Thursday, 17 September 2026

मनुस्मृति 2

कुपुत्रों के कंधे और मनुस्मृति की पालकी

मनुष्य की स्मृति केवल देखे और सुने से नहीं बनती. इतिहास उसमें एक महत्वपूर्ण तत्व बनकर शामिल रहता है. इसी इतिहास और सांस्कृतिक परंपरा से व्यक्ति अपने श्रेष्ठ को समझता है, गर्व को पहचानता है, शक्ति का अनुमान लेता है, पराजयों से सबक लेता है और मलिनताओं को स्वीकारता है. लेकिन कल्पना कीजिए कि हम स्मृतिबोध का चश्मा किसी और को सौंपकर ख़ुद आंखें मूंदें रहें और उसकी सुविधा के समायोजन को ही सत्य मानकर स्वीकार कर बैठें? इससे बड़ी आत्महंता अवस्था क्या हो सकती है. क्योंकि किराए की आंखों से दूसरे की सुविधा दिखती है, अपनी सच्चाई नहीं. भारतीय धर्म-परंपरा, जातिगत राजनीति और संविधान को एकसाथ प्रभावित करनेवाली इसी सच्चाई का नाम है मनुस्मृति.

मनुस्मृति पर जितना शोर है, उतना शोध नहीं है. जितने मत हैं, उतने तथ्य नहीं हैं. जितने फैसले हैं, उतने प्रमाण नहीं हैं. कोई उसे सामाजिक विषमता की जड़ कहता है. कोई हिंदू सभ्यता का आधारग्रंथ. कोई उसे जलाने की बात करता है. कोई उसे बचाने की. लेकिन इस पूरे शोर में एक सवाल है, जो मुझे बेचैन करता है. वह है. हम जिस मनुस्मृति पर बहस कर रहे हैं, क्या वह सचमुच वही मनुस्मृति है, जिसे कभी मनु ने लिखा था? यही सवाल मेरी बेचैनी की वजह है.

मैं यह सिद्ध करने नहीं बैठा हूँ कि मनुस्मृति सही है या गलत. मैं केवल इतना जानना चाहता हूँ कि अगर आज हमारे हाथ में जो मनुस्मृति है, वही मूल मनुस्मृति है, तो उसके भीतर इतने गहरे अंतर्विरोध क्यों हैं? और अगर वह मूल नहीं है… अगर सचमुच उसके साथ छेड़छाड़ हुई… अगर उसमें क्षेपक जोड़े गए तो फिर आजादी के लगभग अस्सी वर्ष बाद भी हम उसी कथित दूषित पाठ का बोझ क्यों ढो रहे हैं? उसकी प्रामाणिकता पर हमारी इस चुप्पी का मतलब क्या है? 

धर्मध्वजाधारियों और धर्माचार्यों को यह बताना होगा कि इस किताब का कौन-सा पाठ प्राचीन और प्रामाणिक है…कौन-सा संदिग्ध. यह नहीं हो सकता कि एक ही सांस में हम कहें- मनुस्मृति पवित्र भी है… और उसी सांस में यह भी कहें- उसमें अंग्रेजों ने मिलावट भी कर दी थी. इन दोनों बातों के बीच की दूरी केवल नारे नहीं भर सकते. उसके लिए अनुसंधान चाहिए. पांडुलिपियों का तुलनात्मक अध्ययन चाहिए. विद्वानों का धैर्य चाहिए. धर्माचार्यों का साहस चाहिए. और सबसे बढ़कर चाहिए- सत्य को स्वीकार करने का साहस. मुझे लगता है, पिछले सौ वर्षों में हमने मनुस्मृति पर जितनी राजनीति की, उस श्रम का दसवां हिस्सा भी उसकी प्रामाणिकता पर नहीं लगाया. हमने उसके पक्ष में भाषण दिए. उसके विरोध में आंदोलन किए. लेकिन यह जानने की बेचैनी बहुत कम दिखाई कि असल मनुस्मृति कौन-सी है?

अगर भारतीय परंपरा के सबसे सुंदर सूत्र- वाक्यों में से किसी एक को चुनना हो, तो मेरी पहली पसंद होगी-

यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः.
यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफलाः क्रियाः॥
(मनुस्मृति, अध्याय 3, श्लोक 56)

यानी- जहां स्त्री का सम्मान होता है, वहीं देवताओं का वास होता है. जहां स्त्री का सम्मान नहीं होता, वहां सारे शुभ कर्म निष्फल हो जाते हैं.

बहुत कम लोगों को पता है कि यह श्लोक मनुस्मृति का ही है. हर बार इसे पढ़ता हूँ तो मन श्रद्धा से भर जाता है. लेकिन हर बार एक सवाल भी जन्म लेता है. जो ग्रंथ स्त्री के सम्मान को देवत्व की शर्त बना सकता है… वही यह कैसे कह सकता है कि स्त्री जीवन भर पिता, पति या पुत्र के संरक्षण में रहे? और वही यह कैसे कह सकता है-

स्वभाव एष नारीणां नराणामिह दूषणम्.
अतोऽर्थान्न प्रमाद्यन्ति प्रमदासु विपश्चितः॥

मतलब- स्त्री का स्वभाव ही पुरुष को दूषित करने वाला है (मनुस्मृति, अध्याय 2, श्लोक 213 — कुछ संस्करणों में क्रम भिन्न मिलता है).

