Thursday, 17 September 2026

ब्राह्मणवाद महार जाति और अछूत

बहुत सारे लोगों के मुंह में ब्राह्मणवाद ब्राह्मणवाद शब्द कुछ ज्यादा ही चढ़ गया है। वह जब देखो तब ही हर विषय पर ब्राह्मणवाद का जाप प्रारंभ कर देते हैं।

अभी मैं सम्राट अशोक के शिलालेखों का अध्ययन कर रहा हूं। आज के तर्क के हिसाब से तो सम्राट अशोक सबसे बड़े ब्राह्मणवादी थे। कोई शिलालेख नहीं है जिसमें ब्राह्मण का नाम आदर के साथ सम्राट अशोक ने नहीं लिया है। 

ब्राह्मण का नाम और सम्मान सम्राट अशोक के शिलालेखों में हमेशा श्रमण से पहले आया है, बहुत ही सम्मानजनक रूप में आया है। 

और तो और जाति शब्द भी सम्राट अशोक ने कम से कम 14 से अधिक स्थानों पर अंकित किया है। अपने सभी शिलालेखों में वह जाति को ज्ञाति कहते हैं। जाति का मूल नाम ज्ञाति है। ज्ञाति का अपभ्रंश जाति है। जाति मतलब ज्ञाति और हर जाति की अपनी ज्ञान परंपरा थी। जाति कभी भी कास्ट या CASTE न थी और न ही हो सकती है। किंतु सारे आधुनिक इतिहासकार, समाजशास्त्री, मार्क्सवादी अपनी मूर्खता को गर्वपूर्ण ढंग से व्यक्त करते हैं जब वह ज्ञाति को CASTE कहते हैं। जबकि कास्ट अलग है, जाति तो बिल्कुल अलग है। भारत की जाति व्यवस्था का यूरोपीय कास्ट सिस्टम से कोई साम्य है ही नहीं।

इतिहास में म्लेच्छ विदेशी आक्रमणों में बहुत सी ज्ञातियों की ज्ञान पंरपरा नष्ट हो गई, ब्राह्मण भी नष्ट हुए किन्तु उन्होंने छाती से चिपकाकर अपने ज्ञान का बड़ा हिस्सा बचा लिया, बहुत सी जातियां नहीं बचा पाईं, क्योंकि म्लेच्छों के हमलों में अस्तित्व के संघर्ष से गुजरना पड़ा। 

जाति तो इस संघर्ष में बच गई, लेकिन उनकी ज्ञान परंपरा खत्म हो गई। ब्राह्मणों ने किसी तरह से अपनी ज्ञान परंपरा बचा ली। तो अब सवाल है कि ब्राह्मणों ने कैसे अपनी ज्ञान परंपरा की रक्षा कर ली। अन्य जातियों की बिजनेस-युक्त ज्ञान परंपरा क्यों बिखर गई? शोध का विषय है।

पर अब आगे का विचार होना चाहिए। बीत गई सो बात गई। आखिर अब कौन रोक रहा है? भारत अपनी राख से पुनर्जीवित हो रहा है। सभी जातियां अंगड़ाई ले रही हैं। वह अपने मूल और अपनी ज्ञान परंपरा को पाने के लिए एकजुट हो रही हैं। 

इसका स्वागत होना ही चाहिए। लेकिन इसके लिए ब्राह्मणों के विरूद्ध राजनीतिक कारणों से चल रहा विषवमन हर हाल में बंद किया जाना आवश्यक है। 

और मजे की बात बताऊं। भारतीय इतिहास में सम्राट अशोक पहले थे जिन्होंने मांसाहार को प्रतिबंधित किया, जीवहत्या निषिद्ध हो गई। सभी चौपायों के वध पर राज्यादेश से रोक लगाई गई, यहां तक कि पशु-पक्षियों की सूची जारी कर दी गई कि यदि किसी ने किसी पक्षी जैसे मुर्गा या मछली को भी मार दिया तो उसे मृत्युदंड दिया जाएगा। 

सोचकर देखिए कि जब अशोक का जीववध प्रतिबंध कानून लागू हुआ होगा तब क्या गुजरी होगी इस देश के मांसाहारियों पर, जीववध के जरिए गुजारा करने वाली जातियों पर? लेकिन इस मुद्दे पर अशोक के शिलालेख में स्पष्ट आदेश होने के बावजूद कोई बहस नहीं है, कोई शोध नहीं है। कोई बोलने को राजी नहीं है। आखिर क्यों? गलती से भी जीवहिंसा किसी से हो गई तो उस कुटुंब के साथ क्या गुजरी?

