सही इतिहासलेखन :
आसुरी साम्राज्यवाद और धार्मिक जनपद-परम्परा
कंस से जरासन्ध, अजातशत्रु, अशोक, घटोत्कच और समुद्रगुप्त तक मानव-संस्कृति के अवनयन की कथा
आधुनिक इतिहास-लेखन ने सभ्यता को साम्राज्य, राज्य को केन्द्रीय सत्ता, उन्नति को विजय और संस्कृति को विशाल भवनों व सेनाओं से मापा। जिसने अधिक प्रदेश जीते, जनों को करदाता बनाया, नगर ध्वस्त किये और शिलालेखों में अपना यश लिखवाया—वही “महान्” कहलाया। इसके विपरीत स्थानीय स्वशासन, सभा, समिति, गण, संघ, जनपद, कुल-परम्परा, ग्राम-संस्था और धर्माधिष्ठित राजमर्यादा बचाने वाले समाज “जनजातीय”, “अविकसित” अथवा “विखण्डित” कहे गये।
यह दृष्टि स्वयं तटस्थ नहीं है। यह आसुरी साम्राज्यवाद की दृष्टि है।
असुर कोई जाति, रक्त, वर्ण, देश या मानव-प्रजाति नहीं; वह ऐसी सत्ता-वृत्ति है जो स्वयं को धर्म से ऊपर रखकर जनपदों और स्वशासी संस्थाओं को अधीन करती, स्वेच्छा को आज्ञापालन, प्रजा को करदाता और धरती को राजकीय सम्पत्ति बनाती है। धार्मिक व्यवस्था में राजा भूमि-प्रजा का स्वामी नहीं, धर्म का संरक्षक है; सभा, समिति, कुल, ग्राम, जनपद, आचार, परम्परा और लोकमत राज्य के वास्तविक आधार हैं।
यही भारतीय इतिहास की सबसे महत्त्वपूर्ण धारा है, जिसे साम्राज्यवादी इतिहासकारों ने लगभग मिटा दिया।
असुर जाति नहीं, साम्राज्यवादी मनोवृत्ति है
यूरोपीय जातिवादी इतिहासकारों ने प्राचीन भारतीय ग्रन्थों के प्रत्येक संघर्ष को जातीय संघर्ष बनाने का प्रयास किया। देव और असुर को दो जातियाँ मान लिया गया। आर्य और अनार्य को दो रक्त-समूह बना दिया गया। राक्षस को किसी वनवासी अथवा कथित “आदिम जाति” का नाम समझ लिया गया।
किन्तु भारतीय परम्परा स्वयं इस भ्रान्ति को अस्वीकार करती है।
कंस असुर था, परन्तु वह भगवान् कृष्ण की माता देवकी का भ्राता था। एक ही कुल में देवकी और कंस दोनों सम्भव हैं। अतः असुरत्व रक्त से नहीं, वृत्ति से निर्धारित होता है।
रावण ब्राह्मण-पुत्र, वेदविद् और शिवोपासक था, किन्तु दर्प, अधिग्रहण और परस्त्री-हरण ने उसे राक्षस बनाया; उसी कुल का विभीषण धार्मिक रहा। महिषासुर भी किसी जाति का नहीं, धरती, नारी, शक्ति और समाज को अपनी सम्पत्ति मानने वाली सत्ता का प्रतीक है।
अतः —
असुरत्व का अर्थ है धर्म से विमुख, विस्तारवादी, केन्द्रीकृत और दमनकारी सत्ता।
और —
देवत्व अथवा धार्मिकता का अर्थ है मर्यादा, सत्य, आत्मसंयम, लोकहित तथा धर्म के अधीन शक्ति।
इसी कसौटी पर प्राचीन भारत के अनेक प्रसिद्ध सम्राटों को पुनः देखना होगा।
कंस और जरासन्ध : जनपदों पर साम्राज्य का प्रारम्भिक दबाव
कंस केवल एक क्रूर व्यक्ति नहीं था। वह एक राजनीतिक प्रकार था। उसने अपने ही कुल की स्वाभाविक मर्यादा को तोड़ा, पिता को बन्दी बनाया, राज्य पर अधिकार किया और भय के द्वारा शासन स्थापित किया।
उसके पीछे जरासन्ध का साम्राज्यवादी बल था।
जरासन्ध अनेक राजाओं और जनपदों को पराजित कर उन्हें कारागार में रखता था। उसका उद्देश्य केवल युद्ध-विजय नहीं था; वह स्वतंत्र राजसत्ताओं को समाप्त कर एक विशाल केन्द्रीय साम्राज्य बनाना चाहता था। कृष्ण और पाण्डवों का उसके विरुद्ध संघर्ष केवल दो राजवंशों की प्रतिद्वन्द्विता नहीं था। वह जनपदीय स्वायत्तता और साम्राज्यवादी केन्द्रीकरण के मध्य संघर्ष था।
कृष्ण ने स्वयं विशाल साम्राज्य स्थापित नहीं किया। उन्होंने अनेक राजाओं को मुक्त कराया। हस्तिनापुर, इन्द्रप्रस्थ, द्वारका, पाञ्चाल, विदर्भ, मिथिला, काशी, कोसल और अन्य जनपद अपनी-अपनी सत्ता और धर्म-व्यवस्था के साथ बने रहे।
यही धार्मिक राजनीति है — सभी को एक ही कर-संग्रह मशीन में बदल देना नहीं, बल्कि विभिन्न जनपदों के धर्मसंगत सहअस्तित्व की रक्षा करना।
रामराज्य का अर्थ निरंकुश राजतन्त्र नहीं
रामराज्य को आधुनिक लोग प्रायः एक आदर्श राजतन्त्र मान लेते हैं। किन्तु रामराज्य का आधार राजा की निरंकुश इच्छा नहीं था।
राम धर्म के अधीन थे; राजधर्म, कुलधर्म, पितृवचन, जनमत और लोकापवाद उनके निजी सुख से ऊपर थे। रामराज्य में राजा लोक का भक्षक नहीं पालक, भूमि का निजी स्वामी नहीं और प्रजा का मालिक नहीं—धर्म-संरक्षक है।
अतः धार्मिक व्यवस्था का प्रश्न यह नहीं कि राजा है अथवा नहीं। वास्तविक प्रश्न है —
राजा धर्म के अधीन है, अथवा धर्म राजा के अधीन?
