Saturday, 27 June 2026

न तस्य प्रतिमा अस्ति

मूर्त-अमूर्त 
न तस्य प्रतिमा अस्ति, यस्य नाम महद्यशः। (वाज. यजुर्वेद, ३२/३)
इसके २ अर्थ हैं-
(१) जिसका नाम महद्यश है, उसकी बराबरी कोई नहीं कर सकता। यह भाव महद् शब्द में भी है- सबसे महान् का अर्थ ही है, उससे सभी कम हैं, कोई बराबर नहीं है।
(२) महान् व्यक्ति या वस्तु की प्रतिमा होती है, जैसा पुरुष सूक्त आदि में है- सहस्र शीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात्। इसी अर्थ में अर्जुन ने गीता में कहा है-तेनैव रूपेण चतुर्भुजेन सहस्रबाहो भव विश्वमूर्ते। (गीता, ११/४६)।
महान् के यश की प्रतिमा नहीं होती। जैसे व्यक्ति रूप में मेरा रूप रंग, आकार आदि है। पर मेरे यश, विद्या, प्रभाव आदि का रूप या आकार नहीं है। इस अर्थ में लक्ष्मी के भी दो रूप वेद में हैं-जो सम्पत्ति दीखती है, वह लक्ष्मी है, जो नहीं दीखता वह श्री है-श्रीश्च ते लक्ष्मीश्च पत्न्यौ (वाज. यजुर्वेद, ३१/२२)। श्री अर्थात् तेज, महिमा को इसी अर्थ में अलक्ष्मी भी कहा है-या श्रीः स्वयं सुकृतिनां भवनेष्वलक्ष्मीः (चण्डी पाठ, ४/५)।
अतः सभी पदार्थों के मूर्त-अमूर्त भेद किये गये हैं। वैशेषिक दर्शन में काल भी एक पदार्थ है। सूर्य सिद्धान्त के अनुसार उसके मूर्त-अमूर्त रूप हैं। अपनी श्वास क्रिया का अनुभव होता है। उसका ४ सेकण्ड का चक्र असु है। उससे छोटे कालमान अमूर्त है, बड़े कालमान मूर्त हैं।
सांख्य दर्शन के अनुसार वस्तुओं का कई कारणों से अनुभव नहीं होता-बहुत बड़ा या बहुत सूक्ष्म, (भागवत पुराण, ३/११/१-४ भी), अपने परिवेश से भिन्न नहीं हो। अनुभव से परे को असत् कहते हैं, उसकी सत्ता है, पर पता नहीं चलता। यदि असत् की सत्ता नहीं है तो उससे सत् या दृश्य जगत् का निर्माण नहीं हो सकता। असतो सदजायत (तैत्तिरीय उपनिषद्, २/७/१)। गीता में भी कहा है कि यदि असत् का अस्तित्व नहीं होता, उससे कुछ उत्पन्न नहीं होता -नासतो विद्यते भावो, नाभावो विद्यते सतः (गीता, २/१६)।
किसकी प्रतिमा है-
ऋग्भ्यो जातां सर्वशो मूर्तिमाहुः, 
सर्वा गतिः याजुषी हैव शश्वत्।
सर्वं तेजं सामरूप्यं ह शश्वत्,
सर्वं हीदं ब्रह्मणा हैव सृष्टम्॥
(तैत्तिरीय ब्राह्मण, ३/१२/९/३)
ऋग्वेद स्पष्टतः मूर्ति रूप है।
यजुर्वेद गति रूप है, जब चक्रीय गति से उपयोगी उत्पादन हो (गीता, ३/१०, १६)। अतः यज्ञ की प्रक्रिया यजुर्वेद में है। इसमें प्रायः मूर्ति होती है, वस्तु की गति देख सकते है। यज्ञ की हवि (निर्माण के लिए प्रयुक्त सामग्री), निर्मित पदार्थ, यज्ञ वेदी तथा उपकरण आदि दृश्य हैं। उनकी मूर्ति है, कई प्रकार की वेदी निर्माण के आकार वैदिक साहित्य में वर्णित हैं। किन्तु कुछ गति नहीं दीखती है, जैसे शरीर के भीतर श्वास या रक्त सञ्चार, पाचन क्रिया। इनको भी उपकरणों से देखा जा सकता है। मानसिक विचार अमूर्त हैं, पर विचारों का क्रम लिखा जा सकता है। ऋग्वेद के अस्य वामीय सूक्त के अनुसार वाक् के तीन पद गुहा में अदृश्य हैं, बाहरी व्यक्त वाक् वैखरी का अनुभव दूसरे को भी होता है। उसे मूर्त अक्षरों में लिखा भी जाता है।
सामवेद महिमा है। उसकी मूर्ति नहीं होती। किन्तु उसकी माप के लिए चित्र बना कर गणना होती है, जैसे गुरुत्वाकर्षण बल, विद्युत् चुम्बकीय क्षेत्र आदि। महिमा या साम को प्रायः ३ भाग में देखते है, विष्णु सहस्रनाम में एक नाम है-त्रिसामा। सूर्य के प्रभाव क्षेत्र या साम को भी तीन क्षेत्रों में बांटा है-
अग्नि वायु रविभ्यस्तु त्रयं ब्रह्म सनातन (मनु स्मृति, १/२३)
पृथ्वी कक्षा तक ताप या अग्नि क्षेत्र, यूरेनस कक्षा तक सौर वायु, सौर मण्डल की सीमा ३० धाम तक प्रकाश क्षेत्र (ऋक्, १०/१८९/३)। इनको विष्णु के तीन पद भी कहा है। यह मूर्त नहीं है, पर इनकी सीमा की माप वेद में है तथा उनके चित्र बन सकते हैं।
गीता के अध्याय १५ में सभी पदार्थों को पुरुष कहा है। क्षर सभी पदार्थ हैं, उनकी मूर्ति है। उसकी क्रिया या परिचय अदृश्य है। क्रिया दीखती है। यह मूर्त-अमूर्त दोनों है।
क्षरः सर्वाणि भूतानि, कूटस्थोऽक्षर उच्यते।
अव्यय पुरुष की मूर्ति नहीं है, उसकी प्रक्रिया समझने के लिए उसे रेखांकित करते है, या वर्णन करते है।
परात्पर पुरुष कल्पना से परे है।

