व्रतबन्धे विवाहेच चतुर्थ्यां सह भोजने । व्रतेदाने मखे (यज्ञे) श्राध्दे पत्नी तिष्ठति दक्षिणे ।।
वामे सिन्दूरदाने च वामे चैव द्विरागमने ।
वामेऽ शनैकशय्यायां भवेज्जाया प्रियार्थिनी ।।
सर्वेषु शुभकार्येषु पत्नी दक्षिणतः शुभाः।
अभिषेके विप्रपादप्रक्षालने चैव वामतः ।।
वामे पत्नी त्रिषु स्थाने पितृणां पादशौचने। रथारोहणकाले च ऋतुकाले सदा भवेत् ।।
हिंदू धर्मशास्त्रों (जैसे धर्मसिंधु ग्रंथ) से है। इसके अनुसार पूजा, यज्ञ और अन्य शुभ धार्मिक कार्यों में पत्नी को पति के दाहिने (दक्षिण - Right Side) बैठना चाहिए। केवल कुछ विशेष परिस्थितियों और सांसारिक कार्यों में ही पत्नी का स्थान बाईं (वाम - Left Side) ओर होता है।
1. दाहिनी ओर (दक्षिण भाग) बैठने के नियम
श्लोक: व्रतबन्धे विवाहेच चतुर्थ्यां सह भोजने । व्रतेदाने मखे (यज्ञे) श्राध्दे पत्नी तिष्ठति दक्षिणे ।।
सर्वेषु शुभकार्येषु पत्नी दक्षिणतः शुभाः।
इन कार्यों में पत्नी को पति के दाहिनी ओर बैठना अनिवार्य और शुभ माना गया है:
व्रतबन्ध (उपनयन/जनेऊ संस्कार के समय)
विवाह संस्कार के मुख्य अनुष्ठानों में
चतुर्थी कर्म और उसके बाद सहभोजन के समय
व्रत अनुष्ठान और दान करते समय
मख यानी यज्ञ/हवन और पूजन के समय
श्राद्ध कर्म (पितृ कार्य) करते समय
सभी प्रकार के शुभ और धार्मिक कार्यों में
2. बाईं ओर (वाम भाग) बैठने के नियम
श्लोक: वामे सिन्दूरदाने च वामे चैव द्विरागमने । वामेऽ शनैकशय्यायां भवेज्जाया प्रियार्थिनी ।।
अभिषेके विप्रपादप्रक्षालने चैव वामतः ।।
वामे पत्नी त्रिषु स्थाने पितृणां पादशौचने। रथारोहणकाले च ऋतुकाले सदा भवेत् ।।
इन विशिष्ट अवसरों, संस्कारों और सांसारिक कार्यों में पत्नी को बाईं ओर होना चाहिए:
सिन्दूरदान के समय
द्विरागमन (गौना या वधू का दूसरी बार ससुराल आगमन) के समय
शयन (सोते) करते समय
अभिषेक (धार्मिक स्नान या दीक्षा) के समय
विप्रपादप्रक्षालन (ब्राह्मणों के चरण धोते समय)
पितृणां पादशौचने (पितरों के तर्पण या माता-पिता के चरण धोते समय)
रथारोहण (सवारी या यात्रा पर निकलते समय)
ऋतुकाल (गर्भाधान या वैवाहिक गृहस्थी के समय)
धार्मिक कार्य (कर्म प्रधान): पूजा, हवन, दान और यज्ञ में पत्नी हमेशा दाहिनी ओर बैठती है क्योंकि शास्त्रों में इस हिस्से को ऊर्जा और कर्म की सफलता का प्रतीक माना गया है।।
संस्कार व सांसारिक कार्य (भावना प्रधान): विवाह के कुछ क्षणों (जैसे सिन्दूरदान), सेवा, यात्रा और शयन में पत्नी बाईं ओर (वामांगी) होती है क्योंकि बाईं ओर को प्रेम और करुणा का स्थान माना गया है।
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