अथर्वसंहिता के 'ऋचः सामानि छन्दांसि पुराणं यजुषा सह' (अथर्व ११,७,२४) इस मत का 'ऋक्, साम, छन्द और पुरा के साथ उत्पन्न हुए' यह स्फुट अर्थ है। बृहदारण्यक और शतपथब्राह्मण में एक स्थान पर यह वर्णन किया गया है कि 'जिस प्रकार गीले काष्ठ से उत्पन्न अग्नि से पृथक् पृथक् धुआँ निकलता है, उसी प्रकार इस महान् भूत के निःश्वास से ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद, इतिहास, पुराण, विद्या, उपनिषत्, श्लोक, सूत्र, व्याख्यान और अनुव्याख्यान निकले हैं। ये सभी इनके निःश्वास हैं।' इसमें भी 'पुराण' का इतिहासादि से पृथक् कथन किया गया है। छान्दोग्योपनिषत् के 'होवाच ऋग्वेदं भगवोऽध्येमि यजुर्वेदमाथर्वणं चतुर्थमितिहासं पुराणं पञ्चमं वेदानां वेदम्।' (छान्दोग्य उ० ७, १.१) इस वचन द्वारा 'पुराण' भी वेद-समूह में पाँचवाँ वेद माना गया है। इसी प्रकार महाभारत और रामायण में भी पुराण शब्द का अनेक स्थलों पर प्रयोग हुआ है। भगवान् शंकराचार्य ने बृहदारण्यक के भाष्य में 'पुराण' शब्द की व्याख्या की है। उनका कहना है कि 'वेदों में उर्वशी और पुरूरवा के कथोपकथन आदि ब्राह्मणभाग का नाम इतिहास और सबसे पहले एकमात्र असत् था इत्यादि सृष्टि-प्रक्रिया के घटित वृत्तान्त का नाम पुराण है।' इसी प्रकार आचार्य सायण ने भी वेदों में आये हुये पुराण शब्द की निरुक्ति करते हुए सृष्टि-प्रक्रिया-घटित वृत्तान्त को 'पुरा' माना है। शंकराचार्य एवं सायण की परिभाषा के अतिरिक्त महाभारत एवं रामायण में पुराणों का जो परिचय दिया गया है, उसमें सृष्टि-प्रक्रिया-घटित वृत्तान्तों के अतिरिक्त अन्य विषयों का भी उल्लेख किया गया है।
महाभारत के आदि पर्व में महर्षि शौनक ने कहा है-
पुराणे हि कथा दिव्या आदिवंशाश्च धीमताम्।
कथ्यन्ते ये पुराऽस्माभिः श्रुतपूर्वं पितुस्तव ।।(महाभारत आदिपर्व ५, २)।
★भगवद्पादाचार्य आदि शंकराचार्य जी को पुराणों ने स्वतः सिद्ध किया है उदाहरणार्थ-- "ब्रह्मा कृतयुगे देवस्त्रेतायां भगवान्नविः । द्वापरे दैवतं विष्णुः कलौदेवो महेश्वरः।।"(कूर्मपुराण १.२९.११),
★शङ्कर इसलिए क्योंकि शिवावतार हैं और आचार्य/जगद्गुरु इसलिए क्योंकि श्रुति का भाष्य ,ब्रह्मसूत्र भाष्य(बादरायण) किए हैं अतः गुरु-शिष्य परम्परया में जो भी गद्दी पर बैठते हैं वे जगद्गुरु शंकराचार्य कहलाते और सूक्ष्म तत्त्व दृष्टि से शिवावतार ही होते हैं।
★निम्बार्काचार्य की गद्दी पर बैठने वाले तत्त्वतः निम्बार्काचार्य ही होते।
★रामानुजाचार्य की गद्दी पर बैठने वाले जगद्गुरु रामानुजाचार्य ही होते हैं।
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