आदमी को कुछ नहीं चाहिए होता
न कोई जीत,
न कोई प्रमाण,
न कोई ताली।
बस एक ऐसी जगह चाहिए होती है
जहाँ उससे कोई सवाल न किया जाए।
जहाँ उसे हर बात के लिए
अपने होने का कारण न बताना पड़े।
शायद पचास के आसपास
आदमी पहली बार समझता है
कि थकान शरीर में नहीं होती,
थकान उन तमाम जवाबों में होती है
जो उसने पूरी ज़िंदगी देते-देते जमा कर लिए हैं।
बचपन में
माँ ने पूछा
“इतनी देर से क्यों आए?”
पिता ने पूछा
“पढ़ाई कैसी चल रही है?”
स्कूल ने पूछा
“कितने नंबर आए?”
रिश्तेदारों ने पूछा
“बड़े होकर क्या बनोगे?”
और वह हर बार
एक नया जवाब लेकर खड़ा हो गया।
फिर जवानी आई।
तब सवाल बदल गए
“कमा कितना लेते हो?”
“कहाँ काम करते हो?”
“अपना घर कब होगा?”
“शादी कब करोगे?”
“बच्चे कब होंगे?”
और उसने फिर
अपनी ज़िंदगी को
उन सवालों के हिसाब से काट-छाँटकर
एक ऐसा आदमी बनने की कोशिश की
जिसे दुनिया स्वीकार कर सके।
फिर प्रेम आया।
वहाँ सवाल और कठिन थे
“तुम मुझसे कितना प्यार करते हो?”
“तुम्हें मेरी परवाह क्यों नहीं दिखती?”
“तुमने ऐसा क्यों कहा?”
“तुमने वैसा क्यों नहीं किया?”
और उसने सीखा
कि कभी-कभी प्यार करने से ज्यादा मुश्किल होता है
अपने प्यार को समझाना।
उसने समझाया।
बहुत समझाया।
कभी शब्दों से,
कभी चुप रहकर,
कभी अपनी गलतियाँ मानकर,
कभी अपनी सही बात छोड़कर।
फिर घर आया।
फिर बच्चे आए।
फिर जिम्मेदारियाँ आईं।
फिर उसने जाना
कि पुरुष होना शायद
हर बार मजबूत होने का नाम नहीं है
बल्कि
हर बार टूटकर भी
सुबह उठ जाने का नाम है।
वह गिरा भी होगा,
डरा भी होगा,
कई रातें ऐसी भी रही होंगी
जब उसने छत को देखते हुए सोचा होगा
“क्या मैं सही कर रहा हूँ?”
लेकिन सुबह
उसने वही चेहरा पहना
जिस पर सबको भरोसा था।
क्योंकि घर में
पिता का डर
बच्चों के लिए कोई विकल्प नहीं होता।
उसने कमाया।
हार गया।
फिर कमाया।
कुछ लोगों को खोया।
कुछ रिश्ते बचाए।
कुछ रिश्तों को
बहुत कोशिश करके भी नहीं बचा पाया।
कुछ दोस्त
सिर्फ़ पुराने फोटो में रह गए।
कुछ सपने
बैंक बैलेंस, EMI, स्कूल फीस
और जिम्मेदारियों के नीचे दब गए।
और कुछ सपने
आज भी उसके भीतर
चुपचाप साँस लेते हैं।
फिर अचानक
उसे एहसास हुआ
कि अब वह हर बात का जवाब नहीं देना चाहता।
किसी ने गलत समझ लिया
तो समझ लिया।
किसी ने उसकी नीयत पर शक किया
तो किया।
किसी को उसका मौन अहंकार लगा
तो लगे।
किसी को उसका व्यस्त रहना बेरुखी लगा
तो लगे।
अब उसमें
हर गलतफहमी को ठीक करने की ऊर्जा नहीं बची।
क्योंकि उसने पूरी ज़िंदगी
लोगों को समझाते हुए बिताई है
कि वह बुरा नहीं है।
अब वह बस इतना जानता है
जिसे मेरे साथ रहना है,
वह मेरे मौन को भी पढ़ लेगा।
और जिसे हर बार
मेरे शब्दों की गवाही चाहिए,
शायद उसे मैं कभी समझा ही नहीं पाऊँगा।
पचास के बाद
पुरुष प्रेम करना नहीं छोड़ता।
बस प्रेम का शोर छोड़ देता है।
वह अब
किसी के पीछे भागकर
अपनी जगह नहीं माँगता।
वह अब
हर बहस जीतना नहीं चाहता।
वह अब
हर रिश्ता बचाना नहीं चाहता।
वह अब
हर चोट का हिसाब नहीं रखता।
वह बस चाहता है
अपने लोगों की सलामती।
बच्चों की हँसी।
अपने कमरे में कुछ घंटे की ख़ामोशी।
शरीर में थोड़ी ताकत।
मन में थोड़ा सुकून।
और कोई ऐसा इंसान
जिसके सामने उसे
अपने मन की सफाई देने की जरूरत न पड़े।
क्योंकि पचास का पुरुष
बहुत कुछ देख चुका होता है।
उसे मालूम होता है
कि हर बहस का अंत समझ नहीं होता।
हर माफ़ी के बाद रिश्ता नहीं बचता।
हर सच पर विश्वास नहीं किया जाता।
और हर अच्छा आदमी
हर किसी के लिए अच्छा साबित नहीं हो सकता।
इसलिए अब
वह चुप रहता है।
यह चुप्पी हार नहीं है।
यह उस आदमी की
आखिरी बची हुई ताकत है
जिसने जिंदगी भर
सब कुछ ठीक करने की कोशिश की है।
अब पचास पर
वह पहली बार
अपने लिए कुछ माँगता है
कि मुझे मत समझाओ।
मुझसे मत पूछो कि मैं ऐसा क्यों हूँ।
मुझे हर बात साबित मत करने दो।
मैं थक चुका हूँ
अपने होने का प्रमाण देते-देते।
अब अगर तुम मेरे पास हो,
तो बस मेरे पास रहो।
मेरी हर चुप्पी का अर्थ मत खोजो।
हर दूरी को नाराज़गी मत समझो।
हर थकान को बेरुखी मत कहो।
कभी-कभी
एक आदमी बस थका हुआ होता है।
और कभी-कभी
उसकी चुप्पी में
पूरी ज़िंदगी बोल रही होती है।
पचास के बाद
उसे दुनिया जीतनी नहीं होती।
उसे बस
अपने भीतर बचा हुआ आदमी
बचाना होता है।
और शायद यही
उम्र का सबसे कठिन सत्य है
एक उम्र के बाद पुरुष शांति नहीं माँगता…
वह सिर्फ़ उन चीज़ों से दूर हो जाता है
जो उसकी शांति छीनती हैं।
क्योंकि अब उसके पास
सिर्फ समय कम नहीं हुआ है
बल्कि
वह पहली बार समझ गया है
कि उसका समय
उसका अपना भी है।
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