भारत के ४ प्रकार से त्रिविध भाग

भारत के ४ प्रकार से त्रिविध भाग हैं-(१) (क) भू लोक- विन्ध्य से दक्षिण, (ख) भुवः या मध्यम लोक (विन्ध्य-हिमालय के बीच-दिलीप को रघुवंश में यहां का राजा कहा है), (ग) त्रिविष्टप् (तिब्बत) या स्वर्ग लोक, देवतात्मा।
(२) पश्चिम, मध्य, पूर्व के ३ सप्तसिन्धु (ऋग्वेद. १०/६४/८-९, १०/७५/१-८)। मध्य भारत के सप्त सिन्धु का नाम पूजा में कहा जाता है-गङ्गे यमुने चैव गोदावरी सरस्वती। नर्मदे सिन्धु कावेरी जलेऽस्मिन् संनिधिं कुरु॥ इरावती २ हैं, मध्य भारत के पश्चिमी भाग में रावी है। किन्तु मुख्य इरावती थाइलैण्ड में हैं, जहां के हाथी को ऐरावत कहते थे (वायु पुराण, ३७/२५, ब्रह्माण्ड पुराण, २/३/७/३२६-३२७)। 
(३) अश्वक्रान्ता, रथक्रान्ता, विष्णुक्रान्ता। श्रीविद्या साधना की शिवाकान्त द्विवेदी की टीका, भाग १ (पृष्ठ १२) में इसे भारत भारत का विभाजन माना है-
विष्णुक्रान्ता = भारत का उत्तर पूर्व भाग, 
रथक्रान्ता = विन्ध्य से महाचीन (तिब्बत)
अश्वक्रान्ता-शाक्तमंगल तन्त्र के अनुसार विध्य से दक्षिण समुद्र। महासिद्धिसार के अनुसार करतोया (दक्षिण ओड़िशा की कटारधोया) नदी से जावा तक।
इन ३ क्रान्ताओं में ६४ प्रकार के तन्त्र प्रचलित हैं। 
(४) शक्तिसंगम तन्त्र, पटल द्वितीय के अनुसार हादि, कादि, सादि खण्ड। इनसे अरबी में हाजी, काजी, सादी हुआ है।
ज्योतिष ग्रन्थों में मलाट, पलाट को पणाट, मणाट कहा गया है जो प्रायः शून्य देशान्तर (उज्जैन का) रेखा पर हैं। ब्राह्मी के ळ को देवनागरी में ण या ल जैस भी पढ़ते हैं, इस कारण २ प्रकार के नाम हैं। वन्द्य देश बंगाल हो सकता है जहां वन्द्योपाध्याय (बनर्जी) गये थे।
शून्य देशान्तर रेखा के अन्य स्थान हैं (प्रायः रेखा पर)-
लङ्कातः खरनगरं सितोरुगेहं, पाणाटो मिसितपुरी तथातपर्णी।
उत्तुङ्गस्सितवरनामधेय शैलो, लक्ष्मीवत्पुरमपि वात्स्यगुल्मसंज्ञम्॥१॥
विख्याता वननगरी तथा ह्यवन्ती, स्थानेशो मुदितजनस्तथा च मेरुः।
अध्वाख्यः करणविधिस्तु मध्यमाना-मेतेषु प्रतिवसतां न विद्यते सः॥२॥
(भास्कराचार्य-१, महाभास्करीय, २/१-२)
= लंका से क्रमशः उत्तर हैं- खरनगर, सितोरुगेह, पाणाट, मिसितपुरी, आतपर्णी, सितवर पर्वत, लक्ष्मीवत् वात्स्यगुल्म (लक्ष्मी स्थान को कोल्हापुर कहते हैं, उज्जैन रेखा के निकट थोड़ा पश्चिम) , विख्यात वननगरी, अवन्ती, स्थानेश, मेरु।
लङ्का कुमारी तु ततस्तु काञ्ची, मानाटमश्वेतपुरी त्वथोदक्।
(वटेश्वर सिद्धान्त, १/८/१)

