☛ नित्य -- नैमित्तिक -- काम्य -- वृद्धिश्राद्ध -- सपिण्डिन श्राद्ध -- पार्वण श्राद्ध -- गोष्ठ श्राद्ध -- शुद्धि श्राद्ध -- कर्माङ्ग श्राद्ध -- दैविक श्राद्ध -- क्षयाह श्राद्ध -- और तुष्टि श्राद्ध ---
⚘ नित्य श्राद्ध --
प्रतिदिन किये जाने वाले श्राद्ध को नित्य श्राद्ध कहते हैं । उसमें विश्वेदेव की पूजा नहीं की जाती । यदि अन्न से श्राद्ध करने की शक्ति न हो तो केवल जल से भी नित्यश्राद्ध किया जा सकता है ।
⚘ नैमित्तिक श्राद्ध --
एकोद्दिष्ट श्राद्ध का नाम नैमित्तिक श्राद्ध है।
⚘ काम्य श्राद्ध --
अभिष्ट वस्तु की सिद्धि के लिए कामना रखकर जो श्राद्ध किया जाता है - उसे काम्य श्राद्ध कहते हैं ।
⚘ वृद्धि श्राद्ध --
विवाह आदि उत्सवों के अवसर पर जो श्राद्ध किया जाता है - वह वृद्धि श्राद्ध कहलाता है ।
⚘ सपिण्डन श्राद्ध --
' ये सामना ' - इत्यादि मंत्रों के द्वारा किये जाने वाले श्राद्ध को सपिण्डन श्राद्ध कहते हैं ।
⚘ पार्वण श्राद्ध --
अमावस्या आदि पर्वो पर किये जाने वाले श्राद्ध को पार्वण श्राद्ध कहते हैं ।
⚘ गोष्ठ श्राद्ध --
गोशाला में जो श्राद्ध किया जाता है - वह गोष्ठ श्राद्ध है ।
⚘ शुद्धि श्राद्ध --
पाप शुद्धि के लिए जो श्राद्ध किया जाता है - उसे शुद्धि श्राद्ध कहते हैं ।
⚘ कर्माङ्ग श्राद्ध --
गर्भाधान - सोमयाग - सीमन्तोन्नयन तथा पुंसवन आदि में जो श्राद्ध किया जाता है - वह कर्माङ्ग श्राद्ध है ।
⚘ दैविक श्राद्ध --
देवता के उद्देश्य से किये जाने वाले श्राद्ध को दैविक श्राद्ध कहते हैं ।
⚘ तुष्टि श्राद्ध --
जो देशान्तर चला जाये - उसकी तुष्टि के लिए घी से श्राद्ध करना चाहिए - इसे तुष्टि श्राद्ध कहते हैं ।
⚘ सांवत्सरिक ( क्षयाह ) श्राद्ध --
बारह महिने पर जो श्राद्ध किया जाता है - उसे क्षयाह अथवा सांवत्सरिक श्राद्ध कहते हैं ।
जो वर्ष के अंत में क्षयाह के दिन पिता और माता का आदरपूर्वक श्राद्ध नहीं करते - उनकी की हुई पूजा को मैं ( महादेव जी ) ग्रहण नहीं करता ।
जो मनुष्य पिता की क्षयाह - तिथि को ठीक- ठीक नहीं जानता हो - उसे माघ अथवा मार्गशीर्ष की अमावस्या को सांवत्सरिक श्राद्ध करना चाहिए ।
इन सभी श्राद्ध में सांवत्सरिक श्राद्ध सबसे श्रेष्ठ माना गया है ।
🚩 हर हर महादेव 🚩।।वशिष्ठ।।
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