बाबा साहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर को बड़ौदा महाराजा सयाजीराव गायकवाड़ ने अच्छी खासी छात्रवृत्ति दी थी। बड़ौदा महाराज से उनके बारे में पहली बार चर्चा एक संस्कृत के प्रकांड विद्वान पंडित अर्जुन केलुस्कर ने की थी। पंडित केलुस्कर बड़ौदा महाराजा के शिक्षा मंत्री जो कि ब्राह्मण थे, के नजदीकी थे, वह उनके जरिए ही महाराजा से मिले थे। उन ब्राह्मण शिक्षा मंत्री का नाम था नारायण केलकर।
पंडित अर्जुन केलुस्कर जाति से भंडारी थे। इसके पूर्व डॉ. अंबेडकर के जीवन में जिन शिक्षकों का बहुत भावनापूर्ण स्थान रहा है उनमें पंडित पेणसे गुरुजी और पंडित कृष्णाजी केशव आंबेडकर की भूमिका महत्वपूर्ण थे। ये दोनों ब्राह्मण थे। इसका भावपूर्ण उल्लेख स्वयं डॉ.अंबेडकर ने धनंजय कीर के द्वारा अंग्रेजी में लिखित, मराठी और हिंदी में अनूदित प्रामाणिक जीवनी में किया है।
इसके अनुसार, पेणसे गुरु अक्सर बचपन में उन्हें अपने घर भी ले जाते थे, बरसात में कपड़े भी पहनने को देते थे। उन्हीं के घर में भीम स्नान करते थे। दोपहर का लंच वह दूसरे ब्राह्मण गुरु कृष्णाजी केशव आंबेडकर के साथ ही करते थे। इन्हीं आंबेडकर गुरुजी से उन्हें आंबेडकर उपनाम मिला जिसने भीम को नई पहचान दी।
पंडित केलुस्कर के कारण ही डॉ. अंबेडकर को अपनी प्रतिभा को निखारने का बड़ा अवसर तब मिला जबकि उनकी मुलाकात बड़ौदा महाराजा से हुई। उनकी प्रखर प्रतिभा देखकर स्नातक में ही उनकी स्कॉलरशिप महाराजा ने प्रारंभ की थी। बाद में उन्हें 1913 में अमेरिका की कोलंबिया यूनिवर्सिटी में अध्ययन के लिए भारी भरकम छात्रवृत्ति बड़ौदा महाराजा ने प्रदान की। आज के हिसाब से यह स्कॉलरशिप उनकी स्नातक, परास्नातक आदि डिग्री के समय सब मिलाकर 3 करोड़ रुपये से कम नहीं थी।
1913 में इसी स्कॉलरशिप की बदौलत ही डॉ. अंबेडकर एलफिंस्टन कॉलेज, मुंबई से ग्रेजुएट हुए तो उन्हें बड़ौदा की सेना में लेफ्टिनेंट पद पर नियुक्ति मिली। उल्लेखनीय है कि डॉ. अंबेडकर के पिताजी सूबेदार मेजर थे, दादा, नाना आदि सभी तत्कालीन ब्रिटिश आर्मी और मराठा सेनाओं से परंपरा से जुड़े ही रहे थे।
23 जनवरी 1913 को डॉ. अंबेडकर लेफ्टिनेंट पद पर नियुक्त हुए। 9 दिन बीते थे कि पिताजी की बीमारी के कारण उन्हें लौटना पड़ा। 2 फरवरी 1913 को पिताजी का निधन हो गया। इस शोकांतिका से उबरकर 4 जून 1913 को डॉ. अंबेडकर पुनः महाराजा बड़ौदा की सेवा में उपस्थित हुए।
वहां उन्होंने अमेरिका में उच्च शिक्षा के लिए स्कॉलरशिप की जरुरत बतायी और प्रार्थनापत्र दिया। वहीं बड़ौदा महाराज के एक ब्राह्मण जाति के शिक्षा मंत्री नारायण केलकर, प्रधानमंत्री श्री बीएल गुप्ता, उपप्रधानमंत्री मनुभाई मेहता, राजस्व मंत्री श्रीमंत भद्र सिंह गायकवाड़, और अपने गुरु पंडित केलुस्कर आदि की उपस्थिति में उनकी अर्जी नारायण केलकर ने मंजूर की।
