Tuesday, 30 December 2025

कैलास देशान्तर रेखा के शैव पीठ

कैलास देशान्तर रेखा के शैव पीठ
१. प्राचीन भूगोल-(१) आकाश के लोक-आकाश के ७ लोक हैं-भू (पृथ्वी), भुवः (यूरेनस तक का वायु क्षेत्र, २२ अहर्गण तक, या १०० कोटि योजन व्यास की चक्राकार पृथ्वी जो नेपचून तक की ग्रह कक्षा है), स्वः (सौर मण्डल, ३० धाम या ३३ अहर्गण तक-ऋक्, १०/१८९/३, जहां तक सूर्य का प्रकाश अधिक है), महः लोक (४३ अहर्गण तक, सर्पाकार भुजा शेषनाग में सूर्य केन्द्रित भुजाकी मोटाई का गोल जिसके १००० तारा शेष के १००० सिर हैं), जनः लोक (ब्रह्माण्ड जिसका केन्द्रीय चक्र आकाशगंगा है, ४९ अहर्गण क्षेत्र की गति ४९ मरुत्), तपः लोक (जहां तक का ताप या प्रकाश पृथ्वी तक आ सकता है, पृथ्वी का २ घात ६४ गुणा, या ८६४ करोड़ प्रकाश वर्ष की त्रिज्या), सत्य लोक ( अनन्त आकाश)।
(२) परिलेख या माप-पृथ्वी पर २ प्रकार का परिलेख या माप (map) बनता था। इसके लिए नक्षत्र देख कर अक्षांश देशान्तर निकालते थे, अतः इसे नक्षा (नक्शा) कहते थे। पृथ्वी के ७ द्वीप चक्राकार नहीं हैं। पृथ्वी से देखने पर यूरेनस तक के ग्रहों का पथ गोलाकार या वलयाकार दीखता है, जिनके नाम पृथ्वी के द्वीपों के नाम पर ही दिये गये हैं। (विष्णु पुराण, २/७/३-४)। अन्यथा १००० योजन व्यास की पृथ्वी पर १६ कोटि योजन मोटाई का वलयाकार पुष्कर द्वीप नहीं हो सकता है। पृथ्वी के ७ द्वीप किसी भी ज्यामितिक आकार में नहीं हैं। ये ७ द्वीप हैं-जम्बू द्वीप (एशिया), प्लक्ष द्वीप (यूरोप), कुश द्वीप (विषुव रेखा के उत्तर का अफ्रीका), शाल्मलि द्वीप (विषुव वृत्त के दक्षिण का अफ्रीका), शक द्वीप (अग्नि कोण में होने से अग्नि द्वीप, वायु पुराण अध्याय ३६, ३०० प्रकार के शक या स्तम्भ वृक्ष युकलिप्टस), क्रौञ्च द्वीप (उत्तर अमेरिका, यह द्वीप तथा मुख्य क्रौञ्च पर्वत-दोनों उड़ते पक्षी के आकार के हैं), पुष्कर द्वीप (दक्षिण अमेरिका, उज्जैन से १२ अंश पश्चिम के पुष्कर बुखारा के विपरीत-विष्णु पुराण में पुष्कर २/८/४२)
अन्य पद्धति थी पृथ्वी के उत्तर गोल का ४ पाद में नक्शा बनाना जिनको भूपद्म का ४ दल कहा गया है-(१) भारत दल उज्जैन देशान्तर के पूर्व और पश्चिम ४५-४५ अंश तक, विषुव रेखा से उत्तर ध्रुव तक) (२) पूर्व में भद्राश्व, (३) पश्चिम में केतुमाल, (४) विपरीत दिशा में कुरु वर्ष (यह कुरुक्षेत्र के विपरीत है)। 
भद्राश्वं पूर्वतो मेरोः केतुमालं च पश्चिमे। वर्षे द्वे तु मुनिश्रेष्ठ तयोर्मध्यमिलावृतः॥२४॥
भारताः केतुमालाश्च भद्राश्वाः कुरवस्तथा। पत्राणि लोकपद्मस्य मर्यादाशैलबाह्यतः॥४०॥
(विष्णु पुराण, २/२)
दक्षिण में भी इसी प्रकार ४ पाद थे। भारत दल में इन्द्र के ३ लोक थे। इनकी माप के लिए विष्णु वामन का पूर्व दिशा में प्रथम पद यवद्वीप सहित सप्तद्वीप के पूर्व में पड़ा था। यहां पद का अर्थ है वृत्त पाद, ९० अंश। द्वीतीय पद मेरु (उत्तर ध्रुव) पर पड़ा। तृतीय पद वापस बलि के स्थान भारत के पाचिमी छोर पर पड़ा।
तत्र पूर्वपदं कृत्वापुरा विष्णुस्त्रिविक्रमे। द्वितीयं शिखरे मेरोश्चकार पुरुषोत्तमः॥
वाल्मीकि रामायण, किष्किन्धा काण्ड, ४०/५८)
यहां त्रिविक्रम = तिकड़म। राजा की ४ नीति हैं-साम, दाम, दण्ड, भेद। दण्ड तभी दिया जा सकता है, जब बल हो। नहीं तो छल करना पड़ेगा जिसकी ३ पद्धति साम, दाम, भेद को त्रिविक्रम कहा गया है। वामन ने तीनों का प्रयोग किया था।
(३) पृथ्वी के लोक- भारत पाद में इन्द्र के ३ लोकों को ही ७ लोकों में विभाजित किया गया था। 
लोकाख्यानि तु यानि स्युर्येषां तिष्ठन्ति मानवाः॥८॥ भूरादयस्तु सत्यान्ताः सप्त लोकाः कृतास्त्विह॥९॥
पृथिवी चान्तरिक्षं च दिव्यं यच्च महत् स्मृतम्। स्थानान्येतानि चत्वारि स्मृतान्यावर्णकानि च॥११॥
जनस्तपश्च सत्यं च स्थान्यान्येतानि त्रीणि तु। एकान्तिकानि तानि स्युस्तिष्ठंतीहा प्रसंयमात्॥१३॥
भूर्लोकः प्रथमस्तेषां द्वितीयस्तु भुवः स्मृतः।१४॥ 
स्वस्तृतीयस्तु विज्ञेयश्चतुर्थो वै महः स्मृतः। जनस्तु पञ्चमो लोकस्तपः षष्ठो विभाव्यते॥१५॥ 
सत्यस्तु सप्तमो लोको निरालोकस्ततः परम्।१६। महेति व्याहृतेनैव महर्लोकस्ततो ऽभवत्॥२१॥
यामादयो गणाः सर्वे महर्लोक निवासिनः।५१॥ (ब्रह्माण्ड पुराण,३/४/२/८-५१)
ध्रुव तक देखने पर चीन मध्य में आता है, अतः वहां के लोग अपने को पृथ्वी स्वर्ग के बीच का मध्य राज्य कहते थे। केवल भारत वर्ष में हिमालय-विन्ध्य के बीच का भाग मध्य भारत है जिसे आजकल उत्तर भारत समझा जाता है। इसे मध्यम लोक भी कहा गया है-(रघुवंश, २/१६)। इसी अर्थ में नेपाल में दक्षिण की समतल भूमि को मधेश (मध्यदेश) कहते हैं। हिमालय मार्ग को प्राचीन काल से उत्तरापथ कहा गया है। 
भारत दल के ७ लोक हैं-भू (विन्ध्य से पश्चिम), भुवः (मध्यम लोक, विन्ध्य हिमालय के पश्चिम), स्वः (हिमालय, तिब्बत या त्रिविष्टप = स्वर्ग), महः (चीन, ब्रह्मा ने यहां के लोगों को महान कहा था (ब्रह्माण्ड पुराण,३/४/२/२१, वायु पुराण, १०१/२३), जनः लोक (मंगोलिया, अरबी में मुकुल = प्रेत), तपस् (स्टेपीज, साइबेरिया), सत्य लोक (ध्रुव वृत्त)।
भारत दल के अतिरिक्त अन्य ७ पादों को ७ तल या पाताल कहते थे। ये पृथ्वी सतह पर ही हैं, आकाश में नहीं। भारत के दक्षिण तल या महारल, पश्चिम में अतल, उसके दक्षिण तलातल, अतल के पश्चिम पाताल, उसके दक्षिण रसातल, भारतके पूर्व सुतल, उसके दक्षिण वितल है। 
२. भू-माप के सन्दर्भ विन्दु-
शून्य देशान्तर का चयन-आधुनिक काल में ब्रिटेन की प्रभुता होने पर अपनी राजधानी के निकट ग्रीनविच की देशान्तर रेखा को शून्य घोषित कर दिया। यह विषुव के निकट होने के कारण माप में कठिनाई होती है। इसके पूर्व नेपोलियन ने पेरिस से गुजरती देशान्तर रेखा पर विषुव से उत्तर ध्रुव तक की दूरी के १ कोटि भाग को मीटर घोषित किया तथा उस लम्बाई के बराबर मिश्र धातु की छड़ पर २ चिह्न दिये गये जिनके बीच की दूरी शून्य डिग्री केल्विन (सेण्टीग्रेड) पर १ मीटर थी। पुरुष सूक्त के अनुसार भी यही माप होगी। 
सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात्।
स भूमिं विश्वतो वृत्त्वा अत्यत्तिष्ठत् दशाङ्गुलम्॥ (वाज. यजु, ३१/१)
यहां भूमि का अर्थ पृथ्वी ग्रह लें तो ठोस पिण्ड = भू (भ = २४वां अक्षर), वायुमण्डल आवरण जोड़ कर २५वां अक्षर मिलाने पर यह भूमि है। इसकी परिधि = २४/२५ x१/९६ x१००० शीर्ष x१००० अक्ष (२) x१००० पाद (२) = ४ x१० घात ७ दण्ड (१ दण्ड = ९६ अङ्गुल) = ४ कोटि दण्ड। पृथ्वी की परिधि = ४ कोटि मीटर (४०,००० किमी)। अर्थात् यहां १ दण्ड = १ मीटर। विषुव रेखा पर स्थित लंका को शुन्य देशान्तर रेखा मानने का मूल कारण था कि यह दोनों ध्रुवों (उत्तर में मेरु या सुमेरु, दक्षिण में कुमेरु) तथा समुद्र के बीच है। (इस मन्त्र के अन्य कई अर्थ हैं)
स्थलजलमध्याल्लङ्का भूकक्ष्याया भवेच्चतुर्भागे। 
उज्जयिनी लङ्कायाः तच्चतुरंशे समोत्तरतः॥ (आर्यभटीय, ४/१४)
विषुव रेखा का हर विन्दु दोनों ध्रुवों के बीच है। इस रेखा पर भारत के दक्षिण महासागर में पश्चिम में अफ्रीका तट से पूर्व में सुमेरु तट के मध्य विन्दु पर लंका था। लंका के समुद्र में लीन होने के बाद उज्जयिनी को सन्दर्भ माना गया जो भूपरिधि के चतुर्थ भाग (९० अंश) का भी चतुर्थ भाग (२२.५ अंश) उत्तर है।
हर महाद्वीप में सन्दर्भ के लिए १-१ मेरु थे। पूर्व का मेरु प्राङ्मेरु (पामीर) मध्य मेरु अफ्रीका में विषुव रेखा पर है जिसका नाम अंग्रेजों ने किलिमंजारो कर दिया, पर उस जिले का नाम अभी भी मेरु है। पश्चिम में अपर मेरु या अमेरु दक्षिण अमेरिका में है जिसके नाम पर उसे अमेरिका कहा गया।
इसके अतिरिक्त स्थानीय सन्दर्भ के लिए अनेक मेरु थे, जिनमें प्रायः २५ मेरु आज भी मूल नाम से वर्तमान हैं।
लंका का समय पृथ्वी का समय कहते थे, अतः यहां के शासक का नाम कुबेर था (कु = पृथ्वी, बेर = समय)। बाद में रावण ने इस पर अधिकार किया था। इसी अर्थ में उज्जैन के शिवलिङ्ग को भी महाकाल कहते हैं। प्राचीन काल में वहां से १-१ दण्ड (२४ मिनट = ६ अंश) की दूरी पर समय क्षेत्र थे। इन रेखाओं पर भी कई स्थानों का नाम लंका था, जैसे 
लंकावी (मलयेसिया के पश्चिम तट पर द्वीप) ६अं२१’उ, ९९अं४८’ पू
फू लंका-थाईलैण्ड, १९अं२७’५" उ, १००अं२५’३’
वट लंका-कम्बोडिया की राजधानी नोम्पेन्ह में मन्दिर ११अं३३’५७" उ, १०४अं५५’३६" पूर्व
लंकात (सुमात्रा, इण्डोनेसिया) ३अं४५’२"उ, ९८अं२८’१४" पू
लंकांफेन (आस्ट्रिया) ४७अं३३’७" उ, १२अं६’१४" पू
ब्रिटेन का लंकाशायर (स्टोनहेंज की प्राचीन वेधशाला) उज्जैन से ठीक १३ समय क्षेत्र पश्चिम है।
वाराणसी में भी प्राचीन वेधशाला का स्थान लंका है। उसके निकट सिगरा भी है, जो लंका में रावण के राजभवन का स्थान था।
३. शिव क्षेत्र-हिमालय की मेरु चोटी ३०अं ५२’५" उत्तर तथा ७९अं१’५६" पूर्व है। 
इसी देशान्तर रेखा पर ८ प्रसिद्ध शिव पीठ हैं-
(१) केदारनाथ-केदारनाथ मन्दिर-(३०.७३५२ उ, ७९.०६६९ पू.)
(२) कालेश्वरम्-कालेश्वर मुक्तीश्वर स्वामी मन्दिर (१८.८११०उ, ७९.९०६७ पू.)
(३) श्रीकालहस्ती-श्रीकालहस्ती मन्दिर (१३.७४९८०२ उ, ७९.६९८४१० पू.)
(४) काञ्चीपुरम्-एकाम्बरेश्वर मन्दिर (१२.८४७६०४ उ, ७९.६९९७९८ पू.)
(५) तिरुवनै कवल-जम्बूकेश्वर मन्दिर (१०.८५३३८३ उ. ७८.७०५४५५ पू.)
(६) तिरुवन्नामलै-अन्ना मलैयार मन्दिर (१२.२३१९४२ उ, ७९.०६७६९४)
(७) चिदम्बरम् -नटराज मन्दिर-(११.३९९५९६ उ, ७९.३१७४ पू.)
(८) रामेश्वरम्- रामनाथ स्वामी मन्दिर (९.२८८१, ७९.३१७४ पू.) 
अन्य भी कई शिव क्षेत्र हैं। इन ८ मुख्य शिव क्षेत्रों के एक देशान्तर रेखा पर स्थित होने का कोई कारण नहीं लिखा हुआ है। अनुमानित कारण-
(१) कैलास-शिव को ज्ञान स्वरूप तथा आदि गुरु कहा गया है। गायत्री मन्त्र का तृतीय पाद इसका द्योतक है-धियो यो नः प्रचोदयात्। मस्तिष्क में आज्ञा चक्र के ऊपर इड़ा-पिङ्गला- सुषुम्ना का मिलन स्थान त्रिकूट या कैलास है। इस पर शिव का निवास है। शिव पार्वती के परस्पर वार्त्तालाप से१८ प्रकार की विद्या उत्पन्न हुई। मालिनी विजयोत्तर तन्त्र में इसकी व्याख्या है। मस्तिष्क से वाम और दक्षिण भाग हैं। उनके ऊपर और नीचे२-२ भागहैं। ये ४ भाग शिव के ४ मुखों के स्थूल रूप हैं। मध्य का मुख अघोर है, जिसमें इनका लय होता है। अन्य ४ मुख हैं-ईशान, तत्पुरुष, वामदेव और सद्योजात। आधुनिक शरीर विज्ञान के अनुसार मस्तिष्क के दोनों भागों में जितना अधिक सम्बन्ध रहता है, उतनी अधिक बुद्धि क्षमता होती है। इसका वर्णन शङ्कराचार्य ने किया है-
समुन्मीलत् संवित्-कमल मकरन्दैक रसिकं, भजे हंस-द्वन्द्वं किमपि महतां मानसचरम्।
यदालापादष्टादश गुणित विद्या परिणतिः, तदादत्ते दोषाद् गुणमखिल-मद्भ्यः पय इव॥ 
(शंकराचार्य, सौन्दर्य लहरी, ३८)
इन २ हंसों को वेद में २ सुपर्ण कहा है, जिनमें एक कर्म फल का भोग करता है, अन्य निर्लिप्त है-
द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया, समानं वृक्षं परिषस्वजाते। 
तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्ति, अनश्नन्नन्यो अभिचाकषीति॥
(मुण्डक उप. ३/१/१, श्वेताश्वतर उप. ४/६, ऋक्, १/१६४/२०, अथर्व, ९/९/२०)
भौतिक शरीर में इनको आत्मा तथा जीव कहा है, जो बाइबिल में आदम-ईव हो गया है।
भौगोलिक रूप में भारत का मस्तिष्क स्थान हिमालय का त्रिविष्टप् (तिब्बत) है। इसके ३ विष्टप् (या विटप = वृक्ष) हैं। वृक्ष का मूल भूमि से जल ग्रहण कर तना और शाखा होते हुए पत्तों तक पहुंचाता है। इसी प्रकार हिमालय क्षेत्र में जो जल बरसता है, वह कई धाराओं से बह कर ३ नदियों से सागर तक जाता है। पश्चिम भाग का जल सिन्धु नदसे होकर सिन्धु समुद्र (वर्तमान नाम अरब सागर) में मिल जाता है। सिन्धु तनया लक्ष्मी विष्णु पत्नी हैं, अतः यह विष्णु विटप हुआ। मध्य भाग का जल गङ्गा से मिल कर गङ्गासागर (वर्तमान नाम बंगाल की खाड़ी) तक जाता है। इस जल ग्रहण क्षेत्र को शिव की जटा कहा गया है। यह शिव विटप हुआ। पूर्व भाग ब्रह्म विटप है, जिसका जल ब्रह्मपुत्र होते हुए गङ्गा सागर में मिलता है। इस रूप में गङ्गा सागर ब्रह्मा का क-मण्डल ( क = जल) है। ब्रह्मपुत्र के पार की भूमि ब्रह्म देश है। तीनों विटप मिल कर त्रिविष्टप हुआ। इसका केन्द्र कैलास भारत रूपी मस्तिष्क का केन्द्र है, अतः यह शिवका स्थान है। अतः शिव के ८ क्षेत्र इसकी देशान्तर रेखा पर हैं। 
अग्नि रूप में शिव के ८ वसु हैं, वायु रूप में ११ रुद्र तथा तेज रूप में १२ आदित्य हैं। अतः कैलास देशान्तर रेखा पर ८ मुख्य शिव पीठ हैं।
(२) उज्जैन केन्द्र से पूर्व दिशा में ६ अंश पर यह प्रथम सीमा क्षेत्र है। २ पीठों के नाम भी ’काल’ हैं-कालेश्वरम्, कालहस्ती। ज्योतिष में काल के २ रूप हैं-नित्य और जन्य काल। 
लोकानामन्तकृत् कालः, कालोऽन्यः कलनात्मकः। 
स द्विधा स्थूलसूक्ष्मत्वान्मूर्त्तश्चान्मूर्त्त उच्यते॥ (सूर्यसिद्धान्त १/१०) 
इस अर्थ में शिव को २ काल का स्वरूप कहा है-
या सृष्टिः स्रष्टुराद्या वहति विधिहुतं या हविर्या च होत्री, 
ये द्वे कालं विधत्तः श्रुतिविषयगुणा या स्थिता व्याप्य विश्वम्।
यामाहुः सर्वबीजप्रकृतिरिति यया प्राणिनः प्राणवन्तः, 
प्रत्यक्षाभिः प्रपन्नस्तनुभिरवतु वस्ताभिरष्टभिरीशः॥१॥ 
(अभिज्ञानशाकुन्तलम्, मंगलाचरण) 
इनका विस्तृत वर्णन अथर्व वेद के २ काल सूक्तों में है (अथर्व सूक्त, १९/५३-५४)।
कालहस्ती स्थूलरूप है जिसकी माप की जाती है। कालेश्वरम् नित्य काल है।
(३) मस्तिष्क से आरम्भ कर मेरुदण्ड में ८ चक्र हैं-सहस्रार, विन्दु, आज्ञा, विशुद्धि, अनाहत, मणिपूर, स्वाधिष्ठान, मूलाधार। अतः मस्तिष्क कैलास से नीचे (दक्षिण) ८ शिव पीठ हैं। अन्य प्रकार से इसकी व्याख्य़ा है कि ये ५ महाभूत-आकाश, वायु, अग्नि, अप्, भूमि तत्त्व के प्रतीक हैं। अन्य ३ हैं-मन, बुद्धि, अहंकार। या अष्टधा प्रकृति रूप हैं।

Monday, 29 December 2025

एकलव्य का अंगूठा और शूद्र

पुरानी पोस्ट है : #एकलव्य_महाभारत को संदर्भित करके ऊंची नीची जाति तथा शोषण का प्रोपगंडा फैलाने वालों से अपेक्षा है कि वे मात्र कुछ सौ वर्ष पहले हमारे शिल्पकारों के अंगूठे काटे जाने के सत्य इतिहास से परिचित होंगे। 

1772 के #एकलव्यों का अंगूठा किस द्रोणाचार्य ने काटा था ? 