यहीं मैं ठहर जाता हूँ. इतना बड़ा अंतर्विरोध सहज नहीं लगता. या तो मैं मनुस्मृति को ठीक से नहीं समझ पाया हूँ. या फिर मनुस्मृति की कहानी, मनुस्मृति से कहीं अधिक जटिल है. लेकिन विरोधाभास यहीं समाप्त नहीं होता. जाति के प्रश्न पर भी मनुस्मृति ऐसे ही कठिन सवाल खड़े करती है.

सहासनमभिप्रेप्सुरुत्कृष्टस्यापकृष्टजः.
कट्यां कृताङ्को निर्वास्यः स्फिचं वाऽस्यावकर्तयेत्॥
(मनुस्मृति, अध्याय 8, श्लोक 280 — कुछ संस्करणों में 281)

यानी- यदि निम्न वर्ण का व्यक्ति उच्च वर्ण के साथ समान आसन पर बैठने का प्रयास करे, तो उसे दंडित किया जाए. उसके नितंब काट दिए जाए. एक दूसरा
श्लोक कहता है-

शक्तेनापि हि शूद्रेण न कार्यो धनसञ्चयः.
शूद्रो हि धनमासाद्य ब्राह्मणानेव बाधते॥
(मनुस्मृति, अध्याय 10, श्लोक 126 — कुछ संस्करणों में 129)

मतलब - शूद्र को धन संचय नहीं करना चाहिए, क्योंकि उसके धनवान होने से ब्राह्मणों को कष्ट पहुंचता है.

राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने 
इन्हीं श्लोकों को सदन में उद्धृत किया जिस पर हंगामा हुआ. सत्ता पक्ष को कहना पड़ा यह मनुस्मृति का है ही नहीं, जबकि जबाब यह होना चाहिए था कि भले यह लाईने मनुस्मृति में हो, हम इन श्लोकों का समर्थन नहीं करते, कोई भी सभ्य समाज इसके पक्ष में खड़ा नहीं हो सकता. हम इसकी निंदा करते हैं.

“एकजातिर्द्विजातींस्तु वाचा दारुणया क्षिपन्।
जिह्वायाः प्राप्नुयाच्छेदं जघन्यप्रभवो हि सः॥
(मनुस्मृति, अध्याय 8, श्लोक 269 — कुछ संस्करणों में 270)

शुद्र यदि द्विजातियों- ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य- को गाली देता है, तो उसकी जीभ काट देनी चाहिए, क्योंकि नीच वर्ण का होने से वह इसी दण्ड का अधिकारी है.

एक और श्लोक देखिए-

नामजातिग्रहं त्वेषां अभिद्रोहेण कुर्वतः।
निक्षेप्योऽयोमयः शङ्कुर्ज्वलन्नास्ये दशाङ्गुलः॥
(मनुस्मृति, अध्याय 8, श्लोक 270 — कुछ संस्करणों में 271)

यानी- शूद्र द्वारा अहंकारवश उपेक्षा से द्विजातियों- ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य- के नाम और जाति का उच्चारण करने पर उसके मुंह पर दस अंगुल लम्बी लोहे की जलती कील ठोंक देनी चाहिए.

धर्मोपदेशं दर्पेण विप्राणामस्य कुर्वतः ।
तप्तमासेचयेत् तैलं वक्त्रे श्रोत्रे च पार्थिवः ॥
(मनुस्मृति, अध्याय 8, श्लोक 271 — कुछ संस्करणों में 272)

मतलब - शूद्र दारा अहंकारवश ब्राह्मणों को धर्मोपदेश देने का दुस्साहस करने पर राजा को उसके मुँह और कान में गरम तेल डलवा देना चाहिए.

अगर आज कोई व्यक्ति सार्वजनिक मंच से ऐसी बातें कहे, तो समाज भी उसका विरोध करेगा और भारतीय संविधान भी. इसलिए इन विचारों का आधुनिक भारत में कोई नैतिक बचाव संभव नहीं है. लेकिन यहीं सबसे बड़ा प्रश्न खड़ा होता है. अगर ये श्लोक मूल हैं, तो उनका सामना कीजिए. लेकिन अगर ये मूल नहीं हैं… अगर ये वही क्षेपक हैं, जिनका वर्षों से दावा किया जाता रहा है… तो फिर ये आज भी हर संस्करण में यह क्यों छप रहे हैं? आखिर ये विवादित श्लोक हमारे घरों तक पहुंचे कैसे? और अगर पहुंच गए… तो हमने उन्हें अगली पीढ़ी तक पहुंचने क्यों दिया?

मनुस्मृति को लेकर सबसे अधिक चर्चा उसके विवादित श्लोकों की होती है. लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि यही ग्रंथ धर्म के दस लक्षण भी बताता है—

धृतिः क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः.
धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम्॥
(मनुस्मृति, अध्याय 6, श्लोक 92)

धैर्य, क्षमा, संयम, चोरी न करना, शुचिता, इंद्रियों पर नियंत्रण, बुद्धि, विद्या, सत्य और अक्रोध— यही धर्म के दस लक्षण हैं.