जिस क्षण सत्ता स्वयं धर्म का निर्माता बनने लगती है, असुरत्व आरम्भ हो जाता है।
जनपद, गण, संघ, सभा और समिति : वास्तविक प्रजातन्त्र
आधुनिक प्रजातन्त्र को केवल मतपत्र, सार्वभौम वयस्क मताधिकार और संख्या-बहुमत से परिभाषित किया जाता है। यह अत्यन्त संकीर्ण परिभाषा है।
बहुमत सत्य का प्रमाण नहीं। भ्रमित, प्रचारित, लोभी, भयभीत अथवा अशिक्षित बहुमत अधर्म चुन सकता है। जब शिक्षा विवेक के स्थान पर परीक्षा-यन्त्र, समाचार-माध्यम धनिकों के अधीन और राजनीति जाति, भय, लोभ व असत्य पर टिकी हो, तब मतों की संख्या धर्म का प्रमाण नहीं।
प्राचीन भारतीय जनपद-व्यवस्था की कसौटी भिन्न थी।
वैशाली के वज्जि-संघ के सात गुणों का उल्लेख बुद्ध ने वस्सकार अथवा वर्षकार के समक्ष किया था। उनका सार था —
लोग बारम्बार और पर्याप्त संख्या में सभा करें।
वे एकमत अथवा सामंजस्य से बैठें, कार्य करें और उठें।
वे स्थापित विधान को मनमाने ढंग से न तोड़ें।
वे वृद्धों और अनुभवी जनों का सम्मान करें।
स्त्रियों और कन्याओं का बलपूर्वक अपहरण अथवा दमन न हो।
प्राचीन पवित्र स्थलों और संस्थाओं की रक्षा हो।
तपस्वियों और धर्ममार्गियों को सुरक्षा तथा सम्मान मिले।
यह प्रजातन्त्र केवल मतगणना नहीं है। यह संवैधानिक आचार, परम्परा, सामंजस्य, स्त्री-सम्मान, वृद्ध-मान, धर्म-संरक्षण और नियमित सभा पर आधारित व्यवस्था है।
ऐसी व्यवस्था में मनुष्य केवल मतदाता नहीं होता; वह उत्तरदायी सभासद होता है।
अजातशत्रु : ऐतिहासिक युग में जनपदीय स्वशासन पर महान् आक्रमण
भारतीय ऐतिहासिक युग में जनपद-परम्परा पर सबसे निर्णायक प्रारम्भिक आक्रमण अजातशत्रु ने किया।
बिम्बिसार के समय मगध की शक्ति बढ़ी, किन्तु अजातशत्रु जानता था कि नियमित सभा, परम्परा और एकता वाले वज्जियों को केवल सैन्यबल से हराना कठिन है; अतः पहले भीतर से उनकी एकता तोड़ी गयी।
यह साम्राज्यवाद की स्थायी नीति है —
पहले समाज की सभा तोड़ो, फिर उसकी स्मृति;
पहले कुल और समुदाय में फूट डालो, फिर उसकी भूमि पर अधिकार करो।
अजातशत्रु की विजय केवल एक राज्य की विजय नहीं थी। वह भारतीय इतिहास में गण-संघीय स्वशासन पर राजकीय केन्द्रीकरण की विजय थी।
मगध के विस्तार को आधुनिक इतिहासकार “राजनीतिक एकीकरण” कहते हैं। किन्तु जिस जनपद ने अपनी सभा, अपना विधान, अपनी भूमि और अपनी परम्परा खो दी, उसके लिए वह एकीकरण नहीं, पराधीनता थी।
घनानन्द, चाणक्य और चन्द्रगुप्त मौर्य : साम्राज्यवाद नहीं, धर्म और राष्ट्र की रक्षा
नन्द-सत्ता के अन्तिम चरण में मगध की राजशक्ति अत्यन्त विशाल हो चुकी थी, किन्तु विशाल सेना और अपार कोष अपने-आप में धार्मिक राज्य के प्रमाण नहीं होते। जब राजसत्ता धर्म, जनपदों और राष्ट्रहित से विमुख होकर केवल धन-संचय, भय और निरंकुश नियन्त्रण का साधन बन जाती है, तब उसका विरोध केवल राजवंश-परिवर्तन नहीं, धर्मरक्षा का कार्य बन जाता है।
चाणक्य और चन्द्रगुप्त मौर्य का अभियान इसी दृष्टि से समझना चाहिए।
चन्द्रगुप्त को अजातशत्रु, अशोक या समुद्रगुप्त की साम्राज्यवादी श्रेणी में रखना अनुचित है। उसने जनपद नष्ट करने के लिए युद्ध नहीं किये; उसका कार्य अधार्मिक नन्द-सत्ता का अन्त, यवन प्रभुत्व का उन्मूलन, भारतराष्ट्र की रक्षा, विखण्डित शक्ति का धर्मसम्मत पुनर्संयोजन और राज्यशक्ति को राष्ट्ररक्षा का साधन बनाना था।
