Sunday, 14 December 2025

गायत्री जप के नियम

🌹गायत्रीजप के नियम- वेदादिशास्त्रों ने गायत्री के विविध पक्षों पर प्रचुर विचार किया है। यहाँ विचारणीय विषय है कि जपकाल में गायत्री के तीनों पादों का पृथक् पृथक् उच्चारण करना चाहिए या एक साथ- यानी गायत्री छिन्नपादा या अच्छिन्नपादा हो? 

🌹समाधान- श्रीमद्देवीभागवत में लिखा है
"अच्छिन्नपादा गायत्री ब्रह्महत्यां प्रयच्छति। छिन्नपादा तु गायत्री ब्रह्महत्यां विनाशयेत्।।" अच्छिन्नपादा गायत्री ब्रह्महत्या का फल देती है और पृथक्पादा गायत्री ब्रह्महत्याजन्य पाप को भी नष्ट कर देती है। 

🌹पुन: सन्ध्याभाष्यसमुच्चय में एक वचन आया है कि "जपकाले तु गायत्रीमुच्चरन् जपमाचरेत्। सन्ध्यासु भिन्नपादा चेत्स जपो निष्फलो भवेत्।।" जपकाल में उपांशूच्चारण पूर्वक गायत्री का जप करना चाहिए (इसका विशेष विवेचन कभी अलग से किया जायगा) और तीनों या चारों सन्ध्याओं में भिन्नपादा गायत्री का जप निष्फल हो जाता है। एतादृश द्वैध स्थलों में विशेष विचार की आवश्यकता होती है। 

🌹धर्मशास्त्रीय मन्थन से यह निष्कर्ष सामने आता है कि गायत्र्युपासक विभिन्नप्रकारेण शास्त्रोक्त दृष्टादृष्ट फल की सिद्धि के लिए आनुष्ठानिक प्रयोग करते समय विच्छिन्नपादा गायत्री का जप करे और वेदोक्त मार्ग से अवश्यकर्तव्य प्रात: आदि सन्ध्याओं में अविच्छिन्नपादा गायत्री का जप करे। यथा- "गायत्रीविच्छिन्नपादजपपरं वचनं गायत्रीकल्पाद्यागमशास्त्रानुरोधेन तच्छास्त्रोक्तदृष्टादृष्टफलसिद्धये प्रयोगं कुर्वतां गायत्रीमन्त्रोपासकानां विच्छिन्नपादा जप्तव्येति बोधयति, न तु वेदोक्तमार्गेण सन्ध्यासु गायत्रीं जपतां तथेति।" उपनयन संस्कार में वटु के गायत्र्युपदेश के समय पहले तीनों पाद अलग करके, पुन: गायत्री के दो विभाग करके एवं तीसरी बार में अविभक्तपादा सम्पूर्ण गायत्री प्रदान करने का विधान है। 

🌹शङ्का होती है कि इसी भिन्नाभिन्न पाद क्रम से गायत्री का नित्य जप क्यों नहीं किया जाता है? 

🌹एक समाधानपक्ष यह भी है कि यहाँ वटु के एकबार में सम्पूर्ण गायत्रीग्रहण की असमर्थता से ही सूत्रकारों ने ऐसा निर्देश दिया है, न कि नित्यनियमार्थ। यदि विभक्तपादा गायत्री के उपदेश को ही नित्य मान लिया जाय तो तीसरी और अन्तिम बार का निर्णीत अविभक्तपाद गायत्र्युपदेश व्यर्थ ही सिद्ध हो जायगा। 

🌹आपस्तम्बगृह्यसूत्र और उनके भाष्यकारों ने भी विवरण दिया है, यथा- "तस्मै कुमाराय ग्रहणार्थं तत्सवितुर्वरेण्यमित्येतामृचमाचार्योऽन्वाहेति। अन्यथा व्याहृतीर्विहृता: पादादिष्वन्तेषु वा तथाऽर्द्धर्चयोरुत्तमां कृत्स्नायामित्यादिकमपि तत्कालविहितं प्रसक्तं स्यादविशेषात्। तस्माद्ग्रहणार्थमेवोपनयनकाले तथोपदिष्टं न नियमार्थम्। अन्यथा तत: सर्वामिति सकलगायत्र्युपदेशो न स्यात्। तस्मादविच्छिन्नपादा सर्वा गायत्री जप्तव्येति सिद्धम्।" 

🌹श्रीमद्देवीभागवत के जिस प्रकरण का उपर्युक्त श्लोक है, वहाँ भी गायत्र्यनुष्ठान के दृष्टादृष्ट विभिन्न प्रयोग ही बताये गये हैं; जिनमें हवनादि के विधान भी द्रष्टव्य हैं। शास्त्रीय ऊहापोह से एतत्काल यही सिद्ध होता है कि प्रात: आदि सन्ध्याओं में अविभक्तपादा और तदितर आनुष्ठानिक प्रयोगों में विभक्तपादा गायत्री का जप करना चाहिए। धर्मशास्त्र में उपलब्ध द्वैध वाक्यों की सङ्गति भी इसी विचार से हो सकती है। पिङ्गलच्छन्द आदि के अनुसार भिन्नपाद के लिए 'पाद-यति' का विधान भी विचिन्तनीय हो सकता है। पुन: अधिकारी विद्वान् और विशेष चिन्तन करें...

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