महाराजा ने प्रसन्नतापूर्वक सभी को निर्देशित किया, और डॉ. अंबेडकर ने एग्रीमेंट या करार पर दस्तखत किए कि उच्च शिक्षा पूरी कर वह 10 साल तक महाराज की डिफेंस सर्विस (सिविल सेवा) में अधिकारी के रूप में सेवा प्रदान करेंगे।
डॉ. अंबेडकर पहले भी 9 दिन तक बड़ौदा महाराजा के डिफेंस सेवा में लेफ्टिनेंट के रूप में अतिथि गृह में रुक चुके थे। पुनः उनका आतिथ्य बड़ौदा के पूरे मंत्रिमंडल ने किया। संभवतः तीन दिन आतिथ्य लेकर वह मुंबई चले गए ताकि अमेरिका जाने की तैयारी कर सकें। जुलाई 1913 के तीसरे सप्ताह में डॉ. अंबेडकर अमेरिका रवाना हो गए। वहां ठहरने आदि के लिए भी महाराजा ने अपने संपर्कों का पूरा ब्यौरा उन्हें दिया।
इन 10-15 दिनों में डॉ. अंबेडकर के साथ किसी प्रकार से छुआछूत की कोई घटना घटी हो, कोई प्रमाण उपलब्ध नहीं है।
और तो और डॉ. अंबेडकर ने मास्टर डिग्री के लिए जो शोधप्रबंध लिखा था, उसमें भी उन्होंने जाति व्यवस्था को भारत के रिपब्लिक के रूप में लिखकर उसे सराहा था। एडमिनिस्ट्रेशन एंड फाइनेंस ऑफ ईस्ट इंडिया कंपनी नामक शोध प्रबंध उन्होंने 1915 में कोलंबिया यूनिवर्सिटी में लिखा तो यह उनकी पहली थीसिस थी।
इस शोध पत्र में उन्होंने ब्रिटिश हुकूमत और ईस्ट इंडिया कंपनी की आर्थिक नीतियों की इतनी बारीक और वैज्ञानिक चीरफाड़ की थी कि वह आज भी भारतीय अर्थशास्त्र के इतिहास में एक अनूठा दस्तावेज़ है।
बाबा साहेब ने ब्रिटिश सरकार के इस दावे पर तीखा प्रहार किया कि अंग्रेजों ने भारत में शांति स्थापित की।
बाबा साहेब ने लिखा कि अंग्रेजों की यह 'शांति' वास्तव में भारत की बरबादी की कीमत पर आई है। उन्होंने कहा कि कानून-व्यवस्था की आड़ में अंग्रेजों ने भारत और उसके स्वावलंबी ग्रामों का भयंकर आर्थिक शोषण किया है। इसी तथ्य के समर्थन में उन्होंने यह प्रसिद्ध उक्ति लिखी थी कि "कोई भी मनुष्य आर्थिक तबाही या दरिद्रता के मुकाबले केवल एक 'पशुवत शांति' (Mere Animal Peace) को चुने या नहीं, इसका फैसला लोग करेंगे।" साफ था कि उन्होंने पहले शोध प्रबंध में ब्रिटिश सरकार को ललकारा था कि भूखे पेट और गुलाम रखकर उनके द्वारा दा जा रही शांति किसी काम की नहीं है।
डॉ. अंबेडकर फाउंडेशन, नई दिल्ली से प्रकाशित वॉल्यूम-6 के पृष्ठ 16 पर इस थीसिस में वह लिखते हैं कि- भारत में ग्राम समाज अधिकांश रूप से उत्तर भारत में पाया जाता है। (हालांकि यह निष्कर्ष सही नहीं था, पर जिस भी संदर्भ से डॉ. अंबेडकर ने लिखा, शायद उसी में यह अंग्रेजों ने अंकित कर रखा हो)
ग्राम का प्रशासन निर्वाचित प्रधान करते थे, जिन्हें ग्राम समाज की जातियां मिलकर चुनती थीं, उसके पास हटाने का भी अधिकार था।...विभिन्न शिल्पी, कलावंत समूह और लोग ग्राम में अपने विशिष्ट अधिकार रखते थे। जैसे गांव में अध्यापक वर्ग था, धोबी, नाई, बढ़ई, लोहार, कर्मकार, पासवान , कायस्थ आदि सभी थे। ये सभी अधिकार संपन्न थे। इनके पास ग्राम समाज के हित में काम करने, खर्च करने, लोगों के आतिथ्य के लिए भी कुछ करने का अधिकार था। इन गांवों में अपरिचित, अनजान लोगों को भी सम्मान के साथ आतिथ्य मिलता था।....