सिकन्दर के बाद उत्तर-पश्चिम में चन्द्रगुप्त का विस्तार स्वतंत्र जनपदों को दास बनाने नहीं, विदेशी सैन्य-उपनिवेशों और शक्ति-शून्य को समाप्त करने का राष्ट्ररक्षात्मक प्रयत्न था।
यह भेद मूलभूत है —
राष्ट्र की रक्षा के लिए शक्तियों का संघटन साम्राज्यवाद नहीं है।
साम्राज्यवाद वहाँ आरम्भ होता है जहाँ कोई सत्ता स्वतंत्र जनपदों को उनके धर्म, सभा, परम्परा और स्वशासन से वंचित करके अपने कर और आज्ञा के अधीन कर देती है। चन्द्रगुप्त के विषय में ऐसा कोई प्रमाण नहीं कि उसने भारतीय जनपदों की सभाएँ नष्ट कीं अथवा उनकी स्वायत्त संस्थाओं का विध्वंस किया।
कौटिल्य का अर्थशास्त्र : अधर्म का शास्त्र नहीं
कौटिल्य के अर्थशास्त्र को केवल गुप्तचर, दण्डनीति, युद्ध, कर और सत्ता-कौशल की पुस्तक कहना एकांगी पठन है।
अर्थशास्त्र राज्य को स्वेच्छाचारी सत्ता नहीं मानता। राजा का दायित्व है —
प्रजा की रक्षा,
न्याय,
कृषि और व्यापार की सुरक्षा,
दुष्टों का निग्रह,
दुर्बलों का संरक्षण,
राजकोष का उत्तरदायी उपयोग,
सीमाओं की रक्षा,
तथा धर्मसम्मत व्यवस्था की स्थापना।
राजा राज्य का उपभोक्ता-स्वामी नहीं, राजधर्म का अधिकारी है; उसकी समृद्धि प्रजा पर निर्भर है। कौटिल्य ने राज्यकला को धर्मविहीन शक्ति नहीं, नियम, दायित्व और राष्ट्रहित के अधीन शक्ति बनाया।
अर्थशास्त्र जानता है कि शत्रु, षड्यन्त्र, छल, विदेशी आक्रमण और विद्रोह होते हैं; अतः धार्मिक राज्य को बुद्धि, गुप्तचर, सेना, कोष और नीति चाहिए। ये धर्म, प्रजा और राष्ट्र की रक्षा के साधन हैं, लक्ष्य नहीं।
अतः चाणक्य की कूटनीति को आसुरी छल कहना भूल होगी। अधर्मी और आक्रमणकारी शक्ति के विरुद्ध प्रयुक्त रणनीति धर्मरक्षा का अंग हो सकती है।
चन्द्रगुप्त का संन्यास
आयु और राज्यकर्तव्य का काल पूर्ण होने पर चन्द्रगुप्त ने सत्ता से चिपकने के बजाय राज्य त्यागकर संन्यास लिया। आसुरी सत्ता मृत्यु तक अधिकार से चिपकती और राज्य को निजी सम्पत्ति मानती है; चन्द्रगुप्त के लिए सत्ता धर्मपालन का साधन थी, जीवन का परम लक्ष्य नहीं।
उसका संन्यास सिद्ध करता है कि राजत्व आश्रमधर्म से ऊपर नहीं, शक्ति त्याज्य है और मनुष्य का अन्तिम लक्ष्य साम्राज्य नहीं, आत्मसंयम व मोक्ष है।
इसलिए चन्द्रगुप्त मौर्य को अशोक की साम्राज्यवादी नीति का पूर्वरूप कहना ऐतिहासिक और दार्शनिक दोनों दृष्टियों से अनुचित है।
सही क्रम है—घनानन्द की अधार्मिक सत्ता; चाणक्य का धर्म-राष्ट्ररक्षा आयोजन; चन्द्रगुप्त द्वारा विदेशी-अधार्मिक शक्तियों का उन्मूलन और धर्मसम्मत राज्य-पुनर्गठन; अन्ततः राजत्याग और संन्यास।
इसके विपरीत अशोक ने उसी राज्यतन्त्र को त्रिकलिङ्ग जैसे स्वतंत्र महासंघ के विनाश और दक्षिण की ओर साम्राज्यवादी प्रसार के लिए प्रयुक्त किया।
मौर्य नाम से सभी शासकों को एक नैतिक श्रेणी में रखना अनुचित है; वंश एक, वृत्ति भिन्न हो सकती है।
चन्द्रगुप्त मौर्य राष्ट्ररक्षक था; अशोक साम्राज्य-विस्तारक।
चाणक्य ने शक्ति को धर्म के अधीन करना चाहा; अशोक ने धर्म की भाषा को साम्राज्य की प्रतिष्ठा के लिए प्रयुक्त किया।
जहाँ अशोक का शिलालेख मिला, वहाँ प्रत्यक्ष प्रशासन मान लिया गया। जहाँ धर्म-सन्देश पहुँचा, वहाँ राजनीतिक अधीनता मान ली गयी। जहाँ कोई उत्तरकालीन परम्परा मिली, वहाँ विजय मान ली गयी।
