१. सहस्रनाम-
वेद तथा पुराणों में ब्रह्म या भगवान् के अनेक नाम हैं। सहस्र नामों का संग्रह महाभारत के अनुशासन पर्व, अध्याय १४९ में है, जिसे विष्णु सहस्रनाम कहते हैं। ये ऋषियों द्वारा गुणों के अनुसार कहे गये हैं। इसका अर्थ मध्व सम्प्रदाय के राघवेन्द्र स्वामी ने किया है कि ऋग्वेद के १००० सूक्तों के प्रतीक १००० नाम हैं।
यानि नामानि गौणानि विख्यातानि महात्मनः।
ऋषिभिः परिगीतानि तानि वक्ष्यामि भूतये॥१३॥
गीता में भी कहा है कि वेद में भगवान् का ही वर्णन है-वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यं, वेदान्तकृद् वेदविदेव चाहम् (गीता, १५/१५)
बलदेव विद्याभूषण (ओड़िशा में बालेश्वर जिला में रेमुना ग्राम में जन्म-रमना शक्तिपीठ-देवी भागवत पुराण, ७/३०/६७) ने अर्थ किया है कि इससे ४ प्रकार के पुरुषार्थ (भूति) की सिद्धि होती है। विष्णु सहस्रनाम के अन्त में स्पष्ट लिखा है कि इसके पाठ से कोई अशुभ नहीं होता, ब्राह्मण को वेद का ज्ञान होता है, क्षत्रिय विजयी होता है, वैश्य धन से समृद्ध होता है, शूद्र सुखी होता है, वाञ्छित फल, यश, समाज में मुख्य स्थान, परम श्रेय मिलता है (सहस्रनाम, १२२-१३२)।
विष्णु सहस्रनाम मन्त्र मे वेदव्यास ऋषि हैं, अनुष्टुप् छन्द, कृष्ण देवता हैं, अमृतांशूद्भव बीज, कृष्ण शक्ति हैं, त्रिसामा (विष्णु सहस्रनाम का एक नाम) हृदय है, जिसकी शान्ति इसका विनियोग (उद्देश्य) है।
ऋषिर्नाम्नां सहस्रस्य वेदव्यासो महामुनिः।
छन्दोऽनुष्टुप् तथा देवो भगवान् देवकीसुतः॥
अमृतांशूद्भवो बीजं शक्तिर्देवकीनन्दनः।
त्रिसामा हृदयं तस्य शान्त्यर्थे विनियुज्यते॥
इसकी भूमिका के अनुसार वेद के ३ अर्थ, महाभारत के १० अर्थ, तथा विष्णु सहस्रनाम के १०० अर्थ हैं।
त्रयार्थाः सर्व वेदेषु दशार्थाः सर्व भारते। विष्णोः सहस्रनामापि निरन्तर शतार्थकम्॥
सहस्रनाम या वेद में कई नाम एक से अधिक बार हैं, उनके भिन्न अर्थ हैं। प्रति सन्दर्भ कुछ मुख्य अर्थों की चर्चा की जाती है।
२. विविध ब्रह्म-इन्द्रं मित्रं वरुणमग्निरथो दिव्यः स सुपर्णो गरुत्मान्।
एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्त्यग्निं यमं मातरिश्वानमाहुः॥ (ऋक्, १/१६४/४६, अथर्व, ९/१०/२८)
यहां अग्नि तथा गरुड के २-२ उल्लेख हैं।
(१) अग्नि १-अग्रि या अग्रणी- आगे चलने वाला, नेता-
स यत् अस्य सर्वस्य अग्रं असृज्यत, तस्मात् अग्रिः, अग्रिः ह वै तं अग्निः इति आचक्षते परोऽक्षम्। (शतपथ ब्राह्मण, ६/१/१/११, २/२/४२)
अग्ने नय सुपथा राये अस्मान् (ईशावास्य उपनिषद्, १८, ऋक्, १/१८९/१, वाज. यजु, ५/३६, ७/४३, ४०/१६ आदि)
= हे अग्रणी या नेता, हमें अच्छे मार्ग से ले चलो।
अग्निं ईळे पुरोहितम् (ऋक्, १/१/१) = सामने या आगे हित के लिए स्थित अग्नि की उपासना करते हैं। (पुरोहित = सामने रह कर हित करे, वकील, प्रतिनिधि आदि)।
लोकभाषा में इसे अग्रसेन कहते थे। भारत के शासक या नेता को अग्नि कहते थे। वह विश्व का भरण पोषण करता था, अतः इस अग्नि को भरत कहते थे, जिससे इस देश का नाम भारत हुआ।
अग्नेर्महाँ ब्राह्मण भारतेति । एष हि देवेभ्य हव्यं भरति । (तैत्तिरीय संहिता २/५/९/१, तैत्तिरीय ब्राह्मण३/५/३/१, शतपथ ब्राह्मण १/४/१/१)
