Wednesday, 10 December 2025

जौहर और सती प्रथा

जौहर किसे कहते है? वामपंथी इसे आपको पढ़ने से क्यों रोकते है?

भारत में जौहर, हिन्दू महिलाओं द्वारा युद्ध में निश्चित हार होने पर शत्रुओं द्वारा हरण, यौन गुलामी और अपमान से बचने के लिए सामूहिक आत्मदाह करने की प्रथा थी, जो सम्मान, सतीत्व और बलिदान की रक्षा के लिए किया जाता था।

जैसे चित्तौड़ की रानी पद्मावती और चंदेरी की रानी मणिमाला के जौहर प्रसिद्ध हैं, जहाँ स्त्रियाँ आग में कूदकर अपनी अस्मिता की रक्षा करती थीं। 

जौहर के मुख्य कारण:

1.शत्रु के हाथों पड़ने से बचना: युद्ध में हारने पर जब राजा और पुरुष वीरगति प्राप्त कर लेते थे, तो स्त्रियाँ दुश्मन के हाथ लगने, बलात्कार या दासता से बचने के लिए यह कदम उठाती थीं।

2.सतीत्व और सम्मान की रक्षा: यह अपनी पवित्रता और सम्मान की रक्षा का अंतिम उपाय था, जहाँ वे अपनी जान देकर भी कलंकित होने से बचती थीं।

3.स्वाभिमान और प्रतिरोध: जौहर केवल आत्म-बलिदान नहीं, बल्कि शत्रुओं के आगे न झुकने और अपने स्वाभिमान को बनाए रखने का एक शक्तिशाली प्रतीक था, जैसा कि चंदेरी के जौहर में देखा गया।

4.धार्मिक और सांस्कृतिक भावना: यह नारी जीवन की निष्कलंकता और प्राणोत्सर्ग की उद्दात भावना से जुड़ा था, जहाँ वे स्वयं को समाज और संस्कृति की रक्षा के लिए समर्पित करती थीं। 

प्रमुख उदाहरण:
1.चित्तौड़ का जौहर (रानी पद्मावती): अलाउद्दीन खिलजी के आक्रमण के समय रानी पद्मावती और अन्य महिलाओं ने अपने सतीत्व की रक्षा के लिए जौहर किया था।

2.चंदेरी का जौहर (रानी मणिमाला): बाबर के आक्रमण के दौरान 1600 क्षत्राणियों ने जौहर कुंड में कूदकर अपने स्वाभिमान की रक्षा की थी। 

• 1020–1140, चालुक्य बनाम परमार: कोई जौहर नहीं

 • 1100–1200, परमार बनाम चौहान: कोई जौहर नहीं

 • 1150–1180, चालुक्य बनाम चौहान: कोई जौहर नहीं

 • 1160–1180, चौहान बनाम गहड़वाल: कोई जौहर नहीं

 • 1200–1500, सिसोदिया बनाम राठौड़: कोई जौहर नहीं

 • 1300–1400, सिसोदिया बनाम परमार: कोई जौहर नहीं

 • 1300–1500, सिसोदिया के आंतरिक उत्तराधिकार युद्ध: कोई जौहर नहीं

 • 1300–1400, राठौड़ बनाम परमार: कोई जौहर नहीं

 • 1350–1500, राठौड़ बनाम भाटी: कोई जौहर नहीं

 • 1100–1300, कछवाहा बनाम चौहान: कोई जौहर नहीं

 • 1000–1200, चौहान शाखाओं के आंतरिक संघर्ष: कोई जौहर नहीं

 • 1100–1300, भाटी बनाम जाडौन: कोई जौहर नहीं

 • 1100–1150, तोमर बनाम चौहान: कोई जौहर नहीं

 • 1400–1500, राठौड़ बनाम कछवाहा: कोई जौहर नहीं

इन सभी में—दो दर्जन से भी अधिक युद्ध, जिनमें राजपूत आपस में लड़े, और कहीं भी जौहर नहीं हुआ।
एक भी नहीं।
ना भारतीय स्रोतों में, ना विदेशी लेखनों में।