२. हादिमतस्य प्रदेशाः

कादिदेशाः समाख्याता हादिदेशान् शृणु प्रिये । अङ्गबङ्गकलिङ्ग (1) श्चकालिङ्गः स्यात् सुवीरकः ॥ २५ ॥

...

द्वितीयः पटलः

काश्मीरश्चैव काम्बोजः सौराष्ट्रो मगधस्तथा । महाराष्ट्रो मालवस्तु नेपालः केरलस्तथा ॥ २६ ॥

चोलपाञ्चालगौडाश्च मलयालश्च सिंहलः । द्रविडः कोङ्कणश्चैव कार्णाटो लाट एव च ॥ २७ ॥

मलाटश्चैव पालाटः पाण्ड्यान्धकपुलिन्दकाः । हूणकौरवगान्धारविदर्भाः सविदेहकाः ॥ २८ ॥ बाह्रीकबर्बरौ देवि कैकयः कोशलोऽपि च ।

कुन्तलश्च किरातश्च शूरसेनश्च सेवनः ॥ २९ ॥ वनाटः टङ्कणश्चैव कोङ्कणे मत्स्यमद्रकौ । मैडसैन्धवसिन्धूत्थाः पार्श्वकीकौ ततः स्मृतौ ॥ ३० ॥ योर्जालयवनौ देवि जलजालन्धसाल्वलाः । सिन्धुश्च वन्द्यदेशश्च हादिपर्यायवाचकाः ॥ ३१ ॥

२१

हादिमत के प्रदेश- यहाँ तक 'कादि' पर्याय के देश कहे गये हैं। अब हे प्रिये ! 'हादि' पर्याय के देशों को सुनिए । १. अङ्ग, २. वङ्ग, ३. कलिङ्ग, ४. कालिङ्ग, ५. सुवीरक, ६. काश्मीर, ७. काम्बोज, ८. सौराष्ट्र, ९. मगध, १०. महाराष्ट्र, ११. मालव, १२. नेपाल, १३. केरल, १४. चोल, १५. पाञ्चाल, १६. गौड़, १७. मलय, १८. सिंहल, १९. द्रविड़, २०. कोङ्कण, २१. कार्णाट, २२. लाट, २३. मलाट, २४. पालाट, २५. पाण्ड्यान्धक, २६. पुलिन्दक, २७. हूण, २८. कौरव, २९. गान्धार, ३०. विदर्भ, ३१. विदेह, ३२. वाह्लीक, ३३. वर्वर, ३४. कैकय, ३५. कोशल, ३६. कुन्तल, ३७. किरात, ३.८. शूरसेन, ३९. सेवन, ४०. वनाट, ४१. टङ्कण, ४२. कोङ्कण, ४३. मत्स्य, ४४. मद्रक, ४५. मैड, ४६. सैन्धव, ४७. सिन्धूत्थ, ४८. पार्श्व, ४९. कीक, ५०. योर्जाल, ५१. यवन, ५२. जल, ५३. जालन्धर, ५४. साल्वल, ५५. सिन्धु एवं ५६. वन्द्यदेश- इतने देश हादि मत के पर्यायवाचक हैं ।। २५-३१ ।।