आज एक उद्भट विद्वान की वाल पर गया, जो उच्च शिक्षा आयोग में निरन्तर कई वर्ष तक सदस्य रहे हैं। 
#शम्बूक_कथा पर अपने पद के अनुरूप ही अति गर्वीली पोस्ट लिखी थी। 

मैंने मात्र दो कमेंट लिखा और वे धराशायी हो गए। 
सत्य एक ही होता है। असत्य के अनेकों स्वरूप और कलेवर होते हैं। एक बार आप जोर से दहाड़िये तो। 
पेंट गीली होना निश्चित है। 

#मिथक के एक #एकलव्य के #अंगूठा काटने को लेकर भारत मे 3000 या 5000 वर्षो के अत्याचार का #रंडी_रोना मचाए वामियों और दलित चिंतको , मात्र 250 साल पहले सिल्क के कपड़े बनाने वाले भारतीयों ने #अपने_अंगूठे_खुद काट लिए। वे कहां गए क्या हुवा उनका? 10,000 साल की कथा तुम्हे पता है और 200 साल की कथा तुम्हे नही याद है।
तुम निम्न किस्म के केंचुए हो। स्वार्थ घृणा और कुंठा से भरे हुए जोंक हो तुम। 
क्योंकि तुमको देश का खून चूसने और झूंठ का ढिंढोरा पीटने में आनंद आने लगा है। 

ब्रिटिश दस्युवो ने तुमको नष्ट किया बर्बाद किया और तुमको एकलव्य और शम्बूक का झुनझुना थमा दिया:

 “18वी शताब्दी मे विश्व के अन्य देशों की तरह ही, भारत मे भी सड़क या नदी से होने वाले व्यापार पर ड्यूटी लगा करती थी। लेकिन ईस्ट इंडिया कंपनी ने एक सरकारी फरमान प्राप्त कर लिया था जिसके माध्यम से आयातित या निर्यात होने वाली वस्तुओं को टैक्स फ्री कर दिया था। अतः कंपनी द्वारा निर्यातित या आयातित किसी भी वस्तु पर टैक्स नहीं लगता था”।

(रिफ्रेन्स – रोमेश दुत्त इकनॉमिक हिसटरि ऑफ ब्रिटिश इंडिया, पेज -18)

"1757 मे मीर जफर को बंगाल का नवाब बनाया गया लेकिन मात्र 3 साल बाद 1760 मे उसके ऊपर असमर्थ बताकर मीर कासिम को नवाब बनाया , जिसने कंपनी को बर्धमान मिदनापुर और चित्तगोंग नामक तीन जिलों का रवेनुए तथा मीरजाफ़र पर द्वारा दक्षिण भारत मे हुये युद्ध मे कंपनी द्वारा खर्च किए गए, देय उधार धन 5 लाख रुपये कंपनी के खाते मे जमा करवाया"।
 ( रोमेश दुत्त – पेज -19 )

लेकिन उसके बाद सभ्य अंग्रेजों ने जो आम जनता के द्वारा निर्मित वस्तुओं की लूट मचाई, वो किसी भी सभ्य समाज द्वारा एक अकल्पनीय घटना है। उस दृश्य को आप बंगाल के नवाब द्वारा मई 1762 को ईस्ट इंडिया कंपनी को लिखे पत्र से समझा जा सकता है:
 “ हर जिले, हर परगना , और हर फ़ैक्ट्री मे वे ( कंपनी के गुमाश्ते ) नमक, सुपाड़ी, घी , चावल, धान का पुवाल ( सूखा डंठल, जरा सोचिए क्या क्या खरीद कर ये दरिद्र समुद्री डकैत खरीद कर यूरोप ले जाते थे ) बांस ,मछली ,gunnies अदरक चीनी तंबाकू अफीम और अन्य ढेर सारी वस्तुयेँ,जिनको लिख पान संभव नहीं है , को खरीदते बेंचेते रहते हैं । वे रैयत और व्यापारियों की वस्तुए ज़ोर जबर्दस्ती हिंसा और दमन करके ,उनके मूल्य के एक चौथाई मूल्य पर ले लेते हैं , पाँच रुपये की वस्तु एक रुपए मे लेकर भी वे रैयत पर अहसान करते हैं। 

 प्रत्येक जिले के ओफिसर अपने कर्तव्यो का पालन नहीं करते और उनके दमानात्मक रवैये और मेरा टैक्स न चुकाने के कारण मुझे प्रत्येक वर्ष 25 लाख रुपयों का नुकसान हो रहा है। मैं उनके द्वारा किए गए किसी समझौते का न उल्लंघन करता हूँ न भविष्य मे करूंगा , तो फिर क्यूँ अंग्रेज़ो के उच्च अधिकारी मेरा अपमान कर रहे हैं, और मेरा निरंतर नुकसान कर रहे हैं ”।
( रोमेश दुत्त पेज – 23 ) 

सभ्य बनाने आए इयसाइयों के नैतिक ऊंचाई को आप इस एक उद्धरण से ही माप सकते हैं।

यही बात ढाका का कलेक्टर महोम्मद अली ने कलकत्ता के अंग्रेज़ गवर्नर 26 मई 1762 मे लिखा “पहली बात तो ये है कि व्यापारी फ़ैक्टरी मे रुचि दिखा रहे हैं और अपने नावों पर अंग्रेजों का झण्डा लगाकर अपने को अंग्रेजो का समान होने का दिखावा करते हैं , जिससे कि उनको duty न देना पड़े। दूसरी बात ढाका और लकीपुर की फ़क्टरियाँ व्यापारियों को तंबाकू सूती कपड़े , लोहा और अनेक विविध वस्तुओं को बाज़ार से ज्यादा दामों मे खरीदने का प्रलोभन देते हैं, लेकिन बाद मे जबर्दस्ती वो पैसा उनसे छीन लेते हैं; जो व्यापारियों को पैसा एडवांस मे दिया था ।

लेकिन फिर उनके ऊपर एग्रीमंट तोड़ने का बहाना बनाकर उनके ऊपर फ़ाइन लगाते हैं । तीसरी बात लकीपुर फैक्ट्री के गुमाश्ते तहसीलदार से ताल्लूकदारों से उनके ताल्लूक ( कृषि योग्य जमीन ) को निजी प्रयोग के लिए जबरन कब्जा कर लेते हैं , और उसका भाड़ा भी नहीं देते। कुछ लोगों के कहने पर ,कोई शिकायत होने पर वे यूरोपेयन लोगों को एक सरकारी आदेश का परवाना लेकर गावों मे जाकर उपद्रव करते हैं। वे टोल स्टेशन बनाते हैं और जो भी किसी गरीब के घर समान मिलता है उसको बैंचकर पैसा बनाते हैं। इन उपद्रवों के कारण पूरा देश नष्ट हो गया है और रैयत न अपने घरों मे रह सकते हैं और न ही मालगुजारी चुका सकते हैं। मिस्टर चवालीर ने कई स्तर पर झूँटे बाजार और झूंठे फक्ट्रिया बनाया हैं, और अपनी तरफ से झूंठे सिपाही बनाए हैं जो जिसको चाहे उसको पकड़कर उनसे जबरन अर्थदण्ड वसूलते हैं । उनके इस जबर्दस्ती के अत्याचारों के कारण कई हाट बाजार और परगना नष्ट हो गए हैं। ” 
( रोमेश दुत्त पेज 24- 25 )

“इस तरह बंगाल के प्रत्येक महत्वपूर्ण जिले के व्यापार को कंपनी के नौकरों और अजेंटों ने नष्ट किया और इन वस्तुओं के निरमातों को निर्दयता के साथ अपना गुलाम बनाया । उसका वर्णन एक अंग्रेज़ व्यापारी विलियम बोल्ट्स ने आंखो देखी हाल खुद लिखा है :
“ अब इस बात को सत्यता के साथ बताया जा सकता है कि वर्तमान मे यह व्यापार जिस तरह इस देश मे हो रहा है , और जिस तरह कंपनी अपना इनवेस्टमेंट यूरोप मे कर रही है,वो एक दमनकारी प्रक्रिया है; जिसका अभिशाप इस देश का हर बुनकर और निर्माता भुगतने को मजबूर है, प्रत्येक उत्पाद को एकाधिकार मे बदला जा रहा है ; जिसमे अंग्रेज़ अपने बनियों और काले गुमाश्तों के मदद से, मनमाने तारीके से यह तय करते हैं कि कौन निर्माता किस वस्तु का कितनी मात्रा मे, और किस दर पर निर्मित करेगा ...गुमाश्ते औरंग या निर्माताओं के कस्बे मे पहुँचने के बाद वो एक दरबार लगाता है जिसको वह अपनी कचहरी कहता है। 

जिसमे वो अपने चपरासी और हरकारों की मदद से वो दलाल और पयकार और बुनकरों को बुलाता है, और अपने मालिक द्वारा दिये गए धन मे से कुछ पैसा उनको एडवांस मे देता है और उनसे एक एग्रीमंट पर दस्तखत करवाता है जिसके तहत एक विशेष प्रॉडक्ट , एक विशेष मात्रा मे, एक विशेष समय के अंदर डेलीवर करना है। उस मजबूर बुनकर की सहमति आवश्यक नहीं समझी जाती है। और ये गुमाश्ते, जो कंपनी के वेतनभोगी थे , प्रायः इस तरह के एग्रीमंट उनसे अपने मन मुताबिक करवाते रहते थे; और यदि बुनकरों ने ये एडवांस रकम स्वीकार करने से इंकार किया तो उनको बांधकर शारीरिक यातना दी जाती है.... कंपनी के गुमाश्तों के रजिस्टर मे बहुत से बुनकरों के नाम दर्ज रहते थे, जो किसी दूसरे के लिए काम नहीं कर सकते थे, और वे प्रायः एक गुलाम की तरह एक गुमाश्ते से दूसरे गुमाश्ते के हाथों तब्दील किए जाते रहते हैं, जिनके ऊपर दुष्टता और अत्याचार हर नए गुमाश्ते के हाँथो बढ़ता ही जाता है ... इस विभाग मे जो अत्याचार होता है वो अकल्पनीय है ; लेकिन इसका अंत इन बेचारे बुनकरों को धोखा देने मे ही होता है; क्योंकि गुमाश्तों और जांचकारो ( कपड़े की क्वालिटी जाँचने वाला ) द्वारा जो दाम उनके प्रोडक्टस का तय किया जाता था वो कम से कम बाजार के दाम से 15 से 40 % कम होता है ...।

बंगाल के बुनकरों के साथ, कंपनी के अजेंटों द्वारा जबर्दस्ती किए गए इन अग्रीमेंट्स को पूरा न करने की स्थिति मे, उनके खिलाफ मुचलका जारी किया जाता था , उसके तहत उनके सारे सामान (कच्चा और पक्का माल ) उस एग्रीमंट की भरपाई के लिए कब्जा कर लिया जाता है और उसी स्थान पर उनको बेंच दिया जाता है ; कच्चे सिल्क को कपड़ों मे बुनने वाले लोगों के, जिनको Nagoads कहते हैं, उनके साथ भी इसी तरह का अन्याय होता है, और ऐसी घटनाए आम बात हैं जिसमे उन्होने जबर्दस्ती #सिल्क के #कपड़े #बनाने की #मजबूरी से बचने के लिए स्वयं ही अपने #अंगूठे #काट लिए ।

( and the winders of raw silk , called Nagoads, have been known of their cutting off their thumbs to prevent their being forced to wind silk ) 
(Ref: Consideration on India affairs (London 1772), p 191 to 194 : from Romesh Dutt ; Economic History of British India , page 25-27 )

इस सच्चाई तक तुम्हारी पहुंच नही है धूर्त और मक्कारों?
इसीलिये पुस्तक का नाम लिखा है। गूगल आर्काइव से डाउनलोड करो और पढो।

बाबा साहेब जैसे पढ़े लिखे लोग ही नहीं, तिलक और दिनकर जैसे लोग भी उस अफवाहबाजी का शिकार हुए जिसको इंडोलॉजी नामक #फेक_साइंस के नाम से उनको विश्वविद्यालय में पढ़ाया गया। 

कोई लुटेरा तुमको निम्न प्रमाणित करके ही तो अपने को श्रेष्ठ प्रमाणित कर सकेगा? 
उन्होंने तुम्हें उल्लू बनाया शिक्षा के माध्यम से।
और तुम उल्लू बनने को तैयार बैठे थे।
बने।

Saturday, 27 December 2025

जम्बू द्वीप भारतवर्ष

हिन्दू धर्म : जम्बू द्वीप में कहां था सुमेरू पर्वत?

जम्बू द्वीप के आसपास 6 द्वीप थे- प्लक्ष, शाल्मली, कुश, क्रौंच, शाक एवं पुष्कर। जम्बू द्वीप धरती के मध्य में स्थित है और इसके मध्य में इलावृत नामक देश है। आज के कजाकिस्तान, रूस, मंगोलिया और चीन के मध्य के स्थान को इलावृत कहते हैं। इस इलावृत के मध्य में स्थित है सुमेरू पर्वत।

इलावृत के दक्षिण में कैलाश पर्वत के पास भारतवर्ष, पश्चिम में केतुमाल (ईरान के तेहरान से रूस के मॉस्को तक), पूर्व में हरिवर्ष (जावा से चीन तक का क्षेत्र) और भद्राश्चवर्ष (रूस), उत्तर में रम्यकवर्ष (रूस), हिरण्यमयवर्ष (रूस) और उत्तकुरुवर्ष (रूस) नामक देश हैं।

मिस्र, सऊदी अरब, ईरान, इराक, इसराइल, कजाकिस्तान, रूस, मंगोलिया, चीन, बर्मा, इंडोनेशिया, मलेशिया, जावा, सुमात्रा, हिन्दुस्तान, बांग्लादेश, नेपाल, भूटान, पाकिस्तान और अफगानिस्तान का संपूर्ण क्षेत्र जम्बू द्वीप था।

अगले पन्ने पर सुमेरू पर्वत का रोचक वर्णन...

इलावृत देश के मध्य में स्थित सुमेरू पर्वत के पूर्व में भद्राश्ववर्ष है और पश्चिम में केतुमालवर्ष है। इन दोनों के बीच में इलावृतवर्ष है। इस प्रकार उसके पूर्व की ओर चैत्ररथ, दक्षिण की ओर गंधमादन, पश्चिम की ओर वैभ्राज और उत्तर की ओर नंदन कानन नामक वन हैं, जहां अरुणोद, महाभद्र, असितोद और मानस (मानसरोवर)- ये चार सरोवर हैं। माना जाता है कि नंदन कानन का क्षेत्र ही इंद्र का लोक था जिसे देवलोक भी कहा जाता है। महाभारत में इंद्र के नंदन कानन में रहने का उल्लेख मिलता है।

सुमेरू के दक्षिण में हिमवान, हेमकूट तथा निषध नामक पर्वत हैं, जो अलग-अलग देश की भूमि का प्रतिनिधित्व करते हैं। सुमेरू के उत्तर में नील, श्वेत और श्रृंगी पर्वत हैं, वे भी भिन्न-भिन्न देश में स्थित हैं।

इस सुमेरू पर्वत को प्रमुख रूप से बहुत दूर तक फैले 4 पर्वतों ने घेर रखा है। 1. पूर्व में मंदराचल, 2. दक्षिण में गंधमादन, 3. पश्चिम में विपुल और 4. उत्तर में सुपार्श्व। इन पर्वतों की सीमा इलावृत के बाहर तक है।

सुमेरू के पूर्व में शीताम्भ, कुमुद, कुररी, माल्यवान, वैवंक नाम से आदि पर्वत हैं। सुमेरू के दक्षिण में त्रिकूट, शिशिर, पतंग, रुचक और निषाद आदि पर्वत हैं। सुमेरू के उत्तर में शंखकूट, ऋषभ, हंस, नाग और कालंज आदि पर्वत हैं।
अगले पन्ने पर, अन्य पर्वत और गंगा नदी के स्वर्ग से उतरना...