अब यह देखें:
 • 712, दाहिर (सिंध) बनाम मुहम्मद बिन क़ासिम: जौहर

 • 1232, ग्वालियर बनाम इल्तुतमिश: जौहर

 • 1301, रणथंभौर बनाम अलाउद्दीन खिलजी: जौहर

 • 1299, जैसलमेर बनाम अलाउद्दीन खिलजी: जौहर

 • 1303, चित्तौड़ बनाम अलाउद्दीन खिलजी: पहला जौहर

 • 1327, कम्पिली बनाम मुहम्मद बिन तुगलक: जौहर

 • 1326, जैसलमेर बनाम गयास-उद-दीन तुगलक: जौहर

 • 1486, कुवा बनाम महमूद बेगड़ा: जौहर

 • 1528, चंदेरी बनाम बाबर: जौहर

 • 1535, चित्तौड़ बनाम बहादुर शाह: दूसरा जौहर

 • 1543, रायसेन बनाम हुमायूं: तीन जौहर

 • 1568, चित्तौड़ बनाम अकबर: तीसरा जौहर

 • 1634, बुंदेलखंड बनाम औरंगज़ेब: जौहर

 • 1710, दद्दानाला बनाम मीर फ़ज़लुल्लाह: जौहर

इसी तरह जब अंग्रेज आए—प्लासी, बक्सर, कर्नाटिक युद्ध, मैसूर युद्ध, मराठा युद्ध, गुरखा युद्ध, सिख युद्ध, बर्मा युद्ध, अफगान युद्ध—
कहीं भी जौहर नहीं।

अब जब कोई समीक्षक “हिंदुत्व” को जौहर को “महिमामंडित करने” के लिए कोसता है, मैं उसकी बात से पूरी तरह सहमत हूँ—
यह एक भयावह प्रथा थी, सभ्य समाज में इसका कोई स्थान नहीं, और सौभाग्य से यह समाप्त हो चुकी है।

लेकिन क्या आपको ऊपर की सूचियों में कुछ पैटर्न दिख रहा है?

क्यों यह वीभत्स परंपरा केवल मुस्लिम आक्रमणों के प्रसंगों में ही दिखाई देती है?

अन्य किसी भी विरोधी के विरुद्ध राज्य गिरने पर महिलाओं ने ऐसा क्यों नहीं किया?

इतना तो कोई भी समझ सकता है।

कोई जौहर का महिमामंडन नहीं करता—यह कोई उत्सव नहीं था। हम इसे सम्मान देते हैं—उस अग्नि को नहीं, बल्कि उस दर्दनाक भावना को जिसने हमारे पूर्वजों को ऐसा करने पर मजबूर किया।

क्योंकि उस भावना को स्मरण रखना आवश्यक है।

पता है क्यों?

क्योंकि वे राक्षस, जिन्होंने हमारे पूर्वजों को ऐसी भयावह स्थिति में धकेला—
वे आज भी हमारे बीच मौजूद हैं।
और उनका स्वभाव आज भी वैसा ही है।

जब कोई मृत्यु को आपकी छाया से बेहतर विकल्प समझ ले—तो सोचिए आप हैं ही क्या?

जौहर भारतीय इतिहास में महिलाओं के अदम्य साहस, त्याग और सम्मान के प्रति उनकी अटूट प्रतिबद्धता का एक मार्मिक उदाहरण है, जिसे वे शत्रु के क्रूर इरादों से बचने के लिए अपनाती थीं। 

भारत के वामपंथी इतिहासकार जौहर को राजपूतों की हार का परिणाम बताते हुए नकारात्मक चित्रण करते हैं, इसे महिलाओं के आत्मसमर्पण के बजाय स्वेच्छा से चुनी गई मृत्यु के रूप में प्रस्तुत करने से बचते हैं। वे इसे अपमानजनक मानते हुए तर्क देते हैं कि महिलाओं को गुलाम बनकर जीना चाहिए था, 

वामपंथी इतिहास लेखन में हिंदू परंपराओं को कमतर दिखाने और आक्रमणकारियों के कृत्यों को नरमी से पेश करना मुख्य उद्देश्य रहा है।

वामपंथी इतिहासकारों पर आरोप है कि वे जौहर को दबाते हैं क्योंकि यह जिहादी आक्रमणों की क्रूरता को उजागर करता है, जो उनकी तुष्टिकरण वाली ऐतिहासिक व्याख्या से टकराता है। जौहर को झूठों के बोझ तले दबाकर सामाजिक क्रांति के इस प्रतीक को भुला दिया जाता है, जिससे आधुनिक पीढ़ियां अपनी गौरवशाली विरासत से अनभिज्ञ रह जाती हैं।

जौहर ने पुरुषों को और कठोर युद्ध के लिए प्रेरित किया, क्योंकि महिलाओं का बलिदान आक्रमणकारियों को खाली जीत देता था। वामपंथी दृष्टिकोण इसे कमजोरी के रूप में चित्रित कर हिंदू समाज के प्रतिरोध को कम किया जा सकता है, यदि आज के समय में इसे पढ़ाया जाएगा तो हिन्दू एकीकरण और जागृति होगी जो कि वामपंथियों के एजेंडे में नहीं आता है।

भारत में वामपंथी या मार्क्सवादी इतिहासकारों की प्रमुख सूची में रोमिला थापर, इरफान हबीब, आर.एस. शर्मा और डी.डी. कोसांबी शामिल हैं, जिन्हें अक्सर जौहर जैसी परंपराओं पर नकारात्मक या कमतर दृष्टिकोण अपनाया है।

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