इसी कार्य के लिए तो उसने विशेष रूप से रज्जुक यानी राजुक को अधिकार संपन्न बनाया कि मौके पर जाकर तीन दिन के भीतर दण्ड सुनिश्चित करे।

अब जो मांसाहारी थे, या जिनसे भूलवश पर पशु-पक्षी को मार देने का आरोप आ गया तो उन्हें फौरन गांव से बाहर की बस्ती में बहिष्कृत कर डाला जाने लगा। राजुक लोग सम्राट का फरमान सुनाकर सजा सुनाने लगे। तब पहली बार ग्रामों में ऐसी बस्तियां बनीं जिनमें वो बहिष्कृत लोग रखे गए जिन्हें अशोक के राजुकों ने दण्ड सुनाने के बाद क्षमादान कर जीवित रहने की इजाजत दी, किंतु उन्हें गांव के लोगों से रिश्ता रखने की भी इजाजत नहीं थी। शिलालेखों का संकेत तो यही है।

मैं तो इतिहास के सारे विद्वानों से कहता हूं कि इस मुद्दे पर लेखनी खामोश क्यों हो जाती है। यदि मैं गलत हूं तो बता दीजिए, मैं तो शिलालेख लेकर बात कर रहा हूं, चुनौती है कि कोई मुझे गलत साबित कर दे। या इतना ही बता दे कि सम्राट अशोक की करनी को संदेह के दायरे से बाहर कैसे किया जा सकता है कि उनके कारण भारत में बहिष्कृत जातियों की तस्वीर पहली बार दिखाई देती है?  

इस पर शोधपूर्ण आलेख कुछ ही दिन में प्रकाशित कर दूंगा। कुछ हिस्सा फेसबुक पर मैं डाल ही देता हूं। अब यदि किसी को बहस करनी है तो थोड़ा पढ़-लिखकर बात करे। कम से कम राजुक संबंधी शिलालेखों की प्रति लेकर ही बैठे। एक एक शब्द की मीमांसा को तैयार रहे।

अब स्वामी प्रसाद मौर्य में इतनी दम तो नहीं ही है कि सम्राट अशोक को गाली बके कि उसने ब्राह्मणों का इतना आदर क्यों किया। क्यों ब्राह्मण को इतने शिलालेखों में सम्मानित किया है। कम से कम ब्राह्मणों के कहने पर तो उसने ये नहीं ही किया होगा?

खैर, एक विदुषी ने अभी मुझे उपदेश भी किया है जिनसे मैंने सवाल पूछा था कि डॉ. अंबेडकर ने ब्राह्मणवाद को लेकर कुछ कहा था तो महारवाद पर कोई टिप्पणी क्यों नहीं की?

अब तो ये सवाल गंभीर है कि ये महारवाद क्या है भला? तो मेरा सांकेतिक उत्तर है कि जब डॉ. अंबेडकर का जन्म महू सैनिक छावनी में हुआ था तो 1893 में उनके पिताजी आदरणीय रामजी सकपाल सूबेदार मेजर और महू सैनिक छावनी स्कूल के हेडमास्टर थे या नहीं थे? 

और तो और डॉ. अंबेडकर के दादा भी आर्मी में सम्मानित पद से रिटायर हुए। उनके नाना, मामा आदि भी आर्मी में ही थे। जिसे जानकारी नहीं हो तो उसे बता दूं कि शिवाजी के प्रमुख अंगरक्षकों और सैन्य संचालन में शामिल योद्धाओँ में कई महार जाति के प्रमुख योद्धा थे। महारों के एक समूह का शिवाजी के बाद मराठों से मतभेद क्यों हुआ, यह अलग कहानी है कि आखिर क्यों मराठों और महारों में दुराव बढ़ता चला गया। इसकी मीमांसा इतिहास में अवश्य होनी चाहिए, होकर रहेगी।