मनु स्मृति पर हमेशा यह आरोप भी लगता है कि इसने समाज के निचले तबके के प्रति न्याय नहीं किया. केवल उनके शोषण की बात कही. कहीं-कही यह सच भी लगती है. स्मृति को पूरा पढ़ें तो कहीं ब्राह्मणो के प्रति भी तल्खी दिखेगी. स्मृति ब्राह्मण कर्म को लेकर ज़्यादा सजग और सचेत दिखती है. जैसे ब्राह्मण होने की जो शर्त मनुस्मृति बताती है वह वेदपाठी होना चाहिए और उसे शिक्षा का व्यापार नहीं करना चाहिए. स्मृति इस बात पर पूरा जोर देती है.इस व्यवस्था में कोई व्यक्ति सिर्फ़ इसलिए ब्राह्मण नहीं है क्योंकि वह ब्राह्मण कुल में पैदा हुआ है. हर व्यक्ति को ब्राह्मण होने के प्रतिमानों को व्यक्तिगत रूप में पूरा करना पड़ता है यहाँ जन्मना ब्राह्मण के लिए कोई स्थान नहीं है,ब्राह्मण अर्थात् योग्यता. ब्राह्मण वर्ग की पक्षधरता को लेकर तुलसीदास पर जो आरोप लगाएं जाते हैं वह मनुस्मृति के संदर्भ में सच नहीं प्रतीत होते. तुलसीदास सील गुन हीन विप्र को भी पूज्य कहते हैं लेकिन मनुस्मृति इसका विरोध करती है. 

यह पढ़कर मनुस्मृति से शिकायत नहीं होती. सम्मान बढ़ता है. लेकिन सम्मान के साथ फिर प्रश्न भी खड़ा हो जाता है. जो ग्रंथ अक्रोध को धर्म का लक्षण कहता है. वही ग्रंथ स्त्री और शूद्र के बारे में इतने घटिया वाक्य कैसे कह सकता है? अगर दोनों मूल हैं… तो विरोधाभास क्यों? और अगर दोनों मूल नहीं हैं…तो फिर असली मनुस्मृति कौन-सी है? यानी कुछ तो गड़बड़ है! जिस पर विद्वान सदियों से चुप हैं.

पूरा मामला समझने के लिए हमे पीछे जाना होगा. अपने दादा के भी परदादा के समय में. यही कोई ढाई सौ साल पहले. भारत पर अंग्रेजी सत्ता अपनी जड़ें जमा चुकी थी. प्लासी का युद्ध हो चुका था. ‘ईस्ट इंडिया कंपनी’ अब व्यापारी कम, शासक ज्यादा थी. लेकिन भारत पर शासन करना आसान था, भारत को समझना मुश्किल. एक ऐसा देश, जहां हर कुछ किलोमीटर पर भाषा बदल जाती थी. रीति बदल जाती थी. रिवाज बदल जाते थे. कई बार न्याय की परंपरा भी बदलती थी. अंग्रेज जल्दी समझ गए कि भारत को जीतना ही पर्याप्त नहीं है. भारत को पढ़ना भी पड़ेगा. यहीं से मनुस्मृति की कहानी नया मोड़ लेती है.

वर्ष 1772 में गवर्नर जनरल वॉरेन हेस्टिंग्स ने फैसला किया कि मुसलमानों के निजी मामलों में इस्लामी कानून लागू होगा और हिंदुओं के मामलों का निर्णय उनके धर्मशास्त्रों के आधार पर किया जाएगा. सुनने में यह व्यवस्था न्यायपूर्ण लगती है. लेकिन यहीं सबसे बडा प्रश्न फिर खड़ा हुआ. हिंदुओं का धर्मशास्त्र कौन-सा? भारत में तो एक नहीं, अनेक स्मृतियां थीं. याज्ञवल्क्य स्मृति. नारद स्मृति. बृहस्पति स्मृति. स्थानीय परंपराएं थीं. लोकाचार था. न्याय के पारंपरिक नियम थे. पारंपरिक उदाहरण भी थे. सामंतों के अपने नियम थे. जाति आधारित नियम और तरीके थे. धर्म और परंपरा के नाम पर कई अघोषित विधान थे. यहां तक कि ग्राम पंचायतों की अपनी व्यवस्था थी.

समस्या थी किस किताब को चुने. भारतीय समाज किसी एक पुस्तक से नहीं चलता था. जैसे हिंदू धर्म, ईसाइयत और इस्लाम की तरह किसी एक किताब से नहीं चलता. लेकिन औपनिवेशिक शासन को भारत की जटिलता नहीं, प्रशासन की सरलता चाहिए थी. उसे एक ऐसा ग्रंथ चाहिए था, जिसे सामने रखकर कहा जा सके- यही है हिंदू कानून. यहीं से मनुस्मृति अंग्रेजी शासन के लिए असाधारण महत्व की हो गई. अंग्रेजों ने मनुस्मृति को बंदरिया के मरे बच्चे की तरह सीने से चिपका लिया.