= ब्रह्मा ने अग्नि को महान् कहा था क्योंकि यह देवों को भोजन देता है।
(२) अग्नि २-सघन ऊर्जा या पदार्थ-आग, वह्नि-धूः असि, धूर्वं तं योऽस्मान् धूर्वति (वाज. यजु, १/८, तैत्तिरीय सं, १/१/४/१ आदि) = धू धू शब्द कर जलना, ध्वस्त करना।
अग्निः वै ज्योति रक्षोहा (शतपथ ब्राह्मण, ७/४/१/३४)
अग्निः वा अर्कः (शतपथ ब्राह्मण, २/५/१/४, १०/६/२/५)
तेज रूप में सभी देवता अग्नि हैं-
सर्व देवत्यो अग्निः (शतपथ ब्राह्मण, ६/१/२/२८)
पृथ्वी (घनीभूत पदार्थ या ऊर्जा)-
इयं पृथिवी हि अग्निः (शतपथ ब्राह्मण, ६/१/२/१४, ६/१/१/२९ आदि)
(३) इन्द्र-सर्वव्यापी-नेन्द्रात् ऋते पवते धाम किञ्चन । (ऋक्, ९/६९/६)
यह शून्य में भी वर्तमान है, अतः इसे शुनः इन्द्र कहते हैं इस इन्द्र से इद्दर, ईथर (Ether) हुआ है, जो शून्य में भी वर्तमान है।
शुनं हुवेम मघवानमिन्द्रम्। (ऋक्, ३/३०/२२)।
जैसे इन्द्र शून्य में भी है उसी प्रकार कुत्ता खाली घर देख कर उसमें घुस जाता है, अतः उसे श्वान (शुनः) कहते हैं। अकेली स्त्री को देखकर युवक (युवन्) भी उसके पीछे लग जाता है, जैसे इन्द्र गौतम पत्नी को अकेले देख कर उनके घर में घुस गये थे। अतः श्वन्, युवन्, मघवन्-इन ३ शब्दों के रूप एक जैसे चलते हैं- श्वयुवमघोनामतद्धिते (पाणिनि अष्टाध्यायी, ६/१/३३)
सरिस श्वान मघवान जुबानू॥ (रामचरितमानस, २/३०१/८)
शुनेव यूना प्रसभं मघोना प्रधर्षिता गौतमधर्मपत्नी।
विचारवान् पाणिनिरेकसूत्रे श्वानं युवानं मघवानमाह॥
इन्द्र सृष्टि निर्माण के लिए ऊर्जा है।
(देवस्य त्वा सवितुः प्रसवे) इन्द्रियस्य इन्द्रियेण। (तैत्तिरीय ब्राह्मण, २/६/५/३)
इन्द्रस्य इन्द्रियेण अभिषिंचामि (शतपथ ब्राह्मण, ५/४/२/२, ऐतरेय ब्राह्मण, ८/७)
(३-४) मित्र-वरुण-इनके कई अर्थ हैं। जिस ऊर्जा से निर्माण होता है वह मित्र है, जिससे निर्माण नहीं होता वह वरुण है। वरुण वाः (वारि) का क्षेत्र है जहां जल जैसा बहुत विरल पदार्थ फैला हुआ है। उसके कुछ भाग में निर्माण होता है, वह मित्र है। आकाश में ब्रह्माण्ड के अप् का क्षेत्र वरुण है। सौर मण्डल के भीतर ऊर्जा का प्रसार मित्र है। आकाश के ३ धामों में मूल स्वरूप अन्तरिक्ष में दीखता है। मूल रूप से आदि हुआ था, अतः इनको आदित्य कहते हैं। स्वयम्भू मण्डल १०० अरब ब्रह्माण्डों का समूह है, जिसके भीतर अन्तरिक्ष (ब्रह्माण्डों के बीच खाली स्थान) अर्यमा है। ब्रह्माण्ड में १०० अरब ताराओं के बीच का स्थान वरुण है। सौर मण्डल का आदित्य मित्र है। ब्रह्माण्ड या ब्रह्माण्ड में तारा संख्या की गणना शतपथ ब्राह्मण (१२/३/२/५) में है।
ब्रह्मैव मित्रः (शतपथ बाह्मण, ४/१/४/१, ५/३/२/४)
मित्रः (एवैनं) सत्यानां (सुवते(। (तैत्तिरीय ब्राह्मण, १/७/४/१)
क्रिया भाग दक्षिण तथा निष्क्रिय भाग वाम हस्त है। अतः मित्र को दक्षिण और वरुण को वाम कहा है।
मैत्रो वै दक्षिणः। वरुणः सव्यः। (तैत्तिरीय ब्राह्मण, १/७/१०/१)
अप्सु वै वरुणः (तैत्तिरीय ब्राह्मण, १/६/५/६)
आभिर्वा अहमिदं सर्वं आप्स्यामि यदिदं किं चेति। तस्मादापोऽभवन्। तदपामप्त्वम्। (गोपथ ब्राह्मण, पूर्व, १/१/२)