अन्य पर्वत : माल्यवान तथा गंधमादन पर्वत उत्तर तथा दक्षिण की ओर नीलांचल तथा निषध पर्वत तक फैले हुए हैं। उन दोनों के बीच कर्णिकाकार मेरू पर्वत स्थित है। मर्यादा पर्वतों के बाहरी भाग में भारत, केतुमाल, भद्राश्व और कुरुवर्ष नामक देश सुमेरू के पत्तों के समान हैं। जठर और देवकूट दोनों मर्यादा पर्वत हैं, जो उत्तर और दक्षिण की ओर नील तथा निषध पर्वत तक फैले हुए हैं। पूर्व तथा पश्चिम की ओर गंधमादन तथा कैलाश पर्वत फैला है। इसी समान सुमेरू के पश्चिम में भी निषध और पारियात्र- दो मर्यादा पर्वत स्थित हैं। उत्तर की ओर निश्रृंग और जारुधि नामक वर्ष पर्वत हैं। ये दोनों पश्चिम तथा पूर्व की ओर समुद्र के गर्भ में स्थित हैं।

गंगा की नदियां : माना जाता है कि सुमेरू के ऊपर अंतरिक्ष में ब्रह्माजी का लोक है जिसके आस-पास इंद्रादि लोकपालों की 8 नगरियां बसी हैं। गंगा नदी चंद्रमंडल को चारों ओर से आप्लावित करती हुई ब्रह्मलोक (शायद हिमवान पर्वत) में गिरती है और सीता, अलकनंदा, चक्षु और भद्रा नाम से 4 भागों में विभाजित हो जाती है।

सीता पूर्व की ओर आकाश मार्ग से एक पर्वत से दूसरे पर्वत होती हुई अंत में पूर्व स्थित भद्राश्ववर्ष (चीन की ओर) को पार करके समुद्र में मिल जाती है। अलकनंदा दक्षिण दिशा से भारतवर्ष में आती है और 7 भागों में विभक्त होकर समुद्र में मिल जाती है। चक्षु पश्चिम दिशा के समस्त पर्वतों को पार करती हुई केतुमाल नामक वर्ष में बहते हुए सागर में मिल जाती है। भद्रा उत्तर के पर्वतों को पार करते हुए उतरकुरुवर्ष (रूस) होते हुए उत्तरी सागर में जा मिलती है।

पृथ्वी के मध्य में जम्बू द्वीप है। इसका विस्तार एक लाख योजन का बतलाया गया है। जम्बू द्वीप की आकृति सूर्यमंडल के सामान है। वह उतने ही बड़े खारे पानी के समुद्र से घिरा है। जम्बू द्वीप और क्षार समुद्र के बाद शाक द्वीप है, जिसका विस्तार जम्बू द्वीप से दोगुना है। वह अपने ही बराबर प्रमाण वाले क्षीर समुद्र से, उसके बाद उससे दोगुना बड़ा पुष्कर द्वीप है, जो दैत्यों को मदोन्मत्त कर देने वाले उतने ही बड़े सुरा समान समुद्र से घिरा हुआ है। उससे परे कुश द्वीप की स्थिति मानी गई है, जो अपने से पहले द्वीप की अपेक्षा दोगुना विस्तार वाला है। कुश द्वीप को उतने ही बड़े विस्तार वाले दही समान के समुद्र ने घेर रखा है। उसके बाद क्रोंच नामक द्वीप है; जिसका विस्तार कुश द्वीप से दोगुना है, यह अपने ही सामान विस्तार वाले घी समान समुद्र से घिरा है। इसके बाद दोगुना विस्तार वाला शाल्मलि द्वीप है; जो इतने ही बड़े ईख रस समान समुद्र से घिरा हुआ है। उसके बाद उससे दोगुने विस्तार वाले गोमेद (प्लक्ष) नामक द्वीप है; जिसे उतने ही बड़े रमणीय स्वादिष्ट जल के समुद्र ने घेर रखा है।

जम्बू द्वीप के मध्यभाग में मेरु पर्वत है, यह ऊपर से नीचे तक एक लाख योजन ऊंचा है। सोलह हजार योजन तो यह पृथ्वी के नीचे तक गया हुआ है और चौरासी हजार योजन पृथ्वी से ऊपर उसकी ऊंचाई है। मेरु के शिखर का विस्तार बत्तीस हजार योजन है। उसकी आकृति प्याले के सामान है। वह पर्वत तीन शिखरों से युक्त है, उसके मध्य शिखर पर ब्रह्माजी का निवास है, ईशान कोण में जो शिखर है, उस पर शंकरजी का स्थान है तथा नैऋत्य कोण के शिखर पर भगवान विष्णु की स्तिथि है।

मेरु पर्वत के चारों ओर चार विष्कम्भ पर्वत माने गए हैं। पूर्व में मंदराचल, दक्षिण में गंधमादन, पश्चिम में सुपार्श्व तथा उत्तर में कुमुद नामक पर्वत है। इनके चार वन हैं जो पर्वतों के शिखर पर ही स्थित हैं। पूर्व में नंदन वन, दक्षिण में चैत्र रथ वन, पश्चिम में वैभ्राज वन और उत्तर में सर्वतोभद्र वन है। इन्हीं चरों में चार सरोवर भी हैं। पूर्व में अरुणोद सरोवर, दक्षिण में मान सरोवर, पश्चिम में शीतोद सरोवर तथा उत्तर में महाह्रद सरोवर है। ये विष्कम्भ पर्वत पच्चीस पच्चीस हजार योजन ऊचे हैं। इनकी चोड़ाई भी हजार हजार योजन मानी गई है। मेरुगिरी के दक्षिण में निषध, हेमकूट और हिमवान- ये तीन मर्यादा पर्वत हैं। इनकी लम्बाई एक लाख योजन और चौड़ाई दो हजार योजन मानी गई है। मेरु के उत्तर में भी तीन मर्यादा पर्वत हैं- नील, श्वेत और श्रंग्वान। मेरु से पूर्व माल्यवान पर्वत है और मेरु के पश्चिम में गंधमादन पर्वत है। ये सभी पर्वत जम्बू द्वीप पर चारों ओर फैले हुए हैं। गंधमादन पर्वत पर जो जम्बू का वृक्ष है, उसके फल बड़े बड़े हाथियों के समान होते हैं। उस जम्बू के ही नाम पर इस द्वीप को जम्बू द्वीप कहते हैं।

पूर्व काल में स्वायम्भुव नाम से प्रसिद्ध एक मनु हुए हैं; वे ही आदि मनु और प्रजापति कहे गए हैं। उनके दो पुत्र हुए, प्रियव्रत और उत्तानपाद। राजा उत्तानपाद के पुत्र परम धर्मात्मा ध्रुव हुए, जिन्होंने भक्ति भाव से भगवान् विष्णु की आराधना करके अविनाशी पद को प्राप्त किया। राजर्षि प्रियव्रत के दस पुत्र हुए, जिनमें से तीन तो संन्यास ग्रहण करके घर से निकल गए और परब्रह्म परमात्मा को प्राप्त हो गए। शेष सात द्वीपों में उन्होंने अपने सात पुत्रों को प्रतिष्ठित किया। राजा प्रियव्रत के ज्येष्ठ पुत्र आग्नीघ्र जम्बू द्वीप के अधिपति हुए। उनके नौ पुत्र जम्बू द्वीप के नौ खण्डों के स्वामी माने गए हैं, जिनके नाम उन्हीं के नामों के अनुसार इलावृतवर्ष, भद्राश्ववर्ष, केतुमालवर्ष, कुरुवर्ष, हिरण्यमयवर्ष, रम्यकवर्ष, हरीवर्ष, किंपुरुष वर्ष और हिमालय से लेकर समुद्र के भू-भाग को नाभि खंड (भारतवर्ष) कहते हैं।

नाभि और कुरु ये दोनों वर्ष धनुष की आकृति वाले बताए गए हैं। नाभि के पुत्र ऋषभ हुए और ऋषभ से ‘भरत’ का जन्म हुआ; जिनके आधार पर इस देश को भारतवर्ष भी कहते हैं।

संदर्भ : हिन्दू ग्रंथ विष्णु पुराण, जैन ग्रंथ 'जंबूद्वीप्प्रज्ञप्ति

बाइबल ईसाई

ईसाईयत की नींव ही कामवासना (s€x) पर है।👇

1-यहोवा परमेश्वर औरतों को नंगा करता था । ( Yashashah3/16-17 )

2-हजरत लूत ने शराब पीकर अपनी दो बेटियों को ही गर्भवति बनाया । ( Genesis 19/33-28 )

3- यहूदा ने अपने बेटे की बहू से व्यभिचार किया । ( 38/12-20 )

4-हजरत अविराहम ने अपनी बहन से व्याभिचार किया और झूठ- मूठ की शादी की । ( Genesis 12/11-13)

5याकूब ने अपनी दासियों के साथ व्यभिचार किया और उसकी बहन दीन ने हमूर के बेटे सिकम के साथ व्यभिचार किया । ( Genesis 34/24-30 )

6-बाप अपनी बेटी के साथ व्यभिचार और शादी कर सकता है । ( Carenthio 36-37-38 )

7-दाऊद के बेटे आमनून ने अपनी सगी बहन तामार के साथ जबरदस्ति मूँह काला किया । ( Semuel 2/13/1-20 )

8- इसराइल में रुबेन ने अपने पिता की बीवी के साथ व्यभिचार किया । और मूसा ने फौज को क्वांरी अछूती कन्याओं से खुले व्यभिचार की आज्ञा दी । ( Ginti Book 31/14-18 )

9-इन्सान को मनुष्य के मल पर रोटी पका कर खाने की आज्ञा है । ( जेहकेल पर्व 4 )

अभी कोई कहेगा बाइबिल एक धार्मिक पुस्तक है?
भाई साहब इन सभी कार्यो को घर व समाज में ना दोहराऐं , हानिकारक हो सकता है लात घुसे ईंटे पत्थर डंडे आदि पड़ेंगे और जेल होगी----
ऐसे नीच चरित्रहीन लोग चंगाई सभाओं के द्वारा भोले भाले लोगों को सभ्यता का पाठ पढ़ाते हैं । और ईसाईयत की श्रेष्ठता का दावा करते हैं और हमारे भी कुछ मूर्ख हिन्दू चर्च जाकर ऐसी सभ्यता का पाठ पढ़ने जाते हैं क्या?

Thursday, 25 December 2025

शूद्र मंदिर और अंबेडकर

यह उस #दस्तावेज के कुछ पन्ने है - #रेगुलशन_1804 या 1806, जिसका उद्धरण प्रस्तुत करके अंबडेकर जी ने 1930 में अपने मालिकान नग्रेजो को बताया कि पूरी के मंदिर में 17 जातियों को नही घुसने दिया जाता था। 
लेकिन यह नही बताया कि कौन नही घुसने दे रहा था।
और क्यों नही घुसने दे रहा था।
लोथियन समिति की रिपोर्ट पढिये।
इस रेगुलशन को बनाया गया था हिन्दुओ से पूरी मन्दिर में दर्शन करने के लिए टैक्स वसूलने के लिए।
जो जितना टैक्स देने की आर्थिक क्षमता रखता था उसको उस श्रेणी की सुविधा लेने की अनुमति देते थे वे।
2 रुपये से लेकर 10 रुपये टैक्स वसूली होती थी। 
जो टैक्स नही दे सकता था, उसे घुसने नही देते थे वे। पुजारी नही, अंग्रेज दस्यु, जिनको दलित छींटक अपना बाप समझते हैं। 

यह रेगुलशन #Temple_Endowment_act नामक उस कानून की पृष्ठभूमि बनाती है जिसे नग्रेजो ने बनाया।
 और स्वत्नत्रता के बाद नेहरू ने उसे जारी रखा, और आज भी वह जारी है - मंदिर की सम्पत्तिओं और उस पर चढ़ावे पर सरकारी कब्जा।

 लेकिन मस्जिद और चर्च के लिए ऐसा कोई कानून न उन्होंने बनाया, न इन्होंने। 

आज भी मंदिरों पर सरकार का कब्जा है।
क्यों है?
क्योंकि आपने कभी सवाल नही उठाया।
सवाल उठाइये।
क्योंकि सरकार का चरित्र एक ही जैसा होता है।
सरकार चलाते हैं बाबू।
नेता जब तक उनको बम्बू न करे वह कोई कानून बदलने नहीं देंगे।

इस पोस्ट से एक और महत्वपूर्ण प्रश्न उठाना चाहता हूँ।

"कोई बता सकता है कि 10 रुपये का जो मूल्य 1804 में था, उसका आज कितना मूल्य होगा?
1807 में francis hamilton buchnan लिखता है कि एक रुपये का मूल्य दो पौण्ड था।
1901 में दादा भाई नौरोजी लिखते है कि एक रुपये का मूल्य सोने के एक सिक्के के बराबर था। 

उस समय दर्शनार्थियों से 2 रुपये से 10 रुपए के बीच टैक्स वसूला जाता था।

1804 जनवरी से अप्रैल के बीच 46,000 दर्शनार्थी गए थे जिनमें से लगभग 20,000 लोगों से टैक्स वसूला गया था।

यह दर्शनार्थी कोई राजा महाराजा नहीं थे, हर कुम्भ में आने वाले दर्शनार्थियों जैसे ही थे।
लेकिन 1800 तक भारत विश्व की 20%, जीडीपी का निर्माता था।
1900 आते आते मात्र 2% जीडीपी का निर्माता बचा।
लाखो अछूत 1900 के आस पास पैदा हुए।"

इस पोस्ट के अनेक विंदु हैं।
आप जिन पर भी प्रकाश डाल सकते हैं, डालिये। 
यह papers related to east india affairs से उद्धरित है

Wednesday, 24 December 2025

बंदा बैरागी बंदा बहादुर और सिख

कितने लोग "गमानी कावा" शब्द जानते है

" गोविदराय जी , बिन #पेशवाई आप पंजाब में मुगलों के खिलाफ 1 वर्ष भी नही टिक पाएंगे "...

गुरु गोविद सिंह का मराठा देश में स्वागत करते हुए पिंगले सरदार ने कहा... " गुरुजी , हम मराठों ने भगवान परशुराम को अपना आराध्य माना है , तो उन्ही के बताए नियमों से लड़ते भी हैं "...

सिखों के गुरु गोविंद सिंह अचंभित थे !! 

वे तो विष्णु के सबसे विध्वंसक अवतार भगवान परशुराम को लगभग भूल ही गए थे... उनको ध्यान ही नही रहा,लेकिन जब मराठो की मुगलों के खिलाफ विजय देखते है , तब उनसे रहा नही गया.....

उन्होंने पूंछ ही लिया "यह #पेशवे_पद्धति है क्या ? "

सरदार मोरोपंत पिंगले ने कहा " गुरुजी यह प्राचीन ब्राहमण - क्षत्रिय पद्धति पर आधारित परशुराम विधित्व सर्वसम्मत सह्याद्रि खण्ड में वर्णित हिन्दुओ की सबसे तेज युद्ध नीति है जिसे हम लोग... गमानी कावा #GAMANI_KAWA कहते है "....
              " इसका मतलब है , दुश्मन से वहां लडो , जहां आप हो ही नही... हमारा राजा यहां सतारा में बैठता है । उसकी जगह युद्ध उसका पेशवा लड़ता है । नीति निर्धारण कही और पेशवा की मार कही और होती है...."
          " ब्राहमण होने के नाते उसका हर सूबे में यजमानी और रिश्तेदारी है... उनकी सफलता तेज है और जरूरत पड़ने में रिज़र्व रूप में व्यूह-रचना बढ़ता है । वो सब पेशवा के अधीनस्थ लड़ते है लेकिन राजा जिंदा रहता है और ताकतवर होता जाता है... "

यही 4th generation warfare है । 

गुरुवर को बात समझ मे आ जाती है । वह बंदा मोहियाली को अपना पेशवा नियुक्त करते है और उत्तर की ओर भेजते है ! लेकिन सिख इस पद्धति को चला ही नही पाते और अपने गुरु के नियुक्त अंतिम योद्धा श्रीमन्त बंदाबहादुर (हिंदू -ब्राह्मण) के खिलाफ ही विद्रोह कर देते है... 

सिख दो खेमे में बंट जाते है - बेबेसिख (खालसे) और बंदाई सिख (श्रीमंत बंदा बहादुर के लोग)... बाद में यही खालसे श्रीमंत बंदा बहादुर को पकड़वा देते है और मुगल... बन्दाबहादुर की बहुत क्रूरतम हत्या कर देते हैं..

बंदा बहादुर के लोगो को पहचानने 5 नियामक थे ,जिसका खालसे (बेबे-सिख) विरोध करते थे...

(१) चरणामृत पीना 
(२) जनेऊ पहनना 
(३) सफेद कपड़े पहनना ( काले एवम हरे से परहेज )
(४) धोती का गुटनो के नीचे तक जाना 
(५) जयघोष - जय दर्शन की... जय गुरु की...

यह बंदाबहादुर का हस्तलिखित निर्देश है जिसे " बन्दा फरमान " कहते है । 

Monday, 22 December 2025

rahim रहीम

आज 17 दिसंबर ब्रज के कवि, अकबर के नवरत्नों में से एक, बैरम खाँ के लाड़ले, हम मेवातियों के नंवासे और एक कुशल सेनापति, प्रशासक तथा अपनी दानशीलता के लिए प्रसिद्ध अब्दुर्रहीम ख़ानख़ानाँ का जन्मदिन है l उसी रहीम का जिसका जीवन शायद मुग़लकाल का सबसे जटिल, चुनौती भरा और उतार-चढ़ाव वाला रहा है l रहीम ने कई भाषाओं जैसे फ़ारसी, अरबी, संस्कृत, ब्रज में निपुणता हासिल की हुई थी l जहाँगीर के शासनकाल में उन्हें आर्थिक संकटों और कैद का सामना करना पड़ा l 1627 में दिल्ली में उनका निधन हो गया और उन्हें पत्नी माहबानू के मकबरे के पास दफनाया गया, जिसका निर्माण उन्होंने स्वयं करवाया था l 
         रहीम के जन्मदिन के अवसर पर तुलसी और उनकी मित्रता को लेकर प्रस्तुत है उपन्यास 'ख़ानज़ादा' का एक अंश - 

OO
उम्र सिर्फ़ बीस बरस और ओहदा पहले गुजरात का सूबेदार और फिर मिर अर्ज़ l इतना ही नहीं बादशाह अकबर के नौ रत्नों में से एक रत्न का ख़िताब भी हासिल हो गया l अब्दुर्रहीम मिर्ज़ा खाँ का ज़्यादातर वक़्त अब दरबार की सियासत में बीतने लगा l घर आने के बाद शाम से लेकर इशा की नमाज़ तक का समय रहीम का माहबानू के आलिंगन में बीतता l बीच-बीच में वह हिंदी का ज्ञान अपनी माँ से, कुछ अपने शौक़ से और बाकी अरबी, फ़ारसी और तुर्की की तालीम अंदीजान के मौलवी मुल्ला मुहम्मद अमीन से हासिल करता रहता l इस सबके बीच जो समय मिलता उसमें वह नीतिपरक दोहे और चुटीले बरवै रच लेता l रहीम जब ये नीतिपरक दोहे और चुटीले बरवै दरबार में सुनाता, तब इन्हें सुन पूरा दरबार उसकी विदग्धता पर भौचक्क रह जाता l रहीम की यह प्रतिभा दरबार में टोडरमल, बीरबल और गंग जैसे कवियों के अलावा अनेक संस्कृत विद्वानों के साथ रह कर और निखरने लगी l इनकी संगत में रह कर हिंदू धर्म-शास्त्रों का ज़्यादा और गहन अध्ययन करने लगा l
  गुजरात में अब्दुर्रहीम जो अमन-चैन स्थापित कर आया था, अचानक एक दिन बादशाह अकबर के पास एक बेचैन करने वाली ख़बर आई l बादशाह ने गुजरात के सूबेदार और मीर अर्ज़ अर्थात अब्दुर्रहीम मिर्ज़ा खाँ को एक बार फिर बुलाया l
 “बादशाह सलामत, आपने याद फरमाया ?” रहीम ने कोर्निश करते हुए पूछा l
 “हाँ मिर्ज़ा खाँ, मुज़फ़्फ़र हुसैन मिर्ज़ा ने हमसे गुजरात फिर छीन लिया है l मैं चाहता हूँ कि आप फिर से गुजरात जाएँ और इस पाजी को सलीक़े से सबक़ सिखा कर आएँ l” 
 “जैसा आपका हुक्म बादशाह सलामत l”
 “इस काम को जितना ज़ल्दी अंजाम दिया जाए, उतना बेहतर होगा l”
 अब्दुर्रहीम मिर्ज़ा खाँ तुरंत गुजरात के लिए रवाना हो गया और शीघ्र हि मुज़फ़्फ़र हुसैन मिर्ज़ा की कमर तोड़ कर लौट आया l इससे ख़ुश होकर अगले दिन बादशाह अकबर ने उसे न केवल ख़िलअत देकर सम्मानित किया, बल्कि रहीम के वालिद मरहूम बैरम खाँ की तरह उसे भी ख़ानेख़ानाँ जैसे सबसे बड़े शाही ख़िताब से नवाज़ा गया l 
 रहीम एक बार फिर अपने दोहे, बरवै और सोरठा रचने में रम गया l
 एक बार शायर नज़ीरी निशापूरी ने अब्दुर्रहीम से कहा,”ख़ानेख़ानाँ साहब, मैंने ज़िंदगी में कभी एक लाख अशर्फ़ियाँ नहीं देखी हैं l”
 शायर नज़ीरी निशापूरी की बात सुन अब्दुर्रहीम ख़ानेख़ानाँ घर चला आया l घर आने के बाद भी उसे शायर नज़ीरी की यह बात परेशान करती रही l परेशान बेटे को देख शाम को माँ सलीमा बेगम उसके पास आई और सर पर हाथ फेरते हुए पूछा,”लगता है मेरा बेटा आज परेशान है ?”
 “अम्मी जान, ऐसा कुछ नहीं है l” रहीम ने माँ को टालना चाहा l
 “कुछ तो है l नहीं बताएगा तो किसी मुश्किल का ऐसे कैसे हल निकलेगा ?” 
 रहीम ने सोचा कि माँ को बता देना चाहिए वरना उसके चक्कर में वह भी परेशान रहेगी l वैसे भी उसकी ज़्यादातर मुश्किलों का हल यही तो बताती है l
 “अम्मी जान, पता है आज शायर नज़ीरी निशापूरी साहब क्या बोले l”
 “क्या बोले ?” माँ ने बेटे के बालों में अपनी नाज़ुक अँगुलियाँ फेरते हुए पूछा l
 “बोले कि ख़ानेख़ानाँ साहब, मैंने ज़िंदगी में कभी एक लाख अशर्फ़ियाँ नहीं देखी हैं l अम्मी जान, जब से नज़ीरी साहब ने यह कहा है, मैं तब से यह सोच-सोच कर बेचैन हूँ कि यहाँ मेरे पास बेशुमार दौलत है, और एक शायर नज़ीरी निशापूरी साहब जैसे लोग हैं, जिन्होंने कभी एक लाख अशर्फ़ियाँ नहीं देखी हैं l”
 “बेटा, शायर-कवियों के पास कभी धन-दौलत जुड़ती देखी है ? इनका दौलत से क्या लेना-देना l ये तो फ़क़ीर होते हैं l इस दुनिया में नज़ीरी साहब जैसे न जाने कितने लोग हैं l ऐसे ही लोगों के बारे में हमारे मेवात में कहा गया है कि-
 बिरह बाण और बिरहड़ा, इन्ने मत सीखियो कोए l
 इनका सीखणहार को, झुर-झुर पिंजर होए ll”
 
