Saturday, 28 March 2026

चक्र व्यूह

गीता : प्रथम श्लोक ६(७)

कभी कभी मुझे यह प्रश्न उलझा देता है कि अभिमन्यु ने जिस चक्रव्यूह की विद्या को अधूरा गर्भ में सीख लिया था, वह विद्या उसे जन्म के बाद के सोलह वर्षों में क्यों पूरी सिखाई न गई। महाभारत में कहीं भी यह उल्लेख नहीं है कि किसी ने — अर्जुन ने, कृष्ण ने, द्रोण ने — अभिमन्यु को बाद में चक्रव्यूह-भेदन की पूरी विद्या सिखाने का प्रयास किया। यह चुप्पी स्वयं एक पाठ है। एक सूक्ष्म किन्तु महत्त्वपूर्ण प्रश्न — क्या अर्जुन को स्मरण था कि उसने सुभद्रा को यह विद्या सुनाई थी, और कि वह अधूरी रह गई? संस्कृत टीकाकार इस पर मौन हैं। यदि अर्जुन जानते थे, तो यह उनकी सबसे बड़ी चूक है। यदि नहीं जानते थे, तो महाकाव्य की यह त्रासद विडम्बना और भी गहरी हो जाती है।

द्रोण ने अभिमन्यु को असंख्य अस्त्र-विद्याएँ सिखाईं होंगी किन्तु चक्रव्यूह-भेदन केवल अर्जुन की विशेष विद्या थी। यह द्रोण के पास भी पूर्णतः नहीं थी उसी रूप में। तो यह ज्ञान देना केवल अर्जुन का काम था — और अर्जुन चूक गये ।

कुरुक्षेत्र-युद्ध अचानक नहीं आया, किन्तु जब आया तो हर महारथी अपनी-अपनी तैयारी में व्यस्त था। जो ज्ञान की कमी थी वह दिखाई नहीं दी — क्योंकि किसी को यह अनुमान नहीं था कि अभिमन्यु को अकेले चक्रव्यूह में भेजना पड़ेगा।

क्या जो ज्ञान जन्म के समय अधूरा रह जाता है, उसे जीवन में पूरा किया जा सकता है?महाभारत का उत्तर क्रूर किन्तु ईमानदार है: कभी-कभी नहीं। कि कुछ अधूरापन संरचनात्मक होता है। वह व्यक्ति की असावधानी नहीं, परिस्थिति की नियति है। और वह अधूरापन ही उस व्यक्ति की त्रासदी बनता है। न उसकी कमज़ोरी से, न शत्रु की चालाकी से, बल्कि उस रिक्तता से जो किसी ने भरी नहीं, क्योंकि किसी ने देखा ही नहीं कि वह रिक्तता है।यही अभिमन्यु की असली त्रासदी है और यही उसे शाश्वत बनाती है।

मैं महाभारतकार के हिसाब से सोचूँ तो यदि अभिमन्यु ने वह विद्या पूरी सीख ली होती, वह चक्रव्यूह से जीवित निकल जाता। और तब?

कुरुक्षेत्र का परिणाम भिन्न होता।परीक्षित की आवश्यकता न होती उसी रूप में और सबसे महत्त्वपूर्ण अर्जुन का जयद्रथ-वध नहीं होता, जो महाभारत के सबसे भव्य प्रतिशोध-प्रसंगों में से एक है।

महाकाव्य को अभिमन्यु की मृत्यु चाहिए थी। जागतिक कारणों से, आख्यान-कारणों से, और नैतिक-कारणों से। इसीलिए न किसी को सूझा, न किसी ने किया।

महाभारत युद्ध होने से पूर्व द्रौपदी के चीरहरण के समय जो नैतिक पतन देखने में आया, महाभारत युद्ध के दौरान वही नैतिक पतन अभिमन्यु के साथ युद्ध में देखने आया। एक में कौरव सभा के आदरणीयों की चुप्पी थी, दूसरे में कौरव सभा के आदरणीयों की संलिप्तता थी। बल्कि द्रौपदी के समय फिर भी विकर्ण की आवाज विरोध में उठी थी, अभिमन्यु के क्षण किसी ने भी विरोध नहीं किया था। चीरहरण में भीष्म, द्रोण, कृप जानते थे कि जो हो रहा है वह अधर्म है। किन्तु वे चुप रहे। यह कायरता थी, नैतिक विफलता थी — किन्तु उनके हाथ उस पाप में प्रत्यक्षतः नहीं थे।द्रौपदी ने स्वयं पूछा था —क्या इस सभा में कोई धर्म जानने वाला नहीं?" और सभा मौन रही।अभिमन्यु-वध में वही द्रोण, वही कृप इस बार स्वयं उस पाप के उपकरण बन गए। उन्होंने केवल देखा नहीं, उन्होंने किया। एक बार एक असहाय स्त्री पर अत्याचार होते देखा। एक बार एक नि:शस्त्र किशोर पर स्वयं अत्याचार किया।