तो जब डॉ. अंबेडकर के पिताजी सूबेदार मेजर बने, तो उसके 30 साल पहले फांसी पर चढ़ने वाले मंगल पांडेय का भी पद नाम पता लगा लिया जाना चाहिए। वह तो महज सिपाही थे। 

जबकि महार जाति के लोग मंगल पांडेय से ऊंचे पदों पर आर्मी में नियुक्ति पा रहे थे, इसीलिए मैंने कहा कि ब्राह्णणवाद शब्द प्रयोग किया जा रहा है तो महारवाद शब्द में आपत्ति क्यों हो रही है? 

शोध के अनुसार, 1892 में ब्रिटिश आर्मी में 70 के करीब सूबेदार मेजर और सूबेदार महार जाति से जुड़े लोग थे। महार रेजीमेंट भी थी ही जिस अंग्रेजों ने 1893 के बाद भंग किया, बाद में डॉ. अंबेडकर के निवेदन पर पुनर्जीवित भी किया। 

दूसरा मुद्दा ये कि मैं जब विद्वानों से पूछता हूं कि ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र तो चार वर्ण हैं, पंचम वर्ण भी माना गया है। 
फिर इनमें सिर्फ ब्राह्मण और क्षत्रिय को ही जाति क्यों पुकारा गया, वैश्य और शूद्र को जाति क्यों नहीं कहा गया। वैश्य और शूद्र नाम की जाति आखिर कहां हैं? इनके भीतर तो सैकड़ों जातियां गिन ली गईं, लेकिन ब्राह्मण, क्षत्रिय की जातियां गायब हो गईं? तो क्या हुआ आखिर?

संभव है कि मेरी बात कुछ लोगों के गले न उतरे। फिर से समझा देता हूं कि यदि वैश्य और शूद्र वर्ण में सैकड़ों जातियां उपजातियां हैं तो क्या ब्राह्मण और क्षत्रिय की जातियां उपजातियां नहीं हैं? मेरा कहना है कि हैं, पर सवाल है कि वह कहां हैं? कागज पर तो नदारद हैं। मेरा ख्याल है कि विद्वान लोग विचार करेंगे, जवाब मिलेगा।

और अंत में, कंटहा ब्राह्मण को भूल मत जाना। वही महापातर ब्राह्मण, जिसे गांव में घुसते ही दलित जातियों के लोग भी कंकर मारना, दुरदुराना नहीं भूलते। वही जो वास्तविक अछूत है लेकिन सामाजिक न्याय के मसीहा उसे शेड्यूल कास्ट में जगह देने को राजी नहीं हैंं, क्योंकि उसके नाम के साथ ब्राह्मण जो जुड़ा है। उसकी छाया से भी सारी ओबीसी, एससी जातियां भागती हैं। किसी शुभ में उसे ब्राह्मण और ठाकुर भी नहीं पूछते रहे सदियों तक। केवल मृत्यु के समय ही उसे गांव के बाहर बुलाया जाता है, पूरे घर का शोक उसे सौंपकर उसकी विदाई कर देने की रवायत आज भी है।

लेकिन, यहां सामाजिक न्याय के मुंह में ताला लग जाता है और संविधान के अनुच्छेदों को उसकी भावना के अनुसार पूर्ण रूप से लागू करने में किंतु-परंतु आ जाता है।
इसलिए कह रहा हूं कि ब्राह्मणवाद शब्द कर रहे हो तो सवाल सुनने के लिए तैयार भी रहो। लोग भी जवाब सुनेंगे, और पूछेंगे कि यदि अछूत होने से ही शेड्यूल कास्ट की सूची बनी थी तो महापातर ब्राह्मण का तो पहला हक बनता था। और ऐसी जातियां बहुत सी हैं जिन्हें न्याय की प्रतीक्षा है।

आखिर संसद और राजनीति क्यों खामोश हो जाती है? जवाब दिया जाना चाहिए। किसी महापात्र ब्राह्मण के घर जाकर, उसका पानी पीकर ही उसे संतुष्ट करने में किसी सामाजिक न्याय के मसीहा को क्या मुश्किल है।


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