ता या अमू रेतः समुद्रं वृत्वातिष्ठंस्ताः प्राच्यो दक्षिणाच्यः प्रतीच्य उदीच्यः समवद्रवन्त। तद्यत्समवद्रवन्त तस्मात्समुद्र उच्यते। ता भीता अब्रुवन्। भगवन्तमेव वयं राजानं वृणीमह इति। यच्च वृत्वातिष्ठंस्तद्वरणोऽभवत्। तं वा एतं वरणं सन्तं वरुण इत्याचक्षते परोक्षेण। (गोपथ ब्राह्मण, पूर्व, १/१/७)
सबसे ऊपर अर्यमा-एषा वा ऊर्ध्वा बृहस्पतेः दिक् तदेष उपरिष्टाद् अर्यम्णः पन्थाः। (शतपथ ब्राह्मण, ५/५/१/१२)
तिस्रो भूमीर्धारयन् त्रीरुत द्यून्त्रीणि व्रता विदथे अन्तरेषाम् ।
ऋतेनादित्या महि वो महित्वं तदर्यमन् वरुण मित्र चारु ॥ (ऋग्वेद, २/२७/८)
(५-६) सुपर्ण-गरुत्मान्-इनका प्रायः एक साथ प्रयोग है। सुपर्ण इसके अंगों का समन्वय है, गरुत्मान् इसकी क्रिया है।
सुपर्ण चिति मूल बलों के मिलन से बना रूप है। विश्व के ४ मूल बल पक्षी के शरीर कहे गये हैं। इसके २ पक्ष (पंख) साम्य हैं। विषमता पुच्छ है।
त इद्धाः सप्त नाना पुरुषानसृजन्त। स एतान् सप्त पुरुषानेकं पुरुषमकुर्वन्-यदूर्ध्वं नाभेस्तौ द्वौ समौब्जन्, यदवाङ् नाभेस्तौ द्वौ। पक्षः पुरुषः, पक्षः पुरुषः। प्रतिष्ठैक आसीत्। अथ या एतेषां पुरुषाणां श्रीः, यो रस आसीत्-तमूर्ध्व समुदौहन्। तदस्य शिरोऽभवत्। स एवं पुरुषः प्रजापतिरभवत्। स यः सः पुरुषः-प्रजापतिरभवत्, अयमेव सः, योऽयमग्निश्चीयते(कायरूपेण-शरीररूपेण-मूर्त्तिपिण्डरूपेण-भूतपिण्डरूपेण)। स वै सप्तपुरुषो भवति। सप्तपुरुषो ह्ययं, पुरुषः-यच्चत्वार आत्मा, त्रयः पशुपुच्छानि। (शतपथ ब्राह्मण, ६/१/१/२-६)
विश्व में ३ प्रकार के ७ लोकों का मिलन भी सुपर्ण के २१ पर्ण हैं।
एकविंशतिः हि इमानि प्रत्यञ्चि सुपर्णस्य पत्त्राणि भवन्ति। (ऐतरेय आरण्यक, १/४/२)
ये त्रिषप्ताः परियन्ति विश्वा रूपाणि बिभ्रतः॥ (अथर्व, शौनक संहिता, १/१/१)
सप्तास्यासन् परिधयस्त्रिः सप्त समिधः कृताः। देवा यद्यज्ञं तन्वाना अबध्नन् पुरुषं पशुम्। (पुरुष सूक्त, यजुर्वेद, ३१/१५)
सुपर्ण रूप १, २ या ३ हैं-
एकः सुपर्णः स समुद्रमाविवेश स इदं भुवनं वि चष्टे । (ऋक्, १०/११४/४)
द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया, समानं वृक्षं परिषस्वजाते।
तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्ति, अनश्नन्नन्यो अभिचाकषीति॥
(मुण्डक उप. ३/१/१, श्वेताश्वतर उप. ४/६, ऋक् १/१६४/२०, अथर्व ९/९/२०)
(इनमें एक सुपर्ण निर्विशेष ब्रह्म है, अन्य कर्त्ता ब्रह्म है। व्यक्ति स्तर पर ये आत्मा-जीव हैं।
ऋग्वेद (१०/११४) त्रिसुपर्ण सूक्त है। तैत्तिरीय आरण्यक, अनुवाक् (३८-४०) भी त्रिसुपर्ण सूक्त है।तीन सुपर्ण गायत्री मन्त्र के ३ पादों की तरह हैं। प्रथम पाद में सृष्टि होती है, जो ७ अंगों वाले गरुड़ के विभिन्न स्तरों द्वारा होता है। द्वितीय पाद में युग्म सुपर्णों द्वारा सृष्टि क्रिया चलती है, वह पालनकर्ता विष्णु का वाहन हुआ। तृतीय पाद आकाश की सृष्टि तथा उसकी क्रियाओं का मनुष्य पर प्रभाव है। यह प्रभाव पहले मन पर होता है जिसे वेद में धीयोग कहा गया है। मन से बाकी शरीर नियन्त्रित होता है। यह त्रिसुपर्ण है, जिसका मेधा जनन के लिये प्रयोग होता है। मेधा के ३ स्तर हैं-मन, बुद्धि तथा उसका स्थान चित्त आकाश।
