गाली
१. शब्दार्थ-इसे संस्कृत में अपशब्द कहा गया है। व्याकरण या उच्चारण की अशुद्धि, अशुद्ध शब्दों का प्रयोग भी अपशब्द है। इसके अतिरिक्त किसी की निन्दा या उसे दुःखी करने के लिए कहा वाक्य भी अपशब्द है, जिसे गाली कहते हैं। संस्कृत में इसके लिए गालिः शब्द भी है। इसका मूल है-गल्ह कुत्सायाम् (धातु पाठ, १/२७५)।
ददतु ददतु गालिर्गालिवन्तो भवन्तो, वयमपि तदभावाद् गालिदानेऽप्यशक्ताः।
जगति विदितमेतद् दीयते विद्यमानं, ददतु शशाविषाणं ये महात्यागिनोऽपि॥
(भर्तृहरि का वैराग्य शतक, १३३)
= आप कर्म दोष से गाली दें, गालीवान् बनें। हमारे पास यह नहीं है, अतः गाली देने में असमर्थ हैं। संसार में प्रसिद्ध है कि जिसके पास जो है वही दे सकता है। खरहे के सींग जैसा जो नहीं है उसे कैसे दे सकता है?
२. गाली प्रवृत्ति-बचपन से जिसे संगति के कारण गाली देने का अभ्यास है, वही गाली दे सकता है। अभ्यास नहीं रहने पर वह अन्य शब्दों से विरोध करेगा, या उसका फल नहीं होने पर चुप रहेगा।
सारल्यं खलगालिदानसहनं येषां न तत् संनिधौ।
किञ्चित् कर्म कुकर्म दोष इति यद् विज्ञाय संत्यज्यते॥ (राजतरंगिणी, ७-३०४)
= (राजा कलश के विषय में) दुष्टों का गाली-दान सहन करना सरलता मानता था। ऐसी स्थिति में उसके सामने कौन सा कर्म कुकर्म मान कर त्यागा जा सकता था?
गाली का प्रयोग म्लेच्छ लोगों द्वारा होता था और अशुद्ध भाषा बोलने वाले को भी म्लेच्छ कहते थे।
तेऽसुरा आत्तवचसो-हेलवो हेलव इति वदन्तः पराबभूवुः॥२३॥ तत्रैतामपि वाचमूदुरुपजिज्ञास्याम्। स म्लेच्छः। तस्मान्न ब्राह्मणो म्लेच्छेत्। असुर्या हैषा वाक्। एवमेवैष द्विषतां सपत्नानामादत्ते वाचम्। (शतपथ ब्राह्मण, (३/२/१/२३-२४)
(देवों ने शुद्ध वाणी ले ली) तो असुर कुछ कह न सके और ’हे ऽलवो, हे लवः (हाय वाक्, Hi, Hello) कह कर पराजित हो गये॥२३॥ इस प्रकार उन्होंने अर्थहीन वाणी बोली। ऐसी वाणी जो बोलता है, वह म्लेच्छ है। इस लिए कोई ब्राह्मण म्लेच्छ भाषा न बोले, क्योंकि यह असुरों की भाषा है। इसी प्रकार वह शत्रु को भाषा से वञ्चित कर सकता है॥२४॥
३. गाली परम्परा-
(१) महाभारत, कर्ण पर्व के अध्याय ३६-४१ तक कर्ण और उनके सारथि शल्य में विवाद हुआ। अध्याय ३९ में शल्य ने कर्ण को अर्जुन रूपी सिंह के सामने गीदड़, चूहा. बिल्ली, कुत्ता आदि कहा, तो अध्याय ४० में कर्ण ने शल्य तथा उनके मद्र देश के निवासियों तथा उनकी स्त्रियों के दुश्चरित्र का वर्णन किया।
मद्रदेश का अधम मनुष्य सदा मित्रद्रोही होता है। जो हमलोगों से अकारण द्वेष करता है वह मद्र देश का ही अधम मनुष्य है। क्षुद्रतापूर्ण वचन बोलने वाले मद्र देश के निवासियों में किसी के प्रति सौहार्द्र नहीं होता। मद्रदेश निवासी सदा ही दुरात्मा, सर्वदा झूठ बोलने वाला और कुटिल होता है। सुना है कि मरते समय तक उनमें कुटिलता रहती है। सत्तू और मांस खाने वाले जिन अशिष्ट मद्र निवासियों