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कुछ तथ्य : -
आदि गुरू दत्तात्रेय महर्षि अत्रि और अनुसूइया के पुत्र
इसीलिए दत्त +आत्रेय कहे गए!
महर्षि अत्रि की उत्पत्ति ब्रह्मा जी के नेत्रों से, अनुसूइया महर्षि कर्दम और देवहुति की पुत्री और सांख्य दर्शन के प्रणेता महर्षि कपील की बहन थी!
गुजरात में दत्त उपासना के बीज सरदार सरोवर बांध के निकट स्थित गरूड़ेश्वर तीर्थ में प. पू. स्वामी श्री वासुदेवानंद सरस्वती टेम्बे महाराज ने रखे!
पूज्य टेम्बे स्वामी ने मराठी और संस्कृत में दत्त उपासना साहित्य की खूब रचना की!
उनके शिष्य नारेश्वर के संस्थापक प. पू. रंगअवधूत महाराज ने गुजराती, हिंदी और संस्कृत भाषा में दत्तात्रेय उपासना को प्रचुरता प्रदान की!
भगवान दत्तात्रेय का जन्म सह्याद्री पर्वत माला के माहूरगढ़ नामक स्थान पर एवम् गुजरात के गिरनार पर्वत पर उनका निवास माना जाता है! जैसे राम और कृष्ण अवतार में राक्षस वध के बाद वे निज धाम गमन कर गए किंतु दत्तात्रेय चिरंजीवी माने जाते हैं!
भगवान कृष्ण योग के ईश्वर है इसलिए योगेश्वर कहे गए। दत्तात्रेय योगियों के ईश्वर है इसलिए योगीेश्वर कहे जाते हैं!
प. पू. रंगअवधूत जी के अनुसार दत्त शब्द दन्त्यवर्णों से निर्मित है (यानी जो त, थ, द, ध, न,) यह अद्वैत का सूचक है!
"दया, दान अरू दमन ये है दत्ता के भेद!
तत्ता विषयाध्यास है ताको तू कर भेद!!"
भगवान दत्त का मुख्य गुण "सर्वस्व का दान" करना है! दत्त अवतार को लेकर भी प. पू. रंगअवधूत जी का कथन यही था कि जिसमें दत्त की तरह सर्वस्व अर्पण के गुण हो वही दत्तावतारी! उन्होने अपने जीवन में जो सूत्र दिया वह है "परस्पर देवो भवः!" उन्होंने 'लंघन करना (भूखों रहना) पर मांगना नहीं' का सूत्र भी अपने अनुयायियों को दिया!
https://youtu.be/A8BNfgyqVLM
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