यह इतिहास नहीं, साम्राज्यवादी मानचित्र-निर्माण है।
त्रि-क-लिङ्ग : केवल एक छोटा कलिङ्ग राज्य नहीं
कलिङ्ग युद्ध को प्रायः एक छोटे तटीय राज्य के विरुद्ध अशोक की विजय के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। यह वर्णन मेगस्थनीज से प्राप्त सैन्य-संख्या तथा पूर्वी-दक्षिणी भूगोल — दोनों से मेल नहीं खाता।
मेगस्थनीज-परम्परा में जिन शक्तियों का उल्लेख मिलता है, उनमें —
कलिङ्ग के लगभग ६०००० पदाति, १००० अश्वारोही और ७०० हाथी,
मध्य-कलिङ्ग के लगभग ५०००० पदाति, ४००० अश्वारोही और ४०० हाथी,
आन्ध्र के लगभग १००००० पदाति, २००० अश्वारोही और १००० हाथी,
बताये गये हैं।
आन्ध्रों के अनेक ग्राम तथा तीस दुर्गयुक्त नगर भी वर्णित हैं।
यह कहना तर्कहीन है कि अशोक ने केवल ६१,००० सैनिकों वाले कलिङ्ग को हराया और उससे शक्तिशाली आन्ध्र ने बिना युद्ध आत्मसमर्पण कर दिया।
अधिक संगत निष्कर्ष यह है कि —
कलिङ्ग युद्ध वस्तुतः त्रि-कलिङ्ग महासंघ के विरुद्ध युद्ध था।
इस त्रि-कलिङ्ग शक्ति का कुल सैन्य-बल लगभग था —
२,१०,००० पदाति,
७,००० अश्वारोही,
२,१०० युद्धहस्ती।
अशोक का युद्ध छोटे तटीय राज्य से नहीं, पूर्वी-दक्षिणी भारत की महान् जनपदीय-संघीय शक्ति से था।
मोडोगलिङ्गे = मध्य-कलिङ्ग
यूनानी-रोमी लेखकों में आया “मोडोगलिङ्गे” अथवा उससे मिलता-जुलता रूप निरर्थक विदेशी नाम नहीं माना जाना चाहिए। उसका स्वाभाविक भारतीय रूप मध्य-कलिङ्ग है।
इस प्रकार भौगोलिक क्रम बनता है —
उत्तर अथवा मुख्य कलिङ्ग,
मध्य-कलिङ्ग,
दक्षिणी कलिङ्गीय क्षेत्र, जिसमें आन्ध्र-तेलङ्ग क्षेत्र सम्मिलित था।
तेलङ्ग, तेलङ्गाण, त्रिकलिङ्ग और तिलिङ्ग के सम्बन्ध प्राचीन महासंघ की वह स्मृति हो सकते हैं जिसे बाद की सीमाओं ने खण्डित किया।
त्रि-क-लिङ्ग का आध्यात्मिक अर्थ
त्रिकलिङ्ग का अर्थ केवल तीन भौगोलिक कलिङ्ग नहीं है।
इसे इस प्रकार भी समझा जा सकता है —
“त्रि + क + लिङ्ग”
ऋग्वेद के हिरण्यगर्भ सूक्त का मन्त्र —
“कस्मै देवाय हविषा विधेम”
मैक्समूलरवादी भाष्य ने इसे “हम किस देवता को हवि दें?” बनाकर ऋषि को अपने उपास्य से अनभिज्ञ दिखाया—यह अनर्थ है।
निरुक्त में क प्रजापति अथवा अव्यक्त ब्रह्म का नाम है; “कस्मै देवाय” अज्ञान नहीं, उस मूलतत्त्व का संकेत है जिससे देवशक्तियाँ अभिव्यक्त होती हैं।
देवनागरी-ब्राह्मी वर्णक्रम में —
१६ स्वर, १६ शक्तियों के प्रतीक हैं,
३३ व्यञ्जन, ३३ कोटि देवताओं के प्रतीक हैं,
और “क” प्रथम व्यञ्जन है — अव्यक्त से व्यक्त की प्रथम ध्वन्यात्मक अभिव्यक्ति।
अतः त्रि-क-लिङ्ग का गहन अर्थ है —
अव्यक्त “क” के तीन प्रधान लिङ्ग अथवा अभिव्यक्त चिह्न — ब्रह्मा, विष्णु और शिव।
इस प्रकार त्रिकलिङ्ग एक साथ —
पवित्र भूगोल,
त्रिस्तरीय राजनीतिक संघ,
तथा ब्रह्म के त्रिविध व्यक्त लिङ्गों का क्षेत्र
हो सकता है।
भारतीय भूगोल मात्र भूमि-मापन नहीं; देश, प्रदेश, मण्डल, नगर, ग्राम और क्षेत्र देवता, अक्षर, दिशा, शक्ति और धर्म से सम्बद्ध थे।
अशोक का त्रिकलिङ्ग-विनाश
अशोक के अभिलेख स्वयं कहते हैं कि कलिङ्ग-विजय में —
एक लाख मनुष्य मारे गये,
डेढ़ लाख निर्वासित अथवा बलपूर्वक ले जाये गये,
और उससे कई गुना बाद में मरे।
यदि कलिङ्ग की स्थायी सेना केवल लगभग ६१,००० थी, तो एक लाख प्रत्यक्ष मृतक और डेढ़ लाख निर्वासित कौन थे?