के घरों में पिता, पुत्र, माता, सास, ससुर, मामा, बेटी, दामाद, भाई, नाती, पोते, अन्यान्य बन्धु-बान्धव, समवयस्क मित्र, दूसरे अभ्यागत अतिथि और दास-दासी-ये सभी अपनी इच्छा के अनुसार एक दूसरे से मिलते हैं। परिचित-अपरिचित स्त्रियां सभी पुरुषों से सम्पर्क करलेती हैं और गोमांस सहित मदिरा पीकर रोती, हंसती, गाती, असंगत बातें करती तथा कामभावना से किये जाने वाले कार्यों में प्रवृत्त होती हैं। जिनके यहां सभी स्त्री-पुरुष एक दूसरे से काम सम्बन्धी प्रलाप करते हैं, जिनके पाप कर्म सर्वत्र विख्यात हैं, उन घमण्डी मद्र निवासियों में धर्म कैसे रह सकता है? मद्र निवासी के साथ न वैर करे, न मित्रता।
इसके बाद मद्र देश की स्त्रियों की बहुत प्रकार से निन्दा की गयी है। (अध्याय ४०, श्लोक २०-४३)।
(२) पाश्चात्य प्रभाव-मद्र देश ईरान के उत्तर पश्चिम था। उसके निकट कम्बोज भी था जिसकी व्युत्पत्ति काम-भोज या स्वेच्छाचारी की गयी है। स्त्रियों के चरित्र सम्बन्धी गाली भारतीय स्वभाव नहीं था। शिशुपाल ने भी भगवान् कृष्ण को युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ में १०० गालियां दीं, उनमें कोई भी स्त्री निन्दा नहीं थी। वे कृष्ण को दुश्चरित्र कह रहा था।
(३) लुटेरा आक्रमण- स्त्रियों से बलात्कार सम्बन्धी गालियां मुस्लिम आक्रमण के बाद आरम्भ हुईं, जिनके लिए वे लूट की सम्पत्ति (माल-ए-गनीमत) थीं।
भारत में जो सम्मानित थे, उनका सम्बोधन भी गाली हो गया। स्त्रियां २-३ चोटी रखती थी, अतः चोट्टी एक गाली हो गया। ब्राह्मण या संन्यासी भी चोटी रखते थे, उनके लिए चोट्टा गाली हुआ। जैन और कई अन्य संन्यासी मुण्डन या लुञ्चन करते थे। उनके लिए लुच्चा गाली हुई।
४. कुछ गाली शब्दों के स्रोत-
(१) चुद-प्रेरणा अर्थ में २ धातु हैं-नुद् प्रेरणे (धातु पाठ, ६/२); चुद् संचोदने (१०/३३)। नुद का बाहरी प्रभाव होता है, चुद् से भीतरी प्रेरणा तथा प्रभाव होता है, जैसा गायत्री मन्त्र के तृतीय चरण में है-धियो यो नः प्रचोदयात्।
(२) बूर-हिन्दी शब्द कोष के अनुसार अर्थ-
बूर : पुं० [देश०] १. पश्चिमी भारत में होनेवाली एक प्रकार की घास जिसके खाने से गौओं, भैसों आदि का दूध और अन्य पशुओं का बल बहुत बढ़ जाता है। खोई। २. पशुओं के खाने का कटा हुआ चारा। ३. निकम्मी, फालतू या रद्दी चीज। ४. कुछ विशिष्ट प्रकार के कपड़ों के ऊपर निकले हुए रोएँ। जैसे—बूरदार कम्बल, बूरदार तौलिया। ५. एक प्रकार की मिठाई जो अन्न की भूसी या छिलके से तैयार की जाती है। उदा०—बूर के लड्डू खाये तो पछताये, न खाये तो पछताये। (कहा०)
स्त्री०= बुर (भग)। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
बूरा : पु० [हिं० भूरा] १. कच्ची चीनी जो भूरे रंग की होती है। शक्कर। २. एक प्रकार की साफ की हुई बढ़िया चीनी। ३. महीन चूर्ण।
