तिब्बती बौद्ध दर्शन में 'बारडो' का अर्थ है दो अवस्थाओं के बीच का अंतराल या मध्यवर्ती स्थान। जहाँ एक तरफ जीवन और स्वप्न के बारडो हैं, वहीं 'ध्यान का बारडो' (सैम-टेर बारडो) हमारे अपने भीतर की चेतना का वह सचेत अंतराल है, जो हम गहन ध्यान (मेडिटेशन) के दौरान अनुभव करते हैं।
क्या है ध्यान का बारडो?---
जब हम ध्यान में बैठते हैं, तो हमारा मन विचारों की हलचल से धीरे-धीरे शांत होने लगता है। एक पुराना विचार समाप्त हो चुका होता है और नया विचार अभी उत्पन्न नहीं हुआ होता—इन दोनों विचारों के बीच का यह जो खालीपन, शून्य और गहरी शांति होती है, वही 'ध्यान का बारडो' है।
तिब्बती गुरुओं के अनुसार, यह जीवित रहते हुए ही उस परम सत्य का अनुभव करने का सबसे बड़ा अवसर है जो मृत्यु के समय प्रकट होता है!
ध्यान बारडो को साधने की विधि---
तिब्बती महामुद्रा और दज़ोग्चेन परंपराओं में इस आंतरिक अंतराल को अनुभव करने के लिए कुछ प्रमुख चरण अपनाए जाते हैं:
1. शारीरिक और मानसिक स्थिरता :--
सुखासन या पद्मासन में सहज होकर बैठ जाएं। अपनी रीढ़ की हड्डी सीधी रखें, आँखें आधी खुली या कोमलता से बंद रखें और अपने शरीर को पूरी तरह ढीला छोड़ दें।
2. विचारों को दबाएं नहीं, देखें :--
सामान्य ध्यान की तरह यहाँ विचारों को रोकने की कोशिश नहीं की जाती। इसके बजाय, एक दर्शक बनकर यह देखें कि मन में विचार कैसे आ रहे हैं और कैसे अपने-आप विलीन हो रहे हैं।
3. अंतराल पर ध्यान केंद्रित करना --
अभ्यास के दौरान जब एक विचार समाप्त होता है और दूसरे के शुरू होने में जो एक छोटा सा सन्नाटा या खालीपन आता है, अपनी पूरी जागरूकता उस खालीपन पर टिका दें। यही 'ध्यान का बारडो' है।
4. शुद्ध जागरूकता (Rigpa) में टिकना:--
जब आप बार-बार उस खाली अंतराल पर ध्यान केंद्रित करते हैं, तो मानसिक बकबक शांत होने लगती है। पीछे एक विशाल, निर्मल और शांत चेतना उभर कर आती है—जिसे तिब्बती परंपरा में 'रिग्पा' (शुद्ध जागरूकता) कहा जाता है।
इस साधना का असली महत्व क्या है?---
मृत्यु के भय से मुक्ति:-- जो लोग ध्यान के दौरान अपने मन के भीतर के इस शून्य और शांति से परिचित हो जाते हैं, वे मृत्यु के समय आने वाली अज्ञात अवस्था से घबराते नहीं हैं। वे पहचान लेते हैं कि वह शून्य कोई विनाश नहीं, बल्कि चेतना का मूल घर है।
अहंकार से मुक्ति:-- यह अभ्यास हमें सिखाता है कि हम अपने विचारों या भावनाओं से कहीं अधिक गहरे और विशाल हैं।
यदि हम अपने जीवन में रोजाना कुछ पल निकालकर इस ध्यान-रूपी बारडो में उतरना सीख जाएं, तो हमारे जीवन के सारे तनाव, चिंताएं और आंतरिक भय स्वतः शांत होने लगते हैं।
क्या आपने कभी अपने भीतर के इस खामोश अंतराल को महसूस किया है?
बारडो (Tibetan: བར་དོ།) एक तिब्बती बौद्ध धर्म की अवधारणा है, जिसका शाब्दिक अर्थ है "मध्यवर्ती अवस्था" या "अंतर-स्थान" । यह मुख्य रूप से उस संक्रमण काल या अंतराल को संदर्भित करता है जो मृत्यु और पुनर्जन्म के बीच आता है।
तिब्बती बौद्ध परंपरा (विशेषकर तिब्बती मॄतक पुस्तक या बारडो थोडोल के अनुसार) में यह माना जाता है कि चेतना (आत्मा) तुरंत नया शरीर नहीं पाती, बल्कि इस मध्यवर्ती काल से गुजरती है।
तिब्बती परंपरा में जीवन और मृत्यु को एक सतत चक्र के रूप में देखा जाता है, जिसे छह बारडो में बांटा गया है:
1. जीवन का बारडो (स्क्ये-नाग बारडो):--जन्म से लेकर मृत्यु तक की संपूर्ण जीवन अवधि।
2. स्वप्न का बारडो (ग्लिम-लाम बारडो):-- सोते समय अनुभव होने वाली सपनों की दुनिया।
3. ध्यान का बारडो (सैम-टेर बारडो):-- गहन ध्यान (मेडिटेशन) के दौरान मन की स्थिति।
4. मृत्यु की पीड़ा का बारडो (ची-ཁ་ बारडो):-- ठीक मृत्यु के समय होने वाला शारीरिक और मानसिक विघटन।
5. धर्मता की वास्तविकता का बारडो (च्यो-न्यिद बारडो):-- मृत्यु के तुरंत बाद शुद्ध प्रकाश और चेतना की अद्भुत अवस्था, जहाँ विभिन्न दिव्य और उग्र रूप प्रकट होते हैं।
6. भव या पुनर्जन्म का बारडो (सिद-पा बारडो):-- नए जन्म या गर्भधारण की तलाश की अवस्था, जहाँ कर्म के अनुसार अगला शरीर मिलता है।
मुक्ति का अवसर:-- तिब्बती ग्रंथों के अनुसार, बारडो की अवस्था बहुत शक्तिशाली होती है। यदि कोई व्यक्ति जीवन भर साधना, ध्यान और अच्छे कर्म करता है, तो वह 'धर्मता के बारडो' में आने वाले तीव्र दिव्य प्रकाश को पहचान कर संसार चक्र (निर्वाण) से मुक्ति प्राप्त कर सकता है।
भ्रम का निवारण:- जो लोग आध्यात्मिक रूप से तैयार नहीं होते, वे बारडो में भय और भ्रम का अनुभव करते हैं। उनके अचेतन मन और कर्मों के अनुसार उन्हें विभिन्न दृष्टियाँ दिखाई देती हैं।
बारडो थोडोल (तिब्बती मॄतक पुस्तक):-- तिब्बत में किसी व्यक्ति की मृत्यु के बाद लामा (धार्मिक गुरु) उसके शरीर के पास बैठकर बारडो थोडोल का पाठ करते हैं, ताकि मृत व्यक्ति की चेतना को शांत किया जा सके और उसे सही मार्ग का बोध कराया जा सके।(जैसे हिंदुओं में मृत्यु से पूर्व गीता पाठ सुनाने की परंपरा है)
, बारडो केवल मृत्यु के बाद की स्थिति नहीं है, बल्कि यह जीवन, स्वप्न और हर उस पल का प्रतीक है जहाँ एक अवस्था समाप्त होती है और दूसरी शुरू होती है
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