Monday, 3 August 2026

शिक्षा बाधक-

शिक्षा बाधक-
अभी भारतीय ज्ञान पद्धति की चेष्टा हो रही है। किन्तु वर्त्तमान पद्धति में कई अद्वितीय महापुरुष अशिक्षित रह जाते।
(१) वाल्मीकि, व्यास-व्यास का कथन उद्धृत किया जाता है कि स्त्री, शूद्र, द्विजबन्धु को वेद पढ़ने का अधिकार नहीं है। यह भागवत और देवी भागवत पुराणों में है। भागवतपुराण के अनुसार इनको वेद समझ नहीं आता है, अतः इनके लिए महाभारत की रचना हुई। देवीभागवत पुराण के अनुसार इनको वेदश्रवण का अधिकार नहीं है, अतः उनके लिए पुराण की रचना हुई। 
स्त्रीशूद्रद्विजबन्धूनां त्रयी न श्रुतिगोचरा ।
कर्मश्रेयसि मूढानां श्रेय एवं भवेदिह ।
इति भारतमाख्यानं कृपया मुनिना कृतम्॥ (भागवत पुराण, १/४/२५)
स्त्रीशूद्रद्विजबन्धूनां न वेदश्रवणं मतम् ।
तेषामेव हितार्थाय पुराणानि कृतानि च॥ (देवी भागवत पुराण, १/३/२१)
दोनों मतों के अनुसार कम बुद्धि वालों के लिए पुराण और इतिहास ग्रन्थ हैं। किन्तु व्यास ने ही महाभारत के आरम्भ में लिखा है कि इतिहास-पुराण नहीं जानने वाला मूर्ख है, जिससे वेद के नष्ट होने का डर है।
इतिहास पुराणाभ्यां वेदं समुपबृंहयेत्॥२६७॥ बिभेत्यल्पश्रुताद् वेदो मामयं प्रहरिष्यति।
(महाभारत, १/१/२६७-६८)
नारद पुराण इसका विस्तार करता है कि वेद पुराण पर ही आधारित है तथा पुराण कई अन्य का विस्तार से वर्णन करता है।
स्मृतिर्वेदः क्रिया वेदः पुराणेषु प्रतिष्ठितः। पुराण पुरुषाज्जातं यथेदं जगदद्भुतम्।१६॥
तथेदं वाङ्मयं जातं पुराणेभ्यो न संशयः। वेदार्थादधिकं मन्ये पुराणार्थं वरानने॥१७॥
वेदाः प्रतिष्ठिताः सर्वे पुराणेष्वेव सर्वदा बिभेत्यल्पश्रुताद् वेदो मामयं प्रहरिष्यति॥१८॥
न वेदे ग्रह सञ्चारो न शुद्धिः काल बोधिनी। तिथिवृद्धि क्षयो वापि पर्वग्रह विनिर्णयः॥१९॥ 
इतिहास पुराणैस्तु निश्चयोऽयं कृतं पुरा। यन्न दृष्टं हि वेदेषु तत्सर्वं लक्ष्यते स्मृतौ॥१९॥
उभयोर्यन्न दृष्टं हि तत्पुराणैः प्रगीयते। प्रायश्चित्तं तु हत्यायामातुरस्यौषधं प्रिये॥२१॥
 न चापि पापशुद्धिः स्याद् आत्मनश्च परस्य वा। यद् वेदैः गीयते सुभ्रु उपाङ्गैः यत् प्रगीयते॥२२॥
पुराणैः स्मृतिभिश्चैव वेद एव निगद्यते। रटन्तीह पुराणानि भूयो भूयो वरानने॥२३॥ (नारद पुराण, अध्याय २४)
शूद्र के लिए वर्जित होने पर वाल्मीकि और व्यास भी वेद पढ़ने के अधिकारी नहीं थे। वर्तमान विद्वत् समूह उनको वेद विद्यालय से धक्का मार कर भगा देता। व्यास की माता मछली मारती थी। वाल्मीकि पतित डाकू थे। तुलसीदास जी ने भी इनका उल्लेख किया है-
बालमीक नारद घटजोनी। निज निज मुखनि कही निज होनी।।
(रामचरितमानस, बालकाण्ड, २/३)
(२) ऐतरेय महिदास-दास से स्पष्ट है कि वह शूद्र थे। पर ऋग्वेद का एकमात्र ब्राह्मण ग्रन्थ उनका ही लिखा है। पर वर्तमान प्रचार के अनुसार उनको वेद पढ़ने का अधिकार नहीं था।