“आप सही कहती हैं अम्मी जान, शायरी-कवित्त करने वाले पिंजर हो जाते हैं l”
“वैसे रहीम, आपके लिए यह कौन-सी बड़ी बात है l”
 माँ के इतना कहते ही रहीम की सारी बेचैनी और परेशानी जैसे चुटकी बजाते काफ़ूर हो गई l उसने माँ का हाथ यह कहते हुए चूम लिया,”अम्मी जान, आपने मेरी बहुत बड़ी मुश्किल दूर कर दी l”
 अगले रोज़ सुबह अब्दुर्रहीम ख़ानेख़ानाँ ने शायर नज़ीरी निशापूरी को बुलवाया, और उसके सामने अशर्फ़ियों का ढेर लगा दिया l 
अपने सामने लगे अशर्फ़ियों के ढेर को देख शायर नज़ीरी निशापूरी बोला,”ख़ुदा का शुक्रिया ख़ानेख़ानाँ साहब, जो उसने इस नाचीज़ को एक लाख अशर्फ़ियों के दीदार करा दिए l”
“सिर्फ़ अशर्फ़ियों के दीदार के लिए ख़ुदा का क्या शुक्र अदा करना नज़ीरी साहब l”
“हम जैसों के लिए तो एक लाख अशर्फ़ियों को देखना ही किसी सपने का पूरा होने जैसी बात है l” अशर्फ़ियों को देखने के बाद शायर नज़ीरी निशापूरी अपनी जगह से उठा, और यह कह कर जाने लगा,” ख़ानेख़ानाँ साहब, आपका बहुत शुक्रिया l आपकी वजह से आज मेरा एक बहुत बड़ा सपना पूरा हो गया l ख़ुदा हाफ़िज़ l”
शायर नज़ीरी निशापूरी ने जिस नादीदेपन के साथ सपना पूरा होने की बात कही, अब्दुर्रहीम सोचने लगा कि जिस आदमी की ज़िंदगी का सपना सिर्फ़ एक लाख अशर्फ़ियों को देखने का रहा हो, अगर उसे ये मिल जाएँ तब इनसे उसके कितने सपने पूरे होंगे, उसके बारे में सोचा भी नहीं जा सकता l
“अगर ऐसा है नज़ीरी साहब तो एक बार इन्हें छू कर भी देख लो l कहीं ऐसा ना हो कि बाद में आप कहें कि मैंने ज़िंदगी में कभी सोने की अशर्फ़ियों को छू कर नहीं देखा l” 
 शायर नज़ीरी निशापूरी को लगा कि अब्दुर्रहीम ख़ानेख़ानाँ बात तो ठीक कह रहा है l वह वापिस लौटा और अशर्फ़ियों के ढेर में उसने दोनों हाथों की अँगुलियों को ऐसे डाला, जैसे अनाज की ढेरी में किसान हाथ डाल कर उसके दानों को परखता है l जिस वक़्त शायर नज़ीरी निशापूरी की अँगुलियाँ सोने की अशर्फ़ियों की देह का स्पर्श कर रही थीं, अब्दुर्रहीम ने ध्यान दिया शायर नज़ीरी की अँगुलियों में एक ख़ास तरह की जुम्बिश हो रही थी l शायर नज़ीरी निशापूरी ने एक बार फिर अब्दुर्रहीम ख़ानेख़ानाँ का शुक्रिया अदा किया, और वापिस जाने के लिए मुड़ा ही था कि पीछे से अब्दुर्रहीम ने उसे टोका l
 “नज़ीरी साहब, कहाँ चल दिए ?
 शायर नज़ीरी निशापूरी जाते-जाते रुक गया और मुस्कराते हुए बोला,”मिर्ज़ा खाँ, अपनी एक अधूरी ग़ज़ल का शे’र याद आ गया l कई दिनों से उसे पूरी करने की सोच रहा था, मगर पूरी नहीं हो रही थी l आज आपके पास आया तो एक बहुत उम्दा शे’र बन पड़ा है l”
 “वो तो ठीक है मगर इन अशआर को भी तो उठाइए !” अब्दुर्रहीम ने अपने सामने पड़े अशर्फ़ियों के ढेर की तरफ़ इशारा करते हुए कहा l 
नज़ीरी निशापूरी ने अशरफियों को बोरे में भरा और यह सोच कर उठा लिया कि शायद अब्दुर्रहीम यह जतलाना चाहता है, कि वह सिर्फ़ इन्हें देख और छूए भर नहीं, उठा कर यह भी महसूस करे कि एक लाख अशर्फ़ियों में कितना वज़न होता है l
“नज़ीरी साहब, ख़ुदा का शुक्र अदा करना तब ठीक रहेगा, जब आप इन्हें साथ ले जाएँगे !”   
 “ख़ानेख़ानाँ साहब, साथ ले जाएँगे ! क्या मतलब है आपका ?” शायर नज़ीरी निशापूरी के जैसे हाथ-पाँव ठंडे पड़ने लगे l
 “आज से बल्कि इसी वक़्त से इन पर अब आपका हक़ है नज़ीरी साहब l अब इनके मालिक आप हैं l” अब्दुर्रहीम ख़ानेख़ानाँ ने मुस्कराते हुए कहा l
 अब्दुर्रहीम ख़ानेख़ानाँ की इस उदारता की चारों तरफ़ चर्चा होने लगी l कुछ रोज़ पहले उसने मुल्ला शिकेवी को उसके फ़ारसी के एक शे’र पर एक हज़ार अशर्फ़ियाँ भेंट कर दी, तो अरबी कवि रफ़ीउद्दीन हैदर को एक लाख रुपए दे दिए l आए दिन रहीम से अरबी, फ़ारसी शायर ही नहीं अन्य कवि भी ईनाम में भेंट ले जाने लगे l उस दिन इबादतख़ाने में लगने वाली मजलिस में अब्दुर्रहीम ख़ानेख़ानाँ ने कवि गंग को एक छंद, जो छप्पय था, उससे प्रसन्न होकर जब गंग को ईनाम के रूप में छत्तीस लाख रुपए दिए l  
 अब्दुर्रहीम ख़ानेख़ानाँ की दानप्रियता के इन क़िस्सों ने जैसे किंवदंतियों का रूप ले लिया l घर-घर में रहीम के चर्चे होने लगे l माँ सलीमा जब-जब बेटे के इन क़िस्सों को सुनती, तब-तब उसका सीना गर्व से चौड़ा होता चला जाता l जबकि बीवी माहबानू वह तो मारे ख़ुशी के जैसे बौरा जाती l धन्य हो उठती ऐसे दानवीर पति को पाकर l अपनी सूबेदारी और जागीरों से मिले राजस्व को वह कवि और शायरों में दोनों हाथों से बाँटने लगा l
 और इस घटना ने तो मानो पूरे रहीम का ही नहीं बल्कि पूरे हिंदुस्तान का में मस्तक ऊँचा कर दिया l 
 “ख़ानेख़ानाँ साहब, एक ग़रीब बेवा आपसे मिलने की ख़्वाहिश लेकर आई है l” एक सिपाही ने आकर रहीम को आकर बताया l
 “हमसे एक बेवा मिलने की ख़्वाहिश लेकर आई है ?” रहीम ने आश्चर्य से पूछा l
 “जी l कह रही है कि उसे गोस्वामीजी ने भेजा है l”
 “क्याsss ! गोस्वामी तुलसीदास जी ने भेजा है ? उन्हें इसी वक़्त बाइज़्ज़त लाया जाए !”
 अब्दुर्रहीम ख़ानेख़ानाँ के हुक्म के बाद वह निर्धन विधवा हाज़िर हो गई l उसके आने पर रहीम ने पहले उसे ऊपर से नीचे तक देखा l उसके कपड़ों को देख रहीम समझ गया कि विधवा होने के साथ-साथ सचमुच यह काफ़ी ग़रीब भी है l आते ही विधवा ने काग़ज़ का एक छोटा-सा पुर्ज़ा रहीम की तरफ़ यह कहते हुए बढ़ा दिया,”गोस्वामीजी ने कहा है कि मैं इसे आपको ले जाकर दे दूँ l”
 रहीम ने गोस्वामी तुलसीदास द्वारा भेजे गए काग़ज़ के इस छोटे-से टुकड़े को खोला और उसे पढ़ने लगा l पास में बैठे दूसरे कवियों और शायरों ने ध्यान दिया कि इस टुकड़े को पढ़ते हुए उसके आँखों के कोर भीग आए हैं l देर तक रहीम की नज़र काग़ज़ के इस छोटे-से टुकड़े पर टिकी रही l काफ़ी देर बाद रहीम ने धीरे-से नज़र उठाई l
“विवाह में कितना ख़र्चा आ जाएगा ?” रहीम ने निर्धन विधवा की तरफ़ देखते हुए पूछा l
“अन्नदाता, कैसे बताऊँ l कन्या का विवाह है l जितना आपको उचित लगे दे दीजिए l” विधवा ने हाथ जोड़ते हुए बड़ी विनम्रता से कहा l
रहीम ने प्रत्युत्तर में कुछ नहीं कहा l काग़ज़ के उसी टुकड़े पर उसने कुछ लिखा और यह कहते हुए उसे वापस निर्धन विधवा को दे दिया,”इसे गोस्वामीजी को जाकर दे देना !” फिर सामने बैठे ख़ज़ानची की तरफ़ उसने नज़र उठा कर देखा और उससे बोला,”इनसे जितनी अशर्फ़ियाँ ले जाई जाएँ, इनकी झोली में भर देना !” 
निर्धन विधवा रहीम को दुआएँ देती हुई चली गई l
उसके जाने के बाद रहीम ने पहले अपने साथ बैठे तन्ना मिश्रा अर्थात मियाँ तानसेन, शेख़ फ़ैज़ी, शायर नज़ीरी निशापूरी, मुल्ला दो प्याजा, फ़क़ीर अज़ुद्दीन, गंग सहित बैठे दूसरे कवि-शायरों की तरफ़ देखा l फिर सबको सुनाते हुए कवि गंग से बोला,”गंग साहब, आप सब सोच रहे होंगे कि यह बेवा कौन थी...इसने गोस्वामीजी का जो काग़ज़ का छोटा-सा पुर्ज़ा दिया, उस पर क्या लिखा था ?”
“आप सही कह रहे हैं ख़ानेख़ानाँ साहब कि तुलसीदासजी ने ऐसा क्या लिख दिया, जिसे पढ़ने के बाद आपने इस निर्धन बेवा की झोली अशर्फ़ियों से भर दी ?”
“गंग साहब, इस बेवा की पुत्री का विवाह है लेकिन इसके पास इतना धन नहीं है कि वह उसके हाथ पीले कर दे l मदद के लिए यह गोस्वामीजी के पास गई होगी और अपनी परेशानी के बारे में बताया होगा l उस गोस्वामीजी के पास जिसके पास सिवाय रामरतन के कुछ नहीं है l वे ठहरे निरे वैरागी l धन से उनका क्या वास्ता l समझ में नहीं आया कि यह क्या उम्मीद लेकर उनके पास गई l उन्होंने इस पंक्ति के साथ इसे मेरे पास भेज दिया कि – सुरतिय नरतिय नागतिय, अस चाहत सब होय l”
“ख़ानेख़ानाँ साहब, तुलसीदासजी ने कहा तो एकदम सही है कि धन-संपत्ति और आभूषण सभी नारियों को अच्छे लगते हैं l इनकी सभी को ज़रूरत होती है, फिर चाहे वे देवताओं की पत्नियाँ हों या असुरों की... नागवंश की हो और कोई l” कवि गंग मुस्कराते हुए बोला l
“आप सही कह रहे हैं गंग साहब l सब चाहते हैं कि उसकी पुत्री विवाह के बाद, भले ही उसका ससुराल कितना ही साधन-संपन्न हो, सुखी रहे l अब अपने मित्र गोस्वामीजी के मान और उनके कहे को मैं कैसे टाल सकता था l”
“मगर आपने काग़ज़ के उस पुर्ज़े पर क्या लिख कर वापस लौटा दिया ?” तन्ना मिश्रा अर्थात मियाँ तानसेन ने पूछा l
“मुझे लगा गोस्वामीजी ने आधी बात लिखी है l उसे मैंने यह लिख कर पूरा कर दिया कि- गोद लिए हुलसी फिरे, तुलसी सो सुत होए l”
“क्या बात कही है ख़ानेख़ानाँ साहब कि-

सुरतिय नरतिय नागतिय, सब चाहत अस होय l
गोद लिए हुलसी फिरे, तुलसी सो सुत होए l”
    
 “ख़ानेख़ानाँ साहब, इसे दोहे की शक्ल देकर आपने दोस्ती का असली हक़ सही मायने में आज अदा किया है l क्या बात कही है कि गोद लिए हुलसी फिरे, तुलसी सो सुत होए l” मुल्ला दो प्याजा ने हुमकते हुए कहा l
“मुल्ला साहब, आपने सही फ़रमाया l इससे पहले जो नहीं जानते थे कि गोस्वामी तुलसीदास की माँ का क्या नाम है, ख़ानेख़ानाँ साहब के इस दोहे से पता चल जाएगा कि उनकी माँ का नाम हुलसी है l” मियाँ तानसेन मुस्कराते हुए बोला l
रहीम मन-ही-मन मंद-मंद मुस्कराता रहा l 
कवि गंग से इस बार रहा नहीं गया और मुस्कराते हुए बोला,”ख़ानेख़ानाँ साहब, बुरा न मानो तो एक बात पूछूँ ?”
“प्रिय गंग, आपको हमसे कब से इजाज़त लेने की ज़रूरत पड़ गई ?” प्रतिप्रश्न किया अब्दुर्रहीम ख़ानेख़ानाँ ने l
कवि गंग ने इसके बाद एक पल के लिए रहीम की आँखों में देखा और फिर बोला-

सीखी कहाँ नवाब जू, ऐसी दीने दैन l
ज्यों-ज्यों कर ऊँचौ करो, त्यों-त्यों नीचे नैन ll”

 कवि गंग का सवाल सुन अब्दुर्रहीम ख़ानेख़ानाँ पहले चुप रहा l फिर धीरे-से नज़र उठाई और कवि गंग की तरफ़ देख कर मुस्कराया,”गंग जी,
 
 देनदार कोऊ और है, भेजत सो दिन-रैन l 
 लोग भरम हम पै धरें, याते नीचे नैन ll”

 रहीम के इतना कहते ही सभा में जैसे ख़ामोशी छा गई l थोड़ी देर के लिए लगा जैसे पूस की बर्फ़-सी पिघलती रातों की तरह ठंडी-ठंडी फुहारें बरस रही हैं l बेजान दीवारें किसी राग की बंदिश से झंकृत हो उठी हैं l