देशद्वयव्यवस्था तु पूर्वतन्त्रे प्रकीर्तिता । देशभेदं च विज्ञाय पर्यायक्रममाचरेत् ॥ ३२ ॥

इन दोनों देशों की व्यवस्था हम पूर्व में तन्त्र में कह आये हैं देश के भेद को जानकर तब वहाँ के पर्याय क्रम का अनुष्ठान करे ।। ३२ ।।

श्राद्ध के बारह प्रकार

🔥 श्राद्ध के बारह प्रकार 🔥

☛ नित्य -- नैमित्तिक -- काम्य -- वृद्धिश्राद्ध -- सपिण्डिन श्राद्ध -- पार्वण श्राद्ध -- गोष्ठ श्राद्ध -- शुद्धि श्राद्ध -- कर्माङ्ग श्राद्ध -- दैविक श्राद्ध -- क्षयाह श्राद्ध -- और तुष्टि श्राद्ध ---
      
⚘ नित्य श्राद्ध -- 
                    प्रतिदिन किये जाने वाले श्राद्ध को नित्य श्राद्ध कहते हैं । उसमें विश्वेदेव की पूजा नहीं की जाती । यदि अन्न से श्राद्ध करने की शक्ति न हो तो केवल जल से भी नित्यश्राद्ध किया जा सकता है ।

⚘ नैमित्तिक श्राद्ध -- 
                   एकोद्दिष्ट श्राद्ध का नाम नैमित्तिक श्राद्ध है। 

⚘ काम्य श्राद्ध --
                  अभिष्ट वस्तु की सिद्धि के लिए कामना रखकर जो श्राद्ध किया जाता है - उसे काम्य श्राद्ध कहते हैं ।

⚘ वृद्धि श्राद्ध --
                 विवाह आदि उत्सवों के अवसर पर जो श्राद्ध किया जाता है - वह वृद्धि श्राद्ध कहलाता है ।

⚘ सपिण्डन श्राद्ध --
                ' ये सामना ' - इत्यादि मंत्रों के द्वारा किये जाने वाले श्राद्ध को सपिण्डन श्राद्ध कहते हैं ।

⚘ पार्वण श्राद्ध --
                 अमावस्या आदि पर्वो पर किये जाने वाले श्राद्ध को पार्वण श्राद्ध कहते हैं ।

⚘ गोष्ठ श्राद्ध --
                 गोशाला में जो श्राद्ध किया जाता है - वह गोष्ठ श्राद्ध है ।

⚘ शुद्धि श्राद्ध --
                 पाप शुद्धि के लिए जो श्राद्ध किया जाता है - उसे शुद्धि श्राद्ध कहते हैं ।

⚘ कर्माङ्ग श्राद्ध --
                 गर्भाधान - सोमयाग - सीमन्तोन्नयन तथा पुंसवन आदि में जो श्राद्ध किया जाता है - वह कर्माङ्ग श्राद्ध है ।

⚘ दैविक श्राद्ध --
                देवता के उद्देश्य से किये जाने वाले श्राद्ध को दैविक श्राद्ध कहते हैं ।

⚘ तुष्टि श्राद्ध --
                जो देशान्तर चला जाये - उसकी तुष्टि के लिए घी से श्राद्ध करना चाहिए - इसे तुष्टि श्राद्ध कहते हैं ।