(३) अधिकारी- जो अपने को अधिकारी मानते हैं, वे वेद न तो स्वयं पढ़ते हैं न अन्य को पढ़ने देते हैं। शङ्कराचार्य के ४ मठों के४ वेद हैं। पुरी गोवर्धन पीठ का ऋग्वेद है, पर आज तक वहां ऋग्वेद के पठन पाठन की कोई परम्परा नहीं बनी। किन्तु अन्यों को सदा मना करते हैं। यह अधिकार का प्रश्न नहीं है, इच्छा, आवश्यकता, योग्यता पर निर्भर है। जैसे तन्त्र में कई मन्त्रों को स्त्रियों के लिए उपयोगी नहीं कहा है। उसे पढ़ सकते हैं पर उसका जप नहीं करना है।
(४) शङ्कराचार्य-आज १५ वर्ष का बालक किसी प्राध्यापक से चर्चा करने जायेगा तो उसे बिना सुने डांट कर भगा देंगे। उनका तो महाविद्यालय में प्रवेश ही नहीं हो सकता था। तथापि उस समय के सर्वश्रेष्ठ विद्वान् मण्डन मिश्र ने शास्त्रार्थ करना स्वीकार किया। उसमें भी इन दोनों का महान् अपराध था कि भारती देवी को मध्यस्थ बनाया, जिनको वेद सुनने का भी अधिकार नहीं था। दोनों समाज से बहिष्कृत हो जाते।
(५) चन्द्रशेखर वेङ्कट रामन-भारत में विज्ञान का प्रथम नोबेल पुरस्कार इनको ही मिला था। इन्होंने ११ वर्ष की आयु में मैट्रिक परीक्षा में सर्वप्रथम स्थान प्राप्त किया था। वर्तमान पद्धति में इनका उच्च विद्यालय में प्रवेश ही नहीं होता। कई भारतीय छात्रों ने न्यूनतम आयु में ब्रिटेन तथा अमेरिका में मेडिकल तथा इंजीनियरिंग की डिग्री ली है। उनमें से किसी का भारत के विद्यालय में प्रवेश नहीं होता। ब्रिटेन की सबसे कम आयु के डाक्टर अर्पण जोशी हैं। भारत में उनका न विद्यालय में प्रवेश होता न नीट परीक्षा में बैठने की अनुमति मिलती।
https://www.ndtv.com/indians-abroad/indian-origin-doctor-who-just-graduated-is-britains-youngest-1726894
अमेरिका में भी सबसे कम आयु का डाक्टर भारतीय ही है, जिसे भारत में प्रवेश नहीं मिलता।
https://www.21kschool.com/us/blog/world-youngest-doctor-balamurali-ambati/
(६) मेरी स्थिति भी वैसी ही है, यद्यपि इन महान् व्यक्तियों से मेरी तुलना उचित नहीं है। ८ वर्ष तक घर में पढ़ा जिसके कारण मैक्समूलर प्रभाव से मुक्त रहा। ८ वर्ष की आयु में कक्षा ६ में प्रवेश हुआ, आज कक्षा १ में ही हो सकता था जिससे सारा पढ़ा हुआ भूल जाता। जातिवाद तथा प्रश्न पत्र लीक करने के लिए पटना विश्वविद्यालय के कुलपति ने बी.एस,सी में मुझे कभी पास नहीं करने का निश्चय किया था। विरोध करने पर मेरा मैट्रिक परीक्षाफल भी रद्द करवाया जिसके लिए ५ वर्ष राष्ट्रीय छात्रवृत्ति मिल चुकी थी। बीबीसी तथा पेकिंग रेडिओ से कहानी प्रसारित होने के कारण दोनों को हटा कर मुझे पढ़ने दियागया तथा संघ लोकसेवा आयोग के अध्यक्ष श्री अब्दुल रहमान किदवई ने परीक्षा में बैठने की विशेष अनुमति दी-बिना मैट्रिक या बीएससी प्रमाण पत्र के। ओड़िशा में भी अनिवार्य कारणों से सिद्धान्त दर्पण की गणितीय व्याख्या करनी पड़ी। मुख्य मन्त्री को क्रोध आया कि ओड़िशा के बाहर का हो कर क्यों व्याख्या कर रहा है। इसी विषय पर प्रायः १५ अपराधिक मामले दर्ज हुए, घर की सम्पत्ति जब्त करने के लिए २ बार पुलिस दल भेजा गया तथा प्रायः ५० विभागीय कार्यवाही हुई। केवल जगन्नाथ की कृपा से तथा ओड़िशा के मध्य वर्ग के अधिकारियों की श्रद्धा के कारण अब तक बचा हूं जो जगन्नाथ का ही चमत्कार है।

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