स्पष्ट है कि युद्ध केवल सैनिकों तक सीमित नहीं था।
नियमित सेना के बाद ग्राम, नगर, कुल, शिल्पी, विद्यार्थी, गृहस्थ और स्त्रियाँ जनपदीय रक्षा में उतरे होंगे; इतनी मृत्यु और निर्वासन तभी सम्भव है जब राजसेना ही नहीं, पूरे सामाजिक आधार को लक्ष्य बनाया गया हो।
त्रिकलिङ्ग राजा की हार से मिटने वाली राजमहल-केन्द्रित सत्ता नहीं, नगरों, दुर्गों, ग्रामों, कुलों, शिक्षाकेन्द्रों और स्थानीय सेनाओं का महासंघ था। उसे जीतने के लिए उसका सामाजिक शरीर तोड़ा गया।
क्या अशोक युद्ध के पश्चात् तुरन्त पश्चात्तापी हो गया?
लोकप्रिय कथा कि युद्धभूमि देखकर अशोक तत्काल अहिंसक और “बौद्ध” हो गया, ऐतिहासिक कालक्रम से मेल नहीं खाती।
कलिङ्ग युद्ध के बाद ही मौर्य शक्ति आन्ध्र-कर्नाटक में दक्षिणी शिलालेखों और प्रशासनिक उपस्थिति के रूप में दिखती है।
अतः वास्तविक क्रम अधिक सम्भवतः यह था —
त्रिकलिङ्ग के उत्तरी प्रवेशद्वार पर आक्रमण।
दीर्घ और व्यापक युद्ध।
जनसंख्या-वध और निर्वासन।
संघीय प्रतिरोध का विनाश।
आन्ध्र और कर्नाटक में मौर्य शक्ति का प्रवेश।
विजय के दो या अधिक वर्ष बाद “पश्चात्ताप” का शिलालेखीय प्रचार।
जब बाहर पश्चात्ताप का प्रचार हुआ, विजित प्रदेश में निर्वासन, दमन, पुनर्व्यवस्था और दक्षिणी विस्तार सम्भवतः चल रहे थे।
अशोक ने —
कलिङ्ग की स्वतन्त्रता वापस नहीं की,
निर्वासितों को लौटाया नहीं,
त्रिकलिङ्ग महासंघ को पुनः स्थापित नहीं किया,
विजय-प्रदेश का त्याग नहीं किया,
और स्वयं को पीड़ितों के न्याय के अधीन नहीं किया।
यह साम्राज्य-त्याग नहीं, विजय के बाद राजकीय आत्म-प्रचार हो सकता है।
अशोक “बौद्ध” नहीं हुआ
अशोक के विषय में दूसरा विशाल मिथक है कि वह कलिङ्ग युद्ध के बाद “बौद्ध धर्म” में परिवर्तित हो गया।
प्रथम बात — धम्म, धर्म का प्राकृत रूप है।
धम्म को “बौद्ध धर्म”, “राजकीय नैतिकता” या नया अशोकवादी मत मानना भाषिक-दर्शनिक त्रुटि है।
अशोक धम्म में माता-पिता, गुरु-वृद्ध और सेवकों के प्रति उचित व्यवहार, हिंसा में संयम, ब्राह्मण-श्रमण सत्कार और पन्थों के प्रति मर्यादा रखता है—ये धर्म के ही अंग हैं।
दूसरी बात — श्रमण का अर्थ बौद्ध नहीं है।
श्रमण श्रम, तप, संयम और साधना करने वाला है; वैदिक-अवैदिक योगी, तपस्वी, व्रती और वनचारी भी श्रमण कहलाते रहे।
तीसरी बात — संघ शब्द केवल बौद्धों का नहीं है।
संघ का अर्थ संगठित समूह, सभा, समुदाय या साधु-संघ है; दुर्वासा के सहस्रों शिष्यों से आधुनिक दशनामी अखाड़ों तक संन्यासी संघों में रहे हैं।
चौथी बात — अशोक ने किसी अभिलेख में यह घोषणा नहीं की —
“मैं बौद्ध हो गया।”
उसने न स्वयं को भिक्षु कहा, न गृहस्थ-जीवन या राजसत्ता छोड़ी, न पन्थ-परिवर्तन घोषित किया।
बुद्ध के समय “बौद्ध” आधुनिक धर्म-सदस्यता नहीं था; पूर्ण प्रवेश भिक्षु-संघ में प्रव्रज्या और गृहत्याग था। बाद के “उपासक” की पारिभाषिक व्यवस्था को पूर्वकालीन अभिलेख पर आरोपित कर अशोक को “गृहस्थ बौद्ध” सिद्ध करना उचित नहीं।
ब्राह्मण और श्रमण
अशोक के अभिलेख बार-बार “ब्राह्मण-श्रमण” का युग्म देते हैं।
ब्राह्मण का मूल अर्थ ब्रह्म को जानने वाला है। श्रमण का अर्थ तपश्चर्या और श्रम करने वाला साधक है। अशोक इन दोनों को धर्म के भीतर सम्मान देता है।
यदि अशोक ब्राह्मण-विरोधी पन्थान्तरित शासक था, तो सार्वजनिक धर्मादेशों में ब्राह्मणों को प्रथम सम्मान क्यों?
आधुनिक यूरोपीय अनुवादक “ब्राह्मण और श्रमण” को “ब्राह्मण और बौद्ध” बना देते हैं। यह अनुवाद नहीं, विचारधारात्मक परिवर्तन है।
लुम्बिनी और कर
अशोक लुम्बिनी गया, पर उसे पूर्ण राजस्व-मुक्त सार्वभौम तीर्थ नहीं बनाया; केवल सीमित कर-राहत दी। व्याख्या विवादित हो सकती है, पर बुद्ध-जन्मस्थल भी राजकीय राजस्व-व्यवस्था से बाहर नहीं हुआ।
यदि अशोक का राज्य वास्तव में तथाकथित “बौद्ध राज्य” बन गया होता, तो बुद्ध-जन्मभूमि के साथ व्यवहार कहीं अधिक मूलगामी होता।
अशोक “महान्” क्यों बनाया गया?