आगम या स्रोत ग्रन्थ

आगम या स्रोत ग्रन्थ 
(१) वेद-यह प्रकृति के निरीक्षण से प्राप्त ज्ञान है अतः इसे निगम (निसर्ग से प्राप्त) कहते हैं। इसका ग्रहण श्रुति आदि ५ इन्द्रियों से होता है, अतः इसे श्रुति कहते हैं।
यह तीन अर्थों में अपौरुषेय है-
(१) यह किसी एक व्यक्ति का विचार नहीं है, विभिन्न काल तथा स्थान के अनेक ऋषियों के मन्त्रों का संग्रह है।
(२) ५ ज्ञानेन्द्रियों के अतिरिक्त इसमें २ प्रकार के अतीन्द्रिय ज्ञान भी हैं-ऋषि तथा परोरजा प्राण द्वारा।
(३) मनुष्य, पृथ्वी तथा आकाश (आध्यात्मिक, आधिभौतिक, आधिदैविक) ज्ञान का समन्वय है।
संहिता भाग में ऋषियों के मन्त्रों का संकलन है। यह स्वायम्भुव मनु (२९१०२ ईपू) से २८वें व्यास कृष्ण द्वैपायन (३२०० ईपू) तक २८ व्यासों द्वारा हुआ। 
मुण्डक उपनिषद् (१/१/१-५) के अनुसार देवताओं में प्रथम ब्रह्मा ने अपने ज्येष्ठ पुत्र अथर्वा को सभी विद्याओं का आधार ब्रह्मविद्या पढ़ाया। यह मूल वेद एक ही था जिसे ब्रह्म वेद या अथर्व वेद कहा गया। बाद में भरद्वाज ने इसे ४ वेद तथा ६ अंगों में विभाजित किया। एक मूल अथर्व से ३ वेद-ऋक्, यजु, साम निकले पर अविभाज्य मूल भी बचा रहा। अतः त्रयी का अर्थ ४ वेद है-१ मूल + ३ शाखा। इसका प्रतीक पलास है जिसकी शाखा से ३ पत्ते निकलते हैं। इसका प्रयोग वेदारम्भ संस्कार में होता है।
४ वेद-ऋक्, यजुः, साम, अथर्व।
६ अंग-शिक्षा, कल्प, ज्योतिष, व्याकरण, निरुक्त, छन्द।
ऋग्वेद की २१ संहिता में ४ उपलब्ध हैं-शाकल्य (प्रचलित), शांखायन, वाष्कल, आश्वलायन।
हर संहिता के ब्राह्मण (व्याख्या), आरण्यक (प्रयोग) तथा उपनिषद थे। ऋग्वेद का केवल ऐतरेय ब्राह्मण, आरण्यक, उपनिषद उपलब्ध हैं। अन्य कई उपनिषद हैं।
यजुर्वेद दो प्रकार का है। प्राचीन कृष्ण यजुर्वेद की ८६ शाखा विश्व के ७ द्वीपों में ६ द्वीपों में प्रचलित थी। पुष्कर द्वीप (दक्षिण अमेरिका) में हिरण्याक्ष ने वेद नष्ट कर दिया था। शुक्ल यजुर्वेद की १५ शाखा केवल भारत में प्रचलित थीं। 
अभी शुक्ल यजुर्वेद की २ शाखाएं उपलब्ध हैं-वाजसनेयि, काण्व। वाजसनेयि शाखा का शतपथ ब्राह्मण है जिसे याज्ञवल्क्य ने लिखा था। इसमें १०० अध्याय १४ काण्ड में हैं। अन्तिम काण्ड को बृहदारण्यक उपनिषद कहते हैं। काण्व शाखा का ब्राह्मण काण्व शतपथ ब्राह्मण है।
कृष्ण यजुर्वेद की ४ शाखा उपलब्ध हैं। तैत्तिरीय शाखा की संहिता, ब्राह्मण, आरण्यक तथा उपनिषद-सभी उपलब्ध हैं। मैत्रायणी संहिता का अपूर्ण ब्राह्मण , पूर्ण आरण्यक तथा उपनिषद उपलब्ध हैं। कठ (काठक), कपिष्ठल संहिता तथा कठोपनिषद् उपलब्ध हैं।
सामवेद की तत्त्व रूप में १००० तथा शब्द रूप में १३ शाखा हैं, जिनमें ३  उपलब्ध हैं-जैमिनीय (प्रचलित), कौथुमी (इसके ऋषि को एनी बेसण्ट ने महात्मा कूट-हूमि लिखा है, जिनसे उनका साक्षात्कार हुआ था), राणायनीय। इसके कई ब्राह्मण ग्रन्थ उपलब्ध हैं-छान्दोग्य उपनिषद तथा ब्राह्मण (पञ्चविंश), षड्विंश, आर्षेय, ताण्ड्य महाब्राह्मण, जैमिनीय आर्षेय।
मूल ११३१ उपनिषद में २३८ उपलब्ध हैं। ११ मुख्य उपनिषद पर वेदान्त आचार्यों शङ्कराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, वल्लभाचार्य ने टीका की है-ईश, केन, कठ, मुण्डक, माण्डूक्य, ऐतरेय, तैत्तिरीय, प्रश्न, श्वेताश्वतर, छान्दोग्य, बृहदारण्यक।
किसी ऋषि का वचन सूक्त है जिसमें कई मन्त्र होते हैं। हर मन्त्र एक छन्द है, जो २६ प्रकार के हैं। छन्द के ४ चरण हैं, प्रत्येक चरण में १ से २६ तक अक्षर होते हैं। छन्द की कुल अक्षर संख्या में एक कम होने से उसे निचृत् (लिच्चड़, कंजूस), २ अक्षर कम होने पर विराट् कहते हैं। १ अक्षर अधिक होने पर भूरिक् (भूयसी = १०० या हजार से १ अधिक), स्वराट् कहते हैं।
वेद एक समय का अनुभव या दर्शन है। सृष्टि क्रम, परिवर्तन तथा इतिहास जानने के लिए बार-बार अध्ययन करना पड़ता है। इसे पुराण कहते हैं। इतिहास के हर संस्करण में नयी घटना जोड़ी जाती है, सभी विषयों के पाठ्य पुस्तकों में भी यही होता है। पुरा + नवति = पुराण, अर्थात् पुराने का नवीन संस्करण। स्वायम्भुव मनु से पूर्व भी पुराण था जिससे उनको पता चला कि उनके पूर्व की सृष्टि कैसे हुई थी। इसके आधार पर वेद की रचना की।
पुराणं सर्व शास्त्राणां प्रथमं ब्रह्मणा स्मृतम्। अनन्तरं च वक्त्रेभ्यो वेदास्तस्य विनिर्गताः॥ (मत्स्य पुराण, ५३/२)
सूर्या चन्द्रमसौ धाता यथा-पूर्वं अकल्पयत् (ऋक्, १०/१९०/३)
१८ पुराण या महापुराण हैं। १८ उपपुराण हैं। इनके अतिरिक्त कुछ स्थानीय पुराण भी हैं-एकलिंग, नीलाद्रि महोदय आदि।
१८ महापुराणों को स्मरण करने का सूत्र देवीभागवत पुराण में है-
म-द्वयं, भ-द्वयं चैव, ब्र-त्रयं, व-चतुष्टयम्।
अनाप लिंगकूस्कानि पुराणानि पृथक् पृथक्॥
द्वितीय पंक्ति में 'अनाप' ३ पुराणों का निर्देश करता है। इनमें विविध विषय हैं, जिससे अनाप-शनाप हुआ है।
म-द्वयं= मत्स्य, मार्कण्डेय। 
भ-द्वयं = भागवत, भविष्य।
ब्र-त्रयं= ब्रह्म, ब्रह्माण्ड, ब्रह्मवैवर्त। 
व-चतुष्टय= विष्णु, वायु, वामन, वराह।
अनाप = अग्नि, नारद, पद्म।
लिंग = लिङ्ग, गरुड।
कूस्का = कूर्म, स्कन्द।
२८वें व्यास कृष्ण द्वैपायन के बाद भी पुराणों के २ संस्करण हुए-
(१) नैमिषारण्य में शौनक की महाशाला में ८८,००० मुनियों द्वारा। (३१००-२८०० ईपू-१००० वर्ष की योजना थी-भागवत पुराण, १/१/४)
(२) संवत् प्रवर्तक विक्रमादित्य (८२‍ ईपू से १९ ई तक)-बेताल भट्ट की अध्यक्षता में विशाला नगरी में। (महाशाला या विशाला का अर्थ है विशेष पाठशाला)। एक विशाला उज्जैन का एक भाग था, एक अन्य विशाला पटना से उत्तर थी। बद्रीनाथ शङ्कराचार्य ने में ब्रह्म सूत्र का भाष्य लिखा था- वह भी बद्री विशाल है। सम्भवतः अन्य विशाला भी थी। वर्तमान पुराणों में राजाओं की सूची विक्रमादित्य पूर्व के गुप्त काल तक ही है। विक्रमादित्य संवत् के आरम्भ के अयनांश के अनुसार ही उत्तरायण आदि का वर्णन है।
आगम तन्त्र को कहते हैं जो व्यावहारिक ज्ञान है तथा गुरु से ही सीखा जा सकता है। इंजीनियरिंग, शिल्प आदि भी तन्त्र हैं। विभिन्न चिकित्सा पद्धतियों को भी तन्त्र कहा गया है। दर्शन रूप में शैव तथा शाक्त आगम हैं। वैष्णव आगम रूप में पाञ्चरात्र हैं।

Saturday, 20 December 2025

शूद्र सूत पुत्र

, एकलव्य वैसे तो दलित नहीं था। क्षत्रिय पुत्र था, जरासंध के सेनापति का पुत्र था। जरासंध को तो आप जानते ही होंगे कि वह कौन था। और किसके पक्ष में था। 

 शंबूक का वर्णन मैंने न वाल्मीकि रामायण मे पढ़ा न तुलसी दास के रामचरित मानस में।

 कर्ण शूद्र नहीं था, सूतपुत्र था। और सूत महाभारत के शांति पर्व, जिसका संदर्भ डॉ #अम्बेडकर ने अपनी पुस्तक, "शूद्र कौन थे", में देते हुए लिखा है कि सूत राजा के मंत्रिमंडल का अंग थे, यह अनिवार्य शर्त थी, राजा के कैबिनेट की।

 भगवान कृष्ण ने अर्जुन के रथ का संचालन किया तो वह सूत कर्म था। कर्ण के रथ का संचालन पांडवों के मामा साल्व ने किया था। वह भी सूतकर्म था। 

 चौथी बात रैदास के गुरु ब्राम्हण थे, ( गूगल कर लीजिए) और उनकी शिष्या मीरा राजमहिषी क्षत्राणी थी।

 समयकाल के बारे में मैन पूंछा था कि कितने सदियों से? राम दस हजार वर्ष पूर्व हुए। कृष्ण, एकलव्य और कर्ण पांच हजार वर्ष पूर्व हुए। रैदास चार सौ वर्ष पूर्व हुए। दस हजार वर्षों में मात्र चार पात्रों का नाम आप उल्लिखित कर पाए, और उसमें से सारे पात्रों के बारे में आपको ठीक से पता भी नहीं है?

 

Friday, 19 December 2025

बलि

अभी एक पण्डितजी ने पूछा- आचार्यजी! आपने बलि पर कोई विचार नहीं लिखा? "निवृत्तिस्तु महाफला" का भाव क्या है?

🌺श्रीमन्! लिखा तो था परन्तु एकपक्षीय विचार की अपेक्षा रखने के कारण आपने देखा नहीं। उभय पक्षों में प्रमाणवचनों की कमी नहीं है और बलि के भी विविध रूप हैं। निष्कर्षत: सिद्ध होता है "यदन्न: पुरुषो लोके तदन्नास्तस्य देवता:" व्यक्ति में जिस अन्न को खाने की प्रवृत्ति होती है, उसके देवता-पितर भी वही खाते हैं। "वयं यदन्ना: पितरस्तदन्ना:" का भी यही भाव है। अन्न का तात्पर्य केवल "सिद्धमन्नम्" ओदन ही नहीं होता; "पचाम्यन्नं चतुर्विधम्" भाष्य के अनुसार "यदद्यते भक्ष्यते सर्वप्राणिभिरिति अन्नम्" यानी भक्ष्य, भोज्य, लेह्य, चोष्य के रूप में प्राणिमात्र का आहारद्रव्य अन्न ही कहलाता है। उपनिषदों के #सप्तान्नसृष्टि प्रकरण में जल, दुग्ध, वायु, आमिषादि को भी #अन्न ही कहा गया है। जिसे जो अन्न प्रिय हो वह अपने देवता को वही समर्पित कर उसका ग्रहण करे। स्वतन्त्र प्रवृत्ति का परिशमन ही स्वेष्टपूजाङ्ग बलि का प्रयोजन है। "निवृत्तिस्तु महाफला" मनुस्मृति में भी अनुपाकृत यानी यज्ञभागभिन्न वृथा मांस की ही निवृत्ति इष्ट है, न कि क्रत्ववशिष्टपल की। धर्मशास्त्रों में प्रोक्षिताभ्युक्षित आमिष को #हविष्यान्न ही कहा गया है। इसीलिए देवपितृयज्ञावशिष्ट मांसाशन की आज्ञा देने में शास्त्र किञ्चिदपि संकोच नहीं करते हुए कहते हैं कि "देवपितृ्न्समभ्यर्च्य खादन्मांसं न दोषभाक्" देव-पितरों के समभ्यर्चनशेष हविष्यामिष का ग्रहण करने में दोष नहीं; अपितु ग्रहण न करने वालों को ही दोषी कहा है। अत: जिनकी मांसाशन में प्रवृत्ति है वे स्वतन्त्र उच्छृङ्लता का परित्याग कर क्रत्वङ्ग आमिष को ही ग्रहण करे और जो मांसाशन में प्रवृत्त नहीं हैं वे बलि में अन्य प्रतिनिधि द्रव्यों का प्रयोग करे। पुन: जो मांसाशन नहीं करते वे वैष्णव और जो करते वे अवैष्णव- शास्त्रज्ञों के लिए ऐसी कोई बात नहीं। धर्म में विकृति तब फैलती है जब अमुकामुक विषयों से सर्वथानभिज्ञ व्यक्ति सर्वोच्च न्यायालय के सबसे बड़े न्यायाधीश बन जाते हैं। वस्तुत: किसी एक पक्ष पर किसी का उछलना-कूदना सही नहीं। आमिषाशी महानुभावों का विशेष कर्तव्य है कि वे श्रौतक्रतुओं को भी बचाने का विशेष संघर्ष करें। जय शिव..


वेद मंत्रों के अर्थ में अंतर

वेद क्यों नहीं छापता गीता प्रेस?

आज दोपहर एक ग्रुप में टहलता हुआ चला गया। दृष्टि एक चर्चा पर गई। वहां ठीक यही प्रश्न, जो मेरी टिप्पणी का शीर्षक है, एक सज्जन ने पूछा था। उपस्थित विद्वजन अपने-अपने विचार, तर्क, अनुमान और धारणाएं प्रस्तुत कर रहे थे। लगभग सभी का विचार था कि गीता प्रेस, गोरखपुर को भी वेदों का प्रकाशन करना चाहिए, क्योंकि वेद सनातन के आदि ग्रंथ हैं।

मुझे स्मरण हो आया कि एक बार मैंने गीता प्रेस प्रबंधन से जुड़े एक सज्जन का स्पष्टीकरण कहीं पढ़ा था - 'चूंकि वेदों की संस्कृत भाषा लौकिक अर्थात प्रचलित संस्कृत से अलग है और विद्वानों के अनुवादों में अत्यंत गंभीर अंतर है। साथ ही, सभी विद्वानों के विचार एक साथ प्रस्तुत कर पाना संभव नहीं है, अतः गीता प्रेस, गोरखपुर वेदों का प्रकाशन नहीं करता।'

मैंने उसी उल्लेख के साथ यह तर्क वहां प्रस्तुत कर दिया, लेकिन विद्वजन का समूह मानने को तत्पर न हुआ। तब मेरे मन में विचार आया कि किसी एक मंत्र के कुछ अनुवाद इनके लिए प्रस्तुत कर दूं, किंतु वहां इस सुदीर्घ टिप्पणी का कोई प्रतिफल संभवतः नहीं होता, तो यहां देखें कि वैदिक मंत्रों का विभिन्न विद्वानों ने अपनी दृष्टि से अनुवाद किस भांति किया है। मैं केवल एक मंत्र प्रस्तुत कर रहा हूं।

ऋग्वेद (7/59/12), अथर्ववेद (14/1/17) तथा यजुर्वेद (3/60) के मंत्रों में त्र्यंबकं शब्द आया है, और केवल इसी शब्द पर कितना गहन मतभेद विद्वानों में है, इस पर दृष्टि अवश्य बनाए रखें।

त्र्यंबकं यजामहे सुगन्धिम पुष्टिवर्धनम।
उर्वारुकमिव बंधनान्मृत्योर्मक्षीय मामृतात।।

"हम लोग जो शुद्ध गंधयुक्त शरीर, आत्मा और समाज के बल को बढ़ाने वाला (त्र्यंबकं) जगदीश्वर है, उसकी निरंतर स्तुति करें। इसकी कृपा से जैसे खरबूजा फल पक कर लता के संबंध से छूट कर अमृत के तुल्य होता है, वैसे हम लोग भी प्राण वा शरीर के वियोग से छूट जाएं और मोक्ष-रूप सुख से श्रद्धा-रहित कभी न हों।"

- स्वामी दयानंद सरस्वती

"हम सुरक्षित, पुष्टिवर्धक त्र्यंबक का पूजन करते हैं। हे रुद्र! हमें मृत्यु के पाश से छुड़ाओ और अमृत से दूर मत रखो।"

- आचार्य श्रीराम शर्मा

"उत्तम यशस्वी पोषण-साधनों का संवर्धन करने वाले, तीन प्रकार से संरक्षण करने वाले देव की हम उपासना करते हैं। यह देव कंकड़ी को मुक्त करते हैं, इस तरह मृत्यु के बंधन से हमें मुक्त करें, परन्तु हमें अमरत्व से कभी न छुड़ाएं, परन्तु हमें अमरत्व से संयुक्त करें।"

- श्रीपाद दामोदर सातवलेकर

"(त्र्यंबकं) शक्तित्रय से युक्त परमेश्वर की हम उपासना करें, जिससे मैं मृत्यु के बंधन से मुक्त होऊं और अमृत अर्थात मोक्ष से दूर न होऊं। परम पालक को प्राप्त कराने वाले इस ईश्वर की पूजा करें, जिससे हम इस देह-बंधन से छूटें, उस परम मोक्ष से वंचित न रहें।"

- पं. जयदेव शर्मा

"दिव्य गंध-युक्त मर्त्यधर्म-हीन उभय लोकों का फल देने वाले धनधान्यादि की पुष्टि बढ़ाने वाले पूर्वोक्त तीन नेत्रों वाले शिव को हम पूजते हैं। वह हमको संसार के मरण से छुड़ाए, बंधन से कर्करी फल के जैसा अर्थात जैसे पका हुआ फल अपनी घुजी से छूट कर भूमि पर गिर जाता है, वैसे ही शिव की कृपा से मैं जन्म-मरण रहित हो जाऊं।"

- रामस्वरूप शर्मा

"हम सुगंधि-प्रसारित पुण्यकीर्ति पुष्टिवर्धक, जगत बीज वा आनमादि शक्ति-वर्धन त्र्यंबक (ब्रह्मा, विष्णु और महेश को पिता वा आदि कारण) की पूजा या यज्ञ करते हैं। रुद्रदेव उर्वारुक फल की तरह हमें मृत्यु-बंधन (संसार) से मुक्त और अमृत (चिरजीवन या स्वर्ग) से मन-मुक्त करो।"

- रामसुंदर त्रिवेदी

इस तरह स्पष्ट दृष्टिगोचर है कि विद्वानों में शब्द, भाव, प्रतीक आदि के अर्थ पर पर्याप्त मतभेद है। संस्कृत के हिंदू विद्वानों की स्थिति जब यह है, तो उन विदेशियों के अनुवादों की हालत क्या होगी, जो अनुवाद के समय अपनी मजहबी या रिलीजियस दृष्टि से सनातनी तत्वों को देखते हैं अथवा अपने ही प्रतीकों तथा प्रतिमानों पर उन्हें परखते हैं, यह सहज समझा जा सकता है।
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नोट - कुछ मित्रों को सभी अनुवाद समान लगे, उनके लिए यह और - स्वामी दयानंद सरस्वती मूर्तिपूजा विरोधी थे, अतः वे जगदीश्वर (जगत का ईश्वर अर्थात एक, निराकार) अर्थ ले रहे हैं। वैष्णव मत में जगदीश्वर विष्णु का अन्य नाम है, जबकि आचार्य श्रीराम शर्मा उसका अर्थ रुद्र ले रहे हैं। वैदिक रुद्र शिव से अलग देव थे, ऐसी भी एक मान्यता है। रामस्वरूप शर्मा ने सीधे ही शिव लिखा है। जयदेव शर्मा ने तीन शक्तियों से युक्त परमेश्वर (निराकार) अर्थ लिया है, तो सातवलेकर ने किसी देव का नाम ही नहीं लिखा। रामसुंदर त्रिवेदी इसका अर्थ त्रिदेव (अर्थात ब्रह्मा, विष्णु, महेश तीनों) लगा रहे हैं। इसी तरह अन्य अनुवादों में पर्याप्त अंतर है।

मुसलमान और बर्बरता

#भारतविमर्श 
जंजीरों में कैद करके ज़ैनब को 750 किमी दूर कुफा (इराक) से दमास्कस (सीरिया) ले जाया गया।

ये लम्बी यात्रा जंजीरों में कैद बच्चों और महिलाओं पर बहुत भारी पड़ी और कई ने सर्दियों में तड़पकर दम तोड़ दिया। दमास्कस में पहुँचने के बाद उन्हें 72 घंटों तक बाज़ार के चौराहे पर खड़ा रखा गया।

उस समय जंग जीतने वाली फौज हारने वाली फौज के लोगों का कटा हुआ सिर साथ लेकर जाती थी और अपनी जीत का जश्न मनाती थी। इस पूरे सफर में जैनब के साथ उसके भाई हुसैन और अब्बास का कटा हुए सिर साथ लाया गया था।

बाद में यजीद से ज़ैनब ने माँग की थी कि उन्हें शहीदों के सिर लौटा दिए जाएं और उन्हें एक घर दिया जाए जहाँ वो मातम मना सकें।।मोहम्मद के गुजर जाने के तीन महीने में ही उसकी बेटी फातिमा की घर में घुसकर निर्मम हत्या कर दी गई थी।

उसके दामाद अली को रमजान में नमाज पढ़ते हुए मारा गया। बड़े नवासे को जहर दिया गया और छोटे नवासे को कर्बला के मैदान में तीन दिन तक भूख और प्यास से तड़पाने के बाद कत्ल कर दिया गया।

जैनब मोहम्मद की नवासी थी जो जंजीरों में कैद नए खलीफा यजीद के सामने खड़ी थी। कमाल की बात ये थी जब ये सब हो रहा था उस समय ना अमेरिका बना था, ना इजरायल था, ना हथियार बेचने वाली कम्पनियाँ थीं और जो ये सब कर रहे थे वो भी कोई गैर नहीं थे।

ये जौहर करती औरतें, तबाह होते विजननगर और देवगिरी, लाशों की बेकद्री, कटे हुए सिरों के पिरामिड... ये सब तो भारत में बाद में आया। इस मानसिकता का सबसे पहला पीड़ित मोहम्मद का परिवार ही बना। उधर कर्बला के मैदान में 70 का सामना हजारों से था, इधर चमकौर के युद्ध में 40 का 10 हजार से।

उधर मोहम्मद का परिवार था, इधर गुरू गोविंद सिंह का। उधर हुसैन का कटा सिर उनकी चार साल की बेटी को खाने की थाल में सजा कर दिया गया, इधर दारा का कटा सिर शाहजहां को खाने की थाल में दिया गया। उधर जैनब यजीद से अपने भाईयों का कटा हुआ सिर माँग रही थी ताकि उनका मातम मनाया जा सके, इधर सोनीपत का कुशाल सिंह दहिया गुरू तेगबहादुर के शीश को ससम्मान वापस आनंदपुर साहिब भेजने के लिए अपना शीश काटकर मुगल सेना को सौंप रहे थे।

उधर हुसैन की छोटी बेटी को तड़पाया गया, इधर गुरू गोविंद सिंह के छोटे बच्चों को जिन्दा दीवार में चुनवा दिया गया। उधर जैनब को कुफा (इराक) से दमास्कस ले जाया गया, इधर बंदा वीर बैरागी को जोकर बनाकर हाथी के पीछे बंधे पिंजरे में कैद करके जुलूस की शक़्ल में लाहौर से दिल्ली लाया गया, जहाँ उनके मुँह में उनके तीन साल के बच्चे के दिल का माँस ठूँसा गया। उधर कर्बला में लाशों की बेकद्री की गई, इधर गुरू गोविंद सिंह के बच्चों को दाह संस्कार के लिए जमीन सोने के सिक्के लगाकर बेची गई। जो जहालत 7वीं शताब्दी में अरब में थी…

वही 17वी शताब्दी में भारत में भी साफ दिख रही थी। फिर भी यजीद तो शैतान था और औरंगजेब जिन्दा पीर। IMKB

शूद्र दलित

इतना ज़हर ? इतना अज्ञान ? 

