🌸भोजनपात्र में कुछ अन्नशेष बचाना चाहिए या पात्रों को धो-पोंछकर पी-चाट जाना चाहिए?
🔥समाधान- धर्मशास्त्रों के अनुसार भोजनपात्र में किञ्चित् अन्नशेष बचाना चाहिए; बर्तनों को धो-पोंछकर पी-चाट जाना निषिद्ध है। कात्यायनभोजनसूत्रम् में स्पष्ट लिखा है- "न सर्वभोजी स्यात्किञ्चिद्भोज्यं परित्यजेदन्यत्र घृतपायसदधिसक्तुपललमधुभ्य:" भोजनपात्रस्थ अन्न को पोंछ-पाछकर सर्वग्रास नहीं कर जाना चाहिए। घृत, पायस, दधि, सक्तु, पलल और मधु से अतिरिक्त भोज्यपदार्थ को किञ्चित् बचा लेना चाहिए। नारदजी ने भी कहा है- "सर्वं सशेषमश्नीयाद्घृतपायसवर्जितम्।"
🌸धर्मशास्त्रनियन्त्रित गृहस्थों की परम्परा में उच्छिष्टभोजी पितृगण भी हैं, जिनके लिए भोजनपात्र में बचे हुए उच्छिष्ट अन्न ही ग्राह्य होते हैं; तदर्थ चित्राहुति के रूप में- "मद्भुक्तोच्छिष्टशेषं ये भुञ्जन्ति पितरोsधमा:। तेषामन्नं मया दत्तमक्षय्यमुपतिष्ठतु।।" बदरीफलप्रमाण उच्छिष्टान्न ही देने का विधान है। देवल ने भी यही बात कही है- "भुक्तोच्छिष्टं समाघ्राय सर्वेभ्यो घृतवर्ज्जितम्। उच्छिष्टभागधेयेभ्य: सोदकं निर्वपेद्भुवि।।" पुन: भोजनपात्र में बचे शेषान्न अथवा चित्राहुति वाला अन्न लेकर कौओं को खिलाये। भोजनान्त में ही "श्वानौ द्वौ श्यावशवलौ वैवस्वतकुलोद्भवौ। ताभ्यामन्नं प्रदास्यामि स्यातामेतावहिंसकौ।।" से श्वानबलि देने का विधान है।
🌸धर्मनियन्त्रित समुदार गृहस्थों को उत्तममध्यमाधम मृतपितृगणों की भी चिन्ता रहती है, अत: उच्छिष्टभोजी पितरों के भाग को भी स्वयं खा-पचा जाना सही नहीं है। धार्मिकों के द्वारा यथासाध्य शास्त्राज्ञा का पालन करना चाहिए; अन्यथा अतृप्त और बली पितृगण को "अतर्पिता: पितरो देहाद्रुधिरं पिबन्ति" से कौन रोक सकता है??
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