विशुद्ध नैतिक दृष्टिकोण से, अभिमन्यु की हत्या महाकाव्य-साहित्य में सर्वाधिक सावधानीपूर्वक निर्मित नैतिक अत्याचारों में से एक है। महाभारत धर्म-युद्ध के प्रत्येक नियम का क्रमिक उल्लंघन स्थापित करने में अत्यन्त सतर्क है: कर्ण ने उसका धनुष तोड़ा; कृतवर्मा ने उसके अश्व मारे; कृपाचार्य ने उसके सारथी को मारा; अश्वत्थामा ने उसकी ध्वजा काटी; और अन्ततः, जब वह निःशस्त्र था, अनेक महारथियों ने घेरकर उसे मारा। महाकाव्य इनमें से प्रत्येक उल्लंघन का स्पष्ट वर्णन करता है, और अभिमन्यु की प्रतिक्रिया का भी — वह लड़ता रहता है, नए अस्त्र खोजता है, रथ-चक्र से युद्ध करता है, कभी नहीं रुकता, कभी नहीं भागता।

महाकाव्य यह दिखाता है कि नैतिक पतन एकाएक नहीं होता। यह क्रम यों चलता है: 
मौन देखना
    ↓
मौन स्वीकृति
    ↓
निष्क्रिय सहभागिता
    ↓
सक्रिय संलिप्तता
    ↓
नेतृत्व में पाप

चीरहरण पहला पड़ाव था — जब इन महापुरुषों ने मौन रहकर यह सिखाया कि संस्था, स्वामिभक्ति और व्यक्तिगत सुरक्षा धर्म से बड़े हैं। अभिमन्यु-वध अन्तिम पड़ाव था — जब वही संस्था-निष्ठा उन्हें एक किशोर की हत्या में सीधे भागीदार बना गई।

कौरवों के ये प्रसंग नैतिकता पर संस्थागत निष्ठा की विजय बताने के प्रसंग हैं। दोनों प्रसंगों में एक समान सूत्र है — इन महापुरुषों ने व्यक्तिगत धर्म को संस्था-धर्म के नीचे दबा दिया। भीष्म की प्रतिज्ञा, द्रोण का नमक, कृप का कुलधर्म — ये सब संस्थागत बन्धन थे जो उन्हें बार-बार वह करने पर विवश करते रहे जो वे जानते थे कि अधर्म है। यही महाभारत का सबसे आधुनिक सन्देश है कि जो व्यक्ति एक बार संस्था के नाम पर मौन रहना सीख लेता है, वह धीरे-धीरे संस्था के नाम पर पाप करना भी सीख लेता है। चुप्पी और संलिप्तता के बीच की दूरी उतनी नहीं होती जितनी हम सोचते हैं।

द्रौपदी और अभिमन्यु दोनों इसके साक्षी हैं। द्रौपदी बची — किन्तु उसका अपमान महाभारत युद्ध का कारण बना। अभिमन्यु नहीं बचा — किन्तु उसकी मृत्यु महाभारत युद्ध का नैतिक केन्द्र बन गई। दोनों ने कौरव-पक्ष के महापुरुषों का असली चेहरा उघाड़ा। एक ने उनकी कायरता दिखाई, दूसरे ने उनका पतन।

इस निर्माण का नैतिक महत्त्व गहन है। महाभारत गहराई से इस प्रश्न में निवेशित है कि धर्म कब अपने स्वयं के नियमों से विचलन की अनुमति देता है। वास्तव में, सम्पूर्ण भगवद्गीता इसी प्रश्न पर विस्तारित ध्यान है। किन्तु अभिमन्यु की हत्या एक ऐसा मामला है जिसमें महाकाव्य कोई शमन-तर्क नहीं देता। यह असामान्य है, क्योंकि महाभारत सामान्यतः अपने सभी पात्रों के प्रति कठोरता से न्यायसंगत है। अभिमन्यु के हत्यारों की अशमनीय नैतिक निन्दा यह संकेत देती है कि उसकी मृत्यु युद्ध का नैतिक रसातल है।

पांडव मुझे इसीलिए पसंद हैं क्योंकि उन्होंने इन दोनों ही अन्यायों को भुलाया नहीं। अन्याय सहकर चुप बैठते तो वे भी कौरव पक्ष के इन महापुरुषों की श्रेणी में शामिल होते। 

और कौरव इसीलिए नापसंद हैं क्योंकि वे अधिक से और अधिक रसातल में गिरते गये। अश्वत्थामा पर चर्चा हम बाद में करेंगे पर आखिरी दिन उसके द्वारा किया गया कृत्य नैतिक अधोकाष्ठा का निकृष्टतम दृष्टान्त थी।