नहीं जानते तो अब से जान लो कि भारतीय इतिहास में जोधाबाई , कोई नहीं है l न कभी कोई अकबर की बीवी थी जोधाबाई l मुग़लेआज़म फ़िल्म में कमाल अमरोही ने एक काल्पनिक चरित्र गढ़ा था , जोधाबाई का l उसी आधार पर बाद में एक फ़िल्म और एक धारावाहिक भी बना है l टोटल काल्पनिक l अकबर और सलीम में भी कोई युद्ध कभी नहीं हुआ l अनारकली , ज़रूर अकबर की एक रखैल थी l लाहौर में अनारकली की मजार आज भी है l पर अकबर का चेहरा साफ़ करने के लिए कमाल अमरोही ने अनारकली को सलीम की माशूका बना दिया , फ़िल्म में l 

एक बात और जान लो कि मुग़लों ने ही तुम्हें अपनी सेवा के लिए दलित बनाया l मुग़लों के आने के पहले देश में कोई दलित नहीं था l इतना ही नहीं , ज़्यादातर दलित ही तलवार के डर से कंवर्ट हो कर मुसलमान बने l बाद में ब्रिटिशर्स ने भी दलितों को अपना ग़ुलाम बनाया और उन्हें दलित होने की पहचान दी l दलितों , आदिवासियों को क्रिश्चियन बनाया l 

यह अंबेडकर भी ब्रिटिश एजेंट था l बाद में गांधी को ब्लैकमेल करता रहा l बहुत सी बातें हैं l ज़हर से अलग हो कर सोचोगे तो बहुत कुछ समझ आएगा l इतिहास पढ़ो , अपना भी और देश का भी l कश्मीर में मुसलमानों ने दलितों को न कश्मीर छोड़ने दिया , न वोटर बनने दिया l नौकर बनाए रखा l अब 370 हटने के बाद दलित , कश्मीर में वोटर बन पाए हैं l

अव्वल दर्जे के मूर्ख हो l 

मालूम है पहली रामायण लिखने वाले महर्षि वाल्मीकि कौन थे ? महाभारत और गीता लिखने वाले महर्षि वेदव्यास कौन थे ? 

आरक्षण की भीख का कटोरा लिए ज़हर की खेती में तुम्हारा मन लग रहा है , तो ख़ूब लगाओ l पर अपने बारे में कुछ ख़ुद से जान लो l


नया विद्युत मीटर

विद्युत विभाग महाप्रबंधक उपभोक्ता आयोग में तलब, 18 दिसंबर तक स्मार्ट मीटर पर स्टे आवेदन का देना होगा जवाब

बिजली काटने की धमकियों देकर जबरिया स्मार्ट मीटर लगाने के प्रयास से क्षुब्ध राकेश मिश्रा ने अपने अधिवक्ता डॉ. पुष्पराग के माध्यम से स्मार्ट मीटर पर रोक व 5 लाख की क्षतिपूर्ति का दावा ठोका। आयोग ने विद्युत विभाग को किया तलब।*

(मूल आवेदन के तथ्य व निम्नानुसार हैं)

1. यहकि आवेदक पिछले अनेक वर्षों से अना. गण के पोस्ट-पेड बिजली कनेक्शन नं. एन 2419001242 से उपभोक्ता हैं और सभी बिल समय पर जमा करता रहा है। इस प्रकार से आवेदक अना. गण का उपभोक्ता है।

2. यहकि नबम्वर माह में अना. के कर्मचारी आवेदक के निवास पर मौजूदा कार्यशील इलेक्ट्रो-मैकेनिकल / पोस्ट-पेड मीटर को जबरन हटाकर स्मार्ट प्रीपेड मीटर लगाने आए जिस पर आवेदक ने इन्कार किया तो वे विजली काटने की धमकी देने लगे। पडौसियों ने दबाब बना कर जैसे तैसे अना. के प्रतिनिधियों को बापस किया।

3. यहकि इस प्रकार अना. गण द्वारा मौजूदा कार्यशील इलेक्ट्रो-मैकेनिकल / पोस्ट-पेड मीटर को जबरन हटाकर स्मार्ट प्रीपेड मीटर लगाने से इनकार करने पर बिजली कनेक्शन काटने की धमकी दी जा रही है। जबकि यह कार्य पूर्ण रूप से अवैध, असंवैधानिक एवं न्यायिक आदेशों का उल्लंघन है। जिसके कारण निम्न हैं:

क. विद्युत अधिनियम, 2003 का स्पष्ट उल्लंघन
धारा 55 (1) के प्रावधानों के अनुसार स्मार्ट/प्रीपेड मीटर केवल उपभोक्ता की लिखित सहमति से या नए कनेक्शन के मामले में ही लगाया जा सकता है। कार्यशील पुराने मीटर को बिना सहमति बदलना गैर-कानूनी है। स्मार्ट मीटर से इनकार करने पर धारा 56 (1) के तहत बिजली काटना इसका दुरुपयोग है। सर्वोच्च न्यायालय ने M/s Southern Electricity vs- M- Ramakrishna (2017) 3 SCC 525 में स्पष्ट कहा है कि धारा 56 (1) का उपयोग केवल बकाया वसूली के लिए ही हो सकता है, किसी अन्य उद्देश्य के लिए नहीं।

ख. निजता के मौलिक अधिकार (अनुच्छेद 21) का उल्लंघन
स्मार्ट मीटर हर 15-30 मिनट में बिजली खपती रिकॉर्ड 4 कर सर्वर पर भेजता है, जिससे घर के अंदर की निजी जिंदगी का पता चलता है। बिना लिखित सहमति के यह निगरानी सर्वोच्च न्यायालय के K-S-Puttaswamy (Privacy) मामले (2017) 10 SCC 1 के विरुद्ध है।

ग. उच्च न्यायालयों के बंधनकारी आदेश (2023-2025) निम्नलिखित उच्च न्यायालयों ने स्पष्ट आदेश दिया है कि स्मार्ट मीटर जबरन नहीं थोपा जा सकता और इनकार करने पर बिजली नहीं काटी जा सकतीः

ए. बंबई उच्च न्यायालय WP 14711/2022 एवं अन्य (आदेश दिनांक 20.02.2023 एवं 08.05.2024)

बी. पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय-CWP&15224&2023 (12.01 2024)

सी. राजस्थान उच्च न्यायालय 2024) SBCWP 16438/2023 (03.09.

डी. इलाहाबाद उच्च न्यायालय PIL 242/2024 (15.10.2024)

ई. गुजरात उच्च न्यायालय SCA 1842/2024 (22.08.2024)

सभी आदेशों में एकमत :
"No Coercion, No Disconnection for refusal of smart meter"

घ. उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 का उल्लंघन
जबरन प्रीपेड थोपना धारा 2(47) के अंतर्गत अनुचित व्यापार प्रथा है। उपभोक्ता को सेवा चुनने का अधिकार धारा 2(9) में है।

ङ. मध्य प्रदेश विद्युत नियामक आयोग के Petition No-73/2023 के आदेश दिनांक 7 मार्च 2024 में अपने 156 पेजों के ऑर्डर में स्पष्ट निर्देश दिया गया है कि Electricity Act 2003 की धारा 47(5) स्मार्ट / प्री-पेड को अनिवार्य नहीं बनाती। जबरदस्ती स्मार्ट मीटरइंस्टॉलेशन गैर कानूनी। उपभोक्ता को सही और सटीक मीटर मिलना चाहिए यह उनका अटूट अधिकार है। उपभोक्ता को मीटर चयन का अधिकार है। स्मार्ट मीटर खरीदी पर कंपनी पर लगभग 500-600 करोड़ रुपये खर्च आया है लेकिन उपभोक्ताओं पर इसका अतिरिक्त बोझ नहीं डाला जा सकता। उपभोक्ता पर प्री-पेड मीटर जबरदस्ती नहीं थोपा जा सकता।

य. स्वास्थ्य जोखिम स्मार्ट मीटर से निकलने वाला RF रेडिएशन WHO द्वारा Class 2B (संभावित कैंसरजनक) घोषित है। आवेदक स्वास्थ्य कारणों से भी इससे इनकार करता है।

4. यहकि आवेदक ने अना. गण को विगत दि. 20/11/2022 को इसी आशय का एक नोटिस भी अपने अधिवक्ता के माध्यम से भिजबाया कि अना. आवेदक के घर पर जबरिया स्मार्ट मीटर लगाने से विरत रहे आवेदक ने नोटिस में मॉग की थी कि आवेदक स्मार्ट प्रीपेड मीटर लगवाने से स्पष्ट रूप से इनकार करता है। आप तत्काल जबरदस्ती एवं बिजली काटने की सभी धमकियाँ देना बंद करें। मौजूदा मीटर से ही बिलिंग जारी रखें। स्मार्ट मीटर से संबंधित किसी भी आधार पर बिजली काटने से पूर्णतः परहेज करें। यदि आप बिजली काटते हैं या जबरन मीटर बदलते हैं तो आवेदक को कानूनी कार्यवाही करने पर विचार करने को बाध्य होना पड़ेगा जिसके सारे हर्जे खर्चे की जिम्मेदारी आप अना.गण की होगी।

5. यहकि इसके बाद भी अभी 8 दिसम्बर 2025 को पुनः अना. के कर्मचारी आवेदक के निवास पर स्मार्ट प्रीपेड मीटर लगाने आ गये मित्रों ने दबाब बना कर जैसे तैसे अना. के प्रतिनिधियों को बापस किया।

6. यहकि आवेदक द्वारा स्मार्ट प्रीपेड मीटर लगवाने से स्पष्ट रूप से इनकार करने के बाद भी अना. गण द्वारा जबरदस्ती एवं बिजली काटने की धमकियाँ देना अवैध, असंवैधानिक, न्यायिक आदेशों के उल्लंघनयुक्त, लापरवाही एवं भूल गलती के कारण आवेदक अनावश्यक परेशान हो रहा है। आवेदक अना. का उपभोक्ता है। अना. के किसी अनुचित कृत्य से आवेदक परेशान न हो यह आवेदक का उपभोक्ता अधिकार है। उक्त कृत्य अना. की आवेदक के प्रति सेवा में कमी तो है ही अनुचित व्यापार प्रथा की श्रेणीं में भी आता है। आवेदक को अनावेदकगण द्वारा जबरिया कर कार्यवाही रूकबाने, एवं बिजली काटने की स्मार्ट मीटर लगाने धमकियों से संरक्षण का आवेदक को पूर्ण वैधानिक अधिकार प्राप्त है।

अस्तु निवेदन है कि अना, गण को आदेशित करने की कृपा करें कि वह आवेदक के निवास पर जबरिया स्मार्ट मीटर लगाने से विरत रहे, बिजली काटने की धमकियों न दे आवेदक को हुई परेशानी की क्षतिपूर्ती 450000/- रू. तथा वाद व्यय 20000/- रू. व 20000/- रू. अधिवक्ता शुल्क अदा करे।

प्रार्थी
राकेश मिश्रा.. आवेदक

द्वारा -डॉ. पुष्पराग शर्मा,

Tuesday, 16 December 2025

जन्म आधारित जातीय व्यवस्था हिन्दुओ को कमजोर करने

चलिए हजारो साल पुराना इतिहास पढ़ते हैं।

और पता करते हैं दलितों पर शोषण किसने किया ??

सम्राट शांतनु ने विवाह किया एक मछुवारे की पुत्री सत्यवती से। उनका बेटा ही राजा बने इसलिए भीष्म ने विवाह न करके, आजीवन संतानहीन रहने की भीष्म प्रतिज्ञा की।

सत्यवती के बेटे बाद में क्षत्रिय बन गए, जिनके लिए भीष्म आजीवन अविवाहित रहे, क्या उनका शोषण होता होगा?

महाभारत लिखने वाले वेद व्यास भी मछवारे थे , पर महर्षि बन गए, गुरुकुल चलाते थे वो।

विदुर, जिन्हें महा पंडित कहा जाता है वो एक दासी के पुत्र थे , हस्तिनापुर के महामंत्री बने, उनकी लिखी हुई विदुर नीति, राजनीति का एक महाग्रन्थ है।

भीम ने वनवासी हिडिम्बा से विवाह किया।

श्रीकृष्ण दूध का व्यवसाय करने वालों के परिवार से थे,

उनके भाई बलराम खेती करते थे , हमेशा हल साथ रखते थे।

यादव क्षत्रिय रहे हैं, कई प्रान्तों पर शासन किया और श्रीकृषण सबके पूजनीय हैं, गीता जैसा ग्रन्थ विश्व को दिया।

राम के साथ वनवासी निषादराज गुरुकुल में पढ़ते थे‌ ।

उनके पुत्र लव कुश महर्षि वाल्मीकि के गुरुकुल में पढ़े जो वनवासी थे।

तो ये हो गयी वैदिक काल की बात, स्पष्ट है कोई किसी का शोषण नहीं करता था,सबको शिक्षा का अधिकार था, कोई भी पद तक पहुंच सकता था अपनी योग्यता के अनुसार।

वर्ण सिर्फ काम के आधार पर थे वो बदले जा सकते थे जिसको आज इकोनॉमिक्स में डिवीज़न ऑफ़ लेबर कहते हैं वो ही।

प्राचीन भारत की बात करें, तो भारत के सबसे बड़े जनपद मगध पर जिस नन्द वंश का राज रहा वो जाति से नाई थे ।

नन्द वंश की शुरुवात महापद्मनंद ने की थी जो की राजा नाई थे। बाद में वो राजा बन गए फिर उनके बेटे भी, बाद में सभी क्षत्रिय ही कहलाये ।

उसके बाद मौर्य वंश का पूरे देश पर राज हुआ, जिसकी शुरुआत चन्द्रगुप्त से हुई,जो कि एक मोर पालने वाले परिवार से थे

और एक ब्राह्मण चाणक्य ने उन्हें पूरे देश का सम्राट बनाया । 506 साल देश पर मौर्यों का राज रहा।

फिर गुप्त वंश का राज हुआ, जो कि घोड़े का अस्तबल चलाते थे और घोड़ों का व्यापार करते थे।

140 साल देश पर गुप्ताओं का राज रहा।

केवल पुष्यमित्र शुंग के 36 साल के राज को छोड़ कर *92% समय प्राचीन काल में देश में शासन उन्ही का रहा, जिन्हें आज दलित पिछड़ा कहते हैं तो शोषण कहां से हो गया?

यहां भी कोई शोषण वाली बात नहीं है।

फिर शुरू होता है मध्यकालीन भारत का समय जो सन 1100- 1750 तक है, इस दौरान अधिकतर समय, अधिकतर जगह मुस्लिम शासन रहा।

अंत में मराठों का उदय हुआ, बाजी राव पेशवा जो कि ब्राह्मण थे, ने गाय चराने वाले गायकवाड़ को गुजरात का राजा बनाया,

चरवाहा जाति के होलकर को मालवा का राजा बनाया।

अहिल्या बाई होलकर खुद बहुत बड़ी शिवभक्त थी।

ढेरों मंदिर गुरुकुल उन्होंने बनवाये।

मीरा बाई जो कि राजपूत थी, उनके गुरु एक चर्मकार रविदास थे

और रविदास के गुरु ब्राह्मण रामानंद थे|।

यहां भी शोषण वाली बात कहीं नहीं है।

मुग़ल काल से देश में गंदगी शुरू हो गई और यहां से

पर्दा प्रथा, गुलाम प्रथा, बाल विवाह जैसी चीजें शुरू होती हैं।

1800-1947 तक अंग्रेजो के शासन रहा और यहीं से जातिवाद शुरू हुआ ।

जो उन्होंने फूट डालो और राज करो की नीति के तहत किया।

अंग्रेज अधिकारी निकोलस डार्क की किताब

"कास्ट ऑफ़ माइंड" में मिल जाएगा कि कैसे अंग्रेजों ने जातिवाद, छुआछूत को बढ़ाया और कैसे स्वार्थी भारतीय नेताओं ने अपने स्वार्थ में इसका राजनीतिकरण किया।

इन हजारों सालों के इतिहास में देश में कई विदेशी आये जिन्होंने भारत की सामाजिक स्थिति पर किताबें लिखी हैं, जैसे कि मेगास्थनीज ने इंडिका लिखी, फाहियान , ह्यू सांग और ‌अलबरूनी जैसे कई। किसी ने भी नहीं लिखा की यहां किसी का शोषण होता था।

योगी आदित्यनाथ जो ब्राह्मण नहीं हैं, गोरखपुर मंदिर के महंत हैं, पिछड़ी जाति की उमा भारती महा मंडलेश्वर रही हैं।

जन्म आधारित जातीय व्यवस्था हिन्दुओ को कमजोर करने के लिए लाई गई थी।

Monday, 15 December 2025

कुमारिल भट्‌ट ने आत्मदाह क्यों किया .