ब्रिटिश साम्राज्यवाद को ऐसा भारतीय आदर्श चाहिए था जो विशाल केन्द्रीय साम्राज्य बनाये, जनपद नष्ट करे, राजाज्ञा को धर्मोपदेश बनाये, विजित प्रदेश नियंत्रित करे और बाद में स्वयं को दयालु घोषित करे।
ऐसा शासक ब्रिटिश राज के लिए अत्यन्त उपयोगी ऐतिहासिक पूर्वज था।
इसलिए अशोक को “महान्” बनाया गया।
महिषासुर के बाद अशोक भी “महान्” — क्योंकि साम्राज्यवादी इतिहास में महानता की कसौटी धर्म नहीं, विस्तार है।
लाखों की मृत्यु, निर्वासन और जनपदीय विनाश गौण हुए; विजेता का पश्चात्ताप प्रधान बना। पीड़ितों का इतिहास मिटा, सम्राट की आत्मकथा इतिहास बनी।
घटोत्कच और गुप्त वंश
गुप्त वंश के प्रारम्भिक शासकों में “घटोत्कच” नाम अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है।
कोई परम्परागत हिन्दू परिवार यह नाम अनायास नहीं रखता; घटोत्कच महाभारत का राक्षस-वीर था। पर राक्षस पृथक जाति नहीं—जैसे असुर कंस कृष्ण का मामा था, राक्षस-परम्परा हिन्दू समाज से बाहर जैविक जाति नहीं।
घटोत्कच नाम किसी राक्षस-वंशीय स्मृति, गौरव अथवा राजनीतिक परम्परा का संकेत हो सकता है।
प्रारम्भिक गुप्त शासक सम्भवतः कुषाणोत्तर शक्ति-संरचना में सामन्त अथवा अधीनस्थ शासक थे। घटोत्कच के पुत्र ने लिच्छवि राजकुमारी कुमारदेवी से विवाह किया और स्वयं को चन्द्रगुप्त कहा।
यह साधारण विवाह नहीं, उदीयमान पितृवंश और प्राचीन वज्जि-विदेह-लिच्छवि परम्परा का राजनीतिक संयोजन था।
गुप्त स्वर्णमुद्राओं में कुमारदेवी और लिच्छवियों का गौरवपूर्ण उल्लेख इस सम्बन्ध की महत्ता बताता है।
“गुप्त” का अर्थ संरक्षित, गोपित या छिपा भी है; सम्भव है नये राजवंश ने पुरानी राक्षस-वंशीय या निम्न राजनीतिक स्थिति गोपित कर लिच्छवि वैधता से सत्ता स्थापित की हो।
यहाँ “राक्षस” जाति नहीं, पुरानी राजनीतिक और वंशीय स्मृति है।
समुद्रगुप्त : शेष जनपदों पर अन्तिम महान् प्रहार
अजातशत्रु ने जिस ऐतिहासिक प्रक्रिया का आरम्भ किया, समुद्रगुप्त ने उसे बहुत आगे बढ़ाया।
समुद्रगुप्त की प्रयाग-प्रशस्ति पराजित, उन्मूलित, अधीन, करदाता, आज्ञाकारी और पुनः स्थापित राजाओं की वीरगाथा है; उसे पीड़ित जनपदों की दृष्टि से भी पढ़ना चाहिए।
जहाँ-जहाँ प्राचीन गण, संघ, स्थानीय राजसत्ताएँ और जनपदीय संस्थाएँ बची थीं, समुद्रगुप्त की विजय-यात्राओं ने उन्हें राजकीय अधीनता में बाँधा। इस साम्राज्यवादी विजय को “स्वर्णयुग” का आरम्भ कहा गया।
प्रश्न है — स्वर्ण किसके लिए?
दरबार, कवि, अधिकारी, विजेता और स्वर्णमुद्रा-धारक वर्ग के लिए?
या ग्राम, जनपद, शिल्पी, स्थानीय सभा, स्वायत्त नगर और पराजित समुदायों के लिए?