गरुड गतिशील रूप है, जिसे विष्णु का वाहन कहा गया है। इसकी गति को छन्द कहा गया है-
छन्दोमयेन गरुड़ेन समुह्यमानश्चक्रायुधोभ्यगमदाशु यतो गजेन्द्रः (गजेन्द्र मोक्ष, भागवत पुराण, ८/३/३१)
छन्द रूपी गरुड़ को वयः छन्द या मूर्धा वयः छन्द कहा गया है (वाजसनेयि संहिता, १५/४-५)। छन्द माप है। काव्य में अक्षर माप, दूरी, गति या काल की माप तथा मात्रा की माप भी छन्द हैं। गायत्री पृथ्वी तथा उससे बड़े लोकों की माप है, जो मनुष्य से आरम्भ कर क्रमशः १-१ कोटि अर्थात् २ घात २४ गुणा बड़े हैं (गायत्री २४ अक्षर का छन्द है)। एक सामान्य समुद्र में जल विन्दुओं की संख्या १० घात १४ है, अतः इस संख्या को समुद्र या समुद्रिय छन्द कहते हैं। मनुष्य की तुलना में पृथ्वी का भार २ घात ८० है, अतः अशीति का अर्थ ८० तथा भोजन है। काल माप-महिदास ऐतरेय को उद्धृत कर छान्दोग्य उपनिषद् (३/१६/१-७) में कहा है कि जीवन यज्ञ को उसने ३ सवन में विभाजित कर ११६ वर्ष की आयु प्राप्त की। (१) प्रथम सवन गायत्री के २४ अक्षर अनुसार २४ वर्ष तक प्राण का विकास किया, (२) द्वितीय माध्यन्दिन सवन त्रिष्टुप् (११ x ४ अक्षर) में प्राणों से परिश्रम कर रोया, रोने वाला रुद्र = ११। (३) तृतीय सवन जगती (१२ x ४ = ४८ अक्षर) ६८ वर्ष के बाद आदित्य (१२) रूपी प्राणों का रक्षण करता है।
गरुड़ का प्रभाव क्षेत्र तथा उससे प्राप्त बुद्धि वाक् सुपर्णी है-सुपर्णी (माया) वागेव सुपर्णी। (शतपथ ब्राह्मण, ३/६/२/२)
महर्षि दैवरात् ने वाक् सुधा (पृष्ठ २९०) में सुपर्णी वाक् के ३ खण्ड कहे हैं जो त्रिसुपर्ण का एक अर्थ है-
सौपर्णी परसंज्ञया सुरसरित् सा वाक् सुपर्णी त्रिधा, वर्णाभ्यां डयते सुपर्ण इव सा माता सुपर्णाभिधा।
चिज्ज्योतिः सुहिरण्यरूपतनुभृत् सत्त्वात्मसौपर्णिका, पञ्चाशीह षडुत्तराऽतति मनःप्राणात्मचित्कर्षिका॥२६॥
(७) मातरिश्वा-मातरिश्वा-अप् में पदार्थों के मिश्रण के लिए गति आवश्यक है, जिससे नया निर्माण है। इस गति या वायु से माता जैसा निर्माण होता है, अतः इसे मातरिश्वा वायु कहते हैं।
तस्मिन् अपो मातरिश्वा दधाति (वाज. यजु, ४०/४, ईशावास्य उपनिषद्, ४)
यावन् मात्रं उषसो न प्रतीकं सुपर्ण्यो वसते मातरिश्वः (ऋक्, १०/८८/१९)
(८) यम-विष्णु सहस्रनाम में यम (१६२) नियम (८६४) तथा अयम (८६६) नाम हैं। ऋग्वेद में यम सूक्त (१०/१४), तथा पितर सूक्त (१०/१५) हैं। अथर्व वेद, काण्ड १८ में ४ बड़े सूक्त पितृमेध हैं, जिनमें २८३ मन्त्र हैं।
पृथ्वी पर विवस्वान् (सूर्य,११वें व्यास) के २ वंशज थे-भारत के सूर्य वंशी तथा भारत के वरुण खण्ड (इराक-अरब) की पश्चिम सीमा पर यम थे (यमन, अम्मान, सना-संयमनी आदि-मत्स्य पुराण, १२४/२०-३२)। वहां के यम के पास नचिकेता ज्ञान के लिए गया था (कठोपनिषद्, वल्ली १/१)। ब्रह्म रूप में अर्थ-
(क) सृष्टि का लय रूप-जन्माद्यस्य यतः (ब्रह्म सूत्र, १/१/२)-जिससे जगत् का जन्म, वृद्धि, क्षरण, मृत्यु आदि हो वह यम है। सृष्टि के आरम्भ में एक ही ऋषि था जिसे पूषा (पोषण करने वाला) या अत्रि (जिसका ३ में विभाजन नहीं हुआ है) कहते थे। स्रोत रूप ब्रह्म सूर्य है (विष्णु सहस्रनाम, ८८३), परिणति या अन्त रूप यम है। सूर्य से यम रूप तक की सृष्टि क्रिया (प्राजापत्य) एकर्षि पूषा से होती है।