⚘ सांवत्सरिक ( क्षयाह ) श्राद्ध --
                 बारह महिने पर जो श्राद्ध किया जाता है - उसे क्षयाह अथवा सांवत्सरिक श्राद्ध कहते हैं ।
                जो वर्ष के अंत में क्षयाह के दिन पिता और माता का आदरपूर्वक श्राद्ध नहीं करते - उनकी की हुई पूजा को मैं ( महादेव जी ) ग्रहण नहीं करता ।
                जो मनुष्य पिता की क्षयाह - तिथि को ठीक- ठीक नहीं जानता हो - उसे माघ अथवा मार्गशीर्ष की अमावस्या को सांवत्सरिक श्राद्ध करना चाहिए ।
         इन सभी श्राद्ध में सांवत्सरिक श्राद्ध सबसे श्रेष्ठ माना गया है ।
                         🚩 हर हर महादेव 🚩।।वशिष्ठ।।

अकेले रहने की आदत

एक समय के बाद हमें अकेले रहने की आदत हो जाती है और जीवन चौबीस घड़ियों के बीच यूँ रीतता चला जाता है मानो किसी घट से पानी रिस रहा हो।

दिन, महीने, साल बस यूं ही गुजरते चले जाते हैं और कई महीनों बाद किसी का फोन कॉल या किसी की याद उस तंद्रा को भंग कर देती है और अचानक आपको अहसास होता है कि अरे! सम्बन्धों के इस मकड़ी जाल संसार में आप नितान्त अकेले हो।

आप एकांत व अकेलेपन की एक नितान्त सीधी रेखा में चुपचाप प्रकाश किरण की भांति गमन कर रहे होते हो और अचानक कोई गीत, किसी फिल्म का कोई दृश्य, लम्बी यात्राओं में आपकी सामने वाली सीट पर रोमांटीसिज्म में डूबा कोई चुहलबाज कपल, किसी डाल पर चोंच लड़ाते दो पंछी आपके गमन मार्ग में अचानक अवरोध खड़ा कर देता है और आपको बोध होता है कि अरे! तुम इस संसार में कितने अकेले हो!

सच!एक समय के बाद अकेलेपन का बोध स्वयं को होना बन्द हो जाता है लेकिन निर्मल वर्मा के फ़िक्शन की भांति ये संसार आपको बार-बार याद दिलाता रहता कि तुम इस संसार में बिल्कुल अकेले हो। 
ये ठीक वैसा ही होता है जैसे कोई विधवा स्त्री अपने वैधव्य से समझौता कर चुकी हो लेकिन तीज त्यौहार, शादी ब्याह में दूसरी सुहागिनों को देखकर उसके सूने हृदय में एक शूल सी उठती हो। 
मैं इसमें संसार का कोई दोष भी नही मानता क्योंकि उलझन इस संसार में नही, उलझन तो हमारे हृदय में है।

आखिर शिव सूत्र भी यही कहता है कि चैतन्य के अलावा इस संसार में कोई आपका नही है लेकिन सांसारिक द्वन्दों व द्वैत से कम्पित इस मन को भला शास्त्रों की इस इंटेलेक्चुअल अंडरस्टैंडिंग से क्या ही सांत्वना व ठौर मिले?

संग्राम शब्द का अर्थ

संग्राम शब्द का अर्थ पूछूँ तो आप कहेंगे युद्ध।

लेकिन अथर्ववेद में संग्राम का तात्पर्य दो गांवों का सम्मेलन है। सम् + ग्राम = संग्राम। (सङ्ग्राम में सम् और ग्राम की संधि के कारण पंचमाक्षर नियम लागू हुआ और 'ग' व्यंजन के कारण ग से पूर्व ङ् का प्रयोग हुआ।) व्याकरण तो अपनी जगह है, पर अर्थ? अर्थ की तो ऐसी तैसी हो गई। भाषा विज्ञान के हिसाब से देखें तो 'अर्थविस्तार, अर्थसंकोच, अर्थप्रशस्ति, अर्थच्युति, अर्थापकर्ष,. अर्थान्तर, अर्थभ्रंश, अर्थादेश, अर्थभेद' में कौन सा मामला फिट होगा?

