श्री राहुल गांधी और श्री मल्लिकार्जुन खड़गे सहित अन्य राजनीतिक नेताओं को मनु स्मृति किसने दी है? मतलब कहां से मिली है? किस गुरु के मार्गदर्शन में उन्होंने मनु स्मृति पढ़ी है? किस शंकराचार्य से, किस आचार्य से, किस परंपरा से उन्हें यह स्मृति मिली है?
सनातन धर्म की किसी भी प्रामाणिक पीठ (जैसे ज्योतिषपीठ, पुरी, द्वारका या श्रृंगेरी) या सनातन धर्म से जुड़े आस्तिक या नास्तिक किसी भी संप्रदाय के आचार्य ने उन्हें यह ग्रंथ नहीं सौंपा है। फिर ये कहां से, किस स्रोत से इसे लेकर घूम रहे हैं?
पूछो तो उत्तर में सिर्फ इतना है कि डॉ. अंबेडकर की सामाजिक न्याय की लड़ाई, और उनकी राजनीतिक विचारधारा के जरिए उन्हें यह मनु स्मृति मिली है। तो फिर सनातन धर्म के आचार्यों को दोष क्यों? यह स्मृति तो राजनीति के जरिए लोगों के मन में घुसाई गई।
वस्तुतः आजादी के पहले और बाद मनु स्मृति को हाथ में लेकर यदि कोई घूम रहा है तो चर्च के पादरी हैं, अब्राहमिक संप्रदाय के नेता हैं और लेफ्ट के कारिंदे हैं। किसी सनातनी ब्राह्मण के घर से या किसी सनातन धर्म के आचार्य के गुरुकुल से यह मनु स्मृति की पोथी न लेफ्ट को मिली, न चर्च को, और न कॉंग्रेस को।
पंडित नेहरु की माता जी बहुत धार्मिक महिला थीं, क्या पंडितजी के घर में, या आनंद भवन में कोई प्रति रखी थी?
हम लोग भी काशी से आते हैं, हमारे घर में तो हमें परंपरा से रामायण मिली, सत्यनारायण की कथा मिली, पर मनु स्मृति सचमुच नहीं मिली।
गारंटी है कि पूरे उत्तर भारत में किसी भी ब्राह्मण परिवार में आज से 50-100 साल पहले या 200-250-300 साल पहले भी शायद ही मनु स्मृति की कोई पांडुलिपि रखी रही हो???
सबका जीवन ही मंड़ई और कच्चे घरों में गुजर रहा था तो फिर दुर्लभ पांडुलिपि रखने का प्रश्न ही नहीं। जब अंग्रेजी प्रेस से छपी तो भी सवाल ही नहीं कि किसी ने इसे रखा या पूजा।
तो फिर इन्हें मिली कहां से? प्रश्न है।
हकीकत यही है कि शुरुआती वामपंथी इतिहासकारों (जैसे डी. डी. कोसंबी, आर. एस. शर्मा, रोमिला थापर आदि) ने सनातन परंपरा की किसी पाठशाला से मनु स्मृति ग्रहण नहीं की है।
श्री ज्योतिराव फूले, डॉ. भीमराव अंबेडकर आदि को भी यह मनु स्मृति किसी आचार्य परंपरा से नहीं मिली है। बल्कि इन सहित आजादी के पूर्व सभी आधुनिक समाज चितंकों को भी मनु स्मृति चर्च के पादरियों के जरिए मिली है।
लेफ्ट संगठन जो कि अब्राहमिक संप्रदायों की नाजायज बिगड़ैल औलाद हैं, इन्होंने भी इसे चर्च के षड्यंत्री पादरियों से ही हासिल किया, न कि किसी शंकराचार्य या किसी परंपरावादी ब्राह्मण के घर से।
इनने ब्रिटिश और यूरोपीय संपादकों के द्वारा ब्रिटिश सरकार के नियंत्रण वाले प्रेस से प्रकाशित मनुस्मृति को ही मूल अंग्रेजी में पढ़ा, फिर इसका मार्क्सवादी और औपनिवेशिक उपयोगवादी दृष्टिकोण (वर्ग संघर्ष और बांटो-राज करो) से इन सबने अलग-अलग विश्लेषण किया है।
वस्तुतः जिस रूप में आज राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे मनु स्मृति को हाथ में लेकर घूम-घूमकर संसद से सड़क तक बांच रहे हैं, यही काम आज से दो सौ साल पूर्व चर्च के पादरी रेवरेंड जॉन विल्सन, और पादरी डॉ. मरे मिशेल ने भारत में ब्रिटिश सरकार के इशारे पर कोलकाता और पुणे में शुरु किया था। फिर इसे मद्रास पहुंचाया गया।
यह बात सन 1820 की है। पहली मनु स्मृति 1776 में जेन्टू कोड के नाम से छपी थी। एनबी हेलहेड ने पहला संपादन किया। संस्कृत से पर्शियन में उसने संपादन सहित अनुवाद किया था। फिर पर्शियन से अंग्रेजी में अनुवाद हुआ।