पूषन् एकर्षे यम सूर्य प्राजापत्य व्यूहरश्मीन् समूह। (ईशावास्य उपनिषद्, १६)
सौर मण्डल में सौर वायु इषा है (वाज. यजु, १/१), इषा-दण्ड की परिधि ९,००० योजन या सौर व्यास है (यूरेनस कक्षा तक- विष्णु पुराण, २/८/३)। वह अन्धकार भाग यम है। प्रकाशित भाग शनि धर्म है। शनि वलय के ३ क्षेत्रों को पीलुमती, उदन्वती तथा प्रद्यौ कहा गया है-उदन्वती द्यौरवमा पीलुमतीति मध्यमा। तृतीया ह प्रद्यौरिति यस्यां पितर आसते॥ (अथर्व १८/२/४८)।
(ग) नियन्ता-नियन्ता (ऽ) नियमो (७) यमः (सहस्रनाम, १०५)। ब्रह्म का ईश्वर रूप सभी भूतों के हृदय में रह कर नियन्त्रण करता है-
ईश्वरः सर्व भूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति।
भ्रामयन् सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया॥ (गीता, १८/६१)
नियन्त्रण के नियम भी वही बनाते हैं। विकल्प से अनियम का अर्थ है कि वह स्वयं किसी नियम से बन्धे नहीं है। योग सूत्र (२/३०-३४) के अनुसार ५ यम निषेध रूप हैं, १० नियम पालन रूप हैं।
(घ) पितर रूप-पितर का सामान्य अर्थ है माता-पिता। व्यापक अर्थ में सभी पूर्वज पितर हैं। सभी भूतों के उत्पत्ति स्रोत पितर हैं जो ५० से अधिक प्रकार के हैं।
ऋषिभ्यः पितरो जाताः, पितृभ्यो देव-दानवाः (मनु स्मृति, ३/२०१)।
(ङ) मृत पितर-मृत्यु के बाद कई प्रकार के पितर होते हैं, उन्हीं से पुनः जन्म होता है। उदाहरण-
अङ्गिरसो नः पितरो नवग्वा अथर्वाणो भृगवः सोम्यासः।
तेषां वयं सुमतौ यज्ञियानामपि भद्रे सौमनसे स्याम॥६॥
प्रेहि प्रेहि पथिभिः पूर्व्येभिर्यत्रा नः पूर्वे पितरः परेयुः।
उभा राजाना स्वधया मदन्ता यमं पश्यासि वरुणं च देवम्॥७॥ (ऋक्, १०/१४)
३. जगन्नाथ रूप-
तत्र गत्वा जगन्नाथं वासुदेवं वृषाकपि। पुरुषं पुरुषसूक्तेन उपतस्थे समाहिताः॥ (भागवत पुराण, १०/१/२०)
इसमें ४ नाम हैं-जगन्नाथ, वासुदेव, वृषाकपि, पुरुष।
(१-२) जगन्नाथ-विष्णु-सुप्त रूप विष्णु तथा जाग्रत रूप जगन्नाथ है। दुर्गा सप्तशती, अध्याय १-
निद्रां भगवतीं विष्णोरतुलां तेजसः प्रभुः॥७१॥
विष्णुः शरीरग्रहणमहमीशान एव च॥८४॥
विष्णोः प्रबोधनार्थाय निहन्तुं मधुकैटभौ॥९०॥
जाग्रत होने के बाद-उत्तस्थौ च जगन्नाथस्तत्या मुक्तो जनार्दनः॥९१॥
प्रबोधं च जगत्स्वामी नीयतामच्युतो लघु॥८६॥
सूर्य जीवन का आधार रूप में विष्णु का रूप है। यह आकर्षण द्वारा पृथ्वी को अपनी कक्षा में धारण किये हुए है। यह विष्णु रूप है। उससे जो किरण तथा तेज निकलता है, वह इन्द्र है। किरणों द्वारा यह जीवन का पालन करता है वह जाग्रत रूप या जगन्नाथ है।
(३) विश्वनाथ-लोकभाषा में जगत् तथा विश्व समान हैं। किन्तु विष्णु को जगन्नाथ, तथा शिव को विश्वनाथ कहते हैं। वेद विज्ञान में इनके अलग अर्थ हैं। विश्व वह रचना है जो एक सीमा के भीतर प्रायः पूर्ण है तथा हृदय केन्द्र से संचालित है। इसका संचालक चेतन तत्त्व जगत् है जो अव्यक्त या अदृश्य है।
जगदव्यक्तमूर्तिना (गीता ९/४) जगज्जीवनं जीवनाधारभूतं (नारद परिव्राजक उपनिषद् ४/५०)
वालाग्रमात्रं हृदयस्य मध्ये विश्वं देवं जातरूपं वरेण्यं (अथर्वशिर उपनिषद् ५)