इसी पैरे में डॉ. अंबेडकर ने स्वयं यह लिखा है, मतलब वह किसी को उद्धृत नहीं कर खुद कह रहे हैं कि- these village communities are little republics, having nearly everything that they want within themselves, and almost independent...। मतलब यह कि ये ग्राम समुदाय छोटे गणतंत्र की तरह हैं। लगभग उन्हें उनकी जरुरत की हर चीज आपसी सेवाओं से उपलब्ध है। वे आत्मनिर्भर हैं पूरी तरह।
डॉ. अंबेडकर आगे लिखते हैं कि भारत में सत्ता बदलती रही लेकिन ये ग्राम समुदाय नहीं बदले। और तो और संकट के समय इन्होंने अपनी अंदुरुनी एकता मजबूत कर खुद को और अधिक शक्तिशाली बना लिया।
इन गांवों की खासियत थी कि इनमें से किसी कमजोर शख्स को यदि किसी बाहरी को कुछ देनदारी देनी है और अगर वह चुकाने में असमर्थ है तो पूरा गांव उसके साथ खड़ा हो जाता है।
इस शोधपत्र में डॉ. अंबेडकर ने ईस्ट इंडिया कंपनी और ब्रिटिश सरकार की ओर से भारत के गांवों की लूट का पर्दाफाश किया है। भारत की बरबादी के लिए ब्रिटिश शासन को जिम्मेदार ठहराया है। कंपनी की आय के स्रोतों में अफीम, नील की खेती से किसानों की बरबादी सहित नमक, चमड़े, कपड़े के व्यापार पर अंग्रेजी आघात की परत दर परत खोली है। युद्ध के नाम पर भारत के किसानों, उनके उत्पादकों से अवैध वसूली को रेखांकित किया है।
डॉ. अंबेडकर लिखते हैं कि अंग्रेजों की लूट के कारण भारत के मजदूरों, कृषकों की आय घट गई। वह मुनरो के दिए आंकड़ों पर कहते हैं कि जमीन और फसलों पर अंग्रेजी शासन में लगाए गए लगान के कारण सन 1830 में किसान-मजदूर मासिक 4 से 6 रुपये की आय पर आ गए हैं। (आज के बाजार मूल्य से यह आय 6 हजार रूपये से 9 हजार रुपये तक होती है। अर्थात, उस जमाने में तमाम ब्रिटिश शोषण के बावजूद गरीब आदमी न्यूनतम 6000 रुपये से- 9000/10,000 रुपये मासिक तक अपने गांव में कमा ले रहा था, स्किल आदमी की आय इससे कहीं ऊपर ही थी)
खैर, भारत की दुर्दशा का कारण डॉ. अंबेडकर ने अपनी थीसिस में अंग्रेजों की आर्थिक लूट को ही बताया है। इसमें उन्होंने कहीं पर भी भारत की जाति व्यवस्था, कथित ब्राह्मणवादी व्यवस्था पर कोई टिप्पणी नहीं की है। प्रख्यात आर्थिक इतिहासकार आरसी दत्त को अनेक जगहों पर उद्धृत किया है।
संयोग है कि जब उन्हें महाराजा गायकवाड़ ने अमेरिका जाने के लिए स्कॉलरशिप मंजूर की तो उस पर मुहर लगाने वालों में बड़ौदा के उपप्रधानमंत्री भी थे जिनका नाम मनुभाई नंदशंकर मेहता था। मतलब कि मनु तब भी डॉ. अंबेडकर के सामने दूसरे रूप में सहायक बनकर मौजूद थे।
फिर भी पहली थीसिस में डॉ. अंबेडकर ने जाति, ब्राह्मण, मनु आदि पर कोई टिप्पणी नहीं लिखी है। कम-से-कम 15 दिन वह राजकीय आतिथ्य में बड़ौदा में रहे लेकिन उन्होंने किसी तकलीफ या छुआछूत की शिकायत भी नहीं की।
हालांकि 1917 में अमेरिका से लौटने पर उनका संपर्क मुंबई के ब्रिटिश गर्वनर से हो चुका था। उन्होंने कोलंबिया यूनिवर्सिटी में पढ़ाई की, फिर लंदन स्कूल ऑफ इकनोमिक्स भी गए। 1917 में लौटे तो उनकी इच्छा पुनः लंदन स्कूल ऑफ इकनोमिक्स जाकर डीएससी और बार एट लॉ यानी बैरिस्टर की पढ़ाई की हो गई। मास्टर्स, पीएचडी कोलंबिया यूनिवर्सिटी, अमेरिका से हो ही चुकी थी। पीएचडी की डिग्री मिलनी बाकी थी।