मनुस्मृति संस्कृत की पहली किताबों में से एक है, जिसका यूरोपीय अनुवादकों ने अध्ययन और अनुवाद किया. अंग्रेज़ी में इसका पहला अनुवाद सर विलियम जोंस ने 1776 में किया. Institutes of Hindu Law, के नाम से यह किताब 1794 में छपी. हलॉंकि भारत में पहला छापा खाना 1556 में ओल्ड गोवा के सेंट पॉल कॉलेज में पुर्तगाली लोगों ने स्थापित किया था. जहॉं भारत में पहली अंग्रेजी किताब 1794 में छपी 'The Travels of Dean Mahomet' . जबकि हिंदी में पहली किताब 1810 में छपी. यह लल्लू लाल जी की ‘प्रेम सागर’ थी.

वर्तमान मनुस्मृति के जो पाठ मिलते हैं उसका मूल संपादन विलियम जोंस ने ही किया था. बाद में लुई जैकोलॉयट ने “लॉ ऑफ मनु” नाम से मनु स्मृति का अनुवाद, 1867 से 1876 के बीच किया. अंग्रेज़ सरकार ने इस किताब का इस्तेमाल हिन्दू कोड तैयार करने में किया. 1886 में जर्मन विद्वान मैक्स मुलर ने मनुस्मृति को अपनी कृति ‘edited volume Sacred Books of the East’ में शामिल करने से पहले इसका फ्रेंच, जर्मन, पुर्तगाली और रूसी भाषा में अनुवाद किया.

मनुस्मृति या मानव धर्मशास्त्र. इसे मनु के नियम के नाम से भी जानते है. इसकी रचना कब हुई इसका निर्धारण कठिन है. मनुस्मृति में कुल 12 अध्याय तथा 2694 श्लोक हैं. इतना विशाल ग्रन्थ की एक दिन या एक वर्ष में तो लिखा नहीं जा सकता. माना जाता है कि इसे दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व और दूसरी शताब्दी ईसवी के बीच लिखा गया. मनुस्मृति श्लोक छंद में लिखी गयी. इसमें 16-16 शब्दों की दो अव्यक्त पंक्तियाँ हैं. वेदों को कानों से सुनने और मस्तिष्क में गुनने के बाद जब यह विचार ताड़पत्रों पर उतरे तो स्मृति कहलाए. अब तक तक़रीबन बीस प्रामाणिक स्मृतियाँ हैं जिनमें सबसे चर्चित मनु स्मृति है.

मनुस्मृति के पहले भाष्यकार मेधातिथि हैं. इनका समय लगभग 825-900 ई. के बीच माना जाता है. उन्होंने 'मनुमहाभाष्य' नाम की टीका लिखी. मेधातिथि का मानना है कि मनुस्मृति के श्लोकों का संकलन ई.पूर्व चौथी अथवा पांचवीं शताब्दी में किया गया होगा. मनुस्मृति पर एक अन्य टीकाकार कुल्लुक भट्ट (1200 ई.) ने भी टीका लिखी. उन्होंने मनुस्मृति का रचना काल चौथी सदी ईसा पूर्व माना. मनु ने यवन, शक, कम्बोज, गान्धार, पदलव आदि का वर्णन किया है. इसलिए वे ई. पू. तीसरी सदी से बहुत पहले के नहीं हो सकते. इतिहासकार काशी प्रसाद जायसवाल भी मनुस्मृति की रचना पुष्यमित्र शुंग और उसके उत्तराधिकारियों के शासन काल में ही मानते हैं.

मनुस्मृति के प्राचीन पाठ में चार प्रमुख हिस्से हैं. एक- दुनिया की रचना. दो- धर्म के स्रोत. तीन-चार सामाजिक वर्गों का धर्म. और चौथा-कर्म, पुनर्जन्म और अंतिम मुक्ति का नियम. तीसरा खंड सबसे लंबा और सबसे महत्वपूर्ण है. जिसमें वर्ण व्यवस्था के सिलसिले को बनाए रखते हर जाति को उसके नियम बताए गए हैं. ब्राह्मण को मानव जाति का उच्च प्रतिनिधि और शूद्र को नीच बताते उसे 'उच्च' जातियों की सेवा करने का एकमात्र कर्तव्य दिया गया है. कुछ छंदों में महिलाओं के जन्म के आधार पर उनके खिलाफ घटिया और बेहद अपमानजनक भावनाएँ हैं.

भारतीय राजदर्शन में मनु के सप्तांग राज्य सिद्धांत सबसे चर्चित है. इसके मुताबिक, राज्य एक शरीर की तरह है, जिसके सात अंग हैं. ये सभी राज्य- रूपी शरीर की प्रकृतियां है जिनके बिना राज्य संचालन की कल्पना करना कठिन है. मनुस्मृति के अध्याय 9 के श्लोक 294 में राज्य के सात अंग गिनाए गए हैं.  जैसे- स्वामी यानी राजा, (2) मंत्री, (3) पुर (दुर्ग), (4) राष्ट्र, (5) कोष, (6) दंड और (7) मित्र. इन सात अंगों से बने राज्य का प्रत्येक अंग एक विशिष्ट कार्य करता है और इसी कारण उसका महत्व है. मनु के अनुसार यदि इनमें से किसी भी एक हिस्से की उपेक्षा होती है तो राजा के लिए राज्य का कुशल संचालन संभव नहीं है. मनुस्मृति के पहले अध्याय में सृष्टि की उत्पत्ति और प्रलय के बारे में लिखा गया है. दूसरा अध्याय- आर्यावर्त की सीमा, जलवायु, सोलह संस्कार के बारे में बताता है. तीसरा अध्याय- गृहस्थ आश्रम में प्रवेश, आठ तरह के विवाह , कन्या की पात्रता, श्राद्ध आदि के बारे में है.

