Thursday, 19 March 2026

भारतीय इतिहास के युग-

भारतीय इतिहास के युग-(१) अन्धकार युग-मनुष्य उत्पत्ति प्रायः ३० लाख वर्ष पुरानी है, पर प्राचीन काल का विवरण उपलब्ध नहीं है। मनुष्य वन में प्रायः पशु जैसा रहते थे ऐसा अनुमान है। वृक्ष की शाखा जैसा घर बनाना आरम्भ हुआ अतः घर को शाला (शाखा जैसा) कहा गया (वायु पुराण, अध्याय ८, ब्रह्माण्ड पुराण, अध्याय १/७)। 
(२) आदि कृत युग-भारत में ऐतिहासिक युग चक्र १२,००० वर्ष का माना गया है जिसमें आगम के अनुसार बीज संस्कार का वर्णन भास्कराचार्य तथा ब्रह्मगुप्त ने किया है (सिद्धान्त शिरोमणि, भू परिधि, ७-८, ब्राह्म-स्फुट सिद्धान्त, सुधाकर द्विवेदी संस्करण, १९०२, मध्यमाधिकार, ६०-६१)। ब्रह्माब्द में पहले १२,००० वर्ष का अवसर्पिणी क्रम तथा उसके बाद उतने ही काल का उत्सर्पिणी क्रम होता है। अवसर्पिणी में सत्य युग ४८००, त्रेता ३६००, द्वापर २४००, कलि १२०० वर्ष के होते हैं। उत्सर्पिणी में विपरीत क्रम में कलि से सत्य युग तक होते हैं। अभी ब्रह्माब्द का तृतीय युग चल रहा है जिसका आरम्भ वैवस्वत मनु के समय से हुआ। वैवस्वत मनु के बाद सत्य, त्रेता, द्वापर की समाप्ति ३१०२ ईपू में हुई, अतः उनका समय १३९०२ ईपू है। अतः आदि कृत युग काल ६१९०२ से ५७१०२ ईपू तक है। इस युग में मणिजा सभ्यता द्वारा खनिज निष्कासन आरम्भ हुआ था तथा उस काल के खानों के अवशेष विश्व भर में मिलते हैं। (वायु पुराण, अध्याय ३१ आदि)
(३) ब्रह्मा काल-ब्रह्माण्ड पुराण (१/२/२९/, १९, ३६, ३७), मत्स्य पुराण (२७३/७७-७८) आदि के अनुसार स्वायम्भुव मनु या मनुष्य ब्रह्मा कलि आरम्भ से २६,००० वर्ष पूर्व हुए थे। अतः २९१०२ ईपू इनके युग की समाप्ति का काल मान सकते हैं। महाभारत, शान्ति पर्व, अध्याय ३४९-३५० के अनुसार ७ मनुष्य व्रह्मा हुए थे। वायु पुराण (९/४६; ३१/३, ५, २९) इनका काल आद्य त्रेता में कहता है (३३१०२-२९५०२ ईपू)।
(४) मन्वन्तर काल-स्वायम्भुव से वैवस्वत मनु तक ७ मनु हुए। ७ सावर्णि मनु भी इनके ही सम्बन्धी थे, अतः इसी काल में वे भी हुए। समान अवधि मानने पर इनका काल है- 
क्रम मनु सावर्णि मनु काल (ईपू)
१ स्वायम्भुव इन्द्र ३३१०२-२९१०२
२ स्वारोचिष देव २९१०२-२६०६२
३ उत्तम रुद्र २६०६२-२३०२२
४ तामस धर्म २३०२२-१९९८२
५ रैवत ब्रह्म १९९८२-१६९४२
६ चाक्षुष दक्ष १६९४२-१३९०२
७ वैवस्वत मेरु १३९०२-८५७६