दूसरे नगरीकरण का पतन
समुद्रगुप्त के साम्राज्यवादी विस्तार और उसके पश्चात् भारतीय दूसरे नगरीकरण का पतन एक ही व्यापक प्रक्रिया के अंग हो सकते हैं।
नगर केवल राजमहलों से नहीं बनते। उनके आधार होते हैं —
स्वायत्त शिल्प-संघ,
स्थानीय मुद्रा,
व्यापारी श्रेणियाँ,
नगरसभा,
ग्राम और नगर के मध्य विनिमय,
क्षेत्रीय व्यापार-पथ,
स्थानीय सिंचाई,
तथा उत्तरदायी सामुदायिक संस्थाएँ।
साम्राज्य के कर, राजाज्ञा और सामन्ती अधीनता में स्थानीय नगरों का स्वाभाविक जीवन क्षीण होता है।
रोमन साम्राज्य और पश्चिमी व्यापार के पतन ने प्रक्रिया तीव्र की, पर वह अकेला कारण नहीं; जनपदीय और नागर संस्थाओं की क्षति समाज को पहले ही दुर्बल कर चुकी थी।
लगभग ६०० ईस्वी के बाद अनेक उत्खनित स्थलों पर पक्की ईंटों के विशाल निर्माण घटे; पुरानी ईंटें पुनः लगीं, नगरीय स्तर सिकुड़े, स्थायी संरचनाएँ लुप्त हुईं।
इसे केवल “ग्रामीणकरण” कह देना पर्याप्त नहीं। यह सम्भवतः एक दीर्घ सांस्कृतिक अवनयन था —
जनपदों की मृत्यु, नगरों की निर्बलता और साम्राज्य के पश्चात् सामाजिक रिक्तता।
रोमन आसुरी अल्पतन्त्र और जर्मनिक जनपद
यूरोपीय इतिहास भी इसी आसुरी दृष्टि से विकृत किया गया।
रोम को सभ्यता का शिखर बताया गया। जर्मनिक समुदायों को असभ्य, वनवासी और बर्बर कहा गया।
रोमन गणराज्य वास्तविक लोकशासन नहीं, धनी कुलों, सीनेट, भू-स्वामियों, सैन्य सरदारों और दास-अर्थव्यवस्था का अल्पतन्त्र था; नागरिक मत देते थे, शक्ति कुलीनों के हाथ थी।
वही गणराज्य साम्राज्य बना; सम्राट, सेना, कर, उपनिवेश, दासता और प्रान्तीय शोषण रोमन “सभ्यता” की रीढ़ बने।
इसके विपरीत, जर्मनिक समुदायों में —
कुल और ग्राम-आधारित सभाएँ,
युद्ध और शान्ति पर सामूहिक विचार,
प्रथा-आधारित विधि,
सीमित राजसत्ता,
स्वतंत्र पुरुषों की सभा,
तथा स्थानीय न्याय-व्यवस्था
विद्यमान थी।
उनकी “थिंग” सभाएँ भारतीय सभा, गण और जनपद से तुलनीय और राजसत्ता पर वास्तविक सामुदायिक अंकुश थीं; आधुनिक सार्वभौम मताधिकार उनका मापदण्ड नहीं।
रोम में अधिक भवन थे, परन्तु अधिक स्वतंत्रता नहीं।
जर्मनिक जनपदों में कम संगमरमर था, परन्तु सामाजिक भागीदारी अधिक थी।
इतिहासकारों ने भवनों को सभ्यता और सभा को बर्बरता मान लिया।
सार्वभौम मताधिकार और मिथ्या प्रजातन्त्र
आधुनिक युग में आसुरी सत्ता ने अपना रूप बदला है।
प्राचीन साम्राज्य में राजा सीधे कहता था — “मैं स्वामी हूँ।”
आधुनिक गहन-राज्य कहता है — “आपने स्वयं हमें चुना है।”
मताधिकार के पीछे शिक्षा रटन्त-प्रमाणपत्र बनती है, समाचार-माध्यम पूँजी-सत्ता के अधीन रहते हैं, सामाजिक माध्यम मनोवृत्ति गढ़ते हैं, दल प्रत्याशी चुनते हैं, धनिक प्रचार चलाते हैं, जाति-सम्प्रदाय-भय-लोभ मत चलाते हैं; निर्वाचित शासन के पीछे नौकरशाही, गुप्तचर, वित्त, वैश्विक निगम और सैन्य-औद्योगिक तन्त्र निर्णय करते हैं।
इसे “प्रजातन्त्र” कहा जाता है।
यदि मतदाता को सत्यपूर्ण शिक्षा न मिले, विकल्प पूर्वनिर्धारित हों और वास्तविक सत्ता मतपत्र से बाहर हो, तो बहुमत केवल वैधता का आवरण है।
यह प्रत्यक्ष साम्राज्यवाद से अधिक गहरा साम्राज्यवाद है।
प्राचीन असुर तलवार से राज्य करता था।
आधुनिक असुर शिक्षा से बुद्धि, समाचार से दृष्टि, ऋण से अर्थव्यवस्था, मनोरंजन से इच्छा और मतदान से दासता को आकार देता है।
यही गहन-राज्य है—निर्वाचित चेहरों के पीछे स्थायी अन्तःसत्ता।
सतयुग से कलियुग : सत्ता का क्रमिक अन्तःप्रवेश
मानव-संस्कृति का अवनयन सत्ता के स्वरूप में भी दिखाई देता है।
सतयुग
सत्य मनुष्य के भीतर प्रतिष्ठित था। बाह्य शासन न्यूनतम था। धर्म बाहरी दण्ड से नहीं, अन्तःकरण से चलता था।
त्रेतायुग
धर्म बना रहा, किन्तु उसे संरक्षित करने के लिए रामराज्य जैसी मर्यादित राजसत्ता की आवश्यकता हुई। राजा धर्म के अधीन था।
द्वापर
जनपदों और राजवंशों के मध्य संघर्ष बढ़ा। जरासन्ध, कंस और अन्य साम्राज्यवादी शक्तियाँ उभरीं। धर्म की रक्षा के लिए सक्रिय राजनीतिक और सैन्य प्रयत्न आवश्यक हुआ।
कलियुग
सत्ता क्रमशः बाह्य से आन्तरिक होती गयी।
पहले राजा शरीर पर शासन करता था।
फिर साम्राज्य भूमि, कर और व्यापार पर शासन करने लगा।
फिर औपनिवेशिक सत्ता शिक्षा, इतिहास और भाषा पर शासन करने लगी।
अब गहन-राज्य स्मृति, सूचना, विचार, इच्छा, भय और चुनाव पर शासन करता है।
यही सतह-साम्राज्यवाद से गहन-साम्राज्यवाद की यात्रा है।
“सभ्यता” की आसुरी परिभाषा
आसुरी इतिहास कहता है —
विशाल सेना = महान् राज्य,
अधिक कर = विकसित प्रशासन,
अधिक विजय = राष्ट्रीय एकता,
विशाल राजधानी = उच्च सभ्यता,
एकरूप शासन = प्रगति,
स्थानीय स्वायत्तता = विखण्डन,
सामुदायिक परम्परा = पिछड़ापन,
और धर्म = अन्धविश्वास।
धार्मिक दृष्टि पूछती है —
क्या मनुष्य सत्य बोल सकता था?