कुमारिल भट्‌ट ने आत्मदाह क्यों किया .......
यह मध्यकालीन भारत का एक यक्ष प्रश्न है।
उन्हें किसी ने बाध्य नहीं किया था, उन्होंने स्वयं ही इसका चयन किया। वैसा करने के अनुल्लंघ्य कारण भी न थे। उन्हें कौन-सी ग्लानि और व्यथा थी, भांति-भांति से इसकी व्याख्या की जाती है। 
किंतु इसका सबसे बड़ा कारण सनातन धर्म और बौद्धों के बीच उस काल में चल रहे संघर्ष में निहित था। जिस ताप ने कुमारिल को भस्म कर दिया, उसके मूल में वैदिक धर्म के पराभव से उपजा शोक था। 
वास्तव में कुमारिल सनातन परम्परा के महान हुतात्मा हैं!
कुमारिल मीमांसक थे। मीमांसा दर्शन के भाट्टमत के प्रतिपादक थे! उनके ग्रंथ "श्लोकवार्तिक" की बड़ी प्रतिष्ठा थी। मण्डन मिश्र उन्हीं के शिष्य थे।
 फिर उन्होंने आत्मनाश क्यों कर लिया? 
वास्तव में, उस कालखण्ड यानी आठवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में भारत में बौद्धों का वर्चस्व था। वेदों को अप्रामाणिक सिद्ध करने में बौद्धों ने पूरी शक्ति लगा दी थी। उन्हें राज्याश्रय प्राप्त था। बौद्ध- नैयायिकों की तब तूती बोलती थी। उनके तर्क अकाट्य मान लिए गए थे।
कुमारिल इससे बड़े विक्षुब्ध रहते थे। उन्होंने सोचा कि बौद्धों की तर्क- प्रणाली को जानने के बाद ही उन्हें परास्त किया जा सकता है। 
यह निश्चय करके वे नालंदा गए, बौद्ध मत स्वीकार किया और बौद्ध दर्शन के प्रकांड विद्वान धर्मपाल के सान्निध्य में अध्ययन करने लगे।
एक दिन की बात है! आचार्य धर्मपाल वैदिक धर्म में निहित दोषों का निर्ममता से उद्घाटन कर रहे थे। उनमें कटाक्ष की वृत्ति बहुत सघन थी, अतएव वे नाना प्रकार से वैदिक धर्म पर कटाक्ष भी करते जा रहे थे।
कुमारिल यह सहन नहीं कर पाए। उनकी आंखों से आंसू फूट पड़े।
इधर कुमारिल की आंखों से अश्रुधारा बही, उधर उनका रहस्य खुला। वे आचार्य से बोल पड़े: "आप क्या जानें वेद-विद्या की श्रेष्ठता!" 
अहिंसा का उपदेश देने वाले आचार्य को इस पर क्रोध आ गया। उन्होंने अपने शिष्यों से कहा: "इस मूढ़ को विहार के शिखर से नीचे धकेल दो, देखते हैं कौन-सा वेद इसकी रक्षा करता है!" 
कुमारिल को शिखर पर ले जाया गया। नीचे धकेले जाने से पूर्व कुमारिल ने कहा: "यदि वेद प्रमाण हैं तो मेरे प्राण बचे रहें!" कुमारिल बच गए, किंतु अपने वाक्य में "यदि" लगा देने के कारण उनकी एक आंख फूट गई!
कुमारिल को किस बात की ग्लानि थी?
 शायद इसकी कि उन्होंने मीमांसक के रूप में ईश्वर के अस्तित्व पर प्रश्न किया। या इसकी कि बौद्धों की तर्क-प्रणाली जानने के लिए उन्होंने बौद्ध मत स्वीकार किया। या इसकी कि उन्होंने वेदों पर संशय करके अपनी एक आंख गंवा दी। किंतु शायद ग्लानि से बढ़कर उन्हें इस बात का शोक था कि वे अपनी समस्त क्षमताओं के बावजूद वैदिक धर्म की रक्षा नहीं कर पा रहे हैं।
प्रयाग में संगम पर उन्होंने आत्मदाह का निर्णय लिया। भूसे की ढेरी को सुलगाकर उसमें जा बैठे। 
उनके शरीर का निचला हिस्सा प्राय: जल गया। वक्ष और शीशस्थल शेष रह गया, तब शंकर उनके दर्शन को पहुंचे। शंकर ने ब्रह्मसूत्र पर भाष्य लिखा था किंतु वह बहुत दुर्बोध था। वे कुमारिल की कीर्ति से परिचित थे।
 वे चाहते थे कि कुमारिल उस भाष्य पर वार्तिक लिखें। यही मनोरथ बांधकर वे प्रयाग आए किंतु यहां धू-धू जलते आचार्य को देखकर वे स्तब्ध रह गए।
कुमारिल का आत्मदाह करना और ऐन उसी अवसर पर शंकर का उनके पास पहुंचना- यह मध्यकालीन भारत के इतिहास में केंद्रीय महत्व की घटना है। 
शंकर ने कुमारिल को ब्रह्मसूत्र का अपना भाष्य दिखलाया तो उनकी आंखों में चमक आ गई। जो काम वो पूरा नहीं कर सके थे, उसे शंकर पूरा करेंगे, यह उन्हें विश्वास हो गया।
मृत्यु से क्षोभ चला गया, उसमें आत्मबलिदान की दीप्ति आ गई। उन्होंने शंकर को आशीष देते हुए कहा कि "मण्डन से शास्त्रार्थ करो और विजयी होओ।"
मण्डन तो उन्हीं के शिष्य थे, फिर उन्होंने शंकर को विजय का आशीष क्यों दिया?
 इसलिए, क्योंकि वे जान गए थे कि अब अद्वैत-वेदान्त ही सनातन धर्म की रक्षा कर सकता है और इसके लिए मीमांसकों को पीछे हटना होगा। 
शंकर ने यही कर दिखाया। अकेले अपने बूते वे भारत में सनातन धर्म की पुन:प्रतिष्ठा करने में सफल रहे। बौद्धों का तब जो पराभव हुआ तो आज तक वे भारत में अपनी धरती नहीं पा सके।
सनातन धर्म पर इससे बड़ा संकट इससे पहले कभी नहीं आया था। ना ही उसके बाद कभी आया। यों तो कालान्तर में सनातन धर्म पर यवनों, म्लेच्छों, विधर्मियों, विदेशियों ने अनेक प्रहार किए, किंतु वे सभी बाहरी आक्रमण थे, उसकी मूल दार्शनिक-मान्यताओं को तो बौद्धों ने ही सबसे प्रमुख चुनौती दी थी।
बीसवीं सदी के बीच में नवबौद्धों ने अवश्य एक कथित धर्म-आंदोलन चलाया था। बौद्ध धर्म उनके लिए राजनीतिक पूंजी की तरह था। वह नीति अतीत के प्रेतों को जगाकर सनातन धर्म पर मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने की थी। किंतु उनके सामाजिक न्याय का चाहे जो हुआ हो,उन नवबौद्धों का कोई नामलेवा आज नहीं है।
 आधुनिक काल में भी कुछ के द्वारा सनातन के मानमर्दन के यत्किंचित प्रयत्न किए जाते हैं, किंतु वे इतने उपहास्य हैं कि उनकी बात करना भी उन्हें महत्व देना है।
मध्यकाल के वज्रयानियों से लेकर आधुनिक काल के नवबौद्धों तक, ये सभी भारत से सनातन के उन्मूलन में सफल क्यों नहीं हो पाए हैं?
इसका संकेत शंकर-मण्डन संवाद में मिलता है। 
मण्डन ने शंकर से कहा था: "वेद का अभिप्राय है विधि का प्रतिपादन करना और उपनिषद स्वरूप का प्रतिपादन करते हैं। मैं तो विधि की ही बात करूंगा।"
इसके प्रत्युत्तर में शंकर ने जीव-ब्रह्मैक्य का सिद्धांत प्रतिपादित किया और यह तर्क देकर मण्डन को निरुत्तर कर दिया कि जिसे प्रमाण से सिद्ध किया जा सकता हो, वह पूर्णब्रह्म नहीं हो सकता। 
मण्डन को हार मानना पड़ी। कुमारिल यह जानते थे, इसलिए उन्होंने शंकर को विजय का आशीष दिया था। वे अपनी मृत्युशैया पर अद्वैत-वेदान्त के सामर्थ्य को पहचान गए थे।
शंकर न तो वेदविरुद्ध थे, न ही विधि-विरुद्ध, किंतु उन्होंने औपनिषदिक प्रविधि इसलिए अपनाई, क्योंकि वे जानते थे कि विधि को चुनौती दी जा सकती है, किंतु स्वरूप का खण्डन नहीं किया जा सकता। 
यह वही स्वरूप है, जिससे बुद्ध के अनित्य को भी प्राणधारा मिलती थी। मण्डूक्योपनिषद में बौद्ध और वेदान्त के सूत्र एकमेव हो जाते थे। स्वरूप को साध लिया तो फिर धर्म की भी रक्षा हो सकेगी, यह शंकर के उद्यम के मूल में था।
आज जो भी धर्म की विधियों पर प्रहार करते हैं, उन्हें जान लेना चाहिए कि उसके स्वरूप को नष्ट किए बिना भारत से सनातन-धर्म का उन्मूलन नहीं किया जा सकता, और भारत के गुणसूत्र इस स्वरूप से इतने अविच्छिन्न हो गए हैं कि इसे नष्ट करना सम्भव नहीं। 
प्रयाग में त्रिवेणी-संगम पर तुषानल के दाह में कुमारिल को जिस तत्व का बोध हो गया था, जिसकी धर्मध्वजा शंकर ने चतुर्दिक फहराई, उसकी मानहानि करना कम से कम विदूषकों के बस का रोग नहीं है।

Sunday, 14 December 2025

गायत्री जप के नियम

🌹गायत्रीजप के नियम- वेदादिशास्त्रों ने गायत्री के विविध पक्षों पर प्रचुर विचार किया है। यहाँ विचारणीय विषय है कि जपकाल में गायत्री के तीनों पादों का पृथक् पृथक् उच्चारण करना चाहिए या एक साथ- यानी गायत्री छिन्नपादा या अच्छिन्नपादा हो? 

🌹समाधान- श्रीमद्देवीभागवत में लिखा है
"अच्छिन्नपादा गायत्री ब्रह्महत्यां प्रयच्छति। छिन्नपादा तु गायत्री ब्रह्महत्यां विनाशयेत्।।" अच्छिन्नपादा गायत्री ब्रह्महत्या का फल देती है और पृथक्पादा गायत्री ब्रह्महत्याजन्य पाप को भी नष्ट कर देती है। 

🌹पुन: सन्ध्याभाष्यसमुच्चय में एक वचन आया है कि "जपकाले तु गायत्रीमुच्चरन् जपमाचरेत्। सन्ध्यासु भिन्नपादा चेत्स जपो निष्फलो भवेत्।।" जपकाल में उपांशूच्चारण पूर्वक गायत्री का जप करना चाहिए (इसका विशेष विवेचन कभी अलग से किया जायगा) और तीनों या चारों सन्ध्याओं में भिन्नपादा गायत्री का जप निष्फल हो जाता है। एतादृश द्वैध स्थलों में विशेष विचार की आवश्यकता होती है। 

🌹धर्मशास्त्रीय मन्थन से यह निष्कर्ष सामने आता है कि गायत्र्युपासक विभिन्नप्रकारेण शास्त्रोक्त दृष्टादृष्ट फल की सिद्धि के लिए आनुष्ठानिक प्रयोग करते समय विच्छिन्नपादा गायत्री का जप करे और वेदोक्त मार्ग से अवश्यकर्तव्य प्रात: आदि सन्ध्याओं में अविच्छिन्नपादा गायत्री का जप करे। यथा- "गायत्रीविच्छिन्नपादजपपरं वचनं गायत्रीकल्पाद्यागमशास्त्रानुरोधेन तच्छास्त्रोक्तदृष्टादृष्टफलसिद्धये प्रयोगं कुर्वतां गायत्रीमन्त्रोपासकानां विच्छिन्नपादा जप्तव्येति बोधयति, न तु वेदोक्तमार्गेण सन्ध्यासु गायत्रीं जपतां तथेति।" उपनयन संस्कार में वटु के गायत्र्युपदेश के समय पहले तीनों पाद अलग करके, पुन: गायत्री के दो विभाग करके एवं तीसरी बार में अविभक्तपादा सम्पूर्ण गायत्री प्रदान करने का विधान है। 

🌹शङ्का होती है कि इसी भिन्नाभिन्न पाद क्रम से गायत्री का नित्य जप क्यों नहीं किया जाता है? 

🌹एक समाधानपक्ष यह भी है कि यहाँ वटु के एकबार में सम्पूर्ण गायत्रीग्रहण की असमर्थता से ही सूत्रकारों ने ऐसा निर्देश दिया है, न कि नित्यनियमार्थ। यदि विभक्तपादा गायत्री के उपदेश को ही नित्य मान लिया जाय तो तीसरी और अन्तिम बार का निर्णीत अविभक्तपाद गायत्र्युपदेश व्यर्थ ही सिद्ध हो जायगा। 

🌹आपस्तम्बगृह्यसूत्र और उनके भाष्यकारों ने भी विवरण दिया है, यथा- "तस्मै कुमाराय ग्रहणार्थं तत्सवितुर्वरेण्यमित्येतामृचमाचार्योऽन्वाहेति। अन्यथा व्याहृतीर्विहृता: पादादिष्वन्तेषु वा तथाऽर्द्धर्चयोरुत्तमां कृत्स्नायामित्यादिकमपि तत्कालविहितं प्रसक्तं स्यादविशेषात्। तस्माद्ग्रहणार्थमेवोपनयनकाले तथोपदिष्टं न नियमार्थम्। अन्यथा तत: सर्वामिति सकलगायत्र्युपदेशो न स्यात्। तस्मादविच्छिन्नपादा सर्वा गायत्री जप्तव्येति सिद्धम्।" 

🌹श्रीमद्देवीभागवत के जिस प्रकरण का उपर्युक्त श्लोक है, वहाँ भी गायत्र्यनुष्ठान के दृष्टादृष्ट विभिन्न प्रयोग ही बताये गये हैं; जिनमें हवनादि के विधान भी द्रष्टव्य हैं। शास्त्रीय ऊहापोह से एतत्काल यही सिद्ध होता है कि प्रात: आदि सन्ध्याओं में अविभक्तपादा और तदितर आनुष्ठानिक प्रयोगों में विभक्तपादा गायत्री का जप करना चाहिए। धर्मशास्त्र में उपलब्ध द्वैध वाक्यों की सङ्गति भी इसी विचार से हो सकती है। पिङ्गलच्छन्द आदि के अनुसार भिन्नपाद के लिए 'पाद-यति' का विधान भी विचिन्तनीय हो सकता है। पुन: अधिकारी विद्वान् और विशेष चिन्तन करें...

Friday, 12 December 2025

भोजनपात्र में कुछ अन्नशेष बचाना चाहिए

🌸किसी सज्जन की धर्मजिज्ञासा- 
🌸भोजनपात्र में कुछ अन्नशेष बचाना चाहिए या पात्रों को धो-पोंछकर पी-चाट जाना चाहिए?

🔥समाधान- धर्मशास्त्रों के अनुसार भोजनपात्र में किञ्चित् अन्नशेष बचाना चाहिए; बर्तनों को धो-पोंछकर पी-चाट जाना निषिद्ध है। कात्यायनभोजनसूत्रम् में स्पष्ट लिखा है- "न सर्वभोजी स्यात्किञ्चिद्भोज्यं परित्यजेदन्यत्र घृतपायसदधिसक्तुपललमधुभ्य:" भोजनपात्रस्थ अन्न को पोंछ-पाछकर सर्वग्रास नहीं कर जाना चाहिए। घृत, पायस, दधि, सक्तु, पलल और मधु से अतिरिक्त भोज्यपदार्थ को किञ्चित् बचा लेना चाहिए। नारदजी ने भी कहा है- "सर्वं सशेषमश्नीयाद्घृतपायसवर्जितम्।" 

🌸धर्मशास्त्रनियन्त्रित गृहस्थों की परम्परा में उच्छिष्टभोजी पितृगण भी हैं, जिनके लिए भोजनपात्र में बचे हुए उच्छिष्ट अन्न ही ग्राह्य होते हैं; तदर्थ चित्राहुति के रूप में- "मद्भुक्तोच्छिष्टशेषं ये भुञ्जन्ति पितरोsधमा:। तेषामन्नं मया दत्तमक्षय्यमुपतिष्ठतु।।" बदरीफलप्रमाण उच्छिष्टान्न ही देने का विधान है। देवल ने भी यही बात कही है- "भुक्तोच्छिष्टं समाघ्राय सर्वेभ्यो घृतवर्ज्जितम्। उच्छिष्टभागधेयेभ्य: सोदकं निर्वपेद्भुवि।।" पुन: भोजनपात्र में बचे शेषान्न अथवा चित्राहुति वाला अन्न लेकर कौओं को खिलाये। भोजनान्त में ही "श्वानौ द्वौ श्यावशवलौ वैवस्वतकुलोद्भवौ। ताभ्यामन्नं प्रदास्यामि स्यातामेतावहिंसकौ।।" से श्वानबलि देने का विधान है। 

🌸धर्मनियन्त्रित समुदार गृहस्थों को उत्तममध्यमाधम मृतपितृगणों की भी चिन्ता रहती है, अत: उच्छिष्टभोजी पितरों के भाग को भी स्वयं खा-पचा जाना सही नहीं है। धार्मिकों के द्वारा यथासाध्य शास्त्राज्ञा का पालन करना चाहिए; अन्यथा अतृप्त और बली पितृगण को "अतर्पिता: पितरो देहाद्रुधिरं पिबन्ति" से कौन रोक सकता है??

Wednesday, 10 December 2025

जौहर और सती प्रथा

जौहर किसे कहते है? वामपंथी इसे आपको पढ़ने से क्यों रोकते है?

भारत में जौहर, हिन्दू महिलाओं द्वारा युद्ध में निश्चित हार होने पर शत्रुओं द्वारा हरण, यौन गुलामी और अपमान से बचने के लिए सामूहिक आत्मदाह करने की प्रथा थी, जो सम्मान, सतीत्व और बलिदान की रक्षा के लिए किया जाता था।

जैसे चित्तौड़ की रानी पद्मावती और चंदेरी की रानी मणिमाला के जौहर प्रसिद्ध हैं, जहाँ स्त्रियाँ आग में कूदकर अपनी अस्मिता की रक्षा करती थीं। 

जौहर के मुख्य कारण:

1.शत्रु के हाथों पड़ने से बचना: युद्ध में हारने पर जब राजा और पुरुष वीरगति प्राप्त कर लेते थे, तो स्त्रियाँ दुश्मन के हाथ लगने, बलात्कार या दासता से बचने के लिए यह कदम उठाती थीं।

2.सतीत्व और सम्मान की रक्षा: यह अपनी पवित्रता और सम्मान की रक्षा का अंतिम उपाय था, जहाँ वे अपनी जान देकर भी कलंकित होने से बचती थीं।

3.स्वाभिमान और प्रतिरोध: जौहर केवल आत्म-बलिदान नहीं, बल्कि शत्रुओं के आगे न झुकने और अपने स्वाभिमान को बनाए रखने का एक शक्तिशाली प्रतीक था, जैसा कि चंदेरी के जौहर में देखा गया।

4.धार्मिक और सांस्कृतिक भावना: यह नारी जीवन की निष्कलंकता और प्राणोत्सर्ग की उद्दात भावना से जुड़ा था, जहाँ वे स्वयं को समाज और संस्कृति की रक्षा के लिए समर्पित करती थीं। 

प्रमुख उदाहरण:
1.चित्तौड़ का जौहर (रानी पद्मावती): अलाउद्दीन खिलजी के आक्रमण के समय रानी पद्मावती और अन्य महिलाओं ने अपने सतीत्व की रक्षा के लिए जौहर किया था।

2.चंदेरी का जौहर (रानी मणिमाला): बाबर के आक्रमण के दौरान 1600 क्षत्राणियों ने जौहर कुंड में कूदकर अपने स्वाभिमान की रक्षा की थी। 

• 1020–1140, चालुक्य बनाम परमार: कोई जौहर नहीं

 • 1100–1200, परमार बनाम चौहान: कोई जौहर नहीं

 • 1150–1180, चालुक्य बनाम चौहान: कोई जौहर नहीं

 • 1160–1180, चौहान बनाम गहड़वाल: कोई जौहर नहीं

 • 1200–1500, सिसोदिया बनाम राठौड़: कोई जौहर नहीं

 • 1300–1400, सिसोदिया बनाम परमार: कोई जौहर नहीं

 • 1300–1500, सिसोदिया के आंतरिक उत्तराधिकार युद्ध: कोई जौहर नहीं

 • 1300–1400, राठौड़ बनाम परमार: कोई जौहर नहीं

 • 1350–1500, राठौड़ बनाम भाटी: कोई जौहर नहीं

 • 1100–1300, कछवाहा बनाम चौहान: कोई जौहर नहीं

 • 1000–1200, चौहान शाखाओं के आंतरिक संघर्ष: कोई जौहर नहीं

 • 1100–1300, भाटी बनाम जाडौन: कोई जौहर नहीं

 • 1100–1150, तोमर बनाम चौहान: कोई जौहर नहीं

 • 1400–1500, राठौड़ बनाम कछवाहा: कोई जौहर नहीं

इन सभी में—दो दर्जन से भी अधिक युद्ध, जिनमें राजपूत आपस में लड़े, और कहीं भी जौहर नहीं हुआ।
एक भी नहीं।
ना भारतीय स्रोतों में, ना विदेशी लेखनों में।

अब यह देखें:
 • 712, दाहिर (सिंध) बनाम मुहम्मद बिन क़ासिम: जौहर

 • 1232, ग्वालियर बनाम इल्तुतमिश: जौहर

 • 1301, रणथंभौर बनाम अलाउद्दीन खिलजी: जौहर

 • 1299, जैसलमेर बनाम अलाउद्दीन खिलजी: जौहर

 • 1303, चित्तौड़ बनाम अलाउद्दीन खिलजी: पहला जौहर

 • 1327, कम्पिली बनाम मुहम्मद बिन तुगलक: जौहर

 • 1326, जैसलमेर बनाम गयास-उद-दीन तुगलक: जौहर

 • 1486, कुवा बनाम महमूद बेगड़ा: जौहर

 • 1528, चंदेरी बनाम बाबर: जौहर

 • 1535, चित्तौड़ बनाम बहादुर शाह: दूसरा जौहर

 • 1543, रायसेन बनाम हुमायूं: तीन जौहर

 • 1568, चित्तौड़ बनाम अकबर: तीसरा जौहर

 • 1634, बुंदेलखंड बनाम औरंगज़ेब: जौहर

 • 1710, दद्दानाला बनाम मीर फ़ज़लुल्लाह: जौहर

इसी तरह जब अंग्रेज आए—प्लासी, बक्सर, कर्नाटिक युद्ध, मैसूर युद्ध, मराठा युद्ध, गुरखा युद्ध, सिख युद्ध, बर्मा युद्ध, अफगान युद्ध—
कहीं भी जौहर नहीं।

अब जब कोई समीक्षक “हिंदुत्व” को जौहर को “महिमामंडित करने” के लिए कोसता है, मैं उसकी बात से पूरी तरह सहमत हूँ—
यह एक भयावह प्रथा थी, सभ्य समाज में इसका कोई स्थान नहीं, और सौभाग्य से यह समाप्त हो चुकी है।

लेकिन क्या आपको ऊपर की सूचियों में कुछ पैटर्न दिख रहा है?

