के लिए अलग नियम हैं,श्मशान के देवी–देवता उनकी
रक्षा करते हैं,क्योंकि वो वहां साधना के उपलक्ष्य हेतु आते हैं,साधना
करने से पूर्व वो आज्ञा मांगते हैं,शमशान में बैठे इन रक्षक देवी देवताओं
से,बाकी जो भी,मौज–मस्ती,गांजा फूंकते हुए,रील बनाने आते हैं,वो
अपनी जीवनशक्ति का अपव्यय,आभामंडल की चमक और सुरक्षा को
क्षीण करते हैं,नाना प्रकार के रोगों और दिक्कतों से वो कुछ वर्ष बाद,
घिर जाते हैं और उन्हें पता भी नहीं चलता,ये किस कारण उनके साथ
हो रहा है,कौनसा प्रेत,शमशान की भूमि से,उनके साथ,चिपट गया है।

आभामंडल(AURA),एक अदृश्य कवच है,जो हमें न केवल रोगों से,
अपितु,आत्मघाती विचारों और प्रेत प्रभावों से भी बचाता है।इसका
ध्यान रखना,हमारी मानसिक,भावनात्मक और आध्यात्मिक रक्षा के
लिए अति आवश्यक है।

बंधु,ये जान लो,आत्महत्या...एक देह की नहीं,अपितु एक "अवसर" की
हत्या है,एक अवसर,जो तुम्हें न जाने,कितनी योनियों में समय देने के
पश्चात,प्राप्त हुआ,और तुम हो कि,इस अवसर को ऐसे ही,गंवा देना
चाहते हो,बिना ये समझे कि,ये आत्मघाती निर्णय,तुम्हारा स्वयं का न
होकर,किसी ऊर्जा द्वारा प्रभावित होने पर लिया गया निर्णय है,और तुम
हो कि,इस भ्रम में हो कि,तुम स्वयं ये निर्णय ले रहे हो,और तुम्हारे
हिसाब से,ये ही सबसे उचित निर्णय है,तुम बस औरों की भांति,उसी
जाल में फंस रहे हो,जो तुम्हें इस जन्म के पश्चात,बस कष्ट ही कष्ट देगा,
और उस कष्ट के समक्ष,जीवन में इस समय मिल रहा,कष्ट,"नगण्य"
लगेगा।

तुम्हें लग रहा होगा,कि मैं ये सब बातें,इसलिए कह रहा हूं,कि मेरे जीवन
में,सबकुछ सही है,और मैं दूसरों को लंबा–लंबा ज्ञान बांटने और
कहानियां सुनाने आ गया हूं,तो सुनो बंधु,मैं वहां था,जहां तुम अभी हो,
और हां अभी भी मैं टूटा हुआ हूं,बहुत कुछ खोया है,और खोने की कगार
पर हूं,सबकुछ शून्य से,पुनः आरंभ करना पड़ेगा और वो आसान नहीं
होता,पर मैंने स्वयं को समेटना सीख लिया है,स्वीकार लिया है कि,ये
जीवन,ये जन्म भी पूर्व जन्मों की भांति,संघर्षमय होगा,स्वीकार लिया है
कि,कई लोग आएंगे,कई जाएंगे,परिवर्तन को स्वीकार लिया है,परिवर्तन
है तो मैं गतिमान हूं,एक तालाब की भांति रुका हुआ नहीं हूं,ये स्वीकार
लिया है,स्वीकार लिया है कि,मुझे पग–पग पर,ठोकरें भी मिलेंगी,
तिरस्कार भी मिलेगा,कर्म फल सिद्धांत से मैं भी सबकी भांति बंधा हूं,
पर मैं आगे बढ़ता रहूंगा,क्योंकि आगे बढ़ना,मेरी प्रवृति है,हर जन्म में
रही है,परिवर्तन को स्वीकार करता हुआ,इतिहास से सीख लेते हुए,आगे
बढ़ना,मेरी प्रवृति है,ये सारा संघर्ष,ये सारी ठोकरें,मुझे कुछ सिखाने के
लिए मिली हैं,और जो भी मैं सीख रहा हूं एक विद्यार्थी की भांति,वो मैं
तुमको सिखाऊंगा,फ्री ऑफ कॉस्ट,कोई हिडेन एजेंडा नहीं,कोई स्वार्थ
नहीं,मुझे जो आदेश मिला है,बस उसी की पूर्ति कर रहा हूं,समझ लो,
जैसे महाकुंभ के दौरान,प्रभु प्रेरणा से मेरी इस देह ने निःशुल्क सेवा दी
थी,बस ये भी एक सेवा ही है,मेरे इस जन्म का तुम सबके प्रति एक
कर्तव्य,जो कार्य अब तक मेरी इस देह ने पर्सनल काउंसलिंग करके दी
थी,और आज वही सब इस लेख के माध्यम से समझाने का प्रयास कर
रहा हूं,हां ये लंबा लेख है,जैसे लिखने में मुझे समय लगा,वैसे पढ़ने में
तुम्हें भी समय लगेगा,आज एकादशी के दिन,इस लेख की पूर्ति कर रहा
हूं,पालनकर्ता श्री हरि विष्णु चाहेंगे और तुम्हारे प्रारब्ध में समझना होगा,
तो तुम्हें ये बातें,अवश्य समझ आएंगी,नहीं तो जो हरि इच्छा...🙏🏻

हां तो सुनो बंधु,ये आत्महत्या करने के विचारों ने मुझे भी पूरी तरह
जकड़ लिया था,वर्ष 2007 में,पर प्रेत सफल नहीं हुआ,कई उद्देशों की
पूर्ति करनी थी मुझे शायद,इस जन्म में।मेरी मां की प्रार्थनाएं थीं,प्रभु की
कृपा थी,और पूर्व जन्मों का प्रारब्ध भी,तभी मैं उन नेगेटिव ऊर्जाओं के
वश से बाहर निकल पाया,नहीं तो आज मैं यहां,ये लेख तुम्हारे लिए,नहीं
लिख रहा होता।प्रेत बन,तुम में से किसी को,आत्महत्या के लिए उकसा
रहा होता,या बस किसी शक्तिशाली प्रेत द्वारा प्रताड़ित हो रहा होता,इस
जाल में फंसने के लिए स्वयं को कोस रहा होता,और तुमसे ईर्ष्या कर,
जल रहा होता।

ये लेख तुम्हारे लिए ही है,तुम जो कोई भी हो,तुम्हारी क्या आयु है,तुम
युवा हो,अधेड़ हो,स्त्री हो,पुरुष हो,तुम जो भी हो,ये स्मरण रखो,कि जब
तुम इसे पढ़ो,तो जान लो,कोई ऐसी "सकारात्मक शक्ति" है,जो तुम्हें

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