Friday, 10 July 2026

भाषा का तिरस्कार

मैं जब-जब भाषा के उच्चतम मानक से गिरा हूँ तब-तब ग्लानिबोध से भरा हूँ क्योंकि दुःख के दिनों में मैंने नहीं चुना नस काटना या देह पर केरोसिन डालना। मैंने वरण किया “लिखना” और विषाद में मैंने ब्रह्म की भांति शब्दों को बरता है।

भाषा ने बचा लिया मेरा अस्तित्व उन दुर्दिन दिनों में जब कोई नहीं था मेरे साथ उस समय भाषा मेरे साथ थी।
सस्ती लोकप्रियता के मोह में उतर जाता हूँ कभी-कभी भदेस पर लेकिन जब भी एकांत में करता हूँ आत्मावलोकन तो ग्लानि व क्षोभ से भर उठता हूँ।

दुःख के दिनों में मेरी भाषा सजीव हो उठी थी और अब सस्ती लफ्फाजियों में कहीं खो सी गई है। सस्ती व फूहड़ चुटकुलेबाजी आपको थोड़ी देर खुश तो कर सकती है लेकिन असल आनन्द, सुख व तोष का अनुभव तो आपको भाषा के परिष्कृत, संस्कारित, प्रांजल व उच्चतम मानदंडों का पालन करके ही मिलता है।

खैर! सच तो ये है कि भाषा का तिरस्कार एक तरह से ईश्वर का तिरस्कार है क्योंकि ईश्वर की भांति भाषा आपको दुःखों से उबार लेती है, एक सहारा देती है और पीठ थपथपाती है।

#आत्मचिंतन

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