चौथा अध्याय- गृहस्थ के लिए नियम, दान की पात्रता तय करता है. पांचवें अध्याय में मांस सेवन के दोष, बारह शुद्धिकारक, ईमानदारी, स्त्री-पुरुष संबंध के क़ायदे कानून है. छठें अध्याय में वानप्रस्थ के नियमों के बारे में बताया गया है. सातवां अध्याय में राजा के धर्म, दंड, मंत्रियों के परामर्श आदि की जानकारी दी गई है. आठवां अध्याय- राजा के विवाद निपटाने के तरीकों के बारे में लिखा गया है. नवां अध्याय- स्त्री पुरुष के कर्तव्य, अधिकार, पित्ता का उत्तराधिकारी होने के बारे में बताता है. दसवें अध्याय में चारों वर्णों के कर्तव्य वर्णित हैं. ग्यारहवें अध्याय में गोवध, मांस सेवन और अन्य पापों के बारे में लिखा गया है. बारहवां अध्याय स्वर्गलाभ, नरक प्राप्ति के उपाय बताता है.

ब्रिटिश भारत में औपनिवेशिक अफ़सरों के लिए इस किताब का अनुवाद एक व्यवहारिक मकसद था. हिंदुओं के इस धर्मशास्त्र को अंग्रेज 'कानून' के रूप में देखते थे पर भारत में इसका इस्तेमाल उस तरह से नहीं होता था. बरतानियों को लगा कि जिस तरह मुस्लिमों के पास क़ानून की किताब के रूप में शरिया है, उसी तरह हिंदुओं के पास भी मनुस्मृति है. इसकी वजह से उन्होंने इस किताब के आधार पर मुक़दमों की सुनवाई शुरू कर दी. इसके साथ ही काशी के पंडितों ने भी अंग्रेज़ों से कहा कि वे मनुस्मृति को हिंदुओं का सूत्रग्रंथ बताकर प्रचार करें. इसकी वजह से ये धारणा बनी की मनुस्मृति हिंदुओं का मानक धर्मग्रंथ है.

दलितों और महिलाओं पर मनुस्मृति में जो कुछ कहा गया है, वह अपमानजनक है. अस्वीकार्य है. सनातन का झंडा उठाए लोगों को कम से कम इसकी निंदा तो करनी ही  चाहिए. मनुस्मृति ने वर्णाश्रम व्यवस्था को मज़बूत किया. उसके पक्षपाती नियम बनाए. जिसका सुधारवादी तो विरोध करते हैं पर हर मानवतावादी को इसका विरोध करना चाहिए. जो मनुस्मृति का समर्थन करते हैं, वो मानते हैं कि सृष्टि की रचना ब्रह्मा ने की थी और दुनिया का कानून मनु और भृगु की परंपरा से आया है. इसके बहुत से हिस्सों में समाज के कल्याण की बातें कही गई हैं. दलितों और महिलाओं के बारे में जो विवादित अंश हैं, वो शायद बाद में जोड़े गए हैं. क्षेपक हैं. ये मूल किताब में नहीं हैं. मनुस्मृति को विस्तार से पढ़ें तो समझ भी आता है कि इसमें सारा कुछ कूड़ा नहीं है. कुछ अच्छी और नीतिगत बातें भी हैं पर उन्हें घटिया और जातीय विभाजन वाली बातें ढक लेती हैं.

मनुस्मृति का अनुवाद ब्रिटिश सरकार ने जिस मकसद से किया, उसका जहरीला असर मौजूदा समाज-जीवन में देखा जा सकता है. विलियम जोंस ने मनुस्मृति में षडयंत्रपूर्वक मनमानी मिलावट की. यही ग्रंथ बाद में भारत में छपी अलग-अलग मनुस्मृति का आधार बना. मार्च 1783 में ब्रिटिश सरकार ने जोंस को बंगाल सुप्रीम कोर्ट में जज बनाकर भेजा था. थोड़े ही दिनों बाद उन्हें ‘सर’ की उपाधि मिली. 15 जनवरी 1784 को गवर्नर जनरल वारेन हेस्टिंग्स ने “एशियाटिक सोसाइटी ऑफ़ बंगाल” की स्थापना कर उन्हें अध्यक्ष नामित किया. बस इसी के बाद उन्होंने भारतीय धर्मशास्त्र की अलग-अलग पांडुलिपियों को मँगाकर उनमें मिलावट का कारोबार शुरू किया. एक अनुमान के मुताबिक उन्हें मनुस्मृति के 50 से ज्यादा पाठ बंगाल के पंडितों ने सौंपे. पैसे और वजीफों के लालच में. हो सकता है कि ये मिलावट संकुचित जातीय दृष्टि और जातीय स्वार्थों से प्रेरित भी रही हों. विलियम जोंस का निधन 27 अप्रैल 1794 को हुआ. इसी साल उन्होंने संपादित मनुस्मृति का दूसरा अंग्रेजी संस्करण “इंस्टीट्यूट आफ हिंदू लॉ” प्रकाशित करा दिया. यह वह कालखंड था जब अंग्रेज सत्ता मनुस्मृति को खोज-खोज कर उसे छपवाने में सबसे ज्यादा बेताब थी.