अनाद्यनन्तं कलिलस्य मध्ये विश्वस्य स्रष्टारमनेकरूपम् ।
विश्वस्यैकं परिवेष्टितारं ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्व पाशैः ॥ (श्वेताश्वतर उपनिषद्, ५/१३)
(४) वासुदेव-सूर्य सिद्धान्त (१२/१२-२५) में पाञ्चरात्र, सांख्य, पुराण तथा वेद समन्वित सृष्टि क्रम है। हिरण्यगर्भ से पहले वासुदेव हुए। उसके बाद क्रम से संकर्षण, प्रद्युम्न तथा अनिरुद्ध हुए। यह भागवत पुराण में भगवान कृष्ण, उनके भाई, पुत्र तथा पौत्र के भी नाम हैं। पर इस वर्णन से लगता है कि सृष्टि का आधार प्रथम उत्पन्न आकाश ही वासुदेव रूप है। वास = रहने का स्थान। संकर्षण = परस्पर आकर्षण। आकर्षण के केन्द्र के रूप में स्वयं वासुदेव ही कृष्ण हैं। पर सम् उपसर्ग का अर्थ है सभी पिण्डों के आकर्षण का योग। परस्पर आकर्षण द्वारा ही ब्रह्माण्ड, ग्रह, नक्षत्र आदि रूपों में पदार्थ एक सीमा के भीतर गठित हुआ। प्रद्युम्न = प्रकाशित या तेज का स्रोत। यह स्पष्ट रूप से सूर्य को कहा गया है जो तेज के कारण संसार की आत्मा है और त्रयी रूप में ऋक् (पिण्ड), यजु (जीवन), साम (तेज) तथा आधार (अथर्व) है। उसके बाद विविध सृष्टि अनिरुद्ध है जो अनन्त प्रकार की है। इसका विभाजन १२ प्रकार के आदित्यों से हुआ।
(५) वृषाकपि- पण्डित मधुसूदन ओझा ने इन्द्र विजय, अध्याय ३ में वृषाकपि को इन्द्र का मित्र असुर राज कहा है, जो एक साथ मद्यपान करते थे (ऋक् सूक्त, १०/८६)। ब्रह्म रूप में वृषा को इन्द्र, सूर्य, हिङ्कार या व्यक्ति रूप में मन, आत्मा कहा है।
इन्द्रो वृषा (शतपथ ब्राह्मण, १/४/१/३३)
समग्निरिध्यते वृषा (ऋक्, ३/२७/१३)-शतपथ ब्राह्मण (१/४/१/२९)
वृषा अग्नि रूप स्रष्टा है, उसका स्थान या वेदी योषा (स्त्री) है-
योषा वै वेदिः वृषा अग्निः (शतपथ ब्राह्मण, १/२/५/१५)
वृषा हि मनः (शतपथ ब्राह्मण, १/४/४/३)
वृषा हिङ्कारः (गोपथ ब्राह्मण, पूर्व, ३/२३)-सृष्टि का आरम्भ ब्रह्म के विभिन्न रूपों द्वारा होता है-कामना (निर्विशेष ब्रह्म-सो अकामयत्-तैत्तिरीय उपनिषद्, २/६, बृहदारण्यक उपनिषद्, १/२/४), ईक्षा (सृष्टि इच्छा-स इक्षांचक्रे-प्रश्नोपनिषद्, ६/३, स ईक्षत-ऐतरेय उपनिषद्, १/३), हिङ्कार (कार्य आरम्भ या प्रस्ताव-छान्दोग्य उपनिषद्, अध्याय २ में विविध हिङ्कार)।
सृष्टि का आरम्भ जल जैसे विरल पदार्थ से हुआ, जिसका मूल रूप रस या आनन्द था। उसमें तरंग होने से सलिल् हुआ, उसका आकार ग्रहण करने से सरिर् (शरीर) हुआ। उसमें द्रप्स (अंग्रेजी में ड्रॉप्स, drops) अलग (स्कन्न) हुए। प्रथम स्तर के द्रप्स ब्रह्माण्ड (गैलेक्सी), उसमें तारा रूप द्रप्स हुए। ब्रह्माण्ड में फैला पदार्थ अप् था, उसमें तरंग होने से अम्भ हुआ, अम्भ सहित साम्भ या साम्ब सदाशिव हुआ। सौर मण्डल में अप् का रूप मर है, जिसमें सूर्य मरीची है।
यद्वै तत्सुकृतं रसो वै सः । रसं ह्येवायं लब्ध्वाऽऽनन्दी भवति। (तैत्तिरीय उपनिषद्, २/७)
वेदिर्वै सलिलम् (शतपथ ब्राह्मण, ३/६/२/५)
अयं वै सरिरो योऽयं वायुः पवत एतस्माद्वै सरिरात् सर्वे देवाः सर्वाणि भूतानि सहेरते (शतपथ ब्राह्मण, १४/२/२/३)
स इमाँल्लोकनसृजत । अम्भो मरीचीर्मरमापोऽदोऽम्भः परेण दिवं द्यौः प्रतिष्ठान्तरिक्षं मरीचयः पृथिवी मरो या अधस्तात्ता आपः । (ऐतरेय उपनिषद्, १/१/२)