और देखिए कि वही द्रौपदी पतन के इस चरमतम क्षण पर अपने पितृपक्ष के सभी लोगों के मारे जाने बल्कि सबसे कायर तरीके से मारे जाने पर ही नहीं बल्कि अपने सभी पुत्रों के मारे जाने पर भी अश्वत्थामा को क्षमा कर देती है।प्रतिशोध से क्षमा तक की भी एक यात्रा है इस महाकाव्य में।

वनवास में जब भीम हताश होते हैं, जब अर्जुन अस्त्र-प्राप्ति के लिए जाते हैं और लौटने में विलम्ब होता है, जब युधिष्ठिर में निराशा घर करने लगती है — तब द्रौपदी वह स्त्री है जो सबको सँभालती है। वह एक साथ दो असम्भव काम करती है — अपने क्रोध को जीवित रखती है ताकि न्याय के लिए संघर्ष की आग बुझे नहीं, और अपने परिवार की आशा को जीवित रखती है ताकि वे टूट न जाएँ। यह असाधारण मनोवैज्ञानिक सन्तुलन है। और यह सन्तुलन ही उसे महाकाव्य की सबसे परिपक्व आत्मा बनाता है।

द्रौपदी अपनी पीड़ा से क्षमा तक पहुँचती है — किसी आदर्श से नहीं, किसी धर्मशास्त्र के उपदेश से नहीं। वह कहती है — मैं जानती हूँ एक माँ का दर्द क्या होता है। इसलिए मैं उस माँ को यह पीड़ा नहीं दूँगी। यह empathy का सर्वोच्च रूप है — वह empathy जो अपनी पीड़ा के चरमतम क्षण में भी दूसरे की पीड़ा देख सके।

पूरे महाभारत में द्रौपदी और युधिष्ठिर के बीच एक निरन्तर नैतिक संवाद चलता है।युधिष्ठिर कहते हैं — क्षमा करो, धर्म पर छोड़ो, क्रोध त्यागो।द्रौपदी कहती है — क्षमा कायरता बन जाती है जब अन्याय करने वाला पश्चाताप न करे।दोनों गलत नहीं हैं। दोनों एक ही सत्य के दो पक्ष हैं।किन्तु जो बात उल्लेखनीय है वह यह है कि युद्ध के अन्त में द्रौपदी वहाँ पहुँचती है जहाँ युधिष्ठिर सदा थे — क्षमा तक। और युधिष्ठिर वहाँ पहुँचते हैं जहाँ द्रौपदी थी — शोक तक।दोनों एक-दूसरे की यात्रा करते हैं। यह महाकाव्य का अद्भुत वैवाहिक मनोविज्ञान है।

जिसे सबसे अधिक खोना पड़ा, जिसे सबसे अधिक अधिकार था प्रतिशोध का — वह क्षमा तक पहुँची।यही महाभारत का सन्देश है कि प्रतिशोध न्याय का प्रारम्भ हो सकता है। किन्तु क्षमा उसकी परिणति है — जब वह करुणा से जन्मे, दुर्बलता से नहीं। द्रौपदी ने यह यात्रा पूरी की। अग्नि से जन्मी स्त्री अन्त में प्रकाश बन गई।

अभिमन्यु को कृष्ण की तरह दो दो माताओं सुभद्रा और द्रौपदी का स्नेह मिला था हालाँकि महाकाव्य उन दोनों के मातृस्नेह का वैसाविस्तृत विवरण नहीं देता लेकिन वह था। अभिमन्यु इस महाकाव्य के समाजशास्त्रीय जगत् में वह है जिसे आज हम बाल-प्रतिभा कहते हैं। एक ऐसा पात्र जिसकी प्रतिभा उसके अनुभव और आयु से इतनी अधिक है कि उसके चारों ओर का सामाजिक तन्त्र उसे वयस्क मानता है, उस पर वयस्क भार और अपेक्षाएँ थोपता है। वह सर्वाधिक घातक स्थिति में अपनी युवावस्था के बावजूद नहीं बल्कि किसी अर्थ में उसके कारण ही भेजा जाता है।

पूर्व-जन्म के ज्ञान-संचरण प्रसंग का एक समाजशास्त्रीय आयाम है जिस पर अपर्याप्त ध्यान दिया गया है। वह है इसकी लिंग-संरचना चक्रव्यूह का ज्ञान एक सर्वोच्च सैन्य रहस्य है वह, एक ऐसी स्त्री के पास संचारित किया जा रहा था जो केवल एक माध्यम के रूप में उपस्थित थी। सुभद्रा की नींद ने संचरण को बाधित किया, और पारम्परिक व्याख्या उसे इसके लिए दोषी नहीं मानती।वह बस सो गई। किन्तु संरचनात्मक व्यवस्था प्रकट करती है: ज्ञान अर्जुन का था, अभिमन्यु को प्राप्त करना था, और सुभद्रा का शरीर ही वह माध्यम था जिसके द्वारा संचरण को गुज़रना था।

इसलिए गीता को अभिमन्यु को सौभद्र कहना उचित ही लगता है।

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