लेकिन यह नही बताया कि कौन नही घुसने दे रहा था।
और क्यों नही घुसने दे रहा था।
लोथियन समिति की रिपोर्ट पढिये।
इस रेगुलशन को बनाया गया था हिन्दुओ से पूरी मन्दिर में दर्शन करने के लिए टैक्स वसूलने के लिए।
जो जितना टैक्स देने की आर्थिक क्षमता रखता था उसको उस श्रेणी की सुविधा लेने की अनुमति देते थे वे।
2 रुपये से लेकर 10 रुपये टैक्स वसूली होती थी।
जो टैक्स नही दे सकता था, उसे घुसने नही देते थे वे। पुजारी नही, अंग्रेज दस्यु, जिनको दलित छींटक अपना बाप समझते हैं।
यह रेगुलशन #Temple_Endowment_act नामक उस कानून की पृष्ठभूमि बनाती है जिसे नग्रेजो ने बनाया।
और स्वत्नत्रता के बाद नेहरू ने उसे जारी रखा, और आज भी वह जारी है - मंदिर की सम्पत्तिओं और उस पर चढ़ावे पर सरकारी कब्जा।
लेकिन मस्जिद और चर्च के लिए ऐसा कोई कानून न उन्होंने बनाया, न इन्होंने।
आज भी मंदिरों पर सरकार का कब्जा है।
क्यों है?
क्योंकि आपने कभी सवाल नही उठाया।
सवाल उठाइये।
क्योंकि सरकार का चरित्र एक ही जैसा होता है।
सरकार चलाते हैं बाबू।
नेता जब तक उनको बम्बू न करे वह कोई कानून बदलने नहीं देंगे।
इस पोस्ट से एक और महत्वपूर्ण प्रश्न उठाना चाहता हूँ।
"कोई बता सकता है कि 10 रुपये का जो मूल्य 1804 में था, उसका आज कितना मूल्य होगा?
1807 में francis hamilton buchnan लिखता है कि एक रुपये का मूल्य दो पौण्ड था।
1901 में दादा भाई नौरोजी लिखते है कि एक रुपये का मूल्य सोने के एक सिक्के के बराबर था।
उस समय दर्शनार्थियों से 2 रुपये से 10 रुपए के बीच टैक्स वसूला जाता था।
1804 जनवरी से अप्रैल के बीच 46,000 दर्शनार्थी गए थे जिनमें से लगभग 20,000 लोगों से टैक्स वसूला गया था।
यह दर्शनार्थी कोई राजा महाराजा नहीं थे, हर कुम्भ में आने वाले दर्शनार्थियों जैसे ही थे।
लेकिन 1800 तक भारत विश्व की 20%, जीडीपी का निर्माता था।
1900 आते आते मात्र 2% जीडीपी का निर्माता बचा।
लाखो अछूत 1900 के आस पास पैदा हुए।"
इस पोस्ट के अनेक विंदु हैं।
आप जिन पर भी प्रकाश डाल सकते हैं, डालिये।
यह papers related to east india affairs से उद्धरित है
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