कर्म के आरम्भ रूप अप् के सभी रूप ’क’ हैं। ’क’ का पान करने वाला कपि, उसके बाद ब्रह्माण्ड रूपी विन्दुओं की वर्षा करने वाला वृषाकपि है।
तद् यत् कम्पाय-मानो रेतो वर्षति तस्माद् वृषाकपिः, तद् वृषाकपेः वृषा कपित्वम्। ... आदित्यो वै वृषाकपिः। (गोपथ ब्राह्मण, उत्तर, ६/१२)
द्रप्सश्चस्कन्द प्रथमाँ अनु द्यूनिमं च योनिमनु यश्च पूर्वः॥ (ऋक्, १०/१७/११, वाज. यजु, १३/५)
यस्ते द्रप्सः स्कन्दति॥१२॥ (ऋक्, १०/१७/१२)
एष द्रप्सो वृषभो विश्वरूपो इन्द्राय वृष्णे समकारि सोमः (ऋक्, ६/४१/३)
यह सृष्टि सदा पहले जैसी होती है, अतः अनुकरण करने वाले जीव को कपि (अंग्रेजी में कॉपी, copy) कहते हैं।
सूर्या चन्द्रमसौ धाता यथा पूर्वमकल्पयत् । (ऋक्, १०/१९०/३)
(६) पुरुष-(क) सांख्य दर्शन के अनुसार सृष्टि का चेतन तत्त्व पुरुष है, निर्माण सामग्री प्रकृति है, जिसके २४ भेद हैं।
(ख) गीता के अनुसार सभी भूत पुरुष हैं, जिसके ४ प्रकार हैं। उनमें ३ का वर्णन हो सकता है। सभी का बाह्य रूप क्षर पुरुष है, उनका परिचय या कार्य रूप अक्षर पुरुष है, समष्टि के अंग रूप अव्यय पुरुष है।
द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च। क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते॥१६॥
उतमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः। यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्यव्यय ईश्वरः॥१७॥
समष्टि रूप में व्यय या कमी नही होती है, जिसे आधुनिक भौतिक विज्ञान में ५ प्रकार के संरक्षण सिद्धान्त कहा गया है। (Conservation of mass, energy, momentum, angular momentum, electric charge)
अति सूक्ष्म या अति विस्तृत रूप में भेद नहीं दीखता या अनुभव नही होता है (भागवत पुराण, ३/११/३-५), वह परात्पर पुरुष है। इसका वर्णन सम्भव नहीं है, उपवर्णन होता है।
अणोरणीयान् महतो महीयान् (कठोपनिषद्, २/२०)
स वै न देवासुर मर्त्य तिर्यङ् न स्त्री न षण्ढो न पुमान् न जन्तुः।
नायं गुणः कर्म न सन्न चासन्, निषेधशेषो, जयतादशेषः॥
एवं गजेन्द्रमुपवर्णित निर्विशेषं (गजेन्द्र मोक्ष, भागवत पुराण, अध्याय, ८/३)
(ग) पुरुष सूक्त में इसके सभी रूप वर्णित हैं अतः उसी सूक्त से उनकी उपासना हुई। पुरुष सूक्त के कुछ रूपों के क्रम हैं-(१) पूरुष = ४ पाद का मूल स्वरूप, (२) सहस्रशीर्ष-उससे १००० प्रकार के सृष्टि विकल्प या धारा, (३) सहस्राक्ष =हर स्थान अक्ष या केन्द्र मान सकते हैं, (३) सहस्रपाद-३ स्तरों की अनन्त पृथ्वी, (४) विराट् पुरुष-दृश्य जगत् जिसमें ४ पाद में १ पाद से ही सृष्टि हुई। १ अव्यक्त से ९ प्रकार के व्यक्त हुए जिनके ९ प्रकार के कालमान सूर्य सिद्धान्त (१५/१) में दिये हैं। अतः विराट् छन्द के हर पाद में ९ अक्षर हैं। (५) अधिपूरुष-दृश्य पिण्डों के बीच का विरल पदार्थ जो उनका ३ गुणा है, (६) देव, साध्य, ऋषि आदि, (६) ७ लोक का षोडषी पुरुष, (७) सर्वहुत यज्ञ का पशु पुरुष, (८) आरण्य और ग्राम्य पशु, (९) यज्ञ पुरुष (१०) अन्तर्यामी आदि।
पुरुष की सभी परिभाषा मधुसूदन ओझा जी ने श्लोकों में दी हैं-