क्यों यह वीभत्स परंपरा केवल मुस्लिम आक्रमणों के प्रसंगों में ही दिखाई देती है?

अन्य किसी भी विरोधी के विरुद्ध राज्य गिरने पर महिलाओं ने ऐसा क्यों नहीं किया?

इतना तो कोई भी समझ सकता है।

कोई जौहर का महिमामंडन नहीं करता—यह कोई उत्सव नहीं था। हम इसे सम्मान देते हैं—उस अग्नि को नहीं, बल्कि उस दर्दनाक भावना को जिसने हमारे पूर्वजों को ऐसा करने पर मजबूर किया।

क्योंकि उस भावना को स्मरण रखना आवश्यक है।

पता है क्यों?

क्योंकि वे राक्षस, जिन्होंने हमारे पूर्वजों को ऐसी भयावह स्थिति में धकेला—
वे आज भी हमारे बीच मौजूद हैं।
और उनका स्वभाव आज भी वैसा ही है।

जब कोई मृत्यु को आपकी छाया से बेहतर विकल्प समझ ले—तो सोचिए आप हैं ही क्या?

जौहर भारतीय इतिहास में महिलाओं के अदम्य साहस, त्याग और सम्मान के प्रति उनकी अटूट प्रतिबद्धता का एक मार्मिक उदाहरण है, जिसे वे शत्रु के क्रूर इरादों से बचने के लिए अपनाती थीं। 

भारत के वामपंथी इतिहासकार जौहर को राजपूतों की हार का परिणाम बताते हुए नकारात्मक चित्रण करते हैं, इसे महिलाओं के आत्मसमर्पण के बजाय स्वेच्छा से चुनी गई मृत्यु के रूप में प्रस्तुत करने से बचते हैं। वे इसे अपमानजनक मानते हुए तर्क देते हैं कि महिलाओं को गुलाम बनकर जीना चाहिए था, 

वामपंथी इतिहास लेखन में हिंदू परंपराओं को कमतर दिखाने और आक्रमणकारियों के कृत्यों को नरमी से पेश करना मुख्य उद्देश्य रहा है।

वामपंथी इतिहासकारों पर आरोप है कि वे जौहर को दबाते हैं क्योंकि यह जिहादी आक्रमणों की क्रूरता को उजागर करता है, जो उनकी तुष्टिकरण वाली ऐतिहासिक व्याख्या से टकराता है। जौहर को झूठों के बोझ तले दबाकर सामाजिक क्रांति के इस प्रतीक को भुला दिया जाता है, जिससे आधुनिक पीढ़ियां अपनी गौरवशाली विरासत से अनभिज्ञ रह जाती हैं।

जौहर ने पुरुषों को और कठोर युद्ध के लिए प्रेरित किया, क्योंकि महिलाओं का बलिदान आक्रमणकारियों को खाली जीत देता था। वामपंथी दृष्टिकोण इसे कमजोरी के रूप में चित्रित कर हिंदू समाज के प्रतिरोध को कम किया जा सकता है, यदि आज के समय में इसे पढ़ाया जाएगा तो हिन्दू एकीकरण और जागृति होगी जो कि वामपंथियों के एजेंडे में नहीं आता है।

भारत में वामपंथी या मार्क्सवादी इतिहासकारों की प्रमुख सूची में रोमिला थापर, इरफान हबीब, आर.एस. शर्मा और डी.डी. कोसांबी शामिल हैं, जिन्हें अक्सर जौहर जैसी परंपराओं पर नकारात्मक या कमतर दृष्टिकोण अपनाया है।

Monday, 8 December 2025

आचमन

आचमन तीन बार ही क्यों। ?

पूजा, यज्ञ आदि आरंभ करने से पूर्व शुद्धि के लिए मंत्र पढ़ते हुए जल पीना ही आचमन कहलाता है। इससे मन और हृदय की शुद्धि होती है।   

धर्मग्रंथों में तीन बार आचमन करने के संबंध में कहा गया है।

प्रथमं यत् पिवति तेन ऋग्वेद प्रीणाति । यद् द्वितीयं तेन यजुर्वेदं प्रीणाति यद् तृतीयं तेन सामवेदं प्रीणाति ॥

अर्थात् तीन बार आचमन करने से तीनों वेद यानी-ऋग्वेद, यजुर्वेद व सामवेद प्रसन्न होकर सभी मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं। मनु महाराज के मतानुसार

त्रिराचामेदपः पूर्वम् ।

-मनुस्मृति 2/60 

अर्थात् सबसे पहले तीन बार आचमन करना चाहिए। इससे कंठशोषण दूर होकर, कफ़ निवृत्ति के कारण श्वसन क्रिया में व मंत्रोच्चारण में शुद्धता आती है। इसीलिए प्रत्येक धार्मिक कृत्य के शुरू में और संध्योपासन के मध्य बीच-बीच में अनेक बार तीन की संख्या में आचमन का विधान बनाया गया है। इसके अलावा यह भी माना जाता है कि इससे कायिक, मानसिक और वाचिक तीनों प्रकार के पापों की निवृत्ति होकर न दिखने वाले फल की प्राप्ति होती है।

अंगूठे के मूल में ब्रह्मतीर्थ, कनिष्ठा के मूल प्रजापत्यतीर्थ, अंगुलियों के अग्रभाग में देवतीर्थ, तर्जनी और अंगूठे के बीच पितृतीर्थ और हाथ के मध्य भाग में सौम्यतीर्थ होता है, जो देवकर्म में प्रशस्त माना गया है। आचमन हमेशा ब्रह्मतीर्थ से करना चाहिए। आचमन करने से पहले अंगुलियां मिलाकर एकाग्रचित्त यानी एकसाथ करके पवित्र जल से बिना शब्द किए 3 बार आचमन करने से महान फल मिलता है। आचमन हमेशा 3 बार करना चाहिए।  

आचमन के मंत्र

जल लेकर तीन बार निम्न मंत्र का उच्चारण करते हैं:- हुए जल ग्रहण करें-
ॐ केशवाय नम: 
ॐ नाराणाय नम:
ॐ माधवाय नम:
ॐ ह्रषीकेशाय नम:, बोलकर ब्रह्मतीर्थ (अंगुष्ठ का मूल भाग) से दो बार होंठ पोंछते हुए हस्त प्रक्षालन करें (हाथ धो लें)। उपरोक्त विधि ना कर सकने की स्थिति में केवल दाहिने कान के स्पर्श मात्र से ही आचमन की विधि की पूर्ण मानी जाती है।  

आचमन करने के बारे में मनुस्मृति में भी कहा गया है कि ब्रह्मतीर्थ यानी अंगूठे के मूल के नीचे से इसे करें अथवा प्राजापत्य तीर्थ यानी कनिष्ठ उंगली के नीचे से या देवतीर्थ यानी उंगली के अग्रभाग से करें, लेकिन पितृतीर्थ यानी अंगूठा व तर्जनी के मध्य से आचमन न करें, क्योंकि इससे पितरों को तर्पण किया जाता है, इसलिए यह वर्जित है। आचमन करने की एक अन्य विधि बोधायन में भी बताई गई है, जिसके अनुसार हाथ को गाय के कान की तरह आकृति प्रदान कर तीन बार जल पीने को कहा गया है।

आचमन के बारे में स्मृति ग्रंथ में लिखा है की :-

प्रथमं यत् पिबति तेन ऋग्वेद प्रीणाति।
यद् द्वितीयं तेन यजुर्वेद प्रीणाति।
यत् तृतीयं तेन सामवेद प्रीणाति।  
 
पहले आचमन से ऋग्वेद और द्वितीय से यजुर्वेद और तृतीय से सामवेद की तृप्ति होती है। आचमन करके जलयुक्त दाहिने अंगूठे से मुंह का स्पर्श करने से अथर्ववेद की तृप्ति होती है। आचमन करने के बाद मस्तक को अभिषेक करने से भगवान शंकर प्रसन्न होते हैं। दोनों आंखों के स्पर्श से सूर्य, नासिका के स्पर्श से वायु और कानों के स्पर्श से सभी ग्रंथियां तृप्त होती हैं। माना जाता है कि ऐसे आचमन करने से पूजा का दोगुना फल मिलता है l

Saturday, 6 December 2025

ब्राह्मण और शूद्र

नीच मानसिकता के लोग ब्राह्मणों पर अनर्गल प्रलाप करते है, कहते है कि समाज को तोड़ने और भेद भाव को जन्म ब्राह्मणों ने दिया...।

जब ब्राह्मण अत्याचारी था तो यह कहानी किसने बनाई कि, किसी नगर में एक गरीब ब्राह्मण था...।

ब्राह्मण गरीब था लेकिन अपने तप, त्याग, तपस्या, तेज, बलिदान से आज समाज के कुछ लोगों के आंखों में खटक रहा है...।

आरे बेवकूफों ब्राह्मणों ने हमेशा से समाज में समरसता बना कर जोड़ने का कार्य किया, भेद भाव को मिटाने का कार्य किया...।
आप उदाहरण देखे...।

         त्रेता युग में क्षत्रियों का शासन था !!
         महाभारत काल मे यादव क्षत्रियों का शासन था !!
         उसके बाद दलित-मौर्य और बौद्धो का राज था !!
         उसके बाद 600 साल मुसलमान बादशाह (अरबी लुटेरों) का राज था.......
         फिर 300 साल अंग्रेज राज था, 
         पिछले 71 वर्षों से अंबेडकर का संविधान राजकाज चला रहा है़,
         लेकिन फिर भी सब पर अत्याचार ब्राह्मणों द्वारा किया गया... आश्चर्य किंतु सत्य !!
         मूर्खता की कोई सीमा नही !!

         ब्राह्मणों को गाली देना , कोसना , उन्हें कर्मकांडी , पाखंडी , लालची , भ्रष्ट, ढोंगी जैसे विशेषणों के द्वारा अपमानित करना आजकल ट्रेंड में है !
कुछ लोग ब्राह्मणों को सबक सिखाना चाहते हैं , कुछ उन्हें मंदिरों से बाहर कर देना चाहते हैं
. वगैरह-वगैरह !!

         कुछ कथित रूप से पिछड़े लोगों को लगता है कि ब्राह्मणों की वजह से ही वो 'पिछड़े' रह गये, दलितों की अपनी दलीलें हैं , कभी - कभी अन्य जातियों के लोगों के श्रीमुख से भी इस तरह की बातें सुनने को मिल जाती हैं !!
         आमतौर से ये धारणा फैलाई जा रही है कि ब्राह्मणों की वजह से समाज पिछड़ा रह गया , लोग अशिक्षित रह गये, समाज जातियों में बंट गया, देश में अंधविश्वासों को बढ़ावा मिला .. वगैरह - वगैरह !!
         आज , ऐसे सभी माननीयों को हृदय से धन्यवाद देते हुए हम आपको जवाब दे रहे हैं ...

         लेकिन आप जान लीजिये , - वो कौटिल्य , जिसने संपूर्ण मगध साम्राज्य को संकटों से मुक्ति दिलाई , देश में जनहितैषी सरकार की स्थापना कराई , भारत की सीमाओं को ईरान तक पहुंचा दिया और कालजयी ग्रन्थ
 'अर्थशास्त्र' की रचना की (जिसे आज पूरी दुनिया पढ़ रही है) वो *कौटिल्य* ब्राह्मण थे !!

          आदि शंकराचार्य जिन्होंने संपूर्ण हिंदू समाज को एकता के सूत्र में बांधने के प्रयास किये, 8वीं सदी में ही पूरे देश का भ्रमण किया , विभिन्न विचारधाराओं वाले तत्कालीन विद्वानों-मनीषियों से शास्त्रार्थ कर उन्हें हराया, देश के चार कोनों में चार मठों की स्थापना कर हर हिंदू के लिए चार धाम की यात्रा का विधान किया , जिससे आप इस देश को समझ सकें वो शंकराचार्य ब्राह्मण थे !!

         कर्नाटक के जिन लिंगायतों को कांग्रेसी हिंदूओं से अलग करना चाहतें हैं , उनके गुरु और लिंगायत के संस्थापक - बसव - भी ब्राह्मण थे !!

         भारत में सामाजिक - वैचारिक उत्थान , विभिन्न जातियों की समानता , छुआछूत - भेदभाव के खिलाफ समाज को एक करने वाले भक्ति आंदोलन के प्रमुख संत रामानंद , (जो केवल "कबीर" के ही नहीं बल्कि *"संत रैदास"* के भी "गुरु" थे) ब्राह्मण थे !!

आज दिल्ली में जिस भव्य अक्षरधाम मंदिर के दर्शन करके दलितों समेत सभी जातियों के लोग खुद को धन्य मानते हैं, उस मंदिर की स्थापना करने वाला स्वामीनारायण संप्रदाय है जिसके जनक घनश्याम पांडेय भी ब्राह्मण थे !!

         वक्त के अलग-अलग कालखंड मे 
हिंदू समाज में व्याप्त हो चुकी बुराईयों को दूर करने के लिए 'आर्य समाज' व 'ब्रह्म समाज' के रूप में जो दो बड़े आंदोलन देश में खड़े हुए , इन दोनों के ही जनक क्रमश: "स्वामी दयानंद सरस्वती व राजा राममोहन राय" ( जिन्होंने हमें सती प्रथा से मुक्ति दिलाई ) ब्राह्मण थे !

भारत में विधवा विवाह की शुरुआत कराने वाले *"ईश्वरचंद्र विद्यासागर"* भी ब्राह्मण थे,
 इन सभी संतों ने जाति - पांति , छुआछूत, भेदभाव के खिलाफ समाज को जागरुक करने में अपना जीवन खपा दिया - लेकिन समाज में कुछ नीच मानसिकता के लोग आज भी ब्राह्मण को गाली देना नहीं छोड़ा है...।

         भगवान श्रीराम की महिमा को ' " रामचरित मानस " ' के जरिये घर-घर में पहुंचाने वाले "तुलसीदास" और भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति की लहर पैदा करने वाले वल्लभाचार्य भी ब्राह्मण थे !

 ये भी याद रखिये - मंदिरों में ब्राह्मणों का वर्चस्व था , जैसा कि आप लोग कहते हैं,फिर भी भारत में भगवान परशुराम (ब्राह्मण) के मंदिर सामान्यत: नहीं मिलते ये है ब्राह्मणों की भावना !!

         विदेशी आधिपत्य के खिलाफ सबसे पहले विद्रोह का बिगुल बजाने संन्यासियों में से अधिकांश लोग ब्राह्मण थे ,
 अंग्रेजों की तोपों के सामने सीना तानने वाले
मंगल पांडेय , रानी लक्ष्मीबाई,
अंग्रेज अफसरों के लिए दहशत का पर्याय बन चुके चंद्रशेखर आजाद , फांसी के फंदे पर झूलने वाले राजगुरु - ये सभी ब्राह्मण थे !!

         वंदेमातरम जैसी कालजयी रचना से पूरे देश में देशभक्ति का ज्वार पैदा करने वाले बंकिमचंद्र चटर्जी , जन-गण-मन के रचयिता रविंद्रनाथ टैगोर ब्राह्मण , देश के पहले आईएएस (तत्कालीन ICS) सत्येंद्रनाथ टौगोर भी ब्राह्मण...।

 स्वतंत्रता आंदोलन के नायक गोपालकृष्ण गोखले ( गांधी जी के गुरु ), बाल गंगाधर तिलक, राजगोपालाचारी ब्राह्मण। भारत के सबसे लोकप्रिय प्रधानमंत्रियों में स्वर्गीय " श्री अटल बिहारी वाजपेयी " भी ब्राह्मण !!

         पंडित जवाहर लाल नेहरु जिसने आजादी के बाद हमारा सपनो का भारत कैसा होगा, उसके बारे में पहले ही "भारत एक खोज" जैसी पुस्तक लिख दी थी, वो भी ब्राह्मण थे।
नेहरू जी के मंत्रिमंडल सरकार से त्यागपत्र देने वाले पहले मंत्री , जिन्होंने पद की बजाय जनहित के लिए संघर्ष का रास्ता चुना और कश्मीर के सवाल पर अपने प्राणों की आहुति दी - वो डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी भी ब्राह्मण।

 बीजेपी के सबसे बड़े सिद्धांतकार पंडित दीनदयाल उपाध्याय हिंदू समाज की एकता , जातिविहीन समाज की स्थापना और सांस्कृतिक गौरव की पुनर्स्थापना के लिए खड़ा हुआ दुनिया का सबसे बड़ा स्वयंसेवी संगठन - राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ - की नींव एक गरीब ब्राह्मण परिवार से ताल्लुक रखने वाले डॉ. हेडगेवार ने डाली थी उन्होंने अपने खून का कतरा-कतरा हिंदूओं को ताकत देने और उन्हें एकसूत्र में पिरोने में खपा दिया , केवल ब्राह्मणों की चिंता नहीं की संघ के दूसरे सरसंघचालक - डॉ. गोलवलकर -जिन्होंने संपूर्ण हिंदू समाज को ताकत देने के लिए सारा जीवन समर्पित कर दिया - वो भी ब्राह्मण !!

         यही नहीं , देश में पहली कम्यूनिस्ट सरकार केरल में बनाने वाले नंबूदरीपाद समेत मार्क्सवादी आंदोलन के कई प्रमुख रणनीतिकार ब्राह्मण ही थे। 

समकालीन नेताओं की बात करें तो तमिलनाडु में जयललिता ब्राह्मण थीं ,
         मायावती , जिन्होंने 'तिलक-तराजू और तलावर, इनको मारो जूते चार' जैसा अपमानजनक नारा बार-बार लगवाया , उन पर जब लखनऊ के गेस्ट हाउस में सपा के समर्थकों ने जानलेवा हमला किया , उन्हें मारा-पीटा, उनके कपड़े फाड़े , और शायद उनकी हत्या करने वाले थे , उस समय जान पर खेलकर उन समर्थकों से लड़ने वाले और
 मायावती को सुरक्षित वहां से निकालने वाले " स्वर्गीय ब्रह्मदत्त द्विवेदी " भी ब्राह्मण थे !!

         फिर भी , जिन्हें लगता है कि ब्राह्मण केवल मंदिर में घंटा बजाना जानता है - वो ये भी जान लें कि भारत के इतिहास का सबसे महान घुड़सवार योद्धा और सेनानायक - जो 20 साल के अपने राजनीतिक जीवन में कभी कोई युद्ध नहीं हारा , जिसने मुस्लिम शासकों के आंतक से कराहते देश में भगवा पताकाओं को चारों दिशाओं में लहरा दिया और जिसे बाजीराव-मस्तानी फिल्म में देखकर आपने भी तालियां ठोंकी होंगी , - वो बाजीराव बल्लाल भी ब्राह्मण था !!

         तो , ब्राह्मणों को कोसने वाले इतिहास को ठीक से पढ़ लो..!!