Friday, 19 December 2025

मुसलमान और बर्बरता

#भारतविमर्श 
जंजीरों में कैद करके ज़ैनब को 750 किमी दूर कुफा (इराक) से दमास्कस (सीरिया) ले जाया गया।

ये लम्बी यात्रा जंजीरों में कैद बच्चों और महिलाओं पर बहुत भारी पड़ी और कई ने सर्दियों में तड़पकर दम तोड़ दिया। दमास्कस में पहुँचने के बाद उन्हें 72 घंटों तक बाज़ार के चौराहे पर खड़ा रखा गया।

उस समय जंग जीतने वाली फौज हारने वाली फौज के लोगों का कटा हुआ सिर साथ लेकर जाती थी और अपनी जीत का जश्न मनाती थी। इस पूरे सफर में जैनब के साथ उसके भाई हुसैन और अब्बास का कटा हुए सिर साथ लाया गया था।

बाद में यजीद से ज़ैनब ने माँग की थी कि उन्हें शहीदों के सिर लौटा दिए जाएं और उन्हें एक घर दिया जाए जहाँ वो मातम मना सकें।।मोहम्मद के गुजर जाने के तीन महीने में ही उसकी बेटी फातिमा की घर में घुसकर निर्मम हत्या कर दी गई थी।

उसके दामाद अली को रमजान में नमाज पढ़ते हुए मारा गया। बड़े नवासे को जहर दिया गया और छोटे नवासे को कर्बला के मैदान में तीन दिन तक भूख और प्यास से तड़पाने के बाद कत्ल कर दिया गया।

जैनब मोहम्मद की नवासी थी जो जंजीरों में कैद नए खलीफा यजीद के सामने खड़ी थी। कमाल की बात ये थी जब ये सब हो रहा था उस समय ना अमेरिका बना था, ना इजरायल था, ना हथियार बेचने वाली कम्पनियाँ थीं और जो ये सब कर रहे थे वो भी कोई गैर नहीं थे।

ये जौहर करती औरतें, तबाह होते विजननगर और देवगिरी, लाशों की बेकद्री, कटे हुए सिरों के पिरामिड... ये सब तो भारत में बाद में आया। इस मानसिकता का सबसे पहला पीड़ित मोहम्मद का परिवार ही बना। उधर कर्बला के मैदान में 70 का सामना हजारों से था, इधर चमकौर के युद्ध में 40 का 10 हजार से।

उधर मोहम्मद का परिवार था, इधर गुरू गोविंद सिंह का। उधर हुसैन का कटा सिर उनकी चार साल की बेटी को खाने की थाल में सजा कर दिया गया, इधर दारा का कटा सिर शाहजहां को खाने की थाल में दिया गया। उधर जैनब यजीद से अपने भाईयों का कटा हुआ सिर माँग रही थी ताकि उनका मातम मनाया जा सके, इधर सोनीपत का कुशाल सिंह दहिया गुरू तेगबहादुर के शीश को ससम्मान वापस आनंदपुर साहिब भेजने के लिए अपना शीश काटकर मुगल सेना को सौंप रहे थे।

उधर हुसैन की छोटी बेटी को तड़पाया गया, इधर गुरू गोविंद सिंह के छोटे बच्चों को जिन्दा दीवार में चुनवा दिया गया। उधर जैनब को कुफा (इराक) से दमास्कस ले जाया गया, इधर बंदा वीर बैरागी को जोकर बनाकर हाथी के पीछे बंधे पिंजरे में कैद करके जुलूस की शक़्ल में लाहौर से दिल्ली लाया गया, जहाँ उनके मुँह में उनके तीन साल के बच्चे के दिल का माँस ठूँसा गया। उधर कर्बला में लाशों की बेकद्री की गई, इधर गुरू गोविंद सिंह के बच्चों को दाह संस्कार के लिए जमीन सोने के सिक्के लगाकर बेची गई। जो जहालत 7वीं शताब्दी में अरब में थी…

वही 17वी शताब्दी में भारत में भी साफ दिख रही थी। फिर भी यजीद तो शैतान था और औरंगजेब जिन्दा पीर। IMKB

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