Tuesday, 2 December 2025

वेद

हम ईश्वर को क्यों मानते हैं? इसका एकमात्र कारण यही है कि वेद ही ईश्वर की सत्ता बताते हैं। इसके अतिरिक्त अन्य कोई भी कारण यद्यपि नहीं है, तथापि लोकप्रसिद्ध कारण वेद के आश्रित होने मात्र से ही हैं। 'शास्त्रं योनिः स्वरूपसिद्धौ प्रमाणं यस्य' के अनुसार ब्रह्म के यथार्थ स्वरूप के ज्ञान में वेद ही प्रमाण हैं। 'नावेदविन्मनुते तं बृहन्तम्' कि वेदार्थ के न जानने पर उस महान् तत्त्व का ज्ञान नहीं होता। 

जैसे दीपक अपने प्रकाश से बाह्य पदार्थों को दिखाता है, ऐसे स्वयंप्रकाश वेद भी गुप्त तथा प्रकट सब पदार्थों का बोध कराने में समर्थ हैं, इसलिए वेद स्वतः प्रमाण हैं। वेद को अपने प्रामाण्य में अन्य प्रमाणों की अपेक्षा नहीं है, जैसे सूर्य को किसी अन्य प्रकाश की अपेक्षा नहीं होती। इसलिए वेदों को सर्वज्ञकल्प कहा है, वेदों का कारण ब्रह्म है, और ब्रह्म के यथार्थ बोध का कारण वेद हैं, जैसे अत्यंत उत्कृष्ट रचना ही रचनाकार का निर्देश कर देती है, उसके अस्तित्त्व का भान कराती है, ऐसे वेद ही ईश्वर का निर्देश करते हैं, और संसार में ज्ञान जो कि ब्रह्म है, उसका प्रकाश करते हैं, 'त्वं त्वौपनिषदं पृच्छामि'। 

परब्रह्म के निःश्वास मात्र से ही वेदों का प्रादुर्भाव हो जाता है, 'अस्य महतो भूतस्य निःश्वसितमेतद्...'। जैसे स्वाभाविक निःश्वास में पुरुष श्रम नहीं करता, ऐसे वेद भी ईश्वर का निःश्वास है, वह बिना प्रयास, बिना श्रम के ही प्रकट ज्ञान है, अतः अपौरुषेय है। 

वास्तव में वेद परमात्मा से भिन्न नहीं हैं, त्रयीविद्या वेद और शब्द को ब्रह्म ही कहा है, 'वेदो नारायण: साक्षात्', 'वेदस्य चेश्वरात्मत्वात् तत्र मुह्यन्ति सूरयः'। पुत्रवत्सला माता से भी शतकोटि गुणित हितैषिणी भगवती वेदमाता ही अपने उपासकों को पवित्र करके आयु प्राण प्रजा पशु कीर्ति धन और ब्रह्मवर्चस् प्रदान करती है। 

भारतीय संस्कृति के मूलाधार ये अपौरुषेय वेद ही हैं। वेदों को जो नहीं मानता वह अश्रेष्ठ है, श्रुतिविरुद्ध सभी ग्रन्थ अश्रेष्ठ व तिरस्कृत हैं। वैदिक धर्म और वेदों से श्रेष्ठ संसार में कुछ नहीं है। वेद मन्त्र संहिता से लेकर मन्त्र ब्राह्मण तर्क न्याय छंद व्याकरण ज्योतिष आदि षड्वेदांगों दशवादों दर्शनों समस्त विद्याओं तक व्यापक हैं। वेद को न मानने वाले(असंभावना) भी इन सबको छोड़ नहीं सकते। वेदों से इतर कोई भी विद्या स्वतन्त्र नहीं होती, अतः कोई भी वेदों से पृथक नहीं हो सकता। जैसे अग्नि से दाहकता मिटाना सम्भव नहीं है, ऐसे वेदों को न मानना सम्भव नहीं है, पाषण्ड मात्र है। 

वेदों की संहिताओं की मूल रचना गुह्यता आदि उसकी सर्वश्रेष्ठता बता देती है, लौकिक संस्कृत व अन्य भाषाओं में लिखे ग्रन्थ कभी दैवीय वैदिक संस्कृत की श्रुति से होड़ नहीं कर सकते हैं। सारे प्राचीन चन्द्र सूर्य अग्नि वंशीय हिन्दू कुलों, ऋषिकुलों में वेद प्रचलित थे न कि वेद से विरोध रखने वाले ग्रन्थ। शाश्वत आगम श्रुति के अविरुद्ध अर्थ वाले हैं।

वेद के अतिरिक्त संसार में कुछ भी अपौरुषेय नहीं है, वेद की सत्ता स्वतंत्र व स्वयंप्रकाश है। अन्यों का प्रमाण वेद के अधीन होने से है, वेद किसी प्रमाण की आशा नहीं रखते। तृण से ब्रह्म तक सभी, सृष्टि की समग्र रचना, स्थिति, प्रलय आदि का नियामक वेद है। इतिहास भी वेद के अनुसार चलता है। 

वेद का तिरस्कार निकृष्टता है, यह तो ऐसा है कि सूखी भूस के लिए इन्द्र के नन्दनवन को छोड़ देना, वे नास्तिक कहे गए हैं। वेद के सर्वांग का विरोध करना सम्भव नहीं है, वेदविरोधियों भी उसी ज्ञान में अपने आपको ढ़ालना पड़ता है, वेद से ही ज्ञान लेकर अन्य ग्रन्थों की रचना हुई है।

वेद सर्वोच्च हैं यह किसी का निज मत नहीं है, समस्त ऋषियों का मत है, इसे आर्ष मत कहते हैं। पाणिनि, वेदव्यास, पराशर, पतंजलि, कपिल, गर्ग, मेधा, अंगिरा, विश्वामित्र, वशिष्ठ, पुलस्त्य, जैमिनी, जमदग्नि, गौतम, भारद्वाज, शौनक, अगस्त्य, अदिति, च्यवन, दधीचि, दीर्घतमस, गृत्समद, कण्व, कश्यप, कुत्स, मेधातिथि, प्रस्कण्व, पुरुरवा, ऋषभ, ऋश्यशृंग, रुचि, वैशंपायन, वामदेव, याज्ञवल्क्य, यास्क आदि भगवती वेदमाता के उपासक ऋषियों ने वेद को सर्वोच्च माना। भगवती श्रुति का निरादर समस्त अविच्छिन्न ऋषि परंपरा का अनादर होता है। वेद रूपी आधारशिला पर ही आज भी सम्पूर्ण हिन्दू धर्म का प्रासाद खड़ा होता है। 

ऐसे वेदों का संरक्षण करने वाले नमनीय हैं, वन्दनीय हैं, प्रणम्य और प्रशंसनीय हैं। वे पूज्य हैं, पूज्यतर हैं और पूज्यतम हैं। ऐसी अनादि परम्परा के वाहक श्री देवव्रत महेश रेखे को सम्पूर्ण देश का नमन।
धन्य धन्य धरा वसुंधरा 
यत्र श्रूयन्ते श्रुतेः स्वराः

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