अंग्रेज तब हिंदू को जेन्टू कहता था, इसलिए इसका नाम जेन्टो कोड पड़ा। यह प्रथम प्रकाशित प्रति बाद में हटा दी गई। इसमें खूब इधर-उधर से चीजें ली गईं थीं, इसके प्रमाण विलियम जोन्स के पत्र व्यवहार में मिलते हैं। 1783 में वॉरेन हेस्टिंग्स ने इसके पुनः संपादन का ठेका नए निर्देशों के साथ विलियम जोन्स को दिया। बंगाल एशियाटिक सोसायटी बनी। 11 पंडितों की कमेटी पहले से थी, जिसमें बाद में कुछ और पंडित, फारसी जानने वाले मौलाना भी शामिल हुए।
मनु स्मृति के नाम पर बहुत सी पोथियां बटोरी गईं। इसका विधिवत् संपादन विलियम जोन्स ने 1784 में प्रारंभ किया, ब्रिटिश प्रेस ने इसे 1794 में प्रकाशित किया।
किन्तु बहुत से पंडितों ने इसे स्वीकार करने से उसी समय इन्कार किया क्योंकि वह जान रहे थे कि मिलावट की गई है, एक म्लेच्छ ने स्मृति को गढ़ा है, यह भी एक कारण था ही। लोगों ने तब से ही इसे विलियम जोन्स स्मृति कहना शुरु कर दिया था।
सवाल है कि आखिर जो पंडित अपनी विद्या किसी गैर ब्राह्मण को देने को भी राजी नहीं होते थे, अचानक वह एक अंग्रेज म्लेच्छ को देने के लिए राजी कैसे हो गए? इस मुद्दे पर उसी समय बंगाल में पंडित बंट गए थे। जिस ग्रंथ को म्लेच्छ ने छू दिया, संपादन कर दिया, उसे भला ब्राह्मण कैसे स्वीकार कर लेंगे? बंगाल एशियाटिक सोसायटी की फेलोशिप वाले कथित पंडितों सहित किसी ने भी इसे तब स्वीकार ही नहीं किया।
यही कारण है कि कालांतर में जब गीता प्रेस का जन्म हुआ तो इसे प्रकाशित करने के मुद्दे पर पंडित ही भिड़ गए। गीता प्रेस से जुड़े पंडितों ने विलियम जोन्स की संपादित प्रति को स्वीकार ही नहीं किया। प्रकाशित करना तो दूर की बात है। काशी के ब्राह्मणों की इस पूरे मामले में न कोई राय ली गई और न ही कोई भूमिका थी। इसके प्रकाशन की संपूर्ण प्रक्रिया से जगतगुरु शंकराचार्यों से कोई परामर्श कभी नहीं लिया गया।
फिर षड्यंत्र तो पूरा हो ही गया। ब्रिटिश सरकार अपने मिशन पर आगे बढ़ गई। उस समय पंडित इसे लेने को राजी नहीं हुए तो अंग्रेजी प्रेस से अंग्रेजी में प्रकाशित मनु स्मृति को चर्च के जरिए देश भर में नवस्थापित मिशनरी स्कूलों, सरकार प्रेरित सिस्टम, तंत्र में बांटा गया, और पढ़ाया गया। फिर प्रारंभ हुआ हिंदू धर्म को गाली देने का नया शगल जिसे ब्रिटिश सरकार का पूरा संरक्षण था ही।
सरकारी और अन्य निजी साधनों से मनु स्मृति को खूब छापा गया। मनु स्मृति को देश भर में पहुंचाने का कार्य यदि मिशनरी भाव से किसी ने किया तो वह चर्च के पादरियों ने किया। पुणे में चर्च ऑफ स्कॉटलैंड ने कमान संभाली।
पुणे में रेवरेंड जॉन विल्सन नामक पादरी को मनु स्मृति पढ़ने-पढ़ाने में बहुत दिलचस्पी थी, वह केवल विवादित श्लोकों को ही पढ़ाता था, बाइबिल से तुलना करता था, पुणे के स्कॉटिश मिशनरी स्कूल में तब पढ़ने आए ज्योतिराव फूले के मन में इसी पादरी ने हिंदू धर्म के प्रति नफरत और चर्च के प्रति मतांतरण की हसरत पैदा करने की कोशिश की।
1925 के बाद चर्च से ठेका लेफ्ट के लोगों ने लिया क्योंकि देश में आजादी की चिंगारी तेज होने लगी थी। टू स्टेप फ्लो थ्योरी पर चल रहा चर्च रणनीति बदलने लगा था। अब लेफ्ट आगे, चर्च पीछे।
अब देश आजाद है, और एफसीआरए बिल संसद में है, चर्च के पेट में मरोड़
उठने लगी है, लिहाजा उसके सारे एजेंट रण में उतर पड़े हैं। जैसे 200 साल पहले हाथ में मनु स्मृति थी, फिर से मनु मनु मनु का जाप चल पड़ा है। देखिए कहां तक जाता है।
जाहिर तौर पर अंग्रेजों की ओर से प्रकाशित मनु स्मृति को चर्चित करने का कम चर्च ने ही किया है। इसमें किसी भारतीय गुरुकुल, आश्रम, शंकराचार्य या किसी आचार्य का सीधे तौर पर कोई रोल नहीं है। यूनिवर्सिटी सिस्टम आने के बाद उसे लेफ्ट ने अकादमिक चर्चा में समाजशास्त्र, राजनीति की मार्क्सवादी व्याख्या में जमकर इस्तेमाल किया है।
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