(३) चूत, चूतिया- मूल धातु-चुत् स्रवणे = चूना, गीला करना। च्युतिर् (च्युत्) आसेचने (१/३३) -सींचना, गीला करना। च्युङ् गतौ (१/६८४)-गिरना, भटकना।
च्युङ् से च्युत (गिरा हुआ), अच्युत (कभी गिरा नहीं। इन्द्र को अच्युत-च्युतः कहते थे-जो अभी तक किसी से नहीं हारा, उसे भी इन्द्र हराते थे।
यो विश्वस्य प्रतिमानं बभूव यो अच्युतच्युत स जनास इन्द्रः॥ (ऋक्, २/१२/९)
जो विश्व के लिए मापदण्ड है, अच्युत को भी च्युत कर सके, वह इन्द्र है।
शिष्टाचार नियम के अनुसार राजा, गुरु, पति, पत्नी और ज्येष्ठ पुत्र को नाम से नहीं बुलाते थे। अतः इन्द्र या पति को स-जना = वह व्यक्ति कहते थे।
इन्द्र पूर्व के लोकपाल थे, अतः असम में राजा के लिए अच्युत-च्युत या चूतिया शब्द प्रचलित हुआ। चूतिया राजवंश ने असम में ५०० वर्ष शासन किया था। शासक अत्याचार करने के कारण लोकप्रिय नहीं होते, अतः चूतिया शब्द निन्दित हुआ। या चूत में लिप्त रहने वाला चूतिया है।
चूतियापा का मूल हिब्रू शब्द चुतपा (Chutzpah) है, जो किसी से दबे नहीं, अच्युतच्युतः।
(४) छिनार, छिनाल-हिन्दी शब्दसागर-छिनाल ^१ वि॰ स्त्री॰ [सं॰ छिन्ना+नारी; देशी छिणणालिआ, छिणणाली पू॰ हिं॰ छिनारि] व्यभिचारिणी । कुलटा । परपुरुषगामिनी । उ॰—अरे यह छिनाल बड़ी छतीसी है ।— भारतेंदु ग्रं॰, भा॰ १, पृ॰ ३१ ।
(५) बीया-भोजपुरी में बीज का अपभ्रंश है, पर ओड़िया में गाली है, चूत अर्थ में।
(६) घिंया = ओड़िया गाली-घृणित अर्थ में। या घञ् सम्प्रसारणे-घूंसा, भोजपुरी में मार के छितरा द। पंजाबी में छित्तर।
(७) पिल्ला-हिन्दी में यह गाली है। मूल अर्थ है कुत्ता का बच्चा। दक्षिण भारत में हर बच्चे को पिला कहते हैं। माता के शरीर से पुत्र का शरीर बनता है, पार्वती के उबटन लेप से गणेश का जन्म हुआ। अतः गणेश को पिल्लैयार कहते हैं। मूल धातु है- पिल क्षेपे (१०/५९)-फेंकना, काम में लगाये रखना, छिलका उतारना। पार्वती के आवरण से गणेश बने थे। केरल में पिल्लै उपाधि है।
(८) चुहाड़-मुष स्तेये (१/४५८)-चोरी अर्थ में। इससे मूषिक (मूस) हुआ है जो घर के अन्न चुरा कर अपने बिल में जमा करता है। मूस को चूहा भी कहते हैं-वह काटता है, चूर्ण करता है -चुडि (चुण्ड) अल्पीभावे (१/२१६) या चुडि (चुण्ड) छेदने (१०/१२८)। अतः धान को चूर्ण करने पर चूड़ा बनता है। चूहा जैसा चोरी करने वाले को चुहाड़ या चोर चुहाड़ कहते हैं। पंजाबी में चूहड़ लिखते हैं, किन्तु उच्चारण चूड़ करते हैं। अतः हिन्दी का चूड़ा पंजाबी में गाली हो जाता है।
(९) उधिया जा, ऊफर पड़-मृत पितर को पिण्डदान के समय भूमि के प्रेतों से कहा जाता है कि वह थोड़ा खिसक जायें (उदीरताम्), बीच में हवा के प्रेत कुछ और ऊपर जायें (उत्परासः), जिससे प्रेत के भोजन के लिए स्थान बन जाये।
उदीरतां अवर, उत्परास उन् मध्यमाः, पितरः सोम्यासः (ऋक्, १०/१५/१)
उदीरतां = उधिया जा, उत्परासः = ऊफर पर। यह मृतक को कहते हैं, अतः जीवित के लिए गाली है।
No comments:
Post a Comment