किंतु बड़ौदा के मंत्रिमंडल को इस बार लगा कि पहले कुछ साल इन्हें बड़ौदा में सेवा का अवसर दिया जाए। बाद में लगेगा तो फिर भेज देंगे। बड़ौदा के मंत्रिमंडल ने उनसे विनती की कि पहले एग्रीमेंट के मुताबिक 10 साल की नौकरी पूरी करें।
17 सितंबर 1917 का महीना था। निर्देश के अनुसार वह बड़ौदा आ गए। 23 सितंबर को विधिपूर्वक उन्हें बड़ौदा राज्य का डिफेंस सेक्रेट्री(सैन्य सचिव, सिविल सेवा का ऊंचा पद) दिया गया। उनके रहने-खाने की व्यवस्था विगत अनुसार अतिथिगृह में थी, किंतु वह कुछ दिनों बाद स्वयं ही रहने के लिए एक पारसी संपर्कित के गेस्ट हाउस चले गए।
फिर क्या हुआ और क्या नहीं हुआ, कौन बताएगा। डॉ. अंबेडकर कुछ बताते हैं, बड़ौदा महाराज के रिकॉर्ड कुछ और कहानी बताते हैं। इतना तो तय है कि जब डॉ. अंबेडकर ने 1935-36 में अपनी आत्मकथा वेटिंग फॉर अ वीजा में दो महीने के भीतर बड़ौदा का 10 साल का एग्रीमेंट तोड़कर वापस लौटने की कहानी के पीछे छुआछूत को कारण बताया तब तक इसे सही ठहराने का कोई भी दस्तावेज बड़ौदा में नहीं था।
महाराजा को उन्होंने कभी इस बारे में कोई पत्र भी नहीं लिखा, कोई मौखिक जानकारी नहीं दी। क्योंकि बड़ौदा महाराजा के रिकॉर्ड में कुछ नहीं है। जो है वह यही कि एग्रीमेंट तोड़कर चले गए। उन्हें महाराजा की ओर से नोटिस भी तब भेजा गया था। कहा गया था कि पैसा वापस कर दीजिए। डॉ. अंबेडकर ने तब लिखित दिया था कि वह समय पर वापस कर देंगे। बाकी कारण अज्ञात हैं। हालांकि 1936-37 में 20 साल बाद डॉ. अंबेडकर ने बताया कि छुआछूत हो रहा था।
खैर, वह जब अचानक बड़ौदा छोड़कर चले गए तो ऐसी कोई बात उन्होंने महाराजा को नहीं लिखी, महाराजा के वह चहेते थे, क्योंकि महाराजा खुद सामाजिक न्याय के अगुवा थे। कालांतर में 1939 में महाराजा भी नहीं रहे। हालांकि दोनों की भेंट प्रथम गोलमेज सम्मेलन 1930 में लंदन में हुई। महाराजा ने उन्हें देखकर खुशी व्यक्त की थी कि चलो उनके कारण एक जीवन सार्थक हुआ।
10 अक्टूबर 1950 को डॉ. अंबेडकर ने भी महाराजा की स्मृति में उनके पोते प्रताप सिंह गायकवाड़ को पत्र लिखा था कि
"वे (महाराजा सयाजीराव) मेरे संरक्षक और मेरे भाग्य के निर्माता थे। उनके प्रति मुझ पर कृतज्ञता का एक ऐसा गहरा कर्ज है, जिसे मैं शायद कभी पूरी तरह नहीं चुका पाऊंगा।''
छुआछूत उनके साथ घटित हुआ तो पहले क्यों नहीं हुआ? बड़ौदा में जो एग्रीमेंट 1913 में साइन हुआ उसे ब्राह्मण शिक्षा मंत्री ने क्या डॉक्टर अंबेडकर से हस्ताक्षर कराते समय दूर से फेंक दिया था? इस पर कोई कमेंट इतिहास में दर्ज नहीं है।
बड़ौदा महाराजा से किसी भी बातचीत में डॉ. अंबेडकर ने उनके साथ छुआछूत किए जाने की घटना यदि संकेत में भी बता दी होती तो बड़ौदा में त्राहिमाम मच जाता। वो सारे अधिकारी और स्टॉफ के लोग उसी समय बर्खास्त हो जाते। क्योंकि बड़ौदा में सामाजिक सुधार कोल्हापुर महाराजा के साथ ही चल रहे थे। सभी जाति, वर्ग के लोग राजकीय कार्य में संलग्न थे। महाराष्ट्र, म.प्र., गोवा, गुजरात आदि के 50 के करीब अन्य गणराज्य के प्रधान मुखिया या राजा तो खुद ही अनुसूचित जनजाति के या अनुसूचित वर्ग के ही थे।