इस काल में देव-असुर सभ्यता कश्यप से आरम्भ हुई। उस काल में पुनर्वसु नक्षत्र में विषुव संक्रान्ति होती थी, जिसका देवता अदिति है। दिति-अदिति को कश्यप की पत्नियां कहते हैं। अतः शान्ति पाठ में कहते हैं-अदितिर्जातम्, अदितिर्जनित्वम् = अदिति (पुनर्वसु) से संवत्सर आरम्भ हुआ, उसी से अन्त हुआ। यह समय १७,५०० ईपू में था। इसके बाद १० युग = ३६,०० वर्ष तक असुर प्रभुत्व कहा है, जिसके बाद वैवस्वत मनु काल हुआ। (ब्रह्माण्ड पुराण, २/३/७२, वायु पुराण, ९८/५१)
(५) वैवस्वत मनु काल- इनका काल १३९०२ ईपू. में आरम्भ होता है। इनके पिता विवस्वान् ने स्वायम्भुव मनु के पितामह सिद्धान्त के स्थान पर सूर्य सिद्धान्त की ज्योतिष पद्धति निकाली जिसमें १२,००० वर्षों की युग पद्धति बनायी। इस चतुर्युग गणना का आरम्भ यदि ब्रह्मा से होता तो उनसे सत्ययुग का आरम्भ होता, पर विवस्वान् गणना से वे आद्य त्रेता में थे। वेद में भी ब्रह्म सम्प्रदाय के बाद आदित्य सम्प्रदाय का प्रचलन हुआ, जिसका विस्तार योगी याज्ञवल्क्य ने किया। पितामह सिद्धान्त का उद्धार ३६० कलि वर्ष (२७४२ ईपू) में आर्यभट ने किया। आर्यभट को ग्रीक ज्योतिष की नकल दिखाने के लिए उनका समय ३६० के बदले ३६०० कलि किया गया। आज तक वह ग्रीक ज्योतिष गणना नहीं मिली है। वैवस्वत मनु के बाद इस परम्परा में वैवस्वत यम हुए जिनके काल में प्रायः २ युग = ७२० वर्ष तक जल प्रलय रहा। इसका विवरण जेन्द अवेस्ता में है, तथा जगन्नाथ मूर्ति समुद्र में डूबने का उल्लेख ब्रह्म पुराण (४३/७१-७७) में है। विष्णु धर्मोत्तर पुराण (८२/७-८) के अनुसार मत्स्य और राम अवतार के समय पितामह और सूर्य सिद्धान्त दोनों मत से प्रभव वर्ष था। इससे मत्स्य अवतार ९५३३ ईपू और राम अवतार ४४३३ ईपू में हुआ। मत्स्य अवतार के समय जल-प्रलय था, जिसका आधुनिक भूगर्भ शास्त्र का अनुमान भी यही है।
(६) ऋषभ काल-२८ व्यास गणना में यह ११वें हैं (वायु पुराण, २३/११९-२१८, ९८/७१-९१, कूर्म पुराण, ५२/१-१० आदि)। इनका प्रभाव काल ९५८०-८८६० ईपू है। स्वायम्भुव मनु की तरह जल प्रलय के बाद पुनः सभ्यता का आरम्भ करने के कारण इनको स्वायम्भुव मनु का वंशज कहा गया है। इस काल में सूर्य वंश (वैवस्वत मनु का) के राजा इन्द्रद्युम्न ने पुनः जगन्नाथ पूजा आरम्भ की (स्कन्द पुराण, वैष्णव, उत्कल खण्ड, ७/६)। 
(७) इक्ष्वाकु काल-इनका काल १-११-८५७६ ईपू में आरम्भ हुआ (एनी बेसण्ट द्वार तञ्जावुर मन्दिर अभिलेख से उद्धृत)। इस काल में सूर्व वंश का प्रभुत्व आरम्भ हुआ अतः इनको वैवस्वत मनु का पुत्र कहते हैं। इस काल में १२वें व्यास अत्रि द्वारा ज्योतिष गणना और १३वें व्यास नर-नारायण द्वारा वेद विकास हुआ। इस वंश के ककुत्स्थ और मान्धाता का पूरे विश्व में प्रभुत्व था।