संग्राम में जहां जोड़ने का भाव था वहां विग्रह का भाव प्रकट हो गया। तत्सम शब्द के प्रयोग में ऐसा अर्थापकर्ष जबर्दस्त है।

"ये संग्रामाः समितयस्तेषु"- जहां ग्राम मिलते हैं, विमर्श करते हैं, हे भूमि हम आपको प्रणाम करते हैं। : अथर्ववेद

पुराण लक्षण

पुराण_लक्षण--अथर्ववेद की अथर्वसंहिता,शतपथब्राह्मण,छान्दोग्य,बृहदारण्यक, तैत्तिरीयारण्यक, आश्वलायनगृहसूत्र, आपस्तम्बधर्मसूत्र,मनुसंहिता,रामायण,महाभारत(एक उदाहरण निम्नलिखित है) में किया गया है।

 अथर्वसंहिता के 'ऋचः सामानि छन्दांसि पुराणं यजुषा सह' (अथर्व ११,७,२४) इस मत का 'ऋक्, साम, छन्द और पुरा के साथ उत्पन्न हुए' यह स्फुट अर्थ है। बृहदारण्यक और शतपथब्राह्मण में एक स्थान पर यह वर्णन किया गया है कि 'जिस प्रकार गीले काष्ठ से उत्पन्न अग्नि से पृथक् पृथक् धुआँ निकलता है, उसी प्रकार इस महान् भूत के निःश्वास से ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद, इतिहास, पुराण, विद्या, उपनिषत्, श्लोक, सूत्र, व्याख्यान और अनुव्याख्यान निकले हैं। ये सभी इनके निःश्वास हैं।' इसमें भी 'पुराण' का इतिहासादि से पृथक् कथन किया गया है। छान्दोग्योपनिषत् के 'होवाच ऋग्वेदं भगवोऽध्येमि यजुर्वेदमाथर्वणं चतुर्थमितिहासं पुराणं पञ्चमं वेदानां वेदम्।' (छान्दोग्य उ० ७, १.१) इस वचन द्वारा 'पुराण' भी वेद-समूह में पाँचवाँ वेद माना गया है। इसी प्रकार महाभारत और रामायण में भी पुराण शब्द का अनेक स्थलों पर प्रयोग हुआ है। भगवान् शंकराचार्य ने बृहदारण्यक के भाष्य में 'पुराण' शब्द की व्याख्या की है। उनका कहना है कि 'वेदों में उर्वशी और पुरूरवा के कथोपकथन आदि ब्राह्मणभाग का नाम इतिहास और सबसे पहले एकमात्र असत् था इत्यादि सृष्टि-प्रक्रिया के घटित वृत्तान्त का नाम पुराण है।' इसी प्रकार आचार्य सायण ने भी वेदों में आये हुये पुराण शब्द की निरुक्ति करते हुए सृष्टि-प्रक्रिया-घटित वृत्तान्त को 'पुरा' माना है। शंकराचार्य एवं सायण की परिभाषा के अतिरिक्त महाभारत एवं रामायण में पुराणों का जो परिचय दिया गया है, उसमें सृष्टि-प्रक्रिया-घटित वृत्तान्तों के अतिरिक्त अन्य विषयों का भी उल्लेख किया गया है।

 महाभारत के आदि पर्व में महर्षि शौनक ने कहा है-

पुराणे हि कथा दिव्या आदिवंशाश्च धीमताम्।
कथ्यन्ते ये पुराऽस्माभिः श्रुतपूर्वं पितुस्तव ।।(महाभारत आदिपर्व ५, २)।

★भगवद्पादाचार्य आदि शंकराचार्य जी को पुराणों ने स्वतः सिद्ध किया है उदाहरणार्थ-- "ब्रह्मा कृतयुगे देवस्त्रेतायां भगवान्नविः । द्वापरे दैवतं विष्णुः कलौदेवो महेश्वरः।।"(कूर्मपुराण १.२९.११),
★शङ्कर इसलिए क्योंकि शिवावतार हैं और आचार्य/जगद्गुरु इसलिए क्योंकि श्रुति का भाष्य ,ब्रह्मसूत्र भाष्य(बादरायण) किए हैं अतः गुरु-शिष्य परम्परया में जो भी गद्दी पर बैठते हैं वे जगद्गुरु शंकराचार्य कहलाते और सूक्ष्म तत्त्व दृष्टि से शिवावतार ही होते हैं।
★निम्बार्काचार्य की गद्दी पर बैठने वाले तत्त्वतः निम्बार्काचार्य ही होते।
★रामानुजाचार्य की गद्दी पर बैठने वाले जगद्गुरु रामानुजाचार्य ही होते हैं।

जगन्नाथ पुरी अविवाहित प्रेमी जोड़े न करें दर्शन

जगन्नाथ पुरी को है राधा रानी का श्राप, अविवाहित प्रेमी जोड़े न  करें दर्शन !