20 अक्टूबर 1791 को वारेन हेस्टिंग्स को लिखी एक चिट्ठी में विलियम जोंस लिखते हैं, “यहां पंडितों के साथ मैं उनकी देववाणी संस्कृत सीख रहा हूँ. अब मैं संस्कृत में धाराप्रवाह बातचीत कर लेता हूँ. कोर्ट के काम के अलावा मैं मनुस्मृति के अनुवाद में जुटा हूँ. मेरी ही देखरेख में ग्रंथ संपादित हो रहा है”. उधर बंगाल के पंडित इसी बात पर बम-बम थे कि अंग्रेज संस्कृत बोल रहा है. उन्हें वज़ीफ़ा मिल रहा है. सरकारी सम्मान मिल रहा है. पर इस क़ीमत पर क्या बोया जा रहा है इसकी उन्हें परवाह नहीं थी. वह चमत्कृत थे. जोंस के संस्कृत शिक्षक कोई पंडित रामलोचन थे.

मित्रवर प्रो. राकेश उपाध्याय का इस विषय में अध्ययन है,वे कहते हैं, “दरअसल ब्रिटिश सुप्रीम कोर्ट के जजों का बंगाली पंडितों से बहुत से न्यायिक विषयों में वाद-विवाद हो जाता था. जजों का आरोप था कि पंडित लोग मनमाने तरीके से व्याख्या कर रहे हैं. हर पंडित के पास अपनी अलग-अलग विधि संहिता है, जहां वह कई तरह से विधि की व्याख्या करता है. इसलिए एक कॉमन संहिता जरूरी हो गई. उन्होंने उस समय के बड़े बंगाली विद्वानों की सूची तैयार की. सबके पास जो भी विधि संहिता की मूल पांडुलिपियां थीं, उन्होंने मुँह-मांगे दाम पर इकट्ठा करना शुरू कर दिया. ग्यारह बंगाली पंडितों की समिति गठित की गई. उस समिति को देशभर से जुटाई गई पोथियां दी गई. इसमें अनेक पाठ, मत-मतांतर शामिल थे.” यहीं से भारतीय समाज में विभाजन के बीज रोप दिए गए.

यूरोप ने पहली बार भारत को काफी हद तक मनुस्मृति की नजर से पढ़ना शुरू किया. यहीं से बहस शुरू होती है. इतिहास का एक पक्ष कहता है कि अंग्रेजों ने मनुस्मृति में कोई परिवर्तन नहीं किया. उन्होंने केवल उसे पूरे हिंदू समाज की प्रतिनिधि विधि-संहिता घोषित कर दिया, जबकि वास्तविक भारत उससे कहीं अधिक विविध था. पर एक दूसरा पक्ष इससे आगे जाता है. वह कहता है कि अंग्रेजों ने केवल मनुस्मृति का उपयोग नहीं किया. उन्होंने उसका उपयोग हथियार की तरह किया. स्त्री और जाति से जुड़े विवादित श्लोकों को आगे बढ़ाया. कुछ अंशों में क्षेपक जोड़े गए. कुछ को बढ़ा-चढ़ाकर प्रचारित किया गया. उद्देश्य था- भारतीय समाज की दरारों को और चौड़ा करना. यहीं सबसे अधिक सावधान होना पड़ता है. क्योंकि इतिहास यहां अंतिम निर्णय नहीं देता. इस दावे पर विद्वानों में मतभेद हैं. निर्णायक प्रमाण आज भी विवाद का विषय हैं. इसलिए इसे अंतिम सत्य नहीं कहा जा सकता.

लेकिन… क्षण भर के लिए मान भी लें कि यह मत सही है. मान लें कि मनुस्मृति के साथ सचमुच छेड़छाड़ हुई. मान लें कि उसमें क्षेपक जोड़े गए. मान लें कि स्त्रियों और शूद्रों के बारे में लिखे गए कुछ विवादित श्लोक बाद की मिलावट हैं. तो फिर सबसे बड़ा प्रश्न अंग्रेजों से नहीं, हमसे है. अंग्रेजों ने वही किया होगा, जो हर औपनिवेशिक सत्ता अपने हित में करती है. लेकिन हमने क्या किया? आजादी को लगभग अस्सी वर्ष हो चुके हैं. अगर यह हमारी मूल मनुस्मृति नहीं है… अगर इसमें मिलावट हुई… अगर इसमें स्त्री और जाति के खिलाफ लिखे गए विवादित श्लोक बाद में जोड़े गए… तो वे आज भी हर संस्करण में यह क्यों छप रहे हैं? और सारे धर्माचार्य, शंकराचार्य इस मनुस्मृति को अंतिम सत्य मान इसके पक्ष में क्यों खड़े हैं?