(८) परशुराम काल-६७७७ ईपू में बाक्कस के नेतृत्व में यवन आक्रमण हुआ जिसमें सूर्य वंश का राजा बाहु मारा गया। उसके प्रायः १५ वर्ष बाद राजा सगर ने यवनों आदि को दण्डित कर बाहर निकाला तथा समुद्रों पर अधिपत्य किया। ६०० वर्ष बाद परशुराम ने यवनों के सहायक हैहय राज्य का अन्त किया जिसमें बर्मा से इराक तक की जातियों ने उनका सहयोग किया (कामधेनु जातियां)। उनके देहान्त के बाद ६१७७ ईपू में कलम्ब संवत् आरम्भ हुआ जो केरल में अभी तक चल रहा है। इस काल में राम सबसे प्रतापी राजा हुए जिन्होंने राक्षसों का प्रभुत्व समाप्त किया।
(९) चन्द्र वंश उदय-कुरु द्वारा ४०७१ ईपू में हस्तिनापुर में चन्द्र वंश का पुनः उदय हुआ। इस वंश की शाखा में उपरिचर वसु ने मगध में शासन आरम्भ किया। शान्तनु (३३१०-३२५१ ईपू) मुख्य राजा थे जिनके वंशजों में महाभारत युद्ध ३१३९ ईपू में हुआ। उसके बाद युधिष्ठिर का ३६ वर्ष तक विश्व में प्रभुत्व था।
(१०) मगध काल-कलियुग के बाद मगध के राजा सबसे शक्तिशाली थे जिनमें सबसे प्रतापी महापद्म नन्द था। उसने द्वितीय परशुराम की तरह सभी क्षत्रियों के राज्यों पर अधिकार किया। इसके मुख्य राजवंश हैं-
बार्हद्रथ वंश के २२ राजा-३१३८-२१३२ ईसा पूर्व (१००६ वर्ष)-इसमें सरस्वती लोप के बाद पार्श्वनाथ का संन्यास २६३४ ईसा पूर्व, उसके बाद के राजा-(१२) अणुव्रत (२६४८-२५८४ ईसा पूर्व), (१३) धर्मनेत्र (२५८४-२५४९ ईसा पूर्व), (१४) निर्वृत्ति (२५४९-२४९१ ईसा पूर्व), (१५) सुव्रत (२४९१-२४५३ ईसा पूर्व)।
प्रद्योत वंश के ५ राजा १३८ वर्ष-(२१३२-१९९४ ईसा पूर्व)। प्रथम राजा प्रद्योत (२१३२-२१०९ ईसा पूर्व) चण्ड महासेन नाम से प्रसिद्ध था जिसने वत्सराज उदयन को धोखे से पराजित कर दिया था। इस की चर्चा भास के नाटक स्वप्नवासवदत्ता तथा कालिदास के मेघदूत में है।
शिशुनाग वंश के १० राजा ३६० वर्ष तक (१९९४-१६३४ ईसा पूर्व)। सिद्धार्थ बुद्ध इसी काल में हुये (३१-३-१८८७ से २७-३-१८०७ ईसा पूर्व) यह बिम्बिसार (शासन १८५२-१८१४ ईसा पूर्व) से ५ वर्ष छोटे थे तथा उसके पुत्र अजातशत्रु शासन (१८१४-१७८७ ईसा पूर्व) के ८वें वर्ष में मृत्यु हुई। अजातशत्रु के पौत्र उदायि (१७५२-१७१९ ईसा पूर्व) के चतुर्थ वर्ष में गङा के दक्षिण तट पर पाटलिपुत्र बना। उसके पूर्व वह केवल शिक्षा संस्थान के रूप में कुसुमपुर था। भगवान् महावीर सिद्धार्थ बुद्ध से १८ वर्ष बड़े थे (जन्म ११-३-१९०५ ईसा पूर्व, चैत्र शुक्ल १३) तथा निर्वाण बुद्ध के १२ वर्ष बाद १७९५ ईसा पूर्व में)। 
नन्द वंश १०० वर्ष (१६३४-१५३४ ईसा पूर्व)-महापद्मनन्द ८८ वर्ष, उसके ८ पुत्र १२ वर्ष।
