🌺श्रीमन्! लिखा तो था परन्तु एकपक्षीय विचार की अपेक्षा रखने के कारण आपने देखा नहीं। उभय पक्षों में प्रमाणवचनों की कमी नहीं है और बलि के भी विविध रूप हैं। निष्कर्षत: सिद्ध होता है "यदन्न: पुरुषो लोके तदन्नास्तस्य देवता:" व्यक्ति में जिस अन्न को खाने की प्रवृत्ति होती है, उसके देवता-पितर भी वही खाते हैं। "वयं यदन्ना: पितरस्तदन्ना:" का भी यही भाव है। अन्न का तात्पर्य केवल "सिद्धमन्नम्" ओदन ही नहीं होता; "पचाम्यन्नं चतुर्विधम्" भाष्य के अनुसार "यदद्यते भक्ष्यते सर्वप्राणिभिरिति अन्नम्" यानी भक्ष्य, भोज्य, लेह्य, चोष्य के रूप में प्राणिमात्र का आहारद्रव्य अन्न ही कहलाता है। उपनिषदों के #सप्तान्नसृष्टि प्रकरण में जल, दुग्ध, वायु, आमिषादि को भी #अन्न ही कहा गया है। जिसे जो अन्न प्रिय हो वह अपने देवता को वही समर्पित कर उसका ग्रहण करे। स्वतन्त्र प्रवृत्ति का परिशमन ही स्वेष्टपूजाङ्ग बलि का प्रयोजन है। "निवृत्तिस्तु महाफला" मनुस्मृति में भी अनुपाकृत यानी यज्ञभागभिन्न वृथा मांस की ही निवृत्ति इष्ट है, न कि क्रत्ववशिष्टपल की। धर्मशास्त्रों में प्रोक्षिताभ्युक्षित आमिष को #हविष्यान्न ही कहा गया है। इसीलिए देवपितृयज्ञावशिष्ट मांसाशन की आज्ञा देने में शास्त्र किञ्चिदपि संकोच नहीं करते हुए कहते हैं कि "देवपितृ्न्समभ्यर्च्य खादन्मांसं न दोषभाक्" देव-पितरों के समभ्यर्चनशेष हविष्यामिष का ग्रहण करने में दोष नहीं; अपितु ग्रहण न करने वालों को ही दोषी कहा है। अत: जिनकी मांसाशन में प्रवृत्ति है वे स्वतन्त्र उच्छृङ्लता का परित्याग कर क्रत्वङ्ग आमिष को ही ग्रहण करे और जो मांसाशन में प्रवृत्त नहीं हैं वे बलि में अन्य प्रतिनिधि द्रव्यों का प्रयोग करे। पुन: जो मांसाशन नहीं करते वे वैष्णव और जो करते वे अवैष्णव- शास्त्रज्ञों के लिए ऐसी कोई बात नहीं। धर्म में विकृति तब फैलती है जब अमुकामुक विषयों से सर्वथानभिज्ञ व्यक्ति सर्वोच्च न्यायालय के सबसे बड़े न्यायाधीश बन जाते हैं। वस्तुत: किसी एक पक्ष पर किसी का उछलना-कूदना सही नहीं। आमिषाशी महानुभावों का विशेष कर्तव्य है कि वे श्रौतक्रतुओं को भी बचाने का विशेष संघर्ष करें। जय शिव..
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