किसी प्रकाशक ने उनके नीचे यह लिखने की जरूरत क्यों नहीं समझी कि उनकी प्रामाणिकता विवादित है? किसी धर्माचार्य ने यह मांग क्यों नहीं उठाई कि देशभर की पांडुलिपियों का मिलान कर एक प्रमाणिक पाठ तैयार किया जाए? किसी कुलपति ने इसे राष्ट्रीय बौद्धिक परियोजना क्यों नहीं बनाया? हम हर बार अंग्रेजों को कठघरे में खड़ा करते हैं. लेकिन अपने मौन का हिसाब कौन देगा? आज हिन्दुत्व के जो झंडाबरदार चिल्ला-चिल्ला कर कह रहे हैं. यह ‘क्षेपक’ हैं. वह पिछले ढाई सौ साल से कहां थे. उनकी मरघटी चुप्पी ने इस विवादित मनुस्मृति को वैधता दे दी.

मुझे अंग्रेजों से शिकायत कम है. वे शासक थे. उन्होंने अपने साम्राज्य के हित में काम किया. शिकायत अगर किसी से है… तो हमसे है. अगर मनुस्मृति सचमुच मिलावट का शिकार हुई थी, तो सबसे बड़ी विफलता अंग्रेजों की नहीं थी. सबसे बड़ी विफलता हमारी थी. क्योंकि साजिश उन्होंने की होगी… लेकिन उसे पीढ़ी-दर-पीढ़ी हमने ढोया. यही वह प्रश्न है, जिससे बचना सबसे कठिन है. और शायद यहीं से मनुस्मृति की बहस इतिहास से निकलकर हमारे बौद्धिक चरित्र की बहस बन जाती है.

सिर्फ स्वामी दयानंद ने मनुस्मृति की मिलावट को चुनौती दी थी. 1875 से 80 के बीच अपने प्रवचनों में स्वामी जी ने उसके महिला, दलित विरोधी अंशों पर सवाल उठाते हुए इसे मूल मनुस्मृति का हिस्सा नहीं बताया था. बाद में उनके शिष्यों ने शोध करके 2685 श्लोकों में से 1471 को मिलावटी बताया. जिन्हें नकली कहा गया. वे मनुस्मृति का हिस्सा नहीं थे. यहीं महात्मा ज्योतिबा फुले और डॉ. भीमराव आंबेडकर का उल्लेख अनिवार्य हो जाता है. मैं यह नहीं कह रहा कि उनसे पहले किसी ने मनुस्मृति पर प्रश्न नहीं उठाए. भारतीय परंपरा में असहमति कोई नई बात नहीं थी. बुद्ध ने प्रश्न पूछे. महावीर ने प्रश्न पूछे. चार्वाक ने प्रश्न पूछे. कबीर ने पूछे. रविदास ने पूछे. गुरु नानक ने पूछे. लेकिन मनुस्मृति पहली बार एक बड़े सामाजिक और राजनीतिक प्रश्न के रूप में उन्नीसवीं शताब्दी में महात्मा ज्योतिबा फुले के साथ और फिर बीसवीं शताब्दी में डॉ. भीमराव आंबेडकर के साथ राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में आती दिखाई देती है. यह प्रश्न अभी भी विचारणीय है. डॉ. आंबेडकर ने सिर्फ प्रश्न ही नहीं पूछे. उन्होंने समारोह पूर्वक मनुस्मृति को जलाया भी.

क्या इसलिए कि अंग्रेजों ने उसे “हिंदू लॉ” का प्रतिनिधि ग्रंथ बनाकर पहले से कहीं अधिक प्रभावशाली बना दिया था? या इसलिए कि आधुनिक भारत पहली बार अपने ही ग्रंथों को नए प्रश्नों के साथ पढ़ रहा था? इतिहास इस पर अंतिम निर्णय नहीं देता. लेकिन प्रश्न अपनी जगह बना रहता है. जो किसी सनातन के झंडाबरदार ने नहीं पूछा. सब मनुस्मृति के पक्ष में बेहूदी दलीलें देते रहे.

25 दिसंबर 1927. महाड़. डॉ. भीमराव आंबेडकर ने मनुस्मृति का दहन किया. वह केवल एक पुस्तक नहीं जला रहे थे. वे उस सामाजिक व्यवस्था के विरुद्ध विद्रोह कर रहे थे, जिसे वे मनुष्य की समानता के विरुद्ध मानते थे. लेकिन आंबेडकर को केवल इस घटना से समझना भी पर्याप्त नहीं है. अपनी पुस्तक “Philosophy of Hinduism” में वे लिखते हैं कि मनु ने वर्णव्यवस्था का समर्थन किया और उसके बीज बोए, लेकिन यह निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता कि जाति-व्यवस्था का निर्माण स्वयं मनु ने किया. यह अंतर बहुत महत्वपूर्ण है. क्योंकि आंबेडकर भी इतिहास को नारे में नहीं बदलते. वे विचार का विरोध करते हैं. लेकिन जटिलताओं को सरल नहीं बनाते. शायद इसी कारण उन्हें पूरा पढ़ना चाहिए, टुकड़ों में नहीं. 1970 में कांशीराम ने ‘बामसेफ’ का गठन किया. इस एलान के साथ कि हमारा समाज दो हिस्सों में बंटा है, जिससे एक हिस्सा मनुवादी है दूसरा मूल निवासी. उनकी इस परम्परा को बाद में मायावती ने आगे बढ़ाया. यह दूसरी बात है कि कथित मनुवादियों के साथ सत्ता की साझेदारी के चलते उन्होंने कॉंशीराम और अम्बेडकर की लड़ाई को कमजोर किया. राजस्थान हाईकोर्ट में मनु की एक मूर्ति भी लगाई गई थी, जिसका बहुत विरोध हुआ.