पुरु व्यवस्यन् पुरुधा स्यति स्वतस्ततः स उक्तः पुरुषश्च पूरुषः।
पुरा स रुष्यत्यथ पूर्षुरुच्यते स पूरुषो वा पुरुषस्तदुच्यते। धी प्राणभूतस्य पुरे स्थितस्य सर्वस्य सर्वानपि पाप्मनः खे।
यत्सर्वतोऽस्मादपि पूर्व औषत् स पूरुषस्तेन मतोऽयमात्मा॥ स व्यक्तभूते वसति प्रभूते शरीरभूते पुरुषस्ततोऽसौ।
पुरे निवासाद्दहरादिके वा वसत्यतं ब्रह्मपुरे ततोऽपि॥ (ब्रह्म सिद्धान्त, ११/१७२-१७४)
४. स्रष्टा और सृष्टि रूप
यह रूप दारु ब्रह्म भी कहा गया है। भगवान् सृष्टि क्रम रूप में वृक्ष का मूल, शाखा और पत्र हैं, निरपेक्ष द्रष्टा हैं, विश्व निर्माण की सामग्री हैं, सृष्टि चक्र या संकल्प-कर्म-फल का चक्र हैं, कई चक्रों के समन्वय रूप में वन तथा विश्व के आधार भी हैं।
ब्रह्म वनं ब्रह्म स वृक्ष आसीत् यतो द्यावा पृथिवी निष्टतक्षुः।
मनीषिणो मनसा विब्रवीमि वो ब्रह्माध्यतिष्ठद् भुवनानि धारयन्॥
(तैत्तिरीय ब्राह्मण, २/८/९/१६)
= ब्रह्म ही वह वन और वृक्ष है जिसे काट कर जगत् का निर्माण हुआ। मनीषी चिन्तन कर कहते हैं कि ब्रह्म ने ही भुवनों का धारण किया।
यस्मात् परं नापरमस्ति किञ्चित्, यस्मान्नाणीयो न ज्यायोऽस्ति कश्चित्।
वृक्ष इव स्तब्धो दिवि तिष्ठत्येनेदं पूर्णं पुरुषेण सर्वम्॥ (श्वेताश्वतर उपनिषद्, ३/९)
= पूर्ण पुरुष वृक्ष के जैसा आकाश में स्तब्ध हो कर देख रहा है। इससे परे कुछ नहीं है, इससे सूक्ष्म नहीं है न इसके अतिरिक्त कुछ है।
ऊर्ध्वमूलमधः शाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम्।
छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित्। (गीता, १५/१)
= जिसका मूल ऊपर है तथा शाखा नीचे है वह अविनाशी अश्वत्थ है। छन्द इसके पत्ते हैं। जो इस वृक्ष को जानता है, वही वेद जान सकता है।
अधश्चोर्ध्वं प्रसृतास्तस्य शाखा गुणप्रवृद्धा विषयप्रवालाः।
अधश्च मूलान्यनुसन्ततानि कर्मानुबन्धीनि मनुष्यलोके॥२॥
न रूपमस्येह तथोपलभ्यते, नान्तो न चादिर्न च सम्प्रतिष्ठा।
अश्वत्थमेनं सुविरूढ़मूलमसङ्गशस्त्रेण दृढ़ेन छित्वा॥३॥
= संकल्प, क्रिया, फल के चक्र रूपी वृक्ष का जो बन्धन है, उसे काटने पर ही मनुष्य मुक्त हो सकता है।
अदो यद्दारुः प्लवते सिन्धोः पारे अपूरुषम्।
तदारभस्व दुर्हणो येन गच्छ परस्तरम्॥
ऋक् , शाकल्य शाखा, १०/१५५/३)
= यह समुद्र (विश्व विस्तार) के पार जो अपौरुषेय दारु (काठ) तैर रहा
है, उसकी शरण में जाने से ही समुद्र को पार कर सकते हैं।
५. गायत्री मन्त्र-
एको नैकः सवः कः किं यत् तत् पदमनुत्तमम् (सहस्रनाम, ९१)
गायत्री प्रथम पाद में सविता = स्रष्टा। यह सविता सूर्य पिता जैसा है।
उसका निर्माता ब्रह्माण्ड पितामह है, उसका भी निर्माता स्वयम्भू ब्रह्म
प्रपितामह, या तत् सविता है।
गायत्री मन्त्र तृतीय पाद में यत् = स्वयं, व्यक्ति। उसकी बुद्धि को प्रेरित
करने वाला ब्रह्म।
मध्यम पाद में भर्गः भी ब्रह्म का वाचक है, जो शिव का एक नाम है
(अमरकोष, १/१/३३)
एको नैकः(देव्यथर्वशीर्ष, २३)
कः = कर्ता रूप या स्रष्टा-कस्मै देवाय हविषा विधेम (ऋक्,
१०/१२१/१)
कं = क्रिया रूप, सृष्टि-कं लोकं अनुप्राविशत् (अथर्व, ११/८/११)
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