डॉ. अंबेडकर मुश्किल से 2 महीने बड़ौदा में रह सके। मुंबई के गवर्नर लॉर्ड विलिंगडन ने कुछ ही महीने बाद उन्हें प्रतिष्ठित सिडनेहम कॉलेज ऑफ कॉर्मस में प्रोफेसर के पद पर नियुक्ति का आमंत्रण भेज दिया।
फिर जो हुआ, इतिहास में दर्ज है, केवल विश्लेषण करने और सोचने की जरूरत है। अनेक सवाल हैं, जिसका जवाब खोजा ही जाना चाहिए। क्योंकि यह पूरी भारतीय परंपरा पर थोपे गए वह प्रश्न हैं, जिनका सही सही तथ्यांकन, मूल्यांकन अब कहीं ज्यादा आवश्यक है।
1918 में डॉ. अंबेडकर मुंबई में प्रोफेसर बने। इधर लॉर्ड विलिंगडन को लंदन से जानकारी मिल चुकी थी कि साउथबरो कमेटी फ्रांसिस जॉन स्टीफेंस हॉपवुड की अगुवाई में पृथक निर्वाचन (बांटो और राज करो नीति के अंतर्गत एक दांव) के लिए भारत आ रही है, कथित अछूत वर्ग की ओर से भी उस कमेटी के सामने एक प्रस्तुति मुंबई में होनी तय थी। लॉर्ड विलिंगडन को सभी डाटा स्रोतों को उस कमेटी के सामने उपस्थित करने का दायित्व था। विलिंगडन ने इस कार्य के लिए डॉ. अंबेडकर पर निगाह गड़ा दी थी।
नवंबर 1918 में साउथबरो कमेटी भारत आ गई। इसी नवंबर 1918 में डॉ. अंबेडकर को सरकारी सिडेनहम कॉलेज में प्रोफेसर पद के लिए नियुक्ति भी मिली। जनवरी 1919 में मुंबई में साउथबरो कमेटी के सामने डॉ. अम्बेडकर की ऐतिहासिक गवाही लॉर्ड विलिंगडन की उपस्थिति में दर्ज की गई। ब्रिटिश सरकार ने तय कर लिया था कि पृथक निर्वाचन मंडल लागू कर ही दम लेंगे।
खैर, डॉ. अंबेडकर उस समय महार जाति में और ब्रिटिश शासन द्वारा तैयार की गई अनुसूचित शेड्यूल हिंदू जाति की सूची में उल्लिखित समूचे अनुसूचित वर्ग में एकमात्र ऐसे व्यक्ति थे जिनके पास अमेरिका (कोलंबिया विश्वविद्यालय) से एम.ए. और पीएच.डी. जैसी उच्च और वैश्विक डिग्रियां थीं। ब्रिटिश अधिकारियों के लिए उनकी यह शैक्षणिक योग्यता अत्यंत प्रभावशाली थी, क्योंकि वे पश्चिमी राजनीतिक सिद्धांतों को गहराई से समझते थे।
साउथबरो कमेटी के सामने डॉ. अंबेडकर ने जब गवाही दी तो फिर उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। उन्होंने अपने द्वारा लिखित उस थिसिस को वस्तुतः खुद ही नकार दिया जिसमें जाति व्यवस्था और ग्राम को रिपब्लिक कहकर प्रशंसा की थी। गवाही ऐतिहासिक थी, लेकिन यह सत्य है कि इसमें उन्होंने उस थीसिस से नजरें हटा लीं थीं, या उसे नकार दिया था जिसके कारण ही उन्हें मास्टर डिग्री मिली। थीसिस झूठ थी या गवाही, इतिहास तय करेगा।
इस गवाही के बाद वह पुनः लंदन रवाना हो गए। इस बार कोल्हापुर के महाराजा ने उन्हें मदद की। लॉर्ड विलिंगडन का सामीप्य भी मिल ही गया था। अब वह इंग्लैंड के एक विशेष राजनीतिक वर्ग में अपनी गवाही के कारण चर्चित थे। मार्च 1920 तक डॉ. अंबेडकर सिडनेहम कॉलेज मे शिक्षक रहे, जुलाई 1920 में वह पुनः उच्च अध्ययन (पीएचडी) के लिए लंदन चले गए।
(क्रमशः)
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