फिर वहीं लौटता हूँ, जहां से चला था. इस पूरे लेख को लिखने के बाद मेरे पास उत्तर कम हैं. प्रश्न अधिक हैं. मैं भी  यह दावा नहीं कर सकता कि मनुस्मृति के सभी विवादित श्लोक क्षेपक हैं. इतिहास भी अभी यह दावा नहीं करता. मैं यह भी नहीं कह सकता कि अंग्रेजों ने निश्चित रूप से उसके पाठ में परिवर्तन किए. इस पर भी विद्वानों में मतभेद हैं. इस सवाल पर गीता प्रेस का अभिनंदन होना चाहिए. उसने समूचे हिंदू आर्ष ग्रन्थ छापे. वेद छापा. पुराण, उपनिषद, आरण्यक ग्रंथ छापे. रामायण, रामचरितमानस, महाभारत और गीता छापी. पर मनुस्मृति में हाथ नहीं लगाया. नहीं छापी, क्योंकि उसके पास प्रामाणिक ग्रंथ की किल्लत थी.

लेकिन मेरे मन में सबसे बड़ा सवाल मनुस्मृति में निहित विरोधाभास का है. समानता की वकालत करता यह ग्रंथ दलितों को प्रताड़ित करने की बात कैसे कह सकता है. स्त्री को पूज्य बताते बताते यही मनुस्मृति उनके प्रति कठोर और हिंसक कैसे हो सकती है. इससे यह अंदाज़ा लगता है कि हो न हो, इस ग्रंथ में बाद के समय में बहुत कुछ जोड़ा गया है. ज़ाहिर है, कि मूल पाठ में से श्लोक हटाए तो नहीं गए लेकिन अपनी बात और तर्क मनवाने के लिए नए जोड़ दिए गए. यहीं से मनुस्मृति का विरोधाभास सामने आ जाता है. मनुस्मृति का पक्ष या विरोध करने वाले लोग अगर अपनी पसंद के हिस्सों को पढ़ने के बजाए इसका पूरा पाठ करें तो उनको भी यह विरोधाभास सहज ही महसूस होगा.

एक बात पूरे विश्वास से कह सकता हूँ. हमने इस प्रश्न को कभी गंभीरता से लिया ही नहीं. अगर आज उपलब्ध मनुस्मृति ही मूल है… तो उसके विवादित श्लोकों का ईमानदारी से सामना कीजिए. उन्हें सही मानते हैं, तो तर्क दीजिए. गलत मानते हैं, तो स्पष्ट कहिए. लेकिन अगर आप स्वयं यह कहते हैं कि आज की मनुस्मृति में मिलावट है… तो फिर सबसे पहले उसी मिलावट को पहचानिए. उसे चिह्नित कीजिए. उसे प्रमाणित कीजिए.

किसी भी सभ्यता की सबसे बड़ी त्रासदी उसके ग्रंथों में मिलावट नहीं होती. सबसे बड़ी त्रासदी यह होती है कि वह उस मिलावट को पहचानने की कोशिश भी छोड़ दे. अगर कोई ग्रंथ सचमुच हमारी सभ्यता का हिस्सा है, तो उसकी रक्षा जयकारों से नहीं होती. उसकी रक्षा सत्य से होती है. और अगर किसी ग्रंथ पर मिलावट का आरोप है, तो उसका उत्तर आक्रोश नहीं, प्रमाण देते हैं. शायद इसलिए मेरा सवाल मनुस्मृति से कम, हमसे अधिक है. अगर वर्तमान मनुस्मृति ही मूल है, तो उसके विवादित श्लोकों का सामना कीजिए. स्वीकार कीजिए. अगर वह मूल नहीं है, तो उसकी प्रामाणिक प्रति खोजिए. लेकिन यह नहीं हो सकता कि हम एक ही सांस में उसे पवित्र भी कहें और दूषित भी. सभ्यताएं अपने ग्रंथों से नहीं हारतीं. वे तब हारती हैं, जब अपने ग्रंथों से, सत्य से और इतिहास से प्रश्न पूछना छोड़ देती हैं.

लेकिन देरी के बावजूद मैं आशावादी रहना चाहता हूं. समाज में हिंदुत्व के अलम्बरदार और विरोधी फिर से इस ग्रंथ को उठाएं. इसके मूल पाठ की खोज और कथावस्तु पर चर्चा करें. प्रश्नों का सामना करें.मिलावटों की पहचान करें. यह हमारा ग्रंथ है. इसे अपनी नज़र से देखें. अंग्रेज़ों की नज़र से नहीं. हंस बनें. दूध का दूध और पानी का पानी कर दें.

जय जय.

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