किम् स्वर्गस्य प्रयोजनम्?
दाम्पत्यं प्रतिकूलम् चेत्
नरकं किम्? गृहमेव तत्॥
दाम्पत्य यदि अनुकूल है तो फिर स्वर्ग की आवश्यकता ही क्या है? तथा दाम्पत्य यदि प्रतिकूल है तो नरक और क्या है जब घर ही नरक है?
आज हमारी विवाह वर्षगांठ है। मेरे गृहस्थ जीवन को उत्सव स्वरूप देने वाली आरती जी को हृदय से ढेरों बधाई, शुभकामनायें, अनेक धन्यवाद कि इस भवाटवी में सबसे पवित्र सम्बन्ध, दाम्पत्य सम्बन्ध निर्वहन के लिये हमारे माता पिता ने इष्ट कुलदैवत की प्रेरणा से आपका चयन मेरे लिये किया। मैं बार बार ये कहता रहा हूँ कि, सांसारिक सम्बन्धों में सबसे पवित्र सम्बन्ध है दाम्पत्य सम्बन्ध। दाम्पत्य मधुर हो तो भक्ति, ज्ञान, सत्कर्म, श्रद्धा, विश्वास, समर्पण, आध्यात्म के पुष्प खिलते हैं। तब समर्पण और शरणागति का गौरीशंकर शिखर बनता है गृहस्थ जीवन।
~मनस्य एकं, ~चित्तस्य एकं,~ हृदयस्य एकं से लेकर ~सुमंत्रिते, ~सुविचारिते, ~सुचिन्त्यते भाव ही गृहस्थी को पवित्र करता है। तब जीवन में अपनी पूर्णता को लेकर शिवत्व उतरता है।
गुरुदेव एवं श्रीलक्ष्मीनृसिंह की कृपा बनी रहे हम पर।
"द्यौरहं पृथिवीत्वम्, रेतोऽहं रेतोभृत्त्वम्, मनोऽहमस्मि वाक्त्वम्, सामाहमस्मि ऋकृत्वम्, सा मां अनुव्रता भव"।।
मैं आकाश हूँ और तुम पृथ्वी हों। मैं ऊर्जा देता हूँ और तुम ऊर्जा लो। मैं मन हूँ और तुम शब्द हो। मैं संगीत हूँ और तुम गीत हो। तुम और मैं एक दूसरे का पालन करें।
"ॐ गृभ्णामि ते सौभगत्वाय हस्तं मया पत्या जरदष्टिर्यथाऽऽसः । भगोऽअर्य्यमा सविता पुरन्धिर्मह्यं त्वा दुर्गार्हपत्याय देवाः । अमोऽह- मस्मि सा त्वं सा त्वमस्यमोऽअहम् । सामाहमस्मि ऋक् त्वं द्यौरहं पृथिवी त्वम् । तावेहि विवाहवहै सह रेतो दधावहै । प्रजां प्रजनयावहै पुत्रान् विन्द्यावहै बहून् । ते सन्तु जरदष्टयः सम्प्रियौ रोचिष्णू सुमन- स्यमानौ । पश्येम शरदः शतं जीवेम शरदः शतम् शृणुयाम शरदः शतमिति"।
पुनः वर्षगांठ की अनन्ताशेष मंगलकामनाएं प्रिय❤️❤️❤️
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