जगन्नाथ पुरी ओडिशा के बारे में यह परंपरा और मान्यता लंबे समय से चली आ रही है कि अविवाहित जोड़े या प्रेमी जोड़े मंदिर में दर्शन करने नहीं जाते।

इसके पीछे कुछ धार्मिक, सांस्कृतिक और पौराणिक कारण बताए जाते हैं। श्री जगन्नाथ मंदिर दुनिया के सबसे प्राचीन और कठोर अनुशासन वाले मंदिरों में से एक है। यहां परंपरा है कि केवल वही व्यक्ति मंदिर में प्रवेश करे जो सामाजिक और धार्मिक दृष्टि से गृहस्थ धर्म का पालन करता हो। अविवाहित प्रेमी जोड़े को मंदिर की मर्यादा के अनुसार अनुचित माना जाता है इसलिए उन्हें प्रवेश से हतोत्साहित किया जाता है।

राधा_रानी_का_श्राप:- प्राचीन पौराणिक कथा और लोक किवदंती के अनुसार एक समय राधारानी जगन्नाथ पुरी में दर्शनों के लिए गई लेकिन वहां के पुजारियों ने उन्हें दर्शन नहीं करने दिए। पुजारियों का कहना था की वे श्रीकृष्ण की प्रेमिका हैं पत्नी नहीं। न केवल राधा रानी बल्कि भगवान की अन्य पटरानियों और रानियों को भी मंदिर में प्रवेश करने की अनुमति नहीं है। राधारानी ने भगवान जगन्नाथ के दर्शन न कर पाने के कारण श्राप दिया था की इस मंदिर में कोई भी प्रेमी युगल अथवा अविवाहित जोड़ा प्रवेश नहीं कर पाएगा। अगर वो ऐसा करेगा तो उनका अलगाव हो जाएगा और वो जीवन में कभी भी सच्चा प्रेम सुख प्राप्त नहीं कर पाएंगे।

भगवान_जगन्नाथ_का_स्वरूप:- भगवान जगन्नाथ को परब्रह्म माना जाता है लेकिन उनके स्वरूप में शालिग्राम, नारायण और कृष्ण तीनों ही भाव झलकते हैं। यहां भगवान जगन्नाथ का रूप बहुत पवित्र और सांकेतिक है। मान्यता है कि यह स्थान पारिवारिक जीवन की मर्यादा का प्रतीक है, इसलिए यहां केवल पति-पत्नी या परिवार के सदस्य दर्शन के लिए उचित माने जाते हैं।

लोक_मान्यता:- पुरी के स्थानीय लोगों का मानना है कि अविवाहित प्रेमी जोड़े मंदिर में दर्शन करें तो उनके रिश्ते में बाधाएं आती हैं। ऐसी मान्यता है कि भगवान जगन्नाथ उस रिश्ते को मान्यता नहीं देते, जो समाज और धर्म की परिभाषा में विवाह से बंधा न हो।

किंवदंती:- कुछ लोककथाओं के अनुसार एक समय अविवाहित जोड़े ने मंदिर में प्रवेश किया था और उनके रिश्ते में अलगाव हो गया। तभी से यह मान्यता और सख़्त हो गई कि ऐसे जोड़े को मंदिर नहीं जाना चाहिए।

ज्योतिषीय_दृष्टि:- ज्योतिष के अनुसार, जगन्नाथपुरी मूलाधार चक्र और धर्म-संस्कार का केंद्र माना जाता है। यह स्थान व्यक्ति को उसके जीवन की स्थिरता और धर्म मार्ग पर ले जाने के लिए है। यहां अधूरी या अस्थिर (विवाह रहित) स्थिति को स्वीकार नहीं किया जाता।

अविवाहित प्रेमी जोड़े को जगन्नाथपुरी मंदिर में दर्शन से रोका नहीं जाता लेकिन परंपरागत रूप से उन्हें हतोत्साहित किया जाता है। इसका मूल कारण मंदिर की पवित्रता, मर्यादा और धार्मिक मान्यता है। यह नियम धर्म, समाज और परंपरा को सुरक्षित रखने के लिए है, न कि केवल प्रतिबंध लगाने के लिए।