मौर्य वंश के १२ राजा ३१६ वर्ष (१५३४-१२१८ ईसा पूर्व)-चन्द्रगुप्त (१५३४-१५००), बिन्दुसार (१५००-१४७२) अशोक (१५७२-१४३६ ईसा पूर्व) इसका समकालीन कश्मीर का राजा अशोक (गोनन्द वंश का ४३वां राजा, १४४८-१४०० ईसा पूर्व) बौद्ध हो गया था जिसके कारण मध्य एसिआ के बौद्धों ने उसका राज्य नष्ट कर दिया।
शुंग वंश के १० राजा ३०० वर्ष (१२१८-९१८ ईसा पूर्व), पुष्यमित्र (१२१८-११५८) अग्निमित्र (११५८-११०८ ईसा पूर्व)
कण्व वंश के ४ राजा ८५ वर्ष (९१८-८३३ ईसा पूर्व)
आन्ध्र वंश के ३३ राजा ५०६ वर्ष (८३३-३०७ ईसा पूर्व) ३२वें राजा चन्द्रश्री का सेनापति घटोत्कच गुप्त ने उसे मारकर उसके पुत्र पुलोमावि को नाममात्र का राजा बनाया तथा अपने पुत्र चन्द्रगुप्त को गुप्तवंश का प्रथम राजा (३२७-३२० ईसा पूर्व) बनाया। इसके काल में सिकन्दर का आक्रमण हुआ। उसके बाद समुद्रगुप्त (३२०-२६९), चन्द्रगुप्त-२ (२६९-२३३ ईसा पूर्व) थे। गुप्त काल के अन्त ८२ ईसा पूर्व के बाद उज्जैन में परमार वंशी विक्रमादित्य का शासन १०० वर्ष (१९ ईसवी तक) रहा। नेपाल राजा अवन्तिवर्मन (१०३-३३ ईसा पूर्व) के काल में पशुपतिनाथ में ५७ ईसा पूर्व में विक्रम संवत् आरम्भ किया। उसी वर्ष कार्त्तिक मास में सोमनाथ में कार्त्तिकादि संवत् आरम्भ हुआ। गुप्तों के वंशज गुजरात के वलभी में शासन करते रहे जिनके अन्त के बाद ३१९ ईसवी में वलभी-भंग शक हुआ।  
शालिवाहन (७८-१३८ ईसवी) ने शकों को परजित कर ७८ ईसवी में शक चलाया। उसके १०वीं पीढ़ी के भोजराज के काल में तृतीय कालिदास पैगम्बर मुहम्मद के समकालीन थे।
(११) मालव गण-विक्रमादित्य काल से १२०० ई तक मुख्यतः ४ अग्निवंशी शासकों का प्रभुत्व रहा-परमार, प्रतिहार, चौहान, चालुक्य। उत्तर भारत में चन्देल, असम के राजा, ओड़िशा तथा दक्षिण में काञ्ची आदि के भी मुख्य राजा थे।
(१२) विदेशी आतंक काल-१२०० से १५२६ ई तक तुर्क अफगान और उसके बाद मुगलों द्वारा भारत में प्रायः ८ करोड़ हिन्दुओं का नरसंहार अकबर के इतिहासकार फरिश्ता के अनुसार हुआ। मन्दिरों, पुस्तकालयों का पूर्ण विनाश हुआ। असम, ओड़िशा, मराठा राज्य इनसे मुक्त रहे। 
(१३) अंग्रेजी लूट-१८०३-१९४७ ई तक। मुस्लिम शासक भारत में विनाश करते थे, अंग्रेज विनाश भी करते थे और बाहर भी सम्पत्ति ले जाते थे।
(१४) आधुनिक काल-१९४७ ई से आरम्भ हुआ। अंग्रेज अपने प्रिय लोगों को शासन दे कर चले गये जो उसी प्रकार विदेशी बैंकों में भ्रष्टाचार की आय जमा करते रहे जो अभी तक जमा है। अब पुनः भारत उद्योग और रक्षा उत्पादन में स्वावलम्बी होने के मार्ग पर है।

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