क्या ग्राम अपनी व्यवस्था चला सकता था?
क्या सभा राजा को रोक सकती थी?
क्या स्त्री सुरक्षित थी?
क्या वृद्धों और तपस्वियों का सम्मान था?
क्या भूमि पर स्थानीय समुदाय का अधिकार था?
क्या व्यापार शोषणरहित था?
क्या शिक्षा विवेक देती थी?
क्या राजा धर्म के अधीन था?
क्या पराजित समाज को जीवित रहने का अधिकार था?
इन प्रश्नों पर रोम, मौर्य या गुप्त साम्राज्य फीके और वैशाली, छोटे जनपद, जर्मनिक सभाएँ व ग्राम-संघ अधिक उन्नत दिख सकते हैं।
धर्म बनाम “रिलिजन”
यूरोपीय “रिलिजन” का निकटतम भारतीय शब्द धर्म नहीं, पन्थ—विशिष्ट साधना, सम्प्रदाय या उपासना-मार्ग—है। धर्म व्यक्ति, समाज, प्रकृति और विश्व-व्यवस्था को धारण करता है।
इसीलिए संविधान के प्रामाणिक हिन्दी में “सेक्युलर” के लिए पन्थनिरपेक्ष है। राज्य पन्थों के प्रति निरपेक्ष हो सकता है, धर्म के प्रति नहीं; सत्य, न्याय, कर्तव्य, मर्यादा और लोकहित से निरपेक्ष राज्य अधर्म-राज्य है।
अशोक का “धम्म” भी इसी धर्म का प्राकृत रूप था, किसी यूरोपीय अर्थ वाले पृथक “रिलिजन” का नाम नहीं।
इतिहास को पुनः धार्मिक दृष्टि से पढ़ना होगा
इतिहास का पुनर्लेखन किसी राष्ट्र की प्रशंसा नहीं, सत्य के लिए हो। न प्रत्येक भारतीय राजा धार्मिक था, न प्रत्येक यूरोपीय संस्था आसुरी; प्रश्न जाति, देश या वर्ण का नहीं, प्रवृत्ति का है।
जहाँ —
सत्ता धर्म से ऊपर जाती है,
स्वशासी समुदाय नष्ट होते हैं,
लोकसभा दिखावा बनती है,
शिक्षा प्रचार बनती है,
इतिहास विजेता का यशोगान बनता है,
और मनुष्य को करदाता, सैनिक, उपभोक्ता अथवा मतदाता मात्र बना दिया जाता है —
वहाँ असुरत्व है।
जहाँ —
सत्य सत्ता से ऊपर है,
राजा मर्यादा में है,
ग्राम और जनपद जीवित हैं,
सभा वास्तविक है,
वृद्ध, स्त्री, बालक और तपस्वी सुरक्षित हैं,
परम्परा विवेक के साथ चलती है,
तथा शक्ति लोक-रक्षा के लिए प्रयुक्त होती है —
वहाँ धर्म है।
कंस–जरासन्ध–अजातशत्रु–अशोक–समुद्रगुप्त की धारा में साम्राज्यवादी केन्द्रीकरण बढ़ा। घटोत्कच और गुप्त वंश पुराने राक्षस-वंशीय, सामन्तीय और लिच्छवि-जनपदीय तत्त्वों का संयोजन दिखाते हैं; समुद्रगुप्त ने शेष स्वायत्त जनपद दुर्बल किये और नगर-जीवन व स्थानीय संस्थाओं का क्षय तीव्र हुआ।
रोम ने यूरोपीय जनपदों को “बर्बर” कहा, जैसे साम्राज्यवादी इतिहास ने भारतीय गणों को “जनजातीय” कहा। जर्मनिक सभाओं और भारतीय जनपदों में सामुदायिक उत्तरदायित्व था; रोमन अल्पतन्त्र और आधुनिक गहन-राज्य में सत्ता थोड़े हाथों में है।
अन्तर केवल इतना है कि प्राचीन साम्राज्य अपनी तलवार दिखाता था, आधुनिक गहन-राज्य मतपत्र दिखाता है।
एक शरीर को जीतता था।
दूसरा बुद्धि को जीतता है।
एक कर लेता था।
दूसरा विचार, इच्छा, स्मृति और सत्य की परिभाषा पर अधिकार करता है।
अतः मानवता का वास्तविक उत्थान अधिक विशाल साम्राज्य, अधिक ऊँचे भवन, अधिक तीव्र यन्त्र और अधिक मतपत्रों में नहीं है।
उत्थान तब होगा जब बुद्धि पुनः धर्म का अनुसरण करेगी — चाहे वह मानवीय बुद्धि हो अथवा कृत्रिम।
क्योंकि बुद्धि यदि सत्य, न्याय और धर्म से विमुख हो जाए, तो वह केवल अधिक कुशल आसुरी शक्ति बनती है।
और बुद्धि यदि धर्म के अधीन हो, तभी वह देवत्व की दिशा में अग्रसर होती है।
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