दिन, महीने, साल बस यूं ही गुजरते चले जाते हैं और कई महीनों बाद किसी का फोन कॉल या किसी की याद उस तंद्रा को भंग कर देती है और अचानक आपको अहसास होता है कि अरे! सम्बन्धों के इस मकड़ी जाल संसार में आप नितान्त अकेले हो।
आप एकांत व अकेलेपन की एक नितान्त सीधी रेखा में चुपचाप प्रकाश किरण की भांति गमन कर रहे होते हो और अचानक कोई गीत, किसी फिल्म का कोई दृश्य, लम्बी यात्राओं में आपकी सामने वाली सीट पर रोमांटीसिज्म में डूबा कोई चुहलबाज कपल, किसी डाल पर चोंच लड़ाते दो पंछी आपके गमन मार्ग में अचानक अवरोध खड़ा कर देता है और आपको बोध होता है कि अरे! तुम इस संसार में कितने अकेले हो!
सच!एक समय के बाद अकेलेपन का बोध स्वयं को होना बन्द हो जाता है लेकिन निर्मल वर्मा के फ़िक्शन की भांति ये संसार आपको बार-बार याद दिलाता रहता कि तुम इस संसार में बिल्कुल अकेले हो।
ये ठीक वैसा ही होता है जैसे कोई विधवा स्त्री अपने वैधव्य से समझौता कर चुकी हो लेकिन तीज त्यौहार, शादी ब्याह में दूसरी सुहागिनों को देखकर उसके सूने हृदय में एक शूल सी उठती हो।
मैं इसमें संसार का कोई दोष भी नही मानता क्योंकि उलझन इस संसार में नही, उलझन तो हमारे हृदय में है।
आखिर शिव सूत्र भी यही कहता है कि चैतन्य के अलावा इस संसार में कोई आपका नही है लेकिन सांसारिक द्वन्दों व द्वैत से कम्पित इस मन को भला शास्त्रों की इस इंटेलेक्चुअल अंडरस्टैंडिंग से क्या ही सांत्वना व ठौर मिले?
No comments:
Post a Comment