समस्या ये है कि आज हम इस कदर उन वाहियात टीवी सीरियलों से जुड़े हुए हैं जो बिना किसी शोध एवं तथ्य के, केवल अपने शो को प्रचलित करने के लिए भारतीय दर्शकों के सामने कुछ भी परोस देते हैं। वर्षों से यही सब बकवास देखते देखते आज की लगभग पूरी पीढ़ी इसे ही सत्य मानने लगी है। रामायण, महाभारत और हमारे धार्मिक ग्रंथों की जैसी दुर्गति टीवी और सिनेमा ने की है उसका कोई और उदाहरण नही है। यदि आप उन्ही से अपना संदर्भ ले रहे हैं तो अर्जुन को 21 बार क्या, 210 बार हराइये, उससे सत्य नही बदल जाएगा।
दूसरी समस्या ये भी है कि आज मूल महाभारत, जिसे जय कहते थे, हमारे बीच है जी नही। आज महाभारत का जो स्वरूप हमारे बीच है उसमें बहुत मिलावट है। कहते हैं महर्षि वेदव्यास ने मूल ग्रंथ केवल 8800 श्लोकों का लिखा था जिसका नाम "जय" था। ये वही श्लोक थे जिनका अर्थ अत्यंत कठिन था और जिनकी रचना उन्होंने भगवान गणेश की लेखन गति कम करने के लिए की थी। बाद में उन्होंने उस ग्रंथ का 67200 श्लोकों तक और विस्तार किया और उसका नाम "भारत" रखा। देवताओं ने इस महान ग्रंथ को वेदों से भी श्रेष्ठ समझा और इसे "महाभारत" का नाम दिया। यहाँ तक ये रचना शुद्ध रूप से महर्षि वेदव्यास की ही थी।
बाद में उनके शिष्य ऋषि वेंशपायन ने 24000 श्लोकों की रचना कर इसे महाभारत में ही मिला दिया जिससे कुल श्लोकों की संख्या 100000 हो गयी। तत्पश्चात हरिवंश पुराण के सभी श्लोकों को भी इसी में जोड़ दिया गया जिससे श्लोकों की संख्या 120000 चली गयी। ध्यान रहे कि ये सभी श्लोक महर्षि वेदव्यास द्वारा रचित नही थे। इसी कारण आज महाभारत की कथाओं में हमें बहुत विरोधाभास भी देखने को मिलता है। बांकी रही सही कसर तो भारतीय टीवी ने पूरी कर ही दी।
अपने दिव्यास्त्रों के कारण अर्जुन लगभग अपराजेय थे, इसी कारण उनका एक नाम "विजय" भी था। ऐसा नही है कि उन्हें परास्त करना असंभव था किंतु मूल महाभारत में उनकी स्पष्ट पराजय का वर्णन मिलना दुर्लभ है। विराट युद्ध में तो उन्होंने अकेले ही पूरी कुरुसेना को परास्त कर दिया था जिसमें स्वयं भीष्म, द्रोण एवं कर्ण जैसे महारथी थे। यदि आपने बीआर चोपड़ा कृत महाभारत (1988) देखी हो तो उसमें विराट युद्ध बहुत अच्छे से दिखाया गया है, किन्तु यदि आपने स्टार प्लस वाले महाभारत, या उससे भी वाहियात सूर्यपुत्र कर्ण सीरियल देखा होगा तो उन्होंने पूरे विराट युद्ध को ऐसे दिखाया है जैसे वो अर्जुन और कर्ण का व्यक्तिगत युद्ध था, जिसमें कर्ण परास्त ही नहीं हुए। शुद्धता में मिलावट इसे ही कहते हैं।
महाभारत में केवल एक बार उनकी स्पष्ट पराजय का वर्णन है और वो है भगवान शंकर द्वारा। किन्तु इसे गिना नही जाता क्योंकि महादेव से भला कैसे जीत जा सकता है। अर्जुन तो फिर भी उनके सम्मुख कुछ क्षणों के लिए खड़े रह सके, यही देख कर महादेव अत्यंत प्रसन्न हुए और उन्हें पाशुपतास्त्र प्रदान किया। महादेव से परास्त होने का सौभाग्य भी इतिहास में विरलों को ही प्राप्त है। अब जिनके पास पाशुपतास्त्र हो उनसे भला और कौन जीत सकता है?
बर्बरीक के बारे में बहुत चर्चा होती है किन्तु उनका वर्णन मूल महाभारत में है ही नहीं। इसके अतिरिक्त अर्जुन और चित्रांगदा के पुत्र बब्रुवाहन एवं सुभद्रा के कारण श्रीकृष्ण एवं अर्जुन के मध्य युद्ध का भी वर्णन मूल महाभारत में नही है। कर्ण द्वारा अर्जुन के पराजय के जितने किस्से टीवी में भर भर कर दिखाए जाते हैं वैसा कुछ भी महाभारत में नही है। इसके अतिरिक्त भी और घटनायें, जिसने आपकी सूची को 21 तक पहुंचा दिया है, उसके होने में भी स्पष्ट संशय ही है।
ये सत्य है कि श्रीकृष्ण के अतिरिक्त कुछ योद्धा थे जिनमें कदाचित अर्जुन को परास्त करने का समर्थ था, जैसे भीष्म एवं द्रोण, किन्तु फिर भी महाभारत में इनके द्वारा अर्जुन के स्पष्ट पराजय का कोई वर्णन नही है। कर्ण को मैं यहाँ नही जोड़ रहा क्योंकि वो मूल महाभारत में अर्जुन और उनके अतिरिक्त भीम और अन्य योद्धाओं से भी परास्त हुए। उस पर से बेचारे कई श्रापों से जूझ रहे थे।
यहाँ कर्ण का अपमान करने का मेरा कोई आशय नहीं है, वे एक महान प्रचण्ड योद्धा थे, इसमें कोई संदेह नही है। मैं आपको बताना चाहूंगा कि कर्ण महाभारत में मेरे प्रिय पात्रों में से एक है। किन्तु किसी के प्रेम में इतना भी नही डूब जाना चाहिए कि सत्य असत्य कुछ दिखे ही नही।
अंत मे जाते जाते केवल ये कहूंगा कि मुझे समझ में नही आता जब स्वयं महर्षि वेदव्यास ने अपने ग्रंथ में अर्जुन को कही परास्त नही किया, तो हम क्यों जबरदस्ती कई भ्रामक पराजयों को उनपर थोपना चाहते हैं? हम व्यास द्वारा रचित महाभारत को, जिसे पंचम वेद तक कहा गया है, अपनी सुविधा अनुसार बदलने का प्रयत्न क्यों करना चाहते हैं? यदि उन्होंने महाभारत में अर्जुन को श्रेष्ठ बताया है तो इसका अर्थ ये तो नहीं ना कि अन्य लोग श्रेष्ठ नहीं है? हमें ये बात मानने में क्यों आपत्ति है कि जो महर्षि वेदव्यास ने लिखा है केवल वही सही है, बांकी सब झूठ? क्या आपको नही लगता कि ऐसा कर हम महर्षि वेदव्यास की समझ और उनकी रचना पर ही प्रश्नचिन्ह उठा रहे हैं? सोचियेगा अवश्य।
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